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द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत

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उग्र राष्ट्रवादी कांग्रेसी नेताओं द्वारा द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थन

द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के अनुसार हिन्दू और मुसलमान दो राष्ट्र हैं। एक देश में दो राष्ट्र एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते। कांग्रेस द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करती थी किंतु हिन्दुत्वादी नेता और कट्टरवादी मुसलमान दोनों ही द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत में विश्वास करते थे।

बंग-भंग के बाद एक बार फिर से उग्रवादी नेता कांग्रेस में हावी होने लगे। वे आवेदन-निवेदन और याचना की नीति में विश्वास नहीं करते थे तथा भारतीयों द्वारा अँग्रेजी साम्राज्य से सहयोग करने की नीति को भी उचित नहीं समझते थे। वे भारतीयों के लिये स्वराज्य चाहते थे तथा स्वराज्य की प्राप्ति के लिए राष्ट्रव्यापी आन्दोलन की आवश्यकता अनुभव करते थे।

वे जन साधारण में राष्ट्र-प्रेम एवं बलिदान की अटूट भावना विकसित करना चाहते थे जिससे घबराकर गोरी सरकार भारत से चली जाये। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार और राष्ट्रीय शिक्षा पर बल देते थे। इस काल में भारत का सम्पन्न वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग एवं मध्यम वर्ग पश्चिमी शिक्षा एवं जीवन शैली के आकर्षण में फंसे हुए थे।

इन लोगों में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने के लिए उनके समक्ष भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक श्रेष्ठता को स्थापित करना आवश्यक था। इसी उद्देश्य से बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में जन साधारण के स्तर पर गणेश पूजन तथा शिवाजी उत्सव मनाने की परम्परा आरम्भ की।

अरविन्द घोष ने बंगाल में एक माह तक चलने वाली काली पूजा आरम्भ की। लाला लाजपतराय ने पंजाब में आर्य समाज आन्दोलन को सशक्त बनाने का काम किया। इस प्रकार इन उग्र-राष्ट्रवादी नेताओं ने इन धार्मिक एवं सामाजिक समारोहों को व्यापक रूप देकर उन्हें राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक चेतना उत्पन्न करने का प्रभावी माध्यम बना दिया।

राष्ट्रवादी नेताओं ने जनसाधरण को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उठ खड़े होने एवं उनमें एकता की भावना उत्पन्न करने के लिये व्यापक स्तर पर सामाजिक एवं धार्मिक समारोहों को आरम्भ किया था किंतु अँग्रेजों ने इन समारोहों की आड़ में मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध उकसाया तथा कट्टर मुस्लिम नेताओं को पृथकतावादी आन्दोलन आरम्भ करने हेतु प्रोत्साहित किया। यह पृथकतावादी आंदोलन ही द्विराष्ट्रवाद का जनक था।

अँग्रेज अधिकारियों का आरोप था कि तिलक द्वारा स्थापित गोरक्षिणी सभा, हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच कलह का स्रोत थी। जबकि एन. एम. गोल्डवर्ग ने लीडर ऑफ द डेमोक्रेटिक विंग इन महाराष्ट्र में लिखा है कि तिलक द्वारा आरम्भ किये गये गणपति पूजन में शिया एवं सुन्नी भी आते थे।

इन्दुलाल याज्ञिक ने अपनी कृति श्यामजी कृष्ण वर्मा की जीवनी में गोल्डबर्ग के इस कथन की पुष्टि की है किंतु अंग्रेज सरकार द्वारा उग्र राष्ट्रवाद को मुस्लिम-विरोधी बताकर उसे असफल करने के प्रयास जारी रखे गए। इस कारण भारत में द्विराष्ट्रवाद के सिद्धान्त का विकास हुआ।

द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के अनुसार भारत में एक राष्ट्र नहीं होकर दो राष्ट्र बसते हैं- पहला हिन्दू राष्ट्र और दूसरा मुस्लिम राष्ट्र। इस विचार से प्रभावित होकर अनेक मुसलमानों ने स्वयं को राष्ट्रीय आन्दोलन से दूर कर लिया तथा ई.1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना की।

उग्रवादी नेता भारत में ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति स्थापित करना चाहते थे जो देशभक्त नागरिक तैयार कर सके। उनका मानना था कि अँग्रेजी शिक्षा पद्धति से मानसिक गुलाम तैयार किये जा रहे हैं। यदि भारतीय नौजवानों में स्वतंत्र चिंतन की योग्यता उत्पन्न हो जाये तो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को स्वतः गति प्राप्त हो जायेगी।

इस विचार से प्रेरित होकर उग्रवादी नेताओं ने देश भर में थियोसॉफिकल स्कूल और कॉलेज, डी. ए. वी. स्कूल, हिन्दू कॉलेज, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय आदि स्थापित किये। इन संस्थाओं ने राष्ट्रीयता के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस पर अँग्रेजों ने मुसलमानों तथा अन्य धर्मावलम्बियों को भी अपनी अलग शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने के लिये उकासाया जिनमें उन धर्मों, मतों एवं पंथों की धार्मिक शिक्षा दी जाने लगी।

उदारवादियों एवं उग्रवादियों के राजनीतिक उद्देश्यों में बहुत बड़ा अंतर था। उदारवादी नेता ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत ही उत्तरदायी सरकार की कल्पना करते थे। वे अँग्रेजों के रहने में ही भारत का कल्याण समझते थे।

एक बार लॉर्ड हार्डिंग ने गोखले से कहा- ‘तुम्हें कैसा लगेगा यदि तुम्हें मैं यह कहूँ कि एक माह में ही समस्त ब्रिटिश अधिकारी और सेना भारत छोड़ देंगे।’

इस पर गोखले का उत्तर था- ‘मैं इस समाचार को सुनकर प्रसन्नता अनुभव करूंगा किन्तु इससे पूर्व कि आप लोग अदन तक पहुँचेगें, हम आपको वापस आने के लिये तार कर देंगे।’

उदारवादियों से ठीक उलट, उग्रवादियों ने देश के लिये स्वराज की मांग की। तिलक का कहना था कि जितनी जल्दी हो सके अँग्रेजों को भारत से चले जाना चाहिए। इससे भारतीयों को अपार प्रसन्नता होगी। उग्रवादी नेताओं का मानना था कि विदेशी सुशासन कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह स्वशासन से श्रेष्ठ नहीं हो सकता।

उग्र-राष्ट्रवादी नेता विपिनचन्द्र पाल का कहना था- ‘कोई किसी को स्वराज्य नहीं दे सकता। यदि आज अँग्रेज उन्हें स्वराज्य देना चाहें तो वह ऐसे स्वराज्य को ठुकरा देंगे क्योंकि मैं जिस वस्तु को उपार्जित नहीं कर सकता; उसे स्वीकार करने का भी पात्र नहीं हूँ।’

तिलक का कहना था कि- ‘राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए लड़ना पड़ेगा…… अँग्रेजों के साथ सहयोग करना और भिक्षा तथा उपहार, वरदानों के रूप में अधिकार प्राप्त करना नितान्त भ्रामक है।’

लाला लाजपतराय ने ई.1905 के कांग्र्रेस अधिवेशन में कहा था- ‘एक अँग्रेज को भिखारी से बड़ी घृणा और विरक्ति होती है। मेरे विचार में भिखारी है ही इस योग्य कि उससे घृणा की जाये। अतः हमारा कर्त्तव्य है कि अब हम अँग्रेजों को दिखा दें कि हम भिक्षुक नहीं हैं। हमारा आदर्श भीख मांगना नहीं, वरन् आत्म-निर्भरता है।’

यदि उस काल की कांग्रेस के उदारवादी एवं उग्रवादी नेताओं का समग्र विश्लेषण किया जाए तो यह बात स्पष्ट होगी कि यद्यपि उग्र राष्ट्रवाद, उदारवाद की प्रतिक्रया में उत्पन्न हुआ था तथापि वे एक दूसरे के पूरक थे। उदारवादियों ने, कांग्रेस के रूप में उग्रवादियों के लिये एक पृष्ठभूमि तैयार की तथा उग्रवाद ने उसी कांग्रेस का उपयोग अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने में किया। दोनों ही सच्चे देशभक्त और देशप्रेमी थे।

रामनाथ सुमन ने लिखा है- ‘जब हम नरम व गरम दोनों दलों की प्रवृत्तियों का विश्लेषण और अध्ययन करते हैं तो मालूम पड़ता है कि हमारी राष्ट्रीयता के विकास में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों हमारी राजनीति के स्वाभाविक उपकरण हैं। वस्तुतः वे एक ही आन्दोलन के दो पक्ष हैं। एक ही दीपक के दो परिणाम हैं। पहला प्रकाश का द्योतक है; दूसरा गर्मी का। पहला बुद्धि-पक्ष है; दूसरा भाव-पक्ष है। पहला कुछ सुविधाएं प्राप्त करना चाहता था, दूसरे का उद्देश्य राष्ट्र में मानसिक परिवर्तन करना था।’

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उग्रवादी आन्दोलन के नेताओं ने ही इस बात को जोर देकर कहा कि राजनीतिक आजादी ही राष्ट्र का जीवन है। इस कारण ब्रिटिश सरकार ने पूरी ताकत के साथ उग्रवादियों को कुचलना आरम्भ कर दिया। ई.1908 में समाचार पत्र विधेयक लागू किया गया ताकि ये नेता जनता में अपने विचारों का प्रसार नहीं कर सकें। सरकार द्वारा उसी वर्ष आतंकवादी अभियोगों से निपटने के लिए दंडविधि संशोधन अधिनियम (1908) और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबंधित करने के लिए राजद्रोह सम्मेलन अधिनियम-1911 लागू किया गया।

बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय तथा अन्य उग्रवादी नेताओं को बंदी बना लिया गया जिससे उग्रवादियों को भारी धक्का लगा। रिहाई के बाद अनेक नेताओं का मनोबल टूट गया। ई.1916 में बाल गंगाधर तिलक, लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस की एकता फिर से स्थापित करने में सफल रहे और एनीबीसेंट के साथ मिलकर होमरूल आन्दोलन चलाते रहे।

बाल गंगाधर तिलक को अपने जीवन का काफी हिस्सा अंग्रेजों की जेलों में बिताना पड़ा। इसलिए ई.1919 के आते-आते उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा।

इस समय तक ई.1915 में मोहनदास गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट चुके थे और ई.1917 के चम्पारण आंदोलन से कुछ प्रसिद्धि भी पा गए थे। ई.1919 के आते-आते गांधीजी कांग्रेस के मंचों पर जगह बनाने लगे। जब ई.1919 में गांधी ने असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा तो बाल गंगाधर तिलक और श्रीमती एनीबीसेंट ने नाराज होकर कांग्रेस छोड़ दी।

वे इस लिजलिजी राजनीति को कांग्रेस के लिए अच्छी शरुआत नहीं समझते थे। 1 अगस्त 1920 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया और देश ने अपने महानतम नेताओं में से एक को खो दिया।

इस प्रकार भारतीय असंतोष से निबटने के लिए ई.1885 में अंग्रेजों ने कांग्रेस रूपी जिस यंत्र का आविष्कार किया था, राष्ट्रवादी नेताओं ने ई.1905 में उसे भारत की आजादी प्राप्त करने का युद्धपोत बना दिया किंतु इससे पहले कि कांग्रेस रूपी युद्धपोत आजादी की दिशा में एक इंच भी आगे बढ़ पाता, ई.1906 में अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग रूपी दूसरे युद्धपोत का आविष्कार किया जो बड़ी ही दृढ़ता से कांग्रेस का मार्ग अवरुद्ध करने के लिए विपरीत दिशा से तीव्र वेग से चला आ रहा था।

इसी मुस्लिम लीग के गर्भ से द्विराष्ट्रवाद का जन्म हुआ किंतु बहुत से इतिहासकारों ने द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के लिए उग्र हिन्दूवादी नेताओं को जिम्मदार ठहराया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा

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ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा

भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने का काम जितना ब्रिटिश काल के मुसलमानों ने किया, उतना ही अंग्रेज नौकरशाही ने भी किया। स्वयं वायसराय तथा उसकी पत्नी के स्तर पर भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने का व्यापक षड़यंत्र रचा गया।

मुस्लिम नेताओं को लॉर्ड मिण्टो का निमंत्रण

जब कांग्रेस देश की आजादी की मांग करने लगी तो अँग्रेज नौकरशाहों ने मुसलमानों की चिंताओं का लाभ उठाने का निश्चय किया। वायसराय लॉर्ड मिण्टो (ई.1905-10) के निजी सचिव स्मिथ ने अलीगढ़ कॉलेज के प्रिंसिपल आर्किबाल्ड को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया कि- ‘यदि आगामी सुधारों के बारे में मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मण्डल मुसलमानों के लिए अलग अधिकारों की मांग करे और इसके लिए वायसराय से मिले तो वायसराय को उनसे मिलने में प्रसन्नता होगी।’

इस निमंत्रण को पाकर अलगाववादी-मुस्लिम नेताओं की बांछें खिल गईं। 1 अक्टूबर 1906 को 36 मुस्लिम नेताओं का एक प्रतिनिधि मण्डल सर आगा खाँ के नेतृत्व में शिमला में लॉर्ड मिन्टो से मिला और उन्हें एक आवेदन पत्र दिया जिसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें की गईं-

(1) मुसलमानों को सरकारी सेवाओं में उचित अनुपात में स्थान मिले।

(2) नौकरियों में प्रतियोगी तत्त्व की समाप्ति हो।

(3) प्रत्येक उच्च न्यायालय और मुख्य न्यायालय में मुसलमानों को भी न्यायाधीश का पद मिले।

(4) नगरपालिकाओं में दोनों समुदायों को अपने-अपने प्रतिनिधि भेजने की वैसी ही सुविधा मिले, जैसी पंजाब के कुछ नगरों में है।

(5) विधान परिषद के चुनाव के लिए मुख्य मुस्लिम जमींदारों, वकीलों, व्यापारियों, अन्य महत्त्वपूर्ण हितों के प्रतिनिधियों, जिला परिषदों और नगर पालिकाओं के मुस्लिम सदस्यों तथा पांच वर्षों अथवा किसी ऐसी ही अवधि के पुराने मुसलमान स्नातकों के निर्वाचक-मण्डल बनाये जायें।

इस प्रार्थना-पत्र में इस तथ्य पर विशेष जोर दिया गया कि भविष्य में किये जाने वाले किसी संवैधानिक परिवर्तन में न केवल मुसलमानों की संख्या, वरन् उनके राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्त्व को भी ध्यान में रखा जाये। वायसराय मिन्टो ने मुस्लिम प्रतिनिधि मण्डल के प्रार्थना-पत्र की प्रशंसा की तथा उनकी मांगों को उचित बताया।

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मिण्टो ने कहा- ‘आपका यह दावा बिल्कुल उचित है कि आपके स्थान का अनुमान सिर्फ आपकी जनसंख्या के आधार पर नहीं, अपितु आपके समाज के राजनीतिक महत्त्व और उसके द्वारा की गई साम्राज्य की सेवा के आधार पर लगाया जाना चाहिए।’ मिन्टो ने यह आश्वासन भी दिया कि भावी प्रशासनिक पुनर्गठन में मुसलमानों के अधिकार और हित सुरक्षित रहेंगे।

इस प्रकार ब्रिटिश नौकरशाही ने मुसलमानों को अपने जाल में फंसाने तथा साम्प्रदायिकता की खाई को चौड़ा करने का काम किया। इस प्रतिनिधि मण्डल की उत्तेजना को देखकर अँग्रेज नौकरशाह अच्छी तरह जान गये कि वे भारत के 6.2 करोड़ मुसलमानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से अलग करने में समर्थ हो गये हैं। इसकी पुष्टि खुद मैरी मिन्टो की डायरी से होती है। कहा जा सकता है कि अक्टूबर 1906 का मुस्लिम शिष्ट मण्डल, एक मुस्लिम राजनैतिक दल के गठन का पूर्वाभ्यास था, इसका आभास मिलते ही ब्रिटिश नौकरशाही वर्ग में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई।

उसी शाम एक ब्रिटिश अधिकारी ने वायसराय की पत्नी मैरी मिन्टो को पत्र लिखकर सूचित किया- ‘मैं आपको संक्षेप में सूचित करता हूँ कि आज एक बहुत बड़ी बात हुई है। आज राजनीतिज्ञतापूर्ण एक ऐसा कार्य हुआ जिसका प्रभाव भारत तथा उसकी राजनीति पर चिरकाल तक पड़ता रहेगा। 6 करोड़ 20 लाख लोगों को हमने विद्रोही पक्ष में सम्मिलित होने से रोक लिया है।’

इंग्लैण्ड के समाचार पत्रों ने भी इसे एक बहुत बड़ी विजय बताया और मुसलमानों की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की। यह प्रथम अवसर था जब वायसराय के निमंत्रण पर भारत के विभिन्न भागों के मुसलमान शिमला में एकत्र हुए थे। जब वे वापिस अपने-अपने घर लौटे तब वे पूरे राजनीतिज्ञ बन चुके थे। अब उनके कंधों पर अलीगढ़ की राजनीति को सारे देश में फैलाने की जिम्मेदारी थी।

मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध खड़ा करने के इस काम के लिए भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने 16 अक्टूबर 1906 को गवर्नर जनरल लॉर्ड मिन्टो को पत्र लिखकर बधाई दी। ब्रिटिश सरकार ने अपना आश्वासन पूरा किया और ई.1909 के भारतीय परिषद् अधिनियम के अन्तर्गत ब्रिटिश-भारत की प्रत्येक विधान सभा के लिए मुसलमानों को अपने समुदाय पर आधारित चुनाव मण्डलों से अपने प्रतिनिधियों को, अपनी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक अनुपात में चुनने का अधिकार दिया। इस प्रकार, मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जाने लगा।

पुलिस का मुस्लिमीकरण

कांग्रेस द्वारा किए जा रहे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े बहुसंख्यक हिन्दुओं को दबाने के लिए अंग्रेजों ने पुलिस विभाग में मुसलमानों को अधिक संख्या में भरना आरम्भ किया ताकि बहुसंख्यक हिन्दू जनता को कड़ाई से नियंत्रण में रखा जा सके। भारत सरकार के गृह विभाग की दिसम्बर 1909 की गोपनीय रिपोर्ट के अुनसार 1 अप्रेल 1908 को भारत सरकार में 2 सिख एवं 11 मुसलमानों के मुकाबले 2 हिन्दू सुपरिन्टेण्डेन्ट ऑफ पुलिस थे तथा 18 सिक्खों एवं 59 मुसलमानों के मुकाबले में 20 हिन्दू पुलिस इंस्पेक्टर थे।

इसी प्रकार 120 सिक्खों एवं 408 मुसलमानों के विरुद्ध केवल 211 हिन्दू सब इंस्पेक्टर थे। 1 जनवरी 1909 को भारत सरकार द्वारा निम्नतम श्रेणी के 15,529 पुलिस कर्मी लिए गए। इनमें से 1,078 सिख (7 प्रतिशत), 10,164 मुसमलान (65 प्रतिशत) तथा 4,287 हिन्दू (28 प्रतिशत) पुलिस कर्मी लिए गए। स्पष्ट है कि अंग्रेज सरकार मुसलमान-पुलिस के माध्यम से बहुसंख्यक-हिन्दुओं को दबाने का कार्य कर रही थी।

शासन के इस असमान व्यवहार के कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की दूरियां बढ़ीं। शासन द्वारा धर्म के आधार पर जनता के साथ असमान व्यवहार धरती के हर क्षेत्र में और हर युग में किया जाता रहा है, यह कोई पहली बार नहीं था। मुसलमानों के शासन में भी हिन्दुओं को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था और अब अंग्रेजों ने भी वही नीति अपना ली थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुस्लिम लीग का जन्म

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मुस्लिम लीग का जन्म निश्चित रूप से कट्टर साम्प्रदायिक सोच वाले मुस्लिम नेताओं के कारण हुआ किंतु यदि यह कहा जाए कि मुस्लिम लीग का जन्म ब्रिटिश नौकरशाही के गर्भ से हुआ तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

ई.1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी। तब से वह हिन्दुओं एवं मुसलमानों का संयुक्त रूप से नेतृत्व करती रही थी किंतु जब ई.1906 में वायसरॉय लॉर्ड मिण्टो ने मुस्लिम नेताओं का अलग से शिमला-सम्मेलन आयोजित करके उन्हें अपने अधिकारों के लिए कांग्रेस से अलग होकर लड़ने का मंत्र दिया, तब से भारतीय मुसलमानों में अपने लिए अलग पार्टी बनाने का विचार आकार लेने लगा।

मुस्लिम लीग की स्थापना

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30 दिसम्बर 1906 को ढाका के नवाब सलीमउल्ला खाँ के निमंत्रण पर ढाका में, अलीगढ़ की मोहम्मडन एज्युकेशनल कॉन्फ्रेन्स की वार्षिक सभा आयोजित की गई। इस सभा में सलीमुल्ला ने मुसलमानों के अलग राजनीतिक संगठन की योजना प्रस्तुत की तथा कहा कि इसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार का समर्थन करना, मुसलमानों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना, कांग्रेस के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकना और मुस्लिम नौजवानों को राजनीतिक मंच प्रदान करना है ताकि उन्हें भारतीय कांग्रेस से दूर रखा जा सके।

सलीमउल्ला ने इस संस्था का नाम मुस्लिम ऑल इण्डिया कान्फेडरेसी सुझाया। इस प्रस्ताव को उसी दिन स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 30 दिसम्बर 1906 को अखिल भारतीय मुस्लिम संगठन अस्तित्व में आया जिसका नाम ऑल इंडिया मुस्लिम लीग रखा गया। नवाब विकुर-उल-मुल्क को इसका सभापति चुना गया। इस प्रकार मुस्लिम लीग का जन्म हो गया।

लीग के संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए समिति गठित की गई जिसके संयुक्त सचिव मोहिसिन-उल-मुल्क तथा विकुर-उल-मुल्क नियुक्त किये गये।

ई.1907 में, कराची में लीग का वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ जिसमें लीग का संविधान स्वीकार किया गया। इस संविधान में मुस्लिम लीग के निम्नलिखित लक्ष्य और उद्देश्य निर्धारित किये गये-

(क.) भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा की भावना पैदा करना और किसी भी योजना के सम्बन्ध में मुसलमानों के प्रति होने वाली सरकारी कुधारणाओं को दूर करना।

(ख.) भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक तथा अन्य अधिकारों की रक्षा करना और उनकी आवश्यकताओं तथा उच्च आकांक्षाओं को संयत भाषा में सरकार के समक्ष रखना।

(ग.) जहाँ तक हो सके, उक्त उद्देश्यों को हानि पहुँचाये बिना, मुसलमानों तथा भारत के अन्य समाजों में मित्रतापूर्ण भावना उत्पन्न करना।

मुस्लिम लीग के संविधान में स्थायी अध्यक्ष की व्यवस्था की गई और खोजा सम्प्रदाय के धार्मिक नेता प्रिन्स आगा खाँ को अध्यक्ष बनाया गया। आगा खाँ के पास पहले से ही इतने काम थे कि उन्हें लीग के अध्यक्ष के कार्यालय का दैनिक कार्य देखने का समय नहीं था। इसलिए लीग के हर वार्षिक अधिवेशन में एक कार्यकारी अध्यक्ष चुना जाता था। लीगी नेता, भारत के मुसलमानों में अपने देश के प्रति नहीं, अपितु अँग्रेजों के प्रति वफादारी की भावना बढ़ाना चाहते थे। वे भारत के अन्य निवासियों के साथ नहीं अपितु अँग्रेजों के साथ एकता स्थापित करना चाहते थे।

लीग के सचिव जकाउल्ला ने स्पष्ट कहा- ‘कांग्रेस के साथ हमारी एकता सम्भव नहीं हो सकती क्योंकि हमारे और कांग्रेसियों के उद्देश्य एक नहीं। वे प्रतिनिधि सरकार चाहते हैं, मुसलमानों के लिए जिसका मतलब मौत है। वे सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा चाहते हैं और इसका मतलब होगा कि मुसलमान सरकारी नौकरियों से हाथ धो बैठेंगे। इसलिए हम लोगों को (हिन्दुओं के साथ) राजनीतिक एकता के नजदीक जाने की आवश्यकता नहीं।’

ई.1908 में सर अली इमाम, लीग का कार्यकारी अध्यक्ष हुआ। उसने कांग्रेस की कटु आलोचना करते हुए कहा- ‘जब तक कांग्रेस के नेता इस तरह की व्यावहारिक नीति नहीं अपनाते, तब तक ऑल इंण्डिया मुस्लिम लीग को अपना पवित्र कर्त्तव्य निभाना है। यह कर्त्तव्य है- मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक भूल करने से रोकना अर्थात् उसे ऐसे संगठन में मिलने से रोकना जो लॉर्ड मार्ले के शब्दों में, चन्द्रमा को पकड़ने के लिए चिल्ला रहा है।’

इसी प्रकार अलीगढ़ में विद्यार्थियों की एक सभा में नवाब विकुर-उल-मुल्क ने कहा- ‘अगर हिन्दुस्तान से ब्रिटिश हुकूमत खत्म हो गई तो उस पर हिन्दू राज करेंगे और तब हमारी जिन्दगी, जायदाद और इज्जत पर सदैव खतरा मंडराया करेगा। इस खतरे से बचने के लिए मुसलमानों के लिए एकमात्र उपाय है- ब्रिटिश हुकूमत जरूर बनी रहे। मुसलमान अपने को ब्रिटिश फौज समझें और ब्रिटिश ताज के लिए अपना खून बहाने और अपनी जिन्दगी कुर्बान कर देने के लिए तैयार रहें

…….आपका नाम ब्रिटिश हिन्दुस्तान की तवारीख में सुनहरे हर्फों में लिखा जायेगा। आने वाली पीढ़ियां आपका अहसान मानेंगी।’

मुस्लिम लीगी नेताओं के इन वक्तव्यों को मुसलमान युवाओं के बीच अपार लोकप्रियता मिली। इस प्रकार सर सैयद अहमद जीवन भर प्रयास करके जो सफलता प्राप्त नहीं कर पाए, मुस्लिम लीग ने वह सफलता प्रथम प्रयास में ही प्राप्त कर ली। लीगी नेताओं के वक्तव्यों को अंग्रेजों में प्रसन्नता के साथ और हिन्दुओं में चिंता की लकीरों के साथ देखा गया। शिक्षा एवं रोजगार से वंचित आम मुसलमान के लिए तो लीगी नेताओं के वक्तव्य मुसलमानों के दिलों में आशाओं का नवीन उजाला भरने वाले थे। मुस्लिम लीग के रूप में मुसलमानों को उनके पुराने सुनहरी दिन लौटाने वाले कई मसीहा एक साथ मिल गए थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट

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मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट से भारत में साम्प्रदायिकता में वृद्धि

भारत के अंग्रेज अधिकारियों ने मुस्लिम लीग की मांगों को हाथों-हाथ लिया तथा ई.1909 में उन्होंने मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट की घोषणा की। इस अधिनियम के माध्यम से भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की एकता को पटरी से उतार दिया गया।

मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट

मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट के द्वारा भारत की गोरी सरकार ने प्रांतीय विधान सभाओं में मुसलमानों, जमींदारों और व्यापारियों को अलग प्रतिनिधित्व प्रदान किया अर्थात् उनके लिए पद आरक्षित किए गए। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार द्वारा पहली बार हिन्दुओं और मुसलमानों को पृथक इकाई स्वीकार करके उन्हें अलग-अलग प्रतिनिधित्व दिया गया। साथ ही मुसलमानों को प्रतिनिधित्व के मामले में विशेष रियायत दी गयी।

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उन्हें केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों में जनसंख्या के अनुपात में अधिक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया। मुस्लिम मतदाताओं के लिये आय की योग्यता को भी हिन्दुओं की तुलना में कम रखा गया। कांग्रेस ने इस व्यवस्था का विरोध किया जबकि मुस्लिम लीग ने इसका समर्थन किया। इतिहासकारों ने अंग्रेजों की इस व्यवस्था को फूट डालो और शासन करो की नीति कहकर पुकारा है।

वाई. पी. सिंह ने लिखा है- ‘अँग्रेजों ने भारतीय परिषद् अधिनियम, 1909 के द्वारा साम्प्रदायिक विद्वेष के बीज बोये।’ विख्यात पत्रकार दुर्गादास ने लिखा है- ‘व्हाइट हॉल ने पृथक निर्वाचन एवं सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को स्वीकार करके अनजाने में ही सर्वप्रथम विभाजन के बीज बोये।’ गणेशप्रसाद बरनवाल ने लिखा है- ‘मार्ले मिण्टो सुधार एक्ट से साम्प्रदायिकता की फसल बीमा कर दी जाती है। मिण्टो के शब्दों में- ‘मुस्लिम नेशन।’

हमारा मानना है कि ये अनजाने में बोये गये बीज नहीं थे। साम्प्रदायिकता के बीज शताब्दियों से भारत की राजनीतिक जमीन में मौजूद थे तथा उसकी फसल भी सदियों से लहरा रही थी। मार्ले-मिण्टो एक्ट ने तो साम्प्रदायिकता की फसल को काटकर उससे अधिकतम मुनाफा कमाने की विधि विकसित की थी।

मार्ले-मिण्टो एक्ट के प्रावधानों के कारण हिन्दुओं एवं मुसलमानों दोनों वर्गों में अपने-अपने पक्ष को लेकर उत्तेजना व्याप्त हो गई। भारत की राजनीति ने पूरी तरह से साम्प्रदायिक रंग ले लिया। देश भर में प्रदर्शन होने लगे और चारों तरफ अशांति व्याप्त हो गई।

लखनऊ समझौते से देश में शांति

उन्हीं दिनों मुसलमानों के विरुद्ध दो बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय घटनाएं हुईं-

(1) यूरोपीय देशों के बीच बाल्कन प्रायद्वीप को लेकर हुए दो युद्ध,

(2) तुर्की में युवा तुर्क आन्दोलन।

इन दोनों ही घटनाओं में मुसलमानों को ईसाइयों के हाथों नीचा देखना पड़ा। इस कारण ई.1911 के बाद भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश शासन के प्रति राजभक्ति का ज्वार ठण्डा हो गया। चूंकि मुस्लिम लीग मुसलमानों को ब्रिटिश राजभक्ति का पाठ पढ़ा रही थी और कांग्रेस अंग्रेजों से औपनिवेशिक स्वशासन की मांग कर रही थी, इसलिए भारत का युवा मुस्लिम वर्ग, मुस्लिम लीग की बजाय कांग्रेस के लक्ष्य से सहानुभूति रखने लगा।

मुस्लिम-युवाओं में पनप रही इस मनोवृत्ति को देखते हुए ई.1913 में मुस्लिम लीग ने अपने संविधान में संशोधन करके कांग्रेस की ही तरह अपना लक्ष्य भारत में औपनिवेशिक स्वशासन प्राप्त करना निश्चित किया।

जब दोनों पार्टियों के लक्ष्य एक हो गये तो उनमें निकटता आनी भी स्वाभाविक थी। कांग्रेस भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मुसलमानों का सहयोग चाहती थी। फलस्वरूप ई.1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य समझौता हुआ जिसे लखनऊ समझौता कहते हैं। यह समझौता कराने में बाल गंगाधर तिलक और मुहम्मद अली जिन्ना की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। इस समझौते में तीन मुख्य बातें थीं-

(क.) मुस्लिम लीग ने भी कांग्रेस की तरह भारत को उत्तरदायित्व-पूर्ण शासन देने की मांग की।

(ख.) कांग्रेस ने मुसलमानों के पृथक् निर्वाचन-मण्डल की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और विभिन्न प्रान्तों में उनके अनुपात को भी मान लिया। देश की ग्यारह प्रांतीय विधान सभाओं में मुसलमानों का अनुपात इस प्रकार निर्धारित किया गया था- पंजाब: 50 प्रतिशत, संयुक्त प्रान्त: 30 प्रतिशत, बंगाल: 40 प्रतिशत, बिहार: 25 प्रतिशत, मध्य प्रदेश: 15 प्रतिशत, मद्रास: 15 प्रतिशत तथा बम्बई: 43 प्रतिशत।

(ग.) यह स्वीकार कर लिया गया कि यदि विधान सभाओं में किसी गैर-सरकारी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किसी प्रस्ताव का विरोध किसी एक सम्प्रदाय के तीन चौथाई सदस्य करेंगे तो उस प्रस्ताव पर विचार नहीं किया जायेगा।

पं. मदनमोहन मालवीय, सी. वाई. चिंतामणि आदि कई कांग्रेसी नेताओं को लगा कि इस समझौते में मुसलमानों को अत्यधिक सुविधाएं दे दी गई हैं। कुछ इतिहासकार तो इन सुविधाओं को साम्प्रदायिकता के विकास की महत्त्वपूर्ण कड़ी मानते हैं जिसकी परिणति पाकिस्तान के रूप में हुई।

तिलक का कहना था- ‘कुछ लोगों का विचार है कि हमारे मुसलमान भाइयों को अत्यधिक रियायतें दे दी गई हैं किन्तु स्वराज्य की मांग के लिए उनका हार्दिक समर्थन प्राप्त करने के लिए वह आवश्यक था; भले ही कठोर न्याय की दृष्टि से वह सही हो या गलत। उनकी सहायता और सहयोग के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।’ अयोध्यासिंह के अनुसार- ‘इस पैक्ट से जिन्हें सबसे अधिक आघात लगा था वे थे, ब्रिटिश साम्राज्यवादी और उनके दलाल।’

लखनऊ समझौते के परिणाम स्वरूप कुछ समय के लिए देश में साम्प्रदायिक समस्या शांत हो गई।

मुसलमानों को केन्द्रीय सभा में अधिक प्रतिनिधित्व

ई.1914 से 1919 तक लडे़ गए प्रथम विश्वयुद्ध ने भारत में ब्रिटिश तंत्र का ढांचा तोड़ कर रख दिया। प्रथम विश्व युद्ध में 6 लाख 80 हजार अंग्रेज मारे गए। यह क्षति इंगलैण्ड के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हुई। भारत में अब स्वशासन के अधिकारों की मांग तेज होती जा रही थी, इसलिए अब वे भारत का शासन विक्टोरिया की घोषणा के आधार पर अथवा मार्ले-मिण्टो एक्ट के आधार पर नहीं चला सकते थे। उन्हें भारत में ब्रिटिश संसद से पारित कानून लागू करना आवश्यक हो गया जिसमें भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी दी गई हो।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार को पूरा सहयोग दिया था तथा बड़ी संख्या में भारतीय नौजवानों ने ब्रिटिश मोर्चों पर इंग्लैण्ड की ओर से लड़ते हुए प्राण गंवाए थे। इस सहयोग के बदले में भारत की गोरी सरकार ने युद्ध समाप्ति के बाद भारतीयों को स्वशासन का अधिकार देने का आश्वासन दिया था परन्तु युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने अपना वचन नहीं निभाया।

‘भारत सरकार अधिनियम 1919‘ के माध्यम से मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की घोषणा की गई। यह देश का नया संविधान था जिसने मार्ले-मिण्टो सुधार एक्ट 1909 का स्थान लिया। इस संविधान में भारतीयों को शासन में अधिक भागीदारी तो दी गई किंतु भारतीयों को स्वशासन का अधिकार नहीं दिया गया। यह भारतीय जनता के साथ विश्वास-घात था। इस कारण इस अधिनियम से राष्ट्रवादी नेता असन्तुष्ट हो गए किन्तु गांधीजी इस संविधान को लागू करवाने के पक्ष में थे। अतः अंग्रेजों ने अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण वाले ग्यारह ब्रिटिश-भारतीय प्रांतों में इस नए कानून को लागू कर दिया।

भारत सरकार अधिनियम 1919 के माध्यम से भारत में पहली बार दो सदनों वाली केन्द्रीय व्यवस्थापिका (पार्लियामेंट) की स्थापना की गई। पहले सदन को विधान सभा और दूसरे सदन को राज्य सभा कहा जाता था। विधान सभा का कार्यकाल 3 वर्ष तथा राज्यसभा का कार्यकाल 5 वर्ष रखा गया। गवर्नर जनरल इन सदनों को कार्यकाल पूरा होने से पहले भी भंग कर सकता था।

केन्द्रीय विधान सभा में 145 सदस्य थे जिनमें 104 निर्वाचित सदस्य थे। निर्वाचित सदस्यों में से 52 सदस्य सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों से, 30 मुस्लिम, 2 सिक्ख, 9 यूरोपियन, 7 जमींदार तथा 4 भारतीय वाणिज्य के हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। 41 मनोनीत सदस्यों में 26 सरकारी अधिकारी और 15 गैर-सरकारी सदस्य होते थे। केन्द्रीय राज्यसभा में सदस्यों की अधिकतम संख्या 60 थी।

इनमें से सरकारी सदस्यों की अधिकतम संख्या 20 हो सकती थी। शेष 40 सदस्यों में से 34 सदस्य निर्वाचित होते थे जिनमें से 19 सामान्य निर्वाचन क्षेत्र से, 12 साम्प्रदायिक क्षेत्रों अर्थात् मुस्लिम, सिक्ख एवं ईसाई में से और 3 विशेष निर्वाचन क्षेत्रों से होते थे। 6 गैर-सरकारी सदस्यों की नियुक्ति गवर्नर जनरल द्वारा की जाती थी।

इस प्रकार दोनों सदनों में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि आवश्यकता पड़ने पर भारत की गोरी सरकार मुस्लिम एवं ईसाई प्रतिनिधियों तथा सरकारी सदस्यों के बल पर कांग्रेस के सभी प्रस्तावों को ध्वस्त कर सकती थी किंतु फिर भी इस व्यवस्था के माध्यम से भारतीयों ने आधुनिक राजनीतिक शासन व्यवस्था में प्रवेश किया। इस कारण बहुत से विद्वान मानते हैं कि इस अधिनियम में भारत के संवैधानिक विकास के बीज मौजूद थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधाजी के विरुद्ध संदेह

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नोआखाली में मुसलमानों से बात करते हुए गांधी

मुसलमानों में गांधाजी के विरुद्ध संदेह

कांग्रेस के विरोध के बावजूद गांधीजी ने तुर्की के खलीफा के समर्थन में भारत में चल रहे खिलाफत आंदोलन को समर्थन दिया तथा कुछ दिनों बाद इसे वापस ले लिया। मुसलमानों ने इसे गांधीजी द्वारा मुसलमानों के साथ धोखा माना तथा उनके मन में गांधाजी के विरुद्ध संदेह उत्पन्न हो गया।

प्रथम विश्वयुद्ध (ई.1914-19) में तुर्की, जर्मनी की तरफ से तथा अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ा। विश्व भर के उलेमा और मौलवी तुर्की के सुल्तान को अपना खलीफा अर्थात् धार्मिक एवं राजनीतिक नेता मानते थे और तुर्की उनका धार्मिक केन्द्र था।

अंग्रेजों ने भारतीय सेनाओं को भी इस युद्ध में झौंका जो तुर्की के खलीफा के विरुद्ध भेजी गई थीं। इन सेनाओं में भारतीय मुसलमान भी थे। यह एक विचित्र स्थिति थी। भारतीय मुसलमान तुर्की के खलीफा की तरफ से लड़ना चाहते थे किंतु उन्हें अंग्रेजी सेना का हिस्सा होने के कारण खलीफा के खिलाफ लड़ना पड़ रहा था।

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भारतीय मुसलमानों को आशंका थी कि यदि तुर्की युद्ध में हार गया तो तुर्की साम्राज्य का विघटन कर दिया जायेगा तथा खलीफा की शक्तियां भी समाप्त कर दी जायेंगी। अतः भारतीय मुसलमानों ने युद्ध छिड़ते ही खिलाफत कमेटी संगठित की और तुर्की के विरुद्ध फौज भेजे जाने का विरोध किया तथा भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध खिलाफत आन्दोलन चलाया। भारत की अंग्रेज सरकार ने खिलाफत आंदोलन के नेताओं मुहम्मद अली तथा शौकत अली को नजरबंद कर लिया।

उन्हीं दिनों गांधीजी ने भारत में असहयोग आंदोलन आरम्भ किया। गांधीजी ने मुसलमानों से अपील की कि वे भी कांग्रेस के इस कार्यक्रम को अपनाएं। इसके बदले में गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन देने का आश्वासन दिया। चूंकि इस दौर की राजनीति में हिन्दुओं और मुसलमानों के उद्देश्य एक जैसे प्रतीत हो रहे थे इसलिए मुसलमानों ने गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में सहयोग देने का निर्णय लिया। कांग्रेस भी खुलकर खिलाफत आन्दोलन को समर्थन देने लगी। कुछ दिनों में दोनों आन्दोलन मिलकर एक हो गये।

याज्ञिक ने लिखा है- ‘गांधी खिलाफत के सवाल पर अंधाधुंध भाषण करने लगा और वह इस्लाम की रक्षा तथा मुक्ति के जेहाद में मुसलमानों से भी आगे बढ़ गया।’

प्रथम विश्व-युद्ध के बाद हुई संधि के द्वारा तुर्की के पुराने साम्राज्य के टुकड़े कर दिए गए। ईराक, मेसोपोटामिया, सीरिया, फिलीस्तीन और स्मिर्ना पर सुल्तान अब्दुल मजीद की सत्ता समाप्त कर दी गई। तुर्की साम्राज्य में से एक हिस्सा फ्रांस और एक ब्रिटेन के संरक्षण में दे दिया गया।

इस्तम्बूल और दर्रा दानियाल अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण में रख दिए गए। स्मिर्ना और अंतोलिया का तट यूनान में मिला दिया गया। इस संधि ने भारतीय मुसलमानों के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया और एक बार फिर से खिलाफत आंदोलन ने जोर पकड़ लिया।

मुसलमान चाहते थे कि अरब देश और इस्लाम के पवित्र स्थलों को उसी तरह खलीफा के अधिकार में रहना चाहिए जिस तरह इस्लामी राज्य द्वारा उनकी सीमा निर्धारित की गई है किन्तु जब ई.1922 में गांधीजी ने चौरी-चौरा काण्ड के कारण अचानक असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया तब मुसलमानों ने गांधीजी की कटु आलोचना की और लखनऊ समझौते से स्थापित साम्प्रदायिक एकता पुनः नष्ट हो गई।

मुसलमानों का एक वर्ग पहले से ही लखनऊ समझौते का घनघोर विरोधी था। इस वर्ग को भय था कि गांधीजी का नेतृत्व, मुसलमानों के भिन्न अस्तित्त्व को समाप्त कर देगा। खिलाफत एवं असहयोग आन्दोलन के दौरान ये नेता अनुभव करने लगे थे कि इस एकता से मुस्लिम नेताओं के स्वार्थ पूरे नहीं हो रहे हैं; इसलिए उन्होंने गांधीजी के प्रति खुलकर विष-वमन किया तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता की गाड़ी पुनः पटरी से उतर गई।

कांग्रेस में हिन्दू नेताओं का बोलबाला था तथा गांधीजी उनके सर्वमान्य नेता थे। गांधीजी यद्यपि मुसलमानों का विश्वास जीतने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देते थे और अपनी मेज की दराज में गीता के ऊपर कुरान रखते थे, उन्हें जिन्ना की अपेक्षा कुरान की अधिक आयतें याद थीं तथापि साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले मुसलमान नेताओं का मानना था कि गांधीजी का सत्य और अहिंसा के प्रति अत्यधिक आग्रह, हिन्दू धर्म के आदर्शों से प्रेरित है।

इसलिए मुसलमानों को गांधीजी का नेतृत्व अमान्य है। अनेक पढ़े-लिखे कट्टर मुस्लिम नेता गांधीजी के विरुद्ध थे। उनका मानना था कि मुसलमानों से विश्वासघात के मामले में गांधीजी का पिछला रिकॉर्ड भी अच्छा नहीं था।

गांधीजी ने ई.1907 में दक्षिण अफ्रीका में जनरल स्मट्स की सरकार के विरुद्ध जो आंदोलन चलाया था, उसे बीच में ही बंद कर दिया था। दक्षिण अफ्रीका के भारतीय पठानों ने गांधीजी के इस कार्य को विश्वासघात मानते हुए उन पर प्राण-घातक हमला किया था।

इस प्रकार मुसलमानों ने गांधीजी पर विश्वास नहीं होते हुए भी गांधीजी के ई.1920 के असहयोग आन्दोलन का समर्थन किया क्योंकि गांधीजी ने कहा था कि ‘यदि देश मेरे पीछे चले तो मैं एक वर्ष के भीतर स्वराज्य ला दूँगा’ किंतु जब ई.1922 में गांधीजी ने अचानक असहयोग आंदोलन बंद कर दिया तो मुसलमानों को लगा कि गांधीजी ने मुसलमानों को मंझधार में छोड़कर, एक बार फिर विश्वासघात किया है।

अलगाववादी मुसलमानों ने पूरे देश में यह प्रचार किया कि ‘गांधीजी ने अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए मुसलमानों को गुमराह किया।’ इससे देश में उत्तेजना फैल गई और साम्प्रदायिक दंगे आरम्भ हो गये।

इस प्रकार मुसलमानों के मन में हमेशा-हमेशा के लिए गांधाजी के विरुद्ध संदेह उत्पन्न हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत में साम्प्रदायिक हिंसा (1921-31)

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स्वतंत्रता संग्राम से पहले भारत में साम्प्रदायिक हिंसा

बीसवीं सदी के भारत में साम्प्रदायिक हिंसा के युग की शुरुआत मालाबार के मुस्लिम मोपलाओं ने की। इसके बाद कोहाट के मुस्लिम दंगों ने देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं को भयभीत करने का काम किया। हिन्दुओं ने मोपला और कोहाट दोनों ही स्थानों पर बहुत कमजोर प्रतिरोध दर्ज करवाया। इसका मुख्य कारण अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों को बढ़ावा दिया जाना था ताकि बहुसंख्यक हिन्दुओं को दबाकर भारत पर शासन बनाए रखा जा सके।

अठारहवीं सदी में मोपलाओं ने टीपू सुल्तान के शासन में हिन्दुओं पर पहली बार संगठित हमले किए थे तब से मोपलाओं ने अपना कार्य जारी रखा था। उन्नीसवीं सदी में जब मोपला किसानों ने हिन्दू जमींदरों की हत्या की थी तो अंग्रेज, मोपलाओं को नहीं दबा सके। फिर भी अंग्रेजों ने हिन्दू जमींदारों को अपनी जमीनों पर बने रहने में बहुत सहायता दी।

बीसवीं सदी आते-आते मोपला पुनः संगठित होकर हिन्दुओं की हत्या करने लगे। ई.1921 में मोपलाओं ने मुस्लिम लीग के कराची प्रस्ताव में स्वीकृत खलीफा आंदोलन से प्रेरित होकर नैयर, नम्बूदरी एवं जम्मी हिन्दू भूस्वामियों के विरुद्ध भयानक साम्प्रदायिक हिंसा आरम्भ कर दी। उन्होंने हजारों हिन्दुओं को मार डाला एवं निर्धन हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बना लिया।

इस हिंसा का सामना नहीं कर पाने के कारण एक लाख से अधिक हिन्दू अपने घरों को छोड़कर भाग खड़े हुए जिन पर मोपला मुसलमानों ने कब्जा कर लिया। इस कार्यवाही से केरल का जनसांख्यिकीय परिवर्तन हो गया। जब ब्रिटिश सरकार ने हिन्दुओं को बचाने के प्रयास किए तो मुसलमानों ने अंग्रेजों पर भी हमले कर दिए।

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ब्रिटिश रिकॉर्ड में इन्हें ब्रिटिश-मुस्लिम विद्रोह के रूप में अंकित किया गया। जब ब्रिटिश प्रशासक मोपला क्षेत्रों से हट गए तो मोपला लोगों ने फिर से हिन्दुओं का उत्पीड़न एवं हत्याएं करनी आरम्भ कर दीं। मुहम्मद हाजी को मोपला लोगों का खलीफा घोषित किया गया तथा पूरे क्षेत्र में खलीफा के झण्डे फहराने लगे। केरल के एरनाड एवं वल्लुवनाड जिलों को खलीफा की सल्तनत घोषित किया गया।

अंग्रेजों ने मोपलाओं द्वारा की जा रही मारकाट के समाचारों को काफी समय तक देश के सामने नहीं आने दिया किंतु वीर सावरकर ने एक मार्मिक उपन्यास लिखकर सारे नरसंहार को प्रकट कर दिया। इससे हिन्दुओं में भारी आक्रोश उत्पन्न हो गया। इस पर अंग्रेजों ने गढ़वाल, नेपाल और बर्मा से सेनाएं मंगवाकर मालाबार को भेजीं। इन सेनाओं ने 2,226 मोपला उपद्रवियों को मारा, 1,615 मोपला उपद्रवी घायल हुए, 5,688 मोपला उपद्रवी बंदी बनाए गए तथा 38,256 मोपला उपद्रवियों ने ब्रिटिश सेनाओं के समक्ष आत्म-समर्पण किया।

मोपला विद्रोह में गांधीजी ने पीड़ित हिन्दुओं से सहानुभूति दर्शाने की बजाय हिन्दू-मुस्लिम एकता का राग अलापा जिससे हिन्दुओं में मुसलमानों तथा गांधीजी के प्रति और अधिक आक्रोश पनप गया। डॉ. शिवराम मुंजे गांधीजी की नीतियों से इतने त्रस्त हो चुके थे कि वे कांग्रेस से उदासीन होने लगे।

श्रीमती एनीबेसेंट ने ई.1921 की मोपला-हिंसा के बारे में लिखा है- ‘मोपलाओं ने बहुत बड़े स्तर पर हत्याएं एवं लूट की। यहाँ तक कि जो हिन्दू, मोपलाओं का विरोध नहीं कर रहे थे उन्हें भी मार डाला। एक लाख लोगों का सर्वस्व लूटकर उन्हें अपने घरों से निकाल दिया गया। मालाबार हमें सिखाता है कि इस्लामिक शासन का वास्तविक अर्थ क्या है! हम भारत में दूसरे खिलाफत राज का नमूना नहीं देखना चाहते।’

जब मोपला उपद्रवियों के दमन के समाचार देश भर के समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए तो पूरे देश में साम्प्रदायिक तनाव व्याप्त हो गया। मुल्तान में भी मुसलमानों ने अनेक हिन्दुओं को मार डाला और उनकी सम्पत्ति लूट ली या नष्ट कर दी। सहारनपुर में भी ऐसी घटनाएं घटित हुईं। लाहौर में भी साम्प्रदायिक दंगे हुए। आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानन्द की रोगी-शैया पर ही हत्या कर दी गई। आर्य समाज के कुछ अन्य नेताओं की भी हत्या की गई। इन घटनाओं ने हिन्दू जनता को विचलित कर दिया।

कोहाट के हिन्दू मुस्लिम दंगे

इस काल में भारत में साम्प्रदायिक हिंसा का दूसरा बड़ा केन्द्र कोहाट बना। कोहाट अविभाजित पंजाब का एक छोटा सा कस्बा था, अब यह पाकिस्तान में चला गया है।

मई 1924 में पंजाब के एक मुस्लिम समाचार पत्र ‘लाहुल’ में एक हिन्दू विरोधी कविता छपी, जिसका एक अंश इस प्रकार था-

तुझे तेग ए मुस्लिम उठानी पड़ेगी।

कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी।

इसके जवाब में जम्मू के ‘हिन्दू’ समाचार पत्र ने भी एक कविता प्रकाशित की जिसका एक अंश इस प्रकार था-

बनाएंगे काबा में विष्णु का मन्दिर,

नमाजी की हस्ती मिटानी पड़ेगी।

 जीवनदास नामक व्यक्ति ने ‘हिन्दू’ समाचार पत्र की एक हजार प्रतियां प्राप्त कीं तथा 22 अगस्त 1924 को कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर 30-40 प्रतियां बेच दीं। जब ये प्रतियां मुसलमानों तक पहुंचीं तो उन्होंने हिन्दुओं पर हमले करने आरम्भ कर दिए। हिन्दुओं के घर जला दिए गए, 12 हिन्दुओं को मार डाला गया, 13 हिन्दू लापता हो गए, 24 हिन्दुओं के शरीर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त किए गए, 62 हिन्दू सामान्य घायल हुए। इसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने भी मुसलमानों पर हमले किए और कोहाट में दंगे आरम्भ हो गए।

कुल मिलाकर 10 मुसलमान मार डाले गए, 1 या 2 मुसलमान लापता कर दिए गए, 6 मुसलमान बुरी तरह से तथा 17 मुसलमान सामान्य रूप से घायल हुए। इस घटना के बाद हिन्दुओं को कोहाट से रावलपिण्डी भेज दिया गया। कोहाट के दंगा पीड़ितों की सहायता के लिए गांधीजी तीन बार रावलपिण्डी गए किंतु उनकी कोई सहायता नहीं कर सके। भाई परमानंद ने स्थानीय हिन्दू सभा की सहायता से पीड़ित हिन्दुओं को सहायता पहुंचाने में सफलता प्राप्त की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

उग्र-हिन्दुत्व की लहर

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जब अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर अविभाजित भारत के मुसलमान बड़े स्तर पर हिंसा और दंगे करने पर उतारू थे तो हिन्दुओं में भी इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई। इसके परिणामस्वरूप पूरे देश में उग्र-हिन्दुत्व की लहर उठी जिसने अंग्रेजी शासन की चूलें हिला दीं। मुस्लिम लीग के नेताओं ने देश में उठी उग्र-हिन्दुत्व की लहर का मजबूती से सामना किया। इस कार्य में अंग्रेजों ने मुस्लिम लीगी नेताओं का साथ दिया।

विजयी  विश्व तिरंगा प्यारा

जब भारत साम्प्रदायिक हिंसा की आग में जलने लगा तो भारतवासियों को उनके गौरव का स्मरण कराने के लिए ई.1924 में श्यामलाल पार्षद ने कांग्रेस के लिए एक झण्डा-गीत लिखा जो इतना प्रसिद्ध हुआ कि हारमोनियम एवं ढोलक की मधुर धुनों पर कांग्रेस की प्रभात-फेरियों में गाया जाने लगा-

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।

सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला,

वीरों को हरषाने वाला, मातृभूमि का तन-मन सारा।। झंडा…।

स्वतंत्रता के भीषण रण में, लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में,

कांपे शत्रु देखकर मन में, मिट जाए भय संकट सारा।। झंडा…।

इस झंडे के नीचे निर्भय, लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय,

बोलें भारत माता की जय, स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा।। झंडा…।

आओ! प्यारे वीरो, आओ। देश-धर्म पर बलि-बलि जाओ,

एक साथ सब मिलकर गाओ, प्यारा भारत देश हमारा।। झंडा…।

इसकी शान न जाने पाए, चाहे जान भले ही जाए,

विश्व-विजय करके दिखलाएं, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा।। झंडा…।

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।

गांधीजी के अनुयाई जवाहरलाल नेहरू को इस गीत में हिंसा के तत्व दिखाई देते थे। इस गीत में बार-बार बोले जाने वाले विश्व-विजयी शब्द से उन्हें सख्त परहेज था। फिर भी यह गीत भारत की आजादी तक कांग्रेस की प्रभात-फेरियों का मुख्य आकर्षण बना रहा।

इसके साथ ही बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखित- ‘वंदे मातरम्‘ गीत भी पूरे देश में धूम मचाता रहा तथा कांग्रेसियों से लेकर धुर-दक्षिण-पंथियों एवं क्रांतिकारियों तक की पहली पसंद बना रहा। अंग्रेजों से अधिक मुस्लिम लीग यह अनुभव करती थी कि ये गीत उनके विरोध में लिखे गए थे।

बंगाल में साम्प्रदायिक दंगों की बाढ़

बंगाल में हिन्दुओं की आबादी तेजी से घटती जा रही थी और मुस्लिम आबादी बढ़ती जा रही थी। इस कारण सड़कों, गली-मुहल्लों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर मस्जिदों की बाढ़ सी आ गई थी। जब कभी हिन्दू धर्मावलम्बी अपने धार्मिक जुलूसों को लेकर गाजे-बाजे के साथ इन मस्जिदों के सामने से निकलते तो मुसलमान, इन जुलूसों पर हमला बोल देते थे।

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ई.1926 के मध्य में देश में साम्प्रदायिक दंगों की बाढ़ आ गई। सबसे पहले कलकत्ता में भयानक साम्प्रदायिक हमले शुरू हुए। छः सप्ताह तक कलकत्ता की सड़कों पर नृशंस हत्याएं हुईं। 110 स्थानों पर आगजनी हुई, मंदिरों और मस्जिदों पर हमले हुए। सरकारी वक्तव्य के अनुसार पहली मुठभेड़ में 44 मनुष्य मरे और 584 घायल हुए। दूसरी मुठभेड़ में 66 मनुष्य मरे और 391 घायल हुए। ये दंगे मुख्यतः मस्जिदों के सामने, हिन्दुओं के जुलूस एवं बाजे के प्रश्न को लेकर होते थे।

मरने वालों एवं घायल होने वालों में हिन्दू अधिक थे। इस समय लॉर्ड इरविन भारत के गवर्नर जनरल थे। हिन्दू महासभा ने 22 मई 1926 को दिल्ली में एक प्रस्ताव पारित करके सरकार से मांग की कि कलकत्ता के हिन्दुओं की रक्षा की जाए। जब हिन्दू महासभा के डॉ. शिवराम मुंजे तथा पं. मदनमोहन मालवीय कलकत्ता गए तो बंगाल की सुहरावर्दी सरकार ने उन दोनों के विरुद्ध सम्मन जारी कर दिए।

पूर्वी बंगाल में तो स्थिति और भी बुरी थी। वहाँ हिन्दू महिलाओं एवं बच्चों के अपहरण, बलात्कार, आगजनी एवं हत्याओं के मामले प्रतिदिन बढ़ने लगे। उत्तरी बंगाल के मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।

गणपति उत्सव पर हमले

महाराष्ट्र में भी गणपति उत्सव में जुलूस निकालने पर मुसलमानों द्वारा उन पर हमले किए जाने लगे। स्थितियां इतनी बिगड़ गईं कि हिन्दू महासभा ने देश की महिलाओं के नाम अपील की कि अपने सम्मान की रक्षा के लिए प्रत्येक हिन्दू महिला अपने साथ शस्त्र रखे।

कानपुर में साम्प्रदायिक हिंसा

ई.1931 में कानपुर में सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें बड़ी संख्या में हिन्दुओं का नरसंहार किया गया और अंग्रेज सरकार कुछ नहीं कर सकी। इन्हीं दंगों के दौरान 25 मार्च 1931 को पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या कर दी गई।

देश में उग्र-हिन्दुत्व की लहर

मालाबार, मुल्तान, कानपुर, महाराष्ट्र, बंगाल और अमृतसर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे साम्प्रदायिक दंगों के कारण देश में उग्र-हिन्दुत्व की लहर प्रकट हुई। देश भर में हिन्दुओं के विरुद्ध हो रही हिंसक घटनाओं के विरोध में हिन्दू नेताओं ने ‘हिन्दू-एकता’ का नारा दिया। देश भर में हिन्दू महासभा की शाखाएं स्थापित की गईं।

अखिल भारतीय क्षत्रिय सभा की स्थापना हुई। ई.1923 में डॉ. किचलू ने अमृतसर में तन्जीम और तबलीग आन्दोलन प्रारम्भ किया। ई.1925 में विजय दशमी के दिन डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक दल का गठन किया जिसका उद्देश्य हिन्दू धर्म, जाति और संस्कृति की रक्षा करना था। पूरे भारत में इसकी शाखाएं स्थापित की गईं।

ई.1928 में लाहौर में ऑर्डर ऑफ दी हिन्दू यूथ नामक संगठन की स्थापना की गई। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद तथा महर्षि अरविंद घोष ने परतंत्र भारत की देह में आत्मगौरव के नवीन प्राण फूंकने के लिये उग्र-हिंदुत्व को जन्म दिया। कांग्रेस में लाला लाजपतराय, विपिनचंद्र पाल और बाल गंगाधर तिलक उग्र-हिंदुत्व के ध्वज-वाहक थे। इनके योगदान के सम्बन्ध में हम पूर्व में संक्षेप में चर्चा कर चुके हैं।

महाराष्ट्र में जन्मे विनायक दामोदर सावरकर ने हिन्दू-राष्ट्रवाद की भावना को तिलक युग से आगे बढ़ाया। उन्होंने हिन्दुओं में राजनीतिक एवं सामाजिक एकीकरण की आवश्यकता पर बल दिया तथा हिन्दुओं के समान हितों पर बल देते हुए उन्हें संगठित होने का आह्नान किया। वे मुसलमानों को प्रसन्न करने वाली नीति के समर्थक नहीं थे।

सावरकर का कहना था कि- ‘यदि भारतीय मुसलमान, स्वराज्य-प्राप्ति में सहयोग नहीं देना चाहते तो उनसे अनुनय-विनय करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मुसलमानों के बिना भी हिन्दू अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने में समर्थ हैं।’ मुसलमानों के लिये साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले नेताओं को, सावरकार का विरोध करने के बहाने, अपनी उग्र साम्प्रदायिक राजनीति को चमकाने का अच्छा अवसर प्राप्त हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

एकता का राजदूत जिन्ना

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मुहम्मद अली जिन्ना

ई.1919 में पार्लियामेंट्री कमेटी में एक गवाही देते हुए जिन्ना ने कहा कि मैं भारतीय राष्ट्रवादी की हैसियत से बोल रहा हूँ। इस घटना के बाद भारत के तथाकथित एवं अपरिपक्व राष्ट्रवादियों ने जिन्ना को एकता का राजदूत कहना आरम्भ कर दिया।

भारतीय राजनीति में जिन्ना का उदय देश को पाकिस्तान की ओर ले जाने वाले प्रमुख तत्त्वों में से एक था। मुहम्मद अली जिन्ना का जन्म ई.1876 में कराची के एक बड़े मुस्लिम व्यापारी के घर में हुआ था। भारत में यह बात प्रचलित है कि जिन्ना के पूर्वज गुजराती-हिन्दू थे, जबकि पाकिस्तानी यह मानते हैं कि उसके पूर्वज ईरान से आये थे।

जिन्ना ने कभी भी स्वयं को इसपहानी नहीं कहा, जैसा कि उस समय के मुसलमान अपनी ईरानी वंशावली को प्रमाणित करने के लिये कहा करते थे।

पाकिस्तान में अन्य लोग मानते हैं कि उसकी वंशावली राजपूत जाति में है, जिसका अर्थ है कि उनके पूर्वज हिन्दू थे। कहा जाता है कि वह राजपूत जाति पंजाब में साहिवाल कहलाती थी। जिन्ना के किसी पूर्वज ने गुजरात के समृद्ध खोजा समुदाय की लड़की से विवाह किया। उस दम्पत्ति के वंशज खोजा मुसलमान माने गये।

हिन्दू पति तथा मुस्लिम पत्नी की संतान होने के कारण यह परिवार सांप्रदायिकता की सोच से बिलकुल अलग रहता था। मोहम्मद अली जिन्ना अंग्रेजी माहौल में पला और बढ़ा। ई.1896 में मुहम्मद अली जिन्ना ने लंदन से बैरिस्टरी की परीक्षा पास की और उसी वर्ष बम्बई में वकालात आरम्भ की।

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दादाभाई नौरोजी, जिन्ना को राजनीति में लेकर आये। ई.1904 में जिन्ना कांग्रेस के बीसवें बम्बई अधिवेशन में फिरोजशाह मेहता के साथ सम्मिलित हुआ। ई.1906 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने उसे अपने सचिव की हैसियत से कांग्रेस के मंच से बोलने दिया। कांग्रेस में यह उसका पहला भाषण था। इस भाषण में उसने मुसलमानों के लिये अलग सुविधाओं की मांग का विरोध करते हुए कहा- ‘मुसलमानों के साथ वही व्यवहार होना चाहिये जो हिन्दुओं के साथ हो रहा है।’

इस प्रकार अपने राजनीतिक कैरियर के आरम्भ में जिन्ना राष्ट्रवादी था तथा भारत-विभाजन के पक्ष में नहीं था। ई.1906 में ढाका में जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और लीग ने मुसलमानों के लिये पृथक् प्रतिनिधित्व की मांग की तो जिन्ना ने उसका विरोध किया और कहा कि इस तरह का प्रयास देश को विभाजित कर देगा। ई.1913 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग की सदस्यता ग्रहण की किंतु वह कांग्रेस का सदस्य भी बना रहा।

उस समय मुस्लिम लीग तथा हिन्दू महासभा आदि विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्य भी कांग्रेस की सदस्यता रख सकते थे। ई.1916 में मुहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम लीग का अध्यक्ष चुना गया। वह हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रबल समर्थक था। इस विषय पर जोरदार भाषण देने का एक भी मौका वह हाथ से नहीं जाने देता था।

ई.1919 में पार्लियामेंट्री कमेटी में एक गवाही देते हुए जिन्ना ने कहा- ‘मैं भारतीय राष्ट्रवादी की हैसियत से बोल रहा हूँ।’

इस घटना के बाद भारत के राष्ट्रवादियों ने जिन्ना को ‘एकता का राजदूत’ कहना आरम्भ किया। अंग्रेजों ने जिन्ना को पहचानने में अधिक विलम्ब नहीं किया कि एकता का राजदूत जिन्ना कांग्रेस की बजाय अंग्रेजों के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध होगा।

ई.1919 में बम्बई के गवर्नर जॉर्ज लॉयड ने वायसराय मांटेग्यू को लिखा था- ‘जिन्ना जुबान के सफेद किंतु दिल के काले हैं…. उनके साथ कोई समझौता नहीं हो सकता क्योंकि केवल वही हैं जो कहते एक बात हैं किंतु फौरन दूसरा काम करते नजर आते हैं।’

जब कांग्रेसियों ने जिन्ना का एकता का राजदूत जिन्ना कहा तो जिन्ना ने कांग्रेसियों की कलई उतारने में अधिक विलम्ब नहीं किया। ई.1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में जिन्ना ने गांधीजी को ‘महात्मा’ कहने से मना कर दिया और उन्हें मंच से ‘मिस्टर घैण्ढी’ कहकर सम्बोधित किया। इस पर कांग्रेस के नेताओं ने जिन्ना का अपमान किया। अंग्रेजियत के रंग में पला-बढ़ा जिन्ना, हिन्दी शब्दों का ढंग से उच्चारण नहीं कर पाता था।

इसलिये वह गांधीजी को मिस्टर घैण्ढी कहता था। इस घटना के बाद, जिन्ना एवं नेहरू के बीच दूरियां बढ़ने लगीं जबकि गांधीजी ने जिन्ना को और अधिक कसकर गले लगाना शुरू कर दिया। 30 सितम्बर 1921 को जिन्ना कांग्रेस से अलग हो गया फिर भी राष्ट्रवादी बना रहा।

उस काल के कांग्रेसी नेता में गांधीजी ही सबसे अधिक चाहते थे कि मुहम्मद अली जिन्ना ‘ एकता का राजदूत जिन्ना ’ बना रहे। गांधीजी की राजनीति के लिये यह पाखण्ड ही सबसे अधिक अनूकूल था।

मोसले ने लिखा है- ‘ई.1920 तक वह वैधानिक तरीकों से अपनी बात मनवाने के लिये प्रचार करता था। ई.1928 तक वह हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करता था किंतु सत्ता के लालच ने उसे पहले कांग्रेस छोड़ने और फिर देश का बंटवारा करने की मांग करने के लिये विवश कर दिया।’

ई.1933 में जब चौधरी रहमत अली ने पाकिस्तान नामक अलग देश की अवधारणा दी तो जिन्ना ने उसे दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया। मोसले ने लिखा है कि कुछ दिनों तक मुहम्मद अली जिन्ना का नाम भारतीय कवयित्री सरोजनी नायडू के साथ लिया जाता था। वह जिन्ना के प्रेम में पागल थी और उसे प्रेम की कवितायें लिखकर भेजती थी।

माना जाता है कि सरोजनी नायडू से पीछा छुड़ाने के लिये ही एकता का राजदूत जिन्ना भारत छोड़कर लंदन चला गया और वहाँ उसने अपनी वकालात जमा ली। ई.1934 तक जिन्ना लंदन में बैरिस्ट्री करता रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

साँप जैसा चालाक गांधी

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मुहम्मद अली जिन्ना गांधी और नेहरू को सार्वजनिक मंचों से अपमानति करता था और गांधीजी को साँप जैसा चालाक गांधी कहता था।

अंग्रेजी रंग में रंगा था पाकिस्तान का भावी जनक

ई.1934 से ई.1947 तक की संक्षिप्त अवधि में भारतीय राजनीति के आकाश पर मुहम्मद अली जिन्ना और गांधीजी एक दूसरे के राजनीतिक दुश्मन माने जाते थे। गांधीजी पूरी तरह भारतीय रंग में रंगे हुए, राजनीति के ऐसे धूमकेतु थे जिनका मुकाबला दुनिया का कोई दूसरा आदमी नहीं कर सकता था तो जिन्ना पूरी तरह से अंग्रेजियत के रंग में रंगा हुआ था।

गांधी को जिन्ना की तुलना में कुरान की ज्यादा ही आयतें याद रही होंगी। इसके बावजूद जिन्ना की सफलता बेमिसाल थी क्योंकि उसने जिन मुसलमानों का दिल जीत कर दिखा दिया था, जिन्ना उनकी परम्परागत मातृभाषा उर्दू ठीक से बोल भी नहीं सकता था। उसके उच्चारण का हाल यह था कि एक बार उसने अपने भाषण के अंत में ‘पैकिस्टैन जिण्डैबैड’ कहा। कुछ पत्रकारों ने इन शब्दों का अर्थ ‘पाकिस्तान इज इन बैग’ लगाया जबकि वह तो ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ कहना चाहता था।

गांधीजी को तनिक भी सहन नहीं करता था जिन्ना

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कौलिन्स एण्ड लैपियरे ने लिखा है- वह गांधीजी को महात्मा मानने से मना करता था तथा उन्हें चालाक लोमड़ी, साँप और हर किसी से होड़ करने वाला हिन्दू कहता था। लियोनार्ड मोसले ने लिखा है- गांधीजी के लिये उसका कहना था- ‘इस आदमी को किसी एक बात तक लाना असम्भव है। वह साँप की तरह चालाक है।’

जिन्ना गांधीजी को बिल्कुल सहन नहीं कर पाता था। लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखा है- ‘एक बार गांधीजी किसी वार्ता के लिये जिन्ना के निवास स्थान पर गये। मध्यांतर हुआ तो गांधीजी जिन्ना के बहुमूल्य पर्शियन कालीन पर लेट गये और अपने पेट पर मिट्टी रख ली। इस दृश्य को जिन्ना कभी भूल नहीं सका, कभी माफ नहीं कर सका।‘ कम से कम दो बार जिन्ना को कांग्रेस के सार्वजनिक मंच से इसलिये भगाया गया क्योंकि कांग्रेसी सदस्य चाहते थे कि जिन्ना गांधीजी को महात्मा कहकर सम्बोधित करे जबकि जिन्ना उन्हें ‘मिस्टर घैण्ढी’ कहकर ही सम्बोधित करता था।

पण्डित नेहरू को राजनीति में नहीं देखना चाहता था जिन्ना

लैरी कालिंस एवं दॉमिनिक लैपियर ने अपनी पुस्तक फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखा है- जवाहरलाल नेहरू के बारे में जिन्ना के मन में आक्रोश ही आक्रोश था। वह नेहरू के बारे में कहा करता- ‘यहाँ राजनीति में नेहरू का क्या काम? जाएं अंग्रेजी के प्रोफेसर बनें। खिसकें। साहित्यकार हैं। राजनीति में घुसे आ रहे हैं। घमण्डी ब्राह्मण हैं। पश्चिमी पढ़ाई-लिखाई का बाना जरूर पहन लिया लेकिन अंदर से मक्कार हिन्दू….. हैं।’

लियोनार्ड मोसले ने लिखा है कि जवाहरलाल नेहरू के लिये जिन्ना का कहना था- ‘उद्दण्ड ब्राह्मण जो अपनी चालबाजी को पश्चिमी शिक्षा के आवरण से ढंककर रखता है। जब वह वादा करता है, कोई न कोई रास्ता छोड़ देता है और जब कोई रास्ता नहीं मिलता तो सफेद झूठ बोलता है।’

मैक्यावेली का शिष्य

जिन्ना राजनीति में मैक्यावेली का शिष्य था जिसके अनुसार राजनीति में कोई निश्चित सिद्धांत कभी नहीं होता। वह अपने सिद्धांतों एवं मांगों में परिवर्तन करता रहता था। आरम्भ में वह विधान सभाओं में मुसलमानों के लिए अलग प्रतिनिधित्व मांगता था तो बाद में वह सिंध और सीमाप्रांत को अलग करने पर जोर देता था और केन्द्र में एक तिहाई स्थान प्राप्त करना चाहता था। अंत में वह भारत विभाजन का समर्थक बन गया जिसमें उसने सिंध एवं सीमाप्रांत के साथ-साथ पंजाब, बंगाल एवं असम को भी जोड़ लिया था।

पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए उसने द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत स्वीकार किया था किंतु पाकिस्तान बनने के बाद उसने धर्मनिरपेक्ष-राष्ट्र के पक्ष में वक्तव्य दिया। इसके कुछ दिन बाद ही वह पाकिस्तान को कट्टर-मुस्लिम राज्य बनाने में जुट गया।

कैबीनेट मिशन में प्रस्तावित भारतीय संघ में बनने वाले केन्द्र के नीचे वह प्रांतों के समूहीकरण का विरोध करता था किंतु पाकिस्तान का गवर्नर-जनरल बन जाने के बाद वह अमरीका के राजदूत से शिकायत करता था कि वह भारत के साथ साझा सेना, मुक्त व्यापार एवं खुली हुई सीमाएं चाहता है।

यह कितने आश्चर्य की बात थी कि गांधीजी के लिए जिन्ना हिन्दू-मुस्लिम एकता का राजदूत था और जिन्ना उन्हें साँप जैसा चालाक गांधी कहता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मद इकबाल

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विभाजित भारत का पहला नक्शा मुहम्मद इकबाल ने बनाया

मोहम्मद इक़बाल को अल्लामा इकबाल भी कहा जाता है। उसका जन्म 9 नवम्बर 1877 को पंजाब के सियालकोट जिले में (अब पाकिस्तान) में हुआ था। इकबाल के पूर्वज काश्मीरी शैव मत को मानने वाले ब्राह्मण थे। यह परिवार शोपियां से कुलगाम जाने वाली सड़क पर स्थित स्प्रैण नामक गांव में रहता था इसलिए इन्हें ‘सप्रू’ कहा जाता था।

इकबाल के परबाबा का नाम बीरबल, दादा का नाम कन्हैयालाल एवं पिता का नाम रतनलाल सप्रू था। शैव-ब्राह्मण होने के उपरांत भी रतनलाल एक अशिक्षित दर्जी था। गांव में उसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं थी इसलिए रतनलाल स्प्रैण छोड़कर श्रीनगर चला गया। वहाँ उसने काश्मीर के अफगान सूबेदार के यहाँ नौकरी कर ली।

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वह अपने सूबेदार के लिए कर की उगाही किया करता था। एक बार उसने कर की रकम में बहुत बड़ी हेराफेरी की। अफगान सूबेदार ने उसे पकड़ लिया और उसके सामने दो विकल्प रखे, या तो वह मुसमलान बन जाए या सूली पर चढ़ने के लिए तैयार हो जाए। रतनलाल मुसलमान बन गया। उसने अपना नाम ‘शेख़ नूर मोहम्मद’ रख लिया और काश्मीर से भाग कर स्यालकोट चला गया। वहाँ उसने ‘इमाम बीबी’ नामक एक मुस्लिम लड़की से विवाह कर लिया। इसी दाम्पत्य से इकबाल का जन्म हुआ।

इमाम बीबी विनम्र तथा सहयोगी स्वभाव की महिला थी। उसने अपने पुत्र मुहम्मद इकबाल को पढ़ने के लिए ब्रिटेन भेज दिया। इकबाल कुछ समय तक इंग्लैण्ड में पढ़ता रहा और उसके बाद ब्रिटेन से जर्मनी चला गया। जर्मनी में भी इकबाल ने कुछ समय तक अध्ययन किया। इकबाल ने भारत लौटकर तीन विवाह किये। उसका पहला विवाह करीम बीबी के साथ हुआ था जो एक गुजराती चिकित्सक ख़ान बहादुर अता मोहम्मद ख़ान की पुत्री थी। इससे इक़बाल को पुत्री मिराज बेगम और पुत्र आफ़ताब इक़बाल की प्राप्ति हुई।

इसके बाद मुहम्मद इकबाल ने दूसरा विवाह सरदार बेगम के साथ किया जिससे इकबाल को पुत्र जाविद इक़बाल की प्राप्ति हुई। दिसम्बर 1914 में इक़बाल ने तीसरा विवाह मुख्तार बेगम के साथ किया। इकबाल काश्मीर में हिन्दू राजा के राज्य का विरोध करने लगा। उसने काश्मीर के मुसलमानों को महाराजा हरिसिंह के विरुद्ध भड़काया। चूंकि काश्मीरी पण्डित महाराजा हरिसिंह के समर्थक थे इसलिए इकबाल काश्मीरी पण्डितों का भी दुश्मन बन गया और उनके विरुद्ध जहर उगलने लगा।

मोहम्मद इक़बाल कट्टर मजहबी विचारों का व्यक्ति था। उसका मानना था कि इस्लाम रूहानी आज़ादी की जद्दोजहद के जज्बे का अलमबरदार है और सभी प्रकार के मजहबी अनुभवों का निचोड़ है। वह कर्मवीरता का एक जीवन्त सिद्धान्त है, जो जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाता है। इस्लाम ही एकमात्र धर्म है, जो सच्चे जीवन मूल्यों का निर्माण कर सकता है और अनवरत संघर्ष के द्वारा प्रकृति के ऊपर मनुष्य को विजयी बना सकता है।

इकबाल ने एक गीत- ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी’ भी लिखा जो मुसलमानों का कौमी तराना बन गया। ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ नामक गीत लिखकर उसने बड़ी लोकप्रियता अर्जित की। कुछ लोगों का मानना था कि यह द्विअर्थी गीत था जिसमें ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना’ का अर्थ यह था कि मुसलमान आपस में बैर नहीं करें। ‘हम बुलबुलें हैं इसकी’ का गूढ़ अर्थ यह था कि समय आने पर बुलबुलें दाना चुगकर उड़ जाएंगी। अपने गीतों से प्रसिद्धि पाकर वह राजनीति में घुस आया था।

मुहम्मद इकबाल की कविताओं एवं लेखों ने भारत के मुसलमानों में यह भावना भर दी कि, भारत में उनकी भूमिका हिन्दुओं से पृथक है। ई1922 में उसे सम्राट जॉर्ज पंचम द्वारा ज्ञदपहीज ठंबीमसवत बनाया गया। इक़बाल ने ही सबसे पहले ई.1930 में भारत के सिंध एवं पंजाब आदि प्रांतों के भीतर काश्मीर को मिलाकर एक नया मुस्लिम राज्य बनाने का विचार रखा।

इक़बाल के विचारों से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने उसे ‘सर’ की उपाधि दी। ईरान में उसकी कविताएं इकबाल लाहौरी के नाम से प्रसिद्ध हैं। ई.1930 में इलाहाबाद में मुस्लिम लीग का वार्षिक सम्मेलन आयोजित हुआ।

सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में डा. इकबाल ने मुसलमानों की अलग राजनीतिक पहचान के आधार पर भारत में एक ‘अलग मुस्लिम राष्ट्र’ या फेडरेशन की स्थापना की वकालात की। इकबाल ने कहा- ‘मैं पंजाब, काश्मीर, उत्तर-पश्चिमी प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को एक अलग राष्ट्र में एकीकृत होते हुए देखना चाहता हूँ। ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन हो या ब्रिटिश साम्राज्य से अलग एक एकीकृत उत्तर-पश्चिम भारतीय मुस्लिम राष्ट्र- मुझे मुसलमानों, खासकर उत्तर-पश्चिमी भारत के मुसलमानों की अंतिम नियति प्रतीत होती है।’

यह विभाजित भारत का पहला नक्शा था। उस समय तक पाकिस्तान शब्द का आविष्कार नहीं हुआ था। इसलिये इसे ‘मुस्लिम-भारत’ कहा गया। इस संकल्पना में बंगाल सम्मिलित नहीं था। मुहम्मद इकबाल ने लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया। इकबाल की मृत्यु 21 अप्रैल 1938 को लाहौर में हुई। उसे पाकिस्तान का राष्ट्रकवि घोषित किया गया।

अब पाकिस्तान में उसे कवि के रूप में कम जाना जाता है, पीर के रूप में ज्यादा पूजा जाता है। जर्मन में मुहम्मद इकबाल के नाम पर एक गली का नामकरण किया गया है। पाकिस्तान में उसकी कब्र पर रोज उसी प्रकार भीड़ होती है जिस प्रकार भारत में सूफी संतों की मजारों पर होती है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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