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उपन्यासों में सौन्दर्य दृष्टि

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उपन्यासों में सौन्दर्य दृष्टि

डॉ. मोहनलाल गुप्ताजी के उपन्यासों में सौन्दर्य दृष्टि’ शीर्षक से लिखे गए शोधग्रंथ में गुप्ताजी के तीन उपन्यासों- चित्रकूट का चातक, संघर्ष एवं पासवान गुलाबराय की समालोचना की गई है तथा इन उपन्यासों में लेखक की सौन्दर्य दृष्टि की विवेचना की गई है।

साहित्य-सृजन का मूल उद्देश्य सम्पूर्ण सृष्टि को सुंदर बनाना है। इसलिए हर युग के लेखक द्वारा साहित्य के माध्यम से सौन्दर्य का सृजन किया जाता है। इस ग्रंथ में डॉ. मोहनलाल गुप्ताजी के तीन उपन्यासों की ‘सौन्दर्य शास्त्र’ की दृष्टि से विवेचना की गई है।

सौन्दर्य शास्त्र ‘दर्शन’ की वह शाखा है जिसके अंतर्गत कला, साहित्य और सौन्दर्य के अन्तरंग सम्बन्धों का विवेचन किया जाता है। इसे सौन्दर्य-मीमांसा, रस-मीमांसा एवं सौन्दर्य का सिद्धांत भी कहा जाता है। अर्थात् सौन्दर्य शास्त्र वह शास्त्र है जिसके अंतर्गत, साहित्य में निहित रहने वाले सौन्दर्य का तात्विक और मार्मिक विवेचन किया जाता है।

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डॉ. मोहनलाल गुप्ता आधुनिक काल के सफल उपन्यासकार, कहानीकार एवं लेखक हैं। उन्होंने विगत लगभग चालीस वर्षों में अपने शताधिक ग्रंथों, सहस्राधिक आलेखों एवं फुटकर रचनाओं के माध्यम से इस सृष्टि को सुंदर बनाने की साधना की है। गुप्ताजी द्वारा रचित साहित्य में उपन्यास, नाटक, कहानियाँ, काव्य संग्रह आदि साहित्यक विधाओं के ग्रंथ तो हैं ही, साथ ही वे भारत के जाने-माने इतिहासकार भी हैं जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् के वर्षों में हुई नवीन शोधों से प्राप्त नवीन ऐतहासिक तथ्यों को आधार बनाकर भारत के इतिहास का पुनर्लेखन किया है। भारत की पुरातन सभ्यताओं, प्राचीन संस्कृतियों एवं पौराणिक साहित्य पर भी गुप्ताजी ने विपुल लेखनी चलाई है। उनके उपन्यास साहित्य में साहित्य एवं इतिहास का बहुत सुंदर समन्वय हुआ है। प्रस्तुत ग्रंथ में गुप्ताजी के तीन उपन्यासों- ‘संघर्ष’, ‘चित्रकूट का चातक’ एवं ‘पासवान गुलाबराय’ का सौन्दर्य शास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार के ग्रंथों के लेखन के लिए सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययनकर्त्ता को साहित्य की प्रकृति के क्रमबद्ध अध्ययन, साहित्य के विश्लेषण की दक्षता एवं तात्विक दृष्टि की तो आवश्यकता होती ही है, साथ ही उसे साहित्य के आचार्यों द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों एवं भारतीय चिंतन परम्परा की भी गहरी जानकारी होनी चाहिए।

इस ग्रंथ की मूर्धन्य लेखिका डॉ. लता शर्मा द्वारा ग्रंथ-लेखन में जिस प्रतिभा का परिचय दिया गया है, वह हर दृष्टि से स्तुत्य है। वे बैकुंठी देवी कन्या महाविद्यालय, आगरा में हिन्दी विभाग की अध्यक्ष रहीं। उन्होंने इस विषय को वर्षों तक पढ़ा एवं पढ़ाया है और वे इस विषय की प्रखर आचार्य हैं।

सैद्धांतिक रूप से सौन्दर्य शास्त्र के अंतर्गत काव्य-सौन्दर्य (साहित्य-सौन्दर्य) का परीक्षण कर आधारभूत सिद्धांत का प्रतिपादन किया जाता है। इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर काव्य (साहित्य) के विभिन्न अंगों का मूल्यांकन किया जाता है। इस दृष्टि से डॉ. लता शर्मा ने गुप्ताजी के उपन्यासों का बड़ी गइराई से विवेचन प्रस्तुत किया है।

इस प्रकार के सौन्दर्यशास्त्रीय विवेचन तब तक नहीं किए जा सकते जब तक कि अध्ययनकर्त्ता, साहित्यकार के दृष्टिकोण को न पकड़ पाए। डॉ. लता शर्मा ने गुप्ताजी के उपन्यासों का अध्ययन प्रस्तुत करते समय लेखक के दृष्टिकोण को बहुत अच्छी तरह से आत्मसात् किया है, अन्यथा इस प्रकार की श्रेष्ठ विवेचना संभव नहीं थी।

किसी साहित्यक रचना को समग्र रूप में परखने अथवा उसका मूल्यांकन करने की प्रक्रिया को ‘आलोचना’ अथवा ‘समालोचना’ भी कहा जाता है। इस दृष्टि से डॉ. लता शर्माजी का यह ग्रंथ गुप्ताजी के उपन्यासों पर समालोचना प्रस्तुत करता है। आधुनिक परिभाषाओं के अनुसार आलोचना ‘साहित्यकार’ और ‘पाठक’ के बीच की योजक कड़ी है। डॉ. लता शर्माजी ने इस ग्रंथ के माध्यम से यही कार्य किया है।

कोई भी रचना अच्छी है या बुरी, यह निर्णय कर देना ही आलोचना नहीं है, अलोचना का वास्तविक उद्देश्य, रचना का प्रत्येक दृष्टि से मूल्यांकन कर पाठक के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। साथ ही पाठक की रुचि का परिष्कार करना भी आलोचक का धर्म है, ताकि पाठक की साहित्यक समझ का विकास हो। डॉ. लता शर्माजी ने इस ग्रंथ में आद्योपरांत इस धर्म का निर्वहन किया है।

साहित्य-सिद्धांत और समालोचना में चोली-दामन का साथ है। साहित्य-शास्त्र के ज्ञान से आलोचक को व्यावहारिक दृष्टि मिलती है। कुछ मौलिक सिद्धांत जैसे रस, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि, अनुकरण सिद्धांत, विरेचन सिद्धांत आदि का ज्ञान साहित्यकार, पाठक और अलोचक, तीनों के लिए उपयोगी होता है। यह सृजन के मूल्यांकन में काफी मदद पहुंचाता है।

मूल्यांकन में वैयक्तिक रुचियों या प्रभावों को स्थान नहीं मिलना चाहिए। आलोचक की व्यक्तिगत मान्यताएं कुछ भी हो सकती हैं किंतु साहित्यक कृति का मूल्यांकन व्यक्तिगत मान्यताओं पर न करके, सौन्दर्यशास्त्र के स्थापित मानदण्डों पर किया जाना चाहिए। डॉ. लता शर्माजी का यह ग्रंथ इन समस्त कसौटियों पर खरा उतरता है।


इस पुस्तक का लेखन वर्ष 2016 में पूर्ण कर लिया गया था किंतु इसके प्रकाशन में लगभग सात वर्ष का विलम्ब हो गया। इसके कई कारण रहे जिनमें से कोरोना जैसी परिस्थितियां भी किसी सीमा तक जिम्मेदार रहीं। इस बीच गुप्ताजी के कुछ और उपन्यास भी आए हैं किंतु इस ग्रंथ में केवल तीन उपन्यासों की विवेचना को ही सम्मिलित किया जा सका है।

श्रमसाध्यम कार्य होने से इस कार्य में विपुल ऊर्जा एवं समय की आवश्यकता होती है। डॉ. लता शर्माजी ने यह चुनौती स्वीकार की तथा इस कार्य को पूर्ण किया। इस श्रमसाध्य कार्य के लिए मैं डॉ. लता शर्माजी के प्रति आभार व्यक्त करती हूँ, साथ ही ग्रंथ के प्रकाशन में हुए विलम्ब के लिए क्षमा प्रार्थना भी करती हूँ।

मैं आशा करती हूँ कि यह ग्रंथ गुप्ताजी के उपन्यास-साहित्य में समाहित सौन्दर्य-दृष्टि को समाज के समक्ष रखने में सफल होगा। शुभम्

  • मधुबाला गुप्ता

भारतीयों का डीएनए एक है क्या?

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भारतीयों का डीएनए - www.bharatkaitihas.com
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू

विगत लगभग एक दशक से भारत की राजनीति में भारतीयों का डीएनए चर्चा के मुख्य विषयों में बना हुआ है। आरएसएस के सरसंघ चालक मोहन भागवत समस्त भारतीयों का डीएनए एक बताते हैं, किंतु क्या इस बात में किंचित् भी सच्चाई है?

पिछले कुछ समय से देश के समक्ष यह अवधारणा प्रस्तुत की जा रही है कि विगत चालीस हजार साल से भारत के लोगों का डीएनए एक है! संभवतः इस बात को इसलिए बार-बार दोहराया जा रहा है कि ‘डीएनए का एक होना’ अच्छी बात है।

चालीस हजार साल की अवधि भारत में ‘उत्तर पाषाण काल’ के आरम्भ होने की अवधारणा से ली गई जान पड़ती है, जब मनुष्य का नवीनतम संस्करण ‘क्रो-मैगनन मैन’ भारत की धरती पर पहली बार दिखाई दिया। इस प्रकार समस्त भारतीयों को मानव के उसी संस्करण की संतान मान लिया गया है।

विज्ञान के आधार पर न तो समस्त भारतीयों के ‘क्रो-मैगनन मैन’ की संतान होने की बात सही ठहरती है और न भारतीयों का डीएनए एक होने की बात सही ठहरती है। आधुनिक पुरातत्व विज्ञान ने भारत में मिली आदिम खोपड़ियों से छः प्रकार के डीएनए की पहचान की है- नीग्रेटो, प्रोटोऑस्ट्रेलॉयड, मंगोलायड, मेडिटेरियन द्रविड़, वेस्टर्न ब्रेचीसेफल्स तथा नॉर्डिक।

इन छः प्रकार के आदिम डीएनए से मुण्डा, संथाल, द्रविड़, निषाद, कोल और किरात आदि जनसमुदायों की उत्पत्ति हुई है। आर्य-जनसमुदाय छः प्रकार के आदिम डीएनए से अलग है। अतः विज्ञान इस बात की पुष्टि नहीं करता कि भारतीयों का डीएनए एक है।

यदि कन्वर्टेड मुसलमानों एवं कन्वर्टेड ईसाइयों को लक्ष्य करके हिन्दुओं, मुसलमानों एवं ईसाइयों के डीएनए का उद्गम एक ही मान लिया गया है, तो भी भारत के विगत 1400 साल के इतिहास के आधार पर यह अवधारणा गलत सिद्ध होती है कि समस्त भारतीयों का डीएनए एक है। हिन्दुओं के डीएनए का मूल हिस्सा आर्य, द्रविड़, मंगोल, मुण्डा तथा संथाल आदि आदिम जनजातीय समूहों से आया है। उसमें ईरानी एवं यूनानी आर्यों का डीएनए भी मिश्रित है।

मुसलमानों के डीएनए में अरब, मेसोपोटामिया (ईराक), पर्शिया (ईरान) तथा अफगानिस्तान से आए हुए डीएनए का मिश्रण है जिसमें कुछ हिस्सा हिन्दुओं से कन्वर्टेड मसुलमानों का भी है। आज के भारतीय ईसाइयों के डीएनए में यूरोप के इंग्लैण्ड, फ्रांस, स्पेन, नीदरलैण्ड तथा पुर्तगाल आदि देशों से आया हुआ डीएनए शामिल है। पारसियों का डीएनए तो मूलतः ईरान से ही आया है।

हम भारतीयों के ज्ञान का आदिस्रोत वेद है, अतः इस संदर्भ में वेदों को भी देखा जाना चाहिए। वेदों में डीएनए के एक होने की अवधारणा नहीं है। वहाँ देवों, दस्युओं एवं आर्यजनों की चर्चा है। वेद डीएनए के एक होने की नहीं, मन, विचारों और चेष्टाओं के एक होने की बात कहता है।

ऋग्वेद कहता है-

‘समानी व आकूतिः समाना हृदयानी वः।’ (ऋग्वेद 10/191) अर्थात्- हमारी अभिव्यक्ति एक जैसी हो, हमारे अन्तःकरण एक जैसे हों।

‘समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सहचित्तमेषाम्।’ (ऋग्वेद 8/49/3) अर्थात्- मिलकर कार्य करने वालों का मन्त्र समान होता है। चित्त सहित इनका मन समान होता है।

‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।’ (ऋग्वेद 10/191/2) अर्थात्- हम सब एक साथ चलें, आपस में संवाद करें, हमारे मन एक हों।

इस प्रकार वेदों में डीएनए जैसे किसी विचार की अवधारणा नहीं है।

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यदि भारत के संविधान पर दृष्टिपात करें तो हम पाते हैं कि किसी को भी भारत की नागरिकता डीएनए के आधार पर नहीं मिली, संविधान के आधार पर मिली है। संविधान में डीएनए को किसी भी तरह व्याख्यायित नहीं किया गया है, चर्चा तक नहीं की गई है। अतः वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, अध्यात्मिक, राजनीतिक किसी भी स्तर पर समस्त भारतीय एक ही डीएनए समूह से निकले हुए दिखाई नहीं देते। यह भी विचारणीय है कि डीएनए भारतीयों के लिए कभी समस्या या चिंतन का विषय नहीं रहा। हो सकता है कि इस चिंतन का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता स्थापित करना हो किंतु डीएनए के आधार पर यह एकता स्थापित करना एक दूर की कौड़ी है। यदि डीएनए एकता का आधार होता तो कौरवों और पाण्डवों में एकता स्थापित हो ही गई होती। कंस और भगवान श्रीकृष्ण का डीएनए एक ही था। आतताई रावण और धर्मात्मा विभीषणजी का डीएनए भी एक ही था। हिरणाकश्यपु और भक्तराज प्रहलाद का डीएनए भी एक ही था। भारत में रह गए और पाकिस्तान चले गए मुसलमानों का डीएनए भी एक ही था। अब इसके उलटे उदाहरण देखते हैं।

समान डीएनए वाली माता कैकेई ने रामजी को वनवास दे दिया। जबकि असमान डीएनए वाले रामजी ने जटायु की अंत्येष्टि इस भाव से की जिस प्रकार कोई पुत्र अपने पिता की अंत्येष्टि करता है- ‘तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम।’ उन्हीं रामजी ने अलग डीएनए वाली शबरी के झूठे बेर खाए।

मध्यकाल में दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक और सिकन्दर लोदी की माताएं हिन्दू स्त्रियाँ थीं किंतु इन दोनों सुल्तानों ने भारत की हिन्दू प्रजा पर जो अत्याचार किए उनका खूनी भारतीय इतिहास की पुस्तकों में भलीभांति अंकित है। मुगल बादशाह जहांगीर की माता हिन्दू थी। उसके पुत्र शाहजहाँ की माता भी हिन्दू स्त्री थी।

इस प्रकार औरंगजेब की दादी और परदादी दोनों हिन्दू थीं। इन तीनों बादशाहों ने देश की बहुसंख्य हिन्दू प्रजा पर जो अत्याचार किए, उनसे कौन परिचित नहीं है। इन सबकी हड्डियों में हिन्दुओं का डीएनए था। फिर वे हिन्दुओं के प्रति सहानुभूति क्यों नहीं रख सके?

यदि इसका उलटा करके देखें तो खानखाना अब्दुर्रहीम, सयैद रसखान और चांदबीबी की माताएं हिन्दू नहीं थीं किंतु इन तीनों ने भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करके भारत की बहुसंख्य प्रजा को श्रीकृष्ण भक्ति पर अटल रहने का मार्ग दिखाया। उपरोक्त उदाहरणों के आधार पर यदि यह कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भगवान और उनके भक्त का डीएनए एक होता है, न कि विरोधी विचारों वाले माता और पुत्र का!

कुछ ही वर्ष पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बीच जो स्वागत-मिलन हुआ, उस दृश्य की सुगंध वैसी ही प्रसन्नतादायक थी जैसी रामजी और भरतजी के मिलाप के समय रही होगी। निश्चय ही भारत और इजराइल के प्रधानमंत्रियों का डीएनए एक नहीं है, और इससे दोनों देशों के सांस्कृतिक प्रेम की सुगंध मंद नहीं हो जाती!

कहने का आशय केवल इतना है कि डीएनए कभी भी एकता स्थापित करने के उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता। डीएनए की एकता के बिना भी वह उद्देश्य पूरा हो सकता है और एक ही डीएनए के बीच कौरव-पाण्डवों जैसी शत्रुता स्थापित हो सकती है। खोखले नारों से देश की एकता कभी स्थापित नहीं हो सकती। डीएनए की एकता भी एक खोखला नारा प्रतीत होता है। भारत के जनसामान्य में डीएनए किसी भी प्रकार के चिंतन का आधार नहीं है!

जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक के प्रधानमंत्रित्व काल में भारत में राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य से कुछ बातें इस प्रकार कही जाती थीं- लहू का रंग एक है; अनेकता में एकता – हिन्द की विशेषता; कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। हम जानते हैं कि ऊपरी तौर पर ये नारे ठीक ही दिखते थे किंतु भीतर से ये तीनों नारे खोखले थे। लहू का रंग तो चोर और सिपाही का भी एक ही होता है; चूहे और बिल्ली का भी एक ही होता है।

जिस कश्मीर की बात कही गई है, उसमें से अधिकतर हिस्सा पाकिस्तान एवं चीन के पास जा चुका है। ‘अनेकता में एकता’ वैसी ही बात है जैसे गुलाब की झाड़ी पर गुलाब और कांटे दोनों होते हैं और कोई व्यक्ति इस आधार पर गुलाब और कांटों के गुणों में एकता स्थापित करने का प्रयास करे!

वर्ष 1947 तथा उसके बाद हमारे देश के तीन टुकड़े हो जाने के बाद आज भी विभाजनकारी शक्तियाँ देश को खण्ड-खण्ड करने पर तुली हुई हैं। अतीत में अमर हो गए लाला लाजपत राय, सरदार भगतसिंह, हरगोबिंद खुराना और आज के खालिस्तान समर्थकों का डीएनए भी एक ही है। क्या उनके जीवन मूल्यों में कहीं-कोई साम्य है? डीएनए ढूंढने से तो गुमराह होने की दिशा प्राप्त होगी।

कड़वी सच्चाई यह है कि जब तक देश में रहने वाले लोगों के जीवन मूल्य एक नहीं होंगे तब तक देश में एकता का स्थापित होना आकाश-कुसुम प्राप्त करने की कल्पना ही बना रहेगा। डीएनए जीवन मूल्यों का निर्माण नहीं करता! हमारा अभीष्ट डीएनए नहीं, हमारा अभीष्ट है- वन्दे मातरम्, भारत माता की जय, जयहिन्द, जय भारत।

डीएनए की परख राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में कोई मायने रखती हो, ऐसा लगता नहीं है। राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में डीएनए को ढूंढना तो गुमराह होकर वास्तविक समस्या से दूर हो जाने जैसा है!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बेबी को बुरका पसंद है!

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बेबी को बाबुल नहीं बुरका पसंद है!

यह लिखते हुए आत्मा हाहाकर करती है कि अब भारतीय बेबी को बुरका पसंद है, बाबुल तो उसे दुश्मन जैसा दिखाई देता है। भारतीय युवतियों के मन में यह परिवर्तन आजादी के बाद के वर्षों में भारत सरकार, भारत के संविधान, भारतीय सिनेमा तथा भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे पाठ्यक्रमों के माध्यम से किया गया है।

भारत की जनसंख्या वर्ष 2001 से 2011 के बीच में 1.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी थी जबकि ई.2011 से 2022 के बीच में 1.2 प्रतिशत बढ़ी है। इस दर से बढ़ती हुई आबादी भी भारत पर इतना बोझ डाल रही है कि हम अगले कुछ ही महीनों में 140 करोड़ आबादी वाले चीन को पीछे छोड़कर विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश हो जाएंगे। यदि इसी गति से बढ़ते रहे तो ई. 2050 तक भारत की जनंसख्या 166 करोड़ हो जाएगी।

एक सौ छासठ करोड़ लोगों के रहने, खाने और कमाने के लिए जितने संसाधन चाहिए, उतने संसाधन जुटाना अत्यंत कठिन हो जाएगा। इसलिए पढ़े-लिखे और राष्ट्रवादी लोग परिवारों को इतना सीमित करने लगेंगे कि बहुत से परिवार निःसंतान रहने लगेंगे। यूनाइटेड नेशन्स के अनुसार वर्ष 2100 तक भारत की आबादी घटकर केवल 103 करोड़ रह जाएगी। यह 103 करोड़ आबादी किन लोगों की होगी?

इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले सिनेमा इण्डस्ट्री का एक छोटा सा चक्कर लगा लेते हैं। सुना है कि शत्रुघ्न सिन्हा की सिने स्टार पुत्री किसी मुस्लिम से विवाह कर रही है। इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है! जब शर्मिला टैगोर ने नवाब पटौदी से शादी की, जब सुशीला चरक ने सलीम खान से शादी की थी, जब किरण राव ने आमिर खान से शादी की, जब गौरी ने शाहरूख खान से शादी की, जब अमृता राव ने सैफ अली से शादी की और कुछ दशकों बाद करीना कपूर ने भी सैफ अली से शादी की, तब भी किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई, न किसी को आपत्ति करने का अधिकार था।

भारत का संविधान इस बात की अनुमति नही देता कि कोई किसी की शादी पर आपत्ति जताए किंतु क्या किसी पिता को भी उस समय आपत्ति करने का अधिकार नहीं है, जब कोई श्रद्धा अपने बाबुल की मर्जी के बिना, बाबुल का घर छोड़कर किसी आफताब के साथ रहने के लिए चली जाए? एक पिता को यह चिंता क्यों नहीं होनी चाहिए कि उसकी बेटी जिसके साथ जा रही है वह आगे चलकर उसकी बेटी को बुरका तो नहीं पहनाएगा, या उसके 35 टुकड़े तो नहीं करेगा, या उसे जीवित छोड़कर दूसरी, तीसरी और चौथी शादी तो नहीं करेगा?

एक समय था जब लड़की किसी परिवार की नहीं, पूरे गांव, पूरे मुहल्ले और पूरे संभ्रांत समाज की बेटी हुआ करती थी। महानगरों की भीड़भाड़ को छोड़ दें तो छोटे शहरों, कस्बों एवं गांवों में रहने वाले समाज का हर व्यक्ति यह ध्यान रखता था कि अपने गांव-मुहल्ले की बेटी या किसी अनजान लड़की को भी कोई गुण्डा या समाजकंटक तंग न करे किंतु अब बिटिया जिस परिवार में पलकर बड़ी होती है, सबसे पहले उसी को कानूनी भाषा में समझाती है कि अब मैं बालिग हो गई हूँ और कानूनन सब प्रकार से स्वतंत्र हूँ। अब बेबी को बुरका पसंद है!

बेटियों को संविधान से मिले इसी अधिकार के चलते भारतीय समाज की ऐसी स्थिति बनी है कि अब बेटियां घर छोड़कर चाहे जिसके साथ चली जाती हैं, मनमर्जी के लड़के या आदमी से शादी करने, लिव इन रिलेशन में रहने या अपनी ही जैसी किसी दूसरी लड़की से विवाह करने। यहाँ तक कि खुद अपने ही साथ विवाह करने।

घर छोड़कर जाने वाली लड़की को बाबुल की बजाय उस व्यक्ति से अधिक प्यार होता है जो कुछ ही समय में उसे बुरका पहना सकता है, या उसके पैंतीस टुकड़े कर सकता है। क्योंकि लड़की यह बात जानती ही नहीं कि उसके साथ क्या होने वाला है! चाहे जो हो, अब तो बेबी को बुरका पसंद है!

जाहिर है कि भारत के संविधान को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है कि बालिग लड़की अपनी मर्जी से शादी करे किंतु क्या समाज को यह सोचने का अधिकार नहीं है कि क्या बालिग होते ही लड़की में अपनी जिंदगी के सम्बन्ध में सभी फैसले लेने की पर्याप्त समझ आ जाती है?

दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, माता-पिता और घर-परिवार के वे सब लोग जो उस लड़की को अपनी बांहों में झुलाकर, प्यार भरी थपकियां देकर, लोरियां सुनाकर पालते हैं, उसकी किलकारियां सुनकर खुश होते हैं, उसे अंगुली पकड़कर चलना सिखाते हैं, उसके लालन-पालन एवं पढ़ाई पर लाखों रुपए खर्च करते हैं, क्या उस लड़की के बालिग होते ही वे लड़की के शत्रु हो जाते हैं?

क्या कानून इसे किसी भी तरह परिभाषित कर सकता है कि ऐसा आखिर क्यों है कि घर-परिवार के लोग अपनी बिटिया को किसी गलत जगह शादी करने से नहीं रोक सकते? क्यों एक बाप उस बहेलिये को रोकने में असमर्थ है जो उसकी सोनचिरैया सी बेटी को फांस कर मारने के लिए ले जा रहा है?

भारतीय परम्परा यह कहती है कि विवाह वैयक्तिक अथवा संवैधानिक विषय है ही नहीं। यह पारिवारिक और सामाजिक विषय है। जहाँ से मैंने बात आरम्भ की थी, यदि वहीं पर पहुंचकर सोंचें तो हम पाएंगे कि यह केवल पारिवारिक या सामाजिक मामला भी नहीं है, यह राष्ट्रीय अस्मिता का मामला है। यदि हिन्दुओं के देश हिन्दुस्तान में, हिन्दू कोख से बड़ी संख्या में गैर हिन्दू संतान पैदा होगी तो राष्ट्र का क्या होगा? भारत के न्यायालयों में चल रही कानून की किताबों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बेबी को बुरका पंसद है, बाबुल नहीं!

इस स्थिति को यदि ईमानदारी से व्याख्यायित किया जाए तो यह वैयक्तिक स्वतंत्रता की आड़ में कानून के जोर पर किया गया धर्मांतरण है जिसका अंतिम परिणाम राष्ट्रांतरण होता है। यह अलग बात है कि तब भी पूरे भारत का डीएनए वही चालीस हजार साल पुराना रहेगा किंतु क्या वह तब भी हिंदुस्तान ही होगा?

अब आप स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं कि वर्ष 2100 में भारत में रहने वाले 103 करोड़ लोग कौन होंगे! शायद मोहन भागवत को इससे फर्क न पड़े क्योंकि वे तब भी हिन्दू तथा हिन्दुत्व की ऊटपटांग व्याख्या करते रहेंगे और डीएनए-डीएनए चिल्लाते रहेंगे। क्या जिनसे हमारा डीएनए नहीं मिलता, वे अकारण ही हमारे शत्रु हें?

।।वयम् राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिताः।।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

प्रांतों की स्वाभाविक संस्कृति को कुचल रही हैं राजनीतिक पार्टियाँ!

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पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी

सत्ता के लालच में प्रांतों की स्वाभाविक संस्कृति को कुचल रही हैं राजनीतिक पार्टियाँ! लालची नेताओं के लिए वोट चरने का मैदान बन गए हैं प्रांत!

भारत हजारों साल पुराना देश है जिसका स्वरूप समय-समय पर बदलता रहा है। इसके वर्तमान स्वरूप का निर्माण 15 अगस्त 1947 को 11 ब्रिटिश शासित प्रोविंसों, 6 ब्रिटिश शासित कमिश्नरियों तथा लगभग 565 देशी राजाओं द्वारा शासित प्रिंसली स्टेट्स में से पूर्वी एवं पश्चिमी पाकिस्तान को निकाल देने के बाद एक संघ के रूप में हुआ।

26 जनवरी 1950 को लागू हुए भारतीय संविधान के माध्यम से इन इकाइयों को मिलाकर एक वृहद् इकाई का गठन किया गया जिसके लिए संविधान में ‘यूनियन ऑफ इण्डिया’ शब्द का प्रयोग किया गया तथा यूनियन ऑफ इण्डिया की पहचान ‘हम भारत के लोग’ के रूप में स्पष्ट की गई।

26 जनवरी 1950 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने जो कि संविधान सभा के अध्यक्ष भी थे, भारत का नया संविधान लागू करने की घोषणा करते हुए कहा कि आज पहली बार एक ऐसे संविधान की शुरुआत हो रही है जिसके दायरे में पूरा देश है और हम एक ऐसे संघीय गणराज्य को जन्म लेते हुए देख रहे हैं जिसमें अनेक राज्य हैं, जिनकी अपनी कोई संप्रभुता नहीं है और जो वास्तव में संघ के ही अंग हैं।

वास्तव में ऐसे राज्य को ही सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न कहा जा सकता है जिसकी संप्रभुता को राज्य के भीतर अथवा बाहर की कोई भी शक्ति सुपरसीड नहीं करती। संविधान निर्माताओं ने ऐसे ही भारत की संकल्पना की थी और उसी संकल्पना को साकार करने के लिए देश का संविधान बनाया था।

आज के भारत में 28 राज्य एवं 8 केन्द्रशासित प्रदेश हैं। स्वतंत्र भारत में राज्यों का गठन भाषाई भिन्नता के आधार पर किया गया क्योंकि प्रत्येक भाषा एक विशिष्ट प्रकार की संस्कृति की द्योतक है, जैसे- कन्नड़, तेलुगू, मलयालम, उड़िया, गुजराती, बंगाली आदि। केन्द्र शासित प्रदेशों का निर्माण उन क्षेत्रों की विशिष्ट परस्थितियों एवं प्रशासनिक आवश्यकताओं के आधार पर किया गया, जैसे पुर्तगालियों द्वारा शासित क्षेत्र गोआ, दमन एवं दीव, फ्रांसिसियों द्वारा शासित क्षेत्र पाण्डिचेरी तथा पहले डेन्मार्क एवं बाद में अंगेजों द्वारा शासित क्षेत्र अण्डमान एवं निकोबार को अंग्रेजों द्वारा शासित क्षेत्रों में न मिलाकर अलग केन्द्रशासित क्षेत्र बनाया गया।

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स्वतंत्र भारत में प्रांतों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों का निर्माण इस बात को ध्यान में रखकर किया गया कि प्रांतों की स्वाभाविक संस्कृति को बिना किसी व्यवधान के मुस्कुराते रहने दिया जाए और वहाँ के निवासी सदियों से चली आ रही परम्पराओं को आगे भी जारी रखते हुए अपने जीवन आदर्शों एवं सनातन मूल्यों का आनंद लेते रह सकें। आजादी के बाद सत्ता के लालची नेताओं ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारतीय प्रांतों को जो स्वरूप प्रदान किया है, उससे ऐसा लगता है जैसे भारत के प्रांत सांस्कृतिक इकाइयां न होकर राजनीतिक बाड़े या नेताओं के लिए वोट चरने वाले चारागाह हैं। 1952 के प्रथम लोकसभा चुनावों से ही वोटो के लालची नेताओं ने ऐसे घिनौने खेल खेलने आरम्भ कर दिए थे। नेशनल कॉन्फ्रेंस तथा पीडीपी ने काश्मीर को मुस्लिम वोटों का चारागाह बनाकर सालों तक वोटों की खूब चराई की। पंजाब में अकाली दलों ने पंजाब को सिक्ख वोटों का चारागाह बना दिया। कम्युनिस्टों ने पश्चिमी बंगाल तथा केरल को कम्युनिस्ट बाड़ों में बदल दिया।

प्रांतों की स्वाभाविक संस्कृति के इस बदले हुए स्वरूप में पश्चिमी बंगाल का मतलब ममता बनर्जी का बाड़ा, पंजाब का मतलब शिरोमणि अकाली दल या आप पाटी का बाड़ा, केरल का मतलब कम्युनिस्टों का बाड़ा, तमिलनाडु का मतलब जयललिता या करुणानिधि का बाड़ा, कश्मीर का मतलब महबूबा मुफ्ती या फारुख अब्दुल्ला का बाड़ा, उड़ीसा का मतलब नवीन पटनायक का बाड़ा और दिल्ली का मतलब केजरीवाल का बाड़ा हो गया है। यही स्थिति अन्य राज्यों में भी है।

जब तक केन्द्र में कांग्रेस की सरकार रही, तब तक देश में राजनीतिक बाड़ों की संख्या अपेक्षाकृत सीमित रही, क्योंकि तब तक देश में क्षेत्रीय दलों की संख्या इतनी अधिक नहीं थी किंतु विगत कुछ दशकों में क्षेत्रीय दलों की संख्या बढ़ी है तथा जब से केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी है, तब से क्षेत्रीय दलों ने अपने-अपने प्रांतों की राजनीतिक बाड़ाबंदी घनीभूत कर दी है।

इसका एक बड़ा कारण यह भी है क्योंकि केन्द्र की कांग्रेस सरकारें जब भी आवश्यक समझती थीं, राज्य सरकारों को बिना किसी हिचक के बर्खास्त कर देती थीं। जवाहरलाल नेहरू ने केरल की प्रथम सरकार को केवल इसलिए बर्खास्त कर दिया था क्योंकि वह कम्युनिस्टों की सरकार थी किंतु जब से केन्द्र में गैर कांग्रेस सरकारें बननी आरम्भ हुईं तब से कोर्ट के दखल के कारण केन्द्र से यह अधिकार छिन गया। राबड़ी देवी की बर्खास्त सरकार को कोर्ट ने वापस जीवित कर दिया। तब से राज्यों ने केन्द्र सरकार की परवाह करनी बंद कर दी।

प्रांतों की स्वाभाविक संस्कृति नष्ट होने का एक घिनौना उदाहरण तेलंगाना के रूप में हमारे सामने है। जब से के चंद्रशेखर राव तेलंगाना के मुख्यमंत्री बने हैं, उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तेलंगाना यात्राओं के समय शिष्टाचार स्वागत की परम्परा बंद कर दी है। हम भारत के लोग ऐसे तो नहीं थे कि जब परिवार का मुखिया घर आए तो उसके स्वागत में उठकर खड़े भी न हों!

ममता बनर्जी ने भारत के प्रधानमंत्री के लिए यह कह कर भारत के लोगों का अपमान किया कि वे प्रधानमंत्री मोदी की कमर में रस्सी बांधकर उन्हें बांगलादेश भेज देंगी तथा उन्हें दीपावली के उपहार में खाने के लिए पत्थर भिजवाएंगी। ममता बनर्जी ने तो भारत के गृहमंत्री तथा भाजपा के अन्य नेताओं की यात्राओं के दौरान उनकी रैलियों एवं सभाओं में खूनी हमले तक करवाए। अपनी ही पार्टी के गुण्डों से गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रतिमा तक तुड़वा दी ताकि अमितशाह की रैली पर आरोप मंढ़ा जा सके। हम भारत के लोगों की ऐसी परम्पराएं तो नहीं थीं!

आज केरल एक ऐसे खूनी बाड़े में तब्दील हो चुका है जिसमें आए दिन आरएसएस के स्वयं सेवकों की हत्याएं होती हैं तथा विरोधी पार्टियों के सदस्यों के हाथ-पैर काटे जाते हैं। यहाँ तक कि अब तो पंजाब में भी, अस्सी के दशक में खालिस्तान समर्थकों द्वारा खेला गया घिनौना खेल फिर से आरम्भ होने की आहट सुनाई देने लगी है। पंजाब में शिवसेना के एक कार्यकर्ता को इसलिए गोलियों से भून दिया गया क्योंकि वह हिन्दू मंदिर में तोड़ी गई मूर्तियों के अपराधियों को गिरफ्तार करने की मांग कर रहा था।

राजनीतिक क्षुद्रता के दौर में प्रत्येक प्रांत के मतदाता के सामने लगभग तीन-चार क्षेत्रीय दल पनप गए हैं जो कहीं ‘एमवाई’ जैसे फार्मूले बनाकर तो कहीं ‘जय भीम और जय मीम’ जैसे नारे देकर मतदाताओं के वोट चरती हैं। इन क्षेत्रीय दलों से लड़ने के लिए मतदाताओं के सामने कांग्रेस तथा भाजपा के रूप में दो प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दल हैं।

इन दो राष्ट्रीय दलों में से भी कांग्रेस की हालत यह है कि जब कांग्रेस शासित राजस्थान में किसी महिला का बलात्कार होता है तो राहुल और प्रियंका की जीभ तक नहीं खुलती किंतु जब यही काम भाजपा शासित यूपी में होता है तो पूरी कांग्रेस रैलियां लेकर दौड़ पड़ती है और प्रियंका गांधी महिला पुलिस कांस्टेबल को धक्का देकर किसी कार्यकर्ता की मोटर साइकिल पर बैठकर पीड़िता के घर पहुंचती हैं और सोचती हैं कि अब यूपी रूपी वोटों का चारागाह हमारे लिए उपलब्ध हो जाएगा।

जब-जब ऐसा होता है, तब-तब ऐसा लगता है मानो भारतीय संस्कृति दूर खड़ी खून के आंसू बहा रही है। हम भारत के लोग कभी भी ऐसे न थे कि हमारी बेटी के साथ बुरा हो तो रोएं और पड़ौसी की बेटी के साथ बुरा हो तो हंसें!

केवल दो राज्यों में सिमट चुकी और वहाँ भी अंतिम सांसें गिन रही कांग्रेस अब पूरी तरह से क्षेत्रीय दलों की राजनीति पर उतर आई है और वह भी भाजपा से जीतने के लिए केजरीवाल की ‘आप’ पार्टी जैसे हथकण्डे अपना रही है। एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा कि कांग्रेस ने दिसम्बर 2022 में होने वाले गुजरात चुनावों में अपने ‘घोषणा पत्र में ‘आप पार्टी’ की ही तरह हर घर को 300 यूनिट फ्री बिजली देने की बात कही है।

क्या कभी कांग्रेस ने यह सोचा है कि यदि कभी आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की सरकार बनी तो क्या कांग्रेस पूरे देश में हर घर को 300 यूनिट बिजली फ्री दे सकती है! शायद कांग्रेस जानती है कि सोचने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि अब उसकी कोई संभावना भी नहीं है। भारत भर में हर घर को 300 यूनिट बिजली फ्री देने का अर्थ यह है कि भारत ने अपनी बर्बादी का मार्ग स्वयं ही चुन लिया, उसे पाकिस्तान और चीन जैसे शत्रुओं की आवश्यकता नहीं है।

भारतीय संविधान में सद्भावना स्वरूप प्रांतों को राज्य कहा गया किंतु कांग्रेस की मानसिक स्थिति ऐसे है कि राहुल गांधी कहते हैं कि भारत के प्रांत, अलग-अलग देश हैं। तो क्या कांग्रेस यह कहना चाह रही है कि भारत सम्पूर्ण प्रभुत्व देश नहीं है अपितु प्रभुतासम्पन्न देशों का झुण्ड है???? इससे अधिक शर्मानाक स्थिति और क्या हो सकती है कि यदि वोटों का खेत हम न चर पाएं तो इस खेत को ही बिखेर दो!

देश में हालात यहाँ तक भयावह हो चुके हैं कि जिस अहमदाबाद-उदयपुर रेलट्रैक का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया, उस रेल ट्रैक पर 13 दिन के भीतर-भीतर राजस्थान में बम विस्फोट हो गया। हम भारत के लोग ऐसे तो नहीं थे!

प्रांतों की संस्कृति को तेजी से कुचल रही राजनीतिक पार्टियों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वे कभी स्वस्थ राजनीति की तरफ मुंह भी करेंगी। अच्छा यही होगा कि देश का मतदाता इस बात को सोचे कि वे इस हजारों साल पुराने महान देश के सुसभ्य नागरिक हैं। उनके पुरखों ने जो संस्कृति बनाई थी, वह तभी सुरक्षित बनी रह सकती है जब मतदाता यह समझें कि वे वोटरों की भीड़ मात्र नहीं है, उनका प्रांत नेताओं के चरने के लिए वोटों का चारागाह नहीं है, या वे किसी नेता अथवा पार्टी के बाड़े में बंद भेड़ें नहीं हैं।

समय आ गया है जब मतदाताओं को आगे बढ़कर, राजनीतिक पार्टियों एवं नेताओं को याद दिलाना होगा कि ‘हम भारत के लोग’ ऐसे देश के नागरिक हैं जिसमें एक संविधान चलता है, एक प्रधान चलता है और एक ही निशान चलता है। इस देश में अनेक राज्य स्थित हैं किंतु राज्यों की अपनी कोई संप्रभुता नहीं है, भारत की संप्रभुता ही हमारी संप्रभुता है। हम सब भारत हैं, एक मतदाता के रूप में, एक नागरिक के रूप में और एक प्रांत के रूप में, हम भारत के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। इसलिए प्रांतों की स्वाभाविक संस्कृति नष्ट होने से बचाई जानी चाहिए।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कांग्रेस ! तुमसे ना हो पाएगा !

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गीता को जिहादी साहित्य बताने वाले शिवराज पाटिल और राहुल गांधी

कांग्रेस की हवा दिन पर दिन निकलती जा रही है और उसकी दशा पिचके हुए गुब्बारे जैसी रह गई है। इस कारण कांग्रेस ! तुमसे ना हो पाएगा ! कुछ भी ना हो पाएगा !

6 नवम्बर 2022 को देश के 6 राज्यों में 7 रिक्त विधानसभा सीटों के उपचुनावों के परिणाम आए। 7 सीटों में से 4 भारतीय जनता पार्टी ने जीतीं। 3 सीटों पर क्षेत्रीय दलों ने जीत प्राप्त की और कांग्रेस शून्य पर आउट हो गई। क्षेत्रीय दलों के बिखरे हुए गुच्छे में से 1 बिहार के क्षेत्रीय दल ने, 1 महाराष्ट्र के क्षेत्रीय दल ने तथा 1 सीट तेलंगाना के क्षेत्रीय दल ने जीती।

राष्ट्रीय राजनीतिक दल कांग्रेस शून्य पर सिमटी, इसमें कोई खास बात नहीं है। खास बात तो यह है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दल नहीं है, राष्ट्रीय स्तर का दल है जिसने कम से कम छः दशकों तक देश पर शासन किया है। इससे भी अधिक खास बात यह है कि उपचुनावों में शामिल 7 सीटों में से 2 पर पिछले चुनावों में कांग्रेस के प्रत्याशी जीते थे। कांग्रेस ने ये दोनों सीटें गवां दीं।

उपचुनावों के ये नतीजे आश्चर्य में डालने वाले हैं। अमरीका, इंगलैण्ड और दुनिया के अधिकतर प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं वाले देशों में कम से कम दो राष्ट्रीय पार्टिंयां वहाँ के मतदाताओं की पहली पसंद हैं। क्या विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाला भारत अब राष्ट्रीय स्तर की एक राजनीतिक पार्टी और तिनका-तिनका बिखरे हुए क्षेत्रीय दलों के भरोसे लोकतंत्र की गाड़ी हांकेगा?

कांग्रेस की हवा दिन पर दिन निकलती जा रही है और उसकी दशा पिचके हुए गुब्बारे जैसी रह गई है। इसका कारण न तो देश के मतदाता हैं, न देश की दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ हैं, अपितु स्वयं कांग्रेस ही है। जब देश को आजादी मिली तो अंग्रेजों द्वारा बड़ी चालाकी से सत्ता की चाबी कांग्रेस को सौंपी गई।

सत्ता की चाबी हाथों से खिसक न जाए, इसके लिए कांग्रेस ने दो तिलिस्म खड़े किए। पहला तिलिस्म यह झूठ था कि कांग्रेस ने देश को आजादी दिलवाई। दूसरा तिलिस्म कांग्रेस ने अपने नेताओं को महात्मा, महामना, चाचा, दीनबंधु, देशबंधु, भारत कोकिला आदि उपाधियां देकर खड़ा किया।

कुछ दशकों तक तो भारत का मतदाता इन तिलिस्मों के सम्मोहन में बंधा हुआ कांग्रेस को सत्ता में टिकाए रहा। जब ये तिलिस्म बिखरने लगे तो कांग्रेस ने देश के मतदाताओं के लिए नया चक्रव्यूह तैयार किया और मतदाताओं के तीन टुकड़े किए- सामान्य, दलित एवं अल्पसंख्यक।

कांग्रेस ने कई दशकों तक दलितों और अल्पसंख्यकों की राजनीति की तथा सामान्य मतदाता को उपेक्षित किया। जब दूसरी राजनीतिक पार्टियों ने सामान्य में से अन्य पिछड़ा वर्ग और पिछड़ों में से महापिछड़ा वर्ग ढूंढ लिए तो कांग्रेस का चक्रव्यहू बिखर गया और शाहबानो प्रकरण के बाद राजीव गांधी इतिहास के नेपथ्य में चले गए।

अब कांग्रेस ने देश के मतदाताओं को उलझाने के लिए एक नया उपाय ढूंढा। उसने स्वर्गीय राजीव गांधी की विदेशी मूल की पत्नी को देश के मतदाताओं के समक्ष कांग्रेस की अध्यक्षा के रूप में प्रस्तुत किया। भारत की भोली-भाली जनता ने कांग्रेस की इस अध्यक्षा को न केवल महात्मा और चाचा का वारिस समझा, अपितु उसमें इंदिरा गांधी के भी दर्शन किए जिसने बांगला देश को पाकिस्तान से अलग किया था और भारत को परमाणु शक्ति बनाया था।

इतना ही नहीं कांग्रेस ने भारत की जनता से उस सहानुभूति का वोट भी बटोरा जो राजीव गांधी की आतंकी हमले में मृत्यु होने से उत्पन्न हुई थी। भारत की जनता पूरे दस साल तक इस सहानुभूति के सम्मोहन में बंधी रही।

हाँ से कांग्रेस ने मतदाताओं के लिए एक नया जाल बुनना आरम्भ किया। उसने अपने प्रधानमंत्री को दुनिया का सबसे बड़ा अर्थशास्त्री घोषित किया। इस अर्थशास्त्री ने कहा कि भारत के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है। अर्थशास्त्री का यह वक्तव्य कांग्रेस के लिए सेल्फगोल करने जैसी बात थी। कांग्रेस शायद भूल गई थी कि भारत का मतदाता भोला-भाला है किंतु बेवकूफ नहीं है।

भारतीय मतदाता अभी अर्थशास्त्री के वक्तव्य का अर्थ समझने का प्रयास कर ही रहा था कि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की सरकार के गृहमंत्री ने देश में सैफ्रॉन टेरेरिज्म (भगवा आतंकवाद) फैल रहा है कहकर एक निर्दोष साध्वी, सेना के एक निर्दोष कर्नल तथा कुछ अन्य हिन्दूवादी लोगों को ऐसे अपराध में पकड़कर जेल में बंद कर दिया जो अपराध उन्होंने किए ही नहीं थे।

अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रीय संसाधानों पर अल्पसंख्यकों के पहले अधिकार के सिद्धांत तथा गृहमंत्री द्वारा प्रस्तुत सैफ्रॉन टेरेरिज्म के सिद्धांत को अभी जनता समझ ही रही थी कि कुछ धुरंधर कांग्रेसी देश की बहुसंख्यक जनता के खिलाफ जोर-जोर से चिल्लाने लगे। इनके वक्तव्य टेलिविजनों और अखबारों पर बिना किसी नागा के दिखाई देने लगे। इन दिग्गजों में कपिल सिब्बल, मणिशंकर अय्यर, पी. चिदम्बरम्, दिग्विजयसिंह तथा राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नाम लेना पर्याप्त होगा।

जब पूरी कांग्रेस देश के बहुसंख्यक मतदाता के विरुद्ध हो गई तो भारतीय मतदाताओं के समक्ष खड़ा किया गया सहानुभूति का सम्मोहन बिखर गया और 2014 में एक बार फिर कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। अब कांग्रेस ने चाचा के खानदान में पैदा हुए तथा महात्माजी के असली नाम में लगने वाले सरनेम वाले एक लड़के को अपने नेता के रूप में प्रस्तुत किया जो कांग्रेस की समस्त महान उपलब्धियों का अकेला वारिस था।

इस लड़के ने कोट के ऊपर जनेऊ पहनकर स्वयं को ब्राह्मण घोषित किया और देश के प्रधानमंत्री के लिए अपशब्दों का प्रयोग करना आरम्भ किया। हालांकि अपशब्दों के प्रयोग की शुरुआत तो इस लड़के की माता ‘हत्यारा’ और ‘मौत का सौदागर’ कहकर पहले ही कर चुकी थी। लड़के ने तो उन अपशब्दों को और अधिक तेजी से दोहराया।

माता और पुत्र सहित पूरी कांग्रेस इस बात को पचा ही नहीं सकी कि एक चाय बेचने वाला लड़का देश का प्रधानमंत्री बन सकता है! कांग्रेस की दृष्टि में भारत के प्रधानमंत्री का पद तो विशिष्ट सरनेम वाले और विशिष्ट खानदान वाले लड़के के लिए सुरक्षित है!

जैसे-जैसे विशिष्ट सरनेम वाला लड़का देश के प्रधानमंत्री को गालियां देता गया, वैसे-वैसे कांग्रेस का ग्राफ नीचे गिरता गया। एक दिन उस लड़के ने यह कहा कि देश के प्रधानमंत्री सुधर जाएं वरना जनता प्रधानमंत्री को सड़कों पर जूते मारेगी। यह बात सुनकर भारत की भोली-भाली जनता अत्यंत दुःखी हुई। यह भारतीयों की भाषा नहीं है। भारत की जनता इन बातों को सुनने की आदी नहीं है।

जब विशिष्ट सरनेम वाले लड़के से कुछ होते नहीं दिखा तो, वह स्वयं ही कांग्रेस के अध्यक्ष पद की घोषित और अघोषित कुर्सियों को छोड़ भागा। दक्षिण भारत के एक सुलझे हुए, परिपक्व किंतु 80 वर्ष के वृद्ध नेता को कांग्रेस की कमान दी गई।

अभी इस वृद्ध नेता ने अध्यक्ष की कुर्सी संभाली ही थी कि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की सरकार में गृहमंत्री रहे शिवराज पाटिल के वक्तव्य ने देश को झकझोर कर रख दिया। इस समय उनकी आयु 87 वर्ष है। इन 87 वर्षों में उन्होंने यह खोज की कि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने पार्थ को जेहाद करने का उपदेश दिया है।

भारत के गृहमंत्री एवं भारत की लोकसभा के अध्यक्ष रह चुके शिवराज पाटिल के इस वक्तव्य को सुनकर पूरा देश सन्न रह गया। यह वही अतिवृद्ध नेता है जिसने देश में सैफ्रॉन टेरेरिज्म पनपने की थ्यौरी दी थी तथा ताज होटल में हुए आतंकी हमले वाले दिन थोड़ी-थोड़ी देर में कोट बदले थे।

अब ऐसी स्थिति में यदि कांग्रेस विधान सभा के उपचुनावों में 7 में से 1 भी सीट नहीं जीत सकी तो इसमें आश्चर्य क्या है। आश्चर्य तो इस बात में है कि कांग्रेस अभी भी कुछ नहीं समझ पाएगी। वह भारत के मतदाताओं को दलित, अल्पसंख्यक, सामान्य, अन्य पिछड़ा आदि के रूप में देखती रहेगी। वह देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार घोषित करती रहेगी और कोट पर जनेऊ पहनकर घूमती रहेगी। इसीलिए मैंने लिखा है कि हे कांग्रेस तुमसे न हो पाएगा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय न्यायिक व्यवस्था के घावों को उपचार की आवश्यकता है!

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भारतीय न्यायिक व्यवस्था - www.bharatkaitihas.com
भारत के कानून मंत्री किरण रिजिजू

भारतीय न्यायिक व्यवस्था घायल है और उसके घावों को उपचारों की आवश्यकता है। करोड़पतियों के लिए भारतीय न्यायिक व्यवस्था मखमली गलीचा बिछाकर आधी रात को भी तैयार रहती है तथा आम आदमी की पीढ़ियां न्यायिक व्यवस्था के दरवाजे के बाहर ही दम तोड़ देती हैं।

सूरज से धरती निकली है और धरती से चंद्रमा। यही क्रम इनकी मर्यादा को भी निश्चित करता है जिसके चलते चंद्रमा धरती के चारों ओर घूमता है तथा धरती सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। सूरज इन दोनों को अपने आकर्षण में बांधे रखकर अनंत ब्रह्माण्ड में फैली आकाशगंगा में विचरण करता है। इसी व्यवस्था में बंधे रहकर सूरज, धरती और चंद्रमा एक-दूसरे का सम्मान करते हुए जीव-जगत् की रचना करते हैं तथा उसका पालन-पोषण करके उसे पूर्णता की ओर ले जाते हैं।

भारत की संसद में से भारतीय न्यायिक व्यवस्था निकली है और भारतीय न्यायिक व्यवस्था में से वकीलों का अपार समूह प्रकट हुआ है। भारत की संसद न्यायपालिका को कानून का प्रकाश देती है और न्यायपालिका वकीलों को कानून के अनुसार अपने मुकदमे रखने का अधिकार देती है। ये तीनों मिलकर भारत की जनता को न्याय उपलब्ध करवाते हैं। इन तीनों संस्थाओं का यही सम्बन्ध इन तीनों की मर्यादा के क्रम को भी निश्चित करता है किंतु हाल ही में भारत के विधि मंत्री किरण रिजिजू जो कि भारत की संसद के लघुप्रतिरूप अर्थात् मंत्रिमण्डल के वरिष्ठ सदस्य हैं, ने जो कुछ भी कहा है वह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की देह में पल रहे घावों को उजागर करने वाला है। भारतीय न्यायिक व्यवस्था के घावों को उपचार की आवश्यकता है

विधि मंत्री ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेजी और वकीलों का वर्चस्व है। 40-50 वकील जजों को भी धमकाते हैं। वे अंग्रेजी के कई शब्द इस्तेमाल करना जानते हैं। रिजिजू ने भारत की जनता की पीड़ा बहुत ही सीधे, सरल एवं ईमानदार शब्दों में व्यक्त की है। यह तो ठीक ऐसा ही है जैसे सूरज को धरती धमकाए और धरती को चंद्रमा।

आज भारत की जनता को न्याय वकीलों की फौज और अंग्रेजी भाषा में लिखी रिट् के माध्यम से ही मिल सकता है। जबकि वास्तविकता यह है कि भारत की संसद को चुनने वाले अधिकांश भारतीय न तो वकीलों की फीस चुका सकते हैं और न अंग्रेजी भाषा की आतंकित करने वाली गिटर-पिटर को समझ सकते हैं। यह हैरान करने वाली बात है कि अंग्रेजी से जनता ही नहीं डरती, सरकार भी परेशान है। यह जानकर तो और भी हैरानी हुई कि कुछ वकील ऐसे भी हैं जो जजों को धमकाते हैं।

रिजिजू ने इससे भी अधिक गंभीर बातें कही हैं। उन्होंने कहा है कि न्यायपालिका उपनिवेश व्यवस्था पर आधारित है। उनके कपड़े भी यही दिखाते हैं, जबकि कपड़े भारत के मौसम के अनुसार होने चाहिए।

उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति करने वाले कॉलेजियम में गुटबाजी होती है। इसमें पारदर्शिता भी नहीं है। कॉलेजियम प्रणाली के कारण हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, न्यायिक कार्य करने के बदले आधा समय तो इसी में व्यस्त रहते हैं कि किसे जज बनाएं।

यह तो ऐसा हुआ जैसे दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो तमाशबीन दुकान सजाकर बैठ गए! जनता संसद का खर्च उठाती है, न्यायालय का खर्चा उठाती है, वकील का खर्चा उठाती है और इसके बदले में क्या और कितना पाती है, इसका हिसाब विधिमंत्री के इस वक्तव्य से लगाया जा सकता है कि जजों का आधा समय इस बात पर खर्च होता है कि जज किसे बनाया जाए!

रिजिजू ने यह भी कहा कि जब कार्यपालिका या विधायिका रास्ते से भटकते हैं, तो न्यायपालिका उन्हें संविधान से सुधार देती है किंतु जब न्यायपालिका भटकती है, तो उसे सुधारने की कोई व्यवस्था नहीं है।

रिजिजू ने बड़ी ही मार्मिक बात कही- हमारा लोकतंत्र जीवंत है, इसमें कई बार तुष्टीकरण की राजनीति भी होती है। कोई दल नहीं चाहता कि वह न्यायपालिका के खिलाफ दिखे। यहाँ रिजिजू किसके तुष्टिकरण की बात कर रहे हैं? पाठक स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि यहाँ कम से कम अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की बात तो नहीं हो रही!

विधि मंत्री ने अपने वक्तव्य में यह भी कहा है कि ऐसी व्यवस्था विश्व में कहीं नहीं है कि जज ही अपनी बिरादरी के जजों की नियुक्ति करें। राजनीति में जो उथल-पुथल होती है, वह तो सभी को दिखती है, किंतु जजों की नियुक्ति में जो उथल-पुथल हो रही है, वह किसी को नहीं दिख पा रही।

रिजिजू यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में अंकल जज सिंड्रोम घुसा हुआ है। जज उसी को जज चुनते हैं, जिसे वे जानते हैं। जज के पद पर नियुक्ति के लिए करीबी, परिवार के लोगों, जानने वालों में से नाम की सिफारिश व चयन होता है। जज बनाने के लिए मेरे पास जो टिप्पणियां आती हैं, उनमें जज लिखते हैं, मैं इसे जानता हूं, वो मेरी कोर्ट में आते हैं, इसका चरित्र अच्छा है, इसके काम से मैं खुश हूं। 1993 के पहले जजों पर अंगुली नहीं उठती थी क्योंकि दूसरे जजों की नियुक्ति में उनकी भूमिका नहीं होती थी। वे इन सबसे दूर रहते थे।

रिजिजू ने कहा, सांसद व जज, दोनों के पास विशेषाधिकार होते हैं किंतु संसद में एथिक्स कमेटी या स्पीकर किसी सांसद के असंसदीय शब्दों को कार्यवाही से हटाते हैं, उसकी निंदा होती है। प्रेस पर भी प्रेस काउंसिल दृष्टि रखती है परंतु न्यायपालिका जब कोई ऐसा निर्णय दे, जो समाज के अनुकूल नहीं है, तो इसे देखने की कोई भीतरी व्यवस्था नहीं है।

कानून मंत्री ने कहा, सांसद पांच साल के लिए चुनकर आते हैं, लोग चाहें तो 5 साल बाद उन्हें फिर से कुर्सी पर न बैठाएं। जजों को लोग नहीं चुनते, फिर भी याद रखना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट व कई हाईकोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण हो रहा है। सोशल मीडिया पर भी चीजें आ रही हैं, लोग जजों का व्यवहार देख रहे हैं।

यह बहुत ही गंभीर बात है कि रिजिजू यह कहें कि लोग जजों का व्यवहार देख रहे हैं। हाल ही में नूपुर शर्मा के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों द्वारा की गई टिप्पणियों में भारत की जनता ने जो तीखी प्रतिक्रिया दी, वह सबके सामने है। इन जजों ने कोर्ट की अवमानना की दुहाई देकर जनता को चुप कराने का प्रयास किया किंतु जनता को कब तक चुप रखा जा सकता है!

संभवतः इसी उदाहरण को ध्यान में रखते हुए विधि मंत्री ने कहा कि कई बार जज कोई बात कह देते हैं, जो निर्णय का हिस्सा नहीं होती है किंतु ऐसा कहकर वे अपनी सोच उजागर करते हैं। समाज में इसका विरोध भी होता है। जज अपनी बात केवल आदेश के जरिये कहें, यही अच्छा रहेगा। न कि बाहर टिप्पणियों में कुछ कहा जाए।

किरेन रिजिजू ने कहा, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जमाने में तीन सीनियर जजों को ओवरटेक करके किसी को चीफ जस्टिस बनाया गया, मौजूदा सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया। आज जब सरकार कोई कदम उठाती है तो वही लोग जो कभी न्यायपालिका पर कब्जा चाहते थे, कहते हैं कि मौजूदा सरकार न्यायपालिका पर हावी हो रही है, नियंत्रण कर रही है या जजों की नियुक्ति में रोड़े अटका रही है।

रिजिजू ने कहा, केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते 8 साल में ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे न्यायपालिका को नुकसान हो या उसके अधिकार को चुनौती मिले। जब केंद्र सरकार राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग लाई, तो इसे चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द किया। सरकार चाहती तो इस पर और कदम उठा सकती थी।

रिजिजू ने अपने वक्तव्य में यह भी कहा है कि जजों को व्यावहारिकता और वित्तीय स्थितियों का पता नहीं होता। यूपी में कोविड के दौरान एक जज ने आदेश दिए कि सभी जिला अस्पतालों में निश्चित दिनों में कोविड की दवाएं, ऑक्सीजन, एंबुलेंस आदि दी जाएं। हमारे पास यह सब होना भी तो चाहिए, हमारी अपनी क्षमता है। जजों को व्यवहारिक दिक्कतें व वित्तीय स्थिति पता नहीं होती।

इस प्रकार रिजिजू ने न्यायव्यवस्था के कपड़े से लेकर भाषा तक और वकीलों के व्यवहार से लेकर जजों के व्यवहार तक सुधार की आवश्यकता जताई है। अच्छा तो यह हो कि सुधारों की मांग न्यायपालिका के स्वयं के भीतर से उठे अन्यथा यह आवाज जनता के बीच से उठेगी। सुधार अनिवार्य हैं और वे होकर रहेंगे….. आज नहीं तो कल।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुलायमसिंह का अतीत मृत्यु के साबुन से नहीं धुल सकता!

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मुलायमसिंह का अतीत
मुलायमसिंह का अतीत

मुलायमसिंह ने अपने राजनीतिक जीवन में हिन्दुओं के विरुद्ध जो घृणित कार्य किए हैं उन्हें कभी क्षमा नहीं किया जा सकता। मुलायमसिंह का अतीत मृत्यु के साबुन से नहीं धुल सकता!

मुलायम सिंह यादव नहीं रहे…… इसमें दुख की कोई बात नहीं है। सभी लोग मरते हैं….. सबको यहाँ मरना है…… कोई भी यहाँ जिन्दा बैठा नही रहेगा। मनुष्य का आकलन उसके कर्मों से होता है। यह एक व्हाटसैप ग्रुप में जोधपुर के एक बंधु द्वारा की गई टिप्पणी थी, जो मेरे भीतर बहुत कुछ झिंझोड़ गई।

हमारी संस्कृति कहती है कि मृत्यु के बाद मनुष्य की बुराई नहीं की जाती। मरने वाला मर गया, उसके साथ सारी शत्रुता खत्म। सारी शिकायतें समाप्त और केवल उसकी आत्मा के लिए शांतिपाठ….। तो क्या मृत्यु वह साबुन है जो मनुष्य के अतीत को धो डालता है, चाहे वह कैसा भी क्यों न रहा हो!

10 अक्टूबर 2022 को जिस दिन मुलायमसिंह की देह पूरी हुई, देश जैसे दो हिस्सों में बंट गया। एक ओर टेलिविजन चैनलों पर देश के सियासती लोग मुलायमसिंह की मौत पर आठ-आठ आंसू ढार रहे थे तो दूसरी ओर व्हाटसैप समूहों एवं अन्य सोशियल मीडिया प्लेटफार्मों पर लाखों लोग मुलायमसिंह के अतीत पर तीखी टिप्पणियां कर रहे थे।

भारत की वर्तमान राजनीति में राजनीतिक पार्टियों को संस्कृति की परवाह नहीं होती, उन्हें केवल अपने वोटों की चिंता रहती है। सियासती लोगों की यह मजबूरी हो सकती है कि वे स्वयं को अजातशत्रु घोषित करने के लिए उस आदमी की मौत पर भी रोदन करें जिसकी शक्ल तक देखना वे पसंद नहीं करते थे किंतु पब्लिक की ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती। सियासती लोगों को मुलायमसिंह की मृत्यु के बाद उनके वोटर्स को रिझाने के लिए भी आंसू बहाना ही एकमात्र मार्ग दिखाई देता है किंतु पब्लिक को किसी के वोट नहीं लेने होते, इसलिए पब्लिक अपनी प्रतिक्रियाएं बिना किसी लाग-लपेट के देती है।

सोशियल मीडिया में जो संदेश चल रहे थे उनमें कहा गया था कि मुलायम सिंह यादव ही तब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे जब 30 अक्टूबर तथा 2 नवम्बर 1990 को अयोध्या में निहत्थे कारसेवकों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई गईं। सैकड़ों रामभक्त मारे गए। रातों-रात हिन्दू श्रद्धालुओं के शव सरयू मे फैंक दिए गए। सैंकड़ों ललनाओं की मांगों के सिंदूर लुट गए। सैंकड़ों चूल्हे उजड़ गए। सैंकड़ों आंखों के तारे बुझ गए। इन टिप्पणियों से समझा जा सकता है कि मुलायमसिंह का अतीत मुलायमसिंह का पीछा कभी नहीं छोड़ेगा।

कलकत्ता के कोठारी बंधु शरद कोठारी और राम कोठारी की याद आज भी करोड़ों हिंदुओं की आंखें नम कर देती है जो अपनी पितृविहीन छोटी बहिन का विवाह छोड़कर भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम के चरणों में अपनी विनम्र और मूक सेवा अर्पित करने आए थे। उन्हें तब गोली मारी गई जब वे एक सुनसान गली में किसी सहृदय हिन्दू के घर में शरण लिए हुए थे। जोधपुर के प्रोफेसर महेन्द्र नाथ अरोड़ा का शव ही वापस लौटा था। जोधपुर जिले के परिहार माली परिवार का 18-19 साल का एक लड़का था, उसका भी शव ही जोधपुर लौटकर आया।

ऐसे सैंकड़ों रामसेवक थे जिनके शव भी उनके घर नहीं लौट सके। सैंकड़ों लोगों के तो नाम तक सामने नहीं आए जिन्हें मुलायम सिंह ने बड़ी बेरहमी से मरवाया। बहुत से किस्से ऐसे थे जो कभी भी अखबारों की रिपोर्ट नहीं बने। ऐसा ही एक किस्सा यहाँ लिखता हूँ।

मेरी जब झालावाड़ में नियुक्ति थी, तब मेरे पास रमेशचंद्र नामक एक ड्राइवर था। वह रोज मुलायमसिंह को गाली दिया करता था। मेरे द्वारा कारण पूछे जाने पर उसने जो बताया, उसे सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए! उसने बताया कि –

”जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब एक दिन घर लौटते समय मैंने एक बस खड़ी हुई देखी जिसके बाहर खड़ा आदमी आवाज लगा रहा था कि यदि किसी को रामजी का मंदिर बनवाने अयोध्या चलना है तो बस जा रही है। मैं भी रामजी का मंदिर बनाने के लिए स्कूल के बस्ते सहित उस बस में चढ़ गया और अयोध्या चला गया। वहाँ जब गोलियां चलीं तो मेरी आंखों के सामने लोग गोलियां लगने से गिरने लगे। हजारों लोग गलियों में भागने लगे। इस दौरान मैं अपने ग्रुप से से बिछुड़ गया। मैंने लोगों की लाशों को अपनी आंखों के सामने सरयूजी में फैंके जाते हुए देखा। उस दिन मैंने सौगंध खाई कि यदि मुलायम सिंह मिल जाए तो उसे गोली मार दूं। मुझे मालूम नहीं था कि झालावाड़ कैसे पहुंचते हैं। मेरी जेब में एक भी पैसा नहीं था। मैं भीख मांगकर रोटी खाता और किसी भी ट्रेन में चढ़ जाता। एक महीने भटकने के बाद मैं किसी तरह अपने घर पहुंचा। मेरे घर वालों का रो-रो कर बुरा हाल था। किसी ने उन्हें बता दिया था कि मैं अयोध्या जाने वाली बस में चढ़ा था। मेरे घर वाले समझते रहे कि मैं अयोध्या में मर गया। ऐसे किस्से असंख्य हैं।”

जब तक रमेशचन्द्र जीवित रहेगा, तब तक मुलायमसिंह का अतीत भी जीवित रहेगा। रमेशचंद्र जैसे लाखों लोग हैं जो मुलायमसिंह का अतीत हमेशा जिंदा रखेंगे।

मुलायम सिंह को अयोध्याजी में रामभक्तों पर गोलियां चलाने का कोई मलाल नहीं था। वे कई बार इस बात को दोहराते रहे कि यदि जरूरत होती तो वे और गोलियां चलवाते।

मुलायम सिंह ही वह नेता थे जिन्होंने दिन-दहाड़े ठाकुर परिवारों के 22 निर्दोष सदस्यों का बेरहमी से रक्त बहाने वाली कुख्यात डकैतन फूलन देवी को अपनी पार्टी से टिकट देकर लोकसभा पहुंचाया।

जिस उत्तर प्रदेश से लालबहादुर शास्त्री, गोविंद वल्लभ पंत, चंद्रभान गुप्ता, चौधरी चरणसिंह और कल्याणसिंह जैसे नेता भारतीय राजनीति में अपना नाम अमर कर गए, उसी उत्तर प्रदेश में मुलायमसिंह पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे दर्जनों माफियाओं और गुन्डों को अपनी पार्टी से एमएलए, एमपी और मंत्री बनाया।

मुलायमसिंह यादव ही वह नेता थे जिन्होंने उत्तर प्रदेश की पॉलिटिक्स में एमवाई फैक्टर (मुस्लिम एवं यादव घटक) तैयार करने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस फिटमेंट बोर्ड में मुसलमानों एवं यादवों को डंके की चोट पर भर्ती कराया। इतना ही नहीं मुलायमसिंह ने इस घटक के लोगों को अंधाधुंध तरीके से प्रांतीय सरकार की बहुत सी नौकरियों में भर्ती कराया।

एमवाई फैक्टर लालू यादव ने भी बिहार में तैयार किया था किंतु उन्होंने रामरथ यात्रा पर गोलियां नहीं चलवाईं, केवल लालकृष्ण आडवानी को बंदी बनाया। जबकि मुलायमसिंह ने तो रामभक्तों पर बेहिचक गोलियां चलवाईं।

मुलायमसिंह ही वे नेता थे जिन्होंने लड़कियों के साथ बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने वालों को यह कहकर कानूनी प्रक्रिया से बचाने का प्रयास किया कि लड़कों से गलती हो जाती है।

मुलायमसिंह ही वह नेता थे जिन्होंने भारत सरकार द्वारा सिमी के स्लीपर सैल के सदस्यों को पकड़ लिए जाने पर उन्हें छुड़वाने के लिए ऐढ़ी-चोटी का जोर लगाया था।

मुलायमसिंह ही वे नेता थे जिनकी पार्टी के लोगों ने बहिन मायावती की प्रतिष्ठा को धूल में मिलाने के लिए गेस्टहाउस में उनके कपड़े तक फाड़ दिए थे। जब बहिन मायावती ने कहा कि समाजवादी गुण्डे मेरा बलात्कार करना चाहते थे तो मुलायमसिंह ने कहा था कि मायावती में ऐसा क्या है जो कोई उससे बलात्कार करेगा?

मुलायमसिंह ही वह नेता थे जिन्होंने अलग पहाड़ी प्रदेश (उत्तराखण्ड) बनाने की मांग कर रही औरतों पर जुल्म ढहाए थे। तत्कालीन मीडिया रिपोर्टों की मानें तो मुलायम की पुलिस ने आंदोलनकारी औरतों को खेतों में खींचकर उनसे बलात्कार किए। ऐसा जघन्य काण्ड भारत के किसी अन्य राज्य में हुआ हो, ऐसा याद नहीं पड़ता।

मुलायमसिंह ही वह नेता थे जिन्होंने अपने भाइयों, पुत्रों, पुत्रवधुओं, भतीजों आदि को थोक के भाव भारत की संसद, उत्तर प्रदेश की विधानसभा एवं विधान परिषद में पहुंचाया।

मुलायम के राजनीतिक गुरु तथा जवाहरलाल नेहरू के धुर विरोधी राममनोहर लोहिया का एक किस्सा बड़ा प्रसिद्ध है। जिस समय जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु हुई, उस समय लोहिया यूरोप में थे। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि नेहरू की मृत्यु हो गई तो उन्होंने वहीं पर नेहरू के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया। आज जब उन्हीं राममनोहर लोहिया के चेले मुलायमसिंह का निधन हुआ है तो लोग भला मुलायम के विरुद्ध अपने मन की पीड़ा व्यक्त करने से कैसे रोक पाएंगे।

जब हम इतिहास ग्रन्थ खोलते हैं तो उनमें जिन लोगों की बुराइयां लिखी हुई हैं उन तमाम लोगों को मरे हुए सैंकड़ों या हजारों साल हो चुके हैं। मुलायमसिंह की मृत्यु पर उदासीन अथवा निरपेक्ष नहीं रहा जा सकता। लोग कुछ तो कहेंगे, लोगों से यह अधिकार छीना नहीं जा सकता। मुलायमसिंह का अतीत कम से कम तब तक तो जीवित रहेगा, जब तक भारत में इतिहास के ग्रंथ जीवित रहेंगे।

जहाँ तक सियासी लोगों की बात है, उनकी तो हालत यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने जनसंघ की आधारशिला रखने वाले चार नेताओं में से एक बलराज मधोक के निधन पर उतने आंसू खर्च नहीं किए जितने उन्होंने मुलायम की मौत पर बहाए हैं।

सियासी मजबूरी होने और नहीं होने के अंतर को यहीं पर देखा जा सकता है कि मुरलीमनोहर जोशी ने मुलायम के निधन पर कहा है कि मुलायम ऐसी शख्सियत थे जो किसी भी आदमी के साथ दो तरह का व्यवहार कर सकते थे। एक तरफ तो वे उस आदमी से दोस्ती रख सकते थे और दूसरी तरफ वे उस आदमी के साथ दुर्व्यवहार भी कर सकते थे। साफ समझ में आता है कि मुरलीमनोहर जोशी को अब किसी के वोट नहीं चाहिए।

इतना सब होने पर मुलायम सिंह द्वारा राष्ट्र के प्रति की गई एक सेवा को नहीं भुलाया जा सकता। वे मुलायमसिंह ही थे जिन्होंने एक विदेशी मूल की महिला को भारत के प्रधानमंत्री पद पर आरूढ़ होने से रोक दिया था। उनके तथा सुब्रमण्यम स्वामी के अतिरिक्त यह साहस और किसी राजनेता अथवा राजनीतिक दल में नहीं था।

ज्ञातव्य है कि सुब्रमण्यम स्वामी भारत का संविधान लेकर भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के पास पहुंचे थे और उन्हें बताया था कि भारतीय संविधान के अनुसार विदेशी मूल का कोई व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। रमेशचंद्र जैसे लाखों लोग हैं जो मुलायमसिंह का अतीत हमेशा जिंदा रखेंगे। मुलायमसिंह का अतीत कम से कम तब तक तो जीवित रहेगा, जब तक भारत में इतिहास के ग्रंथ जीवित रहेंगे।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हे कलियुगी गौतम, ये तुमने क्या किया!

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Gautam Buddha

हे कलियुगी गौतम, तुम मुझे नहीं पहचानते किंतु मैं तुम्हें पहचानता हूँ। तुमने मेरे बारे में सुन अवश्य रखा है किंतु तुमने जो सुना है, उसे समझा नहीं है। तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हारा नाम मेरे नाम पर गौतम तो रख दिया किंतु तुम गौतम बन नहीं सके। आज मैं तुम्हें बताता हूँ कि गौतम होना क्या होता है!

तुम से सात हजार साल पहले भी एक गौतम हुए थे जिन्होंने समाज में उच्च आदर्शों को बनाए रखने के लिए अपनी स्त्री को पत्थर बना दिया था। ठीक समझे तुम, अहिल्या नाम ही था उनका। तुम्हारी तरह मैं भी जानता हूँ कि माता अहिल्या का कोई दोष नहीं था, उनके साथ छल हुआ था किंतु सजा उन्हें मिली। मेरी और तुम्हारी तरह गौतम मुनि भी जानते थे कि उनकी स्त्री के साथ अन्याय हुआ है किंतु उन्होंने अपनी पत्नी को न्याय देने के स्थान पर उस विराट् समाज की ओर देखा जिसके समक्ष चरित्र की उज्जवलता का आदर्श बनाए रखने के लिए अपनी पत्नी का बलिदान करना आवश्यक था, उन्होंने किया।

तुम्हारे जैसे अल्पबुद्धि के लोग गौतम मुनि के उस निर्णय को गलत बताकर उस पर घण्टों कुतर्क करते हैं किंतु वे यह नहीं समझ पाते कि कई बार कुछ निर्णय सही और गलत की परिभाषाओं से बाहर निकलकर भी लेने पड़ते हैं। गौतम ने ऐसा ही किया। क्या यह निर्णय लेते समय उनका हृदय अदम्य पीड़ा से भर नहीं गया होगा? अवश्य ही भरा होगा! हृदय पर पत्थर रखकर ही तो उन्होंने अपनी निर्दोष नारी को पत्थर बनाने का श्राप दिया होगा!

गौतम मुनि की निर्दोष नारी की इसी पीड़ा को हरने के लिए राम को आना पड़ा। वही राम जिसकी पूजा न करने के लिए तुमने भारत की राजधानी दिल्ली में हजारों भोले-भाले लोगों को शपथ दिलवाई है।

जिस तरह तुम नहीं समझते कि गौतम होना क्या होता है, उसी तरह तुम यह भी नहीं समझोगे कि राम होना क्या होता है! क्या तुमने उस राम को कभी जानने का प्रयास किया है जो शबरी के द्वार पर जाकर उसके झूठे बेरों की याचना करता है। तुम भला राम को कैसे जानोगे! वह तो अपने पिता को वचनबद्ध देखकर स्वयं ही सत्तासुख को छोड़कर जंगलों में चला आया था और तुम! तुम तो सत्तासुख पाते रहने के लिए भारत के भोले-भाले लोगों के मनमंदिरों से राम को निकालकर उन्हें फिर से वनवास देने की कुचेष्ट कर रहे हो!

हे कलियुगी गौतम! क्या तुमने जटायु का नाम सुना है? वही जटायु जिसके शरीर को अपनी गोद में रखकर राम जितना रोए थे, उतना तो अपने पिता दशरथ की मृत्यु पर भी नहीं रोए होंगे! तुम क्या जानो राम को और राम के मन में बैठे शबरी और जटायु को!

एक और गौतम के बारे में बताता हूँ जिन्होंने सामवेद के अनेक मंत्रों की रचना की थी। हो सकता है, तुमने उनका भी नाम सुना हो। न सुना हो तो आज सुन लो। सामवेद के उन्हीं मंत्रों पर गौतम ने ‘गौतम धर्मसूत्र’ की रचना की। इस ग्रंथ में उन्होंने वैदिक धर्म, वर्ण और आश्रम की विस्तृत व्याख्या की जिसमें समाज के सभी वर्गों के लोगों के लिए नियम बनाए थे।

हे कलियुगी गौतम! विष्णु और दुर्गा की पूजा करने वाले इस गौतम द्वारा बनाए गए सामाजिक नियमों को क्या कभी तुमने जाना है? तुम भला कैसे जानोगे? तुम्हारी विकृत दृष्टि स्वयं के लिए सत्ता प्राप्त करने पर टिकी रहती है, तुम्हें समाज को उन्नति की ओर ले जाने वाले गौतम सूत्र की वे महान् बातें क्योंकर पता होंगी जिनका आधार केवल दया, क्षमा, उदारता और त्याग है। क्या गौतम सूत्र में लिखी वे बातें कभी तुम्हें किसी ने नहीं बताईं जिनका संदेश मनुष्य को स्वयं कष्ट सहकर, समाज को उच्च आदर्श पर दृढ़ता पूर्वक टिकाए रखना है!

अब मैं तुम्हें अपने बारे में बताता हूँ। यह तो मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मेरा नाम भी तुम्हारी तरह गौतम है। मैं आज से ढाई हजार साल पहले इसी पावन भारत भूमि पर हुआ था जिस पर तुम पैदा हुए हो! तुम मेरी शरण में आना चाहते हो, आओ, धर्म तुम्हें बुला रहा है, बुद्ध तुम्हें बुला रहा है। परंतु हे कलियुगी गौतम मुझ तक आने के लिए मेरा मार्ग अपनाओ।

वह कभी न करो जो मैंने कभी नहीं कहा, कभी नहीं किया। मैंने समाज से यह कभी नहीं कहा कि तुम राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा की पूजा मत करो। फिर तुमने किस लालच के वशीभूत होकर भारत के भोले-भाले लोगों को यह संदेश देने का कुत्सित कार्य किया है कि तुम हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं की पूजा मत करो। मैंने तो केवल इतना कहा था कि वीणा के तार इतने मत कसो कि वे टूट जाएं और इतने ढीले भी मत छोड़ो कि उनसे कोई राग न निकले। तुम तो वीणा के तारों को तोड़ने पर ही तुल गए हो।

हे कलियुगी गौतम! तुम शायद नहीं जानते कि मेरा नाम तो केवल सिद्धार्थ था, मुझे गौतम ऋषि किसने बनाया? सुजाता की खीर ने उसी सुजाता की खीर ने जो राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा की पूजा करने के कारण मेरे प्राण बचाने के लिए खीर लेकर आई थी! मैं तो निरा संन्यासी था, मुझे भगवान गौतम किसने कहा? राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा के पूजकों ने। मेरे शिष्य तो मुझे केवल तथागत कहते थे किंतु मुझे विष्णु का दसवां अवतार किसना कहा? राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा के भक्तों ने। मेरे समय के लोग तो मुझे केवल शाक्य मुनि कहते थे, मुझे बुद्ध किसने कहा? राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा के पूजकों ने।

मैंने कब कहा कि तुम राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को छोड़कर मेरी शरण में आओ? तुम मेरे पास जरूर आओ किंतु राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा के आदर्शों को अपने मनमंदिर में सजा कर आओ!

मैंने कब कहा था कि आत्मा नहीं है? मैंने तो केवल इतना कहा था कि अप्प दीपो भव! मैंने कब कहा था कि परमात्मा नहीं है? मैंने तो यह कहा था कि तुम्हारे सदाचरण ही तुम्हें मोक्ष की तरफ ले जा सकते हैं। मैंने कब कहा था कि धर्म नहीं है? मैंने तो केवल इतना ही कहा था कि अहिंसा ही परमधर्म है।

राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा तुम्हें मेरी बातों से दूर कहाँ ले जाते हैं? फिर तुम भारत के भोले-भोले लोगों को उनसे दूर ले जाने की कुचेष्टा क्यों करते हो?

यदि तुम्हारे मनमंदिरों में राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा के आदर्श नहीं होंगे तो तुम भी एक दिन ऐसे ही संकट में आ जाआगे जिस प्रकार अफगानिस्तान के लोग आए थे। अफगानिस्तान का इतिहास पता है तुम्हें? आज से दो हजार साल पहले तक अफगानिस्तान में राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा के भक्त रहते थे किंतु उन्होंने भी राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को छोड़कर मेरी शरण में आना चाहा। क्या परिणाम हुआ उसका?

आज से ठीक चौदह सौ साल पहले सम्पूर्ण अफगानिस्तान अरबवासियों द्वारा तलवार की धार पर धर लिया गया। करोड़ों लोग मौत के घाट उतार दिए गए, करोड़ों लोग जीवित ही आग में झौंक दिए गए और जो बचे, वे सब अपना धर्म खोकर तालिबान द्वारा शासित हैं। यह होता है अपना धर्म छोड़कर कहीं और मुंह मारने का अर्थ! राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को पूजने वालों ने बार-बार कहा है स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।

अपनी जड़ों से कटकर इस बेरहम दुनिया में तुम कभी भी सुरक्षित नहीं रह पाओगे। यदि भारतीय समाज टूट-टूट कर बिखर गया तो सम्पूर्ण भारत महान् विपत्ति में पड़ जाएगा। यदि तुम्हारे मनमंदिरों से राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा निकल गए तो तुम पर भी कोई देश वैसे  ही परमाणु बम लेकर टूट पड़ेगा जैसे अमरीका जापान पर टूट पड़ा था। तुम पर भी कोई आतंकवादी समूह वैसे ही टूट पड़ेगा जैसे हमास आए दिन इजराइल पर टूट पड़ता है। तुम भी किसी तालिबान से बचने के लिए हवाई जहाज के पहियों और छतों पर चढ़कर मौत को गले लगाने के लिए मजबूर हो जाओगे।

हे कलियुगी गौतम! तुम्हें पता नहीं है किंतु मैं बताता हूँ जितनी पूजा तुम मेरी करते हो, उससे कहीं अधिक पूजा राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को पूजने वाले मेरी करते हैं! तुम राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को पूजने वालों को छोड़ दोगे तो भी राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को पूजने वाले तुम्हें नहीं छोड़ेंगे। तुम उनके अपने हो और वे तुम्हारे अपने हैं।

जरा सोचो जब पूरी दुनिया में पारसियों पर संकट आया तो किसने उन्हें गले लगाया? राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को पूजने वालों ने। जब तिब्बत के बौद्धधर्मगुरु दलाई लामा पर संकट आया तो किसने उन्हें सिर आंखों पर बैठाया? राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को पूजने वालों ने। जब तसलीमा नसरीन पर संकट आया तो किसने उसे अपनी बेटी समझ कर अपनाया? राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को पूजने वालों ने।

हे कलियुगी गौतम! एक बात और कहता हूँ। मैं ही राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा हूँ। राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को पूजने वाले मुझ तक ही आते हैं। तुम भारत के भोले-भाले लोगों को भटकाओ मत। तुम राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा के साथ मेरी शरण में आओ। ये बात तुम्हारी समझ में आ जाए तो ठीक है, वरना मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि तुम्हारे आचरण ही तुम्हें मोक्ष की तरफ ले जा सकते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा अग्रसेन प्रजापालक राजाओं के आदर्श !

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महाराजा अग्रसेन प्रजापालक राजाओं के आदर्श !

महाराजा अग्रसेन का इतिहास पाँच हजार साल से भी अधिक पुराना है। वे भगवान श्रीकृष्ण के समकालीन थे। उनका जन्म द्वापर के अंतिम चरण में हुआ था। इस काल में भारत भूमि पर दुष्ट राजाओं का बोलबाला था और उनके दमन के लिए बड़ी तैयारियां चल रही थीं।

यदुवंशी श्रीकृष्ण भारत भूमि से कंस, जरासंध, शिशुपाल तथा कालयवन जैसे पापी राजाओं का सफाया कर रहे थे और चंद्रवंशी पाण्डव, अपने ही कुल के कुरु राजकुमारों से अंतिम युद्ध की तैयारी कर रहे थे। पापात्मा दुर्योधन, दुःशासन, शकुनि, जयद्रथ तथा कर्ण आदि मलिन बुद्धि के राजा भगवान श्रीकृष्ण तथा पाण्डवों के विरोध में खड़े थे। इस कारण भारत भूमि पर एक महान युद्ध के बादल मण्डरा रहे थे जिसमें बड़ी संख्या में योद्धाओं का विनाश होना निश्चित था।

ऐसे घनघोर समय में आगरा तथा वल्लभगढ़ के आसपास सूर्यवंशियों के प्रतापनगर राज्य के राजा वल्लभसेन के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में अग्रसेन का जन्म हुआ। उस दिन अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा थी। इसी दिन से आश्विन मास की नवरात्रियों का आरम्भ होता है।

जब अग्रसेन राजा बने तो उन्होंने द्वापर और कलियुग के संधिकाल के क्षत्रिय राजा होते हुए भी युगीन मान्यताओं को अस्वीकार करके समाज में समृद्धि, सहयोग, शांति तथा अहिंसा की स्थापना के लिए कार्य किया। उन्होंने यज्ञों में पशु-बलि की प्रथा को बंद करवाया तथा समाज को उच्च आदर्शों पर चलने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने भारत भूमि से जातीय उच्चता के दंभ का मिथक तोड़ने के लिए तथा विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य समाप्त करके भाईचारा स्थापित करने के लिए स्वयं सूर्यवंशी आर्यराजा होते हुए भी नाग कन्याओं से विवाह किए तथा अपने पुत्रों को युद्धों का हिंसक मार्ग छोड़कर अहिंसक वणिक कर्म अपनाने को कहा।

महाराजा अग्रसेन सूर्यवंशी राजा रामचंद्र को अपना आदर्श मानते थे तथा समाज के प्रत्येक व्यक्ति के अभ्युदय के लिए संकल्पित थे। उनका मानना था कि उच्च आदर्शों से प्रेरित समृद्ध समाज ही सुखी हो सकता है। इसलिए अग्रसेन ने अपनी प्रजा को कृषि, व्यापार तथा गौपालन के लिए प्रेरित किया ताकि समाज में समृद्धि आ सके। अपने गुणों के कारण अग्रसेन प्रजाप्रिय राजा बन गए। ऐसे व्यक्तियों के साथ कई तरह के मिथक एवं दंतकथाएं स्वतः ही जुड़ जाया करती हैं। महाराजा अग्रसेन के साथ भी ऐसा ही हुआ है।

कुछ मिथकों में कहा गया है कि जिस राजकन्या माधवी से महाराज अग्रसेन ने विवाह किया, उस राजकुमारी से स्वयं इन्द्र विवाह करना चाहता था किंतु राजकुमारी ने इंद्र की जगह अग्रसेन को चुना। इस पर इंद्र ने अग्रसेन पर आक्रमण कर दिया। दोनों के बीच युद्ध हुआ। अंत में देवर्षि नारद ने इस युद्ध को बंद करवाया।

कुछ कथाओं में कहा गया है कि महाराजा अग्रसेन ने अपनी प्रजा की समृद्धि के लिए काशी में रहकर भगवान शिव की घोर तपस्या की। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें माँ लक्ष्मी की तपस्या करने के लिए कहा। महाराजा अग्रसेन ने माँ लक्ष्मी को भी तपस्या से प्रसन्न किया। लक्ष्मीजी ने उन्हें वरदान दिया कि आप एक नवीन राज्य की स्थापना करें। आपकी प्रजा कभी भी निर्धन नहीं होगी।

देवी लक्ष्मी के आदेश से महाराजा अग्रसेन ने सरस्वती नदी के किनारे ‘अग्रेयगण’ नामक नवीन राज्य की स्थापना की तथा अपनी राजधानी को ‘अग्रोहा’ नाम दिया। अग्रेयगण को ‘अग्रोदय’ राज्य के नाम से भी जाना गया। वर्तमान समय में यह स्थान हरियाणा प्रांत में स्थित है।

महाराजा ने व्यवस्था बनाई कि जब कोई व्यक्ति अग्रोहा में आकर बसे तो अग्रोहा का प्रत्येक परिवार एक ईंट तथा एक रुपया देकर उसकी सहायता करे। इस व्यवस्था से उसे अपना घर बनाने तथा व्यवसाय आरम्भ करने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। इस कारण अग्रोहा में कोई निर्धन नहीं रहा। 

मान्यता है कि महाराजा अग्रसेन ने 108 वर्ष राज्य किया। महाराजा अग्रसेन के उन्नीस पुत्र हुए जिनमें से सबसे बड़ा पुत्र ‘विभु’ प्रजापालन के लिए अग्रसेन के बाद अग्रोहा का राजा बना। उसके वंशजों से क्षत्रिय राजाओं की परम्परा का निर्वहन होता रहा जबकि महाराजा अग्रसेन के शेष अठारह पुत्रों ने अहिंसक वणिक वृत्ति धारण करके अपने पिता के आदर्शों को आगे बढ़ाया। उन 18 पुत्रों के वंशज ही अब विश्वव्यापी अग्रवाल समाज के नाम से जाने जाते हैं।

महाराजा अग्रसेन के वंशजों में हजारों-लाखों नर-नारी ऐसे हुए हैं जिन्होंने महाराजा अग्रसेन के आदर्श पर चलकर प्रजा के कष्टों को हरने के लिए अनाथालय, धर्मशाला, चिकित्सालय, विद्यालय, कुएं, तालाब, प्याऊ, धर्मार्थ ट्रस्ट आदि बनवाए। भारत की आजादी में अग्रवाल समाज का बहुत बड़ा योगदान है।

महाराजा के वंशज आज भी दुनिया भर में चिकित्सक, वैज्ञानिक, शिक्षक, लेखक, पत्रकार, सैन्य अधिकारी, लेखाकार आदि के रूप में मानव मात्र को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। महाराजा अग्रसेन पर बहुत से ग्रंथ लिखे गए हैं। सुप्रसिद्ध लेखक भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र, जो स्वंय भी अग्रवाल समुदाय से थे, उन्होंने ई.1871 में ‘अग्रवालों की उत्पत्ति’ नामक प्रामाणिक ग्रंथ लिखा जिसमें उन्होंने महाराजा अग्रसेन के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला। 

भारत सरकार ने ई.1976 में महाराजा अग्रसेन पर 25 पैसे का डाकटिकट जारी किया। ई.1995 में भारत सरकार ने दक्षिण कोरिया से 350 करोड़ रूपये की लागत से एक विशेष तेल वाहक पोत खरीदा, जिसका नाम ‘महाराजा अग्रसेन’ रखा गया। इस पोत की तेल परिवहन क्षमता 1,80,0000 टन है। भारत सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 10 का नाम महाराजा अग्रसेन के नाम पर रखा।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय ज्योतिष एवं कालगणना का सम्पूर्ण विश्व ऋणी है!

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भारतीय ज्योतिष एवं कालगणना

भारतीय ज्योतिष एवं कालगणना का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी ज्योतिषी विओट ने लिखा है कि भारतीयों ने नक्षत्र ज्ञान चीनियों से ग्रहण किया। एक अन्य यूरोपीय विद्वान ह्विटनी भी इस मत का समर्थक है। कुछ अन्य विद्वानों ने लिखा है कि भारतीयों ने नक्षत्र ज्ञान बेबिलोन के लोगों या अरब के लोगों से प्राप्त किया।

इन विद्वानों ने जानबूझकर सही तथ्यों की अनदेखी की है तथा ऋग्वेद को केवल ई.पू.1200 का बताकर भारतीय ज्योतिष को विदेशों से ग्रहण किया जाना बताया है। अनेक उद्धरणों से यह सिद्ध किया जा सकता है कि विदेशी विद्वान झूठ बोल रहे हैं।

जहाँ विदेशी विद्वान कह रहे हैं कि भारतीयों ने ज्योतिष का ज्ञान अरबवासियों से लिया, वहीं प्राचीन अरबवासियों ने स्वयं लिखा है कि उन्होंने अपना ज्योतिषशास्त्र भारतीय सिद्धान्तों से बनाया। ई.622 में अरब में इस्लाम का उदय हुआ। इस्लाम के अनुयाइयों ने लिखा है कि उस समय अरब में असभ्य तथा बर्बर लोग रहते थे।

इसलिए मुहम्मद की सेनाओं ने इन असभ्य लोगों को मारकर इस्लाम का प्रसार किया। वस्तुतः ये दोनों तरह के लोग झूठ बोल रहे हैं। जो लोग यह कह रहे हैं कि अरबवासियों ने भारतवासियों को ज्योतिष एवं गणित का ज्ञान दिया वे भी झूठे हैं तथा तथा जो लोग यह कह रहे हैं कि इस्लाम के उदय के समय अरब में असभ्य लोग रहते थे, वे भी झूठे हैं।

अरबवासी इस्लाम के उदय से पहले भी सभ्य थे। वे तीन देवियों की पूजा करते थे जिनका साम्य दुर्गा, सरस्वती एवं लक्ष्मी से बैठता है। उन्हें ज्योतिष एवं गणित का ज्ञान था जो निःसंदेह भारत से अरब में गया था। जिस समय मुहम्मद की सेनाएं अरब के प्राचीन सभ्यता के लोगों को मार रही थीं, उस समय भारत में ब्रह्मगुप्त शून्य का अविष्कार कर रहे थे। यह शून्य ही आज सम्पूर्ण जगत में गणित एवं ज्योतिष का आधार बना हुआ है। संसार का कोई भी विज्ञान शून्य के बिना गूंगा, बहरा, लंगड़ा एवं अंधा है।

जहाँ तक सिइयू के चीनी सिद्धान्त का प्रश्न है, उसमें मूलतः 24 नक्षत्र थे जबकि वैदिक ग्रन्थों में 24 नक्षत्रों की कोई चर्चा नहीं हुई है। वेदों में अभिजीत नक्षत्र के बिना 27 तथा अभिजीत नक्षत्र सहित 28 नक्षत्रों का उल्लेख हुआ है। चीन के सिइयू सिद्धांत ने भी आगे चलकर 28 नक्षत्र मान लिए। इस प्रकार चीन ने भारतीयों से ज्योतिष ग्रहण किया है न कि भारत ने चीन से।

नक्षत्रों की महत्ता ऋग्वेद के समय से अर्थात् ईसा के जन्म से लगभग 4000 साल पहले से भी अधिक पहले समझ ली गई थी। ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं में नक्षत्रों का उल्लेख हुआ है, यथा- मघा नक्षत्र में कन्यादान और पूर्वाफाल्गुनी में गोदान करना चाहिए।   एक ऋचा में यमगृह के रक्षक दो श्वानों के रूप में अश्विनी नक्षत्र (दो तारों का युग्म) का उल्लेख हुआ है।  विभिन्न ऋचाओं में सप्तर्षिमंडल,  सात लोक,  आकाशीय पिंडों के पारस्परिक आकर्षण  का उल्लेख आया है।

ऋग्वेद में उल्लेख आया है कि ‘वासंत विषुवद्दिन’ कृत्तिका नक्षत्र के स्थान पर मृगशिरा नक्षत्र में पड़ने लगा। बाल गंगाधर तिलक ने नक्षत्रों की गणना करके बताया कि यह घटना ईसा के जन्म से 4,000 वर्ष पहले घटित हुई। चूंकि वासंत विषुवद्दिन कृत्तिका नक्षत्र के स्थान पर मृगशिरा नक्षत्र में आने की गणना विशुद्ध ज्योतिषीय है, अतः भारतीय ज्योतिष भी उतना ही पुराना है, जितना कि ऋग्वेद। इस समय तक संसार में किसी भी सभ्यता के पास ज्योतिषीय ज्ञान नहीं था।

वेदों में ज्योतिष का सम्बन्ध धार्मिक-कृत्यों विशेषकर यज्ञों के आयोजनों से था किंतु बेबिलोन एवं चीन में यज्ञों की कोई परम्परा नहीं थी। भारत में वैदिक काल में कोई व्यक्ति किसी निर्दिष्ट नक्षत्र में अग्नि प्रज्वलित किये बिना, यज्ञ नहीं कर सकता था। माघ, फाल्गुन, चैत्र आदि मासों के नाम नक्षत्रों के आधार पर ही बने, और यह बात संस्कृत भाषा में ही पायी जाती है, यूनानी, लैटिन या चीनी में नहीं। नक्षत्रों के देवता वैदिक हैं, उनके बेबिलोनी या चीनी नाम नहीं पाये जाते। बेबिलोन में जो प्राचीन ज्योतिष सम्बन्धी आलेख प्राप्त हुए हैं, उनमें नक्षत्रों की गणना वैसी नहीं है जैसी कि हम वैदिक साहित्य में पाते हैं।

तैत्तिरीय संहिता और तैत्तिरीय ब्राह्मण में 27 एवं 28 नक्षत्रों का उल्लेख प्रमुखता के साथ हुआ है किंतु इन ग्रंथों के लिखे जाने से बहुत पहले, वैदिक ऋषियों ने नक्षत्रों की संख्या 27 या 28 निश्चित कर ली थी। वैदिक काल में ही नक्षत्रों, उनके नामों, उनके देवताओं आदि के क्रम यज्ञीय कृत्यों में समाहित हो चुके थे।

भारतीय ज्योतिष में समस्त नक्षत्रों के भारतीय नाम, किसी न किसी विशिष्ट अर्थ अथवा प्राकृतिक घटना के संदर्भ से संलग्न हैं और उनके साथ सार्थक अनुश्रुतियाँ भी बँधी हुई हैं। उदाहरणार्थ, आर्द्रा का अर्थ है- ‘भीगा हुआ।’ यह नक्षत्र आर्द्रा नाम से इसलिए जाना गया क्योंकि जब सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में स्थित होता है तो वर्षा आरम्भ हो जाती है। पुनर्वसु का यह नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि धान एवं जौ के बीज जो भूमि में पड़े थे, अब नये धान के रूप में अंकुरित हुए अर्थात् उनका ‘पुनर्वपन’ हुआ। ‘पुष्य’ नक्षत्र का नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि इस नक्षत्र के काल में नये अंकुर बढ़ते और पोषित होते हैं।

आश्रेषा या आश्लेषा नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि सूर्य के इस नक्षत्र में आने पर, धान या जौ के पौधे इतने बढ़ गये कि वे एक-दूसरे का आलिंगन करने लगे अर्थात् एक दूसरे का आश्रय लेने लगे।

मघा नक्षत्र का नाम इसलिए मघा पड़ा क्योंकि धान या अन्य पौधे खड़े अन्नों के रूप में हो गये, जो स्वयं धन है। कृत्तिका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि वे (6 या 7) चितकबरे मृगचर्मों के समान हैं, जिन पर वेद के छात्र वेदाध्ययन के लिए आसन जमाते थे।

ये समस्त तथ्य भारतीय ज्योतिष को भारतीय जन-जीवन की समझ से उत्पन्न ज्ञान सिद्ध करते हैं, न कि विदेशी नकल से ग्रहण किया हुआ। प्रो. जैकोबी ने स्पष्ट किया है कि कृत्तिका से आरम्भ नक्षत्र-श्रेणी, भारत की प्राचीनतम नक्षत्र-व्यवस्था नहीं थी, अपितु भारतीयों के पास इससे भी प्राचीन व्यवस्था थी, जिसमें महाविषुव के काल से आरम्भ करके गूगशीर्ष नक्षत्र से नक्षत्र श्रेणी की गणना की जाती थी।

ईसा के जन्म से कुछ हजार साल पहले लिखित ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है- ‘सूर्य एक है और वह कभी अस्त नहीं होता।’ अर्थात् सूर्य न तो अस्त होता है और न उदित। वह धरती के किसी न किसी भाग में चमकता रहता है। जबकि यूरोप के लोग इस बात को बहुत बाद में जान सके।

ईसा के जन्म से केवल 600 साल पहले यूनान (ग्रीस) में हिराक्लिटस नामक एक ज्योतिषी ने बड़ी ही भ्रामक उक्ति कही थी- ‘एक नया सूर्य प्रति दिन जन्म लेता है और मरता है।’

वैदिक ऋषियों की धारणा से विपरीत, जैनग्रंथ ‘सूर्यप्रज्ञप्ति’ में लिखा है- ‘दो सूर्य एवं दो चन्द्र हैं। जब एक अस्त होता है तो दूसरा उदित होता है।

बेबिलोनवासियों द्वारा ग्रह-निरीक्षण ई.पू. दूसरी सहस्राब्दी में आरम्भ किया गया था। अर्थात् ऋग्वेद की रचना के कम से कम दो हजार साल बाद। वहाँ सर्वप्रथम शुक्र ग्रह का अध्ययन हुआ। शुक्र-निरीक्षण से उत्पन्न तालिकाएँ लगभग ई.पू.1900 में बनीं। इसके बाद बृहस्पति एवं मंगल का निरीक्षण हुआ। बृहस्पति को स्वाभाविक रूप से अच्छा मान लिया गया, जबकि वह चमकदार हो या चन्द्र का अनुसरण करे।

उनके लिए मंगल दुर्भाग्य का ग्रह था किन्तु यदि वह दुर्बल हो या अस्त हो गया हो तो बुरे प्रभाव नष्ट हो जाते थे। शनि (अटल रूप से खड़ा रहने वाला) भाग्य का ग्रह कहा गया। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के फल कहे गये। बेबिलोनिया में ग्रहों को विभिन्न नाम भी मिले। विभिन्न कालों में ग्रहों के क्रम अलग-अलग थे जिनका भारतीय ग्रह-ज्ञान से कोई सम्बन्ध नहीं है।

यूनान का कोई भी साहित्य ई.पू. 800 से पुराना नहीं है। होमर की कविताएँ एवं हेसिओड के ग्रन्थ सबसे प्राचीन यूनानी साहित्य हैं। होमर में सूर्य, चन्द्र, प्रातः एवं सायं, तारा, प्लेइआडस (कृत्तिका), ह्याडेस, ओराइन, ग्रेट बियर, सिरियस (ओराइन का कुत्ता), बूटेस का उल्लेख है, जिन्हें हेसिओड ने भी उल्लिखित किया है। हेसिओड का कथन है कि जाड़े के 60 दिनों के उपरान्त वसन्त का आगमन हुआ, किन्तु उसमें विषुव दिनों का उल्लेख नहीं है। इस बात से स्पष्ट है कि वैदिक ज्योतिषशास्त्र, इन दो यूनानी लेखकों से कई शताब्दियों पूर्व अथवा कई हजार वर्ष पूर्व, कई गुना विकसित था।

यूनानी लोग क्षयोन्मुख चन्द्र को अशुभ एवं बढ़ते चन्द्र को शुभ मानते थे। हेसिओडी पद्धति (जो ऋग्वेद से कई सहस्र वर्ष पश्चात् की है) भी शुभाशुभ दिनों की चर्चा करती है। यद्यपि हेसिओड स्वीकार करता है कि इसमें मतैक्य नहीं है। हेसिओड ने मास की पाँचवीं तिथि को विशिष्ट रूप से वर्जित माना है; अपोलो के लिए यूनान में सातवीं तिथि पवित्र थी और बेबिलोन में भी सातवीं तिथि पवित्र थी।

भारत, चीन, मिस्र, बेबिलोन, हित्ती (हिट्टाइट) एवं चाल्डियन सभ्यताएं (नियो बैबीलोनियन एम्पायर) विश्व की प्राचीनतम सभ्यताएं मानी जाती हैं। कैम्ब्रिज एंशियेण्ट हिस्ट्री के अनुसार मिस्र के लोग गणित का उपयोग ज्योतिषशास्त्र में नहीं के बराबर करते थे।  हिट्टाइटों एवं चाल्डियनों में ज्योतिषी गणनाओं की कोई अवधारणा ही नहीं थी। ई.पू.800 के लगभग भी होमर एवं हेसिओड आदि यूनानी विद्वानों का ज्योतिष-ज्ञान बहुत अल्प था।

हिप्पार्कस, जो प्राचीन काल का सबसे बड़ा ज्योतिषशास्त्रज्ञ कहा गया है, उसने अपना कार्य लगभग ई.पू.130 में पूरा किया। वह मेसोपोटेमिया में किये गये ई.पू.747 के निरीक्षणों की जानकारी रखता था। टॉलेमी द्वारा ई.150 में लिखित ‘एल्मागेस्ट’ हिप्पार्कस द्वारा किये गये निरीक्षणों पर आधारित था और टॉलेमी के पूर्वजों के सारे कार्य भी हिप्पार्कस पर आधारित थे, जो टॉलेमी के स्पष्ट कार्यों के समक्ष नहीं ठहर सके। इस कारण उनका पठन-पाठन बन्द हो गया और वे नष्ट हो गये।

भारतीय ग्रन्थ यह स्वीकार नहीं करते कि भारतीय ज्योतिष शास्त्र का आधार यवन-ज्ञान था। ज्योतिषशास्त्र के ग्रन्थों में यूनानी मूल के शब्द प्राप्त नहीं होते। केवल वराहमिहिर ने अपने ग्रंथ फलित ज्योतिष में कुछ यूनानी शब्दों का प्रयोग किया है क्योंकि उन्होंने यूनान की यात्रा की थी। वराह मिहिर के ग्रंथ पंचसिद्धान्तिका में कहीं भी यूनानी शब्द का मूल प्रकट नहीं होता। इसका कारण संभवतः यह था कि इस पुस्तक के लिखने तक वराह मिहिर यूनान नहीं गए थे। वस्तुतः पंचसिद्धांतिका में भारत का सम्पूर्ण गणितीय-ज्योतिष समाया हुआ है। यह ज्ञान भारत से अन्य देशों को गया न कि वहाँ से भारत आया।

वेबर आदि ने वराहमिहिर द्वारा प्रयुक्त ‘रोमक’ एवं ‘पोलिश’ शब्दों को यूनानी बताया है। जबकि वास्तविकता यह है कि रोमक अथवा रोमश सिद्धांत वस्तुतः लोमश ऋषि का सिद्धांत है। भारत में आज भी ‘र’ को ‘ल’ और ‘ल’ को ‘र’ बोलते हैं। इसी प्रकार पोलिश सिद्धांत ‘पुलत्स्य’ अथवा उनके किसी वंशज ‘पौलत्स्य’ (विश्रवा आदि) के नाम पर है, न कि विदेश से आया हुआ कोई शब्द।

यदि यह मान भी लिया जाए कि ‘रोमक’ शब्द अलेक्जेंड्रिया का है तो इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वराहमिहिर के फलित ज्योतिष के सिद्धान्तों पर यूनानी प्रभाव है। ईसा बाद की शताब्दियों में रोमक सिद्धांत पर आधारित कोई भी ग्रन्थ या पंचांग भारत या किसी अन्य देश में प्राप्त नहीं हुआ है। न ही ऐसे किसी ग्रंथ का किसी अन्य ग्रंथ में उल्लेख ही हुआ है।

ईसा के जन्म से कई हजार साल पहले, भारत में ऐसे गणितज्ञ एवं ज्योतिषी हो चुके थे जिन्होंने गणित एवं ज्योतिष के ऐसे-ऐसे सिद्धान्त स्थापित किए जो आज भी विश्व भर में प्रचलित हैं किंतु उनका श्रेय भारत को नहीं मिल सका। भारत का गणित और ज्योतिष भारत से चलकर अरब और मिस्र होते हुए यूनान पहुंचा और वहीं के लोगों ने उस गणित और ज्योतिष का श्रेय ले लिया।

ईसा के जन्म से लगभग 500 साल पहले ग्रीस (यूनान) में उत्पन्न हुए गणितज्ञ-दार्शनिक पाइथोगोरस का उदाहरण हमारे सामने है। पाइथोगोरस ने मिस्र के ‘मेम्फिस’ नगर के पुजारियों से विद्याध्ययन किया था तथा उनसे ‘पाइथोगोरस प्रमेय’ के बारे में जानकारी प्राप्त की थी।

मेम्फिस के ये शाकाहारी पुजारी अपनी बुद्धि के लिए जाने जाते थे। यूनानी साहित्य में इस बात के उल्लेख हैं कि मिस्रवासियों ने इस प्रमेय का ज्ञान भारतवासियों से प्राप्त किया था। भारत के गणितज्ञ इस प्रमेय का प्रयोग पाइथोगोरस के जन्म के बहुत पहले से कर रहे थे। मिस्र के पुजारियों को शाकाहारी जीवनशैली भी भारत से ही प्राप्त हुई थी।

पाइथोगोरस मिस्र के गुरुकुल में सीखे गए गणित, ज्योतिष एवं शाकाहारी जीवनशैली से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने रोम जाकर वहाँ की जनता में गणित एवं ज्योतिष के साथ शाकाहारी जीवन शैली का प्रचार करने के लिए जनव्यापी आंदोलन चलाया।

केवल वही लोग पाइथोगोरस के विद्यार्थी बन सकते थे जो जीवन भर शाकाहारी बने रहने का संकल्प लेते थे। जो लोग पाइथोगोरस से गणित सीखना चाहते थे और मांसाहार नहीं छोड़ सकते थे, उन्हें एक पर्दे के पीछे बैठकर पाहथोगोरस के व्याख्यान सुनने होते थे। न तो वे पाइथोगोरस का मुंह देख सकते थे और न पाइथोगोरस उनका मुंह देखना चाहता था।

मिस्रवासियों को शाकाहार का ऐसा दृढ़ विचार भारतवासियों के अतिरिक्त और कहाँ से मिल सकता था! मिस्र तो वैसे भी अफ्रीकी देश है जहाँ की प्रजा मांसाहार पर अधिक निर्भर रहती आई है। अतः निश्चित रूप से मिस्र के पुजारियों को शाकाहार का विचार उन भारतीय गणितज्ञों एवं ज्योतिषियों से मिला जिन्होंने भारतीय ज्योतिष विद्या को मिस्र के पुजारियों तक पहुंचाया था। मिस्र के पुजारियों ने शाकाहारी जीवन शैली तथा भारतीय गणित एवं ज्योतिष का ज्ञान पाइथोगोरस को प्रदान किया। इस प्रकार यह ज्ञान यूरोप तक पहुंच गया।

गणितीय ज्योतिष की तरह फलित ज्योतिष भी भारत में पहले आया और विदेशों में बाद में। ऋग्वेद आदि ग्रंथों में ग्रहों के आधार पर वर्षा, आंधी, बादल आदि की जानकारी प्राप्त करने के उल्लेख हैं यहाँ तक कि राशियों के भी उल्लेख हैं जो आज फलित ज्योतिष की प्रमुख आधार बनी हुई हैं। जबकि बेबिलोन एवं असीरिया आदि सभ्यताओं में फलित ज्योतिष बहुत बाद में आया।

बेबीलोन आदि देशों में पंचांग सम्बन्धी फलित ज्योतिष बहुत बाद का विकास है। स्वप्नों, पक्षियों की उड़ानों एवं स्वरों, भेड़ों के कलेजे पर पड़े संकेतों (जो बेबीलोन या रोम में देव-यज्ञों के समय काटे जाते थे) से भी ओझा अथवा भोपे भविष्यवाणियाँ किया करते थे।

असीरिया में आकाशीय स्थितियों एवं ग्रहों की दशाओं के आधार पर अन्न-उत्पत्ति, बाढ़, अन्धड़, शत्रु-आक्रमण एवं अन्य उपद्रवों के विषय में फलित ज्योतिष द्वारा भविष्यवाणी की जाती थी। आकाश के नक्षत्रों एवं पृथ्वी की घटनाओं का सम्बन्ध देवों के विचारों से समझा जाता था और आसन्न घटनाएँ उनसे परिलक्षित की जाती थीं। हम इसे भौतिक फलित ज्योतिष कह सकते हैं।

चीन के ज्योतिष में बारह राशियाँ इस प्रकार हैं- चूहा, बैल, बाघ, खरगोश, ड्रैगन (अग्नि फेंकता साँप), सर्प, अश्व, भेड़, बन्दर, मुर्गी, कुत्ता एवं सूअर। एक ही प्रकार के नक्षत्रों को विभिन्न नाम दे दिये गये हैं। मिस्र के धार्मिक ज्योतिषशास्त्र में बारह राशियों का अभाव है। मिस्र वासियों को सिकन्दर के काल से पहले, राशि-ज्ञान प्राप्त नहीं था, बहुत थोड़ी सी राशियाँ रोम-काल से प्राचीन ठहरती हैं।

असीरिया के लोगों ने ज्योतिष ज्ञान यूफ्रोट (दजला-फरात) की घाटियों में विकसित किया था। इस कारण बहुत से विद्वान् राशि-ज्ञान का उद्गम बेबिलोन को मानते हैं। जबकि बहुत से विद्वान यूनान को ही सभी ज्ञानों का मूल मानते हैं। इन विद्वानों का मानना है कि यह ज्ञान क्लीयोस्ट्रेटस का दिया हुआ है, जो प्लिनी के अनुसार ई.पू.520 का है।

ई.1953 में लिखित ग्रंथ ‘हिस्ट्री ऑफ साइंस’ में सार्टन ने लिखा है कि बेबिलोन के लोगों ने क्लीयोस्ट्रेटस से एक हजार वर्ष पहले ही राशि-ज्ञान प्राप्त कर लिया था। यह बात सही नहीं है क्योंकि क्लीयोस्ट्रेटस ने छठी शताब्दी ईस्वी में राशियों को बराबर विस्तारों में बाँटा था और उसने यह विज्ञान भारतीय ज्योतिष से प्राप्त किया था।

बेबिलोन एवं ग्रीस (यूनान) में कर्मफल एवं पुनर्जन्म के सिद्धान्त नहीं पाये जाते थे। अतः वहाँ के ज्योतिषी अपने ज्योतिष के माध्यम से प्रजा को यह नहीं कह सकते थे कि वे अपने जीवन को चरित्रवान् बनाएं ताकि उन्हें वर्तमान तथा अगले जीवन में कठिनाइयाँ न भोगनी पड़ें।

छठी शताब्दी ईस्वी में भारतीय गणितज्ञ ज्योतिषी वराहमिहिर ने ईरान के शहंशाह नौशे खाँ के आमन्त्रण पर ‘जुन्दीशापुर’ नामक स्थान पर एक वेधशाला की स्थापना की जिससे वेधशालाओं के निर्माण, उनके वेध एवं वेध से प्राप्त गणनाओं के आधार पर सारणियों एवं पंचांगों के निर्माण की विद्या मध्य एशिया में पहुंची। वराहमिहिर ने यूनान की भी यात्रा की थी। वराहमिहिर के कुछ सिद्धांत यूनानी ज्योतिष एवं गणित में अपनाए गए।

ब्रह्मगुप्त ने अपने ग्रंथ ‘ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त’ में शून्य का अलग अंक के रूप में उल्लेख किया। इस अंक ने विश्व की समस्त गणित को बदल दिया। उन्होंने इस ग्रन्थ में ऋणात्मक अंकों और शून्य पर गणित करने के सभी नियमों का वर्णन किया। ये नियम वर्तमान समय में भी मानव जाति की गणित सम्बन्धी समझ के बहुत निकट हैं। तब से अब तक शून्य के सम्बन्ध में एक भी नया सिद्धान्त नहीं खोजा जा सका है।

भास्कर (प्रथम) ने सातवीं शताब्दी ईस्वी में संख्याओं को हिन्दू दाशमिक पद्धति में लिखना आरम्भ किया। इससे पहले विश्व के किसी भी हिस्से में दाशमिक प्रणाली का प्रचलन नहीं हुआ था। उन्होंने आर्यभट की कृतियों पर टीका लिखी और उसी सन्दर्भ में ज्या (Sin X) पद गद्ध का परिमेय मान बताया। ऐसा सबसे पहले भारत में हुआ। श्रीधराचार्य अथवा आचार्य श्रीधर आठवीं अथवा नौंवी शताब्दी इस्वी के महान गणितज्ञ थे। उन्होंने शून्य की व्याख्या की तथा द्विघात समीकरण को हल करने सम्बन्धी सूत्र का प्रतिपादन किया।

अतः यह किसी भी प्रकार से सिद्ध नहीं किया जा सकता कि भारतीय ज्योतिष विश्व के अन्य देशों के ज्योतिष का ऋणी है। वास्तविकता यह है कि विश्व-ज्योतिष ही भारतीय ज्योतिष का ऋणी है।

आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, श्रीधर, मुंजाल तथा भास्कर जैसे गणितज्ञ-ज्योतिषी तो धरती से चले गए किंतु उन्होंने संसार को ज्योतिष का जो ज्ञान दिया, उसकी चमक सदियां व्यतीत होते चले जाने पर भी बनी रही। इस ज्योतिष की गूंज पूरी दुनिया में हर कालखण्ड में सुनाई देती रही। अरबवासियों ने भारतीयों से ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त करके अपने यहाँ वेधशालाएं स्थापित कीं। अरब के रेगिस्तान की ये वेधशालाएं अरब आक्रांताओं के साथ विश्व के कई भागों में पहुंचीं। अरब की भूमि से भारतीय ज्योतिष का ज्ञान मिस्र तक पहुंच और वहाँ से यूनान तक पहुंचा।

ईसा की सातवीं शताब्दी ईस्वी में सम्पूर्ण विश्व में इस्लाम की आंधी जोरों से उठी। सम्पूर्ण अरब और मिस्र तथा एशिया एवं यूरोप के बहुत से देश इस्लाम की इस आंधी में तिनकों की तरह उड़ गए। रोम की प्राचीन सभ्यता भी अपना अस्तित्व खो बैठी। लगभग पांच सौ साल तक भारत के वीर राजा इस्लाम के आक्रांताओं से लड़ते रहे किंतु दुर्भाग्य से बारहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत पर तुर्कों का शासन हो गया।

सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में तुर्क शासक तो नष्ट हो गए किंतु उनके स्थान पर मंगोल शासक मुगलों के नाम से भारत पर शासन करने लगे। जब मुगलों का शासन क्षीण पड़ा तो अंग्रेज इस देश पर अधिकार जमाकर बैठ गए। लगभग साढ़े सात सौ साल की पराधीनता की अवधि में भारतवासियों ने अपने गणित एवं ज्योतिष सम्बन्धी ज्ञान को तो नहीं भुलाया किंतु इस ज्ञान पर गौरव का अनुभव करना भूल गए।

ईसा के जन्म से कई सौ वर्ष पहले उज्जैन में एक वेधशाला का निर्माण हुआ जिसे मुस्लिम आक्रांताओं ने तोड़ डाला। आज जिस स्तम्भ को दिल्ली की कुतुबमीनार कहा जाता है, वस्तुतः वह गुप्तकाल में निर्मित एक वेधशाला थी। इसे भी मुसलमानों ने तोड़कर कुव्वत उल इस्लाम नामक मस्जिद में बदल दिया। भारत के वेधशास्त्रियों ने वेधशाला बनाने का ज्ञान मध्य एशिया तक पहुंचाया। ये वेधशालाएं मध्य एशिया में तो टिकी रहीं किंतु भारत की धरती से वेधशालाओं को नष्ट कर दिए जाने से भारत के पण्डित इस ज्ञान को भुला बैठे।

पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में मध्य एशिया के उज्बेकिस्तान नामक देश की राजधानी समरकंद में एक वेधशाला बनवाई गई। यह वेधशाला उलूग बेग मिर्जा ने बनवाई थी। इस वेधशाला को ‘जीचशाही’ कहा जाता था। इस वेधशाला में तीन मंजिलें थीं। उलूग बेग मिर्जा ने इस वेधशाला में सूर्य, चन्द्र एवं अन्य नक्षत्रों की गति का अध्ययन करके कूरकानी जीच (पंचांग) तैयार किया था। यह पंचांग इतना प्रसिद्ध हुआ कि कई शताब्दियों तक विश्व के कई देशों में यही पंचांग प्रचलित रहा।

उस समय तक सम्पूर्ण विश्व में केवल 7-8 वेधशालाओं का निर्माण हुआ था जिनमें से सबसे पहली वेधशाला भारत के उज्जैन राज्य के राजा विक्रमादित्य के समय में बनी थी। जब सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में उलूग बेग मिर्जा का वंशज बाबर दिल्ली और आगरा का शासक हुआ तो उसने अपनी जीवनी बाबरनामा में दुनिया भर में स्थित वेधशालाओं का उल्लेख किया।

बाबर ने यह स्वीकार किया कि उज्जैन की वेधशाला संसार में सबसे पहले बनी थी और उसके निर्माण का समय ई.पू.57 था। बाबर ने इस वेधशाला में बने पंचांग में कुछ दोष भी बताए थे। वस्तुतः उज्जैन की इसी वेधशाला में वराहमिहिर तथा ब्रह्मगुप्त ने अपने अनुसंधान किए थे।

बाबर के समय मध्य एशिया में एक और पंचांग का उपयोग होता था जिसे ‘ईलखानी जीच’ कहते थे। इसे ख्वाजा नसीर तूसी ने हुलाकू खाँ के समय ‘मरागा’ में तैयार किया था। संभवतः इस पंचांग को अरब देशों में स्थापित वेधशालाओं द्वारा की गई गणनाओं के आधार पर तैयार किया गया था। बाबर ने ‘मामूनी जीच’ का भी उल्लेख किया है जिसे मामून खलीफा द्वारा निर्मित वेधशाला में तैयार किया गया था।

उसने ‘बतलीमूस’ नामक वेधशाला का भी उल्लेख किया है। इस प्रकार भारत का ज्योतिष ज्ञान अरब देशों में भी पर्याप्त विस्तार पा गया। बाद में जब अंग्रेजों का भारत पर शासन हुआ तो उन्होंने अरबवासियों को बड़े गणितज्ञ के रूप में प्रस्तुत किया ताकि भारतवासियों को अपने ज्ञान के गौरव का भान न रह सके। (मेरी पुस्तक भारतीय ज्योतिष एवं कालगणना का इतिहास से।)

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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