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हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं! (166)

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हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं

रसखान पठान की बहिन दीवानी जिसे मुगलानी ताज भी कहा जाता था, ब्रजक्षेत्र में रहकर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के पद रचा करती थी। उसने अपने एक पद में लिखा था- हों तो मुगलानी हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं! जब अहमदनगर की शहजादी चांद बीबी भी ताज के मार्ग पर चल पड़ी तो मुसलमानों ने चांद बीबी की हत्या कर दी!

जब पूर्व, पश्चिम तथा उत्तर दिशाओं में भारत के विशाल क्षेत्र अकबर के अधीन हो गए तब अकबर ने अपनी सल्तनत के दक्षिणी छोर पर स्थित पांच शिया राज्यों को निगलने की तैयारी आरम्भ कर दी।

बहुत से इतिहासकारों ने लिखा है कि अकबर ने दक्षिण के राज्यों के साथ शान्ति-पूर्वक समझौता करने का प्रयत्न किया। ई.1591 में उसने दक्षिण के चार प्रधान राज्यों- अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा तथा खानदेश के पास प्रस्ताव भेजा कि वे अकबर की अधीनता स्वीकार कर लें।

खानदेश के शासक ने अकबर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया किंतु शेष तीनों राज्यों ने अकबर का प्रस्ताव ठुकरा दिया। इसलिये अकबर को दक्षिण के राज्यों पर आक्रमण करने का निश्चय करना पड़ा।

अकबर ने सबसे पहले अहमदनगर राज्य पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इस अभियान की चर्चा करने से पहले हमें अहमदनगर की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा करनी होगी।

इन दिनों अहमदनगर अपने अमीरों की आपसी लड़ाई से अत्यंत जर्जर हो चला था। अहमदनगर के शासक बुरहान निजामशाह की मृत्यु के बाद उसका बेटा इब्राहीम निजामशाह अहमदनगर के तख्त पर बैठा। मात्र चार माह बाद ही वह बीजापुर के बादशाह आदिल खाँ द्वारा मार दिया गया।

उस समय इब्राहीम निजामशाह का बेटा बहादुर निजामशाह मात्र डेढ़ वर्ष का था। अतः इब्राहीम की बहिन चाँद बीबी राजकाज चलाने लगी किंतु मुस्लिम अमीरों को औरत का शासन स्वीकार नहीं हुआ। वे चाँद बीबी के विरुद्ध दो धड़ों में विभक्त हो गये।

पहला धड़ा दक्खिनियों का था जिनका नेता मियाँ मंझू था। दूसरा धड़ा हब्शियों का था जिनका नेता इखलास खाँ था। दक्खिनियों के नेता मियाँ मंझू ने अहमदनगर में घुसकर डेढ़ साल के शासक बहादुर निजामशाह को उसकी फूफी चाँद बीबी से छीनकर जुनेर के किले में भेज दिया और दौलताबाद में कैद अहमदशाह को बुलाकर तख्त पर बैठा दिया।

उस समय तो हब्शी भी मियाँ मंझू से सहमत हो गये किंतु बाद में जब उनके सरदार इखलास खाँ को पता लगा कि अहमदशाह शाही परिवार में से नहीं है तो हब्शियों ने अहमदशाह के स्थान पर दुबारा से डेढ़ साल के बहादुरशाह को अहमदनगर का सुल्तान बनाने के लिये अहमदनगर घेर लिया और जुनेर के किलेदार से किले में कैद शिशु सुल्तान बहादुरशाह को मांगा।

जुनेर का किलेदार मियाँ मंझू का विश्वस्त आदमी था। उसने बहादुरशाह हब्शियों को सौंपने से इन्कार कर दिया। जब हब्शी किसी भी तरह बहादुर निजामशाह को नहीं पा सके तो उन्होंने अहमदनगर के बाजार से मोतीशाह नामक एक लड़के को पकड़ लिया और घोषणा की कि यह लड़का निजाम के परिवार से है, अतः इसे बादशाह बनाया जाता है।

कुछ दक्खिनी सरदार भी हब्शियों से आ मिले। इस प्रकार दस-बारह हजार हब्शी और दक्खिनी घुड़सवार मोतीशाह के साथ हो गये।

इस पर मियाँ मंझू ने गुजरात से शहजादी मुराद को अहमदनगर बुलवाया जो बुरहान निजामशाह के परिवार से थी। अभी शहजादी मार्ग में ही थी कि हब्शियों में जागीरों के बंटवारे को लेकर आपस में तलवारें चल गईं। बहुत से हब्शी आपस में ही कटकर मर गये।

दक्खिनी सरदार, हब्शियों की यह हालत देखकर फिर से मियाँ मंझू के पास चले गये। अपने आदमियों को फिर से अपने पास आया देखकर मियाँ मंझू ने हब्शियों पर हमला कर दिया और बहुत से हब्शी मार गिराये। शेष हब्शी जान बचाकर भाग खड़े हुए।

हब्शियों से निबटकर मियाँ मंझू ने डेढ़ साल के बादशाह बहादुर निजामशाह की फूफी चाँद बीबी से निबटने की योजना निर्धारित की जो इस समय बहादुरशाह की संरक्षक की हैसियत से अहमदनगर पर शासन कर रही थी। उसी समय मियाँ मंझू ने सुना कि मुगल शहजादा मुराद और खानखाना अब्दुर्रहीम विशाल सेना लेकर अहमदनगर की ओर बढ़ रहे हैं।

मंझू जानता था कि वह मुगल सेना के सामने नहीं टिक सकेगा। इसलिये उसने अन्सार खाँ को खजानों तथा चाँद बीबी की चौकसी पर नियुक्त किया तथा स्वयं बीजापुर, बरार और गोलकुण्डा से सहायता लेने के बहाने से अहमदनगर से बाहर निकल गया।

मंझू के अहमदनगर से बाहर निकलते ही चाँद बीबी ने मुरतिजा निजामशाह के धाभाई मुहम्मद खाँ के साथ मिलकर अन्सार खाँ को मार डाला और किले में डेढ़ साल के बालक बहादुर निजामशाह की दुहाई फेर दी।

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कहा जाता है कि एक दिन चांद बीबी अपनी पालकी में सवार होकर अहमदनगर के बाजार से गुजर रही थी, तब अचानक ही कहारों ने पालकी बीच मार्ग में खड़ी कर दी। इस पर चांद बीबी ने कहारों से पूछा कि तुमने पालकी क्यों रोकी है?

कहारों ने जवाब दिया कि हुजूर सामने से छोटे सरकार की पालकी आ रही है। उसे देखने के लिये सैंकड़ों बाशिंदे रास्ते के दोनों ओर जमा हैं। जब छोटे सरकार की सवारी निकल जायेगी तब हम लोग आगे बढ़ पाएंगे।

चांद बीबी ने आश्चर्य-चकित होकर पूछा कि हमारी सल्तनत में ये छोटे सरकार कौन हैं?’

पालकी के आगे चलने वाले घुड़सवार सिपाहियों ने चांद बीबी को बताया कि मथुरा के राजा किसनजी की सवारी जा रही है जिन्हें हिन्दू लोग फरिश्ता मानते हैं। उन्हीं को ये कहार छोटे सरकार कह रहे हैं। आज देवझूलनी ग्यारस है, इसलिए हिन्दू लोग किसनजी के बुत को तालाब में नहलाने के लिए ले जा रहे हैं।

चांद बीबी ने उन कहारों से पूछा कि उन्होंने हिन्दुओं के फरिश्ते किसनजी को छोटे सरकार क्यों कहा?

इस पर एक कहार ने जवाब दिया कि आप बड़ी सरकार हैं। इसलिए हमने मथुरा के राजा किसनजी को छोटे सरकार कहा। तब तक किसनजी की सवारी बिल्कुल निकट आ गई तथा उसके साथ बज रहे ढोल-बाजों और सामूहिक स्वरों में गाये जाने वाले कीर्तन की आवाजें भी स्पष्ट हो गईं।

पालकी के पर्दे के भीतर बैठी चाँद उस कीर्तन को सुनती रही। ऐसा संगीत उसने आज से पहले कभी नहीं सुना था। शब्द भी क्या थे जैसे आदमियों के कण्ठों से नहीं, आसमानी फरिश्तों के कण्ठों से निकल रहे हों! लगता था जैसे किसी ने शब्दों में सुगंध भर दी थी जिनकी महक से चारों ओर का वातावरण महकने लगा था!

कीर्तन सुनकर चाँद आपे में नहीं रही। वह अचानक पालकी का पर्दा उठाकर बाहर निकल आई। उसके शरीर पर बुर्का नहीं था। एक बिजली सी चमकी और लगा जैसे दिन में ही चाँद निकल आया।

देखने वालों की आँखें चुंधिया गयीं। पूनम का जो चाँद आसमान के रहस्यमयी पर्दों में से निकलता था आज पालकी के पर्दों में से प्रकट हुआ। कहार, चोबदार और घुड़सवार हड़बड़ाकर एक दूसरे का मुँह देखने लगे।

चांद बीबी अपनी शाही मर्यादा भुलाकर किसनजी की सवारी की तरफ दौड़ पड़ी। चोबदार और दूसरे सैनिक सुलताना के पीछे दौड़े। चाँद अपने होश में नहीं थी।

वह बदहवासों की तरह भगवान कृष्ण की सवारी की तरफ भागी। आगे-आगे कीमती कपड़ों में सजी-धजी एक मुस्लिम औरत और उसके पीछे सिपाहियों और चोबदारों को इस तरह भागकर आते हुए देख भगवान कृष्ण की शोभायात्रा में चल रहे लोग डरकर पीछे हट गये।

चाँद आगे बढ़ती रही और मार्ग स्वतः खाली होता गया! गाजे-बाजे बंद हो गये और भगवान की सवारी रुक गयी।

ठीक भगवान के झूले के सामने जाकर चाँद खड़ी हो गयी और आँखें फाड़-फाड़ कर भगवान के विग्रह को निहारने लगी। उसने पलक तक नहीं गिरायी। चाँद को लगा कि किसनजी का बुत उसे अपनी ओर खींच रहा है। उसके मन में विचारों की आंधी उमड़ पड़ी।

क्या यही है मुगलानी ताज का वह साहब सिरताज! नन्दजू का पूत? जिसने रुक्मनी और द्रौपदी की लाज रखी? मैं भी तो एक औरत हूँ, क्या यह मेरी लाज रखेगा? क्या सचमुच ही यह कोई आसमानी फरिश्ता है? ऐसी क्या बात है इसमें? यह मुझे अपनी ओर क्यों खींच रहा है?

क्या बुत किसी इंसान को खींच सकता है? क्या इसमें वाकई कोई आसमानी ताकत है?

चांद के मुख से अचानक निकल पड़ा- ‘हूँ तो मुगलानी हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं!’

पाठकों को बताना समीचीन होगा कि रसखान पठान की बहिन दीवानी जिसे मुगलानी ताज भी कहा जाता था, ब्रजक्षेत्र में रहकर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के पद रचा करती थी। उसी के एक पद को लक्ष्य करके चांद ने कहा- हूँ तो मुगलानी हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं!

जब बहुत देर तक चाँद सुलताना बुत बनी हुई, अपलक होकर भगवान की प्रतिमा को निहारती रही तो उसके सिपाहियों में बेचैनी फैल गयी। उन्होंने साहस करके पूछा- ‘यदि सुलताना का हुकुम हो तो पालकी यहीं ले आयें?’

अंगरक्षक दल के नायक की बात सुनकर सुलताना जैसे किसी अदृश्य लोक से निकल कर फिर से धरती पर आयी। क्या कमाल की बात है? अभी-अभी तो यहाँ कोई नहीं था। कहाँ चले गये थे ये लोग और फिर अचानक कहाँ से आ गये?

किसी से कुछ न कहकर चाँद फिर से पालकी की ओर मुड़ी। तब तक कहार पालकी लेकर वहीं पहुँच चुके थे। भक्तों ने चाहा कि जब सुलताना की पालकी निकल जाये तो भगवान की सवारी को आगे बढ़ायें किंतु सुलताना ने कहा कि ये बड़े सरकार हैं, पहले इनकी सवारी आगे बढ़ेगी उसके बाद छोटे सरकार यानि हमारी सवारी जायेगी।

पूरा आकाश भगवान मुरली मनोहर और सुलताना बीबी की जय-जयकार से गूंज उठा। भक्तों ने अबीर गुलाल और पुष्पों की वर्षा करके उस क्षण को सदैव के लिये स्मरणीय बना दिया। चांद के कानों में बार-बार हिंदुआनी व्है रहूंगी मैं गूंजता रहा।

आनंद में मग्न वे लोग नहीं जानते थे कि चांद के देश को ग्रहण लगाने के लिए अकबर रूपी राहू तेजी से बढ़ा चला आ रहा था!

अकबर का बेटा मुराद बड़ा नामुराद निकला (167)

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अकबर का बेटा मुराद

अकबर का बेटा मुराद एक नम्बर का धोखेबाज, घमण्डी, स्वार्थी तथा अविश्वसनीय शाहजादा था। उसका नाम भले ही मुराद था किंतु वास्तव में वह नामुराद था। वह किसी से भी सीधे मुँह बात नहीं करता था।

जब अकबर ने दक्षिण भारत में अहमदनगर, खानदेश, बीजापुर, बरार और गोलकुण्डा राज्यों में अपने पैर पसारने का निश्चय किया तो उसने इन राज्यों को संदेश भिजवाया कि वे अकबर की अधीनता स्वीकार करें तथा नियमित रूप से कर भिजवाया करें।

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खानदेश के शाह राजा अली खाँ ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली किंतु शेष चार राज्यों ने अकबर को कर देने से मना कर दिया। इस पर अकबर ने अहमदनगर राज्य पर हमला करने का निश्चय किया क्योंकि वहाँ का शाह मर गया था और उसकी बहिन चांद बीबी अपने डेढ़ वर्षीय भतीजे बहादुर निजाम शाह को गद्दी पर बैठाकर अहमदनगर का शासन चला रही थी।

ई.1593 में अकबर ने शहजादा दानियाल को अहमदनगर पर विजय प्राप्त करने तथा उसे अपने साम्राज्य में सम्मिलित करने के लिये भेजा। शहजादे की सेवा में बैराम खाँ के पुत्र अब्दुर्रहीम खानखाना को नियुक्त किया गया।

अकबर का बेटा मुराद पहले से ही अहमदनगर के मोर्चे पर नियुक्त था। मुगलिया खून की तासीर को देखते हुए कोई अनाड़ी भी यह भविष्यवाणी कर सकता था कि ये दोनों शहजादे दक्षिण में पहुँच कर शत्रु से लड़ने की बजाय आपस में लड़ेंगे। बादशाह को भी अपनी भूल का शीघ्र ही अनुमान हो गया।

उसने दानियाल को वापस बुला लिया और अकबर का बेटा मुराद इसी काम पर बना रहा। मुराद एक नम्बर का धोखेबाज, घमण्डी, स्वार्थी तथा अविश्वसनीय शाहजादा था। उसका नाम भले ही मुराद था किंतु वास्तव में वह नामुराद था। वह किसी से भी सीधे मुँह बात नहीं करता था।

दूसरी ओर खानखाना स्वतंत्र प्रवृत्ति का और अपने निर्णय स्वयं लेने वाला सेनापति था। इस प्रकार दो विपरीत प्रवृत्तियों के स्वामी एक साथ रख दिये गये। यदि मुराद बेर की झाड़ी था तो खानखाना केले का वृक्ष। ये दोनों एक बाग में एक साथ खड़े नहीं रह सकते थे। बेर की झाड़ी केले के पत्तों को शीघ्र ही चीर देने वाली थी।

शहजादा दानियाल खानखाना अब्दुर्रहीम का जवांई था तथा उसके स्वभाव में कुछ सहजता भी थी, खानखाना को उसके साथ काम करने में कोई कठिनाई नहीं थी होती थी किंतु मुराद निहायत बदतमीज किस्म का शहजादा था। वह किसी का भी लिहाज नहीं करता था।

जब खानखाना मार्ग में था, तब उसे इस परिवर्तन की जानकारी मिली। इसलिये खानखाना बादशाह से कुछ न कह सका और अपनी सेना लेकर भिलसा होता हुआ उज्जैन पहुँचा। उधर मुराद गुजरात में खानखाना का रास्ता देख रहा था। जब उसने सुना कि खानखाना मालवा चला गया है तो वह बहुत आग-बबूला हुआ। उसने खानखाना को चिट्ठी भिजवाई और ऐसा करने का कारण पूछा।

खानखाना ने जवाब भिजवाया कि खानदेश का सुल्तान राजा अली खाँ भी बादशाही फौज के साथ हो जायेगा। मैं उसको लेकर आता हूँ। तब तक आप गुजरात में शिकार खेलें। शहजादा मुराद इस जवाब को सुनकर और भी भड़का और अकेला ही गुजरात से दक्षिण को चल दिया।

 खानखाना यह समाचार पाकर अपना तोपखाना, फीलखाना और लाव-लश्कर उज्जैन में ही छोड़कर शहजादे के पीछे भागा।  अहमदनगर से तीस कोस उत्तर में चाँदोर के पास खानखाना शहजादे की सेवा में प्रस्तुत हुआ किंतु शहजादे ने खानखाना से भेंट करने से मना कर दिया।

खानखाना दो दिन तक मुराद के आदमियों से माथा खपाता रहा। अंत में मुराद ने खानखाना को अपने पास बुलाया और बड़ी बेरुखी से पेश आया। सलाम भी ढंग से नहीं लिया।

खानखाना ने प्रकट रूप में तो कुछ नहीं कहा किंतु उसने भी मन ही मन इस मगरूर शहजादे को सबक सिखाने का निश्चय कर लिया। मुराद ने खानखाना की तरह अन्य अमीरों को भी नाराज कर लिया। वे भी मुराद को नीचा दिखाने का निश्चय करके चुपचाप बैठे रहे।

अकबर के विश्वस्त सेनापति शहबाज खाँ कंबो, सादिक खाँ और अन्य कई अमीर जो अकबर के एक संकेत पर अपने प्राण न्यौछावर करने को तैयार रहते थे, अकबर के इस बदतमीज शहजादे को तमीज का पाठ पढ़ाने में जुट गए।

जब शहजादे मुराद और अब्दुर्रहीम खानखाना की सम्मिलित सेनाओं ने अहमदनगर से आधा कोस पहले पड़ाव डाला तो अहमदनगर के बहुत से स्थानीय जमींदार, व्यापारी और सेनापति शहजादे मुराद और खानखाना से रक्षापत्र लेने के लिये आये।

शहजादे और खानखाना ने अहमदनगर के प्रमुख लोगों को अभयपत्र दे दिए और उनसे कहा कि यदि चाँद बीबी लड़ने के लिये नहीं आयेगी तो नगर पर हमला नहीं किया जायेगा। यदि नगर पर हमला किया गया तो तुम लोगों के घर सुरक्षित रहेंगे। खानखाना ने मुगल सिपाहियों को आदेश दिया कि वे जीत प्राप्त होने पर भी शहर में लूट न करें।

इधर तो अकबर का बेटा मुराद और खानखाना अदमदनगर को अभय प्रदान कर रहे थे और उधर शहबाज खाँ कंबो शहजादे से अनुमति लिये बिना, चुपके से अहमदनगर के भीतर प्रविष्ट हो गया। उसके अनुशासनहीन और लालची सिपाहियों ने शहर में लूटपाट आरंभ कर दी।

जब अब्दुर्रहीम खानखाना को यह समाचार ज्ञात हुआ तो वह किसी तरह शहर में प्रविष्टि हुआ और अपार परिश्रम करके मुगलिया सिपाहियों को लूटपाट करने से रोक कर बाहर लाया किंतु तब तक शहर में काफी नुक्सान हो चुका था। इससे शहरवालों का विश्वास मुगल सेनापतियों पर से हट गया और चाँद बीबी ने अहमदनगर के दरवाजे बंद करके मुगलों का सामना करने का निश्चय किया।

दूसरे दिन शहजादे मुराद की सेनाओं ने अहमद नगर को घेर लिया। चाँद बीबी की ओर से शाह अली तथा अभंगर खाँ मोर्चे पर आये किंतु लड़ाई में हार कर पीछे हट गये। मुगलों की फूट अब खुलकर सामने आ गयी। जब चाँद बीबी के सिपाही हार कर भाग रहे थे तो मुगल सेनापति एक दूसरे से यह कह कर लड़ने लगे कि तू उनके पीछे जा – तू उनके पीछे जा, किंतु कोई नहीं गया और चाँद बीबी के आदमी फिर से किले में सुरक्षित पहुँच गये।

अगले दिन मुगल सेनापतियों ने विचार किया कि यहाँ मुगलों की तीन बड़ी फौजें हैं- पहली शहजादे मुराद की, दूसरी शहबाज खाँ कंबो की और तीसरी खानखाना अब्दुर्रहीम की। इन तीनों में से एक अहमदनगर के किले पर घेरा डाले, दूसरी किले पर हमला करे तथा तीसरी सेना रास्तों को रोके किंतु यह योजना कार्यरूप नहीं ले सकी।

अकबर का बेटा मुराद युद्ध की योजना इस तरह से बनाता था कि विजय का श्रेय किसी भी तरह से खानखाना अथवा शहबाज खाँ कंबो न ले सकें। इन योजनाओं को सुनकर खानखाना तो चुप हो जाता था और शहबाज खाँ उन योजनाओं का विरोध करने लगता था। इस कारण एक भी योजना कार्यरूप नहीं ले सकी।

मुराद की पगड़ी (168)

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मुराद की पगड़ी

शहंशाह अकबर के बेटे मुराद ने अपनी पगड़ी अब्दुर्रहीम के कदमों में रख दी! नामुराद मुराद की पगड़ी अपने पैरों में पड़ी देखकर खानखाना अब्दुर्रहीम का हृदय पसीज गया।

अकबर ने अपने पुत्र मुराद, खानखाना अब्दुर्रहीम तथा शहबाज खाँ कम्बो को अहमदनगर पर आक्रमण करने भेजा था किंतु मुराद ने अपने सेनापतियों से इतनी बदतमीजी की कि वे मन ही मन शहजादे के विरोधी हो गए और उसे नीचा दिखाने का अवसर खोजने लगे।

इस कारण अहमदनगर की सेना पर मुराद के दो हमले विफल हो गए। क्योंकि मुराद अपने सेनापतियों को जो भी आदेश देता था, उसके सेनापति उसका ठीक उलटा करते थे। 

इस पर शहजादे मुराद के विश्वस्त मंत्रियों ने मुराद को समझाया कि खानखाना अब्दुर्रहीम इस लड़ाई को इस तरह चलाना चाहता है कि जीत का सेहरा शहजादे के सिर पर न बंध कर खानखाना के सिर पर बंधे। मुराद तो स्वयं भी इस युद्ध को इस प्रकार चलाना चाहता था कि जीत का सेहरा केवल मुराद के सिर पर बंधे।

इसलिए मुराद ने अपने मंत्रियों की बातों का विश्वास कर लिया तथा एक ऐसी योजना बनाई जिससे खानखाना को इस युद्ध से दूर रखा जा सके। उसने अहमदनगर के बाहर एक मुगल थाना कायम किया और खानखाना को उस पर बैठा दिया ताकि खानखाना अपनी जगह से हिल भी न सके।

उधर मुराद और उसकी सेना के अत्याचार देखकर चाँद बीबी ने बीजापुर तथा गोलकुण्डा के शासकों से सहायता मांगी। बीजापुर और गोलकुण्डा के बादशाह भी जानते थे कि यदि मुगलों ने अहमदनगर फतह कर लिया तो वे सेनाएं वहीं से आगरा नहीं लौटेंगी अपितु वे बीजापुर और गोलकुण्डा पर भी आक्रमण करेंगी।

इसलिए बेहतर होगा कि तीनों राज्य मिलकर मुगलों से मोर्चा लें। पहले भी दक्षिण के पांचों शिया राज्य विजयनगर के विरुद्ध मिलकर लड़ते रहे थे। इसलिए बीजापुर और गोलकुण्डा अपनी-अपनी सेनाएं लेकर आ गए।

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अब अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा ने मिलकर मुगल सेना के विरुद्ध मोर्चा बांधा। बीजापुर का बादशाह इस संयुक्त सेना का सेनापति नियुक्त हुआ। उसके नेतृत्व में साठ हजार घुड़सवारों और त्वरित गति से चलायमान तोपखाने की सेना मुगलों से लड़ने के लिये आयी।

मुराद ने इस सेना के आने से पहले ही अहमदनगर को लेने का विचार किया और खानखाना को बताये बिना अपने डेरे से लेकर किले की दीवार तक पाँच सुरंगें बिछा दीं। मुराद ने जुम्मे की नमाज पढ़ने के बाद इन सुरंगों में आग लगाने का निश्चय किया।

चाँद बीबी को इन सुरंगों का पता चल गया। उसने दो सुरंगों की बारूद तो शुक्रवार दोपहर से पहले ही निकलवा ली। जब वह तीसरी सुरंग से बारूद निकलवा रही थी तब मुराद ने सुरंगों को आग दिखा दी। इससे किले की पचास गज की दीवार उड़ गयी।

किले के भीतर सुरंग खोद रहे लोगों में से कुछ तो मौके पर ही मारे गये और बाकी के भाग खड़े हुए। सुलताना चाँद बीबी फौरन महल से निकली और तलवार लेकर वहीं आ खड़ी हुई। उसे देखने के लिये दोनों ओर के सिपाहियों की भीड़ जुट गयी।

उधर शहजादा और उसके अमीर शेष सुरंगों के फटने की प्रतीक्षा करते रहे और इधर चाँद बीबी ने तोपों, धनुरधारियों और बन्दूकधारी सैनिकों द्वारा किले का रास्ता अवरुद्ध कर दिया। खानखाना अब्दुर्रहीम अपने थाने पर चुपचाप बैठा हुआ तमाशा देखता रहा।

जब मुराद की फौज धावे के लिये आयी तो चाँद बीबी ने उस पर ऐसे बान और गोले मारे कि मुराद की सेना घबरा कर लौट गयी। चाँद बीबी पूरी रात किले के परकोटे पर खड़ी रही और उसने अपने सामने वह दीवार फिर से बनवा ली।

मुराद ने खानखाना को पूरी तरह से इस युद्ध से अलग रखा था। इसलिये वह पूरी तरह निष्क्रिय बना रहा। इस दौरान वह तभी क्रियाशील हुआ जब उससे कुछ करने के लिये कहा गया। मुराद का हमला विफल हो गया और वह बुरी तरह पिट कर अपने खेमे में लौटा।

अहमदनगर के किले पर अधिकार करने में असफल रहने के बाद मुराद समझ गया कि खानखाना की सहायता प्राप्त किये बिना अहमदनगर का किला नहीं जीता जा सकता। उसके मन में बड़ी इच्छा थी कि अपने पिता अकबर के बाद वही बादशाह बने। वह जानता था कि यदि वह दक्खिन के मोर्चे से असफल होकर लौटेगा तो उसे बादशाहत मिलनी तो दूर, राजधानी आगरा में प्रवेश भी नहीं मिलेगा।

अतः मुराद ने मुगलिया राजनीति की चौसर का सबसे आजमाया हुआ दांव खेलने की तैयारी की। उसने खानखाना को अपने डेरे में बुलाया। जब खानखाना अपने आदमियों के साथ शहजादे की सेवा में हाजिर हुआ तो मुराद ने बड़ी लल्लो-चप्पो के साथ खानखाना का स्वागत किया।

उसने कहा कि क्या खानखाना जानते हैं कि शहंशाह ने इस मोर्चे पर आपकी भी उतनी ही जिम्मेदारी तय की है, जितनी कि मेरी?

इस पर रहीम ने जवाब दिया कि मैं अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से पहचानता हूँ। आपने मुझे जो भी आदेश दिये हैं, मैं उन्हें पूरा कर रहा हूँ। इस पर शहजादे ने कहा कि आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि आप मोर्चे पर मौजूद हों और मुगल सेना को फतह हासिल न हो?

खानखाना ने अत्यंत उदासीन भाव से उत्तर दिया कि शहजादे स्वयं बड़ी से बड़ी फतह हासिल करने में सक्षम हैं। मुराद भी पूरा घाघ था, वह समझ गया कि खानखाना आसानी से उसे अपने पुट्ठे पर हाथ नहीं धरने देगा।

इसलिए मुराद ने बहुत रिरिया कर कहा कि सच तो यह है खानखाना कि आपके या आपके पिता मरहूम खानखाना बैराम खाँ के बिना मुगलिया सल्तनत आज तक कोई भी बड़ी लड़ाई नहीं जीत सकी। हम जानते हैं कि आप हमसे नाराज हैं।

खानखाना ने कहा कि मेरे दुश्मनों ने आपसे यह बात कही होगी, मैं शहंशाह का गुलाम हूँ। मुगलों को फतह हासिल हो, इससे अच्छी और क्या बात होगी?

शहजादे ने कहा कि यह जीत आपके बिना नहीं हो सकती। आप ही बताईये कि क्या किया जाये? खानखाना ने कहा कि मेरे अकेले के किये कुछ नहीं होगा। आप अपने विश्वस्त आदमियों से सलाह करें। जैसी सबकी राय बने, वैसा ही करें।

खानखाना की उदासीनता से मुराद समझ गया कि खानखाना सहयोग करने के मूड में नहीं है किंतु मुराद भी पूरा कांईयां था। उसने ठान ली थी कि वह खानखाना के माध्यम से ही अहमदनगर हासिल करेगा।

मुराद ने अपने डेरे से सब अमीरों को बाहर जाने का संकेत किया और खानखाना को वहीं ठहरने के लिये कहा। जब डेरा खाली हो गया तो मुराद ने अपनी पगड़ी उतार कर खानखाना के पैरों में रख दी और गिड़गिड़ाकर बोला, मेरी लाज आपके हाथ में है खानखाना।

समय का पहिया पूरी तरह घूम कर फिर से उसी बिंदु पर आ गया था। एक दिन अकबर की पगड़ी बैराम खाँ के कदमों में पड़ी रहती थी और आज अकबर के बेटे मुराद की पगड़ी बैराम खाँ के बेटे के कदमों में पड़ी थी।

 खानखाना अब्दुर्रहीम शहजादे मुराद के इस अभिनय से पसीज गया। उसने मुराद की पगड़ी उठाकर फिर से मुराद के सिर पर रख दी और उसे वचन दिया कि वह पूरे मनोयोग से यत्न करेगा। उस काल की मुगलिया राजनीति में नामुराद मुराद की पगड़ी का एक सेनापति के कदमों में होना कोई बड़ी बात नहीं थी। मुगल शहजादे सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर सकते थे।

चांद सुल्ताना बेपर्दा होकर खानखाना के सामने आ खड़ी हुई! (169)

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चांद सुल्ताना

अब्दुर्रहीम खानखाना अहमदनगर की चांद सुल्ताना के बारे में काफी कुछ सुन चुका था और उसका प्रशसंक था। जिस तरह अब्दुर्रहीम भगवान श्रीकृष्ण का भक्त था, उसी प्रकार चांद बीबी भी भगवान मुरली मनोहर श्रीकृष्ण की दासी थी।

अपने समय के इन दो श्रेष्ठ मुस्लिम कृष्ण भक्तों में एक-दूसरे के लिए सहानुभूति होनी स्वाभाविक थी। अब्दुर्रहीम कतई नहीं चाहता था कि चाँद बीबी की कुछ भी हानि हो। इसलिए उसने मुराद से कहा कि श्रेष्ठ उपाय तो यह होगा कि बिना रक्तपात किये अहमदनगर हमारी अधीनता स्वीकार कर ले।

इससे हमारे आदमियों की भी हानि नहीं होगी और इस समय मुगल सेना को जो धान और चारे की कमी है, उससे भी छुटकारा मिल जायेगा।

मुराद चाहता था कि किसी भी तरह अहमदनगर मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ले। मुराद को अपने पिता की राजधानी फतहपुर सीकरी से चले तीन साल हो चले थे और अहमदनगर अब भी दूर की कौड़ी बना हुआ था।

वह फतहपुर सीकरी से अधिक दिनों तक दूर नहीं रहना चाहता था। इसलिए उसने अब्दुर्रहीम को अनुमति दे दी कि वह चांद बीबी से बात करे। शहजादे की अनुमति पाकर स्वयं खानखाना ने मुगलों की ओर से चाँद बीबी के सम्मुख उपस्थित होने का निश्चय किया।

उसने इस आशय का संदेश चांद सुल्ताना को भिजवाया। वैसे तो शहबाज खाँ कम्बो द्वारा की गई लूट के कारण मुगल सेनापति अहमदनगर वालों के सामने अपनी साख खो बैठे थे किंतु जब चांद को ज्ञात हुआ कि स्वयं खाखाना चांद से मिलने आ रहा है तो वह सहमत हो गई।

खानखाना की इस योजना से उसके एक साथ दो उद्देश्य पूरे हो गये। एक तो खानखाना फिर से इस अभियान के केंद्र में आ गया और दूसरा यह कि चाँद बीबी को देख पाने की उसकी साध पूरी हो गयी।

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वह जब से अहमदनगर की सीमा में आया था, तब से चाँद की बुद्धिमत्ता और कृष्ण-भक्ति की बातें सुनता रहा था। बिना पिता, बिना भाई और बिना पुत्र के संरक्षण में एकाकी महिला का राजकाज चलाना स्वयं अपने आप में ही एक बड़ी बात थी! तिस पर चारों ओर दक्खिनियों, हब्शियों एवं मुगलों जैसे खूंखार शत्रुओं की रेलमपेल लगी रहती थी। खानखाना को लगा कि इस साहसी और अद्भुत महिला को अवश्य देखना चाहिये।

खानखाना अपने पाँच सवारों को लेकर अहमदनगर के दुर्ग में दाखिल हुआ। ऊँचे घोड़े पर सवार, लम्बे कद और पतली-दुबली देह का खानखाना दूर से ही दिखाई देता था। चांद सुल्ताना के आदमी उसे सुलताना के महलों तक ले गये। चाँद ने खानखाना के स्वागत की भारी तैयारियां कर रखी थीं। उसने शाही महलों को रंग-रोगन और बंदनवारों से सजाया। चांद ने रास्तों पर रंग-बिरंगी पताकाएं लगवाईं तथा महलों की ड्यौढ़ी पर खड़े रहकर गाजे-बाजे के साथ खानखाना की अगुवाई की।

अहमदनगर के अमीर, साहूकार और अन्य प्रमुख लोग भी खानखाना की अगुवाई के लिये उपस्थित हुए। जब खानखाना शाही महलों में पहुँचा तो उस पर इत्र और फूलों की वर्षा की गयी।

बुर्के की ओट से चाँद ने खानखाना का अभिवादन किया। खानखाना ने एक भरपूर दृष्टि अपने आसपास खड़े लोगों पर डाली और किंचित मुस्कुराते हुए कहा-

‘रहिमन रजनी ही भली, पिय सों होय  मिलाप।

खरो दिवस किहि काम को, रहिबो आपुहि आप।’

वहाँ खड़े तमाम लोग खानखाना की इस रहस्य भरी बात को सुनकर अचंभे में पड़ गये। वे नहीं जान सके कि खानखाना की इस रहस्यमयी बात से बुर्के के भीतर मुस्कान की शुभ्र चांदनी खिली है और उसकी चमक खानखाना तक पहुँच गयी है!

सुलताना ने लोक रीति के अनुसार खानखाना का आदर-सत्कार करके उसे अपने महल के भीतरी कक्ष में पधारने का अनुरोध किया। खानखाना की इच्छानुसार एकांत हो गया।

अब केवल दो ही व्यक्ति वहाँ थे, एक ओर तो खानखाना तथा दूसरी ओर पर्दे की ओट में बैठी चाँद। खानखाना ने पर्दे की ओर देखकर हँसते हुए कहा-

‘रहिमन प्रीति सराहिए, मिले होत रंग दून।

ज्यों जरदी  हरदी  तजै, तजै सफेदी चून।’

पाठकों को बताना समीचीन होगा कि अब्दुर्रहीम खानखाना अपने समय का बहुत बड़ा कवि था। उसकी कविता वैसे तो भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित थी किंतु उसने भक्ति के साथ-साथ नीति और ज्ञान की जो सरिता बहाई, वैसी बहुत कम ही देखने को मिलती है।

खानखाना हिन्दी, उर्दू, फारसी, डिंगल, संस्कृत आदि भाषाओं का जानकार था। इन सभी भाषाओं में उसकी कुछ रचनाएं मिलती हैं किंतु खानखाना ने अपनी अधिकांश रचनाएं हिन्दी भाषा में लिखीं जिसमें ब्रज एवं अवधी का मिश्रण देखने को मिलता है।

खानखाना की बात सुनकर चांद सुल्ताना ने कहा कि यदि खानखाना पहेलियाँ ही बुझाते रहेंगे तो हमारी समझ में कुछ नहीं आयेगा। इस पर खानखाना ने कहा कि सुलताना! मैंने कहा कि उसी प्रेम की सराहना की जानी चाहिये, जब दो व्यक्ति मिलें और अपना-अपना रंग त्याग दें। जैसे चूने और हल्दी को मिलाने पर हल्दी अपना पीलापन त्याग देती है और चूना अपनी सफेदी त्याग देता है।

अर्थात् यदि आप पर्दे में रहेंगी तब मैं कैसे जानूंगा कि हल्दी ने अपना रंग त्याग कर चूने का रंग स्वीकार कर लिया है! इस बार चाँद खानखाना का संकेत समझ गयी। वह पर्दे से बाहर निकल आयी।

बचपन से वह खानखाना के बारे में सुनती आयी है। खानखाना की वीरता, दयालुता और दानवीरता के भी उसने कई किस्से सुने हैं। उसने यह भी सुना है कि खानखाना मथुरा के फरिश्ते किसनजी की तारीफ में कविता करता है।

जिस दिन से चाँद सुल्ताना ने किसनजी की सवारी के दर्शन किये थे, उसी दिन से चाँद के मन में न केवल रसखान पठान, मुगलानी दीवानी और खानखाना अब्दुर्रहीम से मिलने की अभिलाषा प्रबल हो चली थी, अपितु चांद उनकी कविताओं की कुछ पुस्तकें भी मंगवाने में भी सफल हो गई थी।

चांद भी चाहती थी कि वह भी इन लोगों की तरह किसनजी की भक्ति में कविता करे किंतु कविता लिखना उसके वश की बात नहीं थी। इसलिए वह उन लोगों से मिलकर किसनजी के बारे में अधिक से अधिक जानकारी लेना चाहती थी। आज वह अवसर अनायास ही उसे प्राप्त हो गया था। उसे अपने भाग्य पर विश्वास नहीं हुआ कि एक दिन वह इस तरह खानखाना के सामने बेपर्दा होकर खड़ी होगी!       

चांद बीबी (170)

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चांद बीबी

मुगल सेनापति अब्दुर्रहीम खानखाना इस समय अहमद नगर की राजकुमारी चांद बीबी के महल में था। और चांद बीबी पर्दे के पीछे थी।

खानखाना अब्दुर्रहीम के अनुरोध पर सुल्ताना चांद बीबी, बिना किसी पर्दे के खानखाना के सामने उपस्थित हुई। चाँद को पर्दे से बाहर आया देखकर खानखाना ने हँसकर कहा-

‘रहिमन प्रीति न कीजिये जस खीरा ने कीन।

ऊपर से तो दिल मिला,  भीतर फांकें  तीन।’

-‘इसका क्या अर्थ है खानानजू?’ सुलताना ने हँस कर पूछा। उसे अब पहिले का सा संकोच न रह गया था।

-‘सुलताना! मैं चाहूंगा कि संधि के सम्बन्ध में जो भी बात हो, दिल से हो, निरी शाब्दिक नहीं हो।’ खानखाना ने जवाब दिया।

चांद ने खानखाना को विश्वास दिलाया कि जो कुछ भी तय होगा, उसका अक्षरशः पालन होगा, बशर्ते कि मुगल अपनी तरफ से वादाखिलाफी न करें। खानखाना समझ गया कि चांद का संकेत शहबाज खाँ कम्बो द्वारा की गई लूट की तरफ है।

खानखाना ने गंभीर होकर कहा कि मुझे तुम पर विश्वास है इसीलिये मैं तुम्हें कुछ कहना चाहता हूँ। इसे मुगल बादशाह की तरफ से नहीं अपितु मेरी तरफ से समझना। खानखाना ने कहा-

रहिमन छोटे नरन सों बैर भलो ना प्रीति।

काटे चाटे स्वान के, दौऊ भांति विपरीत।’

चाँद को समझ नहीं आया कि खानखाना ने ऐसा क्यों कहा।

-‘खानखाना! हमारी समझ में कुछ नहीं आया।’ चाँद ने कहा।

चाँद की बेचैनी देखकर खानखाना मुस्कुराया। उसने कहा-

‘रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहि।

जै जानत ते कहत नहि, कहत ते जानत नाहि।’

अर्थात्- गूढ़ बातें कहने और सुनने की नहीं होतीं। जो इन्हें जानते हैं, वे कहते नहीं हैं और जो कहते हैं, समझो कि वे जानते नहीं हैं। खानखाना अब्दुर्रहीम की अत्यंत गूढ़ और रहस्य भरी बातों से चाँद के होश उड़ गये। जाने खानखाना क्या कहता था, जाने वह क्या चाहता था!

खानखाना उसकी दुविधा समझ गया। उसने कहा- ‘ओछे व्यक्तियों से न दुश्मनी अच्छी होती है और न दोस्ती। जैसे कुत्ता यदि दुश्मन बनकर काट खाये तो भी बुरा और यदि दोस्त होकर मुँह चाटने लगे तो भी बुरा।’

-‘क्या मतलब हुआ इस बात का?’

-‘मैं अपने स्वामी मुराद की ओर से संधि का प्रस्ताव लेकर आया हूँ। वह भी एक ऐसा ही ओछा इंसान है। मतलब आप स्वयं समझ सकती हैं।’

खानखाना की बात सुनकरचांद बीबी और भी दुविधा में पड़ गयी। कुछ क्षण पहले वह जिस खानखाना को सरल सा इंसान समझे बैठी थी, वह भावना तिरोहित हो गयी। उसे लगा कि उसका पाला एक रहस्यमय इंसान से पड़ा है जिससे पार पाना संभवतः आसान न हो।

-‘और दूसरे दोहे में आपने क्या कहा?’

-‘दूसरे दोहे में मैंने कहा कि जो बातें हमारी सामर्थ्य से बाहर हैं, वे कहने सुनने की नहीं हैं। क्योंकि जो जानते हैं वे कहते नहीं हैं और जो कहते हैं, वे जानते नहीं हैं।’

-‘इस बात का क्या मतलब हुआ?’ 

-‘इसका अर्थ यह हुआ कि जो बात मैंने तुम्हें अपने स्वामी के बारे में बताई है वह मेरी सामर्थ्य के बाहर की बात है। उसे कभी किसी और के सामने कदापि नहीं कहा जाये।’

-‘खानखाना मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा कि आप क्या कह रहे हैं और आप मेरे लिये क्या संदेश लाये हैं!’ चाँद के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं।

-‘मैं कहना चाहता हूँ कि शहजादा मुराद धूर्त इंसान है। इसलिये मैं जानबूझ कर स्वयं तुम्हारे सामने संधि का प्रस्ताव लेकर आया हूँ। मैं तो तुम्हें केवल यह चेतावनी दे रहा था कि मैं जिस स्वामी की ओर से संधि करने आया हूँ, वह विश्वास करने योग्य नहीं है।

चूंकि वह बहुत शक्तिशाली है, इसलिये वह शत्रुता करने योग्य भी नहीं है। मैंने ऐसा इसलिये कहा ताकि तुम्हारे मन में किसी तरह का भ्रम न रहे और तुम बाद में किसी परेशानी में न पड़ जाओ।

तुम साहसी हो, बुद्धिमती हो, स्वाभिमानी हो, भगवान कृष्णचंद्र पर भरोसा करने वाली हो किंतु तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि तुम्हारा पाला किसी इंसान से नहीं, अपितु शैतान से पड़ा है।’

-‘यह तो मैं उसी समय देख चुकी हूँ जब मुगल सैनिकों ने नगर में घुस कर विश्वासघात किया। कृपया बताईये कि मैं मुराद से संधि करूं या नहीं?’

-‘संधि तो तुम्हें करनी होगी किंतु सावधान भी रहना होगा।’

-‘अर्थात्?’

-‘यदि तुम संधि नहीं करोगी तो मुराद अहमदनगर की ईंट से ईंट बजा देगा और यहाँ से तब तक नहीं हिलेगा जब तक कि अहमदनगर उसके अधीन न हो जाये।

संधि करने से तुम्हें यह लाभ होगा कि मुराद अपनी सेना लेकर अहमदनगर से चला जायेगा। और सावधान इसलिये रहना होगा कि यदि मुराद संधि भंग करे तो तुम तुरंत कार्यवाही करने की स्थिति में रहो।’

-‘संधि का क्या प्रस्ताव तैयार किया है आपने?’

-‘मेरा प्रस्ताव यह है कि बराड़ का वह प्रदेश जो बराड़ के अंतिम बादशाह तफावल खाँ के पास था और जिसे इन दिनों मुरतिजा निजामशाह ने दबा रखा है वह तो शहजादा मुराद ले ले और बाकी का राज्य माहोर के किले से चोल बन्दर तक और परेंड़े से दौलताबाद के किले और गुजरात की सीमा तक अहमदनगर के अधिकार में रहे।’

-‘इससे मुझे क्या लाभ होगा?’

-‘बरार अहमदनगर का मूल हिस्सा नहीं है। वह तो मुरतिजा ने तफावल खाँ से छीना था। यदि यह क्षेत्र तुम्हारे हाथ से निकल भी जाता है तो भी तुम्हारा मूल राज्य सुरक्षित रहेगा।’

-‘क्या मुझे शहजादे मुराद के सामने पेश होना होगा?’

-‘नहीं, तुम मुरतिजा को अपनी ओर से शहजादे की सेवा में भेज सकती हो।’

-‘क्या शहजादा मुराद बरार लेकर मान जाएगा?’ चांद ने पूछा।

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खानखाना की सीधी-सपाट बात सुनकर चांद बीबी की आँखों में आँसू आ गये। किसी तरह अपने आप को संभाल कर बोली- ‘आप ज्ञानी हैं, इसी से इतने उदासीन हैं और बड़ी-बड़ी बातें कहते हैं किंतु मैं अज्ञानी हूँ, मैं आपकी तरह संतोषी नहीं हो सकती।’ खानखाना उठ खड़ा हुआ। चाँद ने सिर पर दुपट्टा लेकर खानखाना को तसलीम कहा और पर्दे की ओट में चली गयी। खानखाना को लगा कि श्रद्धा, विश्वास और प्रेम का निश्छल चाँद जो कुछ क्षण पहले तक कक्ष में उजाला किये हुए था, अचानक बादलों की ओट में चला गया।

-‘शहजादे की नजर पूरे अहमदनगर राज्य पर है किंतु फिलहाल वह बराड़ से संतोष कर लेगा। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलेंगी। हो सकता है बादशाह द्वारा मुराद को वापस बुला लिया जाये और यह पूरा काम मेरे जिम्मे छोड़ दिया जाये या फिर हम दोनों के ही स्थान पर कोई और आये। जब जैसी परिस्थति हो, तुम वैसे ही निबटना।

अब्दुर्रहीम खानखाना से छल 171

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अब्दुर्रहीम खानखाना से छल

अकबर के विश्वासघाती नामुराद शहजादे मुराद ने संकट में सहायक बनने वाले अब्दुर्रहीम खानखाना से छल किया तथा उसकी हत्या करने का षड़यंत्र रचा!

खानखाना अब्दुर्रहीम ने शहजादे मुराद के अनुरोध पर अपने पांच आदमियों के साथ अहमदनगर के किले में प्रवेश किया तथा चांद बीबी से संधि करके उसे इस बात पर सहमत कर लिया कि वह बरार का क्षेत्र मुगलों को सौंप दे तथा मुगलों के साथ मित्रवत् व्यवहार करे।

यद्यपि बादशाह अकबर और शहजादा मुराद दोनों चाहते थे कि केवल बरार नहीं अपितु सम्पूर्ण अहमदनगर राज्य मुगल सल्तनत में सम्मिलित किया जाए किंतु चांद बीबी इसके लिए सहमत नहीं थी और खानखाना किसी भी हालत में चांद बीबी को क्षति नहीं पहुंचाना चाहता था। इसलिए शहजादा मुराद दुविधा में फंस गया।

शहजादे को फतहपुर सीकरी छोड़कर आए हुए तीन साल बीत चुके थे और वह अब तक अपने पिता अकबर को अपनी विजय का एक भी समाचार नहीं भेज पाया था। इससे मुराद की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

जब खानखाना ने अहमदनगर की सुलताना चाँद बीबी की ओर से प्राप्त प्रस्ताव मुराद के समक्ष रखा कि यदि मुराद अहमदनगर से चला जाये तो चाँद उसे बरार का समस्त क्षेत्र दे सकती है तो मुराद ने इसी पर संतोष करना उचित समझा और उसने संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये।

मुराद ने खानखाना को आदेश दिए कि अब अहमदनगर में खानखाना का काम पूरा हो गया है। इसलिए खानखाना जालना चला जाए। मुराद का यह आदेश सुनकर खानखाना का मुंह उतर गया। वह समझ किया कि मुराद चांद बीबी के साथ धोखा करेगा। फिर भी उसके पास आदेश मानने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। 

मुगलों से संधि हो जाने पर चांद सुलताना ने खानखाना अब्दुर्रहीम का बड़ा आभार व्यक्त किया। जब खानखाना जालना के लिये रवाना होने लगा तो चाँद बीबी ने खानखाना के सम्मान में अहमदनगर के किले में बड़ा दरबार आयोजित किया। इस दरबार में खानखाना पूरे ठाठ-बाट के साथ उपस्थित हुआ।

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उन दिनों खानखाना का ठाठ-बाट किसी भी मुगल शहजादे से बढ़कर हुआ करता था। यहाँ तक कि कई बार अकबर का दरबार भी खानखाना के दरबार के सामने फीका दिखाई देने लगता था। स्वयं अकबर को इस बात से कोई कठिनाई नहीं थी कि मरहूम बैराम खाँ का बेटा अब्दुर्रहीम इस ठाठ-बाट के साथ रहता है।

रहीम के इस ठाठ-बाट के कई कारण थे। एक तो रहीम का स्वयं का व्यक्तित्व इतना मधुर था कि कोई भी व्यक्ति उससे नाराज हो ही नहीं सकता था। उससे सलाह प्राप्त करने से हर किसी को लाभ होता था, इसलिए लगभग समस्त हिन्दू एवं मुसलमान अमीर एवं उमराव, शहजादे एवं राजे-महाराजे, कवि एवं साधु-संत, फकीर एवं दरवेश, रहीम के दरबार में हाजरी देते थे।

रहीम के दरबार की भव्यता का दूसरा कारण यह था कि अकबर के मन में बैराम खाँ की हत्या के कारण ग्लानि का जो स्थाई भाव बना रहता था, वह रहीम की उन्नति को देखकर कुछ कम होता था।

तीसरा कारण यह था कि स्वयं सलीमा बेगम जो किसी समय बैराम खाँ की बीवी थी और अब अकबर की बेगम थी, वह अब्दुर्रहीम पर विशेष महरबान रहती थी। रहीम की माँ खानजादा बेगम भी अकबर के हरम में रहती थी।

स्वयं अकबर भी अब्दुर्रहीम को अपने पुत्र की तरह प्रेम देता था और भरे दरबार में वह रहीम को अपना बेटा कह चुका था। अकबर ने यह विश्वास केवल दो ही व्यक्तियों पर व्यक्त किया था एक तो कुंअर मानसिंह कच्छवाहे पर और दूसरे खानखाना अब्दुर्रहीम पर।

जब खानखाना अब्दुर्रहीम चांद बीबी के निमंत्रण पर अहमदनगर के दरबार में उपस्थित हुआ तो मुराद की छाती पर सांप लोट गए। उसे यह सहन नहीं था कि मालिक बैठा रहे और उसका नौकर दावत खाता फिरे! मुराद स्वयं को खानखाना का मालिक समझता था किंतु उसे पता नहीं था कि लोगों से सम्मान प्राप्त करने के लिए मनुष्य में स्वयं में क्या गुण होने चाहिए!

अहमदनगर के अमीरों ने खानखाना को महंगे नजराने पेश किये और उसके प्रति बड़ा आभार व्यक्त किया। उन्हें विश्वास नहीं था कि यह मामला इतनी अच्छी तरह से सुलझ जाएगा। बहुत से अमीर तो खानखाना की अंगुली पकड़कर मुगल सल्तनत में बड़ी जागीरें प्राप्त करने का सपना देख रहे थे।

वस्तुतः मुराद ने खानखाना को दिखाने के लिए यह संधि स्वीकार की थी और अकबर को यह सूचना भी भेज दी थी कि चांद बीबी से बरार का क्षेत्र प्राप्त कर लिया गया है किंतु अंदरखाने मुराद इस संधि से बिल्कुल भी सहमत नहीं था। वह अहमदनगर का सम्पूर्ण राज्य जीत कर अपने पिता की झोली में डालना चाहता था।

 खानखाना को अहमदनगर से गये हुए अभी कुछ ही दिन बीते होंगे कि मुराद ने अहमदनगर राज्य से की गई संधि तोड़ दी और बराड़ से आगे बढ़कर पाटड़ी में भी अपना अमल कर लिया।

इस पर दक्षिण के अन्य शिया शासकों को भी अपना भविष्य अंधकारमय दिखायी देने लगा। उन्हें लगा कि इस विपदा से अकेले रहकर मुकाबला नहीं किया जा सकता। इसके लिये उन्हें एकजुट होकर प्रयास करना पड़ेगा।

चाँद सुलताना ने अपने विश्वस्त सेनापति सुहेल खाँ को मुगलों का रास्ता रोकने के लिये लिखा। आदिलशाह और कुतुबशाह ने भी अपनी-अपनी सेनाएं भेज दीं। उस वक्त मुराद शाहपुर में और खानखाना जालना में था।

जब खानखाना को ये सारे समाचार मिले तो वह शहजादे के पास गया और वचन भंग करने के लिये उसे भला-बुरा कहा। शहजादा उस समय तो खानखाना से कुछ नहीं बोला किंतु उसने मन ही मन खानखाना से पीछा छुड़ाने का निश्चय कर लिया।

मुराद स्वयं तो शाहपुर में ही बैठा रहा और उसने अपने आदमियों के साथ शहबाज खाँ कंबो, खानदेश के जागीरदार रजाअली खाँ रूमी तथा खानखाना अब्दुर्रहीम को चांद बीबी के सेनापति सुहेल खाँ पर चढ़ाई करने के लिये भेजा।

मुराद के आदमियों ने मुराद के कहे अनुसार अब्दुर्रहीम खानखाना से छल करके युद्ध की कपटपूर्ण व्यूह रचना की जिसका भेद बहुत कम आदमियों को मालूम था।

पहर भर दिन चढ़ने के बाद युद्ध शुरू हुआ। मुराद की योजनानुसार खानखाना की सेना को इस प्रकार नियोजित किया गया कि वह शत्रु सेना के तोपखाने की सीधी चपेट में आ जाये। खानखाना के गुप्तचरों को इस बात का पता नहीं चल सका किंतु खानदेश के शासक रजाअली खाँ रूमी को अब्दुर्रहीम खानखाना से छल किए जाने की बात की जानकारी हो गई।

उसने खानखाना की रक्षा करने का निश्चय किया तथा अपने विश्वस्त आदमियों से कहा- ‘दोस्तो! मरने का दिन आ गया।’

रजाअली खाँ रूमी (172)

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तू मुझे लाशों के ढेर के नीचे ढूंढना!

शहजादे मुराद ने खानखाना अब्दुर्रहीम को युद्ध के मैदान में मरवाने का षड़यंत्र रचा। मुराद स्वयं तो शाहपुर में बैठा रहा और उसने शहबाज खाँ कंबो, रजाअली खाँ रूमी तथा खानखाना अब्दुर्रहीम को चांद बीबी के सेनापति सुहेल खाँ पर चढ़ाई करने के लिये भेजा।

मुराद के आदमियों ने मुराद के कहे अनुसार युद्ध की कपटपूर्ण व्यूह रचना की जिसका भेद बहुत कम आदमियों को मालूम था किंतु युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले रजाअली खाँ रूमी को मुराद के षड़यंत्र का पता लग गया।

उसने खानखाना के प्राण बचाने का निर्णय लिया तथा वह अपना मोर्चा छोड़कर सुहेल खाँ की तोपों की सीधी मार में खड़े खानखाना को बचाने के लिये दौड़ पड़ा।

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रजाअली खाँ रूमी तथा उसके सिपाहियों को ऐन वक्त पर अपना स्थान छोड़ दौड़कर जाते हुए देखकर मुराद के आदमी गुस्से से चिल्लाने लगे कि धोखेबाज रजाअली खाँ शत्रु से मिल गया है। रजाअली खाँ ने उनकी परवाह नहीं की और किसी तरह खानखाना के पास जा पहुँचा।

उसने कहा- ‘खानखाना! शहजादे ने आपके साथ दगा की है। आपको जानबूझ कर ऐसी जगह रखा गया है जहाँ से आप जीवित बचकर नहीं निकल सकते। सारी आतिशबाजी आपके बराबर चुनी हुई है। अभी उसमें आग दी जाती है। इसलिए यदि आप दाहिनी ओर मुड़ जावें तो ठीक होगा।’

खानखाना तो तुरंत अपने आदमियों के सहारे उसी ओर मुड़ गया और रजाअली खाँ रूमी उसके स्थान पर डट गया। जैसे ही खानखाना वहाँ से हटा, गनीम की तोपों को आग दिखाई गयी और सारा आकाश धुएँ से भर गया। यहाँ तक कि सूर्यदेव भी उस धुएँ से ढंक गये।

कुछ पता नहीं चला कि कौन जीवित रहा और कौन मर गया। शत्रु की फौज रजाअली खाँ को खानखाना समझ कर उस पर चढ़ बैठी। किसी को शत्रु-मित्र की पहचान न रही। सब अमीर आपस में कट मरे। रजाअली खाँ का भी काम तमाम हो गया। मुगलों की बड़ी भारी क्षति हुई। राजा जगन्नाथ अपने चार हजार सिपाहियों सहित मारा गया।

धुआँ छंटने पर खानखाना ने फिर से उसी स्थान पर धावा किया जिस स्थान पर उसने रजाअली खाँ को छोड़ा था किंतु रजाअली खाँ वहाँ नहीं मिला। इसी दौरान रात हो गयी और दोनों ओर की सेनाएं अपनी-अपनी जीत समझ कर सारी रात रणक्षेत्र में खड़ी रहीं।

कोई भी घोड़े की पीठ से नहीं उतरा। दक्खिनी तो यह समझते रहे कि हमने खानखाना को मार डाला है और मुगल सेना यह समझती रही कि सुहेल खाँ पराजित होकर भाग गया है। यह भाग्य अथवा प्रारब्ध का ही यत्न था कि जिस खानखाना को मार डालने के लिये उसके स्वामी ने षड़यंत्र रचा था, उसी खानखाना को बचाने के लिये सेवकों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिये।

सुबह होने पर खानखाना ने अपना नक्कारा बजाया और अपना नरसिंगा फूंका जिसे सुनकर मुगल सेना के जो सिपाही युद्ध से भागकर इधर-उधर छिपे हुए थे, खानखाना से आ मिले। खानखाना ने किसी तरह रजाअली खाँ के क्षत-विक्षत शव को ढूंढ निकाला।

उस समय खानखाना और उसके आदमियों के पास कुल सात हजार सवार रह गये थे जबकि शत्रु सैन्य में पच्चीस हजार घुड़सवार मौजूद थे।

इस पर दौलत खाँ लोदी ने खानखाना से कहा- ‘यदि मैं तोपखाने या हाथियों के सामने चढ़ कर जाऊंगा तो शत्रु तक पहुँचने से पहले ही मारा जाऊंगा इसलिये पीठ पीछे से धावा करता हूँ।’

इस पर खानखाना ने दौलत खाँ लोदी से कहा- ‘जो तू ऐसा करेगा तो दिल्ली का नाम डुबोवेगा।’

– ‘नाम को जीवित रखकर क्या करना है? यदि मैं जीवित रहा तो सौ दिल्लियाँ बसा लूंगा।’ यह कहकर दौलत खाँ आगे बढ़ गया।

दौलत खाँ लोदी के नौकर सैयद कासिम को खानखाना की नीयत पर शक हो गया। उसने दौलत खाँ के कान में फुसफुसा कर कहा- ‘खानखाना आपको मरवा डालने के लिये ऐसा कह रहा है।’

दौलत खाँ लोदी ने खानखाना की टोह लेने के लिये पूछा- ‘इतना बता दो खानखाना! यदि हार हो जावे और मैं किसी तरह शत्रु के हाथों से बचकर वापिस आऊँ तो आप कहाँ मिलेंगे?’

– ‘शत्रु की लाशों के नीचे।’ खानखाना ने जवाब दिया। इस जवाब से संतुष्ट होकर दौलत खाँ लोदी सुहेल खाँ की सेना पर धावा बोलने के लिये चला गया।

खानखाना समझ गया कि उसकी नीयत पर शक किया जा रहा है। मुगलों का संशय मिटाने के लिये उस दिन खानखाना ने ऐसी लड़ाई की कि मुराद और उसके मंत्री दांतों तले अंगुली दबाकर देखने के सिवाय कुछ न कर सके।

चांद बीबी का सेनापति सुहेल खाँ विशाल सेना का स्वामी होने के बावजूद खानखाना की छोटी सेना से परास्त हो गया। खानखाना यह चमत्कार करने का पुराना जादूगर था।

इसी जादू के बल पर वह मुगलिया सल्तनत का खानखाना बना था। विजय प्राप्त होने पर खानखाना ने उस दिन पचहत्तर लाख रुपये और अपनी समस्त सम्पत्ति अपने सैनिकों में लुटा दी। दक्खिनियों के चालीस हाथी और तोपखाना खानखाना के हाथ लगे जो उसने मुराद को सौंप दिये।

उस शाम मुगल सेना में चारों ओर विजय का उत्सव था। सिपाही छक कर शराब पीते थे और रक्कासाओं के साथ नगाड़ों की धुन पर घण्टों नाचते थे किंतु शायद ही कोई जान सका कि विजयी सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीम खाँ अपने डेरे में मुँह पर कपड़ा बांधे जार-जार रो रहा था।

उसके पास उसके दोस्त रजाअली खाँ रूमी का क्षत-विक्षत शव रखा था। रजा अली खाँ मुगलिया राजनीति की चौसर पर बलिदान हो गया था।

यह मुगलों की बड़ी भारी विजय थी जिसके कारण पूरा दक्खिन काँप उठा था। जीत का सेहरा अपने सिर पर बांधने तथा खानखाना से छुटकारा पाने की फिराक में लगे शहजादे मुराद ने भागते हुए दक्खिनियों के पीछे अपना कोई लश्कर नहीं भेजा अन्यथा दक्खिनियों की बड़ी भारी हानि होती। खानखाना तो वैसे भी नहीं चाहता था कि इस शत्रु फौज का और अधिक नुक्सान हो।

सुहेल खाँ पर विजय प्राप्त करके खानखाना फिर से जालना लौट गया। जब परनाला और गावील के दुर्ग मुराद के हाथ लग गये तो उसने अपने अमीर सादिक खाँ के कहने से खानखाना को लिखा कि अब अवसर है कि चलकर अहमदनगर ले लें। मुराद का पत्र पाकर खानखाना के होश उड़ गये।

उसे अनुमान तो था कि शहजादा अपने वचन से फिरेगा किंतु इतनी शीघ्र फिरेगा, इसका अनुमान नहीं था। बहुत सोच-विचार कर खानखाना ने मुराद को लिखा कि अभी तो यही उचित है कि इस वर्ष बराड़ में रहकर यहाँ के किलों को फतह करें और जब यह देश पूर्ण रूप से दब जाये तो दूसरे देशों पर जायें।

खानखाना के इस लिखित जवाब से मुराद को खानखाना के विरुद्ध मजबूत प्रमाण मिल गया। उसने खानखाना का पत्र ढेर सारे आरोपों के साथ नत्थी करके बादशाह अकबर को भिजवा दिया।

उसमें प्रमुख शिकायत यह थी कि खानखाना अब्दुर्रहीम शहंशाह अकबर और समूची मुगलिया सल्तनत से दगा करके चाँद बीबी से मिल गया है। शहजादे का पत्र पाकर अकबर खानखाना पर बड़ा बिगड़ा।

उसने खानखाना को दक्खिन से लाहौर में तलब किया और खानखाना की जगह शेख अबुल को दक्षिण का सेनापति बनाकर भेज दिया। ऐसी थी उस काल की मुगलिया राजनीति की गंदी चौसर जहाँ हर कोई हर किसी को निबटाने में लगा रहता था। यह अलग बात है कि राजनीति हर काल में ऐसी गंदी ही होती है। 

खुरासान से आया बादशाह तो मर जाएगा किंतु हिन्दू धर्म और धरती यहीं रहेंगे! (173)

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खुरासान से आया बादशाह तो मर जाएगा किंतु हिन्दू धर्म और धरती यहीं रहेंगे!

जब मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह ने अपनी प्रजा के दुखों से दुखी होकर अकबर से संधि करने का मन बनाया तो अब्दुर्रहीम खानखाना ने अमरसिंह से कहलवाया कि खुरासान से आया बादशाह तो मर जाएगा किंतु हिन्दू धर्म और धरती यहीं रहेंगे!

शहजादे मुराद ने बादशाह अकबर से खानखाना अब्दुर्रहीम की शिकायत कर दी कि वह अहमदनगर की सुल्ताना चांद बीबी से मिल गया है। इस पर अकबर रहीम पर बहुत बिगड़ा और उसने रहीम को लाहौर बुलवाया जहाँ इन दिनों अकबर प्रवास कर रहा था।

जब खानखाना लाहौर में अकबर की सेवा में उपस्थित हुआ तो अकबर ने उसकी ड्यौढ़ी बंद कर दी। यह बताना समीचीन होगा कि बादशाह के खास अमीरों को बादशाह के महलों में ड्यौढ़ी पर हाजिर होने का अधिकार होता था। जब बादशाह किसी अमीर से नाराज हो जाता था तो उसका यह अधिकार छीन लिया जाता था। 

अब्दुर्रहीम खानखाना शहंशाह अकबर के सामने शहजादे मुराद की अकारण अप्रसन्नता, सादिक खाँ की शत्रुता और अपनी बेगुनाही के बारे में तरह-तरह से निरंतर अर्ज करता रहा किंतु अकबर ने उसे क्षमा नहीं किया। जब कई माह बीत गये और कोई परिणाम नहीं निकला तो एक दिन खानखाना ने एक दोहा लिखकर अकबर को भिजवाया-

‘रहिमन एक दिन वे रहे, बीच न सोहत हार।

बायु जु ऐसी बह गयी, बीचन परे पहार।’

अर्थात्- कभी ऐसा था कि हार का भी व्यवघान असह्य था और कुछ ऐसी हवा चली कि वे हार छाती पर पहाड़ हो गये हैं और ऐसी स्थिति में चुपचाप सहना ही एक मात्र विकल्प रह गया है।

अकबर इस दोहे को पढ़कर पसीज गया। उसने अब्दुर्रहीम को अपने समक्ष बुलवाया। जब खानखाना बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ तो बादशाह ने पूछा- ‘मिर्जा खाँ! दक्षिण फतह का क्या उपाय है?’

-‘यदि बादशाह सलामत शहजादे मुराद को वहाँ से हटाकर युद्ध की समस्त जिम्मेदारी मुझे सौंप दें तो दक्षिण पर फतह की जा सकती है।’

खानखाना का जवाब सुनकर अकबर का चेहरा फक पड़ गया। उसे अनुमान नहीं था कि खानखाना भरे दरबार में शहजादे पर तोहमत लगायेगा। इसके बाद उसने खानखाना से कोई बात नहीं की और खानखाना को अपने मन से उतार कर फिर से उसकी ड्यौढ़ी बंद कर दी।

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जब अकबर लाहौर से आगरा के लिये रवाना हुआ तो खानखाना तथा खानेआजम धायभाई अजीज कोका को भी आगरा कूच करने का आदेश दिया गया। मार्ग में अम्बाला पहुंचने पर खानखाना की पत्नी माहबानूं बीमार पड़ गयी। माहबानूं अकबर की धाय माहम अनगा की पुत्री थी और खानेआजम कोका की बहिन थी। अकबर ने माहबानूं की देखभाल के लिये खानखाना और खानेआजम दोनों को अम्बाला में ही रुकने की अनुमति दी और स्वयं आगरा चला गया। कुछ दिन बाद माहबानूं मर गयी।

भाग्य का पहिया उलटा घूमना आरंभ हो गया था। अब तक अब्दुर्रहीम को संसार में मिलता ही रहा था किंतु माहबानूं की मृत्यु के साथ अब्दुर्रहीम से नित्य प्रति दिन कुछ न कुछ छिन जाने का सिलसिला आरंभ हो गया था। माहबानूं को अम्बाला में ही दफना कर रहीम आगरा चला आया। एक दिन मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह का एक चारण अब्दुर्रहीम खानखाना की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने खानखाना से कहा कि हुजूर! महाराणा ने कहलवाया है-

हाड़ा कूरम राव बड़, गोखाँ जोख करंत।

कहियो खानखानाँ ने, बनचर हुआ फिरंत।।

तुबंरा सु दिल्ली गई, राठौड़ां कनवज्ज।

राणपयं पै खान ने वह दिन दीसे अज्ज।।

अर्थात्- हाड़ा चौहान, कच्छवाहे और राठौड़ राजा अपने-अपने महलों में विश्राम कर रहे हैं। खानखाना से कहना कि हम सिसोदिये तो वनचर हुए फिर रहे हैं। तंवरों से दिल्ली गयी, राठौड़ों से कन्नौज गया, क्या खानखाना को राणाओं के लिये अब भी स्वतंत्रता दिखायी देती है?

चारण की बात सुनकर खानखाना सोच में पड़ गया। उसने चारण से कहा, अपने महाराणा से कहना-

धर रहसी रहसी धरम, खप जासी खुरसाण।

अमर विसंभर ऊपराँ राखो नहचो राण।’

अर्थात्- यह धरती रहेगी, धर्म रहेगा। खुरासान देश से आया हुआ यह बादशाह मिट जायेगा। इसलिये हे राणा अमरसिंह! विश्वंभर पर विश्वास रखो।

चारण इस महान् आत्मा को नमस्कार करके भलीभांति नतमस्त होकर चला गया। यह बताना समीचीन होगा कि कुछ वर्ष पहले जब अकबर ने अब्दुर्रहीम खानखाना को मेवाड़ पर आक्रमण करने भेजा था, तब खानखाना के परिवार की महिलाओं को मेवाड़ की सेनाओं ने पकड़ लिया था। महाराणा अमरसिंह ने खानखाना के परिवार को आदर सहित खानखाना के पास भिजवा दिया था। तब से खानखाना अब्दुर्रहीम मेवाड़ के राजपरिवार को आदर की दृष्टि से देखता था और यह नहीं चाहता था कि मेवाड़ कभी भी मुगलों की अधीनता स्वीकार करे। 

जब से हिन्दू राजाओं को यह बात ज्ञात हुई थी, तब से मेवाड़, रीवां तथा कुछ अन्य हिन्दू राजपरिवार खानखाना अब्दुर्रहीम से सलाह लिया करते थे। वैसे भी इस समय तक खानखाना अब्दुर्रहीम की प्रसिद्धि उस काल के प्रसिद्ध वैष्णव भक्तों में होने लगी थी।

कुछ दिनों बाद दक्षिण के मोर्चे से एक बुरी खबर आई जिसे सुनकर अकबर थर्रा उठा। खबर यह थी कि शहजादा मुराद शराब के नशे में मिरगी आने से मर गया। इस पर अकबर ने शहजादे दानियाल को दक्षिण के मोर्चे पर नियुक्त किया।

जब दानियाल दक्षिण के लिये रवाना हो गया तो अकबर खानाखाना अब्दुर्रहीम के डेरे पर गया और उसने खानखाना से कहा कि वह भी दानियाल के साथ दक्षिण जाए और किसी भी कीमत पर शहजादे को फतह दिलवाए। खानखाना नहीं चाहता था कि वह फिर से दक्षिण में जाए। वह जानता था कि दक्षिण उसके लिये दो पाटों की चक्की बन चुका है।

एक तरफ बादशाह है तो दूसरी तरफ चाँद बीबी। यदि वह किसी एक के साथ हो जाता है तो दूसरे के साथ अन्याय होना निश्चित ही है किंतु भाग्य की विडम्बना को स्वीकार कर खानखाना दक्षिण के लिये रवाना हो गया। हालांकि वह अच्छी तरह जानता था कि खुरासान से आया बादशाह एक न एक दिन मर ही जाएगा।

चांद बीबी की हत्या! (174)

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चांद बीबी की हत्या

जब से चांद बीबी ने श्रीकृष्ण की भक्ति करनी आरम्भ की थी, तब से दक्षिण भारत के सभी शिया एवं सुन्नी मुसलमान यहाँ तक कि हब्शी मुसलमान भी चांद बीबी की हत्या करने पर उतारू हो गए।

जब खानखाना दक्षिण में पहुँचा तो दानियाल ने उसे सबसे पहले अहमदनगर पर ही घेरा डालने के आदेश दिये। शहजादे के आदेश से खानखाना अब्दुर्रहीम ने अहमदनगर को घेर लिया।

मुगलों को फिर से आया देखकर चांद सुलताना ने अभंग खाँ हब्शी को पंद्रह हजार घुड़सवारों सहित किले से बाहर निकाल कर चित्तार की तरफ से दानियाल पर आक्रमण करने भेजा तथा चीते खाँ हब्शी को किले की आंतरिक सुरक्षा के लिये नियुक्त किया।

अब्दुर्रहीम खानखाना किसी भी कीमत पर चांद सुल्ताना से लड़ना नहीं चाहता था। अतः वह शहजादे दानियाल से अनुमति लेकर एक बार फिर चांद बीबी से मुगलों की अधीनता स्वीकार करवाने के लिए किले के भीतर गया।

चांद बीबी ने खानखाना से पूछा- ‘आप मुझे केवल इतना बताएं कि जब संधि की शर्तों के अनुसार मैं बराड़ पर अपना अधिकार त्याग चुकी हूँ, तब किस खुशी में आपकी सेनाओं ने फिर से अहमदनगर का रुख किया है?’

खानखाना ने कहा- ‘मैंने तो तुम्हें उसी समय चेता दिया था कि मुराद से संधि का कोई अर्थ नहीं है! वह तो मुराद को उस समय अहमदनगर से दूर ले जाने की चेष्टा मात्र थी। इस पर चांद ने पूछा कि अब आप दानियाल को किस तरह दूर ले जायेंगे?’

-‘एक और संधि करके।’ खानखाना ने जवाब दिया।

इस पर चांद ने पूछा- ‘पिछली बार की संधि में तो मुगलों को बरार दिया गया था, इस बार की संधि में हमें क्या देना होगा?’

– ‘यदि अहमदनगर को बचाना चाहती हैं तो बहादुर निजाम मेरे हवाले कर दें।’ खानखाना ने जवाब दिया।

पाठकों को स्मरण होगा कि बहादुर निजाम अहमदनगर का अवयस्क शासक था। वह चाँद के मरहूम भाई इब्राहीम निजामशाह का बेटा था। इससे चाँद बीबी बहादुर निजामशाह की बुआ लगती थी। चूंकि बहादुर निजामशाह बालक था इसलिये उसके स्थान पर चाँद ही शासन का काम देखती थी और इसी अधिकार से सुलताना कहलाती थी।

खानखाना ने चांद बीबी को वचन दिया कि मैं बहादुर निजामशाह को अपनी सुरक्षा में बादशाह अकबर के पास ले जाउंगा और बादशह से कहूंगा कि अहमदनगर का निजाम आपकी अधीनता स्वीकार करता है और इसके बदले में अपने राज्य की सुरक्षा चाहता है। उसके बाद मैं बहादुर निजाम शाह को वापिस सुरक्षित अहमदनगर लाऊंगा और तुम्हें सौंप दूंगा।

-‘क्या और कोई उपाय नहीं है?’ चांद ने पूछा।

-‘दूसरा उपाय शक्ति है किंतु इस समय भारत में किसी के पास भी ऐसी शक्ति नहीं है जो अकबर की सेनाओं को हरा सके।’ खानखाना ने जवाब दिया।

इस पर चांद ने कहा- ‘आप जो कुछ भी कह रहे हैं, यदि मैं उसे स्वीकार कर लूं तो इसका अर्थ होगा कि अहमदनगर ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली।’

खानखाना ने कहा- ‘जिस प्रकार उत्तर भारत के हिन्दू राजाओं ने अपने राज्य और प्रजा की सुरक्षा के लिये मुगलिया सल्तनत की अधीनता स्वीकार कर ली है, उसी प्रकार यदि दक्षिणी राज्यों के सुलतान भी मुगलिया सल्तनत का प्रभुत्व स्वीकार कर लें तो वे अपने राज्य और प्रजा दोनों की सुरक्षा कर सकते हैं। जब मौका लगेगा तो सारे के सारे राज्य फिर से अपनी-अपनी खोई हुई स्वतंत्रता प्राप्त कर ही लेंगे।’

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अहमदनगर राज्य की सुरक्षा का और कोई उपाय न देखकर चांद बीबी ने अब्दुर्रहीम खानखाना का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और उसने अहमदनगर का अल्पवय शासक बहादुर निजामशाह अब्दुर्रहीम को सौंप दिया। खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बुरहानपुर के लिये रवाना हुआ जहाँ अकबर स्वयं डेरा डाले हुए था और युद्ध की समस्त प्रगति पर निगाह रख रहा था।

इधर खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बुरहानपुर के लिये रवाना हुआ और उधर राजू दखनी और अम्बर चम्पू हब्शी ने शाहअली के बेटे मुर्तिजा निजामशाह को अहमदनगर का स्वामी घोषित करके बादशाही थानों पर धावा बोल दिया। खानखाना बहादुर निजामशाह को लेकर बादशाह की सेवा में हाजिर हुआ और चाँद सुलताना का संदेश पढ़कर सुनाया कि यदि बादशाह अहमदनगर राज्य की सुरक्षा करे तो चाँद मुगलों की अधीनता स्वीकार कर लेगी। चाँद सुलताना के पत्र और बहादुर निजामशाह को अपनी सेवा में आया देखकर अकबर बहुत प्रसन्न हुआ।

उसने चांद बीबी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा शहजादे दानियाल का विवाह खानखाना की बेटी जाना बेगम से करने की घोषणा की। इसके बाद बादशाह पूरी तरह संतुष्ट होकर आगरा लौट गया।

अभंग खाँ हब्शी जो स्वयं को चाँद सुलताना का विश्वसनीय आदमी बताते हुए थकता नहीं था, उसने चित्तार पहुँच कर अपना इरादा बदल लिया और अपने डेरों में खुद आग लगाकर जुनेर के किले को भाग गया।

चाँद ने यह समाचार सुना तो सिर पीटकर रह गयी किंतु जब चाँद सुलताना ने मुर्तिजा निजामशाह, राजू दखनी और अम्बर चम्पू को पूरी तरह नालायकी पर उतरे हुए देखा तो उसने सोचा कि यह ठीक ही हुआ जो अभंग खाँ जुनेर चला गया।

चाँद ने किलेदार चीते खाँ हब्शी से विचार विमर्श किया कि इन बदली हुई परिस्थितयों में बेहतर है कि किला दानियाल को सौंप दिया जाये और राजकीय कोष तथा राज्य सामग्री लेकर जुनेर के किले को चला जाये ताकि वहाँ हमारी सुरक्षा अधिक अच्छी तरह से हो सके।

चीते खाँ हब्शी ने यह बात सुनते ही सबसे यह कहना आरंभ कर दिया कि चाँद सुलताना मुगलों से मिल गयी है और उनको किला सौंपती है। चीते खाँ ने किले से बाहर नियुक्त दक्खिनियों से सम्पर्क किया और उनके लिये किले के गुप्त-मार्ग खोल दिये।

जब दक्खिनी किले में प्रवेश कर गये तो हब्शी भी उनसे जा मिले। इन लोगों ने मिलकर उसी दिन चांद बीबी की हत्या कर दी। इस प्रकार चांद सुल्ताना राजनीति की गंदी दलदल में फंसकर दर्दनाक मृत्यु को प्राप्त हुई।

जब खानखाना अब्दुर्रहीम बुरहानपुर से बहादुर निजामशाह को लेकर अहमदनगर लौटा तो उसने मार्ग में चांद बीबी की हत्या का समाचार सुना। इस समाचार को सुनकर खानखाना के दुःख का पार न रहा। उसके मुँह से बरबस ही निकला-

रहिमन मनहिं लगाहि के, देखि लेहु किन कोय।

नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय।

अर्थात्- कोई किसी से भी प्रेम कर ले, उससे क्या होता है? मनुष्य के वश में क्या है? जो कुछ है नारायण की इच्छा के अधीन है।

दीने-इलाही (175)

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दीने-इलाही

दीने-इलाही के अंतर्गत अकबर ने वन्ध्या, गर्भवती तथा छोटी कन्याओं से मैथुन का निषेध कर दिया!

दीने-इलाही का शाब्दिक अर्थ, ‘अल्लाह का धर्म’ होता है परन्तु वास्तव में दीने-इलाही कोई धर्म नहीं था। यह अकबर के चेलों की ऐसी मण्डली थी जो अकबर को अपना पीर या गुरु मानने को तैयार थे।

अकबर इन लोगों में अपने विचारों को प्रचलित करना चाहता था। अतः अकबर ने दीने-इलाही का आविष्कार किया। यह केवल उन लोगों के लिए था जो अकबर के मजहबी विचारों से सहमति व्यक्त करते थे।

दीने-इलाही की सदस्यता अत्यन्त सीमित थी। अकबर जानता था कि उसे प्रसन्न करने अथवा अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये बहुत बड़ी संख्या में लोग इसका सदस्य बनने के लिए तैयार होंगे। अकबर नहीं चाहता था कि लोग भय अथवा प्रलोभन वश इसके सदस्य बनें।

बदायूंनी (Badayuni)लिखता है कि दीने-इलाही का सदस्य बनाने के लिए धन अथवा शक्ति का प्रयोग नहीं किया गया। एक भी ऐसा उदाहरण उपलब्ध नहीं है कि दीने-इलाही का सदस्य बनने से किसी के पद में वृद्धि हुई हो अथवा इसका सदस्य बनने से मना कर देने पर किसी प्रकार की क्षति पहुँची हो अथवा दण्ड मिला हो!

इसमें केवल वही लोग सम्मिलित हो सकते थे जो स्वेच्छा से इसका सदस्य बनना चाहते थे और जिन्हें अकबर इसका सदस्य बनने योग्य समझता था। बिना अकबर की स्वीकृति के कोई इसका सदस्य नहीं बन सकता था।

इतने सारे प्रतिबन्धों के होते हुए भी कई हजार लोग इसके सदस्य बन गये। अब लगभग बीस सदस्यों के नाम उपलब्ध हैं। दीने-इलाही स्वीकार करने वाले दरबारियों में राजा बीरबल के अतिरिक्त शेष समस्त सदस्य मुसलमान थे।

इनमें से कुछ बड़े ही योग्य, चरित्रवान् तथा स्वतन्त्र विचारों के व्यक्ति थे। राज्य के बड़े-बड़े हिन्दू मंत्रियों में से, जो अकबर के बड़े विश्वासपात्र थे, यथा भगवानदास, मानसिंह, टोडरमल आदि कोई भी दीने-इलाही का सदस्य नहीं बना।

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दीने-इलाही का सदस्य बनने के लिए अकबर ने रविवार को दीक्षा देने का दिन निर्धारित किया। उसी दिन लोग इसके सदस्य बन सकते थे। जो व्यक्ति दीक्षा लेना चाहता था वह अपने हाथों में एक पगड़ी लेकर अपने सिर को अकबर के चरणों पर रख देता था। अकबर उसे उठाकर उसकी पगड़ी उसके सिर पर रख देता था। तब अकबर शिस्त शब्द का उच्चारण करता था। शिष्य भी इस शब्द को दोहराता था।

शिस्त शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है- कटिया, जिससे मछलियाँ पकड़ी जाती हैं या कटिया लगाना परन्तु यहाँ पर इसका अर्थ है शिष्यता ग्रहण करना। एक पत्र पर शिस्त शब्द अंकित रहता था जिस पर ‘अल्ला-हो-अकबर’ अर्थात् ईश्वर महान् है भी लिखा रहता था। नये शिष्य को अकबर का एक लघुचित्र भी मिलता था जिसे वह प्रायः अपनी पगड़ी में रखता था। दीने-इलाही के सदस्यों को कुछ निश्चित सिद्धांतों का पालन करना होता था।

दीने-इलाही के सदस्य आपस में मिलने पर अल्ला-हो-अकबर अर्थात् ‘ईश्वर महान् है’ कहकर प्रणाम करते थे और जल्ला-जलाल-हू अर्थात् ‘महान् है उसका ऐश्वर्य’ कहकर प्रणाम का उत्तर देते थे। दीने-इलाही के सदस्यों को मांस-भक्षण से बचने का यथा-सम्भव प्रयत्न करना होता था।

वे अपने जन्म के महीने में मांसयुक्त भोजन को स्पर्श भी नहीं करते थे। अकबर ने दीने-इलाही के सदस्यों के लिए अनिवार्य कर दिया कि वे बांझ, गर्भवती स्त्रियों तथा रजस्वला होने के पूर्व कन्याओं के साथ मैथुन नहीं कर सकते।

 दीने-इलाही का न कोई धर्मग्रन्थ था, न कोई आचार्य थे, न कोई देवालय या पूजागृह था और न दीक्षा के अतिरिक्त कोई त्यौहार या अनुष्ठान था। बदायूंनी ने लिखा है कि दीने-इलाही के अनुयायियों को लिखित वचन देना पड़ता था कि वे इस्लाम को त्याग देंगे। त्याग की चार कोटियाँ थीं- सम्पत्ति का त्याग, जीवन का त्याग, सम्मान का त्याग तथा मजहब का त्याग।

आधुनिक काल के बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि अकबर किसी नये धर्म का प्रचार नहीं करना चाहता था और न किसी धर्म को नष्ट करना चाहता था। वह घृणा, ईर्ष्या, द्वेष, कलह तथा पारस्परिक संघर्ष के जगत् में प्रेम, सहयोग तथा सद्भावना का राज्य स्थापित करना चाहता था।

अकबर अपने राज्य से वैचारिक संकीर्णता तथा धार्मिक असहिष्णुता को दूर करके सब लोगों में सुलह, शान्ति तथा सद्भावना स्थापित करना चाहता था। अकबर की धारणा थी कि लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए भी कुछ समान आदर्शों तथा सिद्धान्तों के सूत्र में बंधकर भ्रातृत्व का संचार कर सकते थे।

अकबर अपने चिंतन तथा सत्संग से कुछ महान् आदर्शों का सृजन कर सका था, उन्हें वह अपने व्यावहारिक जीवन में चरितार्थ करके दिखाना चाहता था। कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि दीने-इलाही के माध्यम से अकबर अपनी प्रजा की राजभक्ति को सुदृढ़ बनाना चाहता था।

अकबर की मृत्यु के साथ ही दीने-इलाही समाप्त हो गया परन्तु कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अकबर ने जिन आदर्शों तथा सिद्धान्तों को स्थापित किया, उसके वंशज दो पीढ़ियों तक उनका पालन करते रहे।

शहजादा खुसरो (Prince Khusro) तथा दारा शिकोह (Dara Shikoh) अकबर की विलमौदोर्दा का प्रतिनिधित्व करते रहे। यदि राज-सत्ता उनके हल्थों में आई होती तो अकबर की विलमौदोर्दा आगे भी जीवंत रहती किंतु औरंगजेब (Aurangzeb) के खुजिलॉे गारु स्वामी के मुगल शासकों में उदारता का लोप हो गया तथा राजा से सीआ लाही का प्रभाव पूणर्णतः समाइत हो गया।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक दृष्टि से दीने-इलाही का कोई विशेष महत्त्व नहीं है क्योंकि बहुत थोड़े से लोग ही इसके सदस्य बने।

मुस्लिम तथा ईसाई इतिहासकारों ने दीने-इलाही की तीव्र आलोचना की है। बदायूंनी के अनुसार दीने-इलाही का प्रचार इस्लाम को नष्ट करने के लिये किया गया था।

विन्सेन्ट स्मिथ ने इसे अकबर की मूर्खता का द्योतक बताया है। स्मिथ के अनुसार दीने-इलाही, अकबर के हास्यास्पद दम्भ तथा अनियन्त्रित अधिनायकतन्त्र के दानवीय विकास का फल था। हेग ने लिखा है- दीने-इलाही वास्तव में लज्जाजनक असफलता रही। वह हिन्दू, मुसलमान तथा ईसाई किसी को भी अच्छा नहीं लगा।

इसाइयों एवं मुसलमान लेखकों के विपरीत अधिकांश हिन्दू इतिहासकारों ने दीने-इलाही की प्रशंसा की है।

डां. ईश्वरी प्रसाद (Dr. Ishwari Prasad) ने दीने-इलाही की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘यह एक ऐसा धर्म था जिसमें समस्त धर्मों के गुण विद्यमान थे। इसमें रहस्यवाद, दर्शन तथा प्रकृति पूजा के तत्त्व संयुक्त थे। यह तर्क पर आधारित था। इसने किसी अंध-विश्वास को नहीं अपनाया, किसी ईश्वर या पैगंबर को स्वीकार नहीं किया। अकबर ही इसका मुख्य प्रवर्तक था।’

प्रो. श्रीरां शर्मा (Prof. Shriram Sharma) ने लिखा है- ‘दीने-इलाही अकबर की राष्ठ्रीय आदर्श की उवसऺ-कोठि की अभिव्यंजना थी।’

एक अन्य इतिहासकार ने लिखा है- ‘जो लोग अकबर की धार्मिक खोज में यह देखते हैं कि उसने राजनीतिक ध्येय से एक ऐसे धर्म को स्थापित करने का प्रयास किया जिसमें उसकी प्रजा एकता के सूत्र में बँध जाती, वे सत्य के केवल धरातल को ही देख सके हैं और वे भी बिनयॉन की भाँति उस व्यक्ति के अन्तःस्थल तक नहीं पहुँच सके हैं।’

हिन्दू, मुस्लिम एवं ईसाई इतिहासकार भले ही कुछ भी कहें, वास्तविकता यह है कि किसी भी मत को धर्म का रूप लेने के लिए उसका दर्शनशास्त्र, नीति शास्त्र, तर्कशास्त्र एवं साहित्य होना आवश्यक है। कोई भी मत तभी धर्म का रूप लेता है जब कोई समुदाय उस मत के साहित्य एवं देवता में विश्वास व्यक्त करे। दीने-इलाही में इनमें से एक भी तत्व मौजूद नहीं था। इसलिए दीने-इलाही को धर्म नहीं माना जा सकता।

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हरम बेगम का कपट जाल (69)

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बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...