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तुलसीदासजी की लोकप्रियता से पीछे रह गया अकबर! (185)

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तुलसीदासजी की लोकप्रियता

अकबर अपने समय में सर्वाधिक लोकप्रिय बादशाह था। उसकी ख्याति पूरे भारत में तो थी ही, भारत से बाहर मध्यएशियाई देशों में भी थी। फिर भी तुलसीदासजी की लोकप्रियता से पीछे रह गया था अकबर!

आज अकबर की मृत्यु हुए 417 वर्ष बीत चुके हैं। भारत में शायद ही कोई ऐसा शिक्षित व्यक्ति हो जिसने अकबर का नाम न सुन रखा हो! अकबर के सम्बन्ध में भारत के लोगों में अलग-अलग राय है। कुछ लोग अकबर को महान् मानते हैं तो कुछ लोग उसे क्रूर एवं अत्चारी मानते हैं। कुछ लोग उसे इस्लाम का प्रचार करने वाला मानते हैं तो कुछ लोग उसे इस्लाम को क्षति पहुंचाने वाला मानते हैं।

कुछ लोग अकबर को हिन्दुओं का मित्र मानते हैं तो कुछ लोग उसे हिन्दू धर्म को को नष्ट करने का षड़यंत्र रचने वाला मानते हैं। अकबर के समर्थकों का मत है कि अकबर हिन्दू धर्म और इस्लाम दोनों से ऊपर उठकर एक मानव धर्म की रचना करना चाहता था, वह सभी धर्मों एवं मजहबों के प्रति उदार था किंतु वह लोगों की मजहबी कट्टरता के खिलाफ था।

हिन्दू इतिहासकारों की अकबर के विरुद्ध सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उसने हिन्दू राजाओं को अपने अधीन करके तथा हिन्दू राजकुमारियों से विवाह करके हिंदुओं के गौरव पर चोट की तथा हिंदू धर्म एवं हिन्दू अस्मिता को नुक्सान पहुंचाया। भारत में अक्सर लोग यह कहते हुए मिल जाते हैं कि यदि अकबर जैसे दो-चार शासक और हो गये होते तो हिन्दू धर्म बड़ी कठिनाई में पड़ जाता। इसके विपरीत, मुस्लिम इतिहासकार मानते हैं कि अकबर ने इस्लाम के सिद्धांतों को छोड़कर तथा दीने-इलाही चलाकर भारत में इस्लाम का बहुत नुक्सान किया। अकबर के समकालीन मुल्ला-मौलवी तो अकबर को इस्लाम का शत्रु ही मानते थे।

इतिहास की बहुत सारी पुस्तकों में अकबर की गणना भारत के महान् शासकों में की जाती है। उसके व्यक्तित्व के सम्बन्ध में विद्वानों ने इतना अधिक लिख दिया है कि वास्तविकता का पता लगाना कठिन हो गया है। अबुल फजल जैसे प्रशंसकों ने उसके व्यक्तित्व को अत्यन्त अतिरंजित करके उसे एक आदर्श शासक बताया है परन्तु बदायूंनी ने उसे इस्लाम का शत्रु घोषित करके उसके व्यक्तित्व को हेय सिद्ध करने का प्रयास किया है।

उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन करने पर अनुमान होता है कि अकबर का व्यक्तित्व अपने युग के मुस्लिम बादशाहों से कहीं अधिक श्रेष्ठ था। उसमें ऐसे अनेक गुणों का समावेश था जिनके बल पर वह अपने राज्य का अभूतपूर्व विस्तार कर सका, उसे स्थायित्व दे पाया तथा अपने वंशजों के लिये मार्गदर्शक सिद्धांतों का निर्माण करने में सफल रहा किंतु उसकी सफलताओं एवं उपलब्धियों के समस्त परिणाम केवल उसके राज्य-विस्तार पर आकर केन्द्रित हो जाते हैं।

अकबर के समकालीन एक जेजुइट पादरी ने अकबर के बारे में लिखा है- ‘वह हर समय व्यस्त रहता था। अभी वह राजकीय मामलों में मशगूल है या अपनी प्रजा के लोगों को मुजरे दे रहा है तो दूसरे ही क्षण वह ऊँटों के बाल कतरता हुआ या पत्थर फोड़ता हुआ या लकड़ी काटता हुआ या लोहा कूटता हुआ नजर आता है। इन सब कामों को वह इतनी होशियारी से करता है मानो खुद अपने ही खास पेशे को कर रहा हो।’

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पं. जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा प्रियदर्शिनी को लिखे पत्रों में लिखा है- ‘वह जमाना यूरोप में नीदरलैण्ड के विद्रोह का और इंग्लैण्ड में शेक्सपीयर का था। अकबर का नाम भारत के इतिहास में जगमगा रहा है और कभी-कभी कुछ बातों में वह हमें अशोक की याद दिलाता है। यह एक अजीब बात है कि ईसा से तीन सौ साल पहले का एक बौद्ध सम्राट और ईसा के बाद सोलहवीं सदी का एक मुसलमान बादशाह, दोनों एक ही ढंग से और करीब-करीब एक ही आवाज में बोल रहे हैं। ताज्जुब नहीं कि यह खुद भारत की ही आवाज हो जो उसके दो महान् पुत्रों के जरिये बोल रही हो। अशोक के बारे में हम केवल उतना ही जानते हैं जितना उसने खुद पत्थरों पर तराशा हुआ छोड़ा है किंतु अकबर के बारे में हम बहुत-कुछ जानते हैं। उसके दरबार के दो समकालीन इतिहासकारों के लम्बे विवरण मिलते हैं। जो विदेशी उससे मिलने आए थे- खासकर जेजुुइट लोग, जिन्होंने उसे ईसाई बनाने की जोरदार कोशिश की थी, उन्होंने भी लम्बे-चौड़े बयान लिखे हैं।’

जवाहरलाल नेहरू ने अकबर के व्यक्तित्व का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए लिखा है- ‘संयोग से अकबर एक बुद्धिमान स्वेच्छाचारी था और वह भारत के लोगों की भलाई के लिए जी-तोड़ कोशिश करता रहता था। एक तरह से वह भारतीय राष्ट्रीयता का जन्मदाता माना जा सकता है। हालांकि वह एक शक्तिशाली और निरंकुश शासक था किंतु वह हाथ से काम करने को अपनी शान के खिलाफ नहीं समझता था जैसा कि आजकल के कुछ लोग खयाल करते हैं।’

अकबर के समकालीन पादरी मनसर्रट ने लिखा है- ‘अकबर बहुत कृपण था और धन को बचाए रखने वाला था।’

अकबर के दरबार में उपस्थित ईसाई पादरी जेवियर ने लिखा है- ‘अकबर अपने चरणों की धोवन जन-सामान्य को पीने के लिए देता था। जेवियर के हवाले से स्मिथ ने लिखा है कि अकबर अपने आप को पैगम्बर की तरह घोषित करता था। जनता को मानना होता था कि अकबर के पैरों की धोवन पीने से जनता के रोग ठीक हो जाते हैं।’

बदायूंनी लिखता है- ‘इस तरह का अपमानजनक व्यवहार केवल हिंदुओं के लिए ही सुरक्षित था। यदि हिंदुओं के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति अकबर के प्रति इस तरह की भक्ति प्रदर्शित करने की इच्छा प्रकट करता तो अकबर उसे झिड़क देता था।’

पुरुषोत्तम नागेश ओक ने लिखा है- ‘औरतें यातनाग्रस्त होकर अंतिम उपाय के रूप में अपने बच्चों को अकबर के चरणों में लेटा देती थीं और दया की भीख मांगती थीं। अकबर के दरबारी, ईसाई पादरियों को समझाया करते थे कि ये औरतें अकबर को पहुंचा हुआ फकीर मानती हैं, वे अपने बच्चों को आशीर्वाद दिलाने के लिए उन्हें बादशाह के चरणों में डालती हैं।’

विन्सेट स्मिथ ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘वह मनुष्य का जन्मजात शासक था और इतिहास में परिज्ञात सर्वशक्तिशाली शासकों में स्थान पाने का वस्तुतः अधिकारी है। यह अधिकार निःसंदेह उसके अलौकिक एवं प्राकृतिक गुणों, उसके मौलिक विचारों तथा उसकी शानदार सफलताओं पर आधारित है।’

के. टी. शाह ने अकबर के बारे में लिखा है- ‘मुगलों में अकबर सबसे महान् था और यदि मौर्यों के काल से नहीं तो कम से कम एक सहस्र वर्षों में वह सबसे बड़ा भारतीय शासक था।’

लेनपूल ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘वह भारत का भद्रतम शासक था…..वह साम्राज्य का सच्चा संस्थापक तथा संगठनकर्ता था…..वह मुगल साम्राज्य के स्वर्ण-युग का प्रतिनिधित्व करता है।’

एडवर्ड्स तथा गैरेट ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘अकबर ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यता को सिद्ध कर दिया है। वह एक निर्भीक सैनिक, एक महान् सेनानायक, एक बुद्धिमान प्रबन्धक, एक उदार शासक और चरित्र का सही मूल्यांकन करने वाला था। वह मनुष्यों का जन्मजात नेता था और इतिहास का सर्वशक्तिमान् शासक कहलाने का वास्तविक अधिकारी है।’

यूरोपीय इतिहासकार हेग ने लिखा है- ‘वास्तव में वह एक महान् शासक था क्योंकि वह जानता था कि अच्छा शासक वही है जिसका उसकी प्रजा आज्ञा-पालन के साथ-साथ आदर-सम्मान और प्यार करती हो न कि भयभीत रहती हो। वह ऐसा शहजादा था जिसे समस्त लोग प्यार करते थे, जो महान् व्यक्तियों के साथ दृढ़, निम्न-स्थिति के लोगों के प्रति उदार और जो छोटे-बड़े परिचित-अपरिचित समस्त लोगों के साथ न्याय करता था।’

पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने विश्व इतिहास की झलक में अकबर की प्रसिद्धि का विश्लेषण करते हुए लिखा है- ‘अकबर के शासनकाल में उत्तर भारत में और अधिकतर काशी में एक व्यक्ति हुआ जिसका नाम संयुक्त प्रांत अर्थात् आज के उत्तर प्रदेश में हरेक देहाती की जबान पर है। वहाँ वह इतना मशहूर है और इतना लोकप्रिय है, जितना अकबर या दूसरा कोई बादशाह नहीं हो सकता।’

नेहरू लिखते हैं कि ‘मेरा मतलब तुलसीदास से है जिन्होंने हिन्दी में रामचरित मानस या रामायण लिखी।’ इस प्रकार हम कह सकते हैं कि तुलसीदासजी की लोकप्रियता से पीछे रह गया अकबर!

यदि हम नेहरू के इस कथन पर निष्पक्ष होकर विचार करें तो हम पाएंगे कि यद्यपि जवाहरलाल नेहरू द्वारा अकबर की प्रसिद्धि के सम्बन्ध में किया गया यह विलेषण अंतिम सत्य नहीं है तथापि यह कथन इस ओर मजबूत संकेत करता है कि अकबर अपने काल का एकमात्र प्रसिद्धतम व्यक्ति नहीं था, कुछ लोग थे जो अकबर से भी अधिक लोकप्रिय थे जिनमें गोस्वामी तुलसीदास और उस काल के अनेक वैष्णव संतों के नाम लिए जा सकते हैं। जैसे कि भगवान वल्लभाचार्य एवं अकबर का स्वयं का मुख्य सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीम। सूरदास तथा मीरांबाई भी लोकप्रियता के मामले में अकबर से बहुत आगे बैठते हैं।

भारत की जनता तब भी संतों से ऊर्जा प्राप्त कर रही थी और आज भी उन संतों की वाणी भारतीय समाज को ऊर्जा एवं प्रेरणा दे रही है। भारतीयों के लिए कोई धनी व्यक्ति अथवा कोई राजा तब तक आदरणीय नहीं हुआ जब तक कि उसमें संतों की तरह निष्छलता और लोकोपकार की भावना के दर्शन न हुए हों! यही कारण है कि तुलसीदासजी की लोकप्रियता अकबर की अपेक्षा बहुत बढ़ी-चढ़ी थी।

तुलसीदासजी की तुलना में अकबर का व्यक्तित्व बहुत छोटा सिद्ध होता है। अकबर औरतों और सल्तनत का लालची था न कि जनता का निश्छल सेवक या कि दिव्य गुणों से सम्पन्न अद्भुत संत! अकबर केवल बादशाह था जबकि तुलसीदासजी न केवल अपने युग के लोकनायक थे अपितु आज भी उन्होंने अपना वह स्थान बनाए रखा है।

संत तुलसीदास पर अन्य लेख-

तुलसीदास

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संत तुलसीदास का साहित्य

कैसे बना था पाकिस्तान – अनुक्रमणिका

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कैसे बना था पाकिस्तान

इस अध्याय में पाकिस्तान के निर्माण पर लिखी गई सुप्रसिद्ध पुस्तक कैसे बना था पाकिस्तान की अनुक्रमणिका लिखी गई है। पाकिस्तान निर्माण के समय मुस्लिम लीग एवं उसके नेताओं की गतिविधियों के बारे में जानना तो रोचक है ही, साथ ही ब्रिटिश सत्ता के अधिकारियों के षड़यंत्र एवं जोधपुर, अलवर तथा बीकानेर आदि हिन्दू रियासतों की पाकिस्तान निर्माण के समय की गतिविधियों को जााना कम रोचक नहीं है।

1. कैसे बना था पाकिस्तान – अनुक्रमणिका

2. कैसे बना था पाकिस्तान – प्राक्कथन

3. भारत स्वयं में एक महाद्वीप है!

4. इस्लाम का वैश्विक विस्तार

5. इस्लाम के विश्वव्यापी प्रसार के कारण

6. ईस्लाम का भारत में प्रवेश और प्रसार

7. सूफियों के प्रेम-तराने भी पाकिस्तान की जड़ों को पनपने से नहीं रोक सके

8. ब्रिटिश.भारत में साम्प्रदायिक राजनीति

9. ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण (1)

10. ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण (2)

11. ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण (3)

12. गॉड सेव द क्वीन बनाम वन्दे मातरम्

13. ब्रिटिश नौकरशाही के गर्भ से कांग्रेस का जन्म

14. अंग्रेजों द्वारा कांग्रेस की स्थापना के घोषित उद्देश्य एवं कारण

15. अंग्रेजों द्वारा स्थापित कांग्रेस का प्रारम्भिक स्वरूप एवं प्रभाव

16. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में नरमपंथी कांग्रेस की भूमिका

17. ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा कांग्रेस का विरोध

18. उग्र हिन्दुत्ववादी नेताओं ने कांग्रेस को अंग्रेजों की छाया से बाहर निकाला

19. बंग-भंग से देश में उग्र हिन्दुत्व की लहर

20. उग्र राष्ट्रवादी कांग्रेसी नेताओं द्वारा द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थन

21. ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा

22. ब्रिटिश नौकरशाही के गर्भ से मुस्लिम लीग का जन्म

23. मार्ले.मिण्टो सुधार एक्ट से भारत में साम्प्रदायिकता में वृद्धि

24. मुसलमानों में गांधाजी के विरुद्ध संदेह

25. स्वतंत्रता संगा्रम से पहले भारत में साम्प्रदायिक हिंसा : 1921-1931

26. देश में उग्र हिन्दुत्व की लहर

27. जिन्ना को प्रेमपत्र लिखा करती थीं सरोनी नायडू!

28. गांधी और नेहरू को सार्वजनिक मंचों से अपमानित करता था जिन्ना!

29. विभाजित भारत का पहला नक्शा मुहम्मद इकबाल ने बनाया

30. साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (1)

31. साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (2)

32. साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (3)

33. साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (4)

34. रहमत अली ने किया पाकिस्तान शब्द का आविष्कार

35. मुहम्मद अली जिन्ना का भारत की राजनीति में पुनः आगमन

36. जवाहरलाल नेहरू का पाकिस्तान के विचार पर हमला

37. जिन्ना का कांग्रेस पर हमला

38. जिन्ना द्वारा मुक्ति दिवस का आह्वान

39. मुस्लिम लीग का पाकिस्तान प्रस्ताव

40. मुस्लिम लीग की दुष्टता का लिनलिथगो ने फायदा उठाया

41. क्रिप्स मिशन की भारत-संघ योजना

42. क्रिप्स मिशन की असफलता

43. हम दिल्ली की सड़कों पर सुभाष का स्वागत तलवारों से करेंगे!

44. भारतीय संघ के निर्माण हेतु कुछ और योजनाएं

45. कांग्रेस और मुस्लिम लीग में अस्थाई सरकार के गठन के लिए समझौता

46. कैबीनेट मिशन का भारत आगमन

47. अलीगढ़ में 1946 के साम्प्रदायिक दंगे एवं शिमला कान्फ्रेंस

48. कैबीनेट मिशन प्लान (संयुक्त भारत योजना)

49. कैबीनेट मिशन कम्पलीट

50. मौलाना आजाद द्वारा जिन्ना और प्रस्तावित पाकिस्तान का विरोध

51. कैबीनेट प्लान की मृत्यु

52. अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को अंतरिम सरकार बनाने का निमंत्रण

53. सुहरावर्दी के गुण्डों को कत्लेआम के लिए कूपन दिए गए!

54. महीनों तक खून में तैरता रहा कलकत्ता!

55. पाकिस्तान को बोलने दो!

56. बन गई नेहरू की अंतरिम सरकार

57. संविधान सभा में जिन्ना का फच्चर

58. मुस्लिम लीग द्वारा अंतरिम सरकार के विरुद्ध षड़यंत्र

59. जिन्ना को मिल गया पाकिस्तान

60. मुस्लिम लीग द्वारा पंजाब में सिक्खों एवं हिंदुओं का नरसंहार!

61. कुछ सिक्खों ने सिक्खिस्तान बनाने की मांग की!

62. भारत में मेवस्थान बनाने की योजना

63. भारत को आजादी देने के लिए लॉर्ड माउण्टबेटन को भेजा गया!

64. जिन्ना को दे दो पूरी सरकार

65. माउण्टबेटन ने जवाहर लाल को भारत-विभाजन के लिए तैयार किया

66. माउण्टबेटन की दृष्टि में जिन्ना उन्मादी था!

67. जिन्ना भारत का विभाजन चाहता था न कि पंजाब और बंगाल का

68. भारत का विभाजन केवल पागलपन

69. अंग्रेजों ने भारत के टुकड़े.टुकड़े करने की तैयारी कर ली!

70. भारत विभाजन योजना में संशोधन

71. भारत को बीच में से चीरने की योजना

72. सुहरावर्दी द्वारा अलग बंगाल बनाने की योजना

73. सब भीतर ही भीतर गांधी के खिलाफ थे

74. कांग्रेस कार्यसमिति में पाकिस्तान को स्वीकृति

75. गांधीजी द्वारा पाकिस्तान निर्माण पर सहमति

76. मुहम्मद अली जिन्ना की हत्या का प्रयास

77. भारत विभाजन प्रस्ताव को स्वीकृति

78. भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947

79. विभाजन कौंसिल का गठन

80. भावी देशों के लिए वैकल्पिक सरकारें

81. रैडक्लिफ आयोग ने खींची विभाजन रेखा

82. अहमदपुर चौरोली

83. आखिर बन गया पाकिस्तान

84. क्या कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया ने पाकिस्तान आंदोलन में सहायता की?

85. रक्त की नदी में तैर कर निकला पाकिस्तान (1)

86. रक्त की नदी में तैर कर निकला पाकिस्तान (2)

87. रक्त की नदी में तैर कर निकला पाकिस्तान (3)

88. रक्त की नदी में तैर कर निकला पाकिस्तान (4)

89. देशी राज्यों पर पाकिस्तानी जाल (1)

90. देशी राज्यों पर पाकिस्तानी जाल (2)

91. देशी राज्यों पर पाकिस्तानी जाल (3)

92. देशी राज्यों पर पाकिस्तानी जाल (4)

93. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (1)

94. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (2)

95. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (3)

96. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (5)

97. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (6)

98. जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र (7)

99. बीकानेर रियासत का भारत में विलय

100. जूनागढ़ का नवाब बेगमों की बजाय कुत्ते लेकर पाकिस्तान भाग गया

101. निजाम को विश्वास था कि अंग्रेज हैदराबाद को अलग देश बना देंगे!

102. सरदार पटेल ने हैदराबाद राज्य को भारत में मिला लिया

103. सरदार पटेल ने धराशाई किए भोपाल नवाब के हसीन सपने

104. भारतीय हिस्से हथियाने के दुष्प्रयास

105. काश्मीर में कबाइलियों का आक्रमण

106. बीकानेर महाराजा पर पाकिस्तानी मकड़जाल

107. पाकिस्तान से आगे

108. जिन्ना का पाकिस्तान बनाम पाकिस्तान का जिन्ना!

109. भारत वापस लौटना चाहता था जिन्ना !

110. पाकिस्तान मुस्लिम लीग का विभाजन

111. पाकिस्तान से मोहभंग

112. जिन्ना के उत्तराधिकारियों का पाकिस्तान

113. एक दूसरे से दूर होते चले गए भारत-पाकिस्तान

114. पाकिस्तान का पानी खतरे में

115. पाकिस्तान की सेना ही पाकिस्तान का सबसे बड़ा शत्रु

117. पूर्वी-पाकिस्तान में धर्म के नाम पर हिन्दुओं की और भाषा के नाम पर मुसलमानों की हत्या

118. पश्चिमी-पाकिस्तान की सेना ने तीस लाख बंगालियों एवं बिहारियों का संहार किया

119. दूसरे धर्म वालों के लिए पाकिस्तान में जगह नहीं!

120. पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार

121. पाकिस्तान में शियाओं का सफाया

122. पाकिस्तान में सूफी दरगाहों पर खूनी हमलों का इतिहास

123. दीनदारों तथा सयैदों की जिंदगियों का अंतर

124. ये कैसा पाकिस्तान!

125. जारी है मौत एवं पलायन का सिलसिला

126. क्यों नहीं हो सकती भारत से दोस्ती!

127. पाकिस्तानियों को पहचान का संकट

128. कुछ अनुत्तरित प्रश्न

129. Appendix – Government’s Statement Of 3 June 1947

130. संदर्भ सूचि – कैसे बना था पाकिस्तान

कैसे बना था पाकिस्तान-प्राक्कथन

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कैसे बना था पाकिस्तान-प्राक्कथन
कैसे बना था पाकिस्तान-प्राक्कथन

कैसे बना था पाकिस्तान-प्राक्कथन लिखते समय आज भी मुझे उन पुरानी स्मृतियों का उल्लेख हो आता है जिनके कारण मैंने यह पुस्तक लिखी। इस पुस्तक को लिखने की पहली बार मेरी इच्छा वर्ष 1985 में हुई थी। यह वह दौर था जब श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली एवं उत्तर भारत के कुछ नगरों में सिक्खों का बड़ा नर-संहार होकर ही चुका था तथा पंजाब में ‘घल्लूघारा’ चल रहा था। उन्हीं दिनों मुझे श्रीगंगानर जिले के ‘बिलोचिया’ गांव जाने का अवसर मिला।

इस गांव में सैंकड़ों कच्चे घर थे जो पूरी तरह खाली पड़े थे और उनमें से अधिकांश घर खण्डहरों में बदल चुके थे। गांव के एक कौने में हिन्दुओं की एक छोटी सी बस्ती थी। उन्हीं लोगों ने मुझे बताया कि आजादी से पहले यह गांव पूरी तरह आबाद था तथा इन खाली पड़े घरों में मुसलमान रहा करते थे जो 1947 में पाकिस्तान चले गए। उसके बाद से इन घरों में रहने के लिए कोई नहीं आया और इन्हें राजस्थान सरकार ने नजूल सम्पत्ति घोषित कर दिया है।

बिलोचिया से आने के कुछ ही दिनों बाद मुझे ‘हिन्दूमल कोट’ जाना पड़ा। यह पक्के घरों और साफ-सुथरी गलियों वाला एक सुंदर सा कस्बा था किंतु वहाँ भी सैंकड़ों घरों पर ताले पड़े हुए थे। मैंने लोगों से पूछा कि क्या इस कस्बे के लोग भी भारत विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए? वहाँ के लोगों ने मुझे बताया कि नहीं पाकिस्तान नहीं गए, अधिकतर लोग गंगानगर, बीकानेर, अबोहर, फाजिल्का तथा बम्बई आदि शहरों में गए हैं।

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मैंने पूछा- ‘क्यों?’ तो उन्होंने बताया- ‘यह कस्बा भारत विभाजन से पहले अनाज की अच्छी मण्डी हुआ करता था किंतु भारत-विभाजन के बाद यह कस्बा अचानक पाकिस्तान की सीमा पर आ गया। इस कारण 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में यह कस्बा उजड़ गया। लोग अपने परिवारों को लेकर अन्य शहरों को चले गए और इस कस्बे का वाणिज्य-व्यापार ठप्प हो गया। उनके घरों पर आज भी ताले लगे हुए हैं।’

गंगानगर के पांच साल के प्रवास के दौरान मैं श्री स्वदेशराज वर्मा के परिवार के सम्पर्क में आया। यह एक आर्यसमाजी परिवार था और बहुत खुले हुए आधुनिक विचारों का परिवार था। भारत-विभाजन के समय श्री स्वदेशराज वर्मा अपने पिता डॉ. गोविंदराम तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बहावलपुर स्टेट के खानपुर कस्बे से हिन्दूमल कोट आए थे। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता कराची रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर हुआ करते थे।

भारत विभाजन के समय चूंकि पाकिस्तान से भारत आने वाली ट्रेनों में कत्ले-आम मचा हुआ था इसलिए यह परिवार कराची से वायुयान द्वारा दिल्ली पहुंचा। वहाँ से यह परिवार पहले मेरठ और फिर अमृतसर चला गया। श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता श्री मूलचंद मल्होत्रा का परिवार मूलतः मुल्तान के सक्खर क्षेत्र का रहने वाला था। श्री स्वदेश वर्मा और श्रीमती कैलाश वर्मा अक्सर भारत विभाजन के समय की आंखों-देखी घटनाओं का उल्लेख किया करते थे।

चूंकि उन दोनों के परिवारों की पृष्ठभूमि सम्पन्न थी तथा वे समय रहते ही वहाँ से निकल आए थे तब भी उनके मन एवं मस्तिष्क से उन दिनों की यादें मिटती नहीं थीं। यहाँ तक कि श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता श्री मूलचंद मल्होत्रा को भारत सरकार ने मेरठ रेल्वे स्टेशन पर नियुक्ति भी दी किंतु वे अपने सगे-सम्बन्धियों, मित्रों एवं अपनी अचल सम्पत्ति के पाकिस्तान में छूट जाने के कारण मानसिक रूप से इतने विक्षुब्ध हो चुके थे कि वे नौकरी छोड़कर अमृतसर चले गए। उनके संगी-साथी तथा घर-सम्पत्ति पाकिस्तान में ही रह गए थे।

मैं जब वर्मा-दम्पत्ति की बातें सुनता था तो अक्सर भारत-विभाजन की त्रासदी झेलने वाले उन लाखों लोगों के बारे में सोचा करता था जो पैदल ही पाकिस्तान से भारत आए थे या भारत से पाकिस्तान गए थे! पांच लाख लोग तो अपने गंतव्य पर पहुंचने से पहले ही दंगाइयों के क्रूर हाथों में पड़कर मौत की खाई में जा गिरे थे।

भारत से पाकिस्तान का अलग होना, मानवीय इतिहास की एक क्रूरतम एवं रक्तरंजित घटना थी। संसार के कई अन्य देशों को भी ऐसी भीषण त्रासदियां झेलनी पड़ी हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि आदमी कभी सभ्य नहीं बन पाया, वह असभ्य था, है और रहेगा।

1980 के दशक में अजमेर प्रवास के दौरान मैं एक ऐसे परिवार के सम्पर्क में रहा जिसकी गृह-स्वामिनी श्रीमती द्रौपदी यादव अपने पिता एवं उनके परिवार के साथ भारत की आजादी से लगभग दो साल पहले उस समय बर्मा से भारत आई थीं जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज एवं जापानी सेनाएं अंग्रेज सेनाओं को बर्मा से मारकर भगा रही थीं। श्रीमती यादव जो उस समय छोटी बच्ची ही थीं, का परिवार किसी बड़े दल के साथ पैदल चल कर ही बर्मा से असम तक आया था और वहाँ से इलाहाबाद गया।

इस दौरान उन्हें युद्धक-विमानों से होने वाली बम-वर्षा से लेकर हिंसक हाथियों तथा पुलिस के सिपाहियों के अत्याचारों का सामना करना पड़ा। इन्हीं में से एक घटना के दौरान उनके एक भाई अथवा एक बहिन की मृत्यु हो गई थी। श्रीमती द्रौपदी भी प्रायः उस पलायन के बहुत से लोमहर्षक प्रसंग कभी हँस कर तो कभी रो कर सुनाया करती थीं।

मेरे पितामह श्री मुकुंदी लाल गुप्ता भी ई.1947 में यमुनाजी के किनारे हुए मेवों के आक्रमण के समय अपने कुनबे के युवकों तथा संगी-साथियों के साथ सशस्त्र संघर्ष में सम्मिलित हुए थे। मेरी दादी श्रीमती जय देवी (अब स्वर्गीय) एवं पिताजी अक्सर उस संघर्ष की चर्चा करते रहे हैं।

वर्ष 1993 में मैंने भारत-पाकिस्तान की सरहद पर स्थित आकुड़ियां गांव देखा था। यह जालोर जिले के नेहड़ क्षेत्र में स्थित है जहाँ लूनी नदी का मुहाना है। यह पूरी तरह से सुनसान और उजड़ा हुआ गांव था। पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि भारत की आजादी से पहले यह भरा-पूरा गांव था जिसमें मुसलमान परिवार रहा करते थे किंतु आजादी के बाद इस गांव के सारे लोग भारत की सीमा पार करके पाकिस्तान के क्षेत्र में चले गए और उन्होंने वहाँ पर एक नया गांव बसा लिया जिसका नाम भी आकुड़िया है। अब भारतीय आकुड़िया पूरी तरह सुनसान है।

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के समय जो कुछ हुआ, वह भी इस बात की पुष्टि करता है कि सभ्यता के कैनवास पर मनुष्य सदैव गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करता आया है। नयी जीत की आशा में वह पुरानी उपलब्धियों को आग में झौंक डालता है। मनपसंद खिलौना प्राप्त करने की प्रत्याशा में वह अपनी हथेली पर रखे खिलौने को क्रूरता से तोड़ डालता है। जो कुछ भी मानव के पास है, उसमें वह कभी भी संतुष्ट नहीं है, और जो कुछ उसे संतुष्ट कर सके, उसे कभी भी मिलता नहीं है।

ई.1906 में भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, तब से लेकर ई.1947 तक मुस्लिम लीग पाकिस्तान के लिये झगड़ती रही और उसे लेकर ही रही। ऊपरी तौर से देखने पर पाकिस्तान का निर्माण इन्हीं 41 वर्षों के संघर्ष का परिणाम लगता है किंतु सच्चाई यह है कि पाकिस्तान की नींव तो ई.712 में मुहम्मद बिन कासिम ने उसी समय डाल दी थी जब उसने सिंध पर आक्रमण करके महाराजा दाहिर सेन और उनके राज्य को समाप्त किया था।

तब से लेकर ई.1947 तक तिल-तिल करके भारत का इतिहास पाकिस्तान की ओर बढ़ता रहा। मेरी दृष्टि में पाकिस्तान इकतालीस वर्ष के संघर्ष का परिणाम नहीं था। अपितु पूरे 1225 वर्ष के संघर्ष का परिणाम था। भारत के इतिहास में यह पूरी अवधि नफरत, हिंसा, रक्तपात और दंगों से भरी हुई थी।

भारत-विभाजन के समय भारत में विश्व की जनसंख्या का पांचवा हिस्सा निवास करता था। उस समय भारत की कुल जनंसख्या लगभग 39 करोड़ थी जिनमें से लगभग 29 करोड़ हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन एवं ईसाई थे तथा लगभग 10 करोड़ मुसलमान थे। विभाजन के बाद दोनों तरफ से कुल मिलाकर एक से डेढ़ करोड़ हिन्दुओं, सिक्खों एवं मुसलमानों ने सीमा पार की।

इसके बावजूद भारत में बड़ी संख्या में मुसलमान जनसंख्या एवं पाकिस्तान में बड़ी संख्या में हिन्दू जनसंख्या निवास करती रही। इस पुस्तक में कुछ स्थानों पर दूसरे लेखकों के संदर्भ से उल्लिखित तथ्यों में भारत की जनसंख्या का 35 करोड़ और 30 करोड़ उल्लेख हुआ है। यह जनसंख्या उन लेखकों द्वारा ई.1947 से पहले एवं बाद के संदर्भों में बताई गई है।

ई.1951 की जनगणना के बाद पूर्वी-पाकिस्तान की जनसंख्या 4.2 करोड़ एवं पश्चिमी-पाकिस्तान की जनसंख्या 3.4 करोड़ पाई गई। इस प्रकार पाकिस्तान की कुल जनसंख्या 7.5 करोड़ पाई गई। इसमें से 16 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दुओं की थी। अर्थात् भारत विभाजन के बाद भी 1.2 करोड़ हिन्दू पाकिस्तान में रह गए थे।

विभाजन के समय सिंध, खैबर-पख्तून एवं पश्चिमी पंजाब से हिन्दू भारत में आए तथा पूर्वी पंजाब एवं पश्चिमी बंगाल से मुसलमान पाकिस्तान में गए। ब्लूचिस्तान जनसंख्या की अदला-बदली से लगभग अपरिवर्तित रहा। सिंध से लगभग 18 लाख हिन्दू भारत आए तथा उत्तर भारत से लगभग 30 लाख मुसलमान सिंध के विभिन्न नगरों में जाकर बए गए। ई.1947 के विभाजन के बाद पूर्वी-पाकिस्तान एवं पश्चिमी बंगाल के बीच लगभग 50 लाख लोगों की अदला-बदली हुई।

ई.1951 की जनगणना में भारत की कुल जनसंख्या 36 करोड़ 11 लाख पाई गई जिसमें से 30 करोड़ 60 लाख हिन्दू तथा 3 करोड़ 40 लाख मुसलमान थे। शेष ईसाई, सिक्ख, बौद्ध तथा अन्य धर्मों के लोग थे। अर्थात् विभाजन के बाद भी 3.40 करोड़ मुसलमान भारत में रह गए थे जो कि भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 9.8 प्रतिशत थे। इस प्रकार भारत-विभाजन के बाद अखण्ड-भारत के लगभग एक-तिहाई मुसलमान पूर्वी-पाकिस्तान में, एक-तिहाई मुसलमान पश्चिमी-पाकिस्तान में एवं एक-तिहाई मुसलमान विभाजित भारत में रह गए थे।

इस पुस्तक में भारत विभाजन के समय हुए राजनीतिक संघर्ष की एक झलक भर है। इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य इतिहास के उन पन्नों को टटोल कर देखना है ताकि हम भविष्य में उन्हीं गलतियों को फिर से न दोहराएं जिनके कारण हम भारत-पाकिस्तान के विभाजन के खतरनाक निर्णय पर पहुंचे थे। आज भी हमारे सामने अवसर है कि हम शांति की साधना करें तथा अच्छे पड़ौसियों की तरह जिम्मेदारी के साथ रहें।

प्रत्येक भारतीय की पहली और आखिरी इच्छा भारत-पाकिस्तान के बीच शांति की स्थापना करने की ही है किंतु केवल भारत की ओर से की गई शांति की इच्छाएं भारत-पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित नहीं कर सकतीं। इसके लिए पाकिस्तान के राष्ट्रीय चरित्र में भी शांति की लहर उठनी चाहिए। पाकिस्तानी शासकों द्वारा की जा रही नफरतों की खेती के बीच भारत की ओर से जाने वाले शांति के कबूतर लहूलुहान ही किए जाते रहेंगे और शांति केवल एक ढकोसला सिद्ध होगी।

यह पुस्तक पाकिस्तान निर्माण की पूरी कहानी नहीं है। यह भारत-पाकिस्तान विभाजन की दुखःद त्रासदी की पृष्ठभूमि पर लिखी गई एक संक्षिप्त गाथा है जो उस समय के कुछ ऐसे दृश्यों से साक्षात्कार करवाती है जिनकी पृष्ठभूमि में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया। इस पुस्तक को लिखने के लिए मैंने प्रो. एफ. के कपिल (जोधपुर), श्री योगेन्द्रसिंह यादव (अजमेर), श्री नरेश वर्मा (श्रीगंगानगर) एवं अपने पिता श्री गिरिराज प्रसाद गुप्ता से साक्षात्कार के माध्यम से भी अनेक तथ्य जुटाए हैं, मैं इस सबके प्रति आभार व्यक्त करता हूँ।

श्रीमती द्रौपदी यादव (अब स्वर्गीय), श्रीमती कैलाश वर्मा (अब स्वर्गीय) एवं श्रीस्वदेश वर्मा (अब स्वर्गीय) के प्रति भी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ जिन्होंने मुझे विभाजन की त्रासदी के आंखों देखे दृश्यों से परिचित करवाया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत स्वयं महाद्वीप है

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भारत स्वयं महाद्वीप है
भारत स्वयं महाद्वीप है

भारत भारत स्वयं महाद्वीप है औरअनादि काल से हिन्दुओं का देश है। हिन्दू कोई सम्प्रदाय नहीं है, कोई धर्म नहीं है, कोई पंथ नहीं है, अपितु यह जीवन जीने की एक पद्धति है जो मानव सभ्यता के आदिकाल से सहज-स्वाभाविक रूप में विकसित हुई है। इसे किसी ने गढ़ा नहीं है, इसके नियम किसी ने निर्धारित नहीं किए हैं।

ये सहज रूप से आर्य-सभ्यता में प्रचलित हुए। यही कारण है कि हिन्दू संस्कृति मानव मात्र को स्वतंत्र-चिंतन एवं निजी-विश्वास के साथ जीवन जीने की छूट देती है। प्राचीन आर्य ‘हिन्दू’ शब्द से परिचित नहीं थे। पश्चिम से भारत आने वाले यूरोपीय आक्रांताओं ने सिंधु नदी को ‘इण्डस’ कहकर पुकारा। इसी इण्डस के आधार पर भारत को ‘इण्डिया’ तथा भारतीयों को ‘इण्डियन’ कहा गया। ‘सिन्धु’ नदी के किनारे रहने के कारण ही भारत के लोग ‘सिन्धु’ और ‘हिन्दू’ कहलाए।

भारत हजारों साल पुराना देश है जिसका निर्माण प्रकृति या राजनीति की सीमाओं से नहीं अपितु संस्कृति की सीमाओं से हुआ था। भारत स्वयं महाद्वीप है जिसमें सुदूर पूर्व से लेकर पश्चिम में धरती के जिस छोर तक वेदों की ऋचायें गूंजती थीं तथा सुरों अर्थात् देवताओं की पूजा होती थी, वहाँ तक सांस्कृतिक भारत की सीमायें लगती थीं।

भारत की पश्चिमी सीमा के पार रहने वाले लोग असुरों की पूजा करते थे और अहुरमज्दा पढ़ते थे। असुरों के देश को आज ‘असीरिया’ के नाम से जाना जाता है। अर्थात् असीरिया से लेकर आज के भारत के बीच के जो भी देश हैं, वहाँ तक वैदिक संस्कृति का ही प्रसार था और यह पूरा क्षेत्र ‘सांस्कृतिक-भारत’ था।

पौराणिक युग में जहाँ-जहाँ तक रामकथा तथा महाभारत की कथा का प्रसार हुआ, वहाँ-वहाँ भारत से गये राजकुमारों ने अपने-अपने शासन भी स्थापित किये। उन देशों में भारतीय संस्कृति सहज रूप से व्याप्त हो गई। आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा बांगलादेश ही नहीं अपितु तिब्बत, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मलेशिया, जावा, सुमात्रा, बाली, बु्रनेई, थाईलैण्ड, बर्मा, कम्बोडिया, मेडागास्कर आदि देश पूर्ववर्ती काल में भौगोलिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक रूप से भारतवर्ष का ही भाग रहे हैं। यही कारण है कि यदि यह कहा जाए कि भारत स्वयं महाद्वीप है तो इसमें कोई अतिश्योक्त नहीं होगी!

भारत की संस्कृति का प्रभाव यूरोप के बहुत से देशों में था जहाँ आज भी ‘राम’ और ‘वेदव्यास’ के नाम पर नगर मिल जाएंगे। बाली, ट्रिनीडाड और मॉरीशश तो आज भी लघुभारत ही हैं। इण्डोनेशिया, इण्डोचीन, वेस्टइण्डीज आदि देशों के नाम में लगा ‘इण्डो’ शब्द ही बताता है कि किसी समय ये देश ‘हिन्द’ के ही हिस्से थे। हिन्द महासागर अथवा इण्डियन ओसियन की विशालता, भारतीय सांस्कृतिक सीमाओं की विशालता का ही आभास करवाती है।

Kaise-Bana-Tha-Pakistan
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कोलम्बस जब अमरीका की धरती पर उतरा तो उसने भी वहाँ के मूल-निवासियों को ‘रेड-इण्डीज’ कहकर पुकारा क्योंकि उसके अवचेतन मन में भारत की विशालता ही व्याप्त थी। यूरोप का डेन्मार्क वास्तव में ‘धेनुमार्ग’ का अपभ्रंश है, यह आज भी दुग्ध-उत्पादन के लिए विख्यात है। ‘इटली’ ‘स्थली’ का अपभ्रंश है, यूनानी भाषा में इटली का अर्थ ‘चारागाह’ होता है। इटली के इतिहास के अनुसार र्ई.पू. 9वीं शताब्दी में भारतीय आर्य राजा ‘अत्ती’ का पुत्र ‘तिरहेन’ अपने बहुत से साथियों के साथ इटली आकर बस गया था। वे लोग संस्कृत बोलते थे।

आज का वेटिकन सिटी किसी समय की वाटिका है जिसमें किसी वैदिक ऋषि का आश्रम था, इस स्थान से शिवलिंगों की प्राप्ति हुई है जिनमें से एक शिवलिंग आज भी यहाँ के संग्रहालय में प्रदर्शित है। सिकंदर के भारत आक्रमण के समय अर्थात् आज से लगभग 2,350 वर्ष पहले, भारत की सीमायें उत्तर-पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत से प्रारंभ होकर उत्तर-पूर्व में बर्मा के अंतिम छोर तक सीमित हो गई थीं। पश्चिम दिशा में भारत का पड़ौसी पर्शिया अर्थात् फारस हुआ करता था।

उस समय का पर्शिया आज का ईरान है। माना जाता है कि ईरान शब्द का निर्माण ‘इरा’ नामक नदी के ‘रण’ से हुआ है ठीक वैसे ही जैसे आज ‘कच्छ का रण’ भारत के गुजरात में स्थित है। भारत से लेकर असीरिया तक लोहे के ऐसे तीर, तरकश एवं शिलालेख मिले हैं जिन पर ब्राह्मी लिपि में संस्कृत भाषा के शब्द उत्कीर्ण हैं।

अजरबैजान में गणेशजी का अत्यंत प्राचीन मंदिर मिला है जिसमें गणेशजी की प्रतिमा, संस्कृत भाषा के शिलालेख एवं शिवलिंग आदि भी प्राप्त हुए हैं। इस मंदिर में सूर्य की भी पेजा होती थी।

यदि यह कहा जाए कि मानव सभ्यता के आरम्भ में जहाँ-जहाँ तक सभ्यता का प्रसार हुआ, वहाँ-वहाँ तक का विश्व भारत ही था, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। वैदिक ऋषियों ने मानव की प्राचीन सभ्यता को वैदिक संस्कृति प्रदान की तथा जहाँ-जहाँ तक सभ्यता का प्रसार हो गया था, वहाँ-वहाँ तक की धरती वैदिक-यज्ञों के सुवासित-धूम्र से महक उठी थी। हमें स्मरण रखना चाहिए कि वेदों के शुद्ध-अवशेष भारत में नहीं अपितु जर्मनी में पाए गए थे जहाँ से इन्हें पुनः भारत लाकर भारतीयों के लिए उपलब्ध कराया जा सका।

यूरोपीय भाषा परिवार की लगभग सभी भाषाओं में संस्कृत के अपभ्रंश शब्दों की भरमार है। यथा- मैन (मनु), वुमैन (वामा), काऊ (गऊ), बुल (बैल), डाइटी (देवता), डिवाइन (दिव्य), वैन (वाहन), मदर (मातृ), फादर (पितृ), ब्रदर (भ्रात्), सन (सुअन-पुत्र), ग्रास (घास), ट्री (तरु), सिलिकॉन (शिलाकण), एडमिनिस्ट्रेशन (आदिमनुदर्शन), बोट (पोत), चैरिअट (रथ), कॉट (खाट), बैलेन्स (बलांश), डोर (द्वार), वन (ऊन, संस्कृत में ऊन का अर्थ एक होता है), टू (द्वि), थ्री (त्रि), स्वाइन (सूअर), वाइन (वारुणी), वाइड (वृहद्), सैकेण्ड (क्षण), कैमल (कम्मेलक) आदि।

इस प्रकार और भी प्रमाण मिल जाएंगे जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि मध्य-एशिया एवं यूरोप के कई देश अत्यंत प्राचीन काल के ‘सांस्कृतिक-भारत’ ही हैं।

ईसा के जन्म से 563 साल पहले महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ। उन्होंने पूरी दुनिया को शांति का संदेश दिया। पश्चिम में ये संदेश हिन्दुकुश पर्वत के इस पार अर्थात् अफगानिस्तान तक सीमित रहे जबकि उत्तर में भूटान, तिब्बत और चीन, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व में बर्मा, थाईलैण्ड, जावा, सुमात्रा, बाली, बोर्नियो, इण्डोनेशिया, कम्बोडिया, सुमाली, आदि देशों तक गये। दक्षिण में श्रीलंका ने महात्मा बुद्ध के उपदेशों को ग्रहण किया। जहाँ-जहाँ तक महात्मा बुद्ध के संदेश गये, वहाँ- वहाँ तक भारतीय संस्कति का नए सिरे से प्रसार हुआ। इस दृष्टि से भी इन्हें सांस्कृतिक भारत ही माना जाना चाहिये।

एक बार भारत के अंतिम ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड माउण्टबेटन ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा था कि- ‘भारत एक उपमहाद्वीप नहीं, महाद्वीप है। यह एशिया से जुड़ा हुआ होने के कारण उपमहाद्वीप प्रतीत होता है। जब तक इसे महाद्वीप के रूप में नहीं देखा जाएगा तब तक इसकी समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता। भारत महाद्वीप की तुलना यूरोप महाद्वीप से की जा सकती है। लम्बाई-चौड़ाई में बहुत अंतर नहीं। जातियां, भाषाएं, उपभाषाएं, धर्मों की संख्या भी लगभग उतनी ही है। ‘

वर्तमान समय में ईरान से बर्मा तक के क्षेत्र में आठ देश स्थित हैं। इनमें से पहला अफगानिस्तान, दूसरा पाकिस्तान, तीसरा भारत, चौथा भूटान, पांचवा नेपाल, छठा बांगलादेश और सातवां म्यानमार है जबकि आठवां तिब्बत चीन में विलुप्त हो चुका है। श्रीलंका भी किसी समय भारत का हिस्सा था। अशोक के समय से लेकर औरंगजेब के समय तक अफगानिस्तान भी भारत का हिस्सा था किंतु अंग्रेजों के भारतीय राजनीतिक आकाश में ताकतवर बनकर उभरने से काफी पहले वह भारत से अलग हो चुका था।

अफगानिस्तान में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा बनायी हुई गुफायें तथा उनमें उकेरी गयी भगवान बुद्ध की मूर्तियां अभी तक मौजूद थीं जिनमें से कुछ मूर्तियों को मार्च 2001 में तालिबानी आतंकवादियों ने तोपों से गोले बरसाकर बर्बाद कर दिया तथा इन मूर्तियों के वहाँ बनाए जाने के प्रायश्चित स्वरूप 100 गायों का वध किया। तालिबानियों को छोड़ दें तो आम अफगानी आज भी हिन्दी भाषा बोलता है। अफगानियों की हिन्दी, भारत के कई प्रांतों में बोली जाने वाली हिन्दी से अधिक स्पष्ट है।

भारत स्वयं महाद्वीप है इसका एक प्रमाण यह भी है कि भारत की पहचान रहा तक्षशिला अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान की सीमा पर पाकिस्तान में स्थित है। नेपाल, तिब्बत, बर्मा और श्रीलंका हमसे अंग्रेजों के शासन के दौरान अलग हुए किंतु पाकिस्तान और बांगलादेश हमसे ठीक उस दिन अलग हुए जिस दिन अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना था।

पाकिस्तान और बांगलादेश भारत से, दो टुकड़ों वाले एक देश के रूप में अलग हुए थे जिनमें से एक टुकड़े को पश्चिमी-पाकिस्तान कहा जाता था तो दूसरे को पूर्वी पाकिस्तान। बाद में ये दोनों टुकड़े भी आपस में झगड़ कर दो राष्ट्रों के रूप में अलग हुए- ‘पाकिस्तान’ एवं ‘बांग्लादेश’।

भारत से पाकिस्तान के अलग होने का आधार साम्प्रदायिकता था। अतः हमें पाकिस्तान बनने के इतिहास से पहले साम्प्रदायिकता की उस आग के इतिहास को समझना होगा, जिसने पाकिस्तान का निर्माण किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इस्लाम का वैश्विक विस्तार

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इस्लाम का वैश्विक विस्तार

इस्लाम का वैश्विक विस्तार बहुत तेज गति से हुआ। संसार में कोई भी मजहब इतनी तेज गति से नहीं फैला! आज भी इसकी गति मंद नहीं हुई है।

इस्लाम को अपने उद्भव के समय से ही सैनिक तथा राजनीतिक स्वरूप प्राप्त हो गया था जिसके कारण इस्लाम का वैश्विक विस्तार तीव्र गति से कर पाना संभव हुआ। ई.622 में पैगम्बर मुहम्मद मक्का से मदीना गए और वहाँ उन्होंने एक सेना संगठित करके मक्का पर पहली सैन्य-सफलता प्राप्त की।

इसके बाद हजरत मुहम्मद न केवल इस्लाम के प्रधान स्वीकार कर लिए गए वरन् वे राजनीति के भी प्रधान बन गए और उनके निर्णय सर्वमान्य हो गए। इस प्रकार मुहम्मद के जीवन काल में इस्लाम तथा राज्य के अध्यक्ष का पद एक ही व्यक्ति में संयुक्त हो गया।

इस्लाम का राजनीतिक स्वरूप

पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के उपरान्त जब खलीफाओं का उत्कर्ष हुआ, तब भी इस्लाम तथा राजनीति में अटूट सम्बन्ध बना रहा क्योंकि खलीफा भी न केवल इस्लाम के अपितु राज्य के भी प्रधान होते थे। उनके राज्य का शासन कुरान के अनुसार होता था। इससे राज्य में मुल्ला-मौलवियों का प्रभाव बढ़ा। राज्य ने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया जिसके फलस्वरूप अन्य धर्म वालों को इस्लामिक राज्य का नागरिक नहीं समझा गया।

खलीफा उमर ने अपने शासन काल में इस्लाम के अनुयाइयों को सैनिक संगठन में परिवर्तित कर दिया। जहाँ कहीं खलीफा की सेनाएं गईं, वहाँ पर इस्लाम का प्रचार किया गया। यह प्रचार शान्ति-पूर्वक सन्तों द्वारा नहीं वरन् राजनीतिज्ञों और सैनिकों द्वारा तलवार के बल पर किया गया। परिणाम यह हुआ कि वहाँ की धरा रक्त-रंजित हो गई।

जेहाद

यदि यह कहा जाए के जेहाद इस्लाम का वैश्विक विस्तार करने के लिए सबसे सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस्लामी सेनापति अपने शत्रु पर युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए ‘जेहाद’ अर्थात् धर्म-युद्ध का नारा लगाते थे। इस्लाम का एक निर्देश इस्लाम की खातिर पवित्र युद्ध (जिहाद) से सम्बन्ध रखता है। कुरान में इस निर्देश को सूत्रबद्ध किया गया है- ‘वर्ष में आठ माह बहुदेववादियों और विधर्मियों से लड़ना, उनका संहार करना और उनकी जमीन-जायदाद को छीन लेना चाहिए।’

बाद में मुस्लिम उलेमाओं ने जिहाद से सम्बन्धित निर्देशों की अलग-अलग ढंग से व्याख्या की। बहुदेवपूजकों के बारे में कुरान का रवैया बहुत सख्त है। उसमें कहा गया है- ‘हे ईमानवालो! अपने आस-पास के काफिरों से लड़े जाओ और चाहिए कि वह तुमसे अपनी बाबत सख्ती महसूस करें, और जानें कि अल्लाह उन लोगों का साथी है जो अल्लाह से डरते हैं।’

यद्यपि कुरान ‘किताबवालों’ अर्थात् यहूदियों और ईसाईयों के प्रति थोड़ी उदार है। फिर भी कुरान में उन ‘किताबवालों’ के साथ लड़ने का आदेश है कि यदि वे अल्लाह को नहीं मानते और इस्लाम के आगे नहीं झुकते। क्लेन नामक विद्वान ने जिहाद का अर्थ ‘संघर्ष’ किया है और इस संघर्ष के उसने तीन क्षेत्र माने हैं- (1) दृश्य शत्रु के विरुद्ध संघर्ष (2) अदृश्य शत्रु के विरुद्ध संघर्ष और (3) इन्द्रियों के विरुद्ध संघर्ष।

‘रिलीजन ऑफ इस्लाम’ के लेखक मुहम्मद अली का मत है कि-

‘इस शब्द का अर्थ इस्लाम के प्रचार के लिए युद्ध करना नहीं है, इसका अर्थ परिश्रम, उद्योग या सामान्य संघर्ष ही है। हदीस में हज करना भी जिहाद माना गया है किंतु व्यवहार में, आगे चलकर काजियों ने जिहाद का अर्थ युद्ध कर दिया उन्होंने समस्त विश्व को दो भागों में बांट दिया-

(1) दारूल-इस्लाम: अर्थात् शांति का देश जिस पर मुसलमानों की हुकूमत थी,

(2) दारूल-हरब: युद्ध स्थल, जिस भाग पर गैर-मुसलमानों की हुकूमत थी। काजियों ने मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को उत्तेजित किया कि ऐसे देशों को जीत कर इस्लाम का झण्डा गाड़ना जाहिदों का परम कर्त्तव्य है।’

इन भावनाओं के कारण जेहाद प्रायः भयंकर रूप धारण कर लेता था जिससे दानवता ताण्डव करने लगती थी और मजहब के नाम पर घनघोर अमानवीय कार्य किए जाते थे। शताब्दियाँ व्यतीत हो जाने पर भी इस्लाम की कट्टरता का स्वरूप अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। इस कारण इस्लाम जिस भी देश में गया, उस देश के समक्ष साम्प्रदायिकता की समस्या की नई चुनौतियां खड़ी हो गईं।

इस्लाम का वैश्विक विस्तार – इस्लामी राज्य

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हज़रत मुहम्मद के जीवन काल में अरब के अधिकांश भू-भाग पर इस्लाम का वर्चस्व हो गया। उनकी मृत्यु के बाद खलीफाओं के नेतृत्व में भी इस्लामी राज्य का तेजी से प्रसार हुआ। अरबवासियों ने संगठित होकर इस्लाम के प्रसार के साथ-साथ राजनीतिक विजय का अभियान शुरू किया। शीघ्र ही उन्होंने भूमध्यसागरीय देशों- सीरिया, फिलीस्तीन, दमिश्क, साइप्रस, क्रीट, मिस्र आदि देशों पर अधिकार कर लिया। इसके बाद फारस को इस्लाम की अधीनता में लाया गया। फिर उत्तरी अफ्रीका के नव-मुस्लिमों और अरबों ने स्पेन में प्रवेश किया। स्पेन तथा पुर्तगाल जीतने के बाद इस्लामी सेनाओं ने फ्रांस में प्रवेश किया परन्तु ई.732 में फ्रांसिसियों ने चार्ल्स मार्टेल के नेतृत्व में ‘तुर्स के युद्ध’ में इस्लामी सेना को परास्त कर उसे पुनः स्पेन में धकेल दिया जहाँ ई.1492 तक उनका शासन रहा। इसके बाद उन्हें स्पेन से भी हटाना पड़ा। अरबों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया पर भीषण आक्रमण किए। 15वीं सदी में ओटोमन तुर्कों ने कुस्तुन्तुनिया को जीतकर इस कार्य को पूरा किया। उधर फारस को जीतने के बाद अरबों ने बुखारा और समरकन्द पर अधिकार किया। मध्य एशिया पर उन्होंने पूर्ण प्रभुत्व स्थापित किया। इसके बाद ई.712 में उन्होंने भारत के सिन्ध प्रदेश पर अधिकार किया।

ई.750 में उन्होंने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। इस समय तक अरबवासियों का इस्लामी राज्य स्पेन से उत्तरी अफ्रीका होते हुए भारत में सिन्ध और चीन की सीमा तक स्थापित हो चुका था। इस्लाम का वैश्विक विस्तार उसी दौर में वे भारत में वे सिंध तथा रेकगस्तानी इलाकों तक चढ़ आए। कहा जा सकता है कि अपने जन्म के दो सौ साल के भीतर ही इस्लाम का वैश्विक प्रसार प्रचुर मात्रा में हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इस्लामिक विश्वव्यापी प्रसार के कारण

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Indonesian Muslims perform Eid Al-Adha prayer at Al-Akbar Mosque in Oct. 2014 in Surabaya, Indonesia

अरब के एक छोटे नगर में उत्पन्न इस्लाम विश्व की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक बन गया। तीव्र इस्लामिक विश्वव्यापी प्रसार के कई कारण थे-

(1) इस्लाम की कट्टरता ने तीव्र इस्लामिक विश्वव्यापी प्रसार में सहायता की। हजरत मुहम्मद ने मदीना पहुँचकर अपने अनुयाइयों को सैनिकों के रूप में संगठित किया तथा उन्हें आदेश दिया कि कुरान में अविश्वास रखने वाले को बलात् मुसलमान बना लिया जाए और यदि वे इस्लाम को स्वीकार न करें तो उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाए। पैगम्बर के आदेश का पालन किया गया तथा सबसे पहला आक्रमण मक्का पर किया गया। मक्का विजय के बाद हर जगह यही उदाहरण दोहराया गया।

रामधारीसिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है– ‘जहाँ-जहाँ इस्लाम के उपासक गए, उन्होंने विरोधी सम्प्रदाय के सामने तीन रास्ते रखे- या तो कुरान हाथ में लो और इस्लाम कबूल करो या जजिया दो और अधीनता स्वीकार करो। यदि दोनों में से कोई बात पसन्द न हो तो तुम्हारे गले पर गिरने के लिए हमारी तलवार प्रस्तुत है। ये बड़े ही कारगर उपाय रहे होंगे किन्तु यह समझ में नहीं आता कि सिर्फ इन्हीं उपायों से इस्लाम इतनी जल्दी कैसे फैल गया?’ इस्लाम के लिए युद्ध करने वाले मुसलमानों को कुरान का आश्वासन था कि उनके पाप क्षमा कर दिए जाएंगे और उन्हें स्वर्ग में खूब आनन्द मिलेगा।

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(2) अरब की तत्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति इस्लामिक विश्वव्यापी प्रसार का बड़ा कारण थी। उस समय सारा अरब अन्धविश्वास, सामाजिक कुरीतियों और दुराचार का केन्द्र बना हुआ था। अरबों में निर्धनता व्याप्त थी जिसके कारण उनमें लालच भी बहुत अधिक था और धन प्राप्त करने का हर उपाय अच्छा समझा जाता था। जुआ, शराबखोरी, और वेश्यागमन भंयकर रूप से प्रचलित थे। विवाह जैसी पवित्र संस्था का महत्त्व भी जाता रहा और समाज में यौन-सम्बन्धों की कोई नैतिक व्यवस्था नहीं रह गयी थी। अरब लोग बहुदेववादी और मूर्तिपूजक थे। ऐसी स्थिति में हजरत मुहम्मद द्वारा चलाया गया- अन्धविश्वासों से रहित, आडम्बरहीन, सरल, बोधगम्य तथा एक निराकार अल्लाह की उपासना वाला इस्लाम शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया।

(3) इस्लाम में सामाजिक एवं धार्मिक समानता की विचारधारा भी इस्लाम की सफलता का बड़ा कारण था। इस्लाम में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है तथा प्रत्येक व्यक्ति के सामाजिक एवं धार्मिक अधिकार एक समान हैं। समस्त मुसलमानों को एक अल्लाह का बन्दा समझा गया है। इसलिए इस्लाम के अनुयाई परस्पर बन्धु हैं तथा उनमें ऊँच-नीच की भावना नहीं है। इस समानता के सिद्धान्त के कारण इस्लाम की लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी। जिस भी समाज में निम्न स्तर के लोग उच्च स्तर के लोगों के धार्मिक या सामाजिक अत्याचार से पीड़ित थे, उन्होंने समाज में सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए इस्लाम स्वीकार कर लिया। इस कारण इस्लाम का प्रसार तेजी से हुआ।

(4) जिस समय इस्लाम के अनुयाई इस्लाम के प्रसार में लगे हुए थे, उस समय रोमन साम्राज्य खोखला हो चुका था और वहाँ विलासिता चरम पर थी। ईरानी साम्राज्य भी विलासिता के दलदल में डूबा हुआ था। राज्य के अधिकारी और धर्माधिकारी जनता का भयानक शोषण करते थे। इन शोषित राज्यों की जनता ने इस्लामी सेनाओं को अपनी मुक्तिदाता समझा।

इतिहासकार मानवेन्द्र राय ने लिखा है- ‘अरब आक्रमणकारी जहाँ भी गए, जनता ने उन्हें अपना रक्षक और मुक्तिदाता मानकर उनका स्वागत किया क्योंकि कहीं तो जनता लोभी शासकों के भ्रष्टाचार के नीचे पिस रही थी तो कहीं ईरानी तानाशाहों के जुल्मों से त्रस्त थी और कहीं ईसाइयत का अन्धविश्वास उन्हें जकड़े हुए था।’

(5) अरबों की तात्कालिक आर्थिक स्थिति ने भी इस्लामिक विश्वव्यापी प्रसार में योगदान दिया। छठी शताब्दी में अरब में कारवाँ व्यापार का ह्रास हो रहा था जिससे आर्थिक सन्तुलन भंग हो गया। कारवाँओं से होने वाली आमदनी बन्द हो जाने पर खानाबदोश अरब, खेती करने लगे। इससे जमीन की माँग बढ़ रही थी और पड़ौसी राज्यों की उपजाऊ भूमि को हस्तगत करना सबसे आसान तरीका था।

जिस क्षेत्र को भी वे हस्तगत करते थे, वहाँ के लोगों से कर वसूल करते थे। लाखों गैर-मुसलमानों ने इस्लाम को इसलिए स्वीकार कर लिया ताकि उन्हें कर नहीं चुकाना पड़े। इस्लाम स्वीकार करके वे इस्लामी राज्य में नौकरियाँ प्राप्त करने के पात्र बन जाते थे। यदि वे दास अथवा अर्द्धदास होते तो धर्म-परिवर्तन से दासता से मुक्त कर दिए जाते थे। इस प्रकार विजित क्षेत्रों की निर्धन जनता ने इस्लाम सहर्ष स्वीकार कर लिया।

(6) इस्लाम के प्रारम्भिक नेताओं के व्यक्तित्त्व तथा आदर्श-पूर्ण जीवन ने इस्लाम की लोकप्रियता में बड़ा योगदान दिया। अबूबक्र, उमर उस्मान और अली, तीनों ही नबी के चुने हुए साथी थे और उन्होंने भी हजरत मुहम्मद की ही तरह अभाव और दरिद्रता में जीवन व्यतीत किया था। उनके न तो महल या अंगरक्षक थे और न समसामयिक बादशाहों जैसे ठाट-बाट थे। प्रत्येक मुसलमान सीधे ही उन तक पहुँच सकता था। उन्होंने सादगी, सच्चरित्रता, वीरता और वैराग्य का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया इन कारणों से इस्लाम का शीघ्र प्रसार सम्भव हो सका।

(7) प्रत्येक मुसलमान वैधानिक रूप से चार पत्नियाँ रख सकता है। इस बहु-विवाह का परिणाम यह निकला कि मुसलमान जहाँ भी गए, उन्होंने गैर-मुस्लिम-स्त्रियों से विवाह कर लिए। भारत में आकर भी मुसलमानों ने हिन्दू स्त्रियों से विवाह किए। हिन्दू स्त्रियों से मुस्लिम बच्चे पैदा हुए जिनके कारण देश में इस्लाम का तेजी से प्रसार हुआ। हिन्दू स्त्रियों से उत्पन्न मुसलमान, भारत में इस्लाम के प्रसार के लिए अधिक तत्पर सिद्ध हुए।

(8) भारत में तुर्कों के आने के समय यहाँ की राजनीतिक दशा अत्यन्त शोचनीय थी। देश में केन्द्रीय सत्ता एवं राजनीतिक एकता का अभाव था। छोटे-बड़े राज्यों के राजा आपसी संघर्ष में अपनी शक्ति क्षीण कर रहे थे। इस समय हिन्दू समाज भी पतनोन्मुख था और उसे उत्साह से भरी हुई इस्लामिक सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। सामान्य जनता में राजवंशों के उत्थान एवं पतन के प्रति विशेष रुचि नहीं थी।

हिन्दू समाज की जाति-व्यवस्था ने जनसामान्य को विभक्त कर रखा था। निम्न कही जाने वाली जातियों का जीवन बहुत दयनीय था। निम्न जाति के अधिकांश लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। इसके विपरीत इस्लाम ने मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधा तथा भारतीय शासकों के विरुद्ध लड़े जाने वाले युद्धों को जिहाद का जामा पहना दिया। मुस्लिम सुल्तानों ने कुरान के आधार पर शासन किया और इस्लाम का प्रसार किया।

के. एस. लाल ने लिखा है- ‘भारत में सुल्तानों ने अपनी धार्मिक नीति से हिन्दुओं की संख्या एक-तिहाई कर दी।’ सुल्तानों ने इस्लाम के प्रचारकों को हर प्रकार से सहयोग दिया।

इस्लाम का भारत प्रवेश और प्रसार

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इस्लाम का भारत प्रवेश सातवीं शताब्दी में ही हो गया था। मुस्लिम अरब व्यापारियों ने ईसा की सातवीं शताब्दी में ही भारत के दक्षिण-पश्चिमी समुद्र तटीय राज्यों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए थे। कुछ अरब व्यापारी दक्षिण भारत के मलाबार तथा अन्य स्थानों पर स्थायी रूप से बस भी गए थे। दक्षिण भारत में अरब व्यापारियों ने व्यापार करने के साथ-साथ इस्लाम का प्रचार भी किया। इसी के साथ इस्लाम का भारत प्रवेश हो गया।

इस कारण दक्षिण भारत के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। आठवीं सदी के आरम्भ में अरबों ने सिन्ध को जीत लिया किंतु इस जीत से इस्लाम सिन्ध में अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर सका। क्योंकि दो सौ वर्षों से कम समय में इस्लाम के अरबों का धार्मिक उत्साह शिथिल पड़ गया तथा इस्लाम का नेतृत्व पहले, ईरानियों और उसके बाद तुर्कों के पास चला गया।

इस्लाम के प्रचार के लिए तुर्क कई शाखाओं में बँट गए। समानी वंश के तुर्कों ने पूर्व की ओर बढ़कर ई.874 से 999 के बीच खुरासान, आक्सस नदी पार के देश तथा अफगानिस्तान के विशाल भू-भाग पर अधिकार कर लिया। दसवीं शताब्दी ईस्वी में समानी वंश के शासक ‘अहमद’ का गुलाम ‘अलप्तगीन’ गजनी का स्वतंत्र शासक बना। उसका वंश ‘गजनवी वंश’ कहलाया।

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ई.977 में अलप्तगीन के गुलाम एवं दामाद सुबुक्तगीन ने गजनी राज्य की सीमाओं को हिन्दूशाही राज्य ‘लमगान’ तक पहुँचा दिया। ई.986 में उसने पंजाब के हिन्दूशाही राज्य लमगान पर आक्रमण किया तथा लमगान तक का प्रदेश जीत लिया। ई.997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु होने पर उसका पुत्र महमूद गजनी का शासक बना। गजनी का शासक होने के कारण वह महमूद गजनवी कहलाया।

महमूद गजनवी ने ई.1000 से 1026 के मध्य, भारत पर 17 आक्रमण किए। महमूद के आक्रमणों का उद्देश्य भारत में स्थायी शासन स्थापित करना नहीं था, अपितु धन-सम्पदा की लूट, मन्दिरों और मूर्तियों को भूमिसात् करना तथा भारत में इस्लाम के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करना था। उसके मुस्लिम प्रांतपति अफगानिस्तान से लेकर पंजाब के बीच कुछ क्षेत्रों पर शासन करने लगे। 12वीं शताब्दी ईस्वी में मुहम्मद गौरी ने अजमेर एवं दिल्ली के चौहान शासकों को परास्त कर भारत में मुस्लिम साम्राज्य की नींव रखी। उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का पहला स्वतंत्र मुस्लिम सुल्तान बना। इसके साथ ही भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या गहरी हो गई।

हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या

यद्यपि कुरान तथा हदीस में इस्लामिक एवं गैर-इस्लामिक भूमियों की संकल्पना मौजूद नहीं है तथापि इस्लामी चिंतकों ने पूरे विश्व को दो हिस्सों- ‘दारुल इस्लाम’ (इस्लाम का घर) तथा ‘दारुल हरब’ (युद्ध का घर) में बांटा है। दारुल इस्लाम वह भूमि है जहाँ शरीयत का कानून चलता है जबकि दारुल हरब वह भूमि है जहाँ शरीयत के अनुसार शासन नहीं चलता। इसे ‘दारुल कुफ्र’ भी कहते हैं। दारुल हरब को पुनः तीन भागों में विभक्त किया गया है-

(1) दारुल अहद- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों का बहुमत है।

(2) दारुल सुलह- अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जहाँ अल्लाह को नहीं मानने वालों ने मुसलमानों से शांति का समझौता कर रखा है।

(3) दारुल दावा- (Proselytizing or preaching of Islam) अर्थात् वह गैर इस्लामिक देश जिसके लोगों को इस्लाम की शिक्षा देकर उनका धर्मांतरण किया जाना है।

इस्लाम के प्रसार के इस चिंतन से प्रभावित मुसलमान पूरे विश्व को दारुल इस्लाम में बदलना चाहते थे। इसलिए जहाँ भी मुस्लिम सेनाएं गईं, उन्होंने बुतपरस्तों (मूर्ति-पूजकों) को काफिर (नास्तिक) कहकर उनकी हत्याएं कीं अथवा उन्हें गुलाम बनाया। उन्होंने लोगों के सामने दो ही विकल्प छोड़े या तो मुसलमान बन जाओ या मर जाओ।

एक तीसरा किंतु संकरा रास्ता और भी था जिसके अंतर्गत काफिरों को जिम्मी अर्थात् ‘रक्षित-विधर्मी’ घोषित किया जाता था जो जजिया देकर मुसलमानों के राज्य में जिंदा रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सूफियों के प्रेम तराने भी पाकिस्तान की जड़ों को पनपने से नहीं रोक सके

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भारत की धरती पर विगत लगभग एक हजार साल से सूफियों के प्रेम तराने गूंज रहे हैं। सूफी फकीरों एवं दरवेशों ने भारतीय वेदान्त के प्रेमतत्व को अपने गीतों में ढालकर भारत की धरती को प्रेम और भक्ति की दीवानगी से भर दिया। सूफी-मत का आदि स्रोत शामी जातियों की आदिम प्रवृत्तियों में मिलता है जो सीरिया के आसपास शाम नामक देश में रहते थे।

सूफी मत की आधारशिला रति-भाव था जिसका पहले-पहल शामी जातियों ने विरोध किया। मूसा और हजरत मुहम्मद ने संयत भोग का विधान किया। मूसा ने प्रवृत्ति मार्ग पर जोर देकर लौकिक प्रेम का समर्थन किया। सूफी ‘इश्क मजाजी’ को ‘इश्क हकीकी’ की पहली सीढ़ी मानते हैं। सूफी मत पर इस्लाम की गुह्य विद्या, आर्यों के अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, नव-अफलातूनी मत एवं विचार स्वातंत्र्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है तथा सूफी-मत को ‘जीवन का क्रियात्मक धर्म’ कहा जाता है।

भारत में इस्लाम के साथ-साथ सूफी-मत का भी प्रवेश हुआ। सूफी मत, अपने वर्तमान स्वरूप में इस्लाम का एक वर्ग अथवा समुदाय है और उतना ही प्राचीन है जितना कि इस्लाम। सूफी प्रचारक कई वर्गों तथा संघों में विभक्त थे। अरब से लेकर मध्य एशिया में उनके अलग-अलग केन्द्र थे, जहाँ से चलकर वे भारत पहुंचे थे। इस्लाम की ही तरह सूफी मत का भी भारत में तीव्र गति से प्रचार हुआ। हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही सूफी सन्तों की ओर आकृष्ट हुए और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हुए।

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अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया, नागौर में हमीदुद्दीन नागौरी जैसे सैंकड़ों सूफियों ने इस्लाम को हिन्दुओं के निकट लाने का काम किया। भारत विभाजन के समय जिन पंजाब और सिंध को सर्वाधिक खून के आंसू बहाने पड़े, उन पंजाब और सिंध की धरती सैंकड़ों सालों से सूफियों के प्रेम-तरानों से गुंजारित थी। 12वीं सदी के सूफी बाबा फरीद, सत्रहवीं सदी के सूफी कवि बाबा अब्दुल रहमान, डेरा गाजी खान के साखी सरवर, चमकानी के फंडू बाबा, सूफी दरवेश अब्दुल्लाह शाह गाजी, बुल्लेशाह, वारिसशाह आदि सूफी संत पंजाब की धरती को अपने प्रेम-तरानों एवं विरह गीतों से सिंचित करते रहे।

पंजाबी कवि बुल्लेशाह

सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में जब औरंगजेब भारत का सम्पूर्ण इस्लामीकरण करने के नाम पर भारत के चप्पे-चप्पे को रक्त से भिगो रहा था, उस समय ई.1680 में पंजाब के बहावलपुर राज्य के ‘गिलानियाँ’ अथवा मुल्तान क्षेत्र के कसूर नामक शहर में बुल्लेशाह नामक एक सूफी दरवेश पैदा हुआ। आज यह क्षेत्र पाकिस्तान में है। बुल्लेशाह की मृत्यु ई.1757 के आसपास हुई। उसकी कविताओं को काफ़ियाँ कहा जाता है। बुल्लेशाह पैगम्बर मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा के वंशजों में से थे। बुल्लेशाह जब बड़े हुए तो शाह इनायत के चेले बन गए। बुल्लेशाह का परिवार पैग़म्बर मुहम्मद की बहिन का वंशज होने से ऊँची ‘सैय्यद’ जाति का था जबकि शाह इनायत ‘आराइन’ जाति से थे जिन्हें नीची जाति का माना जाता था लेकिन जाति-पांति के भेद-भाव से दूर बुल्लेशाह अपने गुरु शाह इनायत से जुड़े रहे और प्रेम-तराने गाते रहे। अपने एक गीत में उन्होंने कहा-

बुल्ले नूँ समझावन आँईयाँ भैनाँ ते भरजाईयाँ

मन्न लै बुल्लेया साड्डा कैहना, छड्ड दे पल्ला राईयाँ

आल नबी, औलाद अली, नूँ तू क्यूँ लीकाँ लाईयाँ?

जेहड़ा सानू सईय्यद सद्दे, दोज़ख़ मिले सज़ाईयाँ

जो कोई सानू राईं आखे, बहिश्तें पींगाँ पाईयाँ

राईं-साईं सभनीं थाईं रब दियाँ बे-परवाईयाँ

सोहनियाँ परे हटाईयाँ ते कूझियाँ ले गल्ल लाईयाँ

जे तू लोड़ें बाग़-बहाराँ चाकर हो जा राईयाँ

बुल्ले शाह दी ज़ात की पुछनी? शुकर हो रज़ाईयाँ!

अर्थात्- बुल्ले को समझाने के लिए बहनें और भाभियाँ आईं और उन्होंने कहा हमारा कहना मान बुल्ले, आराइनों का साथ छोड़ दे। तू नबी के परिवार और अली के वंशजों में से है। बुल्ले ने जवाब दिया- जो मुझे सैय्यद बुलाएगा उसे दोज़ख़ (नरक) में सज़ा मिलेगी। जो मुझे आराइन कहेगा उसे बहिश्त (स्वर्ग) के सुहावने झूले मिलेंगे। आराइन और सैय्यद इधर-उधर पैदा होते रहते हैं, परमात्मा को ज़ात की परवाह नहीं। वह ख़ूबसूरतों को परे धकेलता है और बदसूरतों को गले लगता है। अगर तू बाग़-बहार (स्वर्ग) चाहता है तो आराइनों का नौकर बन जा। बुल्ले की ज़ात क्या पूछता है? ऊपर वाले की बनाई दुनिया के लिए शुक्र मना।

सिन्धी संत झूलेलाल तथा शाहबाज़ क़लन्दर

पंजाबी मिश्रित सिन्धी भाषा में लिखा गया ‘दमादम मस्त क़लन्दर’ नामक गीत भारतीय उपमहाद्वीप का अत्यंत लोकप्रिय एवं बहुत लम्बा सूफ़िआना गीत है जो सिन्ध प्रांत के महान संत झूले लाल क़लन्दर को सम्बोधित करके उनके सामने एक माँ की फ़रियाद रखता है। झूले लाल के साथ-साथ इसमें सूफ़ी संत शाहबाज़ क़लन्दर का भी उल्लेख है। झूले लाल साईं हमेशा लाल चोगा पहनते थे, इसलिए उन्हें ‘लाल’ या ‘लालन’ नाम से पुकारा जाता है। गाने का हर छंद ‘दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर’ पर पूरा होता है जिसका अर्थ है- ‘दम-दम में मस्ती रखने वाला क़लन्दर (फ़क़ीर), जो हर सांस में रब (अली) को रखता है।’ इस गीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं-

ओ लाल, मेरी पत्त रखियो बला झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

चार चिराग़ तेरे बरन हमेशा,

पंजवां बारन आईआं बला झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

हिंद-सिंद पीरा तेरी नौबत वाजे,

नाल वजे घड़ेयाल बला झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

मावाँ नूं पीरा बच्चड़े देना ई,

पैणा नूं देना तूं वीर मिला झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

उच्चा रोज़ा पीरा तेरा,

हेठ वग्गे दरिया बला झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

हर दम पीरा तेरी ख़ैर होवे,

नाम-ए-अली बेड़ा पार लगा झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

अर्थात्- हे लाल, मेरी रक्षा कीजिये, ऊंचे झूले लाल, सिन्ध का और सेरवन का संत शाहबाज़ क़लन्दर! दम-दम में मस्त फ़क़ीर, हर सांस में रब! तेरी मज़ार पर चार चिराग़ हमेशा जलते रहते हैं, तेरे आदर में पांचवां दिया जलाने के लिए मैं आई हूँ। …… हे पीर, पूरे हिंदुस्तान और सिन्ध में तेरी महानता गूंजती है, और तेरी मज़ार के बड़े घंटे की आवाज़ फैलती है। …… हे पीर, झोली फैलाने वाली माओं को तू बच्चे देता है, मांगने वाली बहनों को तू भाई देता है। …… ओ पीर, तेरा डेरा पहाड़ की ऊंचाई पर है, नीचे दरिया बहता है …… हे पीर, हर जगह तेरी जीत हो, अली के नाम पर भवसागर में मेरा बेड़ा पार लगा दे। …… सिन्ध का और सेरवन का संत शाहबाज़ क़लन्दर! हे हर सांस में मस्त फ़क़ीर!

भगवान झूलेलाल के संदेश

सिंध की भूमि पर भगवान झूले लाल को लेकर लिखे गए सूफियों के प्रेम तराने अलग ही मिठास रखते हैं। सिन्धी समाज में मान्यता है कि चेटीचण्ड के दिन वरुण देव ने अवतार लिया तथा प्रजा को मिरखशाह नामक दुष्ट शासक के अत्याचारों से मुक्ति दिलवाई। उनके बचपन का नाम उडेरोलाल था किंतु बाद में उन्हें झूलेलाल तथा लालसांई के नाम से जाना गया। सिंध क्षेत्र के मुसलमान उन्हें ख्वाजा खिज्र जिन्दह पीर के नाम से पूजते हैं। उनके प्रमुख संदेश इस प्रकार थे-

– ‘ईश्वर अल्लाह हिक आहे।’ अर्थात् ईश्वर अल्लाह एक हैं।

– ‘कट्टरता छदे, नफरत, ऊंच-नीच एं छुआछूत जी दीवार तोड़े करे पहिंजे हिरदे में मेल-मिलाप, एकता, सहनशीलता एं भाईचारे जी जोत जगायो।’ अर्थात् विकृत धर्मांधता, घृणा, ऊंच-नीच और छुआछूत की दीवारें तोड़ो और अपने हृदय में मेल-मिलाप, एकता, सहिष्णुता और भाईचारे के दीप जलाओ।

– ‘सभनि हद खुशहाली हुजे।’ अर्थात्- सब जगह खुशहाली हो।

– ‘सजी सृष्टि हिक आहे एं असां सभ हिक परिवार आहियू।’ अर्थात् समस्त सृष्टि एक है, हम सब एक परिवार हैं।

वारिसशाह की हीर-राँझा

सूफियों के प्रेम तराने वारिस शाह के गीतों में भी अपने पूरे ठाठ के साथ मुखरित हुए हैं। सूफी संत प्रेम में ईश्वर को और ईश्वर में प्रेम को देखते थे। उन्होंने बहुत से विख्यात प्रेमाख्यानों की रचना की। हीर-राँझा जैसे प्रेमाख्यान पर वे भला कैसे नहीं झूम जाते! इस प्रेमाख्यान को सैंकड़ों, कवियों, लेखकों एवं साहित्यकारों ने अपनी-अपनी तरह से लिखा किंतु हीर की पीर को ओर राँझा के प्रेम को पंजाबी सूफी कवि वारिसशाह ही सर्वाधिक मार्मिक शब्द दे सका। वारिसशाह ने अपनी कविता हीर-राँझा में चिनाब नदी के किनारे स्थित तख्त हजारा गांव तथा उसके लड़कों का वर्णन इस रसमय ढंग से किया-

केही तख़त हज़ारे दी सिफ़त कीजे, जित्थे रांझ्यां रंग मचायआ ए ।

छैल गभ्भरू, मसत अलबेलड़े नी, सुन्दर हिक्क थीं हिक्क सवायआ ए ।

वाले कोकले, मुन्दरे, मझ लुंङी, नवां ठाठ ते ठाठ चड़्हायआ ए ।

केही सिफ़त हज़ारे दी आख सकां, गोया बहशत ज़मीन ते आया ए ।

अर्थात्- चेनाब नदी के किनारे की सुन्दर बस्ती तख्त हजारा की क्या प्रशंसा करें जहाँ रांझों ने रौनक कर रखी है। यहाँ के मस्त, अलबेले सुंदर नौजवान देखते ही बनते हैं। दरिया की लहरों और बगीचों की सुगंधित हवाओं के कारण ऐसा लगता है मानो स्वर्ग ही धरती पर आ गया है। यही रांझाओं की धरती है जो मस्ती से यहाँ रहते हैं। इस बस्ती के नौजवान खूबसूरत और बेपरवाह किस्म के हैं। वे कानों में बालियाँ पहनते और कंधांे पर नए शॉल रखते हैं। उन्हें अपनी खूबसूरती पर गर्व है और वे सब इस मामले में एक-दूसरे को मात देते हुए प्रतीत होते हैं।

हीर के रूप-लावण्य की प्रशंसा करते हुए कवि कहता है-

केही हीर दी करे तारीफ शायर, मत्थे चमकदा हुसन महताब दा जी ।

ख़ूनी चूंडियां रात ज्यु चन्न गिरदे, सुरख रंग ज्युं रंग शहाब दा जी ।

नैन नरगसी मिरग ममोलड़े दे, गल्ल्हां टहकियां फुल्ल गुलाब दा जी ।

भवां वांङ कमान लाहौर दे सन, कोई हुसन ना अंत हिसाब दा जी ।

सुरमा नैणां दी धार विच्च फब रहआ, चंगा हिन्द ते कटक पंजाब दा जी।

अर्थात्- कवि, ‘हीर’ की भला क्या प्रशंसा करे! उसका माथा ऐसे चमक रहा है जैसे चंद्रमा का सौन्दर्य हो। उसकी लाल चूड़ियां इतनी सुर्ख हैं जैसे आग की लपटें हों। उसके नरगिसी आंखें मृगशावक की आंखों जैसी हैं तथा गाल गुलाब के फूलों जैसे लगते हैं। उसकी भौंहें लाहौरी तलवार की तरह खिंची हुई हैं। उसकी आंखों में सुरमा ऐसे सुशोभित हो रहा है जैसे हिन्दुस्तान और पंजाब की कोई भली सी सेना हो। उसके यौवन का कोई पार नहीं है।

यह ताकत सूफियों के प्रेम तराने की ही हो सकती थी।

इस प्रकार सूफियों द्वारा की गई प्रेम और रस की सृष्टि ने सैंकड़ों साल तक पंजाब वासियों के हृदयों में जिस आनंद की वर्षा की वह अन्य क्षेत्र के मानवों के लिए दुर्लभ है किंतु बुल्लेशाह, लालशाह, झूलेलाल तथा वारिस शाह जैसे सूफी फकीरों, चांद बीबी जैसे शासकों, गुरु नानक जैसे सिक्ख गुरुओं, रहीम एवं रसखान जैसे मुस्लिम कवियों और कबीरदास एवं रविदास जैसे हिन्दू संतों के ये प्रेम-प्रयास उस समय व्यर्थ प्रतीत होने लगे जब दोनों संस्कृतियों ने एक-दूसरे से अपनी दूरी यथावत् बनाए रखी।

हिन्दू और मुसलमान दोनों ही, अपने-अपने कारणों से एक-दूसरे के निकट आने के लिए कभी तैयार नहीं हुए। भारत की भूमि में भावी पाकिस्तान की जड़ें घृणा और वैमनस्य की खाद-पानी पाकर अनवरत विस्तार पाती रहीं। एक न एक दिन उन्हें धरती से बाहर निकलकर भारत का विभाजन करना ही था …… पाकिस्तान बनना ही था। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सूफियों के प्रेम तराने भी पाकिस्तान की जड़ों को पनपने से नहीं रोक सके!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक राजनीति

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ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक राजनीति ब्रिटिश भारत में साम्प्रदायिक राजनीति की शुरुआत ईस्ट इण्डिया कम्पनी के समय से ही हो गई थी। जैसे-जैसे गोरों का शासन आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे भारत में साम्प्रदायिक राजनीति भी गाढ़ी होती चली गई। यहाँ तक कि यह न केवल देश के विभाजन का अपितु हिन्दू संस्कृतिं के विनाश का मुख्य कारण बन गई।

ब्रिटिश-भारत और रियासती-भारत

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक राजनीति का इतिहास जानने से पहले हमें यूरोपीय जातियों के भारत में आगमन का इतिहास जानना होगा। ई.1498 में पहली बार पुर्तगाली व्यापारी वास्कोडिगामा के नेतृत्व में भारत आए। इन व्यापारियों ने भारत से इतना धन कमाया कि यूरोप के अन्य देश भी भारत आने के लिए लालायित हो उठे।

पुर्तगालियों के बाद हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड) से डच, इंग्लैण्ड से अंग्रेज और फ्रांस से फ्रांसीसी व्यापारी भारत आए। डचों की गतिविधियां व्यापार करने तथा व्यापार के लिए कुछ भू-भागों पर अधिकार करने तक सीमित रहीं।

जब इंग्लैण्ड की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ई.1608 में भारत में प्रवेश किया तब इंग्लैण्ड पर महारानी एलिजाबेथ (प्रथम) का तथा भारत पर मुगल बादशाह जहाँगीर का शासन था। ई.1615 में अंग्रेजों का दूत सर टामस रो जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ तथा उसने कम्पनी के लिए कुछ व्यापारिक सुविधाएं प्राप्त कीं। ई.1644 में फ्रांसीसी व्यापारी भारत आए। इससे अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच भारत में व्यापारिक एवं राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता आरम्भ हो गयी किंतु ई.1760 में वैण्डीवाश के युद्ध के बाद भारत में फ्रैंच शक्ति परास्त हो गई।

ब्रिटिश-भारत का निर्माण

ई.1765 में बक्सर के मैदान में अंग्रेजों एवं मुगल बादशाह के बीच एक युद्ध लड़ा गया जिसमें मुगल बादशाह शाहआलम हार गया। इसके बाद मुगल बादशाह एवं अंग्रेजों के बीच एक संधि हुई जिसे इलाहाबाद की संधि कहा जाता है। इस संधि के बाद मुगल बादशाह को पेंशन देकर शासन के काम से अलग कर दिया गया तथा उसके क्षेत्रों पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दीवानी एवं फौजदारी अधिकार प्राप्त हो गए। अर्थात् अंग्रेज उत्तर-भारत के हरे-भरे मैदानों के प्रत्यक्ष स्वामी बन गए।

कम्पनी द्वारा समय-समय पर जीते गए पूर्वी भारत का असम एवं बंगाल, दक्षिण भारत का मद्रास, पश्चिमी भारत का बम्बई तथा उत्तर-पश्चिम के बिलोचिस्तान एवं सिंध आदि क्षेत्र भी अंग्रेजों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में थे जिन्हें मुगलों से लिए गए क्षेत्रों के साथ मिलाकर ब्रिटिश-भारत का निर्माण किया गया।

अंग्रेजों ने ब्रिटिश-भारत को 11 प्रांतों में बांटा जिनमें अलग-अलग गवर्नरों की नियुक्ति की गई- (1) बंगाल, (2) पंजाब, (3) सिंध, (4) उड़ीसा, (5) असम, (6) मद्रास, (7) बम्बई, (8) यूनाइटेड प्रोविंस, (9) बिहार, (10) सेण्ट्रल प्रोविन्स, (11) नॉर्थ-वेस्ट फ्रण्टीयर प्रोविन्स। इन ग्यारह प्रांतों के अतिरिक्त अंग्रेजों ने भारत में छः चीफ-कमिश्नरेट भी स्थापित कीं जिनके नाम इस प्रकार थे- (1) अजमेर-मेरवाड़ा, (2) अण्डमान एण्ड निकोबार आइलैण्ड्स, (3) बिलोचिस्तान, (4) कुर्ग, (5) दिल्ली, (6) पांठ-पीपलोदा।

ई.1769 में कम्पनी ने ब्रिटिश-प्रांतों में जिलों का गठन करके कलक्टरों की नियुक्ति की तथा जनता को बंदूक से चलने वाले कठोर शासन में जकड़ लिया। ई.1773 में रेग्यूलेटिंग एक्ट के माध्यम से भारत में गवर्नर जनरल की नियुक्ति की गई तथा कम्पनी को ब्रिटिश सम्राट के अधीन कर दिया गया। भारत के गवर्नर जनरल पर नियत्रंण रखने के लिए चार सदस्यों की एक एक्जीक्यूटिव काउंसिल गठित की गई।

इस प्रकार भारत में एक ऐसी संस्था की स्थापना की गई जो शीघ्र ही न केवल भारत सरकार कहलाने वाली थी अपितु बिलोचिस्तान से लेकर असम तथा काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों भारतीयों के जीवन पर शिकंजा जकड़ने में सक्षम सिद्ध होने वाली थी।

इलाहाबाद की संधि के बाद मुगल-शासित उत्तर भारत में तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सत्ता स्थापित हो गई किंतु मध्य भारत, राजपूताना, मराठवाड़ा, कर्नाटक, हैदराबाद आदि क्षेत्र असंरक्षित रह गए। इसे रियासती भारत कहा जाता था। रियासती-भारत में लगभग 550-600 देशी रियासतें थीं जिनकी संख्या घटती-बढ़ती रहती थी। भारत की आजादी के समय देश में 118 सैल्यूट स्टेट्स एवं 448 नॉन सैल्यूट स्टेट्स थीं।

जब अंग्रेजों ने मुगलों को सत्ता से बाहर कर दिया तब उनके सैनिक बेरोजगार होकर डकैत बन गए जिन्हें भारतीय इतिहास में पिण्डारी कहा गया। इसी प्रकार दक्षिण भारत में मराठों ने अपनी शक्ति का प्रसार कर लिया तथा वे नर्मदा नदी को पार करके राजपूताना, दिल्ली एवं पंजाब तक धाड़े मारते थे। कुछ समय बाद मराठों एवं पिण्डारियों में गठजोड़ हो गया तथा उनकी संयुक्त सेनाओं ने सम्पूर्ण 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध एवं उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में उत्तर भारत के देशी राज्यों एवं अंग्रेजी क्षेत्रों में हाहाकार मचा दिया।

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इस पर ई.1817-1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय राज्यों से सहायता की अधीनस्थ संधियां करके उन्हें संरक्षण प्रदान किया जिसके कारण देशी राज्यों के रक्षा एवं वैदेशिक मामलों का दायित्व ईस्ट-इण्डिया कम्पनी के पास चला गया और देशी राजा अपने राज्यों का आंतरिक प्रशासन करने तक सीमित हो गए।

ई.1857 में जब ब्रिटिश-भारत एवं राजपूताना रियासतों में सशस्त्र सैनिक क्रांति हुई तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस क्रांति को बलपूर्वक कुचल दिया किंतु ब्रिटेन के लोगों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध आवाजें उठानी शुरू कीं जिससे प्रेरित होकर ई.1858 में ग्रेट-ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की सरकार ने ‘ब्रिटिश-भारत’ का शासन अपने हाथों में ले लिया। इसके साथ ही, ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने राजपूताना की रियासतों सहित देश की 40 प्रमुख रियासतों से जो ‘सहायता की अधीनस्थ संधियां’ कर रखी थीं वे भी ज्यों की त्यों ब्रिटिश क्राउन को स्थानांतरित हो गईं।

इस प्रकार ब्रिटिश-क्राउन के अधीन भारत के दो टुकड़े थे। पहला टुकड़ा प्रत्यक्ष-ब्रिटिश-शासित-क्षेत्र था जिसे ‘ब्रिटिश-इण्डिया’ अथवा ‘आंग्ल-भारत’ कहा जाता था। दूसरा टुकड़ा ‘देशी-राजाओं द्वारा शासित क्षेत्र’ था जिसे ‘इण्डियन-इण्डिया’ अथवा ‘रियासती-भारत’ कहा जाता था।

ब्रिटिश-क्राउन भारत के पहले टुकड़े पर गवर्नर जनरल के माध्यम से शासन करता था तो दूसरे टुकड़े पर वायसराय के माध्यम से शासन किया जाता था। व्यावहारिक रूप में इन दोनों पदों को एक ही व्यक्ति संभालता था। वायसराय के नीचे एक काउंसिल गठित की गई जिसके सदस्य वायसराय द्वारा मनोनीत किए जाते थे। ईस्वी 1858 के आगे भी यही व्यवस्था चलती रही। ब्रिटिश संसद ने इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं किया।

अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति दृष्टिकोण

ब्रिटिश जाति स्वयं को उच्च एवं भारतीयों को नीच जाति के रूप में देखती थी। लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है-

‘अंग्रेजों के मन में यह विश्वास जमता गया कि गोरी अंग्रेज जाति श्रेष्ठ और ऊंची है। काले भारतीय नीच और मूर्ख हैं। उन पर शासन करने की जिम्मेदारी ईश्वर नामक रहस्यमय शक्ति ने अंग्रेजों के ही कंधों पर रखी है। अंग्रेज वह जाति है जो केवल जीतने एवं शासन करने के लिए पैदा होती है।

….. भारतीयों पर शासन चलाने के लिए अंग्रेजों ने इण्डियन सिविल सर्विस की स्थापना की जिसमें 2000 अंग्रेज अधिकारी नियुक्त हुए। 10,000 अंग्रेज अधिकारियों को भारतीय सेना सौंप दी गई। तीस करोड़ की जनसंख्या को अनुशासन में रखने के लिए साठ हजार अंग्रेज सिपाही आ धमके। उनके अतिरिक्त दो लाख भारतीय सिपाही भारतीय सेना में थे ही।’

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक राजनीति का आधार

हिन्दू एवं मुसलमान पिछले लगभग सात सौ सालों से पूरे देश में फैले हुए थे तथा इनके बीच हर जगह लगभग एक जैसी साम्प्रदायिक समस्या थी। ई.1858 से पहले तक अंग्रेज भारतीय मुसलमानों एवं हिन्दुओं के झगड़ों को बलपूर्वक दबाते थे किंतु जैसे ही भारत की आजादी की लड़ाई आरम्भ हुई वैसे ही अंग्रेजों ने भारत की साम्प्रदायिक समस्या को अपनी ढाल के रूप में प्रयुक्त करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने हिन्दुओं एवं मुसलमानों को राजनीतिक स्तर पर उकसाना प्रारम्भ किया। अंग्रेज चाहते थे कि ये दोनों जातियां परस्पर झगड़ती रहें तथा अपने लिए आजादी की मांग नहीं करें।

अंग्रेजों की शह पाकर कुछ मुसलमान नेताओं ने साम्प्रदायिकता को ही अपनी राजनीति का आधार बना लिया। उनके विरोध में हिन्दू-प्रतिरोध ने भी सिर उठाया और देखते ही देखते ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिकता ही राजनीति का एकमात्र आधार हो गई।

अंग्रेजों ने देश में साम्प्रदायिकता की आग तो लगा दी किंतु उन्हें मालूम नहीं था कि इस आग की लपटें इतनी ऊँची उठेंगी कि मुसलमान अपने लिए एक अलग राष्ट्र की मांग करने लगेंगे तथा अंग्रेजों के लिए इस देश पर शासन करना असम्भव हो जाएगा। आगे चलकर ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक राजनीति ही अंग्रेजों के सर्वनाश का कारण बनी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण (1)

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ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या का मुख्य कारण भारत का मध्यकालीन इतिहास था जब मुसलमानों ने सत्ता, तलवार और लालच के बल पर लाखों हिन्दुओं को मुसलमान बनाया। इस्लामी आक्रांताओं का यह कार्य हिन्दुओं के लिए अत्यंत अपमानजनक था तथा उनके गौरव को पददलित करने वाला था। इस कारण भारतवासी कभी नहीं भूल पाये कि उनकी पहचान हिन्दू धर्म से है।

(1) इस्लाम का भारत की भूमि में बाहर से आना

‘हिन्दू-संस्कृति’ भारत भूमि पर जन्मी थी। इसी को रूढ़ अर्थ में ‘हिन्दू-धर्म’ तथा ‘हिन्दू-जाति’ कहा गया। यह भारत-भूमि पर आकार लेने वाला प्रथम धर्म है। इसलिए इसे ‘सनातन-धर्म’ भी कहते हैं। बाद में बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि कई पंथ इसी धर्म से निकले जिन्हें स्वीकार करने में हिन्दुओं को संकोच नहीं हुआ किंतु इस्लाम, विजेता के रूप में बाहर से भारत में आया इसलिए भारतवासियों के लिए इस्लाम को अंगीकार करना सहज रूप से स्वीकार्य नहीं हुआ।

(2) हिन्दू धर्म एवं इस्लाम में मौलिक भिन्नताएँ

जिस समय इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया, उस समय तक लगभग समस्त हिन्दू जाति देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तथा उनके लिए मंदिर बनाकर उनकी पूजा करती थी किंतु इस्लाम में मूर्ति-पूजा को अधर्म समझा जाता था। इसलिए इस्लामी आक्रांताओं ने हिन्दू-देवालयों एवं देव-विग्रहों को तोड़ने के प्रति विशेष आग्रह प्रदर्शित किया तथा इस दुराग्रह को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। इसी प्रकार हिन्दू-जाति गाय को देवी-देवताओं के समान पूज्य मानती आई है किंतु मुसलमान गायों को काटकर उनका मांस खाते थे। इस कारण हिन्दू कभी भी इस्लाम के प्रति मुलायम दृष्टिकोण नहीं अपना सके।

हिन्दू अनेक देवी-देवताओं में विश्वास करते थे किंतु मुसलमान एक अल्लाह में विश्वास करते हैं। हिन्दू गंगा नहाते हैं एवं चार धामों की यात्रा करते हैं जबकि मुसलमान हज करने मक्का जाते हैं। हिन्दू तिलक, चोटी एवं जनेऊ को अपनी पहचान मानते हैं जबकि मुसलमान सुन्नत, बुर्का एवं तीन तलाक को मुसलमानियत की पहचान समझते हैं। ऐसी स्थिति में ये दोनों संस्कृतियां एक दूसरे को कैसे सहन कर सकती थीं! हिन्दुओं और मुसलमानों ने अपनी-अपनी दाढ़ी-मूंछों, भाषा, खानपान एवं पहनावे में भी यत्न-पूर्वक अंतर बनाए रखा। मुसलमान अपनी पहचान कुरान से तथा हिन्दू अपनी पहचान वेद, रामायण एवं गीता से करते रहे।

(3) हिन्दुओं द्वारा स्वयं को रूढ़ियों की कारा में बंद कर लेना

हिन्दुओं ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए स्वयं को जातियों, संस्कारों, धार्मिक परम्पराओं एवं रूढ़ियों की ऐसी मजबूत कारा में बंद कर लिया जिसमें मुस्लिम जीवन शैली की स्वीकार्यता के लिए किंचित भी अवकाश नहीं था। वे मुसलमानों के हाथ का छुआ अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करते थे। शुद्धता एवं पवित्रता के प्रति हिन्दुओं के इस आग्रह को मुसलमान उनका घमण्ड समझते थे। ऐसी परिस्थितियों में भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की आग सदैव प्रज्जवलित रही।

(4) मुसलमानों का राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में पिछड़ जाना

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या का एक बड़ा कारण मुसलमानों का राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में पिछड़ जाना था। भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना के पूर्व, मुस्लिम समाज दो वर्गों में विभाजित था- प्रथम वर्ग में वे लोग थे जो विदेशों से आये आक्रांताओं, व्यापारियों तथा धर्म प्रचारकों के वंशज थे।

दूसरे वर्ग में वे भारतीय थे जो भय अथवा लालच से ग्रस्त होकर, परिस्थिति वश, बल-पूर्वक अथवा स्वेच्छा से धर्म-परिवर्तन करके मुसलमान बन गये थे अथवा ऐसे लोगों की सन्तान थे। प्रथम वर्ग के लोग शासन संभालते थे तथा उनका शासन एवं शासकीय नौकरियों पर एकाधिकार था। यह ‘मुस्लिम अभिजात्य वर्ग’ था।

दूसरे वर्ग के लोग खेती-बाड़ी या अन्य छोटे-मोटे काम करते थे। धर्म-परिवर्तन के बाद भी दूसरे वर्ग के आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक स्तर में कोई उल्लेखीय परिवर्तन नहीं हुआ था। प्रथम वर्ग अर्थात् मुस्लिम अभिजात्य वर्ग का राजनीतिक प्रभुत्व 18वीं और 19वीं शताब्दी में बंगाल, अवध तथा दिल्ली द्वारा अँग्रेजों के समक्ष घुटने टेक देने के साथ समाप्त हो चुका था किंतु मुस्लिम अभिजात्य वर्ग, राजनीतिक प्रभुत्व का इतना अधिक अभ्यस्त था कि इसने कभी व्यापार अथवा किसी अन्य कार्य की ओर ध्यान नहीं दिया।

सरलता से धन प्राप्त होते रहने से इस वर्ग में अकर्मण्यता व्याप्त थी। प्रतिष्ठा बनाये रखने के दिखावे ने इस वर्ग को भीतर और बाहर दोनों तरफ से खोखला कर दिया। अंग्रेजों द्वारा किए गए भूमि के स्थायी बन्दोबस्त के कारण अभिजात्य वर्ग के मुसलमानों की आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो गई।

(5) अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति से दूर रहना

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या का एक बड़ा कारण मुसलमानों का अपने अतीत में डूबे हुए रहकर मदरसों में तालीमी शिक्षा प्राप्त करना और अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति से दूर रहना था।

मुसलमानों ने केवल कुरान और हदीस की शिक्षा को ही वास्तविक शिक्षा समझा तथा अँग्रेजी शिक्षा-पद्धति को नहीं अपनाया। इस प्रवृत्ति ने मुसलमानों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रगति को अवरुद्ध कर दिया। अंग्रेजी शिक्षा से वंचित मुसलमानों को सरकारी नौकरियां नहीं मिल सकीं क्योंकि अँग्रेजी राज में सरकारी नौकरियों के लिए अँग्रेजी शिक्षा की डिग्रियां आवश्यक थीं। इस क्षेत्र में हिन्दू उनसे आगे निकल गये।

मुसलमानों की स्थिति के सम्बन्ध में विलियम हण्टर ने लिखा है- ‘एक अमीर, गौरव-पूर्ण तथा वीर जाति को निर्धन तथा निरक्षर जन-समूह में बदल दिया गया और उसके उत्साह तथा गर्व को मिट्टी में मिला दिया गया।’ अँग्रेजों के शासन में मुसलमानों के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में आई गिरावट के कारण मुसलमान स्वयं को उपेक्षित अनुभव करने लगे और उनमें असन्तोष तथा विद्रोह की भावना पनप गई।

(6) अँग्रेजों का हिंदुओं पर विश्वास एवं मुसलमानों पर अविश्वास

ई.1857 के प्रथम स्वातन्त्र्य संग्राम के बारे में सर जेम्स आउट्रम का मत था- ‘यह विद्रोह मुसलमानों के षड़यंत्र का परिणाम था जो हिन्दुओं की शक्ति के बल पर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे।’ वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘यह हिन्दू शिकायतों की आड़ में मुस्लिम षड़यंत्र था जो पुनः मुगल बादशाह के नेतृत्व में मुस्लिम सत्ता स्थापित करना चाहते थे।’

विद्रोह के काफी समय बाद बेगम जीनत महल ने देशी शासकों को पत्र लिखे, जिनमें उसने मुगल बादशाह की अधीनता में, अँग्रेजों को देश से बाहर निकालने की बात लिखी। अतः जेम्स आउट्रम एवं स्मिथ के कथनों में कुछ सच्चाई प्रतीत होती है।

बहादुरशाह के मुकदमे के जज एडवोकेट जनरल मेजर हैरियट ने मुकदमे में पेश हुए समस्त दस्तावेजों का अच्छी तरह से अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला- ‘आरम्भ से ही षड्यंत्र सिपाहियों तक सीमित नहीं था और न उनसे वह शुरू ही हुआ था, अपितु इसकी शाखाएं राजमहल (लालकिला) और शहर (दिल्ली) में फैली हुई थीं।’

(7) ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण 1857 की क्रांति

यह सच है कि ई.1857 की क्रांति में हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों ने अधिक बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था किंतु इस सच्चाई से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस क्रांति में देश के केवल 1/3 मुसलमानों ने भाग लिया था। बड़ी मुस्लिम शक्तियों में केवल अवध की बेगम जीनत महल तथा लाल किले का बादशाह बहादुरशाह ही इस क्रांति में सम्मिलित हुए थे। जबकि व्यापक फलक पर नाना साहब, झांसी की रानी, तात्या टोपे, कुंवरसिंह और अवध के हिन्दू ताल्लुकेदारों ने क्रांति का वास्तविक संचालन किया था।

लॉर्ड केनिंग आरम्भ में इसे मुसलमानों द्वारा किया गया षड्यन्त्र मानते थे किंतु बाद में उन्होंने अपनी धारणा बदल ली। उन्होंने भारत सचिव को लिखे एक पत्र में स्वीकार किया- ‘मुझे कोई संदेह नहीं है कि यह विद्रोह ब्राह्मणों और दूसरे लोगों के द्वारा धार्मिक बहानों पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिये भड़काया गया था।’

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि जहाँ हिन्दू सेनानायक, विदेशी शासन से मुक्ति के लिये लड़े, वहीं मुसलमानों के एक बड़े वर्ग ने बहादुरशाह के नेतृत्व में मुगल शासन की पुनर्स्थापना के लिये संघर्ष किया। लॉर्ड केनिंग द्वारा प्रस्तुत इस निष्कर्ष के उपरांत भी भारत में नियुक्त अंग्रेज पूरी तरह हिन्दुओं अथवा पूरी तरह मुसलमानों को इस क्रांति के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सके किंतु उनमें यह सामान्य धारणा बन गई थी कि ई.1857 की क्रांति में हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों ने अधिक उत्साह दिखाया था।

बहुत से अंग्रेज मानते थे कि ई.1857 का विद्रोह मुसलमानों द्वारा, अपने खोये हुए शासन की पुनर्प्राप्ति का प्रयास था। अतः इस क्रांति के दमन के बाद अँग्रेजों ने मुसलमानों पर विश्वास करना बंद करके हिन्दुओं का पक्ष लेना आरम्भ कर दिया। शासन के इस असमान व्यवहार के कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दूरियां और बढ़ीं। इस नीति से अंग्रेज हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सैंकड़ों सालों से चली आ रही खाई को और चौड़ी करके उसका लाभ अपने पक्ष में लेना चाहते थे।

………… लगातार (2)

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