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अकबर की मृत्यु (182)

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अकबर की मृत्यु

अकबर की मृत्यु एक ऐसे मंगोल बादशाह की मृत्यु थी जिसने साढ़े तेरह साल की आयु में अपने बाप का तख्त संभाला तथा अपने बाप के छोटे से राज्य को पूरे भारत में फैला दिया। संसार भर के कवि और इतिहासकार जिसकी शान में कशीदे पढ़ा करते थे और उसे संसार का स्वामी बताते न थकते थे, वह महान् अकबर एक दुखी बाप के रूप में मरा। अकबर की मृत्यु से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा। महान् अकबर अपने शराबी बेटों के लिए रोते हुए मर गया।

अकबर ने सलीम की बगावत से नाराज होकर सलीम को राज्याधिकार से वंचित करने तथा सलीम के पुत्र खुसरो का अपना उत्तराधिकारी बनाने का निश्चय किया था किंतु जब सलीम ने अकबर के महल में घुसकर हुमायूँ की तलवार अपनी कमर में बांध ली तो अकबर समझ गया कि यदि उसने सलीम की जगह खुसरो को बादशाह बनाने का प्रयास किया तो मुगलिया खानदान में खून की नदियां बहेंगी। इसलिए अकबर ने अपनी पगड़ी सलीम के सिर पर रख दी।

इसी के साथ मुगलिया सल्तनत को उसका अगला बादशाह और चंगेजी खानदान को उसका अगला चिराग मिल गया। तैमूर लंग के वंश में उत्पन्न यह शराबी शहजादा ही अब सर्वसम्पन्न भारत के करोड़ों निर्धन भारतवासियों का भाग्य विधाता था। अपनी पगड़ी सलीम के सिर पर रखने के बाद अकबर ने मानसिंह से कहा कि वह शहजादे सलीम की रक्षा करे।

अकबर 22 सितम्बर 1605 को बीमार हुआ था। 8 दिन तक हकीम उसकी सघन चिकित्सा करते रहे किंतु अंतिम बीस दिनों में अकबर ने हकीमों से कोई चिकित्सा नहीं करवाई। 15 अक्टूबर 1605 को अकबर के प्राण पंखेरू पिंजरा खाली छोड़कर उड़ गए। जो दुनिया को जीतना चाहता था, वह अपनी शराबी बेटों के लिए रोता हुआ इस असार संसार से चला गया। अकबर का हरम पांच हजार औरतों की चीखों से भर गया।

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कहा नहीं जा सकता कि इन पांच हजार औरतों के अतिरिक्त अकबर महान् के लिए और कौन-कौन रोया! अकबर का पिता हुमायूँ, अकबर की माता मरियम मकानी अर्थात् हमीदा बानू बेगम, अकबर की सौतेली माता चूचक बेगम, अकबर की धाय माताएं माहम अनगा और जीजी अनगा, अकबर का छोटा सौतेला भाई हकीम खाँ तथा अकबर का संरक्षक बैराम खाँ भी मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। अकबर की प्यारी बुआ गुलबदन बेगम भी अकबर से दो साल पहले मौत के गाल में समा चुकी थी।

अकबर के नवरत्नों एवं मित्रों में से भी अधिकांश लोग धरती छोड़कर जा चुके थे। नवरत्न फकीर अजियोद्दीन ई.1572 में मर गया था। राजा बीरबल ई.1586 में और राजा टोडरमल ई.1589 में मर चुका था। संगीत सम्राट तानसेन भी ई.1889 में मृत्यु को प्राप्त हो चुका था। अकबर का नवरत्न फैजी ई.1595 में मृत्यु को प्राप्त हुआ। अबुल फजल ई.1602 में मारा गया।

अकबर की मृत्यु के समय उसके तीन रत्न ही जीवित बचे थे जिनमें मुल्ला दो प्याजा, खानखाना अब्दुर्रहीम तथा राजा मानसिंह के नाम आते हैं। अतः अकबर की मृत्यु पर रोने के लिए उसके मित्रों में से केवल तीन ही जीवित बचे थे।

कहा नहीं जा सकता कि अकबर के हरम में रहने वाली पांच हजार औरतों से अकबर के वास्तव में कितने पुत्र पैदा हुए थे किंतु इस्लामी विधान के अनुसार उसकी जो चार घोषित बीवियां थी, उनके पेट से उत्पन्न हुए तीन पुत्रों में से दानियाल एवं मुराद मर चुके थे और अब केवल एक पुत्र सलीम ही जीवित बचा था।

16 अक्टूबर 1605 को आगरा के दुर्ग से अकबर का जनाजा निकला और उसे बिहिश्ताबाद में दफना दिया गया। बाद में उसे सिकंदरा में बनाए गए एक मकबरे में ले जाकर दफनाया गया।

अकबर के मरते ही राजा मानसिंह ने अपने सैनिक अकबर के महल के पहरे से हटा लिए और रामसिंह कच्छवाहा के सैनिक अकबर के महल को घेर कर खड़े हो गए। जब शहजादे खुसरो ने सुना कि अकबर मर गया तो वह फतहपुर सीकरी छोड़कर भाग गया। कच्छवाहे रामसिंह ने आगरा का चप्पा-चप्पा खोज मारा किंतु खुसरो उसके हाथ नहीं लगा।

बादशाह के मरते ही सलीम ने सबसे पहले शाही कोष को अपने अधिकार में लेने का काम किया। अकबर आगरा के किले में तीस करोड़ रुपया छोड़ कर मरा था। राजा मानसिंह ने किले की किसी चीज को हाथ नहीं लगाया था, इस कारण वे रुपये बिना किसी बाधा के सलीम के हाथ लग गये।

बादशाह की मौत के ठीक आठवें दिन अकबर का एकमात्र जीवित पुत्र सलीम, नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से आगरा के तख्त पर बैठा। पहले ही दिन उसने कई राजाज्ञाएं प्रसारित कीं जिनमें से दो राजाज्ञाएं प्रमुख थीं। पहली ये कि राजा मानसिंह कच्छवाहा तत्काल बंगाल के लिये प्रस्थान कर जाये तथा दूसरी ये कि शहजादे खुसरो को कैद करके बादशाह के सम्मुख प्रस्तुत किया जाये।

आम्बेर नरेश राजा मानसिंह कच्छवाहा की तीन पीढ़ियों ने अकबर की तन-मन से सेवा की थी। राजा मानसिंह की बुआ अकबर से और बहिन सलीम से ब्याही गई थी। आगे चलकर राजा मानसिंह की पोती भी सलीम से ब्याही गई। मानसिंह के बाबा भारमल, मानसिंह के पिता भगवानदास, मानसिंह के भाई भुवनपति तथा मानसिंह के पुत्र जगतसिंह ने अपने जीवन अकबर एवं मुगलिया सल्तनत की श्रीवृद्धि के लिए खोए थे।

स्वयं राजा मानसिंह ने भी अकबर के लिये बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ जीती थीं और अपने पुराने स्वामी महाराणा प्रताप से युद्ध करने का कलंक अपने मुंह पर लगाया था। मानसिंह के दुर्भाग्य से आज मानसिंह का सबसे बड़ा विरोधी सलीम मुगलिया सल्तनत का स्वामी था। उसकी सल्तनत में मानसिंह के लिए कोई इज्जत, प्रेम और श्रद्धा नहीं थी। अकबर की मृत्यु से एक क्षण पहले तक मानसिंह मुगल सल्तनत का सबसे मजबूत मंत्री था किंतु नियति के चक्र ने सलीम को बादशाह बना दिया था जो मानसिंह से अपने पुराने हिसाब चुकता करना चाहता था। जहाँगीर के हाथों अपमानित होकर राजा मानसिंह वृद्धावस्था में अपना टूटा हुआ हृदय लेकर बंगाल के लिये प्रस्थान कर गया। पूरे तीन साल तक मानसिंह बंगाल में रहा। जब फरवरी 1608 में मानसिंह जहांगीर के दरबार में उपस्थित हुआ तो जहांगीर ने बूढ़ा भेड़िया कहकर मानसिंह को अपमानित किया। क्रुद्ध जहांगीर को प्रसन्न करने के लिए राजा मानसिंह को अपने स्वर्गीय पुत्र जगतसिंह की युवा पुत्री का विवाह बूढ़े जहांगीर के साथ करना पड़ा।

हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण (183)

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हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण

अकबर था तो अनपढ़ किंतु उसे शासन करना आता था। उसने न केवल मुगल शहजादों और तुर्क अमीरों पर अपितु प्रबल हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण स्थापित किया। यहाँ तक कि हिन्दू राजाओं को अपने राज्य में जाने के लिए अकबर से छुट्टी लेनी होती थी!

15 अक्टूबर 1605 को अकबर की मृत्यु हो गई। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारत में सोलहवीं सदी का उत्तरार्ध अकबर के व्यक्तित्व से प्रभावित था। इस कारण भारत के मध्यकालीन इतिहास में अकबर एक बड़े व्यक्तित्व के रूप में उभर कर सामने आता है। उसने अफगानिस्तान से लेकर बंगाल तक तथा कश्मीर से लेकर खानदेश, अहमदनगर एवं बरार तक एक विशाल सल्तनत का निर्माण किया। उसने अपनी सल्तनत में अनेक ऐसे नवाचार किए जिन्होंने करोड़ों भारतीयों को बड़े स्तर पर प्रभावित किया।

अकबर ई.1556 में बादशाह बना था, उस समय उसकी आयु केवल साढ़े तेरह वर्ष थी एवं उसके पास एक काल्पनिक राज्य ही बचा था जिस पर उसके बाबा बाबर एवं पिता हुमायूँ ने थोड़े-थोड़े समय के लिए शासन किया था। अपनी थोड़ी सी सेना के बल पर अकबर को वास्तविक राज्य प्राप्त करने एवं उसका विस्तार करने में कई दशक लग गए।

जैसे-जैसे अकबर का भारतीय क्षेत्रों पर अधिकार होता गया, वैसे-वैसे उसे पता लगता गया कि वह केवल अफगानिस्तान से आए हुए मुट्ठी भर मुगलों, उज्बेकों एवं तातारियों अथवा सुन्नियों एवं शियाओं का बादशाह नहीं है। उसकी सल्तनत में 99 प्रतिशत से अधिक हिन्दू रहते हैं, इसलिए हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण करके ही हिन्दुस्तान पर बेहतर तरीके से शासन किया जा सकता है।

अकबर ने यह भी अनुभव कर लिया था कि मध्यएशिया से आए हुए लड़ाके किसी भी स्तर पर न तो नैतिकता का पालन करते हैं और न बादशाह के प्रति स्वामिभक्त हैं। जबकि उनकी तुलना में भारतीय हिन्दू राजा एवं राजकुमार अधिक नैतिक एवं अधिक विश्वसनीय हैं।

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इसलिए अकबर ने अपनी सैनिक एवं राजनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण करना आरम्भ किया। बहुत से लोग इसमें अकबर की उदारता एवं धर्म-सहिष्णुता की नीति के दर्शन करते हैं जबकि बहुत से लोग इसे अकबर द्वारा हिन्दुस्तान को अपना गुलाम बनाने के लिए कसा गया शिकंजा समझते हैं। यह सही है कि अकबर ने हिन्दू नरेशों को अपने साथ लिया किंतु समझने वाली बात यह है कि अकबर ने हिन्दुओं को उनकी अस्मिता की रक्षा की शर्त पर अपने साथ नहीं लिया अपितु अपनी अस्मिता खो देने की शर्त पर उन्हें अपनी नौकरी में रखा। हिन्दू राजाओं को अपनी बेटियां मुगलों से ब्याहकर मुगलों के प्रति जीवन भर के लिए अपनी निष्ठा का अनुबंध करना होता था।

दूसरी ओर मुगल शहजादियों के विवाह हिन्दू नरेशों से नहीं किए जाते थे ताकि हिन्दू नरेश मुगलों से बराबरी का दावा न कर सकें। आरम्भ से लेकर अंत तक अकबर ने इस तरह के उपाय किए कि हिन्दू नरेश सत्ता में कनिष्ठ भागीदार बनकर रहें और वे किसी भी मुगल शहजादे से प्रतिस्पर्धा या बराबरी का दावा न कर सकें।

मुगल शहजादों एवं अमीरों की हिन्दू राजाओं पर श्रेष्ठता एवं वरीयता स्थापित करने एवं हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण को मजबूत करने के लिए अकबर ने मनसबदारी व्यवस्था आरम्भ की। अबुल फजल के अनुसार अकबर ने मनसबदारों को लिए दहववाशी अर्थात् 10 सैनिकों के नायक से लेकर दस हजारी अर्थात् 10,000 सैनिकों के नायक तक के मनसब बनाए। बाद में इसकी उच्च सीमा बारह हजारी कर दी गई।

अकबर ने 5,000 से ऊपर के मनसब अपने पुत्रों के लिये आरक्षित कर दिये। हिन्दुओं को 10 घोड़ों से लेकर 5000 घोड़ों तक का मनसब दिया जाता था। बड़े से बड़े राजा को अपनी नौकरी के आरम्भ में डेढ़-दो हजार के मनसब दिए जाते थे जिन्हें बाद में धीरे-धीरे बढ़ाया जाता था। राजा मानसिंह एकमात्र हिन्दू नरेश था जिसे 7,000 जात एवं 6,000 सवार का मनसब दिया गया।

अकबर की अधीनता स्वीकार करने के बाद हिन्दू नरेश एक भी दिन अपनी इच्छा से अपने राज्य में नहीं रह सकते थे। उन्हें अपने राज्य में जाने के लिए अकबर से न केवल अनुमति लेनी होती थी अपितु छुट्टी भी लेनी होती थी। छुट्टियां पूरी होने पर हिन्दू राजाओं को अपनी नौकरी पर लौटना होता था। अन्यथा उसके मनसब में कमी कर दी जाती थी, या उसकी कोई बड़ी जागीर जब्त कर ली जाती थी।

हिन्दू राजाओं को यह नौकरी उनके अपने राज्य से सैंकड़ों किलोमीटर दूर किसी युद्ध के मोर्चे पर रहकर करनी होती थी। इन मोर्चों पर युद्ध करते हुए न केवल हिन्दू राजाओं को अपने प्राण गंवाने पड़ते थे अपितु उनके कुल एवं वंश के राजकुमार एवं सामंत भी उन्हीं मोर्चों पर खड़े रहकर मौत को गले लगाते थे। राजा के न रहने पर उसके अवयस्क पुत्रों को भी इन मोर्चों पर जबर्दस्ती भेज दिया जाता था।

जब ये हिन्दू राजा एवं राजकुमार अधिकांश समय तक अपने राज्य से बाहर रहने लगे तो उनका अपनी प्रजा से सम्पर्क टूट गया। उनके कारिंदे उनकी प्रजा पर अत्याचार करने लगे और वे ही राज्य के वास्तविक स्वामी हो गए। इससे विगत हजारों वर्षों से राजा एवं प्रजा के बीच विश्वास एवं स्नेह का जो मधुर सामंजस्य स्थापित था, वह कमजोर हो गया।

जब राजाओं की लड़कियां मुगलों के महलों में जाने लगीं तो जनता में इन राजाओं के प्रति आदर का भाव समाप्त होने लगा जबकि दूसरी ओर जोधपुर के राव चंद्रसेन तथा मेवाड़ के महाराणा प्रताप जैसे राजा उच्च आदर्शों के रूप में समाज में स्थापित होने लगे।

अकबर की अधीनता स्वीकार करने से हिन्दू राजाओं को एक बड़ा नुक्सान यह हुआ कि अब हिन्दू राजाओं के लिए अपने कुल के असंतुष्ट राजकुमारों को नियंत्रित करना संभव नहीं रह गया। हिन्दू राजकुमार अपने भाई, पिता या चाचा के विरुद्ध शिकायतें लेकर अकबर की शरण में पहुंचने लगे।

जोधपुर के राजा चंद्रसेन को इस कारण इतनी क्षति हुई कि उसे अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा क्योंकि राव चंद्रसेन के भाई उदयसिंह ने अपनी पुत्री का विवाह अकबर के साथ करके उसका संरक्षण प्राप्त कर लिया तथा वह जोधपुर का राजा बन गया। जबकि राव चंद्रसेन को अपना जीवन जंगलों एवं पहाड़ों में बिताना पड़ा।

इसी प्रकार मेवाड़ का राजकुमार शक्तिसिंह अपने पिता महाराणा उदयसिंह के विरुद्ध सहायता पाने के लिए अकबर की शरण में पहुंच गया। शक्तिसिंह को अपने इस कार्य से इतनी ग्लानि हुई कि वह स्वयं ही अकबर को छोड़कर वापस अपने पिता उदयसिंह की सेवा में आ गया।

जब महाराणा उदयसिंह की मृत्यु हो गई तो उसका पुत्र जगमाल अकबर की शरण में जा पहुंचा। अकबर ने उसे चित्तौड़ का किला देकर महाराणा घोषित किया किंतु मेवाड़ के सामंतों ने जगमाल को महाराणा स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार मेवाड़ राजघराने में फूट का बीज पड़ गया। ऐसी घटनाएं और भी राजवंशों में हुईं।

अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले हिन्दू राजा अकबर के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हुए। उन्होंने न केवल अकबर की सल्तनत का विस्तार किया, न केवल अकबर की सल्तनत को मजबूत सुरक्षा चक्र प्रदान किया अपितु उन्होंने मध्यएशिया से आए ईरानी, तूरानी, अफगानी, उज्बेक, चगताई, कजलबाश, हब्शी एवं तातार योद्धाओं को भी नियंत्रित रखा।

जब भी कोई मध्यएशियाई अमीर अथवा शहजादा एवं भारतीय राजा अथवा राजकुमार अकबर के विरुद्ध विद्रोह करने का प्रयास करता था, अकबर इन निष्ठावान हिन्दू राजाओं को उनके विरुद्ध झौंक देता था। इस विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अकबर ने अपने व्यक्तित्व के प्रभाव से हिन्दू राजाओं को न केवल अपने अधीन किया अपितु उन्हें शासन में कनिष्ठ भागीदारी देकर निष्ठावान दोस्तों की एक रक्षापंक्ति तैयार कर ली।

भारतीय राजनीति में हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण स्थापित करने जैसे प्रयोग अकबर से पहले एवं उसके बाद के अन्य मुस्लिम शासक नहीं कर सके थे।

अकबर कालीन वेश्याएँ (184)

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अकबर कालीन वेश्याएँ

अकबर कालीन वेश्याएँ कैसी थीं, इनके बारे में अधिक विवरण नहीं मिलता किंतु वे बड़ी संख्या में थीं, इसका विवरण मिलता है। लोगों में वेश्याओं के यहाँ जाकर उनका नाच-गान देखने की प्रवृत्ति बड़े स्तर पर प्रचलित थी। जब मुगल सेनाएं एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाया करती थीं तब भी अकबर कालीन वेश्याएँ बड़ी संख्या में उनके साथ चला करती थीं।

अकबर ने हिन्दू राजाओं पर नियंत्रण स्थापित करके उन्हें अपने अधीन कर लिया तथा उन्हीं से अपने राज्य-विस्तार का कार्य करवाया। अकबर ने उनका विश्वास जीतकर उन्हें अपने राज्य का मुख्य प्रहरी बना लिया। इस कारण अकबर को अपने प्रतिद्वंद्वी शहजादों एवं अमीरों पर भी नकेल कसने में सहायता मिल गई।

कुछ लोगों ने अकबर द्वारा हिन्दू राजाओं को शासन में कनिष्ठ भागीदारी दिए जाने को अकबर की धार्मिक उदारता का प्रमाण मानकर अकबर की भूरि-भूरि प्रशंसा की है जिनमें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू भी सम्मिलित हैं। जबकि कुछ इतिहासकारों ने इसे हिन्दू अस्मिता के लिए बहुत खतरनाक बताया है।

अकबर के कुछ कार्यों ने भारतीय समाज को गहराई तक प्रभावित किया। जब बड़ी संख्या में हिन्दू राज्य अकबर के अधीन हो गए तो उसने भारत की सामाजिक व्यवस्था में सुधार लाने के लिए कुछ नए कानूनों का निर्माण किया। ई.1582 में अकबर ने एक बहुत बड़े दरबार का आयोजन किया जिसमें उसने प्रजा के कल्याण के लिये कई घोषणाएं कीं।

अकबर ने आज्ञा दी कि राज्य में गुलामी की प्रथा बन्द कर दी जाये तथा युद्ध-बंदियों को भी गुलाम न बनाया जाये। उसने कोतवालों को आदेश दिये कि वे गुलामों का क्रय-विक्रय बंद कर दें। इस आज्ञा के बाद गुलामों को मुक्त कर दिया गया। राज्य से न केवल गुलामी की प्रथा को हटा दिया गया अपितु गुलाम शब्द का प्रयोग निषिद्ध कर दिया गया। इसके स्थान पर ‘चेला’ शब्द का प्रयोग होने लगा।

अकबर ने अपने राज्य में बारह वर्ष की आयु के पूर्व विवाह न करने की आज्ञा प्रसारित की। बादशाह ने आज्ञा दी कि बादशाह की स्वीकृति के बिना, प्रान्तीय गवर्नर किसी भी व्यक्ति को प्राणदण्ड न दें। मध्यकालीन मुस्लिम शासन पद्धति में इसे अकबर का एक क्रांतिकारी कदम समझा जाना चाहिए। क्योंकि उस काल में शासकों द्वारा किसी मनुष्य के प्राण ले-लेना बहुत ही साधारण बात थी। बात-बात पर लोगों के सिर काट लिए जाते थे। अकबर ने अपने मंत्रियों, अधिकारियों एवं प्रांतपतियों को आज्ञा दी कि जहाँ तक सम्भव हो, छोटे पक्षियों की रक्षा की जाये क्योंकि इनको मारने से किसी का पेट नहीं भरता तथा अकारण जीव हिंसा होती है।

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अकबर ने आज्ञा प्रसारित की कि उसके महल में प्रतिदिन दान-दक्षिणा दी जाये। उसने यह भी आदेश प्रसारित किया कि सल्तनत के समस्त मार्गों पर सरायें बनवाई जायें, दीन-दुखियों की देखभाल की जाए और अस्पतालों की स्थापना की जाए। जन-सामान्य की भलाई के साथ-साथ अकबर ने अपनी सल्तनत में महिलाओं की दशा सुधारने की ओर भी ध्यान दिया। इस तरह का प्रयत्न उससे पहले किसी भी मुस्लिम शासक ने नहीं किया था।

उस काल में विधवा स्त्रियां बड़ी संख्या में सती होती थीं। सती होने वाली स्त्रियों में वे छोटी-छोटी लड़कियां भी होती थीं जिनके बालविवाह किए जाते थे और जिनके पति किसी बीमारी एवं युद्ध आदि के कारण मर जाते थे। हजारों ऐसी स्त्रियां भी होती थीं जिन्होंने विवाह के बाद एक बार भी अपनी ससुराल का मुंह नहीं देखा था। ई.1591 में अकबर ने अपनी सल्तनत में ‘जबरन सती प्रथा’ का निषेध कर दिया। अकबर ने आज्ञा प्रसारित करवाई कि कोई भी विधवा स्त्री, उसकी इच्छा के विरुद्ध सती न कराई जाए और जो स्त्रियाँ गौने के पहले विधवा हो जायें उन्हें कदापि सती नहीं होने दिया जाए।

कहा जाता है कि जोधपुर के मोटाराजा उदयसिंह की पुत्री के पति जयमल की मृत्यु चौसा में हो गई। इस पर मोटाराजा उदयसिंह ने अपनी पुत्री को सती करने के आदेश दिए। जब अकबर को यह बात ज्ञात हुई तो वह एक तेज घोड़े पर सवार होकर घटना स्थल पर पहुंचा और उसने उस लड़की को सती किए जाने से पहले ही वहाँ पहुंचकर बचा लिया। जब लड़की के पीहर वालों ने हो-हल्ला किया तो अकबर ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

अकबर ने विधवा विवाह को राज्य की ओर से स्वीकार्य मान लिया तथा एक-पत्नी प्रथा को प्रोत्साहित किया। अकबर ने आदेश जारी किया कि एक पुरुष के एक समय में एक ही पत्नी होनी चाहिये। कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के जीवन काल में दूसरा विवाह तभी कर सकता था जब उसकी पहली पत्नी वन्ध्या हो। हालांकि अकबर के स्वयं के हरम में पांच हजार स्त्रियां रहती थीं। चूंकि इस्लाम में कानूनन चार विवाह करने की स्वीकृति है। इसलिए मुल्ला-मौलवियों ने एक विवाह के नियम को इस्लाम के विरुद्ध बताया और इस नियम का विरोध किया।

अकबर कालीन वेश्याएँ बहुत कम उम्र की हुआ करती थीं क्योंकि अरब के रेगिस्तान में बहुत कम आयु की लड़कियों से शारीरिक सम्बन्ध बनाना या विवाह करना स्वीकार्य था। यही परम्परा इस्लाम को मानने वालों में पूरी धरती पर प्रचलित हो गई थी।

ई.1592 में अकबर ने घोषणा की कि 16 वर्ष की आयु के पहले किसी बालक का और 18 वर्ष की आयु के पहले किसी बालिका का विवाह न किया जाये। बादशाह ने आज्ञा जारी की कि कोई व्यक्ति बलपूर्वक अथवा अनैतिक प्रलोभन देकर किसी लड़की से विवाह नहीं कर सकेगा। अकबर ने वेश्याओं तथा भ्रष्ट-स्त्रियों को नगर छोड़कर चले जाने की आज्ञा दी। दाखिली सेना (पुलिस) को आदेश दिया गया कि जो लोग वेश्याओं के यहाँ जायें अथवा उन्हें अपने यहाँ बुलायें उन पर कड़ी निगाह रखी जाये और उनका नाम रजिस्टर में लिखा जाये।

अकबर ने अपने राज्य में सब लोगों को अपनी इच्छानुसार धर्म अथवा मजहब का पालन करने एवं धर्म-परिवर्तन करने की स्वतन्त्रता दे दी। अकबर ने सल्तनत में शराब के विक्रय तथा उत्पादन का निषेध कर दिया परन्तु अनुज्ञा-धारकों की दुकानों पर औषधि के लिए शराब मिल सकती थी। अकबर ने अपनी राजधानी से भिखमंगों को भी दूर करने का प्रयत्न किया।

इतिहासकारों द्वारा वर्णित अकबर के सुधारों को पढ़कर बड़ा आश्चर्य होता है। विशेषकर तब, जबकि अकबर स्वयं जीवन भर उन सुधारों की भावनाओं के ठीक विपरीत काम करता रहा था। कहा जाता है कि अकबर ने अपने प्रांतपतियों को आज्ञा दी कि वे किसी को भी प्राणदण्ड न दें जबकि स्वयं अकबर अपने विरोधियों को हाथी के पैरों तले कुचलवाता रहा था और अपने शत्रुओं के सिर काटकर उनकी मीनारें चिनवाता रहा था!

कहा जाता है कि अकबर ने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि केवल एक ही पत्नी रखी जाए तथा वेश्याओं के यहाँ जाने वालों के नाम रजिस्टर में लिखे जाएं जबकि अकबर के हरम में पांच हजार स्त्रियां थीं। उसने तिब्बत से लेकर तूरान तक, पंजाब से लेकर पुर्तगाल तक और गुजरात से लेकर गोआ तक की औरतों से निकाह और मुताह किए थे। मुताह की जाने वाली औरतें भी अकबर कालीन वेश्याएँ ही थीं अथवा वेश्यावृत्ति का बदला हुआ रूप थीं।

अकबर के हरम में हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई आदि विभिन्न धर्मों एवं मजहबों की औरतें मुताह की हुई थीं।

अकबर ने अपनी प्रजा को भी न केवल इस्लामी परम्परा के अनुसार चार बीवियां रखने को स्वीकृति दे रखी थी अपितु मुताह के माध्यम से कितनी ही लौण्डियाओं (गुलाम स्त्रियों) को अपनी बीवी बनाने का आदेश जारी कर रखा था। ऐसी स्थिति में वह अपनी प्रजा को एक विवाह करने का आदेश कैसे दे सकता था! अकबर कालीन वेश्याएँ भी बहुत से पुरुषों के साथ उनकी औरतों की तरह रहा करती थीं।

कहा जाता है कि अकबर ने अपनी प्रजा के नाम आदेश जारी किया कि जहाँ तक संभव हो छोटे पक्षियों का शिकार नहीं किया जाए क्योंकि इनसे किसी का पेट नहीं भरता। जबकि अकबर जीवन भर जंगलों में जाकर शिकार खेलता रहा था जिनका उद्देश्य किसी का पेट भरना नहीं था, अपितु अपना मनोरंजन करना था।

तुलसीदासजी की लोकप्रियता से पीछे रह गया अकबर! (185)

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तुलसीदासजी की लोकप्रियता

अकबर अपने समय में सर्वाधिक लोकप्रिय बादशाह था। उसकी ख्याति पूरे भारत में तो थी ही, भारत से बाहर मध्यएशियाई देशों में भी थी। फिर भी तुलसीदासजी की लोकप्रियता से पीछे रह गया था अकबर!

आज अकबर की मृत्यु हुए 417 वर्ष बीत चुके हैं। भारत में शायद ही कोई ऐसा शिक्षित व्यक्ति हो जिसने अकबर का नाम न सुन रखा हो! अकबर के सम्बन्ध में भारत के लोगों में अलग-अलग राय है। कुछ लोग अकबर को महान् मानते हैं तो कुछ लोग उसे क्रूर एवं अत्चारी मानते हैं। कुछ लोग उसे इस्लाम का प्रचार करने वाला मानते हैं तो कुछ लोग उसे इस्लाम को क्षति पहुंचाने वाला मानते हैं।

कुछ लोग अकबर को हिन्दुओं का मित्र मानते हैं तो कुछ लोग उसे हिन्दू धर्म को को नष्ट करने का षड़यंत्र रचने वाला मानते हैं। अकबर के समर्थकों का मत है कि अकबर हिन्दू धर्म और इस्लाम दोनों से ऊपर उठकर एक मानव धर्म की रचना करना चाहता था, वह सभी धर्मों एवं मजहबों के प्रति उदार था किंतु वह लोगों की मजहबी कट्टरता के खिलाफ था।

हिन्दू इतिहासकारों की अकबर के विरुद्ध सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उसने हिन्दू राजाओं को अपने अधीन करके तथा हिन्दू राजकुमारियों से विवाह करके हिंदुओं के गौरव पर चोट की तथा हिंदू धर्म एवं हिन्दू अस्मिता को नुक्सान पहुंचाया। भारत में अक्सर लोग यह कहते हुए मिल जाते हैं कि यदि अकबर जैसे दो-चार शासक और हो गये होते तो हिन्दू धर्म बड़ी कठिनाई में पड़ जाता। इसके विपरीत, मुस्लिम इतिहासकार मानते हैं कि अकबर ने इस्लाम के सिद्धांतों को छोड़कर तथा दीने-इलाही चलाकर भारत में इस्लाम का बहुत नुक्सान किया। अकबर के समकालीन मुल्ला-मौलवी तो अकबर को इस्लाम का शत्रु ही मानते थे।

इतिहास की बहुत सारी पुस्तकों में अकबर की गणना भारत के महान् शासकों में की जाती है। उसके व्यक्तित्व के सम्बन्ध में विद्वानों ने इतना अधिक लिख दिया है कि वास्तविकता का पता लगाना कठिन हो गया है। अबुल फजल जैसे प्रशंसकों ने उसके व्यक्तित्व को अत्यन्त अतिरंजित करके उसे एक आदर्श शासक बताया है परन्तु बदायूंनी ने उसे इस्लाम का शत्रु घोषित करके उसके व्यक्तित्व को हेय सिद्ध करने का प्रयास किया है।

उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन करने पर अनुमान होता है कि अकबर का व्यक्तित्व अपने युग के मुस्लिम बादशाहों से कहीं अधिक श्रेष्ठ था। उसमें ऐसे अनेक गुणों का समावेश था जिनके बल पर वह अपने राज्य का अभूतपूर्व विस्तार कर सका, उसे स्थायित्व दे पाया तथा अपने वंशजों के लिये मार्गदर्शक सिद्धांतों का निर्माण करने में सफल रहा किंतु उसकी सफलताओं एवं उपलब्धियों के समस्त परिणाम केवल उसके राज्य-विस्तार पर आकर केन्द्रित हो जाते हैं।

अकबर के समकालीन एक जेजुइट पादरी ने अकबर के बारे में लिखा है- ‘वह हर समय व्यस्त रहता था। अभी वह राजकीय मामलों में मशगूल है या अपनी प्रजा के लोगों को मुजरे दे रहा है तो दूसरे ही क्षण वह ऊँटों के बाल कतरता हुआ या पत्थर फोड़ता हुआ या लकड़ी काटता हुआ या लोहा कूटता हुआ नजर आता है। इन सब कामों को वह इतनी होशियारी से करता है मानो खुद अपने ही खास पेशे को कर रहा हो।’

Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar - www.bharatkaitihas.com
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पं. जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा प्रियदर्शिनी को लिखे पत्रों में लिखा है- ‘वह जमाना यूरोप में नीदरलैण्ड के विद्रोह का और इंग्लैण्ड में शेक्सपीयर का था। अकबर का नाम भारत के इतिहास में जगमगा रहा है और कभी-कभी कुछ बातों में वह हमें अशोक की याद दिलाता है। यह एक अजीब बात है कि ईसा से तीन सौ साल पहले का एक बौद्ध सम्राट और ईसा के बाद सोलहवीं सदी का एक मुसलमान बादशाह, दोनों एक ही ढंग से और करीब-करीब एक ही आवाज में बोल रहे हैं। ताज्जुब नहीं कि यह खुद भारत की ही आवाज हो जो उसके दो महान् पुत्रों के जरिये बोल रही हो। अशोक के बारे में हम केवल उतना ही जानते हैं जितना उसने खुद पत्थरों पर तराशा हुआ छोड़ा है किंतु अकबर के बारे में हम बहुत-कुछ जानते हैं। उसके दरबार के दो समकालीन इतिहासकारों के लम्बे विवरण मिलते हैं। जो विदेशी उससे मिलने आए थे- खासकर जेजुुइट लोग, जिन्होंने उसे ईसाई बनाने की जोरदार कोशिश की थी, उन्होंने भी लम्बे-चौड़े बयान लिखे हैं।’

जवाहरलाल नेहरू ने अकबर के व्यक्तित्व का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए लिखा है- ‘संयोग से अकबर एक बुद्धिमान स्वेच्छाचारी था और वह भारत के लोगों की भलाई के लिए जी-तोड़ कोशिश करता रहता था। एक तरह से वह भारतीय राष्ट्रीयता का जन्मदाता माना जा सकता है। हालांकि वह एक शक्तिशाली और निरंकुश शासक था किंतु वह हाथ से काम करने को अपनी शान के खिलाफ नहीं समझता था जैसा कि आजकल के कुछ लोग खयाल करते हैं।’

अकबर के समकालीन पादरी मनसर्रट ने लिखा है- ‘अकबर बहुत कृपण था और धन को बचाए रखने वाला था।’

अकबर के दरबार में उपस्थित ईसाई पादरी जेवियर ने लिखा है- ‘अकबर अपने चरणों की धोवन जन-सामान्य को पीने के लिए देता था। जेवियर के हवाले से स्मिथ ने लिखा है कि अकबर अपने आप को पैगम्बर की तरह घोषित करता था। जनता को मानना होता था कि अकबर के पैरों की धोवन पीने से जनता के रोग ठीक हो जाते हैं।’

बदायूंनी लिखता है- ‘इस तरह का अपमानजनक व्यवहार केवल हिंदुओं के लिए ही सुरक्षित था। यदि हिंदुओं के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति अकबर के प्रति इस तरह की भक्ति प्रदर्शित करने की इच्छा प्रकट करता तो अकबर उसे झिड़क देता था।’

पुरुषोत्तम नागेश ओक ने लिखा है- ‘औरतें यातनाग्रस्त होकर अंतिम उपाय के रूप में अपने बच्चों को अकबर के चरणों में लेटा देती थीं और दया की भीख मांगती थीं। अकबर के दरबारी, ईसाई पादरियों को समझाया करते थे कि ये औरतें अकबर को पहुंचा हुआ फकीर मानती हैं, वे अपने बच्चों को आशीर्वाद दिलाने के लिए उन्हें बादशाह के चरणों में डालती हैं।’

विन्सेट स्मिथ ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘वह मनुष्य का जन्मजात शासक था और इतिहास में परिज्ञात सर्वशक्तिशाली शासकों में स्थान पाने का वस्तुतः अधिकारी है। यह अधिकार निःसंदेह उसके अलौकिक एवं प्राकृतिक गुणों, उसके मौलिक विचारों तथा उसकी शानदार सफलताओं पर आधारित है।’

के. टी. शाह ने अकबर के बारे में लिखा है- ‘मुगलों में अकबर सबसे महान् था और यदि मौर्यों के काल से नहीं तो कम से कम एक सहस्र वर्षों में वह सबसे बड़ा भारतीय शासक था।’

लेनपूल ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘वह भारत का भद्रतम शासक था…..वह साम्राज्य का सच्चा संस्थापक तथा संगठनकर्ता था…..वह मुगल साम्राज्य के स्वर्ण-युग का प्रतिनिधित्व करता है।’

एडवर्ड्स तथा गैरेट ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘अकबर ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यता को सिद्ध कर दिया है। वह एक निर्भीक सैनिक, एक महान् सेनानायक, एक बुद्धिमान प्रबन्धक, एक उदार शासक और चरित्र का सही मूल्यांकन करने वाला था। वह मनुष्यों का जन्मजात नेता था और इतिहास का सर्वशक्तिमान् शासक कहलाने का वास्तविक अधिकारी है।’

यूरोपीय इतिहासकार हेग ने लिखा है- ‘वास्तव में वह एक महान् शासक था क्योंकि वह जानता था कि अच्छा शासक वही है जिसका उसकी प्रजा आज्ञा-पालन के साथ-साथ आदर-सम्मान और प्यार करती हो न कि भयभीत रहती हो। वह ऐसा शहजादा था जिसे समस्त लोग प्यार करते थे, जो महान् व्यक्तियों के साथ दृढ़, निम्न-स्थिति के लोगों के प्रति उदार और जो छोटे-बड़े परिचित-अपरिचित समस्त लोगों के साथ न्याय करता था।’

पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने विश्व इतिहास की झलक में अकबर की प्रसिद्धि का विश्लेषण करते हुए लिखा है- ‘अकबर के शासनकाल में उत्तर भारत में और अधिकतर काशी में एक व्यक्ति हुआ जिसका नाम संयुक्त प्रांत अर्थात् आज के उत्तर प्रदेश में हरेक देहाती की जबान पर है। वहाँ वह इतना मशहूर है और इतना लोकप्रिय है, जितना अकबर या दूसरा कोई बादशाह नहीं हो सकता।’

नेहरू लिखते हैं कि ‘मेरा मतलब तुलसीदास से है जिन्होंने हिन्दी में रामचरित मानस या रामायण लिखी।’ इस प्रकार हम कह सकते हैं कि तुलसीदासजी की लोकप्रियता से पीछे रह गया अकबर!

यदि हम नेहरू के इस कथन पर निष्पक्ष होकर विचार करें तो हम पाएंगे कि यद्यपि जवाहरलाल नेहरू द्वारा अकबर की प्रसिद्धि के सम्बन्ध में किया गया यह विलेषण अंतिम सत्य नहीं है तथापि यह कथन इस ओर मजबूत संकेत करता है कि अकबर अपने काल का एकमात्र प्रसिद्धतम व्यक्ति नहीं था, कुछ लोग थे जो अकबर से भी अधिक लोकप्रिय थे जिनमें गोस्वामी तुलसीदास और उस काल के अनेक वैष्णव संतों के नाम लिए जा सकते हैं। जैसे कि भगवान वल्लभाचार्य एवं अकबर का स्वयं का मुख्य सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीम। सूरदास तथा मीरांबाई भी लोकप्रियता के मामले में अकबर से बहुत आगे बैठते हैं।

भारत की जनता तब भी संतों से ऊर्जा प्राप्त कर रही थी और आज भी उन संतों की वाणी भारतीय समाज को ऊर्जा एवं प्रेरणा दे रही है। भारतीयों के लिए कोई धनी व्यक्ति अथवा कोई राजा तब तक आदरणीय नहीं हुआ जब तक कि उसमें संतों की तरह निष्छलता और लोकोपकार की भावना के दर्शन न हुए हों! यही कारण है कि तुलसीदासजी की लोकप्रियता अकबर की अपेक्षा बहुत बढ़ी-चढ़ी थी।

तुलसीदासजी की तुलना में अकबर का व्यक्तित्व बहुत छोटा सिद्ध होता है। अकबर औरतों और सल्तनत का लालची था न कि जनता का निश्छल सेवक या कि दिव्य गुणों से सम्पन्न अद्भुत संत! अकबर केवल बादशाह था जबकि तुलसीदासजी न केवल अपने युग के लोकनायक थे अपितु आज भी उन्होंने अपना वह स्थान बनाए रखा है।

संत तुलसीदास पर अन्य लेख-

तुलसीदास

संत तुलसीदास और अकबर

गोस्वामी तुलसीदास का जीवनवृत्त

गोस्वामी तुलसीदास का काव्य तत्कालीन समय का इतिहास है!

गोस्वामी तुलसीदास की दृष्टि में लौकिक दु:ख

तुलसीदासजी की लोकप्रियता से पीछे रह गया अकबर!

संत तुलसीदास का साहित्य

कैसे बना था पाकिस्तान – अनुक्रमणिका

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कैसे बना था पाकिस्तान

इस अध्याय में पाकिस्तान के निर्माण पर लिखी गई सुप्रसिद्ध पुस्तक कैसे बना था पाकिस्तान की अनुक्रमणिका लिखी गई है। पाकिस्तान निर्माण के समय मुस्लिम लीग एवं उसके नेताओं की गतिविधियों के बारे में जानना तो रोचक है ही, साथ ही ब्रिटिश सत्ता के अधिकारियों के षड़यंत्र एवं जोधपुर, अलवर तथा बीकानेर आदि हिन्दू रियासतों की पाकिस्तान निर्माण के समय की गतिविधियों को जााना कम रोचक नहीं है।

1. कैसे बना था पाकिस्तान – अनुक्रमणिका

2. कैसे बना था पाकिस्तान – प्राक्कथन

3. भारत स्वयं में एक महाद्वीप है!

4. इस्लाम का वैश्विक विस्तार

5. इस्लाम के विश्वव्यापी प्रसार के कारण

6. ईस्लाम का भारत में प्रवेश और प्रसार

7. सूफियों के प्रेम-तराने भी पाकिस्तान की जड़ों को पनपने से नहीं रोक सके

8. ब्रिटिश.भारत में साम्प्रदायिक राजनीति

9. ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण (1)

10. ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण (2)

11. ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण (3)

12. गॉड सेव द क्वीन बनाम वन्दे मातरम्

13. ब्रिटिश नौकरशाही के गर्भ से कांग्रेस का जन्म

14. अंग्रेजों द्वारा कांग्रेस की स्थापना के घोषित उद्देश्य एवं कारण

15. अंग्रेजों द्वारा स्थापित कांग्रेस का प्रारम्भिक स्वरूप एवं प्रभाव

16. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में नरमपंथी कांग्रेस की भूमिका

17. ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा कांग्रेस का विरोध

18. उग्र हिन्दुत्ववादी नेताओं ने कांग्रेस को अंग्रेजों की छाया से बाहर निकाला

19. बंग-भंग से देश में उग्र हिन्दुत्व की लहर

20. उग्र राष्ट्रवादी कांग्रेसी नेताओं द्वारा द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थन

21. ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा

22. ब्रिटिश नौकरशाही के गर्भ से मुस्लिम लीग का जन्म

23. मार्ले.मिण्टो सुधार एक्ट से भारत में साम्प्रदायिकता में वृद्धि

24. मुसलमानों में गांधाजी के विरुद्ध संदेह

25. स्वतंत्रता संगा्रम से पहले भारत में साम्प्रदायिक हिंसा : 1921-1931

26. देश में उग्र हिन्दुत्व की लहर

27. जिन्ना को प्रेमपत्र लिखा करती थीं सरोनी नायडू!

28. गांधी और नेहरू को सार्वजनिक मंचों से अपमानित करता था जिन्ना!

29. विभाजित भारत का पहला नक्शा मुहम्मद इकबाल ने बनाया

30. साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (1)

31. साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (2)

32. साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (3)

33. साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (4)

34. रहमत अली ने किया पाकिस्तान शब्द का आविष्कार

35. मुहम्मद अली जिन्ना का भारत की राजनीति में पुनः आगमन

36. जवाहरलाल नेहरू का पाकिस्तान के विचार पर हमला

37. जिन्ना का कांग्रेस पर हमला

38. जिन्ना द्वारा मुक्ति दिवस का आह्वान

39. मुस्लिम लीग का पाकिस्तान प्रस्ताव

40. मुस्लिम लीग की दुष्टता का लिनलिथगो ने फायदा उठाया

41. क्रिप्स मिशन की भारत-संघ योजना

42. क्रिप्स मिशन की असफलता

43. हम दिल्ली की सड़कों पर सुभाष का स्वागत तलवारों से करेंगे!

44. भारतीय संघ के निर्माण हेतु कुछ और योजनाएं

45. कांग्रेस और मुस्लिम लीग में अस्थाई सरकार के गठन के लिए समझौता

46. कैबीनेट मिशन का भारत आगमन

47. अलीगढ़ में 1946 के साम्प्रदायिक दंगे एवं शिमला कान्फ्रेंस

48. कैबीनेट मिशन प्लान (संयुक्त भारत योजना)

49. कैबीनेट मिशन कम्पलीट

50. मौलाना आजाद द्वारा जिन्ना और प्रस्तावित पाकिस्तान का विरोध

51. कैबीनेट प्लान की मृत्यु

52. अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को अंतरिम सरकार बनाने का निमंत्रण

53. सुहरावर्दी के गुण्डों को कत्लेआम के लिए कूपन दिए गए!

54. महीनों तक खून में तैरता रहा कलकत्ता!

55. पाकिस्तान को बोलने दो!

56. बन गई नेहरू की अंतरिम सरकार

57. संविधान सभा में जिन्ना का फच्चर

58. मुस्लिम लीग द्वारा अंतरिम सरकार के विरुद्ध षड़यंत्र

59. जिन्ना को मिल गया पाकिस्तान

60. मुस्लिम लीग द्वारा पंजाब में सिक्खों एवं हिंदुओं का नरसंहार!

61. कुछ सिक्खों ने सिक्खिस्तान बनाने की मांग की!

62. भारत में मेवस्थान बनाने की योजना

63. भारत को आजादी देने के लिए लॉर्ड माउण्टबेटन को भेजा गया!

64. जिन्ना को दे दो पूरी सरकार

65. माउण्टबेटन ने जवाहर लाल को भारत-विभाजन के लिए तैयार किया

66. माउण्टबेटन की दृष्टि में जिन्ना उन्मादी था!

67. जिन्ना भारत का विभाजन चाहता था न कि पंजाब और बंगाल का

68. भारत का विभाजन केवल पागलपन

69. अंग्रेजों ने भारत के टुकड़े.टुकड़े करने की तैयारी कर ली!

70. भारत विभाजन योजना में संशोधन

71. भारत को बीच में से चीरने की योजना

72. सुहरावर्दी द्वारा अलग बंगाल बनाने की योजना

73. सब भीतर ही भीतर गांधी के खिलाफ थे

74. कांग्रेस कार्यसमिति में पाकिस्तान को स्वीकृति

75. गांधीजी द्वारा पाकिस्तान निर्माण पर सहमति

76. मुहम्मद अली जिन्ना की हत्या का प्रयास

77. भारत विभाजन प्रस्ताव को स्वीकृति

78. भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947

79. विभाजन कौंसिल का गठन

80. भावी देशों के लिए वैकल्पिक सरकारें

81. रैडक्लिफ आयोग ने खींची विभाजन रेखा

82. अहमदपुर चौरोली

83. आखिर बन गया पाकिस्तान

84. क्या कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया ने पाकिस्तान आंदोलन में सहायता की?

85. रक्त की नदी में तैर कर निकला पाकिस्तान (1)

86. रक्त की नदी में तैर कर निकला पाकिस्तान (2)

87. रक्त की नदी में तैर कर निकला पाकिस्तान (3)

88. रक्त की नदी में तैर कर निकला पाकिस्तान (4)

89. देशी राज्यों पर पाकिस्तानी जाल (1)

90. देशी राज्यों पर पाकिस्तानी जाल (2)

91. देशी राज्यों पर पाकिस्तानी जाल (3)

92. देशी राज्यों पर पाकिस्तानी जाल (4)

93. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (1)

94. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (2)

95. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (3)

96. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (5)

97. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (6)

98. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (7)

99. बीकानेर रियासत का भारत में विलय

100. जूनागढ़ का नवाब बेगमों की बजाय कुत्ते लेकर पाकिस्तान भाग गया

101. निजाम को विश्वास था कि अंग्रेज हैदराबाद को अलग देश बना देंगे!

102. सरदार पटेल ने हैदराबाद राज्य को भारत में मिला लिया

103. सरदार पटेल ने धराशाई किए भोपाल नवाब के हसीन सपने

104. भारतीय हिस्से हथियाने के दुष्प्रयास

105. काश्मीर में कबाइलियों का आक्रमण

106. बीकानेर महाराजा पर पाकिस्तानी मकड़जाल

107. पाकिस्तान से आगे

108. जिन्ना का पाकिस्तान बनाम पाकिस्तान का जिन्ना!

109. भारत वापस लौटना चाहता था जिन्ना !

110. पाकिस्तान मुस्लिम लीग का विभाजन

111. पाकिस्तान से मोहभंग

112. जिन्ना के उत्तराधिकारियों का पाकिस्तान

113. एक दूसरे से दूर होते चले गए भारत-पाकिस्तान

114. पाकिस्तान का पानी खतरे में

115. पाकिस्तान की सेना ही पाकिस्तान का सबसे बड़ा शत्रु

117. पूर्वी-पाकिस्तान में धर्म के नाम पर हिन्दुओं की और भाषा के नाम पर मुसलमानों की हत्या

118. पश्चिमी-पाकिस्तान की सेना ने तीस लाख बंगालियों एवं बिहारियों का संहार किया

119. दूसरे धर्म वालों के लिए पाकिस्तान में जगह नहीं!

120. पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार

121. पाकिस्तान में शियाओं का सफाया

122. पाकिस्तान में सूफी दरगाहों पर खूनी हमलों का इतिहास

123. दीनदारों तथा सयैदों की जिंदगियों का अंतर

124. ये कैसा पाकिस्तान!

125. जारी है मौत एवं पलायन का सिलसिला

126. क्यों नहीं हो सकती भारत से दोस्ती!

127. पाकिस्तानियों को पहचान का संकट

128. कुछ अनुत्तरित प्रश्न

129. Appendix – Government’s Statement Of 3 June 1947

130. संदर्भ सूचि – कैसे बना था पाकिस्तान

कैसे बना था पाकिस्तान-प्राक्कथन

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कैसे बना था पाकिस्तान-प्राक्कथन
कैसे बना था पाकिस्तान-प्राक्कथन

कैसे बना था पाकिस्तान-प्राक्कथन लिखते समय आज भी मुझे उन पुरानी स्मृतियों का उल्लेख हो आता है जिनके कारण मैंने यह पुस्तक लिखी। इस पुस्तक को लिखने की पहली बार मेरी इच्छा वर्ष 1985 में हुई थी। यह वह दौर था जब श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली एवं उत्तर भारत के कुछ नगरों में सिक्खों का बड़ा नर-संहार होकर ही चुका था तथा पंजाब में ‘घल्लूघारा’ चल रहा था। उन्हीं दिनों मुझे श्रीगंगानर जिले के ‘बिलोचिया’ गांव जाने का अवसर मिला।

इस गांव में सैंकड़ों कच्चे घर थे जो पूरी तरह खाली पड़े थे और उनमें से अधिकांश घर खण्डहरों में बदल चुके थे। गांव के एक कौने में हिन्दुओं की एक छोटी सी बस्ती थी। उन्हीं लोगों ने मुझे बताया कि आजादी से पहले यह गांव पूरी तरह आबाद था तथा इन खाली पड़े घरों में मुसलमान रहा करते थे जो 1947 में पाकिस्तान चले गए। उसके बाद से इन घरों में रहने के लिए कोई नहीं आया और इन्हें राजस्थान सरकार ने नजूल सम्पत्ति घोषित कर दिया है।

बिलोचिया से आने के कुछ ही दिनों बाद मुझे ‘हिन्दूमल कोट’ जाना पड़ा। यह पक्के घरों और साफ-सुथरी गलियों वाला एक सुंदर सा कस्बा था किंतु वहाँ भी सैंकड़ों घरों पर ताले पड़े हुए थे। मैंने लोगों से पूछा कि क्या इस कस्बे के लोग भी भारत विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए? वहाँ के लोगों ने मुझे बताया कि नहीं पाकिस्तान नहीं गए, अधिकतर लोग गंगानगर, बीकानेर, अबोहर, फाजिल्का तथा बम्बई आदि शहरों में गए हैं।

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मैंने पूछा- ‘क्यों?’ तो उन्होंने बताया- ‘यह कस्बा भारत विभाजन से पहले अनाज की अच्छी मण्डी हुआ करता था किंतु भारत-विभाजन के बाद यह कस्बा अचानक पाकिस्तान की सीमा पर आ गया। इस कारण 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में यह कस्बा उजड़ गया। लोग अपने परिवारों को लेकर अन्य शहरों को चले गए और इस कस्बे का वाणिज्य-व्यापार ठप्प हो गया। उनके घरों पर आज भी ताले लगे हुए हैं।’

गंगानगर के पांच साल के प्रवास के दौरान मैं श्री स्वदेशराज वर्मा के परिवार के सम्पर्क में आया। यह एक आर्यसमाजी परिवार था और बहुत खुले हुए आधुनिक विचारों का परिवार था। भारत-विभाजन के समय श्री स्वदेशराज वर्मा अपने पिता डॉ. गोविंदराम तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बहावलपुर स्टेट के खानपुर कस्बे से हिन्दूमल कोट आए थे। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता कराची रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर हुआ करते थे।

भारत विभाजन के समय चूंकि पाकिस्तान से भारत आने वाली ट्रेनों में कत्ले-आम मचा हुआ था इसलिए यह परिवार कराची से वायुयान द्वारा दिल्ली पहुंचा। वहाँ से यह परिवार पहले मेरठ और फिर अमृतसर चला गया। श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता श्री मूलचंद मल्होत्रा का परिवार मूलतः मुल्तान के सक्खर क्षेत्र का रहने वाला था। श्री स्वदेश वर्मा और श्रीमती कैलाश वर्मा अक्सर भारत विभाजन के समय की आंखों-देखी घटनाओं का उल्लेख किया करते थे।

चूंकि उन दोनों के परिवारों की पृष्ठभूमि सम्पन्न थी तथा वे समय रहते ही वहाँ से निकल आए थे तब भी उनके मन एवं मस्तिष्क से उन दिनों की यादें मिटती नहीं थीं। यहाँ तक कि श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता श्री मूलचंद मल्होत्रा को भारत सरकार ने मेरठ रेल्वे स्टेशन पर नियुक्ति भी दी किंतु वे अपने सगे-सम्बन्धियों, मित्रों एवं अपनी अचल सम्पत्ति के पाकिस्तान में छूट जाने के कारण मानसिक रूप से इतने विक्षुब्ध हो चुके थे कि वे नौकरी छोड़कर अमृतसर चले गए। उनके संगी-साथी तथा घर-सम्पत्ति पाकिस्तान में ही रह गए थे।

मैं जब वर्मा-दम्पत्ति की बातें सुनता था तो अक्सर भारत-विभाजन की त्रासदी झेलने वाले उन लाखों लोगों के बारे में सोचा करता था जो पैदल ही पाकिस्तान से भारत आए थे या भारत से पाकिस्तान गए थे! पांच लाख लोग तो अपने गंतव्य पर पहुंचने से पहले ही दंगाइयों के क्रूर हाथों में पड़कर मौत की खाई में जा गिरे थे।

भारत से पाकिस्तान का अलग होना, मानवीय इतिहास की एक क्रूरतम एवं रक्तरंजित घटना थी। संसार के कई अन्य देशों को भी ऐसी भीषण त्रासदियां झेलनी पड़ी हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि आदमी कभी सभ्य नहीं बन पाया, वह असभ्य था, है और रहेगा।

1980 के दशक में अजमेर प्रवास के दौरान मैं एक ऐसे परिवार के सम्पर्क में रहा जिसकी गृह-स्वामिनी श्रीमती द्रौपदी यादव अपने पिता एवं उनके परिवार के साथ भारत की आजादी से लगभग दो साल पहले उस समय बर्मा से भारत आई थीं जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज एवं जापानी सेनाएं अंग्रेज सेनाओं को बर्मा से मारकर भगा रही थीं। श्रीमती यादव जो उस समय छोटी बच्ची ही थीं, का परिवार किसी बड़े दल के साथ पैदल चल कर ही बर्मा से असम तक आया था और वहाँ से इलाहाबाद गया।

इस दौरान उन्हें युद्धक-विमानों से होने वाली बम-वर्षा से लेकर हिंसक हाथियों तथा पुलिस के सिपाहियों के अत्याचारों का सामना करना पड़ा। इन्हीं में से एक घटना के दौरान उनके एक भाई अथवा एक बहिन की मृत्यु हो गई थी। श्रीमती द्रौपदी भी प्रायः उस पलायन के बहुत से लोमहर्षक प्रसंग कभी हँस कर तो कभी रो कर सुनाया करती थीं।

मेरे पितामह श्री मुकुंदी लाल गुप्ता भी ई.1947 में यमुनाजी के किनारे हुए मेवों के आक्रमण के समय अपने कुनबे के युवकों तथा संगी-साथियों के साथ सशस्त्र संघर्ष में सम्मिलित हुए थे। मेरी दादी श्रीमती जय देवी (अब स्वर्गीय) एवं पिताजी अक्सर उस संघर्ष की चर्चा करते रहे हैं।

वर्ष 1993 में मैंने भारत-पाकिस्तान की सरहद पर स्थित आकुड़ियां गांव देखा था। यह जालोर जिले के नेहड़ क्षेत्र में स्थित है जहाँ लूनी नदी का मुहाना है। यह पूरी तरह से सुनसान और उजड़ा हुआ गांव था। पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि भारत की आजादी से पहले यह भरा-पूरा गांव था जिसमें मुसलमान परिवार रहा करते थे किंतु आजादी के बाद इस गांव के सारे लोग भारत की सीमा पार करके पाकिस्तान के क्षेत्र में चले गए और उन्होंने वहाँ पर एक नया गांव बसा लिया जिसका नाम भी आकुड़िया है। अब भारतीय आकुड़िया पूरी तरह सुनसान है।

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के समय जो कुछ हुआ, वह भी इस बात की पुष्टि करता है कि सभ्यता के कैनवास पर मनुष्य सदैव गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करता आया है। नयी जीत की आशा में वह पुरानी उपलब्धियों को आग में झौंक डालता है। मनपसंद खिलौना प्राप्त करने की प्रत्याशा में वह अपनी हथेली पर रखे खिलौने को क्रूरता से तोड़ डालता है। जो कुछ भी मानव के पास है, उसमें वह कभी भी संतुष्ट नहीं है, और जो कुछ उसे संतुष्ट कर सके, उसे कभी भी मिलता नहीं है।

ई.1906 में भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, तब से लेकर ई.1947 तक मुस्लिम लीग पाकिस्तान के लिये झगड़ती रही और उसे लेकर ही रही। ऊपरी तौर से देखने पर पाकिस्तान का निर्माण इन्हीं 41 वर्षों के संघर्ष का परिणाम लगता है किंतु सच्चाई यह है कि पाकिस्तान की नींव तो ई.712 में मुहम्मद बिन कासिम ने उसी समय डाल दी थी जब उसने सिंध पर आक्रमण करके महाराजा दाहिर सेन और उनके राज्य को समाप्त किया था।

तब से लेकर ई.1947 तक तिल-तिल करके भारत का इतिहास पाकिस्तान की ओर बढ़ता रहा। मेरी दृष्टि में पाकिस्तान इकतालीस वर्ष के संघर्ष का परिणाम नहीं था। अपितु पूरे 1225 वर्ष के संघर्ष का परिणाम था। भारत के इतिहास में यह पूरी अवधि नफरत, हिंसा, रक्तपात और दंगों से भरी हुई थी।

भारत-विभाजन के समय भारत में विश्व की जनसंख्या का पांचवा हिस्सा निवास करता था। उस समय भारत की कुल जनंसख्या लगभग 39 करोड़ थी जिनमें से लगभग 29 करोड़ हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन एवं ईसाई थे तथा लगभग 10 करोड़ मुसलमान थे। विभाजन के बाद दोनों तरफ से कुल मिलाकर एक से डेढ़ करोड़ हिन्दुओं, सिक्खों एवं मुसलमानों ने सीमा पार की।

इसके बावजूद भारत में बड़ी संख्या में मुसलमान जनसंख्या एवं पाकिस्तान में बड़ी संख्या में हिन्दू जनसंख्या निवास करती रही। इस पुस्तक में कुछ स्थानों पर दूसरे लेखकों के संदर्भ से उल्लिखित तथ्यों में भारत की जनसंख्या का 35 करोड़ और 30 करोड़ उल्लेख हुआ है। यह जनसंख्या उन लेखकों द्वारा ई.1947 से पहले एवं बाद के संदर्भों में बताई गई है।

ई.1951 की जनगणना के बाद पूर्वी-पाकिस्तान की जनसंख्या 4.2 करोड़ एवं पश्चिमी-पाकिस्तान की जनसंख्या 3.4 करोड़ पाई गई। इस प्रकार पाकिस्तान की कुल जनसंख्या 7.5 करोड़ पाई गई। इसमें से 16 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दुओं की थी। अर्थात् भारत विभाजन के बाद भी 1.2 करोड़ हिन्दू पाकिस्तान में रह गए थे।

विभाजन के समय सिंध, खैबर-पख्तून एवं पश्चिमी पंजाब से हिन्दू भारत में आए तथा पूर्वी पंजाब एवं पश्चिमी बंगाल से मुसलमान पाकिस्तान में गए। ब्लूचिस्तान जनसंख्या की अदला-बदली से लगभग अपरिवर्तित रहा। सिंध से लगभग 18 लाख हिन्दू भारत आए तथा उत्तर भारत से लगभग 30 लाख मुसलमान सिंध के विभिन्न नगरों में जाकर बए गए। ई.1947 के विभाजन के बाद पूर्वी-पाकिस्तान एवं पश्चिमी बंगाल के बीच लगभग 50 लाख लोगों की अदला-बदली हुई।

ई.1951 की जनगणना में भारत की कुल जनसंख्या 36 करोड़ 11 लाख पाई गई जिसमें से 30 करोड़ 60 लाख हिन्दू तथा 3 करोड़ 40 लाख मुसलमान थे। शेष ईसाई, सिक्ख, बौद्ध तथा अन्य धर्मों के लोग थे। अर्थात् विभाजन के बाद भी 3.40 करोड़ मुसलमान भारत में रह गए थे जो कि भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 9.8 प्रतिशत थे। इस प्रकार भारत-विभाजन के बाद अखण्ड-भारत के लगभग एक-तिहाई मुसलमान पूर्वी-पाकिस्तान में, एक-तिहाई मुसलमान पश्चिमी-पाकिस्तान में एवं एक-तिहाई मुसलमान विभाजित भारत में रह गए थे।

इस पुस्तक में भारत विभाजन के समय हुए राजनीतिक संघर्ष की एक झलक भर है। इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य इतिहास के उन पन्नों को टटोल कर देखना है ताकि हम भविष्य में उन्हीं गलतियों को फिर से न दोहराएं जिनके कारण हम भारत-पाकिस्तान के विभाजन के खतरनाक निर्णय पर पहुंचे थे। आज भी हमारे सामने अवसर है कि हम शांति की साधना करें तथा अच्छे पड़ौसियों की तरह जिम्मेदारी के साथ रहें।

प्रत्येक भारतीय की पहली और आखिरी इच्छा भारत-पाकिस्तान के बीच शांति की स्थापना करने की ही है किंतु केवल भारत की ओर से की गई शांति की इच्छाएं भारत-पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित नहीं कर सकतीं। इसके लिए पाकिस्तान के राष्ट्रीय चरित्र में भी शांति की लहर उठनी चाहिए। पाकिस्तानी शासकों द्वारा की जा रही नफरतों की खेती के बीच भारत की ओर से जाने वाले शांति के कबूतर लहूलुहान ही किए जाते रहेंगे और शांति केवल एक ढकोसला सिद्ध होगी।

यह पुस्तक पाकिस्तान निर्माण की पूरी कहानी नहीं है। यह भारत-पाकिस्तान विभाजन की दुखःद त्रासदी की पृष्ठभूमि पर लिखी गई एक संक्षिप्त गाथा है जो उस समय के कुछ ऐसे दृश्यों से साक्षात्कार करवाती है जिनकी पृष्ठभूमि में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया। इस पुस्तक को लिखने के लिए मैंने प्रो. एफ. के कपिल (जोधपुर), श्री योगेन्द्रसिंह यादव (अजमेर), श्री नरेश वर्मा (श्रीगंगानगर) एवं अपने पिता श्री गिरिराज प्रसाद गुप्ता से साक्षात्कार के माध्यम से भी अनेक तथ्य जुटाए हैं, मैं इस सबके प्रति आभार व्यक्त करता हूँ।

श्रीमती द्रौपदी यादव (अब स्वर्गीय), श्रीमती कैलाश वर्मा (अब स्वर्गीय) एवं श्रीस्वदेश वर्मा (अब स्वर्गीय) के प्रति भी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ जिन्होंने मुझे विभाजन की त्रासदी के आंखों देखे दृश्यों से परिचित करवाया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत स्वयं महाद्वीप है

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भारत स्वयं महाद्वीप है
भारत स्वयं महाद्वीप है

भारत भारत स्वयं महाद्वीप है औरअनादि काल से हिन्दुओं का देश है। हिन्दू कोई सम्प्रदाय नहीं है, कोई धर्म नहीं है, कोई पंथ नहीं है, अपितु यह जीवन जीने की एक पद्धति है जो मानव सभ्यता के आदिकाल से सहज-स्वाभाविक रूप में विकसित हुई है। इसे किसी ने गढ़ा नहीं है, इसके नियम किसी ने निर्धारित नहीं किए हैं।

ये सहज रूप से आर्य-सभ्यता में प्रचलित हुए। यही कारण है कि हिन्दू संस्कृति मानव मात्र को स्वतंत्र-चिंतन एवं निजी-विश्वास के साथ जीवन जीने की छूट देती है। प्राचीन आर्य ‘हिन्दू’ शब्द से परिचित नहीं थे। पश्चिम से भारत आने वाले यूरोपीय आक्रांताओं ने सिंधु नदी को ‘इण्डस’ कहकर पुकारा। इसी इण्डस के आधार पर भारत को ‘इण्डिया’ तथा भारतीयों को ‘इण्डियन’ कहा गया। ‘सिन्धु’ नदी के किनारे रहने के कारण ही भारत के लोग ‘सिन्धु’ और ‘हिन्दू’ कहलाए।

भारत हजारों साल पुराना देश है जिसका निर्माण प्रकृति या राजनीति की सीमाओं से नहीं अपितु संस्कृति की सीमाओं से हुआ था। भारत स्वयं महाद्वीप है जिसमें सुदूर पूर्व से लेकर पश्चिम में धरती के जिस छोर तक वेदों की ऋचायें गूंजती थीं तथा सुरों अर्थात् देवताओं की पूजा होती थी, वहाँ तक सांस्कृतिक भारत की सीमायें लगती थीं।

भारत की पश्चिमी सीमा के पार रहने वाले लोग असुरों की पूजा करते थे और अहुरमज्दा पढ़ते थे। असुरों के देश को आज ‘असीरिया’ के नाम से जाना जाता है। अर्थात् असीरिया से लेकर आज के भारत के बीच के जो भी देश हैं, वहाँ तक वैदिक संस्कृति का ही प्रसार था और यह पूरा क्षेत्र ‘सांस्कृतिक-भारत’ था।

पौराणिक युग में जहाँ-जहाँ तक रामकथा तथा महाभारत की कथा का प्रसार हुआ, वहाँ-वहाँ भारत से गये राजकुमारों ने अपने-अपने शासन भी स्थापित किये। उन देशों में भारतीय संस्कृति सहज रूप से व्याप्त हो गई। आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा बांगलादेश ही नहीं अपितु तिब्बत, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मलेशिया, जावा, सुमात्रा, बाली, बु्रनेई, थाईलैण्ड, बर्मा, कम्बोडिया, मेडागास्कर आदि देश पूर्ववर्ती काल में भौगोलिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक रूप से भारतवर्ष का ही भाग रहे हैं। यही कारण है कि यदि यह कहा जाए कि भारत स्वयं महाद्वीप है तो इसमें कोई अतिश्योक्त नहीं होगी!

भारत की संस्कृति का प्रभाव यूरोप के बहुत से देशों में था जहाँ आज भी ‘राम’ और ‘वेदव्यास’ के नाम पर नगर मिल जाएंगे। बाली, ट्रिनीडाड और मॉरीशश तो आज भी लघुभारत ही हैं। इण्डोनेशिया, इण्डोचीन, वेस्टइण्डीज आदि देशों के नाम में लगा ‘इण्डो’ शब्द ही बताता है कि किसी समय ये देश ‘हिन्द’ के ही हिस्से थे। हिन्द महासागर अथवा इण्डियन ओसियन की विशालता, भारतीय सांस्कृतिक सीमाओं की विशालता का ही आभास करवाती है।

Kaise-Bana-Tha-Pakistan
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कोलम्बस जब अमरीका की धरती पर उतरा तो उसने भी वहाँ के मूल-निवासियों को ‘रेड-इण्डीज’ कहकर पुकारा क्योंकि उसके अवचेतन मन में भारत की विशालता ही व्याप्त थी। यूरोप का डेन्मार्क वास्तव में ‘धेनुमार्ग’ का अपभ्रंश है, यह आज भी दुग्ध-उत्पादन के लिए विख्यात है। ‘इटली’ ‘स्थली’ का अपभ्रंश है, यूनानी भाषा में इटली का अर्थ ‘चारागाह’ होता है। इटली के इतिहास के अनुसार र्ई.पू. 9वीं शताब्दी में भारतीय आर्य राजा ‘अत्ती’ का पुत्र ‘तिरहेन’ अपने बहुत से साथियों के साथ इटली आकर बस गया था। वे लोग संस्कृत बोलते थे।

आज का वेटिकन सिटी किसी समय की वाटिका है जिसमें किसी वैदिक ऋषि का आश्रम था, इस स्थान से शिवलिंगों की प्राप्ति हुई है जिनमें से एक शिवलिंग आज भी यहाँ के संग्रहालय में प्रदर्शित है। सिकंदर के भारत आक्रमण के समय अर्थात् आज से लगभग 2,350 वर्ष पहले, भारत की सीमायें उत्तर-पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत से प्रारंभ होकर उत्तर-पूर्व में बर्मा के अंतिम छोर तक सीमित हो गई थीं। पश्चिम दिशा में भारत का पड़ौसी पर्शिया अर्थात् फारस हुआ करता था।

उस समय का पर्शिया आज का ईरान है। माना जाता है कि ईरान शब्द का निर्माण ‘इरा’ नामक नदी के ‘रण’ से हुआ है ठीक वैसे ही जैसे आज ‘कच्छ का रण’ भारत के गुजरात में स्थित है। भारत से लेकर असीरिया तक लोहे के ऐसे तीर, तरकश एवं शिलालेख मिले हैं जिन पर ब्राह्मी लिपि में संस्कृत भाषा के शब्द उत्कीर्ण हैं।

अजरबैजान में गणेशजी का अत्यंत प्राचीन मंदिर मिला है जिसमें गणेशजी की प्रतिमा, संस्कृत भाषा के शिलालेख एवं शिवलिंग आदि भी प्राप्त हुए हैं। इस मंदिर में सूर्य की भी पेजा होती थी।

यदि यह कहा जाए कि मानव सभ्यता के आरम्भ में जहाँ-जहाँ तक सभ्यता का प्रसार हुआ, वहाँ-वहाँ तक का विश्व भारत ही था, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। वैदिक ऋषियों ने मानव की प्राचीन सभ्यता को वैदिक संस्कृति प्रदान की तथा जहाँ-जहाँ तक सभ्यता का प्रसार हो गया था, वहाँ-वहाँ तक की धरती वैदिक-यज्ञों के सुवासित-धूम्र से महक उठी थी। हमें स्मरण रखना चाहिए कि वेदों के शुद्ध-अवशेष भारत में नहीं अपितु जर्मनी में पाए गए थे जहाँ से इन्हें पुनः भारत लाकर भारतीयों के लिए उपलब्ध कराया जा सका।

यूरोपीय भाषा परिवार की लगभग सभी भाषाओं में संस्कृत के अपभ्रंश शब्दों की भरमार है। यथा- मैन (मनु), वुमैन (वामा), काऊ (गऊ), बुल (बैल), डाइटी (देवता), डिवाइन (दिव्य), वैन (वाहन), मदर (मातृ), फादर (पितृ), ब्रदर (भ्रात्), सन (सुअन-पुत्र), ग्रास (घास), ट्री (तरु), सिलिकॉन (शिलाकण), एडमिनिस्ट्रेशन (आदिमनुदर्शन), बोट (पोत), चैरिअट (रथ), कॉट (खाट), बैलेन्स (बलांश), डोर (द्वार), वन (ऊन, संस्कृत में ऊन का अर्थ एक होता है), टू (द्वि), थ्री (त्रि), स्वाइन (सूअर), वाइन (वारुणी), वाइड (वृहद्), सैकेण्ड (क्षण), कैमल (कम्मेलक) आदि।

इस प्रकार और भी प्रमाण मिल जाएंगे जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि मध्य-एशिया एवं यूरोप के कई देश अत्यंत प्राचीन काल के ‘सांस्कृतिक-भारत’ ही हैं।

ईसा के जन्म से 563 साल पहले महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ। उन्होंने पूरी दुनिया को शांति का संदेश दिया। पश्चिम में ये संदेश हिन्दुकुश पर्वत के इस पार अर्थात् अफगानिस्तान तक सीमित रहे जबकि उत्तर में भूटान, तिब्बत और चीन, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व में बर्मा, थाईलैण्ड, जावा, सुमात्रा, बाली, बोर्नियो, इण्डोनेशिया, कम्बोडिया, सुमाली, आदि देशों तक गये। दक्षिण में श्रीलंका ने महात्मा बुद्ध के उपदेशों को ग्रहण किया। जहाँ-जहाँ तक महात्मा बुद्ध के संदेश गये, वहाँ- वहाँ तक भारतीय संस्कति का नए सिरे से प्रसार हुआ। इस दृष्टि से भी इन्हें सांस्कृतिक भारत ही माना जाना चाहिये।

एक बार भारत के अंतिम ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड माउण्टबेटन ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा था कि- ‘भारत एक उपमहाद्वीप नहीं, महाद्वीप है। यह एशिया से जुड़ा हुआ होने के कारण उपमहाद्वीप प्रतीत होता है। जब तक इसे महाद्वीप के रूप में नहीं देखा जाएगा तब तक इसकी समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता। भारत महाद्वीप की तुलना यूरोप महाद्वीप से की जा सकती है। लम्बाई-चौड़ाई में बहुत अंतर नहीं। जातियां, भाषाएं, उपभाषाएं, धर्मों की संख्या भी लगभग उतनी ही है। ‘

वर्तमान समय में ईरान से बर्मा तक के क्षेत्र में आठ देश स्थित हैं। इनमें से पहला अफगानिस्तान, दूसरा पाकिस्तान, तीसरा भारत, चौथा भूटान, पांचवा नेपाल, छठा बांगलादेश और सातवां म्यानमार है जबकि आठवां तिब्बत चीन में विलुप्त हो चुका है। श्रीलंका भी किसी समय भारत का हिस्सा था। अशोक के समय से लेकर औरंगजेब के समय तक अफगानिस्तान भी भारत का हिस्सा था किंतु अंग्रेजों के भारतीय राजनीतिक आकाश में ताकतवर बनकर उभरने से काफी पहले वह भारत से अलग हो चुका था।

अफगानिस्तान में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा बनायी हुई गुफायें तथा उनमें उकेरी गयी भगवान बुद्ध की मूर्तियां अभी तक मौजूद थीं जिनमें से कुछ मूर्तियों को मार्च 2001 में तालिबानी आतंकवादियों ने तोपों से गोले बरसाकर बर्बाद कर दिया तथा इन मूर्तियों के वहाँ बनाए जाने के प्रायश्चित स्वरूप 100 गायों का वध किया। तालिबानियों को छोड़ दें तो आम अफगानी आज भी हिन्दी भाषा बोलता है। अफगानियों की हिन्दी, भारत के कई प्रांतों में बोली जाने वाली हिन्दी से अधिक स्पष्ट है।

भारत स्वयं महाद्वीप है इसका एक प्रमाण यह भी है कि भारत की पहचान रहा तक्षशिला अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान की सीमा पर पाकिस्तान में स्थित है। नेपाल, तिब्बत, बर्मा और श्रीलंका हमसे अंग्रेजों के शासन के दौरान अलग हुए किंतु पाकिस्तान और बांगलादेश हमसे ठीक उस दिन अलग हुए जिस दिन अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना था।

पाकिस्तान और बांगलादेश भारत से, दो टुकड़ों वाले एक देश के रूप में अलग हुए थे जिनमें से एक टुकड़े को पश्चिमी-पाकिस्तान कहा जाता था तो दूसरे को पूर्वी पाकिस्तान। बाद में ये दोनों टुकड़े भी आपस में झगड़ कर दो राष्ट्रों के रूप में अलग हुए- ‘पाकिस्तान’ एवं ‘बांग्लादेश’।

भारत से पाकिस्तान के अलग होने का आधार साम्प्रदायिकता था। अतः हमें पाकिस्तान बनने के इतिहास से पहले साम्प्रदायिकता की उस आग के इतिहास को समझना होगा, जिसने पाकिस्तान का निर्माण किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इस्लाम का वैश्विक विस्तार

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इस्लाम का वैश्विक विस्तार

इस्लाम का वैश्विक विस्तार बहुत तेज गति से हुआ। संसार में कोई भी मजहब इतनी तेज गति से नहीं फैला! आज भी इसकी गति मंद नहीं हुई है।

इस्लाम को अपने उद्भव के समय से ही सैनिक तथा राजनीतिक स्वरूप प्राप्त हो गया था जिसके कारण इस्लाम का वैश्विक विस्तार तीव्र गति से कर पाना संभव हुआ। ई.622 में पैगम्बर मुहम्मद मक्का से मदीना गए और वहाँ उन्होंने एक सेना संगठित करके मक्का पर पहली सैन्य-सफलता प्राप्त की।

इसके बाद हजरत मुहम्मद न केवल इस्लाम के प्रधान स्वीकार कर लिए गए वरन् वे राजनीति के भी प्रधान बन गए और उनके निर्णय सर्वमान्य हो गए। इस प्रकार मुहम्मद के जीवन काल में इस्लाम तथा राज्य के अध्यक्ष का पद एक ही व्यक्ति में संयुक्त हो गया।

इस्लाम का राजनीतिक स्वरूप

पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के उपरान्त जब खलीफाओं का उत्कर्ष हुआ, तब भी इस्लाम तथा राजनीति में अटूट सम्बन्ध बना रहा क्योंकि खलीफा भी न केवल इस्लाम के अपितु राज्य के भी प्रधान होते थे। उनके राज्य का शासन कुरान के अनुसार होता था। इससे राज्य में मुल्ला-मौलवियों का प्रभाव बढ़ा। राज्य ने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया जिसके फलस्वरूप अन्य धर्म वालों को इस्लामिक राज्य का नागरिक नहीं समझा गया।

खलीफा उमर ने अपने शासन काल में इस्लाम के अनुयाइयों को सैनिक संगठन में परिवर्तित कर दिया। जहाँ कहीं खलीफा की सेनाएं गईं, वहाँ पर इस्लाम का प्रचार किया गया। यह प्रचार शान्ति-पूर्वक सन्तों द्वारा नहीं वरन् राजनीतिज्ञों और सैनिकों द्वारा तलवार के बल पर किया गया। परिणाम यह हुआ कि वहाँ की धरा रक्त-रंजित हो गई।

जेहाद

यदि यह कहा जाए के जेहाद इस्लाम का वैश्विक विस्तार करने के लिए सबसे सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस्लामी सेनापति अपने शत्रु पर युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए ‘जेहाद’ अर्थात् धर्म-युद्ध का नारा लगाते थे। इस्लाम का एक निर्देश इस्लाम की खातिर पवित्र युद्ध (जिहाद) से सम्बन्ध रखता है। कुरान में इस निर्देश को सूत्रबद्ध किया गया है- ‘वर्ष में आठ माह बहुदेववादियों और विधर्मियों से लड़ना, उनका संहार करना और उनकी जमीन-जायदाद को छीन लेना चाहिए।’

बाद में मुस्लिम उलेमाओं ने जिहाद से सम्बन्धित निर्देशों की अलग-अलग ढंग से व्याख्या की। बहुदेवपूजकों के बारे में कुरान का रवैया बहुत सख्त है। उसमें कहा गया है- ‘हे ईमानवालो! अपने आस-पास के काफिरों से लड़े जाओ और चाहिए कि वह तुमसे अपनी बाबत सख्ती महसूस करें, और जानें कि अल्लाह उन लोगों का साथी है जो अल्लाह से डरते हैं।’

यद्यपि कुरान ‘किताबवालों’ अर्थात् यहूदियों और ईसाईयों के प्रति थोड़ी उदार है। फिर भी कुरान में उन ‘किताबवालों’ के साथ लड़ने का आदेश है कि यदि वे अल्लाह को नहीं मानते और इस्लाम के आगे नहीं झुकते। क्लेन नामक विद्वान ने जिहाद का अर्थ ‘संघर्ष’ किया है और इस संघर्ष के उसने तीन क्षेत्र माने हैं- (1) दृश्य शत्रु के विरुद्ध संघर्ष (2) अदृश्य शत्रु के विरुद्ध संघर्ष और (3) इन्द्रियों के विरुद्ध संघर्ष।

‘रिलीजन ऑफ इस्लाम’ के लेखक मुहम्मद अली का मत है कि-

‘इस शब्द का अर्थ इस्लाम के प्रचार के लिए युद्ध करना नहीं है, इसका अर्थ परिश्रम, उद्योग या सामान्य संघर्ष ही है। हदीस में हज करना भी जिहाद माना गया है किंतु व्यवहार में, आगे चलकर काजियों ने जिहाद का अर्थ युद्ध कर दिया उन्होंने समस्त विश्व को दो भागों में बांट दिया-

(1) दारूल-इस्लाम: अर्थात् शांति का देश जिस पर मुसलमानों की हुकूमत थी,

(2) दारूल-हरब: युद्ध स्थल, जिस भाग पर गैर-मुसलमानों की हुकूमत थी। काजियों ने मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को उत्तेजित किया कि ऐसे देशों को जीत कर इस्लाम का झण्डा गाड़ना जाहिदों का परम कर्त्तव्य है।’

इन भावनाओं के कारण जेहाद प्रायः भयंकर रूप धारण कर लेता था जिससे दानवता ताण्डव करने लगती थी और मजहब के नाम पर घनघोर अमानवीय कार्य किए जाते थे। शताब्दियाँ व्यतीत हो जाने पर भी इस्लाम की कट्टरता का स्वरूप अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। इस कारण इस्लाम जिस भी देश में गया, उस देश के समक्ष साम्प्रदायिकता की समस्या की नई चुनौतियां खड़ी हो गईं।

इस्लाम का वैश्विक विस्तार – इस्लामी राज्य

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हज़रत मुहम्मद के जीवन काल में अरब के अधिकांश भू-भाग पर इस्लाम का वर्चस्व हो गया। उनकी मृत्यु के बाद खलीफाओं के नेतृत्व में भी इस्लामी राज्य का तेजी से प्रसार हुआ। अरबवासियों ने संगठित होकर इस्लाम के प्रसार के साथ-साथ राजनीतिक विजय का अभियान शुरू किया। शीघ्र ही उन्होंने भूमध्यसागरीय देशों- सीरिया, फिलीस्तीन, दमिश्क, साइप्रस, क्रीट, मिस्र आदि देशों पर अधिकार कर लिया। इसके बाद फारस को इस्लाम की अधीनता में लाया गया। फिर उत्तरी अफ्रीका के नव-मुस्लिमों और अरबों ने स्पेन में प्रवेश किया। स्पेन तथा पुर्तगाल जीतने के बाद इस्लामी सेनाओं ने फ्रांस में प्रवेश किया परन्तु ई.732 में फ्रांसिसियों ने चार्ल्स मार्टेल के नेतृत्व में ‘तुर्स के युद्ध’ में इस्लामी सेना को परास्त कर उसे पुनः स्पेन में धकेल दिया जहाँ ई.1492 तक उनका शासन रहा। इसके बाद उन्हें स्पेन से भी हटाना पड़ा। अरबों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया पर भीषण आक्रमण किए। 15वीं सदी में ओटोमन तुर्कों ने कुस्तुन्तुनिया को जीतकर इस कार्य को पूरा किया। उधर फारस को जीतने के बाद अरबों ने बुखारा और समरकन्द पर अधिकार किया। मध्य एशिया पर उन्होंने पूर्ण प्रभुत्व स्थापित किया। इसके बाद ई.712 में उन्होंने भारत के सिन्ध प्रदेश पर अधिकार किया।

ई.750 में उन्होंने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। इस समय तक अरबवासियों का इस्लामी राज्य स्पेन से उत्तरी अफ्रीका होते हुए भारत में सिन्ध और चीन की सीमा तक स्थापित हो चुका था। इस्लाम का वैश्विक विस्तार उसी दौर में वे भारत में वे सिंध तथा रेकगस्तानी इलाकों तक चढ़ आए। कहा जा सकता है कि अपने जन्म के दो सौ साल के भीतर ही इस्लाम का वैश्विक प्रसार प्रचुर मात्रा में हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इस्लामिक विश्वव्यापी प्रसार के कारण

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Indonesian Muslims perform Eid Al-Adha prayer at Al-Akbar Mosque in Oct. 2014 in Surabaya, Indonesia

अरब के एक छोटे नगर में उत्पन्न इस्लाम विश्व की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक बन गया। तीव्र इस्लामिक विश्वव्यापी प्रसार के कई कारण थे-

(1) इस्लाम की कट्टरता ने तीव्र इस्लामिक विश्वव्यापी प्रसार में सहायता की। हजरत मुहम्मद ने मदीना पहुँचकर अपने अनुयाइयों को सैनिकों के रूप में संगठित किया तथा उन्हें आदेश दिया कि कुरान में अविश्वास रखने वाले को बलात् मुसलमान बना लिया जाए और यदि वे इस्लाम को स्वीकार न करें तो उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाए। पैगम्बर के आदेश का पालन किया गया तथा सबसे पहला आक्रमण मक्का पर किया गया। मक्का विजय के बाद हर जगह यही उदाहरण दोहराया गया।

रामधारीसिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है– ‘जहाँ-जहाँ इस्लाम के उपासक गए, उन्होंने विरोधी सम्प्रदाय के सामने तीन रास्ते रखे- या तो कुरान हाथ में लो और इस्लाम कबूल करो या जजिया दो और अधीनता स्वीकार करो। यदि दोनों में से कोई बात पसन्द न हो तो तुम्हारे गले पर गिरने के लिए हमारी तलवार प्रस्तुत है। ये बड़े ही कारगर उपाय रहे होंगे किन्तु यह समझ में नहीं आता कि सिर्फ इन्हीं उपायों से इस्लाम इतनी जल्दी कैसे फैल गया?’ इस्लाम के लिए युद्ध करने वाले मुसलमानों को कुरान का आश्वासन था कि उनके पाप क्षमा कर दिए जाएंगे और उन्हें स्वर्ग में खूब आनन्द मिलेगा।

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(2) अरब की तत्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति इस्लामिक विश्वव्यापी प्रसार का बड़ा कारण थी। उस समय सारा अरब अन्धविश्वास, सामाजिक कुरीतियों और दुराचार का केन्द्र बना हुआ था। अरबों में निर्धनता व्याप्त थी जिसके कारण उनमें लालच भी बहुत अधिक था और धन प्राप्त करने का हर उपाय अच्छा समझा जाता था। जुआ, शराबखोरी, और वेश्यागमन भंयकर रूप से प्रचलित थे। विवाह जैसी पवित्र संस्था का महत्त्व भी जाता रहा और समाज में यौन-सम्बन्धों की कोई नैतिक व्यवस्था नहीं रह गयी थी। अरब लोग बहुदेववादी और मूर्तिपूजक थे। ऐसी स्थिति में हजरत मुहम्मद द्वारा चलाया गया- अन्धविश्वासों से रहित, आडम्बरहीन, सरल, बोधगम्य तथा एक निराकार अल्लाह की उपासना वाला इस्लाम शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया।

(3) इस्लाम में सामाजिक एवं धार्मिक समानता की विचारधारा भी इस्लाम की सफलता का बड़ा कारण था। इस्लाम में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है तथा प्रत्येक व्यक्ति के सामाजिक एवं धार्मिक अधिकार एक समान हैं। समस्त मुसलमानों को एक अल्लाह का बन्दा समझा गया है। इसलिए इस्लाम के अनुयाई परस्पर बन्धु हैं तथा उनमें ऊँच-नीच की भावना नहीं है। इस समानता के सिद्धान्त के कारण इस्लाम की लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी। जिस भी समाज में निम्न स्तर के लोग उच्च स्तर के लोगों के धार्मिक या सामाजिक अत्याचार से पीड़ित थे, उन्होंने समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए इस्लाम स्वीकार कर लिया। इस कारण इस्लाम का प्रसार तेजी से हुआ।

(4) जिस समय इस्लाम के अनुयाई इस्लाम के प्रसार में लगे हुए थे, उस समय रोमन साम्राज्य खोखला हो चुका था और वहाँ विलासिता चरम पर थी। ईरानी साम्राज्य भी विलासिता के दलदल में डूबा हुआ था। राज्य के अधिकारी और धर्माधिकारी जनता का भयानक शोषण करते थे। इन शोषित राज्यों की जनता ने इस्लामी सेनाओं को अपनी मुक्तिदाता समझा।

इतिहासकार मानवेन्द्र राय ने लिखा है- ‘अरब आक्रमणकारी जहाँ भी गए, जनता ने उन्हें अपना रक्षक और मुक्तिदाता मानकर उनका स्वागत किया क्योंकि कहीं तो जनता लोभी शासकों के भ्रष्टाचार के नीचे पिस रही थी तो कहीं ईरानी तानाशाहों के जुल्मों से त्रस्त थी और कहीं ईसाइयत का अन्धविश्वास उन्हें जकड़े हुए था।’

(5) अरबों की तात्कालिक आर्थिक स्थिति ने भी इस्लामिक विश्वव्यापी प्रसार में योगदान दिया। छठी शताब्दी में अरब में कारवाँ व्यापार का ह्रास हो रहा था जिससे आर्थिक सन्तुलन भंग हो गया। कारवाँओं से होने वाली आमदनी बन्द हो जाने पर खानाबदोश अरब, खेती करने लगे। इससे जमीन की माँग बढ़ रही थी और पड़ौसी राज्यों की उपजाऊ भूमि को हस्तगत करना सबसे आसान तरीका था।

जिस क्षेत्र को भी वे हस्तगत करते थे, वहाँ के लोगों से कर वसूल करते थे। लाखों गैर-मुसलमानों ने इस्लाम को इसलिए स्वीकार कर लिया ताकि उन्हें कर नहीं चुकाना पड़े। इस्लाम स्वीकार करके वे इस्लामी राज्य में नौकरियाँ प्राप्त करने के पात्र बन जाते थे। यदि वे दास अथवा अर्द्धदास होते तो धर्म-परिवर्तन से दासता से मुक्त कर दिए जाते थे। इस प्रकार विजित क्षेत्रों की निर्धन जनता ने इस्लाम सहर्ष स्वीकार कर लिया।

(6) इस्लाम के प्रारम्भिक नेताओं के व्यक्तित्त्व तथा आदर्श-पूर्ण जीवन ने इस्लाम की लोकप्रियता में बड़ा योगदान दिया। अबूबक्र, उमर उस्मान और अली, तीनों ही नबी के चुने हुए साथी थे और उन्होंने भी हजरत मुहम्मद की ही तरह अभाव और दरिद्रता में जीवन व्यतीत किया था। उनके न तो महल या अंगरक्षक थे और न समसामयिक बादशाहों जैसे ठाट-बाट थे। प्रत्येक मुसलमान सीधे ही उन तक पहुँच सकता था। उन्होंने सादगी, सच्चरित्रता, वीरता और वैराग्य का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया इन कारणों से इस्लाम का शीघ्र प्रसार सम्भव हो सका।

(7) प्रत्येक मुसलमान वैधानिक रूप से चार पत्नियाँ रख सकता है। इस बहु-विवाह का परिणाम यह निकला कि मुसलमान जहाँ भी गए, उन्होंने गैर-मुस्लिम-स्त्रियों से विवाह कर लिए। भारत में आकर भी मुसलमानों ने हिन्दू स्त्रियों से विवाह किए। हिन्दू स्त्रियों से मुस्लिम बच्चे पैदा हुए जिनके कारण देश में इस्लाम का तेजी से प्रसार हुआ। हिन्दू स्त्रियों से उत्पन्न मुसलमान, भारत में इस्लाम के प्रसार के लिए अधिक तत्पर सिद्ध हुए।

(8) भारत में तुर्कों के आने के समय यहाँ की राजनीतिक दशा अत्यन्त शोचनीय थी। देश में केन्द्रीय सत्ता एवं राजनीतिक एकता का अभाव था। छोटे-बड़े राज्यों के राजा आपसी संघर्ष में अपनी शक्ति क्षीण कर रहे थे। इस समय हिन्दू समाज भी पतनोन्मुख था और उसे उत्साह से भरी हुई इस्लामिक सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। सामान्य जनता में राजवंशों के उत्थान एवं पतन के प्रति विशेष रुचि नहीं थी।

हिन्दू समाज की जाति-व्यवस्था ने जनसामान्य को विभक्त कर रखा था। निम्न कही जाने वाली जातियों का जीवन बहुत दयनीय था। निम्न जाति के अधिकांश लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। इसके विपरीत इस्लाम ने मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधा तथा भारतीय शासकों के विरुद्ध लड़े जाने वाले युद्धों को जिहाद का जामा पहना दिया। मुस्लिम सुल्तानों ने कुरान के आधार पर शासन किया और इस्लाम का प्रसार किया।

के. एस. लाल ने लिखा है- ‘भारत में सुल्तानों ने अपनी धार्मिक नीति से हिन्दुओं की संख्या एक-तिहाई कर दी।’ सुल्तानों ने इस्लाम के प्रचारकों को हर प्रकार से सहयोग दिया।

इस्लाम का भारत प्रवेश और प्रसार

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इस्लाम का भारत प्रवेश सातवीं शताब्दी में ही हो गया था। मुस्लिम अरब व्यापारियों ने ईसा की सातवीं शताब्दी में ही भारत के दक्षिण-पश्चिमी समुद्र तटीय राज्यों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए थे। कुछ अरब व्यापारी दक्षिण भारत के मलाबार तथा अन्य स्थानों पर स्थायी रूप से बस भी गए थे। दक्षिण भारत में अरब व्यापारियों ने व्यापार करने के साथ-साथ इस्लाम का प्रचार भी किया। इसी के साथ इस्लाम का भारत प्रवेश हो गया।

इस कारण दक्षिण भारत के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। आठवीं सदी के आरम्भ में अरबों ने सिन्ध को जीत लिया किंतु इस जीत से इस्लाम सिन्ध में अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर सका। क्योंकि दो सौ वर्षों से कम समय में इस्लाम के अरबों का धार्मिक उत्साह शिथिल पड़ गया तथा इस्लाम का नेतृत्व पहले, ईरानियों और उसके बाद तुर्कों के पास चला गया।

इस्लाम के प्रचार के लिए तुर्क कई शाखाओं में बँट गए। समानी वंश के तुर्कों ने पूर्व की ओर बढ़कर ई.874 से 999 के बीच खुरासान, आक्सस नदी पार के देश तथा अफगानिस्तान के विशाल भू-भाग पर अधिकार कर लिया। दसवीं शताब्दी ईस्वी में समानी वंश के शासक ‘अहमद’ का गुलाम ‘अलप्तगीन’ गजनी का स्वतंत्र शासक बना। उसका वंश ‘गजनवी वंश’ कहलाया।

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ई.977 में अलप्तगीन के गुलाम एवं दामाद सुबुक्तगीन ने गजनी राज्य की सीमाओं को हिन्दूशाही राज्य ‘लमगान’ तक पहुँचा दिया। ई.986 में उसने पंजाब के हिन्दूशाही राज्य लमगान पर आक्रमण किया तथा लमगान तक का प्रदेश जीत लिया। ई.997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु होने पर उसका पुत्र महमूद गजनी का शासक बना। गजनी का शासक होने के कारण वह महमूद गजनवी कहलाया।

महमूद गजनवी ने ई.1000 से 1026 के मध्य, भारत पर 17 आक्रमण किए। महमूद के आक्रमणों का उद्देश्य भारत में स्थायी शासन स्थापित करना नहीं था, अपितु धन-सम्पदा की लूट, मन्दिरों और मूर्तियों को भूमिसात् करना तथा भारत में इस्लाम के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करना था। उसके मुस्लिम प्रांतपति अफगानिस्तान से लेकर पंजाब के बीच कुछ क्षेत्रों पर शासन करने लगे। 12वीं शताब्दी ईस्वी में मुहम्मद गौरी ने अजमेर एवं दिल्ली के चौहान शासकों को परास्त कर भारत में मुस्लिम साम्राज्य की नींव रखी। उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का पहला स्वतंत्र मुस्लिम सुल्तान बना। इसके साथ ही भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या गहरी हो गई।

हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या

यद्यपि कुरान तथा हदीस में इस्लामिक एवं गैर-इस्लामिक भूमियों की संकल्पना मौजूद नहीं है तथापि इस्लामी चिंतकों ने पूरे विश्व को दो हिस्सों- ‘दारुल इस्लाम’ (इस्लाम का घर) तथा ‘दारुल हरब’ (युद्ध का घर) में बांटा है। दारुल इस्लाम वह भूमि है जहाँ शरीयत का कानून चलता है जबकि दारुल हरब वह भूमि है जहाँ शरीयत के अनुसार शासन नहीं चलता। इसे ‘दारुल कुफ्र’ भी कहते हैं। दारुल हरब को पुनः तीन भागों में विभक्त किया गया है-

(1) दारुल अहद- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों का बहुमत है।

(2) दारुल सुलह- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों ने मुसलमानों से शांति का समझौता कर रखा है।

(3) दारुल दावा- (Proselytizing or preaching of Islam) अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जिसके लोगों को इस्लाम की शिक्षा देकर उनका धर्मांतरण किया जाना है।

इस्लाम के प्रसार के इस चिंतन से प्रभावित मुसलमान पूरे विश्व को दारुल इस्लाम में बदलना चाहते थे। इसलिए जहाँ भी मुस्लिम सेनाएं गईं, उन्होंने बुतपरस्तों (मूर्ति-पूजकों) को काफिर (नास्तिक) कहकर उनकी हत्याएं कीं अथवा उन्हें गुलाम बनाया। उन्होंने लोगों के सामने दो ही विकल्प छोड़े या तो मुसलमान बन जाओ या मर जाओ।

एक तीसरा किंतु संकरा रास्ता और भी था जिसके अंतर्गत काफिरों को जिम्मी अर्थात् ‘रक्षित-विधर्मी’ घोषित किया जाता था जो जजिया देकर मुसलमानों के राज्य में जिंदा रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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