एक पुरानी रोमन कहावत है कि सीजर की पत्नी को संदेहों से परे होना चाहिए। (Caesar’s wife must be above suspicion) इस कहावत का भारतीय परम्परागत शब्दावली में अनुवाद इस प्रकार किया जाता है कि सीजर की पत्नी को पवित्र होना ही नहीं चाहिए, पवित्र दिखना भी चाहिए!
1 जुलाई 2022 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जज द्वारा जो अनावश्यक टिप्पणियां की गईं, उनसे सीजर की पत्नी अनावश्यक रूप से संदेह के घेरे में आ गई। यहाँ सीजर की पत्नी से आशय उन टिप्पणियों से है जो एक जज द्वारा अनावश्यक रूप से की गईं। उन टिप्पणियों का उद्देश्य भले ही पवित्र रहा होगा किंतु उनका स्वरूप टिप्पणियों के उद्देश्य की पवित्रता के अनुरूप नहीं था। यही कारण है कि पूरा देश इन अनावश्यक टिप्पणियों को सुनकर स्तब्ध रह गया!
भारत में न्यायालय की सर्वोच्चता एवं उसके सम्मान को सर्वोपरि माना गया है। यह सर्वोच्चता और सम्मान न केवल संविधान द्वारा स्थापित किया गया है अपितु भारत की जनता द्वारा भी सहज प्रसन्नता से स्वीकार किया गया है। जब मामला सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्चता और सम्मान का हो तो प्रत्येक नागरिक कुछ भी प्रतिक्रिया देने से पहले संभल जाता है। फिर भी सर्वोच्चता और सम्मान के नाम पर यह देश गूंगा-बहरा तो नहीं बन सकता!
मामला केवल इतना था कि एक प्रार्थी द्वारा यह याचिका प्रस्तुत की गई थी कि उसके विरुद्ध देश के विभिन्न भागों में जो पुलिस थानों में प्राथमिकियां लिखी गई हैं, उन सब मुकदमों को एक साथ जोड़कर दिल्ली स्थानांतरित कर दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट के जज को इस याचिका पर निर्णय देना था।
कानूनी धाराओं के आलोक में सुप्रीम कोर्ट के ऑनरेबल जज महोदय चाहे जो फैसला देते, उस पर किसी की प्रतिक्रिया नहीं आती क्योंकि वह कोर्ट का निर्णय होता। भारत में या तो कोर्ट के फैसले का स्वागत किया जाता है या फिर अगले प्लेटफॉर्म पर अपील की जाती है। अभी भी जज ने चार लाइनों का एक फैसला दिया ही है कि आप हाईकोर्ट जाइए! इतना पर्याप्त था। ऐसा पहले भी सैंकड़ों बार हुआ है कि लोग त्वरित न्याय की आशा में अपने केस लेकर सीधे ही सुप्रीम कोर्ट में आ जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट उनसे पूछ लेता है कि वे सीधे ही यहाँ क्यों आए हैं? प्रार्थी के जवाब से संतुष्ट होने पर सुप्रीम कोर्ट उन्हें सुन लेता है या संतुष्ट नहीं होने पर, उन्हें निचली अदालत में जाने का निर्देश देता है किंतु किसी जज द्वारा ऐसी टिप्पणी पहली बार की गई है कि आप घमण्डी हैं, इसलिए निचली अदालत में या हाईकोर्ट जाने की बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट में चले आए हैं। ऑनरेबल जज ने इस टिप्पणी के साथ और भी जो टिप्पणियाँ कीं उनसे तो ऐसा लगता है कि जज ने बिना केस की सुनवाई किए, यह निर्णय दे दिया कि वादी के कारण ही देश में आग लगी हुई है।
जज की इस टिप्पणी के बाद जनता द्वारा यह प्रतिक्रिया देना कि आग तो पूरी दुनिया में लगी हुई है और यह आग आज से थोड़े ही लगी हुई है, यह तो सैंकड़ों साल से लगी हुई है, स्वाभाविक है।
जज महोदय ने याचिका की सुनवाई के दौरान जो और भी जो अनावश्यक टिप्पणियां दीं, उनसे पूरे देश के जनमानस में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। 1 जुलाई 2022 को सोशियल मीडिया प्लेटफार्मों पर जनता द्वारा क्या कुछ नहीं कहा गया है! ये प्रतिक्रियाएं जनसाधारण की मानसिक व्यथा को प्रकट करती हैं। इन्हें पढ़कर ऐसा लगता है कि जनता का मानना है कि जज ने इन टिप्पणियों के माध्यम से जनता के सम्मान को ठेस पहुंचाई।
जिस प्रकार कोर्ट के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए, उसी प्रकार जनता के सम्मान को भी ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए।
सीजर को यह जानना चाहिए कि सीजर भले ही कितना ही ताकतवर क्यों न हो और सीजर की पत्नी भले ही कितनी ही पवित्र क्यों न हो, उन्हें संदेह से ऊपर बने रहना होगा क्योंकि सीजर को शासन तो जनता पर ही करना है! जनता की आंखों में सीजर का सम्मान बना रहे, इसके लिए सीजर तथा उसकी पत्नी को स्वयं ही सतर्क रहना चाहिए।
महाराष्ट्र की राजनीति कोई बड़ी करवट लेने वाली है। कोई ऐसे ही एकनाथ शिंदेकी सरकार नहीं बना देता!
भारतीय राजनीति में द्वापर के योगिराज कृष्ण और कलियुग के आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य के नाम आदर से लिए जाते हैं। इन दोनों के काल में हजारों साल का अंतर है, इसके उपरांत भी दोनों की राजनीति में कुछ समानताएं जबर्दस्त थीं। दोनों की राजनीतिक चालों को समय से पहले कोई कभी नहीं समझ पता था, न शत्रुपक्ष और न मित्रपक्ष।
दोनों के ही चिंतन के कैनवास अत्यंत विस्तृत थे एवं दृष्टिकोण बहुआयामी। जब कृष्ण और चाणक्य के शत्रु और मित्र तत्कालीन परिस्थितियों के समाधान के लिए व्याकुल रहते थे, तब कृष्ण और चाणक्य अपनी दृष्टि भविष्य में उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों पर केन्द्रित करते थे।
कृष्ण और चाणक्य दोनों ही इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि तात्कालिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की गई राजनीति के परिणाम भी तात्कालिक एवं अल्पजीवी होते हैं जबकि भविष्य के गर्भ में पल रही परिस्थितियों को समझकर बनाई गई योजनाओं के परिणाम भले ही कुछ विलम्ब से प्रकट हों किंतु उनकी आयु लम्बी होती है।
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की सरकार के गठन की घटना, कृष्ण और चाणक्य की गूढ़ राजनीति का स्मरण करवाती है। जिस समय देवेन्द्र फडणवीस मुम्बई में प्रेसवार्त्ता को सम्बोधित कर रहे थे, और इस प्रेसवार्त्ता का लगभग तीन चौथाई हिस्सा पूरा कर चुके थे, तब तक किसी को यह अनुमान नहीं था कि आज शाम को महाराष्ट्र में जो मुख्यमंत्री शपथ लेने वाला है, वह देवेन्द्र फडणवीस नहीं अपितु एकनाथ शिंदे है।
कोई सामान्य व्यक्ति भी आज यह अनुमान लगा सकता है कि भारत में मेंढकों की तरह पनप चुके जो राजनीतिक विश्लेषक, बुद्धिजीवी और पत्रकार टेलिविजन की बहसों में घण्टों तक गुर्राते और टर्राते हैं और स्वयं को राजनीति का पण्डित बताते हैं, उनकी बुद्धि कभी भी इस संभावना तक नहीं पहुंच सकी होगी कि भारतीय जनता पार्टी एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बना देगी!
एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने एक बाण से कई लक्ष्य साधे गए हैं। सबसे पहला लक्ष्य तो यह साधा गया है कि शिंदे गुट की बगावत को सफलता के सर्वोंच्च सोपान पर स्थापित करके, निकट भविष्य में शिंदे गुट में होने वाली किसी अप्रत्याशित फूट की संभावनाएं शून्यप्रायः कर दी गई हैं।
दूसरा लक्ष्य यह साधा गया है कि एकनाथ शिंदे और उनके साथी विधायक अब उद्धव ठाकरे और उनके साथी विधायकों से आंखों में आंखें डालकर बराबरी के स्तर पर निबट सकते हैं। संजय राउत और उनके जैसे विध्वंसक शिवसैनिक यदि हिंसा के बल पर शिंदे गुट को सबक सिखाने के मंसूबे पाले हुए बैठे थे, तो उन मंसूबों पर भी पानी फेर दिय गया है।
लोकतंत्र में किसी भी दल की चुनी हुई सरकार को अपनी नीतियों को बनाने, उन्हें चलाने तथा उनके परिणामों को जनता तक पहुंचाने के लिए पांच साल का समय भी कम पड़ता है। महाराष्ट्र के अगले चुनावों में तो अब लगभग दो-ढाई साल ही बचे हैं। ऐसी स्थिति में यदि भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनती तो दो-ढाई साल की अवधि में उसे अपनी योजनाएं बनाकर उनका लाभ जनता तक पहुंचाने में सफलता नहीं मिलती। इससे जनता में असंतोष उत्पन्न होता जिसका लाभ अगले चुनावों में विपक्षी दलों को मिलता।
शिंदे सरकार का गठन करवाकर भारतीय जनता पार्टी ने जनता में यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि भाजपा ने सत्ता के लालच में शिवसेना में फूट नहीं करवाई है। भाजपा तो महाराष्ट्र की जनता को शरद पंवार की एनसीपी तथा राहुल गांधी की कांग्रेस द्वारा शिवसेना के कंधों पर बैठकर किए जा रहे कुशासन से मुक्ति दिलवाने के लिए शिवसेना के ही उन विधायकों का साथ दे रही है, जिन्होंने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और जो हिन्दुत्व की राह पर चलना चाहते हैं।
इस सरकार के गठन के माध्यम से भाजपा का संदेश साफ है कि भाजपा सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं अपितु महाराष्ट्र की भ्रष्ट सरकार को उखाड़कर एक साफ-सुथरी और हिन्दुत्व की विचारधारा के लिए समर्पित सरकार देने के लिए शिंदे गुट का साथ दे रही है।
जिस प्रकार द्वापर के कृष्ण और कलियुग के चाणक्य की राजनीति निजी स्वार्थों से प्रेरित नहीं होती थी, उसी प्रकार नरेन्द्र मोदी और अमितशाह की नीतियों पर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी ने भी महाराष्ट्र में सत्ता के मोह से दूर रहकर बहुत ही चौंकाने वाली और साफ-सुथरी राजनीति की है। निश्चित ही भाजपा द्वारा खेले गए इस राजनीतिक दांव के परिणाम बहुत दूरगामी और राष्ट्र के लिए हितकारी होंगे।
हिन्दुत्व में शांतिपाठ का महत्व किसी से छिपा हुआ नहीं है। प्रत्येक हिन्दू दैनिक पूजा-पाठ के अंत में शांतिपाठ करता है। शांतिपाठ ही प्रत्येक यज्ञ अथवा पूजा की पूर्णाहुति है।
यह संसार हलचलों से भरा हुआ है। हर ओर संघर्ष है, भागमभाग है, शोर है और प्रतिस्पर्द्धा है। यह सारा संघर्ष, भागमभाग, शोर और प्रतिस्पर्द्धा इसलिए है, क्योंकि हर जीव प्रतिक्षण कुछ न कुछ प्राप्त करना चाहता है। प्रत्येक जीव किसी न किसी चीज केे लिए तरस रहा है।
जिस प्रकार मुनष्यों में संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा है, उसी प्रकार जीव-जंतुओं में भी संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा है। वनस्पतियों में भी संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा है। पंचमहाभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) में भी संघर्ष एवं प्रतिस्पर्द्धा है। वास्तविकता तो यह है कि समस्त निर्जीव समझी जाने वाली अर्थात् जड़ कही जाने वाली वस्तुओं में भी प्रतिस्पर्द्धा है। यह संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा ही सृष्टि को जीवन एवं गति देते हैं और यही संघर्ष एवं प्रतिस्पर्द्धा सृष्टि को विनाश की ओर ले जाते हैं।
इस बात को इस तरह समझा जा सकता है कि समस्त सजीव और निर्जीव वस्तुएं अणुओं से बनी हैं जिन्हें हम आंख से नहीं देख सकते। इन छोटे-छोटे अणुओं के भीतर अनवरत संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा चल रहे हैं। प्रत्येक अणु में एक या एक से अधिक परमाणु होते हैं। प्रत्येक परमाणु के केन्द्र में प्रोटोन और न्यूट्रॉन होते हैं और इनके चारों ओर इलेक्ट्रॉन चक्कर लगाते रहते हैं। इनमें से न्यूट्रॉन पर कोई आवेश नहीं होता, जबकि प्रोटोन पर धनात्मक एवं इलेक्ट्रॉन पर ऋणात्मक आवेश होता है। परमाणु के भीतर स्थित प्रोटोन, न्यूट्रॉन और इलैक्ट्रॉन के आवेशों का अंतर ही उनके परस्पर आकर्षण, विकर्षण, संघर्ष एवं प्रतिस्पर्द्धा का कारण है।
प्रत्येक परमाणु के भीतर बैठा प्रोटॉन, अपने चारों ओर घूम रहे इलैक्ट्रॉनों को आकर्षित करके उन्हें न्यूट्रॉन के साथ बांधे रखने का प्रयास करता है जबकि उसी अणु के दूसरे परमाणु में बैठे प्रोटॉन, या किसी अन्य अणु के परमाणु में बैठे प्रोटॉन, इन इलैक्ट्रॉनों को अपनी तरफ खींचने के लिए दबाव बनाते हैं। अर्थात् प्रत्येक परमाणु अपने इलैक्ट्रॉन को छोड़ना नहीं चाहता किंतु दूसरे परमाणु के इलैक्टॉन को प्राप्त करना चाहता है। इस संघर्ष के कारण कुछ इलैक्ट्रोनों को विवश होकर अपना परमाणु छोड़ना पड़ता है और दूसरे परमाणु में कूदना पड़ता है। यहीं से भौतिक जगत में संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा का क्रम आरम्भ होता है।
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जिस प्रकार इलैक्ट्रॉन एक दूसरे को धक्का देते हैं, उसी प्रकार एक परमाणु दूसरे परमाणु को धक्का देकर उसका स्थान प्राप्त करना चाहता है जबकि पहला परमाणु अपना स्थान नहीं छोड़ना चाहता है। यही स्थिति अणुओं की होती है। अणुओं एवं परमाणुओं के भीतर चलने वाले संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा से ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे जड़ अस्तित्वों की जड़ता टूटती है और वे कुछ नया रचने की स्थिति में आते हैं। सृजन की इस प्रक्रिया में पूरा संसार हलचल अर्थात् गति से भर जाता है। यह हलचल ही संसार की उन्नति का आधार है। इस उन्नति की चरम परिणति जड़ (निर्जीव) एवं चेतन (सजीव) समझे जाने वाले पदार्थों एवं अस्तित्वों के रूप में होती है। जब आंखों से दिखाई न देने वाले अणुओं और परमाणुओं के भीतर दिन-रात इतना भीषण संघर्ष चलता है और प्रतिस्पर्द्धा होती है, तब हम कल्पना कर सकते हैं कि सजीव अस्तित्वों में संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा कितने उच्च स्तर पर होते हैं! भोजन और आश्रय के लिए वनस्पतियों, कीट-पतंगों और पशु-पक्षियों में दिन-रात संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा चलते रहते हैं। मनुष्यों में परस्पर संघर्ष एवं प्रतिस्पर्द्धा रोटी, कपड़ा और मकान प्राप्त करने के लिए होते हैं। ये संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा मनुष्यों में लालच, क्रोध और अहंकार जैसी नकारात्मक स्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।
इस कारण पूरा संसार शोर तथा भागमभाग से भर जाता है जिसका अंतिम परिणाम सम्पूर्ण जगत् में अशांति के रूप में दिखाई देता है। इस कारण हिन्दुत्व में शांतिपाठ का महत्व है।
रोटी, कपड़ा और मकान प्राप्त करने के लिए होने वाला संघर्ष कोई पाप नहीं है, ये तो मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं हैं जिनके लिए मनुष्य को संघर्ष करना ही पड़ेगा किंतु जब संघर्ष रोटी, कपड़ा और मकान प्राप्त होने के बाद भी चलता रहता है और मनुष्य अपने लालच और अहंकार की पूर्ति के लिए संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा करने लगता है तो अशांति का स्तर कई गुना बढ़ जाता है।
सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त यह अशांति क्षण-प्रतिक्षण बढ़ती ही जाती है। संसार से प्रेम और श्रद्धा के भाव कम होने लगते हैं और युद्ध, घृणा एवं हिंसा का बोलबाला हो जाता है। ऐसी स्थिति में कोई भी निर्जीव या सजीव अस्तित्व संतुलित नहीं रह पाता। वह अपने स्थान से गिरने लगता है। ठीक वैसे ही जैसे भूकम्प आने पर धरती के ऊपर कोई भी वस्तु स्थिर नहीं रह पाती।
स्थिरता नष्ट होते ही प्रकृति के कण-कण से संतोष, आनंद और प्रेम के भाव समाप्त होने लगते हैं। जड़ एवं चेतन पदार्थ एक दूसरे को शत्रुभाव से देखने लगते हैं और वे एक-दूसरे को नष्ट करने पर तुल जाते हैं। प्रकृति के इसी असंतुलन को दूर करने के लिए वैदिक ऋषियों ने शांति की कामना की।
यद्यपि वेदों के प्रत्येक मंत्र में सर्वत्र सुख एवं शांति की ही कामना की गई है तथापि यजुर्वेद के शांतिमंत्र में शांति की कामना को अत्यंत प्रभावशाली एवं स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया गया है। इस मंत्र अथवा प्रार्थना का सार यह है कि सृष्टि का प्रत्येक कण शांत हो जाए। इसलिए वैदिक काल से ही हिंदुओं ने इस मंत्र को अपने दैनिक पूजापाठ में अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया। यह प्रार्थना इस प्रकार से है-
इस मंत्र का शाब्दिक अर्थ है- हे प्रभु सम्पूर्ण प्रकाशमान लोक (अर्थात् तीनों लोकों) में शान्ति हो। अंतरिक्ष शांत रहे, पृथ्वी शांत रहे, अग्नि और जल शांत रहें। औषधियाँ शांत रहें, वनस्पतियाँ शांत रहें, विश्व के समस्त देव शांत रहें, ब्रह्म शांत रहे, हर ओर शांति हो, हमारी वाणाी में शांति हो, कण-कण में शांति हो।
यदि हम प्रतिदिन शांति की कामना और प्रार्थना करेंगे तो हमारे चारों ओर सकरात्मक ऊर्जा का प्रवाह होगा तथा हमारे आसपास का सम्पूर्ण वातावरण हमारे अनुकूल बनेगा। हम व्यर्थ की बातों से उद्वेलित होकर दूसरे लोगों की गर्दन काटने के लिए नहीं दौड़ेंगे। हम बदला लेने की नहीं, क्षमा करने की संस्कृति की तरफ बढ़ेंगे। हम सड़कों पर उत्तेजना फैलाने वाले नारे नहीं लगाएंगे। हम दूसरों के घर, दुकानें, रेलें और बसें नहीं जलाएंगे। हम व्यर्थ के संघर्ष और प्रतिस्पर्द्धा को समाप्त करके अपने जीवन को सुंदर बनाने की ओर बढ़ेंगे।
जीवन सुख, शांति, प्रेम और श्रद्धा के साथ जीने के लिए है, न कि दूसरों की गर्दन काटने के लिए! क्षण भर के लिए शांत होकर सोचिए कि जब कोई मनुष्य किसी भी पशु, पक्षी या मनुष्य की गर्दन काटता है या उसके प्रति मनसा, वाचा अथवा कर्मणा हिंसा करता है, तो इस सृष्टि में कितना तनाव उत्पन्न होता होगा! यह तनाव नकारात्मक ऊर्जा के रूप में संसार के प्रत्येक प्राणी तक पहुंचता है। छोटे-छोटे बच्चों एवं गर्भस्थ शिशुओं तक भी पहुंचता है और वे माँ के पेट में ही विकलांग, विक्षिप्त अथवा मानसिक रोगी बन जाते हैं। संसार को इस तनाव से बचाने के लिए शांति का यह मंत्र एक अचूक औषधि है।
कितने खेद और दुःख की बात है कि कुछ लोग मजहबी संकीर्णताओं के चलते दूसरे प्राणियों की गर्दनें काटते हैं और इस सृष्टि में दिन-रात तनाव एवं नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। जब सृष्टि में शांतिपाठों की उपेक्षा होती है, तब प्रकृति कुपित होकर भूकम्प, ज्वालामुखी, महामारी, अकाल, भूख, बेरोजगारी, हिंसा, युद्ध आगजनी और अकाल मृत्यु जैसे घातक उपकरणों से मनुष्य जाति का उपचार करती है। इसलिए हमारा सर्वोच्च कर्त्तव्य हर समय शांति की कामना करना तथा शांति की स्थापना के लिए प्रयास करना ही है।
करोड़ों का रेडियो – एक बादशाह अपनी रियासत से रुखसत हो गया और किसी को कानोंकान खबर न हुई!
जब मैंने इस धरती पर आखें खोलीं और घर की चीजों को पहचानना आरम्भ किया तो मैंने पाया कि हमारे घर में कुछ वस्तुएं बहुत ही आकर्षक थीं और इतनी विशिष्ट थीं कि आसपास के घरों में दिखाई भी नहीं देती थीं। इन्हीं वस्तुओं में फिलिप्स का एक बड़ा सा रेडियो भी शामिल था। यह रेडियो मेरे पिताजी ने मेरे जन्म से दो साल पहले अर्थात् वर्ष 1960 में 550 रुपए में खरीदा था। उस समय पिताजी का वेतन लगभग 110 रुपए मासिक था और सोने का भाव लगभग 110 रुपए प्रति दस ग्राम था। उन दिनों घर में रेडियो सुनने के लिए भारत सरकार से लाइसेंस प्राप्त करना होता था जिसकी फीस हर साल चुकानी होती थी।
मेरा जन्म 1962 की गर्मियों में हुआ। उस समय भारत अपनी आजादी की पंद्रहवीं सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहा था। भारतीय जनता के लिए यह काल अपनी आजादी को उत्सुकता भरी दृष्टि से देखने का और राजनेताओं के लिए यह काल देश की जनता को समृद्धि भरे भविष्य के सपने दिखाने का था। प्रजा और शासकों के आशावाद से उलट, कड़वी सच्चाई यह थी कि उन दिनों भारत में बहुत से लोगों को दो जून की रोटी नहीं मिलती थी और लाखों लोग सड़कों पर भूखे सोते थे। भारत सरकार जनता का पेट भरने के लिए अमरीका से पीएल 480 समझौते के तहत सस्ता गेहूं खरीदती थी।
भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीनी नेता चाऊ एन लाई के साथ मिलकर पंचशील का जो गुब्बारा फुलाया था, वह मेरे जन्म के समय, अर्थात् 1962 की गर्मियों में तेजी से पिचक रहा था और भारत के लोग जवाहरलाल नेहरू की वैदेशिक नीतियों की जमकर आलोचना करते थे। हालांकि हमारा रेडियो उन दिनों भी जवाहरलाल नेहरू के करिश्माई व्यक्तित्व के समाचार सुनाया करता था।
1962 की सर्दियों में भारत पर अचानक हुए चीनी आक्रमण ने नेहरूजी के आभामण्डल को पूरी तरह फीका कर दिया। नेहरूजी ने जिस खराब तरीके से उस युद्ध को लड़ा, उससे हर देशवासी स्तब्ध रह गया। भारतीय सेना द्वारा नेहरूजी से अनुरोध किया गया कि वे हवाई मोर्चा खोलें किंतु नेहरूजी ने हवाई मोर्चा नहीं खोला। बाद में नेहरूजी ने कहा भी- ‘इन अफीमचियों को उठाकर बाहर फैंक दो!’ किंतु तब तक बहुत विलम्ब हो चुका था।
यद्यपि भारतीय सेना के अतुल शौर्य के कारण उस युद्ध में चीन को काफी नुक्सान उठाना पड़ा किंतु भारत की सेनाओं को भी भारी क्षति पहुंची और अक्साईचिन का महत्वपूर्ण क्षेत्र चीन ने दबा लिया। देश का माथा शर्म से झुक गया। इस दौर में भारत के अधिकांश व्यक्ति जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के सम्बन्ध में अपने विचारों को एक-दूसरे तक पहुंचाना चाहते थे और अपने विचारों पर एक-दूसरे की राय चाहते थे। इस कारण देश में वैचारिक मंथन की बाढ़ सी आई हुई थी। देश का लगभग हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति इस वैचारिक मंथन में खुलकर भाग लेता था।
इस वैचारिक द्वंद्व को खाद-पानी उन थोड़ी-बहुत सूचनाओं एवं समाचारों से मिलता था जो अखबार, रेडियो और पुस्तकों के माध्यम से जनता तक पहुंचते थे। यह अलग बात थी कि उन दिनों अखबार बहुत कम छपते थे, रेडियो बहुत कम घरों में थे और टेलिविजन की तो कल्पना भी नहीं थी। लोगों की आमदनी कम थी और देश की जनता दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रही थी। फिर भी रेडियो द्वारा किए जा रहे जवाहरलाल नेहरू के गुणगान बिना किसी हिचक के जारी थे।
रेडियो सरकारी नियंत्रण में था इसलिए प्रबुद्ध लोगों को सरकारी सूचनाएं देता था किंतु लोग सरकारी सूचनाओं के साथ-साथ वैचारिक-विश्लेषण एवं राजनीतिक टिप्पणियां भी चाहते थे। इसलिए कुछ लोग अखबार भी खरीदते थे। उस कठिन दौर में भी मेरे पिताजी अखबार खरीद कर पढ़ा करते थे। हमारे घर की अलमारियों में बहुत सी पुस्तकें रखी रहती थीं जिनमें आचार्य चतुरसेन और गुरुदत्त के विचारोत्तेजक उपन्यास प्रमुख थे।
भले ही रेडियो प्रबुद्ध वर्ग की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता था, फिर भी वह प्रबुद्ध वर्ग के लोगों की दिनचर्या का अनिवार्य अंग बना हुआ था। यही कारण था कि हमारे घर का रेडियो भी घर के सदस्यों के बीच अपनी प्रतिष्ठा बनाए हुए था। समाचारों के नियमित प्रसारण के समय उसकी आवाज सबसे ऊंची होती थी। समाचार प्रसारण के समय घर का कोई सदस्य कुछ भी बोलने का साहस करता था तो पिताजी की झिड़की खाकर तुरंत ही चुप हो जाता था।
1962 के चीनी आक्रमण के बाद डेढ़ साल से भी कम समय में अर्थात् 1964 की गर्मियों में नेहरूजी का निधन हो गया और लालबहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री हुए। 1965 की सर्दियों में अचानक ही पाकिस्तान ने भारत पर हमला बोल दिया। पिटे हुए को कौन नहीं पीटना चाहता, कुछ इसी अंदाज में पाकिस्तान भारत की ठुकाई करना चाहता था!
भारत अब भी पीएल 480 में खरीदा गया खराब गेहूँ खा रहा था और अब भी भारत के पास उस खराब एवं सस्ते गेहूं को खरीदने जितने पैसे नहीं थे। इसलिए शास्त्रीजी ने जनता से अपील की कि जो लोग अण्डे खा सकते हैं, अण्डे खाएं और जो लोग सप्ताह में एक दिन उपवास कर सकते हैं, उपवास करें। देश की हालत इतनी खराब होने पर भी शास्त्रीजी ने भारत की सेनाओं से गरजकर कहा- ‘जवानो! बढ़े चलो।’
शास्त्रीजी, 1965 में नेहरूजी द्वारा की गई गलती को नहीं दोहरना चाहते थे। उन्होंने तुरंत हवाई मोर्चा खोल दिया और पाकिस्तान को जमकर ठोक-पीट दिया।
जब हमारा रेडियो प्रातः, मध्याह्न और संध्याकाल में भारतीय सेनाओं की जीत के समाचार सुनाता तो घर का प्रत्येक सदस्य खुश होता। इन दिनों रेडियो की प्रतिष्ठा में और अधिक वृद्धि हो गई थी।
शास्त्रीजी नहीं जानते थे कि यह युद्ध कितना लम्बा चलेगा। उन्होंने नेशरल वार फण्ड की स्थापना की तथा भारत की जनता, पूर्व रियासतों के शासकों एवं बड़े सेठों से अपील की कि भारतीय सेना के लिए धन दें।
रेडियो समाचार सुनाने के साथ-साथ देशभक्ति के गीत बजाता था और जनता से अपील करता था कि भारतीय सेनाओं का हाथ मजबूत करें। शास्त्रीजी की अपील का परिणाम था कि सन् बांसठ में चीन के हाथों चोट खाया हुआ भारत सन् पैंसठ में अपने घावों पर मरहम लगाने के लिए एकजुट हो गया।
माँ बताती थीं कि लोगों ने भारतीय सेनाओं के लिए खुले हाथों से सोना, चांदी, रुपए, कपड़े और बर्तन एकत्रित किए थे। हजारों औरतें घरों में बिस्किट, मठरियां और मिठाइयां बनाकर सेना को भिजवाती थी। मेरी माँ ने भी सैनिकों के लिए स्वेटर और ऊनी मोजे बुनकर भिजवाए थे।
कुछ औरतों ने तो अपने शरीर के सारे गहने सरकारी कारिंदों को यह कहकर दे दिए थे कि शास्त्रीजी सेनाओं के लिए हथियार खरीदें, देश का सिर झुकने न पाए। पंजाब और उत्तर प्रदेश सहित कुछ प्रदेशों की औरतें इस काम में सबसे आगे थीं। जनता द्वारा दिया गया बहुत सा सामान उन लोगों के लिए भी था जिन्हें रातों-रात सीमावर्ती गांवों से हटाकर सुरक्षित शिविरों में स्थानांतरित किया गया था।
शास्त्रीजी ने पूर्व रियासतों के राजाओं से भी अपील की थी कि वे देश की सेनाओं का हाथ मजबूत करें किंतु पूर्व भारतीय रियासतों के राजाओं ने इस अपील के प्रति अधिक उत्साह नहीं दिखाया। कहा जाता है कि इस पर लाल बहादुर शास्त्री हैदराबाद गए तथा उन्होंने हैदराबाद के निजाम से भारतीय सेनाओं के लिए सहयोग मांगा।
यह वही निजाम था जो 1947 में किसी भी कीमत पर भारत में नहीं मिलना चाहता था और जिसे बाद में सरदार पटेल ने पुलिस कार्यवाही करके भारत में सम्मिलित किया था। जब शास्त्रीजी हैदराबाद पहुंचे तो निजाम ने इसे अपने लिए स्वर्णिम अवसर समझा और 1947 में की गई अपनी छवि को सुधारते हुए उसने नेशनल वार फण्ड में 5000 किलो सोना प्रदान किया।
पूरे युद्ध के दौरान शास्त्रीजी हर मोर्चे पर सक्रिय रहे। उन्हीं दिनों शास्त्रीजी द्वारा दिए गए नारे ‘जय जवान जय किसान’ ने देश के प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्पर्श किया था।
दुर्भाग्य से रूस के दबाव में इस युद्ध को बीच में ही रोक दिया गया और कुछ ही दिनों बाद ताशकंद में शास्त्रीजी का रहस्यमय परिस्थितियों में निधन हो गया। भारत अपनी विजय का उत्सव न मना सका। रेडियो ने ही शास्त्रीजी की मृत्यु का दुःखद इतिहास पूरी दुनिया को दिया था। इन्हीं परिस्थितियों में नेहरूजी की पुत्री इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं।
देश में एक बार फिर वैचारिक द्वंद्व उठ खड़ा हुआ। हर कोई यह जानना और बताना चाहता था कि इस संसार में कौन सा देश भारत का दोस्त है और कौन सा दुश्मन! शास्त्रीजी को किसने और क्यों मारा है तथा इंदिरा गांधी को किसने और क्यों प्रधानमंत्री बनवाया है! इस विचित्र से परिदृश्य में रेडियो सरकारी सूचनाएं परोसकर किसी तरह अपना दायित्व निभा रहा था।
ये सब बातें मैंने अपने माता-पिता के मुँह से सुनी थीं, इनमें से ऐसा कुछ नहीं है जो मेरी स्वयं की स्मृति का हिस्सा हो!
आठ-नौ साल की उम्र के आसपास अर्थात् जिस समय मैंने कुछ सोचना-समझना आरम्भ किया, या यूं कहें कि जीवन के जिस हिस्से के कुछ प्राचीनतम दृश्य मुझे आज भी याद हैं, उन दिनों लोग सरकारी राशन की दुकान से लाल गेहूं, सूती कपड़ा, मिट्टी का तेल और चीनी खरीदने के लिए सरकारी राशन की दुकानों पर लाइनें लगाकर खड़े रहते थे। उन दिनों बहुत समय तक मिट्टी का तेल केवल राशन की दुकान पर ही मिलता था। इसलिए देश के हर मध्यमवर्गीय व्यक्ति को इन लाइनों में खड़ा होना ही था। इनमें से कुछ लाइनों का हिस्सा मैं भी, अपने कॉलेज के दिनों में रहा था। इन दिनों में रेडियो समाचार सुनने के लिए कम, गीत सुनने के लिए अधिक प्रयुक्त होने लगा था।
ई.1971 की सर्दियों में पश्चिमी पाकिस्तान की सेनाओं ने पूर्वी पाकिस्तान की जनता को रौंदना आरम्भ किया। पूर्वी पाकिस्तान के लाखों लोग भाग-भाग कर भारत में घुसने लगे। इस खूनी-कलह का सार केवल इतना था कि बंगलाभाषी मुसलमानों पर पंजाबी बोलने वाले मुसलमानों ने अमानवीय जुल्म ढहाए थे।
अभी दुनिया ढाका से आने वाले इन समाचारों के निहित अर्थों को समझने का प्रयास कर ही रही थी कि इंदिरा गांधी ने बंगलादेश में मुक्तिवाहिनी उतारकर पूरी दुनिया को अचम्भित कर दिया। रेडियो इन समाचारों को विस्तार से सुनाता था और भारत की जनता हर समय रेडियो से कान लगाए रहती थी। जब तक अखबार छपकर आते थे, तब तक तो भारत की सेना और आगे बढ़ चुकी होती थी। इसलिए रेडियो अखबारों पर भारी पड़ रहा था और जनमानस पर हावी हो रहा था।
1971 की उन सर्दियों में भारत की सेनाओं ने पाकिस्तानी सेनाओं को जमकर ठोका-पीटा और नब्बे हजार पाकिस्तानी सैनिकों की कमर में रस्सियां बांधकर उन्हें घुटनों पर ला दिया। विश्व के मानचित्र पर बांगलादेश नामक नवीन देश का जन्म हुआ। मैं उस समय केवल साढ़े नौ साल का था, फिर भी मुझे धुंधला सा स्मरण है कि मैंने भारत की मुक्तिवाहिनी की विजय, पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण, शेख मुजीबुर्रहमान की सरकार का गठन आदि घटनाओं के समाचार बड़ी उत्सुकता से उसी रेडियो पर सुने थे जिसे मेरे पिता ने मेरे जन्म से भी दो साल पहले अपने साढ़े पांच माह के वेतन के बदले खरीदा था।
रेडियो पर आने वाले इन समाचारों का अर्थ मेरे लिए केवल इतना होता था कि भारत ने अपने दुश्मनों को हरा दिया है। वह दुश्मन कौन था और हमारे घर से कितनी दूर बैठा था, मैं नहीं जानता था! उस दौर में मेरी समझ का हाल यह था कि मेरा पूरा विश्वास था कि हमारे बड़े से रेडियो के भीतर छोटे-छोटे आदमी और औरत बैठे हैं जो सुबह, दोपहर और शाम को समाचार सुनाते हैं। रेडियो के भीतर बैठे वही लोग कभी-कभी गीत भी गाते हैं और ढोलक बजाते हैं। जब मैं, हमारे कस्बे तक चले आए बंगला शरणार्थियों को सिर पर पोटलियां धरकर चलते हुए देखता और हैण्डपम्पों पर भीड़ लगाए हुए देखता तो मुझे लगता था कि ये लोग हमारे रेडियो से ही निकलकर बाहर आए हैं।
1971 की गौरवशाली विजय के पश्चात् देश में एक बार फिर वैचारिक गदर मचा। यह वैचारिक गदर जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिखाई गई कायरता और उनकी बेटी इंदिरा गांधी द्वारा दिखाए गए साहस को लेकर मचा था। लोग कहना, सुनना और बताना चाहते थे कि पिता-पुत्री की नीतियों में इतना अंतर क्यों है!
भारत के इस अद्भुत पराक्रम के लिए कुछ लोगों ने इंदिरा गांधी को दुर्गा का अवतार तक कहा। निश्चित रूप से साहसपूर्ण राजनीतिक नेतृत्व एवं देश की सेनाओं द्वारा दिखाए गए इस पराक्रम से भारत की जनता का मनोबल ऊँचा हुआ था, जिसकी चर्चा हमारी कक्षाओं में पढ़ाने वाले शिक्षक, पड़ौस में रहने वाले बूढ़े-बुजुर्ग और घर के वरिष्ठ सदस्य किया करते थे।
इंदिरा गांधी द्वारा दिखाए गए इस पराक्रम के उपरांत भी, भारत के लोगों की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ था। ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी फिल्मों के गीत ‘बाकी जो बचा था महंगाई मार गई’ उन दिनों की वास्तविकता का वर्णन बहुत सटीक रूप से करते थे।
मुझे आज भी याद है, यह गीत हमारे उस रेडियो पर दिन में कई बार बजा करता था। महंगाई और बेरोजगारी को लेकर देशभर में हर कहीं बहस होती थी। रेल के डिब्बों, बसों, पान की दुकानों तथा चाय की थड़ियों पर होने वाली ये चर्चाएं इतनी गर्म और जोरदार होती थी कि वर्तमान समय में टेलिविजन के पर्दे पर होने वाली बहसें उनके सामने फूहड़ता से भरा शोर मात्र लगती हैं। आकाशवाणी के साथ-साथ बीबीसी और रेडियो सीलोन भी उस युग में काफी लोकप्रिय थे।
वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा हारने के बाद, देश में अचानक आपातकाल लगा दिया। जिस दिन देश में आपातकाल की घोषणा हुई, उस दिन के कुछ दृश्य मुझे आज भी स्मरण हैं। मैंने इस आपातकाल की घोषणा अपने पिताजी के कमरे में रखे उसी रेडियो पर सुनी थी।
इस समय तक मेरी समझ का दायरा कुछ बढ़ चुका था और मैं समझ पा रहा था कि इस बार देश में ऐसा वैचारिक तूफान उठा है कि पूरा देश ही दो वैचारिक खेमों में बंट गया है। कुछ लोग इंदिरा गांधी को अब भी दुर्गा मानने पर अड़े थे तो कुछ लोग इंदिरा गांधी को तानाशाह बताकर उनकी घनघोर आलोचना किया करते थे।
1977 में इमरजेंसी के दौरान ही लोकसभा चुनाव हुए। मुझे आज भी याद है कि जब माँ और पिताजी वोट डालकर आए मैंने अपनी माँ से पूछा था कि आप कहाँ गई थीं! इस प्रश्न का जवाब मेरे पिताजी ने दिया था। उस जवाब का छोटा सा हिस्सा मुझे आज भी याद है- ‘तेरी माँ जॉर्ज फर्नाण्डीस को जेल से बाहर निकालने गई थी।’
20 मार्च 1977 को मतगणना आरम्भ हुई तो पूरा देश रेडियो से चिपक कर बैठ गया। मेरे पिताजी भी पूरी रात जागकर चुनाव परिणाम सुनते रहे। मैं भी पिताजी के साथ जागता रहा। 21 मार्च की प्रातः तीन-चार बजे के बीच में आखिर वह परिणाम आया जिसकी प्रतीक्षा में पूरा देश पूरी रात जागता रहा था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चुनाव हार गई थीं।
मुझे ऐसा याद पड़ता है कि भारत भर के रेडियो स्टेशनों द्वारा यह समाचार आकाशवाणी इलाहाबाद से रिले किया गया था। इस समाचार प्रसारण के कुछ ही देर बाद देश से आपतकाल समाप्त होने की घोषणा की गई। आकाशवाणी इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की समाचार वाचिका ने इस समाचार को पढ़ने के बाद जो गीत प्रसारित किया था, उसने सबके रोंगटे खड़े कर दिए। वह गीत था- गंगा तेरा पानी अमृत, झर-झर बहता जाए। युग-युग से इस देश की माटी तुझसे जीवन पाए।
मेरे पिताजी का मानना था कि उद्घोषिका ने वह गीत अनायास ही नहीं प्रसारित किया था, अपितु तानाशाही पर लोकशाही की विजय के उपलक्ष्य में सोच-समझ कर प्रसारित किया था।
उस समय सुबह के चार बजे नहीं थे, पौ फटने में कुछ देर थी किंतु लगता था जैसे पूरे देश में उजाला हो गया था। लोग इस समाचार को सुनकर कितने प्रसन्न थे, इस बात का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उस दिन छोटे-छोटे गांवों, कस्बों एवं नगरों में इंदिरा गांधी की पराजय का उत्सव मनाया गया। उस दिन गली मुहल्लों में कोई भी चुपचाप नहीं चल रहा था। लोग जोर-जोर से बोल रहे थे और उनकी बातें खत्म होने को नहीं आती थीं।
अगले दिन जनता पार्टी के नेताओं ने दिल्ली के रामलीला मैदान में विजय उत्सव का आयोजन किया जिसमें मोरारजी भाई, जगजीवनराम, चौधरी चरणसिंह, अटलबिहारी वाजपेई तथा शाही इमाम आदि नेताओं ने लम्बे-लम्बे भाषण दिए थे। इन भाषणों का प्रसारण मैंने हमारे घर के रेडियो पर ही सुना था। जिस समय अटलजी का भाषण आरम्भ हुआ तो मैंने हैरत से देखा कि अटलजी द्वारा बोले जा रहे भाषण की बहुत सी पंक्तियाँ मेरे पिताजी पहले ही बोल देते थे, उन्हें पूरा अनुमान था कि अटलजी अगली पंक्ति में क्या बोलने वाले हैं!
मुझे आज भी याद है कि इसी कार्यक्रम में दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम ने देश के नए प्रधानमंत्री मोरारजी भाई को छड़ी दिखाते हुए कहा था कि यदि इस सरकार ने पुरानी सरकार वाली गलती दोहराई तो यह छड़ी उन्हें भी नहीं बक्शेगी। जब शाही इमाम द्वारा बोली गई यह पंक्ति रेडियो पर प्रसारित हुई तो बहुत से लोगों को शाही इमाम द्वारा छड़ी उठाकर प्रधानमंत्री की ओर संकेत करना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था। कुछ ऐसी ही राय मेरे पिताजी की भी थी।
बदले की आग में झुलसती, अपने-अपने अहंकारों के लिए लड़ती, भिन्न-भिन्न राजनीतिक विचारों वाले नेताओं द्वारा गठित मोरारजी भाई की यह सरकार बड़ी मुश्किल से ढाई साल चली और रेडियो पर नेताओं के बीच जूतियों में दाल बंटने के समाचार आने लगे। अंत में यह सरकार बिना किसी विशेष कारण के धड़ाम से गिर गई। इस बीच इंदिरा गांधी जेल गईं, बाहर आईं, चुनाव जीतीं और फिर से प्रधानमंत्री बन गईं। ये सारे समाचार मैंने अपने घर में रखे फिलिप्स के उसी रेडियो पर सुने थे।
मुझे याद है कि इस दौर में पूरे देश में रेडियो और अखबार पूरे जोश से सुने और पढ़े जा रहे थे। रेडियो पर समाचार सुनने वालों को, रेल्वे स्टेशन पर अखबार खरीदकर पढ़ने वालों को और बुकस्टाल पर खड़े होकर पुस्तकें टटोलने वालों को अत्यंत आदर की दृष्टि से देखा जाता था। बहुत से लोग घरों में सुविधा न होने के कारण निकट के वाचनालयों एवं पुस्तकालयों में जाकर अखबार एवं पुस्तकें पढ़ा करते थे और उनमें लिखी बातों पर अपने परिवार के सदस्यों एवं मित्रों से चर्चा किया करते थे।
रेडियो भी इन दिनों तेजी से फैल रहा था। पान की थड़ियों एवं बहुत से वाचनालयों में तो रेडियो बजता ही था, बहुत से नगरों में नगरपालिकाएं प्रमुख चौराहों पर भोंपू लगाकर आकाशवाणी के समाचार सुनवाया करती थीं जिन्हें सुनने के लिए सड़कों पर चलते हुए लोग, रुक जाया करते थे। बहुत से पनवाड़ियों की दुकानें तो इसलिए चल निकली थीं कि बहुत से बूढ़े-बुजुर्ग और नौजवान, नियमित रूप से पान खाने के बहाने उन दुकानों पर आते थे और देर तक खड़े रहकर रेडियो पर प्रसारित होने वाले समाचार सुनते थे।
पनवाड़ियों की देखादेखी बहुत से नाइयों ने भी अपनी दुकानों में रेडियो बजाने और अखबार मंगवाने का चलन आरम्भ कर दिया था ताकि रेडियो सुनने और अखबार पढ़ने के आकर्षण में आने वाले ग्राहकों से उनकी दुकानदारी चलती रहे। कुछ रेलवे स्टेशनों एवं बस-स्टैण्डों पर भी रेडिया के समाचार प्रसारित हुआ करते थे।
मुझे याद है कि मैंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बहुत से भाषण, वक्तव्य और साक्षात्कार सड़कों के किनारे, अपनी साइकिल रोककर सुने थे। कई बार सड़क के शोर के कारण कोई पंक्ति सुनाई नहीं देती थी, तब तेजी से साइकिल चलाकर घर पहुंचता था ताकि उस समाचार को अगले बुलेटिन में ढंग से सुना जा सके। जब रेडियो का समाचार वाचक अपनी सधी हुई आवाज में उद्घोषणा करता- ‘ये आकाशवाणी है, अब आप इंदुवाही (या देवकीनंदन पाण्डे) से समाचार सुनिए’ तो ऐसा लगता था मानो पूरे देश में कर्फ्यू लग गया है।
23 मई 1980 को इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी की वायुयान दुर्घटना में मृत्यु हुई। संजय गांधी स्वयं ही उस विमान को उड़ा रहे थे। मुझे याद है, उस दिन मैं अपने स्कूल में था। दोपहर का समय था, कक्षाएँ चल रही थीं, इस दौरान किसी ने किसी से शायद ही कोई बात की होगी। जैसे ही रेसिस हुआ और हम लोग क्लासेज से बाहर निकले, एक अजीब सी बेचैनी पूरे स्कूल में फैल गई।
सब लोग दौड़कर पास के बीएड कॉलेज में जाने लगे। पूछने पर ज्ञात हुआ कि बीएड कॉलेज में एक अखबार आया है जिसमें लिखा है कि संजय गांधी की मृत्यु हो गई। हमारी क्लास भी बीएड कॉलेज की तरफ भागी और तब तक वहाँ से नहीं हिली जब तक कि यह समाचार क्लास के लड़कों ने अपनी आंखों से पढ़ नहीं लिया। मैं तो वहीं से घर चला गया और रेडियो खोलकर बैठ गया। खबर सही थी और दिन भर रह-रह कर रेडियो से प्रसारित होती रही।
1984 की गर्मियों में मैंने ग्रेजुएशन कम्पलीट कर लिया और मैंने पोस्टग्रेजुएशन के लिए दाखिला ले लिया। इसके साथ ही मैं नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगा। सामान्यज्ञान के पेपर के लिए मैंने अपने घर में रखे रेडियो को अपना गुरु बनाया।
उस काल में कोचिंग सेंटर नहीं होते थे किंतु आकाशवाणी तथा बीबीसी से प्रसारित होने वाली बहुत सी रिपोर्टों में जो सूचनाएं, तार्किक विश्लेषण तथा सारगर्भित टिप्पणियां होती थीं, वैसी सामग्री तो आज कोचिंग सेंटरों में भी नहीं दी जाती। मैं मानता हूँ कि मेरी नौकरी लगने में फिलिप्स के उस रेडियो पर प्रसारित होने वाली रिपोर्टों का बहुत बड़ा हाथ था। इतना बड़ा कि मुझे एक भी दिन की बेरोजगारी नहीं झेलनी पड़ी।
3 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हुई, वह हृदयविदारक समाचार मैंने अपने घर के रेडियो पर ही सुना था। दुर्योगवश 4 अक्टूबर को मुझे बैंक अधिकारी की परीक्षा में बैठने के लिए गंगानगर जाना था। पूरे देश में सिक्खों के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा था, इसलिए बहुत सी जगह दंगे फूट पड़े थे और परीक्षा का स्थगित हो जाना अवश्यम्भावी था। मैं पूरे दिन इस आशा में रेडियो से चिपका रहा कि यदि परीक्षा स्थगित होगी तो उसकी सूचना रेडियो पर अवश्य आएगी।
पूरे दिन हमारा रेडियो राजीव गांधी के विदेश से भारत लौटने, प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने तथा बड़ा पेड़ गिरता है तो आसपास की धरती हिलने के बारे में बताता रहा। फिर भी मैंने धैर्य नहीं खोया। शाम सात बजे के प्रादेशिक समाचार बुलेटिन में अगले दिन की बैंक परीक्षा के स्थगित होने की सूचना था। परीक्षा आयोजन की अगली तिथि की सूचना भी कुछ दिनों बाद मुझे घर में रखे फिलिप्स के उसी पुराने रेडियो से मिली थी।
वर्ष 1984 की सर्दियां खत्म होते-होते मेरी नौकरी गंगानगर में बैंक अधिकारी के पद पर लगी। संयोगवश वहाँ मेरा परिचय भारत की आजादी के समय हुए विभाजन के कारण पाकिस्तान से आए श्री सुदेश वर्मा और उनके परिवार से हुआ। गंगानगर रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही गोल मार्केट में वर्मा परिवार की फिलिप्स रेडियो की एक बड़ी सी दुकान और वर्कशॉप हुआ करती थी। पूरा वर्मा परिवार अर्थात् स्वयं सुदेश वर्माजी, उनकी धर्मपत्नी कैलाशजी (अब दोनों ही स्वर्गस्थ) और उनके पुत्र नरेशजी उस दुकान और वर्कशॉप को चलाया करते थे। दुकान पर कई कर्मचारी थे जो फिलिप्स के रेडियो की मरम्मत करने में माहिर थे।
उन दिनों यह दुकान मेरे लिए आकर्षण का बहुत बड़ा केन्द्र बन गई थी। इसका कारण यह था कि वर्माजी की वर्कशॉप में रिपेयरिंग के लिए आने वाले रेडियो सैट में कभी-कभी मुझे अपने पैतृक घर में रखे फिलिप्स के बड़े से रेडियो वाला मॉडल भी दिखाई दे जाता था। उसे देखकर ऐसा लगता था मानो आजादी के बाद के भारत का इतिहास मेरी आंखों के सामने जीवंत हो गया है। रेडियो के उस मॉडल को देखने के लालच में, मैं सप्ताह में एक-दो चक्कर तो उस वर्कशॉप के लगा ही लेता था।
वर्ष 1986 में हमारे घर में टेलीविजन का पदार्पण हुआ। तब टेलीविजन के कार्यक्रम सुबह-शाम कुछ समय के लिए ही प्रसारित होते थे। इस कारण आगे के कुछ सालों बाद तक भी रेडियो अपनी जगह पर मोर्चा जमाए बैठा रहा किंतु जैसे-जैसे टेलीविजन कार्यक्रमों के प्रसारण के घण्टे बढ़ते गए, रेडियो का बोलना कम होता गया।
फिर भी रेडियो का आकर्षण मेरे मन से गया नहीं। यहाँ तक कि साढ़े चार साल तक बैंक अधिकारी की नौकरी करने के बाद ई.1989 में मैंने बैंक छोड़कर रेडियो में प्रसारण अधिकारी की नौकरी कर ली। अब रेडियो सुनना ही मेरी नौकरी हो गई। इसलिए फिलिप्स का वह रेडियो एक बार फिर पूरे जोश से बजने लगा।
वर्ष 1992 में रंगीन टेलीविजन ने घर में सेंध लगाई। मैंने भी उसी साल आकाशवाणी की नौकरी छोड़ दी। संभवतः उसी समय से हमारे घर में रखा वह रेडियो नेपथ्य में जाने लगा। अब वह बहुत कम खोला जाता था। जिन न्यूज बुलेटिनों के बल पर रेडियो, घर में कर्फ्यू जैसा वातावरण बना देता था, अब न्यूज बुलेटिनों के लिए रेडियो को याद तक नहीं किया जाता था।
लगता था जैसे रेडियो भी अब विश्राम लेना चाहता था। पता नहीं कब वह रेडियो पूरी तरह चुप हो गया और कहा नहीं जा सकता कि वह कौनसी तिथि थी जब रेडियो पिताजी के कमरे से निकल कर कबाड़घर में पहुंच गया! यह सब इस तरह से हुआ जैसे कुछ हुआ ही नहीं था! यह संसार की सबसे बड़ी मौन क्रांति थी। एक बादशाह अपनी रियासत से रुखसत हो गया और किसी को कानोंकान खबर तक न हुई!
वर्ष 2004 में मेरे माता-पिता ने अपना आलीशान बड़ा सा घर बेचकर हम तीनों भाइयों के लिए तीन सुवधिाजनक घर खरीदने का निर्णय लिया। माँ ने तय किया कि घर का बहुत सा पुराना सामान जो भविष्य में काम आने वाला नहीं है, कबाड़ी को बेच दिया जाए। माँ ने ऐसा बहुत सा सामान निकलवाकर घर के लॉन में जमा करवाया। संयोगवश मेरी दृष्टि फिलिप्स के उस रेडियो पर पड़ी जो दूसरे कबाड़ के बीच मुंह छिपाए बैठा था। मुझे लगा जैसे रेडियो हमसे आंखें चुराने के लिए ही कबाड़ के बीच छिप सा गया था।
कबाड़ी ने उस रेडियो की कीमत प्लास्टिक के कबाड़ की दर से, साढ़े पांच रुपए लगाई। सोलह वर्षीय विजय भी वहीं पर बैठा था। उस साल उसने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी।
मैंने विजय को बताया- ‘जिस रेडियो की कीमत यह कबाड़ी साढ़े पांच रुपए लगा रहा है, उसे तुम्हारे बाबा ने मेरे जन्म से भी पहले, अपने साढ़े पांच महीने के वेतन से खरीदा था। यदि उन्होंने उस समय यह रेडियो न लेकर चांदी खरीदी होती तो उसकी कीमत आज 30 हजार रुपए होती, यदि सोना लिया होता तो उसकी कीमत 28 हजार रुपए होती और यदि कोई भूखण्ड लिया होता तो आज उसकी कीमत कम से कम साढ़े पांच करोड़ रुपए होती।‘ करोड़ों का रेडियो सुनकर विजय की हैरानी का पार न था।
मुझे पूछना नहीं चाहिए था किंतु फिर भी जाने क्यों मैंने विजय से पूछ लिया- ‘तुम्हारे बाबा ने यह रेडियो खरीद कर सही किया या गलत?’ मेरे इस प्रश्न का विजय ने कोई जवाब तो नहीं दिया किंतु उसके चेहरे पर असमंजस भरी गहरी मुस्कुराहट उभरी जिसने मुझे थोड़ी देर के लिए असहज कर दिया।
अंत में मैंने ही कुछ सोचकर उसे अपने प्रश्न का जवाब दिया- ‘यदि तुम्हारे बाबा ने यह रेडियो नहीं खरीदा होता तो हो सकता है कि आज इस कबाड़ी की जगह मैं बैठा हुआ होता।’ विजय के चेहरे की मुस्कुराहट गायब हो गई थी किंतु अब मैं असहज बिल्कुल नहीं था। इस प्रश्न का सबसे सही उत्तर घर में मेरे अतिरिक्त और कौन दे सकता था!
जब कबाड़ी ने फिलिप्स का वह बड़ा सा रेडियो अपनी बोरी में डाला तो कलेजे में एक टीस सी उठी थी। समय कितना निर्मम है, चाहे कोई कितना ही बड़ा क्यों न हो, समय किसी को उसकी जगह पर नहीं बने रहने देता! कुछ साल हुए जब गंगानगर के सुदेश वर्माजी के परिवार ने फिलिप्स रेडियो की अपनी दुकान और वर्कशॉप भी कई साल पहले ही बंद कर दी थी। फिलिप्स कम्पनी ने भी कई साल पहले रेडियो बनाना बंद कर दिया था। अब तो फिलिप्स के वे बड़े से रेडियो बूढ़ी हो चुकी पीढ़ी की स्मृतियों में ही शेष बचे हैं।
कैम्पिस नामक एक चिंतक का कहना था कि अपना कोट बेच कर भी पुस्तकें खरीदिए ! कोट के अभाव में शरीर को ठण्ड के कारण कष्ट होगा किंतु पुस्तकों के अभाव में आत्मा भूखी मर जाएगी !
मैं बीसवीं सदी के उस दौर में पैदा हुआ जिसमें पुस्तक पढ़ने वाले व्यक्ति को अत्यंत आदर की दृष्टि से देखा जाता था। उस दौर में बहुत से लोग पुस्तकें पढ़ा करते थे और उनमें लिखी बातों पर अपने परिवार के सदस्यों एवं मित्रों से चर्चा किया करते थे। कुछ लोग नियमित रूप से पुस्तकालय जाया करते थे।
उस दौर में स्कूलों एवं कॉलेजों के अलावा भी बहुत से सरकारी कार्यालयों, धर्मशालाओं एवं क्लबों में छोटे-बड़े वाचनालय एवं पुस्तकालय हुआ करते थे। मौहल्लों में भी कुछ उत्साही समाजसेवी पुस्तकालय एवं वाचनालय चलाया करते थे। पुस्तकें कम थीं, साक्षरता की दर भी कम थी किंतु पुस्तकें पढ़ने वाले तथा पुस्तक पढ़ने की चाहत रखने वाले बहुत थे। अब रेडियो ने बड़ी तेजी से लोगों के घरों में घुसना आरम्भ कर दिया था।
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बहुत सी पढ़ी-लिखी गृहणियां भी दुपहरी के खाली समय में कोई पुस्तक पढ़ा करती थीं। मेरी माँ अपने गांव के स्कूल में केवल पांचवी कक्षा तक पढ़ी थीं किंतु वे अस्सी साल की आयु होने तक पुस्तकें पढ़ती रहीं। मेरी दादी, नानी और ताई तीनों ने स्कूल का मुंह नहीं देखा था किंतु तीनों प्रतिदिन स्नान करके रामायण पढ़ा करती थीं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि विगत साठ सालों में पुस्तक आम आदमी की जिंदगी से बाहर हो गई है! अब लोग टेलिविजन देखते हैं, सोशियल मीडिया पर समय व्यतीत करते हैं, क्रिकेट का मैच देखते हैं, गृहणियां खाली समय में सास-बहू के सीरियल देखती हैं। सार्वजनिक पुस्तकालय सूने पड़े हैं। क्लबों, धर्मशालाओं और मोहल्लों में अब पुस्तकालय नहीं होते। सारी जिंदगी जैसे सैलफोन और टेलिविजन में घुस गई है। मनुष्य के जीवन से पुस्तकों का दूर हो जाना किसी समाज के लिए घातक है। पुस्तकें मनुष्य के लिए कितनी आवश्यक हैं, इस बात का अनुमान स्वामी विवेकानंद के एक कथन से लगाया जा सकता है। वे कहा करते थे कि मैं नर्क में भी रहना पसंद करूंगा यदि वहाँ अच्छी पुस्तकें हों। एमर्सन नामक एक पाश्चात्य दार्शनिक कहा करते थे कि पुस्तकों का स्नेह ईश्वर के राज्य में पहुँचने का विमान है।
सुप्रसिद्ध दार्शनिक सिसरो ने कहा है कि अच्छी पुस्तकों को घर में इकट्ठा करना मानो घर को भगवान का मंदिर बना लेना है। कार्लाईल ने तो यहाँ तक लिखा है कि जिन घरों में अच्छी किताबें नहीं वे घर जीवित शवों के रहने के कब्रिस्तान हैं। कैम्पिस नामक एक चिंतक का कहना था कि अपना कोट बेच कर भी पुस्तकें खरीदिए ! कोट के अभाव में शरीर को ठण्ड के कारण कष्ट होगा किंतु पुस्तकों के अभाव में आत्मा भूखी मर जाएगी!
वस्तुतः अच्छी पुस्तक किसी भी मनुष्य की ऐसी मित्र है जो प्रत्येक कदम पर मनुष्य का भला करती है तथा उसका मार्गदर्शन करती है। मैं कहता हूँ कि आप किसी भी बुरे समाज को कुछ अच्छी पुस्तकें दीजिए और बहुत कम अवधि में एक अच्छा समाज प्राप्त कर लीजिए।
भले ही आज भारतीय समाज में पुस्तकों के लिए पहले जैसा आकर्षण नहीं रहा है, फिर भी बहुत से युवा हैं जो सोशियल मीडिया प्लेटफार्म का उपयोग अच्छी पुस्तकें पढ़ने के लिए करते हैं। यह अंधेरे में उजाले की किरण है जो पुस्तक प्रेम को कभी मरने नहीं देगी हालांकि इस दुनिया में किसी भी अपना कोट बेच कर पुस्तकें खरीदते हुए नहीं देखा गया किंतु फिर भी कहावत तो अपनी जगह बनी रहेगी- कोट बेच कर भी पुस्तकें खरीदिए !
प्रत्येक भाषा में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनके एक से अधिक अर्थ होते हैं। ऐसे शब्दों को अनेकार्थक शब्द कहा जाता है। यदि अनेकार्थक शब्दों को समुचित संदर्भ में ग्रहण नहीं किया जाए तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। तेतीस करोड़ देवता होने का मिथक भी ऐसा ही अनर्थ है।
यह श्लोक बृहदारण्यकोपनिषद के तृतीय अध्याय के नवम ब्राह्मण में आया है। इस श्लोक में शाकल्य नामक एक ब्राह्मण द्वारा ब्रह्म के विषय में महर्षि याज्ञवलक्य से पूछे गए कुछ प्रश्नों तथा महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा दिए गए उत्तरों का उल्लेख किया गया है।
शाकल्य पूछता है कि वेदों में देवताओं के अनेक दिव्य स्वरूपों एवं शक्तियों का वर्णन किया गया है। क्या वास्तव में इतने सारे देवता हैं?
इस पर याज्ञवलक्य ऋषि शाकल्य को 33 कोटि देवताओं के बारे में बताते हैं। पाठकों की सुविधा के लिए हमने बृहदारण्यकोपनिषद के इस वर्णन को संवाद के रूप में प्रस्तुत किया है।
याज्ञवल्क्य : ये तो इनकी महिमाएं ही हैं। देवगण तो तैंतीस ही हैं।
शाकल्य : वे तेतीस देव कौन-कौन से हैं?
याज्ञवल्क्य : आठ वसु, ग्यारह रूद्र, बारह आदित्य, ये इकत्तीस देवगण हैं। इंद्र और प्रजापति सहित कुल तेतीस देवता हैं।
शाकल्य : वसु कौन हैं?
याज्ञवल्क्य : इस सृष्टि में अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चंद्रमा और नक्षत्र नामक आठ वसु हैं।
टिप्पणी : ज्ञातव्य है कि इनमें से प्रथम चार (अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष) को पंचभूतों में भी सम्मिलित किया गया है, जल पांचवा पंचभूत है।
शाकल्य : रूद्र कौन हैं?
याज्ञवल्क्य : पुरुष में दस प्राण और ग्यारहवां मन रूद्र हैं। चूंकि मरणशील शरीर से उत्क्रमण करते समय ये मनुष्य तथा उसके सम्बन्धियों को रोदन करवाते (रुलाते) हैं, इसलिए इन्हें रूद्र कहते हैं।
टिप्पणी : ज्ञातव्य है कि उपनिषदों में मनुष्य शरीर में स्थित पांच ज्ञानेन्द्रियों (आंख, कान, नाक, त्वचा और जीभ) तथा पांच कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर, वाणी, मलद्वार तथा प्रजनन इन्द्रिय) को दस प्राण कहा जाता है। मन को ग्यारहवां प्राण माना जाता है।
शाकल्य : आदित्य कौन हैं?
याज्ञवल्क्य : संवत्सर के अवयवभूत ये बारह मास ही आदित्य हैं, क्योंकि ये सबका आदान करते हुए चलते हैं।
टिप्पणी : जहाँ उपनिषदों में बारह मास को बारह आदित्य कहा गया है, वहीं पुराणों में अदिति के पुत्रों को आदित्य कहा गया है। जिनके नाम मित्र, वरुण, धाता, अर्यमा, अंश, विवस्वान्, भग-आदित्य, इन्द्र, विष्णु, पर्जन्य, पूषा तथा त्वष्टा हैं। इस प्रकार स्वयं भगवान विष्णु भी अदिति के पुत्र हैं।
वामन बारहवें ‘आदित्य’ माने जाते हैं। अदितेः अपत्यं पुमान् आदित्यः। अदिति को देवमाता तथा आदित्यों को देवता कहा जाता है। संस्कृत भाषा में अदिति का अर्थ होता है ‘असीम’ अर्थात् जिसकी कोई सीमा न हो। पुराणों के अनुसार अन्तरिक्ष में द्वादश आदित्य भ्रमण करते हैं, वे अदिति के पुत्र हैं।
अदिति के पुण्यबल से ही उसके पुत्रों को देवत्व प्राप्त हुआ। यह आख्यान इस ओर संकेत करता है कि विश्व की समस्त नियामक एवं निर्माणकारी शक्तियाँ एक ही माता से उत्पन्न हुई हैं जिसे ‘अदिति’ कहा गया है।
निष्कर्ष
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उपनिषदों में जिन तेतीस कोटि देवताओं का उल्लेख हुआ है, उनका आशय 33 प्रकार अथवा 33 श्रेणी के देवताओं से है। कोटि का अर्थ ‘करोड़’ ही नहीं होता, ‘प्रकार’ अथवा ‘श्रेणी’ भी होता है। जैसे कि ‘उच्चकोटि’ का अर्थ है ‘उच्चश्रेणी’। कुछ लोग भ्रमवश तेतीस कोटि देवता को तेतीस करोड़ देवता मान लेते हैं।
उपनिषद में आए ये तेतीस कोटि देवता अंतरिक्ष से लेकर हमारे शरीर के भीतर व्याप्त हैं। अर्थात् आठ वसु सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं। ग्यारह रूद्र हमारे शरीर में स्थित हैं। बारह आदित्य सृष्टि को संचालित करने वाला समय है जो बारह महीनों के रूप में हमारे अनुभव में आता है। इंद्र और प्रजापति को मिलाकर कुल 33 कोटि देवता होते हैं। इस प्रकार तेतीस करोड़ देवता नहीं हैं, तेतीस कोटि देवता हैं।
मंत्र का गूढ़ार्थ
यदि इस मंत्र में छिपे गूढ़ आशय को और अधिक स्पष्ट करें तो हम पाते हैं कि महर्षि याज्ञवलक्य कहते हैं कि 8 वसुओं से सम्पन्न सृष्टि के भीतर रहने वाला 11 प्राणों (इंद्रियों) वाला शरीर 12 मास के समय चक्र से बंधा हुआ रहकर कर्म करता है और अपने कर्मों के अनुसार इंद्र एवं प्रजापति द्वारा प्रदत्त कर्मफल भोगता है।
अनारकली कौन थी, कहाँ से आई थी और किसकी पत्नी या प्रेमिका थी, मुगल लेखकों ने इस विषय को इतना उलझा दिया कि सच-झूठ का निर्णय करना कठिन हो जाता है। किंतु यह ऐतिहासिक तथ्य है कि अनारकली पर अधिकार को लेकर लड़े थे अकबर और सलीम!
राजा मानसिंह कच्छवाहा तथा खानेआजम अजीज कोका ने अकबर के आदेश पर सलीम के पुत्र खुसरो को अकबर का उत्तराधिकारी घोषित करने की तैयारी की किंतु रामसिंह कच्छवाहा की सहायता से सलीम अकबर तक पहुंचने में सफल हो गया। अकबर ने अपनी पगड़ी सलीम के सिर पर रख दी।
सलीम ने अपने पिता का सबसे बड़ा एवं एकमात्र जीवित पुत्र होते हुए भी और अपने पिता द्वारा साहिबे आलम अर्थात् अपना उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के उपरांत भी अपने पिता का राज्य छीनने के लिए अपने पिता से बगावत क्यों की तथा उसकी यह बगावत इतनी लम्बी क्यों चली, इस विषय पर किंचित् विचार किया जाना चाहिए।
मुगलों के इतिहास में अकबर के तीन पुत्रों का उल्लेख मिलता है जिन्होंने युवावस्था प्राप्त की थी। इनमें से पहले का नाम सलीम, दूसरे का मुराद एवं तीसरे का दानियाल था। इनमें से सलीम सबसे बड़ा था जिसका जन्म ई.1569 में हुआ था। अकबर के दूसरे पुत्र मुराद का जन्म ई.1570 में तथा तीसरे पुत्र दानियाल का जन्म ई.1572 में हुआ था। अपने पिता का सबसे बड़ा पुत्र होने के कारण अकबर के तख्त पर पहला अधिकार सलीम का ही था। इसलिए सलीम को अपने दोनों छोटे भाइयों से भय नहीं होना चाहिए था।
अकबर के तीन पुत्रों में से केवल सलीम की माता ही किसी राजा की पुत्री थी। सलीम का जन्म आम्बेर की राजकुमारी हीराकंवर के पेट से हुआ था जिसे अकबर ने मरियम उज्जमानी की उपाधि दी थी। मुराद और दानियाल की माताएं मुगलों के महल में काम करने वाली दासियां थीं। इस कारण सलीम को बादशाह बनाने के लिए सलीम का ननिहाल पक्ष पूरी तरह मजबूत था जबकि मुराद और दानियाल के ननिहाल में ऐसा कोई नहीं था जो उन्हें बादशाह बनाने के लिए अकबर को प्रभावित कर सके।
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अकबर के तीनों पुत्र सलीम, मुराद एवं दानियाल पक्के शराबी एवं नशेड़ी थे। उनमें से किसी ने भी कोई भी बड़ा युद्ध नहीं जीता था, उनमें से किसी में भी ऐसी कोई विशेषता नहीं थी जिसके कारण वह अपने शेष दोनों भाइयों की तुलना में, अपने पिता का अधिक स्नेह अर्जित कर सके। इस दृष्टि से भी सलीम को अपने दोनों छोटे भाइयों से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं थी।
सलीम और दानियाल दोनों का पालन पोषण सलीम की माता मरियम उज्जमानी अर्थात् आम्बेर की राजकुमारी हीराकंवर ने किया था। वह भी अपने औरस एवं बड़े पुत्र सलीम को छोड़कर सौतेले पुत्रों का पक्ष क्यों लेती! मुराद एवं दानियाल दोनों का निधन अकबर के जीवन काल में ही हो गया था, ऐसी स्थिति में भी सलीम को अपने पिता का राज्य प्राप्त करने के लिए बगावत करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इतना सब कुछ होने पर भी सलीम ने अपने पिता के विरुद्ध लगभग पांच साल तक विद्रोह का झण्डा उठाए रखा तथा तीस हजार सैनिक जमा करके अपने पिता के खजानों को लूटता फिरा तो उसका कोई विशेष कारण होना चाहिए।
क्या यह विशेष कारण अनारकली नामक एक दासी थी जिसके पेट से दानियाल का जन्म हुआ था?
मुगलों के इतिहास में मुराद और दानियाल की माताओं के नाम बड़ी ही चालाकी से छिपाए गए हैं। केवल एक अंग्रेज अधिकारी ने अपनी पुस्तक में अनारकली के पुत्र का नाम दानियाल लिखा है। कुछ लोगों का मानना है कि अकबर और सलीम के बीच अनारकली को लेकर तनाव उत्पन्न हुआ था जिसका परिणाम सलीम की बगावत के रूप में सामने आया। कहा जाता है कि अकबर की दासी अनारकली बड़ी ही खूबसूरत थी। उसका वास्तविक नाम नादिरा बेगम था। उसे शर्फुन्निसा भी कहा जाता था। वह अकबर के शासनकाल में व्यापारियों के एक काफिले के साथ ईरान से लाहौर आई थी।
ब्रिटिश पर्यटक विलियम फिंच ई.1608 से 1611 तक लाहौर में रहा था। उसने लिखा है कि अनारकली अकबर की कई पत्नियों में से एक थी। अनारकली से अकबर को एक पुत्र भी हुआ जिसे दानियाल कहा जाता था। अकबर के पुत्र सलीम से अनारकली के सम्बन्धों की अफवाह के कारण अकबर ने अनारकली को लाहौर के दुर्ग में चिनवा दिया। लाहौर में पंजाब सिविल सेक्रेटरिएट के पास सफेद रंग के पत्थरों से बना एक भवन है जिसे अनारकली का मकबरा कहा जाता है। जहाँगीर ने अनारकली की स्मृति में यह मकबरा बनवाया। यह आज भी बहुत अच्छी दशा में है। भवन के ऊपर एक खूबसूरत गुम्बद बना हुआ है तथा चारों कोनों पर गुम्बदाकार गुमटियां हैं। मकबरे के चारों ओर खूबसूरत बाग है।
सैयद अब्दुल लतीफ ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-लाहौर’ में लिखा है कि अनारकली अकबर की बेगम थी किंतु जहाँगीर से इश्क के चलते उसकी जान गई। मकबरे में स्थित कब्र पर ई.1599 और 1615 की तिथियां हैं जो अनारकली की मृत्यु एवं मकबरा पूर्ण होने की सूचना देती हैं। ई.1599 ही वह वर्ष है जब जहांगीर ने अकबर से पहली बार विद्रोह किया। अर्थात् अनारकली की मृत्यु और जहांगीर की बगावत का वर्ष एक ही है। इससे ब्रिटिश पर्यटक विलियम फिंच तथा सैयद अब्दुल लतीफ द्वारा लिखी गई इन बातों को बल मिलता है कि अनारकली अकबर की बेगम थी किंतु जहाँगीर से इश्क के चलते उसकी जान गई।
ई.1605 में सलीम जहाँगीर के नाम से बादशाह बना। ई.1615 में वह लाहौर आया। उसने लाहौर में अनारकली का मकबरा बनवाया तथा उसकी कब्र पर लिखवाया कि- ‘अगर मैं अपनी महबूबा को एक बार भी पकड़ सकता तो कयामत तक अल्लाह का शुक्रिया करता।’
कन्हैया लाल नामक लेखक ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-लाहौर’ में लिखा है कि अनारकली की मृत्यु बीमारी से हुई थी। बाद में अकबर ने उसका मकबरा बनवाया। सिख राजाओं ने उसे तुड़वा दिया और अंग्रेजों ने उस पर चर्च बनवा दिया। कन्हैयालाल का वर्णन सही प्रतीत नहीं होता जबकि सैयद अब्दुल लतीफ के विवरण अधिक सही जान पड़ते हैं क्योंकि मकबरे के शिलालेख, मकबरे के होने की सूचना देते हैं न कि चर्च की। आज भी वहाँ मेहराबों, गुम्बद एवं बुर्जों से युक्त एक आलीशान मकबरा बना हुआ है।
अकबर ई.1605 में मर गया था जबकि मकबरे पर शिलालेख की तिथि ई.1615 की है। अर्थात् यह मकबरा अकबर ने नहीं बनवाया था अपितु जहांगीर ने बनवाया था। विलियम फिंच तथा सैयद अब्दुल लतीफ द्वारा लिखे गए विवरणों और अनारकली के मकबरे पर लगे शिलालेख के भावुक शब्द यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त हैं कि अकबर की एक दासी जिसका नाम अनारकली था, वह अकबर के एक पुत्र की माता थी। जब सलीम जवान हुआ तो वह इसी दासी से प्रेम करने लगा जिसके कारण अकबर ने अनारकली की हत्या करवाई।
निश्चित रूप से अनारकली जहांगीर से उम्र में काफी बड़ी रही होगी! इस बात की काफी संभावना है कि अनारकली की हत्या से उन्मादी होकर ही जहांगीर ने अपने पिता अकबर को जहर देने एवं उसके विरुद्ध हथियार उठाने जैसे क्रूर निर्णय लिए होंगे न कि अकबर का राज्य पाने के लालच में।
अकबर की मृत्यु एक ऐसे मंगोल बादशाह की मृत्यु थी जिसने साढ़े तेरह साल की आयु में अपने बाप का तख्त संभाला तथा अपने बाप के छोटे से राज्य को पूरे भारत में फैला दिया। संसार भर के कवि और इतिहासकार जिसकी शान में कशीदे पढ़ा करते थे और उसे संसार का स्वामी बताते न थकते थे, वह महान् अकबर एक दुखी बाप के रूप में मरा। अकबर की मृत्यु से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा।महान् अकबर अपने शराबी बेटों के लिए रोते हुए मर गया।
अकबर ने सलीम की बगावत से नाराज होकर सलीम को राज्याधिकार से वंचित करने तथा सलीम के पुत्र खुसरो का अपना उत्तराधिकारी बनाने का निश्चय किया था किंतु जब सलीम ने अकबर के महल में घुसकर हुमायूँ की तलवार अपनी कमर में बांध ली तो अकबर समझ गया कि यदि उसने सलीम की जगह खुसरो को बादशाह बनाने का प्रयास किया तो मुगलिया खानदान में खून की नदियां बहेंगी। इसलिए अकबर ने अपनी पगड़ी सलीम के सिर पर रख दी।
इसी के साथ मुगलिया सल्तनत को उसका अगला बादशाह और चंगेजी खानदान को उसका अगला चिराग मिल गया। तैमूर लंग के वंश में उत्पन्न यह शराबी शहजादा ही अब सर्वसम्पन्न भारत के करोड़ों निर्धन भारतवासियों का भाग्य विधाता था। अपनी पगड़ी सलीम के सिर पर रखने के बाद अकबर ने मानसिंह से कहा कि वह शहजादे सलीम की रक्षा करे।
अकबर 22 सितम्बर 1605 को बीमार हुआ था। 8 दिन तक हकीम उसकी सघन चिकित्सा करते रहे किंतु अंतिम बीस दिनों में अकबर ने हकीमों से कोई चिकित्सा नहीं करवाई। 15 अक्टूबर 1605 को अकबर के प्राण पंखेरू पिंजरा खाली छोड़कर उड़ गए। जो दुनिया को जीतना चाहता था, वह अपनी शराबी बेटों के लिए रोता हुआ इस असार संसार से चला गया। अकबर का हरम पांच हजार औरतों की चीखों से भर गया।
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कहा नहीं जा सकता कि इन पांच हजार औरतों के अतिरिक्त अकबर महान् के लिए और कौन-कौन रोया! अकबर का पिता हुमायूँ, अकबर की माता मरियम मकानी अर्थात् हमीदा बानू बेगम, अकबर की सौतेली माता चूचक बेगम, अकबर की धाय माताएं माहम अनगा और जीजी अनगा, अकबर का छोटा सौतेला भाई हकीम खाँ तथा अकबर का संरक्षक बैराम खाँ भी मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। अकबर की प्यारी बुआ गुलबदन बेगम भी अकबर से दो साल पहले मौत के गाल में समा चुकी थी।
अकबर के नवरत्नों एवं मित्रों में से भी अधिकांश लोग धरती छोड़कर जा चुके थे। नवरत्न फकीर अजियोद्दीन ई.1572 में मर गया था। राजा बीरबल ई.1586 में और राजा टोडरमल ई.1589 में मर चुका था। संगीत सम्राट तानसेन भी ई.1889 में मृत्यु को प्राप्त हो चुका था। अकबर का नवरत्न फैजी ई.1595 में मृत्यु को प्राप्त हुआ। अबुल फजल ई.1602 में मारा गया।
अकबर की मृत्यु के समय उसके तीन रत्न ही जीवित बचे थे जिनमें मुल्ला दो प्याजा, खानखाना अब्दुर्रहीम तथा राजा मानसिंह के नाम आते हैं। अतः अकबर की मृत्यु पर रोने के लिए उसके मित्रों में से केवल तीन ही जीवित बचे थे।
कहा नहीं जा सकता कि अकबर के हरम में रहने वाली पांच हजार औरतों से अकबर के वास्तव में कितने पुत्र पैदा हुए थे किंतु इस्लामी विधान के अनुसार उसकी जो चार घोषित बीवियां थी, उनके पेट से उत्पन्न हुए तीन पुत्रों में से दानियाल एवं मुराद मर चुके थे और अब केवल एक पुत्र सलीम ही जीवित बचा था।
16 अक्टूबर 1605 को आगरा के दुर्ग से अकबर का जनाजा निकला और उसे बिहिश्ताबाद में दफना दिया गया। बाद में उसे सिकंदरा में बनाए गए एक मकबरे में ले जाकर दफनाया गया।
अकबर के मरते ही राजा मानसिंह ने अपने सैनिक अकबर के महल के पहरे से हटा लिए और रामसिंह कच्छवाहा के सैनिक अकबर के महल को घेर कर खड़े हो गए। जब शहजादे खुसरो ने सुना कि अकबर मर गया तो वह फतहपुर सीकरी छोड़कर भाग गया। कच्छवाहे रामसिंह ने आगरा का चप्पा-चप्पा खोज मारा किंतु खुसरो उसके हाथ नहीं लगा।
बादशाह के मरते ही सलीम ने सबसे पहले शाही कोष को अपने अधिकार में लेने का काम किया। अकबर आगरा के किले में तीस करोड़ रुपया छोड़ कर मरा था। राजा मानसिंह ने किले की किसी चीज को हाथ नहीं लगाया था, इस कारण वे रुपये बिना किसी बाधा के सलीम के हाथ लग गये।
बादशाह की मौत के ठीक आठवें दिन अकबर का एकमात्र जीवित पुत्र सलीम, नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से आगरा के तख्त पर बैठा। पहले ही दिन उसने कई राजाज्ञाएं प्रसारित कीं जिनमें से दो राजाज्ञाएं प्रमुख थीं। पहली ये कि राजा मानसिंह कच्छवाहा तत्काल बंगाल के लिये प्रस्थान कर जाये तथा दूसरी ये कि शहजादे खुसरो को कैद करके बादशाह के सम्मुख प्रस्तुत किया जाये।
आम्बेर नरेश राजा मानसिंह कच्छवाहा की तीन पीढ़ियों ने अकबर की तन-मन से सेवा की थी। राजा मानसिंह की बुआ अकबर से और बहिन सलीम से ब्याही गई थी। आगे चलकर राजा मानसिंह की पोती भी सलीम से ब्याही गई। मानसिंह के बाबा भारमल, मानसिंह के पिता भगवानदास, मानसिंह के भाई भुवनपति तथा मानसिंह के पुत्र जगतसिंह ने अपने जीवन अकबर एवं मुगलिया सल्तनत की श्रीवृद्धि के लिए खोए थे।
स्वयं राजा मानसिंह ने भी अकबर के लिये बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ जीती थीं और अपने पुराने स्वामी महाराणा प्रताप से युद्ध करने का कलंक अपने मुंह पर लगाया था। मानसिंह के दुर्भाग्य से आज मानसिंह का सबसे बड़ा विरोधी सलीम मुगलिया सल्तनत का स्वामी था। उसकी सल्तनत में मानसिंह के लिए कोई इज्जत, प्रेम और श्रद्धा नहीं थी। अकबर की मृत्यु से एक क्षण पहले तक मानसिंह मुगल सल्तनत का सबसे मजबूत मंत्री था किंतु नियति के चक्र ने सलीम को बादशाह बना दिया था जो मानसिंह से अपने पुराने हिसाब चुकता करना चाहता था। जहाँगीर के हाथों अपमानित होकर राजा मानसिंह वृद्धावस्था में अपना टूटा हुआ हृदय लेकर बंगाल के लिये प्रस्थान कर गया। पूरे तीन साल तक मानसिंह बंगाल में रहा। जब फरवरी 1608 में मानसिंह जहांगीर के दरबार में उपस्थित हुआ तो जहांगीर ने बूढ़ा भेड़िया कहकर मानसिंह को अपमानित किया। क्रुद्ध जहांगीर को प्रसन्न करने के लिए राजा मानसिंह को अपने स्वर्गीय पुत्र जगतसिंह की युवा पुत्री का विवाह बूढ़े जहांगीर के साथ करना पड़ा।
अकबर था तो अनपढ़ किंतु उसे शासन करना आता था। उसने न केवल मुगल शहजादों और तुर्क अमीरों पर अपितु प्रबल हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण स्थापित किया। यहाँ तक कि हिन्दू राजाओं को अपने राज्य में जाने के लिए अकबर से छुट्टी लेनी होती थी!
15 अक्टूबर 1605 को अकबर की मृत्यु हो गई। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारत में सोलहवीं सदी का उत्तरार्ध अकबर के व्यक्तित्व से प्रभावित था। इस कारण भारत के मध्यकालीन इतिहास में अकबर एक बड़े व्यक्तित्व के रूप में उभर कर सामने आता है। उसने अफगानिस्तान से लेकर बंगाल तक तथा कश्मीर से लेकर खानदेश, अहमदनगर एवं बरार तक एक विशाल सल्तनत का निर्माण किया। उसने अपनी सल्तनत में अनेक ऐसे नवाचार किए जिन्होंने करोड़ों भारतीयों को बड़े स्तर पर प्रभावित किया।
अकबर ई.1556 में बादशाह बना था, उस समय उसकी आयु केवल साढ़े तेरह वर्ष थी एवं उसके पास एक काल्पनिक राज्य ही बचा था जिस पर उसके बाबा बाबर एवं पिता हुमायूँ ने थोड़े-थोड़े समय के लिए शासन किया था। अपनी थोड़ी सी सेना के बल पर अकबर को वास्तविक राज्य प्राप्त करने एवं उसका विस्तार करने में कई दशक लग गए।
जैसे-जैसे अकबर का भारतीय क्षेत्रों पर अधिकार होता गया, वैसे-वैसे उसे पता लगता गया कि वह केवल अफगानिस्तान से आए हुए मुट्ठी भर मुगलों, उज्बेकों एवं तातारियों अथवा सुन्नियों एवं शियाओं का बादशाह नहीं है। उसकी सल्तनत में 99 प्रतिशत से अधिक हिन्दू रहते हैं, इसलिए हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण करके ही हिन्दुस्तान पर बेहतर तरीके से शासन किया जा सकता है।
अकबर ने यह भी अनुभव कर लिया था कि मध्यएशिया से आए हुए लड़ाके किसी भी स्तर पर न तो नैतिकता का पालन करते हैं और न बादशाह के प्रति स्वामिभक्त हैं। जबकि उनकी तुलना में भारतीय हिन्दू राजा एवं राजकुमार अधिक नैतिक एवं अधिक विश्वसनीय हैं।
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इसलिए अकबर ने अपनी सैनिक एवं राजनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण करना आरम्भ किया। बहुत से लोग इसमें अकबर की उदारता एवं धर्म-सहिष्णुता की नीति के दर्शन करते हैं जबकि बहुत से लोग इसे अकबर द्वारा हिन्दुस्तान को अपना गुलाम बनाने के लिए कसा गया शिकंजा समझते हैं। यह सही है कि अकबर ने हिन्दू नरेशों को अपने साथ लिया किंतु समझने वाली बात यह है कि अकबर ने हिन्दुओं को उनकी अस्मिता की रक्षा की शर्त पर अपने साथ नहीं लिया अपितु अपनी अस्मिता खो देने की शर्त पर उन्हें अपनी नौकरी में रखा। हिन्दू राजाओं को अपनी बेटियां मुगलों से ब्याहकर मुगलों के प्रति जीवन भर के लिए अपनी निष्ठा का अनुबंध करना होता था।
दूसरी ओर मुगल शहजादियों के विवाह हिन्दू नरेशों से नहीं किए जाते थे ताकि हिन्दू नरेश मुगलों से बराबरी का दावा न कर सकें। आरम्भ से लेकर अंत तक अकबर ने इस तरह के उपाय किए कि हिन्दू नरेश सत्ता में कनिष्ठ भागीदार बनकर रहें और वे किसी भी मुगल शहजादे से प्रतिस्पर्धा या बराबरी का दावा न कर सकें।
मुगल शहजादों एवं अमीरों की हिन्दू राजाओं पर श्रेष्ठता एवं वरीयता स्थापित करने एवं हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण को मजबूत करने के लिए अकबर ने मनसबदारी व्यवस्था आरम्भ की। अबुल फजल के अनुसार अकबर ने मनसबदारों को लिए दहववाशी अर्थात् 10 सैनिकों के नायक से लेकर दस हजारी अर्थात् 10,000 सैनिकों के नायक तक के मनसब बनाए। बाद में इसकी उच्च सीमा बारह हजारी कर दी गई।
अकबर ने 5,000 से ऊपर के मनसब अपने पुत्रों के लिये आरक्षित कर दिये। हिन्दुओं को 10 घोड़ों से लेकर 5000 घोड़ों तक का मनसब दिया जाता था। बड़े से बड़े राजा को अपनी नौकरी के आरम्भ में डेढ़-दो हजार के मनसब दिए जाते थे जिन्हें बाद में धीरे-धीरे बढ़ाया जाता था। राजा मानसिंह एकमात्र हिन्दू नरेश था जिसे 7,000 जात एवं 6,000 सवार का मनसब दिया गया।
अकबर की अधीनता स्वीकार करने के बाद हिन्दू नरेश एक भी दिन अपनी इच्छा से अपने राज्य में नहीं रह सकते थे। उन्हें अपने राज्य में जाने के लिए अकबर से न केवल अनुमति लेनी होती थी अपितु छुट्टी भी लेनी होती थी। छुट्टियां पूरी होने पर हिन्दू राजाओं को अपनी नौकरी पर लौटना होता था। अन्यथा उसके मनसब में कमी कर दी जाती थी, या उसकी कोई बड़ी जागीर जब्त कर ली जाती थी।
हिन्दू राजाओं को यह नौकरी उनके अपने राज्य से सैंकड़ों किलोमीटर दूर किसी युद्ध के मोर्चे पर रहकर करनी होती थी। इन मोर्चों पर युद्ध करते हुए न केवल हिन्दू राजाओं को अपने प्राण गंवाने पड़ते थे अपितु उनके कुल एवं वंश के राजकुमार एवं सामंत भी उन्हीं मोर्चों पर खड़े रहकर मौत को गले लगाते थे। राजा के न रहने पर उसके अवयस्क पुत्रों को भी इन मोर्चों पर जबर्दस्ती भेज दिया जाता था।
जब ये हिन्दू राजा एवं राजकुमार अधिकांश समय तक अपने राज्य से बाहर रहने लगे तो उनका अपनी प्रजा से सम्पर्क टूट गया। उनके कारिंदे उनकी प्रजा पर अत्याचार करने लगे और वे ही राज्य के वास्तविक स्वामी हो गए। इससे विगत हजारों वर्षों से राजा एवं प्रजा के बीच विश्वास एवं स्नेह का जो मधुर सामंजस्य स्थापित था, वह कमजोर हो गया।
जब राजाओं की लड़कियां मुगलों के महलों में जाने लगीं तो जनता में इन राजाओं के प्रति आदर का भाव समाप्त होने लगा जबकि दूसरी ओर जोधपुर के राव चंद्रसेन तथा मेवाड़ के महाराणा प्रताप जैसे राजा उच्च आदर्शों के रूप में समाज में स्थापित होने लगे।
अकबर की अधीनता स्वीकार करने से हिन्दू राजाओं को एक बड़ा नुक्सान यह हुआ कि अब हिन्दू राजाओं के लिए अपने कुल के असंतुष्ट राजकुमारों को नियंत्रित करना संभव नहीं रह गया। हिन्दू राजकुमार अपने भाई, पिता या चाचा के विरुद्ध शिकायतें लेकर अकबर की शरण में पहुंचने लगे।
जोधपुर के राजा चंद्रसेन को इस कारण इतनी क्षति हुई कि उसे अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा क्योंकि राव चंद्रसेन के भाई उदयसिंह ने अपनी पुत्री का विवाह अकबर के साथ करके उसका संरक्षण प्राप्त कर लिया तथा वह जोधपुर का राजा बन गया। जबकि राव चंद्रसेन को अपना जीवन जंगलों एवं पहाड़ों में बिताना पड़ा।
इसी प्रकार मेवाड़ का राजकुमार शक्तिसिंह अपने पिता महाराणा उदयसिंह के विरुद्ध सहायता पाने के लिए अकबर की शरण में पहुंच गया। शक्तिसिंह को अपने इस कार्य से इतनी ग्लानि हुई कि वह स्वयं ही अकबर को छोड़कर वापस अपने पिता उदयसिंह की सेवा में आ गया।
जब महाराणा उदयसिंह की मृत्यु हो गई तो उसका पुत्र जगमाल अकबर की शरण में जा पहुंचा। अकबर ने उसे चित्तौड़ का किला देकर महाराणा घोषित किया किंतु मेवाड़ के सामंतों ने जगमाल को महाराणा स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार मेवाड़ राजघराने में फूट का बीज पड़ गया। ऐसी घटनाएं और भी राजवंशों में हुईं।
अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले हिन्दू राजा अकबर के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हुए। उन्होंने न केवल अकबर की सल्तनत का विस्तार किया, न केवल अकबर की सल्तनत को मजबूत सुरक्षा चक्र प्रदान किया अपितु उन्होंने मध्यएशिया से आए ईरानी, तूरानी, अफगानी, उज्बेक, चगताई, कजलबाश, हब्शी एवं तातार योद्धाओं को भी नियंत्रित रखा।
जब भी कोई मध्यएशियाई अमीर अथवा शहजादा एवं भारतीय राजा अथवा राजकुमार अकबर के विरुद्ध विद्रोह करने का प्रयास करता था, अकबर इन निष्ठावान हिन्दू राजाओं को उनके विरुद्ध झौंक देता था। इस विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अकबर ने अपने व्यक्तित्व के प्रभाव से हिन्दू राजाओं को न केवल अपने अधीन किया अपितु उन्हें शासन में कनिष्ठ भागीदारी देकर निष्ठावान दोस्तों की एक रक्षापंक्ति तैयार कर ली।
भारतीय राजनीति में हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण स्थापित करने जैसे प्रयोग अकबर से पहले एवं उसके बाद के अन्य मुस्लिम शासक नहीं कर सके थे।
अकबर कालीन वेश्याएँ कैसी थीं, इनके बारे में अधिक विवरण नहीं मिलता किंतु वे बड़ी संख्या में थीं, इसका विवरण मिलता है। लोगों में वेश्याओं के यहाँ जाकर उनका नाच-गान देखने की प्रवृत्ति बड़े स्तर पर प्रचलित थी। जब मुगल सेनाएं एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाया करती थीं तब भी अकबर कालीन वेश्याएँ बड़ी संख्या में उनके साथ चला करती थीं।
अकबर ने हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण स्थापित करके उन्हें अपने अधीन कर लिया तथा उन्हीं से अपने राज्य-विस्तार का कार्य करवाया। अकबर ने उनका विश्वास जीतकर उन्हें अपने राज्य का मुख्य प्रहरी बना लिया। इस कारण अकबर को अपने प्रतिद्वंद्वी शहजादों एवं अमीरों पर भी नकेल कसने में सहायता मिल गई।
कुछ लोगों ने अकबर द्वारा हिन्दू राजाओं को शासन में कनिष्ठ भागीदारी दिए जाने को अकबर की धार्मिक उदारता का प्रमाण मानकर अकबर की भूरि-भूरि प्रशंसा की है जिनमें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू भी सम्मिलित हैं। जबकि कुछ इतिहासकारों ने इसे हिन्दू अस्मिता के लिए बहुत खतरनाक बताया है।
अकबर के कुछ कार्यों ने भारतीय समाज को गहराई तक प्रभावित किया। जब बड़ी संख्या में हिन्दू राज्य अकबर के अधीन हो गए तो उसने भारत की सामाजिक व्यवस्था में सुधार लाने के लिए कुछ नए कानूनों का निर्माण किया। ई.1582 में अकबर ने एक बहुत बड़े दरबार का आयोजन किया जिसमें उसने प्रजा के कल्याण के लिये कई घोषणाएं कीं।
अकबर ने आज्ञा दी कि राज्य में गुलामी की प्रथा बन्द कर दी जाये तथा युद्ध-बंदियों को भी गुलाम न बनाया जाये। उसने कोतवालों को आदेश दिये कि वे गुलामों का क्रय-विक्रय बंद कर दें। इस आज्ञा के बाद गुलामों को मुक्त कर दिया गया। राज्य से न केवल गुलामी की प्रथा को हटा दिया गया अपितु गुलाम शब्द का प्रयोग निषिद्ध कर दिया गया। इसके स्थान पर ‘चेला’ शब्द का प्रयोग होने लगा।
अकबर ने अपने राज्य में बारह वर्ष की आयु के पूर्व विवाह न करने की आज्ञा प्रसारित की। बादशाह ने आज्ञा दी कि बादशाह की स्वीकृति के बिना, प्रान्तीय गवर्नर किसी भी व्यक्ति को प्राणदण्ड न दें। मध्यकालीन मुस्लिम शासन पद्धति में इसे अकबर का एक क्रांतिकारी कदम समझा जाना चाहिए। क्योंकि उस काल में शासकों द्वारा किसी मनुष्य के प्राण ले-लेना बहुत ही साधारण बात थी। बात-बात पर लोगों के सिर काट लिए जाते थे। अकबर ने अपने मंत्रियों, अधिकारियों एवं प्रांतपतियों को आज्ञा दी कि जहाँ तक सम्भव हो, छोटे पक्षियों की रक्षा की जाये क्योंकि इनको मारने से किसी का पेट नहीं भरता तथा अकारण जीव हिंसा होती है।
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अकबर ने आज्ञा प्रसारित की कि उसके महल में प्रतिदिन दान-दक्षिणा दी जाये। उसने यह भी आदेश प्रसारित किया कि सल्तनत के समस्त मार्गों पर सरायें बनवाई जायें, दीन-दुखियों की देखभाल की जाए और अस्पतालों की स्थापना की जाए। जन-सामान्य की भलाई के साथ-साथ अकबर ने अपनी सल्तनत में महिलाओं की दशा सुधारने की ओर भी ध्यान दिया। इस तरह का प्रयत्न उससे पहले किसी भी मुस्लिम शासक ने नहीं किया था।
उस काल में विधवा स्त्रियां बड़ी संख्या में सती होती थीं। सती होने वाली स्त्रियों में वे छोटी-छोटी लड़कियां भी होती थीं जिनके बालविवाह किए जाते थे और जिनके पति किसी बीमारी एवं युद्ध आदि के कारण मर जाते थे। हजारों ऐसी स्त्रियां भी होती थीं जिन्होंने विवाह के बाद एक बार भी अपनी ससुराल का मुंह नहीं देखा था। ई.1591 में अकबर ने अपनी सल्तनत में ‘जबरन सती प्रथा’ का निषेध कर दिया। अकबर ने आज्ञा प्रसारित करवाई कि कोई भी विधवा स्त्री, उसकी इच्छा के विरुद्ध सती न कराई जाए और जो स्त्रियाँ गौने के पहले विधवा हो जायें उन्हें कदापि सती नहीं होने दिया जाए।
कहा जाता है कि जोधपुर के मोटाराजा उदयसिंह की पुत्री के पति जयमल की मृत्यु चौसा में हो गई। इस पर मोटाराजा उदयसिंह ने अपनी पुत्री को सती करने के आदेश दिए। जब अकबर को यह बात ज्ञात हुई तो वह एक तेज घोड़े पर सवार होकर घटना स्थल पर पहुंचा और उसने उस लड़की को सती किए जाने से पहले ही वहाँ पहुंचकर बचा लिया। जब लड़की के पीहर वालों ने हो-हल्ला किया तो अकबर ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
अकबर ने विधवा विवाह को राज्य की ओर से स्वीकार्य मान लिया तथा एक-पत्नी प्रथा को प्रोत्साहित किया। अकबर ने आदेश जारी किया कि एक पुरुष के एक समय में एक ही पत्नी होनी चाहिये। कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के जीवन काल में दूसरा विवाह तभी कर सकता था जब उसकी पहली पत्नी वन्ध्या हो। हालांकि अकबर के स्वयं के हरम में पांच हजार स्त्रियां रहती थीं। चूंकि इस्लाम में कानूनन चार विवाह करने की स्वीकृति है। इसलिए मुल्ला-मौलवियों ने एक विवाह के नियम को इस्लाम के विरुद्ध बताया और इस नियम का विरोध किया।
अकबर कालीन वेश्याएँ बहुत कम उम्र की हुआ करती थीं क्योंकि अरब के रेगिस्तान में बहुत कम आयु की लड़कियों से शारीरिक सम्बन्ध बनाना या विवाह करना स्वीकार्य था। यही परम्परा इस्लाम को मानने वालों में पूरी धरती पर प्रचलित हो गई थी।
ई.1592 में अकबर ने घोषणा की कि 16 वर्ष की आयु के पहले किसी बालक का और 18 वर्ष की आयु के पहले किसी बालिका का विवाह न किया जाये। बादशाह ने आज्ञा जारी की कि कोई व्यक्ति बलपूर्वक अथवा अनैतिक प्रलोभन देकर किसी लड़की से विवाह नहीं कर सकेगा। अकबर ने वेश्याओं तथा भ्रष्ट-स्त्रियों को नगर छोड़कर चले जाने की आज्ञा दी। दाखिली सेना (पुलिस) को आदेश दिया गया कि जो लोग वेश्याओं के यहाँ जायें अथवा उन्हें अपने यहाँ बुलायें उन पर कड़ी निगाह रखी जाये और उनका नाम रजिस्टर में लिखा जाये।
अकबर ने अपने राज्य में सब लोगों को अपनी इच्छानुसार धर्म अथवा मजहब का पालन करने एवं धर्म-परिवर्तन करने की स्वतन्त्रता दे दी। अकबर ने सल्तनत में शराब के विक्रय तथा उत्पादन का निषेध कर दिया परन्तु अनुज्ञा-धारकों की दुकानों पर औषधि के लिए शराब मिल सकती थी। अकबर ने अपनी राजधानी से भिखमंगों को भी दूर करने का प्रयत्न किया।
इतिहासकारों द्वारा वर्णित अकबर के सुधारों को पढ़कर बड़ा आश्चर्य होता है। विशेषकर तब, जबकि अकबर स्वयं जीवन भर उन सुधारों की भावनाओं के ठीक विपरीत काम करता रहा था। कहा जाता है कि अकबर ने अपने प्रांतपतियों को आज्ञा दी कि वे किसी को भी प्राणदण्ड न दें जबकि स्वयं अकबर अपने विरोधियों को हाथी के पैरों तले कुचलवाता रहा था और अपने शत्रुओं के सिर काटकर उनकी मीनारें चिनवाता रहा था!
कहा जाता है कि अकबर ने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि केवल एक ही पत्नी रखी जाए तथा वेश्याओं के यहाँ जाने वालों के नाम रजिस्टर में लिखे जाएं जबकि अकबर के हरम में पांच हजार स्त्रियां थीं। उसने तिब्बत से लेकर तूरान तक, पंजाब से लेकर पुर्तगाल तक और गुजरात से लेकर गोआ तक की औरतों से निकाह और मुताह किए थे। मुताह की जाने वाली औरतें भी अकबर कालीन वेश्याएँ ही थीं अथवा वेश्यावृत्ति का बदला हुआ रूप थीं।
अकबर के हरम में हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई आदि विभिन्न धर्मों एवं मजहबों की औरतें मुताह की हुई थीं।
अकबर ने अपनी प्रजा को भी न केवल इस्लामी परम्परा के अनुसार चार बीवियां रखने को स्वीकृति दे रखी थी अपितु मुताह के माध्यम से कितनी ही लौण्डियाओं (गुलाम स्त्रियों) को अपनी बीवी बनाने का आदेश जारी कर रखा था। ऐसी स्थिति में वह अपनी प्रजा को एक विवाह करने का आदेश कैसे दे सकता था! अकबर कालीन वेश्याएँ भी बहुत से पुरुषों के साथ उनकी औरतों की तरह रहा करती थीं।
कहा जाता है कि अकबर ने अपनी प्रजा के नाम आदेश जारी किया कि जहाँ तक संभव हो छोटे पक्षियों का शिकार नहीं किया जाए क्योंकि इनसे किसी का पेट नहीं भरता। जबकि अकबर जीवन भर जंगलों में जाकर शिकार खेलता रहा था जिनका उद्देश्य किसी का पेट भरना नहीं था, अपितु अपना मनोरंजन करना था।
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सीजर की पत्नी को संदेहों से परे होना चाहिए!
एक पुरानी रोमन कहावत है कि सीजर की पत्नी को संदेहों से परे होना चाहिए। (Caesar’s wife must be above suspicion) इस कहावत का भारतीय परम्परागत शब्दावली में अनुवाद इस प्रकार किया जाता है कि सीजर की पत्नी को पवित्र होना ही नहीं चाहिए, पवित्र दिखना भी चाहिए!
1 जुलाई 2022 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जज द्वारा जो अनावश्यक टिप्पणियां की गईं, उनसे सीजर की पत्नी अनावश्यक रूप से संदेह के घेरे में आ गई। यहाँ सीजर की पत्नी से आशय उन टिप्पणियों से है जो एक जज द्वारा अनावश्यक रूप से की गईं। उन टिप्पणियों का उद्देश्य भले ही पवित्र रहा होगा किंतु उनका स्वरूप टिप्पणियों के उद्देश्य की पवित्रता के अनुरूप नहीं था। यही कारण है कि पूरा देश इन अनावश्यक टिप्पणियों को सुनकर स्तब्ध रह गया!
भारत में न्यायालय की सर्वोच्चता एवं उसके सम्मान को सर्वोपरि माना गया है। यह सर्वोच्चता और सम्मान न केवल संविधान द्वारा स्थापित किया गया है अपितु भारत की जनता द्वारा भी सहज प्रसन्नता से स्वीकार किया गया है। जब मामला सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्चता और सम्मान का हो तो प्रत्येक नागरिक कुछ भी प्रतिक्रिया देने से पहले संभल जाता है। फिर भी सर्वोच्चता और सम्मान के नाम पर यह देश गूंगा-बहरा तो नहीं बन सकता!
मामला केवल इतना था कि एक प्रार्थी द्वारा यह याचिका प्रस्तुत की गई थी कि उसके विरुद्ध देश के विभिन्न भागों में जो पुलिस थानों में प्राथमिकियां लिखी गई हैं, उन सब मुकदमों को एक साथ जोड़कर दिल्ली स्थानांतरित कर दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट के जज को इस याचिका पर निर्णय देना था।
कानूनी धाराओं के आलोक में सुप्रीम कोर्ट के ऑनरेबल जज महोदय चाहे जो फैसला देते, उस पर किसी की प्रतिक्रिया नहीं आती क्योंकि वह कोर्ट का निर्णय होता। भारत में या तो कोर्ट के फैसले का स्वागत किया जाता है या फिर अगले प्लेटफॉर्म पर अपील की जाती है। अभी भी जज ने चार लाइनों का एक फैसला दिया ही है कि आप हाईकोर्ट जाइए! इतना पर्याप्त था। ऐसा पहले भी सैंकड़ों बार हुआ है कि लोग त्वरित न्याय की आशा में अपने केस लेकर सीधे ही सुप्रीम कोर्ट में आ जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट उनसे पूछ लेता है कि वे सीधे ही यहाँ क्यों आए हैं? प्रार्थी के जवाब से संतुष्ट होने पर सुप्रीम कोर्ट उन्हें सुन लेता है या संतुष्ट नहीं होने पर, उन्हें निचली अदालत में जाने का निर्देश देता है किंतु किसी जज द्वारा ऐसी टिप्पणी पहली बार की गई है कि आप घमण्डी हैं, इसलिए निचली अदालत में या हाईकोर्ट जाने की बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट में चले आए हैं। ऑनरेबल जज ने इस टिप्पणी के साथ और भी जो टिप्पणियाँ कीं उनसे तो ऐसा लगता है कि जज ने बिना केस की सुनवाई किए, यह निर्णय दे दिया कि वादी के कारण ही देश में आग लगी हुई है।
जज की इस टिप्पणी के बाद जनता द्वारा यह प्रतिक्रिया देना कि आग तो पूरी दुनिया में लगी हुई है और यह आग आज से थोड़े ही लगी हुई है, यह तो सैंकड़ों साल से लगी हुई है, स्वाभाविक है।
जज महोदय ने याचिका की सुनवाई के दौरान जो और भी जो अनावश्यक टिप्पणियां दीं, उनसे पूरे देश के जनमानस में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। 1 जुलाई 2022 को सोशियल मीडिया प्लेटफार्मों पर जनता द्वारा क्या कुछ नहीं कहा गया है! ये प्रतिक्रियाएं जनसाधारण की मानसिक व्यथा को प्रकट करती हैं। इन्हें पढ़कर ऐसा लगता है कि जनता का मानना है कि जज ने इन टिप्पणियों के माध्यम से जनता के सम्मान को ठेस पहुंचाई।
जिस प्रकार कोर्ट के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए, उसी प्रकार जनता के सम्मान को भी ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए।
सीजर को यह जानना चाहिए कि सीजर भले ही कितना ही ताकतवर क्यों न हो और सीजर की पत्नी भले ही कितनी ही पवित्र क्यों न हो, उन्हें संदेह से ऊपर बने रहना होगा क्योंकि सीजर को शासन तो जनता पर ही करना है! जनता की आंखों में सीजर का सम्मान बना रहे, इसके लिए सीजर तथा उसकी पत्नी को स्वयं ही सतर्क रहना चाहिए।
-डॉ. मोहन लाल गुप्ता