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ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा कांग्रेस का विरोध

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ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा कांग्रेस का विरोध

यद्यपि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा की गई थी तथापि कुछ वर्षों की अवधि में कांग्रेस की भाषा बदल गई इस कारण ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा कांग्रेस का विरोध किया जाने लगा।

कांग्रेस की स्थापना वायसराय लॉर्ड डफरिन की स्वीकृति से हुई थी तथा इसकी स्थापना के पीछे सरकार का उद्देश्य राष्ट्रीय आन्दोलन के हिंसक मार्ग को संवैधानिक मार्ग की तरफ मोड़ना था। सरकार को विश्वास था कि कांग्रेस का नेतृत्व ऐसे सम्पन्न एवं आराम-पसन्द भारतीयों के हाथों में रहेगा जो न तो हिंसक मार्ग अपनायेंगे और न सरकार की कटु आलोचना करेंगे।

इस प्रकार कांग्रेस, सरकार द्वारा निर्देशित मार्ग पर चलती रहेगी। यही कारण है कि कांग्रेस के प्रथम तीन अधिवेशनों के अवसर पर सरकार की ओर से कांग्रेस के प्रतिनिधियों को चाय-पार्टियाँ दी गईं।

उदारवादी नेता बहुत ही विनम्र भाषा का प्रयोग कर रहे थे तथा अंग्रेजी राज्य के भीतर स्वशासन की मांग कर रहे थे तब भी ई.1988 में ह्यूम और डफरिन के सम्बन्ध बिगड़ गये। इस कारण सरकारी नीति में परिवर्तन आ गया। अँग्रेज शासक, भारतीयों के समानता के दावे को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। 30 नवम्बर 1888 को लॉर्ड डफरिन ने अपने भाषण में कांग्रेस द्वारा की गई संसदीय सरकार की मांग की खिल्ली उड़ायी और कांग्रेस को एक सीमित वर्ग की संस्था कहा।

डफरिन ने सख्त शब्दों में कहा- ‘भारत के कुछ सुशिक्षित व मनीषी यह चाहते हैं कि सरकार लोकतांत्रिक हो, नौकरशाही उसके अधीन हो और उन्हें राष्ट्र के खजाने पर अधिकार मिल जाए और शनैः शनैः ब्रिटिश पदाधिकारी उनके सामने करबद्ध खड़े हों।’

डफरिन द्वारा इस प्रकार के विचार प्रकट किये जाने के बाद ब्रिटिश शासक कांग्रेस के विरोधी बन गये और उसके समाप्त होने की कामना करने लगे। सरकार ने कांग्रेस के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करना आरम्भ कर दिया। चौथा अधिवेशन ई.1888 में दिसम्बर के अंतिम दिनों में इलाहाबाद में होना था।

वहाँ के गवर्नर ऑकलैण्ड कोलविन ने प्रयास किया कि उसके प्रांत में अधिवेशन के लिए पैसा एकत्र न हो, अधिवेशन के लिए कांग्रेस का प्रचार न होने पाए और अधिवेशन के लिए कांग्रेस को इलाहाबाद में कोई जगह न मिले। यदि महाराजा दरभंगा ने सहायता न की होती तो कांग्रेस को कोई स्थान नहीं मिल पाता।

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महाराजा ने लोथर कैसल नामक भवन खरीद कर कांग्रेस को दे दिया। सरकारी अधिकारियों ने लोगों पर दबाव डालना आरम्भ किया कि वे कांग्रेस के अधिवेशन में सम्मिलित न हों। मुसलमानों, देशी राजाओं तथा जमींदारों को कांग्रेस से दूर रखने का प्रयास किया गया। सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने पर रोक लगा दी।

भारत सचिव हेमिल्टन ने कांग्रेस को धन देने वालों पर निगरानी रखने का आदेश जारी कर दिया। कुछ प्रान्तों के गवर्नरों ने तो यह सुझाव भी दिया कि कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों पर रोक लगा दी जाये किन्तु यह सुझाव स्वीकार नहीं हुआ। ई.1895 के बाद कांग्रेस के प्रति सरकार का दृष्टिकोण दिनों-दिन कठोर होता गया। मुस्लिम नेता सर सैयद अहमद ने आरम्भ से ही कांग्रेस का विरोध किया था। जब सरकार ने प्रारम्भ में कांग्रेस की सहायता की तो उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि- ‘यह सहायता बन्द की जाये। सरकार को हिन्दू कांग्रेस की तरफ नहीं झुकना चाहिए।’

जब सरकार ने कांग्रेस विरोधी नीति पर चलना आरम्भ किया तो सर सैयद अहमद को अत्यधिक प्रसन्न्ता हुई और वे कांग्रेस की निन्दा तथा सरकार की प्रशंसा करने लगे।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने लिखा है- ‘नौकरशाही ने आरम्भ में तो कांग्रेस आन्दोलन का मजाक उड़ाया, फिर गाली-गलौच पर उतर आई और अन्त में सशक्त होकर इसके विरुद्ध दमन की नीति अपनाई।’

रैम्जे मेकडोनल्ड ने लिखा है- ‘राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति काफी सीमा तक सरकार की नीति पर निर्भर करती थी, जो आरम्भ में मैत्रीपूर्ण रही किन्तु बाद में घोर विरोध की हो गई।’

अयोध्यासिंह ने लिखा है- ‘कांग्रेस को नेस्तनाबूद करने के लिए ब्रिटिश अधिकारी अपने वफादार चाकरों और खैरख्वाहों को लेकर उस पर टूट पड़े। एक तरफ वायसराय डफरिन और पश्चिमोत्तर प्रदेश के गवर्नर कोलविन ने, दूसरी तरफ बनारस के राजा और हैदराबाद के नवाब ने, तीसरी तरफ सर सैयद अहमद और राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद ने, चौथी तरफ ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन ने तथा पांचवी तरफ सर दिनशा मानकजी पेटिट और अन्य धनी पारसियों ने आक्रमण किये। ब्रिटिश नौकरशाही ने मुसलमानों और पारसियों को, हिन्दुओं के एक बड़े हिस्से को, जमींदारों और धनी-मानी व्यक्तियों को कांग्रेस से अलग कर देने और उसका दुश्मन बना देने की कोशिश की।’

उदारवादी नेता सरकार को नाराज नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सरकार की नाराजगी को चुपचाप सहन कर लिया और अविचलित भाव से काम करते रहे।

कहा जा सकता है कि उदारवादियों ने याचक रहते हुए भी भारतीयों के लिये प्रतिनिधि संस्थाओं में अधिकाधिक प्रतिनिधित्व देने, विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने, प्रेस को स्वतन्त्रता देने तथा उच्च प्रशासनिक पदों पर भारतीयों को भी समान रूप से नियुक्ति देने के लिये सरकार पर दबाव बनाया।

उदारवादी नेताओं ने आर्थिक विकास के प्रति राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने कराधान की एक न्यायसंगत पद्धति अपनाने की वकालत की जिसके अन्तर्गत जनता भुगतान कर सकने में समर्थ हो सके। उन्होंने औद्योगीकरण पर बल दिया, जिससे राष्ट्रीय आय के साधनों में वृद्धि हो सके और बेरोजगारों को काम मिल सके। उनकी सफलताएँ सरहानीय थीं और देश की आजादी की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हुईं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

उग्र हिन्दुत्ववादी नेता

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कांग्रेस अपने जन्म के समय से नरमपंथी नेताओं के हाथों में रही किंतु जैसे-जैसे समय बदला, कांग्रेस पर उग्र हिन्दुत्ववादी नेता हावी होते चले गए। उग्र हिन्दुत्ववादी नेताओं ने कांग्रेस को अंग्रेजों की छाया से बाहर निकाला।

पुनर्जागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र तथा बंकिमचंद्र चटर्जी आदि समाज सुधारकों एवं चिंतकों ने भारतीय राजनीति के लिए उग्र राष्ट्रवाद की आधार भूमि तैयार की क्योंकि उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन के चेहरे पर हिन्दू लक्षण बहुत स्पष्ट था किंतु कांग्रेस की स्थापना करके ब्रिटिश सरकार ने उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन की धारा मंदी कर दी।

कांग्रेस के उदारवादी नेता ब्रिटिश सरकार से विधान सभाओं में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि, भारत सचिव की कौंसिल में भारतीयों की नियुक्ति, सरकारी नौकरियों में भारतीयों को अँग्रेजों के समान अवसर, भू-राजस्व की दर में कमी, भारतीय उद्योगों को सरंक्षण आदि मांगें करते रहे किन्तु ब्रिटिश सरकार ने इन मांगों पर बहुत कम ध्यान दिया। इससे युवा कांग्रेसी नेताओं का यह भ्रम टूटने लगा कि इंग्लैण्ड की सरकार भारत में भारतीयों के लिये भी वैसी ही व्यवस्था करेगी जैसी कि अँग्रेजों के लिये इंग्लैण्ड में थी।

इस कारण कांग्रेस में युवा नेताओं का एक नया गुट उभर कर सामने आया जिसने संघर्ष के माध्यम से सरकार पर दबाव डालने का निश्चय किया। अँग्रेज लेखकों ने इस नवीन नेतृत्व को उग्र राष्ट्रीयता, उग्रवादी तथा गरम दल नेता कहा। उग्र हिन्दुत्ववादी नेता अपने पूर्वज नेताओं की तरह मुलायम भाषा में बात नहीं करते थे अपितु उनमें उग्रता का पुट अधिक था।

इस कारण उनके द्वारा चलाए गए आंदोलन को उग्र राष्ट्रवाद, उग्रवाद तथा रेडिकल नेशनलिस्ट मूवमेंट कहा जाता है। इन युवा उग्रवादी नेताओं ने वृद्ध एवं उदारवादी नेताओं का विरोध किया जो अँग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास रखते थे और आवेदन-निवेदन, तथा स्मरण-पत्रों के माध्यम से भारतीयों को राजनीतिक अधिकार दिलवाना चाहते थे।

उग्र हिन्दुत्ववादी नेता उदारवादियों की भिक्षावृत्ति की शैली पसन्द नहीं करते थे। वे उग्र जन-आन्दोलन के माध्यम से भारतीयों के लिये राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने के लिए अधीर थे। उग्रवादी नेताओं का मानना था कि कमजोर विरोध तथा अस्थिर वैधानिक सुधारों से भारत की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इस कारण कांग्रेस में उग्र राष्ट्रवाद का दौर शुरू हुआ।

कांग्रेस में उग्रराष्ट्रवाद के जनक बाल गंगाधर तिलक थे। ई.1896 में बालगंगाधर तिलक ने कांग्रेस के मंच से कहा- ‘गत 12 वर्षों से हम चिल्ला रहे है कि शासन हमारी बातों को सुने किन्तु सरकार हमारी आवाज को नहीं सुनती, बन्दूक की आवाज को सुनती है। हमारे शासकों ने हमारे ऊपर अविश्वास किया है। अब हमें अधिक शक्तिशाली संवैधानिक साधनों के आधार पर अपनी बात उन्हें सुनानी चाहिए।’

ई.1897 में तिलक ने कमिश्नर रैण्ड की हत्या को न्याय-संगत ठहराते हुए एक लेख लिखा। इसके लिये उन्हें 18 माह की सजा हुई। ई.1899 में बम्बई के गवर्नर सैण्डहर्स्ट ने प्लेग ग्रस्त महाराष्ट्र की जनता पर आतंकपूर्ण कार्यवाही की। तिलक ने कांग्रेस के ई.1899 के लखनऊ अधिवेशन में सैण्डहर्स्ट के विरुद्ध प्रस्ताव रखा किंतु उदारवादियों के दबाव में उन्हें वह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।

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इस प्रकार 19वीं सदी के अंतिम दशक में तिलक की अगुवाई में कांग्रेस में उग्र राष्ट्रवाद का प्रवेश हुआ। उग्र हिन्दुत्ववादी नेता नए जीवन आदर्शों के साथ नए विचार लेक आए।

तिलक का कहना था कि हर हाल में विदेशी राज का विरोध करो। तिलक का आदर्श था- ‘दूसरों की सेवा और स्वयं के लिये कष्ट।’ वे गांव की चौपाल पर बैठकर बात करते थे। वे पिटीशिन (याचिका) की बजाये प्रोटेस्ट (विरोध) करने में विश्वास करते थे।

तिलक ने स्पष्ट घोषणा की- ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे……. स्वराज्य के बिना कोई सामाजिक सुधार नहीं हो सकते, न कोई औद्योगिक प्रगति, न कोई उपयोगी शिक्षा और न ही राष्ट्रीय जीवन की परिपूर्णता। यही हम चाहते हैं और इसी के लिये ईश्वर ने मुझे इस संसार में भेजा है।’

यही कारण है कि ब्रिटिश पत्रकार वेलेंटाइन शिरोल ने तिलक को फादर ऑफ इण्डियन अनरेस्ट (भारतीय असन्तोष का जनक) कहा है। कांग्रेस में गरम दल की स्थापना का श्रेय तिलक को ही है।

यदि तिलक ‘भारतीय असंतोष के जनक’ थे तो महर्षि अरविंद घोष ‘हिन्दू धर्म के राष्ट्रीयकरण के शिल्पी’ थे। अगस्त 1893 में अरविन्द घोष ने न्यू लैम्प्स फॉर ओल्ड (पुरानों के स्थान पर नये दीप) शीर्षक से एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने विचार प्रकट किया कि विरोध-पत्रों, प्रार्थना-पत्रों और स्मृति-पत्रों से देश कभी स्वतन्त्र नहीं हो सकता। महर्षि अरविंद ने अपने वन्देमातरम् नामक पत्र में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कार्य करने और संघर्ष करने के लिए एक कार्यक्रम बताया। इस कार्यक्रम में उन्होंने भारतीयों को स्वदेशी, असहयोग, राष्ट्रभाषा और बहिष्कार का मन्त्र दिया।

अरविंद घोष ने भारतीयों को स्पष्ट मार्ग दिखाते हुए कहा- ‘स्वतंत्रता हमारे जीवन का उद्देश्य है। हिन्दू धर्म ही हमारे इस उद्देश्य की पूर्ति करेगा। राष्ट्रीयता एक धर्म है और ईश्वर की देन है….. भारत पुनः एक गुरु और मार्ग दर्शक के रूप में अपनी भूमिका निभाए, लोगों की आत्ममुक्ति हो ताकि राजनीतिक जीवन में वेदान्त के आदर्श प्राप्त किये जा सकें। यही भारत के लिये सच्चा स्वराज्य होगा।

ई.1905 में जब बंग-भंग आंदोलन चला तो अरविंद ने घोषित किया- ‘राष्ट्रवाद कभी मर नहीं सकता क्योंकि यह ईश्वर ही है जो बंगाल में कार्य कर रहा है, ईश्वर को कभी मारा नहीं जा सकता, ईश्वर को जेल नहीं भेजा जा सकता।’

महाराष्ट्र के सर्वमान्य नेता बालगंगाधर तिलक और बंगाल के सर्वमान्य नेता महर्षि अरविंद के तेजस्वी विचारों के समान ही पंजाब के सर्वमान्य नेता लाला लाजपतराय ने भी कांग्रेस के उग्र हिन्दुत्व को विचारों की और भी पैनी धार प्रदान की। उन्हें पंजाब केसरी तथा शेरे-पंजाब कहा जाता था। उन्होंने पंजाबी तथा वन्देमातरम् नामक दैनिक समाचार पत्रों का प्रकाशन किया। वे आर्यसमाज के प्रबल समर्थक थे। कांग्रेस के ई.1902 के कलकत्ता अधिवेशन में उन्हें अध्यक्ष बनाया गया। उन्हें सरदार अजीतसिंह के साथ मिलकर कोलोनाइजेशन बिल के खिलाफ आंदोलन चलाने के अपराध में बर्मा की माण्डले जेल में बंद किया गया।

उनका कहना था- ‘जैसे दास की आत्मा नहीं होती उसी प्रकार दास जाति की कोई आत्मा नहीं होती। आत्मा के बिना मनुष्य निरा पशु है इसलिये एक देश के लिये स्वराज्य परम आवश्यक है और सुधार अथवा उत्तम राज्य इसके विकल्प नहीं हो सकते।’

बंगाल के एक और प्रखर विचारक विपिनचंद्र पाल भी कांग्रेस के उग्र हिन्दुत्व को नई ऊँचाईयों तक ले जाने में सफल रहे। लाल (लाला लाजपतराय), बाल (बालगंगाधर तिलक) और पाल (विपिनचंद्र पाल) को उग्रवादी तिकड़ी (बिग थ्री) कहा जाता था।

विपिनचंद्र पाल का कहना था- ‘देश को रिफॉर्म (सुधार) की नहीं अपितु री-फार्म (फिर से निर्माण) की आवश्यकता है….. अँग्रेजों को अपनी इच्छा से कर लगाने और उसे खर्च करने का अधिकार छोड़ना होगा।’

इस प्रकार कांग्रेस में उग्र राष्ट्रीयता की भावना पनपने लगी। लाल, बाल, पाल, महर्षि अरविंद और उनके अनुयायी, उग्र हिन्दुत्ववादी नेता के रूप में जाने जाते हैं।

कांग्रेस के उदारवादी नेताओं की नीतियों की आलोचना करने वालों में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, स्वामी विवेकानन्द और लाला मुंशीराम भी थे। फरवरी 1902 में स्वामी विवेकानन्द ने स्वामी अखण्डानन्द को एक पत्र लिखकर उनसे पूछा-

‘भयंकर अकाल, बाढ़, बीमारी और महामारी के इन दिनों में बताइए कि आपके कांग्रेसी लोग कहाँ हैं? क्या सिर्फ यही कहने से काम चलेगा कि देश की सरकार हमारे हाथ में सौंप दीजिए? और उनकी बात सुनता भी कौन है ? अगर कोई आदमी काम करता है तो क्या उसे किसी चीज के लिए मुँह खोलना पड़ता है?’

उग्र हिन्दुत्ववादी नेता भारतीयों की शक्ति को संगठित करके ब्रिटिश सरकार पर इतना दबाव डालना चाहते थे कि सरकार उनकी मांगों को ठुकरा न सके और भारतीयों को उनका देश सौंप दे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बंग-भंग आन्दोलन

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अंग्रेज सरकार द्वारा किए गए बंग-भंग के निर्णय की परिणति बंग-भंग आन्दोलन में हुई। इससे देश में उग्र हिन्दुत्व की लहर उत्पन्न हुई। बंग-भंग आन्दोलन भारत की आजादी की लड़ाई का एक प्रमुख पड़ाव है जिसने पूरे भारत में बिजली सी कौंध गई।

भारतीयों की मांग से पूरी तरह बेपरवाह अंग्रेज सत्ता भारत में अपना राजनीतिक दांव खेल रही थी। नवाब सिराजुद्दौला एवं मीर जाफर से छीने हुए जिस बंगाल में अंग्रेजों ने प्रथम ब्रिटिश प्रांत की स्थापना की थी, उस बंगाल में बंगाल, असम, बिहार, उड़ीसा तथा छोटा नागपुर तक विस्तृत भू-भाग सम्मिलित था। लॉर्ड कर्जन ने 18 जुलाई 1905 को बंगाल का विभाजन करके पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल नामक दो प्रांत बनाये।

पहले टुकड़े में बंगाल का पूर्वी भाग और आसाम का क्षेत्र रखा गया। इस प्रांत के लिये पृथक् लेफिटनेंट गवर्नर नियुक्त किया गया जिसकी राजधानी ढाका रखी गई। पश्चिमी बंगाल में बिहार, उड़ीसा और पश्चिमी बंगाल के क्षेत्र रखे गये। इसकी राजधानी कलकत्ता में रही। बंगाल को विभाजित करने का वास्तविक उद्देश्य बंगाल की एकजुट राजनीतिक शक्ति को भंग करना था। अँग्रेजों ने बंग-भंग के माध्यम से पूर्वी बंगाल के रूप में एक ऐसा प्रान्त बना दिया जिसमें मुसलमानों की प्रधानता थी। अँग्रेजों को आशा थी कि नया प्रांत, हिन्दू बहुल पश्चिमी प्रांत के विरुद्ध आवाज बुलंद करता रहेगा। सैयद अहमद खाँ तथा उनके साथियों ने इस कार्य में अँग्रेजों का साथ दिया ताकि उनकी राजनीति चमक जाये।

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पूर्वी बंगाल में 3 करोड़ 10 लाख लोग रहते थे जिनमें से 1 करोड़ 80 लाख मुसलमान थे। लॉर्ड कर्जन ने पूर्वी बंगाल प्रान्त में मुसलमानों की सभाएं आयोजित कीं जिनमें उसने कहा कि यह विभाजन केवल शासन की सुविधा के लिए ही नहीं किया जा रहा है वरन् उसके द्वारा एक मुस्लिम प्रान्त बनाया जा रहा है जिसमें इस्लाम के अनुयायियों की प्रधानता होगी। बचे हुए पश्चिमी बंगाल प्रान्त में 1 करोड़ 70 लाख बंगला-भाषी लोगों की तुलना में बिहारी तथा उड़िया भाषाओं को बोलने वालों की संख्या 4 करोड़ 10 लाख थी।

इस प्रकार बंगाली हिन्दू, पूर्वी बंगाल में धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक बना दिये गये तथा पश्चिमी बंगाल में भाषा के आधार पर अल्पसंख्यक बना दिये गये। बंगाल विभाजन के पीछे अँग्रेजों के मन में कई प्रकार के भय कार्य कर रहे थे। उस समय के भारत सरकार के गृह सचिव हारवर्ट होप रिसले ने एक गोपनीय रिपोर्ट लिखी- ‘संयुक्त बंगाल एक शक्ति है। बंगाल का विभाजन हो जाने पर वह अलग-अलग रास्तों में बंट जायेगा…….. हमारा एक मुख्य उद्देश्य है हमारे विरोध में संगठित शक्ति को विभाजित करना और उसे कमजोर बनाना।’

लॉर्ड रोनाल्डशे ने कहा था– ‘बंगाली राष्ट्रीयता की बढ़ती हुई दृढ़ता पर आघात किया गया था।’ कर्जन के इस कृत्य की ब्रिटेन के समाचार पत्रों ने भी निन्दा की। मैनचेस्टर गारजियन ने लिखा- ‘बंगाल को दो टुकड़ों में बांट देने की कर्जन की योजना को समझना कठिन है और उसे क्षमा कर देना और भी कठिन।’

बंगाल के विभाजन से उग्र हिन्दुत्व आधारित राष्ट्रीय आन्दोलन में अचानक तेजी आ गयी। समस्त भारत ने इस विभाजन का कड़ा विरोध किया। सरकार ने आन्दोलन को दबाने के लिए दमन का सहारा लिया जिससे गरम दल नेताओं को नया कार्यक्षेत्र एवं अनुकूल वातावरण प्राप्त हो गया।

कलकत्ता में महाराजा जतीन्द्रमोहन ठाकुर की अध्यक्षता में एक सार्वजनिक सभा आयोजित हुई जिसमें सरकार से बंगाल विभाजन के सम्बन्ध में कुछ संशोधन करने की मांग की गई। कर्जन ने किसी भी प्रकार का संशोधन करने से मना कर दिया।

7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हाल में विराट जनसभा हुई जिसमें बड़े-बड़े नेता तथा विभिन्न जिलों के प्रतिनिधि मण्डल उपस्थिति थे। इसके बाद पूरे बंगाल में बंग-भंग के विरोध में जनसभाएँ हुईं। इन सभाओं में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का कार्यक्रम स्वीकार किया गया।

16 अक्टूबर 1905 को कर्जन ने बंग-भंग की घोषणा को कार्यान्वित कर दिया। बंगाली जनता ने इस दिन को शोक-दिवस के रूप में मनाया। प्रातःकाल से ही कलकत्ता सहित विभिन्न नगरों की सड़कें वन्देमातरम् के गायन से गूँज उठीं। मनुष्यों के समूह नदी के किनारे एकत्रित होकर एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधने लगे।

गायन मण्डलियों ने वीर रस से ओत-प्रोत गीत गा-गाकर जनता में देशभक्ति की भावना जागृत की। उस दिन पूरे बंगाल में हड़ताल रही। स्थान-स्थान पर आयोजित जन-सभाओं में बंगालियों ने प्रण लिया कि हम एक जाति की हैसियत से, अपने प्रांत के बँटवारे से पैदा हुए बुरे प्रभावों को दूर करने और अपनी जाति की एकता बनाये रखने के लिए शक्ति-भर सब-कुछ करेंगें।

कलकत्ता में एक फेडरेशन हॉल का शिलान्यास किया गया जिसमें समस्त जिलों की मूर्तियों को रखा गया। पृथक् किये गये जिलों की मूर्तियों को पुनः एक होने तक के लिये ढक दिया गया। अनेक स्थानों पर हड़ताल एवे उपवासों के आयेाजन किये गये। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने बुनकर उद्योग की सहायता से राष्ट्रीय निधि की स्थापना की। विदेशी माल के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग के लिए व्यापक अभियान आरम्भ हुआ। देश भर में बंग-भंग के विरोध में जनसभाएं आयोजित की गईं।

पूरा बंगाल वन्देमातरम् के गायन से गूँज उठा। सरकारी दमन ने आन्दोलन को और अधिक उग्र बना दिया। वन्देमातरम् के गीत पर नियन्त्रण व आन्दोलनकारियों की गिरफ्तारी से आन्दोलन ने अत्यधिक उग्र रूप धारण कर लिया।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और विपिनचन्द्र पाल ने समूचे बंगाल का दौरा करके जनता से अपील की कि वे बंग-भंग विरोधी अभियान को सफल बनायें। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व इस समय भी उदारवादियों के हाथों में था किंतु कांग्रेस ने बंग-भंग की कटु आलोचना की। नवयुवकों और विद्यार्थियांे ने इस आन्दोलन में बड़ी संख्या में भाग लिया।

लॉर्ड कर्जन और उनके सहयोगियों ने मुसलमानों को इस आन्दोलन से अलग रखने के प्रयास किये किंतु अब्दुल रसूल, लियाकत हुसैन, अब्दुल हलीम गजनवी, यूसुफ खान बहादुर, मुहम्मद इस्माइल चौधरी आदि नेताओं के नेतृत्व में बड़ी संख्या में मुसलमानों ने भी बंग-भंग विरोधी आन्दोलन में भाग लिया।

मुसलमान नेताओं ने विशाल सभा का आयोजन करके प्रस्ताव पारित किया कि देश की उन्नति के लिए जो काम हिन्दू करेंगे, मुसलमान उसका समर्थन करेंगे, मुसलमान हिन्दुओं का साथ बंग-भंग विरोधी आन्दोलन में ही नहीं अपितु दूसरे मामलों में भी देंगे, और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के प्रयोग का समर्थन करेंगे। इस पर अँग्रेजों ने उन अलगाववादी मुस्लिम नेताओं को दंगे करने के लिये भड़काया जो अपने लिये एक मुस्लिम-बहुल प्रांत चाहते थे। इससे हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द की स्थिति बिगड़ गई।

सरकार ने सार्वजनिक सभाओें पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अध्यापकों को चेतावनी दी गई कि वे अपने छात्रों को इस आन्दोलन से दूर रखें। मैमनसिंह जिले में दो लड़कों पर केवल इसलिए जुर्माना किया गया कि वे वन्देमातरम् गा रहे थे। सरकार ने निजी शिक्षण संस्थाओं को धमकी दी कि जिस स्कूल के अधिकारी अपने छात्रों एवं अध्यापकों को इस आन्दोलन से अलग नहीं रखेंगे उनकी मान्यता समाप्त करके सरकारी सहायता बंद कर दी जायेगी।

इन स्कूलों के प्रबंधकों ने बहुत से छात्रों और शिक्षकों को स्कूलों से हटा दिया। सरकार ने बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को बन्दी बनाकर उन्हें अमानवीय सजाएं दीं। गोरी सरकार का भयावह चेहरा उस समय खुलकर सामने आया जब सरकार ने पूर्वी-बंगाल के मुसलमानों को हिन्दुओं पर आक्रमण करने तथा उन पर अत्याचार करने के लिये उकसाया। एक स्थान पर तो मुसलमानों ने ढोल-बजा-बजा कर घोषणा करवाई कि सरकार ने उन्हें, हिन्दुओं को लूटने एवं हिन्दू-विधवाओं के साथ विवाह करने की अनुमति दे दी है।

बंगाल के गवर्नर वैमफील्ड फुलर ने लोगों को भड़काने के लिये यह बयान दिया- ‘…… मेरी हिन्दू और मुस्लिम पत्नियों में, मुस्लिम पत्नी मेरी ज्यादा चहेती है।’

बंगाल में घटी इन घटनाओं पर टिप्पणी करते हुए उन दिनों के प्रसिद्ध समाचार पत्र मार्डन रिव्यू ने लिखा था- ‘आन्दोलन-काल की घटनाएं समस्त सम्बन्धित पक्षों के लिए निन्दनीय हैं…….हिन्दुओं के लिए उनकी भीरूता के लिए, क्योंकि उन्होंने मन्दिरों के अपवित्रीकरण, मूर्तियों के खण्डन तथा स्त्रियों के अपहरण के विरुद्ध बल-प्रयोग नहीं किया, स्थानीय मुस्लिम जनता के लिए नीच व्यक्तियों के बाहुल्य के कारण और अँग्रेजी सरकार के लिए इस कारण कि उसके शासन में इस प्रकार की घटनाएँ बिना रोक-टोक के बहुत दिनों तक होती रहीं।’

उग्र हिन्दू राष्ट्रवाद के हाथों अंग्रेजों की उनकी ही राजधानी कलकत्ता में शिकस्त

बंग-भंग आंदोलन के दौरान लॉर्ड कर्जन ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच एक खाई उत्पन्न कर दी, जो उत्तरोतर गहरी होती गई और देश में साम्प्रदायिकता की भयानक समस्या उत्पन्न हो गई। बंग-भंग आन्दोलन के दौरान अनेक स्थानों पर दंगे हुए तथा हिन्दुओं के साथ घोर अन्याय किया गया। अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर ई.1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस दो हिस्सों में बंट गई।

उदारवादी कांग्रेसी, गोपाल कृष्ण गोखले के नेतृत्व में तथा उग्रवादी कांग्रेसी, बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में अलग हो गये। उदारवादी गुट स्वयं को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कहने लगा जबकि उग्रवादी गुट द्वारा स्वयं को राष्ट्रीय पार्टी कहा गया। इस सम्मेलन के बाद सरकार ने बालगंगाधर तिलक, अरविंद घोष, लाला लाजपतराय, विपिनचंद्र पाल आदि को गिरफ्तार करके बंग-भंग आंदोलन को विफल करने का प्रयास किया।

ई.1909 में भारत सरकार ने मार्ले-मिण्टो एक्ट के माध्यम से बंग-भंग आंदोलन की हवा निकालनी चाही। वायसराय की कार्यकारिणी में एक भारतीय सदस्य को स्थान दिया गया, प्रान्तों के गवर्नरों की कार्यकारिणी में भारतीयों की संख्या बढ़ाई गई तथा विधान सभाओं के सदस्यों की संख्या में वृद्धि करके मुसलमानों, जमींदारों और व्यापारियों को अलग प्रतिनिधित्व दिये गये। आरम्भ में नरम पंथी नेताओं ने इन सुधारों का स्वागत किया।

गोखले की धारणा थी कि सरकार का यह कदम निःसन्देह उदार एवं उचित है। वे अनुरोध कर रहे थे कि जनता उनको स्वीकार करे और सरकार का अभिनन्दन करे किंतु गर्मपंथी नेताओं का कहना था कि ये सुधार भारतीयों को मूर्ख बनाने के लिए किये गए थे।

शीघ्र ही उदारवादी नेता भी गर्मपंथी नेताओं से सहमत हो गए और कांग्रेस के ई.1910 के इलाहाबाद अधिवेशन में उदारवादी नेताओं द्वारा भी मार्ले-मिण्टो सुधार की कड़ी आलोचना की गई तथा उसे हिन्दुओं एवं मुसलमानों में फूट डालने वाला एवं साम्प्रदायिक भावनाओं को उभारने वाला बताया गया।

इस प्रकार बंग-भंग आन्दोलन चलता रहा। अंत में ई.1911 में अँग्रेज सरकार ने बंग-भंग को निरस्त करके इस आंदोलन को समाप्त करवाया। इस प्रकार राष्ट्रवादी भारतीयों ने अंग्रेजों को उन्हीं की राजधानी कलकत्ता में गहरी शिकस्त दे दी। इसलिए अंग्रेज उसी वर्ष अपनी राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली ले आए। यह भारतीयों की बड़ी जीत थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत

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उग्र राष्ट्रवादी कांग्रेसी नेताओं द्वारा द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थन

द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के अनुसार हिन्दू और मुसलमान दो राष्ट्र हैं। एक देश में दो राष्ट्र एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते। कांग्रेस द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करती थी किंतु हिन्दुत्वादी नेता और कट्टरवादी मुसलमान दोनों ही द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत में विश्वास करते थे।

बंग-भंग के बाद एक बार फिर से उग्रवादी नेता कांग्रेस में हावी होने लगे। वे आवेदन-निवेदन और याचना की नीति में विश्वास नहीं करते थे तथा भारतीयों द्वारा अँग्रेजी साम्राज्य से सहयोग करने की नीति को भी उचित नहीं समझते थे। वे भारतीयों के लिये स्वराज्य चाहते थे तथा स्वराज्य की प्राप्ति के लिए राष्ट्रव्यापी आन्दोलन की आवश्यकता अनुभव करते थे।

वे जन साधारण में राष्ट्र-प्रेम एवं बलिदान की अटूट भावना विकसित करना चाहते थे जिससे घबराकर गोरी सरकार भारत से चली जाये। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार और राष्ट्रीय शिक्षा पर बल देते थे। इस काल में भारत का सम्पन्न वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग एवं मध्यम वर्ग पश्चिमी शिक्षा एवं जीवन शैली के आकर्षण में फंसे हुए थे।

इन लोगों में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने के लिए उनके समक्ष भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक श्रेष्ठता को स्थापित करना आवश्यक था। इसी उद्देश्य से बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में जन साधारण के स्तर पर गणेश पूजन तथा शिवाजी उत्सव मनाने की परम्परा आरम्भ की।

अरविन्द घोष ने बंगाल में एक माह तक चलने वाली काली पूजा आरम्भ की। लाला लाजपतराय ने पंजाब में आर्य समाज आन्दोलन को सशक्त बनाने का काम किया। इस प्रकार इन उग्र-राष्ट्रवादी नेताओं ने इन धार्मिक एवं सामाजिक समारोहों को व्यापक रूप देकर उन्हें राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक चेतना उत्पन्न करने का प्रभावी माध्यम बना दिया।

राष्ट्रवादी नेताओं ने जनसाधरण को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उठ खड़े होने एवं उनमें एकता की भावना उत्पन्न करने के लिये व्यापक स्तर पर सामाजिक एवं धार्मिक समारोहों को आरम्भ किया था किंतु अँग्रेजों ने इन समारोहों की आड़ में मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध उकसाया तथा कट्टर मुस्लिम नेताओं को पृथकतावादी आन्दोलन आरम्भ करने हेतु प्रोत्साहित किया। यह पृथकतावादी आंदोलन ही द्विराष्ट्रवाद का जनक था।

अँग्रेज अधिकारियों का आरोप था कि तिलक द्वारा स्थापित गोरक्षिणी सभा, हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच कलह का स्रोत थी। जबकि एन. एम. गोल्डवर्ग ने लीडर ऑफ द डेमोक्रेटिक विंग इन महाराष्ट्र में लिखा है कि तिलक द्वारा आरम्भ किये गये गणपति पूजन में शिया एवं सुन्नी भी आते थे।

इन्दुलाल याज्ञिक ने अपनी कृति श्यामजी कृष्ण वर्मा की जीवनी में गोल्डबर्ग के इस कथन की पुष्टि की है किंतु अंग्रेज सरकार द्वारा उग्र राष्ट्रवाद को मुस्लिम-विरोधी बताकर उसे असफल करने के प्रयास जारी रखे गए। इस कारण भारत में द्विराष्ट्रवाद के सिद्धान्त का विकास हुआ।

द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के अनुसार भारत में एक राष्ट्र नहीं होकर दो राष्ट्र बसते हैं- पहला हिन्दू राष्ट्र और दूसरा मुस्लिम राष्ट्र। इस विचार से प्रभावित होकर अनेक मुसलमानों ने स्वयं को राष्ट्रीय आन्दोलन से दूर कर लिया तथा ई.1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना की।

उग्रवादी नेता भारत में ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति स्थापित करना चाहते थे जो देशभक्त नागरिक तैयार कर सके। उनका मानना था कि अँग्रेजी शिक्षा पद्धति से मानसिक गुलाम तैयार किये जा रहे हैं। यदि भारतीय नौजवानों में स्वतंत्र चिंतन की योग्यता उत्पन्न हो जाये तो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को स्वतः गति प्राप्त हो जायेगी।

इस विचार से प्रेरित होकर उग्रवादी नेताओं ने देश भर में थियोसॉफिकल स्कूल और कॉलेज, डी. ए. वी. स्कूल, हिन्दू कॉलेज, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय आदि स्थापित किये। इन संस्थाओं ने राष्ट्रीयता के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस पर अँग्रेजों ने मुसलमानों तथा अन्य धर्मावलम्बियों को भी अपनी अलग शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने के लिये उकासाया जिनमें उन धर्मों, मतों एवं पंथों की धार्मिक शिक्षा दी जाने लगी।

उदारवादियों एवं उग्रवादियों के राजनीतिक उद्देश्यों में बहुत बड़ा अंतर था। उदारवादी नेता ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत ही उत्तरदायी सरकार की कल्पना करते थे। वे अँग्रेजों के रहने में ही भारत का कल्याण समझते थे।

एक बार लॉर्ड हार्डिंग ने गोखले से कहा- ‘तुम्हें कैसा लगेगा यदि तुम्हें मैं यह कहूँ कि एक माह में ही समस्त ब्रिटिश अधिकारी और सेना भारत छोड़ देंगे।’

इस पर गोखले का उत्तर था- ‘मैं इस समाचार को सुनकर प्रसन्नता अनुभव करूंगा किन्तु इससे पूर्व कि आप लोग अदन तक पहुँचेगें, हम आपको वापस आने के लिये तार कर देंगे।’

उदारवादियों से ठीक उलट, उग्रवादियों ने देश के लिये स्वराज की मांग की। तिलक का कहना था कि जितनी जल्दी हो सके अँग्रेजों को भारत से चले जाना चाहिए। इससे भारतीयों को अपार प्रसन्नता होगी। उग्रवादी नेताओं का मानना था कि विदेशी सुशासन कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह स्वशासन से श्रेष्ठ नहीं हो सकता।

उग्र-राष्ट्रवादी नेता विपिनचन्द्र पाल का कहना था- ‘कोई किसी को स्वराज्य नहीं दे सकता। यदि आज अँग्रेज उन्हें स्वराज्य देना चाहें तो वह ऐसे स्वराज्य को ठुकरा देंगे क्योंकि मैं जिस वस्तु को उपार्जित नहीं कर सकता; उसे स्वीकार करने का भी पात्र नहीं हूँ।’

तिलक का कहना था कि- ‘राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए लड़ना पड़ेगा…… अँग्रेजों के साथ सहयोग करना और भिक्षा तथा उपहार, वरदानों के रूप में अधिकार प्राप्त करना नितान्त भ्रामक है।’

लाला लाजपतराय ने ई.1905 के कांग्र्रेस अधिवेशन में कहा था- ‘एक अँग्रेज को भिखारी से बड़ी घृणा और विरक्ति होती है। मेरे विचार में भिखारी है ही इस योग्य कि उससे घृणा की जाये। अतः हमारा कर्त्तव्य है कि अब हम अँग्रेजों को दिखा दें कि हम भिक्षुक नहीं हैं। हमारा आदर्श भीख मांगना नहीं, वरन् आत्म-निर्भरता है।’

यदि उस काल की कांग्रेस के उदारवादी एवं उग्रवादी नेताओं का समग्र विश्लेषण किया जाए तो यह बात स्पष्ट होगी कि यद्यपि उग्र राष्ट्रवाद, उदारवाद की प्रतिक्रया में उत्पन्न हुआ था तथापि वे एक दूसरे के पूरक थे। उदारवादियों ने, कांग्रेस के रूप में उग्रवादियों के लिये एक पृष्ठभूमि तैयार की तथा उग्रवाद ने उसी कांग्रेस का उपयोग अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने में किया। दोनों ही सच्चे देशभक्त और देशप्रेमी थे।

रामनाथ सुमन ने लिखा है- ‘जब हम नरम व गरम दोनों दलों की प्रवृत्तियों का विश्लेषण और अध्ययन करते हैं तो मालूम पड़ता है कि हमारी राष्ट्रीयता के विकास में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों हमारी राजनीति के स्वाभाविक उपकरण हैं। वस्तुतः वे एक ही आन्दोलन के दो पक्ष हैं। एक ही दीपक के दो परिणाम हैं। पहला प्रकाश का द्योतक है; दूसरा गर्मी का। पहला बुद्धि-पक्ष है; दूसरा भाव-पक्ष है। पहला कुछ सुविधाएं प्राप्त करना चाहता था, दूसरे का उद्देश्य राष्ट्र में मानसिक परिवर्तन करना था।’

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उग्रवादी आन्दोलन के नेताओं ने ही इस बात को जोर देकर कहा कि राजनीतिक आजादी ही राष्ट्र का जीवन है। इस कारण ब्रिटिश सरकार ने पूरी ताकत के साथ उग्रवादियों को कुचलना आरम्भ कर दिया। ई.1908 में समाचार पत्र विधेयक लागू किया गया ताकि ये नेता जनता में अपने विचारों का प्रसार नहीं कर सकें। सरकार द्वारा उसी वर्ष आतंकवादी अभियोगों से निपटने के लिए दंडविधि संशोधन अधिनियम (1908) और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबंधित करने के लिए राजद्रोह सम्मेलन अधिनियम-1911 लागू किया गया।

बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय तथा अन्य उग्रवादी नेताओं को बंदी बना लिया गया जिससे उग्रवादियों को भारी धक्का लगा। रिहाई के बाद अनेक नेताओं का मनोबल टूट गया। ई.1916 में बाल गंगाधर तिलक, लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस की एकता फिर से स्थापित करने में सफल रहे और एनीबीसेंट के साथ मिलकर होमरूल आन्दोलन चलाते रहे।

बाल गंगाधर तिलक को अपने जीवन का काफी हिस्सा अंग्रेजों की जेलों में बिताना पड़ा। इसलिए ई.1919 के आते-आते उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा।

इस समय तक ई.1915 में मोहनदास गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट चुके थे और ई.1917 के चम्पारण आंदोलन से कुछ प्रसिद्धि भी पा गए थे। ई.1919 के आते-आते गांधीजी कांग्रेस के मंचों पर जगह बनाने लगे। जब ई.1919 में गांधी ने असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा तो बाल गंगाधर तिलक और श्रीमती एनीबीसेंट ने नाराज होकर कांग्रेस छोड़ दी।

वे इस लिजलिजी राजनीति को कांग्रेस के लिए अच्छी शरुआत नहीं समझते थे। 1 अगस्त 1920 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया और देश ने अपने महानतम नेताओं में से एक को खो दिया।

इस प्रकार भारतीय असंतोष से निबटने के लिए ई.1885 में अंग्रेजों ने कांग्रेस रूपी जिस यंत्र का आविष्कार किया था, राष्ट्रवादी नेताओं ने ई.1905 में उसे भारत की आजादी प्राप्त करने का युद्धपोत बना दिया किंतु इससे पहले कि कांग्रेस रूपी युद्धपोत आजादी की दिशा में एक इंच भी आगे बढ़ पाता, ई.1906 में अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग रूपी दूसरे युद्धपोत का आविष्कार किया जो बड़ी ही दृढ़ता से कांग्रेस का मार्ग अवरुद्ध करने के लिए विपरीत दिशा से तीव्र वेग से चला आ रहा था।

इसी मुस्लिम लीग के गर्भ से द्विराष्ट्रवाद का जन्म हुआ किंतु बहुत से इतिहासकारों ने द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के लिए उग्र हिन्दूवादी नेताओं को जिम्मदार ठहराया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा

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ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा

भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने का काम जितना ब्रिटिश काल के मुसलमानों ने किया, उतना ही अंग्रेज नौकरशाही ने भी किया। स्वयं वायसराय तथा उसकी पत्नी के स्तर पर भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने का व्यापक षड़यंत्र रचा गया।

मुस्लिम नेताओं को लॉर्ड मिण्टो का निमंत्रण

जब कांग्रेस देश की आजादी की मांग करने लगी तो अँग्रेज नौकरशाहों ने मुसलमानों की चिंताओं का लाभ उठाने का निश्चय किया। वायसराय लॉर्ड मिण्टो (ई.1905-10) के निजी सचिव स्मिथ ने अलीगढ़ कॉलेज के प्रिंसिपल आर्किबाल्ड को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया कि- ‘यदि आगामी सुधारों के बारे में मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मण्डल मुसलमानों के लिए अलग अधिकारों की मांग करे और इसके लिए वायसराय से मिले तो वायसराय को उनसे मिलने में प्रसन्नता होगी।’

इस निमंत्रण को पाकर अलगाववादी-मुस्लिम नेताओं की बांछें खिल गईं। 1 अक्टूबर 1906 को 36 मुस्लिम नेताओं का एक प्रतिनिधि मण्डल सर आगा खाँ के नेतृत्व में शिमला में लॉर्ड मिन्टो से मिला और उन्हें एक आवेदन पत्र दिया जिसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें की गईं-

(1) मुसलमानों को सरकारी सेवाओं में उचित अनुपात में स्थान मिले।

(2) नौकरियों में प्रतियोगी तत्त्व की समाप्ति हो।

(3) प्रत्येक उच्च न्यायालय और मुख्य न्यायालय में मुसलमानों को भी न्यायाधीश का पद मिले।

(4) नगरपालिकाओं में दोनों समुदायों को अपने-अपने प्रतिनिधि भेजने की वैसी ही सुविधा मिले, जैसी पंजाब के कुछ नगरों में है।

(5) विधान परिषद के चुनाव के लिए मुख्य मुस्लिम जमींदारों, वकीलों, व्यापारियों, अन्य महत्त्वपूर्ण हितों के प्रतिनिधियों, जिला परिषदों और नगर पालिकाओं के मुस्लिम सदस्यों तथा पांच वर्षों अथवा किसी ऐसी ही अवधि के पुराने मुसलमान स्नातकों के निर्वाचक-मण्डल बनाये जायें।

इस प्रार्थना-पत्र में इस तथ्य पर विशेष जोर दिया गया कि भविष्य में किये जाने वाले किसी संवैधानिक परिवर्तन में न केवल मुसलमानों की संख्या, वरन् उनके राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्त्व को भी ध्यान में रखा जाये। वायसराय मिन्टो ने मुस्लिम प्रतिनिधि मण्डल के प्रार्थना-पत्र की प्रशंसा की तथा उनकी मांगों को उचित बताया।

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मिण्टो ने कहा- ‘आपका यह दावा बिल्कुल उचित है कि आपके स्थान का अनुमान सिर्फ आपकी जनसंख्या के आधार पर नहीं, अपितु आपके समाज के राजनीतिक महत्त्व और उसके द्वारा की गई साम्राज्य की सेवा के आधार पर लगाया जाना चाहिए।’ मिन्टो ने यह आश्वासन भी दिया कि भावी प्रशासनिक पुनर्गठन में मुसलमानों के अधिकार और हित सुरक्षित रहेंगे।

इस प्रकार ब्रिटिश नौकरशाही ने मुसलमानों को अपने जाल में फंसाने तथा साम्प्रदायिकता की खाई को चौड़ा करने का काम किया। इस प्रतिनिधि मण्डल की उत्तेजना को देखकर अँग्रेज नौकरशाह अच्छी तरह जान गये कि वे भारत के 6.2 करोड़ मुसलमानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से अलग करने में समर्थ हो गये हैं। इसकी पुष्टि खुद मैरी मिन्टो की डायरी से होती है। कहा जा सकता है कि अक्टूबर 1906 का मुस्लिम शिष्ट मण्डल, एक मुस्लिम राजनैतिक दल के गठन का पूर्वाभ्यास था, इसका आभास मिलते ही ब्रिटिश नौकरशाही वर्ग में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई।

उसी शाम एक ब्रिटिश अधिकारी ने वायसराय की पत्नी मैरी मिन्टो को पत्र लिखकर सूचित किया- ‘मैं आपको संक्षेप में सूचित करता हूँ कि आज एक बहुत बड़ी बात हुई है। आज राजनीतिज्ञतापूर्ण एक ऐसा कार्य हुआ जिसका प्रभाव भारत तथा उसकी राजनीति पर चिरकाल तक पड़ता रहेगा। 6 करोड़ 20 लाख लोगों को हमने विद्रोही पक्ष में सम्मिलित होने से रोक लिया है।’

इंग्लैण्ड के समाचार पत्रों ने भी इसे एक बहुत बड़ी विजय बताया और मुसलमानों की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की। यह प्रथम अवसर था जब वायसराय के निमंत्रण पर भारत के विभिन्न भागों के मुसलमान शिमला में एकत्र हुए थे। जब वे वापिस अपने-अपने घर लौटे तब वे पूरे राजनीतिज्ञ बन चुके थे। अब उनके कंधों पर अलीगढ़ की राजनीति को सारे देश में फैलाने की जिम्मेदारी थी।

मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध खड़ा करने के इस काम के लिए भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने 16 अक्टूबर 1906 को गवर्नर जनरल लॉर्ड मिन्टो को पत्र लिखकर बधाई दी। ब्रिटिश सरकार ने अपना आश्वासन पूरा किया और ई.1909 के भारतीय परिषद् अधिनियम के अन्तर्गत ब्रिटिश-भारत की प्रत्येक विधान सभा के लिए मुसलमानों को अपने समुदाय पर आधारित चुनाव मण्डलों से अपने प्रतिनिधियों को, अपनी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक अनुपात में चुनने का अधिकार दिया। इस प्रकार, मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जाने लगा।

पुलिस का मुस्लिमीकरण

कांग्रेस द्वारा किए जा रहे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े बहुसंख्यक हिन्दुओं को दबाने के लिए अंग्रेजों ने पुलिस विभाग में मुसलमानों को अधिक संख्या में भरना आरम्भ किया ताकि बहुसंख्यक हिन्दू जनता को कड़ाई से नियंत्रण में रखा जा सके। भारत सरकार के गृह विभाग की दिसम्बर 1909 की गोपनीय रिपोर्ट के अुनसार 1 अप्रेल 1908 को भारत सरकार में 2 सिख एवं 11 मुसलमानों के मुकाबले 2 हिन्दू सुपरिन्टेण्डेन्ट ऑफ पुलिस थे तथा 18 सिक्खों एवं 59 मुसलमानों के मुकाबले में 20 हिन्दू पुलिस इंस्पेक्टर थे।

इसी प्रकार 120 सिक्खों एवं 408 मुसलमानों के विरुद्ध केवल 211 हिन्दू सब इंस्पेक्टर थे। 1 जनवरी 1909 को भारत सरकार द्वारा निम्नतम श्रेणी के 15,529 पुलिस कर्मी लिए गए। इनमें से 1,078 सिख (7 प्रतिशत), 10,164 मुसमलान (65 प्रतिशत) तथा 4,287 हिन्दू (28 प्रतिशत) पुलिस कर्मी लिए गए। स्पष्ट है कि अंग्रेज सरकार मुसलमान-पुलिस के माध्यम से बहुसंख्यक-हिन्दुओं को दबाने का कार्य कर रही थी।

शासन के इस असमान व्यवहार के कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की दूरियां बढ़ीं। शासन द्वारा धर्म के आधार पर जनता के साथ असमान व्यवहार धरती के हर क्षेत्र में और हर युग में किया जाता रहा है, यह कोई पहली बार नहीं था। मुसलमानों के शासन में भी हिन्दुओं को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था और अब अंग्रेजों ने भी वही नीति अपना ली थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुस्लिम लीग का जन्म

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मुस्लिम लीग का जन्म निश्चित रूप से कट्टर साम्प्रदायिक सोच वाले मुस्लिम नेताओं के कारण हुआ किंतु यदि यह कहा जाए कि मुस्लिम लीग का जन्म ब्रिटिश नौकरशाही के गर्भ से हुआ तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

ई.1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी। तब से वह हिन्दुओं एवं मुसलमानों का संयुक्त रूप से नेतृत्व करती रही थी किंतु जब ई.1906 में वायसरॉय लॉर्ड मिण्टो ने मुस्लिम नेताओं का अलग से शिमला-सम्मेलन आयोजित करके उन्हें अपने अधिकारों के लिए कांग्रेस से अलग होकर लड़ने का मंत्र दिया, तब से भारतीय मुसलमानों में अपने लिए अलग पार्टी बनाने का विचार आकार लेने लगा।

मुस्लिम लीग की स्थापना

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30 दिसम्बर 1906 को ढाका के नवाब सलीमउल्ला खाँ के निमंत्रण पर ढाका में, अलीगढ़ की मोहम्मडन एज्युकेशनल कॉन्फ्रेन्स की वार्षिक सभा आयोजित की गई। इस सभा में सलीमुल्ला ने मुसलमानों के अलग राजनीतिक संगठन की योजना प्रस्तुत की तथा कहा कि इसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार का समर्थन करना, मुसलमानों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना, कांग्रेस के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकना और मुस्लिम नौजवानों को राजनीतिक मंच प्रदान करना है ताकि उन्हें भारतीय कांग्रेस से दूर रखा जा सके।

सलीमउल्ला ने इस संस्था का नाम मुस्लिम ऑल इण्डिया कान्फेडरेसी सुझाया। इस प्रस्ताव को उसी दिन स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 30 दिसम्बर 1906 को अखिल भारतीय मुस्लिम संगठन अस्तित्व में आया जिसका नाम ऑल इंडिया मुस्लिम लीग रखा गया। नवाब विकुर-उल-मुल्क को इसका सभापति चुना गया। इस प्रकार मुस्लिम लीग का जन्म हो गया।

लीग के संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए समिति गठित की गई जिसके संयुक्त सचिव मोहिसिन-उल-मुल्क तथा विकुर-उल-मुल्क नियुक्त किये गये।

ई.1907 में, कराची में लीग का वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ जिसमें लीग का संविधान स्वीकार किया गया। इस संविधान में मुस्लिम लीग के निम्नलिखित लक्ष्य और उद्देश्य निर्धारित किये गये-

(क.) भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा की भावना पैदा करना और किसी भी योजना के सम्बन्ध में मुसलमानों के प्रति होने वाली सरकारी कुधारणाओं को दूर करना।

(ख.) भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक तथा अन्य अधिकारों की रक्षा करना और उनकी आवश्यकताओं तथा उच्च आकांक्षाओं को संयत भाषा में सरकार के समक्ष रखना।

(ग.) जहाँ तक हो सके, उक्त उद्देश्यों को हानि पहुँचाये बिना, मुसलमानों तथा भारत के अन्य समाजों में मित्रतापूर्ण भावना उत्पन्न करना।

मुस्लिम लीग के संविधान में स्थायी अध्यक्ष की व्यवस्था की गई और खोजा सम्प्रदाय के धार्मिक नेता प्रिन्स आगा खाँ को अध्यक्ष बनाया गया। आगा खाँ के पास पहले से ही इतने काम थे कि उन्हें लीग के अध्यक्ष के कार्यालय का दैनिक कार्य देखने का समय नहीं था। इसलिए लीग के हर वार्षिक अधिवेशन में एक कार्यकारी अध्यक्ष चुना जाता था। लीगी नेता, भारत के मुसलमानों में अपने देश के प्रति नहीं, अपितु अँग्रेजों के प्रति वफादारी की भावना बढ़ाना चाहते थे। वे भारत के अन्य निवासियों के साथ नहीं अपितु अँग्रेजों के साथ एकता स्थापित करना चाहते थे।

लीग के सचिव जकाउल्ला ने स्पष्ट कहा- ‘कांग्रेस के साथ हमारी एकता सम्भव नहीं हो सकती क्योंकि हमारे और कांग्रेसियों के उद्देश्य एक नहीं। वे प्रतिनिधि सरकार चाहते हैं, मुसलमानों के लिए जिसका मतलब मौत है। वे सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा चाहते हैं और इसका मतलब होगा कि मुसलमान सरकारी नौकरियों से हाथ धो बैठेंगे। इसलिए हम लोगों को (हिन्दुओं के साथ) राजनीतिक एकता के नजदीक जाने की आवश्यकता नहीं।’

ई.1908 में सर अली इमाम, लीग का कार्यकारी अध्यक्ष हुआ। उसने कांग्रेस की कटु आलोचना करते हुए कहा- ‘जब तक कांग्रेस के नेता इस तरह की व्यावहारिक नीति नहीं अपनाते, तब तक ऑल इंण्डिया मुस्लिम लीग को अपना पवित्र कर्त्तव्य निभाना है। यह कर्त्तव्य है- मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक भूल करने से रोकना अर्थात् उसे ऐसे संगठन में मिलने से रोकना जो लॉर्ड मार्ले के शब्दों में, चन्द्रमा को पकड़ने के लिए चिल्ला रहा है।’

इसी प्रकार अलीगढ़ में विद्यार्थियों की एक सभा में नवाब विकुर-उल-मुल्क ने कहा- ‘अगर हिन्दुस्तान से ब्रिटिश हुकूमत खत्म हो गई तो उस पर हिन्दू राज करेंगे और तब हमारी जिन्दगी, जायदाद और इज्जत पर सदैव खतरा मंडराया करेगा। इस खतरे से बचने के लिए मुसलमानों के लिए एकमात्र उपाय है- ब्रिटिश हुकूमत जरूर बनी रहे। मुसलमान अपने को ब्रिटिश फौज समझें और ब्रिटिश ताज के लिए अपना खून बहाने और अपनी जिन्दगी कुर्बान कर देने के लिए तैयार रहें

…….आपका नाम ब्रिटिश हिन्दुस्तान की तवारीख में सुनहरे हर्फों में लिखा जायेगा। आने वाली पीढ़ियां आपका अहसान मानेंगी।’

मुस्लिम लीगी नेताओं के इन वक्तव्यों को मुसलमान युवाओं के बीच अपार लोकप्रियता मिली। इस प्रकार सर सैयद अहमद जीवन भर प्रयास करके जो सफलता प्राप्त नहीं कर पाए, मुस्लिम लीग ने वह सफलता प्रथम प्रयास में ही प्राप्त कर ली। लीगी नेताओं के वक्तव्यों को अंग्रेजों में प्रसन्नता के साथ और हिन्दुओं में चिंता की लकीरों के साथ देखा गया। शिक्षा एवं रोजगार से वंचित आम मुसलमान के लिए तो लीगी नेताओं के वक्तव्य मुसलमानों के दिलों में आशाओं का नवीन उजाला भरने वाले थे। मुस्लिम लीग के रूप में मुसलमानों को उनके पुराने सुनहरी दिन लौटाने वाले कई मसीहा एक साथ मिल गए थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट

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मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट से भारत में साम्प्रदायिकता में वृद्धि

भारत के अंग्रेज अधिकारियों ने मुस्लिम लीग की मांगों को हाथों-हाथ लिया तथा ई.1909 में उन्होंने मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट की घोषणा की। इस अधिनियम के माध्यम से भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की एकता को पटरी से उतार दिया गया।

मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट

मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट के द्वारा भारत की गोरी सरकार ने प्रांतीय विधान सभाओं में मुसलमानों, जमींदारों और व्यापारियों को अलग प्रतिनिधित्व प्रदान किया अर्थात् उनके लिए पद आरक्षित किए गए। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार द्वारा पहली बार हिन्दुओं और मुसलमानों को पृथक इकाई स्वीकार करके उन्हें अलग-अलग प्रतिनिधित्व दिया गया। साथ ही मुसलमानों को प्रतिनिधित्व के मामले में विशेष रियायत दी गयी।

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उन्हें केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों में जनसंख्या के अनुपात में अधिक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया। मुस्लिम मतदाताओं के लिये आय की योग्यता को भी हिन्दुओं की तुलना में कम रखा गया। कांग्रेस ने इस व्यवस्था का विरोध किया जबकि मुस्लिम लीग ने इसका समर्थन किया। इतिहासकारों ने अंग्रेजों की इस व्यवस्था को फूट डालो और शासन करो की नीति कहकर पुकारा है।

वाई. पी. सिंह ने लिखा है- ‘अँग्रेजों ने भारतीय परिषद् अधिनियम, 1909 के द्वारा साम्प्रदायिक विद्वेष के बीज बोये।’ विख्यात पत्रकार दुर्गादास ने लिखा है- ‘व्हाइट हॉल ने पृथक निर्वाचन एवं सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को स्वीकार करके अनजाने में ही सर्वप्रथम विभाजन के बीज बोये।’ गणेशप्रसाद बरनवाल ने लिखा है- ‘मार्ले मिण्टो सुधार एक्ट से साम्प्रदायिकता की फसल बीमा कर दी जाती है। मिण्टो के शब्दों में- ‘मुस्लिम नेशन।’

हमारा मानना है कि ये अनजाने में बोये गये बीज नहीं थे। साम्प्रदायिकता के बीज शताब्दियों से भारत की राजनीतिक जमीन में मौजूद थे तथा उसकी फसल भी सदियों से लहरा रही थी। मार्ले-मिण्टो एक्ट ने तो साम्प्रदायिकता की फसल को काटकर उससे अधिकतम मुनाफा कमाने की विधि विकसित की थी।

मार्ले-मिण्टो एक्ट के प्रावधानों के कारण हिन्दुओं एवं मुसलमानों दोनों वर्गों में अपने-अपने पक्ष को लेकर उत्तेजना व्याप्त हो गई। भारत की राजनीति ने पूरी तरह से साम्प्रदायिक रंग ले लिया। देश भर में प्रदर्शन होने लगे और चारों तरफ अशांति व्याप्त हो गई।

लखनऊ समझौते से देश में शांति

उन्हीं दिनों मुसलमानों के विरुद्ध दो बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय घटनाएं हुईं-

(1) यूरोपीय देशों के बीच बाल्कन प्रायद्वीप को लेकर हुए दो युद्ध,

(2) तुर्की में युवा तुर्क आन्दोलन।

इन दोनों ही घटनाओं में मुसलमानों को ईसाइयों के हाथों नीचा देखना पड़ा। इस कारण ई.1911 के बाद भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश शासन के प्रति राजभक्ति का ज्वार ठण्डा हो गया। चूंकि मुस्लिम लीग मुसलमानों को ब्रिटिश राजभक्ति का पाठ पढ़ा रही थी और कांग्रेस अंग्रेजों से औपनिवेशिक स्वशासन की मांग कर रही थी, इसलिए भारत का युवा मुस्लिम वर्ग, मुस्लिम लीग की बजाय कांग्रेस के लक्ष्य से सहानुभूति रखने लगा।

मुस्लिम-युवाओं में पनप रही इस मनोवृत्ति को देखते हुए ई.1913 में मुस्लिम लीग ने अपने संविधान में संशोधन करके कांग्रेस की ही तरह अपना लक्ष्य भारत में औपनिवेशिक स्वशासन प्राप्त करना निश्चित किया।

जब दोनों पार्टियों के लक्ष्य एक हो गये तो उनमें निकटता आनी भी स्वाभाविक थी। कांग्रेस भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मुसलमानों का सहयोग चाहती थी। फलस्वरूप ई.1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य समझौता हुआ जिसे लखनऊ समझौता कहते हैं। यह समझौता कराने में बाल गंगाधर तिलक और मुहम्मद अली जिन्ना की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। इस समझौते में तीन मुख्य बातें थीं-

(क.) मुस्लिम लीग ने भी कांग्रेस की तरह भारत को उत्तरदायित्व-पूर्ण शासन देने की मांग की।

(ख.) कांग्रेस ने मुसलमानों के पृथक् निर्वाचन-मण्डल की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और विभिन्न प्रान्तों में उनके अनुपात को भी मान लिया। देश की ग्यारह प्रांतीय विधान सभाओं में मुसलमानों का अनुपात इस प्रकार निर्धारित किया गया था- पंजाब: 50 प्रतिशत, संयुक्त प्रान्त: 30 प्रतिशत, बंगाल: 40 प्रतिशत, बिहार: 25 प्रतिशत, मध्य प्रदेश: 15 प्रतिशत, मद्रास: 15 प्रतिशत तथा बम्बई: 43 प्रतिशत।

(ग.) यह स्वीकार कर लिया गया कि यदि विधान सभाओं में किसी गैर-सरकारी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किसी प्रस्ताव का विरोध किसी एक सम्प्रदाय के तीन चौथाई सदस्य करेंगे तो उस प्रस्ताव पर विचार नहीं किया जायेगा।

पं. मदनमोहन मालवीय, सी. वाई. चिंतामणि आदि कई कांग्रेसी नेताओं को लगा कि इस समझौते में मुसलमानों को अत्यधिक सुविधाएं दे दी गई हैं। कुछ इतिहासकार तो इन सुविधाओं को साम्प्रदायिकता के विकास की महत्त्वपूर्ण कड़ी मानते हैं जिसकी परिणति पाकिस्तान के रूप में हुई।

तिलक का कहना था- ‘कुछ लोगों का विचार है कि हमारे मुसलमान भाइयों को अत्यधिक रियायतें दे दी गई हैं किन्तु स्वराज्य की मांग के लिए उनका हार्दिक समर्थन प्राप्त करने के लिए वह आवश्यक था; भले ही कठोर न्याय की दृष्टि से वह सही हो या गलत। उनकी सहायता और सहयोग के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।’ अयोध्यासिंह के अनुसार- ‘इस पैक्ट से जिन्हें सबसे अधिक आघात लगा था वे थे, ब्रिटिश साम्राज्यवादी और उनके दलाल।’

लखनऊ समझौते के परिणाम स्वरूप कुछ समय के लिए देश में साम्प्रदायिक समस्या शांत हो गई।

मुसलमानों को केन्द्रीय सभा में अधिक प्रतिनिधित्व

ई.1914 से 1919 तक लडे़ गए प्रथम विश्वयुद्ध ने भारत में ब्रिटिश तंत्र का ढांचा तोड़ कर रख दिया। प्रथम विश्व युद्ध में 6 लाख 80 हजार अंग्रेज मारे गए। यह क्षति इंगलैण्ड के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हुई। भारत में अब स्वशासन के अधिकारों की मांग तेज होती जा रही थी, इसलिए अब वे भारत का शासन विक्टोरिया की घोषणा के आधार पर अथवा मार्ले-मिण्टो एक्ट के आधार पर नहीं चला सकते थे। उन्हें भारत में ब्रिटिश संसद से पारित कानून लागू करना आवश्यक हो गया जिसमें भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी दी गई हो।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार को पूरा सहयोग दिया था तथा बड़ी संख्या में भारतीय नौजवानों ने ब्रिटिश मोर्चों पर इंग्लैण्ड की ओर से लड़ते हुए प्राण गंवाए थे। इस सहयोग के बदले में भारत की गोरी सरकार ने युद्ध समाप्ति के बाद भारतीयों को स्वशासन का अधिकार देने का आश्वासन दिया था परन्तु युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने अपना वचन नहीं निभाया।

भारत सरकार अधिनियम 1919 के माध्यम से मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की घोषणा की गई। यह देश का नया संविधान था जिसने मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट 1909 का स्थान लिया। इस संविधान में भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी तो दी गई किंतु भारतीयों को स्वशासन का अधिकार नहीं दिया गया। यह भारतीय जनता के साथ विश्वास-घात था। इस कारण इस अधिनियम से राष्ट्रवादी नेता असन्तुष्ट हो गए किन्तु गांधीजी इस संविधान को लागू करवाने के पक्ष में थे। अतः अंग्रेजों ने अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण वाले ग्यारह ब्रिटिश-भारतीय प्रांतों में इस नए कानून को लागू कर दिया।

भारत सरकार अधिनियम 1919 के माध्यम से भारत में पहली बार दो सदनों वाली केन्द्रीय व्यवस्थापिका (पार्लियामेंट) की स्थापना की गई। पहले सदन को विधान सभा और दूसरे सदन को राज्य सभा कहा जाता था। विधान सभा का कार्यकाल 3 वर्ष तथा राज्यसभा का कार्यकाल 5 वर्ष रखा गया। गवर्नर जनरल इन सदनों को कार्यकाल पूरा होने से पहले भी भंग कर सकता था।

केन्द्रीय विधान सभा में 145 सदस्य थे जिनमें 104 निर्वाचित सदस्य थे। निर्वाचित सदस्यों में से 52 सदस्य सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों से, 30 मुस्लिम, 2 सिक्ख, 9 यूरोपियन, 7 जमींदार तथा 4 भारतीय वाणिज्य के हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। 41 मनोनीत सदस्यों में 26 सरकारी अधिकारी और 15 गैर-सरकारी सदस्य होते थे। केन्द्रीय राज्यसभा में सदस्यों की अधिकतम संख्या 60 थी।

इनमें से सरकारी सदस्यों की अधिकतम संख्या 20 हो सकती थी। शेष 40 सदस्यों में से 34 सदस्य निर्वाचित होते थे जिनमें से 19 सामान्य निर्वाचन क्षेत्र से, 12 साम्प्रदायिक क्षेत्रों अर्थात् मुस्लिम, सिक्ख एवं ईसाई में से और 3 विशेष निर्वाचन क्षेत्रों से होते थे। 6 गैर-सरकारी सदस्यों की नियुक्ति गवर्नर जनरल द्वारा की जाती थी।

इस प्रकार दोनों सदनों में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि आवश्यकता पड़ने पर भारत की गोरी सरकार मुस्लिम एवं ईसाई प्रतिनिधियों तथा सरकारी सदस्यों के बल पर कांग्रेस के सभी प्रस्तावों को ध्वस्त कर सकती थी किंतु फिर भी इस व्यवस्था के माध्यम से भारतीयों ने आधुनिक राजनीतिक शासन व्यवस्था में प्रवेश किया। इस कारण बहुत से विद्वान मानते हैं कि इस अधिनियम में भारत के संवैधानिक विकास के बीज मौजूद थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधाजी के विरुद्ध संदेह

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नोआखाली में मुसलमानों से बात करते हुए गांधी

मुसलमानों में गांधाजी के विरुद्ध संदेह

कांग्रेस के विरोध के बावजूद गांधीजी ने तुर्की के खलीफा के समर्थन में भारत में चल रहे खिलाफत आंदोलन को समर्थन दिया तथा कुछ दिनों बाद इसे वापस ले लिया। मुसलमानों ने इसे गांधीजी द्वारा मुसलमानों के साथ धोखा माना तथा उनके मन में गांधाजी के विरुद्ध संदेह उत्पन्न हो गया।

प्रथम विश्वयुद्ध (ई.1914-19) में तुर्की, जर्मनी की तरफ से तथा अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ा। विश्व भर के उलेमा और मौलवी तुर्की के सुल्तान को अपना खलीफा अर्थात् धार्मिक एवं राजनीतिक नेता मानते थे और तुर्की उनका धार्मिक केन्द्र था।

अंग्रेजों ने भारतीय सेनाओं को भी इस युद्ध में झौंका जो तुर्की के खलीफा के विरुद्ध भेजी गई थीं। इन सेनाओं में भारतीय मुसलमान भी थे। यह एक विचित्र स्थिति थी। भारतीय मुसलमान तुर्की के खलीफा की तरफ से लड़ना चाहते थे किंतु उन्हें अंग्रेजी सेना का हिस्सा होने के कारण खलीफा के खिलाफ लड़ना पड़ रहा था।

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भारतीय मुसलमानों को आशंका थी कि यदि तुर्की युद्ध में हार गया तो तुर्की साम्राज्य का विघटन कर दिया जायेगा तथा खलीफा की शक्तियां भी समाप्त कर दी जायेंगी। अतः भारतीय मुसलमानों ने युद्ध छिड़ते ही खिलाफत कमेटी संगठित की और तुर्की के विरुद्ध फौज भेजे जाने का विरोध किया तथा भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध खिलाफत आन्दोलन चलाया। भारत की अंग्रेज सरकार ने खिलाफत आंदोलन के नेताओं मुहम्मद अली तथा शौकत अली को नजरबंद कर लिया।

उन्हीं दिनों गांधीजी ने भारत में असहयोग आंदोलन आरम्भ किया। गांधीजी ने मुसलमानों से अपील की कि वे भी कांग्रेस के इस कार्यक्रम को अपनाएं। इसके बदले में गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन देने का आश्वासन दिया। चूंकि इस दौर की राजनीति में हिन्दुओं और मुसलमानों के उद्देश्य एक जैसे प्रतीत हो रहे थे इसलिए मुसलमानों ने गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में सहयोग देने का निर्णय लिया। कांग्रेस भी खुलकर खिलाफत आन्दोलन को समर्थन देने लगी। कुछ दिनों में दोनों आन्दोलन मिलकर एक हो गये।

याज्ञिक ने लिखा है- ‘गांधी खिलाफत के सवाल पर अंधाधुंध भाषण करने लगा और वह इस्लाम की रक्षा तथा मुक्ति के जेहाद में मुसलमानों से भी आगे बढ़ गया।’

प्रथम विश्व-युद्ध के बाद हुई संधि के द्वारा तुर्की के पुराने साम्राज्य के टुकड़े कर दिए गए। ईराक, मेसोपोटामिया, सीरिया, फिलीस्तीन और स्मिर्ना पर सुल्तान अब्दुल मजीद की सत्ता समाप्त कर दी गई। तुर्की साम्राज्य में से एक हिस्सा फ्रांस और एक ब्रिटेन के संरक्षण में दे दिया गया।

इस्तम्बूल और दर्रा दानियाल अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण में रख दिए गए। स्मिर्ना और अंतोलिया का तट यूनान में मिला दिया गया। इस संधि ने भारतीय मुसलमानों के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया और एक बार फिर से खिलाफत आंदोलन ने जोर पकड़ लिया।

मुसलमान चाहते थे कि अरब देश और इस्लाम के पवित्र स्थलों को उसी तरह खलीफा के अधिकार में रहना चाहिए जिस तरह इस्लामी राज्य द्वारा उनकी सीमा निर्धारित की गई है किन्तु जब ई.1922 में गांधीजी ने चौरी-चौरा काण्ड के कारण अचानक असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया तब मुसलमानों ने गांधीजी की कटु आलोचना की और लखनऊ समझौते से स्थापित साम्प्रदायिक एकता पुनः नष्ट हो गई।

मुसलमानों का एक वर्ग पहले से ही लखनऊ समझौते का घनघोर विरोधी था। इस वर्ग को भय था कि गांधीजी का नेतृत्व, मुसलमानों के भिन्न अस्तित्त्व को समाप्त कर देगा। खिलाफत एवं असहयोग आन्दोलन के दौरान ये नेता अनुभव करने लगे थे कि इस एकता से मुस्लिम नेताओं के स्वार्थ पूरे नहीं हो रहे हैं; इसलिए उन्होंने गांधीजी के प्रति खुलकर विष-वमन किया तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता की गाड़ी पुनः पटरी से उतर गई।

कांग्रेस में हिन्दू नेताओं का बोलबाला था तथा गांधीजी उनके सर्वमान्य नेता थे। गांधीजी यद्यपि मुसलमानों का विश्वास जीतने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देते थे और अपनी मेज की दराज में गीता के ऊपर कुरान रखते थे, उन्हें जिन्ना की अपेक्षा कुरान की अधिक आयतें याद थीं तथापि साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले मुसलमान नेताओं का मानना था कि गांधीजी का सत्य और अहिंसा के प्रति अत्यधिक आग्रह, हिन्दू धर्म के आदर्शों से प्रेरित है।

इसलिए मुसलमानों को गांधीजी का नेतृत्व अमान्य है। अनेक पढ़े-लिखे कट्टर मुस्लिम नेता गांधीजी के विरुद्ध थे। उनका मानना था कि मुसलमानों से विश्वासघात के मामले में गांधीजी का पिछला रिकॉर्ड भी अच्छा नहीं था।

गांधीजी ने ई.1907 में दक्षिण अफ्रीका में जनरल स्मट्स की सरकार के विरुद्ध जो आंदोलन चलाया था, उसे बीच में ही बंद कर दिया था। दक्षिण अफ्रीका के भारतीय पठानों ने गांधीजी के इस कार्य को विश्वासघात मानते हुए उन पर प्राण-घातक हमला किया था।

इस प्रकार मुसलमानों ने गांधीजी पर विश्वास नहीं होते हुए भी गांधीजी के ई.1920 के असहयोग आन्दोलन का समर्थन किया क्योंकि गांधीजी ने कहा था कि ‘यदि देश मेरे पीछे चले तो मैं एक वर्ष के भीतर स्वराज्य ला दूँगा’ किंतु जब ई.1922 में गांधीजी ने अचानक असहयोग आंदोलन बंद कर दिया तो मुसलमानों को लगा कि गांधीजी ने मुसलमानों को मंझधार में छोड़कर, एक बार फिर विश्वासघात किया है।

अलगाववादी मुसलमानों ने पूरे देश में यह प्रचार किया कि ‘गांधीजी ने अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए मुसलमानों को गुमराह किया।’ इससे देश में उत्तेजना फैल गई और साम्प्रदायिक दंगे आरम्भ हो गये।

इस प्रकार मुसलमानों के मन में हमेशा-हमेशा के लिए गांधाजी के विरुद्ध संदेह उत्पन्न हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत में साम्प्रदायिक हिंसा (1921-31)

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स्वतंत्रता संग्राम से पहले भारत में साम्प्रदायिक हिंसा

बीसवीं सदी के भारत में साम्प्रदायिक हिंसा के युग की शुरुआत मालाबार के मुस्लिम मोपलाओं ने की। इसके बाद कोहाट के मुस्लिम दंगों ने देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं को भयभीत करने का काम किया। हिन्दुओं ने मोपला और कोहाट दोनों ही स्थानों पर बहुत कमजोर प्रतिरोध दर्ज करवाया। इसका मुख्य कारण अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों को बढ़ावा दिया जाना था ताकि बहुसंख्यक हिन्दुओं को दबाकर भारत पर शासन बनाए रखा जा सके।

अठारहवीं सदी में मोपलाओं ने टीपू सुल्तान के शासन में हिन्दुओं पर पहली बार संगठित हमले किए थे तब से मोपलाओं ने अपना कार्य जारी रखा था। उन्नीसवीं सदी में जब मोपला किसानों ने हिन्दू जमींदरों की हत्या की थी तो अंग्रेज, मोपलाओं को नहीं दबा सके। फिर भी अंग्रेजों ने हिन्दू जमींदारों को अपनी जमीनों पर बने रहने में बहुत सहायता दी।

बीसवीं सदी आते-आते मोपला पुनः संगठित होकर हिन्दुओं की हत्या करने लगे। ई.1921 में मोपलाओं ने मुस्लिम लीग के कराची प्रस्ताव में स्वीकृत खलीफा आंदोलन से प्रेरित होकर नैयर, नम्बूदरी एवं जम्मी हिन्दू भूस्वामियों के विरुद्ध भयानक साम्प्रदायिक हिंसा आरम्भ कर दी। उन्होंने हजारों हिन्दुओं को मार डाला एवं निर्धन हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बना लिया।

इस हिंसा का सामना नहीं कर पाने के कारण एक लाख से अधिक हिन्दू अपने घरों को छोड़कर भाग खड़े हुए जिन पर मोपला मुसलमानों ने कब्जा कर लिया। इस कार्यवाही से केरल का जनसांख्यिकीय परिवर्तन हो गया। जब ब्रिटिश सरकार ने हिन्दुओं को बचाने के प्रयास किए तो मुसलमानों ने अंग्रेजों पर भी हमले कर दिए।

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ब्रिटिश रिकॉर्ड में इन्हें ब्रिटिश-मुस्लिम विद्रोह के रूप में अंकित किया गया। जब ब्रिटिश प्रशासक मोपला क्षेत्रों से हट गए तो मोपला लोगों ने फिर से हिन्दुओं का उत्पीड़न एवं हत्याएं करनी आरम्भ कर दीं। मुहम्मद हाजी को मोपला लोगों का खलीफा घोषित किया गया तथा पूरे क्षेत्र में खलीफा के झण्डे फहराने लगे। केरल के एरनाड एवं वल्लुवनाड जिलों को खलीफा की सल्तनत घोषित किया गया।

अंग्रेजों ने मोपलाओं द्वारा की जा रही मारकाट के समाचारों को काफी समय तक देश के सामने नहीं आने दिया किंतु वीर सावरकर ने एक मार्मिक उपन्यास लिखकर सारे नरसंहार को प्रकट कर दिया। इससे हिन्दुओं में भारी आक्रोश उत्पन्न हो गया। इस पर अंग्रेजों ने गढ़वाल, नेपाल और बर्मा से सेनाएं मंगवाकर मालाबार को भेजीं। इन सेनाओं ने 2,226 मोपला उपद्रवियों को मारा, 1,615 मोपला उपद्रवी घायल हुए, 5,688 मोपला उपद्रवी बंदी बनाए गए तथा 38,256 मोपला उपद्रवियों ने ब्रिटिश सेनाओं के समक्ष आत्म-समर्पण किया।

मोपला विद्रोह में गांधीजी ने पीड़ित हिन्दुओं से सहानुभूति दर्शाने की बजाय हिन्दू-मुस्लिम एकता का राग अलापा जिससे हिन्दुओं में मुसलमानों तथा गांधीजी के प्रति और अधिक आक्रोश पनप गया। डॉ. शिवराम मुंजे गांधीजी की नीतियों से इतने त्रस्त हो चुके थे कि वे कांग्रेस से उदासीन होने लगे।

श्रीमती एनीबेसेंट ने ई.1921 की मोपला-हिंसा के बारे में लिखा है- ‘मोपलाओं ने बहुत बड़े स्तर पर हत्याएं एवं लूट की। यहाँ तक कि जो हिन्दू, मोपलाओं का विरोध नहीं कर रहे थे उन्हें भी मार डाला। एक लाख लोगों का सर्वस्व लूटकर उन्हें अपने घरों से निकाल दिया गया। मालाबार हमें सिखाता है कि इस्लामिक शासन का वास्तविक अर्थ क्या है! हम भारत में दूसरे खिलाफत राज का नमूना नहीं देखना चाहते।’

जब मोपला उपद्रवियों के दमन के समाचार देश भर के समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए तो पूरे देश में साम्प्रदायिक तनाव व्याप्त हो गया। मुल्तान में भी मुसलमानों ने अनेक हिन्दुओं को मार डाला और उनकी सम्पत्ति लूट ली या नष्ट कर दी। सहारनपुर में भी ऐसी घटनाएं घटित हुईं। लाहौर में भी साम्प्रदायिक दंगे हुए। आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानन्द की रोगी-शैया पर ही हत्या कर दी गई। आर्य समाज के कुछ अन्य नेताओं की भी हत्या की गई। इन घटनाओं ने हिन्दू जनता को विचलित कर दिया।

कोहाट के हिन्दू मुस्लिम दंगे

इस काल में भारत में साम्प्रदायिक हिंसा का दूसरा बड़ा केन्द्र कोहाट बना। कोहाट अविभाजित पंजाब का एक छोटा सा कस्बा था, अब यह पाकिस्तान में चला गया है।

मई 1924 में पंजाब के एक मुस्लिम समाचार पत्र ‘लाहुल’ में एक हिन्दू विरोधी कविता छपी, जिसका एक अंश इस प्रकार था-

तुझे तेग ए मुस्लिम उठानी पड़ेगी।

कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी।

इसके जवाब में जम्मू के ‘हिन्दू’ समाचार पत्र ने भी एक कविता प्रकाशित की जिसका एक अंश इस प्रकार था-

बनाएंगे काबा में विष्णु का मन्दिर,

नमाजी की हस्ती मिटानी पड़ेगी।

 जीवनदास नामक व्यक्ति ने ‘हिन्दू’ समाचार पत्र की एक हजार प्रतियां प्राप्त कीं तथा 22 अगस्त 1924 को कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर 30-40 प्रतियां बेच दीं। जब ये प्रतियां मुसलमानों तक पहुंचीं तो उन्होंने हिन्दुओं पर हमले करने आरम्भ कर दिए। हिन्दुओं के घर जला दिए गए, 12 हिन्दुओं को मार डाला गया, 13 हिन्दू लापता हो गए, 24 हिन्दुओं के शरीर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त किए गए, 62 हिन्दू सामान्य घायल हुए। इसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने भी मुसलमानों पर हमले किए और कोहाट में दंगे आरम्भ हो गए।

कुल मिलाकर 10 मुसलमान मार डाले गए, 1 या 2 मुसलमान लापता कर दिए गए, 6 मुसलमान बुरी तरह से तथा 17 मुसलमान सामान्य रूप से घायल हुए। इस घटना के बाद हिन्दुओं को कोहाट से रावलपिण्डी भेज दिया गया। कोहाट के दंगा पीड़ितों की सहायता के लिए गांधीजी तीन बार रावलपिण्डी गए किंतु उनकी कोई सहायता नहीं कर सके। भाई परमानंद ने स्थानीय हिन्दू सभा की सहायता से पीड़ित हिन्दुओं को सहायता पहुंचाने में सफलता प्राप्त की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

उग्र-हिन्दुत्व की लहर

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जब अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर अविभाजित भारत के मुसलमान बड़े स्तर पर हिंसा और दंगे करने पर उतारू थे तो हिन्दुओं में भी इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई। इसके परिणामस्वरूप पूरे देश में उग्र-हिन्दुत्व की लहर उठी जिसने अंग्रेजी शासन की चूलें हिला दीं। मुस्लिम लीग के नेताओं ने देश में उठी उग्र-हिन्दुत्व की लहर का मजबूती से सामना किया। इस कार्य में अंग्रेजों ने मुस्लिम लीगी नेताओं का साथ दिया।

विजयी  विश्व तिरंगा प्यारा

जब भारत साम्प्रदायिक हिंसा की आग में जलने लगा तो भारतवासियों को उनके गौरव का स्मरण कराने के लिए ई.1924 में श्यामलाल पार्षद ने कांग्रेस के लिए एक झण्डा-गीत लिखा जो इतना प्रसिद्ध हुआ कि हारमोनियम एवं ढोलक की मधुर धुनों पर कांग्रेस की प्रभात-फेरियों में गाया जाने लगा-

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।

सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला,

वीरों को हरषाने वाला, मातृभूमि का तन-मन सारा।। झंडा…।

स्वतंत्रता के भीषण रण में, लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में,

कांपे शत्रु देखकर मन में, मिट जाए भय संकट सारा।। झंडा…।

इस झंडे के नीचे निर्भय, लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय,

बोलें भारत माता की जय, स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा।। झंडा…।

आओ! प्यारे वीरो, आओ। देश-धर्म पर बलि-बलि जाओ,

एक साथ सब मिलकर गाओ, प्यारा भारत देश हमारा।। झंडा…।

इसकी शान न जाने पाए, चाहे जान भले ही जाए,

विश्व-विजय करके दिखलाएं, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा।। झंडा…।

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।

गांधीजी के अनुयाई जवाहरलाल नेहरू को इस गीत में हिंसा के तत्व दिखाई देते थे। इस गीत में बार-बार बोले जाने वाले विश्व-विजयी शब्द से उन्हें सख्त परहेज था। फिर भी यह गीत भारत की आजादी तक कांग्रेस की प्रभात-फेरियों का मुख्य आकर्षण बना रहा।

इसके साथ ही बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखित- वंदे मातरम् गीत भी पूरे देश में धूम मचाता रहा तथा कांग्रेसियों से लेकर धुर-दक्षिण-पंथियों एवं क्रांतिकारियों तक की पहली पसंद बना रहा। अंग्रेजों से अधिक मुस्लिम लीग यह अनुभव करती थी कि ये गीत उनके विरोध में लिखे गए थे।

बंगाल में साम्प्रदायिक दंगों की बाढ़

बंगाल में हिन्दुओं की आबादी तेजी से घटती जा रही थी और मुस्लिम आबादी बढ़ती जा रही थी। इस कारण सड़कों, गली-मुहल्लों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर मस्जिदों की बाढ़ सी आ गई थी। जब कभी हिन्दू धर्मावलम्बी अपने धार्मिक जुलूसों को लेकर गाजे-बाजे के साथ इन मस्जिदों के सामने से निकलते तो मुसलमान, इन जुलूसों पर हमला बोल देते थे।

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ई.1926 के मध्य में देश में साम्प्रदायिक दंगों की बाढ़ आ गई। सबसे पहले कलकत्ता में भयानक साम्प्रदायिक हमले शुरू हुए। छः सप्ताह तक कलकत्ता की सड़कों पर नृशंस हत्याएं हुईं। 110 स्थानों पर आगजनी हुई, मंदिरों और मस्जिदों पर हमले हुए। सरकारी वक्तव्य के अनुसार पहली मुठभेड़ में 44 मनुष्य मरे और 584 घायल हुए। दूसरी मुठभेड़ में 66 मनुष्य मरे और 391 घायल हुए। ये दंगे मुख्यतः मस्जिदों के सामने, हिन्दुओं के जुलूस एवं बाजे के प्रश्न को लेकर होते थे।

मरने वालों एवं घायल होने वालों में हिन्दू अधिक थे। इस समय लॉर्ड इरविन भारत के गवर्नर जनरल थे। हिन्दू महासभा ने 22 मई 1926 को दिल्ली में एक प्रस्ताव पारित करके सरकार से मांग की कि कलकत्ता के हिन्दुओं की रक्षा की जाए। जब हिन्दू महासभा के डॉ. शिवराम मुंजे तथा पं. मदनमोहन मालवीय कलकत्ता गए तो बंगाल की सुहरावर्दी सरकार ने उन दोनों के विरुद्ध सम्मन जारी कर दिए।

पूर्वी बंगाल में तो स्थिति और भी बुरी थी। वहाँ हिन्दू महिलाओं एवं बच्चों के अपहरण, बलात्कार, आगजनी एवं हत्याओं के मामले प्रतिदिन बढ़ने लगे। उत्तरी बंगाल के मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।

गणपति उत्सव पर हमले

महाराष्ट्र में भी गणपति उत्सव में जुलूस निकालने पर मुसलमानों द्वारा उन पर हमले किए जाने लगे। स्थितियां इतनी बिगड़ गईं कि हिन्दू महासभा ने देश की महिलाओं के नाम अपील की कि अपने सम्मान की रक्षा के लिए प्रत्येक हिन्दू महिला अपने साथ शस्त्र रखे।

कानपुर में साम्प्रदायिक हिंसा

ई.1931 में कानपुर में सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें बड़ी संख्या में हिन्दुओं का नरसंहार किया गया और अंग्रेज सरकार कुछ नहीं कर सकी। इन्हीं दंगों के दौरान 25 मार्च 1931 को पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या कर दी गई।

देश में उग्र-हिन्दुत्व की लहर

मालाबार, मुल्तान, कानपुर, महाराष्ट्र, बंगाल और अमृतसर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे साम्प्रदायिक दंगों के कारण देश में उग्र-हिन्दुत्व की लहर प्रकट हुई। देश भर में हिन्दुओं के विरुद्ध हो रही हिंसक घटनाओं के विरोध में हिन्दू नेताओं ने ‘हिन्दू-एकता’ का नारा दिया। देश भर में हिन्दू महासभा की शाखाएं स्थापित की गईं।

अखिल भारतीय क्षत्रिय सभा की स्थापना हुई। ई.1923 में डॉ. किचलू ने अमृतसर में तन्जीम और तबलीग आन्दोलन प्रारम्भ किया। ई.1925 में विजय दशमी के दिन डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक दल का गठन किया जिसका उद्देश्य हिन्दू धर्म, जाति और संस्कृति की रक्षा करना था। पूरे भारत में इसकी शाखाएं स्थापित की गईं।

ई.1928 में लाहौर में ऑर्डर ऑफ दी हिन्दू यूथ नामक संगठन की स्थापना की गई। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद तथा महर्षि अरविंद घोष ने परतंत्र भारत की देह में आत्मगौरव के नवीन प्राण फूंकने के लिये उग्र-हिंदुत्व को जन्म दिया। कांग्रेस में लाला लाजपतराय, विपिनचंद्र पाल और बाल गंगाधर तिलक उग्र-हिंदुत्व के ध्वज-वाहक थे। इनके योगदान के सम्बन्ध में हम पूर्व में संक्षेप में चर्चा कर चुके हैं।

महाराष्ट्र में जन्मे विनायक दामोदर सावरकर ने हिन्दू-राष्ट्रवाद की भावना को तिलक युग से आगे बढ़ाया। उन्होंने हिन्दुओं में राजनीतिक एवं सामाजिक एकीकरण की आवश्यकता पर बल दिया तथा हिन्दुओं के समान हितों पर बल देते हुए उन्हें संगठित होने का आह्नान किया। वे मुसलमानों को प्रसन्न करने वाली नीति के समर्थक नहीं थे।

सावरकर का कहना था कि- ‘यदि भारतीय मुसलमान, स्वराज्य-प्राप्ति में सहयोग नहीं देना चाहते तो उनसे अनुनय-विनय करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मुसलमानों के बिना भी हिन्दू अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने में समर्थ हैं।’ मुसलमानों के लिये साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले नेताओं को, सावरकार का विरोध करने के बहाने, अपनी उग्र साम्प्रदायिक राजनीति को चमकाने का अच्छा अवसर प्राप्त हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

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हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

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काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

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तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

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चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...