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पाकिस्तान के लिए आंदोलन

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Muhammad Ali Jinnah

पाकिस्तान के लिए आंदोलन – मुहम्मद अली जिन्ना का भारत की राजनीति में पुनः आगमन

जैसे ही ई.1933 में रहमत अली ने ‘पाकिस्तान’ नामक राष्ट्र की अवधारणा प्रस्तुत की, वह अवधारणा रातों-रात लंदन में रहने वाले मुस्लिम युवाओं के बीच प्रसिद्धि पा गयी। दुनिया भर के अखबार इसका हल्ला मचाने लगे तो मुस्लिम लीग की हवाई कल्पनाओं को मानो नये पंख मिल गये। अब पाकिस्तान के लिए आंदोलन चलाने का मार्ग साफ हो गया था।

अब मुस्लिम लीग को एक ऐसे लीडर की तलाश थी जिसने भारत से बाहर निकलकर दुनिया को देखा हो, जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को जानता हो और जो अंग्रेजों से उन्हीं की भाषा में पूरे फर्राटे के साथ बात कर सके। जो पाकिस्तान के लिए आंदोलन चला सके, जो नेहरू, पटेल एवं गांधी जैसा बड़ा वकील हो तथा जो नेहरू, गांधी और पटेल से भारत का एक बड़ा हिस्सा छीन सके।

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मुस्लिम लीगी नेताओं की दृष्टि फिर से अपने पुराने अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना पर टिक गयी और वे उसे ई.1934 में लंदन से बैरिस्टरी का काम छुड़वाकर फिर से भारत ले आये। यह पहली बार हो रहा था कि भविष्य में बनने वाले एक देश के लिये एक नेता लंदन से आयात किया जा रहा था। उसी साल जिन्ना केन्द्रीय धारा सभा के लिये चुना गया और उसी साल वह अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का पुनः अध्यक्ष भी हुआ।

इस बार जिन्ना के तेवर बदले हुए थे। वह हिन्दू-मुस्लिम एकता और राष्ट्रवाद का अलाप लगाना छोड़कर मुस्लिम हितों की बात कर रहा था। वह कांग्रेस के नेताओं के विरोध में बोलने के लिए अवसरों की ताक में रहता था और गांधी एवं नेहरू की खुलकर आलोचना करता था। अब वह कांग्रेस में नहीं था, केवल मुस्लिम लीग में था। इस बार वह भारतीय नहीं था, केवल मुस्लिम नेता था। इस बार उसे भारत की आजादी और उन्नति की चिंता नहीं थी, केवल मुसलमानों के भावी देश के निर्माण की चिंता करनी थी।

अब पाकिस्तान जिन्ना के लिए ‘असम्भव सपना’ नहीं था अपितु केवल ‘यही एक सपना शेष’ रह गया था जिसे जिन्ना अपने जीवन काल में पूरा होते हुए देखना चाहता था।

एक ओर जिन्ना और मुस्लिम लीग साम्प्रदायिक राजनीति के खतरनाक चरण में पहुंच चुके थे किंतु दूसरी ओर कांग्रेसी नेता बदली हुई परिस्थितियों को समझ नहीं पा रहे थे। वे हिन्दू और मुसलमान दोनों को अपनी विरासत समझ रहे थे तथा मुस्लिम लीग एवं उसके नेता मुहम्मद अली जिन्ना, दोनों को सिरे से नकार रहे थे। जिन्ना को फिर से राजनीति में लौट आते हुए देखकर पाकिस्तान का स्वप्न देखने वाला रहमत अली बुरी तरह से चिढ़ गया। वह जिन्ना को पसंद नहीं करता था।

रहमत अली इस्लाम की परम्परागत वेशभूषा, भाषा और खानपान को ही मुसलमान होने की गारण्टी मानता था जबकि जिन्ना अंग्रेजी कपड़े पहनता था, अंग्रेजी भाषा में सोचता और बोलता था, अंग्रेजी शैली में बैठकर खाना खाता था। इसलिए रहमत अली की दृष्टि में जिन्ना असली मुसलमान नहीं था।

रहमत अली ने पहले भी जिन्ना के विरुद्ध आग उगली थी किंतु जब जिन्ना भारत छोड़कर इंग्लैण्ड में बैरिस्टरी करने लगा तो रहमत अली ने उसके विरुद्ध बोलना बंद कर दिया था किंतु अब जबकि जिन्ना न केवल भारतीय राजनीति में लौट आया था, अपतिु मुस्लिम लीग का अध्यक्ष भी बन गया था, इसलिए रहमत अली ने जिन्ना के विरुद्ध हमले तेज कर दिए।

8 जुलाई 1935 को रहमत अली ने एक इश्तहार प्रकाशित करवाया जिसमें उसने जिन्ना को निशाना बनाते हुए कहा- ‘मैं दिल से उम्मीद करता हूँ के आप मेहरबानी करके पाकिस्तान की अटल मांग पर हमें पूरा समर्थन देंगे। न्याय और समता पर आधारित हिंदोस्तान से भिन्न पृथक राष्ट्रीय अस्तित्व के रूप में पाकिस्तान की मांग करना एक पवित्र अधिकार है।

……. पाकिस्तान हिन्दुओं की जमीन नहीं है और न ही उसकी जनता हिंदोस्तान की नागरिक है।

….. हमारे राष्ट्रीय जीवन का बुनियादी आधार और सार उससे एकदम अलग है जिस पर हिन्दूवाद आधारित है और परवान चढ़ रहा है।

….. सरकार द्वारा नामजद मुसलमान प्रतिनिधियों द्वारा गोलमेज सम्मेलन में भारत को महासंघ बनाने की योजना पर सहमति देकर किए गए हमारे राष्ट्रीय भविष्य के बेहद शर्मनाक समर्पण की हम पाकिस्तानी बार-बार भर्त्सना कर चुके हैं। ये लोग न तो पाकिस्तान के प्रतिनिधि थे और न ही पाकिस्तानी जनता की नुमाइंदगी कर रहे थे।

…… इतिहास की चेतावनी की पूरी तरह उपेक्षा करते हुए समर्पण की कला के इन प्रतिष्ठित महारथियों ने हमारी राष्ट्रीयता को बेच दिया है और भावी पीढ़ियों की बलि चढ़ा दी है। पाकिस्तान के साथ की गई सबसे ज्यादा अपमानजनक गद्दारी के लिए इन लोगों को इतिहास के सामने जवाबदेही करनी होगी। ‘

संभवतः रहमत अली ने जिन्ना को अपना राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मान लिया था और उसी ईर्ष्या के कारण वह जिन्ना पर हमले कर रहा था। इसलिए जिन्ना भी तेजी से मुसलमानों के लिए अलग देश की राजनीति को आगे बढ़ा रहा था। भारत में एक केन्द्रीय अथवा संघीय व्यवस्था की स्थापना को जिन्ना ने ‘हिन्दू राज्य का स्वप्न’ कहना आरम्भ किया।

जिन्ना का कहना था- ‘आज हम केवल एक चौथाई भारत मांग रहे हैं और तीन चौथाई उनके लिए छोड़ देने को तैयार हैं। यदि उन्होंने अधिक जिद की तो शायद उन्हें यह भी न मिले।’

एक अन्य अवसर पर जिन्ना ने कहा- ‘हिन्दुओं ने पिछले एक हजार वर्षों से भारत पर राज्य नहीं किया है। हम उन्हें तीन चौथाई भारत राज्य करने के लिए दे रहे हैं। हमारे एक चौथाई भारत पर लालच की दृष्टि न रखो।’

भारत के मुसलमान कभी हिन्दू राज्य स्वीकार नहीं करेंगे जिसका परिणाम यह होगा कि देश में अव्यवस्था और अराजकता फैल जाएगी।

ई.1936 में शौकत अली की मूर्ति का अनावरण करते हुए जिन्ना ने कहा- ‘वर्तमान राजनीतिक समस्या यह थी कि इंग्लैण्ड सारे भारत पर राज्य करने का इच्छुक था और गांधीजी इस्लामी भारत का शासक बनना चाहते थे और हम दोनों में से किसी एक को या समान रूप से दोनों को मुसलमानों पर नियंत्रण स्थापित करने नहीं देंगे।’

इस प्रकार पाकिस्तान के लिए आंदोलन दिन पर दिन जोर पकड़ने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुसलमानों में बेचैनी

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जब मुहम्मद अली जिन्ना ने लंदन से भारत लौटकर मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग उठाई तो जवाहर लाल नेहरू ने मुसलमानों के लिए अलग देश के विचार का दृढ़ता से विरोध किया। इस कारण मुसलमानों में बेचैनी फैल गई।

उधर लंदन में रहमत अली जिन्ना को नकार रहा था तो इधर जवाहरलाल नेहरू देश में तेजी से पनप रही मुस्लिम लीग की समानांतर राजनीति पर हमले कर रहे थे। वे केवल कांग्रेस को ही भारतीय राजनीति में देखना चाहते थे।

ई.1937 में जब प्रान्तीय विधान सभाओं के निर्वाचन हुए तो जवाहरलाल नेहरू ने एक वक्तव्य दिया- ‘देश में केवल दो ही ताकतें हैं- सरकार और कांग्रेस।……. कांग्रेस सरकार के खिलाफ वोट देने का मतलब हैब्रिटिश प्रभुत्व स्वीकार करने के लिए वोट देना…….केवल कांग्रेस ही सरकार का मुकाबला कर सकती है। कांग्रेस के विरोधियों के हित आपस में जुड़े हुए हैं। उनकी मांगों का जनता से कुछ लेना देना नहीं है।’

इस वक्तव्य के कारण जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू से नाराज हो गया और उसके बाद उसने नेहरू को नीचा दिखाने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने दिया। उसने तुरंत प्रतिवाद करते हुए कहा- ‘मैं कांग्रेस का साथ देने से इंकार करता हूँ, देश में एक तीसरा पक्ष भी है और वह है मुसलमानों का।’ कुछ दिन बाद जिन्ना ने नेहरू और कांग्रेस को चेतावनी दी- ‘वे मुसलमानों को अकेला छोड़ दें।’

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नेहरू ने जवाब दिया- ‘मिस्टर जिन्ना बंगाल के मुसमलान मामलों में कांग्रेस की दखलंदाजी पर एतराज करते हुए कहते हैं कि कांग्रेस मुसलमानों को अकेला छोड़ दे। …… किन मुसलमानों को? जाहिर है कि केवल उनको जो मिस्टर जिन्ना और मुस्लिम लीग के अनुयायी हैं। …….

मुस्लिम लीग का लक्ष्य क्या है? क्या वह भारत की आजादी के लिए लड़ रही है? क्या वह साम्राज्यवाद विरोधी है ? मेरा विचार है, नहीं। वह मुसलमानों के एक गुट की नुमाइंदगी करती है जिसमें निश्चित रूप से काफी प्रतिष्ठित लोग हैं। ये लोग उच्च-मध्यम वर्ग के ऊँचे हलकों में सक्रिय रहते हैं और उनका मुसलमान जनता से सम्पर्क नहीं है।

मुसलमानों के निम्न-मध्यमवर्ग से भी उनका सम्बन्ध कम ही है। मिस्टर जिन्ना को जान लेना चाहिए कि मुस्लिम लीग के ज्यादातर सदस्यों के मुकाबले में मुसलमानों के ज्यादा सम्पर्क में रहता हूँ।’

इस भाषण के एक माह बाद एक साक्षात्कार में जिन्ना ने कहा- ‘हर बात में दखल देने वाले कांग्रेस के इस अध्यक्ष के बारे में क्या कहूँ? लगता है कि वे सारी दुनिया की जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ढो रहे हैं। अपने काम से मतलब रखने के बजाय हर बात में टांग अड़ाना उनके लिए जरूरी है।’

नेहरू ने अपने भाषणों में बार-बार जिन्ना पर प्रहार किए कि वे ड्राइंग रूम की राजनीति से बाहर निकलकर सारे-सारे दिन खेतों में काम करने वाले एक करोड़ मुसलमानों तक पहुंचें। जिन्ना और मुस्लिम लीग के पास नेहरू के इन बयानों की कोई काट नहीं थी। उन्हें भय हुआ कि कहीं सचमुच ही निर्धन मुस्लिम समुदाय नेहरू एवं कांग्रेस की बातों में न आ जाए।

जाहिर था कि लीग केवल एक ही तरीके से मुसलमान जनता को जगाकर, आंदोलित करके, अपने नेतृत्व के पीछे चला सकती थी। वह तरीका था- ‘इस्लाम खतरे में है।’ दीन का सवाल उठाकर ही लीग अपना झण्डा सबसे अलग उड़ा सकती थी।

इस नारे के द्वारा ही मुस्लिम लीग भारत के मुसलमानों में बेचैनी फैला सकती थी जिसका उपयोग पाकिस्तान की मांग को मजबूत बनाने में किया जा सकता था।

ई.1937 के चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। ये चुनाव भारत सरकार अधिनियम-1935 में किये गये प्रावधानों के अंतर्गत हुए थे। मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और उड़ीसा में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। बंगाल, आसाम तथा पश्चिमोत्तर प्रदेश में वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। केवल पंजाब और सिन्ध में कांग्रेस को कम मत मिले।

ग्यारह प्रान्तों में मुसलमानों के लिए सुरक्षित 482 सीटों में से कांग्रेस को 26 सीटें, मुस्लिम लीग को 108 सीटें तथा निर्दलीय मुसलमानों को 128 सीटें मिलीं। पंजाब में अधिकांश सीटें यूनियनिस्ट पार्टी को मिलीं। बंगाल में फजलुल हक की प्रजा-पार्टी को 38 सीटें मिलीं। इन चुनाव परिणामों से मुसलमानों में बेचैनी फैलना स्वाभाविक ही था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी का अपमान

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जिन्ना की बहिन फातिमा, मुहम्मद अली जिन्ना तथा जिन्ना की पुत्री दीना वाडिया

भारत की आजादी से पहले की राजनीति में गांधीजी एक ऐसी अनिवार्यता बन गए थे जिसकी उपेक्षा करना किसी के लिए संभव नहीं था। गांधीजी मुसलमानों से इतना प्रेम करते थे कि वे किसी भी कीमत पर मुसलमानों को अलग देश नहीं देना चाहते थे। इस कारण मुहम्मद अली जिन्ना ने गांधीजी का अपमान करने का फैसला किया।

जिन्ना का कांग्रेस पर हमला

चुनावों में कांग्रेस को मिली भारी विजय से जिन्ना तिलमिला गया। उसने सोचा कि भारत के समस्त मुस्लिम राजनीतिक दलों को लीग के अन्तर्गत संगठित करके ही हिन्दुओं की पार्टी अर्थात् कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी जा सकती है। इसके बाद जिन्ना ने द्वि-राष्ट्रवाद के सिद्धांत को मुसलमानों की कमजोरी बनाने तथा उस कमजोरी को अपने पक्ष में भुनाने का निर्णय लिया।

जिन्ना ने भारतीय राजनीति की पूरी दिशा बदल दी। उसके साथियों ने मुसलमानों पर हिन्दुओं द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के झूठे आंकड़े और मनगढ़ंत घटनाएं प्रचारित करके ‘इस्लाम खतरे में है’ जैसे भड़काऊ नारे दिये और मुसलमानों में कृत्रिम भय पैदा करके साम्प्रदायिकता की समस्या को चरम पर पहुंचा दिया।

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13 अक्टूबर 1937 को जिन्ना बम्बई से लखनऊ गए। लखनऊ रेलवे स्टेशन पर मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने उनके डिब्बे को घेर लिया। उनका जोश इस कदर फूट पड़ रहा था और हिन्दू हमले का मुकाबला करने का उनका इरादा इतना पक्का था कि अक्सर शांत और अविचलित रहने वाले मि. जिन्ना भी भावुक हो गए।……. उनके चेहरे पर एक कठोर दृढ़ता छा गई। साथ ही उन्हें यह देखकर संतोष भी हो रहा था कि उनके लोग आखिरकार उठ खड़े हुए हैं। उन्होंने जनता के भड़के हुए जज्बात पर मरहम लगाने के लिए कुछ लफ्ज कहे।

कई मुसलमान तो वहाँ अपने नेता को देखकर जज्बात में आकर रोने लगे। उन्हें यकीन था कि उनका नेता उन्हें गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाएगा। ई.1937 के निर्वाचनों से यह स्पष्ट हो चुका था कि किसी भी केन्द्रीय व्यवस्था में हिन्दुओं का बहुमत रहेगा। इसलिए किसी ऐसी योजना को प्रस्तुत करना आवश्यक हो गया जिसका मुसलमान जनता तथा विभिन्न मुस्लिम दल समर्थन करें और अंग्रेज सरकार उसे स्वीकार कर ले।

मुसलमानों में अपनी लोकप्रियता का ऊँचा ग्राफ देखकर जिन्ना ने कांग्रेस, नेहरू और गांधीजी का अपमान करने का निर्णय लिया ताकि वे तिलमिलाकर जिन्ना से पीछा छुड़ाने का मार्ग ढूंढें और इसी उत्तेजना में मुसलमानों को अलग देश देने की बात मान लें

अब जिन्ना को कांग्रेस की स्वीकृति की इतनी चिंता नहीं थी। अक्टूबर 1937 में जबकि कांग्रेस के प्रांतीय मंत्रिमण्डलों को काम करते हुए कुछ सप्ताह भी नहीं बीते थे, जिन्ना ने यह आक्षेप लगाना आरम्भ कर दिया था कि मुसलमान कांग्रेस सरकार से किसी न्याय की आशा नहीं कर सकते। जिन्ना ने वंदे मातरम्, हिन्दी भाषा को प्रोत्साहन तथा कांग्रेसी ध्वज को सम्मान देने के विषय में शिकायत की।

अप्रेल 1938 के मध्य में कलकत्ता के फ्लडलाइटों की रोशनी में नहाए हुए एम्फीथिएटर में जिन्ना ने ललकार कर कहा-

‘कांग्रेस मुख्य तौर से एक हिन्दू संगठन है। मुसलमान एक से ज्यादा बार यह साफ कर चुके हैं कि धर्म, संस्कृति भाषा और विवाह कानून आदि के अलावा भी एक सवाल है जो उनके लिए जिंदगी और मौत का सवाल बन चुका है। उनका भविष्य और नियति इस बात पर निर्भर हैं कि उन्हें उनके राजनीतिक अधकार मिलते हैं या नहीं।

उन्हें राष्ट्रीय जीवन में, सरकार में, देश के प्रशासन में उनकी वाजिब हिस्सेदारी मिलती है या नहीं। वे इसके लिए आखिरी दम तक लड़ेंगे। हिन्दू राज स्थापित करने का कोई भी सपना और विचार कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। मुसलमानों पर कोई हावी नहीं हो सकता और जब तक उनमें जरा सा भी दम बाकी है, वे हथियार नहीं डालेंगे।’

जिन्ना कांग्रेस को मुस्लिम लीग का आदर करने और उससे डरने का सबक सिखाना चाहते थे, साथ ही अपने अनुयाइयों के लिए उनके पास पूरी तरह से आत्मनिर्भर होने और ठोस रूप से एकजुट जनता के रूप में गोलबंद होने का सबक था।

इसी बीच जवाहरलाल नेहरू ने अपने समाजवादी कार्यक्रम में मुसलमानों से सहयोग करने की अपील की किन्तु डॉ. इकबाल ने इसे मुसलमानों की सांस्कृतिक एकता को नष्ट करने की योजना बताया। इकबाल ने जिन्ना को भरपूर सहयोग दिया। इकबाल की मध्यस्थता से जिन्ना-सिकन्दर समझौता हुआ तथा पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी के मुस्लिम सदस्य, मुस्लिम लीग के भी सदस्य बन गये।

इसके तुरन्त बाद बंगाल में फजलुल हक के नेतृत्व में और सिन्ध में सादुल्लाखाँ के नेतृत्व में विधान सभाओं के मुस्लिम सदस्यों ने मुस्लिम लीग की सदस्यता स्वीकार कर ली। इससे मुस्लिम लीग शक्तिशाली पार्टी हो गई। इसी दौरान संयुक्त प्रान्त में मन्त्रिमण्डल निर्माण सम्बन्धी विवाद ने मुस्लिम लीग की लोकप्रियता बढ़ाने में योगदान दिया।

कांग्रेस और लीग के बीच अविश्वास की वृद्धि के कारण ऊपरी तौर पर गौण लगने वाले मसले, जैसे कि कांग्रेस के ‘तिरंगे’ झण्डे को फहराना, ‘वन्देमातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में गाना, उर्दू के स्थान पर हिन्दी के प्रयोग की मांग उठाना आदि भी अब साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए।

जिन्ना ने इसका लाभ उठाया और मुसलमानों पर अपने नेतृत्व और मुस्लिम लीग का प्रभाव मजबूती से आरोपित कर दिया। फलस्वरूप ई.1927 में मुस्लिम लीग की सदस्य संख्या जो मात्र 1330 थी, ई.1938 में एक लाख हो गई और ई.1944 में 20 लाख पहुँच गई।

जिन्ना मुस्लिम लीग को भारत के समस्त मुसलमानों की एक मात्र प्रतिनिधि संस्था कहता था जबकि कांग्रेस उसके इस दावे को अस्वीकार करती थी क्योंकि जिन्ना के दावे को स्वीकार करने का अर्थ था कि कांग्रेस न तो एकमात्र अखिल भारतीय पार्टी है और न हिन्दू और मुसलमान, दोनों की पार्टी है।

इस कारण जिन्ना, कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं, विशेषतः महात्मा गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू से चिढ़ा हुआ रहता था। वह गांधीजी को महात्मा मानने से मना करता था तथा उन्हें चालाक लोमड़ी, साँप और हर किसी से होड़ करने वाला हिन्दू कहकर गांधीजी का अपमान करता था।

वह गांधीजी का अपमान इस हद तक नीचे गिरकर करता था कि वह सार्वजनिक मंचों से कहने लगा- ‘इस आदमी (गांधी) को किसी एक बात तक लाना असम्भव है। वह साँप की तरह चालाक है।’

जवाहरलाल नेहरू के लिये जिन्ना का कहना था- ‘उद्दण्ड ब्राह्मण जो अपनी चालबाजी को पश्चिमी शिक्षा के आवरण से ढंककर रखता है। जब वह वादा करता है, कोई न कोई रास्ता छोड़ देता है और जब कोई रास्ता नहीं मिलता तो सफेद झूठ बोलता है।’

कांग्रेस के नेताओं के लिये जिन्ना का व्यवहार असह्य था। फिर भी गांधीजी हर हाल में जिन्ना को कांग्रेस के आंदोलन के साथ रखना चाहते थे। इस प्रकार कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग, दोनों पार्टियों के शर्षस्थ नेताओं के व्यक्तिगत मतभेदों ने देश में साम्प्रदायिकता को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया।

अप्रेल 1938 में नेहरू एवं जिन्ना के मध्य हुए पत्र-व्यवहार से स्पष्ट हो जाता है कि दोनों में कई मौलिक अंतर थे। जिन्ना चाहता था कि मुस्लिम लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि स्वीकार कर लिया जाए। नेहरू उसे केवल एक साम्प्रदायिक संगठन मानने को तैयार थे। जिन्ना ने आरोप लगाया कि कांग्रेस का व्यवहार एकाधिकारी तथा प्रभुत्वसम्पन्न संस्था जैसा था।

12 अप्रेल 1938 के पत्र में जिन्ना ने लिखा- ‘जब तक मुस्लिम लीग को कांग्रेस पूर्ण समानता के स्तर पर स्वीकार नहीं करती और एक हिन्दू-मुस्लिम समझौते के बारे में बातचीत नहीं करती, तब तक हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी और अपनी आंतरिक शक्ति पर निर्भर रहना पड़ेगा। वह ही हमारे महत्व और प्रतिष्ठा का सूचक होगा।’

26 दिसम्बर 1938 को बम्बई में दिए गए अपने भाषण में जिन्ना ने कांग्रेस के ‘एक-राष्ट्र स्वप्न’ की तीव्र आलोचना की तथा कांग्रेस को केवल एक हिन्दू संगठन बताया।

जिन्ना ने गांधीजी पर तीखे प्रहार करते हए कहा- ‘कांग्रेस के पीछे किसका दिमाग काम कर रहा है? मिस्टर गांधी का। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि यह मिस्टर गांधी ही हैं जिन्होंने उन आदर्शों को नष्ट कर दिया है जिनके आधार पर कांग्रेस की शुरुआत हुई थी। इसी एक अकेले व्यक्ति के ऊपर कांग्रेस को हिंदूवाद के पुनरुत्थान का औजार बनाने की जिम्मेदारी जाती है। उनका लक्ष्य हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान करके इस देश में हिन्दू राज्य स्थापित करना है और अपने इसी मकसद के लिए वे कांग्रेस का इस्तेमाल कर रहे हैं

……. आज हिन्दू मानसिकता और हिन्दू नजरिया बड़ी सावधानी से पाला-पोसा जा रहा है। …… नई शर्तें मानने और कांग्रेस नेताओं के आदेशों पर चलने के लिए मुसलमान मजबूर किए जा रहे हैं।’

बड़ी विचित्र स्थिति थी! एक ओर तो गांधीजी का मुस्लिम प्रेम नहीं छूट रहा था, दूसरी ओर भारत के भोले-भाले हिन्दू गांधीजी को अपना नेता मान रहे थे, तीसरी ओर जिन्ना गांधीजी को अपना परम शत्रु बता रहा था, चौथी ओर कांग्रेस न तो गांधीजी का अपमान सह पा रही थी और न गांधीजी की बातों को स्वीकार कर पा रही थी। चालाक अंग्रेज इन परिस्थितियों का जम कर मजा ले रहे थे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत विभाजन की योजनाएँ

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भारत विभाजन की योजनाएँ

जब मुहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों के लिए अलग देश के रूप में पाकिस्तान की मांग तेज की तो भारत में विभिन्न स्तरों पर भारत विभाजन की योजनाएँ तैयार होने लगीं।

मुस्लिम लीग द्वारा कांग्रेस पर लगाए गए आक्षेप सम्बन्धी ‘पिरपुर रिपोर्ट’ ई.1939 में प्रकाशित हुई। इसी प्रकार बिहार में कांग्रेस शासन के दोषों को स्पष्ट करने के लिए ‘शरीफ रिपोर्ट’ प्रकाशित की गई। ई.1939 में कांग्रेस मंत्रिमण्डलों के त्यागपत्र दिए जाने के पश्चात् जिन्ना ने मुसलमानों से कहा कि वे 22 सितम्बर 1939 को ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाएँ क्योंकि कांग्रेस मंत्रिमण्डल समाप्त हो चुके थे।

दीनिया संकल्पना

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ई. 1940 में रहमत अली ने ‘इस्लाम की मिल्लत और भारतीयता का खतरा’ शीर्षक से एक इश्तहार प्रकाशित किया। इस इश्तहार में उसने कहा कि मुसलमानों को अलग राष्ट्र के निर्माण का प्रयास करना चाहिये। रहमत अली ने ‘इण्डिया’ शब्द के अंग्रेजी अक्षरों में हेरफेर करके ‘दीनिया’ शब्द का निर्माण किया जिसका अर्थ था- ‘एक ऐसा उपमहाद्वीप जो इस्लाम में धर्मान्तरित होने की प्रतीक्षा कर रहा है।’

रहमत अली ने बंगाल एवं आसाम का पुनः नामकरण करते हुए उसे ‘बंगुश ए इस्लाम’ नाम दिया। इस नाम का अर्थ था ‘इस्लाम का बंगुश’। बंगुश बंगाल का एक मुगल सामंत था। रहमत अली ने बिहार का नाम फरूखिस्तान, उत्तर प्रदेश का नाम हैदरिस्तान तथा राजपूताना का नाम मोइनिस्तान रखा। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के नाम पर मोइनिस्तान की कल्पना की गयी। उसने हैदराबाद का नाम ओसमानिस्तान रखा। मलाबार के मोपला मार्गों को मोपलिस्तान नाम दिया गया। इनके अलावा साफिस्तान और नसरिस्तान क्षेत्रों की भी कल्पना की गई।

रहमत अली द्वारा दीनिया (भारत) के मानचित्र पर दिखाए गए गैरमुस्लिम क्षेत्र अप्रभावी और बेकार टुकड़े नजर आते थे जो मुस्लिम राज्यों के सभी ओर छितराए हुए थे। रहमत अली की कल्पना के अनुसार वे मुस्लिम राज्य हिन्दू भारत से संघर्ष के द्वारा जन्मे थे और इस हिन्दू भारत को अपने अंदर समाहित करने, उन्हें धर्मांतरित करने तथा उन पर विजय प्राप्त करने की नीति का अनुसरण कर रहे थे।

इसके बाद दीनिया संकल्पना को ध्यान में रखकर भारत विभाजन की योजनाएँ बनने लगीं। ई. 1942 में रहमत अली ने एक और इश्तहार ‘मिल्लत और उसका मिशन’ निकाला जिसके अनुसार भारत की नियति में पूरी तरह इस्लाम और मुस्लिम प्रभुत्व में धर्मांतरित होना लिखा है। अब भारत विभाजन की योजनाएँ मिल्लत के आधार पर बनाई जाने लगीं।

भारत-विभाजन योजनाओं की बाढ़

भारत विभाजन की तरह-तरह की योजनाएं प्रस्तुत की जाने लगीं। कुछ ने रहमत अली की योजना के अनुसार प्रस्ताव किया कि सिर्फ पंजाब, सिंध, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, ब्लूचिस्तान और काश्मीर को भारत से अलग कर देना चाहिए।

कुछ लोग अब्दुल लतीफ की योजना का समर्थन करते थे जिसके अनुसार उपर्युक्त प्रांतों के अलावा बंगाल और हैदराबाद को भी अलग कर लेना चाहिए तथा एक मुस्लिम राज्य की स्थापना करनी चाहिए। यह राज्य भारत के सब मुसलमानों का राज्य होगा। कुछ समय बाद रहमत अली ने अपने विचार बदल लिए और उसने भारत के समस्त प्रांतों में मुसलमानों के स्वायत्तशासी राज्यों की मांग करनी शुरू कर दी थी।

अंग्रेज सरकार मुस्लिम लीग से पूर्व-अनुमति ले

इस काल में भारत के मुस्लिम बुद्धिजीवियों की बुद्धि ने बहुत तेजी से काम करना आरम्भ कर दिया और वे भारत विभाजन की योजनाएँ बड़ी ही चतुराई के साथ बनाने लगे ताकि मुसलमानों को भारत की भूमि में अधिक से अधिक हिस्सा मिल सके और काफिर हिन्दू किसी अनुपजाऊ भूभाग में सिमट कर रह जाएं।

इन योजनाओं से प्रभावित होकर जिन्ना ने फरवरी 1940 में भारत सरकार से मांग की कि कोई भी आगामी सुधार योजना उस समय तक लागू नहीं की जाए जब तक कि उसके लिए लीग की पूर्व अनुमति प्राप्त न हो जाए। इस समय तक मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश हेतु औपचारिक प्रस्ताव भी पारित नहीं किया था।

6 मार्च 1940 को अलीगढ़ में भाषण देते हुए जिन्ना ने कहा- ‘हिन्दू-मुसलमान समझौता केवल समानता के आधार पर हो सकता है न कि गांधीजी की शर्तों के आधार पर। ‘

चूंकि यह समानता पश्चिमी प्रजातंत्रीय प्रणाली से उपलब्ध नहीं हो सकती थी इसलिए वे प्रजातंत्रीय प्रणाली के विरुद्ध थे। उसका तर्क था कि- ‘इस्लाम ऐसे प्रजातंत्र में विश्वास नहीं रखता जिसमें निर्णय का अधिकार गैर-मुसलमानों को हो।’

मुहम्मद अली जिन्ना ने हिन्दू मुस्लिम समझौते के सम्भव न होने के लिए मुख्य कारण यह बताया था कि मुसलमान भारत के भावी प्रशासन में बराबर के साझीदार होना चाहते थे।

अर्थात् जिन्ना अपनी शर्तें कड़ी करता जा रहा था और बात को घुमाकर बड़े ही लच्छेदार शब्दों में कह रहा था कि भारत के भावी संघ की केन्द्रीय एवं प्रांतीय सभाओं में हिन्दुओं एवं मुसलमानों के लिए बराबर संख्या में सीटें हों। यह मांग किसी भी प्रजातांत्रिक आधार पर उचित नहीं ठहराई जा सकती थी। इसलिए किसी समझौते का प्रश्न नहीं उठता था।

जिन्ना बड़ी चतुराई से और बड़ी तेज से भारत को विभाजन की ओर धकेल रहा था। जिन्ना के कपट के सामने कांग्रेसी नेता किंकर्त्तव्यविमूढ़ से नजर आते थे। भारत विभाजन की योजनाएँ पूरे देश में जोर-शोर से बन रही थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाकिस्तान प्रस्ताव

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मुस्लिम लीग पाकिस्तान के निर्माण के लिए बड़ी तेजी से काम कर रही थी। लीग के नेताओं ने मरो और मारो की नीति अपना ली थी जिसके कारण मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान का प्रस्ताव पारित कर दिया गया। इसे लाहौर प्रस्ताव भी कहा जाता है।

24 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान बनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया जिसमें कहा गया कि-

‘ऑल इण्डिया मुसलिम लीग के इस अधिवेशन का यह दृढ़ मत है कि कोई भी वैधानिक योजना इस देश में सफल नहीं हो सकती और न वह मुसलमानों को स्वीकार हो सकती है जब तक कि यह निम्नलिखित बुनियादी सिद्धांतों पर तैयार नहीं की जाती: भौगोलिक दृष्टि से सटे प्रांतों (यूनिटों) को मिलाकर अंचल बना दिए जाएं। ये अंचल भूमि के आवश्यक आदान-प्रदान के साथ इस तरह बनाए जाने चाहिए जिससे वे क्षेत्र, जिनमें संख्या की दृष्टि से मुसलमानों का बहुमत है जैसे हिंदुस्तान के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में, मिलाकर स्वाधीन राज्य बना दिए जाएं जिनमें उनके घटक यूनिट स्वायत्त और सार्वभौम होंगे।’

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मुस्लिम लीग के इस लाहौर-प्रस्ताव में पाकिस्तान शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था किंतु इसे पाकिस्तान-प्रस्ताव के नाम से ही जाना जाता है। इस अधिवेशन में जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा- ‘मैं चाहता हूँ कि आप अपने आप को संगठित करने का महत्त्व समझें …… आप अपनी आंतरिक शक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी पर भरोसा नहीं कर सकते। अपने आप पर निर्भर रहो। अपने अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए अपने में शक्ति पैदा करो। …… अंग्रेज सरकार द्वारा भारत के भविष्य के संविधान के संदर्भ में कोई घोषणा बिना हमारी सहमति नहीं की जानी चाहिए …….।

यदि ऐसी कोई घोषणा की जाती है और बिना हमारी स्वीकृति और सहमति के कोई अंतरिम समझौता किया जाता है तो भारत के मुसलमान इसका विरोध करेंगे। …… एक हजार वर्षों के सम्पर्क के बावजूद ऐसी राष्ट्रीयताएं जो सदा की भांति भिन्न और अलग-अलग हैं, केवल प्रजातंत्रीय प्रणाली की स्थापना से किस प्रकार एक राष्ट्र बन सकती हैं?

…..भारत की समस्या अंतर्जातीय न होकर अन्तर्राष्ट्रीय है। यदि अंग्रेज सरकार इस उपमहाद्वीप के लोगों की सुख और समृद्धि की इच्छुक है तब एक मात्र विकल्प यही है कि भारत को कई राज्यों में विभक्त करके यहाँ की बड़ी कौमों को पृथक्-पृथक् भाग दे दिए जाएं।

….. यह एक स्वप्न है कि भारत में हिन्दू और मुसलमान एक सम्मिलित राष्ट्रीयता प्राप्त कर सकेंगे। ये दोनों सम्प्रदाय बिल्कुल भिन्न हैं। …… वर्तमान कृत्रिम एकता केवल अंग्रेजी राज्य की देन है …… भारत के मुसलमान किसी भी ऐसे संविधान को स्वीकार नहीं करेंगे जिसमें बहुसंख्यक हिन्दुओं की सरकार स्थापित हो सके। मुसलमान एक अल्पसंख्यक समुदाय नहीं है

……. वे प्रत्येक परिभाषा के अनुसार एक कौम (नेशन) हैं और उन्हें अपना वतन, राज्य तथा क्षेत्रफल मिलना चाहिए ….. हम अपने लक्ष्य से डरा-धमकाकर विचलित नहीं किए जा सकते …..।’

गांधीजी ने मुस्लिम लीग के पाकिस्तान प्रस्ताव पर तुरंत प्रतिक्रिया दी। 30 मार्च 1940 के हरिजन में उन्होंने लिखा-

‘विभाजन एक स्पष्ट असत्य है। मेरी पूरी आत्मा इस विचार के खिलाफ है कि हिंदुत्व और इस्लाम- दो विरोधी संस्कृतियों तथा सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे सिद्धांत को मानना मेरे लिए ईश्वर को नकारना है। मैं अपनी पूरी आत्मा के साथ यह विश्वास करता हूँ कि कुरान का ईश्वर, गीता का भी ईश्वर है। मैं इस विचार का विरोध करता हूँ कि करोड़ों हिन्दुओं ने अपने धर्म के रूप में इस्लाम को स्वीकार करने के बाद अपनी राष्ट्रीयता बदल दी।’

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने दुःख के साथ कहा-

‘द्विराष्ट्र का सिद्धांत एकता की संवेदनशील इच्छा के विकास की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ेगा।’ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भविष्यवाणी की- ‘विभाजन को सबसे अधिक सम्बद्ध लोगों की सद्भावना से प्राप्त करने की संभावना नहीं है, यह वैमनस्य दोनों ओर विद्यमान रहेगा।’

हिन्दू नेताओं द्वारा दी जा रही प्रतिक्रियाओं को नकारते हुए, लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान प्रस्ताव का समर्थन करने वाले मुस्लिम लीगी नेता खलीकुज्जमाँ ने कहा-

‘यदि हिंदुओं तथा मुसलमानों के बीच मुद्दों को तलवार के बल पर सुलझाना है तो मुसलमानों को कोई डर नहीं है।’

मई 1940 में मुस्लिम लीग के बम्बई प्रादेशिक अधिवेशन में जिन्ना ने कहा-

‘अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने भारत के मुसलमानों को सही दिशा दिखा दी है। उन्हें एक उत्तम कार्यक्रम, एक नीति, एक मंच और एक ध्वज प्रदान किया है

…… भारतीय राष्ट्र केवल कांग्रेस हाईकमाण्ड के मस्तिष्क में ही विद्यमान है। हमारा प्रस्ताव यह है कि हिन्दू और मुसलमान दो सम्मानपूर्ण कौमों की भांति साथ-साथ अच्छे पड़ौसियों की भांति रहें न कि हिन्दू उच्च और मुसलमान निम्न कौम की भांति रहें जिसमें हिन्दू बहुमत मुसलमानों पर नियंत्रण करे। भारत विभाजन की योजना साम्प्रदायिक नहीं अपितु राजनीतिक समस्याओं का हल है क्योंकि इस योजना के अधीन हिन्दू और मुसलमान समान अधिकार और स्थान प्राप्त कर सकेंगे। ‘

के. एम. मुंशी ने अपनी पुस्तक पिलग्रिमेज टू फ्रीडम में लिखा है कि इसके तुरंत ही पीछे मुस्लिम लीग के नेताओं ने, जहाँ-जहाँ भी उनसे हो सका, बलवे कराने आरंभ कर दिये। ढाका, अहमदाबाद, बम्बई के बलवे तो अधिक भयंकर हुए थे।

मुहम्मद अली जिन्ना का कहना था कि पाकिस्तान के लिए संघर्ष अंग्रेजों से नहीं बल्कि कांग्रेस से था। नवम्बर 1940 में जिन्ना ने कहा-

‘हम इंग्लैण्ड से अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहते हैं। यही कारण है कि हमने आरम्भ से ही इंग्लैण्ड के मार्ग में रुकावटें नहीं डालीं। यद्यपि पाकिस्तान ही हमारी नौका का लक्ष्य है फिर भी हमने इंग्लैण्ड सरकार के समर्थन को प्राप्त करने के लिए पाकिस्तान की मांग को पूर्व-शर्त के रूप में नहीं रखा। हमने केवल यह आश्वासन चाहा कि इंग्लैण्ड सरकार कांग्रेस से कोई स्थाई समझौता करके हमारा साथ न छोड़ दे।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो

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मुस्लिम लीग की दुष्टता का वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने फायदा उठाया

वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ईस्वी 1936 से 1944 तक पूरे आठ साल तक भारत में वायसराय एवं गवर्नर जनरल रहा। वह इस पद पर सर्वाधिक अविध तक रहने वाला अधिकारी था। उसके कार्यकाल में दूसरा विश्वयुद्ध लड़ा गया। इस कारण भारत की आजादी की लड़ाई कुछ समय के लिए रुक गई किंतु पाकिस्तान की मांग तेजी से उभर गई।

दिसम्बर 1940 में मुहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान योजना के पक्ष में यह तर्क दिया कि जिस प्रकार किसी एक सम्मिलित परिवार में दो भाइयों के लिए मिलकर रहना असम्भव हो जाने की स्थिति में सम्पत्ति विभाजन के पश्चात् वे शांति पूर्वक रह सकते हैं उसी प्रकार भारत विभाजन भी लाभदायक होगा किंतु जब ई.1944 में गांधीजी ने यही तर्क प्रस्तुत किया तो जिन्ना ने उसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि तब मुसलमानों को एक केन्द्रीय व्यवस्था के अधीन रहना पड़ता।

सितम्बर 1944 में गांधीजी भारत को दो राष्ट्रों का देश मानने को तैयार नहीं थे। वे इसे एक संयुक्त परिवार मान सकते थे जिसके वे मुसलमान सदस्य जो उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी भागों में बहुमत में थे, अलग रहना चाहते थे। गांधीजी मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव को निम्नलिखित शर्तों पर स्वीकार करना चाहते थे –

(1) निर्धारित क्षेत्रों के निवासियों की इच्छा किसी निर्वाचन अथवा अन्य पद्धति द्वारा जान ली जाए।

(2) यदि उनका उत्तर हाँ में हो तो भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् उन्हें अलग स्वतंत्र राज्यों में संगठित कर दिया जाए।

(3) एक संधि द्वारा बाह्य सुरक्षा, आंतरिक संचार साधन, आयात-निर्यात आदि विषयों का संचालन किया जाए।

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इस प्रकार लाहौर प्रस्ताव के परिणाम स्वरूप जो व्यवस्था उत्पन्न हो सकती थी, उसे गांधीजी ने स्वीकार तो किया किंतु वे दो राष्ट्रों के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते थे। जिन्ना ने गांधीजी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इस समय तक जिन्ना के लाहौर प्रस्ताव में एक परिवर्तन आ चुका था। वह अब उत्तर-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी भागों को पाकिस्तान के दो क्षेत्र मानने लगा था तथा दोनों भागों को दो पृथक् राज्य बनाने के विरुद्ध हो चुका था। जिन्ना उपरोक्त विभाजन के बाद एक केन्द्रीय व्यवस्था के भी विरुद्ध था क्योंकि वह इस प्रकार के सम्मिलित प्रबन्धों का उत्तरदायित्व दोनों देशों की अलग संवैधानिक सभाओं को देना चाहता था।

कांग्रेस विगत पचास सालों से भी अधिक समय से भारत की आजादी के लिए संघर्ष कर रही थी। उसकी इस मांग को न केवल पूरे भारत में अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक समर्थन मिल रहा था। इस मांग का एक ही अर्थ था कि अंग्रेज सरकार कांग्रेस को सत्ता सौंप कर यहाँ से चली जाये।  

किंतु मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की मांग का फच्चर फंसा देने से तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने अगस्त 1940 के अपने प्रसिद्ध प्रस्ताव में कहा- ‘बिना कहे यह स्पष्ट है कि ब्रिटिश सरकार भारत की शांति और कल्याण की अपनी वर्तमान जिम्मेदारियां किसी ऐसी सरकार को नहीं सौंप सकतीं जिसके प्रभुत्व को भारत के राष्ट्रीय जीवन में विशाल और महत्वपूर्ण तत्वों द्वारा अस्वीकार कर दिया गया हो।’

वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो की इस घोषणा से मुस्लिम लीग को अपनी पाकिस्तान की मांग के प्रति नैतिक समर्थन मिल गया।

ई.1941 में पाकिस्तान की मांग और पुष्ट हो गयी

मुस्लिम लीग के ई.1941 के मद्रास वार्षिक सत्र में पाकिस्तान की मांग और भी जोरदार तरीके से की गयी। इस सत्र में जिन्ना द्वारा इस मांग की विस्तृत व्याख्या भी की गयी।

 उसने कहा कि- “ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग का लक्ष्य है कि हम भारत के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों में पूर्ण रूप से स्वतंत्र, अलग राष्ट्र की स्थापना करें जिसमें रक्षा, विदेश मामलों, संचार, कस्टम, मुद्रा विनिमय आदि पर पूरा हमारा नियंत्रण रहेगा। हम किसी भी परिस्थिति में एक केन्द्रीय सरकार के साथ संपूर्ण भारतीय संविधान नहीं चाहते। हम इसके लिये कभी सहमत नहीं होंगे।”

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

क्रिप्स मिशन

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देशी रियासतों के भारत संघ में सम्मिलिन पर विचार विमार्श करते हुए मेवाड़ महाराणा भोपाल सिंह

क्रिप्स मिशन की भारत-संघ योजना

दिसम्बर 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध में अमरीका का प्रवेश हुआ जिससे ब्रिटिश सरकार पर भारत प्रकरण को सुलझाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ने लगा। अमरीकी राष्ट्रपति इलियट रूजवेल्ट ने भारत की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया। ब्रिटिश सरकार अमरीकी सरकार की सलाह की अनदेखी नहीं कर सकी क्योंकि अमरीकी सहायता के कारण ही युद्ध में ब्रिटेन की स्थिति में सुधार आया था तथा ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था स्थिर रह पायी थी।

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मार्च 1942 में जापान की शाही फौज भारत के इतने नजदीक आ गई कि उसका आक्रमण कभी भी आरम्भ हो सकता था। यह आक्रमण भारत पर नहीं, भारत में डटे अंग्रेजों पर होना था। अंग्रेज जानते थे कि यदि भारत में स्वयं भारतीयों का सहयोग नहीं मिला तो जापानियों के सामने टिकना असम्भव हो जाएगा। बदली हुई परिस्थितियों में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने नरम रुख अपनाया। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार को प्रथम गोलमेज सम्मेलन में आरम्भ हुई ‘भारत संघ योजना’ को फिर से आरम्भ करना पड़ा।

11 मार्च 1942 को इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने हाउस ऑफ कॉमन्स में एक वक्तव्य दिया जिसमें कहा गया- ‘युद्ध मंत्रिमंडल, सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेज रहा है ताकि ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की इच्छाओं के अनुसार जिन सुधारों का प्रस्ताव किया है उनके बारे में भारतीयों के भय और शंकाओं का निवारण किया जा सके। क्रिप्स को राजतंत्रीय सरकार का पूरा विश्वास प्राप्त है। क्रिप्स अपने साथ जो प्रस्ताव ला रहे हैं, वह या तो पूर्णतः स्वीकृत किया जाना चाहिए या फिर पूर्णतः अस्वीकृत।’

22 मार्च 1942 को क्रिप्स दिल्ली पहुंचे। वे साम्यवादी चिंतन वाले नेता थे तथा उन्हें भारतीयों के साथ सहानुभूति थी किंतु वे राजाओं और राजशाही को पसंद नहीं करते थे। यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। उनकी तैयारी केवल कांग्रेस और मुस्लिम लीग से निबटने की थी, उन्हें पता ही नहीं था कि भारत में उनके मिशन के लिए इन दोनों से बड़ी मुसीबत भारतीय राजाओं की है।

राजाओं के पक्ष को लगभग अनसुना करने के कारण ही क्रिप्स मिशन सफल नहीं हो सका। भारत में उन्होंने कांग्रेस, मुस्लिम लीग सहित विभिन्न भारतीय पक्षों से बात की तथा भारतीय क्या लेना चाहते हैं और इंग्लैण्ड की गोरी सरकार उन्हें क्या देना चाहती है, इस अंतर को समझने का प्रयास किया। वी. बी. कुलकर्णी ने लिखा है- क्रिप्स भारत का मित्र और शुभचिंतक समझा जाता था।

28 मार्च 1942 को क्रिप्स मिशन ने नरेन्द्र मण्डल के प्रतिनिधि मण्डल से वार्ता की। क्रिप्स ने राजाओं को बताया कि ‘यदि भारत संघ अस्तित्व में आता है तो देशी-राज्यों के सम्बन्ध स्वतंत्र उपनिवेश अर्थात् भारत संघ से होंगे न कि ब्रिटिश क्राउन से। परमोच्चता वाली संधियां तब तक अपरिवर्तित रहेंगी जब तक कि कोई राज्य नवीन परिस्थतियों में अपने आप को समायोजित करने के लिए इसे समाप्त करने की इच्छा प्रकट न करे।’

राजाओं ने क्रिप्स के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। वे अपना भाग्य कांग्रेस के हाथों में नहीं सौंपना चाहते थे। इसलिए भारत की आजादी के बाद भी वे अपने राज्यों को ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा पूर्व में की गई संधियों के दायरे में ब्रिटिश क्राउन के अधीन रखना चाहते थे।

29 मार्च 1942 को क्रिप्स मिशन ने एक पत्रकार वार्ता में विभिन्न पक्षों के मध्य समझौते के लिए एक योजना का प्रारूप प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया कि-

‘युद्ध की समाप्ति के बाद, भारतीय संघ की स्थापना के उद्देश्य से नया संविधान बनाने हेतु संविधान सभा का गठन किया जाएगा। संविधान सभा में ब्रिटिश प्रांतों एवं देशी राज्यों की भागीदारी का प्रावधान किया जाएगा। यदि ब्रिटिश-भारत का कोई प्रांत नए संविधान को स्वीकार न करे तो वह अपनी यथावत स्थिति में रह सकता है। उसे भारत संघ के बराबर का दर्जा दिया जाएगा।

संविधान सभा का निर्माण विभिन्न प्रांतों की विधान सभाओं के निम्न सदनों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से किया जाएगा। इस हेतु नए चुनाव करवाए जाएंगे। समस्त निम्न सदनों में जितने सदस्य होंगे उनकी दशांश संख्या, संविधान सभा की होगी। संविधान सभा में भारतीय रियासतों को अपनी जनसंख्या के अनुपात से प्रतिनिधि भेजने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।

रियासती प्रतिनिधियों के अधिकार ब्रिटिश-भारतीय प्रतिनिधियों के समान होंगे। रियासतों को यह छूट होगी कि वे नया संविधान स्वीकार करें या न करें। संविधान सभा में कुल 207 सदस्य होंगे जिनमें से 158 ब्रिटिश-भारत के तथा 49 रियासतों के होंगे।

जब तक नवीन संविधान का निर्माण न हो जाए, सम्राट की सरकार, भारत के विश्व-युद्ध उपक्रम का हिस्सा होने के कारण, भारत की रक्षा का भार अपने हाथ में रखेगी परन्तु सेना, साहस तथा सामग्री संसधान उपलब्ध करवाने का दायित्व भारत के नागरिकों के सहयोग से भारत सरकार पर होगा।

सरकार की इच्छा है कि प्रमुख भारतीय दलों के नेताओं को अपने देश की कौंसिलों, कॉमनवेल्थ तथा यूनाईटेड नेशन्स में परामर्श के लिए तुरन्त और प्रभावोत्पादक ढंग से भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाए जिससे वे भारत की स्वतत्रंता के लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण सक्रिय तथा निर्माणकारी सहयोग देने में समर्थ हो सकें।’

योजना प्रस्तुत किए जाने के बाद पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब देते हुए क्रिप्स ने कहा- ‘भारत संघ के निर्माण के लिए तत्काल प्रयास किए जाएंगे। युद्ध समाप्त होने की प्रतीक्षा नहीं की जाएगी। विभिन्न पक्षों में सहमति बनते ही प्रांतीय चुनाव करवाए जाएंगे। चुनाव परिणाम प्राप्त होते ही संविधान निर्माण सभा स्थापित की जाएगी। हम भारत पर कुछ भी थोपना नहीं चाहते यहाँ तक कि समय सीमा भी नहीं।’

पत्रकारों ने पूछा कि- ‘क्या आपको पता है कि इंगलैण्ड का इतिहास अपने वायदों से मुकर जाने का रहा है? क्या आप इन प्रस्तावों की गारण्टी प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट से दिलवा सकते हैं?’

क्रिप्स का उत्तर था कि- ‘यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो किसी चीज की कोई प्रत्याभूति नहीं है। इसके लिए प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट उपलब्ध नहीं होंगे।’

क्रिप्स से पूछा गया कि- ‘इन प्रस्तावों के तहत संविधान सभा में देशी राज्यों की जनता की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहा गया है।’

इस पर क्रिप्स ने कहा कि- ‘यदि किसी राज्य में निर्वाचन का कोई तरीका है तो उनका उपयोग किया जाएगा किंतु यदि किसी राज्य में चुनी हुई संस्थायें नहीं हैं तो वहाँ यह कार्य नामित प्रतिनिधियों द्वारा किया जाएगा।’

पत्रकारों ने पूछा- ‘आप कैसे पता लगायेंगे कि देशी राज्य, भारत संघ में शामिल होने जा रहे हैं?’

क्रिप्स ने कहा- ‘देशी राज्यों से पूछकर।’

पत्रकारों ने पूछा- ‘क्या राज्यों के नागरिकों की कोई आवाज होगी?’

क्रिप्स ने कहा- ‘इसका निर्णय उन राज्यों की वर्तमान सरकारों द्वारा किया जाएगा। हम किसी प्रकार की नई सरकारों का निर्माण नहीं करेंगे। राज्यों के साथ ब्रिटिश सरकार के सम्बन्ध संधियों के माध्यम से हैं, वे संधियां तब तक बनी रहेंगी जब तक कि राज्य उन्हें बदलने की इच्छा प्रकट न करें। यदि भारतीय राज्य, संघ में सम्मिलित होते हैं तो वे ठीक उसी परिस्थिति में रहेंगे जिसमें कि वे आज हैं।’

पत्रकारों ने पूछा- ‘यदि कोई प्रांत या राज्य सम्मिलित न होना चाहे तो उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा?’

क्रिप्स ने कहा- ‘वे दूसरे राज्यों के साथ उसी प्रकार का व्यवहार करेंगे जैसा कि वे अन्य शक्तियों यथा जापान, स्याम, चायना, बर्मा अथवा अन्य किसी देश के साथ करते हैं।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

क्रिप्स मिशन की असफलता

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बिड़ला हाउस नई दिल्ली में सर रिचर्ड क्रिप्स एवं गांधी

ई.1943 में क्रिप्स मिशन को भारत भेजा गया ताकि वह भारत की आजादी की एक सर्वसम्मत योजना बना सके किंतु जब मुसलमान अपनी मांगों पर अड़े रहे तो क्रिप्स मिशन की असफलता तय हो गई। भारत की देशी रियासतों के राजा भी नहीं चाहते थे कि देश आजाद हो और अंग्रेजों का स्थान कांग्रेसी नेता ले लें। कांग्रेस भी क्रिप्स के प्रस्तावों से सहमत नहीं हुई।

क्रिप्स योजना में प्रावधान किया गया था कि यदि भारत की आजादी के बाद भी भारतीय राज्य, भारत संघ में सम्मिलित नहीं होते और ब्रिटिश क्राउन के सहयोगी बने रहते हैं तो गोरी सरकार ई.1818 में देशी-राज्यों के साथ की गई संधियों के तहत उन राज्यों की रक्षा करने के लिए उन राज्यों में इम्पीरियल ट्रूप्स (साम्राज्यिक सेना) रखेगी।

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योजना में प्रावधान किया गया था कि यदि कोई देशी-राज्य संविधान सभा में भाग लेता है किंतु संविधान निर्माण के पश्चात संघ में सम्मिलित नहीं होता है तो वह राज्य फिर से अपनी वर्तमान स्थिति को प्राप्त कर लेगा किंतु उसे नवीन संघ के साथ रेलवे, डाक और तार जैसे सामुदायिक महत्व के विषयों पर समायोजन करने पड़ेंगे। क्रिप्स का कहना था कि ब्रिटिश सरकार की यह इच्छा है कि सभी देशी-राज्य भारत संघ में सम्मिलित हों किंतु सरकार, संधि-दायित्वों को भंग करके उनसे जबर्दस्ती ऐसा करने को नहीं कहेगी।

क्रिप्स ने देशी राज्यों को सलाह दी कि छोटे राज्यों को पहला कदम यह उठाना चाहिए कि वे अपने समूह बनायें अथवा संघीय सम्बन्ध स्थापित करें ताकि सहकारिता पर आधारित समूहों की भावना को बड़ी इकाईयों तक विस्तारित किया जा सके। एक राजा ने क्रिप्स से पूछा कि क्या नवीन परिस्थितियों में राजाओं को ब्रिटिश-भारत के राजनीतिक दलों से सम्पर्क करना चाहिये? इस सवाल के जवाब में क्रिप्स ने कहा कि मेरी सलाह है कि राज्यों के शासक, ब्रिटिश-भारत के नेताओं से सम्पर्क स्थापित करें ताकि भविष्य में होने वाले संवैधानिक परिवर्तनों के दौरान राजाओं को सुविधा रहे।

2 अप्रेल को क्रिप्स ने तीन नरेशों को, जो उनसे मिलने आए थे, गुस्से में आकर कहा- ‘उन्हें अपना फैसला कांग्रेस या गांधी से करना होगा क्योंकि हम तो अब बिस्तर बोरिया बांधकर भारत से कूच करने वाले हैं।’

इस प्रस्ताव के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारत की स्वाधीनता के दावे को स्वीकार करते हुए कहा कि भारत को स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा दे दिया जाएगा। ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में रहना उसकी इच्छा पर निर्भर करेगा। योजना का सबसे विवादित बिंदु यह था कि भारत का कोई भी प्रांत अपना संविधान बनाकर स्वतंत्र हो सकता था। ऐसा पाकिस्तान की मांग को ध्यान में रखकर किया गया था। क्रिप्स-मिशन में औपनिवेशिक स्वराज्य देने की कोई अवधि निश्चित नहीं की गई थी। इसका स्वरूप अस्पष्ट और अनिश्चित था।

क्रिप्स मिशन में मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की माँग को एक कदम और आगे बढ़ा दिया गया। इसमें देशी राज्यों और मुस्लिम लीग को प्रसन्न रखने के लिए उन राज्यों और प्रान्तों को यह छूट दी गई कि वे स्वेच्छानुसार भारतीय संघ में सम्मिलित हो सकते हैं। मुस्लिम-बहुल प्रान्तों को भारतीय संघ से अलग रहने का अधिकार प्राप्त हो गया।

देशी राज्यों में जनता की राय जानने को कोई महत्त्व नहीं दिया गया था। देशी नरेशों को उनके राज्यों के प्रतिनिधियों की नियुक्ति का अधिकार दिया गया। इस प्रकार संविधान-निर्मात्री परिषद् में चौथाई सदस्य अप्रजातांत्रिक ढंग से आते और वे रुढ़िवादी होने के कारण प्रगतिशील सुधारों का विरोध करते।

ब्रिटिश प्रान्तों को संघ में सम्मिलित होने या न होने का अधिकार देकर सरकार ने साम्प्रदायिक तत्त्वों को प्रोत्साहन दिया। मुस्लिम लीग पाकिस्तान बनाने की माँग पर अड़ी रही किंतु पंजाब के सिक्खों ने मुस्लिम लीग की इस मांग का घोर विरोध किया। मुस्लिम लीग द्वारा मांगे जा रहे पाकिस्तान में पूरा पंजाब शामिल था किंतु पंजाब के सिक्ख किसी भी कीमत पर भारत से बाहर किसी अन्य देश में जाने को तैयार नहीं थे। क्रिप्स-मिशन ने अल्पसंख्यकों के हितों और उनके अधिकारों की रक्षा की बात तो की किंतु उनकी स्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत नहीं की।

दलित एवं पिछड़े वर्ग के लोग भी क्रिप्स-मिशन की रिपोर्ट से असंतुष्ट थे। उनका कहना था कि क्रिप्स-योजना में उनके हितों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। क्रिप्स मिशन ने भारत की रक्षा का दायित्व भारतीयों के हाथ में न देकर ब्रिटिश सरकार के पास रखने का प्रावधान किया।

यह बात कांग्रेस को मान्य नहीं थी। इस प्रकार सभी पक्ष क्रिप्स-प्रस्ताव से असंतुष्ट हो गए। कांग्रेस, हिंदू-महासभा और मुस्लिम लीग ने इन प्रस्तावों को मानने से अस्वीकार कर दिया।

क्रिप्स प्रस्ताव में ब्रिटिश-प्रांतों एवं देशी रियासतों को तो अपना पृथक संघ बनाने या संघ से अलग रहने की आजादी थी परन्तु यदि उन्हें ऐसा करने दिया जाता तो भारत में बाल्कन-राष्ट्र जैसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाती। पूरा देश अनुभव कर रहा था कि क्रिप्स के इस प्रस्ताव में व्यावहारिकता का अभाव था क्योंकि देश के समस्त रजवाड़ों की सीमा ब्रिटिश-भारत के क्षेत्र से संलग्न थी। अतः इस तरह का कोई संघ कैसे काम कर सकता था!

11 अप्रेल को कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने क्रिप्स प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया। 22 अप्रेल 1942 को क्रिप्स लंदन चले गए। उनका मिशन असफल हो गया जिससे राजाओं ने चैन की सांस ली। राजाओं की इस दोहरी चाल से कांग्रेस को विशेष निराशा हुई। उन्होंने राजाओं के विरुद्ध वक्तव्य दिए। नेहरू ने उन लोगों की पीठ थपथपाई जो राजाओं को धूर्त, झक्की अथवा मूर्ख कहते थे।

क्रिप्स कमीशन असफल होकर लौट गया किंतु क्रिप्स मिशन की असफलता वस्तुतः ब्रिटिश सरकार की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता थी। योजना में किसी संशोधन तथा आश्वासन के प्रति निस्पृह रहने के लिए चर्चिल ने क्रिप्स को हार्दिक बधाई दी। चर्चिल कतई नहीं चाहता था कि भारत को आजादी दी जाए।

क्रिप्स मिशन की असफलता पर विंस्टन चर्चिल ने मित्र राष्ट्रों को सूचित किया- ‘कांग्रेस की मांगों को मानने का एक ही अर्थ होता कि हरिजनों तथा अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक हिंदुओं की दया पर छोड़ दिया जाता। चर्चिल ने अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट को समझा दिया कि भारतीय नेता परस्पर एकमत नहीं हैं।’

क्रिप्स मिशन की असफलता पर यह शक किया जाने लगा कि या तो क्रिप्स की पीठ में ब्रिटिश सरकार ने छुरा भौंक दिया है अथवा डीक्वेंस के शब्दों में- ‘चालाक क्रिप्स महज धोखेबाजी, छल कपट, विश्वासघात और दुहरी चालों से काम ले रहे थे और उन्हें इस पर जरा भी पश्चाताप नहीं था!’

लॉर्ड वैवेल ने 27 जुलाई 1943 को अपनी डायरी में लिखा- ‘प्रधानमंत्री चर्चिल भारत और उससे सम्बन्धित हर बात से घृणा करता है। … भारत को स्वतंत्र करने के विचार मात्र से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का वह उपासक पागल हो जाता था।’

गांधीजी के अनुसार क्रिप्स मिशन की असफलता इसलिए हुई क्योंकि ‘क्रिप्स योजना आगे की तारीख का चैक था जिसका बैंक खत्म होने वाला था।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुभाष चंद्र बोस

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हम दिल्ली की सड़कों पर सुभाष चंद्र बोस का स्वागत तलवारों से करेंगे!

जवाहर लाल नेहरू के मन में सुभाष चंद्र बोस के विरुद्ध इतना जहर भरा हुआ था कि नेहरू ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि हम हम दिल्ली की सड़कों पर सुभाष का स्वागत तलवारों से करेंगे।

ई.1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध जोरों पर था। जब सुभाष चंद्र बोस को पूर्वी भारत में हवाई हमलों एवं जमीनी हमलों में सफलताएं मिलने लगीं तो कांग्रेसी नेता सुभाष की सफलताओं से घबरा गए। उन्हें लगा कि यदि सुभाष चंद्र बोस के विमान दिल्ली में उतर गए तो अंग्रेजों को भारत की सत्ता सुभाष बाबू को सौंपनी पड़ेगी।

इस स्थिति की कल्पना भी कांग्रेसी नेताओं के रोंगटे खड़े कर देती थी। इसलिए जवाहरलाल नेहरू ने सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया- ‘हम दिल्ली की सड़कों पर सुभाष चंद्र बोस का स्वागत तलवारों से करेंगे।’

इस प्रकार कांग्रेसियों की अहिंसा का हिमालय अपनी पराजय की आशंका उत्पन्न होते ही पिघल गया। 9 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने बम्बई में एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें गांधीजी ने ‘डू और डाई’ तथा ‘नाउ ऑर नेवर’ के नारे लगाए तथा अंग्रेजों से कहा कि वे आज रात ही भारत छोड़ कर चले जाएं। इसे अगस्त क्रांति एवं भारत छोड़ो आंदोलन कहा जाता है। उसी रात बहुत से कांग्रेसी नेता जेलों में डाल दिए गए। सरकार के इस कदम के विरोध में देश में व्यापक हिंसा फैल गई। बड़ी संख्या में जन-धन की हानि हुई।

मुस्लिम लीग को लाभ

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जब कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया तो मुस्लिम लीग बड़ी कठिनाई में पड़ गई। वह अब तक ‘पहले पाकिस्तान फिर आजादी’ के लिए लड़ती आई थी किंतु कांग्रेस पाकिस्तान की बात किए बिना ही आजादी मांग रही थी। यदि अंग्रेज भारत का विभाजन किए बिना चले जाएंगे तो मुस्लिम लीग को नए सिरे से पाकिस्तान के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और इस बार उनका मुकाबला मुस्लिम लीग से सहानुभूति रखने वाले अंग्रेजों से नहीं अपितु मुस्लिम लीग को समाप्त करने की मंशा रखने वाले कांग्रेसियों से होगा। इसलिए जिन्ना ने कांग्रेस के खिलाफ असभ्य भाषा में भाषण दिये।

उसने कहा- ‘कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ लड़ाई का ऐलान किया है। ऐसा करते वक्त कांग्रेस ने सिर्फ अपना स्वार्थ देखा है, दूसरों का नहीं।’ जिन्ना ने मुसलमानों का आह्वान किया कि वे इस आंदोलन से बिल्कुल अलग रहें।’

इस आंदोलन के आरम्भ होने से पहले ही कांग्रेस के बड़े नेता जेल भेज दिए गए। इस कारण आंदोलन का नेतृत्व छोटे स्तर के कार्यकताओं के हाथों में चला गया जिन्होंने गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत को ताक पर रखकर पूरे देश में व्यापक हिंसा की। इस कारण मुस्लिम लीग के पक्ष वाली प्रेस ने इस पूरे आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन से लड़ रहे कांग्रेसियों को ‘गुण्डे’ शब्द से संबोधित किया।

कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ उतनी सख्त बातें ब्रिटिश प्रेस ने भी नहीं कीं जितनी मुस्लिम लीग प्रेस ने कहीं। मुस्लिम लीग वर्किंग कमेटी ने मित्र-राष्ट्रों का ध्यान हिन्दुस्तान के 10 करोड़ मुसलमानों की उन अंचलों में सार्वभौम राज्यों की स्थापना की मांग की तरफ खींचा, जो उनका निवास स्थान है और जहाँ उनका बहुमत है।

भारत-छोड़ो आंदोलन का सबसे ज्यादा लाभ मुस्लिम लीग को मिला। आंदोलन के कारण कांग्रेसी नेता तो जेल में चले गए जबकि मुस्लिम लीगी नेता स्वतंत्र रहे तथा उन्होंने अंग्रेजों के युद्ध-प्रयासों में सक्रिय सहयोग देकर अंग्रजों की सहानुभूति जीत ली ताकि मुसलमानों को अलग पाकिस्तान देने का जो इरादा अंग्रेज पहले से दिखा रहे थे, वह और पक्का हो जाए।

नवम्बर 1942 के मध्य में दिल्ली में जिन्ना ने भारत के मुसलमानों से पाकिस्तान हासिल करने के लिए कटिबद्ध रहने की अपील करते हुए कहा कि- ‘या तो हम पाकिस्तान लेकर रहेंगे और या फिर अपना अस्तित्व ही मिटा देंगे।’

 हिन्दू महासभा के अध्यक्ष वीर सावरकर ने दिसम्बर 1942 में कानपुर में आयोजित अधिवेशन में जिन्ना की मांग का विरोध करते हुए कहा कि– ‘पाकिस्तान की मांग किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी।’

सावरकर ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में एक कमेटी सम्मानपूर्ण शर्तों पर भारत-ब्रिटिश समझौते के लिए अंतिम प्रयास करने के लिए बैठाई। मुखर्जी ने भी जिन्ना से बात की किंतु कोई नतीजा नहीं निकला।

वायसराय को भारत की भौगोलिक एकता का स्मरण

वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो (ई.1936-44) अपनी नियुक्ति के समय भारत संघ के निर्माण का सपना लेकर आए थे जिसे इंग्लैण्ड की सरकार के अधीन स्वायत्तता दी जा सके किंतु परिस्थितियां तेजी से लिनलिथगो के हाथों से निकलती जा रही थीं। पहले तो देशी-राज्यों के राजाओं ने प्रस्तावित संघ में मिलने से मना कर दिया और अब कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग न केवल आपस में लड़ रही थीं अपितु कांग्रेस अंग्रेजों को बिना किसी संघ के निर्माण के भारत से बाहर चले जाने के लिए संघर्ष कर रही थी।

लिनलिथगो ने स्थिति संभालने का प्रयास करने के लिए 17 दिसम्बर 1942 को एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स की वार्षिक सभा में एक ऐसा वक्तव्य दिया जो अंग्रेज शासक मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद से कभी नहीं देते थे।

वह वक्तव्य इस प्रकार था- ‘भारत की भौगोलिक एकता बनाए रखी जाए क्योंकि विभाजित भारत का विश्व में कोई महत्त्व नहीं रह जाएगा।’

बाँटो और भागो

लिनलिथगो के इस बयान पर मुस्लिम लीग के नेता आग-बबूला हो गए। वायसराय न केवल मुस्लिम लीग के अब तक के परिश्रम पर पानी फेर रहा था अपितु वह सीधे-सीधे उन कांग्रेसियों का पक्ष ले रहा था जो अंग्रेजों को आधी रात में ही भारत छोड़कर चले जाने को कह रहे थे। इसलिए मुस्लिम लीग के नेताओं ने पाकिस्तान की मांग के समर्थन में अपनी आवाज और अधिक मुखर की ताकि वह भारत की सरहदों को पार करके, विश्वयुद्ध लड़ रहे मित्र-राष्ट्रों के कानों तक अच्छी तरह पहुंच जाए।

मुस्लिम लीग द्वारा अपनी आवाज तीखी कर दिए जाने के बावजूद जब इंग्लैण्ड के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी और पाकिस्तान की मांग एक इंच भी आगे नहीं सरकी तो दिसम्बर 1943 में मुस्लिम लीग ने कराची अधिवेशन में ‘भारत छोड़ो’ नारे के विरुद्ध एक विचित्र नारा दिया- ‘बाँटो और भागो’ इस नारे के माध्यम से अंग्रेजों का आह्वान किया गया था कि वे भारत को हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में बाँटकर यहाँ से भाग जाएं।

बंगाल में अकाल की विभीषिका

इसी बीच एक बड़ी मानव त्रासदी हुई। अंग्रेजों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चों पर लड़ रही अपनी फौज के लिए भारत से इतना चावल और गेहूं पानी के जहाजों में भरकर सैनिकों को भिजवा दिया कि ई.1943 में बंगाल में अकाल पड़ गया और बंगाल में 30 लाख आदमी मर गए।

इससे भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति नफरत अपने चरम पर पहुंच गई। देश भर में कम्युनिस्ट आंदोलन एवं क्रांतिकारी गतिविधियां बढ़ गईं। फिर भी मुस्लिम लीग मानवता की इस भयानक त्रासदी से तथा क्रांतिकारी आंदोलन से असंपृक्त रहकर केवल पाकिस्तान-पाकिस्तान की रट लगाती रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत संघ योजनाएं

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अंग्रेज ईस्वी 1927 से ही भारत में एक संघ की स्थापना करने का प्रयास कर रहे थे जिसमें ब्रिटिश प्रांत एवं देशी राज्यों के प्रांत शामिल हों तथा देश का शासन एक संघीय सरकार द्वारा चलाया जाए। इस दिशा में अनेक लोगों द्वारा भारत संघ योजनाएं बनाकर अंग्रेज सरकार के समक्ष प्रस्तुत की गईं।

सप्रू योजना

दिसम्बर 1944 में तेज बहादुर सप्रू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। प्रांतों एवं राज्यों के प्रस्तावित भारतीय संघ में सम्मिलित होने अथवा अलग रहने के प्रश्न पर समिति ने सिफारिश की कि ब्रिटिश-भारत के किसी भी प्रांत को संघ में शामिल नहीं होने का विकल्प नहीं होगा। ब्रिटिश-भारत का प्रांत हो या देशी राज्य, एक बार सम्मिलित होने के बाद उसे संघ से अलग होने का अधिकार नहीं होगा। ब्रिटिश-भारत, जिस तरह से किसी भी ब्रिटिश-भारतीय प्रांत को अलग होने की आज्ञा देना स्वीकार नहीं कर सकता उसी तरह देशी राज्यों को भी इसकी अनुमति नहीं दे सकता।

सप्रू समिति में राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं था, इसलिए समिति ने अपनी इच्छा से संघ में शामिल होने के अतिरिक्त रियासतों के विषय में कोई और सिफारिश नहीं की। समिति द्वारा यह सिफारिश भी की गई कि जहाँ तक हो सके राज्य प्रमुख, राज्यों के शासकों में से ही चुना जाना चाहिए। साथ ही उसमें राज्यों के मंत्री पद की भी व्यवस्था हो जिसकी सहायता के लिए राज्यों की सलाहकार समिति हो।

सप्रू समिति की अवधारणा के अनुसार भारतीय संघ केवल एक राज्य होगा जिसमें संघीय इकाइयां होंगी चाहे वह प्रांतों की हों या राज्यों की। संघ से असंबद्ध राज्य भी होंगे। किसी भी विदेशी शक्ति का इन इकाइयों पर कोई अधिकार नहीं होगा चाहे वे संघ में शामिल हों या न हों।

रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रस्ताव

रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से एम. एन. राय द्वारा स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रारूप तैयार किया गया। 6 जनवरी 1945 को ऑल इण्डिया कान्फ्रेन्स ऑफ दी रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी के द्वारा इस प्रारूप को पृष्ठांकित किया गया जिसमें कहा गया कि अंतरिम सरकार को संपूर्ण भारत के लिए संविधान की घोषणा करनी चाहिये तथा उसे भारतीय रियासतों पर भी लागू किया जाना चाहिये।

इसे पूर्व में ब्रिटिश सरकार तथा भारतीय राजाओं के मध्य हुए द्विपक्षीय संधियों के माध्यम से किया जाना चाहिये जिसके माध्यम से भारतीय राजाओं को कुछ वित्तीय अनुदानों के बदले अपने अधिकार भारत सरकार के समक्ष समर्पित करने होंगे।

अन्य विद्वानों के प्रस्ताव

प्रो. कूपलैण्ड ने नदियों को आधार बनाकर जनसंख्या के अनुसार उनके क्षेत्रीय विभाजन की योजना प्रस्तुत की। सर सुल्तान अहमद ने भारत तथा यूनाइटेड किंगडम के मध्य संधि के माध्यम से भारत-पाक विभाजन की योजना प्रस्तुत की। इनमें देशी राज्यों के बारे में कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की गयी।

ई.1943-44 में अर्देशिर दलाल, डा. राधा कुमुद मुखर्जी तथा डा. भीमराव अम्बेडकर ने भी अपनी योजनाएं प्रस्तुत कीं जिनमें भारत की सांप्रदायिक समस्या का समाधान ढूंढने की चेष्टा की गयी किंतु इन सभी योजनाओं में देशी राज्यों की समस्या को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया।

राजगोपालाचारी प्लेटफॉर्म

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6 मई 1944 को गांधीजी को जेल से रिहा कर दिया गया। इसी के साथ भारत छोड़ो आंदोलन भी समाप्त हो गया। लिब्ररल पार्टी के नेता तेज बहादुर सप्रू एवं राजगोपालाचारी ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से बात करके गांधी और जिन्ना के बीच समझौता करवाने का प्रयास किया। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी भी चाहती थी कि गांधी और जिन्ना भारत की आजादी के लिए लड़ें न कि एक दूसरे के खिलाफ लड़कर देश की शक्ति व्यर्थ करें। इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने देश भर में एक नारा उछाला- ‘गांधी-जिन्ना फिर मिलें’ । इन प्रयासों ने असर दिखाया तथा राजगोपालाचारी ने एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें निम्नलिखित बिंदु सम्मिलित किए गए-

(1) युद्ध के दौरान मुस्लिम लीग को पूर्ण स्वाधीनता की मांग का समर्थन करना चाहिए तथा संक्रमण काल के लिए अस्थाई अंतरिम सरकार बनाने में कांग्रेस का सहयोग करना चाहिए।

(2) युद्ध के बाद मुस्लिम बहुमत के क्षेत्रों की सीमा के निर्धारण के लिए एक आयोग नियुक्त किया जाना चाहिए। उन क्षेत्रों के समस्त निवासियों के जनमत या साधारण मतदान के किसी भी अन्य स्वरूप द्वारा निश्चित किया जाना चाहिए कि उनका अलग राज्य बनना चाहिए या नहीं।

(3) जनमत संग्रहण के पहले अपने-अपने दृष्टिकोण का समर्थन करने का अधिकार सब दलों का होगा। अगर अलगाव हो जाए तो दोनों राज्यों के प्रतिरक्षा, व्यवसाय और अन्य उद्देश्यों के लिए समझौता करना चाहिए।

(4) जनसंख्या का कोई भी स्थानांतरण बिल्कुल ऐच्छिक आधार पर होगा।

(5) ये शर्तें तभी लागू होंगी जब ब्रिटेन भारत के शासन की सारी सत्ता और जिम्मेदारी हस्तांतरित कर देगा।

इस प्रस्ताव के आधार पर 4 सितम्बर 1944 को गांधीजी एवं जिन्ना के बीच बम्बई में वार्तालाप आरम्भ हुआ जो कि 17 सितम्बर तक चलता रहा। यह वार्तालाप बहुत गुप्त होता था तथा पत्रों के आदान-प्रदान से होता था। ये पत्र वार्तालाप पूरा होने के बाद प्रकाशित कर दिए गए। यह वार्तालाप असफल हो गया।

असफलता का कारण जिन्ना की जिद था। जिन्ना चाहता था कि किसी भी प्रकार का जनमत संग्रहण करने से पहले ही और ब्रिटिश राज के रहते ही कांग्रेस मान ले कि पाकिस्तान स्थापित किया जाएगा।

जिन्ना ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के अंदर पूरा पंजाब, पूरा बंगाल, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, बलूचिस्तान और असम को पाकिस्तान में शामिल करना होगा। गांधीजी किसी भी कीमत पर जिन्ना को पाकिस्तान देने के लिए तैयार नहीं थे। इसलिए वार्तालाप विफल हो गया और पूरे देश को इस विफलता से बड़ी निराशा हुई।

इस प्रकार एक के बाद एक करके भारत संघ योजनाएं प्रस्तावित की जाती रहीं और मुस्लिम लीग उन्हें ठुकराती रही। बहुत सी योजनाएं कांग्रेस ने ठुकरा दीं तो बहुत सी योजनाओं का राजाओं ने विरोध किया। अंग्रेज भी अपनी तरफ से प्रयास कर रहे थे। भारत संघ की योजनाएं परवान नहीं चढ़ सकीं क्योंकि प्रत्येक पक्ष अपने-अपने उद्देश्य की पूर्ति तो चाहता था किंतु दूसरे पक्ष की अनदेखी करता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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