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ज्वालादेवी मंदिर में अकबर ने छत्र अर्पित किया! (176)

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ज्वालादेवी मंदिर में अकबर ने छत्र अर्पित किया!

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में एक प्राचीन पहाड़ी नगर स्थित है जिसे नगरकोट (Nagarkot) कहा जाता है। इस नगर में देवी दुर्गा के इक्कावन सिद्धपीठों में से एक सिद्धपीठ स्थित है जिसे वज्रेश्वरी सिद्ध पीठ (Vajreshwari Siddh Peeth) कहा जाता है। ऐतिहासिक मान्यता है कि ज्वालादेवी मंदिर (Jwaladevi Temple) में अकबर (Akbar) ने छत्र अर्पित किया।

मान्यता है कि पाण्डवों ने इस स्थान पर एक मंदिर बनवाया था। यह मंदिर कई बार टूटा एवं कई बार बना। इस मंदिर में हजारों वर्षों से पूरे देश से श्रद्धालु आते हैं। हिन्दुओं में मान्यता है कि देवी माता, अपने भक्तों की प्रार्थना सुनती है और उनकी मनोकामनाएं पूरी करती है।

इस मंदिर के सभामण्डप के सामने की दीवार पर पत्थर का एक पैनल लगा हुआ है जिसमें एक मनुष्य के मुंह की प्रतिमा लगी हुई है। इस पैनल पर ध्यानू भगत (Dhyyanu Bhagat) लिखा हुआ है।

मंदिर के दाहिनी भाग में स्थित एक बरामदे में भी ध्यानू भगत की एक प्रतिमा रखी हुई है जिसमें उसके धड़ ने अपना सिर अपने हाथों में पकड़ रखा है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि ध्यानू भगत अपना सिर स्वयं ही काटकर देवी को अर्पित कर रहा है।

ब्रज अंचल के हिन्दुओं में मान्यता है कि अकबर (Akbar) के शासन काल में ब्रज प्रदेश में स्थित नदौन ग्राम निवासी ध्यानू भगत (Dhyyanu Bhagat) एक हजार यात्रियों सहित देवी माता के दर्शनों के लिए जा रहा था।

इतना बड़ा दल देखकर बादशाह के सिपाहियों ने उन्हें रोक लिया और उन्हें अकबर के समक्ष प्रस्तुत किया। अकबर ने पूछा कि तुम इतने आदमियों को साथ लेकर कहाँ जा रहे हो!

ध्यानू भगत ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया कि मैं ज्वाला माई के दर्शनों के लिए जा रहा हूँ। मेरे साथ जो लोग हैं वे भी माता के भक्त हैं और यात्रा पर जा रहे हैं। अकबर ने उससे पूछा कि ज्वाला माई कौन है और वहाँ जाने से क्या होगा!

ध्यानू भगत (Dhyyanu Bhagat) ने उत्तर दिया कि माता पार्वती ही ज्वाला माई हैं जो संसार की रचना एवं पालन करती हैं। वे भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। उनके तेज से उनके मंदिर में बिना तेलबत्ती के ही अखण्ड ज्योति जलती रहती है। हम लोग प्रतिवर्ष उनके दर्शन करने जाते हैं।

अकबर (Akbar) ने कहा कि तुम्हारी ज्वाला माई इतनी शक्तिशाली है कि सबकी मनोकामनाएं पूरी कर सकती है, इस बात का विश्वास हमें कैसे होगा? तुम कोई चमत्कार दिखाओ तो हम भी मान लेंगे।

ध्यानू भगत ने उत्तर दिया कि मैं तो माता का एक तुच्छ सेवक हूँ, मैं भला क्या चमत्कार दिखा सकता हूँ। इस पर अकबर ने कहा कि हम तुम्हारी माता की परीक्षा लेंगे। हम तुम्हारे घोड़े की गर्दन अलग कर देते हैं। तुम अपनी देवी से कहकर उसे दुबारा जीवित करवा लेना। इस प्रकार घोड़े की गर्दन काट दी गयी।

ध्यानू भगत (Dhyyanu Bhagat) ने बादशाह से कहा कि आप एक माह तक मेरे घोड़े के सिर एवं धड़ को सुरक्षित रखें। मैं देवी माँ के पास जाकर उनसे प्रार्थना करूंगा कि घोड़े को जीवित कर दें। अकबर ने ध्यानू भगत की बात मान ली और ध्यानू भगत अपने साथियों के साथ ज्वाला देवी के दर्शनों के लिए चला दिया।

ध्यानू भगत ने देवी मंदिर में पहुंचकर देवी से प्रार्थना की कि बादशाह मेरी भक्ति की परीक्षा ले रहा है। मेरी लाज रखो। मेरे घोड़े को अपनी कृपा से जीवित करो। अन्यथा मैं भी अपना सर काटकर आपके चरणों में अर्पित कर दूंगा।

Miraculous Blessings from Goddess Vajreshwari – जब देवी ने कोई उत्तर नहीं दिया तो ध्यानू ने अपनी तलवार से अपना शीश काटकर देवी को भेंट कर दिया। उसी समय साक्षात ज्वाला माई प्रकट हुई और ध्यानू भगत का सिर धड़ से जुड़ गया और ध्यानू भगत फिर से जीवित हो गया।

माता ने उससे कहा कि तेरे घोड़े का सिर भी धड़ से जुड़ गया है। तू कोई और वर मांग। ध्यानू भक्त ने कहा माता! आप सर्व-शक्तिमान हैं किंतु अपने भक्तों की इतनी कठिन परीक्षा न लिया करें। संसारी मनुष्य आपको शीश काटकर भेंट नहीं चढ़ा सकते। कृपा करके साधारण भेंट से ही अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण किया करें।

देवी ने कहा कि अब से मैं केवल नारियल की भेंट एवं सच्चे हृदय से की गयी प्रार्थना से मनोकामना पूर्ण करुँगी। इसके बाद ध्यानू भगत अकबर से मिलने के लिए रवाना हो गया।

Divine Proof and Akbar’s Disbelief – अकबर (Akbar) के सेवकों ने अकबर को बताया कि ध्यानू (Dhyanu Bhagat) का घोड़ा फिर से जीवित हो गया है किंतु अकबर को अब भी उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने अपने-सिपाहियों को आदेश दिया कि वे माता ज्वालादेवी के मंदिर में निकल रही ज्योति पर लोहे के तवे रखवा दें।

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अकबर के आदेश की पालना की गई किंतु जब इस पर भी अग्नि नहीं बुझी तो अकबर ने पहाड़ों से निकल रहे एक झरने के पानी को एक नहर के माध्यम से मंदिर पर डलवाया। इस पर भी मंदिर की ज्योति नहीं बुझी। तब अकबर ने देवी के लिए सोने का छत्र बनवाया तथा उसे लेकर ज्वाला देवी के मंदिर पहुंचा।

मान्यता है कि जब अकबर ने यह छत्र देवी को अर्पित करना चाहा तो वह अकबर के हाथों से गिरकर टूट गया तथा सोने की बजाय किसी और धातु का बन गया। यह धातु न तो पीतल थी, न सोना थी, न चांदी थी, न ताम्बा थी और न लोहा!

अकबर समझ गया कि देवी ने उसकी भेंट अस्वीकार कर दी है। इसलिए वह चुपचाप लौट गया। अकबर द्वारा चढ़ाया गया खंडित छत्र माता के दरबार में आज भी रखा है। यह घटना ज्वालादेवी के मंदिर की बताई जाती है जो नगरकोट मंदिर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है किंतु ध्यानू भगत की प्रतिमाएं नगर कोट मंदिर में लगी हुई हैं।

कुछ स्थानों पर नगरकोट मंदिर और ज्वाला देवी मंदिर को एक ही माना जाता है। यह संभव है कि ध्यानू द्वारा देवी को शीश अर्पित करने की घटना नगरकोट वाले मंदिर में हुई हो। बाद में इस मंदिर से ज्वाला देवी (Jwala Devi) की ज्योति विलीन हो गई हो और यहाँ से 35 किलोमीटर दूर ज्वाला देवी के मंदिर में प्रकट हुई हो।

यह भी संभव है कि पौराणिक काल के ये दोनों मंदिर आरम्भ से ही अलग रहे हों और ध्यानू भक्त की घटना नगरकोट के मंदिर में घटित हुई हो और उसकी कथा के साथ अकबर के साथ ज्वालादेवी के मंदिर में हुई किसी घटना को जोड़ दिया गया हो।

Descendants’ Legacy and Sacred Tradition – पिछले पांच सौ सालों से ध्यानू भगत (Dhyyanu Bhagat) के वंशज अपने शरीर पर लोहे की जंजीरें बांध कर अपने परिजनों के साथ इस मंदिर की परिक्रमा करने आते हैं। ये लोग अपने कंधे पर मोर-पंखों का एक गुच्छा धारण करते हैं तथा शरीर को लोहे की जंजीर से बांधते हैं।

यह जंजीर इस बात की द्योतक है कि किसी समय उनके किसी पूर्वज को लोहे की जंजीरों से बांधकर इस मंदिर तक लाया गया था। ध्यानू के वंशजों को लगता है कि ऐसा करके वे ध्यानू भगत की परम्परा को जीवित रखे हुए हैं। सच क्या है, यह तो काल के गाल में समा गया है किंतु ध्यानू भगत आज भी मंदिर की प्रतिमाओं में तथा ध्यानू के वंशजों की मान्यताओं में पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित है।

अकबर के बेटे शराब पी-पी कर मरने लगे ! (177)

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अकबर के बेटे शराब पी-पी कर मरने लगे !

इतिहास की पुस्तकों में लिखा है कि अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थीं। कहा नहीं जा सकता कि इनमें से कितनी अकबर की बेगमें थीं, कितनी रखैलें थीं और कितनी ऐसी दासियां थीं जिनसे अकबर के बेटे – बेटियाँ हुए!

खानदेश का शासक रजाअली खाँ अकबर की अधीनता स्वीकार कर चुका था किंतु रजाअली खाँ के मर जाने के बाद उसके पुत्र मीरन बहादुर खाँ ने असीरगढ़ को अपनी राजधानी बनाकर स्वतन्त्र शासक की तरह व्यवहार करना आरम्भ कर दिया।

अभेद्य माना जाने वाला असीरगढ़ दुर्ग खानदेश के मध्य में स्थित था। यह दुर्ग दिल्ली से दक्षिण भारत जाने वाले मार्ग पर स्थित होने से दक्षिण का फाटक कहलाता था। दक्षिण विजय के लिए इस दुर्ग पर अधिकार करना आवश्यक था।

अकबर के आदेश से एक सेना ने खानदेश की राजधानी बुरहानपुर पर तथा दूसरी सेना ने असीरगढ़ दुर्ग पर घेरा डाला। मुगल सेना ने बड़ी सरलता से बुरहानपुर पर अधिकार कर लिया किंतु असीरगढ़ का घेरा 6 महिने तक चलता रहा। जब सफलता मिलती दिखाई नहीं दी तब अकबर ने मीरन बहादुर खाँ को संधि करने के बहाने से अपने शिविर में बुलाया तथा उसे छल से कैद कर लिया।

मीरन बहादुर खाँ के कैद हो जाने पर भी असीरगढ़ के दुर्ग रक्षकों ने मुगलों के लिए असीरगढ़ दुर्ग के फाटक नहीं खोले। इस पर अकबर ने दुर्ग रक्षकों को रिश्वत देकर दुर्ग का द्वार खुलवा लिया और उस पर अधिकार कर लिया। अहमदनगर तथा असीरगढ़ पर मुगलों का अधिकार हो जाने से मुगलों के लिये दक्षिण के अन्य राज्यों पर विजय का काम आसान हो गया।

एक तरफ चाँद बीबी के नहीं रहने से और दूसरी तरफ शहजादे मुराद के मर जाने से खानखाना अब्दुर्रहीम दोस्ती और दुश्मनी की सभी तरह की दुविधाओं से बाहर निकल आया था और अब वह दक्षिण में जबर्दस्त दबाव बना रहा था।

खानखाना के पुत्र एरच ने भी पिता का बहुत साथ दिया। खानखाना ने उसे मलिक अम्बर के पीछे लगाया। एरच ने मलिक अम्बर को कई मोर्चों पर परास्त किया। शहजादा दानियाल दक्खिन का अभियान अपने श्वसुर अब्दुर्रहीम और साले ऐरच के मजबूत हाथों में सौंप कर स्वयं शराब के नशे में डूब गया।

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अकबर को जब दानियाल के बारे में तरह-तरह के समाचार मिलने लगे तो उसने दानियाल को लिखा कि वह आगरा आ जाये। दानियाल कतई नहीं चाहता था कि वह अपने पिता के सामने जाये।

वहाँ जाने से उसकी शराब और मौज-मस्ती में विघ्न पड़ जाने की पूरी-पूरी संभावना थी। अतः दानियाल ने अकबर को पत्र भिजवाया कि खानखाना अब्दुर्रहीम एक नम्बर का हरामखोर है। उस पर दृष्टि रखने के लिये मेरा दक्षिण में ही रहना आवश्यक है।

पाठकों को यह सुनकर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि दानियाल ने अपने श्वसुर एवं विजयी सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीम के लिए इतना बड़ा झूठ लिखा! अकबर के बेटे इतने ही कृतघ्न और मक्कार थे।

यह स्मरण दिलाना उचित होगा कि जब खानखाना ने मुराद के लिए सुहेल खाँ, आदिलशाह और कुतुबशाह की सम्मिलित सेनाओं को पराजित किया था, तब मुराद ने भी अकबर से यह शिकायत की थी कि खानखाना अहमदनगर की सुल्ताना चांद बीबी से मिल गया है और वह दक्षिण फतह नहीं करना चाहता।

जब अकबर को दानियाल का पत्र मिला तो अकबर ने उसे वापिस पत्र लिखा कि मैं जानता हूँ कि हरामखोर कौन है! तू शराब पीने के लिये ही मुझसे दूर रहना चाहता है। खानखाना तेरी तरह से शराब नहीं पीता। तेरी तरह से झूठ नहीं बोलता। न ही तेरी तरह विश्वस्त सेवकों पर मिथ्या दोषारोपण करता है। तू फौरन आगरा चला आ अन्यथा भविष्य में तुझसे कोई सम्बन्ध नहीं रखूंगा।

इस पर भी दानियाल आगरा नहीं गया। अकबर ने क्रोधित होकर खानखाना अब्दुर्रहीम को बहुत भला-बुरा लिखा कि तेरे रहते हुए भी दानियाल मौत के मुँह में जा रहा है। यदि तूने दानियाल की शराब पर पाबंदी नहीं लगायी तो मुझसा बुरा कोई न होगा।

बादशाह का पत्र पाकर खानखाना ने अकबर के बेटे दानियाल पर पहरा बैठा दिया और शहजादे के डेरे में शराब ले जाने की मनाही कर दी। इस पर भी दानियाल की चापलूसी में लगे हुए नमक हराम लोग बंदूक की नालियों में तेज शराब भरकर ले जाते और दानियाल को पिलाते।

खानखाना इस बात को नहीं जान सका और एक दिन दानियाल अत्यधिक शराब पीकर मर गया। जब खानखाना को मालूम हुआ कि किस युक्ति से शराब शहजादे के डेरे के भीतर पहुँचाई जाती थी तो उसने नमक हराम लोगों को मृत्युदण्ड दिया किंतु जाने वाला जा चुका था। उसे किसी तरह लौटाया नहीं जा सकता था!

बाबर ने मुगलिया हरम में शराब एवं अफीम के नशे का प्रचलन किया था। बाबर के बेटे हुमायूँ की मौत अफीम के नशे में हुई थी। अकबर भी दिन-रात अफीम एवं शराब के नशे में डूबा रहता था। वह भांग, चरस और गांजा का सेवन भी किया करता था। अकबर के बेटे मुराद और दानियाल शराब पी-पीकर मर गए थे।

अकबर का अब एक ही बेटा जीवित बचा था सलीम। वह भी इतनी शराब पीता था कि किसी भी दिन मौत को गले लगा सकता था। इस प्रकार शराब अफीम, गांजा, चरस और भांग मुगल शहजादों की बलि ले रहे थे।

देखा जाए तो दानियाल की मृत्यु से जितना बड़ा कहर अकबर पर टूटा था, उतना ही बड़ा कहर खानखाना अब्दुर्रहीम पर भी टूटा था। दानियाल की मृत्यु से खानखाना की बेटी जाना बेगम विधवा हो गयी। उसने अकबर के बेटे दानियाल के शव के साथ मर जाने की चेष्टा की किंतु खानखाना ने किसी तरह बेटी को ऐसा करने से रोका। जाना बेगम ने अपने पिता के कहने से जान तो नहीं दी किंतु उसने सदा-सदा के लिये फटे हुए और मैले-कुचैले कपड़े पहन लिये।

कुछ दिनों पहले ही अब्दुर्रहीम की पत्नी माहबानूं की मृत्यु हुई थी। अब खानखाना पर यह दूसरा कहर था। उससे बेटी जाना का मुँह देखा नहीं जाता था। वह अंदर से टूटने लगा। मुगलिया राजनीति की खूनी चौसर पर खड़ा खानखाना का परिवार एक-एक करके बरबादी और मृत्यु के मुंह में जा रहा था।

मुराद के बाद दानियाल के मरने की खबर पाकर अकबर का मन हर उस वस्तु से उचाट हो गया जो उसके आस-पास थी। वह मन की शांति प्राप्त करना चाहता था किंतु उसका कोई उपाय नहीं सूझता था।

उसने मक्का जाने का विचार किया किंतु उस युग में एक बादशाह के लिये मक्का तक के मार्ग में पड़ने वाले समस्त राज्यों को जीते बिना अपनी सेना लेकर वहाँ तक पहुँचना संभव नहीं था और बिना सेना के जाने का अर्थ उसी गति को प्राप्त हो जाने जैसा था जिस गति को बैराम खाँ प्राप्त हुआ था।

अकबर को जहर दे दिया शहजादे सलीम ने! (178)

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अकबर को जहर दे दिया शहजादे सलीम ने!

अकबर के बेटे शराब पी-पी कर मर गए और अंत में शहजादा सलीम ही अकबर का एक-मात्र घोषित बेटा जीवित बचा। यह इतना कृतघ्न था कि इसने अपने बाप-दादों की सल्तनत पर अधिकार करने के लिए अकबर को जहर दे दिया!

दक्षिण के मोर्चे पर शहजादे मुराद एवं शहजादे दानियाल की मृत्यु हो जाने के बाद अकबर मक्का जाना चाहता था किंतु वह जानता था कि वह मक्का तक जीवित नहीं पहुंच सकता। उसका भी वही हाल होगा जो बैराम खाँ का हुआ था। इसलिए अकबर ने बहुत सोच-विचार के उपरांत तूरान जाने का निश्चय किया जहाँ उसके पूर्वज तैमूर लंग की कब्र बनी हुई थी।

यद्यपि तूरान तक पहुँच पाना भी अत्यंत कठिन था तथापि उतना कठिन नहीं जितना कि मक्का तक पहुँच पाना! तूरान जाकर तैमूर लंगड़े की कब्र तक पहुंचने की योजना को मुगलिया सल्तनत की पूरी शक्ति झौंके बिना कार्यान्वित किया जाना संभव नहीं था।

अतः अकबर ने दक्षिण से खानखाना अब्दुर्रहीम को, बंगाल से राजा मानसिंह को तथा लाहौर से कूलची खाँ को आगरा बुलवाया और आगरा बुलवाने का प्रयोजन भी लिख भेजा।

राजा मानसिंह तथा कूलची खाँ तो बादशाह का आदेश मिलते ही अपनी-अपनी सेनायें लेकर आगरा के लिये रवाना हो गये किंतु खानखाना अब्दुर्रहीम अपने स्थान से एक इंच भी नहीं हिला।

बादशाह अकबर तथा उसके शहजादों के दुर्व्यवहार और छलपूर्ण आचार-विचार को देखकर खानखाना के मन में मुगल साम्राज्य की अभिवृद्धि हेतु पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया था।

लम्बे समय से खानखाना यह अनुभव कर रहा था कि मुगल शहजादे यदि राजद्रोह भी करते हैं तो क्षमा कर दिये जाते हैं जबकि दूसरे अमीरों के बारे में मिथ्या शिकायतें मिलने पर भी अकबर अमीरों के साथ कठोरता से व्यवहार करता है।

जब से मुराद के प्रकरण में अकबर ने खानखाना अब्दुर्रहीम की ड्यौढ़ी बंद की थी तभी से खानखाना मन ही मन अकबर से खिन्न था। पुत्री जाना के शोक ने भी उसे तोड़ डाला था। अब वह कोई लड़ाई न तो लड़ना चाहता था और न जीतना चाहता था!

इन सब कारणों से भी बढ़कर, सबसे बड़ा कारण यह था कि तैमूर लंग की कब्र में खानखाना की कोई रुचि नहीं थी। अतः उसने बादशाह को एक लम्बा पत्र भिजवाया जिसमें उसने लिखा कि बादशाह सलामत को जानना चाहिये कि मन की शांति तो तभी मिलेगी जब अशांति के वास्तविक कारण को जानकर उसे दूर करने के उपाय किये जायेंगे।

यदि वह संभव न हो तो निरीह और कमजोर प्राणियों पर दया करने और उनकी सेवा करने से भी मन की शांति प्राप्त की जा सकती है।

बादशाह सलामत को यह भी जानना चाहिये कि आपकी रियाया आपके कुल में पैदा हुए तैमूर बादशाह के बारे में उतनी श्रद्धा नहीं रखती जितनी कि आपमें रखती है क्योंकि रियाया का मानना है कि आपके पूर्वज तैमूर लंग के जमाने में हिंदुस्थान की रियाया पर बहुत अत्याचार हुए हैं।

इससे यदि आप तैमूर बादशाह की कब्र के दर्शनों के लिये तूरान जायेंगे तो आपकी रियाया को आपके बारे में संदेह होगा जिसका खामियाजा आपके उत्तराधिकारियों को भुगतना पड़ेगा।

बेहतर होगा कि आप इस इरादे को त्याग ही दें। मैं इस समय दक्षिण का मोर्चा किसी और के भरोसे छोड़कर आपकी सेवा में उपस्थित नहीं हो सकता हूँ। जब कभी दक्षिण में शांति स्थापित होगी तब आप मुझे जो भी आदेश देंगे, प्राण रहते पूरा करूंगा। मेरा विचार तो यही है, आगे आप बादशाह हैं, जैसा कहेंगे, मैं वही करूंगा।

अब्दुर्रहीम खानखाना की इस फटकार भरी चिट्ठी को पढ़कर अकबर के मन का रहा-सहा उत्साह भी भंग हो गया। अकबर को आशा नहीं थी कि बैराम खाँ का बेटा अकबर के ही महल में पलकर बड़ा होने के बाद, अकबर को इतनी कड़ी चिट्ठी लिखेगा! अकबर के मन से तैमूर की कब्र के दर्शनों का उत्साह जाता रहा। उसने तूरान जाने का निश्चय त्याग दिया।

अकबर के तीन शहजादों में से दो छोटे शहजादे मुराद और दानियाल अत्यधिक शराब पीकर मर चुके थे। तीसरा तथा सबसे बड़ा शहजादा सलीम भी अत्यधिक शराब पीकर न केवल खुद मौत के कगार पर जा खड़ा हुआ था अपितु अपने बुरे दोस्तों की सोहबत में अपने बाप अकबर तथा पूरी मुगलिया सल्तनत को मौत के कगार पर खींच कर ले जा रहा था।

अकबर के बाद सलीम ही मुगलिया सल्तनत का उत्तराधिकारी हो सकता था किंतु बुरे आदमियों की संगति के कारण उसका दिमाग विकृत हो चला था। उसे बादशाह बनने की बड़ी शीघ्रता थी। वह अकबर के जीते जी उसकी सारी सम्पत्ति तथा राज्य पर अधिकार करना चाहता था किंतु अकबर इस अयोग्य, धोखेबाज, शराबी और अय्याश शहजादे को बादशाह नहीं बनाना चाहता था।

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ई.1591 में जब अकबर गंभीर रूप से बीमार पड़ा तब अवसर पाकर सलीम ने अपने पिता अकबर को जहर दे दिया किंतु किसी तरह अकबर बच गया। जब अकबर मामले की तह तक गया तो उसका सारा संदेह सलीम पर गया। उसने सदैव के लिये सलीम को अपनी दृष्टि से च्युत कर दिया। अकबर विश्वास नहीं कर सका कि जिस बेटे के लिए उसने जीवन भर पापड़ बेले, वही बेटा एक दिन अकबर को जहर दे देगा! सल्तनत तो वैसे भी सलीम की ही थी, क्या फर्क पड़ता है कि अकबर तख्त पर बैठा है!

सलीम की इस दुष्टता से अकबर के जीवन में चारों ओर निराशा छा गयी। उसने हिन्दू नरेशों को अपनी सल्तनत का रक्षक नियुक्त कर कजलबाश, चगताई, ईरानी और तूरानी अमीरों से तो अपने राज्य की रक्षा कर ली थी किंतु घर में ही जन्मा कुपुत्र, अकबर के सीने में जहर बुझी कटारी की तरह गढ़ गया। उससे निजात पाने का कोई उपाय नहीं था।

अंत में अकबर ने सलीम के पुत्र खुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया। खुसरो के प्रति आसक्ति और अपने प्रति उपेक्षा देखकर शहजादा सलीम अपने पिता अकबर से खुल्लमखुल्ला विद्रोह करने पर उतारू हो गया किंतु हरम की औरतों ने विशेषकर सलीमा बेगम ने किसी तरह अकबर को शांत किया तथा पिता-पुत्र में समझौता करवाया।

जब सलीम को मेवाड़ नरेश अमरसिंह के विरुद्ध अभियान के लिये भेजा गया तो सलीम मेवाड़ न जाकर अजमेर में ही अपना डेरा जमाकर बैठ गया। उन्हीं दिनों अजमेर के सूबेदार शहबाज खाँ कम्बो की मृत्यु हो गयी। सलीम ने अवसर मिलते ही शाही खजाने के एक करोड़ रुपये तथा शहबाज खाँ की निजी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया।

जिस समय अकबर असीरगढ़ के मोर्चे पर था, उस समय सलीम को ज्ञात हुआ कि आगरा के किले में राजकीय कोष के दो करोड़ रुपये रखे हुए हैं। सलीम ने उस कोष को हथियाने के लिये अजमेर से आगरा की ओर प्रयाण किया किंतु किलेदार और कोषाध्यक्ष की सतर्कता के कारण सलीम उस कोष को हाथ नहीं लगा सका। इसके बाद सलीम यमुना पार करके प्रयाग चला गया और उसने अपने आपको स्वतंत्र बादशाह घोषित कर अपना दरबार जमा लिया। कुछ ही दिनों बाद उसे बिहार से भी शाही कोष के तीस लाख रुपये छीनने का अवसर मिल गया। शाही कोष से छीने गये लगभग डेढ़ करोड़ रुपयों के बल पर सलीम ने तीस हजार सिपाही इकट्ठे कर लिये।

अबुल फजल का कत्ल कर दिया शहजादे सलीम ने (179)

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अबुल फजल का कत्ल कर दिया शहजादे सलीम ने

अपने पिता जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर से बदला लेने की आग में जल रहा शहजादा सलीम अकबर के मित्रों, सेवकों एवं दरबारियों की हत्या करने लगा। उसने अकबर के सबसे प्यारे मित्र अबुल फजल का कत्ल कर दिया।

अकबर के तीन पुत्रों में से दो पुत्र मुराद एवं दानियाल अत्यधिक शराब पीने से मर गए तथा अकबर का सबसे बड़ा एवं इकलौता जीवित पुत्र सलीम अपने पिता को मारकर उसके राज्य पर कब्जा करने में लग गया। सलीम के विद्रोह के समाचार सुनकर अकबर असीरगढ़ का मोर्चा छोड़कर आगरा आया।

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जब सलीम को ज्ञात हुआ कि अकबर आगरा आ गया है तो सलीम ने प्रचारित किया कि वह भी अपने पिता की अभ्यर्थना करने के लिये आगरा जायेगा। वास्तव में तो उसका निश्चय अकबर को कैद करके स्वयं बादशाह बनने का था। 

सलीम अपने तीस हजार सिपाही लेकर चारों तरफ लूटमार करता हुआ आगरा की ओर बढ़ा। अकबर सलीम के इरादों को भांप गया। उसने अपने आदमियों के माध्यम से उसे कहलवाया कि यदि वह अपनी सेना को भंग करके प्रयाग लौट जाये तो उसे क्षमा कर दिया जायेगा।

पिता की यह उदारता देखकर सलीम ने अपनी सेना प्रयाग की तरफ लौटा दी और अकबर से कहलवाया कि मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत होना चाहता हूँ। अकबर ने सलीम को अपनी सेवा में उपस्थित होने की अनुमति दे दी। आगरा आकर सलीम बादशाह के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोया।

उसका यह भाव देखकर अकबर ने उसे क्षमा कर दिया तथा उसे बंगाल और उड़ीसा का सूबेदार बनाकर बंगाल जाने के आदेश दिये तथा अपना खास तातार गुलाम उसकी सेवा में नियुक्त कर दिया।

इलाहाबाद लौटकर सलीम पुनः मक्कार आदमियों से घिर गया और उसने बंगाल जाने से मना कर दिया। वह प्रयाग में नित्य दरबार आयोजित करके लोगों को मनसब और जागीरें बांटने लगा।

इस समस्या का अंत न आता देखकर अकबर ने खानखाना को दक्षिण से बुलाने का विचार किया किंतु दक्षिण में खानखाना की सफलताओं को देखते हुए उसे वहाँ से हटाया जाना उचित नहीं था इसलिये बहुत सोच-विचार के उपरांत अकबर ने अबुल फजल को आगरा बुलवाया।

जब सलीम को ज्ञात हुआ कि अबुल फजल आ रहा है तो उसने ओरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला को आदेश दिया कि वह अबुल फजल का कत्ल कर दे। अबुल फजल अकबर का मित्र था किंतु शहजादे को अकबर का एक भी मित्र पसंद नहीं था।

वीरसिंह बुंदेला ने अबुल फजल का कत्ल कर दिया। इस पर वह तातार गुलाम जो हर समय सलीम के पास रहने के लिए अकबर द्वारा नियुक्त किया गया था, भागकर फतहपुर सीकरी आ गया और उसने अकबर को सूचना दी कि शहजादे सलीम ने अबुल फजल की हत्या करवा दी है।

अबुल फजल की हत्या हो जाने का समाचार सुनकर अकबर चीख मारकर बेहोश हो गया। सलीम इस हद तक आगे बढ़ जायेगा, अकबर ने इसकी तो कल्पना भी नहीं की थी। अबुल फजल अकबर का अनन्य मित्र था। वह शहंशाह का खास आदमी माना जाता था। उसकी ख्याति पूरी सल्तनत में सबसे बुद्धिमान आदमी के रूप में थी।

अकबर ने उससे अपनी समस्याओं का समाधान जानने के लिये उसे दक्षिण के मोर्चे से बुलवाया था किंतु सलीम ने उसकी हत्या करवाकर समस्याओं को खतरनाक मुकाम तक पहुँचा दिया था।

इतिहास गवाह है कि अकबर के जीवन काल में वीर राजाओं की नामावली में महाराणा प्रताप के बाद ओरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला का ही नाम आता है। यह जानकर अकबर की निराशा का पार नहीं था कि वीरसिंह बुंदेला अकबर को छोड़कर सलीम से जा मिला है!

अबुल फजल की मौत और बेटे की बेवफाई से अकबर शोक के गहन सागर में डूब गया। अकबर शोक के गहन सागर में डूब गया। उसने अपने महल की सारी शमाएं बुझा दीं और पूरे तीन दिनों तक महल के दरवाजे बंद करके पड़ा रहा। 

जब प्रजा को मालूम हुआ कि बादशाह शमाएं बुझाकर तथा मुँह पर कपड़ा लपेट कर अपने महल में बंद हो गया है तो आगरा एवं फतहपुर सीकरी में हड़कम्प मच गया। कोई न जान सका कि आखिर ऐसा क्या हो गया है जो बादशाह इतना गमगीन है! लोग अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार अनुमान लगाने लगे।

तीन दिन बाद जब अकबर अपने महलों से बाहर निकला तो उसने दो फरमान एक साथ जारी किये। पहला ये कि शहजादे सलीम को आगरा में तलब किया जाये। सलीम ने आगरा आने से मना कर दिया। दूसरा ये कि ओरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला को जहाँ भी पाया जाये, मार डाला जाये।

उस काल में किसी मुस्लिम गवर्नर, शहजादे या सेनापति में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह राजा वीरसिंह बुंदेला पर हमला कर सके। इसलिए अकबर ने राय रायान, राजा राजसिंह, रामचंद्र बुंदेला तथा बुंदेलखण्ड के अन्य हिन्दू सरदारों को आदेश दिया कि वीरसिंह बुंदेला का सिर काटकर अकबर के सामने प्रस्तुत करें।

इन लोगों ने राजा वीरसिंह बुंदेला को पकड़ने या मारने के लिए कई सालों तक परिश्रम किया किंतु वे लोग वीरसिंह बुंदेला की छाया तक भी नहीं पहुंच सके। अकबर तो ई.1605 में मर गया था किंतु राजा वीरसिंह बुंदेला ई.1627 तक अपने राज्य पर शासन करता रहा।

अकबर के क्रोध का पार नहीं था। वह सलीम के विरुद्ध कोई कठोर कार्यवाही करने पर विचार करने लगा। अकबर की यह हालत देखकर एक बार फिर सलीमा बेगम ने पिता-पुत्र के मध्य सुलह करवाने का विचार किया। वह अकबर से अनुमति लेकर इलाहाबाद गयी और सलीम को समझा-बुझा कर आगरा ले आयी।

जब सलीम अकबर के समक्ष उपस्थित हुआ तो उसने देखा कि अकबर शोकग्रस्त एवं रोगग्रस्त है। उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया है जिसके कारण वह ढंग से बोल भी नहीं पा रहा।

शहजादा सलीम अपने बाप की यह दुर्दशा देखकर उसके पैरों पर गिर पड़ा और अबुल फजल का कत्ल करने के लिए पश्चाताप करने लगा। शहजादे की आंखों में पश्चाताप के आंसू देखकर अकबर ने अबुल फजल का गम भुला दिया और सलीम को उठाकर छाती से लगा लिया। सलीम ने अपने सात सौ सत्तर हाथी और बारह हजार स्वर्ण मुद्रायें बादशाह को भेंट कीं।

इस बार अकबर ने सलीम से कहा कि वह यदि बंगाल नहीं जाना चाहता है, न जाए किंतु मेवाड़ पर अभियान करके अपने पूर्वजों की भांति यश लाभ करे। सलीम ने अकबर की बात मान ली और मेवाड़ के लिये रवाना हो गया।

अभी वह आगरा से निकल कर फतहपुर सीकरी तक ही गया था कि उसका मन फिर से बदल गया। उसने अकबर को कहलवाया कि मैं महाराणा के विरुद्ध अभियान करने में स्वयं को असक्षम मानता हूँ, अतः मुझे प्रयाग जाने दिया जाये। अकबर ने सलीम को नितांत निकम्मा जानकर उसकी यह प्रार्थना भी स्वीकार कर ली। प्रयाग पहुँच कर सलीम ने फिर से अपने को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर दिया और दरबार लगाने लगा।

सलीम की नीचता ! 180

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सलीम की नीचता

शहजादे सलीम को अपने बाप अकबर से इतनी घृणा थी कि वह नीचता भरी हरकतें करने लगा। सलीम की नीचता इस हद तक बढ़ गई कि अकबर ने उसे थप्पड़ मार कर गुसलखाने में बंद कर दिया!

अकबर के तीन पुत्रों में से दो पुत्र मुराद एवं दानियाल अत्यधिक शराब पीने से मर गए और उसके एकमात्र जीवित पुत्र सलीम ने अकबर की हत्या करने का प्रयास किया किंतु जब वह अपने पिता की हत्या करने में सफल नहीं हो सका तो वह अत्यधिक शराब पीने लगा।

शराब के नशे में सलीम की नीचता बढ़ गई। उसने अकबर के मित्रों एवं नजदीकी लोगों को मारना शुरु कर दिया। जब अकबर ने अबुल फजल को इस समस्या पर विचार करने के लिए दक्षिण के मोर्चे से बुलाया तो सलीम ने ओरछा के राजा वीरसिंह बुंदेला से कहकर अबुल फजल की हत्या करवा दी। इससे अकबर को अपार कष्ट हुआ।

एक दिन सलीम ने शराब के नशे में धुत्त होकर अपनी पत्नी शाहबेगम को कोड़ों से इस कदर पीटा कि उसने ग्लानि-वश जहर खा लिया। शाहबेगम का वास्तविक नाम मानबाई था। वह आम्बेर के राजा भारमल की पौत्री, राजा भगवंतदास की पुत्री तथा राजा मानसिंह की बहिन थी। सलीम की नीचता से आम्बेर का राजा मानसिंह सलीम से नाराज हो गया। हालांकि मानसिंह सलीम का सगा मामा था।

कुछ लोगों ने लिखा है कि मानबाई तंत्रिका तंत्र की बीमारी से ग्रस्त थी तथा उसने इस बात से दुखी होकर आत्महत्या की कि मानबाई का भाई मानसिंह तथा मानबाई का पुत्र खुसरो, मानबाई के पति सलीम के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे। संभवतः इस झूठ को उस दौरान प्रचारित किया गया होगा जब सलीम जहांगीर के नाम से बादशाह बनने में सफल हो गया।

वास्तविकता यह थी कि सलीम ने मानबाई की हत्या इसलिए की क्योंकि मानबाई का भाई मानसिंह अकबर का सबसे नजदीकी व्यक्ति था। मानबाई की मौत से राजा मानसिंह जो अब तक सलीम का सबसे बड़ा हितैषी था, सलीम का शत्रु हो गया।

अकबर ने जो तातार गुलाम सलीम के साथ नियुक्त किया था, उसने मानबाई की हत्या का विवरण अकबर को लिखकर भेजा। सलीम को इस बात का पता लग गया और उसने तातार गुलाम की जीवित अवस्था में ही खाल खिंचवा ली। जब एक अन्य नौकर ने सलीम के इस अत्याचार का विरोध किया तो सलीम ने शराब पीकर उसे इतना पीटा कि पिटाई के दौरान ही उसकी मृत्यु हो गयी।

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सलीम की नीचता का पार नहीं था। एक दिन सलीम की निगाह अपने पिता अकबर के एक और खास नौकर पर पड़ी। सलीम को उसे देखते ही इतना क्रोध आया कि सलीम ने उसे पीट-पीट कर नपुंसक बना दिया। जब अकबर को ये समाचार मिले तो अकबर ने सलीम के सुधरने की आशा त्याग दी तथा सलीम के सत्रह वर्षीय पुत्र खुसरो पर अपना ध्यान केंद्रित करने का निश्चय किया। खुसरो आमेर नरेश मानसिंह की बहिन मानबाई का पुत्र और खानेआजम मिर्जा कोका का दामाद था। इसलिये खानेआजम मिर्जा कोका तथा राजा मानसिंह भी अकबर की इस योजना में सम्मिलित हो गए तथा खुसरो को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करने और सलीम को दण्डित करने के उपाय करने लगे।

अकबर ने भले ही सलीम को राज्याधिकार से वंचित करने तथा खुसरो को शासन पर स्थापित करने का निर्णय ले लिया किंतु प्रारब्ध ने सलीम और खुसरो के भाग्यों में कुछ और ही लिखा था। अभी खुसरो को शासन पर स्थापित करने की योजना पर विचार चल ही रहा था कि अकबर की माता हमीदा बानू बेगम की मृत्यु हो गयी। इससे खुसरो को अकबर का उत्तराधिकारी घोषित करने की योजना स्थगित हो गई।

सलीम अपनी दादी के मरने का समाचार पाकर मातमपुरसी के लिये आगरा आया और सीधे अपने पिता के दरबार में हाजिर हुआ। अकबर ने दरबार में तो सलीम से कुछ नहीं कहा किंतु जब महल में उसे अकबर के सामने लाया गया तो अकबर ने एक तमाचा सलीम के मुँह पर मारा तथा उसे गुसलखाने में बंद कर दिया। राजा शालिवाहन को सलीम पर निगरानी रखने तथा उसका मानसिक उपचार करने के लिये कहा गया।

सलीम को थप्पड़ मारने तथा गुसलखाने में बंद करने से अकबर को इतना कष्ट पहुंचा कि वह स्वयं बुरी तरह से बीमार पड़ गया। शाही हकीमों ने पूरा जोर लगाया किंतु उन्हें बादशाह की बीमारी पकड़ में नहीं आयी। वे जो भी दवा करते थे, वह अकबर पर विष जैसा कार्य करती थी।

राजा शालिवाहन ने पूरे दस दिन तक सलीम को स्नानागार में बंद रखा तथा इस दौरान उसे शराब की एक बूंद भी पीने को नहीं दी। दस दिन बाद जब राजा शालिवाहन ने सलीम को स्नानागार से बाहर निकाला तो सलीम ने पूरी दुनिया ही बदली हुई पायी।

उसे ज्ञात हुआ कि शहंशाह बुरी तरह बीमार है और अपने महल में अंतिम सांसें गिन रहा है। सलीम को ज्ञात हुआ कि राजा मानसिंह ने फतहपुर सीकरी के चप्पे-चप्पे पर अपने सैनिकों का पहरा लगा रखा है तथा वह शहंशाह की सम्मति से शहजादे खुसरो को बादशाह बनाने की तैयारी कर रहा है।

शहजादे खुसरो का ससुर खानेआजम कोका भी मानसिंह की योजना पर काम कर रहा है। सलीम को अपनी दुनिया अंधकारमय दिखाई देने लगी किंतु तभी उसे रामसिंह कच्छवाहा की सेवाएं प्राप्त हो गईं।

हालांकि रामसिंह भी आम्बेर के कच्छवाहा राजपरिवार से था किंतु वह सलीम का दोस्त था। इसलिए रामसिंह नहीं चाहता था कि सलीम के स्थान पर किसी और शहजादे को बादशाह बनाया जाए।

रामसिंह ने अपने एक सेवक को सलीम के महल में भेजा जो राजा शालिवाहन के सिपाहियों को चकमा देकर सलीम से मिला। उसने सलीम को बताया कि आप हिम्मत नहीं हारें तथा बादशाह बनने का प्रयास करें। रामसिंह कच्छवाहा के सैनिक शहजादे सलीम के लिए मरने-मारने को तैयार खड़े हैं।

सलीम की नीचता ही उसकी ताकत थी। वह जबर्दस्ती अकबर के कक्ष में घुस गया। अकबर को पिछले कुछ दिनों से संग्रहणी रोग हो गया था। हकीमों ने उसे कुछ तेज असर करने वाली दवाएं दी थीं जिनके कारण अकबर को मल के साथ रक्त आने लगा था। शरीर से रक्त निकल जाने के कारण अकबर का शरीर बेहद कमजोर हो गया था। राजा मानसिंह छाया की तरह उसके पलंग से चिपका हुआ खड़ा था।

सलीम ने अपने बीमार पिता के कक्ष में दीवार पर लटक रही हुमायूँ की तलवार उतार ली और उसे अपनी कमर में बांध ली। सलीम को दीवार से तलवार उतारते देखकर राजा मानसिंह ने भी अपनी तलवार खींच ली और चौकन्ना होकर खड़ा हो गया। तलवार उतारने की आवाज से अकबर की आंख खुल गई।

अकबर ने निराश होकर सलीम की तरफ देखा। अकबर समझ गया कि खुसरो को बादशाह बनाना अकबर के वश में नहीं है। यदि अकबर ने ऐसा करने का प्रयास किया तो सलीम एवं खुसरो में सल्तनत के लिए खूनी संघर्ष होगा।

इस संघर्ष में आधे राजपूत राजा सलीम की तरफ तथा आधे राजपूत राजा खुसरो की तरफ से लड़ेंगे। इस कारण अकबर ने जीवन भर युद्ध करके जो सल्तनत खड़ी की है, वह तिनकों के महल की तरह बिखर जाएगी।

अकबर के सिराहने एक चौकी रखी थी जिस पर अकबर की पगड़ी रखी रहती थी। अकबर ने राजा मानसिंह को संकेत किया कि वह पगड़ी उठाकर अकबर को दे। राजा मानसिंह ने अकबर की पगड़ी उठाकर अकबर को दे दी। अकबर ने सलीम को अपने निकट आने का संकेत किया और अपनी पगड़ी सलीम के सिर पर रख दी। जिल्ले इलाही कहलाने वाला अकबर हार गया और उसका शराबी बेटा सलीम जीत गया।      

मृत्यु के बाद संभावनाएं !

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मृत्यु के बाद संभावनाएं
क्या मृत्यु के बाद संभावनाएं रहती हैं, क्या मृत्यु के बाद कोई अशरीरी जीवन भी होता है? क्या मृत्यु का अर्थ सब-कुछ समाप्त हो जाना है?

मृत्यु! एक ऐसा शब्द है जिससे प्रत्येक प्राणी का सामनाा एक न एक दिन होता ही है। यह शब्द अच्छों-अच्छों के हृदय में भय उत्पन्न कर देता है। बड़े-बड़े बलवान, धनवान, गुणवान, रूपवान और सामर्थ्यवान व्यक्ति मृत्यु के नाम से भय खाते हैं। यही कारण है कि अधिकतर लोग इस शब्द को भूले हुए ही रहना चाहते हैं। उसका स्मरण भी नहीं करना चाहते।

सबको पता है कि मृत्यु होनी निश्चित है किंतु वे मानकर चलते हैं कि अभी वह बहुत दूर है। हम यह भी जानते हैं कि जब वह आयेगी तो बता कर नहीं आयेगी, अवांछित अतिथि की भांति बलपूर्वक अचानक ही आ धमकेगी किंतु हम यह भी मानते हैं कि वह अभी इसी क्षण तो नहीं आयेगी।

बहुत से लोग मानते हैं कि जब वह आनी ही है और उस पर हमारा कोई वश नहीं है तो फिर उसका चिंतन क्यों? उस के बारे में सोच-सोच कर अपना वर्तमान क्यों खराब करें? इसके स्मरण से जीवन में कड़वाहट उत्पन्न होती है।

सदियों और सहस्राब्दियों से मनुष्य की आकांक्षा रही है कि वह मृत्यु पर विजय प्राप्त करे। उसे अमरत्व की प्राप्ति हो। इसके लिये उसने कभी अमृत की कल्पना की तो कभी अमरत्व प्रदान करने वाले वरदानों की। कभी उसने न मरने वाले देवताओं की बात की तो कभी सशरीर स्वर्ग जाने वाले इंसानों की।

संसार की लगभग समस्त सभ्यताएं अतीत में देवताओं तथा भूतों का अस्तित्व स्वीकारती हैं, स्वर्ग और नर्क का अस्तित्व स्वीकारती हैं, देवताओं के धरती पर आने और मनुष्यों के स्वर्ग तक जाने की बात स्वीकारती हैं किंतु वर्तमान में ऐसा कहीं देखने में नहीं आता।

हर सम्यता में देवता का अर्थ है न मरने वाला अतीन्द्रिय व्यक्ति। भूत का अर्थ है ऐसी आकृति जो दिखायी तो देती है किंतु उसके पास शरीर नहीं है। स्वर्ग का अर्थ है कष्टों से रहित स्थान जो पुण्य कर्मों के संचय से प्राप्त होता है और नर्क का अर्थ है अशुभ कर्मों की सजा भुगतने के लिये प्राप्त होने वाला स्थान।

संसार की समस्त सभ्यताएं मृत्यु के बाद संभावनाएं एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखती हैं तथा बारम्बार ऐसे दावे भी किये जाते हैं। भारत जैसे आस्था प्रधान देश में ही नहीं अपितु अत्यंत आधुनिक माने जाने वाले देशों में भी मृतकों की शांति के लिये कुछ न कुछ क्रियाएं अवश्य की जाती हैं। वस्तुतः ये सब धारणाएं भी मृत्यु और उसके बाद की संभावनाओं पर केंद्रित हैं।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

मृत्यु क्या है?

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मृत्यु क्या है

इस प्रश्न पर संसार के प्रत्येक देश में, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में तथा काल प्रवाह के प्रत्येक युग में निरंतर चिंतन किया जाता है कि मृत्यु क्या है? ऋषि, मुनि, दार्शनिक, चिंतक एवं उपदेशकों से लगाकर वैज्ञानिकों तक ने इस विषय पर कार्य किया है।

बहुत से लोगों ने मृत्यु की परिभाषाऐं दी हैं, इसके लिये मानदण्ड निर्धारित किये हैं तथा नितांत भिन्न मान्यताएं स्थापित की हैं। सबसे पहले विज्ञान के स्तर पर मृत्यु पर विचार किया जाना उचित होगा।

विज्ञान मानता है मृत्यु एक ऐसी जैव रासायनिक क्रिया है जो प्राणी के शरीर में कुछ निश्चित परिवर्तनों को लाती है। इन परिवर्तनों के कारण प्राणी के शरीर में कुछ ऐसे जैविक परिवर्तन हो जाते हैं जिन्हें वापस उलटा नहीं जा सकता। ये परिवर्तन भौतिक लक्षणों के रूप में प्रकट होते हैं। इन लक्षणों को ही हम मृत्यु कहते हैं।

शरीर के जिन लक्षणों को देखकर प्राणी की मृत्यु होना मान लिया जाता है, उनमें प्रमुख हैं- शरीर का निश्चेष्ट हो जाना। आँख, नाक, कान, जीभ तथा त्वचा आदि इंद्रियों का काम करना बंद कर देना, जिनके कारण आदमी न तो हिल-डुल सकता है, न देख सकता है, न सुन सकता है, न बोल सकता है, न सूंघ सकता है, न विचार कर सकता है।

चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से ऐसा प्रमुखतः तीन कारणों से होता है। पहला कारण है- हृदय का बंद हो जाना। इस स्थिति में हृदय धड़कना बंद कर देता है, फैंफड़ों, मस्तिष्क तथा शरीर के अन्य अवयवों को रक्त संचार बंद हो जाता है। दूसरा कारण है- फैंफड़ों का काम करना बंद कर देना। इस स्थिति में फैंफड़े रक्त कोशिकाओं को ऑक्सीजन की आपूर्ति करना तथा शरीर में उत्पन्न हुई कार्बन डाई ऑक्साइड को बाहर निकालना बंद कर देते हैं। तीसरा कारण है- मस्तिष्क का बंद हो जाना। इस स्थिति में शरीर के संवेदना तंत्र पर नियंत्रण हट जाता है। शरीर में संवेदना ग्रहण करने की तथा प्रतिक्रिया व्यक्त करने की शक्ति समाप्त हो जाती है।

यही कारण है कि चिकित्सक किसी भी व्यक्ति को मृत घोषित करने से पहले तीन चीजों की जांच करते हैं। पहली जांच श्वांस की होती है। यदि श्वांस रुकी हुई है तो दूसरी जांच नाड़ी की होती है। यदि नाड़ी में स्पंदन नहीं है तो तीसरी जांच हृदय की होती है। यदि वहाँ भी धड़कन नहीं है तो अंत में आँखों की जांच की जाती है।

यदि आँखों की पुतलियां फैल गयी हैं तो आँखों में टॉर्च से प्रकाश की बौछार की जाती है। आँख शरीर का अत्यंत संवेदनशील अंग है। इतना संवेदनशील कि वह प्रकाश की चोट को भी सहन नहीं कर सकता है। यदि प्राणी के शरीर में प्राण हैं और यदि उसकी आँखों में प्रकाश की बौछार की जाती है तो इस बात की काफी संभावना होती है कि उसकी आँखों की पुतलियों में हलचल हो।

यदि आँखों से भी जीवन के कोई चिह्न नहीं मिलते तो इसके बाद चिकित्सक प्राणी की मृत्यु हो जाने की घोषणा कर देते हैं।
ऊपर हमने जिन लक्षणों की चर्चा की है वस्तुतः वे मृत्यु के कारण नहीं हैं, लक्षण हैं। मृत्यु के कारणों पर चिकित्सा विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, भौतिक विज्ञान अथवा विज्ञान की अन्य कोई शाखा यह नहीं बता पाई है कि आखिर मृत्यु क्या है और इसके लक्षण क्यों प्रकट हुए?

यदि यह कहा जाये कि शरीर के वृद्ध हो जाने पर मनुष्य की स्वाभाविक मृत्यु हो जाती है तो भी मृत्यु की सही परिभाषा प्राप्त नहीं होती। वृद्धावस्था स्वयं भी एक लक्षण ही है, कारण नहीं है। वृद्धावस्था की भी कोई निश्चित परिभाषा नहीं है न ही इसकी कोई सीमा है। बहुत से लोग चालीस वर्ष की आयु में भी वृद्धों की तरह व्यवहार करने लगते हैं और बहुत से लोग सत्तर-अस्स्सी साल में भी पूरी तरह स्वस्थ एवं सक्रिय दिखायी पड़ते हैं।

यदि वृद्धावस्था मृत्यु का स्वाभाविक कारण है तो फिर कोई आदमी पचास-साठ साल की आयु में ही स्वाभाविक मृत्यु को क्यों प्राप्त हो जाता है? कोई आदमी एक सौ पैंतीस वर्ष या उससे अधिक आयु तक क्यों जा पहुँचता है?

सार रूप में इतना ही कहा जा सकता है कि यह गुत्थी आज तक नहीं सुलझ सकी है कि वास्तव में मृत्यु क्या है? यह क्यों होती है, कब होती है और कैसे होती है?

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

देह कैसे मरती है?

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देह कैसे मरती है

मानव देह कैसे मरती है? इसके तीन लक्षण हैं- फैंफड़ों का सांस लेना बंद कर देना, हृदय की धड़कन रुक जाना तथा मस्तिष्क का काम करना बंद कर देना। अभी तक वैज्ञानिक यह निश्चित नहीं कर पाये हैं कि मृत्यु के समय हृदय की धड़कन का बंद होना, फैंफड़ों का बंद होना तथा मस्तिष्क का काम करना बंद कर देना, इन तीन घटनाओं में से पहली घटना कौनसी होती है तथा इनका क्रम क्या होता है।

सामान्यतः चिकित्सकों का अनुभव है कि यदि इन तीनों घटनाओं में से कोई एक घटना घटित हो गयी है तो दूसरी तथा तीसरी घटना कुछ ही समय में स्वतः ही घट जायेगी। चिकित्सकों के अनुसार इन तीनों घटनाओं में से पहले कोई भी घट सकती है, उनके घटित होने का कोई क्रम निर्धारित नहीं है। इसलिए स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि मानव देह कैसे मरती है?

यह कहना सही नहीं होगा कि मृत्यु के पश्चात प्राणी की देह में कोई परिवर्तन होना संभव नहीं है। प्राणी की स्वाभाविक मृत्यु के बाद भी उसके शरीर में कुछ जैविक परिवर्तन देखे गये हैं। जैसे बालोें का बढ़ना, नाखूनों का बढ़ना, शरीर से अपान वायु का निःसरण होना तथा मुँह से झाग आना।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि शरीर के बाह्य एवं आंतरिक भागों में आये परिवर्तनों को मृत्यु का कारण नहीं माना जा सकता। विश्व में जितनी भी सभ्यतायें हुई हैं उनमें यह विश्वास रहा है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं है, शरीर के भीतर कोई रहता है जो मनुष्य की देह के जन्म लेने, जीवित रहने अथवा मृत्यु को प्राप्त हो जाने के लिये जिम्मेदार है।

हिन्दू इसे आत्मा कहकर पुकारते हैं। इसाईयों ने सोल और मुसमानों ने इसे रूह कहकर पुकारा है। इसी प्रकार रोमन, सुमेरियन, माया, इन्का तथा सिंधु सभ्यताओं सहित जितनी भी सभ्यताएं अतीत में हो चुकी हैं, उन सबमें थोड़े बहुत अंतर से इस बात को स्वीकार किया गया है कि मृत्यु का मुख्य कारण आत्मा का देह त्याग देना है।

निश्चित है मृत्यु का समय

भारतीय सभ्यता सहित संसार की अधिकांश सभ्यताओं की यह मान्यता भी रही है कि प्रत्येक मनुष्य को गिनी हुई साँसें मिलती हैं। जब साँसों की संख्या पूरी हो जाती है तो मानव साँस लेना बंद कर देता है और उसकी मृत्यु हो जाती है।
भारतीय ज्योतिष विज्ञान तो यहाँ तक मान्यता रखता है कि जीवात्मा के धरती लोक पर देह धारण करने और देह त्याग करने का समय निश्चित है, और इस समय से जीवात्मा के धरती पर आने या जाने के बाद का जीवन प्रभावित होता है।

भारतीय अध्यात्म के अनुसार मृत्यु के बाद का जीवन एक जैसा नहीं है। उसके कई रूप होते हैं। मृत्यु के बाद मिलने वाले अगले जीवन की नींव इस जीवन के कर्मों, मृत्यु की परिस्थितियों, मृत्यु के समय मस्तिष्क में आये विचारों तथा और भी बहुत सारे कारकों पर भी निर्भर करती है।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

मृत्यु शाश्वत है!

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मृत्यु शाश्वत है

क्या मृत्यु शाश्वत है? क्या मृत्यु से बचा जा सकता है? क्या सृष्टि में कुछ ऐसे जीव हैं जो अमर हैं? क्या वे सदैव अमर रहेंगे? या वे भी एक दिन किसी न किसी प्रकार की मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे?

आत्मा देह क्यों त्यागती है? इस प्रश्न के उत्तर में एक शाश्वत नियम बताया जाता है कि जिसका जन्म हुआ है, वह मृत्यु को अवश्य प्राप्त होगा। यदि मृत्यु शाश्वत है तो फिर आत्मा कैसे शाश्वत है? या फिर आत्मा भी नश्वर है?

सप्तचिरंजीवी

मृत्यु की अनिवार्यता सम्बन्धी धारणा अस्तित्व में होते हुए भी भारतीय संस्कृति में सप्तचिरंजीवियों की अवधारणा भी मौजूद है। इसके अनुसार रामकथा कालीन हनुमान, विभीषण एवं परशुराम, महाभारत कालीन वेदव्यास, अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा पुराणकालीन राजा बली अमर हैं। इनकी मृत्यु नहीं होती-

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च बिभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः।।

कुछ लोग इस सूची में जाम्बवान का तथा कुछ लोग आल्हा का नाम रखते हैं। इन सातों के साथ मार्कण्डेय ऋषि को भी दीर्घजीवी माना जाता है-

सप्तैतान् स्मरेन्नित्यम् मार्कण्डेयम् तथाष्टम्।
जीवेद् वर्षशतं सोऽपि सर्वव्याधिविवर्जितः।।

सप्तचिरंजीवियों में से हनुमानजी को शिवजी का, जाम्बवान को ब्रह्माजी का तथा परशुराम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। ये तीनों देवता हैं तथा बिना देह के रह सकते हैं और इच्छानुसार कभी भी देहधारण एवं देहत्याग कर सकते हैं। ये रामायण काल में थे तो महाभारत के काल में भी।

अनेक पुण्यात्माओं ने हनुमानजी के दर्शन होने की बात कही है। शेष चिरंजीवियों में से अश्वत्थामा को छोड़कर कभी भी किसी ने भी देखने का दावा नहीं किया है। अतः यह शाश्वत सत्य ही जान पड़ता है कि जिसने जन्म लिया है, वह देह त्याग अवश्य करेगा। यह बात अलग है कि हर देह की आयु एक जैसी नहीं है।

पुराणों में जिन सप्तचिरंजीवियों की बात कही गई है, वे संभवतः केवल एक ही सृष्टि के लिए चिरंजीवी होते हैं। जब इस सृष्टि का प्रलय होगा तब ये सप्तचिरंजीवी भी ईश्वर में स्थिर हो जाएंगे।

किसने देखे हैं सैंकड़ों हजारों साल के मनुष्य?

भारतीय जनमानस अनेक तपस्वियों की सैंकड़ों- हजारों वर्षों की आयु में विश्वास करता है किंतु बहुत कम लोगों ने इस बात का दावा किया है कि उन्होंने सैकड़ों या हजारों वर्ष की आयु के आदमी को स्वयं अपनी आंखों से देखा है।

क्या देवताओं की भी मृत्यु होती है?

भारतीय वांगमय उन देवताओं के वर्णन से भरा पड़ा है जो हिमालय पर्वत पर रहते थे। वे हजारों साल की आयु वाले थे तथा अमर थे किंतु जब प्रलय हुई तब सम्पूर्ण देवलोक नष्ट हो गया। उस सृष्टि में से केवल मनु ही जीवित रहे जो देवताओं की संतान थे और उन्होंने मानव सृष्टि को जन्म दिया। पुराणों में आए इस वर्णन से निष्कर्ष निकलता है कि देवता भी अमर नहीं थे, उनकी भी मृत्यु हुई।

क्या कागभुशुण्डि की भी मृत्यु होती है?

रामचरितमानस में कागभुशुण्डि नामक एक अनोखे जीव का वर्णन आया है। यह कौए के रूप में रहकर ईश्वर की भक्ति में लीन रहता है। यह एक सृष्टि से दूसरी सृष्टि में तथा एक ब्रह्माण्ड से दूसरे ब्रह्माण्ड में विचरण करता है। जब प्रलय होती है तब भी उसका नाश नहीं होता। वह भी शरीर बदलता रहता है।

क्या लोमश ऋषि की भी मृत्यु होती है?

भारतीय पुराणों में कहा गया है कि जब एक सृष्टि समाप्त होती है तब लोमश ऋषि के शरीर का एक रोम टूटता है अर्थात् किसी एक सृष्टि में प्रलय होने पर भी लोमश ऋषि का विलोपन नहीं होता वे अगली सृष्टि में चले जाते हैं। इस पर भी किसी भी ग्रंथ ने यह कहीं नहीं लिखा है कि लोमश ऋषि अमर हैं। कुछ सृष्टियों या बहुत सी सृष्टियों के बाद एक समय ऐसा आएगा जब लोमश ऋषि की देह भी पूरी हो जाएगी।

क्या ब्रह्मा की भी मृत्यु होती है?

पुराणों के अनुसार ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता माना गया है। एक निश्चित समय के बाद ब्रह्मा अपनी बनाई सृष्टि को अपने भीतर ले लेता है जिसे प्रलय कहते हैं। इसके बाद ब्रह्मा नई सृष्टि का निर्माण करता है। यह क्रम चलता रहता है। एक निश्चित समय के बाद ब्रह्मा की भी मृत्यु होती है तथा उसके बाद नया ब्रह्मा आता है।

केवल ईश्वर ही है अमर!

जब पुराणों के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भी मृत्यु को प्राप्त होता है तो इससे समझा जा सकता है कि मृत्यु शाश्वत है, देवता भी मरते हैं, ब्रह्मा भी मरते हैं, केवल भगवान ही सदैव एक जैसे रहते हैं और उनका आदि एवं अंत दोनों नहीं है।

-मोहन लाल गुप्ता

क्या पुनर्जीवन संभव है?

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क्या पुनर्जीवन संभव है

क्या पुनर्जीवन संभव है? भौतिक विज्ञान पुनर्जीवन में विश्वास नहीं करता। जो मर गया, वह वापस जीवित नहीं होता। वैज्ञानिकों के अनुसार देह की धड़कन का बंद होकर कुछ समय बाद फिर से आरम्भ हो जाना पुनर्जीवन नहीं है। यह एक भौतिक या जैविक घटना है? विज्ञान के अनुसार देह के नष्ट हो जाने के बाद तो किसी भी तरह का पुनर्जीवन संभव नहीं है।

विज्ञान की अवधारणा से बिल्कुल उलट, हम विश्वास करते हैं कि मृत्यु हो जाने के कुछ समय बाद पुनः जीवित हो उठने की कुछ घटनायें यदा-कदा घटती रहती हैं। इसी प्रकार मृत्यु हो जाने के बाद किसी अन्य देह को धारण करके पिछले जन्म की घटनाओं की स्मृति शेष रहने के दावे भी किये जाते हैं। हमारा अनुभव बताता है कि इनमें से अधिकांश घटनायें सही होती हैं।

पहले वाली स्थिति का कारण अक्सर यह बताया जाता है कि यमदूत ले जाने तो किसी और को आये थे किंतु ले गये किसी और को। अतः गलती का पता चलते ही वे जीवात्मा को फिर से पुरानी देह में लौटा जाते हैं। यह अनुमान लगाना सहज ही है कि कभी-कभी ऐसा भी होता होगा कि जब तक यमदूतों को अपनी गलती का पता चले, मृतक के शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया जाये और जीवात्मा बिना देह का ही रह जाये।

दूसरी स्थिति में जीवात्मा स्वाभाविक अथवा अस्वाभाविक मृत्यु के बाद उसी क्षेत्र में कहीं जन्म ले लेता है तथा किन्हीं अज्ञात एवं अतिविशिष्ट परिस्थितियों में जीवात्मा को नयी देह प्राप्त होने पर भी उसे पुरानी देह की स्मृति बनी रहती है। देखने में आया है कि ऐसा प्रायः अस्वाभाविक मृत्यु के मामले में होता है।

विज्ञान के शब्दों में मृत्यु की परिभाषा चाहे जो हो किंतु यह निश्चित है कि विज्ञान मनुष्य की मृत्यु के बाद की कोई बात नहीं करता। विज्ञान की दृष्टि में देह मर जाती है और उसकी मृत्यु के कारण भी भौतिक हैं। विज्ञान के अनुसार देह बीमार होने, वृद्ध होेने अथवा दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के कारण मृत्यु को प्राप्त होती है।

आुधनिक विज्ञान की धारणा के विपरीत, भारतीय अध्यात्म, मृत्यु को केवल जीवात्मा का देहांतरण मानता है। जैसे मनुष्य भौतिक जीवन में एक घर छोड़कर दूसरे घर में चला जाता है, या पुराना वस्त्र त्यागकर नया वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही मृत्यु की स्थिति में जीवात्मा पुरानी देह को त्याग कर नयी देह में चला जाता है।

मृत्यु की इस परिभाषा से यह स्वतः स्पष्ट है कि जीवन, जीवात्मा तथा देह के सम्बन्ध से उत्पन्न होता है और इनके विलग होने पर मृत्यु जैसी घटना घटित होती है। इस परिभाषा से यह संभावना बनती है कि जीवात्मा और देह के विलग होने के बाद देह भले ही कार्य करना बंद कर दे किंतु जीवात्मा समाप्त नहीं होता। वह देह के बाद भी कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में बना रहता है।

राम चरित मानस में प्रसंग आता है कि बाली वध के बाद जब तारा विलाप करने लगती है तब भगवान श्रीराम उसे समझाते हैं कि यह पांच तत्वों से बनी हुई देह तो नश्वर है। इसके भीतर जो आत्मा रहती थी वह नाश को प्राप्त नहीं होती। तुम्हें किससे काम है, इस नाशवान देह से जो तुम्हारे सामने पड़ी हुई है या उस अनश्वर आत्मा से जो तुम्हें दिखायी नहीं देता!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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