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साइमन कमीशन

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साइमन कमीशन – साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (1)

भारत में चल रहे क्रांतिकारी आन्दोलनों एवं स्वराज्य दल की गतिविधियों से विवश होकर ई.1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों के बारे में सलाह देने के लिए साइमन कमीशन की नियुक्ति की। इस कमीशन के समस्त सदस्य अँग्रेज थे। इसलिये इसे व्हाइट कमीशन भी कहते हैं। कांग्रेस ने इसका बहिष्कार करने का निश्चय किया।

भारत-सचिव लॉर्ड बर्कनहेड ने भारतीय नेताओं को चुनौती देते हुए कहा कि साइमन कमीशन का विरोध करने से क्या लाभ है जबकि भारतवासी स्वयं ऐसा कोई संविधान तैयार करने में असमर्थ हैं जिसे भारत के समस्त दल स्वीकार करते हों! भारतीय नेताओं ने भारत-सचिव की इस चुनौती को स्वीकार कर लिया तथा भारत के भावी संविधान के लिये एक प्रस्ताव तैयार करने हेतु एक समिति का गठन किया।

मोतीलाल नेहरू को समिति का अध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू को सचिव नियुक्त किया गया। इसमें सुभाषचंद्र बोस तथा सर तेज बहादुर सप्रू सहित कुल 8 सदस्य थे। इस समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को नेहरू रिपोर्ट कहा जाता है। इस रिपोर्ट में भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना, अल्पसंख्यकों के धार्मिक एवं सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए अधिकारों की घोषणा तथा वयस्क मताधिकार आदि बातें सम्मिलित की गईं।

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दिसम्बर 1928 में सर्वदलीय बैठक में जिन्ना ने नेहरू समिति के प्रस्तावों पर तीन संशोधन रखे किन्तु वे स्वीकार नहीं किये गये। मुहम्मद शफी के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने प्रारम्भ से ही नेहरू समिति का बहिष्कार किया। 31 दिसम्बर 1928 और 1 जनवरी 1929 को आगा खाँ की अध्यक्षता में दिल्ली में सर्वदलीय मुस्लिम कान्फ्रेंस की बैठक बुलाई गई।

इसमें नेहरू रिपोर्ट के समस्त प्रस्तावों के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किये गये। जिन्ना ने इस कान्फ्रेंस में भाग नहीं लिया परंतु उसने मार्च 1929 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में एक प्रस्ताव रखा जिसमें नेहरू रिपोर्ट के मुकाबले 14 शर्तें रखीं। मुस्लिम सम्प्रदाय से सम्बन्धित शर्तें इस प्रकार थीं-

(1) भविष्य का संविधान संघीय होना चाहिए तथा बची हुई शक्ति का प्रयोग प्रान्तों द्वारा होना चाहिए।

(2) सभी प्रान्तों के लिए स्वायत्त शासन का एक माप स्वीकार किया जाए।

(3) देश के समस्त विधानमण्डलों एवं अन्य चुनी गई पार्टियों का एक निश्चित सिद्धांत पर पुनर्गठन हो जो प्रत्येक प्रान्त में प्रभावशाली अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व करे।

(4) केन्द्र में मुस्लिम प्रतिनिधित्व एक तिहाई से कम नहीं होना चाहिए।

(5) प्रतिनिधित्व साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली पर आधारित हो।

(6) पंजाब, बंगाल, उत्तर प्रदेश और सीमा प्रान्त में कोई प्रादेशिक पुनर्विभाजन मुस्लिम बहुसंख्यकों को प्रभावित न करे।

(7) पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता हो, यदि किसी समुदाय के 3/4 सदस्य विरोध प्रकट करें तो वह विधेयक पारित नहीं किया जाए।

(8) सिंध को बम्बई से पृथक किया जाए।

(9) अन्य प्रान्तों की तरह उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त एवं बलूचिस्तान में भी समान अधिकार दिए जाएं।

(10) मुस्लिम संस्कृति, धर्म, निजी कानून, मुस्लिम शिक्षा तथा भाषा के उत्थान एवं रक्षा के लिए खुली वकालात करने की छूट हो।

(11) सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को संरक्षण प्राप्त हो।

(12) केन्द्र एवं प्रांतीय सरकारों में मुसलमान मंत्रियों की संख्या 1/3 हो।

(13) यूनिटों की स्वीकृति के बिना संविधान में परिवर्तन नहीं किया जाए।

(14) पृथक् मतदान प्रणाली, मुस्लिम स्वीकृति के बिना नहीं हटाई जाए।

नेहरू रिपोर्ट में जिन्ना की मांग संख्या 1, 12 एवं 13 को छोड़कर शेष 11 मांगें पहले ही मान ली गई थीं किंतु जिन्ना को इनसे संतोष नहीं हुआ। दूसरी ओर हिन्दू महासभा को भी नेहरू समिति के कई प्रस्ताव स्वीकार नहीं थे, विशेषकर सिंध को बम्बई से पृथक् किए जाने का प्रस्ताव।

शाहनवाज भुट्टो, मुहम्मद अली जिन्ना और सर गुलाम हुसैन चाहते थे कि सिंध को बम्बई से अलग किया जाए किंतु लाला लाजपतराय तथा हरचंदराय सिंध को बम्बई के साथ ही रखना चाहते थे ताकि पृथक सिंध क्षेत्र के रूप में एक मुस्लिम बहुल प्रांत का उदय नहीं हो सके। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, सिंध हिन्दू पंचायत आदि संगठनों ने पृथक्कीकरण के प्रस्ताव का विरोध किया।

 हिन्दू महासभा का आरोप था कि मुसलमानों का तुष्टिकरण करने के लिए नेहरू रिपोर्ट में हिन्दुओं के लिए अहितकर प्रस्ताव रखे गए थे। इस प्रकार हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के कारण यह रिपोर्ट कूड़े के ढेर में फैंक दिए जाने से अधिक महत्व प्राप्त नहीं कर सकी।

….. लगातार (2)

साइमन कमीशन का विरोध

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साइमन कमीशन का विरोध साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (2)

साइमन कमीशन भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए लाया गया था। इसमें पृथक् मुस्लिम राष्ट्र बनाने का प्रावधान किय गया था। इस कारण कांग्रेस ने साइमन कमीशन का विरोध किया। यदि कांग्रेस ने इस रिपोर्ट का विरोध नहीं किया होता तो भारत का आजादी मिलने की प्रक्रिया बहुत पहले ही आरम्भ हो गई होती क्योंकि पृथक् मुस्लिम राष्ट्र की मांग तो अंततः माननी ही पड़ी।

साइमन कमीशन की रिपोर्ट

ई.1930 में साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। साइमन कमीशन रिपोर्ट को व्हाइट कमीशन रिपोर्ट भी कहा जाता है। इस रिपोर्ट में दिए गए मुख्य सुझाव इस प्रकार थे-

(1) प्रांतों में दोहरा शासन समाप्त करके उत्तरदायी शासन स्थापित किया जाए।

(2) भारत के लिए संघीय शासन की स्थापना की जाए।

(3) उच्च न्यायालय को भारतीय सरकार के अधीन कर दिया जाए।

(4) अल्पसंख्यकों के हितों के लिए गवर्नर एवं गवर्नर जनरल को विशेष शक्तियां दी जाएं।

(5) सेना का भारतीयकरण हो।

(6) बर्मा को भारत से पृथक् किया जाए तथा सिंध एवं उड़ीसा को नए प्रांतों के रूप में मान्यता दी जाए।

(7) प्रत्येक दस वर्ष पश्चात् भारत की संवैधानिक प्रगति की जांच को समाप्त कर दिया जाए तथा ऐसा लचीला संविधान बनाया जाए जो स्वतः विकसित होता रहे।

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सर जॉन साइमन साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली का विरोधी था। उसके अनुसार यह एक घृणित प्रणाली है जो वही बीमारी पैदा करती है जिसके निदान के लिए इसका प्रयोग किया जाता है परन्तु मांटेग्यू-चैम्सफोर्ड आयोग की ही भांति साइमन कमीशन ने भी कांग्रेस-मुस्लिम लीग समझौते के सांप्रदायिक अंशों को स्वीकार कर लिया तथा मुसलमानों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व अर्थात् केन्द्रीय सभा एवं प्रांतीय विधायिकाओं में मुसलमानों के लिए अलग सीटों के आरक्षण की व्यवस्था को स्वीकार कर लिया।

साइमन कमीशन की रिपोर्ट में भारत में बनने वाले भावी संघ के निम्न-सदन (लोकसभा) में 250 सीटें प्रस्तावित की गईं जिनमें से गैर-मुस्लिमों को 150 (60 प्रतिशत) तथा मुस्लिमों को 100 (40 प्रतिशत) सीटें देनी प्रस्तावित की गईं।

पृथक मुस्लिम राष्ट्र के प्रस्ताव का विरोध

नेहरू समिति के समक्ष प्रस्तुत किए गए 14 सूत्री मांग-पत्र के रूप में जिन्ना का साम्प्रदायिक कार्यक्रम सामने आ चुका था, कांग्रेस इस कार्यक्रम को अस्वीकार तो करती थी किंतु देश में जिन्ना का खुलकर विरोध नहीं किया जा रहा था। नवम्बर 1930 में प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया जाने वाला था। इसलिए हिन्दू महासभा के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ. शिवराम मुंजे ने एक वक्तव्य जारी करके भारत सरकार को संविधान संशोधन के विषय में कुछ सुझाव दिए-

(1) सभी समुदायों को अपने मताधिकार के प्रयोग करने के समस्त अधिकार सभी प्रांतों में समान होने चाहिए।

(2) समस्त समितियों के लिए संयुक्त चुनाव पद्धति द्वारा चुनाव कराए जाएं।

(3) किसी धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर सीटों के आरक्षण न दिए जाएं।

(4) किसी भी प्रांत में सीटों का आरक्षण बहुसंख्यक समुदाय के पक्ष में नहीं हो।

(5) भारत के प्रांतों का प्रतिनिधित्व, यदि आवश्यक हो तो योग्यता के आधार पर किया जाए।

(6) धर्म की बहुलता के आधार पर प्रांतों की रचना नहीं की जानी चाहिए जिसके कारण भारत मुस्लिम भारत, सिख भारत, ईसाई भारत और हिन्दू भारत के रूप में विभाजित हो जाए तथा राष्ट्रीयता के लिए बाधक बन जाए।

(7) सरकारी नौकरियों की प्राप्ति में किसी धर्म या जाति को महत्व न देकर प्रतियोगिता को महत्व दिया जाए।

(8) केन्द्र एवं प्रांतीय मंत्रिमण्डलों में मुसलमान मंत्रियों की संख्या निर्धारित नहीं की जानी चाहिए, सम्मिलित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।

(9) केन्द्र सरकार को अपनी बची हुई शक्ति प्रांतों को नहीं देनी चाहिए। केन्द्र सरकार मजबूत होनी चाहिए।

(10) सभी सम्प्रदायों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता, वैचारिक स्वतंत्रता, पूजा पद्धति की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शिक्षा प्राप्ति की स्वतंत्रता तथा संस्थाओं के गठन की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

लंदन के गोलमेज सम्मेलनों में सरकार की विफलता

साइमन कमीशन की रिपोर्ट में प्रस्तावित संघीय-भारत के निर्माण की दिशा में विचार विमर्श करने हेतु, ब्रिटिश सरकार ने 12 नवम्बर 1930 को लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन बुलाया। कांग्रेस ने इसका बहिष्कार किया। सम्मेलन में मुहम्मद अली जिन्ना और डॉ. भीमराव अम्बेडकर में तीव्र मतभेद हो जाने से भारत में संघीय सरकार के निर्माण पर कोई निर्णय नहीं हो सका।

17 सितम्बर 1931 को लंदन में दूसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया। इसमें कांग्रेस के प्रतिनिधि की हैसियत से अकेले गांधीजी ने भाग लिया। यह सम्मेलन भी असफल रहा। 17 नवम्बर 1932 को लंदन में तृतीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। इस समय कांग्रेस अवैध संस्था घोषित हो चुकी थी इसलिये वह सम्मेलन में भाग नहीं ले सकी।

….. लगातार (3)

भारत के विभाजनकारी तत्व

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second Round Table conference

भारत के विभाजनकारी तत्व – साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (3)

भारत के जाति आधारित सामाजिक विन्यास एवं भारत में बाहर से आए विभिन्न जातियों एवं मजहबों के लोगों की बड़ी संख्या में उपस्थिति के कारण भारत के विभाजनकारी तत्व सदियों से मौजूद थे। कोई भी विदेशी शासक इन विभाजनकारी तत्वों को बढ़ावा देकर भारत में अपना शासन दीर्घकाल तक बनाए रख सकता था। अंग्रेजों ने भी यही किया।

सिंध को मुस्लिम-बहुल प्रांत बनाने की मांग

अंग्रेजों ने पहचाना कि इस्लाम भारत के विभाजनकारी तत्व के रूप में सर्वाधिक शक्तिशाली भूमिका निभा सकता है। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लीग को अलगाववादी कार्यवाहियों के लिए उकसाया। मुस्लिम लीग के ई.1930 के इलाहाबाद सम्मेलन के तुरंत बाद ई.1931 में लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया।

इस सम्मेलन में मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों ने भारतीय विधान सभाओं में मुस्लिम समुदाय के लिये जनसंख्या के अनुपात से सीटों के आरक्षण की मांग की। उन्होंने यह मांग भी की कि सिंध को नये मुस्लिम बहुल प्रांत का दर्जा दिया जाये।

ई.1931 में मुहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि भारत की समस्या को सुलझाने के लिए चार पक्षों में बात-चीत आवश्यक थी- (1) अंग्रेज सरकार, (2) भारतीय राज्य (देशी रियासतें) (3) मुसलमान और (4) हिन्दू। ई.1938 में उसने अपने इस तर्क को पुनः दोहराया।

अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम एकता की हवा निकाली

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ई.1932 में अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रयास किए गए तथा एकता सम्मेलन का आयेाजन किया गया। इस सम्मेलन द्वारा नवम्बर 1932 में नियुक्त कमेटी हिन्दू-मुस्लिम समस्या के हल के एकदम करीब पहुंच गई थी। केन्द्रीय विधानसभा में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के बारे में एक समझौता भी हो गया था और तय हो गया था कि 32 प्रतिशत सीटें मुसलमानों को दी जाएंगी।

लेकनि कमेटी का काम पूरा होने से पहले ही भारत सचिव सैमुएल होर ने हस्तक्षेप किया और घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों को केंद्रीय विधानसभा में 33.33 प्रतिशत सीटें देने का फैसला किया है। उसने सिंध को भी अलग प्रदेश घोषित किया और उसको प्रचुर आर्थिक सहायता देने का वायदा किया। इस तरह एकता सम्मेलन की सारी मेहनत पर पानी फिर गया।

ई.1932 का साम्प्रदायिक पंचाट

जब गोलमेज सम्मेलनों से भी साम्प्रदायिक समस्या का समाधान नहीं हो पाया तो 16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश सरकार ने अपनी तरफ से साम्प्रदायिक पंचाट की घोषणा की। इस पंचाट निर्णय के द्वारा ब्रिटिश सरकार ने केन्द्रीय विधान सभा में गैर-मुस्लिमों को 250 में से 105 सीटें (42 प्रतिशत) दी गईं जबकि भारत में हिन्दुओं की संख्या 75 प्रतिशत थी। मुसलमानों को 33 प्रतिशत सीटें दी गईं जबकि उनकी जनसंख्या 25 प्रतिशत थी।

साइमन कमीशन ने गैर-मुस्लिमों के लिए केन्द्रीय विधान सभा में 250 में से 150 (60 प्रतिशत) सीटें प्रस्तावित की थीं किंतु प्रधानमंत्री मैकडानल ने इन सीटों को घटाकर 42 प्रतिशत कर दिया। इससे हिन्दुओं, सिक्खों, जैनों एवं बौद्धों में सरकार एवं मुसलमानों के प्रति क्षोभ उत्पन्न होना स्वाभाविक था। इस पंचाट निर्णय के अन्तर्गत मुसलमानों की ही तरह यूरोपियनों, सिक्खों, भारतीय ईसाईयों, एंग्लो-इंण्डियनों, राजाओं और जागीरदारों को विभिन्न प्रान्तीय विधान सभाओं में अपने-अपने समुदायों के प्रतिनिधियों को पृथक् निर्वाचन प्रणाली द्वारा चुनने का अधिकार दिया गया।

दलितों को पृथक् प्रतिनिधित्व

भारत के विभाजनकारी तत्व के रूप में दूसरा बड़ा तत्व भारतीय समाज की जाति व्यवस्था थी। भारत के सामाजिक विन्यास में कर्म आधिरित जाति व्यवस्था का प्रावधान किया गया था किंतु समय के साथ इस व्यवस्था ने अत्यंत घृणित रूप ले लिया तथा यह भारत के विभाजनकारी तत्व के रूप में सामने आई। डा. अम्बेडकर ने दलित जातियों के लिए अलग अधिकारों की मांग की। अंग्रेजों ने इस मांग का भी लाभ उठाया।

डा. अम्बेडकर के प्रयत्नों से दलित वर्ग को अपने प्रतिनिधियों को पृथक निर्वाचन प्रणाली द्वारा चुनने की सुविधा दी गई। इस प्रकार इस पंचाट के माध्यम से अँग्रेजों ने बांटो एवं राज्य करो के सिद्धान्त पर देश में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने तथा भारतीय अल्पसंख्यकों को अनुचित महत्त्व प्रदान कर राष्ट्रीय एकता को छिन्न-छिन्न करने का काम किया।

इसी प्रकार दलितों को अलग प्रतिनिधित्व देकर हिन्दू-समाज का बंटवारा करने, राजाओं और जागीरदारों के लिए पृथक्-निवार्चन की व्यवस्था कर अप्रजातांत्रिक तत्त्वों को प्रोत्साहन देने तथा भारत में प्रगतिशील तत्त्वों की गतिविधियों को नियंत्रित एवं कमजोर करने का षड़यंत्र रचा।

इस प्रकार अंग्रेजों पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने धर्म एवं व्यवसाय के आधार पर प्रतिनिधित्व का विभाजन करके भारत को नई समस्याओं के खड्डे में फैंक दिया किंतु यह आरोप सही नहीं है, भारत के विभाजनकारी तत्व भारत में सदियों से मौजूद थे और भारत की आजादी के 75 साल बाद भी उसी तरह विध्वंसक गतिविधियां चलाए हुए हैं।

….. लगातार (4)

पूना पैक्ट

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गांधी और अम्बेडकर में पूना-पैक्ट

पूना पैक्ट – साम्प्रदायिकता का संवैधानिक विकास (4)

जब अंग्रेजों ने भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए नया संविधान बनाना आरम्भ किया तो भारत के विभिन्न विभाजनकारी तत्व अपने लिए अधिक अधिकारों की मांग करने लगे। यह मांग विभिन्न संस्थाओं में पदों के आरक्षण तक सीमित थी। डॉ. अम्बेडकर ने दलित कही जाने वाली जातियों के लिए अलग प्रावधानों की मांग की तो उनका कांग्रेस से विवाद हो गया। इस पर गांधी और अम्बेडकर के बीच पूना में एक समझौता हुआ जिसे पूना पैक्ट कहते हैं।

गांधी और अम्बेडकर में पूना पैक्ट

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गांधीजी ने साम्प्रदायिक पंचाट का, विशेषकर दलितों को हिन्दुओं से पृथक् करने वाले प्रावधानों का जोरदार विरोध किया तथा 20 सितम्बर 1932 को आमरण अनशन पर बैठ गये। डॉ. अम्बेडकर ने इस व्रत को ‘राजनैतिक धूर्त्तता’ बताया। कुछ लोगों ने इसे अपनी मांग मनवाने का तरीका बतलाया। जब गांधीजी का स्वास्थ्य अधिक बिगड़ने लगा तब कांग्रेसी नेताओं ने 26 सितम्बर 1932 को डॉ. अम्बेडकर और गांधीजी के बीच एक समझौता करवाया। यह समझौता पूना पैक्ट के नाम से प्रसिद्ध है।

पूना पैक्ट के द्वारा साम्प्रदायिक पंचाट के आपत्तिजनक भाग को हटाया गया तथा डॉ.अम्बेडकर दलितों के लिए दुगने स्थान सुरक्षित करवाने में सफल रहे। भारत की समस्या के हल को लेकर डॉ. अम्बेडकर का गांधीजी और मुहम्मद अली जिन्ना दोनों से विवाद रहता था। इसलिए अम्बेडकर ने गांधी और जिन्ना की तुलना करते हुए कहा कि– ‘इन दोनों ही नेताओं को भारतीय राजनीति से अलग हो जाना चाहिए।’

भारत सरकार अधिनियम 1935 में अल्पसंख्यकों का हिन्दुओं पर वर्चस्व

लंदन के तीन गोलमेज सम्मेलनों एवं साम्प्रदायिक पंचाट की घोषणा के बाद भारत में नया संविधान लागू किया गया। इसे भारत सरकार अधिनियम 1935 कहते हैं। इस संविधान ने भारत सरकार अधिनियम 1919 का स्थान लिया। नए कानून के मुख्य प्रावधान इस प्रकार थे-

(1) बर्मा को भारत से पृथक् कर दिया जाएगा।

(2) उड़ीसा एवं सिंध नामक नवीन प्रांतों का गठन किया जाएगा।

(3) एक अखिल भारतीय संघ की स्थापना की जायेगी जिसमें ब्रिटिश-भारत के प्रान्त एवं देशी राज्य सम्मिलित होंगे।

(4) प्रांतों को स्वशासन का अधिकार दिया जायेगा।

(5) शासन के विषय तीन भागों में विभक्त किए जायेंगे- (i) संघीय विषय, जो केन्द्र के अधीन होंगे। (ii) प्रांतीय विषय, जो पूर्णतः प्रांतों के अधीन होंगे तथा (iii) समवर्ती विषय, जो केन्द्र और प्रांत के अधीन रहेंगे। विरोध होने पर केन्द्र का कानून मान्य होगा।

(6) संघीय संविधान के अधीन दो सदन होंगे।

(7) हाउस ऑफ एसेम्बली अर्थात् निम्न सदन में 375 सीटें होंगी जिनमें से ब्रिटिश-भारत के प्रतिनिधियों की संख्या 250 एवं देशी राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या 125 होगी।

(8) निम्न-सदन में ब्रिटिश-भारत के 250 प्रतिनिधियों का चुनाव सामान्य अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली द्वारा होगा। इनमें से 105 सीटें सामान्य थीं जबकि 19 सीटें पिछड़े वर्ग के लिए, 82 सीटें मुसलमानों के लिए, 6 सीटें सिक्खों के लिए, 4 एंग्लो-इण्डियन के लिए 8 सीटें यूरोपियन्स के लिए, 8 सीटें भारतीय ईसाइयों के लिए, 11 सीटें उद्योगपतियों के लिए, 7 सीटें जमींदारों के लिए, 10 सीटें श्रमिक प्रतिनिधियों के लिए, 9 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई थीं।

(9) कौंसिल ऑफ स्टेट अर्थात् उच्च सदन में कुल 260 सीटें होंगी जिनमें से ब्रिटिश-भारत के सदस्यों की संख्या 156 तथा देशी राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या 104 होगी। ब्रिटिश-भारत के 156 सदस्यों में से 75 सीटें जनरल के लिए, 6 सीटें पिछड़े वर्ग के लिए, 4 सिक्खों के लिए, 49 मुसलमानों के लिए, 6 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं।

इस प्रकार अंग्रेजों द्वारा आरम्भ किए गए संवैधानिक सुधारों का परिणाम भारत की अखण्डता के लिए अत्यंत खतरनाक सिद्ध हुआ। 1932 के साम्प्रदायिक पंचाट के माध्यम से मुसलमानों को तथा पूना पैक्ट के माध्यम से दलितों को अलग अधिकार दे दिये गये।

इन प्रावधानों से भारत की आत्मा पर गहरा प्रहार हुआ। देश की बहुसंख्यक जातियां मुसलमानों एवं दलितों से पिछड़ जाने के लिए मजबूर कर दी गईं। जो अंग्रेज अपने देश में योग्यता को प्राथमिकता देते थे, भारत में योग्यता का गला घोंटने वाले बन गय। इसमें केवल अंग्रेजों का दोष नहीं था, भारत के विभाजनकारी तत्वों की गहरी साजिशें भी शमिल थीं।

(अध्याय पूर्ण)

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रहमत अली

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रहमत अली ने किया पाकिस्तान शब्द का आविष्कार

ई.1933 में रहमत अली नामक एक विद्यार्थी ने एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें कहा गया कि भारतीय मुसलमानों को अपना राज्य हिन्दुओं से अलग कर लेना चाहिये। रहमत ब्रिटेन में रहकर पढ़ रहा था और उस समय उसकी आयु 40 वर्ष थी। उसने अपने प्रस्ताव में कहा कि भारत को अखण्ड रखने की बात अत्यंत हास्यास्पद और फूहड़ है।

भारत के जिन उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों- पंजाब, काश्मीर, सिंध, सीमांत प्रदेश तथा ब्लूचिस्तान में मुसलमानों की संख्या अधिक है, उन्हें अलग करके पाकिस्तान नामक देश बनाया जाना चाहिये। उसके प्रस्ताव का समापन इन शब्दों के साथ हुआ था- ‘हिन्दू राष्ट्रीयता की सलीब पर हम खुदकुशी नहीं करेंगे।’

कैंब्रिज विश्वविद्यालय के भारतीय मुस्लिम विद्यार्थियों ने रहमत अली का साथ दिया। उन्होंने ‘पाकिस्तान नाउ ऑर नेवर।’ शीर्षक से एक इश्तहार प्रकाशित करवाया जिसमें कहा गया कि- ‘भारत किसी एक अकेले राष्ट्र का नाम नहीं है। न ही एक अकेले राष्ट्र का घर है। वास्तव में यह इतिहास में पहली बार ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्मित एक राष्ट्र की उपाधि है। मुसलमानों की जीवन शैली भारत के अन्य लोगों से भिन्न है। इसलिये उनका अपना राष्ट्र होना चाहिये। हमारे राष्ट्रीय रिवाज और कैलेंडर अलग हैं। यहाँ तक कि हमारा खान-पान तथा परिधान भी भिन्न है।’

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रहमत अली ने ‘पाकिस्तान’ शब्द के दो अर्थ बताये- पहले अर्थ के अनुसार पाकिस्तान माने पवित्र भूमि। दूसरे अर्थ के अनुसार पाकिस्तान शब्द का निर्माण उन प्रांतों के नामों की अंग्रेजी वर्णमाला के प्रथम अक्षरों से हुआ है जो इसमें शामिल होने चाहिये- पंजाब, अफगानिया (उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत), काश्मीर तथा सिंध। शेष शब्द बलूचिस्तान शब्द के अंतिम भाग से लिये गये। बाद में देश के पूर्वी भाग में स्थित असम तथा बंगाल और दक्षिण में स्थित हैदराबाद तथा मालाबार को भी पाकिस्तान में शामिल करने की योजना बनायी गयी।

इस योजना के अनुसार संपूर्ण ‘गैर-मुस्लिम राष्ट्र’ को ‘मुस्लिम-देश’ द्वारा घेरा जाना था तथा गैर-मुस्लिम राष्ट्र के बीच-बीच में मुस्लिम पॉकेट यथा अलीगढ़, भोपाल, हैदराबाद, जूनागढ़, आदि को भी पाकिस्तान का हिस्सा होना था। रहमत अली के इस प्रस्ताव पर मुहम्मद अली जिन्ना की प्रतिक्रिया के बारे में लैरी कॉलिंस एवं दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है-

‘जिस व्यक्ति को एक दिन पाकिस्तान के पिता की संज्ञा से विभूषित किया जाने वाला था, उसी मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान को एक असम्भव सपना कह कर ई.1933 में रहमत अली का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।’

वस्तुतः रहमत अली जीवन भर लंदन में रहकर पाकिस्तान के लिये संघर्ष करता रहा किंतु जिन्ना ने कभी भी उसे महत्व नहीं दिया। जिन्ना को भय था कि कहीं रहमत अली, जिन्ना का स्थान न छीन ले।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाकिस्तान के लिए आंदोलन

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Muhammad Ali Jinnah

पाकिस्तान के लिए आंदोलन – मुहम्मद अली जिन्ना का भारत की राजनीति में पुनः आगमन

जैसे ही ई.1933 में रहमत अली ने ‘पाकिस्तान’ नामक राष्ट्र की अवधारणा प्रस्तुत की, वह अवधारणा रातों-रात लंदन में रहने वाले मुस्लिम युवाओं के बीच प्रसिद्धि पा गयी। दुनिया भर के अखबार इसका हल्ला मचाने लगे तो मुस्लिम लीग की हवाई कल्पनाओं को मानो नये पंख मिल गये। अब पाकिस्तान के लिए आंदोलन चलाने का मार्ग साफ हो गया था।

अब मुस्लिम लीग को एक ऐसे लीडर की तलाश थी जिसने भारत से बाहर निकलकर दुनिया को देखा हो, जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को जानता हो और जो अंग्रेजों से उन्हीं की भाषा में पूरे फर्राटे के साथ बात कर सके। जो पाकिस्तान के लिए आंदोलन चला सके, जो नेहरू, पटेल एवं गांधी जैसा बड़ा वकील हो तथा जो नेहरू, गांधी और पटेल से भारत का एक बड़ा हिस्सा छीन सके।

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मुस्लिम लीगी नेताओं की दृष्टि फिर से अपने पुराने अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना पर टिक गयी और वे उसे ई.1934 में लंदन से बैरिस्टरी का काम छुड़वाकर फिर से भारत ले आये। यह पहली बार हो रहा था कि भविष्य में बनने वाले एक देश के लिये एक नेता लंदन से आयात किया जा रहा था। उसी साल जिन्ना केन्द्रीय धारा सभा के लिये चुना गया और उसी साल वह अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का पुनः अध्यक्ष भी हुआ।

इस बार जिन्ना के तेवर बदले हुए थे। वह हिन्दू-मुस्लिम एकता और राष्ट्रवाद का अलाप लगाना छोड़कर मुस्लिम हितों की बात कर रहा था। वह कांग्रेस के नेताओं के विरोध में बोलने के लिए अवसरों की ताक में रहता था और गांधी एवं नेहरू की खुलकर आलोचना करता था। अब वह कांग्रेस में नहीं था, केवल मुस्लिम लीग में था। इस बार वह भारतीय नहीं था, केवल मुस्लिम नेता था। इस बार उसे भारत की आजादी और उन्नति की चिंता नहीं थी, केवल मुसलमानों के भावी देश के निर्माण की चिंता करनी थी।

अब पाकिस्तान जिन्ना के लिए ‘असम्भव सपना’ नहीं था अपितु केवल ‘यही एक सपना शेष’ रह गया था जिसे जिन्ना अपने जीवन काल में पूरा होते हुए देखना चाहता था।

एक ओर जिन्ना और मुस्लिम लीग साम्प्रदायिक राजनीति के खतरनाक चरण में पहुंच चुके थे किंतु दूसरी ओर कांग्रेसी नेता बदली हुई परिस्थितियों को समझ नहीं पा रहे थे। वे हिन्दू और मुसलमान दोनों को अपनी विरासत समझ रहे थे तथा मुस्लिम लीग एवं उसके नेता मुहम्मद अली जिन्ना, दोनों को सिरे से नकार रहे थे। जिन्ना को फिर से राजनीति में लौट आते हुए देखकर पाकिस्तान का स्वप्न देखने वाला रहमत अली बुरी तरह से चिढ़ गया। वह जिन्ना को पसंद नहीं करता था।

रहमत अली इस्लाम की परम्परागत वेशभूषा, भाषा और खानपान को ही मुसलमान होने की गारण्टी मानता था जबकि जिन्ना अंग्रेजी कपड़े पहनता था, अंग्रेजी भाषा में सोचता और बोलता था, अंग्रेजी शैली में बैठकर खाना खाता था। इसलिए रहमत अली की दृष्टि में जिन्ना असली मुसलमान नहीं था।

रहमत अली ने पहले भी जिन्ना के विरुद्ध आग उगली थी किंतु जब जिन्ना भारत छोड़कर इंग्लैण्ड में बैरिस्टरी करने लगा तो रहमत अली ने उसके विरुद्ध बोलना बंद कर दिया था किंतु अब जबकि जिन्ना न केवल भारतीय राजनीति में लौट आया था, अपतिु मुस्लिम लीग का अध्यक्ष भी बन गया था, इसलिए रहमत अली ने जिन्ना के विरुद्ध हमले तेज कर दिए।

8 जुलाई 1935 को रहमत अली ने एक इश्तहार प्रकाशित करवाया जिसमें उसने जिन्ना को निशाना बनाते हुए कहा- ‘मैं दिल से उम्मीद करता हूँ के आप मेहरबानी करके पाकिस्तान की अटल मांग पर हमें पूरा समर्थन देंगे। न्याय और समता पर आधारित हिंदोस्तान से भिन्न पृथक राष्ट्रीय अस्तित्व के रूप में पाकिस्तान की मांग करना एक पवित्र अधिकार है।

……. पाकिस्तान हिन्दुओं की जमीन नहीं है और न ही उसकी जनता हिंदोस्तान की नागरिक है।

….. हमारे राष्ट्रीय जीवन का बुनियादी आधार और सार उससे एकदम अलग है जिस पर हिन्दूवाद आधारित है और परवान चढ़ रहा है।

….. सरकार द्वारा नामजद मुसलमान प्रतिनिधियों द्वारा गोलमेज सम्मेलन में भारत को महासंघ बनाने की योजना पर सहमति देकर किए गए हमारे राष्ट्रीय भविष्य के बेहद शर्मनाक समर्पण की हम पाकिस्तानी बार-बार भर्त्सना कर चुके हैं। ये लोग न तो पाकिस्तान के प्रतिनिधि थे और न ही पाकिस्तानी जनता की नुमाइंदगी कर रहे थे।

…… इतिहास की चेतावनी की पूरी तरह उपेक्षा करते हुए समर्पण की कला के इन प्रतिष्ठित महारथियों ने हमारी राष्ट्रीयता को बेच दिया है और भावी पीढ़ियों की बलि चढ़ा दी है। पाकिस्तान के साथ की गई सबसे ज्यादा अपमानजनक गद्दारी के लिए इन लोगों को इतिहास के सामने जवाबदेही करनी होगी। ‘

संभवतः रहमत अली ने जिन्ना को अपना राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मान लिया था और उसी ईर्ष्या के कारण वह जिन्ना पर हमले कर रहा था। इसलिए जिन्ना भी तेजी से मुसलमानों के लिए अलग देश की राजनीति को आगे बढ़ा रहा था। भारत में एक केन्द्रीय अथवा संघीय व्यवस्था की स्थापना को जिन्ना ने ‘हिन्दू राज्य का स्वप्न’ कहना आरम्भ किया।

जिन्ना का कहना था- ‘आज हम केवल एक चौथाई भारत मांग रहे हैं और तीन चौथाई उनके लिए छोड़ देने को तैयार हैं। यदि उन्होंने अधिक जिद की तो शायद उन्हें यह भी न मिले।’

एक अन्य अवसर पर जिन्ना ने कहा- ‘हिन्दुओं ने पिछले एक हजार वर्षों से भारत पर राज्य नहीं किया है। हम उन्हें तीन चौथाई भारत राज्य करने के लिए दे रहे हैं। हमारे एक चौथाई भारत पर लालच की दृष्टि न रखो।’

भारत के मुसलमान कभी हिन्दू राज्य स्वीकार नहीं करेंगे जिसका परिणाम यह होगा कि देश में अव्यवस्था और अराजकता फैल जाएगी।

ई.1936 में शौकत अली की मूर्ति का अनावरण करते हुए जिन्ना ने कहा- ‘वर्तमान राजनीतिक समस्या यह थी कि इंग्लैण्ड सारे भारत पर राज्य करने का इच्छुक था और गांधीजी इस्लामी भारत का शासक बनना चाहते थे और हम दोनों में से किसी एक को या समान रूप से दोनों को मुसलमानों पर नियंत्रण स्थापित करने नहीं देंगे।’

इस प्रकार पाकिस्तान के लिए आंदोलन दिन पर दिन जोर पकड़ने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुसलमानों में बेचैनी

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जब मुहम्मद अली जिन्ना ने लंदन से भारत लौटकर मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग उठाई तो जवाहर लाल नेहरू ने मुसलमानों के लिए अलग देश के विचार का दृढ़ता से विरोध किया। इस कारण मुसलमानों में बेचैनी फैल गई।

उधर लंदन में रहमत अली जिन्ना को नकार रहा था तो इधर जवाहरलाल नेहरू देश में तेजी से पनप रही मुस्लिम लीग की समानांतर राजनीति पर हमले कर रहे थे। वे केवल कांग्रेस को ही भारतीय राजनीति में देखना चाहते थे।

ई.1937 में जब प्रान्तीय विधान सभाओं के निर्वाचन हुए तो जवाहरलाल नेहरू ने एक वक्तव्य दिया- ‘देश में केवल दो ही ताकतें हैं- सरकार और कांग्रेस।……. कांग्रेस सरकार के खिलाफ वोट देने का मतलब हैब्रिटिश प्रभुत्व स्वीकार करने के लिए वोट देना…….केवल कांग्रेस ही सरकार का मुकाबला कर सकती है। कांग्रेस के विरोधियों के हित आपस में जुड़े हुए हैं। उनकी मांगों का जनता से कुछ लेना देना नहीं है।’

इस वक्तव्य के कारण जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू से नाराज हो गया और उसके बाद उसने नेहरू को नीचा दिखाने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने दिया। उसने तुरंत प्रतिवाद करते हुए कहा- ‘मैं कांग्रेस का साथ देने से इंकार करता हूँ, देश में एक तीसरा पक्ष भी है और वह है मुसलमानों का।’ कुछ दिन बाद जिन्ना ने नेहरू और कांग्रेस को चेतावनी दी- ‘वे मुसलमानों को अकेला छोड़ दें।’

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नेहरू ने जवाब दिया- ‘मिस्टर जिन्ना बंगाल के मुसमलान मामलों में कांग्रेस की दखलंदाजी पर एतराज करते हुए कहते हैं कि कांग्रेस मुसलमानों को अकेला छोड़ दे। …… किन मुसलमानों को? जाहिर है कि केवल उनको जो मिस्टर जिन्ना और मुस्लिम लीग के अनुयायी हैं। …….

मुस्लिम लीग का लक्ष्य क्या है? क्या वह भारत की आजादी के लिए लड़ रही है? क्या वह साम्राज्यवाद विरोधी है ? मेरा विचार है, नहीं। वह मुसलमानों के एक गुट की नुमाइंदगी करती है जिसमें निश्चित रूप से काफी प्रतिष्ठित लोग हैं। ये लोग उच्च-मध्यम वर्ग के ऊँचे हलकों में सक्रिय रहते हैं और उनका मुसलमान जनता से सम्पर्क नहीं है।

मुसलमानों के निम्न-मध्यमवर्ग से भी उनका सम्बन्ध कम ही है। मिस्टर जिन्ना को जान लेना चाहिए कि मुस्लिम लीग के ज्यादातर सदस्यों के मुकाबले में मुसलमानों के ज्यादा सम्पर्क में रहता हूँ।’

इस भाषण के एक माह बाद एक साक्षात्कार में जिन्ना ने कहा- ‘हर बात में दखल देने वाले कांग्रेस के इस अध्यक्ष के बारे में क्या कहूँ? लगता है कि वे सारी दुनिया की जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ढो रहे हैं। अपने काम से मतलब रखने के बजाय हर बात में टांग अड़ाना उनके लिए जरूरी है।’

नेहरू ने अपने भाषणों में बार-बार जिन्ना पर प्रहार किए कि वे ड्राइंग रूम की राजनीति से बाहर निकलकर सारे-सारे दिन खेतों में काम करने वाले एक करोड़ मुसलमानों तक पहुंचें। जिन्ना और मुस्लिम लीग के पास नेहरू के इन बयानों की कोई काट नहीं थी। उन्हें भय हुआ कि कहीं सचमुच ही निर्धन मुस्लिम समुदाय नेहरू एवं कांग्रेस की बातों में न आ जाए।

जाहिर था कि लीग केवल एक ही तरीके से मुसलमान जनता को जगाकर, आंदोलित करके, अपने नेतृत्व के पीछे चला सकती थी। वह तरीका था- ‘इस्लाम खतरे में है।’ दीन का सवाल उठाकर ही लीग अपना झण्डा सबसे अलग उड़ा सकती थी।

इस नारे के द्वारा ही मुस्लिम लीग भारत के मुसलमानों में बेचैनी फैला सकती थी जिसका उपयोग पाकिस्तान की मांग को मजबूत बनाने में किया जा सकता था।

ई.1937 के चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। ये चुनाव भारत सरकार अधिनियम-1935 में किये गये प्रावधानों के अंतर्गत हुए थे। मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और उड़ीसा में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। बंगाल, आसाम तथा पश्चिमोत्तर प्रदेश में वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। केवल पंजाब और सिन्ध में कांग्रेस को कम मत मिले।

ग्यारह प्रान्तों में मुसलमानों के लिए सुरक्षित 482 सीटों में से कांग्रेस को 26 सीटें, मुस्लिम लीग को 108 सीटें तथा निर्दलीय मुसलमानों को 128 सीटें मिलीं। पंजाब में अधिकांश सीटें यूनियनिस्ट पार्टी को मिलीं। बंगाल में फजलुल हक की प्रजा-पार्टी को 38 सीटें मिलीं। इन चुनाव परिणामों से मुसलमानों में बेचैनी फैलना स्वाभाविक ही था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी का अपमान

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जिन्ना की बहिन फातिमा, मुहम्मद अली जिन्ना तथा जिन्ना की पुत्री दीना वाडिया

भारत की आजादी से पहले की राजनीति में गांधीजी एक ऐसी अनिवार्यता बन गए थे जिसकी उपेक्षा करना किसी के लिए संभव नहीं था। गांधीजी मुसलमानों से इतना प्रेम करते थे कि वे किसी भी कीमत पर मुसलमानों को अलग देश नहीं देना चाहते थे। इस कारण मुहम्मद अली जिन्ना ने गांधीजी का अपमान करने का फैसला किया।

जिन्ना का कांग्रेस पर हमला

चुनावों में कांग्रेस को मिली भारी विजय से जिन्ना तिलमिला गया। उसने सोचा कि भारत के समस्त मुस्लिम राजनीतिक दलों को लीग के अन्तर्गत संगठित करके ही हिन्दुओं की पार्टी अर्थात् कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी जा सकती है। इसके बाद जिन्ना ने द्वि-राष्ट्रवाद के सिद्धांत को मुसलमानों की कमजोरी बनाने तथा उस कमजोरी को अपने पक्ष में भुनाने का निर्णय लिया।

जिन्ना ने भारतीय राजनीति की पूरी दिशा बदल दी। उसके साथियों ने मुसलमानों पर हिन्दुओं द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के झूठे आंकड़े और मनगढ़ंत घटनाएं प्रचारित करके ‘इस्लाम खतरे में है’ जैसे भड़काऊ नारे दिये और मुसलमानों में कृत्रिम भय पैदा करके साम्प्रदायिकता की समस्या को चरम पर पहुंचा दिया।

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13 अक्टूबर 1937 को जिन्ना बम्बई से लखनऊ गए। लखनऊ रेलवे स्टेशन पर मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने उनके डिब्बे को घेर लिया। उनका जोश इस कदर फूट पड़ रहा था और हिन्दू हमले का मुकाबला करने का उनका इरादा इतना पक्का था कि अक्सर शांत और अविचलित रहने वाले मि. जिन्ना भी भावुक हो गए।……. उनके चेहरे पर एक कठोर दृढ़ता छा गई। साथ ही उन्हें यह देखकर संतोष भी हो रहा था कि उनके लोग आखिरकार उठ खड़े हुए हैं। उन्होंने जनता के भड़के हुए जज्बात पर मरहम लगाने के लिए कुछ लफ्ज कहे।

कई मुसलमान तो वहाँ अपने नेता को देखकर जज्बात में आकर रोने लगे। उन्हें यकीन था कि उनका नेता उन्हें गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाएगा। ई.1937 के निर्वाचनों से यह स्पष्ट हो चुका था कि किसी भी केन्द्रीय व्यवस्था में हिन्दुओं का बहुमत रहेगा। इसलिए किसी ऐसी योजना को प्रस्तुत करना आवश्यक हो गया जिसका मुसलमान जनता तथा विभिन्न मुस्लिम दल समर्थन करें और अंग्रेज सरकार उसे स्वीकार कर ले।

मुसलमानों में अपनी लोकप्रियता का ऊँचा ग्राफ देखकर जिन्ना ने कांग्रेस, नेहरू और गांधीजी का अपमान करने का निर्णय लिया ताकि वे तिलमिलाकर जिन्ना से पीछा छुड़ाने का मार्ग ढूंढें और इसी उत्तेजना में मुसलमानों को अलग देश देने की बात मान लें

अब जिन्ना को कांग्रेस की स्वीकृति की इतनी चिंता नहीं थी। अक्टूबर 1937 में जबकि कांग्रेस के प्रांतीय मंत्रिमण्डलों को काम करते हुए कुछ सप्ताह भी नहीं बीते थे, जिन्ना ने यह आक्षेप लगाना आरम्भ कर दिया था कि मुसलमान कांग्रेस सरकार से किसी न्याय की आशा नहीं कर सकते। जिन्ना ने वंदे मातरम्, हिन्दी भाषा को प्रोत्साहन तथा कांग्रेसी ध्वज को सम्मान देने के विषय में शिकायत की।

अप्रेल 1938 के मध्य में कलकत्ता के फ्लडलाइटों की रोशनी में नहाए हुए एम्फीथिएटर में जिन्ना ने ललकार कर कहा-

‘कांग्रेस मुख्य तौर से एक हिन्दू संगठन है। मुसलमान एक से ज्यादा बार यह साफ कर चुके हैं कि धर्म, संस्कृति भाषा और विवाह कानून आदि के अलावा भी एक सवाल है जो उनके लिए जिंदगी और मौत का सवाल बन चुका है। उनका भविष्य और नियति इस बात पर निर्भर हैं कि उन्हें उनके राजनीतिक अधकार मिलते हैं या नहीं।

उन्हें राष्ट्रीय जीवन में, सरकार में, देश के प्रशासन में उनकी वाजिब हिस्सेदारी मिलती है या नहीं। वे इसके लिए आखिरी दम तक लड़ेंगे। हिन्दू राज स्थापित करने का कोई भी सपना और विचार कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। मुसलमानों पर कोई हावी नहीं हो सकता और जब तक उनमें जरा सा भी दम बाकी है, वे हथियार नहीं डालेंगे।’

जिन्ना कांग्रेस को मुस्लिम लीग का आदर करने और उससे डरने का सबक सिखाना चाहते थे, साथ ही अपने अनुयाइयों के लिए उनके पास पूरी तरह से आत्मनिर्भर होने और ठोस रूप से एकजुट जनता के रूप में गोलबंद होने का सबक था।

इसी बीच जवाहरलाल नेहरू ने अपने समाजवादी कार्यक्रम में मुसलमानों से सहयोग करने की अपील की किन्तु डॉ. इकबाल ने इसे मुसलमानों की सांस्कृतिक एकता को नष्ट करने की योजना बताया। इकबाल ने जिन्ना को भरपूर सहयोग दिया। इकबाल की मध्यस्थता से जिन्ना-सिकन्दर समझौता हुआ तथा पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी के मुस्लिम सदस्य, मुस्लिम लीग के भी सदस्य बन गये।

इसके तुरन्त बाद बंगाल में फजलुल हक के नेतृत्व में और सिन्ध में सादुल्लाखाँ के नेतृत्व में विधान सभाओं के मुस्लिम सदस्यों ने मुस्लिम लीग की सदस्यता स्वीकार कर ली। इससे मुस्लिम लीग शक्तिशाली पार्टी हो गई। इसी दौरान संयुक्त प्रान्त में मन्त्रिमण्डल निर्माण सम्बन्धी विवाद ने मुस्लिम लीग की लोकप्रियता बढ़ाने में योगदान दिया।

कांग्रेस और लीग के बीच अविश्वास की वृद्धि के कारण ऊपरी तौर पर गौण लगने वाले मसले, जैसे कि कांग्रेस के ‘तिरंगे’ झण्डे को फहराना, ‘वन्देमातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में गाना, उर्दू के स्थान पर हिन्दी के प्रयोग की मांग उठाना आदि भी अब साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए।

जिन्ना ने इसका लाभ उठाया और मुसलमानों पर अपने नेतृत्व और मुस्लिम लीग का प्रभाव मजबूती से आरोपित कर दिया। फलस्वरूप ई.1927 में मुस्लिम लीग की सदस्य संख्या जो मात्र 1330 थी, ई.1938 में एक लाख हो गई और ई.1944 में 20 लाख पहुँच गई।

जिन्ना मुस्लिम लीग को भारत के समस्त मुसलमानों की एक मात्र प्रतिनिधि संस्था कहता था जबकि कांग्रेस उसके इस दावे को अस्वीकार करती थी क्योंकि जिन्ना के दावे को स्वीकार करने का अर्थ था कि कांग्रेस न तो एकमात्र अखिल भारतीय पार्टी है और न हिन्दू और मुसलमान, दोनों की पार्टी है।

इस कारण जिन्ना, कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं, विशेषतः महात्मा गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू से चिढ़ा हुआ रहता था। वह गांधीजी को महात्मा मानने से मना करता था तथा उन्हें चालाक लोमड़ी, साँप और हर किसी से होड़ करने वाला हिन्दू कहकर गांधीजी का अपमान करता था।

वह गांधीजी का अपमान इस हद तक नीचे गिरकर करता था कि वह सार्वजनिक मंचों से कहने लगा- ‘इस आदमी (गांधी) को किसी एक बात तक लाना असम्भव है। वह साँप की तरह चालाक है।’

जवाहरलाल नेहरू के लिये जिन्ना का कहना था- ‘उद्दण्ड ब्राह्मण जो अपनी चालबाजी को पश्चिमी शिक्षा के आवरण से ढंककर रखता है। जब वह वादा करता है, कोई न कोई रास्ता छोड़ देता है और जब कोई रास्ता नहीं मिलता तो सफेद झूठ बोलता है।’

कांग्रेस के नेताओं के लिये जिन्ना का व्यवहार असह्य था। फिर भी गांधीजी हर हाल में जिन्ना को कांग्रेस के आंदोलन के साथ रखना चाहते थे। इस प्रकार कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग, दोनों पार्टियों के शर्षस्थ नेताओं के व्यक्तिगत मतभेदों ने देश में साम्प्रदायिकता को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया।

अप्रेल 1938 में नेहरू एवं जिन्ना के मध्य हुए पत्र-व्यवहार से स्पष्ट हो जाता है कि दोनों में कई मौलिक अंतर थे। जिन्ना चाहता था कि मुस्लिम लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि स्वीकार कर लिया जाए। नेहरू उसे केवल एक साम्प्रदायिक संगठन मानने को तैयार थे। जिन्ना ने आरोप लगाया कि कांग्रेस का व्यवहार एकाधिकारी तथा प्रभुत्वसम्पन्न संस्था जैसा था।

12 अप्रेल 1938 के पत्र में जिन्ना ने लिखा- ‘जब तक मुस्लिम लीग को कांग्रेस पूर्ण समानता के स्तर पर स्वीकार नहीं करती और एक हिन्दू-मुस्लिम समझौते के बारे में बातचीत नहीं करती, तब तक हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी और अपनी आंतरिक शक्ति पर निर्भर रहना पड़ेगा। वह ही हमारे महत्व और प्रतिष्ठा का सूचक होगा।’

26 दिसम्बर 1938 को बम्बई में दिए गए अपने भाषण में जिन्ना ने कांग्रेस के ‘एक-राष्ट्र स्वप्न’ की तीव्र आलोचना की तथा कांग्रेस को केवल एक हिन्दू संगठन बताया।

जिन्ना ने गांधीजी पर तीखे प्रहार करते हए कहा- ‘कांग्रेस के पीछे किसका दिमाग काम कर रहा है? मिस्टर गांधी का। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि यह मिस्टर गांधी ही हैं जिन्होंने उन आदर्शों को नष्ट कर दिया है जिनके आधार पर कांग्रेस की शुरुआत हुई थी। इसी एक अकेले व्यक्ति के ऊपर कांग्रेस को हिंदूवाद के पुनरुत्थान का औजार बनाने की जिम्मेदारी जाती है। उनका लक्ष्य हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान करके इस देश में हिन्दू राज्य स्थापित करना है और अपने इसी मकसद के लिए वे कांग्रेस का इस्तेमाल कर रहे हैं

……. आज हिन्दू मानसिकता और हिन्दू नजरिया बड़ी सावधानी से पाला-पोसा जा रहा है। …… नई शर्तें मानने और कांग्रेस नेताओं के आदेशों पर चलने के लिए मुसलमान मजबूर किए जा रहे हैं।’

बड़ी विचित्र स्थिति थी! एक ओर तो गांधीजी का मुस्लिम प्रेम नहीं छूट रहा था, दूसरी ओर भारत के भोले-भाले हिन्दू गांधीजी को अपना नेता मान रहे थे, तीसरी ओर जिन्ना गांधीजी को अपना परम शत्रु बता रहा था, चौथी ओर कांग्रेस न तो गांधीजी का अपमान सह पा रही थी और न गांधीजी की बातों को स्वीकार कर पा रही थी। चालाक अंग्रेज इन परिस्थितियों का जम कर मजा ले रहे थे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत विभाजन की योजनाएँ

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भारत विभाजन की योजनाएँ

जब मुहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों के लिए अलग देश के रूप में पाकिस्तान की मांग तेज की तो भारत में विभिन्न स्तरों पर भारत विभाजन की योजनाएँ तैयार होने लगीं।

मुस्लिम लीग द्वारा कांग्रेस पर लगाए गए आक्षेप सम्बन्धी ‘पिरपुर रिपोर्ट’ ई.1939 में प्रकाशित हुई। इसी प्रकार बिहार में कांग्रेस शासन के दोषों को स्पष्ट करने के लिए ‘शरीफ रिपोर्ट’ प्रकाशित की गई। ई.1939 में कांग्रेस मंत्रिमण्डलों के त्यागपत्र दिए जाने के पश्चात् जिन्ना ने मुसलमानों से कहा कि वे 22 सितम्बर 1939 को ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाएँ क्योंकि कांग्रेस मंत्रिमण्डल समाप्त हो चुके थे।

दीनिया संकल्पना

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ई. 1940 में रहमत अली ने ‘इस्लाम की मिल्लत और भारतीयता का खतरा’ शीर्षक से एक इश्तहार प्रकाशित किया। इस इश्तहार में उसने कहा कि मुसलमानों को अलग राष्ट्र के निर्माण का प्रयास करना चाहिये। रहमत अली ने ‘इण्डिया’ शब्द के अंग्रेजी अक्षरों में हेरफेर करके ‘दीनिया’ शब्द का निर्माण किया जिसका अर्थ था- ‘एक ऐसा उपमहाद्वीप जो इस्लाम में धर्मान्तरित होने की प्रतीक्षा कर रहा है।’

रहमत अली ने बंगाल एवं आसाम का पुनः नामकरण करते हुए उसे ‘बंगुश ए इस्लाम’ नाम दिया। इस नाम का अर्थ था ‘इस्लाम का बंगुश’। बंगुश बंगाल का एक मुगल सामंत था। रहमत अली ने बिहार का नाम फरूखिस्तान, उत्तर प्रदेश का नाम हैदरिस्तान तथा राजपूताना का नाम मोइनिस्तान रखा। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के नाम पर मोइनिस्तान की कल्पना की गयी। उसने हैदराबाद का नाम ओसमानिस्तान रखा। मलाबार के मोपला मार्गों को मोपलिस्तान नाम दिया गया। इनके अलावा साफिस्तान और नसरिस्तान क्षेत्रों की भी कल्पना की गई।

रहमत अली द्वारा दीनिया (भारत) के मानचित्र पर दिखाए गए गैरमुस्लिम क्षेत्र अप्रभावी और बेकार टुकड़े नजर आते थे जो मुस्लिम राज्यों के सभी ओर छितराए हुए थे। रहमत अली की कल्पना के अनुसार वे मुस्लिम राज्य हिन्दू भारत से संघर्ष के द्वारा जन्मे थे और इस हिन्दू भारत को अपने अंदर समाहित करने, उन्हें धर्मांतरित करने तथा उन पर विजय प्राप्त करने की नीति का अनुसरण कर रहे थे।

इसके बाद दीनिया संकल्पना को ध्यान में रखकर भारत विभाजन की योजनाएँ बनने लगीं। ई. 1942 में रहमत अली ने एक और इश्तहार ‘मिल्लत और उसका मिशन’ निकाला जिसके अनुसार भारत की नियति में पूरी तरह इस्लाम और मुस्लिम प्रभुत्व में धर्मांतरित होना लिखा है। अब भारत विभाजन की योजनाएँ मिल्लत के आधार पर बनाई जाने लगीं।

भारत-विभाजन योजनाओं की बाढ़

भारत विभाजन की तरह-तरह की योजनाएं प्रस्तुत की जाने लगीं। कुछ ने रहमत अली की योजना के अनुसार प्रस्ताव किया कि सिर्फ पंजाब, सिंध, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, ब्लूचिस्तान और काश्मीर को भारत से अलग कर देना चाहिए।

कुछ लोग अब्दुल लतीफ की योजना का समर्थन करते थे जिसके अनुसार उपर्युक्त प्रांतों के अलावा बंगाल और हैदराबाद को भी अलग कर लेना चाहिए तथा एक मुस्लिम राज्य की स्थापना करनी चाहिए। यह राज्य भारत के सब मुसलमानों का राज्य होगा। कुछ समय बाद रहमत अली ने अपने विचार बदल लिए और उसने भारत के समस्त प्रांतों में मुसलमानों के स्वायत्तशासी राज्यों की मांग करनी शुरू कर दी थी।

अंग्रेज सरकार मुस्लिम लीग से पूर्व-अनुमति ले

इस काल में भारत के मुस्लिम बुद्धिजीवियों की बुद्धि ने बहुत तेजी से काम करना आरम्भ कर दिया और वे भारत विभाजन की योजनाएँ बड़ी ही चतुराई के साथ बनाने लगे ताकि मुसलमानों को भारत की भूमि में अधिक से अधिक हिस्सा मिल सके और काफिर हिन्दू किसी अनुपजाऊ भूभाग में सिमट कर रह जाएं।

इन योजनाओं से प्रभावित होकर जिन्ना ने फरवरी 1940 में भारत सरकार से मांग की कि कोई भी आगामी सुधार योजना उस समय तक लागू नहीं की जाए जब तक कि उसके लिए लीग की पूर्व अनुमति प्राप्त न हो जाए। इस समय तक मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश हेतु औपचारिक प्रस्ताव भी पारित नहीं किया था।

6 मार्च 1940 को अलीगढ़ में भाषण देते हुए जिन्ना ने कहा- ‘हिन्दू-मुसलमान समझौता केवल समानता के आधार पर हो सकता है न कि गांधीजी की शर्तों के आधार पर। ‘

चूंकि यह समानता पश्चिमी प्रजातंत्रीय प्रणाली से उपलब्ध नहीं हो सकती थी इसलिए वे प्रजातंत्रीय प्रणाली के विरुद्ध थे। उसका तर्क था कि- ‘इस्लाम ऐसे प्रजातंत्र में विश्वास नहीं रखता जिसमें निर्णय का अधिकार गैर-मुसलमानों को हो।’

मुहम्मद अली जिन्ना ने हिन्दू मुस्लिम समझौते के सम्भव न होने के लिए मुख्य कारण यह बताया था कि मुसलमान भारत के भावी प्रशासन में बराबर के साझीदार होना चाहते थे।

अर्थात् जिन्ना अपनी शर्तें कड़ी करता जा रहा था और बात को घुमाकर बड़े ही लच्छेदार शब्दों में कह रहा था कि भारत के भावी संघ की केन्द्रीय एवं प्रांतीय सभाओं में हिन्दुओं एवं मुसलमानों के लिए बराबर संख्या में सीटें हों। यह मांग किसी भी प्रजातांत्रिक आधार पर उचित नहीं ठहराई जा सकती थी। इसलिए किसी समझौते का प्रश्न नहीं उठता था।

जिन्ना बड़ी चतुराई से और बड़ी तेज से भारत को विभाजन की ओर धकेल रहा था। जिन्ना के कपट के सामने कांग्रेसी नेता किंकर्त्तव्यविमूढ़ से नजर आते थे। भारत विभाजन की योजनाएँ पूरे देश में जोर-शोर से बन रही थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाकिस्तान प्रस्ताव

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मुस्लिम लीग पाकिस्तान के निर्माण के लिए बड़ी तेजी से काम कर रही थी। लीग के नेताओं ने मरो और मारो की नीति अपना ली थी जिसके कारण मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान का प्रस्ताव पारित कर दिया गया। इसे लाहौर प्रस्ताव भी कहा जाता है।

24 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान बनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया जिसमें कहा गया कि-

‘ऑल इण्डिया मुसलिम लीग के इस अधिवेशन का यह दृढ़ मत है कि कोई भी वैधानिक योजना इस देश में सफल नहीं हो सकती और न वह मुसलमानों को स्वीकार हो सकती है जब तक कि यह निम्नलिखित बुनियादी सिद्धांतों पर तैयार नहीं की जाती: भौगोलिक दृष्टि से सटे प्रांतों (यूनिटों) को मिलाकर अंचल बना दिए जाएं। ये अंचल भूमि के आवश्यक आदान-प्रदान के साथ इस तरह बनाए जाने चाहिए जिससे वे क्षेत्र, जिनमें संख्या की दृष्टि से मुसलमानों का बहुमत है जैसे हिंदुस्तान के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में, मिलाकर स्वाधीन राज्य बना दिए जाएं जिनमें उनके घटक यूनिट स्वायत्त और सार्वभौम होंगे।’

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मुस्लिम लीग के इस लाहौर-प्रस्ताव में पाकिस्तान शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था किंतु इसे पाकिस्तान-प्रस्ताव के नाम से ही जाना जाता है। इस अधिवेशन में जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा- ‘मैं चाहता हूँ कि आप अपने आप को संगठित करने का महत्त्व समझें …… आप अपनी आंतरिक शक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी पर भरोसा नहीं कर सकते। अपने आप पर निर्भर रहो। अपने अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए अपने में शक्ति पैदा करो। …… अंग्रेज सरकार द्वारा भारत के भविष्य के संविधान के संदर्भ में कोई घोषणा बिना हमारी सहमति नहीं की जानी चाहिए …….।

यदि ऐसी कोई घोषणा की जाती है और बिना हमारी स्वीकृति और सहमति के कोई अंतरिम समझौता किया जाता है तो भारत के मुसलमान इसका विरोध करेंगे। …… एक हजार वर्षों के सम्पर्क के बावजूद ऐसी राष्ट्रीयताएं जो सदा की भांति भिन्न और अलग-अलग हैं, केवल प्रजातंत्रीय प्रणाली की स्थापना से किस प्रकार एक राष्ट्र बन सकती हैं?

…..भारत की समस्या अंतर्जातीय न होकर अन्तर्राष्ट्रीय है। यदि अंग्रेज सरकार इस उपमहाद्वीप के लोगों की सुख और समृद्धि की इच्छुक है तब एक मात्र विकल्प यही है कि भारत को कई राज्यों में विभक्त करके यहाँ की बड़ी कौमों को पृथक्-पृथक् भाग दे दिए जाएं।

….. यह एक स्वप्न है कि भारत में हिन्दू और मुसलमान एक सम्मिलित राष्ट्रीयता प्राप्त कर सकेंगे। ये दोनों सम्प्रदाय बिल्कुल भिन्न हैं। …… वर्तमान कृत्रिम एकता केवल अंग्रेजी राज्य की देन है …… भारत के मुसलमान किसी भी ऐसे संविधान को स्वीकार नहीं करेंगे जिसमें बहुसंख्यक हिन्दुओं की सरकार स्थापित हो सके। मुसलमान एक अल्पसंख्यक समुदाय नहीं है

……. वे प्रत्येक परिभाषा के अनुसार एक कौम (नेशन) हैं और उन्हें अपना वतन, राज्य तथा क्षेत्रफल मिलना चाहिए ….. हम अपने लक्ष्य से डरा-धमकाकर विचलित नहीं किए जा सकते …..।’

गांधीजी ने मुस्लिम लीग के पाकिस्तान प्रस्ताव पर तुरंत प्रतिक्रिया दी। 30 मार्च 1940 के हरिजन में उन्होंने लिखा-

‘विभाजन एक स्पष्ट असत्य है। मेरी पूरी आत्मा इस विचार के खिलाफ है कि हिंदुत्व और इस्लाम- दो विरोधी संस्कृतियों तथा सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे सिद्धांत को मानना मेरे लिए ईश्वर को नकारना है। मैं अपनी पूरी आत्मा के साथ यह विश्वास करता हूँ कि कुरान का ईश्वर, गीता का भी ईश्वर है। मैं इस विचार का विरोध करता हूँ कि करोड़ों हिन्दुओं ने अपने धर्म के रूप में इस्लाम को स्वीकार करने के बाद अपनी राष्ट्रीयता बदल दी।’

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने दुःख के साथ कहा-

‘द्विराष्ट्र का सिद्धांत एकता की संवेदनशील इच्छा के विकास की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ेगा।’ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भविष्यवाणी की- ‘विभाजन को सबसे अधिक सम्बद्ध लोगों की सद्भावना से प्राप्त करने की संभावना नहीं है, यह वैमनस्य दोनों ओर विद्यमान रहेगा।’

हिन्दू नेताओं द्वारा दी जा रही प्रतिक्रियाओं को नकारते हुए, लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान प्रस्ताव का समर्थन करने वाले मुस्लिम लीगी नेता खलीकुज्जमाँ ने कहा-

‘यदि हिंदुओं तथा मुसलमानों के बीच मुद्दों को तलवार के बल पर सुलझाना है तो मुसलमानों को कोई डर नहीं है।’

मई 1940 में मुस्लिम लीग के बम्बई प्रादेशिक अधिवेशन में जिन्ना ने कहा-

‘अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने भारत के मुसलमानों को सही दिशा दिखा दी है। उन्हें एक उत्तम कार्यक्रम, एक नीति, एक मंच और एक ध्वज प्रदान किया है

…… भारतीय राष्ट्र केवल कांग्रेस हाईकमाण्ड के मस्तिष्क में ही विद्यमान है। हमारा प्रस्ताव यह है कि हिन्दू और मुसलमान दो सम्मानपूर्ण कौमों की भांति साथ-साथ अच्छे पड़ौसियों की भांति रहें न कि हिन्दू उच्च और मुसलमान निम्न कौम की भांति रहें जिसमें हिन्दू बहुमत मुसलमानों पर नियंत्रण करे। भारत विभाजन की योजना साम्प्रदायिक नहीं अपितु राजनीतिक समस्याओं का हल है क्योंकि इस योजना के अधीन हिन्दू और मुसलमान समान अधिकार और स्थान प्राप्त कर सकेंगे। ‘

के. एम. मुंशी ने अपनी पुस्तक पिलग्रिमेज टू फ्रीडम में लिखा है कि इसके तुरंत ही पीछे मुस्लिम लीग के नेताओं ने, जहाँ-जहाँ भी उनसे हो सका, बलवे कराने आरंभ कर दिये। ढाका, अहमदाबाद, बम्बई के बलवे तो अधिक भयंकर हुए थे।

मुहम्मद अली जिन्ना का कहना था कि पाकिस्तान के लिए संघर्ष अंग्रेजों से नहीं बल्कि कांग्रेस से था। नवम्बर 1940 में जिन्ना ने कहा-

‘हम इंग्लैण्ड से अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहते हैं। यही कारण है कि हमने आरम्भ से ही इंग्लैण्ड के मार्ग में रुकावटें नहीं डालीं। यद्यपि पाकिस्तान ही हमारी नौका का लक्ष्य है फिर भी हमने इंग्लैण्ड सरकार के समर्थन को प्राप्त करने के लिए पाकिस्तान की मांग को पूर्व-शर्त के रूप में नहीं रखा। हमने केवल यह आश्वासन चाहा कि इंग्लैण्ड सरकार कांग्रेस से कोई स्थाई समझौता करके हमारा साथ न छोड़ दे।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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