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एकता का राजदूत जिन्ना

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मुहम्मद अली जिन्ना

ई.1919 में पार्लियामेंट्री कमेटी में एक गवाही देते हुए जिन्ना ने कहा कि मैं भारतीय राष्ट्रवादी की हैसियत से बोल रहा हूँ। इस घटना के बाद भारत के तथाकथित एवं अपरिपक्व राष्ट्रवादियों ने जिन्ना को एकता का राजदूत कहना आरम्भ कर दिया।

भारतीय राजनीति में जिन्ना का उदय देश को पाकिस्तान की ओर ले जाने वाले प्रमुख तत्त्वों में से एक था। मुहम्मद अली जिन्ना का जन्म ई.1876 में कराची के एक बड़े मुस्लिम व्यापारी के घर में हुआ था। भारत में यह बात प्रचलित है कि जिन्ना के पूर्वज गुजराती-हिन्दू थे, जबकि पाकिस्तानी यह मानते हैं कि उसके पूर्वज ईरान से आये थे।

जिन्ना ने कभी भी स्वयं को इसपहानी नहीं कहा, जैसा कि उस समय के मुसलमान अपनी ईरानी वंशावली को प्रमाणित करने के लिये कहा करते थे।

पाकिस्तान में अन्य लोग मानते हैं कि उसकी वंशावली राजपूत जाति में है, जिसका अर्थ है कि उनके पूर्वज हिन्दू थे। कहा जाता है कि वह राजपूत जाति पंजाब में साहिवाल कहलाती थी। जिन्ना के किसी पूर्वज ने गुजरात के समृद्ध खोजा समुदाय की लड़की से विवाह किया। उस दम्पत्ति के वंशज खोजा मुसलमान माने गये।

हिन्दू पति तथा मुस्लिम पत्नी की संतान होने के कारण यह परिवार सांप्रदायिकता की सोच से बिलकुल अलग रहता था। मोहम्मद अली जिन्ना अंग्रेजी माहौल में पला और बढ़ा। ई.1896 में मुहम्मद अली जिन्ना ने लंदन से बैरिस्टरी की परीक्षा पास की और उसी वर्ष बम्बई में वकालात आरम्भ की।

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दादाभाई नौरोजी, जिन्ना को राजनीति में लेकर आये। ई.1904 में जिन्ना कांग्रेस के बीसवें बम्बई अधिवेशन में फिरोजशाह मेहता के साथ सम्मिलित हुआ। ई.1906 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने उसे अपने सचिव की हैसियत से कांग्रेस के मंच से बोलने दिया। कांग्रेस में यह उसका पहला भाषण था। इस भाषण में उसने मुसलमानों के लिये अलग सुविधाओं की मांग का विरोध करते हुए कहा- ‘मुसलमानों के साथ वही व्यवहार होना चाहिये जो हिन्दुओं के साथ हो रहा है।’

इस प्रकार अपने राजनीतिक कैरियर के आरम्भ में जिन्ना राष्ट्रवादी था तथा भारत-विभाजन के पक्ष में नहीं था। ई.1906 में ढाका में जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और लीग ने मुसलमानों के लिये पृथक् प्रतिनिधित्व की मांग की तो जिन्ना ने उसका विरोध किया और कहा कि इस तरह का प्रयास देश को विभाजित कर देगा। ई.1913 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग की सदस्यता ग्रहण की किंतु वह कांग्रेस का सदस्य भी बना रहा।

उस समय मुस्लिम लीग तथा हिन्दू महासभा आदि विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्य भी कांग्रेस की सदस्यता रख सकते थे। ई.1916 में मुहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम लीग का अध्यक्ष चुना गया। वह हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रबल समर्थक था। इस विषय पर जोरदार भाषण देने का एक भी मौका वह हाथ से नहीं जाने देता था।

ई.1919 में पार्लियामेंट्री कमेटी में एक गवाही देते हुए जिन्ना ने कहा- ‘मैं भारतीय राष्ट्रवादी की हैसियत से बोल रहा हूँ।’

इस घटना के बाद भारत के राष्ट्रवादियों ने जिन्ना को ‘एकता का राजदूत’ कहना आरम्भ किया। अंग्रेजों ने जिन्ना को पहचानने में अधिक विलम्ब नहीं किया कि एकता का राजदूत जिन्ना कांग्रेस की बजाय अंग्रेजों के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध होगा।

ई.1919 में बम्बई के गवर्नर जॉर्ज लॉयड ने वायसराय मांटेग्यू को लिखा था- ‘जिन्ना जुबान के सफेद किंतु दिल के काले हैं…. उनके साथ कोई समझौता नहीं हो सकता क्योंकि केवल वही हैं जो कहते एक बात हैं किंतु फौरन दूसरा काम करते नजर आते हैं।’

जब कांग्रेसियों ने जिन्ना का एकता का राजदूत जिन्ना कहा तो जिन्ना ने कांग्रेसियों की कलई उतारने में अधिक विलम्ब नहीं किया। ई.1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में जिन्ना ने गांधीजी को ‘महात्मा’ कहने से मना कर दिया और उन्हें मंच से ‘मिस्टर घैण्ढी’ कहकर सम्बोधित किया। इस पर कांग्रेस के नेताओं ने जिन्ना का अपमान किया। अंग्रेजियत के रंग में पला-बढ़ा जिन्ना, हिन्दी शब्दों का ढंग से उच्चारण नहीं कर पाता था।

इसलिये वह गांधीजी को मिस्टर घैण्ढी कहता था। इस घटना के बाद, जिन्ना एवं नेहरू के बीच दूरियां बढ़ने लगीं जबकि गांधीजी ने जिन्ना को और अधिक कसकर गले लगाना शुरू कर दिया। 30 सितम्बर 1921 को जिन्ना कांग्रेस से अलग हो गया फिर भी राष्ट्रवादी बना रहा।

उस काल के कांग्रेसी नेता में गांधीजी ही सबसे अधिक चाहते थे कि मुहम्मद अली जिन्ना ‘ एकता का राजदूत जिन्ना ’ बना रहे। गांधीजी की राजनीति के लिये यह पाखण्ड ही सबसे अधिक अनूकूल था।

मोसले ने लिखा है- ‘ई.1920 तक वह वैधानिक तरीकों से अपनी बात मनवाने के लिये प्रचार करता था। ई.1928 तक वह हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करता था किंतु सत्ता के लालच ने उसे पहले कांग्रेस छोड़ने और फिर देश का बंटवारा करने की मांग करने के लिये विवश कर दिया।’

ई.1933 में जब चौधरी रहमत अली ने पाकिस्तान नामक अलग देश की अवधारणा दी तो जिन्ना ने उसे दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया। मोसले ने लिखा है कि कुछ दिनों तक मुहम्मद अली जिन्ना का नाम भारतीय कवयित्री सरोजनी नायडू के साथ लिया जाता था। वह जिन्ना के प्रेम में पागल थी और उसे प्रेम की कवितायें लिखकर भेजती थी।

माना जाता है कि सरोजनी नायडू से पीछा छुड़ाने के लिये ही एकता का राजदूत जिन्ना भारत छोड़कर लंदन चला गया और वहाँ उसने अपनी वकालात जमा ली। ई.1934 तक जिन्ना लंदन में बैरिस्ट्री करता रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

साँप जैसा चालाक गांधी

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मुहम्मद अली जिन्ना गांधी और नेहरू को सार्वजनिक मंचों से अपमानति करता था और गांधीजी को साँप जैसा चालाक गांधी कहता था।

अंग्रेजी रंग में रंगा था पाकिस्तान का भावी जनक

ई.1934 से ई.1947 तक की संक्षिप्त अवधि में भारतीय राजनीति के आकाश पर मुहम्मद अली जिन्ना और गांधीजी एक दूसरे के राजनीतिक दुश्मन माने जाते थे। गांधीजी पूरी तरह भारतीय रंग में रंगे हुए, राजनीति के ऐसे धूमकेतु थे जिनका मुकाबला दुनिया का कोई दूसरा आदमी नहीं कर सकता था तो जिन्ना पूरी तरह से अंग्रेजियत के रंग में रंगा हुआ था।

गांधी को जिन्ना की तुलना में कुरान की ज्यादा ही आयतें याद रही होंगी। इसके बावजूद जिन्ना की सफलता बेमिसाल थी क्योंकि उसने जिन मुसलमानों का दिल जीत कर दिखा दिया था, जिन्ना उनकी परम्परागत मातृभाषा उर्दू ठीक से बोल भी नहीं सकता था। उसके उच्चारण का हाल यह था कि एक बार उसने अपने भाषण के अंत में ‘पैकिस्टैन जिण्डैबैड’ कहा। कुछ पत्रकारों ने इन शब्दों का अर्थ ‘पाकिस्तान इज इन बैग’ लगाया जबकि वह तो ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ कहना चाहता था।

गांधीजी को तनिक भी सहन नहीं करता था जिन्ना

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कौलिन्स एण्ड लैपियरे ने लिखा है- वह गांधीजी को महात्मा मानने से मना करता था तथा उन्हें चालाक लोमड़ी, साँप और हर किसी से होड़ करने वाला हिन्दू कहता था। लियोनार्ड मोसले ने लिखा है- गांधीजी के लिये उसका कहना था- ‘इस आदमी को किसी एक बात तक लाना असम्भव है। वह साँप की तरह चालाक है।’

जिन्ना गांधीजी को बिल्कुल सहन नहीं कर पाता था। लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखा है- ‘एक बार गांधीजी किसी वार्ता के लिये जिन्ना के निवास स्थान पर गये। मध्यांतर हुआ तो गांधीजी जिन्ना के बहुमूल्य पर्शियन कालीन पर लेट गये और अपने पेट पर मिट्टी रख ली। इस दृश्य को जिन्ना कभी भूल नहीं सका, कभी माफ नहीं कर सका।‘ कम से कम दो बार जिन्ना को कांग्रेस के सार्वजनिक मंच से इसलिये भगाया गया क्योंकि कांग्रेसी सदस्य चाहते थे कि जिन्ना गांधीजी को महात्मा कहकर सम्बोधित करे जबकि जिन्ना उन्हें ‘मिस्टर घैण्ढी’ कहकर ही सम्बोधित करता था।

पण्डित नेहरू को राजनीति में नहीं देखना चाहता था जिन्ना

लैरी कालिंस एवं दॉमिनिक लैपियर ने अपनी पुस्तक फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखा है- जवाहरलाल नेहरू के बारे में जिन्ना के मन में आक्रोश ही आक्रोश था। वह नेहरू के बारे में कहा करता- ‘यहाँ राजनीति में नेहरू का क्या काम? जाएं अंग्रेजी के प्रोफेसर बनें। खिसकें। साहित्यकार हैं। राजनीति में घुसे आ रहे हैं। घमण्डी ब्राह्मण हैं। पश्चिमी पढ़ाई-लिखाई का बाना जरूर पहन लिया लेकिन अंदर से मक्कार हिन्दू….. हैं।’

लियोनार्ड मोसले ने लिखा है कि जवाहरलाल नेहरू के लिये जिन्ना का कहना था- ‘उद्दण्ड ब्राह्मण जो अपनी चालबाजी को पश्चिमी शिक्षा के आवरण से ढंककर रखता है। जब वह वादा करता है, कोई न कोई रास्ता छोड़ देता है और जब कोई रास्ता नहीं मिलता तो सफेद झूठ बोलता है।’

मैक्यावेली का शिष्य

जिन्ना राजनीति में मैक्यावेली का शिष्य था जिसके अनुसार राजनीति में कोई निश्चित सिद्धांत कभी नहीं होता। वह अपने सिद्धांतों एवं मांगों में परिवर्तन करता रहता था। आरम्भ में वह विधान सभाओं में मुसलमानों के लिए अलग प्रतिनिधित्व मांगता था तो बाद में वह सिंध और सीमाप्रांत को अलग करने पर जोर देता था और केन्द्र में एक तिहाई स्थान प्राप्त करना चाहता था। अंत में वह भारत विभाजन का समर्थक बन गया जिसमें उसने सिंध एवं सीमाप्रांत के साथ-साथ पंजाब, बंगाल एवं असम को भी जोड़ लिया था।

पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए उसने द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत स्वीकार किया था किंतु पाकिस्तान बनने के बाद उसने धर्मनिरपेक्ष-राष्ट्र के पक्ष में वक्तव्य दिया। इसके कुछ दिन बाद ही वह पाकिस्तान को कट्टर-मुस्लिम राज्य बनाने में जुट गया।

कैबीनेट मिशन में प्रस्तावित भारतीय संघ में बनने वाले केन्द्र के नीचे वह प्रांतों के समूहीकरण का विरोध करता था किंतु पाकिस्तान का गवर्नर-जनरल बन जाने के बाद वह अमरीका के राजदूत से शिकायत करता था कि वह भारत के साथ साझा सेना, मुक्त व्यापार एवं खुली हुई सीमाएं चाहता है।

यह कितने आश्चर्य की बात थी कि गांधीजी के लिए जिन्ना हिन्दू-मुस्लिम एकता का राजदूत था और जिन्ना उन्हें साँप जैसा चालाक गांधी कहता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मद इकबाल

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विभाजित भारत का पहला नक्शा मुहम्मद इकबाल ने बनाया

मोहम्मद इक़बाल को अल्लामा इकबाल भी कहा जाता है। उसका जन्म 9 नवम्बर 1877 को पंजाब के सियालकोट जिले में (अब पाकिस्तान) में हुआ था। इकबाल के पूर्वज काश्मीरी शैव मत को मानने वाले ब्राह्मण थे। यह परिवार शोपियां से कुलगाम जाने वाली सड़क पर स्थित स्प्रैण नामक गांव में रहता था इसलिए इन्हें ‘सप्रू’ कहा जाता था।

इकबाल के परबाबा का नाम बीरबल, दादा का नाम कन्हैयालाल एवं पिता का नाम रतनलाल सप्रू था। शैव-ब्राह्मण होने के उपरांत भी रतनलाल एक अशिक्षित दर्जी था। गांव में उसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं थी इसलिए रतनलाल स्प्रैण छोड़कर श्रीनगर चला गया। वहाँ उसने काश्मीर के अफगान सूबेदार के यहाँ नौकरी कर ली।

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वह अपने सूबेदार के लिए कर की उगाही किया करता था। एक बार उसने कर की रकम में बहुत बड़ी हेराफेरी की। अफगान सूबेदार ने उसे पकड़ लिया और उसके सामने दो विकल्प रखे, या तो वह मुसमलान बन जाए या सूली पर चढ़ने के लिए तैयार हो जाए। रतनलाल मुसलमान बन गया। उसने अपना नाम ‘शेख़ नूर मोहम्मद’ रख लिया और काश्मीर से भाग कर स्यालकोट चला गया। वहाँ उसने ‘इमाम बीबी’ नामक एक मुस्लिम लड़की से विवाह कर लिया। इसी दाम्पत्य से इकबाल का जन्म हुआ।

इमाम बीबी विनम्र तथा सहयोगी स्वभाव की महिला थी। उसने अपने पुत्र मुहम्मद इकबाल को पढ़ने के लिए ब्रिटेन भेज दिया। इकबाल कुछ समय तक इंग्लैण्ड में पढ़ता रहा और उसके बाद ब्रिटेन से जर्मनी चला गया। जर्मनी में भी इकबाल ने कुछ समय तक अध्ययन किया। इकबाल ने भारत लौटकर तीन विवाह किये। उसका पहला विवाह करीम बीबी के साथ हुआ था जो एक गुजराती चिकित्सक ख़ान बहादुर अता मोहम्मद ख़ान की पुत्री थी। इससे इक़बाल को पुत्री मिराज बेगम और पुत्र आफ़ताब इक़बाल की प्राप्ति हुई।

इसके बाद मुहम्मद इकबाल ने दूसरा विवाह सरदार बेगम के साथ किया जिससे इकबाल को पुत्र जाविद इक़बाल की प्राप्ति हुई। दिसम्बर 1914 में इक़बाल ने तीसरा विवाह मुख्तार बेगम के साथ किया। इकबाल काश्मीर में हिन्दू राजा के राज्य का विरोध करने लगा। उसने काश्मीर के मुसलमानों को महाराजा हरिसिंह के विरुद्ध भड़काया। चूंकि काश्मीरी पण्डित महाराजा हरिसिंह के समर्थक थे इसलिए इकबाल काश्मीरी पण्डितों का भी दुश्मन बन गया और उनके विरुद्ध जहर उगलने लगा।

मोहम्मद इक़बाल कट्टर मजहबी विचारों का व्यक्ति था। उसका मानना था कि इस्लाम रूहानी आज़ादी की जद्दोजहद के जज्बे का अलमबरदार है और सभी प्रकार के मजहबी अनुभवों का निचोड़ है। वह कर्मवीरता का एक जीवन्त सिद्धान्त है, जो जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाता है। इस्लाम ही एकमात्र धर्म है, जो सच्चे जीवन मूल्यों का निर्माण कर सकता है और अनवरत संघर्ष के द्वारा प्रकृति के ऊपर मनुष्य को विजयी बना सकता है।

इकबाल ने एक गीत- ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी’ भी लिखा जो मुसलमानों का कौमी तराना बन गया। ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ नामक गीत लिखकर उसने बड़ी लोकप्रियता अर्जित की। कुछ लोगों का मानना था कि यह द्विअर्थी गीत था जिसमें ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना’ का अर्थ यह था कि मुसलमान आपस में बैर नहीं करें। ‘हम बुलबुलें हैं इसकी’ का गूढ़ अर्थ यह था कि समय आने पर बुलबुलें दाना चुगकर उड़ जाएंगी। अपने गीतों से प्रसिद्धि पाकर वह राजनीति में घुस आया था।

मुहम्मद इकबाल की कविताओं एवं लेखों ने भारत के मुसलमानों में यह भावना भर दी कि, भारत में उनकी भूमिका हिन्दुओं से पृथक है। ई1922 में उसे सम्राट जॉर्ज पंचम द्वारा ज्ञदपहीज ठंबीमसवत बनाया गया। इक़बाल ने ही सबसे पहले ई.1930 में भारत के सिंध एवं पंजाब आदि प्रांतों के भीतर काश्मीर को मिलाकर एक नया मुस्लिम राज्य बनाने का विचार रखा।

इक़बाल के विचारों से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने उसे ‘सर’ की उपाधि दी। ईरान में उसकी कविताएं इकबाल लाहौरी के नाम से प्रसिद्ध हैं। ई.1930 में इलाहाबाद में मुस्लिम लीग का वार्षिक सम्मेलन आयोजित हुआ।

सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में डा. इकबाल ने मुसलमानों की अलग राजनीतिक पहचान के आधार पर भारत में एक ‘अलग मुस्लिम राष्ट्र’ या फेडरेशन की स्थापना की वकालात की। इकबाल ने कहा- ‘मैं पंजाब, काश्मीर, उत्तर-पश्चिमी प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को एक अलग राष्ट्र में एकीकृत होते हुए देखना चाहता हूँ। ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन हो या ब्रिटिश साम्राज्य से अलग एक एकीकृत उत्तर-पश्चिम भारतीय मुस्लिम राष्ट्र- मुझे मुसलमानों, खासकर उत्तर-पश्चिमी भारत के मुसलमानों की अंतिम नियति प्रतीत होती है।’

यह विभाजित भारत का पहला नक्शा था। उस समय तक पाकिस्तान शब्द का आविष्कार नहीं हुआ था। इसलिये इसे ‘मुस्लिम-भारत’ कहा गया। इस संकल्पना में बंगाल सम्मिलित नहीं था। मुहम्मद इकबाल ने लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया। इकबाल की मृत्यु 21 अप्रैल 1938 को लाहौर में हुई। उसे पाकिस्तान का राष्ट्रकवि घोषित किया गया।

अब पाकिस्तान में उसे कवि के रूप में कम जाना जाता है, पीर के रूप में ज्यादा पूजा जाता है। जर्मन में मुहम्मद इकबाल के नाम पर एक गली का नामकरण किया गया है। पाकिस्तान में उसकी कब्र पर रोज उसी प्रकार भीड़ होती है जिस प्रकार भारत में सूफी संतों की मजारों पर होती है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

साइमन कमीशन

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साइमन कमीशन – साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (1)

भारत में चल रहे क्रांतिकारी आन्दोलनों एवं स्वराज्य दल की गतिविधियों से विवश होकर ई.1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों के बारे में सलाह देने के लिए साइमन कमीशन की नियुक्ति की। इस कमीशन के समस्त सदस्य अँग्रेज थे। इसलिये इसे व्हाइट कमीशन भी कहते हैं। कांग्रेस ने इसका बहिष्कार करने का निश्चय किया।

भारत-सचिव लॉर्ड बर्कनहेड ने भारतीय नेताओं को चुनौती देते हुए कहा कि साइमन कमीशन का विरोध करने से क्या लाभ है जबकि भारतवासी स्वयं ऐसा कोई संविधान तैयार करने में असमर्थ हैं जिसे भारत के समस्त दल स्वीकार करते हों! भारतीय नेताओं ने भारत-सचिव की इस चुनौती को स्वीकार कर लिया तथा भारत के भावी संविधान के लिये एक प्रस्ताव तैयार करने हेतु एक समिति का गठन किया।

मोतीलाल नेहरू को समिति का अध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू को सचिव नियुक्त किया गया। इसमें सुभाषचंद्र बोस तथा सर तेज बहादुर सप्रू सहित कुल 8 सदस्य थे। इस समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को नेहरू रिपोर्ट कहा जाता है। इस रिपोर्ट में भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना, अल्पसंख्यकों के धार्मिक एवं सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए अधिकारों की घोषणा तथा वयस्क मताधिकार आदि बातें सम्मिलित की गईं।

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दिसम्बर 1928 में सर्वदलीय बैठक में जिन्ना ने नेहरू समिति के प्रस्तावों पर तीन संशोधन रखे किन्तु वे स्वीकार नहीं किये गये। मुहम्मद शफी के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने प्रारम्भ से ही नेहरू समिति का बहिष्कार किया। 31 दिसम्बर 1928 और 1 जनवरी 1929 को आगा खाँ की अध्यक्षता में दिल्ली में सर्वदलीय मुस्लिम कान्फ्रेंस की बैठक बुलाई गई।

इसमें नेहरू रिपोर्ट के समस्त प्रस्तावों के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किये गये। जिन्ना ने इस कान्फ्रेंस में भाग नहीं लिया परंतु उसने मार्च 1929 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में एक प्रस्ताव रखा जिसमें नेहरू रिपोर्ट के मुकाबले 14 शर्तें रखीं। मुस्लिम सम्प्रदाय से सम्बन्धित शर्तें इस प्रकार थीं-

(1) भविष्य का संविधान संघीय होना चाहिए तथा बची हुई शक्ति का प्रयोग प्रान्तों द्वारा होना चाहिए।

(2) सभी प्रान्तों के लिए स्वायत्त शासन का एक माप स्वीकार किया जाए।

(3) देश के समस्त विधानमण्डलों एवं अन्य चुनी गई पार्टियों का एक निश्चित सिद्धांत पर पुनर्गठन हो जो प्रत्येक प्रान्त में प्रभावशाली अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व करे।

(4) केन्द्र में मुस्लिम प्रतिनिधित्व एक तिहाई से कम नहीं होना चाहिए।

(5) प्रतिनिधित्व साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली पर आधारित हो।

(6) पंजाब, बंगाल, उत्तर प्रदेश और सीमा प्रान्त में कोई प्रादेशिक पुनर्विभाजन मुस्लिम बहुसंख्यकों को प्रभावित न करे।

(7) पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता हो, यदि किसी समुदाय के 3/4 सदस्य विरोध प्रकट करें तो वह विधेयक पारित नहीं किया जाए।

(8) सिंध को बम्बई से पृथक किया जाए।

(9) अन्य प्रान्तों की तरह उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त एवं बलूचिस्तान में भी समान अधिकार दिए जाएं।

(10) मुस्लिम संस्कृति, धर्म, निजी कानून, मुस्लिम शिक्षा तथा भाषा के उत्थान एवं रक्षा के लिए खुली वकालात करने की छूट हो।

(11) सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को संरक्षण प्राप्त हो।

(12) केन्द्र एवं प्रांतीय सरकारों में मुसलमान मंत्रियों की संख्या 1/3 हो।

(13) यूनिटों की स्वीकृति के बिना संविधान में परिवर्तन नहीं किया जाए।

(14) पृथक् मतदान प्रणाली, मुस्लिम स्वीकृति के बिना नहीं हटाई जाए।

नेहरू रिपोर्ट में जिन्ना की मांग संख्या 1, 12 एवं 13 को छोड़कर शेष 11 मांगें पहले ही मान ली गई थीं किंतु जिन्ना को इनसे संतोष नहीं हुआ। दूसरी ओर हिन्दू महासभा को भी नेहरू समिति के कई प्रस्ताव स्वीकार नहीं थे, विशेषकर सिंध को बम्बई से पृथक् किए जाने का प्रस्ताव।

शाहनवाज भुट्टो, मुहम्मद अली जिन्ना और सर गुलाम हुसैन चाहते थे कि सिंध को बम्बई से अलग किया जाए किंतु लाला लाजपतराय तथा हरचंदराय सिंध को बम्बई के साथ ही रखना चाहते थे ताकि पृथक सिंध क्षेत्र के रूप में एक मुस्लिम बहुल प्रांत का उदय नहीं हो सके। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, सिंध हिन्दू पंचायत आदि संगठनों ने पृथक्कीकरण के प्रस्ताव का विरोध किया।

 हिन्दू महासभा का आरोप था कि मुसलमानों का तुष्टिकरण करने के लिए नेहरू रिपोर्ट में हिन्दुओं के लिए अहितकर प्रस्ताव रखे गए थे। इस प्रकार हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के कारण यह रिपोर्ट कूड़े के ढेर में फैंक दिए जाने से अधिक महत्व प्राप्त नहीं कर सकी।

….. लगातार (2)

साइमन कमीशन का विरोध

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साइमन कमीशन का विरोध साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (2)

साइमन कमीशन भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए लाया गया था। इसमें पृथक् मुस्लिम राष्ट्र बनाने का प्रावधान किय गया था। इस कारण कांग्रेस ने साइमन कमीशन का विरोध किया। यदि कांग्रेस ने इस रिपोर्ट का विरोध नहीं किया होता तो भारत का आजादी मिलने की प्रक्रिया बहुत पहले ही आरम्भ हो गई होती क्योंकि पृथक् मुस्लिम राष्ट्र की मांग तो अंततः माननी ही पड़ी।

साइमन कमीशन की रिपोर्ट

ई.1930 में साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। साइमन कमीशन रिपोर्ट को व्हाइट कमीशन रिपोर्ट भी कहा जाता है। इस रिपोर्ट में दिए गए मुख्य सुझाव इस प्रकार थे-

(1) प्रांतों में दोहरा शासन समाप्त करके उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाए।

(2) भारत के लिए संघीय शासन की स्थापना की जाए।

(3) उच्च न्यायालय को भारतीय सरकार के अधीन कर दिया जाए।

(4) अल्पसंख्यकों के हितों के लिए गवर्नर एवं गवर्नर जनरल को विशेष शक्तियां दी जाएं।

(5) सेना का भारतीयकरण हो।

(6) बर्मा को भारत से पृथक् किया जाए तथा सिंध एवं उड़ीसा को नए प्रांतों के रूप में मान्यता दी जाए।

(7) प्रत्येक दस वर्ष पश्चात् भारत की संवैधानिक प्रगति की जांच को समाप्त कर दिया जाए तथा ऐसा लचीला संविधान बनाया जाए जो स्वतः विकसित होता रहे।

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सर जॉन साइमन साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली का विरोधी था। उसके अनुसार यह एक घृणित प्रणाली है जो वही बीमारी पैदा करती है जिसके निदान के लिए इसका प्रयोग किया जाता है परन्तु मांटेग्यू-चैम्सफोर्ड आयोग की ही भांति साइमन कमीशन ने भी कांग्रेस-मुस्लिम लीग समझौते के सांप्रदायिक अंशों को स्वीकार कर लिया तथा मुसलमानों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व अर्थात् केन्द्रीय सभा एवं प्रांतीय विधायिकाओं में मुसलमानों के लिए अलग सीटों के आरक्षण की व्यवस्था को स्वीकार कर लिया।

साइमन कमीशन की रिपोर्ट में भारत में बनने वाले भावी संघ के निम्न-सदन (लोकसभा) में 250 सीटें प्रस्तावित की गईं जिनमें से गैर-मुस्लिमों को 150 (60 प्रतिशत) तथा मुस्लिमों को 100 (40 प्रतिशत) सीटें देनी प्रस्तावित की गईं।

पृथक मुस्लिम राष्ट्र के प्रस्ताव का विरोध

नेहरू समिति के समक्ष प्रस्तुत किए गए 14 सूत्री मांग-पत्र के रूप में जिन्ना का साम्प्रदायिक कार्यक्रम सामने आ चुका था, कांग्रेस इस कार्यक्रम को अस्वीकार तो करती थी किंतु देश में जिन्ना का खुलकर विरोध नहीं किया जा रहा था। नवम्बर 1930 में प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया जाने वाला था। इसलिए हिन्दू महासभा के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ. शिवराम मुंजे ने एक वक्तव्य जारी करके भारत सरकार को संविधान संशोधन के विषय में कुछ सुझाव दिए-

(1) सभी समुदायों को अपने मताधिकार के प्रयोग करने के समस्त अधिकार सभी प्रांतों में समान होने चाहिए।

(2) समस्त समितियों के लिए संयुक्त चुनाव पद्धति द्वारा चुनाव कराए जाएं।

(3) किसी धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर सीटों के आरक्षण न दिए जाएं।

(4) किसी भी प्रांत में सीटों का आरक्षण बहुसंख्यक समुदाय के पक्ष में नहीं हो।

(5) भारत के प्रांतों का प्रतिनिधित्व, यदि आवश्यक हो तो योग्यता के आधार पर किया जाए।

(6) धर्म की बहुलता के आधार पर प्रांतों की रचना नहीं की जानी चाहिए जिसके कारण भारत मुस्लिम भारत, सिख भारत, ईसाई भारत और हिन्दू भारत के रूप में विभाजित हो जाए तथा राष्ट्रीयता के लिए बाधक बन जाए।

(7) सरकारी नौकरियों की प्राप्ति में किसी धर्म या जाति को महत्व न देकर प्रतियोगिता को महत्व दिया जाए।

(8) केन्द्र एवं प्रांतीय मंत्रिमण्डलों में मुसलमान मंत्रियों की संख्या निर्धारित नहीं की जानी चाहिए, सम्मिलित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।

(9) केन्द्र सरकार को अपनी बची हुई शक्ति प्रांतों को नहीं देनी चाहिए। केन्द्र सरकार मजबूत होनी चाहिए।

(10) सभी सम्प्रदायों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता, वैचारिक स्वतंत्रता, पूजा पद्धति की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शिक्षा प्राप्ति की स्वतंत्रता तथा संस्थाओं के गठन की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

लंदन के गोलमेज सम्मेलनों में सरकार की विफलता

साइमन कमीशन की रिपोर्ट में प्रस्तावित संघीय-भारत के निर्माण की दिशा में विचार विमर्श करने हेतु, ब्रिटिश सरकार ने 12 नवम्बर 1930 को लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन बुलाया। कांग्रेस ने इसका बहिष्कार किया। सम्मेलन में मुहम्मद अली जिन्ना और डॉ. भीमराव अम्बेडकर में तीव्र मतभेद हो जाने से भारत में संघीय सरकार के निर्माण पर कोई निर्णय नहीं हो सका।

17 सितम्बर 1931 को लंदन में दूसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया। इसमें कांग्रेस के प्रतिनिधि की हैसियत से अकेले गांधीजी ने भाग लिया। यह सम्मेलन भी असफल रहा। 17 नवम्बर 1932 को लंदन में तृतीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। इस समय कांग्रेस अवैध संस्था घोषित हो चुकी थी इसलिये वह सम्मेलन में भाग नहीं ले सकी।

….. लगातार (3)

भारत के विभाजनकारी तत्व

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second Round Table conference

भारत के विभाजनकारी तत्व – साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (3)

भारत के जाति आधारित सामाजिक विन्यास एवं भारत में बाहर से आए विभिन्न जातियों एवं मजहबों के लोगों की बड़ी संख्या में उपस्थिति के कारण भारत के विभाजनकारी तत्व सदियों से मौजूद थे। कोई भी विदेशी शासक इन विभाजनकारी तत्वों को बढ़ावा देकर भारत में अपना शासन दीर्घकाल तक बनाए रख सकता था। अंग्रेजों ने भी यही किया।

सिंध को मुस्लिम-बहुल प्रांत बनाने की मांग

अंग्रेजों ने पहचाना कि इस्लाम भारत के विभाजनकारी तत्व के रूप में सर्वाधिक शक्तिशाली भूमिका निभा सकता है। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लीग को अलगाववादी कार्यवाहियों के लिए उकसाया। मुस्लिम लीग के ई.1930 के इलाहाबाद सम्मेलन के तुरंत बाद ई.1931 में लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया।

इस सम्मेलन में मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों ने भारतीय विधान सभाओं में मुस्लिम समुदाय के लिये जनसंख्या के अनुपात से सीटों के आरक्षण की मांग की। उन्होंने यह मांग भी की कि सिंध को नये मुस्लिम बहुल प्रांत का दर्जा दिया जाये।

ई.1931 में मुहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि भारत की समस्या को सुलझाने के लिए चार पक्षों में बात-चीत आवश्यक थी- (1) अंग्रेज सरकार, (2) भारतीय राज्य (देशी रियासतें) (3) मुसलमान और (4) हिन्दू। ई.1938 में उसने अपने इस तर्क को पुनः दोहराया।

अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम एकता की हवा निकाली

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ई.1932 में अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रयास किए गए तथा एकता सम्मेलन का आयेाजन किया गया। इस सम्मेलन द्वारा नवम्बर 1932 में नियुक्त कमेटी हिन्दू-मुस्लिम समस्या के हल के एकदम करीब पहुंच गई थी। केन्द्रीय विधानसभा में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के बारे में एक समझौता भी हो गया था और तय हो गया था कि 32 प्रतिशत सीटें मुसलमानों को दी जाएंगी।

लेकनि कमेटी का काम पूरा होने से पहले ही भारत सचिव सैमुएल होर ने हस्तक्षेप किया और घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों को केंद्रीय विधानसभा में 33.33 प्रतिशत सीटें देने का फैसला किया है। उसने सिंध को भी अलग प्रदेश घोषित किया और उसको प्रचुर आर्थिक सहायता देने का वायदा किया। इस तरह एकता सम्मेलन की सारी मेहनत पर पानी फिर गया।

ई.1932 का साम्प्रदायिक पंचाट

जब गोलमेज सम्मेलनों से भी साम्प्रदायिक समस्या का समाधान नहीं हो पाया तो 16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश सरकार ने अपनी तरफ से साम्प्रदायिक पंचाट की घोषणा की। इस पंचाट निर्णय के द्वारा ब्रिटिश सरकार ने केन्द्रीय विधान सभा में गैर-मुस्लिमों को 250 में से 105 सीटें (42 प्रतिशत) दी गईं जबकि भारत में हिन्दुओं की संख्या 75 प्रतिशत थी। मुसलमानों को 33 प्रतिशत सीटें दी गईं जबकि उनकी जनसंख्या 25 प्रतिशत थी।

साइमन कमीशन ने गैर-मुस्लिमों के लिए केन्द्रीय विधान सभा में 250 में से 150 (60 प्रतिशत) सीटें प्रस्तावित की थीं किंतु प्रधानमंत्री मैकडानल ने इन सीटों को घटाकर 42 प्रतिशत कर दिया। इससे हिन्दुओं, सिक्खों, जैनों एवं बौद्धों में सरकार एवं मुसलमानों के प्रति क्षोभ उत्पन्न होना स्वाभाविक था। इस पंचाट निर्णय के अन्तर्गत मुसलमानों की ही तरह यूरोपियनों, सिक्खों, भारतीय ईसाईयों, एंग्लो-इंण्डियनों, राजाओं और जागीरदारों को विभिन्न प्रान्तीय विधान सभाओं में अपने-अपने समुदायों के प्रतिनिधियों को पृथक् निर्वाचन प्रणाली द्वारा चुनने का अधिकार दिया गया।

दलितों को पृथक् प्रतिनिधित्व

भारत के विभाजनकारी तत्व के रूप में दूसरा बड़ा तत्व भारतीय समाज की जाति व्यवस्था थी। भारत के सामाजिक विन्यास में कर्म आधिरित जाति व्यवस्था का प्रावधान किया गया था किंतु समय के साथ इस व्यवस्था ने अत्यंत घृणित रूप ले लिया तथा यह भारत के विभाजनकारी तत्व के रूप में सामने आई। डा. अम्बेडकर ने दलित जातियों के लिए अलग अधिकारों की मांग की। अंग्रेजों ने इस मांग का भी लाभ उठाया।

डा. अम्बेडकर के प्रयत्नों से दलित वर्ग को अपने प्रतिनिधियों को पृथक निर्वाचन प्रणाली द्वारा चुनने की सुविधा दी गई। इस प्रकार इस पंचाट के माध्यम से अँग्रेजों ने बांटो एवं राज्य करो के सिद्धान्त पर देश में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने तथा भारतीय अल्पसंख्यकों को अनुचित महत्त्व प्रदान कर राष्ट्रीय एकता को छिन्न-छिन्न करने का काम किया।

इसी प्रकार दलितों को अलग प्रतिनिधित्व देकर हिन्दू-समाज का बंटवारा करने, राजाओं और जागीरदारों के लिए पृथक्-निवार्चन की व्यवस्था कर अप्रजातांत्रिक तत्त्वों को प्रोत्साहन देने तथा भारत में प्रगतिशील तत्त्वों की गतिविधियों को नियंत्रित एवं कमजोर करने का षड़यंत्र रचा।

इस प्रकार अंग्रेजों पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने धर्म एवं व्यवसाय के आधार पर प्रतिनिधित्व का विभाजन करके भारत को नई समस्याओं के खड्डे में फैंक दिया किंतु यह आरोप सही नहीं है, भारत के विभाजनकारी तत्व भारत में सदियों से मौजूद थे और भारत की आजादी के 75 साल बाद भी उसी तरह विध्वंसक गतिविधियां चलाए हुए हैं।

….. लगातार (4)

पूना पैक्ट

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गांधी और अम्बेडकर में पूना-पैक्ट

पूना पैक्ट – साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (4)

जब अंग्रेजों ने भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए नया संविधान बनाना आरम्भ किया तो भारत के विभिन्न विभाजनकारी तत्व अपने लिए अधिक अधिकारों की मांग करने लगे। यह मांग विभिन्न संस्थाओं में पदों के आरक्षण तक सीमित थी। डॉ. अम्बेडकर ने दलित कही जाने वाली जातियों के लिए अलग प्रावधानों की मांग की तो उनका कांग्रेस से विवाद हो गया। इस पर गांधी और अम्बेडकर के बीच पूना में एक समझौता हुआ जिसे पूना पैक्ट कहते हैं।

गांधी और अम्बेडकर में पूना पैक्ट

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गांधीजी ने साम्प्रदायिक पंचाट का, विशेषकर दलितों को हिन्दुओं से पृथक् करने वाले प्रावधानों का जोरदार विरोध किया तथा 20 सितम्बर 1932 को आमरण अनशन पर बैठ गये। डॉ. अम्बेडकर ने इस व्रत को ‘राजनैतिक धूर्त्तता’ बताया। कुछ लोगों ने इसे अपनी मांग मनवाने का तरीका बतलाया। जब गांधीजी का स्वास्थ्य अधिक बिगड़ने लगा तब कांग्रेसी नेताओं ने 26 सितम्बर 1932 को डॉ. अम्बेडकर और गांधीजी के बीच एक समझौता करवाया। यह समझौता पूना पैक्ट के नाम से प्रसिद्ध है।

पूना पैक्ट के द्वारा साम्प्रदायिक पंचाट के आपत्तिजनक भाग को हटाया गया तथा डॉ.अम्बेडकर दलितों के लिए दुगने स्थान सुरक्षित करवाने में सफल रहे। भारत की समस्या के हल को लेकर डॉ. अम्बेडकर का गांधीजी और मुहम्मद अली जिन्ना दोनों से विवाद रहता था। इसलिए अम्बेडकर ने गांधी और जिन्ना की तुलना करते हुए कहा कि– ‘इन दोनों ही नेताओं को भारतीय राजनीति से अलग हो जाना चाहिए।’

भारत सरकार अधिनियम 1935 में अल्पसंख्यकों का हिन्दुओं पर वर्चस्व

लंदन के तीन गोलमेज सम्मेलनों एवं साम्प्रदायिक पंचाट की घोषणा के बाद भारत में नया संविधान लागू किया गया। इसे भारत सरकार अधिनियम 1935 कहते हैं। इस संविधान ने भारत सरकार अधिनियम 1919 का स्थान लिया। नए कानून के मुख्य प्रावधान इस प्रकार थे-

(1) बर्मा को भारत से पृथक् कर दिया जाएगा।

(2) उड़ीसा एवं सिंध नामक नवीन प्रांतों का गठन किया जाएगा।

(3) एक अखिल भारतीय संघ की स्थापना की जायेगी जिसमें ब्रिटिश-भारत के प्रान्त एवं देशी राज्य सम्मिलित होंगे।

(4) प्रांतों को स्वशासन का अधिकार दिया जायेगा।

(5) शासन के विषय तीन भागों में विभक्त किए जायेंगे- (i) संघीय विषय, जो केन्द्र के अधीन होंगे। (ii) प्रांतीय विषय, जो पूर्णतः प्रांतों के अधीन होंगे तथा (iii) समवर्ती विषय, जो केन्द्र और प्रांत के अधीन रहेंगे। विरोध होने पर केन्द्र का कानून मान्य होगा।

(6) संघीय संविधान के अधीन दो सदन होंगे।

(7) हाउस ऑफ एसेम्बली अर्थात् निम्न सदन में 375 सीटें होंगी जिनमें से ब्रिटिश-भारत के प्रतिनिधियों की संख्या 250 एवं देशी राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या 125 होगी।

(8) निम्न-सदन में ब्रिटिश-भारत के 250 प्रतिनिधियों का चुनाव सामान्य अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली द्वारा होगा। इनमें से 105 सीटें सामान्य थीं जबकि 19 सीटें पिछड़े वर्ग के लिए, 82 सीटें मुसलमानों के लिए, 6 सीटें सिक्खों के लिए, 4 एंग्लो-इण्डियन के लिए 8 सीटें यूरोपियन्स के लिए, 8 सीटें भारतीय ईसाइयों के लिए, 11 सीटें उद्योगपतियों के लिए, 7 सीटें जमींदारों के लिए, 10 सीटें श्रमिक प्रतिनिधियों के लिए, 9 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई थीं।

(9) कौंसिल ऑफ स्टेट अर्थात् उच्च सदन में कुल 260 सीटें होंगी जिनमें से ब्रिटिश-भारत के सदस्यों की संख्या 156 तथा देशी राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या 104 होगी। ब्रिटिश-भारत के 156 सदस्यों में से 75 सीटें जनरल के लिए, 6 सीटें पिछड़े वर्ग के लिए, 4 सिक्खों के लिए, 49 मुसलमानों के लिए, 6 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं।

इस प्रकार अंग्रेजों द्वारा आरम्भ किए गए संवैधानिक सुधारों का परिणाम भारत की अखण्डता के लिए अत्यंत खतरनाक सिद्ध हुआ। 1932 के साम्प्रदायिक पंचाट के माध्यम से मुसलमानों को तथा पूना पैक्ट के माध्यम से दलितों को अलग अधिकार दे दिये गये।

इन प्रावधानों से भारत की आत्मा पर गहरा प्रहार हुआ। देश की बहुसंख्यक जातियां मुसलमानों एवं दलितों से पिछड़ जाने के लिए मजबूर कर दी गईं। जो अंग्रेज अपने देश में योग्यता को प्राथमिकता देते थे, भारत में योग्यता का गला घोंटने वाले बन गय। इसमें केवल अंग्रेजों का दोष नहीं था, भारत के विभाजनकारी तत्वों की गहरी साजिशें भी शमिल थीं।

(अध्याय पूर्ण)

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रहमत अली

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रहमत अली ने किया पाकिस्तान शब्द का आविष्कार

ई.1933 में रहमत अली नामक एक विद्यार्थी ने एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें कहा गया कि भारतीय मुसलमानों को अपना राज्य हिन्दुओं से अलग कर लेना चाहिये। रहमत ब्रिटेन में रहकर पढ़ रहा था और उस समय उसकी आयु 40 वर्ष थी। उसने अपने प्रस्ताव में कहा कि भारत को अखण्ड रखने की बात अत्यंत हास्यास्पद और फूहड़ है।

भारत के जिन उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों- पंजाब, काश्मीर, सिंध, सीमांत प्रदेश तथा ब्लूचिस्तान में मुसलमानों की संख्या अधिक है, उन्हें अलग करके पाकिस्तान नामक देश बनाया जाना चाहिये। उसके प्रस्ताव का समापन इन शब्दों के साथ हुआ था- ‘हिन्दू राष्ट्रीयता की सलीब पर हम खुदकुशी नहीं करेंगे।’

कैंब्रिज विश्वविद्यालय के भारतीय मुस्लिम विद्यार्थियों ने रहमत अली का साथ दिया। उन्होंने ‘पाकिस्तान नाउ ऑर नेवर।’ शीर्षक से एक इश्तहार प्रकाशित करवाया जिसमें कहा गया कि- ‘भारत किसी एक अकेले राष्ट्र का नाम नहीं है। न ही एक अकेले राष्ट्र का घर है। वास्तव में यह इतिहास में पहली बार ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्मित एक राष्ट्र की उपाधि है। मुसलमानों की जीवन शैली भारत के अन्य लोगों से भिन्न है। इसलिये उनका अपना राष्ट्र होना चाहिये। हमारे राष्ट्रीय रिवाज और कैलेंडर अलग हैं। यहाँ तक कि हमारा खान-पान तथा परिधान भी भिन्न है।’

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रहमत अली ने ‘पाकिस्तान’ शब्द के दो अर्थ बताये- पहले अर्थ के अनुसार पाकिस्तान माने पवित्र भूमि। दूसरे अर्थ के अनुसार पाकिस्तान शब्द का निर्माण उन प्रांतों के नामों की अंग्रेजी वर्णमाला के प्रथम अक्षरों से हुआ है जो इसमें शामिल होने चाहिये- पंजाब, अफगानिया (उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत), काश्मीर तथा सिंध। शेष शब्द बलूचिस्तान शब्द के अंतिम भाग से लिये गये। बाद में देश के पूर्वी भाग में स्थित असम तथा बंगाल और दक्षिण में स्थित हैदराबाद तथा मालाबार को भी पाकिस्तान में शामिल करने की योजना बनायी गयी।

इस योजना के अनुसार संपूर्ण ‘गैर-मुस्लिम राष्ट्र’ को ‘मुस्लिम-देश’ द्वारा घेरा जाना था तथा गैर-मुस्लिम राष्ट्र के बीच-बीच में मुस्लिम पॉकेट यथा अलीगढ़, भोपाल, हैदराबाद, जूनागढ़, आदि को भी पाकिस्तान का हिस्सा होना था। रहमत अली के इस प्रस्ताव पर मुहम्मद अली जिन्ना की प्रतिक्रिया के बारे में लैरी कॉलिंस एवं दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है-

‘जिस व्यक्ति को एक दिन पाकिस्तान के पिता की संज्ञा से विभूषित किया जाने वाला था, उसी मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान को एक असम्भव सपना कह कर ई.1933 में रहमत अली का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।’

वस्तुतः रहमत अली जीवन भर लंदन में रहकर पाकिस्तान के लिये संघर्ष करता रहा किंतु जिन्ना ने कभी भी उसे महत्व नहीं दिया। जिन्ना को भय था कि कहीं रहमत अली, जिन्ना का स्थान न छीन ले।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाकिस्तान के लिए आंदोलन

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Muhammad Ali Jinnah

पाकिस्तान के लिए आंदोलन – मुहम्मद अली जिन्ना का भारत की राजनीति में पुनः आगमन

जैसे ही ई.1933 में रहमत अली ने ‘पाकिस्तान’ नामक राष्ट्र की अवधारणा प्रस्तुत की, वह अवधारणा रातों-रात लंदन में रहने वाले मुस्लिम युवाओं के बीच प्रसिद्धि पा गयी। दुनिया भर के अखबार इसका हल्ला मचाने लगे तो मुस्लिम लीग की हवाई कल्पनाओं को मानो नये पंख मिल गये। अब पाकिस्तान के लिए आंदोलन चलाने का मार्ग साफ हो गया था।

अब मुस्लिम लीग को एक ऐसे लीडर की तलाश थी जिसने भारत से बाहर निकलकर दुनिया को देखा हो, जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को जानता हो और जो अंग्रेजों से उन्हीं की भाषा में पूरे फर्राटे के साथ बात कर सके। जो पाकिस्तान के लिए आंदोलन चला सके, जो नेहरू, पटेल एवं गांधी जैसा बड़ा वकील हो तथा जो नेहरू, गांधी और पटेल से भारत का एक बड़ा हिस्सा छीन सके।

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मुस्लिम लीगी नेताओं की दृष्टि फिर से अपने पुराने अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना पर टिक गयी और वे उसे ई.1934 में लंदन से बैरिस्टरी का काम छुड़वाकर फिर से भारत ले आये। यह पहली बार हो रहा था कि भविष्य में बनने वाले एक देश के लिये एक नेता लंदन से आयात किया जा रहा था। उसी साल जिन्ना केन्द्रीय धारा सभा के लिये चुना गया और उसी साल वह अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का पुनः अध्यक्ष भी हुआ।

इस बार जिन्ना के तेवर बदले हुए थे। वह हिन्दू-मुस्लिम एकता और राष्ट्रवाद का अलाप लगाना छोड़कर मुस्लिम हितों की बात कर रहा था। वह कांग्रेस के नेताओं के विरोध में बोलने के लिए अवसरों की ताक में रहता था और गांधी एवं नेहरू की खुलकर आलोचना करता था। अब वह कांग्रेस में नहीं था, केवल मुस्लिम लीग में था। इस बार वह भारतीय नहीं था, केवल मुस्लिम नेता था। इस बार उसे भारत की आजादी और उन्नति की चिंता नहीं थी, केवल मुसलमानों के भावी देश के निर्माण की चिंता करनी थी।

अब पाकिस्तान जिन्ना के लिए ‘असम्भव सपना’ नहीं था अपितु केवल ‘यही एक सपना शेष’ रह गया था जिसे जिन्ना अपने जीवन काल में पूरा होते हुए देखना चाहता था।

एक ओर जिन्ना और मुस्लिम लीग साम्प्रदायिक राजनीति के खतरनाक चरण में पहुंच चुके थे किंतु दूसरी ओर कांग्रेसी नेता बदली हुई परिस्थितियों को समझ नहीं पा रहे थे। वे हिन्दू और मुसलमान दोनों को अपनी विरासत समझ रहे थे तथा मुस्लिम लीग एवं उसके नेता मुहम्मद अली जिन्ना, दोनों को सिरे से नकार रहे थे। जिन्ना को फिर से राजनीति में लौट आते हुए देखकर पाकिस्तान का स्वप्न देखने वाला रहमत अली बुरी तरह से चिढ़ गया। वह जिन्ना को पसंद नहीं करता था।

रहमत अली इस्लाम की परम्परागत वेशभूषा, भाषा और खानपान को ही मुसलमान होने की गारण्टी मानता था जबकि जिन्ना अंग्रेजी कपड़े पहनता था, अंग्रेजी भाषा में सोचता और बोलता था, अंग्रेजी शैली में बैठकर खाना खाता था। इसलिए रहमत अली की दृष्टि में जिन्ना असली मुसलमान नहीं था।

रहमत अली ने पहले भी जिन्ना के विरुद्ध आग उगली थी किंतु जब जिन्ना भारत छोड़कर इंग्लैण्ड में बैरिस्टरी करने लगा तो रहमत अली ने उसके विरुद्ध बोलना बंद कर दिया था किंतु अब जबकि जिन्ना न केवल भारतीय राजनीति में लौट आया था, अपतिु मुस्लिम लीग का अध्यक्ष भी बन गया था, इसलिए रहमत अली ने जिन्ना के विरुद्ध हमले तेज कर दिए।

8 जुलाई 1935 को रहमत अली ने एक इश्तहार प्रकाशित करवाया जिसमें उसने जिन्ना को निशाना बनाते हुए कहा- ‘मैं दिल से उम्मीद करता हूँ के आप मेहरबानी करके पाकिस्तान की अटल मांग पर हमें पूरा समर्थन देंगे। न्याय और समता पर आधारित हिंदोस्तान से भिन्न पृथक राष्ट्रीय अस्तित्व के रूप में पाकिस्तान की मांग करना एक पवित्र अधिकार है।

……. पाकिस्तान हिन्दुओं की जमीन नहीं है और न ही उसकी जनता हिंदोस्तान की नागरिक है।

….. हमारे राष्ट्रीय जीवन का बुनियादी आधार और सार उससे एकदम अलग है जिस पर हिन्दूवाद आधारित है और परवान चढ़ रहा है।

….. सरकार द्वारा नामजद मुसलमान प्रतिनिधियों द्वारा गोलमेज सम्मेलन में भारत को महासंघ बनाने की योजना पर सहमति देकर किए गए हमारे राष्ट्रीय भविष्य के बेहद शर्मनाक समर्पण की हम पाकिस्तानी बार-बार भर्त्सना कर चुके हैं। ये लोग न तो पाकिस्तान के प्रतिनिधि थे और न ही पाकिस्तानी जनता की नुमाइंदगी कर रहे थे।

…… इतिहास की चेतावनी की पूरी तरह उपेक्षा करते हुए समर्पण की कला के इन प्रतिष्ठित महारथियों ने हमारी राष्ट्रीयता को बेच दिया है और भावी पीढ़ियों की बलि चढ़ा दी है। पाकिस्तान के साथ की गई सबसे ज्यादा अपमानजनक गद्दारी के लिए इन लोगों को इतिहास के सामने जवाबदेही करनी होगी।

संभवतः रहमत अली ने जिन्ना को अपना राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मान लिया था और उसी ईर्ष्या के कारण वह जिन्ना पर हमले कर रहा था। इसलिए जिन्ना भी तेजी से मुसलमानों के लिए अलग देश की राजनीति को आगे बढ़ा रहा था। भारत में एक केन्द्रीय अथवा संघीय व्यवस्था की स्थापना को जिन्ना ने ‘हिन्दू राज्य का स्वप्न’ कहना आरम्भ किया।

जिन्ना का कहना था- ‘आज हम केवल एक चौथाई भारत मांग रहे हैं और तीन चौथाई उनके लिए छोड़ देने को तैयार हैं। यदि उन्होंने अधिक जिद की तो शायद उन्हें यह भी न मिले।’

एक अन्य अवसर पर जिन्ना ने कहा- ‘हिन्दुओं ने पिछले एक हजार वर्षों से भारत पर राज्य नहीं किया है। हम उन्हें तीन चौथाई भारत राज्य करने के लिए दे रहे हैं। हमारे एक चौथाई भारत पर लालच की दृष्टि न रखो।’

भारत के मुसलमान कभी हिन्दू राज्य स्वीकार नहीं करेंगे जिसका परिणाम यह होगा कि देश में अव्यवस्था और अराजकता फैल जाएगी।

ई.1936 में शौकत अली की मूर्ति का अनावरण करते हुए जिन्ना ने कहा- ‘वर्तमान राजनीतिक समस्या यह थी कि इंग्लैण्ड सारे भारत पर राज्य करने का इच्छुक था और गांधीजी इस्लामी भारत का शासक बनना चाहते थे और हम दोनों में से किसी एक को या समान रूप से दोनों को मुसलमानों पर नियंत्रण स्थापित करने नहीं देंगे।’

इस प्रकार पाकिस्तान के लिए आंदोलन दिन पर दिन जोर पकड़ने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुसलमानों में बेचैनी

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जब मुहम्मद अली जिन्ना ने लंदन से भारत लौटकर मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग उठाई तो जवाहर लाल नेहरू ने मुसलमानों के लिए अलग देश के विचार का दृढ़ता से विरोध किया। इस कारण मुसलमानों में बेचैनी फैल गई।

उधर लंदन में रहमत अली जिन्ना को नकार रहा था तो इधर जवाहरलाल नेहरू देश में तेजी से पनप रही मुस्लिम लीग की समानांतर राजनीति पर हमले कर रहे थे। वे केवल कांग्रेस को ही भारतीय राजनीति में देखना चाहते थे।

ई.1937 में जब प्रान्तीय विधान सभाओं के निर्वाचन हुए तो जवाहरलाल नेहरू ने एक वक्तव्य दिया- ‘देश में केवल दो ही ताकतें हैं- सरकार और कांग्रेस।……. कांग्रेस सरकार के खिलाफ वोट देने का मतलब हैब्रिटिश प्रभुत्व स्वीकार करने के लिए वोट देना…….केवल कांग्रेस ही सरकार का मुकाबला कर सकती है। कांग्रेस के विरोधियों के हित आपस में जुड़े हुए हैं। उनकी मांगों का जनता से कुछ लेना देना नहीं है।’

इस वक्तव्य के कारण जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू से नाराज हो गया और उसके बाद उसने नेहरू को नीचा दिखाने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने दिया। उसने तुरंत प्रतिवाद करते हुए कहा- ‘मैं कांग्रेस का साथ देने से इंकार करता हूँ, देश में एक तीसरा पक्ष भी है और वह है मुसलमानों का।’ कुछ दिन बाद जिन्ना ने नेहरू और कांग्रेस को चेतावनी दी- ‘वे मुसलमानों को अकेला छोड़ दें।’

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नेहरू ने जवाब दिया- ‘मिस्टर जिन्ना बंगाल के मुसमलान मामलों में कांग्रेस की दखलंदाजी पर एतराज करते हुए कहते हैं कि कांग्रेस मुसलमानों को अकेला छोड़ दे। …… किन मुसलमानों को? जाहिर है कि केवल उनको जो मिस्टर जिन्ना और मुस्लिम लीग के अनुयायी हैं। …….

मुस्लिम लीग का लक्ष्य क्या है? क्या वह भारत की आजादी के लिए लड़ रही है? क्या वह साम्राज्यवाद विरोधी है ? मेरा विचार है, नहीं। वह मुसलमानों के एक गुट की नुमाइंदगी करती है जिसमें निश्चित रूप से काफी प्रतिष्ठित लोग हैं। ये लोग उच्च-मध्यम वर्ग के ऊँचे हलकों में सक्रिय रहते हैं और उनका मुसलमान जनता से सम्पर्क नहीं है।

मुसलमानों के निम्न-मध्यमवर्ग से भी उनका सम्बन्ध कम ही है। मिस्टर जिन्ना को जान लेना चाहिए कि मुस्लिम लीग के ज्यादातर सदस्यों के मुकाबले में मुसलमानों के ज्यादा सम्पर्क में रहता हूँ।’

इस भाषण के एक माह बाद एक साक्षात्कार में जिन्ना ने कहा- ‘हर बात में दखल देने वाले कांग्रेस के इस अध्यक्ष के बारे में क्या कहूँ? लगता है कि वे सारी दुनिया की जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ढो रहे हैं। अपने काम से मतलब रखने के बजाय हर बात में टांग अड़ाना उनके लिए जरूरी है।’

नेहरू ने अपने भाषणों में बार-बार जिन्ना पर प्रहार किए कि वे ड्राइंग रूम की राजनीति से बाहर निकलकर सारे-सारे दिन खेतों में काम करने वाले एक करोड़ मुसलमानों तक पहुंचें। जिन्ना और मुस्लिम लीग के पास नेहरू के इन बयानों की कोई काट नहीं थी। उन्हें भय हुआ कि कहीं सचमुच ही निर्धन मुस्लिम समुदाय नेहरू एवं कांग्रेस की बातों में न आ जाए।

जाहिर था कि लीग केवल एक ही तरीके से मुसलमान जनता को जगाकर, आंदोलित करके, अपने नेतृत्व के पीछे चला सकती थी। वह तरीका था- ‘इस्लाम खतरे में है।’ दीन का सवाल उठाकर ही लीग अपना झण्डा सबसे अलग उड़ा सकती थी।

इस नारे के द्वारा ही मुस्लिम लीग भारत के मुसलमानों में बेचैनी फैला सकती थी जिसका उपयोग पाकिस्तान की मांग को मजबूत बनाने में किया जा सकता था।

ई.1937 के चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। ये चुनाव भारत सरकार अधिनियम-1935 में किये गये प्रावधानों के अंतर्गत हुए थे। मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और उड़ीसा में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। बंगाल, आसाम तथा पश्चिमोत्तर प्रदेश में वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। केवल पंजाब और सिन्ध में कांग्रेस को कम मत मिले।

ग्यारह प्रान्तों में मुसलमानों के लिए सुरक्षित 482 सीटों में से कांग्रेस को 26 सीटें, मुस्लिम लीग को 108 सीटें तथा निर्दलीय मुसलमानों को 128 सीटें मिलीं। पंजाब में अधिकांश सीटें यूनियनिस्ट पार्टी को मिलीं। बंगाल में फजलुल हक की प्रजा-पार्टी को 38 सीटें मिलीं। इन चुनाव परिणामों से मुसलमानों में बेचैनी फैलना स्वाभाविक ही था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
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डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

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चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...