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अकबर की दोस्त थी खानिम बेगम! (163)

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अकबर की दोस्त
अकबर की दोस्त

कहने को तो खानिम बेगम अकबर की चाची थी किंतु उन दोनों की आयु में अधिक अंतर नहीं था। इस कारण दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई। इस प्रकार अकबर के बचपन की दोस्त थी खानिम बेगम!

बदख्शां का शासक मिर्जा सुलेमान अपनी पत्नी, भतीजे, जंवाई एवं मंत्रियों से धोखा खाकर अपने राज्य से हाथ धो बैठा तथा अपने अन्य भतीजे अकबर से सैनिक सहायता लेने के लिए भारत आया। अकबर उसका स्वागत करने के लिए स्वयं फतहपुर सीकरी से बाहर आया और तीन कोस आगे आकर अपने चाचा से मिला।

अकबर ने मिर्जा सुलेमान को बड़ी संख्या में हाथी-घोड़े एवं धन-दौलत उपहार के रूप में भेंट किए तथा उसे विश्वास दिलाया कि मैं पंजाब से एक सेना खानेजहाँ के नेतृत्व में बदख्शां भेजूंगा ताकि कृतघ्न कामरान के कृतघ्न पुत्र मिर्जा शाहरुख को बदख्शां से निकाला जा सके।

मिर्जा सुलेमान ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अकबर को उसी प्रकार अपना बादशाह मान लिया, जिस प्रकार मिर्जा सुलेमान अकबर के दादा बाबर को और अकबर के पिता हुमायूँ को अपना बादशाह मानता था। अकबर मिर्जा सुलेमान को अपने महलों में ले गया।

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि अकबर ने मिर्जा सुलेमान के लिए हथियापोल में विशेष आवास बनवाया जहाँ नक्कारखाना बना हुआ था। शाम के समय अकबर प्रायः इबादतखाने में जाया करता था, अब वह अपने चाचा सुलेमान को भी उसमें ले जाने लगा।

मिर्जा सुलेमान के लिए इबादतखाना एक विस्मयकारी एवं आह्लादकारी स्थान सिद्ध हुआ। मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि मिर्जा सुलेमान शेखों एवं दरवेशों का सान्निध्य प्राप्त करके आनंद से चीखने लगता। वह सामूहिक प्रार्थना में सम्मिलित होने में कभी भी चूक नहीं करता था।

मुल्ला लिखता है कि एक दिन जब मैंने अपनी इबादत पूरी की तो मिर्जा सुलेमान ने मुझे टोका कि मैंने इबादत के बाद फातिहा क्यों नहीं पढ़ा! इस पर मैंने उससे कहा कि पैगम्बर के समय इबादत के बाद फातिहा पढ़ने का रिवाज नहीं था।

मेरा यह जवाब सुनकर मिर्जा सुलेमान नाराज हो गया। वह बोला कि क्या तुम यह कहना चाहते हो कि जो लोग इबादत के बाद फातिहा पढ़ते हैं, उन्हें इस्लाम का ज्ञान नहीं है तथा उनमें बुद्धि भी नहीं है?

इस पर मैंने मिर्जा सुलेमान से कहा कि हमें लिखित नियमों की पालना करनी चाहिए न कि फालतू के पचड़ों की। अकबर हम दोनों की यह बहस सुन रहा था, उसने मुझे आदेश दिया कि मैं फातिहा पढ़ूं। इस पर मैंने बादशाह के आदेश की पालना करते हुए फातिहा पढ़ा।

इस प्रकरण के माध्यम से मुल्ला बदायूंनी ने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि मिर्जा सुलेमान ने अकबर का विश्वास एवं स्नेह जीत लिए।

मुल्ला लिखता है कि पंजाब के शासक खानेजहाँ को आदेश दिया गया कि वह पांच हजार तीर-कमान-धारियों के साथ मिर्जा सुलेमान की सेवा में बदख्शां जाए तथा मिर्जा शाहरुख से बदख्शां प्राप्त करके मिर्जा सुलेमान के सुपुर्द कर दे और उसके बाद स्वयं लाहौर लौट आए।

इसी के साथ मुल्ला बदायूंनी इस प्रकरण को यह लिखकर बंद कर देता है कि वास्तव में मसला दूसरे ही प्रकार से हो गया। मुल्ला यह नहीं बताता कि मसला दूसरी प्रकार से कैसे हुआ।

अबुल फजल इस प्रकरण में थोड़ी जानकारी और देता है। हालांकि वह भी पूरी जानकारी नहीं देता किंतु जितना भी उसने लिखा है उससे अनुमान हो जाता है कि अकबर मिर्जा सुलेमान की कोई सहायता नहीं कर पाया और वह चाहकर भी कामरान के बेटे शाहरुख को बदख्शां से बाहर नहीं निकाल पाया। इसका कारण जानने के लिए हमें थोड़े पुराने इतिहास में जाना होगा।

पाठकों को स्मरण होगा कि मिर्जा कामरान का एक पुत्र अकबर के पिता हुमायूँ के पास भी रहा करता था जिसका नाम मिर्जा अबुल कासिम था। मिर्जा कामरान की बेटी गुलरुख बेगम और गुलरुख बेगम का पुत्र इब्राहीम हुसैन मिर्जा भी हुमायूँ के पास रहते थे। जब अकबर बादशाह बना तो कामरान की औलादें अकबर के संरक्षण में रहने लगीं।

बहुत से मुगल अमीर कामरान की औलादों को अकबर के विरुद्ध भड़काते रहते थे। अतः अकबर ने अपना भविष्य सुरक्षित बनाने के लिए अपने चचेरे भाई मिर्जा अबुल कासिम की बिना किसी अपराध के ही हत्या करवा दी थी।

इस कारण कामरान की बेटी गुलरुख बेगम और उसका बेटा इब्राहीम हुसैन मिर्जा भी बागी हो गए थे। बाद में अकबर ने मिर्जा इब्राहीम हुसैन मिर्जा की भी हत्या करवा दी थी और गुलरुख बेगम दक्षिण भारत के राज्यों में भाग गई थी।

चूंकि बदख्शां का नया शासक मिर्जा शाहरुख उसी कामरान का बेटा था, इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि अकबर को उसे भी नष्ट करने में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। फिर भी अकबर के लिए मिर्जा शाहरुख के विरुद्ध कदम उठाना आसान नहीं था। इसका एक विशेष कारण यह था कि शाहरुख की माता खानिम बेगम अकबर की बचपन की दोस्त थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि जब मिर्जा अस्करी एक साल के बालक अकबर को हुमायूँ के शिविर में से उठा कर ले गया था, तब मिर्जा कामरान ने अकबर को अपने हरम में रखा था जहाँ हुमायूँ की बुआ खानजादः बेगम ने अकबर को पाला था।

मिर्जा कामरान के हरम में बहुत सारी औरतें थीं जिनमें हर समय कुछ न कुछ वृद्धि होती रहती थी। कुछ समय बाद कामरान ने खानिम बेगम नामक एक बहुत सुंदर लड़की से विवाह किया। इस प्रकार खानिम बेगम से अकबर का पहला परिचय अपनी चाची के रूप में हुआ।

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जब हुमायूँ और कामरान की बुआ खानजादः बेगम कामरान के शिविर से हुमायूँ के पास चली गई तो अकबर की जिम्मेदारी कामरान की नई पत्नी खानिम बेगम को सौंप दी गई। कहने को तो खानिम बेगम अकबर की चाची थी किंतु उन दोनों की आयु में अधिक अंतर नहीं था। इस कारण खानिम बेगम अकबर की दोस्त बन गई।

समय के साथ दोनों के रिश्तों में बदलाव आया। जब हुमायूँ ने कामरान की आंखें फोड़कर उसे मक्का भेज दिया तो खानिम बेगम ने मिर्जा सुलेमान से निकाह कर लिया। इस नए रिश्ते में भी खानिम बेगम अकबर की चाची लगती थी। इस प्रकार अकबर और खानिम बेगम के बीच दोस्ती का जो रिश्ता बचपन में कायम हुआ था, वह आगे भी चलता रहा। इस रिश्ते में भी खानम बेगम अकबर की दोस्त बनी रही।

जब अकबर साढ़े तेरह वर्ष का हुआ तो वह अपने पिता हुमायूँ के साथ काबुल से भारत चला आया। उन बातों को अब बीस साल हो चुके थे। इस कारण अब वह दोस्ती केवल स्मृतियों में ही बची थी।

इस बीच समय कई बार करवटें ले चुका था। खानिम बेगम अपने पहले पति से हुए बेटे के साथ, अपने दूसरे पति मिर्जा सुलेमान के छोटे से बदख्शां राज्य पर कब्जा किए बैठी थी और उसका दूसरा पति मिर्जा सुलेमान अकबर से सहायता लेने के लिए फतहपुर सीकरी में शरण लिए हुए था।

भारत के विशाल प्रदेशों का स्वामी अकबर इस समय तक इतना शक्तिशाली हो चुका था कि वह न केवल बदख्शां के भाग्य का निर्णय कर सकता था अपितु सम्पूर्ण अफगानिस्तान को अपने पैरों तले रौंद सकता था!

अतः खानिम बेगम ने भी अपने दूत अकबर के पास भिजवाने का निश्चय किया ताकि वह अपना पक्ष अकबर के समक्ष रखकर अकबर को मिर्जा सुलेमान की सहायता करने तथा अपने पुत्र शाहरुख के विरुद्ध कार्यवाही करने से रोक सके। कुछ ही दिनों बाद शाहरुख मिर्जा के दूत अब्दुल रहमान बेग और मिर्जा अशाक भी अकबर के दरबार में आ पहुंचे।

 कहने को वे मिर्जा शाहरुख द्वारा भेजे गए थे किंतु वास्तव में वे खानिम बेगम के दूत थे और उसी के आदेश पर अकबर के पास आए थे। अबुल फजल ने लिखा है कि खानिम बेगम का विचार था कि मिर्जा सुलेमान ने, न जाने बादशाह पर क्या प्रभाव डाला होगा!

उससे अवश्य ही शाहरुख मिर्जा के सम्मान की क्षति हुई होगी। अब्दुल रहमान बेग और मिर्जा अशाक ने खानिम बेगम और उसके पुत्र शाहरुख मिर्जा की प्रार्थना अकबर के समक्ष प्रस्तुत की तो अकबर ने स्नेह और शिष्टता से उस प्रार्थना को स्वीकार किया। फिर उनको विदा कर दिया।

अकबर ने कुछ दिनों पहले ही पंजाब के सूबेदार खानेजहाँ को आदेश दिए थे कि वह बदख्शां पर कार्यवाही करके मिर्जा सुलेमान को उसका राज्य वापस दिलवाए किंतु अब अकबर ने अपना इरादा बदल दिया तथा खानेजहाँ को बंगाल का सूबेदार बनाकर भेज दिया।

मिर्जा सुलेमान ने अपनी आशा पूरी होते हुए नहीं देखकर हज्जाज पर जाने का निश्चय किया। उसका सोचना था कि शायद वहाँ जाने से बदख्शां प्राप्त करने का कोई मार्ग खुल जाए। जब सुलेमान ने अकबर से हज्जाज जाने की अनुमति मांगी तो अकबर ने कुलीज खाँ तथा रूपसिंह को आदेश दिया कि वे सुलेमान को गुजरात के बंदरगाह तक पहुंचा दें। मिर्जा सुलेमान को हज्जाज रवाना कर दिया गया। इस प्रकार अकबर ने अपनी बचपन की दोस्त खानिम बेगम की बात रख ली और बदख्शां उसके पुत्र शाहरुख के पास ही रह गया।

अकबर के शत्रु (164)

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अकबर के शत्रु

उत्तर-पश्चिम के पहाड़ों से आने वाले अकबर के शत्रु अकबर को जीवन भर तंग करते रहे!

भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित पर्वतीय मार्गों से ईसा से भी कई हजार साल पहले से विदेशी आक्रमण होते रहे हैं। ये लोग भोजन-पानी, आवास एवं धन-दौलत पाने के लिए दुर्गम हिंदुकुश पर्वत को लांघकर भारत में घुसा करते थे।

अकबर का बाबा बाबर तथा पिता हुमायूँ भी उन्हीं आक्रांताओं में से थे किंतु अब उन्हीं का वंशज अकबर भारत के विशाल उत्तरी क्षेत्रों का स्वामी था। उत्तर-पश्चिमी सीमा से आने वाले लोगों एवं अकबर के पूर्वजों का खून भले ही एक था किंतु अब वे अकबर के शत्रु थे तथा अकबर के लिए आक्रांता थे।

इस कारण अकबर के लिये यह आवश्यक था कि वह अपनी सल्तनत की सुरक्षा के लिये गजनी, काबुल, कन्दहार, बिलोचिस्तान तथा सिंध आदि सीमांत प्रदेशों पर अपना प्रभाव स्थापित रखे और वहाँ सुदृढ़ दुर्गों का निर्माण करके उनमें मजबूत सैन्य बल रखे ताकि अफगानिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान आदि क्षेत्रों के लड़ाके भारत में प्रवेश न कर सकें। 

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चूंकि बदख्शां अफगानिस्तान के धुर उत्तर में स्थित था तथा उज्बेकिस्तान उससे भी ऊपर था, इसलिए बदख्शां एवं ट्रांसऑक्सिाना की राजनीति से अकबर के राज्य की सुरक्षा को कोई विशेष खतरा नहीं था, फिर भी काबुल, कन्दहार, बिलोचिस्तान, गजनी तथा सिंध की ओर सेअकबर के शत्रु जीवन भर आते रहे। इस कारण अकबर को अपनी सेना, शक्ति, समय एवं धन इन शत्रुओं से लड़ने में व्यय करना पड़ा।

पाठकों को स्मरण होगा कि चूचक बेगम जो कि अकबर की सौतेली माँ थी, ने एक बार अपने पुत्र हकीम खाँ को हिन्दुस्तान का बादशाह बनाने की योजना बनाई थी। उसे उजबेग सरदारों से भी प्रोत्साहन एवं समर्थन मिला था। इसलिये हकीम खाँ ने पंजाब पर आक्रमण किया था।

उजबेगों ने भी उसका साथ दिया था। तब अकबर ने स्वयं एक सेना लेकर पंजाब के लिए प्रस्थान किया था ताकि हकीम खाँ और उसके साथ आए उज्बेक लड़ाकों को दण्डित किया जा सके।

उस समय तो हकीम खाँ भयभीत होकर काबुल भाग गया था और अकबर ने भी उसे अपना छोटा भाई समझकर उसका पीछा नहीं किया था। इसके बाद ई.1580 तक हकीम खाँ चुप बैठा रहा। ई.1581 में अपने अमीरों के उकसाने पर हकीम खाँ ने फिर से पंजाब पर आक्रमण किया।

इस बार अकबर ने उसका पीछा किया और उसे काबुल से भी निकाल बाहर किया। जब हकीम खाँ ने अकबर से क्षमा-याचना की तो अकबर ने उसे फिर से काबुल का शासक बना दिया। इसके बाद हकीम खाँ ने फिर कभी विद्रोह नहीं किया। ई.1585 में हकीम की मृत्यु हो गई और अकबर ने फिर से काबुल पर प्रत्यक्ष अधिकार कर लिया।

अफगानिस्तान तथा भारत की पश्चिमोत्तर सीमा के मध्य स्थित पहाड़ी प्रदेश सदियों से कबाइली क्षेत्र कहलाता है। इस क्षेत्र में उजबेग, रोशनियाँ, युसुफजई आदि जातियों के कबीले निवास किया करते थे जो बड़े ही विद्रोही प्रकृति के थे।

काबुल की रक्षा के लिए इन कबीलों पर नियंत्रण रखना आवश्यक था। इसलिये अकबर ने इन कबीलों को परास्त करके उन्हें अपने नियंत्रण में लाने का निश्चय किया। अकबर ने सबसे पहले उजबेगों का दमन आरम्भ किया क्योंकि उजबेगों तथा मुगलों की पुश्तैनी शत्रुता थी और उन्हीं से अकबर को सबसे बड़ा खतरा था।

उजबेगों की शक्ति छिन्न-भिन्न करने के बाद अकबर ने रोशनिया कबीले का दमन किया। इसके बाद अकबर ने बीरबल तथा जैनी खाँ को यूसुफजाइयों का दमन करने भेजा। ये दोनों सेनापति सहयोग से काम नहीं कर सके। इस कारण यूसुफजाइयों ने बीरबल को मार डाला।

इस पर अकबर ने राजा टोडरमल तथा शाहजादा मुराद की अध्यक्षता में एक सेना भेजी। इस सेना ने यूसुफजाइयों को परास्त करके उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया। इस प्रकार पश्चिमोत्तर प्रदेश के कबाइली क्षेत्रों पर अकबर का नियंत्रण हो गया।

ई.1586 में अकबर ने राजा भगवानदास तथा कासिम खाँ की अध्यक्षता में एक सेना काश्मीर पर आक्रमण करने के लिये भेजी। पर्वतीय प्रदेश होने के कारण काश्मीर में मुगल सेना को भयानक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा परन्तु अन्त में वह काश्मीर के शासक यूसुफ खाँ तथा उसके पुत्र याकूत को परास्त करने में सफल हुई।

पिता-पुत्र को बन्दी बनाकर बिहार भेज दिया गया और मानसिंह को काश्मीर का शासक बना दिया गया। इस प्रकार काश्मीर मुगल साम्राज्य का अंग बन गया।

पश्चिमोत्तर प्रदेश की सुरक्षा के लिए सिन्ध पर भी अधिकार करना आवश्यक था। उत्तरी सिन्ध पहले से ही मुगल साम्राज्य के अधीन था। अब केवल दक्षिणी सिन्ध को जीतना शेष था, जहाँ पर मिर्जा जानी, थट्टा को अपनी राजधानी बनाकर स्वतन्त्रता पूर्वक शासन कर रहा था।

ई.1590 में अकबर ने मुल्तान के हाकिम अब्दुर्रहीम खानखाना को थट्टा पर अधिकार करने भेजा। मिर्जा जानी मुगलों की विशाल सेना का सामना नहीं कर सका और उसने थट्टा तथा सिंहवान के दुर्ग मुगलों को समर्पित कर दिये। अकबर ने मिर्जा जानी के साथ उदारता का व्यवहार किया और उसे अपना जागीरदार बना लिया।

सिन्ध विजय के उपरान्त अकबर ने बिलोचिस्तान पर अधिकार करने का निश्चय किया। इन दिनों बिलोचिस्तान अफगानों के अधिकार में था। ई.1595 में अकबर ने मासूम खाँ की अध्यक्षता में एक सेना बिलोचिस्तान पर आक्रमण करने के लिए भेजी। इस सेना ने सम्पूर्ण बिलोचिस्तान को जीत लिया। इस प्रकार यह क्षेत्र भी अकबर के अधीन हो गया।

कन्दहार सामरिक तथा व्यापारिक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण नगर था। इसे भारत का फाटक कहा जाता था। इससे होकर विदेशी सेनाएँ भारत में प्रवेश करती थीं। फारस के शाह तथा दिल्ली के बादशाह दोनों की दृष्टि कन्दहार पर लगी रहती थी।

इन दिनों कन्दहार (कांधार) पर फारस के शाह का अधिकार था। महाभारत काल में इसे गांधार कहते थे। फारस के शाह ने मुजफ्फर हुसैन मिर्जा को कन्हदार का प्रांतपति बना रखा था। किसी कारण से फारस का शाह, मुजफ्फर हुसैन मिर्जा से नाराज हो गया।

उजबेग लोग भी कन्दहार पर आक्रमण करके मिर्जा को तंग कर रहे थे। इस स्थिति में मुजफ्फर हुसैन मिर्जा ने कन्दहार का दुर्ग अकबर को समर्पित कर दिया। इस प्रकार बिना युद्ध किये ही कन्दहार पुनः मुगलों के अधिकार में आ गया। फिर भी पश्चिमोत्तर के पहाड़ों में रहने वाले अकबर के शत्रु कभी शांति से नहीं बैठे।

दक्षिण के शिया राज्य (165)

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दक्षिण के शिया राज्य

अकबर पूरे भारत पर अधिकार करना चाहता था इसलिए दक्षिण के शिया राज्य अकबर की आंखों की किरकिरी बने हुए थे।

विंध्याचल की पहाड़ियाँ भारत को उत्तर-भारत तथा दक्षिण-भारत में विभक्त करती हैं। उत्तर भारत के कई शासक दक्षिण भारत पर आक्रमण करके उसे अपने साम्राज्य में सम्मिलित करते आये थे।

अकबर ने दक्षिण भारत पर अधिकार करने का निश्चय किया, इसके कई कारण थे। पाठकों को स्मरण होगा कि अकबर ने सम्पूर्ण भारत पर अधिकार करने का निश्चय किया था। अब तक वह पूर्व में बिहार, उड़ीसा, एवं बंगाल के आखिरी छोर तक अधिकार कर चुका था।

पश्चिम में गजनी से लेकर काबुल एवं कांधार तक का क्षेत्र उसके अधीन था। उत्तर में कांगड़ा एवं कश्मीर उसके अधीन थे। जबकि दक्षिण में वह केवल गुजरात एवं मालवा तक ही पहुंच सका था।

इन दिनों दक्षिण भारत की दशा अत्यंत शोचनीय थी। बहमनी राज्य छिन्न-भिन्न होकर पाँच स्वतन्त्र राज्यों- अहमद नगर, बीजापुर, गोलकुण्डा, बीदर तथा बरार में विभक्त हो गया था।

जब तक विजय नगर का हिन्दू राज्य जीवित था, तब तक ये पाँचों राज्य संगठित होकर उससे मोर्चा लेते रहे परन्तु जब ई.1565 में विजयनगर की पराजय तथा उसका उन्मूलन हो गया तब दक्षिण के मुसलमान राज्य सर्वोच्चता के लिए परस्पर संघर्ष करने लगे। अकबर ने दक्षिण की इस राजनीतिक कुव्यवस्था से लाभ उठाने का निश्चय किया। 

दक्षिण के राज्यों में इन दिनों शिया, सुन्नी तथा महदवी लोग एक-दूसरे को उन्मूलित करने का प्रयास कर रहे थे। अकबर को लगता था कि दक्षिण भारत के मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता अंततः इस्लाम का ही नुक्सान कर रही थी इसलिये अकबर ने दक्षिण भारत को मुगल सल्तनत के अधीन लाने का निश्चय किया।

इन दिनों अरब सागर के तट पर पुर्तगालियों की शक्ति तेजी से बढ़ रही थी। ये लोग अपनी राजनीतिक तथा व्यापारिक शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ ईसाई धर्म का प्रचार भी कर रहे थे। वे धार्मिक उन्माद के कारण मुसलमानों पर बड़े अत्याचार करते थे। इसलिये अकबर ने उन्हें अरब सागर के तट से उन्मूलित करने का निश्चय किया।

पुर्तगालियों को उन्मूलित करने के दो उपाय थे- या तो अकबर स्वयं एक विशाल जहाजी बेड़े का निर्माण करके पुर्तगालियों पर आक्रमण करता या फिर वह दक्षिण भारत के राज्यों पर अधिकार करके उनके साधनों से पुर्तगालियों पर आक्रमण करता। अनेक कारणों से जहाजी बेड़े का निर्माण कर पाना संभव नहीं था। इसलिये अकबर ने दक्षिण के राज्यों को मुगल साम्राज्य के अधीन लाने का निर्णय किया।

दक्षिण भारत पर आक्रमण करने का एक बड़ा कारण और भी था। साम्राज्य विस्तार के लिये अकबर ने विशाल सेना का निर्माण कर लिया था। इस सेना को राजधानी के निकट रखना अत्यंत खतरनाक था। वह किसी भी समय विद्रोह कर सकती थी। सेना की विभिन्न टुकड़ियों में संघर्ष न हो इसके लिये उसे निरन्तर युद्धों में संलग्न रखना आवश्यक था।

इस सेना का वेतन चुकाने के लिये धन की आवश्यकता रहती थी। सेना की इन तीनों आवश्यकताओं की पूर्ति दक्षिण भारत पर आक्रमण करके की जा सकती थी।

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अकबर के दक्षिण अभियान की चर्चा आरम्भ करने से पहले हमें दक्षिण भारत के पांच शिया मुस्लिम राज्यों के उदय के इतिहास की कुछ चर्चा करनी चाहिए। आज जिस भूभाग को महाराष्ट्र के नाम से जाना जाता है, किसी समय उस भूभाग पर देवगिरि नामक अत्यंत प्राचीन राज्य स्थित था।

ई.1306 में अल्लाउदीन खिलजी के गुलाम मलिक काफूर ने देवगिरि के राजा रामचंद्र और उसके परिवार को कैद करके दिल्ली भेज दिया था और देवगिरि को दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित कर लिया था। तब से दक्षिण में मुस्लिम शासन का आरंभ हुआ।

इसी देवगिरि में हसन गंगू नामक एक शिया मुसलमान का जन्म हुआ। फरिश्ता ने लिखा है कि बड़े होने पर हसन गंगू ने एक ब्राह्मण के यहाँ नौकरी कर ली।

एक दिन उस ब्राह्मण ने हसन गंगू की भाग्य-रेखाओं को देखकर बताया कि एक दिन तू इस प्रदेश का राजा बनेगा। उसी ब्राह्मण के निर्देश पर हसन गंगू मुहम्मद बिन तुगलक की सेना में भर्ती हो गया और शीघ्र ही वह दक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत का सबसे विश्वस्त आदमी बन गया।

ई.1347 में देवगिरि का सुल्तान मर गया। स्थितियाँ कुछ इस तरह की बनीं कि हसन गंगू ‘हसन अब्दुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमनशाह’ के नाम से देवगिरि का सुल्तान बन गया और उसने अपने ब्राह्मण स्वामी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिये अपने नवनिर्मित राज्य का नाम ‘बहमनी राज्य’ रख दिया। अपने उसी पुराने ब्राह्मण स्वामी को हसन ने अपना प्रधानमंत्री बनाया।

कुछ लोग हसन गंगू की इस कहानी को झूठ मानते हैं। उनके अनुसार हसन गंगू एक विदेशी मुसलमान था। वह कुछ विद्रोहियों के साथ राजधानी दिल्ली छोड़कर दक्षिण भारत की ओर भाग आया था। उसने इस्माइल अफगान को सुल्तान के पद से हटा दिया और 3 अगस्त 1347 को स्वयं दक्कन का सुल्तान बन गया।

हसन गंगू ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाया। उसने जफर खाँ की उपाधि धारण की तथा अल्लाउद्दीन बहमनशाह के नाम से सुल्तान की गद्दी पर बैठा। उसके राज्य को बहमनी सल्तनत कहा गया। वह स्वयं को ईरान के शाह बहमन बिन असफन्द यार का वंशज बताता था।

हसन गंगू के वंशज एक से बढ़कर एक क्रूर और अत्याचारी सुल्तान हुए तथा उन्होंने अपनी पूरी शक्ति अपने पड़ौसी विजयनगर साम्राज्य को कुचलने में लगाई। ई.1422 में अहमदशाह बहमनी राज्य का सुल्तान हुआ। वह हसन गंगू की पांचवी पीढ़ी में था।

उसने विजयनगर पर आक्रमण करके बीस हजार स्त्री पुरुषों को मौत के घाट उतारा। विजयनगर के राजा देवराय को अपनी प्रजा की रक्षा के लिये अहमदशाह की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।

ई.1461 में हसन गंगू की सातवीं पीढ़ी में उत्पन्न हुमायूँ बहमनी राज्य का सुल्तान हुआ। वह क्रूरता की जीती-जागती मिसाल था। उसे इतिहास में जालिम हुमायूँ कहा गया है।

उसके अमीर जब प्रातः उसे सलाम करने जाते थे तो अपने बच्चों से अंतिम विदा लेकर जाते थे क्योंकि उनके वापिस जीवित लौटने की निश्चितता नहीं थी। वह कुसूरवार को ही नहीं अपितु उसके पूरे परिवार को मौत के घाट उतार देता था।

हसन खाँ गंगू के वंशज पौने दो सौ साल तक बहमनी राज्य पर शासन करते रहे। ई.1538 में इस वंश के अंतिम सुल्तान कलीमुल्ला शाह की मृत्यु के बाद उसका बेटा इलहमातउल्ला वेश बदल कर मक्का भाग गया। उसके बाद बहमनी राज्य पाँच राज्यों में विभक्त हो गया।

पहला राज्य अहमदनगर, दूसरा खानदेश, तीसरा बीजापुर, चौथा बरार और पाँचवा गोलकुण्डा। इन पाँचों राज्यों में शिया मुस्लिम शासन करने लगे। वे सब के सब अपने आप को बादशाह कहते थे। जब पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर में भारत के विशाल क्षेत्र अकबर के अधीन हो गए तब अकबर ने दक्षिण भारत के इन पांचों शिया राज्यों को निगलने की तैयारी आरम्भ कर दी।

हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं! (166)

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हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं

रसखान पठान की बहिन दीवानी जिसे मुगलानी ताज भी कहा जाता था, ब्रजक्षेत्र में रहकर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के पद रचा करती थी। उसने अपने एक पद में लिखा था- हों तो मुगलानी हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं! जब अहमदनगर की शहजादी चांद बीबी भी ताज के मार्ग पर चल पड़ी तो मुसलमानों ने चांद बीबी की हत्या कर दी!

जब पूर्व, पश्चिम तथा उत्तर दिशाओं में भारत के विशाल क्षेत्र अकबर के अधीन हो गए तब अकबर ने अपनी सल्तनत के दक्षिणी छोर पर स्थित पांच शिया राज्यों को निगलने की तैयारी आरम्भ कर दी।

बहुत से इतिहासकारों ने लिखा है कि अकबर ने दक्षिण के राज्यों के साथ शान्ति-पूर्वक समझौता करने का प्रयत्न किया। ई.1591 में उसने दक्षिण के चार प्रधान राज्यों- अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा तथा खानदेश के पास प्रस्ताव भेजा कि वे अकबर की अधीनता स्वीकार कर लें।

खानदेश के शासक ने अकबर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया किंतु शेष तीनों राज्यों ने अकबर का प्रस्ताव ठुकरा दिया। इसलिये अकबर को दक्षिण के राज्यों पर आक्रमण करने का निश्चय करना पड़ा।

अकबर ने सबसे पहले अहमदनगर राज्य पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इस अभियान की चर्चा करने से पहले हमें अहमदनगर की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा करनी होगी।

इन दिनों अहमदनगर अपने अमीरों की आपसी लड़ाई से अत्यंत जर्जर हो चला था। अहमदनगर के शासक बुरहान निजामशाह की मृत्यु के बाद उसका बेटा इब्राहीम निजामशाह अहमदनगर के तख्त पर बैठा। मात्र चार माह बाद ही वह बीजापुर के बादशाह आदिल खाँ द्वारा मार दिया गया।

उस समय इब्राहीम निजामशाह का बेटा बहादुर निजामशाह मात्र डेढ़ वर्ष का था। अतः इब्राहीम की बहिन चाँद बीबी राजकाज चलाने लगी किंतु मुस्लिम अमीरों को औरत का शासन स्वीकार नहीं हुआ। वे चाँद बीबी के विरुद्ध दो धड़ों में विभक्त हो गये।

पहला धड़ा दक्खिनियों का था जिनका नेता मियाँ मंझू था। दूसरा धड़ा हब्शियों का था जिनका नेता इखलास खाँ था। दक्खिनियों के नेता मियाँ मंझू ने अहमदनगर में घुसकर डेढ़ साल के शासक बहादुर निजामशाह को उसकी फूफी चाँद बीबी से छीनकर जुनेर के किले में भेज दिया और दौलताबाद में कैद अहमदशाह को बुलाकर तख्त पर बैठा दिया।

उस समय तो हब्शी भी मियाँ मंझू से सहमत हो गये किंतु बाद में जब उनके सरदार इखलास खाँ को पता लगा कि अहमदशाह शाही परिवार में से नहीं है तो हब्शियों ने अहमदशाह के स्थान पर दुबारा से डेढ़ साल के बहादुरशाह को अहमदनगर का सुल्तान बनाने के लिये अहमदनगर घेर लिया और जुनेर के किलेदार से किले में कैद शिशु सुल्तान बहादुरशाह को मांगा।

जुनेर का किलेदार मियाँ मंझू का विश्वस्त आदमी था। उसने बहादुरशाह हब्शियों को सौंपने से इन्कार कर दिया। जब हब्शी किसी भी तरह बहादुर निजामशाह को नहीं पा सके तो उन्होंने अहमदनगर के बाजार से मोतीशाह नामक एक लड़के को पकड़ लिया और घोषणा की कि यह लड़का निजाम के परिवार से है, अतः इसे बादशाह बनाया जाता है।

कुछ दक्खिनी सरदार भी हब्शियों से आ मिले। इस प्रकार दस-बारह हजार हब्शी और दक्खिनी घुड़सवार मोतीशाह के साथ हो गये।

इस पर मियाँ मंझू ने गुजरात से शहजादी मुराद को अहमदनगर बुलवाया जो बुरहान निजामशाह के परिवार से थी। अभी शहजादी मार्ग में ही थी कि हब्शियों में जागीरों के बंटवारे को लेकर आपस में तलवारें चल गईं। बहुत से हब्शी आपस में ही कटकर मर गये।

दक्खिनी सरदार, हब्शियों की यह हालत देखकर फिर से मियाँ मंझू के पास चले गये। अपने आदमियों को फिर से अपने पास आया देखकर मियाँ मंझू ने हब्शियों पर हमला कर दिया और बहुत से हब्शी मार गिराये। शेष हब्शी जान बचाकर भाग खड़े हुए।

हब्शियों से निबटकर मियाँ मंझू ने डेढ़ साल के बादशाह बहादुर निजामशाह की फूफी चाँद बीबी से निबटने की योजना निर्धारित की जो इस समय बहादुरशाह की संरक्षक की हैसियत से अहमदनगर पर शासन कर रही थी। उसी समय मियाँ मंझू ने सुना कि मुगल शहजादा मुराद और खानखाना अब्दुर्रहीम विशाल सेना लेकर अहमदनगर की ओर बढ़ रहे हैं।

मंझू जानता था कि वह मुगल सेना के सामने नहीं टिक सकेगा। इसलिये उसने अन्सार खाँ को खजानों तथा चाँद बीबी की चौकसी पर नियुक्त किया तथा स्वयं बीजापुर, बरार और गोलकुण्डा से सहायता लेने के बहाने से अहमदनगर से बाहर निकल गया।

मंझू के अहमदनगर से बाहर निकलते ही चाँद बीबी ने मुरतिजा निजामशाह के धाभाई मुहम्मद खाँ के साथ मिलकर अन्सार खाँ को मार डाला और किले में डेढ़ साल के बालक बहादुर निजामशाह की दुहाई फेर दी।

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कहा जाता है कि एक दिन चांद बीबी अपनी पालकी में सवार होकर अहमदनगर के बाजार से गुजर रही थी, तब अचानक ही कहारों ने पालकी बीच मार्ग में खड़ी कर दी। इस पर चांद बीबी ने कहारों से पूछा कि तुमने पालकी क्यों रोकी है?

कहारों ने जवाब दिया कि हुजूर सामने से छोटे सरकार की पालकी आ रही है। उसे देखने के लिये सैंकड़ों बाशिंदे रास्ते के दोनों ओर जमा हैं। जब छोटे सरकार की सवारी निकल जायेगी तब हम लोग आगे बढ़ पाएंगे।

चांद बीबी ने आश्चर्य-चकित होकर पूछा कि हमारी सल्तनत में ये छोटे सरकार कौन हैं?’

पालकी के आगे चलने वाले घुड़सवार सिपाहियों ने चांद बीबी को बताया कि मथुरा के राजा किसनजी की सवारी जा रही है जिन्हें हिन्दू लोग फरिश्ता मानते हैं। उन्हीं को ये कहार छोटे सरकार कह रहे हैं। आज देवझूलनी ग्यारस है, इसलिए हिन्दू लोग किसनजी के बुत को तालाब में नहलाने के लिए ले जा रहे हैं।

चांद बीबी ने उन कहारों से पूछा कि उन्होंने हिन्दुओं के फरिश्ते किसनजी को छोटे सरकार क्यों कहा?

इस पर एक कहार ने जवाब दिया कि आप बड़ी सरकार हैं। इसलिए हमने मथुरा के राजा किसनजी को छोटे सरकार कहा। तब तक किसनजी की सवारी बिल्कुल निकट आ गई तथा उसके साथ बज रहे ढोल-बाजों और सामूहिक स्वरों में गाये जाने वाले कीर्तन की आवाजें भी स्पष्ट हो गईं।

पालकी के पर्दे के भीतर बैठी चाँद उस कीर्तन को सुनती रही। ऐसा संगीत उसने आज से पहले कभी नहीं सुना था। शब्द भी क्या थे जैसे आदमियों के कण्ठों से नहीं, आसमानी फरिश्तों के कण्ठों से निकल रहे हों! लगता था जैसे किसी ने शब्दों में सुगंध भर दी थी जिनकी महक से चारों ओर का वातावरण महकने लगा था!

कीर्तन सुनकर चाँद आपे में नहीं रही। वह अचानक पालकी का पर्दा उठाकर बाहर निकल आई। उसके शरीर पर बुर्का नहीं था। एक बिजली सी चमकी और लगा जैसे दिन में ही चाँद निकल आया।

देखने वालों की आँखें चुंधिया गयीं। पूनम का जो चाँद आसमान के रहस्यमयी पर्दों में से निकलता था आज पालकी के पर्दों में से प्रकट हुआ। कहार, चोबदार और घुड़सवार हड़बड़ाकर एक दूसरे का मुँह देखने लगे।

चांद बीबी अपनी शाही मर्यादा भुलाकर किसनजी की सवारी की तरफ दौड़ पड़ी। चोबदार और दूसरे सैनिक सुलताना के पीछे दौड़े। चाँद अपने होश में नहीं थी।

वह बदहवासों की तरह भगवान कृष्ण की सवारी की तरफ भागी। आगे-आगे कीमती कपड़ों में सजी-धजी एक मुस्लिम औरत और उसके पीछे सिपाहियों और चोबदारों को इस तरह भागकर आते हुए देख भगवान कृष्ण की शोभायात्रा में चल रहे लोग डरकर पीछे हट गये।

चाँद आगे बढ़ती रही और मार्ग स्वतः खाली होता गया! गाजे-बाजे बंद हो गये और भगवान की सवारी रुक गयी।

ठीक भगवान के झूले के सामने जाकर चाँद खड़ी हो गयी और आँखें फाड़-फाड़ कर भगवान के विग्रह को निहारने लगी। उसने पलक तक नहीं गिरायी। चाँद को लगा कि किसनजी का बुत उसे अपनी ओर खींच रहा है। उसके मन में विचारों की आंधी उमड़ पड़ी।

क्या यही है मुगलानी ताज का वह साहब सिरताज! नन्दजू का पूत? जिसने रुक्मनी और द्रौपदी की लाज रखी? मैं भी तो एक औरत हूँ, क्या यह मेरी लाज रखेगा? क्या सचमुच ही यह कोई आसमानी फरिश्ता है? ऐसी क्या बात है इसमें? यह मुझे अपनी ओर क्यों खींच रहा है?

क्या बुत किसी इंसान को खींच सकता है? क्या इसमें वाकई कोई आसमानी ताकत है?

चांद के मुख से अचानक निकल पड़ा- ‘हूँ तो मुगलानी हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं!’

पाठकों को बताना समीचीन होगा कि रसखान पठान की बहिन दीवानी जिसे मुगलानी ताज भी कहा जाता था, ब्रजक्षेत्र में रहकर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के पद रचा करती थी। उसी के एक पद को लक्ष्य करके चांद ने कहा- हूँ तो मुगलानी हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं!

जब बहुत देर तक चाँद सुलताना बुत बनी हुई, अपलक होकर भगवान की प्रतिमा को निहारती रही तो उसके सिपाहियों में बेचैनी फैल गयी। उन्होंने साहस करके पूछा- ‘यदि सुलताना का हुकुम हो तो पालकी यहीं ले आयें?’

अंगरक्षक दल के नायक की बात सुनकर सुलताना जैसे किसी अदृश्य लोक से निकल कर फिर से धरती पर आयी। क्या कमाल की बात है? अभी-अभी तो यहाँ कोई नहीं था। कहाँ चले गये थे ये लोग और फिर अचानक कहाँ से आ गये?

किसी से कुछ न कहकर चाँद फिर से पालकी की ओर मुड़ी। तब तक कहार पालकी लेकर वहीं पहुँच चुके थे। भक्तों ने चाहा कि जब सुलताना की पालकी निकल जाये तो भगवान की सवारी को आगे बढ़ायें किंतु सुलताना ने कहा कि ये बड़े सरकार हैं, पहले इनकी सवारी आगे बढ़ेगी उसके बाद छोटे सरकार यानि हमारी सवारी जायेगी।

पूरा आकाश भगवान मुरली मनोहर और सुलताना बीबी की जय-जयकार से गूंज उठा। भक्तों ने अबीर गुलाल और पुष्पों की वर्षा करके उस क्षण को सदैव के लिये स्मरणीय बना दिया। चांद के कानों में बार-बार हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं गूंजता रहा।

आनंद में मग्न वे लोग नहीं जानते थे कि चांद के देश को ग्रहण लगाने के लिए अकबर रूपी राहू तेजी से बढ़ा चला आ रहा था!

अकबर का बेटा मुराद बड़ा नामुराद निकला (167)

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अकबर का बेटा मुराद

अकबर का बेटा मुराद एक नम्बर का धोखेबाज, घमण्डी, स्वार्थी तथा अविश्वसनीय शाहजादा था। उसका नाम भले ही मुराद था किंतु वास्तव में वह नामुराद था। वह किसी से भी सीधे मुँह बात नहीं करता था।

जब अकबर ने दक्षिण भारत में अहमदनगर, खानदेश, बीजापुर, बरार और गोलकुण्डा राज्यों में अपने पैर पसारने का निश्चय किया तो उसने इन राज्यों को संदेश भिजवाया कि वे अकबर की अधीनता स्वीकार करें तथा नियमित रूप से कर भिजवाया करें।

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खानदेश के शाह राजा अली खाँ ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली किंतु शेष चार राज्यों ने अकबर को कर देने से मना कर दिया। इस पर अकबर ने अहमदनगर राज्य पर हमला करने का निश्चय किया क्योंकि वहाँ का शाह मर गया था और उसकी बहिन चांद बीबी अपने डेढ़ वर्षीय भतीजे बहादुर निजाम शाह को गद्दी पर बैठाकर अहमदनगर का शासन चला रही थी।

ई.1593 में अकबर ने शहजादा दानियाल को अहमदनगर पर विजय प्राप्त करने तथा उसे अपने साम्राज्य में सम्मिलित करने के लिये भेजा। शहजादे की सेवा में बैराम खाँ के पुत्र अब्दुर्रहीम खानखाना को नियुक्त किया गया।

अकबर का बेटा मुराद पहले से ही अहमदनगर के मोर्चे पर नियुक्त था। मुगलिया खून की तासीर को देखते हुए कोई अनाड़ी भी यह भविष्यवाणी कर सकता था कि ये दोनों शहजादे दक्षिण में पहुँच कर शत्रु से लड़ने की बजाय आपस में लड़ेंगे। बादशाह को भी अपनी भूल का शीघ्र ही अनुमान हो गया।

उसने दानियाल को वापस बुला लिया और अकबर का बेटा मुराद इसी काम पर बना रहा। मुराद एक नम्बर का धोखेबाज, घमण्डी, स्वार्थी तथा अविश्वसनीय शाहजादा था। उसका नाम भले ही मुराद था किंतु वास्तव में वह नामुराद था। वह किसी से भी सीधे मुँह बात नहीं करता था।

दूसरी ओर खानखाना स्वतंत्र प्रवृत्ति का और अपने निर्णय स्वयं लेने वाला सेनापति था। इस प्रकार दो विपरीत प्रवृत्तियों के स्वामी एक साथ रख दिये गये। यदि मुराद बेर की झाड़ी था तो खानखाना केले का वृक्ष। ये दोनों एक बाग में एक साथ खड़े नहीं रह सकते थे। बेर की झाड़ी केले के पत्तों को शीघ्र ही चीर देने वाली थी।

शहजादा दानियाल खानखाना अब्दुर्रहीम का जवांई था तथा उसके स्वभाव में कुछ सहजता भी थी, खानखाना को उसके साथ काम करने में कोई कठिनाई नहीं थी होती थी किंतु मुराद निहायत बदतमीज किस्म का शहजादा था। वह किसी का भी लिहाज नहीं करता था।

जब खानखाना मार्ग में था, तब उसे इस परिवर्तन की जानकारी मिली। इसलिये खानखाना बादशाह से कुछ न कह सका और अपनी सेना लेकर भिलसा होता हुआ उज्जैन पहुँचा। उधर मुराद गुजरात में खानखाना का रास्ता देख रहा था। जब उसने सुना कि खानखाना मालवा चला गया है तो वह बहुत आग-बबूला हुआ। उसने खानखाना को चिट्ठी भिजवाई और ऐसा करने का कारण पूछा।

खानखाना ने जवाब भिजवाया कि खानदेश का सुल्तान राजा अली खाँ भी बादशाही फौज के साथ हो जायेगा। मैं उसको लेकर आता हूँ। तब तक आप गुजरात में शिकार खेलें। शहजादा मुराद इस जवाब को सुनकर और भी भड़का और अकेला ही गुजरात से दक्षिण को चल दिया।

 खानखाना यह समाचार पाकर अपना तोपखाना, फीलखाना और लाव-लश्कर उज्जैन में ही छोड़कर शहजादे के पीछे भागा।  अहमदनगर से तीस कोस उत्तर में चाँदोर के पास खानखाना शहजादे की सेवा में प्रस्तुत हुआ किंतु शहजादे ने खानखाना से भेंट करने से मना कर दिया।

खानखाना दो दिन तक मुराद के आदमियों से माथा खपाता रहा। अंत में मुराद ने खानखाना को अपने पास बुलाया और बड़ी बेरुखी से पेश आया। सलाम भी ढंग से नहीं लिया।

खानखाना ने प्रकट रूप में तो कुछ नहीं कहा किंतु उसने भी मन ही मन इस मगरूर शहजादे को सबक सिखाने का निश्चय कर लिया। मुराद ने खानखाना की तरह अन्य अमीरों को भी नाराज कर लिया। वे भी मुराद को नीचा दिखाने का निश्चय करके चुपचाप बैठे रहे।

अकबर के विश्वस्त सेनापति शहबाज खाँ कंबो, सादिक खाँ और अन्य कई अमीर जो अकबर के एक संकेत पर अपने प्राण न्यौछावर करने को तैयार रहते थे, अकबर के इस बदतमीज शहजादे को तमीज का पाठ पढ़ाने में जुट गए।

जब शहजादे मुराद और अब्दुर्रहीम खानखाना की सम्मिलित सेनाओं ने अहमदनगर से आधा कोस पहले पड़ाव डाला तो अहमदनगर के बहुत से स्थानीय जमींदार, व्यापारी और सेनापति शहजादे मुराद और खानखाना से रक्षापत्र लेने के लिये आये।

शहजादे और खानखाना ने अहमदनगर के प्रमुख लोगों को अभयपत्र दे दिए और उनसे कहा कि यदि चाँद बीबी लड़ने के लिये नहीं आयेगी तो नगर पर हमला नहीं किया जायेगा। यदि नगर पर हमला किया गया तो तुम लोगों के घर सुरक्षित रहेंगे। खानखाना ने मुगल सिपाहियों को आदेश दिया कि वे जीत प्राप्त होने पर भी शहर में लूट न करें।

इधर तो अकबर का बेटा मुराद और खानखाना अदमदनगर को अभय प्रदान कर रहे थे और उधर शहबाज खाँ कंबो शहजादे से अनुमति लिये बिना, चुपके से अहमदनगर के भीतर प्रविष्ट हो गया। उसके अनुशासनहीन और लालची सिपाहियों ने शहर में लूटपाट आरंभ कर दी।

जब अब्दुर्रहीम खानखाना को यह समाचार ज्ञात हुआ तो वह किसी तरह शहर में प्रविष्टि हुआ और अपार परिश्रम करके मुगलिया सिपाहियों को लूटपाट करने से रोक कर बाहर लाया किंतु तब तक शहर में काफी नुक्सान हो चुका था। इससे शहरवालों का विश्वास मुगल सेनापतियों पर से हट गया और चाँद बीबी ने अहमदनगर के दरवाजे बंद करके मुगलों का सामना करने का निश्चय किया।

दूसरे दिन शहजादे मुराद की सेनाओं ने अहमद नगर को घेर लिया। चाँद बीबी की ओर से शाह अली तथा अभंगर खाँ मोर्चे पर आये किंतु लड़ाई में हार कर पीछे हट गये। मुगलों की फूट अब खुलकर सामने आ गयी। जब चाँद बीबी के सिपाही हार कर भाग रहे थे तो मुगल सेनापति एक दूसरे से यह कह कर लड़ने लगे कि तू उनके पीछे जा – तू उनके पीछे जा, किंतु कोई नहीं गया और चाँद बीबी के आदमी फिर से किले में सुरक्षित पहुँच गये।

अगले दिन मुगल सेनापतियों ने विचार किया कि यहाँ मुगलों की तीन बड़ी फौजें हैं- पहली शहजादे मुराद की, दूसरी शहबाज खाँ कंबो की और तीसरी खानखाना अब्दुर्रहीम की। इन तीनों में से एक अहमदनगर के किले पर घेरा डाले, दूसरी किले पर हमला करे तथा तीसरी सेना रास्तों को रोके किंतु यह योजना कार्यरूप नहीं ले सकी।

अकबर का बेटा मुराद युद्ध की योजना इस तरह से बनाता था कि विजय का श्रेय किसी भी तरह से खानखाना अथवा शहबाज खाँ कंबो न ले सकें। इन योजनाओं को सुनकर खानखाना तो चुप हो जाता था और शहबाज खाँ उन योजनाओं का विरोध करने लगता था। इस कारण एक भी योजना कार्यरूप नहीं ले सकी।

मुराद की पगड़ी (168)

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मुराद की पगड़ी

शहंशाह अकबर के बेटे मुराद ने अपनी पगड़ी अब्दुर्रहीम के कदमों में रख दी! नामुराद मुराद की पगड़ी अपने पैरों में पड़ी देखकर खानखाना अब्दुर्रहीम का हृदय पसीज गया।

अकबर ने अपने पुत्र मुराद, खानखाना अब्दुर्रहीम तथा शहबाज खाँ कम्बो को अहमदनगर पर आक्रमण करने भेजा था किंतु मुराद ने अपने सेनापतियों से इतनी बदतमीजी की कि वे मन ही मन शहजादे के विरोधी हो गए और उसे नीचा दिखाने का अवसर खोजने लगे।

इस कारण अहमदनगर की सेना पर मुराद के दो हमले विफल हो गए। क्योंकि मुराद अपने सेनापतियों को जो भी आदेश देता था, उसके सेनापति उसका ठीक उलटा करते थे। 

इस पर शहजादे मुराद के विश्वस्त मंत्रियों ने मुराद को समझाया कि खानखाना अब्दुर्रहीम इस लड़ाई को इस तरह चलाना चाहता है कि जीत का सेहरा शहजादे के सिर पर न बंध कर खानखाना के सिर पर बंधे। मुराद तो स्वयं भी इस युद्ध को इस प्रकार चलाना चाहता था कि जीत का सेहरा केवल मुराद के सिर पर बंधे।

इसलिए मुराद ने अपने मंत्रियों की बातों का विश्वास कर लिया तथा एक ऐसी योजना बनाई जिससे खानखाना को इस युद्ध से दूर रखा जा सके। उसने अहमदनगर के बाहर एक मुगल थाना कायम किया और खानखाना को उस पर बैठा दिया ताकि खानखाना अपनी जगह से हिल भी न सके।

उधर मुराद और उसकी सेना के अत्याचार देखकर चाँद बीबी ने बीजापुर तथा गोलकुण्डा के शासकों से सहायता मांगी। बीजापुर और गोलकुण्डा के बादशाह भी जानते थे कि यदि मुगलों ने अहमदनगर फतह कर लिया तो वे सेनाएं वहीं से आगरा नहीं लौटेंगी अपितु वे बीजापुर और गोलकुण्डा पर भी आक्रमण करेंगी।

इसलिए बेहतर होगा कि तीनों राज्य मिलकर मुगलों से मोर्चा लें। पहले भी दक्षिण के पांचों शिया राज्य विजयनगर के विरुद्ध मिलकर लड़ते रहे थे। इसलिए बीजापुर और गोलकुण्डा अपनी-अपनी सेनाएं लेकर आ गए।

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अब अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा ने मिलकर मुगल सेना के विरुद्ध मोर्चा बांधा। बीजापुर का बादशाह इस संयुक्त सेना का सेनापति नियुक्त हुआ। उसके नेतृत्व में साठ हजार घुड़सवारों और त्वरित गति से चलायमान तोपखाने की सेना मुगलों से लड़ने के लिये आयी।

मुराद ने इस सेना के आने से पहले ही अहमदनगर को लेने का विचार किया और खानखाना को बताये बिना अपने डेरे से लेकर किले की दीवार तक पाँच सुरंगें बिछा दीं। मुराद ने जुम्मे की नमाज पढ़ने के बाद इन सुरंगों में आग लगाने का निश्चय किया।

चाँद बीबी को इन सुरंगों का पता चल गया। उसने दो सुरंगों की बारूद तो शुक्रवार दोपहर से पहले ही निकलवा ली। जब वह तीसरी सुरंग से बारूद निकलवा रही थी तब मुराद ने सुरंगों को आग दिखा दी। इससे किले की पचास गज की दीवार उड़ गयी।

किले के भीतर सुरंग खोद रहे लोगों में से कुछ तो मौके पर ही मारे गये और बाकी के भाग खड़े हुए। सुलताना चाँद बीबी फौरन महल से निकली और तलवार लेकर वहीं आ खड़ी हुई। उसे देखने के लिये दोनों ओर के सिपाहियों की भीड़ जुट गयी।

उधर शहजादा और उसके अमीर शेष सुरंगों के फटने की प्रतीक्षा करते रहे और इधर चाँद बीबी ने तोपों, धनुरधारियों और बन्दूकधारी सैनिकों द्वारा किले का रास्ता अवरुद्ध कर दिया। खानखाना अब्दुर्रहीम अपने थाने पर चुपचाप बैठा हुआ तमाशा देखता रहा।

जब मुराद की फौज धावे के लिये आयी तो चाँद बीबी ने उस पर ऐसे बान और गोले मारे कि मुराद की सेना घबरा कर लौट गयी। चाँद बीबी पूरी रात किले के परकोटे पर खड़ी रही और उसने अपने सामने वह दीवार फिर से बनवा ली।

मुराद ने खानखाना को पूरी तरह से इस युद्ध से अलग रखा था। इसलिये वह पूरी तरह निष्क्रिय बना रहा। इस दौरान वह तभी क्रियाशील हुआ जब उससे कुछ करने के लिये कहा गया। मुराद का हमला विफल हो गया और वह बुरी तरह पिट कर अपने खेमे में लौटा।

अहमदनगर के किले पर अधिकार करने में असफल रहने के बाद मुराद समझ गया कि खानखाना की सहायता प्राप्त किये बिना अहमदनगर का किला नहीं जीता जा सकता। उसके मन में बड़ी इच्छा थी कि अपने पिता अकबर के बाद वही बादशाह बने। वह जानता था कि यदि वह दक्खिन के मोर्चे से असफल होकर लौटेगा तो उसे बादशाहत मिलनी तो दूर, राजधानी आगरा में प्रवेश भी नहीं मिलेगा।

अतः मुराद ने मुगलिया राजनीति की चौसर का सबसे आजमाया हुआ दांव खेलने की तैयारी की। उसने खानखाना को अपने डेरे में बुलाया। जब खानखाना अपने आदमियों के साथ शहजादे की सेवा में हाजिर हुआ तो मुराद ने बड़ी लल्लो-चप्पो के साथ खानखाना का स्वागत किया।

उसने कहा कि क्या खानखाना जानते हैं कि शहंशाह ने इस मोर्चे पर आपकी भी उतनी ही जिम्मेदारी तय की है, जितनी कि मेरी?

इस पर रहीम ने जवाब दिया कि मैं अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से पहचानता हूँ। आपने मुझे जो भी आदेश दिये हैं, मैं उन्हें पूरा कर रहा हूँ। इस पर शहजादे ने कहा कि आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि आप मोर्चे पर मौजूद हों और मुगल सेना को फतह हासिल न हो?

खानखाना ने अत्यंत उदासीन भाव से उत्तर दिया कि शहजादे स्वयं बड़ी से बड़ी फतह हासिल करने में सक्षम हैं। मुराद भी पूरा घाघ था, वह समझ गया कि खानखाना आसानी से उसे अपने पुट्ठे पर हाथ नहीं धरने देगा।

इसलिए मुराद ने बहुत रिरिया कर कहा कि सच तो यह है खानखाना कि आपके या आपके पिता मरहूम खानखाना बैराम खाँ के बिना मुगलिया सल्तनत आज तक कोई भी बड़ी लड़ाई नहीं जीत सकी। हम जानते हैं कि आप हमसे नाराज हैं।

खानखाना ने कहा कि मेरे दुश्मनों ने आपसे यह बात कही होगी, मैं शहंशाह का गुलाम हूँ। मुगलों को फतह हासिल हो, इससे अच्छी और क्या बात होगी?

शहजादे ने कहा कि यह जीत आपके बिना नहीं हो सकती। आप ही बताईये कि क्या किया जाये? खानखाना ने कहा कि मेरे अकेले के किये कुछ नहीं होगा। आप अपने विश्वस्त आदमियों से सलाह करें। जैसी सबकी राय बने, वैसा ही करें।

खानखाना की उदासीनता से मुराद समझ गया कि खानखाना सहयोग करने के मूड में नहीं है किंतु मुराद भी पूरा कांईयां था। उसने ठान ली थी कि वह खानखाना के माध्यम से ही अहमदनगर हासिल करेगा।

मुराद ने अपने डेरे से सब अमीरों को बाहर जाने का संकेत किया और खानखाना को वहीं ठहरने के लिये कहा। जब डेरा खाली हो गया तो मुराद ने अपनी पगड़ी उतार कर खानखाना के पैरों में रख दी और गिड़गिड़ाकर बोला, मेरी लाज आपके हाथ में है खानखाना।

समय का पहिया पूरी तरह घूम कर फिर से उसी बिंदु पर आ गया था। एक दिन अकबर की पगड़ी बैराम खाँ के कदमों में पड़ी रहती थी और आज अकबर के बेटे मुराद की पगड़ी बैराम खाँ के बेटे के कदमों में पड़ी थी।

 खानखाना अब्दुर्रहीम शहजादे मुराद के इस अभिनय से पसीज गया। उसने मुराद की पगड़ी उठाकर फिर से मुराद के सिर पर रख दी और उसे वचन दिया कि वह पूरे मनोयोग से यत्न करेगा। उस काल की मुगलिया राजनीति में नामुराद मुराद की पगड़ी का एक सेनापति के कदमों में होना कोई बड़ी बात नहीं थी। मुगल शहजादे सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर सकते थे।

चांद सुल्ताना बेपर्दा होकर खानखाना के सामने आ खड़ी हुई! (169)

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चांद सुल्ताना

अब्दुर्रहीम खानखाना अहमदनगर की चांद सुल्ताना के बारे में काफी कुछ सुन चुका था और उसका प्रशसंक था। जिस तरह अब्दुर्रहीम भगवान श्रीकृष्ण का भक्त था, उसी प्रकार चांद बीबी भी भगवान मुरली मनोहर श्रीकृष्ण की दासी थी।

अपने समय के इन दो श्रेष्ठ मुस्लिम कृष्ण भक्तों में एक-दूसरे के लिए सहानुभूति होनी स्वाभाविक थी। अब्दुर्रहीम कतई नहीं चाहता था कि चाँद बीबी की कुछ भी हानि हो। इसलिए उसने मुराद से कहा कि श्रेष्ठ उपाय तो यह होगा कि बिना रक्तपात किये अहमदनगर हमारी अधीनता स्वीकार कर ले।

इससे हमारे आदमियों की भी हानि नहीं होगी और इस समय मुगल सेना को जो धान और चारे की कमी है, उससे भी छुटकारा मिल जायेगा।

मुराद चाहता था कि किसी भी तरह अहमदनगर मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ले। मुराद को अपने पिता की राजधानी फतहपुर सीकरी से चले तीन साल हो चले थे और अहमदनगर अब भी दूर की कौड़ी बना हुआ था।

वह फतहपुर सीकरी से अधिक दिनों तक दूर नहीं रहना चाहता था। इसलिए उसने अब्दुर्रहीम को अनुमति दे दी कि वह चांद बीबी से बात करे। शहजादे की अनुमति पाकर स्वयं खानखाना ने मुगलों की ओर से चाँद बीबी के सम्मुख उपस्थित होने का निश्चय किया।

उसने इस आशय का संदेश चांद सुल्ताना को भिजवाया। वैसे तो शहबाज खाँ कम्बो द्वारा की गई लूट के कारण मुगल सेनापति अहमदनगर वालों के सामने अपनी साख खो बैठे थे किंतु जब चांद को ज्ञात हुआ कि स्वयं खाखाना चांद से मिलने आ रहा है तो वह सहमत हो गई।

खानखाना की इस योजना से उसके एक साथ दो उद्देश्य पूरे हो गये। एक तो खानखाना फिर से इस अभियान के केंद्र में आ गया और दूसरा यह कि चाँद बीबी को देख पाने की उसकी साध पूरी हो गयी।

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वह जब से अहमदनगर की सीमा में आया था, तब से चाँद की बुद्धिमत्ता और कृष्ण-भक्ति की बातें सुनता रहा था। बिना पिता, बिना भाई और बिना पुत्र के संरक्षण में एकाकी महिला का राजकाज चलाना स्वयं अपने आप में ही एक बड़ी बात थी! तिस पर चारों ओर दक्खिनियों, हब्शियों एवं मुगलों जैसे खूंखार शत्रुओं की रेलमपेल लगी रहती थी। खानखाना को लगा कि इस साहसी और अद्भुत महिला को अवश्य देखना चाहिये।

खानखाना अपने पाँच सवारों को लेकर अहमदनगर के दुर्ग में दाखिल हुआ। ऊँचे घोड़े पर सवार, लम्बे कद और पतली-दुबली देह का खानखाना दूर से ही दिखाई देता था। चांद सुल्ताना के आदमी उसे सुलताना के महलों तक ले गये। चाँद ने खानखाना के स्वागत की भारी तैयारियां कर रखी थीं। उसने शाही महलों को रंग-रोगन और बंदनवारों से सजाया। चांद ने रास्तों पर रंग-बिरंगी पताकाएं लगवाईं तथा महलों की ड्यौढ़ी पर खड़े रहकर गाजे-बाजे के साथ खानखाना की अगुवाई की।

अहमदनगर के अमीर, साहूकार और अन्य प्रमुख लोग भी खानखाना की अगुवाई के लिये उपस्थित हुए। जब खानखाना शाही महलों में पहुँचा तो उस पर इत्र और फूलों की वर्षा की गयी।

बुर्के की ओट से चाँद ने खानखाना का अभिवादन किया। खानखाना ने एक भरपूर दृष्टि अपने आसपास खड़े लोगों पर डाली और किंचित मुस्कुराते हुए कहा-

‘रहिमन रजनी ही भली, पिय सों होय  मिलाप।

खरो दिवस किहि काम को, रहिबो आपुहि आप।’

वहाँ खड़े तमाम लोग खानखाना की इस रहस्य भरी बात को सुनकर अचंभे में पड़ गये। वे नहीं जान सके कि खानखाना की इस रहस्यमयी बात से बुर्के के भीतर मुस्कान की शुभ्र चांदनी खिली है और उसकी चमक खानखाना तक पहुँच गयी है!

सुलताना ने लोक रीति के अनुसार खानखाना का आदर-सत्कार करके उसे अपने महल के भीतरी कक्ष में पधारने का अनुरोध किया। खानखाना की इच्छानुसार एकांत हो गया।

अब केवल दो ही व्यक्ति वहाँ थे, एक ओर तो खानखाना तथा दूसरी ओर पर्दे की ओट में बैठी चाँद। खानखाना ने पर्दे की ओर देखकर हँसते हुए कहा-

‘रहिमन प्रीति सराहिए, मिले होत रंग दून।

ज्यों जरदी  हरदी  तजै, तजै सफेदी चून।’

पाठकों को बताना समीचीन होगा कि अब्दुर्रहीम खानखाना अपने समय का बहुत बड़ा कवि था। उसकी कविता वैसे तो भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित थी किंतु उसने भक्ति के साथ-साथ नीति और ज्ञान की जो सरिता बहाई, वैसी बहुत कम ही देखने को मिलती है।

खानखाना हिन्दी, उर्दू, फारसी, डिंगल, संस्कृत आदि भाषाओं का जानकार था। इन सभी भाषाओं में उसकी कुछ रचनाएं मिलती हैं किंतु खानखाना ने अपनी अधिकांश रचनाएं हिन्दी भाषा में लिखीं जिसमें ब्रज एवं अवधी का मिश्रण देखने को मिलता है।

खानखाना की बात सुनकर चांद सुल्ताना ने कहा कि यदि खानखाना पहेलियाँ ही बुझाते रहेंगे तो हमारी समझ में कुछ नहीं आयेगा। इस पर खानखाना ने कहा कि सुलताना! मैंने कहा कि उसी प्रेम की सराहना की जानी चाहिये, जब दो व्यक्ति मिलें और अपना-अपना रंग त्याग दें। जैसे चूने और हल्दी को मिलाने पर हल्दी अपना पीलापन त्याग देती है और चूना अपनी सफेदी त्याग देता है।

अर्थात् यदि आप पर्दे में रहेंगी तब मैं कैसे जानूंगा कि हल्दी ने अपना रंग त्याग कर चूने का रंग स्वीकार कर लिया है! इस बार चाँद खानखाना का संकेत समझ गयी। वह पर्दे से बाहर निकल आयी।

बचपन से वह खानखाना के बारे में सुनती आयी है। खानखाना की वीरता, दयालुता और दानवीरता के भी उसने कई किस्से सुने हैं। उसने यह भी सुना है कि खानखाना मथुरा के फरिश्ते किसनजी की तारीफ में कविता करता है।

जिस दिन से चाँद सुल्ताना ने किसनजी की सवारी के दर्शन किये थे, उसी दिन से चाँद के मन में न केवल रसखान पठान, मुगलानी दीवानी और खानखाना अब्दुर्रहीम से मिलने की अभिलाषा प्रबल हो चली थी, अपितु चांद उनकी कविताओं की कुछ पुस्तकें भी मंगवाने में भी सफल हो गई थी।

चांद भी चाहती थी कि वह भी इन लोगों की तरह किसनजी की भक्ति में कविता करे किंतु कविता लिखना उसके वश की बात नहीं थी। इसलिए वह उन लोगों से मिलकर किसनजी के बारे में अधिक से अधिक जानकारी लेना चाहती थी। आज वह अवसर अनायास ही उसे प्राप्त हो गया था। उसे अपने भाग्य पर विश्वास नहीं हुआ कि एक दिन वह इस तरह खानखाना के सामने बेपर्दा होकर खड़ी होगी!       

चांद बीबी (170)

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चांद बीबी

मुगल सेनापति अब्दुर्रहीम खानखाना इस समय अहमद नगर की राजकुमारी चांद बीबी के महल में था। और चांद बीबी पर्दे के पीछे थी।

खानखाना अब्दुर्रहीम के अनुरोध पर सुल्ताना चांद बीबी, बिना किसी पर्दे के खानखाना के सामने उपस्थित हुई। चाँद को पर्दे से बाहर आया देखकर खानखाना ने हँसकर कहा-

‘रहिमन प्रीति न कीजिये जस खीरा ने कीन।

ऊपर से तो दिल मिला,  भीतर फांकें  तीन।’

-‘इसका क्या अर्थ है खानानजू?’ सुलताना ने हँस कर पूछा। उसे अब पहिले का सा संकोच न रह गया था।

-‘सुलताना! मैं चाहूंगा कि संधि के सम्बन्ध में जो भी बात हो, दिल से हो, निरी शाब्दिक नहीं हो।’ खानखाना ने जवाब दिया।

चांद ने खानखाना को विश्वास दिलाया कि जो कुछ भी तय होगा, उसका अक्षरशः पालन होगा, बशर्ते कि मुगल अपनी तरफ से वादाखिलाफी न करें। खानखाना समझ गया कि चांद का संकेत शहबाज खाँ कम्बो द्वारा की गई लूट की तरफ है।

खानखाना ने गंभीर होकर कहा कि मुझे तुम पर विश्वास है इसीलिये मैं तुम्हें कुछ कहना चाहता हूँ। इसे मुगल बादशाह की तरफ से नहीं अपितु मेरी तरफ से समझना। खानखाना ने कहा-

रहिमन छोटे नरन सों बैर भलो ना प्रीति।

काटे चाटे स्वान के, दौऊ भांति विपरीत।’

चाँद को समझ नहीं आया कि खानखाना ने ऐसा क्यों कहा।

-‘खानखाना! हमारी समझ में कुछ नहीं आया।’ चाँद ने कहा।

चाँद की बेचैनी देखकर खानखाना मुस्कुराया। उसने कहा-

‘रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहि।

जै जानत ते कहत नहि, कहत ते जानत नाहि।’

अर्थात्- गूढ़ बातें कहने और सुनने की नहीं होतीं। जो इन्हें जानते हैं, वे कहते नहीं हैं और जो कहते हैं, समझो कि वे जानते नहीं हैं। खानखाना अब्दुर्रहीम की अत्यंत गूढ़ और रहस्य भरी बातों से चाँद के होश उड़ गये। जाने खानखाना क्या कहता था, जाने वह क्या चाहता था!

खानखाना उसकी दुविधा समझ गया। उसने कहा- ‘ओछे व्यक्तियों से न दुश्मनी अच्छी होती है और न दोस्ती। जैसे कुत्ता यदि दुश्मन बनकर काट खाये तो भी बुरा और यदि दोस्त होकर मुँह चाटने लगे तो भी बुरा।’

-‘क्या मतलब हुआ इस बात का?’

-‘मैं अपने स्वामी मुराद की ओर से संधि का प्रस्ताव लेकर आया हूँ। वह भी एक ऐसा ही ओछा इंसान है। मतलब आप स्वयं समझ सकती हैं।’

खानखाना की बात सुनकरचांद बीबी और भी दुविधा में पड़ गयी। कुछ क्षण पहले वह जिस खानखाना को सरल सा इंसान समझे बैठी थी, वह भावना तिरोहित हो गयी। उसे लगा कि उसका पाला एक रहस्यमय इंसान से पड़ा है जिससे पार पाना संभवतः आसान न हो।

-‘और दूसरे दोहे में आपने क्या कहा?’

-‘दूसरे दोहे में मैंने कहा कि जो बातें हमारी सामर्थ्य से बाहर हैं, वे कहने सुनने की नहीं हैं। क्योंकि जो जानते हैं वे कहते नहीं हैं और जो कहते हैं, वे जानते नहीं हैं।’

-‘इस बात का क्या मतलब हुआ?’ 

-‘इसका अर्थ यह हुआ कि जो बात मैंने तुम्हें अपने स्वामी के बारे में बताई है वह मेरी सामर्थ्य के बाहर की बात है। उसे कभी किसी और के सामने कदापि नहीं कहा जाये।’

-‘खानखाना मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा कि आप क्या कह रहे हैं और आप मेरे लिये क्या संदेश लाये हैं!’ चाँद के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं।

-‘मैं कहना चाहता हूँ कि शहजादा मुराद धूर्त इंसान है। इसलिये मैं जानबूझ कर स्वयं तुम्हारे सामने संधि का प्रस्ताव लेकर आया हूँ। मैं तो तुम्हें केवल यह चेतावनी दे रहा था कि मैं जिस स्वामी की ओर से संधि करने आया हूँ, वह विश्वास करने योग्य नहीं है।

चूंकि वह बहुत शक्तिशाली है, इसलिये वह शत्रुता करने योग्य भी नहीं है। मैंने ऐसा इसलिये कहा ताकि तुम्हारे मन में किसी तरह का भ्रम न रहे और तुम बाद में किसी परेशानी में न पड़ जाओ।

तुम साहसी हो, बुद्धिमती हो, स्वाभिमानी हो, भगवान कृष्णचंद्र पर भरोसा करने वाली हो किंतु तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि तुम्हारा पाला किसी इंसान से नहीं, अपितु शैतान से पड़ा है।’

-‘यह तो मैं उसी समय देख चुकी हूँ जब मुगल सैनिकों ने नगर में घुस कर विश्वासघात किया। कृपया बताईये कि मैं मुराद से संधि करूं या नहीं?’

-‘संधि तो तुम्हें करनी होगी किंतु सावधान भी रहना होगा।’

-‘अर्थात्?’

-‘यदि तुम संधि नहीं करोगी तो मुराद अहमदनगर की ईंट से ईंट बजा देगा और यहाँ से तब तक नहीं हिलेगा जब तक कि अहमदनगर उसके अधीन न हो जाये।

संधि करने से तुम्हें यह लाभ होगा कि मुराद अपनी सेना लेकर अहमदनगर से चला जायेगा। और सावधान इसलिये रहना होगा कि यदि मुराद संधि भंग करे तो तुम तुरंत कार्यवाही करने की स्थिति में रहो।’

-‘संधि का क्या प्रस्ताव तैयार किया है आपने?’

-‘मेरा प्रस्ताव यह है कि बराड़ का वह प्रदेश जो बराड़ के अंतिम बादशाह तफावल खाँ के पास था और जिसे इन दिनों मुरतिजा निजामशाह ने दबा रखा है वह तो शहजादा मुराद ले ले और बाकी का राज्य माहोर के किले से चोल बन्दर तक और परेंड़े से दौलताबाद के किले और गुजरात की सीमा तक अहमदनगर के अधिकार में रहे।’

-‘इससे मुझे क्या लाभ होगा?’

-‘बरार अहमदनगर का मूल हिस्सा नहीं है। वह तो मुरतिजा ने तफावल खाँ से छीना था। यदि यह क्षेत्र तुम्हारे हाथ से निकल भी जाता है तो भी तुम्हारा मूल राज्य सुरक्षित रहेगा।’

-‘क्या मुझे शहजादे मुराद के सामने पेश होना होगा?’

-‘नहीं, तुम मुरतिजा को अपनी ओर से शहजादे की सेवा में भेज सकती हो।’

-‘क्या शहजादा मुराद बरार लेकर मान जाएगा?’ चांद ने पूछा।

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खानखाना की सीधी-सपाट बात सुनकर चांद बीबी की आँखों में आँसू आ गये। किसी तरह अपने आप को संभाल कर बोली- ‘आप ज्ञानी हैं, इसी से इतने उदासीन हैं और बड़ी-बड़ी बातें कहते हैं किंतु मैं अज्ञानी हूँ, मैं आपकी तरह संतोषी नहीं हो सकती।’ खानखाना उठ खड़ा हुआ। चाँद ने सिर पर दुपट्टा लेकर खानखाना को तसलीम कहा और पर्दे की ओट में चली गयी। खानखाना को लगा कि श्रद्धा, विश्वास और प्रेम का निश्छल चाँद जो कुछ क्षण पहले तक कक्ष में उजाला किये हुए था, अचानक बादलों की ओट में चला गया।

-‘शहजादे की नजर पूरे अहमदनगर राज्य पर है किंतु फिलहाल वह बराड़ से संतोष कर लेगा। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलेंगी। हो सकता है बादशाह द्वारा मुराद को वापस बुला लिया जाये और यह पूरा काम मेरे जिम्मे छोड़ दिया जाये या फिर हम दोनों के ही स्थान पर कोई और आये। जब जैसी परिस्थति हो, तुम वैसे ही निबटना।

अब्दुर्रहीम खानखाना से छल 171

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अब्दुर्रहीम खानखाना से छल

अकबर के विश्वासघाती नामुराद शहजादे मुराद ने संकट में सहायक बनने वाले अब्दुर्रहीम खानखाना से छल किया तथा उसकी हत्या करने का षड़यंत्र रचा!

खानखाना अब्दुर्रहीम ने शहजादे मुराद के अनुरोध पर अपने पांच आदमियों के साथ अहमदनगर के किले में प्रवेश किया तथा चांद बीबी से संधि करके उसे इस बात पर सहमत कर लिया कि वह बरार का क्षेत्र मुगलों को सौंप दे तथा मुगलों के साथ मित्रवत् व्यवहार करे।

यद्यपि बादशाह अकबर और शहजादा मुराद दोनों चाहते थे कि केवल बरार नहीं अपितु सम्पूर्ण अहमदनगर राज्य मुगल सल्तनत में सम्मिलित किया जाए किंतु चांद बीबी इसके लिए सहमत नहीं थी और खानखाना किसी भी हालत में चांद बीबी को क्षति नहीं पहुंचाना चाहता था। इसलिए शहजादा मुराद दुविधा में फंस गया।

शहजादे को फतहपुर सीकरी छोड़कर आए हुए तीन साल बीत चुके थे और वह अब तक अपने पिता अकबर को अपनी विजय का एक भी समाचार नहीं भेज पाया था। इससे मुराद की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

जब खानखाना ने अहमदनगर की सुलताना चाँद बीबी की ओर से प्राप्त प्रस्ताव मुराद के समक्ष रखा कि यदि मुराद अहमदनगर से चला जाये तो चाँद उसे बरार का समस्त क्षेत्र दे सकती है तो मुराद ने इसी पर संतोष करना उचित समझा और उसने संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये।

मुराद ने खानखाना को आदेश दिए कि अब अहमदनगर में खानखाना का काम पूरा हो गया है। इसलिए खानखाना जालना चला जाए। मुराद का यह आदेश सुनकर खानखाना का मुंह उतर गया। वह समझ किया कि मुराद चांद बीबी के साथ धोखा करेगा। फिर भी उसके पास आदेश मानने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। 

मुगलों से संधि हो जाने पर चांद सुलताना ने खानखाना अब्दुर्रहीम का बड़ा आभार व्यक्त किया। जब खानखाना जालना के लिये रवाना होने लगा तो चाँद बीबी ने खानखाना के सम्मान में अहमदनगर के किले में बड़ा दरबार आयोजित किया। इस दरबार में खानखाना पूरे ठाठ-बाट के साथ उपस्थित हुआ।

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उन दिनों खानखाना का ठाठ-बाट किसी भी मुगल शहजादे से बढ़कर हुआ करता था। यहाँ तक कि कई बार अकबर का दरबार भी खानखाना के दरबार के सामने फीका दिखाई देने लगता था। स्वयं अकबर को इस बात से कोई कठिनाई नहीं थी कि मरहूम बैराम खाँ का बेटा अब्दुर्रहीम इस ठाठ-बाट के साथ रहता है।

रहीम के इस ठाठ-बाट के कई कारण थे। एक तो रहीम का स्वयं का व्यक्तित्व इतना मधुर था कि कोई भी व्यक्ति उससे नाराज हो ही नहीं सकता था। उससे सलाह प्राप्त करने से हर किसी को लाभ होता था, इसलिए लगभग समस्त हिन्दू एवं मुसलमान अमीर एवं उमराव, शहजादे एवं राजे-महाराजे, कवि एवं साधु-संत, फकीर एवं दरवेश, रहीम के दरबार में हाजरी देते थे।

रहीम के दरबार की भव्यता का दूसरा कारण यह था कि अकबर के मन में बैराम खाँ की हत्या के कारण ग्लानि का जो स्थाई भाव बना रहता था, वह रहीम की उन्नति को देखकर कुछ कम होता था।

तीसरा कारण यह था कि स्वयं सलीमा बेगम जो किसी समय बैराम खाँ की बीवी थी और अब अकबर की बेगम थी, वह अब्दुर्रहीम पर विशेष महरबान रहती थी। रहीम की माँ खानजादा बेगम भी अकबर के हरम में रहती थी।

स्वयं अकबर भी अब्दुर्रहीम को अपने पुत्र की तरह प्रेम देता था और भरे दरबार में वह रहीम को अपना बेटा कह चुका था। अकबर ने यह विश्वास केवल दो ही व्यक्तियों पर व्यक्त किया था एक तो कुंअर मानसिंह कच्छवाहे पर और दूसरे खानखाना अब्दुर्रहीम पर।

जब खानखाना अब्दुर्रहीम चांद बीबी के निमंत्रण पर अहमदनगर के दरबार में उपस्थित हुआ तो मुराद की छाती पर सांप लोट गए। उसे यह सहन नहीं था कि मालिक बैठा रहे और उसका नौकर दावत खाता फिरे! मुराद स्वयं को खानखाना का मालिक समझता था किंतु उसे पता नहीं था कि लोगों से सम्मान प्राप्त करने के लिए मनुष्य में स्वयं में क्या गुण होने चाहिए!

अहमदनगर के अमीरों ने खानखाना को महंगे नजराने पेश किये और उसके प्रति बड़ा आभार व्यक्त किया। उन्हें विश्वास नहीं था कि यह मामला इतनी अच्छी तरह से सुलझ जाएगा। बहुत से अमीर तो खानखाना की अंगुली पकड़कर मुगल सल्तनत में बड़ी जागीरें प्राप्त करने का सपना देख रहे थे।

वस्तुतः मुराद ने खानखाना को दिखाने के लिए यह संधि स्वीकार की थी और अकबर को यह सूचना भी भेज दी थी कि चांद बीबी से बरार का क्षेत्र प्राप्त कर लिया गया है किंतु अंदरखाने मुराद इस संधि से बिल्कुल भी सहमत नहीं था। वह अहमदनगर का सम्पूर्ण राज्य जीत कर अपने पिता की झोली में डालना चाहता था।

 खानखाना को अहमदनगर से गये हुए अभी कुछ ही दिन बीते होंगे कि मुराद ने अहमदनगर राज्य से की गई संधि तोड़ दी और बराड़ से आगे बढ़कर पाटड़ी में भी अपना अमल कर लिया।

इस पर दक्षिण के अन्य शिया शासकों को भी अपना भविष्य अंधकारमय दिखायी देने लगा। उन्हें लगा कि इस विपदा से अकेले रहकर मुकाबला नहीं किया जा सकता। इसके लिये उन्हें एकजुट होकर प्रयास करना पड़ेगा।

चाँद सुलताना ने अपने विश्वस्त सेनापति सुहेल खाँ को मुगलों का रास्ता रोकने के लिये लिखा। आदिलशाह और कुतुबशाह ने भी अपनी-अपनी सेनाएं भेज दीं। उस वक्त मुराद शाहपुर में और खानखाना जालना में था।

जब खानखाना को ये सारे समाचार मिले तो वह शहजादे के पास गया और वचन भंग करने के लिये उसे भला-बुरा कहा। शहजादा उस समय तो खानखाना से कुछ नहीं बोला किंतु उसने मन ही मन खानखाना से पीछा छुड़ाने का निश्चय कर लिया।

मुराद स्वयं तो शाहपुर में ही बैठा रहा और उसने अपने आदमियों के साथ शहबाज खाँ कंबो, खानदेश के जागीरदार रजाअली खाँ रूमी तथा खानखाना अब्दुर्रहीम को चांद बीबी के सेनापति सुहेल खाँ पर चढ़ाई करने के लिये भेजा।

मुराद के आदमियों ने मुराद के कहे अनुसार अब्दुर्रहीम खानखाना से छल करके युद्ध की कपटपूर्ण व्यूह रचना की जिसका भेद बहुत कम आदमियों को मालूम था।

पहर भर दिन चढ़ने के बाद युद्ध शुरू हुआ। मुराद की योजनानुसार खानखाना की सेना को इस प्रकार नियोजित किया गया कि वह शत्रु सेना के तोपखाने की सीधी चपेट में आ जाये। खानखाना के गुप्तचरों को इस बात का पता नहीं चल सका किंतु खानदेश के शासक रजाअली खाँ रूमी को अब्दुर्रहीम खानखाना से छल किए जाने की बात की जानकारी हो गई।

उसने खानखाना की रक्षा करने का निश्चय किया तथा अपने विश्वस्त आदमियों से कहा- ‘दोस्तो! मरने का दिन आ गया।’

रजाअली खाँ रूमी (172)

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तू मुझे लाशों के ढेर के नीचे ढूंढना!

शहजादे मुराद ने खानखाना अब्दुर्रहीम को युद्ध के मैदान में मरवाने का षड़यंत्र रचा। मुराद स्वयं तो शाहपुर में बैठा रहा और उसने शहबाज खाँ कंबो, रजाअली खाँ रूमी तथा खानखाना अब्दुर्रहीम को चांद बीबी के सेनापति सुहेल खाँ पर चढ़ाई करने के लिये भेजा।

मुराद के आदमियों ने मुराद के कहे अनुसार युद्ध की कपटपूर्ण व्यूह रचना की जिसका भेद बहुत कम आदमियों को मालूम था किंतु युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले रजाअली खाँ रूमी को मुराद के षड़यंत्र का पता लग गया।

उसने खानखाना के प्राण बचाने का निर्णय लिया तथा वह अपना मोर्चा छोड़कर सुहेल खाँ की तोपों की सीधी मार में खड़े खानखाना को बचाने के लिये दौड़ पड़ा।

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रजाअली खाँ रूमी तथा उसके सिपाहियों को ऐन वक्त पर अपना स्थान छोड़ दौड़कर जाते हुए देखकर मुराद के आदमी गुस्से से चिल्लाने लगे कि धोखेबाज रजाअली खाँ शत्रु से मिल गया है। रजाअली खाँ ने उनकी परवाह नहीं की और किसी तरह खानखाना के पास जा पहुँचा।

उसने कहा- ‘खानखाना! शहजादे ने आपके साथ दगा की है। आपको जानबूझ कर ऐसी जगह रखा गया है जहाँ से आप जीवित बचकर नहीं निकल सकते। सारी आतिशबाजी आपके बराबर चुनी हुई है। अभी उसमें आग दी जाती है। इसलिए यदि आप दाहिनी ओर मुड़ जावें तो ठीक होगा।’

खानखाना तो तुरंत अपने आदमियों के सहारे उसी ओर मुड़ गया और रजाअली खाँ रूमी उसके स्थान पर डट गया। जैसे ही खानखाना वहाँ से हटा, गनीम की तोपों को आग दिखाई गयी और सारा आकाश धुएँ से भर गया। यहाँ तक कि सूर्यदेव भी उस धुएँ से ढंक गये।

कुछ पता नहीं चला कि कौन जीवित रहा और कौन मर गया। शत्रु की फौज रजाअली खाँ को खानखाना समझ कर उस पर चढ़ बैठी। किसी को शत्रु-मित्र की पहचान न रही। सब अमीर आपस में कट मरे। रजाअली खाँ का भी काम तमाम हो गया। मुगलों की बड़ी भारी क्षति हुई। राजा जगन्नाथ अपने चार हजार सिपाहियों सहित मारा गया।

धुआँ छंटने पर खानखाना ने फिर से उसी स्थान पर धावा किया जिस स्थान पर उसने रजाअली खाँ को छोड़ा था किंतु रजाअली खाँ वहाँ नहीं मिला। इसी दौरान रात हो गयी और दोनों ओर की सेनाएं अपनी-अपनी जीत समझ कर सारी रात रणक्षेत्र में खड़ी रहीं।

कोई भी घोड़े की पीठ से नहीं उतरा। दक्खिनी तो यह समझते रहे कि हमने खानखाना को मार डाला है और मुगल सेना यह समझती रही कि सुहेल खाँ पराजित होकर भाग गया है। यह भाग्य अथवा प्रारब्ध का ही यत्न था कि जिस खानखाना को मार डालने के लिये उसके स्वामी ने षड़यंत्र रचा था, उसी खानखाना को बचाने के लिये सेवकों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिये।

सुबह होने पर खानखाना ने अपना नक्कारा बजाया और अपना नरसिंगा फूंका जिसे सुनकर मुगल सेना के जो सिपाही युद्ध से भागकर इधर-उधर छिपे हुए थे, खानखाना से आ मिले। खानखाना ने किसी तरह रजाअली खाँ के क्षत-विक्षत शव को ढूंढ निकाला।

उस समय खानखाना और उसके आदमियों के पास कुल सात हजार सवार रह गये थे जबकि शत्रु सैन्य में पच्चीस हजार घुड़सवार मौजूद थे।

इस पर दौलत खाँ लोदी ने खानखाना से कहा- ‘यदि मैं तोपखाने या हाथियों के सामने चढ़ कर जाऊंगा तो शत्रु तक पहुँचने से पहले ही मारा जाऊंगा इसलिये पीठ पीछे से धावा करता हूँ।’

इस पर खानखाना ने दौलत खाँ लोदी से कहा- ‘जो तू ऐसा करेगा तो दिल्ली का नाम डुबोवेगा।’

– ‘नाम को जीवित रखकर क्या करना है? यदि मैं जीवित रहा तो सौ दिल्लियाँ बसा लूंगा।’ यह कहकर दौलत खाँ आगे बढ़ गया।

दौलत खाँ लोदी के नौकर सैयद कासिम को खानखाना की नीयत पर शक हो गया। उसने दौलत खाँ के कान में फुसफुसा कर कहा- ‘खानखाना आपको मरवा डालने के लिये ऐसा कह रहा है।’

दौलत खाँ लोदी ने खानखाना की टोह लेने के लिये पूछा- ‘इतना बता दो खानखाना! यदि हार हो जावे और मैं किसी तरह शत्रु के हाथों से बचकर वापिस आऊँ तो आप कहाँ मिलेंगे?’

– ‘शत्रु की लाशों के नीचे।’ खानखाना ने जवाब दिया। इस जवाब से संतुष्ट होकर दौलत खाँ लोदी सुहेल खाँ की सेना पर धावा बोलने के लिये चला गया।

खानखाना समझ गया कि उसकी नीयत पर शक किया जा रहा है। मुगलों का संशय मिटाने के लिये उस दिन खानखाना ने ऐसी लड़ाई की कि मुराद और उसके मंत्री दांतों तले अंगुली दबाकर देखने के सिवाय कुछ न कर सके।

चांद बीबी का सेनापति सुहेल खाँ विशाल सेना का स्वामी होने के बावजूद खानखाना की छोटी सेना से परास्त हो गया। खानखाना यह चमत्कार करने का पुराना जादूगर था।

इसी जादू के बल पर वह मुगलिया सल्तनत का खानखाना बना था। विजय प्राप्त होने पर खानखाना ने उस दिन पचहत्तर लाख रुपये और अपनी समस्त सम्पत्ति अपने सैनिकों में लुटा दी। दक्खिनियों के चालीस हाथी और तोपखाना खानखाना के हाथ लगे जो उसने मुराद को सौंप दिये।

उस शाम मुगल सेना में चारों ओर विजय का उत्सव था। सिपाही छक कर शराब पीते थे और रक्कासाओं के साथ नगाड़ों की धुन पर घण्टों नाचते थे किंतु शायद ही कोई जान सका कि विजयी सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीम खाँ अपने डेरे में मुँह पर कपड़ा बांधे जार-जार रो रहा था।

उसके पास उसके दोस्त रजाअली खाँ रूमी का क्षत-विक्षत शव रखा था। रजा अली खाँ मुगलिया राजनीति की चौसर पर बलिदान हो गया था।

यह मुगलों की बड़ी भारी विजय थी जिसके कारण पूरा दक्खिन काँप उठा था। जीत का सेहरा अपने सिर पर बांधने तथा खानखाना से छुटकारा पाने की फिराक में लगे शहजादे मुराद ने भागते हुए दक्खिनियों के पीछे अपना कोई लश्कर नहीं भेजा अन्यथा दक्खिनियों की बड़ी भारी हानि होती। खानखाना तो वैसे भी नहीं चाहता था कि इस शत्रु फौज का और अधिक नुक्सान हो।

सुहेल खाँ पर विजय प्राप्त करके खानखाना फिर से जालना लौट गया। जब परनाला और गावील के दुर्ग मुराद के हाथ लग गये तो उसने अपने अमीर सादिक खाँ के कहने से खानखाना को लिखा कि अब अवसर है कि चलकर अहमदनगर ले लें। मुराद का पत्र पाकर खानखाना के होश उड़ गये।

उसे अनुमान तो था कि शहजादा अपने वचन से फिरेगा किंतु इतनी शीघ्र फिरेगा, इसका अनुमान नहीं था। बहुत सोच-विचार कर खानखाना ने मुराद को लिखा कि अभी तो यही उचित है कि इस वर्ष बराड़ में रहकर यहाँ के किलों को फतह करें और जब यह देश पूर्ण रूप से दब जाये तो दूसरे देशों पर जायें।

खानखाना के इस लिखित जवाब से मुराद को खानखाना के विरुद्ध मजबूत प्रमाण मिल गया। उसने खानखाना का पत्र ढेर सारे आरोपों के साथ नत्थी करके बादशाह अकबर को भिजवा दिया।

उसमें प्रमुख शिकायत यह थी कि खानखाना अब्दुर्रहीम शहंशाह अकबर और समूची मुगलिया सल्तनत से दगा करके चाँद बीबी से मिल गया है। शहजादे का पत्र पाकर अकबर खानखाना पर बड़ा बिगड़ा।

उसने खानखाना को दक्खिन से लाहौर में तलब किया और खानखाना की जगह शेख अबुल को दक्षिण का सेनापति बनाकर भेज दिया। ऐसी थी उस काल की मुगलिया राजनीति की गंदी चौसर जहाँ हर कोई हर किसी को निबटाने में लगा रहता था। यह अलग बात है कि राजनीति हर काल में ऐसी गंदी ही होती है। 

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