क्या मृत्यु के बाद जीवन होता है? यदि होता है तो कैसा होता है? क्या मृत्यु के बाद के जीवन का मृत्यु के पहले के जीवन से कोई सम्बन्ध शेष रहता है? क्या जीवन एक ही तथा मृत्यु एवं जन्म उसमें दो पड़ावों की तरह हैं? विज्ञान न तो इन प्रश्नों के उत्तर देता है तथा न ही दर्शन एवं अध्यात्म की मान्यताओं को स्वीकार करता है।
जिस क्षण यह अनश्वर आत्मा अर्थात् जीवात्मा देह छोड़ देता है, उसी क्षण से मृत्यु के बाद की संभावनाएं आरंभ हो जाती हैं। भारतीय अध्यात्म और दर्शन देह त्याग के बाद के जीवन की भांति-भांति की संभावनाओं को व्यक्त करते हैं।
रामकथा में यह प्रसंग आता है कि जब भगवान शरभंग ऋषि के आश्रम पहुंचते हैं तो शरभंग ऋषि भगवान से कहते हैं कि मैं तो ब्रह्माजी के पास जा रहा था किंतु जब मैंने सुना कि आप आ रहे हैं तो मैं आपके दर्शनों के लिये रुक गया। इसके बाद शरभंग ऋषि योगानल से देह को भस्म कर देते हैं और जीवात्मा उसी समय तेज पुंज के रूप में बदल कर ऊर्ध्वगामी हो जाता है।
राम चरित मानस में यह प्रसंग भी आता है कि जब दशानन रावण ने जटायु को बुरी तरह घायल कर दिया और भगवान श्रीराम, सीताजी को खोजते हुए जटायु तक पहंुचे तब जटायु ने भगवान राम के अंक में देह त्याग किया। देह त्यागने के तुरंत पश्चात् महात्मा जटायु ने चार भुजा धारी विष्णु रूप में प्रकट होकर भगवान की स्तुति की।
जीवात्मा का कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में बने रहना ही मृत्यु के बाद का जीवन है। आदि काल से धरती के विभिन्न भागों में विकसित हुई सभ्यताओं की यह मान्यता रही है कि मृत्यु के बाद सब कुछ समाप्त नहीं हो जाता। किसी एक स्थान से जीवात्माएं आती हैं और फिर कुछ काल के लिये कहीं चली जाती हैं।
जीवात्मा की शांति
धरती से चली गयी जीवात्माओं के कल्याण की कामना से धरती के निवासी तर्पण, पिण्डदान और श्राद्ध जैसी धार्मिक क्रियाएँ करते हैं। महाभारत में भगवान वेदव्यासजी ने लिखा है कि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पाण्डवों ने राजा धृतराष्ट्र तथा अपने कुल के अन्य व्यक्तियों को साथ लेकर कौरव वंश के जो वीर युद्ध में हताहत हुए थे, उनका श्राद्ध किया। इसी प्रकार ऋषि वाल्मीकि लिखते हैं कि जब चित्रकूट में भगवान श्रीराम को अपने पिता के स्वर्गारोहण की सूचना मिली तो उन्होंने तीर्थ के जल से पिता का श्राद्ध किया।
अधिकांश मनुष्यों का विश्वास है कि मृत व्यक्तियों के नाम से धरती पर किया गया दान पुण्य उन जीवात्माओं को तब तक प्राप्त होता है जब तक कि उनका अंतिम रूप से मोक्ष न हो जाये, चाहे वे जीवात्माएं जिस किसी लोक में हों, जिस किसी अवस्था में हों।
राम चरित मानस में ही प्रसंग आता है कि जब भगवान राम ने दशानन रावण का वध कर दिया तब सारे देव गण भगवान की स्तुति के लिये आये, उनमें राजा दशरथ भी थे। अर्थात् देह त्याग के बाद भी दशरथजी की जीवात्मा किसी देवलोक में अपनी पुरानी स्मृति की अवस्था में ही बनी रही।
इस प्रकार हमारे धार्मिक ग्रंथों के सारे दृष्टांत देह त्याग के बाद के जीवन की विभिन्न प्रकार की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं।
शवों की सुरक्षा दुनिया भर की संस्कृतियों में अनादि काल से की जाती है। हिमालय पर्वत की रहस्यमय गुफाओं से लेकर मिस्र के पिरामिडों तक में हजारों साल पुराने शव सुरक्षित हैं।
भारतीय सभ्यता के अतिरिक्त भी, संसार में वर्तमान तथा अतीत में हो चुकी अनेकानेक सभ्यताएं मृत्यु के बाद के जीवन की कई तरह की संभावनाओं में विश्वास रखती आयी हैं। मिस्र वासियों द्वारा ममी बनाकर मृतक की देह को सुरक्षित रखने के विचार के पीछे यही एक धारणा छिपी हुई है कि हो न हो एक दिन आत्मा इस देह में वापस लौटे।
इसलिये वे न केवल समाज के प्रमुख व्यक्तियों की देह को ममी के रूप में सुरक्षित रखते थे, अपितु मृतक व्यक्तियों के शवों के साथ जीवनोपयोगी सामग्री भी रखते थे। ताकि यदि किसी दिन आत्मा इस देह में लौटे तो उसे अपनी आवश्यकता की वस्तुएं तत्काल प्राप्त हो सकें।
शवों की सुरक्षा करने के लिए मिस्रवासी, राजा अथवा राजपरिवार के सदस्यों की ममियों के ताबूतों के साथ तो जीवित दास दासियों को भी कब्र में गाढ़ देते थे।
इस्लाम का मानना है कि मृत्यु के बाद मनुष्य कब्र में सो जाते हैं। जब कयामत का दिन आता है तो सृष्टिकर्ता एक-एक मनुष्य को कब्र से उठाता है तथा उसके कर्माें का लेखा जोखा करता है और उन्हें उसी के अनुसार दण्ड अथवा पुरस्कार मिलता है।
ईसाइयों में तो मृत्यु के बाद के जीवन की संभावनाओं पर सर्वाधिक विश्वास किया जाता है। बहुत से पाश्चात्य देशों में धनी व्यक्तियों ने लाखों करोड़ों डॉलर ऐसी कम्पनियों को फीस के रूप में चुकाये हैं जो उन धनी व्यक्तियों की मृत्यु के बाद उनकी देह को रासायनिक पदार्थों में तब तक सुरक्षित रख सके, जब तक कि विज्ञान एक दिन मरे हुए व्यक्तियों को पुनजीर्वित करने की विद्या की खोज करके उन्हें भी फिर से जीवित न कर दे।
हाल ही में श्रीलंका में हुई पुरातत्व खोजों से यह तत्व सामने आया है कि किसी दुर्गम गुफा में रावण की देह को भी ममी बनाकर रखा हुआ है। हालांकि यह पुष्टि नहीं हो सकी है कि दुर्गम गुफा के भीतर रखे ताबूत मेें कोई शव या ममी है भी या नहीं! अथवा यदि है भी तो शव या ममी किस की है!
तिब्बत देश की सीमा में स्थित दुर्गम हिमालय क्षेत्र में कुछ ऐसी रहस्यमय गुफाएं मिली हैं जिनमें आज के स्त्री पुरुषों से लगभग डेढ़ गुना लम्बे स्त्री पुरुषों के हजारों साल पुराने शव रखे हुए हैं। ये शव देवताओं के बताये जाते हैं। ये शव किसी रहस्यमय लेप से सुरक्षित हैं क्योंकि वे ममी के रूप में नहीं हैं, शव के रूप में हैं। अनुमान यही होता है कि ये शव भी इसी आशा में सुरक्षित रखे गये हैं कि एक दिन ऐसा आयेगा जब ये शव जीवित हो उठेंगे।
संसार के अन्य हिस्सों से भी मनुष्य जाति द्वारा इस प्रकार से सुरक्षित रखे गये शव या ममी मिल सकते हैं किंतु अब तक जितने भी उदाहरण ऊपर दिये गये हैं ये केवल सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताएं हैं, इनमें से एक भी उदाहरण आज तक देखने मंे नहीं आया है कि कोई शव या ममी फिर से जीवित हुई हो किंतु विज्ञान के बल पर या किसी अन्य शक्ति के बल पर भविष्य में किसी शव या ममी को फिर से जीवित करना संभव हो जाये, इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
तिब्बत, श्रीलंका, भारत तथा मिश्र सहित दुनिया की अनेकानेक सभ्यताओं में मृतकों के कंकाल अथवा उनकी देह की ममियां सुरक्षित रखी गयी हैं। एशिया के अतिरिक्त यूरोप और अमरीका में आधुनिक काल में कुछ अति धनाढ्य व्यक्तियों ने अपने शरीर रासायनिक लेपों से सुरक्षित करवाये हैं ताकि जब भी विज्ञान मृत्यु पर विजय प्राप्त करने में सफल हो जाये तो उनके मृत शरीरों में भी फिर से प्राण फूंके जायें।
क्या आत्मा का कोई आकार होता है? क्या आत्मा का आकर मानव देह की लम्बाई-चौड़ाई और मोटाई आदि के अनुसार निर्धारित होता है? या फिर ईश्वर की तरह आत्मा भी पूर्ण रूप से निराकार है?
भारत के उत्तरांचल की पहाड़ियों से एक विशालाकाय कंकाल प्राप्त हुआ है। यह इतना विशाल है कि आज का आदमी तो इसकी खोपड़ी से भी छोटा है। कई व्यक्ति मिलकर भी इस कंकाल को हिला तक नहीं सकते। यहां तक कि इसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ढोने के लिये विशाल हवाई जहाज की आवश्यकता पड़ेगी। क्या इस प्रकार के विशाल कंकाल की देह में रहने वाली आत्मा का आकार भी बड़ा होता है?
जिस स्थान पर यह कंकाल मिला है, वहां के लोगों की मान्यता है कि यह महाभारत कालीन घटोत्कच का कंकाल है। घटोत्कच कर्ण के हाथों युद्ध के दौरान ही मारा गया था। उसकी मृत्यु पर पाण्डवों के परम हितैषी श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में ही हर्ष से नृत्य किया था क्योंकि घटोत्कच के मरने से कर्ण के पास उपलब्ध वह शक्ति नष्ट हो गयी थी जो उसने अर्जुन को मारने के लिये सुरक्षित रख छोड़ी थी।
यदि कर्ण उस शक्ति से घटोत्कच को नहीं मारता तो घटोत्चक अकेला ही कौरवों के लिये इतना भारी पड़ता कि इससे पहले कि कर्ण अर्जुन के प्राण ले, घटोत्कच ही कर्ण सहित कौरव पक्ष के समस्त लोगों का संहार कर डालता। महाभारत के वर्णन के अनुसार घटोत्कच इतना विशाल था कि उसकी आवाज से समुद्र, पर्वत और वनों के साथ सारी पृथ्वी डगमगाती थी और आकाश के साथ दिशाएं गूंजने लगती थीं। जब उसका शरीर पृथ्वी पर गिरा तो उसके विशाल शरीर के नीचे दब कर कौरवों की एक अक्षौहिणी सेना नष्ट हो गयी।
यह तो निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि उत्तरांचल में मिला कंकाल घटोत्कच का ही है। हो सकता है उसी का हो, किंतु जब तक आधुनिक मानव सभ्यता ने उत्तरांचल में मिले कंकाल को अपनी आंखों से देख नहीं लिया तब तक कोई विश्वास नहीं कर पाया था कि क्या कभी धरती पर इतने बड़े इंसान भी होते थे! तो क्या पूर्व के विशाल देह के आदमियों में और आज के छोटे शरीर वाले आदमियों की देह में निवास करने वाली आत्मा एक ही थी! या इन दोनों प्रकार के मानवों की देह में रहने वाली आत्मा का आकार अलग-अलग था?
या जिस प्रकार एक कोषीय जीवों, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों एवं मानवों में चेतना के स्तर के आधार पर उन्हें अलग-अलग कलाओं का जीव माना गया है, उसी प्रकार इन विशालाकाय देहधारी इंसानों में भी सामान्य मनुष्य से विलग किसी अन्य कला की शक्ति वाली आत्मा निवास करती थी!
यदि मृत्यु के बाद आत्माओं के पुनर्जन्म के सिद्धांत पर अडिग रहा जाये तो इन विशाल देह वाले इंसानों की आत्माएं कहां गयीं। क्या उन्होंने एक समय के बाद पुनर्जन्म लेना बंद कर दिया! या फिर उनका पुनर्जन्म भी सामान्य देह वाले इंसानों में होने लगा!
यहां हम यह स्पष्ट कर देना आवश्यक समझेंगे कि भारतीय अध्यात्म में चींटी से लेकर हाथी और मनुष्य तक में एक ही आत्मा का निवास माना गया है। आत्माएं अलग-अलग तरह की नहीं होतीं। कर्मफल के सिद्धांत के अनुसार वे अलग-अलग कर्मफलों के संस्कारों से संस्कारित होती हैं।
यद्यपि दर्शन और अध्यात्म मानव सभ्यता के इतिहास जितने ही पुराने हैं तथा आधुनिक विज्ञान की आयु अभी कुछ सौ वर्ष ही हुई है, तथापि विज्ञान ने जो भी उन्नति की है, उसके उपरांत भी आज तक दर्शन तथा विज्ञान के बीच चौड़ी खायी है। इस कारण एक दर्शन और अध्यात्म के बहुत से सिद्धांतों की पुष्टि आज भी विज्ञान के माध्यम से संभव नहीं है।
फिर भी जैसे-जैसे समय व्यतीत होता जायेगा, वैसे-वैसे दर्शन तथा विज्ञान परस्पर निकट आते जायेंगे। लेखक की मान्यता है कि दुनिया भर का सारा दर्शन उस विज्ञान से परास्त हो जायेगा किंतु आने वाले समय का विज्ञान भारतीय दर्शन और अध्यात्म की पुष्टि करेगा। तभी यह कह पाना संभव हो पायेगा कि मृत्यु के बाद का जीवन किस तरह का है तथा विज्ञान उसे किस भांति परिभाषित कर पाता है।
भारतीय दर्शन में मृत्यु के बाद के सम्बन्ध में की गयी समस्त चर्चाएं सत्य हैं। निःसंदेह मृत्यु के बाद जीवन है, उसके विविध रूप हैं तथा विज्ञान से परे हटकर आज भी समाज में उसकी झलक किसी न किसी रूप में यत्र-तत्र दिखायी देती रहती है।
जीवों के क्लोन में जीवात्मा कहां से आता है ? जब किसी जीव का क्लोन तैयार किया जाता है तो क्या उसमें निवास करने वाली जीवात्मा का भी क्लोन तैयार हो जाता है जो क्लोन से तैयार किए गए प्राणी में रहता है? या फिर क्लोन से तैयार किए गए शरीर के लिए ब्रह्माण्ड से नया जीवात्मा भेजा जाता है?
विज्ञान तेजी से क्लोनिंग, जीन कल्चर और ह्यूमन ग्राफ्टिंग की तरफ बढ़ रहा है। क्लोनिंग का अर्थ है ठीक एक जैसे दो शरीर तैयार करना। जीन कल्चर का अर्थ है किसी मृत व्यक्ति के शव के किसी हिस्से में सुरक्षित रखे हुए डीएनए से मृतक व्यक्ति के गुणों वाला व्यक्ति तैयार कर देना तथा ह्यूमन ग्राफ्टिंग का अर्थ है किसी जीवित व्यक्ति के शरीर के जीन लेकर उनसे ठीक वैसे ही एक और व्यक्ति तैयार कर देना जैसे कि पेड़ पौधों में किया जाता है।
भेड़ों, कुत्तों तथा चूहों आदि जीवों के क्लोन तैयार कर लिये गये हैं कुछ वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने अज्ञात स्थानों पर आदमी के क्लोन तैयार कर लिये हैं तथा वे जीवित भी हैं। चीन के एक वैज्ञानिक को ह्यूमन जीन ग्राफ्टिंग के लिए फांसी पर भी चढ़ाया जा चुका है।
यदि ये तथ्य सही हैं तो जीवात्मा के देह में आने और निरंतर देह बदलते रहने के सिद्धांत पर बड़ा प्रश्न चिह्न लग जायेगा। हमें हजारों वर्षों से चली आ रही इन मान्याताओं को नये सिरे से व्याख्यायित करना होगा। क्योंकि जीन विज्ञान की प्रगति का सिलसिला कहीं रुकने वाला नहीं। यदि ह्यूमन क्लोनिंग सफल हो गयी तो एक दिन वैज्ञानिक जो क्लोन तैयार करेंगे उसमें से वे मृत्यु के जीन निकाल फेंकेंगे। यदि ऐसा हुआ तो मनुष्य को धरती पर रहने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं बचेगा और मानव को किसी अन्य ग्रह पर जाकर निवास करना पड़ेगा।
क्लोन में जीवात्मा की अभी तक कोई व्याख्या प्रस्तुत नहीं की गई है, न विज्ञान की तरफ से और न अध्यात्म की तरफ से!
भारत में सरकारी एवं अर्द्ध-सरकारी सेवाओं में सेवानिवृत्ति की आयु 60 साल से लेकर 65 साल के बीच में है। देश में बेरोजगारी अपने चरम पर है। इसलिए सेवानिवृत्ति की आयु घटाकर 55 साल की जानी चाहिए।
भारत के राजनेता चौबीसों घण्टे केवल अपने वोट बैंक की परवाह करते हैं। उनकी सारी नीतियां अपने वोट बैंक को मजबूत बनाने पर केन्द्रित रहती हैं। भारत के लोकतंत्र की यह एक बड़ी भारी त्रासदी है। देश पीछे की ओर जा रहा है और सरकारें इस बात का प्रचार कर रही है कि देश आगे की ओर जा रहा है।
देश में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को आरक्षण, अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण, महिलाओं को आरक्षण, विकलांगों को आरक्षण, खिलाड़ियों को आरक्षण, पूर्व सैनिकों को आरक्षण, सांस्कृतिक कोटा, अल्पसंख्यकों को आरक्षण, रिश्वत लेकर की जा रही भर्ती, मृतक राजकर्मचारियों के आश्रितों की अनुकम्पा भर्ती, दुर्घटनाओं में मरने वाले लोगों के आश्रितों को नौकरी और सिफारिश से सरकारी नौकरियों में बढ़े चले आ रहे लोगों के कारण सरकारी दफ्तरों का दृश्य विचित्र हो गया है। सरकारी दफ्तर इतनी कम क्षमता के लोगों से भर गये हैं जिनसे जनता समय पर काम होने की आशा नहीं कर सकती। सरकारी कार्यालयों में दिन पर दिन घूसखोरी और कामचोरी का बोलबाला बढ़ता चला जा रहा है।
भारत के नेता इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि विभिन्न माध्यमों से भर्ती हो रहे कम प्रतिभा युक्त लोगों से सरकारी कार्यालायों का काम नहीं चलाया जा सकता। यही कारण है कि एक तरफ तो वे अपना वोट बैंक पक्का रखने के लिये कम प्रतिभा के लोगों को सरकारी नौकरियों में भरे जा रहे हैं और दूसरी ओर प्रतिभावान लोगों को सरकारी नौकरियों में बनाये रखने के लिये उनकी सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ा रहे हैं।
भारत सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों में सेवानिवृत्ति की आयु पहले किसी समय 55 साल थी जो बाद में बढ़कार 58 और फिर 60 कर दी गई। कुछ विभागों मंे तो यह 62 साल कर दी गई है और कुछ विभागों में सेवानिवृत्ति की आयु 62 या 65 साल करने के लिये कर्मचारी आंदोलन कर रह हैं।
बहुत से राजनेता सरकार में प्रतिभावान युवाओं को नौकरी पर लेने की बजाय सेवानिवृत्त होने वाले अपने चहेते कर्मचारियों एवं अधिकारियों को एक्सटेंशन देकर उन्हें कार्यालयों में बनाये रखने का प्रयास करते हैं। केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के विभिन्न कार्यालयों में 62 से 65 साल तक के बूढ़े लोग काम कर रहे हैं। कुछ लोगों को अनुबंध पर रखा गया है और कुछ लोगों को ठेकेदार के माध्यम से निश्चित वेतन पर नौकरियां दी गई हैं।
हैरानी होती है यह देखकर कि एक तरफ तो देश में बेरोजगारी का प्रतिशत बढ़ रहा है, मोटर साइकिलों पर बैठे बेरोजगार लड़के, सड़कों पर औरतों की चैनें छीन रहे हैं, और दूसरी ओर सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाई जा रही है। देश में नक्सलवालद बढ़ रहा है और सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने के लिये नित नये तरीके खोजे किये जा रहे हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा तो भारत में हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं। देश का लगभग 33 प्रतिशत भूभाग नक्सलवाद की चपेट में जा चुका है। युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी और हताशा उन्हें नक्सलवाद जैसे हिंसक रास्तों पर धकेल देगी।
देश की आबादी 135 करोड़ पहुंच चुकी है। भारत सरकार के अधिकृत आंकड़े देश में 22 प्रतिशत लोगों के गरीब होना स्वीकार करते हैं किंतु कुछ गैर सरकारी संगठनों के दबाव में भारत सरकार के योजना आयोग ने स्वीकार किया है कि देश में 38 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि देश के 10 करोड़ घरों में दोनों समय का चूल्हा नहीं जलता। करोड़ों नौजवानों को नौकरी नहीं है और सरकारें आरक्षण के नाम पर युवाओं को भ्रमित कर रही हैं।
ऐसे में क्या यह सही नहीं होगा कि सरकारी सेवाओं में कार्यरत लोगों की सेवानिवृत्ति की आयु पहले की तरह 55 साल की जाये! क्या यह प्राकृतिक न्याय नहीं होगा कि कम प्रतिभाओं वाले नौजवानों को सरकारी नौकरियों में भरने की प्रवृत्ति त्यागकर उन्हें प्रतिभावान बनाने की ओर ध्यान दिया जाये तथा पूरी तरह सक्षम बनाकर ही सरकारी नौकरियों में भर्ती किया जाये! अनुबंध पर कर्मचारी रखने की प्रवृत्ति बंद की जाये।
सरकारी नौकरियों में आये दिन वेतन बढ़ाने, हर दस साल में वेतन आयोग बैठाने और हर छः माह में महंगाई भत्ता बढ़ाने की बजाय, महंगाई पर अंकुश लगाने के प्रयास किये जायें। वस्तुओं की कीमतों को स्थिर रखा जाये। निजी क्षेत्र के नौजवानों को मिल रहे मोटे-मोटे पैकेजों को बंद करके देश की संस्कृति, परम्परा और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप तर्क संगत वेतन दिये जायें। उसके लिये कानून बनें।
आज के वैज्ञानिक युग में तकनीक का जिस तरह तेजी से विकास हो रहा है उसमें अधिक आयु के कर्मचारी के लिये दक्षता प्रदर्शन की अधिक गुंजाइश नहीं बचती। आज का पढ़ा-लिखा नौजवान अधिक आयु के कर्मचारियों की अपेक्षा अधिक क्षमता, ऊर्जा और कौशल के साथ कार्य करने में सक्षम है। उसे बेरोजगार रखकर, या अल्प वेतन पर अनुबंधों पर रखकर अर्द्ध-बेरोजगार बनाने की बजाय उसे समय पर नौकरी दी जाये तो देश का अधिक भला होगा। देश में अपराध घटेंगे। प्रतिभावान युवाओं की ऊर्जावान टीम देश के लोगों की अधिक सेवा कर सकेगी।
अतः सरकारी सेवाओं में सेवानिवृत्ति की आयु फिर से 55 साल की जाये। सेवानिवृत्त लोगों को अनुबंध पर रखने की बजाय, रिक्त पदों पर युवाओं की भर्ती की जाये। जिन सेवानिवृत्त कर्मचारियों को फिर से अनुबंध पर रखा गया है, उन्हें तुरंत हटाया जाये। सोचिये वह समाज कैसा होगा जिसमें 60 से 65 साल की आयु के दादा और नाना तो नौकरी करें और 22-25 साल के नौजवान बेरोजगार घूमें।
हिन्दू धर्म जिस तरह सवर्णों का धर्म है, उसी तरह दलितों का धर्म है, बहुत से राजनीतिक भेड़िए तथा धर्मान्तरण करने वाले भेड़िए हिन्दू धर्म को दलितों पर अत्याचार करने वाला धर्म बताकर उन्हें किसी अन्य मजहब, सम्प्रदाय या मत में ले जाने की कुचेष्टा करते हैं! हमें इन भेड़ियों के कुचक्रों को समझना होगा। हिन्दू धर्म में कमियां हो सकती हैं किंतु यह किसी भी प्राणी पर अत्याचार करने वाला धर्म नहीं है।
दलितों की राजनीति करके उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री के पद को सुशोभित करने वाली बहिन मायावती जीवन के 61 बसंत देख चुकी हैं। अब तक उन्होंने हिन्दू धर्म के भीतर बने रहकर वह सब प्राप्त किया है जो बिरलों को ही उपलब्ध होता है। अब वे हिन्दुओं को सुधरने की नसीहत देते हुए, हिन्दू धर्म छोड़ने की धमकी दे रही हैं। मायावती पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अत्यंत छोटे बादलपुर गांव के दलित परिवार में जन्मीं, जीवन भर अविवाहित रहीं, 1977 में शिक्षिका बनीं, 1984 में राजनीति में आईं तथा 1995, 1997, 2002 एवं 2007 में कुल चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनकर दलित राजनीति की पुरोधा बनीं।
वर्ष 2007-08 में उन्होंने 26 करोड़ रुपए से अधिक राशि का व्यक्तिगत आयकर चुकाया। इसके बाद उनकी आय तेजी से बढ़ने लगी और वे आयकर विभाग की उस सूचि में बीसवां स्थान पा गईं जिस सूची में शाहरूख खान तथा सचिन तेंदुलकर जैसे सर्वाधिक आयकर चुकाने वाले लोगों के नाम हैं। वे भारत की संसद के उच्च सदन अर्थात् राज्यसभा की सदस्य भी रही हैं।
वर्तमान समय में सम्पूर्ण देश में जैसा राजनीतिक परिदृश्य बना है, उसमें पूरा देश जाति-पांति (सवर्ण, दलित आदि), प्रांतीयता (उत्तर-दक्षिण एवं पूर्वी प्रांत आदि), भाषाई आग्रह (हिन्दी-तमिल आदि), साम्प्रदायिक उन्माद (हिन्दू-मुसलमान आदि) तथा राजनीतिक-वाद (पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद, माओवाद, नक्सलवाद आदि) तमाम संकुचनों को भूलकर शुद्ध राष्ट्रीयता की भावना पर चल पड़ा है जिसके कारण बहिन मायावती को आगे की डगर अत्यंत कठिन दिखाई दे रही है और वे हिन्दू धर्म छोड़ने की धमकी देकर एक बार फिर से दलित राजनीति को उद्वेलित करके अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास कर रही हैं।
मायावती की धमकी पर आगे विचार करने से पूर्व हमें हिन्दू धर्म की वास्तविक स्थिति पर किंचित् विचार कर लेना चाहिए। हिन्दू धर्म किसी जाति विशेष या विचार विशेष या सिद्धांत विशेष के कारागृह में कभी भी बंद नहीं रहा है। यह इतना उदार और इतना सर्वव्यापी है कि वह कभी किसी कारा में बंद हो भी नहीं सकता।
कहा जाता है कि हिन्दू धर्म तो एक ऐसी जीवन पद्धति है जिसका अनुसरण करने वाले लोग विभिन्न आध्यात्मिक मान्यताओं का स्वतंत्र रूप से पालन करते हैं। भारत का प्राचीन धर्म वैदिक धर्म था जिसमें से शैव, शाक्त एवं वैष्णव आदि मतों का प्राकट्य हुआ और ये मत ही सामूहिक रूप से हिन्दू धर्म कहलाते थे। वर्तमान में हिन्दू धर्म का जो स्वरूप दिखाई देता है उसका निर्धारण नौवीं से पंद्रहवीं शताब्दी की अवधि में रामानुजाचार्य, मावधवाचार्य, निम्बार्काचार्य, रामानंदाचार्य तथा वल्लभाचार्य आदि वैष्णव संतों ने किया।
उन्होंने जिन नवीन आध्यात्मिक सिद्धांतों एवं मतों की स्थापना की, उन मतों का सम्मिलित रूप ही आज का हिन्दू धर्म है। रामानंदाचार्य ने चौदहवीं शताब्दी में अपने जिन बारह प्रमुख शिष्यों का चुनाव किया, उनमें सभी जाति पांति के लोग थे- संत धन्ना जाति जाट से थे, कबीर जुलाहा जाति से थे, रैदास चर्मकार थे, पीपा क्षत्रिय थे जो गुरु के आदेश से दर्जी बन गए थे, सेन नाई थे, नरहर्यानंद काशी की कुलीन परम्परा के सुंस्कृत ब्राह्मण थे। रामानंद ने स्त्रियों को भी अपने प्रमुख शिष्यों में स्थान देकर स्त्री-और पुरुष के बीच के अध्यात्मिक अधिकारों की खाई को भी पाटने की घोषणा की।
रामानंद ने कहा- ‘सर्वे प्रपत्तेरधिकारिणः सदा। शक्ता अशक्ता अपित नित्यरंगिणः। अपेक्ष्यते तत्र कुलं बलं च नो न चापि काले न हि शुद्धता च।’ अर्थात्- भगवान के चरणों में अटूट अनुराग रखने वाले सभी लोग चाहे वे समर्थ हों या असमर्थ, भगवत् शरणागति के नित्य अधिकारी हैं। भगवत् शरणागति के लिए न तो श्रेष्ठ कुल की आवश्यकता है, न किसी प्रकार की शुद्धि ही अपेक्षित है। सब समय और शुचि-अशुचि सभी अवस्थाओं में जीव उनकी शरण ग्रहण कर सकता है।
रामानंद के समस्त शिष्य अपने समय के प्रसिद्ध संत हुए। इन सभी संतों ने मिलकर हिन्दू धर्म को नया आकार दिया, वही हिन्दू धर्म चौदहवीं-पंद्रहवीं सदी से लेकर आज तक चला आ रहा है। रामानंद के शिष्य कबीर ने घोषणा की- ‘साखत बामन मत मिलो, बैस्नो मिलो चण्डाल, अंक माल दे भेंटिये माना मिले गोपाल।’ अर्थात् ऐसे ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं है जो वामाचारी हो, यदि वैष्णव धर्म को मानने वाला सबसे छोटी जाति का मनुष्य मिले तो उससे ऐसे मिलिए जैसे कि स्वयं गोपाल मिल गए हों।
संत पीपा ने समस्त सांसारिक बंधनों को शिथिल करते हुए कहा- ‘पीपा पाप न कीजिए, अलगो रीजै आप, करणी जासी आप री कुण बेटो, कुण बाप।’
संत रैदास ने- ‘प्रभुजी तुम चंदन हम पानी’ कहकर मनुष्य मात्र को ईश्वर से एकाकार करने की घोषणा की।
उस युग के वैष्णव संतों ने एक मत से घोषणा की- ‘जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि भजै सो हरि का होई।’
उस युग के वैष्णव संतों की उदारता के कारण जाति, वर्ग, सम्प्रदाय एवं मत-मतांतरों की समस्त वर्जनाएं तोड़ दी गईं। इस कारण छोटी मानी जाने वाली जातियों के लोगों को बड़े संतों की पंक्ति में प्रतिष्ठा मिलने लगी। इस स्थिति को देखकर किसी कवि ने चुटकी लेते हुए कहा है- ‘जाट जुलाह जुरे दरजी, मरजी में रहै रैदास चमारौ, ऐते बड़े करुणा निधि को इन पाजिन ने, दरबार बिगारौ।’
एक अन्य कवि ने चुटकी लेते हुए कहा- ‘ब्रज रज दुर्लभ देवन कू, कछु जाटन कू कछु मेवन कू।’
भक्त शिरोमणि सूरदास ने भगवान श्रीकृष्ण के उदार चरित पर गोपियों के माध्यम से चुटकी लेते हुए कहा- ‘घर घर माखन चोरत डोलत, तिनके सखा तुम ऊधौ, सूर परेखो काकौ कीजे बाप कियो जिन दूजौ।’
रामानंद के एक शिष्य नरहर्यानंद काशी के प्रकाण्ड पण्डित थे। नरहर्यानंद के शिष्य गोस्वामी तुलसीदास हुए। उन्होंने अपने गुरुओं के काम को आगे बढ़ाते हुए रामचरित मानस में घोषणा की- ‘सबहि सुलभ सब दिन सब देसा, सेवत सादर समन कलेसा।’ अर्थात् रामचरित मानस नामक यह ग्रंथ सब लोगों के लिए, प्रत्येक दिन और प्रत्येक स्थान पर सुलभ है। इसका निष्ठा-पूर्वक सेवन करने से क्लेशों का शमन होता है।
तुलसी उस काल के सबसे बड़े जनकवि बन गए और उन्होंने धर्म की बची-खुची वर्जनाओं को तोड़ डाला। उन्होंने ‘सगुनहि अगुनहि नहीं कछु भेदा, गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।’ कहकर सुगणोपासकों और निर्गुणापासकों के बीच की दीवार गिरा दी।
उन्होंने- ‘सिव द्रोही मम दास कहावा, सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा। संकर बिमुख भगति चह मोरी, सो नारकी मूढ़ मति थोरी।’ कहकर वैष्णवों और शैवों के बीच की दीवार को ढहाया।
तुलसी बाबा ने ‘भगतहि ज्ञानही नहीं कछु भेदा, उभय हरहिं भव संभव खेदा।’ कहकर भक्ति-मार्गियों और ज्ञान-मार्गियों के बीच की दीवार गिराने की घोषणा कर दी।
इस प्रकार चौदहवीं से सोलहवीं सदी के बीच नवीन रूप धारण करने वाला हिन्दू धर्म एक ऐसा धर्म था जिसके कवि, लोक भाषा में जन साधारण को सम्बोधित कर रहे थे तथा समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए धर्म के दरवाजे खोलने में सफल रहे थे। वे सब एक स्वर में एक ही बात कह रहे थे- ईश्वर की सर्वव्यापक सत्ता को स्वीकार करो, सदाचरण पर स्थिर रहो और प्राणी मात्र में ईश्वरीय सत्ता के दर्शन करो। हिन्दू धर्म के इस नए संस्करण के सामने आने के बाद ‘दलित’ जैसा शब्द नितांत अप्रासंगिक हो जाता है। फिर भी कुछ दुराग्रही लोगों ने मंदिरों के दरवाजे बंद रखे। इन मंदिरों के दरवाजे भी देश की आजादी के बाद प्रत्येक मानव के लिए खोल दिए गए।
इसके पश्चात् तो दलित शब्द नितांत अप्रांगिक हो जाना चाहिए था किंतु आजाद भारत में वोटों की राजनीति के उद्देश्य से निर्धन जातियों के लिए दलित शब्द का प्रयोग किया गया जिसका लाभ कांग्रेस से लेकर, वामपंथयों एवं समाजवादियों के विभिन्न धड़ों ने उठाया और बहिन मायावती चार बार मुख्यमंत्री बनकर भी दलित बनी रहीं। वे भारत की सबसे बड़ी आयकर-प्रदाताओं में सम्मिलित होकर भी हिन्दू धर्म को मनुवादियों एवं दलितों में विभाजित करने का असाध्य परिश्रम करती रहीं।
राजनीति में सब दिन एक जैसे नहीं होते, मायावती के भी नहीं रहे। देश में आई हुई राष्ट्रीयता एवं हिन्दुत्व की लहर में अपने दुर्दिनों को देखकर मायावती हिन्दू धर्म छोड़ने की धमकी दे रही हैं ताकि दलित कहे जाने वाले निर्धन लोगों को देश की मूल धारा से अलग करके अपने परम्परागत वोट बैंक को पुनः अपनी ओर मोड़ा जा सके। उनके इस दुष्प्रयास को पूरी तरह नकारा जाना चाहिए। मायावती जिन्हें दलित कह रही हैं, वस्तुतः हिन्दू धर्म ही उस दलित वर्ग का मूल धर्म है।
यदि वे अपने राजनीतिक अनुयाइयों सहित बौद्ध बनने की धमकी देती हैं तो वे जान लें कि बौद्ध धर्म भी इसी हिन्दू धर्म का हिस्सा है। हजारों साल से हिन्दू धर्म भगवान बुद्ध को विष्णु के दशावतारों में से एक समझता और मानता आया है। इसलिए वे बौद्ध होकर भी हिन्दू धर्म में बनी रहेंगी। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि दलित इस बात को समझें कि हिन्दू धर्म उनका अपना धर्म है, वे इसे संभालें तथा मायावती के खतरनाक दुष्प्रयासों को एक स्वर से नकार दें।
निःसंदेह हिन्दू धर्म किसी की बपौती नहीं है, जो ब्राह्मणों, बनियों एवं ठाकुर का धर्म है वही दलितों का धर्म है। एक समाज का एक ही धर्म होता है, वह कभी भी ठाकुरों का धर्म या दलितों का धर्म आदि में नहीं बंट सकता।
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डॉ. मोहन लाल गुप्ता द्वारा लिखित उर्दू बीबी की मौत अमेजन पर मुद्रित पुस्तक के रूप में उपलब्ध है। पुस्तक का मूल्य 240 रुपए है किंतु पाठकों की सुविधा के लिए इसे केवल 120 रुपए में उपलब्ध करवाया जा रहा है। उर्दू बीबी की मौत अनुक्रमणिका पृष्ठ पर इस पुस्तक के अध्यायों के लिंक दिए गए हैं।
उर्दू बीबी की मौत – भूमिका पृष्ठ पर पुस्तक की विषय-वस्तु को स्पष्ट किया गया है। यह पुस्तक हिन्दू-उर्दू विवाद के ऐतिहासिक संघर्ष का रोचक विवरण उपलब्ध करवाती है।
काल के प्रत्येक खण्ड में तथा संसार के प्रत्येक भूभाग में दो प्रकार के झगड़े अस्तित्व में रहते हैं। पहली प्रकार के झगड़े भौतिक सुख देने वाले उपादानों के लिए होते हैं, यथा- धन, सम्पत्ति, भूमि, पशु, राज्य, स्त्री आदि। यदि संतों को छोड़ दें तो प्रत्येक सांसारिक व्यक्ति अधिक से अधिक भौतिक उपादानों पर अधिकार करना चाहता है। दूसरी प्रकार के झगड़े वैचारिक होते हैं, इनका भौतिक अस्तित्व नहीं होता अपितु वे प्रत्येक व्यक्ति के मन-मानस में रहते हैं।
भौतिक रूप से अस्तित्व में नहीं होने पर भी वैचारिक झगड़े अलग-अलग रूपों में सम्पूर्ण मानव समाज पर छाए रहते हैं, यथा- भाषा, रीती-रिवाज, परम्परा, पंथ, मत एवं मजहब आदि के झगड़े। कुछ लोग इन्हें धार्मिक झगड़े कहते हैं किंतु ये धार्मिक झगड़े नहीं हैं, धर्म तो मनुष्य मात्र का एक ही है अतः उसे लेकर झगड़ा नहीं हो सकता। मनुष्यों के पंथ, मत एवं मजहब अलग-अलग होते हैं, इस कारण इन्हें लेकर झगड़े होते हैं।
संसार का एक भी देश ऐसा नहीं है जहाँ एक से अधिक भाषाएं अस्तित्व में नहीं हैं या जहाँ एक से अधिक मजहबी विचार अस्तित्व में नहीं हैं। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी भाषा को अपनी मातृभाषा मानता है, क्योंकि यह भाषा उसे अपने परिवार से मिलती है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी मजहब या पंथ को अपना मजहब या पंथ मानता है क्योंकि इसका विचार भी उसे अपने परिवार से मिलता है।
पारिवारिक परम्परा से प्राप्त ये दोनों मानसिक सम्पत्तियां प्रत्येक मनुष्य को संसार भर में स्वयं को श्रेष्ठ समझने का एक स्वाभाविक विचार देती हैं। स्वयं के श्रेष्ठ होने तथा दूसरे के हेय होने की यह धारणा ही भाषा एवं मजहब के झगड़ों को खड़ा करती है। ये झगड़े प्रायः उस देश या काल के राजनीतिक झगड़े बन जाते हैं।
भारत में भी भाषा एवं मजहब को लेकर विगत कई शताब्दियों से झगड़े चल रहे हैं। काल के प्रवाह में ये झगड़े कभी-कभी एक-दूसरे पर इतनी बुरी तरह से छा जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कि झगड़ा भाषा का है या मजहब का, या राजनीति का!
उर्दू बीबी की मौत पुस्तक में ब्रिटिश शासन काल में आरम्भ हुए हिन्दी एवं उर्दू भाषा के झगड़े का रोचक इतिहास लिखा गया है। इस झगड़े को तब तक उसके वास्तविक रूप में नहीं समझा जा सकता जब तक कि पाठकों को भारत के इतिहास की उस पृष्ठभूमि की जानकारी न हो, जिसके कारण यह समस्या उत्पन्न हुई। इसलिए इस पुस्तक के प्रारम्भ में भारत के इतिहास की अतिसंक्षिप्त पृष्ठभूमि को भी लिखा गया है।
इस पुस्तक को पाठकों के समक्ष लाने का उद्देश्य भारतीयों को उनके गौरवमयी इतिहास से परिचित कराना है। आशा है यह इतिहास पाठकों के लिए रुचिकर सिद्ध होगा। सभी भाषाओं, पंथों एवं मजहबों के पाठक प्रत्येक प्रकार के दुराग्रहों से मुक्त होकर इसका आनंद लें। शुभम् अस्तु।
भारत में मुसलमानी शासन ई.1192 में आरम्भ हुआ और लगभग ईस्वी 1757 तक चला। इतने लम्बे शासन काल में भारत की मूल संस्कृति अंधकार में कहीं खो सी गई किंतु फिर भी हिन्दुओं ने इस संस्कृति का केन्द्रीय भाग किसी ने किसी प्रकार सुर्रिक्षत रख लिया।
डिसमिस दावा तोर है सुन उर्दू बदमास (1)
ई.1192 में अफगानिस्तान से आए तुर्कों ने दिल्ली, अजमेर, हांसी एवं सरहिंद आदि विशाल भूभाग के हिन्दू शासक पृथ्वीराज चौहान को मारकर दिल्ली, अजमेर, हांसी और सरहिंद के विशाल भूभाग में पहले मुसलमानी राज्य की स्थापना की। भारत के इतिहास में इसे ‘दिल्ली सल्तनत‘ कहा जाता है। भारत का मुसलमानी राज्य शीघ्र ही तुर्कों के हाथों से निकलकर उनके गुलामों के हाथों में चला गया। गुलामों को भी अपना राज्य बहुत ही कम समय में खिलजियों के हाथों खोना पड़ा।
खिलजियों को दिल्ली के तख्त पर बैठे हुए कुछ ही समय बीता होगा कि दिल्ली का मुसलमानी राज्य तुगलकों के हाथों में चला गया। तुगलक भी अधिक समय तक दिल्ली में नहीं टिक सके और दिल्ली सल्तनत सयैदों के हाथों में चली गई। सैयदों को मारकर लोदियों ने दिल्ली हथिया ली। भारत पर शासन करने वाले ये मुसलमान वस्तुतः अफगानिस्तान से आए छोटे-छोटे कबीले थे जिन्होंने भारत की राजनीतिक दुर्बलता का लाभ उठाते हुए अपने राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की।
ई.1526 में चगताई मुसलमानों अर्थात् मुगलों का भारत में आगमन हुआ। चंगेज खाँ के वंशज होने से उन्हें चंगेजी मुसलमान तथा तैमूर लंग के वशंज होने से उन्हें तैमूरी मुसलमान भी कहा जाता था। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के अफगान कबीलों का दमन करके उत्तर भारत में एक नए मुसलमानी राज्य की स्थापना की जिसे ‘मुगल सल्तनत’ कहा जाता है। मुगलों ने लगभग तीन सौ साल तक तथा उनके बीच अफगानिस्तान के सूरियों ने लगभग 20 साल तक भारत के विशाल भूभागों पर शासन किया।
शासन की बार-बार की अदला-बदली में भारत में हर बार कुछ न कुछ बदल जाता था किंतु एक चीज जो नहीं बदलती थी, वह थी शासन की मुसलमानी पद्धति। मुस्लिम शासन पद्धति ने हिन्दुओं को शरीयत के आधार पर जिम्मी ठहराया तथा हिन्दुओं को अपनी ही भूमि पर रहने देने के लिए उन पर जजिया लगाया।
मुस्लिम हाकिमों ने तीर्थयात्राओं पर जाने वाले हिन्दुओं से जुर्माना वसूल किया, उनकी फसलों पर पचास प्रतिशत से भी अधिक कर लगाया, तिलक लगाने वाले हिंदुओं को कोड़ों से मारा, उन्हें घोड़ों पर चढ़ने तथा तलवार बांधने से वंचित किया तथा हिन्दुओं के हजारों मंदिरों को तोड़कर उन पर मस्जिदें खड़ी कर दीं। राजनीतिक शक्ति से वंचित हिन्दू जाति के पास इन अत्याचारों को सहन करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था।
मुसलमान हाकिमों ने निर्धन हिन्दुओं को धन का लालच देकर, मध्यमवर्गीय हिन्दुओं को नौकरियों का लालच देकर तथा धनी हिन्दुओं को तलवार के बल पर मुसलमानी मजहब अपनाने पर मजबूर किया। मुसलमान हाकिम केवल उन्हीं हिन्दुओं को नौकरी देते थे जो मुसलमानी मजहब अपना लेते थे।
मुस्लिम हाकिम मुसलमानों से उनकी फसल पर 25 प्रतिशत कर लेते थे जबकि हिन्दुओं की फसलों पर 50 प्रतिशत से 75 प्रतिशत तक कर लिया जाता था। इन अत्याचारों से बचने के लिए भारत में करोड़ों लोग मुसलमान बन गए। फिर भी ऐसे हिन्दुओं की संख्या बहुत अधिक थी जिन्होंने मुस्लिम हाकिमों की सेनाओं के हर तरह के अत्याचार सहे किंतु वे मुसलमान नहीं बने।
जिन हिन्दुओं ने विदेशों से आए आक्रांताओं तथा विदेशों से आए मजहब को स्वीकार नहीं किया, मुस्लिम हाकिमों ने उनकी झौंपड़ियां जला दीं, उनके खेतों पर अधिकार कर लिया, उनकी औरतों को उठा लिया तथा उनके बच्चों को उनकी आंखों के सामने जीवित ही आग में झौंक दिया।
अपना सर्वस्व छिन जाने पर भी ये जिद्दी धर्मनिष्ठ हिन्दू, मुसलमान हाकिमों को जजिया देते रहे और उनके कोड़े खाते रहे किंतु येन-केन-प्रकरेण हिन्दू ही बने रहे। उस काल में आधे पेट रोटी खाने वाले एवं टांगों में लंगोटी लपेटने वाले करोड़ों हिन्दू किशनजी को चंदन चढ़ाते रहे और गंगाजी नहाते रहे। स्वाभाविक ही था कि ऐसी स्थिति में हिन्दुओं के मन में मुसलमान हाकिमों के विरुद्ध घनघोर घृणा का भाव होता।
जब हिन्दू और मुसलमान सैनिक सैंकड़ों साल तक युद्ध शिविरों में साथ.साथ रहे तो उनकी भाषाएं आपस में घुलने.मिलने लगीं। इस सम्मिश्रिण से उर्दू का जन्म हुआ।
जब दिल्ली स्थित तुर्कों की सल्तनत का भारत के अन्य क्षेत्रों में विकास हो रहा था, तब ई.1000 के लगभग दिल्ली एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाली बोलियों ने विदेशों से आई तुर्की भाषा के कुछ शब्द ग्रहण करके एक नवीन भाषा को जन्म देना आरम्भ किया। हिन्दुओं ने इसे अपनी भाषा बताया तथा इसे हिन्दी कहा। तुर्कों ने इसे हिंदुल, हिंदुवी, हिंदी, जबाने दिल्ली, जबाने हिंदुस्तान तथा हिंदुस्तानी आदि नामों से अभिहित किया। कुछ लोग इसे खड़ी बोली कहते थे।
जब बारहवीं शताब्दी ईस्वी के अंत में तुर्क भारत में आए तो वे अपने साथ तुर्की भाषा लेकर आए जिसे अरबी लिपि में लिखा जाता था। जब सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में मुगल भारत आए तो वे अपने साथ फारसी एवं चगताई भाषाओं को लेकर आए जिन्हें फारसी लिपि में लिखा जाता था।
अरबी और फारसी भाषाएं अलग-अलग हैं किंतु अरबी और फारसी लिपि में अधिक अंतर नहीं है। अरबी लिपि ही ईरान में आकर थोड़ा-बहुत रूप बदलकर फारसी कहलाने लगी। तुर्की, अरबी, फारसी एवं चगताई ये सारी भाषाएँ मध्य एशियाई देशों में व्यवहृत होती थीं और इन सबकी लिपियाँ मूलतः अरबी लिपि से बनी थीं।
तुर्कों, मंगोलों, अफगानियों एवं मुगलों की सेनाएं सैंकड़ों साल तक भारत में युद्ध के मैदानों में पड़ी रहीं। ये सैनिक अरबी, फारसी, तुर्की एवं चगताई आदि भाषाएं बोलते थे। पराजित हिन्दू राज्यों के सैनिक भी रोजगार पाने के लिए मुसलमानी सेनाओं में भर्ती होने लगे। ये सैनिक अपने-अपने प्रांतों की बोलियां बोलते थे यथा हिन्दी, मराठी, ब्रज, अवधी, डिंगल (राजस्थानी) इत्यादि।
जब हिन्दू और मुसलमान सैनिक सैंकड़ों साल तक युद्ध शिविरों में साथ-साथ रहे तो उनकी भाषाएं आपस में घुलने-मिलने लगीं। इस सम्मिश्रिण से एक नई बोली ने जन्म लिया जिसे उर्दू कहते थे। उर्दू शब्द का अर्थ होता है- भीड़। चूंकि इस बोली में बहुत सी भाषाओं के शब्दों की भीड़ थी, इसलिए इसे उर्दू कहा गया। विभिन्न भाषाओं के शब्दों की इसी भीड़ के कारण उर्दू को खिचड़ी बोली भी कहा जा सकता है।
इस खिचड़ी भाषा का सबसे पहला कवि अमीर खुसरो (ई.1253-1325) को कहा जा सकता है। उसने अरबी, फारसी, हिन्दी तथा दिल्ली की क्षेत्रीय बोलियों का उपयोग करके अपनी रचनाएं लिखीं। उर्दू बोली की अपनी कोई लिपि नहीं थी।
मुगलों के काल में उर्दू को फारसी लिपि में लिखा जाने लगा जो अरबी लिपि जैसी ही थी। इसे ‘रेख्ता’ भी कहा जाता था। यह एक अरबी-फारसी शब्द था जिसका उपयोग बहुत सी चीजों से मिलकर बनी नई चीज के लिए होता है। शासकों की भाषा होने के कारण तथा रोजगार देने में सक्षम होने के कारण भारत में धीरे-धीरे उर्दू बोलने वालों की संख्या बढ़ने लगी जिनमें मुसलमानों की संख्या अधिक थी।
इस काल में जिस प्रकार उर्दू का जन्म हो रहा था, उसी प्रकार ब्रज एवं अवध से लगते हुए क्षेत्रों में हिन्दी भाषा भी आकार ले रही थी जिसे खड़ी बोली कहा जाता था। मेरठ, दिल्ली तथा उसके आसपास का क्षेत्र खड़ी बोली का मुख्य केन्द्र था। इस भाषा को हिन्दू एवं मुसलमान दोनों ही व्यवहार में लाते थे।
एक समय ऐसा भी था जब हिन्दी और उर्दू भाषाएं इतनी निकट थीं कि उन्हें एक ही भाषा के दो रूप माना जाने लगा। खड़ी बोली हिन्दी में अरबी-फारसी के शब्दों की भरमार थी तथा उर्दू में भारत की देशज भाषाओं के शब्द भरे पड़े थे। इस कारण सैंकड़ों सालों तक भारत के हिन्दू और मुसलमान उर्दू एवं हिन्दी भाषाओं में व्यवहार करते रहे।
ई.1858 में जिस समय मुगलों को दिल्ली के लाल किले से निकाल कर फैंका गया, तब तक अंग्रेजों को भारत में शासन आरम्भ किए पूरे एक सौ साल बीत चुके थे। उस समय तक, मध्यकाल में भारत में बाहर से आए मुसलमानों के वंशज तुर्की, अरबी, फारसी एवं चगताई आदि भाषाएं भूल चुके थे एवं विगत सैंकड़ों साल से व्यवहार में लाए जाने के कारण उर्दू को ही अपनी मातृभाषा मानने लगे थे। इस काल में हिन्दू समुदाय का एक बड़ा हिस्सा भी उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानने लगा था और इस कारण उर्दू से परहेज करने लगा था।
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...