Home Blog Page 75

शिमला सम्मेलन

0

कांग्रेस और मुस्लिम लीग में अस्थाई सरकार के गठन के लिए समझौता करवाने हेतु भारत के वायसराय लॉर्ड वेवेल ने शिमला सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में गांधीजी ने जोर डाला कि भारत में बनने वाली सरकार में मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस की ओर से सदस्य होंगे किंतु जिन्ना ने कहा कि सरकार में मुस्लिम मंत्रियों की नियुक्ति केवल मुस्लिम लीग ही करेगी। गांधी और जिन्ना के झगड़े में शिमला सम्मेलन विफल हो गया।

मई 1945 में केन्द्रीय विधान सभा में कांग्रेस के नेता भूलाभाई देसाई और मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली के बीच केन्द्र में अस्थाई सरकार बनाने के बारे में एक समझौता हुआ। इसमें निश्चित किया गया कि इस सरकार में 40 प्रतिशत कांग्रेस के, 40 प्रतिशत लीग के और शेष 20 प्रतिशत पद अन्य गुटों के लिए होंगे।

यह प्रस्ताव लॉर्ड वैवेल के समक्ष रखा गया। वह ब्रिटिश सरकार से सलाह करने के लिए लंदन गया। लम्बे विचार-विमर्श के बाद मई के अंत में ब्रिटिश सरकार ने इस समझौते को अपनी स्वीकृति दे दी। 14 जून 1945 को भारत सचिव एल. एस. एमरी ने हाउस ऑफ कॉमन्स में भारत के सम्बन्ध में नई नीति की घोषणा की। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश सरकार भारत में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की सरकार स्थापित करने के लिए तैयार है।

कैसे बना था पाकिस्तान - bharatkaitihas.com
To Purchase This Book Please Click On Image.

25 जून 1945 को लॉर्ड वैवेल ने शिमला में एक सम्मेलन आयोजित किया। वायसराय की घोषणा के अनुसार इसमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अध्यक्षों, परिगणित जातियों और सिक्खों के प्रतिनिधियों, केन्दीय विधानसभा में कांग्रेस दल के नेता और मुस्लिम लीग के उपनेता, केन्द्रीय राज्यपरिषद में कांग्रेस दल और मुस्लिम लीग के नेता, विधान सभा में नेशनलिस्ट पार्टी और यूरोपीय ग्रुप के नेता एवं उस समय की प्रान्तीय सरकारों के मुख्यमंत्री निमंत्रित किए गए थे।

सम्मेलन में वायसराय की कार्यकारिणी के गठन को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच विवाद हो गया। वैवेल ने 14 सदस्यों की एक्जीक्यूटिव कौंसिल का प्रस्ताव रखा जिसमें कहा गया कि इसमें 5 नाम कांग्रेस द्वारा, 5 नाम मुस्लिम लीग द्वारा और 4 नाम वायसराय द्वारा दिए जाएंगे। कांग्रेस ने आजाद, नेहरू, पटेल, एक पारसी और एक भारतीय ईसाई का नाम दिया। वैवेल ने एक सिक्ख, दो परिगणित जातियों और पंजाब के मुख्यमंत्री खिजिर हयात का नाम दिया।

जिन्ना ने कांग्रेस के द्वारा दिए गए मौलाना अबुल कलाम आजाद के नाम पर आपत्ति कर दी। उसका कहना था कि कौंसिल में कोई भी मुस्लिम सदस्य केवल मुस्लिम लीग से हो सकता है। कांग्रेस मौलाना की बजाय कोई दूसरा नाम दे। इस मुद्दे पर इतनी टसल हुई कि यह सम्मेलन विफल हो गया।

मुस्लिम लीग की यह जिद्द पूरे देश को हैरान करने वाली थी। क्योंकि इस समय पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, पंजाब और सिंध में मुस्लिम जनसंख्या का बहुमत होते हुए भी वहाँ मुस्लिम लीग की सरकारें नहीं बन सकी थीं। पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी के नेता खिजिर हयात खाँ मुख्यमंत्री थे। सिंध में सर गुलाम हुसैन की कांग्रेस समर्थित सरकार थी। यही हालत असम की थी।

बंगाल में गवर्नर शासन था। ऐसी स्थिति में मुस्लिम लीग यह दावा कैसे कर सकती थी कि मुस्लिम लीग ही समूचे भारत के मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती हैै। जिन्ना का रवैया इसलिए भी हैरान करने वाला था क्योंकि यदि जिन्ना इस कौंसिल के गठन को स्वीकार कर लेता तो 14 सदस्यों की इस कौंसिल में मुसलमानों की संख्या 7 अर्थात् 50 प्रतिशत होती जो कि भारत की मुस्लिम जनंसख्या के अनुपात की तुलना में दो गुनी होती। यदि यह सरकार बनती तो जिन्ना और मुसलमान लाभ में रहते किंतु जिन्ना को ‘लाभ’ नहीं ‘पाकिस्तान‘ चाहिए था।

जिन्ना और गांधीजी का मतभेद केवल एक बिंदु पर रहता था। जिन्ना कहता था कि मुस्लिम लीग ही एकमात्र वह संस्था है जो मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कर सकती है जबकि गांधीजी का कहना था कि कांग्रेस हिन्दू और मुसलमान दोनों का प्रतिनिधित्व करती है।

केवल इसी विवाद के कारण कांग्रेस और मुस्लिम लीग में कभी कोई समझौता नहीं हो पाया, यदि हुआ भी तो शीघ्र ही इसी बिंदु पर आकर भंग हो गया। शिमला सम्मेलन में भी यही सब दोहराया गया। शिमला सम्मेलन विफल होने के बाद लॉर्ड वैवेल को भारतीय राजनीति में असफल माना जाने लगा।

21 नवम्बर 1945 को जिन्ना ने पेशावर में दिए एक भाषण में, मुस्लिम लीग द्वारा भारतीय प्रतिनिधियों की अस्थाई सरकार न बनने देने के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण देते हुए कहा-

‘एक अच्छा सेना संचालक उस समय तक आक्रमण करने का आदेश नहीं देता जब तक उसे विजय का विश्वास न हो अथवा उसे सम्मानपूर्ण पराजय का विश्वास तो निश्चित तौर पर होना ही चाहिए।’

…… भारत में एक राज्य बने रहने के सुझाव को जिन्ना मुसलमानों की दासता का सुझाव कहता था।

भारत में साम्प्रदायिक दंगों की लहर

जब क्रिप्स मिशन असफल हो गया, राजगोपालाचारी फार्मूले की हवा निकल गई, भारतीयों की अस्थाई सरकार का गठन नहीं हो सका और पाकिस्तान की मांग एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकी तो मुस्लिम लीग हिंसा पर उतर आई। वर्ष 1946 का प्रारम्भ साम्प्रदायिक दंगों के साथ ही हुआ और वर्ष के अंत तक पूरा देश दंगामय हो गया। दंगों की शुरुआत अलीगढ़ से हुई और उसका विशाल रूप बंगाल, बिहार और पंजाब ने ले लिया।

जनवरी 1946 में देश में प्रांतीय विधानसभाओं के लिए चुनाव हुए जिनमें मिली विजय के बाद सिंध एवं बंगाल में मुस्लिम लीग ने सरकार बनाई। इसके बाद इन दोनों ही प्रांतों में हिन्दुओं को भगाने का काम आरम्भ हो गया। इन प्रांतों में हिन्दुओं के समक्ष तीन ही विकल्प थे या तो वे इस्लाम स्वीकार कर लें या मर जाएं या प्रांत छोड़कर भाग जाएं।

केन्दीय शासन से कोई मदद नहीं मिली, इस कारण हिन्दुओं का धर्मांतरण, इस्लाम स्वीकार न करने पर उनका कत्ल, उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार तथा उनकी सम्पत्ति को लूटने का कार्य बंगाल के प्रधानमंत्री सुहरावर्दी के शासन में चल रहा था।

इन जघन्य हत्याओं के प्रति जिन्ना और सुहरावर्दी मूक बने रहे। इस कारण असहाय हिन्दू बिहार आदि प्रांतों में भाग आए। हिन्दुओं में इसकी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी इसलिए हिन्दू महासभा की प्रेरणा से महाराष्ट्र में हिन्दू राष्ट्र सेना का गठन हुआ और महाराष्ट्र में ही रामसेना एवं बजरंग सेना आदि की भी स्थापना हुई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैबीनेट मिशन

0
नेहरू लियाकत अली पैक्ट

कैबीनेट मिशन का भारत आगमन

क्रिप्स मिशन की असफलता से अंतर्राष्ट्रय स्तर पर ब्रिटेन की बहुत किरकिरी हुई। अमरीका सहित अनेक देशों ने इंगलैण्ड पर आरोप लगाया कि वह भारत को स्वतंत्र नहीं करना चाहता इसलिए क्रिप्स मिशन को जानबूझ कर विफल किया गया। इस दाग को धोने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कैबीनेट मिशन को भारत भेजा ताकि भारत को आजादी दी जा सके।

भारत में सैनिक विद्रोह

18 अगस्त 1945 को सुभाषचंद्र बोस की एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उसके बाद अंग्रेजों ने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को पकड़ कर फांसी पर लटकाना आरम्भ कर दिया। कांग्रेस अब तक आजाद हिन्द फौज को अपने शत्रु के रूप में देखती रही थी। उसने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखायी। भारतीय सिपाहियों को यह बात बहुत बुरी लगी। उन्होंने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों से सहानुभूति दिखाते हुए सशस्त्र विद्रोह कर दिया।

कैसे बना था पाकिस्तान - bharatkaitihas.com
To Purchase This Book Please Click On Image.

20 जनवरी 1946 को बम्बई, लाहौर तथा दिल्ली के वायु सैनिक, हड़ताल पर चले गए। 19 फरवरी 1946 को जल सेना में भी हड़ताल हो गई। हड़तालियों ने आजाद हिंद फौज के बिल्ले धारण किए। कराची, कलकत्ता और मद्रास के नौ-सैनिक भी हड़ताल पर चले गए। अंग्रेज सैन्य अधिकारियों ने इस हड़ताल को बंदूक से कुचलना चाहा। इस कारण दोनों तरफ से गोलियां चलीं। ठीक इसी समय जबलपुर में भारतीय सिगनल कोर में भी 300 जवान हड़ताल पर चले गए। इन हड़तालों से अंग्रेज सरकार थर्रा उठी।

मुस्लिम लीग द्वारा की जा रही मार-काट एवं भारतीय सेनाओं में हो रहे विद्रोहों के बाद इंग्लैण्ड की गोरी सरकार को समझ में आने लगा कि अब एक भी दिन की देरी किए बिना भारत को आजादी देनी होगी चाहे कांग्रेस, मुस्लिम लीग, दलित पक्ष एवं भारतीय-राजाओं द्वारा कितने ही अड़ंगे क्यों न लगाए जाएं। इंग्लैण्ड की सरकार ने भारत को शीघ्र से शीघ्र आजादी देने के लिए उच्चस्तरीय मंत्रिमंडल मिशन भेजने की घोषणा की।

कैबीनेट मिशन का भारत आगमन

15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की कि ग्रेट-ब्रिटेन की लेबर सरकार, ब्रिटेन और हिन्दुस्तान तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के गतिरोध को समाप्त करने का प्रयास करने के लिए एक कैबीनेट मिशन भारत भेज रही है।

उन्होंने कहा- ‘मुझे आशा है कि ब्रिटिश-भारत तथा रियासती-भारत के राजनीतिक एक महान नीति के तहत, इन दो भिन्न प्रकार के अलग-अलग भागों को साथ-साथ लाने की समस्या का समाधान निकाल लेंगे। हमें देखना है कि ‘भारतीय राज्य’ अपना उचित स्थान पायें। मैं एक क्षण के लिए भी इस बात पर विश्वास नहीं करता कि भारतीय राजा भारत के आगे बढ़ने के कार्य में बाधा बनने की इच्छा रखेंगे अपितु जैसा कि अन्य समस्याओं के मामले में हुआ है, भारतीय इस समस्या को भी स्वयं सुलझायेंगे।’

इंग्लैण्ड की सरकार द्वारा इस कमीशन (आयोग) में तीन कैबीनेट मंत्री रखे गए- (1) भारत सचिव लॉर्ड पैथिक लारेन्स, (2) व्यापार मंडल के अध्यक्ष सर स्टैफर्ड क्रिप्स और (3) फर्स्ट लॉर्ड आफ द एडमिरेल्टी ए. वी. अलैक्जेंडर। इस कमीशन को ‘कैबीनेट मिशन’ भी कहा जाता है। 24 मार्च 1946 को यह आयोग भारत पहुंच गया।

इसके साथ ही प्रधानमंत्री एटली ने भारत के वायसराय लॉर्ड वैवेल के नाम एक तार भेजा जिसमें लिखा था- ‘लेबर गवर्नमेंट वायसराय को नजर-अंदाज नहीं करना चाहती किंतु यह अनुभव करती है कि ऐसा दल जो वहीं फैसला कर सके, समझौते की बातचीत को काफी सहारा देगा और हिंदुस्तानियों को यह विश्वास दिलाएगा कि इस बार हम इसे कर दिखाना चाहते हैं।’

इस मिशन के आगमन से राजनीतिक विभाग ने समझ लिया कि अब राज्यों को नये ढांचे में समाहित करने की शीघ्रता करने का समय आ गया है। 25 मार्च को एक प्रेस वार्त्ता के दौरान लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा- ‘हम इस आशा से भारत में आये हैं कि भारतीय एक ऐसे तंत्र का निर्माण कर सकें जो सम्पूर्ण भारत के लिए एक संवैधानिक संरचना का निर्माण कर सके।’

उनसे पूछा गया कि राज्यों का प्रतिनिधित्व राजाओं के प्रतिनिधि करेंगे या जनता के प्रतिनिधि? इस पर पैथिक लॉरेंस ने जवाब दिया कि- ‘हम जैसी स्थिति होगी वैसी ही बनी रहने देंगे। नवीन संरचनाओं का निर्माण नहीं करेंगे। ‘

2 अप्रेल 1946 को कैबीनेट मिशन तथा वायसराय के साथ हुई बैठक में नरेन्द्र मण्डल के चांसलर भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ ने देशी राज्यों के लिए भारत एवं पाकिस्तान से अलग देश की मांग की। उसने कहा कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर देशी-राज्यों तथा ब्रिटिश-भारत के प्रांतों का एक प्रिवी कौंसिल बनाया जाना चाहिये। जब भारत में दो देशों (भारत एवं पाकिस्तान) का निर्माण हो सकता है तब तीसरे भारत को मान्यता क्यों नहीं दी जा सकती जो देशी-राज्यों से मिलकर बना हो?

कोई भी भारतीय राजा, भारत सरकार अधिनियम 1935 में दी गई संवैधानिक संरचना को स्वीकार नहीं करना चाहता। परमोच्चता भारत सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये। कैबीनेट मिशन के सदस्य सर स्टैफर्ड क्रिप्स का मानना था कि यदि देशी राजाओं को भारतीय संघ से अलग रहने की स्वीकृति दी जाती है तो इससे भौगोलिक समस्याएं पैदा होंगी।

उसी संध्या को कैबीनेट मिशन ने नरेन्द्र मण्डल की स्थाई समिति के प्रतिनिधियों से बात की जिनमें भोपाल, पटियाला, ग्वालियर, बीकानेर तथा नवानगर के शासक सम्मिलित थे। इस बैठक में लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि यदि ब्रिटिश-भारत स्वतंत्र हो जाता है तो परमोच्चता समाप्त हो जाएगी तथा ब्रिटिश सरकार भारत में आंतरिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सैनिक टुकड़ियां नहीं रखेगी। राज्यों को संधि दायित्वों से मुक्त कर दिया जाएगा क्योंकि ब्रिटिश क्राउन संधि दायित्वों के निर्वहन में असक्षम हो जाएगा।

अंग्रेजों को स्वाभाविक तौर पर भारतीय राज्यों के साथ लम्बे समय से चले आ रहे सम्बन्धों को बनाए रखने में रुचि थी किंतु ये सम्बन्ध नवीन भारत में राज्यों की स्थिति पर निर्भर होने थे। यदि राज्य अपनी प्रभुसत्ता का समर्पण आजादी के समय बनने वाले भारतीय संघ को करते हैं तो ये सम्बन्ध केवल भारतीय-संघ के माध्यम से ही हो सकते थे। कैबीनेट मिशन भारत को आजादी देने का सर्वसम्मत फार्मूला ढूंढने के लिए कांग्रेस, मुस्लिम लीग एवं भारतीय राजाओं के संघ ‘नरेन्द्र मण्डल’ से वार्ता कर रहा था। इस वार्तालाप से राजाओं की समझ में आ गया कि अब अंग्रेज देश में नहीं रहेंगे।

इसलिए अंग्रेजों की कृपाकांक्षा प्राप्त करने के बजाय इस बात पर ध्यान लगाना चाहिए कि कहीं भविष्य में बनने वाला आजाद भारत राजाओं के राज्यों को न निगल जाए। दूसरी तरफ छोटे राजा इस बात को लेकर आशंकित थे कि कहीं बड़े राजा ही उन्हें न निगल जाएं। रियासती-भारत में अजीब सी बेचैनी और कई तरफा घमासान मचने लगा था। राजाओं और उनके प्रतिनिधियों से निबटने के बाद कैबीनेट मिशन ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से भी बात की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अलीगढ़ में साम्प्रदायिक दंगे

0

जब मुहम्मद अली जिन्ना ने देखा कि गांधीजी हिन्दुओं के साथ-साथ मुसलमानों के भी नेता बने रहना चाहते हैं तथा किसी भी कीमत पर मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं देना चाहते हैं तो जिन्ना ने देश में साम्प्रदायिक दंगे करने की नीति अपनाई। इस दिशा में पहले प्रयोग के रूप में अलीगढ़ में साम्प्रदायिक दंगे करवाए गए।

जिस समय कैबीनेट मिशन भारत में था, उस पर मानसिक दबाव बनाने के लिए 29 मार्च 1946 को अलीगढ़ में दंगों से शुरुआत की गई। भारत सरकार के होम डिपार्टमेंट की गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार यह दंगा 29 मार्च 1946 को उस समय शुरु हुआ जब अलीगढ़ विश्वविद्यालय के मुस्लिम विद्यार्थियों एवं एक हिन्दू कपड़े के व्यापारी के बीच आपसी झड़पें हुईं। इस दंगे में 17 लोग घायल हुए जिनमें से एक की मौत हो गई। दुकानों के जलने से 5 से 10 लाख रुपए की सम्पत्ति नष्ट होने का अनुमान था।

मुस्लिम लीग का दिल्ली अधिवेशन

कैसे बना था पाकिस्तान - bharatkaitihas.com
To Purchase This Book Please Click On Image.

जिस समय कैबीनेट मिशन भारत में विभिन्न पक्षों से बात कर रहा था, उसी दौरान अप्रेल 1946 के प्रारम्भ में नई दिल्ली में मुस्लिम लीग के विधान सभा सदस्यों ने एक अधिवेशन आयोजित किया। इसमें लीग के नेताओं ने कैबीनेट मिशन के सदस्यों पर दबाव बनाने के लिए भड़काऊ भाषण दिए।

जिन्ना ने हर संभव तरीके से विरोध करने की धमकी दी। उसने कहा- ‘यदि कोई भी अंतरिम व्यवस्था मुसलमानों पर थोपी गई तो मैं स्वयं को किसी भी खतरे, परीक्षा या बलिदान जो भी मेरे से मांगा जा सकता है, को झेलने के लिए शपथ लेता हूँ।’

अधिवेशन में सभी मुस्लिम सदस्यों द्वारा पढ़े जाने के लिए एक प्रतिज्ञा तैयार की गई जिसमें कहा गया– ‘मैं अपने आप को मेरे से जो भी बलिदान, परीक्षा या खतरा उठाने हेतु कहा जाएगा, झेलने की शपथ लेता हूँ।’

पंजाबी नेता फिरोज खाँ नून ने कहा- ‘जो विनाश मुस्लिम करेंगे, उससे चंगेज खां और हलाकू ने जो किया, उसे भी शर्म आ जाएगी।’

उसने यह भी कहा कि यदि ब्रिटेन अथवा हिन्दुओं ने पाकिस्तान नहीं दिया तो रूस यह कार्य करेगा। बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने कहा- ‘यदि हिन्दू सम्मान और शांति से रहना चाहते हैं तो कांग्रेस को पाकिस्तान की स्वीकृति देनी चाहिए।’

सीमांत नेता कयूम खाँ ने घोषणा की- ‘मुसलमानों के पास सिवाय तलवार निकालने के और कोई मार्ग नहीं बचेगा।’

बंगाल लीग के जनरल सैक्रेटरी अब्दुल हाशिम ने कहा- ‘जहाँ न्याय और समता असफल हो, चमचमाता इस्पात मसले को तय करेगा।’

पंजाब के शौकत हयात खाँ ने कहा- ‘मेरे प्रांत की लड़ाकू जाति केवल एक उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा कर रही है। आप हमें केवल एक अवसर दीजिए और हम नमूना पेश कर देंगे जबकि ब्रिटिश सेना अभी भी मौजूद है।’

मुस्लिम लीग का आक्रोश मुख्य रूप में अंग्रेज सरकार पर बरसा जिस पर ब्रिटिश मजदूर दल का नियंत्रण था। उसने प्रारम्भिक वर्षों में लीग की अपेक्षा कांग्रेस के प्रति अधिक सहानुभूति का प्रदर्शन किया था।

मुस्लिम लीग के इस रवैये पर कड़ी प्रतिक्रिया करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की कि- ‘पृथ्वी पर कोई भी ताकत यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ भी पाकिस्तान को अस्तित्व में नहीं ला सकती जैसा कि जिन्ना चाहते हैं।’

पटेल ने मुसलमानों से कहा कि- ‘मुसलमानों एवं हिन्दुओं के मध्य गृहयुद्ध की कीमत पर ही उन्हें पाकिस्तान मिल सकता है।’

शिमला में त्रिदलीय सम्मेलन

5 मई 1946 को सरकार ने शिमला में त्रिदलीय सम्मेलन बुलाया। इसमें कैबीनेट मिशन द्वारा प्रस्तावित किया गया कि भारत में एक केन्द्र सरकार का गठन किया जाएगा जिसके पास विदेशी मामले, रक्षा एवं संचार मामले रहेंगे। प्रांतों का समूहीकरण होगा जो अन्य मामलों को निबटाएगा और शेष अधिकार भी उन्हीं के पास रहेंगे।

इस सम्मेलन में कांग्रेस ने एक शक्ति सम्पन्न केन्द्र के निर्माण पर जोर दिया तथा मांग की कि प्रस्तावित भारतीय संघ, कैबीनेट मिशन द्वारा सुझाए गए तीन विषयों के अतिरिक्त मुद्रा, कस्टम और ऐसे विषयों को देखे जो उसके अनुकूल हों। संघ को आवश्यकतानुसार आय वसूल करने तथा संविधान के विफल होने की स्थिति में या संकटकाल में आवश्यकतानुसार कार्यवाही करने में सक्षम होना चाहिए।

कांग्रेस के इस प्रस्ताव में ई.1928 के नेहरू कमेटी के प्रस्तावों को ही दोहराया गया था। दूसरी ओर मुस्लिम लीग शक्तिशाली मुस्लिम प्रांतों के समूहों का संगठन चाहती थी जो पाकिस्तान का जन्मदाता बन सके और संघीय सरकार की शक्ति को क्षीण करके न्यूनतम स्तर पर रख सके।

इस प्रकार इस शिमला सम्मेलन में भी कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच का विरोध ज्यों का त्यों बना रहा तथा कांग्रेस द्वारा मुसलमानों के लिए अलग देश बनाने का विरोध और मुस्लिम लीग के लिए अलग देश बनाने की आवश्यकता ज्यों की त्यों बनी रही। इसलिए कैबीनेट मिशन ने अपनी ओर से प्रस्ताव घोषित करने का निर्णय लिया।

मुहम्मद अली जिन्ना अलीगढ़ में साम्प्रदायिक दंगे करवाकर अंग्रेजों की मंशा एवं हिन्दुओं की ताकत को परख चुका था। इसलिए उसने अलीगढ़ के प्रयोग को बंगाल में दोहराने का निश्चय किया जिसकी भयानक तस्वीर शीघ्र ही देश के सामने आने वाली थी।

अलीगढ़ में साम्प्रदायिक दंगे के सफल प्रयोग की पुनरावृत्ति न केवल बंगाल में की जानी थी अपितु पंजाब में भी की जानी थी। बंगाल का भद्रलोक और पंजाब के सिक्ख दोनों ही मुसलमानों की इस हिंसक ज्वाला का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे। अतः शीघ्र ही दोनों प्रांत हिंसा की आग में जल उठे। इन दृश्यों को देखकर अंग्रेज दोनों हाथों से तालिया बजा रहे थे।

भारत साम्प्रदायिक दंगों की आग में जलने के कगार पर था किंतु गांधीजी अब भी झुकने को तैयार नहीं थे। वे खुलेआम कहते हुए घूम रहे थे कि भले ही पूरा भारत अग्नि की ज्वाला में जल जाए, मैं मुसलमान भाइयों को स्वयं से अलग नहीं होने दूंगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैबीनेट मिशन प्लान – संयुक्त भारत योजना

0

1945 में इंग्लैण्ड की गोरी सरकार ने भारत को स्वतंत्रता देने की योजना बनाने के लिए कैबीनेट मिशन को भारत भेजा था। इस मिशन ने भारतीयों के समक्ष भारत को आजादी देने तथा भारत का विभाजन करने की जो योजना प्रस्तुत की, उसे कैबीनेट मिशन प्लान कहते हैं। इस प्लान में लगभग वही प्रावधान थे, जो इंग्लैण्ड की सरकार द्वारा बहुत पहले से बताए जा रहे थे।

16 मई 1946 को कैबीनेट मिशन ने अपनी योजना प्रकाशित की। इसे ‘कैबीनेट मिशन प्लान’ तथा ‘संयुक्त भारत योजना’ भी कहते हैं। इसके द्वारा भविष्य में बनने वाले भारत संघ के लिए संघीय संविधान का निर्माण किया जाना प्रस्तावित किया गया जिसके तहत भावी भारत संघ की व्यवस्था की जानी थी। प्रस्तावित संघ में सरकार के तीनों अंग- विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका रखे जाने थे।

कैसे बना था पाकिस्तान - bharatkaitihas.com
To Purchase This Book Please Click On Image.

संघ में ब्रिटिश-भारत के 11 प्रांत और समस्त 565 देशी रियासतें शामिल होनी थीं। केन्द्रीय सरकार का अधिकार क्षेत्र रक्षा, वैदेशिक मामले और संचार तक सीमित होना था। शेष सभी विषय और अधिकार रियासतों के पास रहने थे। विधान निर्मात्री परिषद में रियासतों के प्रतिनिधियों की संख्या 93 से अधिक नहीं होनी थी जो बातचीत के द्वारा तय की जानी थी। साम्प्रदायिक प्रश्न उस सम्प्रदाय के सदस्यों द्वारा ही निर्धारित किया जाना था। शेष विषयों पर राज्यों का अधिकार होना था।

कैबीनेट मिशन प्लान में ब्रिटिश-प्रांतों को ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ समूहों अथवा श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव था। पहले अर्थात् ‘ए’ समूह में हिन्दू बहुसंख्यक प्रांत- मद्रास, बम्बई, मध्य-प्रांत व बरार, संयुक्त प्रांत, एवं बिहार थे। दूसरे अर्थात् ‘बी’ समूह में पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत थे जहाँ मुसलमानों का बहुमत था। तीसरे अर्थात् ‘सी’ समूह में बंगाल और असम थे जहाँ मुसलमानों का हल्का बहुमत था।

ये तीनों ही संविभाग अपने समूह के लिए संविधान बनाने के अधिकारी थे। यह प्रावधान भी किया गया था कि ये प्रांत आपस में मिलकर गुट बना सकेंगे। इस योजना के तहत की गई व्यवस्था की प्रत्येक 10 वर्षों के बाद समीक्षा करने का प्रावधान किया गया। राज्यों के सम्बन्ध में कैबीनेट मिशन ने कहा कि ब्रिटिश-भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही, ब्रिटिश ताज और देशी राज्यों के विद्यमान सम्बन्ध समाप्त हो जाएंगे।

ब्रिटिश सरकार न तो अपने हाथ में सर्वोच्च सत्ता रखेगी न ही उसे नई सरकार को हस्तांतरित करेगी। राज्यों को उनके अधिकार वापिस कर दिए जाएंगे। अतः देशी राज्यों को चाहिए कि वे अपने भविष्य की स्थिति उत्तराधिकारी भारतीय सरकार से बातचीत करके व्यवस्थित करें। अर्थात् रजवाड़े अपनी शर्तों पर भारतीय संघ में शामिल हो सकते थे या भारत से बाहर रह सकते थे। कैबीनेट मिशन का विचार था कि यदि ‘एक-सत्तात्मक-भारत’ बना तो रजवाड़े शक्तिशाली तीसरी शक्ति बन जाएंगे।

17 मई 1946 को नवाब भोपाल ने लॉर्ड वैवेल को एक पत्र लिखकर कैबीनेट मिशन से आश्वासान मांगा कि सांप्रदायिकता के प्रश्न पर राज्य अपनी शर्तों पर एक अथवा एक से अधिक समूह बना सकेंगे। राज्यों को यह अधिकार होगा कि वे प्रत्येक 10 वर्ष के अंतराल पर संघीय संविधान के पुनरीक्षण के लिए कह सकें।

संविधान सभा को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह राज्यों में सरकार के प्रकार अथवा शासक वंश के सम्बन्ध में किसी तरह का विचार-विमर्श करे या उसके ऊपर अपनी कोई अभिशंसा दे। संविधान सभा में राज्यों के सम्बन्ध में लिया गया निर्णय या अभिशंसा को लागू करने से पूर्व सम्बन्धित राज्यों द्वारा उसकी अभिपुष्टि की जानी आवश्यक होगी।

दुःखों से मुक्ति का बीज

इस प्रकार कैबीनेट मिशन ने स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्र भारत के केवल दो टुकड़े नहीं होंगे अपितु समूह ए, बी एवं सी के रूप में तीन टुकड़े तथा चौथा टुकड़ा देशी-राज्यों का भी होगा जो कि एक अथवा उससे अधिक यहाँ तक कि पांच सौ पैंसठ तक हो सकता था। भारतीय नेताओं के अनुसार कैबीनेट मिशन द्वारा घोषित प्रांतों के समूहीकरण की योजना भारतीय संघ की एकता एवं अखंडता के लिए अत्यधिक घातक और खतरनाक प्रमाणित हो सकती थी।

इस घोषणा ने देशी शासकों को भविष्य में बनने वाली अंतरिम सरकार के साथ समानता का दर्जा दे दिया था। कांग्रेस इस स्थिति से अप्रसन्न थी तथा पहले ही कह चुकी थी कि कैबीनेट मिशन योजना ने केंद्र को केवल रक्षा, विदेश एवं संचार के अधिकारों से युक्त एक कमजोर केंद्र की प्रस्तावना की है। देश को ए, बी एवं सी समूहों में बांटकर, मुस्लिम लीग द्वारा निर्धारित की गई सीमाओं वाले पाकिस्तान की अवधारणा को पुष्ट किया गया है।

कांग्रेस का मानना था कि प्रांतों के समूहीकरण में प्रांतों को छूट रहेगी कि वे अपने लिए उपयुक्त समूह का चुनाव करें अथवा समूह से बाहर रह सकें जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि प्रांतों को उनके लिए निर्धारित समूह में शामिल होना आवश्यक होगा।

कैबीनेट योजना के प्रस्तावों पर गांधीजी का कहना था कि- ‘दुःख-दर्द से भरे इस देश को अभाव और दुःख से मुक्त करने का यह बीज है। वर्तमान परिस्थिति में इससे अच्छा वे कुछ नहीं कर सकते थे।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैबीनेट मिशन कम्पलीट

0

ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मंत्रियों के दल अर्थात् कैबीनेट मिशन ने जब भारत की आजादी एवं विभाजन की योजना प्रकाशित कर दी तो कैबीनेट मिशन कम्पलीट हो गया। मिशन ने इस आशा के साथ भारत छोड़ दिया कि अब भारत के लोग आगे का मार्ग स्वयं ढूंढ लेंगे। हमेशा की तरह न्याय करने की आड़ में, गोरी सरकार ने भरपूर अन्याय किया था। वे भारत को एक देश न मानकर सैंकड़ों देशों का झुण्ड मानते थे, कैबीनेट मिशन प्लान में भी यही विचार आगे बढ़ाया गया था।

16 मई 1946 की कैबीनेट मिशन योजना यद्यपि एक अभिशंषा के रूप में प्रस्तुत की गई थी किंतु फिर भी यह किसी पंच-निर्णय से कम नहीं थी। योजना के प्रकाशन के साथ ही भारत में कैबीनेट मिशन का काम पूरा हो चुका था और अब उसे इंग्लैण्ड लौट जाना था।

मिशन ने भारत छोड़ने से पहले भारतीय समाचार पत्रों को एक वक्तव्य दिया- ‘कैबीनेट प्रस्ताव भारतीयों को शीघ्रातिशीघ्र आजादी देने का एक मार्ग है जिसमें आंतरिक उपद्रव एवं झगड़े की संभावनाएं न्यूनतम हैं।’

29 जून 1946 को कैबीनेट मिशन ने इस आशा के साथ भारत छोड़ दिया कि और कुछ नहीं तो कम से कम संविधान सभा का गठन तो होगा ही। क्रिप्स तथा पैथिक लॉरेंस ने ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि- ‘मिशन अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल रहा।’

कांग्रेस की हाँ …..!

यद्यपि कैबीनेट योजना कांग्रेस की इच्छा के अनुसार नहीं थी तथापि जवाहरलाल नेहरू को विश्वास था कि कैबीनेट योजना में प्रस्तावित प्रांतों का कोई समूह बनेगा ही नहीं। क्योंकि संविभाग ‘ए’ के सभी और ‘बी’ तथा ‘सी’ के कुछ राज्य समूहीकरण के विरुद्ध रहेंगे। नेहरू का सोचना बिल्कुल सही था क्योंकि पंजाब और बंगाल के हिन्दू इस योजना को स्वीकार करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार सकते थे। इसलिए नेहरू ने 6-7 जुलाई 1946 को कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में कैबीनेट योजना को स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा जो 51 के मुकाबले 205 मतों से स्वीकृत हो गया। इस प्रकार कांग्रेस ने कैबीनेट योजना स्वीकार कर ली।

देशी राजाओं की हाँ …..!

कैबीनेट मिशन के माध्यम से राजओं की मुँहमांगी मुराद पूरी होने जा रही थी और वे एक बार फिर से ई.1817-18 से पहले की स्थिति में अर्थात् पूर्ण स्वतंत्र राज्य होने जा रहे थे। इसलिए 17 जुलाई 1946 को आयोजित नरेन्द्र मण्डल के सम्मेलन में राजाओं ने अपने मुँह में आ रहे पानी को छुपाते हुए स्वयं को देशभक्त प्रदर्शित करने का अवसर हाथ से नहीं जाने दिया और घोषणा की कि नरेन्द्र मण्डल देश की इस इच्छा से पूर्ण सहमति रखता है कि भारत को तत्काल राजनीतिक महिमा प्राप्त हो। राजाओं की इच्छा, संवैधानिक समस्याओं के निस्तारण के कार्य में प्रत्येक संभावित योगदान देने की है।

मुहम्मद अली जिन्ना की हाँ …..!

कैसे बना था पाकिस्तान - bharatkaitihas.com
To Purchase This Book Please Click On Image.

कैबीनेट मिशन योजना में सीधे-सीधे पाकिस्तान की मांग को स्वीकार नहीं किया गया था किंतु प्रांतीय विधान सभाओं में हिन्दु-बहुमत, मुस्लिम बहुमत तथा मुस्लिमों के हल्के बहुमत के आधार पर ‘ए’, ‘बी’ एवं ‘सी’ समूहों के निर्माण की बात कही गई थी जो अपने-अपने लिए अलग संविधान बना सकते थे। जिन्ना को इस समूहीकरण योजना में भविष्य में पाकिस्तान के निर्माण की आशा दिखाई दे रही थी। इसलिए उसने सीधे-सीधे पाकिस्तान न मिलने पर भी इस योजना को स्वीकार करने का निर्णय लिया। कैबीनेट मिशन योजना पर विचार करने के लिए बुलाई गई

मुस्लिम लीग की बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि- ‘पूर्ण सार्वभौम पाकिस्तान के लक्ष्य की प्राप्ति भारत के मुसलमानों का अपरिवर्तनीय उद्देश्य अब भी बना हुआ है, इसलिए हम इसके दीर्घकालीन और अंतरिम दोनों भागों को स्वीकार करते हैं क्योंकि मिशन की योजना में पाकिस्तान का आधार निहित है। ‘

इस प्रकार जिन्ना कैबीनेट मिशन के जाल में फँस गया और भारत की आजादी का रास्ता साफ होता हुआ दिखाई देने लगा। जो जिन्ना पिछले पंद्रह साल से इस ध्येय के लिए भारतीय जनता का खून और मुस्लिम लीगी नेताओं का पसीना बहाता रहा था कि अंग्रेज भारत को आजाद करने से पहले उसके टुकड़े करें, वही जिन्ना भारत के टुकड़े हुए बिना ही अंग्रेजों को भारत से जाने की अनुमति दे रहा था।

राजनीति के कुछ पन्ने पढ़ा हुआ साधारण व्यक्ति भी अनुमान लगा सकता था कि अपने इस निर्णय के लिए जिन्ना शीघ्र ही पश्चाताप की भयानक अग्नि में झुलसने वाला था।

जहाँ एक ओर इंग्लैण्ड की गोरी सरकार दावा कर रही थी कि कैबीनेट मिशन कम्पलीट हो गया है, वहीं वास्तविकता यह थी कि कैबीनेट मिशन कम्पलीट नहीं हुआ था। असली लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी था। यही कारण था कि वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लंदन की सरकार को दो साल तक और पसीना बहाना पड़ा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मौलाना अबुल कलाम आजाद

0

मौलाना अबुल कलाम आजाद द्वारा जिन्ना और प्रस्तावित पाकिस्तान का विरोध

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी पुस्तक इण्डिया विन्स फ्रीडम में अनेक स्थानों पर पाकिस्तान निर्माण के सिद्धांत के विरोध में अपने विचार प्रकट किए हैं। उनका जन्म 1988 में मक्का में हुआ था। वे अरबी, उर्दू, हिन्दी, संस्कृत, और अंग्रेजी के प्रसिद्ध विद्वान थे। उनकी शिक्षा काहिरा के अल अजहर में हुई थी।

मौलाना अपने समय के सर्वाधिक बुद्धिमान मुस्लिम नेताओं में गिने जाते थे। वे जिन्ना के पाकिस्तान में नहीं, अपितु गांधीजी के भारत में रहना चाहते थे। वे भारत के मुसलमानों को भावी पाकिस्तान के सीमित संसाधनों की बजाय विशाल भारत के समस्त प्राकृतिक संसाधनों को भोगते हुए देखना चाहते थे। वे जानते थे कि किस रोटी पर मक्खन अधिक लगा हुआ है!

कैसे बना था पाकिस्तान - bharatkaitihas.com
To Purchase This Book Please Click On Image.

एक स्थान पर वे लिखते हैं- ‘मुस्लिम लीग की पाकिस्तान वाली योजना पर मैंने हर दृष्टि से सोचा-विचारा है। हिन्दुस्तानी की हैसियत से देश की पूरी इकाई पर भविष्य में क्या असर पड़ेगा, इस पर गौर किया है। मुसलमान की हैसियत से, हिन्दुस्तान के मुसलमानों की किस्मत पर इसका क्या असर पड़ सकता है, इसका अन्दाजा लगाया है। इस येाजना के सभी पहलुओं पर गौर करने पर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि यह न सिर्फ पूरे हिन्दुस्तान के लिए नुक्सान-देय है बल्कि मुसलमानों के लिए खास तौर पर है और दरअसल इससे तो जो मसले सुलझते हैं उससे कहीं ज्यादा पैदा होते हैं।’

मुहम्मद अली जिन्ना जब भी कांग्रेस के किसी मुस्लिम प्रतिनिधि को किसी भी सरकारी समिति में सदस्य या सरकार में मंत्री बनाए जाने का विरोध करता था तो उसका सीधा असर मौलाना अबुल कलाम आजाद पर पड़ता था। क्योंकि वे कांग्रेस के मुस्लिम सदस्य थे और जिन्ना किसी भी मुसलमान को इस शर्त पर सरकार में शामिल होने दे सकता था जब वह कांग्रेस का न होकर मुस्लिम लीग का सदस्य हो। इसलिए मौलाना अबुल कलाम आजाद सदैव जिन्ना के विरोधी रहे। मौलाना ने जिन्ना द्वारा मांगे जा रहे मुसलमानों के भावी अलग देश के ‘पाकिस्तान’ नाम का विरोध किया।

15 अप्रेल 1946 को उन्होंने एक वक्तव्य प्रकाशित करवाया जिसमें कहा गया-

‘यह नाम मेरी तबियत के खिलाफ है। इसका आशय है कि दुनिया का कुछ हिस्सा पाक है और बाकी नापाक। इस तरह दुनिया को पाक और नापाक हिस्सों में बांटना इस्लाम की रूह को गलत साबित करना है। इस्लाम में ऐसे बंटवारे की कोई गुंजाइश नहीं क्योंकि हजरत मुहम्मद ने कहा है- खुदा ने मेरे लिए सारी दुनिया ही मस्जिद बनाई है।

इसके अलावा पाकिस्तान की योजना मुझे पराजय का प्रतीक मालूम होती है जो यहूदियों की मांग के नमूने पर तैयार की गई है। यह तो मान लेना है कि पूरे हिन्दुस्तान की इकाई में मुसलमान अपने पैरों पर टिक नहीं सकेंगे इसलिए एक सुरक्षित कोने में सिमटकर उन्हें तसल्ली मिल जाएगी। यहूदियों की एक राष्ट्रीय आवास की मांग के साथ सहानुभूति रखी जा सकती है क्योंकि वे सारी दुनिया में बिखरे पड़े हैं और कहीं के भी अनुशासन में वे अहम पार्ट अदा नहीं कर सकते लेकिन हिन्दुस्तान के मुसलमानों की हालत तो बिल्कुल दूसरी है।

उनकी संख्या लगभग 9 करोड़ है और हिन्दुस्तान की जिंदगी में उनकी तादाद और उनकी खूबियां इतनी अहम हैं कि अनुशासन और नीति के सभी सवालों पर बखूबी और पुरअसर तरीकों से अपना प्रभाव डाल सकते हैं। कुदरत ने कुछ इलाकों में उनको केन्द्रित कर उनकी मदद भी की है। ऐसी हालत में पाकिस्तान की कोई ताकत नहीं रह जाती। मुसलमान की हैसियत से कम से कम मैं तो पूरे मुल्क को अपना समझने का, इसकी सियासी और माली जिंदगी के फैसले में हिस्सा लेने का हक नहीं छोड़ सकता। मुझे तो जो हमारा बपौती हक है, उसे छोड़ना और उसके एक टुकड़े से तसल्ली करना कायरता का पक्का सबूत मालूम होता है। ‘

मौलाना ने एक फार्मूला तैयार किया तथा उसे कांग्रेस की वर्किंग कमेटी से मनवा भी लिया। इसमें पाकिस्तान की येाजना की सारी अच्छी बातें तो थीं किंतु उसकी खराबियों से बचा गया था। विशेषकर जनसंख्या की अदला-बदली से। आजाद के बहुत से हिन्दू साथियों ने तो नहीं लेकिन आजाद ने महसूस किया था कि मुसलमानों का एक बड़ा डर यह था कि यदि पूरे हिन्दुस्तान को आजादी मिली तो केन्द्र का हिन्दू-प्रधान-शासन अल्पसंख्यक-मुसलमानों पर दवाब डालेगा, दखल देगा, बंदरघुड़की देगा, आर्थिक दृष्टि से सतायेगा और राजनीतिक तौर पर कुचल देगा।

इस डर को दूर करने के लिए मौलाना की योजना थी कि दोनों पक्ष ऐसा हल मान लें जिसमें मुसलमानों के बहुमत वाले प्रदेश भीतरी मामलों में अपने विकास के लिए स्वतंत्र हों लेकिन साथ ही साथ जिन मामलों में पूरे देश का सवाल उठता हो, केन्द्र पर अपना प्रभाव डाल सकें।

मौलाना ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान की हालत ऐसी है कि केन्द्रीभूत और एकात्मक सरकार स्थापित करने का हर प्रयास असफल होकर ही रहेगा। इसी तरह हिन्दुस्तान को दो टुकड़ों में बांटने की कोशिश का भी वही परिणाम होगा। इस सवाल के सभी पहलुओं पर गौर करने क बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि इसका सिर्फ एक ही हल हो सकता है जो कांग्रेस फार्मूले में मौजूद है जिसमें प्रदेश और देश दोनों के विकास की संभावनाएं मौजूद हैं।

……. मैं उन लोगों में हूँ जो साम्प्रदायिक दंगों और कड़वाहटों के इस अध्याय को हिन्दुस्तान के जीवन में कुछ दिनों का दौर समझते हैं। मेरा पक्का विश्वास है कि जब हिन्दुस्तान अपने भाग्य की बागडोर स्वयं संभालेगा, तो यह खतरा समाप्त हो जाएगा।

मुझे ग्लैडस्टोन का एक कथन याद आता है- आदमी के मन से पानी का भय दूर करना है तो उस आदमी को पानी में फैंक दो। उसी तरह हिन्दुस्तान अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठा ले और अपना कार्य संभालने लगे तभी डर और संदेह का यह वातावरण पूरी तरह दूर होगा। जब हिन्दुस्तान अपना ऐतिहासिक लक्ष्य प्राप्त कर लेगा तो साम्प्रदायिक संदेह और विरोध का वर्तमान अध्याय भुला दिया जाएगा और आधुनिक जीवन की समस्याओं का वह आधुनिक ढंग से सामना करेगा।

भेद तो तब भी रहेंगे ही किंतु साम्प्रदायिक न होकर आर्थिक। राजनीतिक पार्टियों के बीच विरोध भी रहेगा किंतु वह धार्मिक न होकर आर्थिक और राजनीतिक होगा। भविष्य में गठबंधन और साझेदारी सम्प्रदाय के आधार पर नहीं, वर्ग के आधार पर होंगी और उसी तरह नीतियां निर्धारित होंगी। यदि यह दलील दी जाए कि यह सिर्फ मेरा विश्वास है जिसे भविष्य की घटनाएं गलत साबित कर देंगी तो मुझे यह कहना है कि नौ करोड़ मुसलमानों को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता और अपने भवितव्य को बचाने के लिए वे काफी ताकतवर हैं।’

इस प्रकार मौलाना कभी नहीं चाहते थे कि मुसलमानों का अलग देश बने। वे चाहते थे कि मुसलमान अपना भविष्य भारत में देखें। मौलाना द्वारा किए जा रहे विरोध के बावजूद कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों तेजी से पाकिस्तान की ओर बढ़ रहे थे। अंतर केवल इतना था कि कांग्रेस एक कमजोर पाकिस्तान के निर्माण की तरफ बढ़ रही थी ताकि उसे बनने से पहले ही नष्ट किया जा सके जबकि मुस्लिम लीग एक मजबूत पाकिस्तान तलाश रही थी, एक ऐसा पाकिस्तान जो युगों तक कायम रहे, भारत का प्रतिद्वंद्वी बनकर रहे और भारत का प्रत्येक मुसलमान उस पाकिस्तान का नागरिक हो।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैबीनेट प्लान की मृत्यु

0

कैबीनेट मिशन बड़ी आशा के साथ भारत आया था। मिशन के सदस्यों को उम्मीद थी कि उन्होंने भारत को आजाद करने का जो मार्ग दिखाया है, उसके लिए भारतवासी कैबीनेट मिशन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करेंगे किंतु मिशन के भारत की धरती छोड़ते ही भारत की राजनीति में सक्रिय विभिन्न तत्वों ने कैबीनेट मिशन प्लान को नकार दिया। इस कारण कैबीनेट प्लान की मृत्यु हो गई।

जिन्ना की ना ……!

10 जुलाई 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने एक प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों से कहा कि- ‘कांग्रेस पर समझौतों का कोई बंधन नहीं है और वह हर स्थिति का सामना करने के लिए उसी तरह तैयार है जैसे कि अब तक करती आई है…… ऐसी हालत में ख्याली पुलाव पकानेऔर सपने देखने से तो कोई फायदा होने वाला नहीं है।’

मुस्लिम लीग ने नेहरू के वक्तव्य का अर्थ यह लगाया कि एक बार सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद कांग्रेस इस योजना में संशोधन कर देगी। अतः जिन्ना ने 27 जुलाई को ही मुस्लिम लीग की बैठक बुलाई।

जिन्ना ने उन्हें बताया कि- ‘नेहरू कैबिनेट मिशन के समक्ष किए गए अपने वायदे से फिर गया है। इसलिए अब उन्हें नए हालात में उठाए जा सकने वाले कदमों के बारे में फैसला करना था।’

पहले लियाकत अली ने एक-एक प्रस्ताव ऊँची आवाज में पढ़ा और फिर उन पर चर्चा शुरू हुई जो दो दिन तक चलती रही।

सर फिरोज खान नून का आग्रह था- ‘बेहतर तो यह होगा कि हम अपनी गलती साफ तौर से कबूल करें जो हमने मिशन की योजना द्वारा तजवीज किए गए संघ को मान कर की है। हमें अपने पाकिस्तान के आदर्श की तरफ दोबारा लौट जाना चाहिए।’

मौलाना हसरत मोहानी जबरदस्त नारेबाजी के बीच उठे और लगभग चीखते हुए बोले- ‘अक्लमंदी इसी बात में है कि संवैधानिक प्रस्तावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया जाए। ….. हमें रोशनी का केवल एक ही मीरान रास्ता दिखा सकता है और वह है पूरी तरह संप्रभु पाकिस्तान का पृथक राज्य। सिर्फ कायद-ए-आजम के कहने की देर है, हिंदुस्तान के मुसलमान पल भर में बगावत का झंडा उठा लेंगे।’

दूसरे मौलानाओं, खानों और मुल्लाओं ने भी इसी तरह की बातें दोहराईं। राजा गजनफर अली ने वायदा किया- ‘अगर मिस्टर जिन्ना आवाज देंगे तो जिंदगी के हर हलके से मुलसममान आगे बढ़ कर पाकिस्तान हासिल करने के लिए संघर्ष में कूद पड़ेंगे।’

कौंसिल की राय सुनने के बाद जिन्ना और उनकी कार्यसमिति ने 29 जुलाई 1946 को दो पस्ताव पेश किए। पहले प्रस्ताव के जरिए लीग ने मिशन के मई प्रस्तावों को दी गई अपनी स्वीकृति वापस ले ली और दूसरे के माध्यम से आगे की जाने वाली सीधी कार्यवाही का रास्ता तय किया गया।

कैसे बना था पाकिस्तान - bharatkaitihas.com
To Purchase This Book Please Click On Image.

चूंकि मुस्लिम-भारत कोशिश कर-कर के थक चुका है, पर उसे समझौते और संवैधानिक तरीकों से भारतीय समस्या का शांतिपूर्ण समाधान करने में कामयाबी नहीं मिल पाई है, चूंकि कांग्रेस अंग्रेजों से साठ-गांठ करके भारत में ऊँची जाति के हिन्दुओं की हूकूमत कायम करने पर तुली हुई है, चूंकि हाल के घटनाक्रम में साबित हो गया है कि भारतीय मसलों का फैसला ताकत की राजनीति के दम पर होता है, न कि ईमानदारी और इंसाफ की बिनाह पर, चूंकि अब यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि भारत के मुसलमान अब आजाद और पूरी तरह से संप्रभु पाकिस्तान राज्य की स्थापना के बिना चैन से नहीं बैठेंगे

……. वक्त आ गया है कि मुसलमान-राष्ट्र पाकिस्तान हासिल करने के लिए सीधी कार्यवाही पर उतर कर अपने हकों की दावेदारी करें। अपने गौरव की रक्षा करें, अंग्रेजों की मौजूदा गुलामी और ऊँची जाति के हिन्दू-प्रभुत्व के अंदेशे से छुटकारा हासिल करें।

कैबीनेट प्लान की मृत्यु की घोषणा

दोनों प्रस्तावों के पारित हो जाने के बाद जिन्ना ने नतीजा निकाला- ‘हमने एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक फैसला लिया है। जब से मुस्लिम लीग बनी है, हमने संवैधानिक तरीकों और संवैधानिक वार्ता के अलावा कोई और कदम नहीं उठाया। आज कांग्रेस और ब्रिटेन की मिली-जुली चाल के कारण हम मजबूरन यह कदम उठाने जा रहे हैं। हम पर दो मोर्चों से हमला हो रहा है।

……. आज हमने संविधानों और संवैधानिक तौर-तरीकों को अपना आखिरी सलाम बोल दिया है। हम जिन दो पक्षों से समझौता वार्ता कर रहे थे, उन्होंने पूरी वार्ता के दौरान हम पर पिस्तौलें ताने रखीं। एक की पिस्तौल के पीछे सत्ता और मशीनगनें थीं और दूसरे की पिस्तौल के पीछे असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू कर देने की धमकी थी। हमें इस हालात का मुकाबला करना ही होगा। हमारे पास भी एक पिस्तौल है।’

इस प्रकार मुस्लिम लीग ने कैबीनेट मिशन योजना की अपनी स्वीकृति रद्द करके पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए सीधी कार्यवाही की घोषणा कर दी। इस घोषणा में कहा गया कि- ‘आज से हम वैधानिक तरीकों से अलग होते हैं।……. आज हमने अपने लिए एक अस्त्र तैयार किया है और उसके उपयोग की स्थिति में हैं। ‘

इस प्रकार कैबीनेट प्लान की मृत्यु की घोषणा कर दी गई तथा अब जिन्ना ने कैबीनेट प्लान के शव पर बैठकर भारत के हिन्दुओं का रक्त पीने की येजना बनाई जिनके सर्वमान्य नेता गांधीजी के कारण जिन्ना को पाकिस्तान नहीं मिल पा रहा था।

मुस्लिम लीग के साथ-साथ कुछ अन्य राजनीतिक तत्वों ने भी कैबीनेट योजना को अस्वीकार कर दिया। नेहरू के वक्तव्य पर मौलाना अबुल कलाम आजाद ने टिप्पणी की कि- ‘1946 की गलती बड़ी महंगी साबित हुई।’

जिन्ना ने सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया- ‘इन तमाम तथ्यों ने बिना किसी शक के यह साबित कर दिया है कि भारत की समस्या का एकमात्र हल पाकिस्तान है। जब तक कांग्रेस और मि. गांधी यह दावा करते रहेंगे कि वे पूरे देश की नुमाइंदगी करते हैं…… तब तक वे सच्ची हकीकत और संपूर्ण सत्य से इन्कार करते रहेंगे कि मुसलमानों का एकमात्र अधिकारपूर्ण संगठन मुस्लिम लीग है और जब तक वे इसी कूटनीतिक चक्र में घूमते रहेंगे तब तक न कोई समझौता हो सकता है, न ही कोई आजादी मिल सकती है।

…… अब तो मि. गांधी सारी दुनिया के सलाहकार की भाषा बोलने लगे हैं। वे कहते हैं कि कांग्रेस ……. भारत की जनता की ट्रस्टी है। पिछले डेढ़ सौ साल से इस ट्रस्टी का हमें काफी तजरुबा हो चुका है। हम कांग्रेस को अपना ट्रस्टी नहीं बनाना चाहते। हम अब बड़े हो चुके हें। मुसलमानों का केवल एक ही ट्रस्टी है और वह है मुसलमान-राष्ट्र।’ जिन्ना ने कैबीनेट मिशन के सदस्यों को भी चुन-चुन कर निशाना बनाया।

उसने क्रिप्स पर आरोप लगाया कि- ‘क्रिप्स ने हाउस ऑफ कॉमन्स में मिशन के लक्ष्यों की जो सहज परिभाषा दी थी, उसके दायरे से चालबाजी के साथ बच निकलने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने शब्दों की बाजीगरी का सहारा लिया और सदन को गुमराह किया। मुझे खेद है कि क्रिप्स ने अपनी कानूनी प्रतिभा को भ्रष्ट किया है।’

जिन्ना ने कैबीनेट मिशन के दूसरे सदस्य पैथक लॉरेंस पर आरोप लगाया कि ‘उन्होंने हाउस ऑफ लॉर्ड्स में कहा था कि जिन्ना मुसलमानों के प्रतिनिधित्व पर अपनी इजारेदारी नहीं चला सकते। मैं कोई व्यापारी नहीं हूँ। मैं तेल के लिए रियायतें नहीं मांग रहा। न ही किसी बनिए की तरह सौदेबाजी और तोल-मोल कर रहा हूँ।’

भारत चाहता तो अपनी आजादी का मार्ग कैबीनेट मिशन प्लान के माध्यम से ढूंढ सकता था किंतु भारत में उपस्थित विभिन्न विभाजनकारी तत्वों ने कैबीनेट मिशन प्लान को नकार दिया इस कारण कैबीनेट प्लान की मृत्यु हो गई।

कैबीनेट प्लान की मृत्यु में सबसे बड़ा हाथ जिन्ना का था जो पाकिस्तान से कम किसी बात पर सहमत नहीं होता था और दूसरा हाथ गांधीजी का था जो मुसलमानों से इतना प्रेम करते थे कि किसी भी कीमत पर मुसलानों को अलग देश में जाते हुए देखने के लिए तैयार नहीं थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अंतरिम सरकार का निमंत्रण

0

अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को अंतरिम सरकार का निमंत्रण

लॉर्ड वैवेल अब कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच चल रही लड़ाई से निबटने का प्रयास करते हुए थक चुका था। वह न केवल कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं से छुटकारा पाना चाहता था अपितु भारत से भी छुटकारा पाना चाहता था। इस कारण वैवेल ने जवाहर लाल नेहरू को अंतरिम सरकार का निमंत्रण भिजवाया।

कांग्रेस ने कैबीनेट मिशन प्लान को तो स्वीकार कर लिया था किंतु उसमें अंतरिम सरकार के गठन का जो प्रस्ताव किया गया था, उसे अस्वीकार कर दिया था। अतः मुस्लिम लीग ने दावा किया कि कांग्रेस को छोड़कर भारत की अंतरिम सरकार बनाई जाए किंतु वायसराय ने देश की सबसे बड़ी पार्टी को छोड़कर अंतरिम सरकार बनाने से इन्कार कर दिया।

जब 27 जुलाई 1946 को मुस्लिम कौंसिल ने बम्बई-बैठक में कैबीनेट मिशन योजना को अस्वीकार कर दिया तब कांग्रेस ने दूसरी चाल चली। उसने 8 अगस्त 1946 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई तथा उसमें प्रस्ताव पारित किया कि कांग्रेस कैबीनेट मिशन की दीर्घकालिक योजना एवं अंतरिम सरकार योजना दोनों को पूरी तरह मानती है।

कैसे बना था पाकिस्तान - bharatkaitihas.com
To Purchase This Book Please Click On Image.

वायसराय लॉर्ड वैवेल चाहता था कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों दलों के सहमत होने पर अंतरिम सरकार का गठन हो किंतु मुस्लिम लीग, अंतरिम सरकार में शामिल हाने के लिए सहमत नहीं हुई। अगस्त 1946 में प्रधानमंत्री एटली ने वायसराय लॉर्ड वैवेल को व्यक्तिगत तार भेजकर निर्देशित किया कि मुस्लिम लीग के बिना ही अंतरिम सरकार का गठन किया जाए।

लॉर्ड वैवेल ने जवाहरलाल नेहरू को सरकार बनाने का निमंत्रण भिजवा दिया जिसमें कहा गया कि- ‘मेरे सामने अंतरिम सरकार के गठन का प्रस्ताव रखें। …… यह आपको तय करना है कि आप इसके बारे में मि. जिन्ना से चर्चा करना चाहेंगे या नहीं। ….. मुझे यकीन है कि आप मुझसे सहमत होंगे कि गठजोड़ सरकार ही इस नाजुक समय में भारत की नियति को सबसे अच्छी तरह निर्देशित कर सकती है। हमारे पास समय बहुत कम है।’

नेहरू ने 10 अगस्त 1946 को वर्धा से वायसराय को एक पत्र लिखकर उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया तथा 13 अगस्त 1946 को जिन्ना को पत्र लिखकर उससे सरकार में शामिल होने का अनुरोध किया तथा उससे मिलने का समय मांगा।

जिन्ना ने जवाहरलाल के पत्र का जवाब इस प्रकार भिजवाया-

‘न तो मुझे यह पता है कि आपके और वायसराय के बीच क्या खिचड़ी पकी है और न ही मुझे आपके बीच हुए किसी समझौते की जानकारी है।

……. अगर इसका मतलब यह है कि वायसराय ने आपको एक कार्यकारी परिषद गठित करने की जिम्मेदारी सौंपी है

….. और वे आपकी राय स्वीकार करने और उसके आधार पर कदम उठाने के लिए तैयार हो गए हैं तो यह स्थिति स्वीकार करना मेरे लिए संभव नहीं है।

…… लेकिन अगर मुझसे मिलकर आप हिन्दू-मुसलमान सवाल पर गतिरोध हल करना चाहें तो मैं आपसे आज शाम छः बजे मिलने के लिए तैयार हूँ।’

अंत में 15 अगस्त 1946 को जिन्ना के निवास पर नेहरू और जिन्ना की वार्ता हुई। इस वार्ता में जिन्ना ने मुस्लिम लीग के सदस्यों को नेहरू की अंतरिम सरकार में शामिल करने से मना कर दिया। इस भेंट के बाद नेहरू ने वैवेल को सूचित किया कि नहेरू ने जिन्ना को आश्वासन दिया है कि संविधान सभा में किसी प्रमुख साम्प्रदायिक मसले पर तब तक कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी जब तक दोनों पक्षों का बहुमत उस पर सहमत न हो।

किसी भी विवादास्पद मुद्दे को संघीय अदालत के पास फैसले के लिए भेजा जाएगा और हालांकि कांगेस प्रांतों के घटक-समूहों का विचार नापसंद करती है और केन्द्र के तहत स्वायत्त प्रांतों के बंदोबस्त को प्राथमिकता देती है, लेकिन अगर प्रांतों की इच्छा होगी तो वह घटक-समूह बनाने का विरोध नहीं करेगी।

जवाहरलाल नेहरू को जिन्ना द्वारा की गई ‘ना’ का एक ही अर्थ था- ‘बंगाल में सीधी कार्यवाही के माध्यम से हिन्दुओं का कत्ल।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुसैन सुहरावर्दी

0

हुसैन सुहरावर्दी के गुण्डों को कत्लेआम के लिए कूपन दिए गए!

जिस समय मुस्लिम लीग ने कलकत्ता में हिन्दुओं का खून बहाकर सीधी कार्यवाही करने का निर्णय लिया, उस समय हुसैन सुहरावर्दी बंगाल का मुख्यमंत्री था। उसने अपने गुण्डों को कूपन बांटे ताकि वे हिन्दुओं का खून कर सकें।

सीधी कार्यवाही कार्यक्रम को जान-बूझकर अस्पष्ट रखा गया। जिन्ना का कहना था कि वह नीतियों की चर्चा नहीं करने जा रहे हैं। लियाकत अली ने सीधी कार्यवाही को कानून के खिलाफ कार्यवाही बताया जो हिंसा का आश्रय लेने का व्यापक संकेत था। इस आह्वान का उद्देश्य शांपिूर्ण नहीं था। इसमें प्राणों की आहुति दी जानी थी। पूर्व-सैनिकों को लेकर गठित मुस्लिम लीग नेशनल गार्ड सीधी कार्यवाही में सबसे आगे थी।

5 अगस्त 1946 को मॉर्निंग न्यूज के सम्पादक ने लिखा- ‘मुसलमान अहिंसा की भाषा में विश्वास नहीं रखते।’

इस समाचार पत्र ने 11 अगस्त 1946 को एक मुस्लिम नेता निजामुद्दीन के इस वक्तव्य को उद्धृत किया- ‘हम एक सौ तरीकों से परेशानियां उत्पन्न कर सकते हैं। विशेषकर इसलिए कि हम अहिंसा का सहारा लेने के लिए बाध्य नहीं हैं। बंगाल के मुसमलान सीधी कार्यवाही का अर्थ अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए हमें उन्हें कोई रास्ता दिखाने की आवश्यकता नहीं है।’

कैसे बना था पाकिस्तान - bharatkaitihas.com
To Purchase This Book Please Click On Image.

सीधी कार्यवाही की पूर्व संध्या को सैनिकों की भरती द्वारा मुस्लिम लीग नेशनल गार्डों को पुनः संगठित किया गया। सालार-ए-आला और अन्य प्रांतीय सालारों की नियुक्ति की गई। सीधी कार्यवाही से पहले ब्लूचिस्तान मुस्लिम नेशनल गार्डों के एक मजबूत तथा शक्तिशाली समूह को कई महानों के लिए बिहार में भेजा गया ताकि वे बिहार में मुसलमानों की सुरक्षा कर सकें। वस्तुतः इनकी बिहार में नियुक्ति तो एक दिखावा थी, वास्तव में इनसे कलकत्ता के दंगों में उपद्रव करवाया जाना था।

कलकत्ता के पुलिस कमिश्नर की रिपोर्ट के अनुसार 10 अगस्त 1946 से कलकत्ता से बाहर के गुण्डे लाठी, भालों तथा कटारों से लैस शहर की झुग्गियों में नजर आने लगे थे। …… उस दिन कलकत्ता में बहुत से हिन्दू मारे गए थे….. अगले दिन वहाँ एक दिन पूर्व हुए हिन्दू नरसंहार का व्यापक प्रतिशोध लिया गया। गिद्धों ने शहर साफ कर दिया।

12 अगस्त 1946 को डॉन में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसमें कहा गया- ‘मुसलमानों का अहिंसा में कोई यकीन नहीं है और न ही वे पाखण्डी हैं कि वैसे तो अहिंसा का उपदेश दें और वास्तव में हिंसा का सहारा लें।’

16 अगस्त 1946 को बंगाल के मुख्यमंत्री हुसैन सुहरावर्दी ने सरकारी कर्मचारियों को तीन दिन की असाधारण छुट्टी पर भेज दिया। कलकत्ता में नियुक्त ब्रिगेडियर जे. पी. सी. मेकिनले ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे उस दिन बैरकों में ही रहें। कलकत्ता में ऑक्टरलोनी के नीडिल स्मारक पर बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी और लीग के अन्य नेताओं ने मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं को सम्बोधित किया।

इस सभा में हावड़ा की जूट मिलों में काम करने वाले श्रमिक बड़ी संख्या में सम्मिलित हुए। हुसैन सुहरावर्दी ने अपने भाषण में कहा- ‘कैबीनेट मिशन एक धोखा था और अब वे देखेंगे कि अंग्रेज मिस्टर नेहरू से बंगाल पर कैसे हुकूमत करवा पाते हैं। मुक्ति हासिल करने के लिए सीधी कार्यवाही दिवस मुसलमानों के संघर्ष का पहला कदम साबित होगा। …… आप लोग जल्दी घर लौटें ….. हमने सभी बंदोबस्त कर लिए हैं ताकि पुलिस और मिलिट्री आपके रास्ते में अड़चन न डाले।’

इस सभा के समाप्त होते ही शहर में दंगे भड़क गए। बंगाल के गवर्नर बरो ने लॉर्ड वैवेल को एक तार भेजकर इन दंगों की जानकारी दी- ‘छः बजे तक हालत यह है कि चारों तरफ बहुत सी जगहों पर साम्प्रदायिक झड़पें चल रही हैं।…. साथ में दुकानों की लूट और आगजनी भी जारी है। ज्यादातर पथराव ही किया जा रहा है, पर कुछ जगहों पर दोनों समुदायों के लोगों द्वारा बंदूकों का इस्तेमाल भी किया गया है और चाकूबाजी की कुछ घटनाओं की जानकारी भी मिली है।

….. दिन की शुरुआत से ही खासकर उत्तर-कलकत्ता के हिन्दू व्यापारियों के बीच घबराहट देखी जा सकती है जिसके कारण घटनाओं का ब्यौरा असलियत के मुकाबले बढ़ा-चढ़ाकर भी दिया जा रहा है। …… यह अशांति अभी तक निश्चित रूप से साम्प्रदायिक ही है और इसे किसी भी तरह से ब्रिटिश विरोधी नहीं कहा जा सकता।’

दंगों से पहले मुख्यमंत्री हुसैन सुहरावर्दी के हस्ताक्षरों वाले कूपन मस्लिम लीग की लॉरियों में वितरित किए गए। कलकत्ता के दैनिक ‘द स्टेट्समैन’ ने लिखा- ‘लॉरियों में गुण्डों के समूह थे जो कही-कहीं रुककर आक्रमण कर रहे थे।’

शाम को छः बजे दंगा प्रभावित इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया, लेकिन जब एरिया कमाण्डर ने उत्तरी बैरकों से सेवंथ बूस्टर्स और ग्रीन हावर्ड्स के सैनिकों को तैनाती का आदेश दिया तो उन्होंने रात आठ बजे देखा कि कॉलेज स्ट्रीट मार्केट धू-धू करके जल रहा है।

भीड़ द्वारा की गई लूटमार के बीच एमहर्स्ट स्ट्रीट पर कुछ बिना जले मकान और दुकान पूरी तरह लूट लिए गए हैं। अजर सर्कूलर रोड पर सुलगता हुआ मलबा दिखाई दे रहा है। हैरिसन रोड पर डरे हुए निवासियों और घायलों की कराहें सुनी जा सकती हैं। कई लाशें देख कर लगता है कि उनकी मृत्यु अभी-अभी हुई है। मेजर लिवरमोर के अनुसार कलकत्ता युद्ध के मैदान में बदल चुका था।

एक तरफ भीड़ की हुकूमत थी तथा दूसरी तरफ सभ्यता और भद्रता। उस हिंसाग्रस्त इलाके में अधिकतर गरीबों, नीची जाति के निरक्षरों की जानें गई थीं या वे लोग मारे गए थे जो लुटेरों और चील-कौवों की तरह टूट पड़ने वाली भीड़ से जान-माल की हिफाजत करने के मामले में कमजोर साबित हुए थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कलकत्ता में सीधी कार्यवाही

0

कलकत्ता में सीधी कार्यवाही के बाद महीनों तक सड़कों पर हिन्दुओं का खून पड़ा सूखता रहा और उसमें पड़ी लाशें सड़ती रहीं। महीनों तक खून में तैरता रहा कलकत्ता!

जनरल टक्कर के अनुसार फरवरी में हुई हिंसा से हम सब स्तब्ध रह गए थे लेकिन इस बार तो मामला कुछ और ही था। हत्या के जुनून में भीड़ नंगी बर्बरता के साथ सिर्फ मारकाट और आगजनी पर उतारू थी। कलकत्ता शहर की बागडोर अपराध जगत के हाथों में जा चुकी थी …… पुलिस की तरफ से हालात पर काबू पाने की कोई कोशिश नहीं थी। दिन में न कोई बस दिखती थी, न टैक्सी। रिक्शे तोड़ डाले अैर जला दिए गए थे।

क्लर्कों के दफ्तर जाने का कोई जरिया नहीं बचा था। ….. शहर भर में लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। दंगाई भारी-भारी डण्डे और पैनी लोहे की छड़ें लिए घूम रहे थे। ….. प्रकट रूप में वे बहुत खरतनाक मूड में थे।…. एक व्यक्ति ….. पुलिस से ……सौ गज से भी कम दूरी पर पीट-पीट कर मार डाला गया था। पुलिस ….. जब तक धीरे-धीरे अपनी गाड़ियों से उतरती और कार्यवाही करती तब तक तीन लोगों की पीट-पीट कर जान ले ली गई और वे वहीं सड़क पर पड़े हुए थे।

कलकत्ता में सीधी कार्यवाही निरीह, निर्दोष, निहत्थे हिन्दुओं की हत्या थी। यह मानवता की हत्या थी। यह धरती के क्रूरतम अपराधों में से एक था जो केवल मुहम्मद अली जिन्ना और गांधीजी की जिद के कारण हुआ था। जिन्ना गांधी के साथ रहना नहीं चाहता था और गांधीजी जिन्ना को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। जो हिन्दु गांधीजी को महत्मा कहते नहीं थकते थे, उन्हीं गांधीजी के मुस्लिम-प्रेम ने भोले-भाले हिन्दुओं की हत्या करवाई।

कैसे बना था पाकिस्तान - bharatkaitihas.com
To Purchase This Book Please Click On Image.

टक्कर ने लिखा है- ‘सोमवार 19 अगस्त 1946 को मेजर लिवरमोर की प्लाटून ने एक चौराहे से डेढ़ सौ से अधिक शव हटाए। इस क्षेत्र में दुर्गंध सहनशक्ति से बाहर होती जा रही थी। जिसका एक कारण ये शव भी थे जिनके हटाने से एक नागरिक तो इतना उपकृत हुआ कि उसने प्लाटून को शैम्पेन की दो बोतलें दे डालीं। …… रात को नौ बजे हमें आदेश मिला कि प्रातः चार बजे कर्फ्यू हटने से पहले कम से कम मुख्य सड़कों से तो शव हटा ही लिए जाने चाहिए। सड़ते हुए शव उठाने के कार्य में हमारी सहायता के लिए दुर्गंधरोधी और गैस मास्क भी भेजे गए। मुसलमान कब्रिस्तानों एवं हिन्दू शवदाह घाटों की पहचान करने वाले नक्शे भी हम तक जल्दी से जल्दी पहुंचने वाले थे।

..…. यह पता लगाना कितना कठिन था कि तीन दिन से मरे पड़े लोगों में से कौन हिन्दू है और मुसलमान कौन! मेरे अपने क्षेत्र का काम समाप्त होने में दो दिन तथा दो रातें और लग गईं। एक कम्पनी सेक्टर में कुल मिलाकर 507 शव मिले जिनमें से अधिकतर चार सौ वर्ग गज के एक मुहल्ले के थे। …. हैजे की महामारी का अंदेशा पैदा हो चुका था।’

कलकत्ता में सीधी कार्यवाही का ऐसा घिनौना रूप अंग्रेजों की भी कल्पना से बाहर था हालांकि कलकत्ता में सीधी कार्यवाही में अंग्रेज स्वयं पूरी तरह शामिल थे। हालांकि अंग्रेज खंजर लेकर सड़कों पर नहीं निकले थे किंतु उन्होंने सुहरावर्दी के गुण्डों को रोकने के लिए कुछ नहीं किय। अंग्रेजी सेना बैरकों में पड़ी सोती रही।

टक्कर ने लिखा है- ’19 अगस्त की रात तक सड़ती हुई लाशों के खतरे से कलकत्ता इतना विचलित हो चुका था कि बंगाल की सरकार ने एक लाश ठिकाने लगाने के लिए सैनिकों को पांच रुपए देने की घोषणा की। इस काम में जिन लोगों को लगाया गया उनमें कलकत्ता के फोर्टेस स्टाफ का मेजर डोबनी भी था।

…… ब्रिटिश सैनिकों के इक्का-दुक्का दल के अलावा पूरा शहर बाकयदा मुर्दों के शहर में बदल चुका था। ….. सभी सड़कों पर रोशनी कर दी गई थी, ताकि सड़ते हुए इन्सानों और मलबे के ढेर दिखाई दे सकें। हथठेलों में लाशें भरी हुई थीं और उन्हें किनारे छोड़ दिया गया था। …… जैसे ही पता चला कि अंग्रेज अपने दीवानेपन में लाशें जमा करते घूम रहे हैं, घरों और झौंपड़ियों से और लाशें निकलने लगीं। ….. पूरी रात यह भीषण काम किया जाता रहा।’

टक्कर का अनुमान था कि इस हौलनाक हत्याकांड में मरने वालों की संख्या हजारों में तो रही होगी। गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार लगभग 16 हजार बंगाली 16 से 20 अगस्त के बीच मारे गए। मार्गरेट बर्गवाइट की रिपोर्ट के अुनसार इससे भी कई गुना ज्यादा संख्या में हुगली का पुल पार करके भागते हुए देखे गए।

कई दिनों तक पुरुषों, स्त्रियों, बच्चों और घरेलू पशुओं की भीड़ हावड़ा रेलरोड स्टेशन की तरफ जाती रही। जब ट्रेनों में स्थान नहीं बचा तो हिंदू और मुसलमान अगल-अलग होकर कंकरीट के फर्श पर प्रतीक्षा करने लगे। यह तो पाकिस्तान निर्माण के लिए हुए रक्तपात की केवल एक झलक मात्र थी।

लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है-

’16 अगस्त की सुबह धार्मिक नारे लगाते मुसलमानों की टोलियां अचानक अपनी झौंपड़ियों से निकलीं। छुरे, चाकू, तलवारें, लोहे की छड़ें, ऐसे कोई भी हथियार जो इंसान की खोपड़ी तोड़ सकते हों, उनके हाथों में चमक रहे थे। ये मुसलमान मुस्लिम लीग की ललकार के अनुसार बाहर निकले थे….. ताकि इंग्लैण्ड और कांग्रेस पार्टी के सामने साबित किया जा सके कि मुसलमान पाकिस्तान लेकर रहेंगे

…… उन मुसलमान टोलियों ने जो भी हिन्दू दिखाई दिया, उसे मार कर शव शहर के खुले गटरों में फैंक दिए। पुलिस के हाथ-पांव फूल गए। जल्दी ही शहर के दर्जनों स्थानों से काले धुंएं के खंभे आकाश में उठ-उठ कर डोलने लगे। हिन्दुओं की बस्तियां खाक हो रही थीं। बाजार धू-धू कर जल रहे थे। हिन्दू क्यों पीछे रहते? उन की भी टोलियों ने अपनी झौंपड़-पट्टियों से निकलना और मुसलमानों को मौत के घाट उतारना शुरू किया।

….. शहर में 6000 लोग मारे गए थे। 21 अगस्त को लॉर्ड वैवेल ने भारत सचिव पेथिक लारेंस को जानकारी भिजवाई कि वर्तमान अनुमान के अनुसार 3000 लोगों की जान जा चुकी है और 17 हजार लोग घायल हुए हैं। कांग्रेस पूरी तरह मान चुकी थी कि यह सारी गड़बड़ी बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार की कारस्तानी है। लेकिन वायसराय को अभी तक इस आशय का कोई संतोषजनक प्रमाण नहीं मिला था। शवों के बारे में अनुमान यह था कि मारे गए लोगों में मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं के मुकाबले खासी ज्यादा है। ‘

मोसले ने लिखा है कि 16 अगस्त 1946 की सुबह से तीन दिन बाद की शाम तक कलकत्ता में 6 हजार लोगों को मारपीट, खून-खराबा, आग, छुरेबाजी और गोलियों से मौत के घाट उतारा गया। बीस हजार के साथ बलात्कार हुआ अथवा वे जीवन भर के लिए अपंग बना दिए गए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में लगभग 5000 लोगों की जानें गईं, 15,000 घायल हुए तथा 10 हजार लोग बेघर हुए।

अगस्त के उत्तरार्ध में एक विदेशी संवाददाता ने जिन्ना से कलकत्ता के नरसंहार के बारे में पूछा तो उसका जवाब था-

‘यदि कांग्रेस की सरकारें मुसलमानों का दमन और उत्पीड़न करती रहीं तो अशांति पर नियंत्रण पाना बहुत कठिन हो जाएगा। ….. मेरी राय में पाकिस्तान की स्थापना करने के अतिरिक्त अब कोई विकल्प नहीं रह गया है। ….. हम पाकिस्तान के गैर-मुसलमानों और हिन्दू जाति-अल्पसंख्यकों की देखभाल करने की गारंटी लेते हैं। इनकी संख्या लगभग ढाई करोड़ होगी। इनके हित की हर तरीके से सुरक्षा की जाएगी। ….. भारत को जल्दी से जल्दी सच्ची आजादी दिलाने और उपमहाद्वीप में रहने वाले सभी लोगों के कल्याण और खुशी का तरीका यही हो सकता है।’

कई माह तक बेकाबू रहे कलकत्ता के हालात

3.30 करोड़ मुसलमानों एवं 2.50 करोड़ हिन्दुओं के बंगाल को हिंसा और मौत का खेल खेलने के लिए सुरक्षित शिकारगाह समझकर 16 अगस्त 1946 को भले ही जिन्ना और उसके पिठ्ठू सुहरावर्दी ने सीधी कार्यवाही दिवस मना कर यह सोच लिया था कि वे जीत में रहे हैं किंतु यह हिंसा और मौत का ऐसा खेल था जिसमें जीत कभी भी किसी पक्ष की नहीं होती, अतः जिन्ना और सुहरावर्दी की भी नहीं हुई। कलकत्ता में पुलिस और मिलिट्री भले ही बैरकों से बाहर निकलकर सड़कों पर खड़ी हो गई किंतु हिंसा और मौत का खेल उसके पड़ौसी प्रांत बिहार में शुरू हो गया था।

9 नवम्बर 1946 को बिहार के गवर्नर सर ह्यू डो ने प्रांत में साम्प्रदायिक दंगों के बारे में एक रिपोर्ट गवर्नर जनरल वैवेल को भिजावाई इसमें कहा गया-

‘सेना की नौ बटालियनें दंगा-प्रभावित देहाती क्षेत्रों में नियुक्त की गई हैं किंतु हिंदुओं की भीड़ें मुसलमानों को जहाँ हाथ लगते हैं, खत्म करने पर तुली हुई हैं। मरने वालों में तकरीबन सभी मुसलमान ही हैं और अनुमान यह है कि उनमें 75 प्रतिशत संख्या औरतों और बच्चों की है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा - bharatkaitihas.com

हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा

0
हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा हिन्दू धर्म की युग-युगीन यात्रा धरती पर घटित उन विलक्षण घटनाओं में से है जो मानवता के इतिहास में बहुत...
मोहन भागवत के नाम खुला पत्र - bharatkaitihas.com

मोहन भागवत के नाम खुला पत्र

0
मोहन भागवत के नाम खुला पत्र मोहन भागवत के नाम खुला पत्र राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति समर्पित भाव से लिखा गया है। आज...
सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

0
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

0
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

0
तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...