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दलितों का धर्म है, संभालिए इसे !

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दलितों का धर्म

हिन्दू धर्म जिस तरह सवर्णों का धर्म है, उसी तरह दलितों का धर्म है, बहुत से राजनीतिक भेड़िए तथा धर्मान्तरण करने वाले भेड़िए हिन्दू धर्म को दलितों पर अत्याचार करने वाला धर्म बताकर उन्हें किसी अन्य मजहब, सम्प्रदाय या मत में ले जाने की कुचेष्टा करते हैं! हमें इन भेड़ियों के कुचक्रों को समझना होगा। हिन्दू धर्म में कमियां हो सकती हैं किंतु यह किसी भी प्राणी पर अत्याचार करने वाला धर्म नहीं है।

दलितों की राजनीति करके उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री के पद को सुशोभित करने वाली बहिन मायावती जीवन के 61 बसंत देख चुकी हैं। अब तक उन्होंने हिन्दू धर्म के भीतर बने रहकर वह सब प्राप्त किया है जो बिरलों को ही उपलब्ध होता है। अब वे हिन्दुओं को सुधरने की नसीहत देते हुए, हिन्दू धर्म छोड़ने की धमकी दे रही हैं। मायावती पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अत्यंत छोटे बादलपुर गांव के दलित परिवार में जन्मीं, जीवन भर अविवाहित रहीं, 1977 में शिक्षिका बनीं, 1984 में राजनीति में आईं तथा 1995, 1997, 2002 एवं 2007 में कुल चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनकर दलित राजनीति की पुरोधा बनीं।

वर्ष 2007-08 में उन्होंने 26 करोड़ रुपए से अधिक राशि का व्यक्तिगत आयकर चुकाया। इसके बाद उनकी आय तेजी से बढ़ने लगी और वे आयकर विभाग की उस सूचि में बीसवां स्थान पा गईं जिस सूची में शाहरूख खान तथा सचिन तेंदुलकर जैसे सर्वाधिक आयकर चुकाने वाले लोगों के नाम हैं। वे भारत की संसद के उच्च सदन अर्थात् राज्यसभा की सदस्य भी रही हैं।

वर्तमान समय में सम्पूर्ण देश में जैसा राजनीतिक परिदृश्य बना है, उसमें पूरा देश जाति-पांति (सवर्ण, दलित आदि), प्रांतीयता (उत्तर-दक्षिण एवं पूर्वी प्रांत आदि), भाषाई आग्रह (हिन्दी-तमिल आदि), साम्प्रदायिक उन्माद (हिन्दू-मुसलमान आदि) तथा राजनीतिक-वाद (पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद, माओवाद, नक्सलवाद आदि) तमाम संकुचनों को भूलकर शुद्ध राष्ट्रीयता की भावना पर चल पड़ा है जिसके कारण बहिन मायावती को आगे की डगर अत्यंत कठिन दिखाई दे रही है और वे हिन्दू धर्म छोड़ने की धमकी देकर एक बार फिर से दलित राजनीति को उद्वेलित करके अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास कर रही हैं।

मायावती की धमकी पर आगे विचार करने से पूर्व हमें हिन्दू धर्म की वास्तविक स्थिति पर किंचित् विचार कर लेना चाहिए। हिन्दू धर्म किसी जाति विशेष या विचार विशेष या सिद्धांत विशेष के कारागृह में कभी भी बंद नहीं रहा है। यह इतना उदार और इतना सर्वव्यापी है कि वह कभी किसी कारा में बंद हो भी नहीं सकता।

कहा जाता है कि हिन्दू धर्म तो एक ऐसी जीवन पद्धति है जिसका अनुसरण करने वाले लोग विभिन्न आध्यात्मिक मान्यताओं का स्वतंत्र रूप से पालन करते हैं। भारत का प्राचीन धर्म वैदिक धर्म था जिसमें से शैव, शाक्त एवं वैष्णव आदि मतों का प्राकट्य हुआ और ये मत ही सामूहिक रूप से हिन्दू धर्म कहलाते थे। वर्तमान में हिन्दू धर्म का जो स्वरूप दिखाई देता है उसका निर्धारण नौवीं से पंद्रहवीं शताब्दी की अवधि में रामानुजाचार्य, मावधवाचार्य, निम्बार्काचार्य, रामानंदाचार्य तथा वल्लभाचार्य आदि वैष्णव संतों ने किया।

उन्होंने जिन नवीन आध्यात्मिक सिद्धांतों एवं मतों की स्थापना की, उन मतों का सम्मिलित रूप ही आज का हिन्दू धर्म है। रामानंदाचार्य ने चौदहवीं शताब्दी में अपने जिन बारह प्रमुख शिष्यों का चुनाव किया, उनमें सभी जाति पांति के लोग थे- संत धन्ना जाति जाट से थे, कबीर जुलाहा जाति से थे, रैदास चर्मकार थे, पीपा क्षत्रिय थे जो गुरु के आदेश से दर्जी बन गए थे, सेन नाई थे, नरहर्यानंद काशी की कुलीन परम्परा के सुंस्कृत ब्राह्मण थे। रामानंद ने स्त्रियों को भी अपने प्रमुख शिष्यों में स्थान देकर स्त्री-और पुरुष के बीच के अध्यात्मिक अधिकारों की खाई को भी पाटने की घोषणा की।

रामानंद ने कहा- ‘सर्वे प्रपत्तेरधिकारिणः सदा। शक्ता अशक्ता अपित नित्यरंगिणः। अपेक्ष्यते तत्र कुलं बलं च नो न चापि काले न हि शुद्धता च।’ अर्थात्- भगवान के चरणों में अटूट अनुराग रखने वाले सभी लोग चाहे वे समर्थ हों या असमर्थ, भगवत् शरणागति के नित्य अधिकारी हैं। भगवत् शरणागति के लिए न तो श्रेष्ठ कुल की आवश्यकता है, न किसी प्रकार की शुद्धि ही अपेक्षित है। सब समय और शुचि-अशुचि सभी अवस्थाओं में जीव उनकी शरण ग्रहण कर सकता है।

रामानंद के समस्त शिष्य अपने समय के प्रसिद्ध संत हुए। इन सभी संतों ने मिलकर हिन्दू धर्म को नया आकार दिया, वही हिन्दू धर्म चौदहवीं-पंद्रहवीं सदी से लेकर आज तक चला आ रहा है। रामानंद के शिष्य कबीर ने घोषणा की- ‘साखत बामन मत मिलो, बैस्नो मिलो चण्डाल, अंक माल दे भेंटिये माना मिले गोपाल।’ अर्थात् ऐसे ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं है जो वामाचारी हो, यदि वैष्णव धर्म को मानने वाला सबसे छोटी जाति का मनुष्य मिले तो उससे ऐसे मिलिए जैसे कि स्वयं गोपाल मिल गए हों।

संत पीपा ने समस्त सांसारिक बंधनों को शिथिल करते हुए कहा- ‘पीपा पाप न कीजिए, अलगो रीजै आप, करणी जासी आप री कुण बेटो, कुण बाप।’

संत रैदास ने- ‘प्रभुजी तुम चंदन हम पानी’ कहकर मनुष्य मात्र को ईश्वर से एकाकार करने की घोषणा की।

उस युग के वैष्णव संतों ने एक मत से घोषणा की- ‘जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि भजै सो हरि का होई।’

उस युग के वैष्णव संतों की उदारता के कारण जाति, वर्ग, सम्प्रदाय एवं मत-मतांतरों की समस्त वर्जनाएं तोड़ दी गईं। इस कारण छोटी मानी जाने वाली जातियों के लोगों को बड़े संतों की पंक्ति में प्रतिष्ठा मिलने लगी। इस स्थिति को देखकर किसी कवि ने चुटकी लेते हुए कहा है- ‘जाट जुलाह जुरे दरजी, मरजी में रहै रैदास चमारौ, ऐते बड़े करुणा निधि को इन पाजिन ने, दरबार बिगारौ।’

एक अन्य कवि ने चुटकी लेते हुए कहा- ‘ब्रज रज दुर्लभ देवन कू, कछु जाटन कू कछु मेवन कू।’

भक्त शिरोमणि सूरदास ने भगवान श्रीकृष्ण के उदार चरित पर गोपियों के माध्यम से चुटकी लेते हुए कहा- ‘घर घर माखन चोरत डोलत, तिनके सखा तुम ऊधौ, सूर परेखो काकौ कीजे बाप कियो जिन दूजौ।’

रामानंद के एक शिष्य नरहर्यानंद काशी के प्रकाण्ड पण्डित थे। नरहर्यानंद के शिष्य गोस्वामी तुलसीदास हुए। उन्होंने अपने गुरुओं के काम को आगे बढ़ाते हुए रामचरित मानस में घोषणा की- ‘सबहि सुलभ सब दिन सब देसा, सेवत सादर समन कलेसा।’ अर्थात् रामचरित मानस नामक यह ग्रंथ सब लोगों के लिए, प्रत्येक दिन और प्रत्येक स्थान पर सुलभ है। इसका निष्ठा-पूर्वक सेवन करने से क्लेशों का शमन होता है।

तुलसी उस काल के सबसे बड़े जनकवि बन गए और उन्होंने धर्म की बची-खुची वर्जनाओं को तोड़ डाला। उन्होंने ‘सगुनहि अगुनहि नहीं कछु भेदा, गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।’ कहकर सुगणोपासकों और निर्गुणापासकों के बीच की दीवार गिरा दी।

उन्होंने- ‘सिव द्रोही मम दास कहावा, सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा। संकर बिमुख भगति चह मोरी, सो नारकी मूढ़ मति थोरी।’ कहकर वैष्णवों और शैवों के बीच की दीवार को ढहाया।

तुलसी बाबा ने ‘भगतहि ज्ञानही नहीं कछु भेदा, उभय हरहिं भव संभव खेदा।’ कहकर भक्ति-मार्गियों और ज्ञान-मार्गियों के बीच की दीवार गिराने की घोषणा कर दी।

इस प्रकार चौदहवीं से सोलहवीं सदी के बीच नवीन रूप धारण करने वाला हिन्दू धर्म एक ऐसा धर्म था जिसके कवि, लोक भाषा में जन साधारण को सम्बोधित कर रहे थे तथा समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए धर्म के दरवाजे खोलने में सफल रहे थे। वे सब एक स्वर में एक ही बात कह रहे थे- ईश्वर की सर्वव्यापक सत्ता को स्वीकार करो, सदाचरण पर स्थिर रहो और प्राणी मात्र में ईश्वरीय सत्ता के दर्शन करो। हिन्दू धर्म के इस नए संस्करण के सामने आने के बाद ‘दलित’ जैसा शब्द नितांत अप्रासंगिक हो जाता है। फिर भी कुछ दुराग्रही लोगों ने मंदिरों के दरवाजे बंद रखे। इन मंदिरों के दरवाजे भी देश की आजादी के बाद प्रत्येक मानव के लिए खोल दिए गए।

इसके पश्चात् तो दलित शब्द नितांत अप्रांगिक हो जाना चाहिए था किंतु आजाद भारत में वोटों की राजनीति के उद्देश्य से निर्धन जातियों के लिए दलित शब्द का प्रयोग किया गया जिसका लाभ कांग्रेस से लेकर, वामपंथयों एवं समाजवादियों के विभिन्न धड़ों ने उठाया और बहिन मायावती चार बार मुख्यमंत्री बनकर भी दलित बनी रहीं। वे भारत की सबसे बड़ी आयकर-प्रदाताओं में सम्मिलित होकर भी हिन्दू धर्म को मनुवादियों एवं दलितों में विभाजित करने का असाध्य परिश्रम करती रहीं।

राजनीति में सब दिन एक जैसे नहीं होते, मायावती के भी नहीं रहे। देश में आई हुई राष्ट्रीयता एवं हिन्दुत्व की लहर में अपने दुर्दिनों को देखकर मायावती हिन्दू धर्म छोड़ने की धमकी दे रही हैं ताकि दलित कहे जाने वाले निर्धन लोगों को देश की मूल धारा से अलग करके अपने परम्परागत वोट बैंक को पुनः अपनी ओर मोड़ा जा सके। उनके इस दुष्प्रयास को पूरी तरह नकारा जाना चाहिए। मायावती जिन्हें दलित कह रही हैं, वस्तुतः हिन्दू धर्म ही उस दलित वर्ग का मूल धर्म है।

यदि वे अपने राजनीतिक अनुयाइयों सहित बौद्ध बनने की धमकी देती हैं तो वे जान लें कि बौद्ध धर्म भी इसी हिन्दू धर्म का हिस्सा है। हजारों साल से हिन्दू धर्म भगवान बुद्ध को विष्णु के दशावतारों में से एक समझता और मानता आया है। इसलिए वे बौद्ध होकर भी हिन्दू धर्म में बनी रहेंगी। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि दलित इस बात को समझें कि हिन्दू धर्म उनका अपना धर्म है, वे इसे संभालें तथा मायावती के खतरनाक दुष्प्रयासों को एक स्वर से नकार दें।

निःसंदेह हिन्दू धर्म किसी की बपौती नहीं है, जो ब्राह्मणों, बनियों एवं ठाकुर का धर्म है वही दलितों का धर्म है। एक समाज का एक ही धर्म होता है, वह कभी भी ठाकुरों का धर्म या दलितों का धर्म आदि में नहीं बंट सकता।

(28 मई 2017 को लिखा गया आलेख)

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

उर्दू बीबी की मौत अनुक्रमणिका

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उर्दू बीबी की मौत अनुक्रमणिका

उर्दू बीबी की मौत अनुक्रमणिका पृष्ठ पर इस पुस्तक के अध्यायों के लिंक दिए गए हैं। पाठक नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके वांछित अध्याय तक पहुंच सकते हैं।

1. पुस्तक की भूमिका

2. अनुक्रमणिका – सुन उर्दू बदमास   

3. भारत में मुसलमानी शासन

4. उर्दू का जन्म

5. तारणहार अंग्रेज

6. अट्ठारह सौ सत्तावन

7. सरकारी कार्यालयों एवं न्यायालयों में उर्दू

8. देवनागरी लिपि युक्त हिन्दी के लिए मैमोरेण्डम

9. रोवहु सब मिलि के आवहु भाई

10. उर्दू बीबी की मौत

11. हिन्दी-उर्दू की लड़ाई

12. डिसमिस दावा तोर है सुन उर्दू बदमास

13. ब्रिटिश न्यायालय में हिन्दी-उर्दू की लड़ाई

14. सोहन प्रसाद मुदर्रिस के समर्थन में आंदोलन

15. सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मुकदमे के लिए चन्दा

16. उचित वक्ता और सत्य वक्ता में लड़ाई

17. न्यायिक अभियोग का पटाक्षेप

18. हिन्दी एवं उर्दू को समान दर्जा

19. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद

डॉ. मोहन लाल गुप्ता द्वारा लिखित उर्दू बीबी की मौत अमेजन पर मुद्रित पुस्तक के रूप में उपलब्ध है। पुस्तक का मूल्य 240 रुपए है किंतु पाठकों की सुविधा के लिए इसे केवल 120 रुपए में उपलब्ध करवाया जा रहा है। उर्दू बीबी की मौत अनुक्रमणिका पृष्ठ पर इस पुस्तक के अध्यायों के लिंक दिए गए हैं।

उर्दू बीबी की मौत – भूमिका

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उर्दू बीबी की मौत - भूमिका

उर्दू बीबी की मौत – भूमिका पृष्ठ पर पुस्तक की विषय-वस्तु को स्पष्ट किया गया है। यह पुस्तक हिन्दू-उर्दू विवाद के ऐतिहासिक संघर्ष का रोचक विवरण उपलब्ध करवाती है।

काल के प्रत्येक खण्ड में तथा संसार के प्रत्येक भूभाग में दो प्रकार के झगड़े अस्तित्व में रहते हैं। पहली प्रकार के झगड़े भौतिक सुख देने वाले उपादानों के लिए होते हैं, यथा- धन, सम्पत्ति, भूमि, पशु, राज्य, स्त्री आदि। यदि संतों को छोड़ दें तो प्रत्येक सांसारिक व्यक्ति अधिक से अधिक भौतिक उपादानों पर अधिकार करना चाहता है। दूसरी प्रकार के झगड़े वैचारिक होते हैं, इनका भौतिक अस्तित्व नहीं होता अपितु वे प्रत्येक व्यक्ति के मन-मानस में रहते हैं।

भौतिक रूप से अस्तित्व में नहीं होने पर भी वैचारिक झगड़े अलग-अलग रूपों में सम्पूर्ण मानव समाज पर छाए रहते हैं, यथा- भाषा, रीती-रिवाज, परम्परा, पंथ, मत एवं मजहब आदि के झगड़े। कुछ लोग इन्हें धार्मिक झगड़े कहते हैं किंतु ये धार्मिक झगड़े नहीं हैं, धर्म तो मनुष्य मात्र का एक ही है अतः उसे लेकर झगड़ा नहीं हो सकता। मनुष्यों के पंथ, मत एवं मजहब अलग-अलग होते हैं, इस कारण इन्हें लेकर झगड़े होते हैं।

संसार का एक भी देश ऐसा नहीं है जहाँ एक से अधिक भाषाएं अस्तित्व में नहीं हैं या जहाँ एक से अधिक मजहबी विचार अस्तित्व में नहीं हैं। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी भाषा को अपनी मातृभाषा मानता है, क्योंकि यह भाषा उसे अपने परिवार से मिलती है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी मजहब या पंथ को अपना मजहब या पंथ मानता है क्योंकि इसका विचार भी उसे अपने परिवार से मिलता है।

पारिवारिक परम्परा से प्राप्त ये दोनों मानसिक सम्पत्तियां प्रत्येक मनुष्य को संसार भर में स्वयं को श्रेष्ठ समझने का एक स्वाभाविक विचार देती हैं। स्वयं के श्रेष्ठ होने तथा दूसरे के हेय होने की यह धारणा ही भाषा एवं मजहब के झगड़ों को खड़ा करती है। ये झगड़े प्रायः उस देश या काल के राजनीतिक झगड़े बन जाते हैं।

भारत में भी भाषा एवं मजहब को लेकर विगत कई शताब्दियों से झगड़े चल रहे हैं। काल के प्रवाह में ये झगड़े कभी-कभी एक-दूसरे पर इतनी बुरी तरह से छा जाते  हैं कि पता ही नहीं चलता कि झगड़ा भाषा का है या मजहब का, या राजनीति का!

उर्दू बीबी की मौत पुस्तक में ब्रिटिश शासन काल में आरम्भ हुए हिन्दी एवं उर्दू भाषा के झगड़े का रोचक इतिहास लिखा गया है। इस झगड़े को तब तक उसके वास्तविक रूप में नहीं समझा जा सकता जब तक कि पाठकों को भारत के इतिहास की उस पृष्ठभूमि की जानकारी न हो, जिसके कारण यह समस्या उत्पन्न हुई। इसलिए इस पुस्तक के प्रारम्भ में भारत के इतिहास की अतिसंक्षिप्त पृष्ठभूमि को भी लिखा गया है।

इस पुस्तक को पाठकों के समक्ष लाने का उद्देश्य भारतीयों को उनके गौरवमयी इतिहास से परिचित कराना है। आशा है यह इतिहास पाठकों के लिए रुचिकर सिद्ध होगा। सभी भाषाओं, पंथों एवं मजहबों के पाठक प्रत्येक प्रकार के दुराग्रहों से मुक्त होकर इसका आनंद लें। शुभम् अस्तु।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत में मुसलमानी शासन

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भारत में मुसलमानी शासन

भारत में मुसलमानी शासन ई.1192 में आरम्भ हुआ और लगभग ईस्वी 1757 तक चला। इतने लम्बे शासन काल में भारत की मूल संस्कृति अंधकार में कहीं खो सी गई किंतु फिर भी हिन्दुओं ने इस संस्कृति का केन्द्रीय भाग किसी ने किसी प्रकार सुर्रिक्षत रख लिया।

डिसमिस दावा तोर है सुन उर्दू बदमास (1)

ई.1192 में अफगानिस्तान से आए तुर्कों ने दिल्ली, अजमेर, हांसी एवं सरहिंद आदि विशाल भूभाग के हिन्दू शासक पृथ्वीराज चौहान को मारकर दिल्ली, अजमेर, हांसी और सरहिंद के विशाल भूभाग में पहले मुसलमानी राज्य की स्थापना की। भारत के इतिहास में इसे ‘दिल्ली सल्तनत‘ कहा जाता है। भारत का मुसलमानी राज्य शीघ्र ही तुर्कों के हाथों से निकलकर उनके गुलामों के हाथों में चला गया। गुलामों को भी अपना राज्य बहुत ही कम समय में खिलजियों के हाथों खोना पड़ा।

खिलजियों को दिल्ली के तख्त पर बैठे हुए कुछ ही समय बीता होगा कि दिल्ली का मुसलमानी राज्य तुगलकों के हाथों में चला गया। तुगलक भी अधिक समय तक दिल्ली में नहीं टिक सके और दिल्ली सल्तनत सयैदों के हाथों में चली गई। सैयदों को मारकर लोदियों ने दिल्ली हथिया ली। भारत पर शासन करने वाले ये मुसलमान वस्तुतः अफगानिस्तान से आए छोटे-छोटे कबीले थे जिन्होंने भारत की राजनीतिक दुर्बलता का लाभ उठाते हुए अपने राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की।

ई.1526 में चगताई मुसलमानों अर्थात् मुगलों का भारत में आगमन हुआ। चंगेज खाँ के वंशज होने से उन्हें चंगेजी मुसलमान तथा तैमूर लंग के वशंज होने से उन्हें तैमूरी मुसलमान भी कहा जाता था। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के अफगान कबीलों का दमन करके उत्तर भारत में एक नए मुसलमानी राज्य की स्थापना की जिसे ‘मुगल सल्तनत’ कहा जाता है। मुगलों ने लगभग तीन सौ साल तक तथा उनके बीच अफगानिस्तान के सूरियों ने लगभग 20 साल तक भारत के विशाल भूभागों पर शासन किया।

शासन की बार-बार की अदला-बदली में भारत में हर बार कुछ न कुछ बदल जाता था किंतु एक चीज जो नहीं बदलती थी, वह थी शासन की मुसलमानी पद्धति। मुस्लिम शासन पद्धति ने हिन्दुओं को शरीयत के आधार पर जिम्मी ठहराया तथा हिन्दुओं को अपनी ही भूमि पर रहने देने के लिए उन पर जजिया लगाया।

मुस्लिम हाकिमों ने तीर्थयात्राओं पर जाने वाले हिन्दुओं से जुर्माना वसूल किया, उनकी फसलों पर पचास प्रतिशत से भी अधिक कर लगाया, तिलक लगाने वाले हिंदुओं को कोड़ों से मारा, उन्हें घोड़ों पर चढ़ने तथा तलवार बांधने से वंचित किया तथा हिन्दुओं के हजारों मंदिरों को तोड़कर उन पर मस्जिदें खड़ी कर दीं। राजनीतिक शक्ति से वंचित हिन्दू जाति के पास इन अत्याचारों को सहन करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था।

मुसलमान हाकिमों ने निर्धन हिन्दुओं को धन का लालच देकर, मध्यमवर्गीय हिन्दुओं को नौकरियों का लालच देकर तथा धनी हिन्दुओं को तलवार के बल पर मुसलमानी मजहब अपनाने पर मजबूर किया। मुसलमान हाकिम केवल उन्हीं हिन्दुओं को नौकरी देते थे जो मुसलमानी मजहब अपना लेते थे।

मुस्लिम हाकिम मुसलमानों से उनकी फसल पर 25 प्रतिशत कर लेते थे जबकि हिन्दुओं की फसलों पर 50 प्रतिशत से 75 प्रतिशत तक कर लिया जाता था। इन अत्याचारों से बचने के लिए भारत में करोड़ों लोग मुसलमान बन गए। फिर भी ऐसे हिन्दुओं की संख्या बहुत अधिक थी जिन्होंने मुस्लिम हाकिमों की सेनाओं के हर तरह के अत्याचार सहे किंतु वे मुसलमान नहीं बने।

जिन हिन्दुओं ने विदेशों से आए आक्रांताओं तथा विदेशों से आए मजहब को स्वीकार नहीं किया, मुस्लिम हाकिमों ने उनकी झौंपड़ियां जला दीं, उनके खेतों पर अधिकार कर लिया, उनकी औरतों को उठा लिया तथा उनके बच्चों को उनकी आंखों के सामने जीवित ही आग में झौंक दिया।

अपना सर्वस्व छिन जाने पर भी ये जिद्दी धर्मनिष्ठ हिन्दू, मुसलमान हाकिमों को जजिया देते रहे और उनके कोड़े खाते रहे किंतु येन-केन-प्रकरेण हिन्दू ही बने रहे। उस काल में आधे पेट रोटी खाने वाले एवं टांगों में लंगोटी लपेटने वाले करोड़ों हिन्दू किशनजी को चंदन चढ़ाते रहे और गंगाजी नहाते रहे। स्वाभाविक ही था कि ऐसी स्थिति में हिन्दुओं के मन में मुसलमान हाकिमों के विरुद्ध घनघोर घृणा का भाव होता।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

उर्दू का जन्म

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उर्दू का जन्म

जब हिन्दू और मुसलमान सैनिक सैंकड़ों साल तक युद्ध शिविरों में साथ.साथ रहे तो उनकी भाषाएं आपस में घुलने.मिलने लगीं। इस सम्मिश्रिण से उर्दू का जन्म हुआ।

जब दिल्ली स्थित तुर्कों की सल्तनत का भारत के अन्य क्षेत्रों में विकास हो रहा था, तब ई.1000 के लगभग दिल्ली एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाली बोलियों ने विदेशों से आई तुर्की भाषा के कुछ शब्द ग्रहण करके एक नवीन भाषा को जन्म देना आरम्भ किया। हिन्दुओं ने इसे अपनी भाषा बताया तथा इसे हिन्दी कहा। तुर्कों ने इसे हिंदुल, हिंदुवी, हिंदी, जबाने दिल्ली, जबाने हिंदुस्तान तथा हिंदुस्तानी आदि नामों से अभिहित किया। कुछ लोग इसे खड़ी बोली कहते थे।

जब बारहवीं शताब्दी ईस्वी के अंत में तुर्क भारत में आए तो वे अपने साथ तुर्की भाषा लेकर आए जिसे अरबी लिपि में लिखा जाता था। जब सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में मुगल भारत आए तो वे अपने साथ फारसी एवं चगताई भाषाओं को लेकर आए जिन्हें फारसी लिपि में लिखा जाता था।

अरबी और फारसी भाषाएं अलग-अलग हैं किंतु अरबी और फारसी लिपि में अधिक अंतर नहीं है। अरबी लिपि ही ईरान में आकर थोड़ा-बहुत रूप बदलकर फारसी कहलाने लगी। तुर्की, अरबी, फारसी एवं चगताई ये सारी भाषाएँ मध्य एशियाई देशों में व्यवहृत होती थीं और इन सबकी लिपियाँ मूलतः अरबी लिपि से बनी थीं।

तुर्कों, मंगोलों, अफगानियों एवं मुगलों की सेनाएं सैंकड़ों साल तक भारत में युद्ध के मैदानों में पड़ी रहीं। ये सैनिक अरबी, फारसी, तुर्की एवं चगताई आदि भाषाएं बोलते थे। पराजित हिन्दू राज्यों के सैनिक भी रोजगार पाने के लिए मुसलमानी सेनाओं में भर्ती होने लगे। ये सैनिक अपने-अपने प्रांतों की बोलियां बोलते थे यथा हिन्दी, मराठी, ब्रज, अवधी, डिंगल (राजस्थानी) इत्यादि।

जब हिन्दू और मुसलमान सैनिक सैंकड़ों साल तक युद्ध शिविरों में साथ-साथ रहे तो उनकी भाषाएं आपस में घुलने-मिलने लगीं। इस सम्मिश्रिण से एक नई बोली ने जन्म लिया जिसे उर्दू कहते थे। उर्दू शब्द का अर्थ होता है- भीड़। चूंकि इस बोली में बहुत सी भाषाओं के शब्दों की भीड़ थी, इसलिए इसे उर्दू कहा गया। विभिन्न भाषाओं के शब्दों की इसी भीड़ के कारण उर्दू को खिचड़ी बोली भी कहा जा सकता है।

इस खिचड़ी भाषा का सबसे पहला कवि अमीर खुसरो (ई.1253-1325) को कहा जा सकता है। उसने अरबी, फारसी, हिन्दी तथा दिल्ली की क्षेत्रीय बोलियों का उपयोग करके अपनी रचनाएं लिखीं। उर्दू बोली की अपनी कोई लिपि नहीं थी।

मुगलों के काल में उर्दू को फारसी लिपि में लिखा जाने लगा जो अरबी लिपि जैसी ही थी। इसे ‘रेख्ता’ भी कहा जाता था। यह एक अरबी-फारसी शब्द था जिसका उपयोग बहुत सी चीजों से मिलकर बनी नई चीज के लिए होता है। शासकों की भाषा होने के कारण तथा रोजगार देने में सक्षम होने के कारण भारत में धीरे-धीरे उर्दू बोलने वालों की संख्या बढ़ने लगी जिनमें मुसलमानों की संख्या अधिक थी।

इस काल में जिस प्रकार उर्दू का जन्म हो रहा था, उसी प्रकार ब्रज एवं अवध से लगते हुए क्षेत्रों में हिन्दी भाषा भी आकार ले रही थी जिसे खड़ी बोली कहा जाता था। मेरठ, दिल्ली तथा उसके आसपास का क्षेत्र खड़ी बोली का मुख्य केन्द्र था। इस भाषा को हिन्दू एवं मुसलमान दोनों ही व्यवहार में लाते थे।

एक समय ऐसा भी था जब हिन्दी और उर्दू भाषाएं इतनी निकट थीं कि उन्हें एक ही भाषा के दो रूप माना जाने लगा। खड़ी बोली हिन्दी में अरबी-फारसी के शब्दों की भरमार थी तथा उर्दू में भारत की देशज भाषाओं के शब्द भरे पड़े थे। इस कारण सैंकड़ों सालों तक भारत के हिन्दू और मुसलमान उर्दू एवं हिन्दी भाषाओं में व्यवहार करते रहे।

ई.1858 में जिस समय मुगलों को दिल्ली के लाल किले से निकाल कर फैंका गया, तब तक अंग्रेजों को भारत में शासन आरम्भ किए पूरे एक सौ साल बीत चुके थे। उस समय तक, मध्यकाल में भारत में बाहर से आए मुसलमानों के वंशज तुर्की, अरबी, फारसी एवं चगताई आदि भाषाएं भूल चुके थे एवं विगत सैंकड़ों साल से व्यवहार में लाए जाने के कारण उर्दू को ही अपनी मातृभाषा मानने लगे थे। इस काल में हिन्दू समुदाय का एक बड़ा हिस्सा भी उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानने लगा था और इस कारण उर्दू से परहेज करने लगा था।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तारणहार अंग्रेज

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तारणहार अंग्रेज

जब भारत मुसलमानी शासन से संत्रस्त था तब अंग्रेजों ने बंगाल के रास्ते से भारत पर अधिकार करने लगे। उन्होंने मुगल प्रांतपतियों से बंगाल एवं अवध छीन लिए। हिन्दुओं के लिए अंग्रेज तारणहार बनकर आए तथा ईस्वी 1765 में उन्होंने मुगल बादशाह से दिल्ली का शासन छीनकर उसे पेंशन पर बैठा दिया।

जब ई.1757 में जब प्लासी के युद्ध से अंग्रेजों ने भारत में पैर फैलाने आरम्भ किए तो हिन्दुओं को मुसलमानी शासन से अपनी मुक्ति का मार्ग दिखाई देने लगा। इस काल में दिल्ली से लेकर बंगाल तक मुसलमानी सत्ता जर्जर हो चली थी और भारत में अनेक छोटे-छोटे हिन्दू और मुसलमानी राज्य स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में आ चुके थे।

अगले एक सौ साल में अर्थात् ई.1757 से 1858 तक अंग्रेजों ने मुसलमानों से बंगाल, अवध, इलाहाबाद और दिल्ली आदि के छोटे-छोटे स्वतंत्र और अर्द्धस्वतंत्र राज्य छीन लिए तथा वहाँ के नवाबों, बेगमों, बादशाहों एवं शहजादों को पेंशनें देकर शासन से अलग कर दिया। इतना ही नहीं अंग्रेजों ने हिन्दुओं एवं ईसाइयों पर कहर ढा रहे टीपू सुल्तान को मारकर मैसूर के मुसलमानी राज्य का भी अंत कर दिया और हैदराबाद के शिया मुसलमानों का राज्य अपने संरक्षण में लेकर वहाँ भी अपनी सेनाएं रख दीं।

अंग्रेजों के राज्य में हिन्दुओं को अपना धर्म मानने, अपने तीज-त्यौहार मनाने, तीर्थों पर जाने एवं अपने रीति-रिवाजों का सार्वजनिक प्रदर्शन करने की छूट मिल गई। अब हिन्दू ‘जिम्मी’ नहीं रहे थे इसलिए हिन्दुओं पर से जजिया समाप्त कर दिया गया तथा हिन्दुओं एवं मुसलमानों से एक ही प्रकार का कर लेने की व्यवस्था आरम्भ की गई।

तारणहार अंग्रेज हिन्दुओं को वे सब अधिकार लौटा रहे थे जो मुसलमानों ने छीन रखे थे। अब हिन्दुओं को घोड़े पर चढ़ने, मंदिर में जाकर घण्टे एवं झांझ बजाने, होली-दीपावली पर उत्साह का प्रदर्शन करने, अपने धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने आदि की छूट मिल गई। अब किसी अपराध के लिए मुसलमान को भी वही सजा मिलती थी जो किसी हिन्दू अपराधी को मिलती थी।

इन सब कारणों से स्वाभाविक ही था कि भारत के मुसलमान अंग्रेजों से शत्रुता मानते और उनके नष्ट होने की कामना करते जबकि दूसरी ओर हिन्दू जाति अंग्रेजों को अपना तारणहार मानती और उनके राज्य को दृढ़ बनाने के लिए प्रयास करती। मुसलमानों एवं हिन्दुओं द्वारा अंग्रेजों के साथ किए जा रहे व्यवहार के इस अंतर के कारण अंग्रेज अधिकारी ईस्ट इण्डिया कम्पनी में हिन्दू कर्मचारियों को काम पर रखना पसंद करते थे तथा मुसलमानों की बजाय हिन्दुओं पर अधिक विश्वास करते थे।

इस कारण हिन्दुओं को पहले तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी में तथा बाद में कम्पनी सरकार में हजारों की संख्या में नौकरियां मिल गईं जबकि मुसलमान लड़के नौकरियों से वंचित रह जाने के कारण आर्थिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ गए। चूंकि अंग्रेजों के शासन में हिन्दुओं को मुसलमानी शासन से मुक्ति मिली थी इसलिए उस काल के हिन्दुओं के मन में अंग्रेज जाति के प्रति गहरा श्रद्धा भाव था।

उर्दू को राजभाषा एवं न्यायालय की भाषा का दर्जा

ई.1837 में, ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपने अधीन विभिन्न प्रान्तों में फारसी लिपि में लिखी जाने वाली फारसी भाषा के स्थान पर फारसी लिपि में लिखी जाने वाली उर्दू भाषा को आधिकारिक (राजभाषा) और न्यायालयी भाषा के रूप में मान्यता प्रदानी की।

उस काल में हिन्दी और उर्दू में अधिक अंतर नहीं था इसलिए कम्पनी सरकार में नौकर बहुत से हिन्दू युवक फारसी लिपि में हिन्दी भाषा लिखने लगे और अपनी नौकरियां बचाए रखने में सफल रहे।

इस समय कम्पनी सरकार के कार्यालियों में फारसी लिपि में जो उर्दू काम में ली जा रही थी, वस्तुतः वह फारसी भाषा में लिखी जाने वाली हिन्दी ही थी क्योंकि इस काल में हिन्दी का मानक स्वरूप सामने नहीं आया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अट्ठारह सौ सत्तावन

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अट्ठारह सौ सत्तावन

अट्ठारह सौ सत्तावन का सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम निःसंदेह भारत माता की आत्मा की पुकार थी जिसने देश वासियों को झकझोर कर रख दिया। यदि इसे अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध चलने वाली लम्बी लड़ाई का प्रथम सफल सोपान कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

अट्ठारह सौ सत्तावन

ई.1757 से हिन्दुओं के मन में अंग्रेजों के प्रति आदर का भाव जो उदित हुआ था, वह आदर भाव सौ सालों तक भी नहीं टिक पाया। इस आदर-भाव को तब गहरी चोट लगी, जब ई.1852 में पेशवा बाजीराव (द्वितीय) की मृत्यु हो जाने पर अंग्रेजी सरकार ने मराठा पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब को पेंशन देने से मना कर दिया, झांसी के हिन्दू राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उसके दत्तक पुत्र को स्वीकार करने से मना करके झांसी पर अधिकार कर लिया तथा छत्रपति शिवाजी के वंशज अप्पा साहब की मृत्यु होने पर उसके दत्तक पुत्र से सतारा का छोटा सा हिन्दू राज्य भी छीन लिया।

ऐसी बहुत सी बातें हुईं जिनके कारण भारत के हिन्दुओं में अंग्रेज जाति के विरुद्ध घनघोर वातावरण बन गया।

इन सब बातों से असंतुष्ट होकर ई.1856 में नाना साहब ने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति की योजना बनाई। इससे पहले कि नाना साहब की योजना आरम्भ हो पाती, 29 मार्च 1857 को बैरकपुर की सैनिक छावनी में गाय की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से छीलने के प्रश्न पर एक सशस्त्र सैनिक क्रांति अचानक ही फूट पड़ी। अतः नाना साहब की क्रांति योजना को इस सैनिक क्रांति के साथ जोड़ दिया गया। बाद में बड़े राजाओं से असंतुष्ट छोटे-बड़े जागीरदार भी इस क्रांति के साथ जुड़ गए।

भारत के इतिहास में इसे ‘अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति’ कहते हैं। अंग्रेजों ने इसे ‘गदर’ एवं ‘बगावत’ कहा। इस क्रांति के पहले ही दिन बैरकपुर में मंगल पाण्डे आदि कुछ हिन्दू सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों की हत्याएं कर दीं। इसके बाद मेरठ, नसीराबाद, लखनऊ, कानपुर, बिठूर, आउवा आदि अनेक स्थानों पर हिन्दू सैनिकों एवं अंग्रेज सेनाधिकारियों के बीच गोलियां चलीं तथा अनेक अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवारों के कुछ सदस्य मारे गए।

अपदस्थ पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब, अपदस्थ झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, मराठा सेनापति तात्यां टोपे, जगदीशपुर (बिहार में स्थित) के जागीरदार कुंवरसिंह, आउवा (राजपूताना में स्थित) के ठाकुर कुशालसिंह तथा राजपूताना के रजवाड़ों में नियुक्त अंग्रेजी सेनाओं के हजारों हिन्दू सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों को मारा। अंग्रेजों ने क्रांति के सभी प्रमुख नेताओं को लगभग ढाई साल तक चले सशस्त्र संघर्ष में या तो मार डाला, या उन्हें पकड़कर रहस्यमय ढंग से गायब कर दिया या फिर उनके राज्य छीनकर उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया।

 बड़ी कठिनाई से ब्रिटिश सरकार अट्ठारह सौ सत्तावन की सशस्त्र क्रांति को कुचल सकी। यद्यपि इस क्रांति में दिल्ली के मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर तथा अवध की बेगम हजरत महल भी सम्मिलित हुए किंतु अंग्रेजों ने उनकी शक्ति को बिना किसी परिश्रम के, पूरी तरह से तथा सदा के लिए कुचल दिया।

अंग्रेजों के मन में खटास

अट्ठारह सौ सत्तावन की सशस्त्र क्रांति तो अंग्रेजी कमाण्डरों द्वारा बड़ी बेरहमी से कुचल दी गई किंतु इसके दौरान हुई रक्तरंजित घटनाओं के कारण अंग्रेज अधिकारियों का हिन्दुओं पर से विश्वास उठ गया तथा अब वे हिन्दुओं को दबाने के लिए मुसलमानों को अपने निकट लाने का प्रयास करने लगे।

अंग्रेजों के मन में हिन्दुओं के प्रति इतनी खटास आ गई कि उन्होंने सेना तथा पुलिस की नौकरियों में हिन्दुओं की बजाय मुसलमानों को भर्ती करना आरम्भ कर दिया। यदि हिन्दू कहीं भी विद्रोह करते थे तो अंग्रेजों की सेना और पुलिस बड़ी बेरहमी से हिन्दुओं को कुचलती थी। इस प्रकार पूरा परिदृश्य बदल गया और हिन्दू फिर से संकट में आ गए।

अलीगढ़ आंदोलन

उन दिनों बिजनौर में ईस्ट इण्डिया कम्पनी में सैयद अहमद नामक एक सदर अमीन हुआ करता था। उसने 1857 की क्रांति में अनेक अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवार के सदस्यों के प्राण बचाए। जब क्रांति समाप्त हो गई तो अंग्रेजों ने सैयद अहमद खाँ को अपना विश्वसनीय साथी बना लिया तथा उसे ‘सर’ की उपाधि दी।

सर सैयद अहमद खाँ ने अंग्रेजों की बदली हुई मानसिकता का लाभ उठाया तथा उसने ‘अलीगढ़ आंदोलन’ के नाम से एक आंदोलन खड़ा किया जिसका मुख्य उद्देश्य मुसलमान बच्चों को आधुनिक शिक्षा के लिए प्रेरित करने का था ताकि वे बड़ी संख्या में सरकारी नौकरियों में प्रवेश पा सकें।

उस काल में सैयद अहमद के प्रयासों से बहुत से मुसलमान युवक अंग्रेजी राज्य में बड़ी नौकरियां पा गए। सैयद अहमद तथा उसके साथियों ने उत्तर भारत में जो आंदोलन चलाया, उसने हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच दूरियां बढ़ाने का काम किया। अंग्रेजों ने मुसलमानों में पनप रही इस प्रवृत्ति को अपनी लिए लाभकारी समझा तथा इसे बढ़ावा दिया।

इस कारण भारत में साम्प्रदायिक समस्या में तेजी से वृद्धि हुई। ऐसा नहीं था कि भारत में साम्प्रदायिक समस्या का जन्म अलीगढ़ आंदोलन से हुआ, यह समस्या तो लगभग विगत साढ़े छः सौ सालों से किसी न किसी रूप में भारत में चली आ रही थी। अलीगढ़ आंदोलन से वह और बढ़ गई।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

न्यायालयों में उर्दू

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न्यायालयों में उर्दू

ब्रिटिश शासन में राजकारी कार्यालयों एवं न्यायालयों में उर्दू भाषा का प्रयोग एक बड़ा मुद्दा बन गया था।

डिसमिस दावा तोर है सुन उर्दू बदमास (5)

उस काल में भारत का शासन दो भागों में विभक्त था। पहला भाग ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा प्रत्यक्ष शासित था जिसमें बहुत सारे सरकारी विभागों के साथ-साथ पुलिस एवं न्यायालयों आदि की व्यवस्था की गई थी।

दूसरा भाग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ अधीनस्थ संधियों से बंधे हुए देशी रजवाड़ों द्वारा शासित था जो हजारों साल पुरानी हिन्दू नीति से शासन करते थे।

ब्रिटिश-भारत के सरकारी कार्यालयों तथा न्यायालयों में अरबी लिपि में अरबी-फारसी मिश्रित उर्दू भाषा में लिखा-पढ़त की जाती थी। उस काल में भारत में अंग्रेजी भाषा को जानने वाले कर्मचारी नहीं मिलते थे।

मुसलमानी राज्य समाप्त हो जाने पर भी जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ई.1837 में अपने सरकारी कार्यालयों एवं न्यायालयों में फारसी लिपि में लिखी जाने वाली वाली उर्दू भाषा के प्रयोग को मान्यता दी तो हिन्दुओं को अरबी-फारसी युक्त उर्दू भाषा सीखनी पड़ती थी। कुछ समय तक तो यह स्थिति चलती रही किंतु इसका परिणाम यह हुआ कि अब हिन्दू युवक देवनागरी लिपि को भूलने लगे तथा फारसी लिपि में प्रयुक्त उर्दू में पारंगत होने का प्रयास करने लगे।

यह स्थिति देखकर उत्तर भारत के हिन्दुओं में असंतोष उभरा। इस काल में उत्तर भारत का हिन्दू चाहने लगा था कि जिस प्रकार अंग्रेजी सरकार ने मुसलमानी राज की अनेक प्रथाओं को बदला है, उसी प्रकार मुसलमानी राज्य के अन्य चिह्नों को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए जिनमें से भाषा एवं लिपि का प्रश्न प्रमुख था।

महारानी विक्टोरिया का राज

अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति को बेहद क्रूरता पूर्वक कुचलने के लिए अंग्रेजों के अपने देश इंग्लैण्ड में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों की कड़ी आलोचना हुई। लंदन की संसद में विपक्षी सांसदों ने भारतीयों के नरसंहार पर खूब हो-हल्ला मचाया जिसके कारण ब्रिटिश सरकार को भारत से कम्पनी सरकार का शासन हटाकर इंगलैण्ड की महारानी का शासन स्थापित करना पड़ा।

ब्रिटिश क्राउन के शासन में अंग्रेज अधिकारियों की क्रूरता में पहले की अपेक्षा कमी आई क्योंकि अब वे कम्पनी बोर्ड के प्रति नहीं, अपितु ब्रिटिश संसद के प्रति जवाबदेह थे।

जब हिन्दुओं ने देवनागरी लिपि वाली हिन्दी भाषा के लिए आवाज उठानी आरम्भ की तो अंग्रेज अधिकारियों ने भारत में उर्दू-फारसी के स्थान पर अंग्रेजी भाषा को बढ़ावा देने के प्रयास किए। सरकारी नौकरियों में भी उन्हीं को प्राथमिकता दी जाने लगी जिन्हें फारसी लिपि वाली उर्दू के साथ-साथ रोमन लिपी वाली अंग्रेजी आती हो।

इस कारण भारत के मध्यम वर्गीय हिन्दू परिवारों के लड़कों ने उर्दू-फारसी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा का ज्ञान लेना भी आरम्भ किया जबकि मुसलमान लड़के अंग्रेजी सीखने में पिछड़ गए। उस काल में बहुत कम मुसलमान परिवार ऐसे थे जो अंग्रेजी भाषा सीख सके। जब अंग्रेजी पढ़-पढ़कर हिन्दू लड़के बड़ी संख्या में महारानी की सरकार के कार्यालयों में बाबू बनने लगे तो उन्होंने अपनी लगन एवं प्रतिभा से अंग्रेजी शासन का हृदय जीत लिया। इस प्रकार एक बार फिर से मुसलमानों की जगह हिन्दुओं को अंग्रेजी सरकार के लिए अधिक विश्वसनीय एवं योग्य माना जाने लगा।

ब्रिटिश क्राउन का शासन हो जाने पर भी इस काल में भारतीय युवकों को अंग्रेजी के साथ-साथ अरबी-फारसी का ज्ञान होना आवश्यक था क्योंकि मालगुजारी (भूराजस्व) तथा भूमि सम्बन्धी सभी पुराने अभिलेख (रिकॉर्ड) फारसी लिपि एवं फारसी भाषा में लिखे हुए थे। इस कारण केवल अंग्रेजी सीखने मात्र से काम नहीं चल सकता था।

इस काल के हिन्दुओं ने न केवल संस्कृत तथा उससे विकसित हुई हिन्दी को हिन्दू धर्म के अनिवार्य अंग के रूप में देखा अपितु धोती, तिलक, जनेऊ और आयुर्वेद को भी हिन्दू धर्म का अनिवार्य अंग मानकर हिन्दुओं को भारत में मुसलमानी राज्य आरम्भ होने से पहले की जीवन पद्धति पर ले आने के लिए प्रयास आरम्भ किए।

हिन्दुओं की इस प्रवृत्ति में वृद्धि होते हुए दुखकर भारत के मुसलमान जो कि कुरान, अजान, मस्जिद आदि से पहले से ही निरंतर जुड़े हुए थे, अब दाढ़ी, जालीदार गोल टोपी, बुर्का, हिजाब, उर्दू भाषा और यूनानी चिकित्सा पद्धति को अपने मजहब का अनिवार्य अंग मान कर, बड़े आग्रह के साथ उनसे चिपक गए।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देवनागरी लिपि युक्त हिन्दी के लिए मैमोरेण्डम

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देवनागरी लिपि युक्त हिन्दी

हिन्दू जाति देवनागरी लिपि युक्त हिन्दी भाषा को ही हिन्दी के वास्तविक रूप में देखती थी जबकि अंग्रेजों की चेष्टा थी कि वे सरकारी कामकाज तथा न्यायालयों में फारसी लिपि युक्त उर्दू को हिन्दी भाषा के रूप में थोपें। हिन्दी-उर्दू विवाद का मूल कारण यही था।

हिन्दी आंदोलन के पुरोधाओं में से एक बालमुकुन्द ने लिखा है कि उस काल में (उन्नीसवीं सदी के मध्य में) जो लोग नागरी अक्षर सीखते थे, वे फारसी अक्षर सीखने पर विवश हुए और हिन्दी भाषा ‘हिन्दी’ न रहकर ‘उर्दू’ बन गयी। हिन्दी उस भाषा का नाम रहा जो टूटी-फूटी चाल पर देवनागरी अक्षरों में लिखी जाती थी। हिन्दी वाले भी अपनी पुस्तकें फारसी लिपि में लिखने लगे थे, जिसके कारण देवनागरी अक्षरों का भविष्य ही खतरे में पड़ गया था।

बालमुकुंद ने लिखा है कि उस काल में शिक्षा में मुसलमानों से बहुत आगे रहने के बावजूद सरकारी नौकरियों से वंचित होने पर नागरी लिपि और हिंदी भाषा का व्यवहार करने वाले हिंदुओं में असंतोष होना बिल्कुल स्वाभाविक-सी बात थी और इसके खिलाफ सरकारी क्षेत्रों में नागरी लिपि को लागू करने की माँग भी वाजिब और लोकतांत्रिक थी।

राजा शिवप्रसाद सितारा ए हिंद

ई.1867 में ‘संयुक्त प्रान्त आगरा और अवध’ में कुछ हिन्दुओं ने उर्दू के स्थान पर देवनागरी लिपि युक्त हिन्दी को राजभाषा बनाने की माँग की। ई.1868 में बाबू शिवप्रसाद ने अंग्रेजों को एक ज्ञापन दिया। बाबू शिवप्रसाद का जन्म बनारस के एक वैश्य परिवार में हुआ था। उनके पूर्वजों ने बंगाल के नवाबों के विरुद्ध अंग्रेजों की सहायता की थी। इसलिए अंग्रेज सरकार उन्हें बहुत प्रतिष्ठा एवं आदर देती थी तथा बाबू शिवप्रसाद एवं उनका परिवार अंग्रेजी शासन का भक्त माना जाता था।

लॉर्ड मेयो ने बाबू शिवप्रसाद को इम्पीरियल काउंसिल का सदस्य बनाया तथा अंग्रेजी सरकार ने उन्हें ‘राजा’ तथा ‘सितारा ए हिंद’ की उपाधियां दीं इसलिए उन्हें राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द कहा जाता था। वे अंग्रेज-भक्त व्यक्ति थे।

उनकी अंग्रेज भक्ति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि ई.1883 में वायसराय के लॉ मेम्बर सर सी. पी. इल्बर्ट ने इल्बर्ट बिल प्रस्तुत किया। इस बिल में प्रावधान किया गया था कि यदि कोई अंग्रेज अधिकारी भारत में किसी अपराध में लिप्त पाया जाता है तो उसे भी किसी भारतीय जज के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

अंग्रेजों ने इस बिल का तीव्र विरोध किया। भारतीय जनता ने इस बिल का जोरदार स्वागत किया किंतु अंग्रेज-भक्त होने के कारण बाबू शिवप्रसाद ने एल्बर्ट बिल का विरोध किया और उसे भारत में लागू होने से रोकने के लिए आंदोलन चलाया।

अंग्रेज-भक्त होने पर भी बाबू शिवप्रसाद को हिन्दी भाषा से अनन्य प्रेम था। जब राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द ने हिन्दू लड़कों को देवनागरी की बजाय फारसी लिपि सीखते देखा तो वे देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को अंग्रेजी न्यायालयों एवं कार्यालयों की भाषा बनाने के समर्थक बन गए।

बाबू शिवप्रसाद हिन्दी और नागरी अर्थात् देवनागरी लिपि युक्त हिन्दी के समर्थन में उस समय मैदान में उतरे जब हिन्दी गद्य की भाषा का परिष्कार और परिमार्जन नहीं हो सका था अर्थात् हिन्दी गद्य का कोई सुव्यवस्थिति और सुनिश्चित रूप नहीं गढ़ा जा सका था। कहा जा सकता है कि इस काल में खड़ी बोली हिन्दी घुटनों के बल चल रही थी।

वह खड़ी होने का प्रयास कर रही थी किंतु अपने प्रयास में सफल नहीं हो पा रही थी। एक तरफ तो भारत की अंग्रेजी सरकार भारत में अंग्रेजी भाषा के प्रसार-प्रचार का अभियान चला रही थी तो दूसरी ओर राजकीय कार्यालयों एवं न्यायालयों में फारसी लिपि एवं उर्दू भाषा में कार्य हो रहा था।

ई.1868 में राजा शिवप्रसाद ने संयुक्त प्रांत की सरकार को ‘कोर्ट कैरेक्टर इन दी अपर प्रोविंसेज ऑफ इंडिया’ (भारत के ऊपरी प्रांतों के न्यायालयों का चरित्र) शीर्षक से एक मेमोरेंडम (स्मृतिपत्र) दिया। इस मेमोरेंड में कहा गया कि –

जब मुसलमानों ने हिंदोस्तान पर कब्जा किया, तब उन्होंने पाया कि हिंदी इस देश की भाषा है और इसी लिपि में यहाँ के सभी कारोबार होते हैं।

उन्होंने फारसी को इस देश के लोगों पर जबर्दस्ती थोपा ……लेकिन उनकी फारसी शहरों के कुछ लोगों को, ऊपर-ऊपर के दस-एक हजार लोगों को छोड़कर, आम लोगों की जुबान कभी नहीं बन सकी। आम लोग फारसी शायद ही कभी पढ़ते थे। आजकल की फारसी में आधी अरबी मिली हुई है। सरकार की इस नीति को विवेकपूर्ण नहीं माना जा सकता जिसने हिंदुओं के बीच सामी तत्वों को खड़ा करके उन्हें अपनी आर्यभाषा से वंचित कर दिया है; न सिर्फ आर्यभाषा से बल्कि उन सभी चीजों से जो आर्य हैं, क्योंकि भाषा से ही विचारों का निर्माण होता है और विचारों से प्रथाओं तथा दूसरे तौर-तरीकों का।

बाबू शिव प्रसाद ने मैमोरेण्डम में लिखा कि फारसी पढ़ने से लोग फारसीदाँ बनते हैं। इससे हमारे सभी विचार दूषित हो जाते हैं और हमारी जातीयता की भावना खत्म हो जाती है।…….पटवारी आज भी अपने कागज हिंदी में ही रखता है। महाजन, व्यापारी और कस्बों के लोग अब भी अपना सारा कारोबार हिंदी में ही करते हैं। कुछ लोग मुसलमानों की कृपा पाने के वास्ते अगर पूरे नहीं, तो आधे मुसलमान जरूर हो गए हैं। लेकिन जिन्होंने ऐसा नहीं किया, वे अब भी तुलसीदास, सूरदास, कबीर, बिहारी इत्यादि की रचनाओं का आदर करते हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि हर जगह, हिंदी की सभी बोलियों में फारसी के शब्द काफी पाए जाते हैं। बाजार से लेकर हमारे जनाने तक में, वे घर-घर में बोले जाते हैं। भाषा का यह नया मिला-जुला रूप ही उर्दू कहलाता है। ……मेरा निवेदन है कि अदालतों की भाषा से फारसी लिपि को हटा दिया जाए और उसकी जगह हिन्दी (देवनागरी) लिपि को लागू किया जाए।

इस प्रकार बाबू शिव प्रसाद ने अपने ज्ञापन में देवनागरी लिपि को भारत में सामान्यतः व्यवहृत होने वाली लिपि बताया तथा मध्यकाल के मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दुओं को बलपूर्वक फारसी सिखाने का दोषी बताया। हिन्दी भाषा के उन्नयन के लिए राजा शिवप्रसाद सितारा ए हिन्द ने ‘बनारस अखबार’ नामक समाचार पत्र भी प्रकाशित किया।

मदनमोहन मालवीय एवं अनेक मूर्धन्य व्यक्ति भी हिन्दी आन्दोलन के आरम्भ के उल्लेखनीय समर्थक बन गए।

मुसलमानों का उर्दू को समर्थन

जब उत्तर भारत के हिन्दू सरकारी कार्यालयों में हिन्दी एवं देवनागरी लिपि की मांग करने ले तो इसकी प्रतिक्रिया में भारत के मुसलमान उर्दू के पक्ष में उतर आए। उन्होंने सरकारी कार्यालयों एवं न्यायालयों में उर्दू की आधिकारिक मान्यता को समर्थन दिया; सैयद अहमद खाँ फारसी लिपि में लिखी जाने वाली उर्दू जबान का सबसे मुखर समर्थक बन गया।

प्रेस ने दिया भाषाई विवाद को मंच

भारत में ई.1557 में गोआ में पुर्तगालियों द्वारा देश के पहले छापाखाने (मुद्रणालय) की स्थापना की गई थी। इसके बाद देश के विभिन्न नगरों में छापाखाने लगने लगे जिनमें ईसाई मत के प्रचार हेतु पम्फलेट्स एवं बुकलेट्स छपा करती थीं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन काल के आरम्भ होते ही ई.1767 से भारत में समाचार पत्रों का प्रकाशन भी आरम्भ होने लगा था। ई.1818 आते-आते अंग्रेजी एवं बांग्ला आदि भाषाओं में कई समाचार पत्र छपने लगे थे। ई.1826 में देश का पहला हिन्दी समाचार पत्र प्रकाशित होने लगा। इसके बाद देश में अनेक समाचार पत्र निकलने आरम्भ हो गए।

जिस समय भारत में ई.1858 में गोरी रानी का राज हुआ, उस समय तक भारत में देवनागरी लिपि युक्त हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला एवं मराठी आदि अनेक भाषाओं में कई पत्र-पत्रिकाएं छपती थीं। जब हिन्दुओं ने हिन्दी भाषा एवं देवनागरी लिपि के लिए तथा मुसलमानों ने उर्दू भाषा और फारसी लिपि के लिए आंदोलन आरम्भ किए तो उत्तर भारत के विभिन्न नगरों से प्रकाशित होने वाली पत्र-पत्रिकाएं इस विवाद के प्रमुख मंच बन गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रोवहु सब मिलि के आवहु भाई

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रोवहु सब मिलि के

भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र ने ‘भारत दुर्दशा’ शीर्षक से एक छोटा सा नाटक लिखकर हिन्दू जाति की दुर्दशा पर बड़ा शोक व्यक्त किया। भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र ने अंग्रेजी राज में भारतवासियों की दुर्दशा पर शोक व्यक्त करते हुए लिखा- रोवहु सब मिलि के आवहु भाई।

जिस समय से (ई.1858 से) भारत पर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का शासन हुआ और हिन्दू जाति को कुछ सोचने-समझने की छूट मिली, हिन्दू जाति ने एक नई अंगड़ाई लेनी आरम्भ की। इस काल के हिन्दू युवकों में एक ऐसी नई क्रांति ने जन्म लिया जिसे वैचारिक क्रांति कहा जा सकता है। इस क्रांति की धार और मार सन् सत्तावन की सशस्त्र क्रांति से भी अधिक गहरी और तीखी थी।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में आरम्भ हुई इस वैचारिक क्रांति का नेतृत्व महर्षि दयानंद सरस्वती (ई.1824-1883), भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र (ई.1850-1885), बालगंगाधर तिलक (ई.1856-1920), बिपिनचंद्र पाल (ई.1858-1932), महामना मदन मोहन मालवीय (ई.1861-1946), स्वामी विवेकानंद (ई.1863-1902), लाला लाजपतराय (ई.1865-1928), अरबिंदो घोष (ई.1872-1950) आदि प्रखर हिन्दू युवकों ने किया। इन युवकों ने भारतीयों के विचारों को नई गति दी तथा उन्हें अपनी दुर्दशा पर सोचने के लिए प्रेरित किया।

इस काल में रेलों का संचालन आरम्भ होने एवं टेलिफोन लाइनें आरम्भ होने से भारत के लोगों को दूरस्थ प्रांतों के लोगों से मिलने एवं बातचीत करने के अधिक अवसर मिलने लगे थे। इसके साथ ही समाचार पत्रों के माध्यम से विश्व भर में चल रही राजनीतिक घटनाओं एवं उनके परिणामों के समाचार मिलने लगे थे। उन्हें यह भी पता लगने लगा था कि अंग्रेज जाति अजेय नहीं है, विश्व में अनेक मोर्चों पर उनकी सेनाओं को हराया जाता रहा है।

इन सब कारणों से हिन्दू जाति को भी अपनी दुर्दशा पर नए सिरे से विचार करने तथा विदेशी राज से मुक्ति हेतु मार्ग ढूंढने के लिए सोचने का अवसर मिला। ब्रिटिश राज में कुछ हिन्दू नवयुवकों में इतना वैचारिक बल आ गया कि अब वे पत्र-पत्रिकाओं में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लेख एवं कविताएं आदि लिखकर अपनी आवाज उठाने लगे थे।

हिन्दी साहित्य में इस काल का नेतृत्व बनारस के नवयुवक भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र ने किया। उन्होंने हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि के लिए ‘कवि वचन सुधा’ एवं ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ नामक दो पत्रिकाओं का प्रकाशन आरम्भ किया। एक लेखक ने लिखा है कि हरिश्चंद्र के युग में लगभग प्रत्येक लेखक किसी न किसी पत्र या पत्रिका का सम्पादन या प्रकाशन करता था।

यद्यपि भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र ने केवल 34 वर्ष की आयु पाई तथापि उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दू जाति को झिंझोड़कर नींद से उठा दिया। उन्होंने ‘भारत दुर्दशा’ शीर्षक से एक छोटा सा नाटक लिखकर हिन्दू जाति की दुर्दशा पर बड़ा शोक व्यक्त किया। इस नाटक में हिन्दुओं के अतीत के गौरव की चमकदार स्मृति को बड़े प्रभावशाली ढंग से लिखा गया था और उसके वर्तमान को आँसुओं से भरा हुआ बताते हुए हिन्दू जाति को फिर से स्वर्णिम भविष्य के पथ पर अग्रसर होने की भव्य प्रेरणा दी गई थी। इस नाटक में भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र ने अंग्रेजी राज में भारतवासियों की दुर्दशा पर शोक व्यक्त करते हुए लिखा-

रोवहु सब मिलि के आवहु भाई।

हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई।।

सबके पहिले जेहि ईश्वर धन बल दीनो।

सबके पहिले जेहि सभ्य विधाता कीनो।।

सबके पहिले जो रूप रंग रस भीनो।

सबके पहिले विद्याफल जिन गहि लीनो।।

अब सबके पीछे सोई परत लखाई।

हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई।।

जहँ भए शाक्य हरिचंद नहुष ययाती।

जहँ राम युधिष्ठिर बासुदेव सर्याती।।

जहँ भीम करन अर्जुन की छटा दिखाती।

तहँ रही मूढ़ता कलह अविद्या राती।।

अब जहँ देखहु दुःखहिं दुःख दिखाई।

हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई।।

लरि बैदिक जैन डुबाई पुस्तक सारी।

करि कलह बुलाई जवनसैन पुनि भारी।।

तिन नासी बुधि बल विद्या धन बहु बारी।

छाई अब आलस कुमति कलह अंधियारी।।

भए अंध पंगु सब दीन हीन बिलखाई।

हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई।।

अँगरेराज सुख साज सजे सब भारी।

पै धन बिदेश चलि जात इहै अति ख़्वारी।।

ताहू पै महँगी काल रोग बिस्तारी।

दिन दिन दूने दुःख ईस देत हा हा री।।

सबके ऊपर टिक्कस की आफत आई।

हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई।।

जब यह नाटक हिन्दी भाषा की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ तो इस नाटक की गूंज भारत के शिक्षित वर्ग में सुनाई देने लगी। उन्हीं दिनों में कुछ अन्य लेखकों ने भी ऐसे ही उत्तेजक विचार प्रस्तुत किए जिनसे देश के युवाओं में नवीन उत्साह का संचरण हुआ।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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