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सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा

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सोहन प्रसाद मुदर्रित का मुकदमा

जब अंग्रेजी न्यायालय में सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा चला तो इस मुकदमे का खर्च जुटाने के लिए भारत की जनता से चंदा मांगा गया। भारत के समस्त राजाओं, सेठों एवं जनसामान्य से अपील की गई कि वे हिन्दी भाषा की रक्षा के लिए आगे आएं तथा मुक्त हृदय से चंदा उपलब्ध करवाएं ताकि इस मुकदमे को अंतिम क्षण तक लड़ा जा सके।

सोहनप्रसाद मुदर्रिस की पुकार हिन्दूधर्म की पुकार बन गयी। सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा हिन्दू जाति की अस्मिता का प्रश्न बन गया। मुकदमे में सहायता के लिए चन्दा भेजने और समर्थन में पत्र लिखने का तांता बंध गया। दाउदनगर से चन्दा देने वालों की एक पूरी सूची भेजने वाले ‘सत्यवक्ता’ ने अपने पत्र में खेद व्यक्त करते हुए लिखा कि उनके नगर के कई धनवानों ने बहुत थोड़ा चन्दा दिया, कइयों ने तो कुछ भी नहीं दिया, हाय! हाय! हमारे आर्यधर्म की ऐसी दशा?’ 

बनारस जिले के बड़गाँव के मास्टर मुंशी लक्ष्मणप्रसाद ने सोहन प्रसाद का हौसला बढ़ाते हुए लिखा- ‘भैया, मैं भी आपकी विपत्ति का साथी हूँ. यदि हम लोग आपकी सहायता नहीं करेंगे तो क्या मलेच्छ और ईसाई आपको उबारेंगे?’

कामठी (नागपुर) के डी. एम. वी. स्कूल के हैडमास्टर अम्बाप्रसाद पांडे ने सेठ-साहूकारों, वकीलों और अध्यापकों का आह्वान किया कि वे इस धर्मकार्य में आगे बढ़कर हिस्सा लें क्योंकि यदि सोहन प्रसाद द्वारा लिखित पुस्तकें जला दी गयीं तो हिन्दू बंधुओं को महाशोक और लज्जा का कारण होगा। 

इस काल में गौरक्षा और रामनवमी के जुलूस के मार्ग को लेकर होने वाले विवादों की तरह हिन्दू प्रतिष्ठा का महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन चुके इस मुकदमे में सोहन प्रसाद के समर्थन में छपने वाले पत्रों में मुसलमानों को यवन, मलेच्छ, मियांभाई, मुसल्ले और मलेच्छ मंडली कहकर सम्बोधित किया जाता था और हिन्दुओं को आर्य। इन पत्रों में सोहन प्रसाद परम देशहितैषी बन गये और उनकी सहायता में आगे आने वाले लोग उदार चरित वाले महाशय कहलाने लगे।

दूर और पास, सभी स्थानों से चन्दा भेजा जाने लगा। चन्दा सीधे सोहन प्रसाद को भेजा जाता था या फिर ‘भारत जीवन’ के पते पर। भारत जीवन ने इसके लिए बनारस बैंक में एक अलग खाता खोल लिया। अब ऐसा लगने लगा कि पूरा देश सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा लड़ रहा था।

एक पत्र-लेखक ने लिखा कि चन्दे के जमा-खर्च का हिसाब भारत जीवन में होना मुनासिब है। उसने ध्यान दिलाया कि मुंशी इन्द्रमणी मुरादाबादी के केस में बहुत सा चन्दा ‘भारत जीवन’ से होकर मिला था। जब आर्यसमाज ने मुंशीजी से हिसाब माँगा तो उन्होंने नहीं दिया।  सोहन प्रसाद ने अपील निकाली कि चन्दा सीधे उनके वकील बाबू गोरखप्रसाद को भेजा जाये।

विभिन्न शहरों में स्थानीय संस्थाओं और नागरिकों ने अपनी बैठकों में सोहन प्रसाद के लिए चन्दा जमा करने के प्रस्ताव पारित किये। दाउदनगर सुजन समाज ने बाबू लालजी प्रसाद कोठीवाल के कहने पर प्रस्ताव पास किया कि जो मनुष्य अपने धर्म का पक्ष करके दुःख में पड़े, उसकी सहायता अवश्य कर्त्तव्य है। सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा हम सबका मुकदमा है।

आर्यसमाज के गढ़ अजमेर में कॉलेज के अध्यापकों और सरकारी पाठशाला के छात्रों की सभा हुई जिसमें परम देशहितैषी एक आर्य भाई पर अकारण विपत्ति आते देखकर द्रव्य इकट्ठा करने का उद्योग किया गया।  सबसे उत्तेजक पत्र पं. विजयानन्द का छपा। बनारस में सनातनी ब्राह्मणों के गढ़ भदैनी मुहल्ले के निवासी पं. विजयानन्द उस काल में गोरक्षा और हिन्दी आन्दोलन की सबसे अगली कतार में थे।

न्यायिक अभियोजन में सोहन प्रसाद के बचाव और समर्थन में उठे आन्दोलन को और तेज करने के लिए पं. विजयानन्द ने 14 सितम्बर 1885 के भारत जीवन में एक अपील छपवायी। ‘सात पाँच की लाठी, एक जने का बोझ’ शीर्षक से छपी इस अपील में उन्होंने लिखा-

‘हमारे निर्मम बैरी मुसलमान भाइयों ने गोरखपुर के मजिस्ट्रेट साहब की इजलास में हिन्दुओं पर चढ़ाई की है। इन मुसल्लों की चढ़ाई सोहन प्रसाद के नाम से हिन्दू जाति मात्र पर है न कि एक उन्हीं पर….। आप लोग जानते ही हैं कि इस भारत में मुसलमान भाई केवल तेरहवाँ हिस्सा हैं। यदि हिन्दू सभी एक मन और एक जन होकर लड़ाई को तैयार हों तो एक-एक मुसल्लों की छाती पर तेरह-तेरह हिन्दू भूत सवार हो जायेंगे….।’

पं. विजयानन्द का यह पत्र इस बात का प्रमाण है कि उस काल में भारत में मुसलमानों की जनसंख्या केवल साढ़े सात प्रतिशत थी। फिर भी उस काल के हिन्दू मुसलमानों के उभार से परेशान थे।

इस अपील में पं. विजयानन्द ने लिखा- ‘हिन्दुओं की संख्या ज्यादा होने पर भी मुसलमान निडर बने हुए हैं तो इसकी वजह उनको यह गुमान है कि उनमें एका बहुत है, इसलिए हिन्दू ज्यादा होकर भी क्या कर लेंगे? उनके इस भ्रम को दूर कर देना होगा। अब तो ईश्वर की कृपा से हम लोगों का तिरोहित जातीय बल दिन दूना, रात चौगुना बढ़ रहा है। अब इनके नाने-मामे का राज नहीं है कि हम लोग उचित कहते हुए भी हलाल किये जायेंगे। अब तो यह राज्य न्यायप्रिय गवर्नमेंट का है।’

विजयानन्द ने लोगों से चंदा देने की अपील करते हुए लिखा कि मुसलमान भाई आपस में चन्दा करके जहाँ तक धन बटोरेंगे, उतने ही में हम हिन्दू तेरह गुना बटोर सकते हैं…. हम लोग एक-एक कंकरी उठाकर फेंक दें तो उतने ही में एक-एक मलेच्छ की छाती में तेरह-तेरह छेद हो सकते हैं….. फिर ऐसे बल के रहते भी यदि हम लोग एकमत नहीं होते तो हिन्दू कहलाने को धिक्कार है।’

विजयानन्द ने हिन्दी की सभी पत्र-पत्रिकाओं के ग्राहकों को ‘हिन्दू’ मानते हुए उन्हें एक-एक या आधा-आधा आना चन्दा भारत जीवन कार्यालय में भेज देने को कहा ताकि बड़ी विपत्ति से जातीय गौरव की रक्षा हो सके। विजयानन्द की दृष्टि में मुकदमे की हार-जीत से भी बड़ा प्रश्न जातीय गौरव की रक्षा का था- ‘हमें इस समय मुकदमे की हार-जीत पर उतना खेद अथवा हर्ष नहीं है, जितना भावी दुःख का खेद है। बुड्ढे के मरने का भय नहीं, किन्तु यमदूतों के घर देख जाने का डर है।’

अंत में एक आना चन्दे को ‘जातीय प्रतिष्ठा की रक्षार्थ भिक्षा’ कहते हुए विजयानन्द ने हिन्दुओं को ललकारकर कहा- ‘देखें, आप लोगों में कहाँ तक हिन्दूपन की ममता है।’

इतनी ही प्रभावशाली एक दूसरी अपील चम्पारन में बगहा की विद्याधर्म्मवर्धिनी सभा के प्रधान मंत्री चन्द्रशेखर मिश्र ने निकाली- ‘सोहन प्रसाद का मुकदमा और आर्यों का कर्त्तव्य’। यह अपील ‘भारत जीवन’ में 14 सितम्बर 1885 को छपी।

विजयानन्द तथा चन्द्रशेखर मिश्र की अपीलों में अंतर यह था कि जहाँ पं. विजयानन्द ब्रिटिश गवर्नमेंट को ‘न्यायप्रिय’ मानकर सन्तुष्ट थे, वहीं चन्द्रशेखर मिश्र ने ब्रिटिश शासन की आलोचना भी की।

चन्द्रशेखर ने सबसे पहले सोहन प्रसाद पर हुए मुकदमे से आर्यों को पहुँचे कष्ट का उल्लेख किया। इसके बाद मुस्लिम देशों की एकता और उनकी तुलना में हिन्दुओं की निरीहता सम्बन्धी प्रचलित धारणा को दोहराया।

मुसलमानों का सामना करने के लिए उन्होंने सरकार से न्याय पाने के भरोसे रहने की बजाय, न्याय के लिए आन्दोलन खड़ा करने पर बल दिया। चन्द्रशेखर ने लिखा कि जो लोग यह आस लगाये बैठे हैं कि सरकार पूरा न्याय करेगी ही, हम लोगों के आन्दोलन की क्या आवश्यकता, उनकी यह आस निर्मूल है- ‘टेढ़ जानि सब बंदइ काहू, वक्र चन्द्रमा ग्रसै न राहू।’

उनके कहने का आशय यह था कि सरल व्यक्ति की कोई पूछ नहीं होती। सब लोग टेढ़े चंद्रमा की पूजा करते हैं। टेढ़े चंद्रमा को तो राहू भी नहीं ग्रसता। अतः हमें अपनी सरलता त्यागकर कठोरता धारण करनी होगी।

हिन्दुओं को क्यों राजनीतिक रूप से एकजुट हो जाना चाहिए, इसे समझाते हुए चन्द्रशेखर ने लिखा- ‘मुसलमान जाति जबर्दस्त और कट्टर है, उसकी सहायता में अरब, रूस, मिस्र, फारस और अफगानिस्तान आदि देशों तथा हिन्दुस्तान में भी हैदराबाद आदि के महाशय हैं, और इधर हिन्दू जाति के बाहर के तो किसी प्रकार के सहायक हैं ही नहीं। भारतवर्ष में दशांश में भी एकता नहीं है, अव्वल निरीह, दरिद्र अलग ही ठहरे।’

चन्द्रशेखर ने ब्रिटिश शासन को मुसलमानों का पक्षपाती ठहराते हुए, अंग्रेजी शासन में हिन्दुओं के साथ हुए धार्मिक अन्याय के कई उदाहरणों की याद दिलायी, जैसे भारत में क्रिस्तानों का बढ़ना, शिक्षा विभागों का धर्मनाशक प्रबन्ध, हाईकोर्ट में शालिग्राम की मूर्ति लाने की आलोचना करने पर सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी पर मुकदमा और मुंशी इन्द्रमणी की पुस्तकों के विरुद्ध अभियोग (मुकदमा)। अतएव यह कभी नहीं कह सकते कि सरकार से केवल न्याय ही मिल जायेगा, कुछ विशेष आन्दोलन की आवश्यकता नहीं।’

सोहन प्रसाद के अभियोग को आर्यों की धार्मिक निष्ठा जाँचने की कसौटी बनाते हुए चन्द्रशेखर ने हिन्दूओं का आह्वान किया- ‘यदि अपने पवित्र धर्म पर विश्वास हो, यदि असम्भव और अपवित्र अधर्मों से घृणा (नफरत) हो, हाँ, यदि स्वप्न में भी आर्य (हिन्दू) बनना चाहते हों, यदि किसी एक शिरा (रग) में एक बूँद भी आर्य (हिन्दू) रक्त प्रवाहित हो, तो आर्यों के लिए कोमल वाणी से हित कहने वाले (सोहन प्रसाद मुदर्रिस) की तन-मन-धन से सहायता करने में न चूकिये।’

नफरत, हिन्दू और रग जैसे शब्द जनसाधारण द्वारा बोलचाल में अधिक प्रयुक्त होने पर भी, चन्द्रशेखर मिश्र ने इन्हें उर्दू के शब्द होने के कारण उनके स्थान पर संस्कृत पर्याय दिए तथा उर्दू के शब्दों को कोष्ठक में लिखा। उन्होंने खेद प्रकट किया कि एक निरपराध को फँसाने के लिए मलेच्छ मंडली सक्रिय हो गयी है और हिन्दू अपनी जाति को अधःपतन, पददलित एवं दुर्दशाग्रस्त होते जाने से बचाने का कोई प्रयत्न नहीं कर रहे। अपील का अन्त इस वाक्य से हुआ- ‘अपने धर्म, अपने मान की रक्षा हेतु धन दीजिए।’

विजयानन्द और चन्द्रशेखर मिश्र की अपीलों से सोहन प्रसाद के लिए चन्दा भेजने की गति कुछ तेज हुई। पश्चिमोत्तर प्रान्त के साथ-साथ बंगाल, पंजाब, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र तथा आसाम तक से चन्दा भेजा गया। कुल 479 व्यक्तियों ने चन्दा भेजा। भारत जीवन के पते पर भेजी गयी चन्दे की राशि लगभग पाँच सौ रुपये की हुई। अर्थात् औसतन प्रतिव्यक्ति एक रुपए चार पैसे चंदा भेजा गया।

यह राशि वाद (मुकदमे) को लड़ने के लिए पर्याप्त थी। चन्दा भेजने वालों में कई महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे, जैसे वृन्दावन के राधाचरण गोस्वामी, जबलपुर के ऑनरेरी मजिस्ट्रेट सेठ बागरमल रईस, बेतिया के महाराजाधिराज, रायपुर के महाराजा नरहरदेव बहादुर और महाराजा कालाकांकर। इटावा जिले में मलौसी की जमींदार ठकुरानी और एक विधवा ब्राह्मणी ने भी चन्दा भेजा।

जिन संस्थाओं ने प्रस्ताव पारित करके स्थानीय स्तर पर चन्दा जमा करके भेजा, उनमें दाउदनगर सुजन समाज, अजमेर गवर्नमेंट कॉलेज, फर्रुखाबाद आर्यसमाज, विद्याधर्मवर्धिनी सभा बगहा, विद्यावर्धिनी सभा बलुआ (गोरखपुर), आर्यसमाज कटनीमुखारा (जबलपुर), डिबेटिंग क्लब और एंग्लोवर्नाकुलर स्कूल कामठी (नागपुर) एवं देशहितैषी सभा, छपरा (बिहार) सम्मिलित थीं।

अनेक महत्त्वपूर्ण लोग ऐसे भी थे जिन्होंने ने चन्दा तो नहीं भेजा किंतु अपना समर्थन व्यक्त किया, जो कि सोहन प्रसाद मुदर्रिस के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण था। इनमें प्रयाग हिन्दू समाज के मन्त्री काशी प्रसाद, प्रयाग आर्यसमाज के मन्त्री पं. समर्थदान, बलिया आर्य देशोपकारिणी सभा के मन्त्री पं. इंदिरादत्त जू और खड़गविलास प्रेस (बांकीपुर) के मैनेजर बाबू साहिब प्रसाद सिंह सम्मिलित थे।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोहनप्रसाद मुदर्रिस का समर्थन

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सोहनप्रसाद मुदर्रिस का समर्थन

जिस समय न्यायालय में सोहनप्रसाद मुदर्रिस का मुकदमा चल रहा था तो बहुत से बुद्धिजीवी, विद्वान एवं समाचार पत्र सोहनप्रसाद मुदर्रिस का समर्थन करने लगे और बहुत से लोग सोहन प्रसाद के विरोध में उतर आए। ऐसा करने वालों में सत्यवक्ता और उचित वक्ता नामक समाचार पत्र प्रमुख थे।

‘भारत जीवन’ साप्ताहिक समाचार पत्र सोहन प्रसाद मुदर्रिस के लिए चलाए जा रहे आन्दोलन का नेतृत्व करता रहा। अन्य पत्र-पत्रिकओं ने भी इस आन्दोलन के समाचार प्रकाशित किए किंतु वे भारत जीवन की तरह मुखर नहीं हो सके। कलकत्ता का ‘उचित वक्ता’ अकेला ऐसा समाचार पत्र था जिसने सोहन प्रसाद मुदर्रिस के लिए चलाए जा रहे आन्दोलन से असहमति व्यक्त की और सोहन प्रसाद की पुस्तक को इस योग्य नहीं माना कि उसके लिए आन्दोलन चलाया जाये। वह सोहनप्रसाद मुदर्रिस का समर्थन करने लगा।

अन्य पत्र-पत्रिकाओं की तरह उचित वक्ता ने भी आरम्भ में सोहनप्रसाद मुदर्रिस का समर्थन किया था, परंतु बाद में उसने यह समर्थन वापस ले लिया। 14 नवम्बर 1885 के अंक में उचित वक्ता के सम्पादक ने लिखा- ‘इस विषय में हम लोगों ने इस पुस्तक के बिना देखे जोर दिया था, परन्तु अब इस पुस्तक के देखने से साफ यही मालूम होता है कि यह झगड़ा वास्तव में हिन्दी का नहीं है और न ऐसा ही है कि हिन्दी के सम्पादक इसकी सहायता करने में बाध्य ही हैं।’ यह बात उचित वक्ता ने तब लिखी जब न्यायालय में अभियोग समाप्त हो चुका था तथा आंदोलन पूरी तरह समाप्त हो चुका था।

‘उचित वक्ता’ के विपरीत रुख से इस आंदोलन ने एक बार पुनः चर्चा प्राप्त कर ली। ‘भारत जीवन’ द्वारा उचित वक्ता की कड़ी आलोचना की गयी तथा उचित वक्ता के विरुद्ध ‘सत्यवक्ता’ के नाम से एक उत्तेजक टिप्पणी लिखी गई। भारत जीवन के 28 नवम्बर 1885 के अंक में यह टिप्पणी छपी जिसमें सत्यवक्ता ने लिखा-

‘उचित वक्ता का सम्पादकीय समस्त आर्य समाज के चित्त में क्लेश और दुःख देने वाला है। ये महाशय (उचित वक्ता के सम्पादक) ऐसी आलोचना करते हैं कि मानो उस ग्रन्थ (सोहन प्रसाद मुदर्रिस के पद्यनाटक) में लिखे गए एक-एक वर्णों के आशय इनके रोम-रोम में चुभ गये हैं……इतने पत्र-सम्पादकों के रहते एक आप ही क्यों उबल पड़े? …… सोहन प्रसाद मुदर्रिस के पद्यनाटक में ऐसी कौन-सी बात आपने देखी जो आपको लाइबिल (अविश्वसनीय) लगी?’

भारत जीवन में छपी इस टिप्पणी से प्रकट होता है कि सत्यवक्ता (जो कि संभवतः भारत जीवन के सम्पादक ही थे) सोहन प्रसाद मुदर्रिस के द्वारा पद्यनाटक में इस्लाम के मजहबी नेताओं के विरुद्ध की गई टिप्पणियों को उचित ठहरा रहे थे। न्यायालय में स्थापित मुकदमे में मुख्य शिकायत हजरत उमर के चरित्र पर की गयी उस टीका-टिप्पणी को लेकर थी जिसमें कहा गया था-

    सोहन प्रसाद मुदर्रिस ने अपनी रक्षार्थ मचायी गुहार में अपनी इन बातों पर कभी सफाई नहीं दी कि वे हिन्दी-उर्दू विवाद में खलीफा उमर को कैसे घसीट लाए? संभवतः इसी कारण कुछ आलोचकों का मानना था कि यह नाटक हिन्दी की प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए नहीं लिखा गया था अपितु हिन्दू-मुस्लिम एकता को धक्का पहुंचाने के लिए लिखा गया था।

    ‘उचित वक्ता’ में छपी आलोचना का जवाब देते हुए ‘सत्य वक्ता’ ने भारत जीवन में लिखी अपनी टिप्पणी में लिखा कि सोहन प्रसाद द्वारा खलीफाओं पर की गई टिप्पणियों को इतनी गम्भीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है। यदि छोटी-छोटी साधारण बातों पर आप ध्यान देंगे तब तो आपके समाचार पत्र के फाइल के फाइल लाइबल (अविश्वसनीय) हो सकते हैं?……

     इसलिए इस साधारण सी बात से आप सोहन प्रसाद मुदर्रिस को दोषी नहीं ठहरा सकते। रह गयी बात ताजिए वगैरह की, सो सोहन प्रसाद की आज्ञा नहीं है, किन्तु उर्दू बीबी ने अपने गुन घमंड से जब यह कहा कि देख, तेरे हिन्दू भी हमारे ताजिए कुरान वगैरह को मानते हैं और सर्बत रेवड़ी चढ़ाकर प्रसाद लेते हैं, तब हिन्दी देवी ने भला ही जवाब दिया कि जो हिन्दू अपने मत के अधूरे होते हैं, वे ही ताजिए में ‘हा हुसैन’ करके छाती कूटते हैं!’

    सत्यवक्ता ने स्वयं को और सोहन प्रसाद को हिन्दुओं को सही राह पर चलाने वाले धार्मिक नेता की भूमिका में रखते हुए उचित वक्ता के सम्पादक को कायर बताया- ‘क्या हिन्दू लोगों को कुराह जाते देख यदि हम उन्हें रोकें तो यही हमारा बड़ा अपराध है …. फिर आप अपने अनूठे विचार से भले ही दुम दबाकर भाग जाइए, पर व्यर्थ दूसरों के साहस को क्यों तोड़ते हैं?’

    सत्यवक्ता ने उचित वक्ता के सम्पादक को यह उपालम्भ भी दिया कि- ‘आप सोहन प्रसाद को निजी पत्र लिखकर अपनी राय बता सकते थे। आपने एक साहित्यिक पत्र में ऐसा जघन्य लेख लिखकर दूसरों का जी क्यों दुखाया? दबी जुबान से एक पल के लिए यह भी मान लिया कि इसमें सन्देह नहीं कि कहीं-कहीं इस पुस्तक में कड़े-कड़े शब्द हैं परंतु दूसरे ही पल इन्हें कानूनन आपत्तिजनक मानने से इनकार भी किया, जिन बातों से लाइबल होने की आशा है, वैसे ढूँढे न पाइएगा।’

    सत्यवक्ता ने उचित वक्ता के सम्पादक को सोहन प्रसाद मुदर्रिस की पुस्तक की आलोचना करने के अपराध के लिए हिन्दुओं से क्षमा माँगने के लिए कहा- ‘आपको उचित है कि इस लेख लिखने के अपराध की क्षमा आर्य मात्र से माँगें और अपनी भूल स्वीकार करें।’

    सत्यवक्ता का यह पत्र उन्नीसवीं सदी के भारत में उभरते हुए हिन्दू-असंतोष का परिचायक है। उस काल का हिन्दू अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों को दिए जा रहे बढ़ावे के कारण असंतुष्ट था। इस कारण देश में चारों ओर फिर से अंग्रेजों एवं उनके साथ-साथ मुसलमानों के विरुद्ध 1857 जैसा ही घनघोर वातावरण बनने लगा था। इसी असंतोष की हवा निकालने के लिए ई.1885 में अंग्रेज अधिकारी ए. ओ. ह्यूम ने इण्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य अंग्रेज सरकार के तथा मुसलमानों के विरुद्ध बढ़ते हुए असंतोष को संतुलित करना था।

    सत्यवक्ता की टिप्पणी उस काल के उत्तर भारत के हिन्दुओं में पनप रहे मानसिक उद्वेलन को भलीभांति व्यक्त करती है जो हिन्दी भाषा की आड़ लेकर हिन्दुत्व का उभार चाहते थे और हिन्दुओं को मुसलमानों के मजहब से दूर रखना चाहते थे। उस काल के हिन्दुओं की भाषा मुसलमानों एवं न्यायालयों में बैठे भारतीय जजों के विरुद्ध तो काफी कड़ी थी किंतु अंग्रेजों एवं अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध वे प्रायः चाशनी भरे शब्दों का प्रयोग कर रहे थे।

    वे जानते थे कि विदेशी शासन का विरोध करने के बाद वे जेल जाने से नहीं बच सकते थे। कांग्रेस की स्थापना के समय के हिन्दू, मुसलमानों से तो सड़कों पर निबटना चाहते थे किंतु विदेशी सत्ता से उलझने की बजाय अनुनय-विनय का मार्ग अपनाए हुए थे।

    डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मुकदमे का पटाक्षेप

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    सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मुकदमे का पटाक्षेप

    पूरा देश अंग्रेजी न्यायालय में चल रहे सोहन प्रसाद के मुकदमे को दम साध कर देख रहा था किंतु जब मुसलमानों ने मुकमा वापस ले लिया तो सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मुकदमे का पटाक्षेप हो गया।

    गोरखपुर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में सोहन प्रसाद पर किया गया मुकदमा अधिक लम्बा नहीं खिंचा तथा नवम्बर में मुकदमे की वास्तविक सुनवाई आरम्भ होने से पहले ही गोरखपुर कचहरी के हाते में मुकदमे से जुड़े हिन्दू और मुसलमानों की एक बैठक हुई जिसमें कुछ शर्तों पर समझौता हो गया और मुसलमानों द्वारा न्यायालय से अभियोग वापस ले लिया गया। इस प्रकार सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मुकदमे का पटाक्षेप हो गया।

    30 नवम्बर 1885 को सोहन प्रसाद ने मुकदमे के अन्त के बारे में हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं को जानकारी दी। 30 नवम्बर 1885 के भारत जीवन में छपे अपने पत्र में उन्होंने सूचित किया कि जब हमारा वकील अदालत में मुकदमा लड़ने की तैयारी करने लगा, तब यवन महाशयों के कमल मुख सूख गये और वे संधि करना चाहने लगे। जब हिन्दुओं ने उनसे कहा कि तुमने नालिश की थी, तुम्हीं वापस लो, तो मुसलमान बोले कि कुछ हम लोगों की भी खातिर होनी चाहिए, हमें और कुछ उज्र नहीं है, केवल यही प्रार्थना है कि उमर के निस्बत जो दोहे लिखे हैं, वह पांच-चार दोहे जब दूसरी बेर पुस्तक छपे, तो निकाल दिये जाएँ।

    इस पर कचहरी में हिन्दू और यवनों की एक बड़ी कमेटी हुई। मुसलमानों के गिड़गिड़ाने और हाथ-पैर पकड़ने से हिन्दू भाइयों ने स्वीकार कर लिया कि अच्छा, पाँच-चार दोहे निकल दिये जायेंगे। संधि का एक मजमून तैयार किया गया। जब मजमून मुझे दिखाया गया तो मैंने कहा कि यह कभी न होगा। यदि उमर भी कब्र से निकल आयें और उन दोहों को निकाल देने की प्रार्थना करें, तो भी हमें स्वीकार नहीं।

    सोहन प्रसाद ने इस सूचना में लिखा कि हिन्दुओं के समझाने पर कि ‘दस के बूझे कीजै काज, हारे जीते नहीं लाज’ मथुरा अखबार में भी सम्पादक के द्वारा ऐसी ही सलाह देने तथा चम्पारन हितकारी की भी यही राय होने के अलावा बहुत-से मित्रों ने लिखा और हिन्दूसमाज, आर्यसमाज ने भी ऐसा ही लिख भेजा, लिहाजा हमको स्वीकार करना पड़ा। इसके बाद संधिपत्र तैयार करके मजिस्ट्रेट साहब को दे दिया गया।

    सोहन प्रसाद के अनुसार मुसलमानों ने उनसे कहा कि 250 रुपए की पुस्तकें छपी होंगी। उनका मूल्य 300 रुपए हम देते हैं, आप पुस्तकें यहीं मँगा दो, हम उन दोहों को स्याही से काट देंगे। इस पर उन्हें जवाब मिला कि किताबें कहाँ-कहाँ गयीं, पाठक उन्हें लौटाना चाहेंगे या नहीं, यह सब मुझे क्या पता! बहरहाल, सुलहनामा दाखिल हो गया और सबने अपने-अपने घर की राह ली।

    सोहन प्रसाद का यह विवरण कुछ अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छपे विवरण से मेल नहीं खाता। वर्नाकुलर प्रेस के सम्बन्ध में होने वाली नियमित रिपोर्टिंग में कहा गया कि कोर्ट के बाहर हुए समझौते में सोहन प्रसाद ने यह शर्त कबूल कर ली थी कि वह पहले संस्करण की बाकी बची समस्त प्रतियों को जला देगा और यदि पुस्तक का कोई अगला संस्करण छपता है तो उसमें से आपत्तिजनक दोहों को हटा देगा।

    इस समझौते के बाद यह मुकदमा कोर्ट से हटा लिया गया तथा सोहन प्रसाद मुदर्रिस गुमनामी के नेपथ्य में चले गए। सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मुकदमे का पटाक्षेप हो गया। और कुछ ही समय में लोग इस मुकदमे के बारे में भूल गए।

    यद्यपि सोहन प्रसाद मुदर्रिस के नाटक की भाषा तल्ख थी तथापि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह मुकदमा हिन्दी साहित्य की ऐतिहासिक धरोहर है तथा उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में उत्तर भारत के हिन्दुओं एवं मुसलमानों की उन मनोदशाओं को व्यक्त करता है जिनसे घबराकर अंग्रेज सरकार ने इण्डियन नेशनल कांग्रेस जैसी राष्ट्रव्यापी संस्था की स्थापना की।

    डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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    हिन्दी एवं उर्दू को समान दर्जा

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    हिन्दी एवं उर्दू को समान दर्जा

    ब्रिटिश सरकार ने हिन्दी एवं उर्दू को समान दर्जा देकर इस समस्या को सुलझाना चाहा किंतु समस्या और भी अधिक उलझ गई क्योंकि अंग्रेजों ने जिस हिन्दी को सरकारी न्यायालयों एवं कार्यालयों में मान्यता दी, वह फारसी लिपि में लिखी जाती थी।

    जब उत्तर भारत में हिन्दी-उर्दू विवाद को लेकर साम्प्रदायिक तनाव चरम पर पहुंचने लगा तो सरकार कुछ झुकी। अप्रैल 1900 में उत्तर-पश्चिमी प्रान्त की औपनिवेशिक सरकार ने नागरी और फारसी-अरबी दोनों लिपियों को समान दर्जा देने का आदेश जारी किया।

    इस आदेश का उर्दू समर्थकों ने काफी विरोध किया और हिन्दी समर्थकों ने समर्थन किया। हालाँकि आदेश में उससे भी अधिक प्रतीकात्मक संदेश यह था कि नागरी लिपि के उपयोग के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया था। इस कारण फारसी-अरबी ने उत्तर-पश्चिमी प्रान्त में अपना प्रमुख स्थान बनाये रखा और अवध राज्य में स्वतंत्रता तक इसे मुख्य लेखन भाषा के रूप में जारी रखा।

    ई.1902 में अंग्रेज सरकार ने ‘नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस’ का नाम बदलकर ‘यूनाइटेड प्रोविंस ऑफ आगरा एण्ड अवध’ कर दिया। इसके बाद भी इस प्रांत में हिन्दी और उर्दू का भाषायी विवाद बढ़ता चला गया क्योंकि हिन्दी में फारसी-व्युत्पन्न शब्दों के तुल्य औपचारिक और शैक्षिक शब्दावली के चयन का आधार संस्कृत भाषा में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को बनाया गया। इससे हिन्दू-मुस्लिम मतभेद बढ़ने लगे।

    जब ब्रिटिश सरकार ने अपने कार्यालयों एवं न्यायालयों में फारसी-अरबी लिपि के साथ-साथ देवनागरी लिपि को भी मान्यता दे दी तो भी हिन्दी के प्रयोग की स्थिति में व्यावहारिक रूप से अधिक अंतर नहीं आया। इस कारण अगले तीन दशकों में उत्तर भारत में हिन्दी को उर्दू की तुलना में मजबूत बनाने के लिए कुछ और संस्थाओं का गठन हुआ। इनमें ई.1918 में गठित दक्षिण भारत प्रचार सभा और ई.1926 में गठित राष्ट्रभाषा प्रचार समिति प्रमुख हैं।

    बालगंगाधर तिलक का हिन्दी को समर्थन

    मदनमोहन मालवीय की तरह बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रवादी आन्दोलन के आवश्यक अंग के रूप में देवनागरी लिपि का समर्थन किया। इस काल में कांग्रेसी नेतओं और विभिन्न संस्थाओं के स्वतन्त्रता आन्दोलनकारियों ने अंग्रेजों से मांग की कि वे सरकारी भाषा नीति में हिन्दी का प्रयोग वैकल्पिक भाषा के रूप में करने का प्रावधान करें। बहुत से स्वतन्त्रता सेनानियों का मानना था कि हिन्दी के आन्दोलन से स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किए जा रहे आंदोलन को बल मिलता है।

    इसलिए हिन्दुओं को सरकारी कार्यालयों में हिन्दी के प्रयोग की अनुमति प्राप्त करने के लिए आंदोलन चलाना चाहिए। हिन्दी आंदोलन के इस महत्व को पहचानकर उस काल की बहुत से धार्मिक नेताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, समाज सुधारकों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने भी हिन्दी का समर्थन किया।

    मोहनदास कर्मचंद गांधी का ढुलमुल रवैया

    ई.1920 में बालगंगाधर तिलक की मृत्यु के बाद कांग्रेस का नेतृत्व मोहनदास कर्मचंद गांधी के हाथों में आ गया और वे कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेता बन गए। उन्होंने हिन्दी भाषा के मानकों का पुनः शुद्धीकरण करके पारम्परिक शब्द हिन्दुस्तानी के अन्दर उर्दू अथवा देवनागरी लिपि काम में लेने का सुझाव दिया। इसका कांग्रेस के कुछ सदस्यों तथा भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में सम्मिलित कुछ नेताओं ने भी समर्थन किया किंतु हिन्दू जनता गांधी के इस सुझाव के विरोध में उतर आई। इस कारण गांधी ने अपने विचार बदल लिए तथा भारत राष्ट्र के लिए मानक हिन्दी का समर्थन करने लगे जिसे देवनागरी लिपि में लिखा जाता था।

    हिन्दी और उर्दू दोनों में भाषायी और सांस्कृतिक दूरियाँ बढ़ रही थी। भाषायी आधार पर हिन्दी में संस्कृत से तथा उर्दू में फ़ारसी, अरबी और तुर्की से शब्द लिए जाते रहे। सांस्कृतिक रूप से उर्दू को मुस्लिमों की भाषा के रूप में तथा हिन्दी को हिन्दुओं की भाषा के रूप में देखा जाने लगा।

    1920 के दशक में गांधीजी ने इस स्थिति पर दुःख व्यक्त किया और उन्होंने दोनों भाषाओं के पुनः विलय करके हिन्दुस्तानी को नागरी और फारसी दोनों लिपियों में लिखने का आह्वान किया। एक ओर तो गांधीजी हिन्दुस्तानी बैनर तले हिन्दी और उर्दू को लाने के अपने प्रयास में असफल रहे तथा दूसरी ओर अब हिन्दुओं ने हिंदुस्तानी अथवा किसी अन्य छद्म नाम से उर्दू के अस्तित्व में बनाए रहने को अस्वीकार कर दिया।

    उर्दू लेखकों की चालाकी

    इस काल में जिस प्रकार हिन्दी लेखक हिन्दी के लिए अभियान चला रहे थे, उसी प्रकार अनेक उर्दू लेखक भी उर्दू के पक्ष में आंदोलन तेज कर रहे थे। इन दोनों में अंतर केवल इतना था कि हिन्दी के पक्षधर हिन्दी एवं उर्दू को दो अलग-अलग भाषाएं बताते थे जबकि उर्दू के पक्षधर हिन्दी और उर्दू को एक ही भाषा बताकर उसकी आड़ में उर्दू भाषा को राजकीय भाषा बनाए रखना चाहते थे। इस काल में उर्दू के पक्षधर लोग हिन्दुओं का आह्वान कर रहे थे कि हमें इस व्यर्थ के प्रश्न पर लड़ना नहीं चाहिए। उन्हें गांधी की बात सुननी चाहिए।

    इस काल में मुसलमान हिन्दी एवं उर्दू को समान दर्जा देने का समर्थन करके एक ओर तो हिन्दी के मौलिक स्वरूप को नष्ट करने की वकालात कर रहे थे तो दूसरी ओर अंग्रेजों की भी सहानुभूति प्राप्त कर रहे थे।

    उर्दू के विख्यात कहानीकार सादत हसन मण्टो ने हिन्दी और उर्दू नामक एक व्यंग्यात्मक लेख लिखकर इस विवाद की व्यर्थता को स्पष्ट करने का प्रयास किया। उन्होंने लिखा- ‘हिन्दी और उर्दू का झगड़ा एक ज़माने से जारी है।

    मौलवी अब्दुल-हक़ साहब, डाक्टर ताराचन्दजी और महात्मा गांधी इस झगड़े को समझते हैं लेकिन मेरी समझ से ये अभी तक बालातर है। कोशिश के बावजूद इसका मतलब मेरे ज़हन में नहीं आया। हिन्दी के हक़ में हिन्दू क्यों अपना वक्त ज़ाया करते हैं। मुसलमान, उर्दू के तहफ़्फ़ुज़ के लिए क्यों बेक़रार हैं……? ज़बान बनाई नहीं जाती, ख़ुद बनती है और ना इन्सानी कोशिशें किसी ज़बान को फ़ना कर सकती हैं।

    स्पष्ट है कि सादत हसन मण्टो बड़ी ही चालाकी से, भारत में जो भी भाषा चल रह है उसी को, अर्थात् उर्दू को प्रचलन में बनाए रखने की वकालात कर रहे थे।

    डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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    स्वतंत्र भारत में हिन्दी एवं उर्दू

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    स्वतंत्र भारत में हिन्दी एवं उर्दू

    अंग्रेजों ने हिन्दी एवं उर्दू विवाद को अपने पूरे शासन काल के में बनाए रखा, उसी प्रकार स्वतंत्र भारत में हिन्दी एवं उर्दू विवाद पूरे जोर-शोर से बना रहा। भारत सरकार ने इसे हल करने का प्रयास किया तथा किसी सीमा तक इसमें सफलता भी प्राप्त की।

    भारत विभाजन

    ई.1947 में भारत को ब्रिटिश शासन के नियंत्रण मुक्ति मिली और भारत एवं पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र देश अस्तित्व में आए। स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास लिखने वालों में से बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि भारत के विभाजन में हिन्दी-उर्दू विवाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    भारत में हिन्दी

    स्वतंत्र भारत के हिन्दू हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित करना चाहते थे किंतु भारत में भाषा का प्रश्न फिर से उलझ गया और जब ई.1950 में भारत का संविधान लागू किया गया तो हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित न करके राजभाषा घोषित किया गया। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूचि में हिन्दी के साथ-साथ 21 अन्य भाषाओं को भी राजभाषा घोषित किया गया।

    किसी भी राज्य की विधान सभा अपने प्रांत में इन 22 भाषाओं में किसी भी एक या अधिक भाषाओं को राजकीय कार्यालयों में कामकाज की भाषा अपना सकती है। भारत के लगभग 90 प्रतिशत लोग इन्हीं 22 भाषाओं में से किसी एक को या उससे अधिक भाषाओं को जानते हैं। भारत में 121 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें 10 हजार अथवा उनसे अधिक लोगों का समुदाय बोलता है।

    वर्ष 2011 की जनगणना में भारत के 57 प्रतिशत लोगों ने अपनी मातृभाषा हिन्दी लिखवाई। जबकि यदि पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में रहने वाले जनजातीय कबीलों को छोड़ दिया जाए तो आज भारत में कदाचित ही कोई व्यक्ति होगा जिसे हिन्दी बोलनी नहीं आती होगी या उसे हिन्दी में कही गई बात समझने में कठिनाई होती होगी।

    मानक हिन्दी को बोलने एवं लिखने का ढंग एक ही है किंतु भारत के प्रत्येक प्रांत में हिन्दी को उच्चारित करने के ढंग अलग-अलग हैं। इसका प्रमुख कारण वहाँ बोली जाने वाली क्षेत्रीय भाषाओं का हिन्दी के उच्चारण पर होने वाला प्रभाव है।

    दक्षिण भारत के प्रांतों में राजनीतिक व्यक्तियों द्वारा हिन्दी का विरोध किया जाता है, उसका मुख्य कारण सांस्कृतिक नहीं है, राजनीतिक है। जब भी दक्षिण भारत का कोई व्यक्ति उत्तर भारत के प्रांतों में या केन्द्र सरकार के संस्थानों में काम करने आता है, तब वह बड़ी सरलता से हिन्दी का प्रयोग करता है।

    इस प्रकार हिन्दी आज सम्पूर्ण भारत की सम्पर्क भाषा है जबकि दूसरी ओर उर्दू भाषा भारत से शनैःशनैः समाप्त होती जा रही है। इतना अवश्य है कि हिन्दी भाषा में आज भी कुछ अरबी-फारसी शब्द अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं जिन्हें उर्दू की आखिरी निशानियां माना जा सकता है। कुछ साम्यवादी लेखक और कुछ उर्दू भाषा के लेखक अपनी राजनतिक रोटियां सेकने के लिए आज भी उर्दू की उतनी ही जोश से पैरवी करते हैं, जितनी कि उन्नीसवीं सदी के अंत तथा बीसवीं सदी के मध्य में की जाती थी।

    पाकिस्तान में उर्दू

    पाकिस्तान ने अपने अस्तित्व में आते ही अर्थात् ई.1947 में उर्दू को अपनी राष्ट्रभाषा घोषित किया किंतु सम्पूर्ण पाकिस्तान में उर्दू अपनी स्वीकार्यता नहीं बना सकी। पाकिस्तान में सिंधी, पंजाबी, बलूच आदि भाषाओं को बोलने वाले लोगों की संख्या उर्दू बोलने वालों से अधिक थी फिर भी पश्चिमी पाकिस्तान के लोग चाहते थे कि पाकिस्तान में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को केवल उर्दू में ही बोलने-लिखने की अनुमति हो। जबकि पूर्वी पाकिस्तान के लोग चाहते थे कि हम पर उर्दू न थोपी जाए क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान में अधिक संख्या बांग्ला बोलने वालों की थी।

    कुछ ही वर्षों में पाकिस्तान में उर्दू-बांग्ला का विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने बांग्ला भाषा के समर्थन में तथा उर्दू भाषा के विरोध में संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष में पाकिस्तान की फौज ने लगभग 30 लाख बांग्लाभाषी लोगों की हत्या की।

    यह तो नहीं कहा जा सकता कि पूर्वी पाकिस्तान एवं पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों के बीच केवल उर्दू एवं बांग्ला भाषा को लेकर संघर्ष हुआ, अन्य राजनीतिक कारण भी थे किंतु सबसे बड़ा मुद्दा भाषा का ही था। पाकिस्तान की पंजाबी लॉबी नहीं चाहती थी कि कोई गैर पंजाबी या कोई गैर उर्दूभाषी मुसलमान पाकिस्तान का राष्ट्रपति बने। इसी संघर्ष के चलते ई.1971 में पाकिस्तान का विभाजन हुआ और पाकिस्तान तथा बांग्लादेश नामक दो देश अस्तित्व में आए।

    बांग्लादेश में भाषाई संघर्ष

    ई.1971 में बांग्लादेश ने अस्तित्व में आते ही बांग्ला को अपनी राष्ट्रभाषा घोषित किया। अब बांग्लादेश के लोग समझते थे कि केवल उन्हीं लोगों को बांग्लादेश में रहने का अधिकार है जो बांग्ला भाषा बोलना जानते हैं।

    जबकि इस काल में बांग्लादेश में करोड़ों लोग ऐसे थे जो बांग्ला भाषा बोलना नहीं जानते थे। इनमें अधिकतर वे मुसलमान थे जो भारत विभाजन के कारण भारत से भागकर पूर्वी पाकिस्तान पहुंचे थे तथा उर्दूभाषी थे। जब बांग्लाभाषी मुसलमानों ने गैर-बांग्ला भाषी मुसलमानों को मारना आरम्भ किया तो उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। इतिहास ने उन्हें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ उन्हें पैर रखने के लिए धरती कम पड़ गई थी।

    जब पूर्वी-पाकिस्तान में हिन्दुओं को सताया जाता था अथवा मारा जाता था तो हिन्दू परिवार बांग्लादेश से भारत की ओर भागने का प्रयास करते थे किंतु जब पूर्वी पाकिस्तानके उर्दू बोलने वाले बिहारी मुसमलमानों को बंग्ला-भाषी मुसलमानों द्वारा सताया जाता था या मारा जाता था, तो उन्हें ऐसे देश की तरफ भागना पड़ता था जहाँ से वे अथवा उनके धर्म के लोग कुछ समय पूर्व ही धर्म के आधार पर भागकर आए थे।

    इस प्रकार पूर्वी-पाकिस्तान में भयानक मारकाट मच गई। बंग्ला-भाषी मुसलमान एक ओर तो बंग्ला-भाषी हिन्दुओं को मारकर भगा रहे थे तो दूसरी ओर उर्दू-भाषी बिहारी मुसलमानों को। एक बार फिर से पूर्वी-पाकिस्तान खून से भीग गया और पश्चिमी बंगाल जान बचाकर भाग आने वाले शरणार्थियों से भर गया।

    विश्व भर में हिन्दी भाषा

    आज विश्व भर में हिन्दी बोलने वालों की संख्या दूसरे नम्बर पर है। संसार में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा चीनी है तथा उसके बाद हिन्दी भाषियों की संख्या है। संसार भहर में 80 करोड़ लोगों से अधिक जनसंख्या हिन्दी बोलती है। इसे संसार के 28 देशों में प्रमुखता के साथ बोला जाता है तथा साथ ही आज संसार में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहाँ हिन्दी भाषी लोग न रहते हों।

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    मदर इण्डिया और दुखी भारत

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    मदर इण्डिया और दुखी भारत

    मदर इण्डिया और दुखी भारत दो पुस्तकें हैं। मदर इण्डिया की लेखिका कैथरीन मेयो अमरीका की रहने वाली थीं। उन्होंने भारतवासियों को नीचा दिखाने के लिए यह पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक का जवाब देने के लिए लाला लाजपतराय ने दुखी भारत नामक पुस्तक लिखी।

    ई.1927 में मिस कैथरीन मेयो नामक एक अमरीकी महिला ने ‘मदर इण्डिया’ शीर्षक से एक पुस्तक लिखकर हिन्दुओं को पराधीन, पतित, घृणित तथा हेय जाति बताया। उसने भारतीय समाज में शूद्रों और महिलाओं की स्थिति को संसार के समक्ष उजागर किया। उसने दावा किया कि उसने भारत में रहकर अपनी आंखों से देखा कि भारत के उच्च जातियों के लोग निम्न जाति के लोगों से तथा पुरुष वर्ग स्त्री जाति से कितना बुरा बर्ताव करता है तथा उनका शोषण करता है। इस कारण आम हिन्दुस्तानी का जीवन बहुत कष्टमय है। भारतीय महिलाओं की स्थिति पर कटाक्ष करते हुए उसने लिखा-

    ‘भारतीय स्त्रियां व्यायाम करना पसंद नहीं करती हैं और उसे दबाव में करती हैं। यदि वे चाहें, तो खुली हवा में भी नहीं जाएं। एक औसत छात्रा बहुत कमजोर होती है। उसे अच्छे भोजन, व्यायाम और इलाज के लिए व्यायाम की जरूरत है किंतु उसका सीना सिकुड़ा हुआ और पीठ प्रायः झुकी हुई होती है।’

    मिस कैथरीन मेयो की पुस्तक मदर इण्डिया सनातन हिन्दू धर्म तथा संस्कृति पर गंभीर हमला करती है। इस पुस्तक की आड़ में मिस कैथरीन ने लिखा कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता भी उच्च वर्णों में जन्मे हैं, इसलिए वे सब भी निंदनीय हैं। यह पुस्तक पूरे यूरोप में बिकने लगी जिसके कारण हिन्दू जाति की बड़ी बदनामी हुई।

    मिस कैथरीन की पुस्तक मदर इण्डिया की प्रतिक्रिया में पंजाब में शिक्षा एवं समाज सुधार के क्षेत्र में कार्यरत प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय ने ‘दुखी भारत’ शीर्षक से एक मोटी पुस्तक लिखी जिसमें अमरीकियों एवं यूरोपियनों को घृणित एवं हेय बताया तथा उन्हीं पर हिन्दुओं की वर्तमान स्थिति का ठीकरा फोड़ा। लाला लाजपतराय ने मिस कैथरीन से पूछा कि अकारण ही हिंदुओं को अपमानित करने से अमरीकियों को क्या लाभ होने वाला है?

    लाला लाजपत राय ने अंग्रेजों को भारत का शोषण करने के लिए धिक्कारा तथा अमीरीकियों को अपने ही देश में रह रही हबशी जाति का शोषण करने के लिए धिक्कारते हुए लिखा कि अमरीका में जितनी जाति के लोग रहते हैं या सैर के लिए आते हैं, उन सबकी पाशविक वासनाओं को तृप्त करने के लिए हबशी महिलाएं विवश की जाती हैं। इस नाम मात्र की हबशी जाति की नसों में मनुष्य की प्रत्येक जाति या उपजाति का रक्त दौड़ रहा है। वह रक्त सम्मिश्रण समस्त जाति में ही नहीं, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भी पाया जाता है और इस प्रकार मिश्रित हुआ है कि वह पृथक् नहीं किया जा सकता।

    लाला लाजपत राय द्वारा लिखी गई पुस्तक की गूंज पूरी दुनिया में पहुंची तथा अमरीकियों एवं समस्त यूरोपियन जातियों सहित अंग्रेजों को भी इस बात का अहसास हो गया कि अब हिन्दू जाति चुप होकर बैठने वाली नहीं है। वह शीघ्र ही उठ खड़ी होगी और अंग्रेजों को कान से पकड़कर भारत से बाहर कर देगी।

    लाला लाजपत राय की यह पुस्तक ही उनके जीवन की अंतिम कृति सिद्ध हुई। इस पुस्तक के प्रकाशित होने के के अगले वर्ष ही ई.1928 में अंग्रेजों ने लाला लापजत राय को भारत की सड़कों पर उस समय लाठियों से पीट-पीटकर मार दिया जिस समय वे साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर की सड़कों पर एक जुलूस निकाल रहे थे। अंग्रेजों की ये लाठियां ही अंग्रेजी सरकार के कफन की कीलें सिद्ध हुईं और अगले 19 वर्षों में ही अंग्रेजी सरकार भी अपनी मौत मर गई।

    डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    भगवा रंग के क्या अर्थ हैं?

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    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री आदित्यनााि योगी

    हम एक दीप जलाएं तथा उसकी ज्योति को ध्यान से देखें, इस ज्योति में कई रंग दिखाई देते हैं। इन रंगों में नीले, श्वेत, पीले, लाल एवं भगवा रंग प्रमुख होते हैं। ज्योति के भीतर स्थित विभिन्न रंग वस्तुतः ज्योति की प्रचण्डता की विभिन्नता के कारण दिखाई देते हैं।

    ज्योति के जिस भाग में नीला रंग होता है, उसकी प्रचण्डता सर्वाधिक होती है। यही कारण है कि ऋषियों ने भगवान विष्णु का रंग नीला बताया है।

    दीपक की ज्योति में जो श्वेत रंग दिखाई देता है, इसकी प्रचण्डता नीले रंग की ज्वाला से कम होती है। भगवान शिव का रंग ‘कर्पूर गौरम्’ अर्थात् कर्पूर की तरह श्वेत है, माता पार्वती का नाम ‘गौरा’ है, अर्थात् वे भी श्वेत रंग की हैं। सीताजी भी गोरी हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि भगवान शिव, माता पार्वती एवं माता सीता भगवान विष्णु के अपेक्षाकृत शांत स्वरूप हैं।

    ज्योति में जो पीला रंग दिखाई देता है, वह प्रचण्डता की दृष्टि से तीसरे नम्बर पर आता है। लक्ष्मणजी का रंग पीला है। ज्योति में जो लाल रंग दिखाई देता है, वह प्रचण्डता की दृष्टि से चौथे नम्बर पर आता है, हनुमानजी का रंग लाल है।
    ज्योति में दिखाई देने वाला पांचवां रंग जो कि लाल और पीले के मिश्रण से बनता है, उसे हम भगवा रंग कहते हैं। यह रंग ही भगवान के सबसे शांत स्वरूप का दर्शन कराता है। इसी कारण हमने ‘भगवा’ रंग वाले ईश्वर को ‘भगवान’ कहा।

    नीले रंग वाले अत्यंत प्रचण्ड ज्योर्तिस्वरूप से ही भगवान के क्रमशः शांत होते हुए स्वरूपों का प्रादुर्भाव होता है। भगवान के विभिन्न स्वरूपों के रंग अलग-अलग इसलिए हैं, क्योंकि भिन्न प्रचण्डताओं वाले ज्योतिस्वरूप ईश्वरीय स्वरूप मिलकर इस सृष्टि को संभव बनाते हैं।

    जब ज्योतिर्मय भगवान की प्रचण्डता कम होती हुई भगवा होने लगती है, तब वह शक्ति संसार में अत्यल्प स्थूल रूप में (लगभग न के बराबर) दिखाई देने लगती है। इसे ही भग कहा जाता है। जिसका अर्थ होता है- ‘आंख!’

    ‘भगवान’ शब्द की व्युत्पत्ति इसी ‘भग’ से हुई है। इसका आशय है कि भग वाले अर्थात् ‘आँख’ वाले को भगवान कहते हैं। अर्थात् ‘भगवान्’ ईश्वर का ऐसा स्वरूप है जो हमें देखता है।

    हम प्रायः भगवान शिव के चित्र में तीसरे नेत्र को भी देखते हैं। यह नेत्र दीपशिखा अथवा ज्योति के सदृश्य बनाया जाता है। अर्थात् भगवान की तीसरी आंख जो कि ज्योतिर्मय है, यह ज्योति ही संसार का निर्माण करती है, उसका पालन करती है और संहार करती है।

    जब ज्योति प्रचण्ड रूप धारण करती है तो उसे अग्नि कहा जाता है। ज्योति स्वरूप भगवान भी वस्तुतः प्रचण्ड अग्नि ही हैं। ‘राम’ शब्द का निर्माण भी ‘र’ तथा ‘ओम’ से मिलकर हुआ है जिसमें ‘र’ का अर्थ अग्नि है तथा ‘ओम’ का अर्थ ईश्वर है। इस प्रकार का अर्थ हुआ- वह ईश्वर जो अग्नि स्वरूप है।

    यह ईश्वर रूपी अग्नि ही समस्त जीवों में व्याप्त है। सकल निर्जीव पदार्थ भी इसी अग्नि से बने हैं। इसीलिए हिन्दू अग्नि को भगवान को भगवान के रूप में देखते और समझते हैं।

    हिन्दू साधु-संत अग्नि के रंग धारण करते हैं जिनमें लाल, पीले और भगवा रंग प्रमुख हैं। श्वेत और काले रंग भी इसी अग्नि में समाहित हैं। सज्जन प्रकृति के सांसारिक व्यक्ति श्वेत रंग धारण करते हैं जो वस्तुतः भव्यता का प्रतीक है। तामसिक प्रकृति के लोग काला रंग धारण करते हैं जो दूसरों पर अधिकार जमाने की प्रवृत्ति का प्रतीक है।

    साधु-संन्यासी एवं योगी प्रचण्ड अग्नि के स्थान पर परमात्मा के अत्यंत शांत स्वरूप अर्थात् ज्योति का रंग धारण करते हैं। यही भगवा रंग है। योगियों, तपस्वियों एवं उदासियों का रंग होने के कारण इस रंग को जोगिया रंग भी कहा जाता है। इसीलिए हिन्दू धर्म एवं हिन्दू जाति में भगवा रंग की अत्यंत प्रतिष्ठा है।

    भगवा रंग किसी भी दृष्टि से उग्र प्रवृत्ति का नहीं, अपितु शांत प्रवृत्ति का द्योतक है। यह आक्रामकता का नहीं, अभयदान का प्रतीक है। यह अधर्म से दूर रहने तथा धर्म की स्थापना के संकल्प का प्रतीक है। अतः जब भी हम भगवा रंग देखें, भगवान को नमन् करें। भगवा रंग ही इस सम्पूर्ण सृष्टि की अस्मिता है।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    उपन्यासों में सौन्दर्य दृष्टि

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    उपन्यासों में सौन्दर्य दृष्टि

    डॉ. मोहनलाल गुप्ताजी के उपन्यासों में सौन्दर्य दृष्टि’ शीर्षक से लिखे गए शोधग्रंथ में गुप्ताजी के तीन उपन्यासों- चित्रकूट का चातक, संघर्ष एवं पासवान गुलाबराय की समालोचना की गई है तथा इन उपन्यासों में लेखक की सौन्दर्य दृष्टि की विवेचना की गई है।

    साहित्य-सृजन का मूल उद्देश्य सम्पूर्ण सृष्टि को सुंदर बनाना है। इसलिए हर युग के लेखक द्वारा साहित्य के माध्यम से सौन्दर्य का सृजन किया जाता है। इस ग्रंथ में डॉ. मोहनलाल गुप्ताजी के तीन उपन्यासों की ‘सौन्दर्य शास्त्र’ की दृष्टि से विवेचना की गई है।

    सौन्दर्य शास्त्र ‘दर्शन’ की वह शाखा है जिसके अंतर्गत कला, साहित्य और सौन्दर्य के अन्तरंग सम्बन्धों का विवेचन किया जाता है। इसे सौन्दर्य-मीमांसा, रस-मीमांसा एवं सौन्दर्य का सिद्धांत भी कहा जाता है। अर्थात् सौन्दर्य शास्त्र वह शास्त्र है जिसके अंतर्गत, साहित्य में निहित रहने वाले सौन्दर्य का तात्विक और मार्मिक विवेचन किया जाता है।

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    डॉ. मोहनलाल गुप्ता आधुनिक काल के सफल उपन्यासकार, कहानीकार एवं लेखक हैं। उन्होंने विगत लगभग चालीस वर्षों में अपने शताधिक ग्रंथों, सहस्राधिक आलेखों एवं फुटकर रचनाओं के माध्यम से इस सृष्टि को सुंदर बनाने की साधना की है। गुप्ताजी द्वारा रचित साहित्य में उपन्यास, नाटक, कहानियाँ, काव्य संग्रह आदि साहित्यक विधाओं के ग्रंथ तो हैं ही, साथ ही वे भारत के जाने-माने इतिहासकार भी हैं जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् के वर्षों में हुई नवीन शोधों से प्राप्त नवीन ऐतहासिक तथ्यों को आधार बनाकर भारत के इतिहास का पुनर्लेखन किया है। भारत की पुरातन सभ्यताओं, प्राचीन संस्कृतियों एवं पौराणिक साहित्य पर भी गुप्ताजी ने विपुल लेखनी चलाई है। उनके उपन्यास साहित्य में साहित्य एवं इतिहास का बहुत सुंदर समन्वय हुआ है। प्रस्तुत ग्रंथ में गुप्ताजी के तीन उपन्यासों- ‘संघर्ष’, ‘चित्रकूट का चातक’ एवं ‘पासवान गुलाबराय’ का सौन्दर्य शास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार के ग्रंथों के लेखन के लिए सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययनकर्त्ता को साहित्य की प्रकृति के क्रमबद्ध अध्ययन, साहित्य के विश्लेषण की दक्षता एवं तात्विक दृष्टि की तो आवश्यकता होती ही है, साथ ही उसे साहित्य के आचार्यों द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों एवं भारतीय चिंतन परम्परा की भी गहरी जानकारी होनी चाहिए।

    इस ग्रंथ की मूर्धन्य लेखिका डॉ. लता शर्मा द्वारा ग्रंथ-लेखन में जिस प्रतिभा का परिचय दिया गया है, वह हर दृष्टि से स्तुत्य है। वे बैकुंठी देवी कन्या महाविद्यालय, आगरा में हिन्दी विभाग की अध्यक्ष रहीं। उन्होंने इस विषय को वर्षों तक पढ़ा एवं पढ़ाया है और वे इस विषय की प्रखर आचार्य हैं।

    सैद्धांतिक रूप से सौन्दर्य शास्त्र के अंतर्गत काव्य-सौन्दर्य (साहित्य-सौन्दर्य) का परीक्षण कर आधारभूत सिद्धांत का प्रतिपादन किया जाता है। इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर काव्य (साहित्य) के विभिन्न अंगों का मूल्यांकन किया जाता है। इस दृष्टि से डॉ. लता शर्मा ने गुप्ताजी के उपन्यासों का बड़ी गइराई से विवेचन प्रस्तुत किया है।

    इस प्रकार के सौन्दर्यशास्त्रीय विवेचन तब तक नहीं किए जा सकते जब तक कि अध्ययनकर्त्ता, साहित्यकार के दृष्टिकोण को न पकड़ पाए। डॉ. लता शर्मा ने गुप्ताजी के उपन्यासों का अध्ययन प्रस्तुत करते समय लेखक के दृष्टिकोण को बहुत अच्छी तरह से आत्मसात् किया है, अन्यथा इस प्रकार की श्रेष्ठ विवेचना संभव नहीं थी।

    किसी साहित्यक रचना को समग्र रूप में परखने अथवा उसका मूल्यांकन करने की प्रक्रिया को ‘आलोचना’ अथवा ‘समालोचना’ भी कहा जाता है। इस दृष्टि से डॉ. लता शर्माजी का यह ग्रंथ गुप्ताजी के उपन्यासों पर समालोचना प्रस्तुत करता है। आधुनिक परिभाषाओं के अनुसार आलोचना ‘साहित्यकार’ और ‘पाठक’ के बीच की योजक कड़ी है। डॉ. लता शर्माजी ने इस ग्रंथ के माध्यम से यही कार्य किया है।

    कोई भी रचना अच्छी है या बुरी, यह निर्णय कर देना ही आलोचना नहीं है, अलोचना का वास्तविक उद्देश्य, रचना का प्रत्येक दृष्टि से मूल्यांकन कर पाठक के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। साथ ही पाठक की रुचि का परिष्कार करना भी आलोचक का धर्म है, ताकि पाठक की साहित्यक समझ का विकास हो। डॉ. लता शर्माजी ने इस ग्रंथ में आद्योपरांत इस धर्म का निर्वहन किया है।

    साहित्य-सिद्धांत और समालोचना में चोली-दामन का साथ है। साहित्य-शास्त्र के ज्ञान से आलोचक को व्यावहारिक दृष्टि मिलती है। कुछ मौलिक सिद्धांत जैसे रस, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि, अनुकरण सिद्धांत, विरेचन सिद्धांत आदि का ज्ञान साहित्यकार, पाठक और अलोचक, तीनों के लिए उपयोगी होता है। यह सृजन के मूल्यांकन में काफी मदद पहुंचाता है।

    मूल्यांकन में वैयक्तिक रुचियों या प्रभावों को स्थान नहीं मिलना चाहिए। आलोचक की व्यक्तिगत मान्यताएं कुछ भी हो सकती हैं किंतु साहित्यक कृति का मूल्यांकन व्यक्तिगत मान्यताओं पर न करके, सौन्दर्यशास्त्र के स्थापित मानदण्डों पर किया जाना चाहिए। डॉ. लता शर्माजी का यह ग्रंथ इन समस्त कसौटियों पर खरा उतरता है।


    इस पुस्तक का लेखन वर्ष 2016 में पूर्ण कर लिया गया था किंतु इसके प्रकाशन में लगभग सात वर्ष का विलम्ब हो गया। इसके कई कारण रहे जिनमें से कोरोना जैसी परिस्थितियां भी किसी सीमा तक जिम्मेदार रहीं। इस बीच गुप्ताजी के कुछ और उपन्यास भी आए हैं किंतु इस ग्रंथ में केवल तीन उपन्यासों की विवेचना को ही सम्मिलित किया जा सका है।

    श्रमसाध्यम कार्य होने से इस कार्य में विपुल ऊर्जा एवं समय की आवश्यकता होती है। डॉ. लता शर्माजी ने यह चुनौती स्वीकार की तथा इस कार्य को पूर्ण किया। इस श्रमसाध्य कार्य के लिए मैं डॉ. लता शर्माजी के प्रति आभार व्यक्त करती हूँ, साथ ही ग्रंथ के प्रकाशन में हुए विलम्ब के लिए क्षमा प्रार्थना भी करती हूँ।

    मैं आशा करती हूँ कि यह ग्रंथ गुप्ताजी के उपन्यास-साहित्य में समाहित सौन्दर्य-दृष्टि को समाज के समक्ष रखने में सफल होगा। शुभम्

    • मधुबाला गुप्ता

    भारतीयों का डीएनए एक है क्या?

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    भारतीयों का डीएनए - www.bharatkaitihas.com
    भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू

    विगत लगभग एक दशक से भारत की राजनीति में भारतीयों का डीएनए चर्चा के मुख्य विषयों में बना हुआ है। आरएसएस के सरसंघ चालक मोहन भागवत समस्त भारतीयों का डीएनए एक बताते हैं, किंतु क्या इस बात में किंचित् भी सच्चाई है?

    पिछले कुछ समय से देश के समक्ष यह अवधारणा प्रस्तुत की जा रही है कि विगत चालीस हजार साल से भारत के लोगों का डीएनए एक है! संभवतः इस बात को इसलिए बार-बार दोहराया जा रहा है कि ‘डीएनए का एक होना’ अच्छी बात है।

    चालीस हजार साल की अवधि भारत में ‘उत्तर पाषाण काल’ के आरम्भ होने की अवधारणा से ली गई जान पड़ती है, जब मनुष्य का नवीनतम संस्करण ‘क्रो-मैगनन मैन’ भारत की धरती पर पहली बार दिखाई दिया। इस प्रकार समस्त भारतीयों को मानव के उसी संस्करण की संतान मान लिया गया है।

    विज्ञान के आधार पर न तो समस्त भारतीयों के ‘क्रो-मैगनन मैन’ की संतान होने की बात सही ठहरती है और न भारतीयों का डीएनए एक होने की बात सही ठहरती है। आधुनिक पुरातत्व विज्ञान ने भारत में मिली आदिम खोपड़ियों से छः प्रकार के डीएनए की पहचान की है- नीग्रेटो, प्रोटोऑस्ट्रेलॉयड, मंगोलायड, मेडिटेरियन द्रविड़, वेस्टर्न ब्रेचीसेफल्स तथा नॉर्डिक।

    इन छः प्रकार के आदिम डीएनए से मुण्डा, संथाल, द्रविड़, निषाद, कोल और किरात आदि जनसमुदायों की उत्पत्ति हुई है। आर्य-जनसमुदाय छः प्रकार के आदिम डीएनए से अलग है। अतः विज्ञान इस बात की पुष्टि नहीं करता कि भारतीयों का डीएनए एक है।

    यदि कन्वर्टेड मुसलमानों एवं कन्वर्टेड ईसाइयों को लक्ष्य करके हिन्दुओं, मुसलमानों एवं ईसाइयों के डीएनए का उद्गम एक ही मान लिया गया है, तो भी भारत के विगत 1400 साल के इतिहास के आधार पर यह अवधारणा गलत सिद्ध होती है कि समस्त भारतीयों का डीएनए एक है। हिन्दुओं के डीएनए का मूल हिस्सा आर्य, द्रविड़, मंगोल, मुण्डा तथा संथाल आदि आदिम जनजातीय समूहों से आया है। उसमें ईरानी एवं यूनानी आर्यों का डीएनए भी मिश्रित है।

    मुसलमानों के डीएनए में अरब, मेसोपोटामिया (ईराक), पर्शिया (ईरान) तथा अफगानिस्तान से आए हुए डीएनए का मिश्रण है जिसमें कुछ हिस्सा हिन्दुओं से कन्वर्टेड मसुलमानों का भी है। आज के भारतीय ईसाइयों के डीएनए में यूरोप के इंग्लैण्ड, फ्रांस, स्पेन, नीदरलैण्ड तथा पुर्तगाल आदि देशों से आया हुआ डीएनए शामिल है। पारसियों का डीएनए तो मूलतः ईरान से ही आया है।

    हम भारतीयों के ज्ञान का आदिस्रोत वेद है, अतः इस संदर्भ में वेदों को भी देखा जाना चाहिए। वेदों में डीएनए के एक होने की अवधारणा नहीं है। वहाँ देवों, दस्युओं एवं आर्यजनों की चर्चा है। वेद डीएनए के एक होने की नहीं, मन, विचारों और चेष्टाओं के एक होने की बात कहता है।

    ऋग्वेद कहता है-

    ‘समानी व आकूतिः समाना हृदयानी वः।’ (ऋग्वेद 10/191) अर्थात्- हमारी अभिव्यक्ति एक जैसी हो, हमारे अन्तःकरण एक जैसे हों।

    ‘समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सहचित्तमेषाम्।’ (ऋग्वेद 8/49/3) अर्थात्- मिलकर कार्य करने वालों का मन्त्र समान होता है। चित्त सहित इनका मन समान होता है।

    ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।’ (ऋग्वेद 10/191/2) अर्थात्- हम सब एक साथ चलें, आपस में संवाद करें, हमारे मन एक हों।

    इस प्रकार वेदों में डीएनए जैसे किसी विचार की अवधारणा नहीं है।

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    यदि भारत के संविधान पर दृष्टिपात करें तो हम पाते हैं कि किसी को भी भारत की नागरिकता डीएनए के आधार पर नहीं मिली, संविधान के आधार पर मिली है। संविधान में डीएनए को किसी भी तरह व्याख्यायित नहीं किया गया है, चर्चा तक नहीं की गई है। अतः वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, अध्यात्मिक, राजनीतिक किसी भी स्तर पर समस्त भारतीय एक ही डीएनए समूह से निकले हुए दिखाई नहीं देते। यह भी विचारणीय है कि डीएनए भारतीयों के लिए कभी समस्या या चिंतन का विषय नहीं रहा। हो सकता है कि इस चिंतन का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता स्थापित करना हो किंतु डीएनए के आधार पर यह एकता स्थापित करना एक दूर की कौड़ी है। यदि डीएनए एकता का आधार होता तो कौरवों और पाण्डवों में एकता स्थापित हो ही गई होती। कंस और भगवान श्रीकृष्ण का डीएनए एक ही था। आतताई रावण और धर्मात्मा विभीषणजी का डीएनए भी एक ही था। हिरणाकश्यपु और भक्तराज प्रहलाद का डीएनए भी एक ही था। भारत में रह गए और पाकिस्तान चले गए मुसलमानों का डीएनए भी एक ही था। अब इसके उलटे उदाहरण देखते हैं।

    समान डीएनए वाली माता कैकेई ने रामजी को वनवास दे दिया। जबकि असमान डीएनए वाले रामजी ने जटायु की अंत्येष्टि इस भाव से की जिस प्रकार कोई पुत्र अपने पिता की अंत्येष्टि करता है- ‘तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम।’ उन्हीं रामजी ने अलग डीएनए वाली शबरी के झूठे बेर खाए।

    मध्यकाल में दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक और सिकन्दर लोदी की माताएं हिन्दू स्त्रियाँ थीं किंतु इन दोनों सुल्तानों ने भारत की हिन्दू प्रजा पर जो अत्याचार किए उनका खूनी भारतीय इतिहास की पुस्तकों में भलीभांति अंकित है। मुगल बादशाह जहांगीर की माता हिन्दू थी। उसके पुत्र शाहजहाँ की माता भी हिन्दू स्त्री थी।

    इस प्रकार औरंगजेब की दादी और परदादी दोनों हिन्दू थीं। इन तीनों बादशाहों ने देश की बहुसंख्य हिन्दू प्रजा पर जो अत्याचार किए, उनसे कौन परिचित नहीं है। इन सबकी हड्डियों में हिन्दुओं का डीएनए था। फिर वे हिन्दुओं के प्रति सहानुभूति क्यों नहीं रख सके?

    यदि इसका उलटा करके देखें तो खानखाना अब्दुर्रहीम, सयैद रसखान और चांदबीबी की माताएं हिन्दू नहीं थीं किंतु इन तीनों ने भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करके भारत की बहुसंख्य प्रजा को श्रीकृष्ण भक्ति पर अटल रहने का मार्ग दिखाया। उपरोक्त उदाहरणों के आधार पर यदि यह कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भगवान और उनके भक्त का डीएनए एक होता है, न कि विरोधी विचारों वाले माता और पुत्र का!

    कुछ ही वर्ष पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बीच जो स्वागत-मिलन हुआ, उस दृश्य की सुगंध वैसी ही प्रसन्नतादायक थी जैसी रामजी और भरतजी के मिलाप के समय रही होगी। निश्चय ही भारत और इजराइल के प्रधानमंत्रियों का डीएनए एक नहीं है, और इससे दोनों देशों के सांस्कृतिक प्रेम की सुगंध मंद नहीं हो जाती!

    कहने का आशय केवल इतना है कि डीएनए कभी भी एकता स्थापित करने के उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता। डीएनए की एकता के बिना भी वह उद्देश्य पूरा हो सकता है और एक ही डीएनए के बीच कौरव-पाण्डवों जैसी शत्रुता स्थापित हो सकती है। खोखले नारों से देश की एकता कभी स्थापित नहीं हो सकती। डीएनए की एकता भी एक खोखला नारा प्रतीत होता है। भारत के जनसामान्य में डीएनए किसी भी प्रकार के चिंतन का आधार नहीं है!

    जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक के प्रधानमंत्रित्व काल में भारत में राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य से कुछ बातें इस प्रकार कही जाती थीं- लहू का रंग एक है; अनेकता में एकता – हिन्द की विशेषता; कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। हम जानते हैं कि ऊपरी तौर पर ये नारे ठीक ही दिखते थे किंतु भीतर से ये तीनों नारे खोखले थे। लहू का रंग तो चोर और सिपाही का भी एक ही होता है; चूहे और बिल्ली का भी एक ही होता है।

    जिस कश्मीर की बात कही गई है, उसमें से अधिकतर हिस्सा पाकिस्तान एवं चीन के पास जा चुका है। ‘अनेकता में एकता’ वैसी ही बात है जैसे गुलाब की झाड़ी पर गुलाब और कांटे दोनों होते हैं और कोई व्यक्ति इस आधार पर गुलाब और कांटों के गुणों में एकता स्थापित करने का प्रयास करे!

    वर्ष 1947 तथा उसके बाद हमारे देश के तीन टुकड़े हो जाने के बाद आज भी विभाजनकारी शक्तियाँ देश को खण्ड-खण्ड करने पर तुली हुई हैं। अतीत में अमर हो गए लाला लाजपत राय, सरदार भगतसिंह, हरगोबिंद खुराना और आज के खालिस्तान समर्थकों का डीएनए भी एक ही है। क्या उनके जीवन मूल्यों में कहीं-कोई साम्य है? डीएनए ढूंढने से तो गुमराह होने की दिशा प्राप्त होगी।

    कड़वी सच्चाई यह है कि जब तक देश में रहने वाले लोगों के जीवन मूल्य एक नहीं होंगे तब तक देश में एकता का स्थापित होना आकाश-कुसुम प्राप्त करने की कल्पना ही बना रहेगा। डीएनए जीवन मूल्यों का निर्माण नहीं करता! हमारा अभीष्ट डीएनए नहीं, हमारा अभीष्ट है- वन्दे मातरम्, भारत माता की जय, जयहिन्द, जय भारत।

    डीएनए की परख राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में कोई मायने रखती हो, ऐसा लगता नहीं है। राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में डीएनए को ढूंढना तो गुमराह होकर वास्तविक समस्या से दूर हो जाने जैसा है!

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

    बेबी को बुरका पसंद है!

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    बेबी को बुरका पसंद - www.bharatkaitihas.com
    बेबी को बाबुल नहीं बुरका पसंद है!

    यह लिखते हुए आत्मा हाहाकर करती है कि अब भारतीय बेबी को बुरका पसंद है, बाबुल तो उसे दुश्मन जैसा दिखाई देता है। भारतीय युवतियों के मन में यह परिवर्तन आजादी के बाद के वर्षों में भारत सरकार, भारत के संविधान, भारतीय सिनेमा तथा भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे पाठ्यक्रमों के माध्यम से किया गया है।

    भारत की जनसंख्या वर्ष 2001 से 2011 के बीच में 1.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी थी जबकि ई.2011 से 2022 के बीच में 1.2 प्रतिशत बढ़ी है। इस दर से बढ़ती हुई आबादी भी भारत पर इतना बोझ डाल रही है कि हम अगले कुछ ही महीनों में 140 करोड़ आबादी वाले चीन को पीछे छोड़कर विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश हो जाएंगे। यदि इसी गति से बढ़ते रहे तो ई. 2050 तक भारत की जनंसख्या 166 करोड़ हो जाएगी।

    एक सौ छासठ करोड़ लोगों के रहने, खाने और कमाने के लिए जितने संसाधन चाहिए, उतने संसाधन जुटाना अत्यंत कठिन हो जाएगा। इसलिए पढ़े-लिखे और राष्ट्रवादी लोग परिवारों को इतना सीमित करने लगेंगे कि बहुत से परिवार निःसंतान रहने लगेंगे। यूनाइटेड नेशन्स के अनुसार वर्ष 2100 तक भारत की आबादी घटकर केवल 103 करोड़ रह जाएगी। यह 103 करोड़ आबादी किन लोगों की होगी?

    इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले सिनेमा इण्डस्ट्री का एक छोटा सा चक्कर लगा लेते हैं। सुना है कि शत्रुघ्न सिन्हा की सिने स्टार पुत्री किसी मुस्लिम से विवाह कर रही है। इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है! जब शर्मिला टैगोर ने नवाब पटौदी से शादी की, जब सुशीला चरक ने सलीम खान से शादी की थी, जब किरण राव ने आमिर खान से शादी की, जब गौरी ने शाहरूख खान से शादी की, जब अमृता राव ने सैफ अली से शादी की और कुछ दशकों बाद करीना कपूर ने भी सैफ अली से शादी की, तब भी किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई, न किसी को आपत्ति करने का अधिकार था।

    भारत का संविधान इस बात की अनुमति नही देता कि कोई किसी की शादी पर आपत्ति जताए किंतु क्या किसी पिता को भी उस समय आपत्ति करने का अधिकार नहीं है, जब कोई श्रद्धा अपने बाबुल की मर्जी के बिना, बाबुल का घर छोड़कर किसी आफताब के साथ रहने के लिए चली जाए? एक पिता को यह चिंता क्यों नहीं होनी चाहिए कि उसकी बेटी जिसके साथ जा रही है वह आगे चलकर उसकी बेटी को बुरका तो नहीं पहनाएगा, या उसके 35 टुकड़े तो नहीं करेगा, या उसे जीवित छोड़कर दूसरी, तीसरी और चौथी शादी तो नहीं करेगा?

    एक समय था जब लड़की किसी परिवार की नहीं, पूरे गांव, पूरे मुहल्ले और पूरे संभ्रांत समाज की बेटी हुआ करती थी। महानगरों की भीड़भाड़ को छोड़ दें तो छोटे शहरों, कस्बों एवं गांवों में रहने वाले समाज का हर व्यक्ति यह ध्यान रखता था कि अपने गांव-मुहल्ले की बेटी या किसी अनजान लड़की को भी कोई गुण्डा या समाजकंटक तंग न करे किंतु अब बिटिया जिस परिवार में पलकर बड़ी होती है, सबसे पहले उसी को कानूनी भाषा में समझाती है कि अब मैं बालिग हो गई हूँ और कानूनन सब प्रकार से स्वतंत्र हूँ। अब बेबी को बुरका पसंद है!

    बेटियों को संविधान से मिले इसी अधिकार के चलते भारतीय समाज की ऐसी स्थिति बनी है कि अब बेटियां घर छोड़कर चाहे जिसके साथ चली जाती हैं, मनमर्जी के लड़के या आदमी से शादी करने, लिव इन रिलेशन में रहने या अपनी ही जैसी किसी दूसरी लड़की से विवाह करने। यहाँ तक कि खुद अपने ही साथ विवाह करने।

    घर छोड़कर जाने वाली लड़की को बाबुल की बजाय उस व्यक्ति से अधिक प्यार होता है जो कुछ ही समय में उसे बुरका पहना सकता है, या उसके पैंतीस टुकड़े कर सकता है। क्योंकि लड़की यह बात जानती ही नहीं कि उसके साथ क्या होने वाला है! चाहे जो हो, अब तो बेबी को बुरका पसंद है!

    जाहिर है कि भारत के संविधान को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है कि बालिग लड़की अपनी मर्जी से शादी करे किंतु क्या समाज को यह सोचने का अधिकार नहीं है कि क्या बालिग होते ही लड़की में अपनी जिंदगी के सम्बन्ध में सभी फैसले लेने की पर्याप्त समझ आ जाती है?

    दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, माता-पिता और घर-परिवार के वे सब लोग जो उस लड़की को अपनी बांहों में झुलाकर, प्यार भरी थपकियां देकर, लोरियां सुनाकर पालते हैं, उसकी किलकारियां सुनकर खुश होते हैं, उसे अंगुली पकड़कर चलना सिखाते हैं, उसके लालन-पालन एवं पढ़ाई पर लाखों रुपए खर्च करते हैं, क्या उस लड़की के बालिग होते ही वे लड़की के शत्रु हो जाते हैं?

    क्या कानून इसे किसी भी तरह परिभाषित कर सकता है कि ऐसा आखिर क्यों है कि घर-परिवार के लोग अपनी बिटिया को किसी गलत जगह शादी करने से नहीं रोक सकते? क्यों एक बाप उस बहेलिये को रोकने में असमर्थ है जो उसकी सोनचिरैया सी बेटी को फांस कर मारने के लिए ले जा रहा है?

    भारतीय परम्परा यह कहती है कि विवाह वैयक्तिक अथवा संवैधानिक विषय है ही नहीं। यह पारिवारिक और सामाजिक विषय है। जहाँ से मैंने बात आरम्भ की थी, यदि वहीं पर पहुंचकर सोंचें तो हम पाएंगे कि यह केवल पारिवारिक या सामाजिक मामला भी नहीं है, यह राष्ट्रीय अस्मिता का मामला है। यदि हिन्दुओं के देश हिन्दुस्तान में, हिन्दू कोख से बड़ी संख्या में गैर हिन्दू संतान पैदा होगी तो राष्ट्र का क्या होगा? भारत के न्यायालयों में चल रही कानून की किताबों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बेबी को बुरका पंसद है, बाबुल नहीं!

    इस स्थिति को यदि ईमानदारी से व्याख्यायित किया जाए तो यह वैयक्तिक स्वतंत्रता की आड़ में कानून के जोर पर किया गया धर्मांतरण है जिसका अंतिम परिणाम राष्ट्रांतरण होता है। यह अलग बात है कि तब भी पूरे भारत का डीएनए वही चालीस हजार साल पुराना रहेगा किंतु क्या वह तब भी हिंदुस्तान ही होगा?

    अब आप स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं कि वर्ष 2100 में भारत में रहने वाले 103 करोड़ लोग कौन होंगे! शायद मोहन भागवत को इससे फर्क न पड़े क्योंकि वे तब भी हिन्दू तथा हिन्दुत्व की ऊटपटांग व्याख्या करते रहेंगे और डीएनए-डीएनए चिल्लाते रहेंगे। क्या जिनसे हमारा डीएनए नहीं मिलता, वे अकारण ही हमारे शत्रु हें?

    ।।वयम् राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिताः।।

    -डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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