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मौलाना अबुल कलाम आजाद

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मौलाना अबुल कलाम आजाद द्वारा जिन्ना और प्रस्तावित पाकिस्तान का विरोध

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी पुस्तक इण्डिया विन्स फ्रीडम में अनेक स्थानों पर पाकिस्तान निर्माण के सिद्धांत के विरोध में अपने विचार प्रकट किए हैं। उनका जन्म 1988 में मक्का में हुआ था। वे अरबी, उर्दू, हिन्दी, संस्कृत, और अंग्रेजी के प्रसिद्ध विद्वान थे। उनकी शिक्षा काहिरा के अल अजहर में हुई थी।

मौलाना अपने समय के सर्वाधिक बुद्धिमान मुस्लिम नेताओं में गिने जाते थे। वे जिन्ना के पाकिस्तान में नहीं, अपितु गांधीजी के भारत में रहना चाहते थे। वे भारत के मुसलमानों को भावी पाकिस्तान के सीमित संसाधनों की बजाय विशाल भारत के समस्त प्राकृतिक संसाधनों को भोगते हुए देखना चाहते थे। वे जानते थे कि किस रोटी पर मक्खन अधिक लगा हुआ है!

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एक स्थान पर वे लिखते हैं- ‘मुस्लिम लीग की पाकिस्तान वाली योजना पर मैंने हर दृष्टि से सोचा-विचारा है। हिन्दुस्तानी की हैसियत से देश की पूरी इकाई पर भविष्य में क्या असर पड़ेगा, इस पर गौर किया है। मुसलमान की हैसियत से, हिन्दुस्तान के मुसलमानों की किस्मत पर इसका क्या असर पड़ सकता है, इसका अन्दाजा लगाया है। इस येाजना के सभी पहलुओं पर गौर करने पर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि यह न सिर्फ पूरे हिन्दुस्तान के लिए नुक्सान-देय है बल्कि मुसलमानों के लिए खास तौर पर है और दरअसल इससे तो जो मसले सुलझते हैं उससे कहीं ज्यादा पैदा होते हैं।’

मुहम्मद अली जिन्ना जब भी कांग्रेस के किसी मुस्लिम प्रतिनिधि को किसी भी सरकारी समिति में सदस्य या सरकार में मंत्री बनाए जाने का विरोध करता था तो उसका सीधा असर मौलाना अबुल कलाम आजाद पर पड़ता था। क्योंकि वे कांग्रेस के मुस्लिम सदस्य थे और जिन्ना किसी भी मुसलमान को इस शर्त पर सरकार में शामिल होने दे सकता था जब वह कांग्रेस का न होकर मुस्लिम लीग का सदस्य हो। इसलिए मौलाना अबुल कलाम आजाद सदैव जिन्ना के विरोधी रहे। मौलाना ने जिन्ना द्वारा मांगे जा रहे मुसलमानों के भावी अलग देश के ‘पाकिस्तान’ नाम का विरोध किया।

15 अप्रेल 1946 को उन्होंने एक वक्तव्य प्रकाशित करवाया जिसमें कहा गया-

‘यह नाम मेरी तबियत के खिलाफ है। इसका आशय है कि दुनिया का कुछ हिस्सा पाक है और बाकी नापाक। इस तरह दुनिया को पाक और नापाक हिस्सों में बांटना इस्लाम की रूह को गलत साबित करना है। इस्लाम में ऐसे बंटवारे की कोई गुंजाइश नहीं क्योंकि हजरत मुहम्मद ने कहा है- खुदा ने मेरे लिए सारी दुनिया ही मस्जिद बनाई है।

इसके अलावा पाकिस्तान की योजना मुझे पराजय का प्रतीक मालूम होती है जो यहूदियों की मांग के नमूने पर तैयार की गई है। यह तो मान लेना है कि पूरे हिन्दुस्तान की इकाई में मुसलमान अपने पैरों पर टिक नहीं सकेंगे इसलिए एक सुरक्षित कोने में सिमटकर उन्हें तसल्ली मिल जाएगी। यहूदियों की एक राष्ट्रीय आवास की मांग के साथ सहानुभूति रखी जा सकती है क्योंकि वे सारी दुनिया में बिखरे पड़े हैं और कहीं के भी अनुशासन में वे अहम पार्ट अदा नहीं कर सकते लेकिन हिन्दुस्तान के मुसलमानों की हालत तो बिल्कुल दूसरी है।

उनकी संख्या लगभग 9 करोड़ है और हिन्दुस्तान की जिंदगी में उनकी तादाद और उनकी खूबियां इतनी अहम हैं कि अनुशासन और नीति के सभी सवालों पर बखूबी और पुरअसर तरीकों से अपना प्रभाव डाल सकते हैं। कुदरत ने कुछ इलाकों में उनको केन्द्रित कर उनकी मदद भी की है। ऐसी हालत में पाकिस्तान की कोई ताकत नहीं रह जाती। मुसलमान की हैसियत से कम से कम मैं तो पूरे मुल्क को अपना समझने का, इसकी सियासी और माली जिंदगी के फैसले में हिस्सा लेने का हक नहीं छोड़ सकता। मुझे तो जो हमारा बपौती हक है, उसे छोड़ना और उसके एक टुकड़े से तसल्ली करना कायरता का पक्का सबूत मालूम होता है। ‘

मौलाना ने एक फार्मूला तैयार किया तथा उसे कांग्रेस की वर्किंग कमेटी से मनवा भी लिया। इसमें पाकिस्तान की येाजना की सारी अच्छी बातें तो थीं किंतु उसकी खराबियों से बचा गया था। विशेषकर जनसंख्या की अदला-बदली से। आजाद के बहुत से हिन्दू साथियों ने तो नहीं लेकिन आजाद ने महसूस किया था कि मुसलमानों का एक बड़ा डर यह था कि यदि पूरे हिन्दुस्तान को आजादी मिली तो केन्द्र का हिन्दू-प्रधान-शासन अल्पसंख्यक-मुसलमानों पर दवाब डालेगा, दखल देगा, बंदरघुड़की देगा, आर्थिक दृष्टि से सतायेगा और राजनीतिक तौर पर कुचल देगा।

इस डर को दूर करने के लिए मौलाना की योजना थी कि दोनों पक्ष ऐसा हल मान लें जिसमें मुसलमानों के बहुमत वाले प्रदेश भीतरी मामलों में अपने विकास के लिए स्वतंत्र हों लेकिन साथ ही साथ जिन मामलों में पूरे देश का सवाल उठता हो, केन्द्र पर अपना प्रभाव डाल सकें।

मौलाना ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान की हालत ऐसी है कि केन्द्रीभूत और एकात्मक सरकार स्थापित करने का हर प्रयास असफल होकर ही रहेगा। इसी तरह हिन्दुस्तान को दो टुकड़ों में बांटने की कोशिश का भी वही परिणाम होगा। इस सवाल के सभी पहलुओं पर गौर करने क बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि इसका सिर्फ एक ही हल हो सकता है जो कांग्रेस फार्मूले में मौजूद है जिसमें प्रदेश और देश दोनों के विकास की संभावनाएं मौजूद हैं।

……. मैं उन लोगों में हूँ जो साम्प्रदायिक दंगों और कड़वाहटों के इस अध्याय को हिन्दुस्तान के जीवन में कुछ दिनों का दौर समझते हैं। मेरा पक्का विश्वास है कि जब हिन्दुस्तान अपने भाग्य की बागडोर स्वयं संभालेगा, तो यह खतरा समाप्त हो जाएगा।

मुझे ग्लैडस्टोन का एक कथन याद आता है- आदमी के मन से पानी का भय दूर करना है तो उस आदमी को पानी में फैंक दो। उसी तरह हिन्दुस्तान अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठा ले और अपना कार्य संभालने लगे तभी डर और संदेह का यह वातावरण पूरी तरह दूर होगा। जब हिन्दुस्तान अपना ऐतिहासिक लक्ष्य प्राप्त कर लेगा तो साम्प्रदायिक संदेह और विरोध का वर्तमान अध्याय भुला दिया जाएगा और आधुनिक जीवन की समस्याओं का वह आधुनिक ढंग से सामना करेगा।

भेद तो तब भी रहेंगे ही किंतु साम्प्रदायिक न होकर आर्थिक। राजनीतिक पार्टियों के बीच विरोध भी रहेगा किंतु वह धार्मिक न होकर आर्थिक और राजनीतिक होगा। भविष्य में गठबंधन और साझेदारी सम्प्रदाय के आधार पर नहीं, वर्ग के आधार पर होंगी और उसी तरह नीतियां निर्धारित होंगी। यदि यह दलील दी जाए कि यह सिर्फ मेरा विश्वास है जिसे भविष्य की घटनाएं गलत साबित कर देंगी तो मुझे यह कहना है कि नौ करोड़ मुसलमानों को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता और अपने भवितव्य को बचाने के लिए वे काफी ताकतवर हैं।’

इस प्रकार मौलाना कभी नहीं चाहते थे कि मुसलमानों का अलग देश बने। वे चाहते थे कि मुसलमान अपना भविष्य भारत में देखें। मौलाना द्वारा किए जा रहे विरोध के बावजूद कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों तेजी से पाकिस्तान की ओर बढ़ रहे थे। अंतर केवल इतना था कि कांग्रेस एक कमजोर पाकिस्तान के निर्माण की तरफ बढ़ रही थी ताकि उसे बनने से पहले ही नष्ट किया जा सके जबकि मुस्लिम लीग एक मजबूत पाकिस्तान तलाश रही थी, एक ऐसा पाकिस्तान जो युगों तक कायम रहे, भारत का प्रतिद्वंद्वी बनकर रहे और भारत का प्रत्येक मुसलमान उस पाकिस्तान का नागरिक हो।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैबीनेट प्लान की मृत्यु

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कैबीनेट मिशन बड़ी आशा के साथ भारत आया था। मिशन के सदस्यों को उम्मीद थी कि उन्होंने भारत को आजाद करने का जो मार्ग दिखाया है, उसके लिए भारतवासी कैबीनेट मिशन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करेंगे किंतु मिशन के भारत की धरती छोड़ते ही भारत की राजनीति में सक्रिय विभिन्न तत्वों ने कैबीनेट मिशन प्लान को नकार दिया। इस कारण कैबीनेट प्लान की मृत्यु हो गई।

जिन्ना की ना ……!

10 जुलाई 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने एक प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों से कहा कि- ‘कांग्रेस पर समझौतों का कोई बंधन नहीं है और वह हर स्थिति का सामना करने के लिए उसी तरह तैयार है जैसे कि अब तक करती आई है…… ऐसी हालत में ख्याली पुलाव पकानेऔर सपने देखने से तो कोई फायदा होने वाला नहीं है।’

मुस्लिम लीग ने नेहरू के वक्तव्य का अर्थ यह लगाया कि एक बार सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद कांग्रेस इस योजना में संशोधन कर देगी। अतः जिन्ना ने 27 जुलाई को ही मुस्लिम लीग की बैठक बुलाई।

जिन्ना ने उन्हें बताया कि- ‘नेहरू कैबिनेट मिशन के समक्ष किए गए अपने वायदे से फिर गया है। इसलिए अब उन्हें नए हालात में उठाए जा सकने वाले कदमों के बारे में फैसला करना था।’

पहले लियाकत अली ने एक-एक प्रस्ताव ऊँची आवाज में पढ़ा और फिर उन पर चर्चा शुरू हुई जो दो दिन तक चलती रही।

सर फिरोज खान नून का आग्रह था- ‘बेहतर तो यह होगा कि हम अपनी गलती साफ तौर से कबूल करें जो हमने मिशन की योजना द्वारा तजवीज किए गए संघ को मान कर की है। हमें अपने पाकिस्तान के आदर्श की तरफ दोबारा लौट जाना चाहिए।’

मौलाना हसरत मोहानी जबरदस्त नारेबाजी के बीच उठे और लगभग चीखते हुए बोले- ‘अक्लमंदी इसी बात में है कि संवैधानिक प्रस्तावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया जाए। ….. हमें रोशनी का केवल एक ही मीरान रास्ता दिखा सकता है और वह है पूरी तरह संप्रभु पाकिस्तान का पृथक राज्य। सिर्फ कायद-ए-आजम के कहने की देर है, हिंदुस्तान के मुसलमान पल भर में बगावत का झंडा उठा लेंगे।’

दूसरे मौलानाओं, खानों और मुल्लाओं ने भी इसी तरह की बातें दोहराईं। राजा गजनफर अली ने वायदा किया- ‘अगर मिस्टर जिन्ना आवाज देंगे तो जिंदगी के हर हलके से मुलसममान आगे बढ़ कर पाकिस्तान हासिल करने के लिए संघर्ष में कूद पड़ेंगे।’

कौंसिल की राय सुनने के बाद जिन्ना और उनकी कार्यसमिति ने 29 जुलाई 1946 को दो पस्ताव पेश किए। पहले प्रस्ताव के जरिए लीग ने मिशन के मई प्रस्तावों को दी गई अपनी स्वीकृति वापस ले ली और दूसरे के माध्यम से आगे की जाने वाली सीधी कार्यवाही का रास्ता तय किया गया।

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चूंकि मुस्लिम-भारत कोशिश कर-कर के थक चुका है, पर उसे समझौते और संवैधानिक तरीकों से भारतीय समस्या का शांतिपूर्ण समाधान करने में कामयाबी नहीं मिल पाई है, चूंकि कांग्रेस अंग्रेजों से साठ-गांठ करके भारत में ऊँची जाति के हिन्दुओं की हूकूमत कायम करने पर तुली हुई है, चूंकि हाल के घटनाक्रम में साबित हो गया है कि भारतीय मसलों का फैसला ताकत की राजनीति के दम पर होता है, न कि ईमानदारी और इंसाफ की बिनाह पर, चूंकि अब यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि भारत के मुसलमान अब आजाद और पूरी तरह से संप्रभु पाकिस्तान राज्य की स्थापना के बिना चैन से नहीं बैठेंगे

……. वक्त आ गया है कि मुसलमान-राष्ट्र पाकिस्तान हासिल करने के लिए सीधी कार्यवाही पर उतर कर अपने हकों की दावेदारी करें। अपने गौरव की रक्षा करें, अंग्रेजों की मौजूदा गुलामी और ऊँची जाति के हिन्दू-प्रभुत्व के अंदेशे से छुटकारा हासिल करें।

कैबीनेट प्लान की मृत्यु की घोषणा

दोनों प्रस्तावों के पारित हो जाने के बाद जिन्ना ने नतीजा निकाला- ‘हमने एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक फैसला लिया है। जब से मुस्लिम लीग बनी है, हमने संवैधानिक तरीकों और संवैधानिक वार्ता के अलावा कोई और कदम नहीं उठाया। आज कांग्रेस और ब्रिटेन की मिली-जुली चाल के कारण हम मजबूरन यह कदम उठाने जा रहे हैं। हम पर दो मोर्चों से हमला हो रहा है।

……. आज हमने संविधानों और संवैधानिक तौर-तरीकों को अपना आखिरी सलाम बोल दिया है। हम जिन दो पक्षों से समझौता वार्ता कर रहे थे, उन्होंने पूरी वार्ता के दौरान हम पर पिस्तौलें ताने रखीं। एक की पिस्तौल के पीछे सत्ता और मशीनगनें थीं और दूसरे की पिस्तौल के पीछे असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू कर देने की धमकी थी। हमें इस हालात का मुकाबला करना ही होगा। हमारे पास भी एक पिस्तौल है।’

इस प्रकार मुस्लिम लीग ने कैबीनेट मिशन योजना की अपनी स्वीकृति रद्द करके पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए सीधी कार्यवाही की घोषणा कर दी। इस घोषणा में कहा गया कि- ‘आज से हम वैधानिक तरीकों से अलग होते हैं।……. आज हमने अपने लिए एक अस्त्र तैयार किया है और उसके उपयोग की स्थिति में हैं। ‘

इस प्रकार कैबीनेट प्लान की मृत्यु की घोषणा कर दी गई तथा अब जिन्ना ने कैबीनेट प्लान के शव पर बैठकर भारत के हिन्दुओं का रक्त पीने की येजना बनाई जिनके सर्वमान्य नेता गांधीजी के कारण जिन्ना को पाकिस्तान नहीं मिल पा रहा था।

मुस्लिम लीग के साथ-साथ कुछ अन्य राजनीतिक तत्वों ने भी कैबीनेट योजना को अस्वीकार कर दिया। नेहरू के वक्तव्य पर मौलाना अबुल कलाम आजाद ने टिप्पणी की कि- ‘1946 की गलती बड़ी महंगी साबित हुई।’

जिन्ना ने सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया- ‘इन तमाम तथ्यों ने बिना किसी शक के यह साबित कर दिया है कि भारत की समस्या का एकमात्र हल पाकिस्तान है। जब तक कांग्रेस और मि. गांधी यह दावा करते रहेंगे कि वे पूरे देश की नुमाइंदगी करते हैं…… तब तक वे सच्ची हकीकत और संपूर्ण सत्य से इन्कार करते रहेंगे कि मुसलमानों का एकमात्र अधिकारपूर्ण संगठन मुस्लिम लीग है और जब तक वे इसी कूटनीतिक चक्र में घूमते रहेंगे तब तक न कोई समझौता हो सकता है, न ही कोई आजादी मिल सकती है।

…… अब तो मि. गांधी सारी दुनिया के सलाहकार की भाषा बोलने लगे हैं। वे कहते हैं कि कांग्रेस ……. भारत की जनता की ट्रस्टी है। पिछले डेढ़ सौ साल से इस ट्रस्टी का हमें काफी तजरुबा हो चुका है। हम कांग्रेस को अपना ट्रस्टी नहीं बनाना चाहते। हम अब बड़े हो चुके हें। मुसलमानों का केवल एक ही ट्रस्टी है और वह है मुसलमान-राष्ट्र।’ जिन्ना ने कैबीनेट मिशन के सदस्यों को भी चुन-चुन कर निशाना बनाया।

उसने क्रिप्स पर आरोप लगाया कि- ‘क्रिप्स ने हाउस ऑफ कॉमन्स में मिशन के लक्ष्यों की जो सहज परिभाषा दी थी, उसके दायरे से चालबाजी के साथ बच निकलने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने शब्दों की बाजीगरी का सहारा लिया और सदन को गुमराह किया। मुझे खेद है कि क्रिप्स ने अपनी कानूनी प्रतिभा को भ्रष्ट किया है।’

जिन्ना ने कैबीनेट मिशन के दूसरे सदस्य पैथक लॉरेंस पर आरोप लगाया कि ‘उन्होंने हाउस ऑफ लॉर्ड्स में कहा था कि जिन्ना मुसलमानों के प्रतिनिधित्व पर अपनी इजारेदारी नहीं चला सकते। मैं कोई व्यापारी नहीं हूँ। मैं तेल के लिए रियायतें नहीं मांग रहा। न ही किसी बनिए की तरह सौदेबाजी और तोल-मोल कर रहा हूँ।’

भारत चाहता तो अपनी आजादी का मार्ग कैबीनेट मिशन प्लान के माध्यम से ढूंढ सकता था किंतु भारत में उपस्थित विभिन्न विभाजनकारी तत्वों ने कैबीनेट मिशन प्लान को नकार दिया इस कारण कैबीनेट प्लान की मृत्यु हो गई।

कैबीनेट प्लान की मृत्यु में सबसे बड़ा हाथ जिन्ना का था जो पाकिस्तान से कम किसी बात पर सहमत नहीं होता था और दूसरा हाथ गांधीजी का था जो मुसलमानों से इतना प्रेम करते थे कि किसी भी कीमत पर मुसलानों को अलग देश में जाते हुए देखने के लिए तैयार नहीं थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अंतरिम सरकार का निमंत्रण

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अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को अंतरिम सरकार का निमंत्रण

लॉर्ड वैवेल अब कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच चल रही लड़ाई से निबटने का प्रयास करते हुए थक चुका था। वह न केवल कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं से छुटकारा पाना चाहता था अपितु भारत से भी छुटकारा पाना चाहता था। इस कारण वैवेल ने जवाहर लाल नेहरू को अंतरिम सरकार का निमंत्रण भिजवाया।

कांग्रेस ने कैबीनेट मिशन प्लान को तो स्वीकार कर लिया था किंतु उसमें अंतरिम सरकार के गठन का जो प्रस्ताव किया गया था, उसे अस्वीकार कर दिया था। अतः मुस्लिम लीग ने दावा किया कि कांग्रेस को छोड़कर भारत की अंतरिम सरकार बनाई जाए किंतु वायसराय ने देश की सबसे बड़ी पार्टी को छोड़कर अंतरिम सरकार बनाने से इन्कार कर दिया।

जब 27 जुलाई 1946 को मुस्लिम कौंसिल ने बम्बई-बैठक में कैबीनेट मिशन योजना को अस्वीकार कर दिया तब कांग्रेस ने दूसरी चाल चली। उसने 8 अगस्त 1946 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई तथा उसमें प्रस्ताव पारित किया कि कांग्रेस कैबीनेट मिशन की दीर्घकालिक योजना एवं अंतरिम सरकार योजना दोनों को पूरी तरह मानती है।

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वायसराय लॉर्ड वैवेल चाहता था कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों दलों के सहमत होने पर अंतरिम सरकार का गठन हो किंतु मुस्लिम लीग, अंतरिम सरकार में शामिल हाने के लिए सहमत नहीं हुई। अगस्त 1946 में प्रधानमंत्री एटली ने वायसराय लॉर्ड वैवेल को व्यक्तिगत तार भेजकर निर्देशित किया कि मुस्लिम लीग के बिना ही अंतरिम सरकार का गठन किया जाए।

लॉर्ड वैवेल ने जवाहरलाल नेहरू को सरकार बनाने का निमंत्रण भिजवा दिया जिसमें कहा गया कि- ‘मेरे सामने अंतरिम सरकार के गठन का प्रस्ताव रखें। …… यह आपको तय करना है कि आप इसके बारे में मि. जिन्ना से चर्चा करना चाहेंगे या नहीं। ….. मुझे यकीन है कि आप मुझसे सहमत होंगे कि गठजोड़ सरकार ही इस नाजुक समय में भारत की नियति को सबसे अच्छी तरह निर्देशित कर सकती है। हमारे पास समय बहुत कम है।’

नेहरू ने 10 अगस्त 1946 को वर्धा से वायसराय को एक पत्र लिखकर उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया तथा 13 अगस्त 1946 को जिन्ना को पत्र लिखकर उससे सरकार में शामिल होने का अनुरोध किया तथा उससे मिलने का समय मांगा।

जिन्ना ने जवाहरलाल के पत्र का जवाब इस प्रकार भिजवाया-

‘न तो मुझे यह पता है कि आपके और वायसराय के बीच क्या खिचड़ी पकी है और न ही मुझे आपके बीच हुए किसी समझौते की जानकारी है।

……. अगर इसका मतलब यह है कि वायसराय ने आपको एक कार्यकारी परिषद गठित करने की जिम्मेदारी सौंपी है

….. और वे आपकी राय स्वीकार करने और उसके आधार पर कदम उठाने के लिए तैयार हो गए हैं तो यह स्थिति स्वीकार करना मेरे लिए संभव नहीं है।

…… लेकिन अगर मुझसे मिलकर आप हिन्दू-मुसलमान सवाल पर गतिरोध हल करना चाहें तो मैं आपसे आज शाम छः बजे मिलने के लिए तैयार हूँ।’

अंत में 15 अगस्त 1946 को जिन्ना के निवास पर नेहरू और जिन्ना की वार्ता हुई। इस वार्ता में जिन्ना ने मुस्लिम लीग के सदस्यों को नेहरू की अंतरिम सरकार में शामिल करने से मना कर दिया। इस भेंट के बाद नेहरू ने वैवेल को सूचित किया कि नहेरू ने जिन्ना को आश्वासन दिया है कि संविधान सभा में किसी प्रमुख साम्प्रदायिक मसले पर तब तक कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी जब तक दोनों पक्षों का बहुमत उस पर सहमत न हो।

किसी भी विवादास्पद मुद्दे को संघीय अदालत के पास फैसले के लिए भेजा जाएगा और हालांकि कांगेस प्रांतों के घटक-समूहों का विचार नापसंद करती है और केन्द्र के तहत स्वायत्त प्रांतों के बंदोबस्त को प्राथमिकता देती है, लेकिन अगर प्रांतों की इच्छा होगी तो वह घटक-समूह बनाने का विरोध नहीं करेगी।

जवाहरलाल नेहरू को जिन्ना द्वारा की गई ‘ना’ का एक ही अर्थ था- ‘बंगाल में सीधी कार्यवाही के माध्यम से हिन्दुओं का कत्ल।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुसैन सुहरावर्दी

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हुसैन सुहरावर्दी के गुण्डों को कत्लेआम के लिए कूपन दिए गए!

जिस समय मुस्लिम लीग ने कलकत्ता में हिन्दुओं का खून बहाकर सीधी कार्यवाही करने का निर्णय लिया, उस समय हुसैन सुहरावर्दी बंगाल का मुख्यमंत्री था। उसने अपने गुण्डों को कूपन बांटे ताकि वे हिन्दुओं का खून कर सकें।

सीधी कार्यवाही कार्यक्रम को जान-बूझकर अस्पष्ट रखा गया। जिन्ना का कहना था कि वह नीतियों की चर्चा नहीं करने जा रहे हैं। लियाकत अली ने सीधी कार्यवाही को कानून के खिलाफ कार्यवाही बताया जो हिंसा का आश्रय लेने का व्यापक संकेत था। इस आह्वान का उद्देश्य शांपिूर्ण नहीं था। इसमें प्राणों की आहुति दी जानी थी। पूर्व-सैनिकों को लेकर गठित मुस्लिम लीग नेशनल गार्ड सीधी कार्यवाही में सबसे आगे थी।

5 अगस्त 1946 को मॉर्निंग न्यूज के सम्पादक ने लिखा- ‘मुसलमान अहिंसा की भाषा में विश्वास नहीं रखते।’

इस समाचार पत्र ने 11 अगस्त 1946 को एक मुस्लिम नेता निजामुद्दीन के इस वक्तव्य को उद्धृत किया- ‘हम एक सौ तरीकों से परेशानियां उत्पन्न कर सकते हैं। विशेषकर इसलिए कि हम अहिंसा का सहारा लेने के लिए बाध्य नहीं हैं। बंगाल के मुसमलान सीधी कार्यवाही का अर्थ अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए हमें उन्हें कोई रास्ता दिखाने की आवश्यकता नहीं है।’

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सीधी कार्यवाही की पूर्व संध्या को सैनिकों की भरती द्वारा मुस्लिम लीग नेशनल गार्डों को पुनः संगठित किया गया। सालार-ए-आला और अन्य प्रांतीय सालारों की नियुक्ति की गई। सीधी कार्यवाही से पहले ब्लूचिस्तान मुस्लिम नेशनल गार्डों के एक मजबूत तथा शक्तिशाली समूह को कई महानों के लिए बिहार में भेजा गया ताकि वे बिहार में मुसलमानों की सुरक्षा कर सकें। वस्तुतः इनकी बिहार में नियुक्ति तो एक दिखावा थी, वास्तव में इनसे कलकत्ता के दंगों में उपद्रव करवाया जाना था।

कलकत्ता के पुलिस कमिश्नर की रिपोर्ट के अनुसार 10 अगस्त 1946 से कलकत्ता से बाहर के गुण्डे लाठी, भालों तथा कटारों से लैस शहर की झुग्गियों में नजर आने लगे थे। …… उस दिन कलकत्ता में बहुत से हिन्दू मारे गए थे….. अगले दिन वहाँ एक दिन पूर्व हुए हिन्दू नरसंहार का व्यापक प्रतिशोध लिया गया। गिद्धों ने शहर साफ कर दिया।

12 अगस्त 1946 को डॉन में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसमें कहा गया- ‘मुसलमानों का अहिंसा में कोई यकीन नहीं है और न ही वे पाखण्डी हैं कि वैसे तो अहिंसा का उपदेश दें और वास्तव में हिंसा का सहारा लें।’

16 अगस्त 1946 को बंगाल के मुख्यमंत्री हुसैन सुहरावर्दी ने सरकारी कर्मचारियों को तीन दिन की असाधारण छुट्टी पर भेज दिया। कलकत्ता में नियुक्त ब्रिगेडियर जे. पी. सी. मेकिनले ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे उस दिन बैरकों में ही रहें। कलकत्ता में ऑक्टरलोनी के नीडिल स्मारक पर बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी और लीग के अन्य नेताओं ने मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं को सम्बोधित किया।

इस सभा में हावड़ा की जूट मिलों में काम करने वाले श्रमिक बड़ी संख्या में सम्मिलित हुए। हुसैन सुहरावर्दी ने अपने भाषण में कहा- ‘कैबीनेट मिशन एक धोखा था और अब वे देखेंगे कि अंग्रेज मिस्टर नेहरू से बंगाल पर कैसे हुकूमत करवा पाते हैं। मुक्ति हासिल करने के लिए सीधी कार्यवाही दिवस मुसलमानों के संघर्ष का पहला कदम साबित होगा। …… आप लोग जल्दी घर लौटें ….. हमने सभी बंदोबस्त कर लिए हैं ताकि पुलिस और मिलिट्री आपके रास्ते में अड़चन न डाले।’

इस सभा के समाप्त होते ही शहर में दंगे भड़क गए। बंगाल के गवर्नर बरो ने लॉर्ड वैवेल को एक तार भेजकर इन दंगों की जानकारी दी- ‘छः बजे तक हालत यह है कि चारों तरफ बहुत सी जगहों पर साम्प्रदायिक झड़पें चल रही हैं।…. साथ में दुकानों की लूट और आगजनी भी जारी है। ज्यादातर पथराव ही किया जा रहा है, पर कुछ जगहों पर दोनों समुदायों के लोगों द्वारा बंदूकों का इस्तेमाल भी किया गया है और चाकूबाजी की कुछ घटनाओं की जानकारी भी मिली है।

….. दिन की शुरुआत से ही खासकर उत्तर-कलकत्ता के हिन्दू व्यापारियों के बीच घबराहट देखी जा सकती है जिसके कारण घटनाओं का ब्यौरा असलियत के मुकाबले बढ़ा-चढ़ाकर भी दिया जा रहा है। …… यह अशांति अभी तक निश्चित रूप से साम्प्रदायिक ही है और इसे किसी भी तरह से ब्रिटिश विरोधी नहीं कहा जा सकता।’

दंगों से पहले मुख्यमंत्री हुसैन सुहरावर्दी के हस्ताक्षरों वाले कूपन मस्लिम लीग की लॉरियों में वितरित किए गए। कलकत्ता के दैनिक ‘द स्टेट्समैन’ ने लिखा- ‘लॉरियों में गुण्डों के समूह थे जो कही-कहीं रुककर आक्रमण कर रहे थे।’

शाम को छः बजे दंगा प्रभावित इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया, लेकिन जब एरिया कमाण्डर ने उत्तरी बैरकों से सेवंथ बूस्टर्स और ग्रीन हावर्ड्स के सैनिकों को तैनाती का आदेश दिया तो उन्होंने रात आठ बजे देखा कि कॉलेज स्ट्रीट मार्केट धू-धू करके जल रहा है।

भीड़ द्वारा की गई लूटमार के बीच एमहर्स्ट स्ट्रीट पर कुछ बिना जले मकान और दुकान पूरी तरह लूट लिए गए हैं। अजर सर्कूलर रोड पर सुलगता हुआ मलबा दिखाई दे रहा है। हैरिसन रोड पर डरे हुए निवासियों और घायलों की कराहें सुनी जा सकती हैं। कई लाशें देख कर लगता है कि उनकी मृत्यु अभी-अभी हुई है। मेजर लिवरमोर के अनुसार कलकत्ता युद्ध के मैदान में बदल चुका था।

एक तरफ भीड़ की हुकूमत थी तथा दूसरी तरफ सभ्यता और भद्रता। उस हिंसाग्रस्त इलाके में अधिकतर गरीबों, नीची जाति के निरक्षरों की जानें गई थीं या वे लोग मारे गए थे जो लुटेरों और चील-कौवों की तरह टूट पड़ने वाली भीड़ से जान-माल की हिफाजत करने के मामले में कमजोर साबित हुए थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कलकत्ता में सीधी कार्यवाही

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कलकत्ता में सीधी कार्यवाही के बाद महीनों तक सड़कों पर हिन्दुओं का खून पड़ा सूखता रहा और उसमें पड़ी लाशें सड़ती रहीं। महीनों तक खून में तैरता रहा कलकत्ता!

जनरल टक्कर के अनुसार फरवरी में हुई हिंसा से हम सब स्तब्ध रह गए थे लेकिन इस बार तो मामला कुछ और ही था। हत्या के जुनून में भीड़ नंगी बर्बरता के साथ सिर्फ मारकाट और आगजनी पर उतारू थी। कलकत्ता शहर की बागडोर अपराध जगत के हाथों में जा चुकी थी …… पुलिस की तरफ से हालात पर काबू पाने की कोई कोशिश नहीं थी। दिन में न कोई बस दिखती थी, न टैक्सी। रिक्शे तोड़ डाले अैर जला दिए गए थे।

क्लर्कों के दफ्तर जाने का कोई जरिया नहीं बचा था। ….. शहर भर में लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। दंगाई भारी-भारी डण्डे और पैनी लोहे की छड़ें लिए घूम रहे थे। ….. प्रकट रूप में वे बहुत खरतनाक मूड में थे।…. एक व्यक्ति ….. पुलिस से ……सौ गज से भी कम दूरी पर पीट-पीट कर मार डाला गया था। पुलिस ….. जब तक धीरे-धीरे अपनी गाड़ियों से उतरती और कार्यवाही करती तब तक तीन लोगों की पीट-पीट कर जान ले ली गई और वे वहीं सड़क पर पड़े हुए थे।

कलकत्ता में सीधी कार्यवाही निरीह, निर्दोष, निहत्थे हिन्दुओं की हत्या थी। यह मानवता की हत्या थी। यह धरती के क्रूरतम अपराधों में से एक था जो केवल मुहम्मद अली जिन्ना और गांधीजी की जिद के कारण हुआ था। जिन्ना गांधी के साथ रहना नहीं चाहता था और गांधीजी जिन्ना को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। जो हिन्दु गांधीजी को महत्मा कहते नहीं थकते थे, उन्हीं गांधीजी के मुस्लिम-प्रेम ने भोले-भाले हिन्दुओं की हत्या करवाई।

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टक्कर ने लिखा है- ‘सोमवार 19 अगस्त 1946 को मेजर लिवरमोर की प्लाटून ने एक चौराहे से डेढ़ सौ से अधिक शव हटाए। इस क्षेत्र में दुर्गंध सहनशक्ति से बाहर होती जा रही थी। जिसका एक कारण ये शव भी थे जिनके हटाने से एक नागरिक तो इतना उपकृत हुआ कि उसने प्लाटून को शैम्पेन की दो बोतलें दे डालीं। …… रात को नौ बजे हमें आदेश मिला कि प्रातः चार बजे कर्फ्यू हटने से पहले कम से कम मुख्य सड़कों से तो शव हटा ही लिए जाने चाहिए। सड़ते हुए शव उठाने के कार्य में हमारी सहायता के लिए दुर्गंधरोधी और गैस मास्क भी भेजे गए। मुसलमान कब्रिस्तानों एवं हिन्दू शवदाह घाटों की पहचान करने वाले नक्शे भी हम तक जल्दी से जल्दी पहुंचने वाले थे।

..…. यह पता लगाना कितना कठिन था कि तीन दिन से मरे पड़े लोगों में से कौन हिन्दू है और मुसलमान कौन! मेरे अपने क्षेत्र का काम समाप्त होने में दो दिन तथा दो रातें और लग गईं। एक कम्पनी सेक्टर में कुल मिलाकर 507 शव मिले जिनमें से अधिकतर चार सौ वर्ग गज के एक मुहल्ले के थे। …. हैजे की महामारी का अंदेशा पैदा हो चुका था।’

कलकत्ता में सीधी कार्यवाही का ऐसा घिनौना रूप अंग्रेजों की भी कल्पना से बाहर था हालांकि कलकत्ता में सीधी कार्यवाही में अंग्रेज स्वयं पूरी तरह शामिल थे। हालांकि अंग्रेज खंजर लेकर सड़कों पर नहीं निकले थे किंतु उन्होंने सुहरावर्दी के गुण्डों को रोकने के लिए कुछ नहीं किय। अंग्रेजी सेना बैरकों में पड़ी सोती रही।

टक्कर ने लिखा है- ’19 अगस्त की रात तक सड़ती हुई लाशों के खतरे से कलकत्ता इतना विचलित हो चुका था कि बंगाल की सरकार ने एक लाश ठिकाने लगाने के लिए सैनिकों को पांच रुपए देने की घोषणा की। इस काम में जिन लोगों को लगाया गया उनमें कलकत्ता के फोर्टेस स्टाफ का मेजर डोबनी भी था।

…… ब्रिटिश सैनिकों के इक्का-दुक्का दल के अलावा पूरा शहर बाकयदा मुर्दों के शहर में बदल चुका था। ….. सभी सड़कों पर रोशनी कर दी गई थी, ताकि सड़ते हुए इन्सानों और मलबे के ढेर दिखाई दे सकें। हथठेलों में लाशें भरी हुई थीं और उन्हें किनारे छोड़ दिया गया था। …… जैसे ही पता चला कि अंग्रेज अपने दीवानेपन में लाशें जमा करते घूम रहे हैं, घरों और झौंपड़ियों से और लाशें निकलने लगीं। ….. पूरी रात यह भीषण काम किया जाता रहा।’

टक्कर का अनुमान था कि इस हौलनाक हत्याकांड में मरने वालों की संख्या हजारों में तो रही होगी। गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार लगभग 16 हजार बंगाली 16 से 20 अगस्त के बीच मारे गए। मार्गरेट बर्गवाइट की रिपोर्ट के अुनसार इससे भी कई गुना ज्यादा संख्या में हुगली का पुल पार करके भागते हुए देखे गए।

कई दिनों तक पुरुषों, स्त्रियों, बच्चों और घरेलू पशुओं की भीड़ हावड़ा रेलरोड स्टेशन की तरफ जाती रही। जब ट्रेनों में स्थान नहीं बचा तो हिंदू और मुसलमान अगल-अलग होकर कंकरीट के फर्श पर प्रतीक्षा करने लगे। यह तो पाकिस्तान निर्माण के लिए हुए रक्तपात की केवल एक झलक मात्र थी।

लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है-

’16 अगस्त की सुबह धार्मिक नारे लगाते मुसलमानों की टोलियां अचानक अपनी झौंपड़ियों से निकलीं। छुरे, चाकू, तलवारें, लोहे की छड़ें, ऐसे कोई भी हथियार जो इंसान की खोपड़ी तोड़ सकते हों, उनके हाथों में चमक रहे थे। ये मुसलमान मुस्लिम लीग की ललकार के अनुसार बाहर निकले थे….. ताकि इंग्लैण्ड और कांग्रेस पार्टी के सामने साबित किया जा सके कि मुसलमान पाकिस्तान लेकर रहेंगे

…… उन मुसलमान टोलियों ने जो भी हिन्दू दिखाई दिया, उसे मार कर शव शहर के खुले गटरों में फैंक दिए। पुलिस के हाथ-पांव फूल गए। जल्दी ही शहर के दर्जनों स्थानों से काले धुंएं के खंभे आकाश में उठ-उठ कर डोलने लगे। हिन्दुओं की बस्तियां खाक हो रही थीं। बाजार धू-धू कर जल रहे थे। हिन्दू क्यों पीछे रहते? उन की भी टोलियों ने अपनी झौंपड़-पट्टियों से निकलना और मुसलमानों को मौत के घाट उतारना शुरू किया।

….. शहर में 6000 लोग मारे गए थे। 21 अगस्त को लॉर्ड वैवेल ने भारत सचिव पेथिक लारेंस को जानकारी भिजवाई कि वर्तमान अनुमान के अनुसार 3000 लोगों की जान जा चुकी है और 17 हजार लोग घायल हुए हैं। कांग्रेस पूरी तरह मान चुकी थी कि यह सारी गड़बड़ी बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार की कारस्तानी है। लेकिन वायसराय को अभी तक इस आशय का कोई संतोषजनक प्रमाण नहीं मिला था। शवों के बारे में अनुमान यह था कि मारे गए लोगों में मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं के मुकाबले खासी ज्यादा है। ‘

मोसले ने लिखा है कि 16 अगस्त 1946 की सुबह से तीन दिन बाद की शाम तक कलकत्ता में 6 हजार लोगों को मारपीट, खून-खराबा, आग, छुरेबाजी और गोलियों से मौत के घाट उतारा गया। बीस हजार के साथ बलात्कार हुआ अथवा वे जीवन भर के लिए अपंग बना दिए गए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में लगभग 5000 लोगों की जानें गईं, 15,000 घायल हुए तथा 10 हजार लोग बेघर हुए।

अगस्त के उत्तरार्ध में एक विदेशी संवाददाता ने जिन्ना से कलकत्ता के नरसंहार के बारे में पूछा तो उसका जवाब था-

‘यदि कांग्रेस की सरकारें मुसलमानों का दमन और उत्पीड़न करती रहीं तो अशांति पर नियंत्रण पाना बहुत कठिन हो जाएगा। ….. मेरी राय में पाकिस्तान की स्थापना करने के अतिरिक्त अब कोई विकल्प नहीं रह गया है। ….. हम पाकिस्तान के गैर-मुसलमानों और हिन्दू जाति-अल्पसंख्यकों की देखभाल करने की गारंटी लेते हैं। इनकी संख्या लगभग ढाई करोड़ होगी। इनके हित की हर तरीके से सुरक्षा की जाएगी। ….. भारत को जल्दी से जल्दी सच्ची आजादी दिलाने और उपमहाद्वीप में रहने वाले सभी लोगों के कल्याण और खुशी का तरीका यही हो सकता है।’

कई माह तक बेकाबू रहे कलकत्ता के हालात

3.30 करोड़ मुसलमानों एवं 2.50 करोड़ हिन्दुओं के बंगाल को हिंसा और मौत का खेल खेलने के लिए सुरक्षित शिकारगाह समझकर 16 अगस्त 1946 को भले ही जिन्ना और उसके पिठ्ठू सुहरावर्दी ने सीधी कार्यवाही दिवस मना कर यह सोच लिया था कि वे जीत में रहे हैं किंतु यह हिंसा और मौत का ऐसा खेल था जिसमें जीत कभी भी किसी पक्ष की नहीं होती, अतः जिन्ना और सुहरावर्दी की भी नहीं हुई। कलकत्ता में पुलिस और मिलिट्री भले ही बैरकों से बाहर निकलकर सड़कों पर खड़ी हो गई किंतु हिंसा और मौत का खेल उसके पड़ौसी प्रांत बिहार में शुरू हो गया था।

9 नवम्बर 1946 को बिहार के गवर्नर सर ह्यू डो ने प्रांत में साम्प्रदायिक दंगों के बारे में एक रिपोर्ट गवर्नर जनरल वैवेल को भिजावाई इसमें कहा गया-

‘सेना की नौ बटालियनें दंगा-प्रभावित देहाती क्षेत्रों में नियुक्त की गई हैं किंतु हिंदुओं की भीड़ें मुसलमानों को जहाँ हाथ लगते हैं, खत्म करने पर तुली हुई हैं। मरने वालों में तकरीबन सभी मुसलमान ही हैं और अनुमान यह है कि उनमें 75 प्रतिशत संख्या औरतों और बच्चों की है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नोआखाली में हिंसा

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कलकत्ता में सीधी कार्यवाही में हिन्दुओं का रक्त बहाने के बाद पूर्वी बंगाल के नोआखाली में हिंसा और हत्याओं का नंगा नाच किया गया। नोआखाली और त्रिपुरा जिलों में लगभग 5000 हिन्दू मारे गए। बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मुसलमान बनाया गया तथा स्त्रियों के साथ बलात्कार किए गए। जिन्ना के मुसलमानों ने बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा प्रांतों के अन्य शहरों में भी हत्याओं की झड़ी लगा दी।

नोआखाली में हिंसा

सीधी कार्यवाही दिवस में आशातीत सफलता मिलने के बाद मुस्लिम लीग द्वारा एक इश्तहार का प्रकाशन करवाया गया जिसका शीर्षक था- ‘ पाकिस्तान को बोलने दो !’

इस इश्तहार में मुस्लिम लीग के नेता एस. एम. उस्मान ने कहा- ‘रमजान के महीने में इस्लाम तथा ‘काफिरों’ के बीच पहला खुला युद्ध शुरू हुआ और मुसलमानों को जेहाद में संलग्न होने की अनुमति मिली। इस्लाम को शानदार विजय प्राप्त हुई। खुदा की इच्छा के अनुसार ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान प्राप्त करने के उद्देश्य से जेहाद शुरू करने के लिए इस पवित्र माह को चुना। हम मुसलमानों के पास ताज रहा है और हमने शासन किया है। हिम्मत मत हारो, तैयार हो जाओ और तलवार निकाल लो। ओ काफिर तुम्हारा अंत दूर नहीं है, तुम्हारा संहार जरूर होगा।’

सुहरावर्दी का व्यवहार

बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने इन दंगों का नेतृत्व करते हुए नारा दिया- ‘लड़ कर लेंगे पाकिस्तान।’ उसने 16 अगस्त को सरकारी दफ्तरों में अवकाश घोषित कर दिया ताकि मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता खुलकर हत्याएं कर सकें। बंगाल का गवर्नर सर फ्रेडरिक बरोज इन दंगों को रोकने के लिये कुछ नहीं कर पाया। बंगाल और बिहार हिन्दुओं के खून में नहा उठे।

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बंगाल के तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर जनरल एस. जी. टेलर ने अपने ‘एस. जी. टेलर पेपर्स’ में लिखा है- ‘मुस्लिम लीग के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने उस समय कैसा व्यवहार किया था? सुहरावर्दी का व्यवहार निंदनीय था। उपद्रवों के चरम पर आर्मी एरिया कमाण्डर और मुख्यमंत्री ने कलकत्ता का दौरा किया। सेना के कमाण्डर ने कहा यह असामान्य है, सेना में हिन्दू और मुसलमान खुशी-खुशी एक साथ रहते और काम करते हैं। सुहरावर्दी ने अपनी भावनाओं को छिपाए बिना कहा, हम जल्द ही वह सब खत्म कर देंगे।’

इस प्रकार सीधी कार्यवाही में कलकत्ता में लगभग दस हजार जानें लीं।

मुस्लिम लीग के अन्य नेताओं का व्यवहार

पंजाब के प्रमुख मुस्लिम लीगी नेता ममदौत ने लीग कर्मियों से एक उत्तेजित देश के सभी तरीकों का प्रयोग करने को कहा- ‘हम अपने सभी बंधन तोड़ चुके हैं। अब हम भारत में इस्लाम की स्वतंत्रता के लिए दृढ़-प्रतिज्ञ हैं।’

सिंध के कानून व्यवस्था मंत्री गुलाम अली खाँ ने कहा- ‘पाकिस्तान के सम्बन्ध में मुसलमानों का विरोध करने वाले हर किसी को नष्ट तथा तहस-नहस कर दिया जाएगा।’

कलकत्ता के सटेट्समैन ने सीधी कार्यवाही के कार्यक्रमों को बहुत सूक्ष्मता से परखा। उसने लिखा है- ‘बम्बई में फिरोज खाँ नून ने पाकिस्तान के निर्माण के लिए एक ध्वजोत्तोलन समारोह में भाग लिया और डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को उनके सभी समर्थकों के साथ इस्लाम ग्रहण करने का न्यौता दिया। दिल्ली में 16 अगस्त को जामा मस्जिद में मुसलमानों की एक सभा को सम्बोधित करते हुए काजी मुहम्मद ईसा ने मुसलमानों को खुद को पाकिस्तान का सैनिक मानने और अंतिम संघर्ष हेतु तैयार रहने के लिए कहा। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि मुस्लिम लीग किस प्रकार पूरे उत्तरी भारत में हिन्दू-मुस्लिम दंगों को बढ़ावा देकर साम्प्रदायिक विभाजन उत्पन्न करने के लिए डटी हुई थी।’

नोआखाली में हिंसा

अगस्त 1946 में जो कुछ कलकत्ता में हुआ, वह वहीं तक सीमित नहीं रहा। बंगाल के दूसरे बड़े शहर ढाका में हत्या, आगजनी और लूटपाट की वारदातें दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थीं। पर सबसे भीषण स्थिति अक्टूबर 1946 में मुस्लिम-बहुल पूर्वी-बंगाल के दो जिलों नोआखाली ओर तिप्परा में थी। संगठित गुंडे वहाँ व्यापक स्तर पर आर्थिक बहिष्कार, लूटपाट, आगजनी, बलात्कार तथा हत्या के जरिए असहाय हिन्दू पड़ौसियों को अपनी बर्बरता का शिकार बना रहे थे।

साम्प्रदायिक उन्माद से सर्वाधिक पीड़ित नोआखाली जिले के सबडिवीजन फेनी में जब 9 अक्टूबर 1946 को सशस्त्र सैनिक टुकड़ियां पहुंचीं तो इससे कहीं अधिक बर्बरता से साम्प्रदायिक ताण्डव नोआखाली जिले के रामगंज थाने में शुरु हो गया। वहाँ लूटपाट, आगजनी, बलात्कार और हत्या के अलावा हिन्दुओं को जबर्दस्ती इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया जाने लगा। इस सुनियोजित बर्बरता का नेतृत्व मुस्लिम लीग नहीं अपितु ई.1946 के चुनाव में पराजित भूतपूर्व विधायक गुलाब सरवर कर रहा था।

पूर्वी बंगाल के नोआखाली और त्रिपुरा जिलों में लगभग 5000 हिन्दू मारे गए। नोआखाली में बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का प्रयास किया गया तथा स्त्रियों के साथ बलात्कार किए गए। नोआखाली में 7.5 लाख हिन्दुओं को कई महीनों तक शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा। इन दंगों की प्रतिक्रिया में बिहार में हिन्दुओं ने मुसलमानों पर आक्रमण कर दिया। सरकारी सूत्रों के अनुसार बिहार में लगभग 4,300 मुसलमान मारे गए।

संयुक्त प्रान्त में 250 मुसलमान मारे गए। पूर्वी भारत की तरह पश्चिमी भारत में भी सीधी कार्यवाही में हिन्दुओं एवं सिक्खों के विरुद्ध भयानक हिंसा हुई। पंजाब में मरने वाले सिक्खों तथा हिन्दुओं की संख्या 3,000 तक पहुंच गई। दंगों के दौरान सिक्खों तथा हिन्दुओं की करोड़ों रुपये मूल्य की सम्पत्ति लूट ली गई अथवा तोड़-फोड़ एवं आगजनी में नष्ट कर दी गई।

कांलिन्स एवं लैपियर ने लिखा है– ‘नोआखाली धू-धू कर जल उठा। जहाँ गांधीजी अपनी प्रायश्चित यात्रा पर निकले। बिहार में कौमी दंगों का नंगा नाच हुआ। पश्चिमी तट पर बम्बई भी आग के शहर में बदल गया।

……. इन घटनाओं ने देश के इतिहास को अत्यधिक प्रभावित किया। मुसलमानों ने वास्तव में साबित कर दिया कि यदि उन्हें उनका पाकिस्तान नहीं मिला तो सारे देश को खून से सान देने की जो धमकी वे बरसों से देते आ रहे थे, उसे एक डरावनी सच्चाई में बदल देने का दम-खम उनमें पूरी तरह था। जिस वीभत्स से दृश्य की कल्पना से ही गांधीजी के रोम सिहरते रहे थे, वह दृश्य अचानक मात्र गीदड़ भभकी न रहकर एक नंगी सच्चाई बना गया- गृह युद्ध!’

बंगाल के अन्य शहरों एवं बिहार में हिंसा

सिलहट एवं ढाका में भी लोग हताहत हुए। प्रतिशोध बहुत उग्र था और मूल उपद्रव की तुलना में वह कहीं अधिक भयानक था। एक के बदले तीन की नीति से नोआखाली और त्रिपुरा में जनता उत्तेजित हो उठी। इन दोनों जिलों में मुसलमान बहुसंख्यक और हिन्दू अल्पसंख्यक थे। नोआखाली में उनका अनुपात 18 लाख और 4 लाख का था। पूर्वी बंगाल के इन दोनों जिलों में अपराध जितनी भयानकता के साथ हुए थे उसे देखते हुए हताहतों की संख्या अधिक नहीं थी।

नारी निर्यातन, बलपूर्वक विवाह, जबरन धर्म परिवर्तन, घरों में आग लगा देने, उन पर सामूहिक हमले और प्रसिद्ध परिवारों के इन हमलों में शिकार होने से पूर्वी बंगाल में अविश्वास फैल गया था कि वह तीन वर्ष पूर्व अकाल में हुई सामूहिक मृत्युओं से भी कहीं अधिक भीषण था। पूर्वी बंगाल से कितने ही हिन्दू भागकर बिहार आए और वहाँ अत्याचारों की कहानियां फैल गईं। इससे बिहारी जनता प्रतिशोध के लिए पागल हो उठी।

अक्टूबर 1946 के अंत में साम्प्रदायिक विनाश की बर्बर विनाशलीला बिहार में शुरु हुई। बिहार पहले से ही बारूद के ढेर पर बैठा था। कलकत्ता, ढाका और नोआखाली की खबरों ने पलीते का काम किया। बिहार में साम्प्रदायिक हिंसा का का शिकार मुख्यतः वहाँ के मुसलमान अल्पसंख्यक हुए। लीग ने जब अंतरिम सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया तो वस्तुतः साम्प्रदायिक उन्माद में बह रहे रक्त से ही उसका राजतिलक हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैसे बना पाकिस्तान

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कैसे बना पाकिस्तान

कैसे बना पाकिस्तान प्रश्न का उत्तर वस्तुतः भारत विभाजन का इतिहास ही है। इसी प्रश्न का हल ढूंढते हुए मैंने कैसे बना था पाकिस्तान शीर्षक से यह पुस्तक लिखी। इस पुस्तक को देश-विदेश में अपार लोकप्रियता प्राप्त हुई है।

इस पुस्तक का लेखन मैंने वर्ष 2017 में किया था। अब तक इस पुस्तक के दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इसका प्रसारण शुभदा प्रकाशन जोधपुर द्वारा किया गया है।

इस पुस्तक को लिखने का विचार मुझे वर्ष 1985 में आया था। यह वह दौर था जब श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली एवं उत्तर भारत के कुछ नगरों में सिक्खों का बड़ा नर-संहार होकर ही चुका था तथा पंजाब में ‘घल्लूघारा’ चल रहा था। उन्हीं दिनों मुझे भारत पाक सीमा पर स्थित गंगानर जिले के ‘बिलोचिया’ गांव जाने का अवसर मिला। इस गांव में सैंकड़ों कच्चे घर थे जो पूरी तरह खाली पड़े थे। गांव के एक कौने में हिन्दुओं की एक छोटी सी बस्ती थी।

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उन्हीं लोगों ने मुझे बताया कि आजादी से पहले यह गांव पूरी तरह आबाद था तथा इन खाली पड़े घरों में मुसलमान रहा करते थे जो 1947 में पाकिस्तान चले गए। उसके बाद से इन घरों में रहने के लिए कोई नहीं आया और इन्हें राजस्थान सरकार ने नजूल सम्पत्ति घोषित कर दिया है।

बिलोचिया से आने के कुछ ही दिनों बाद मुझे ‘हिन्दूमल कोट’ जाना पड़ा। यह पक्के घरों और साफ-सुथरी गलियों वाला एक सुंदर सा कस्बा था किंतु वहाँ भी सैंकड़ों घरों पर ताले पड़े हुए थे। मैंने लोगों से पूछा कि क्या इस कस्बे के लोग भी भारत विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए? वहाँ के लोगों ने मुझे बताया कि नहीं पाकिस्तान नहीं गए, अधिकतर लोग गंगानगर, बीकानेर, अबोहर, फाजिल्का तथा बम्बई आदि शहरों में गए हैं।

मैंने पूछा- ‘क्यों?’ तो उन्होंने बताया- ‘यह कस्बा भारत विभाजन से पहले अनाज की अच्छी मण्डी हुआ करता था किंतु भारत-विभाजन के बाद यह कस्बा अचानक पाकिस्तान की सीमा पर आ गया। इस कारण 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में यह कस्बा उजड़ गया। लोग अपने परिवारों को लेकर अन्य शहरों को चले गए और इस कस्बे का वाणिज्य-व्यापार ठप्प हो गया। उनके घरों पर आज भी ताले लगे हुए हैं।’

गंगानगर के पांच साल के प्रवास के दौरान मैं श्री स्वदेशराज वर्मा के परिवार के सम्पर्क में आया। यह एक आर्यसमाजी परिवार है और बहुत खुले हुए आधुनिक विचारों का परिवार है। भारत-विभाजन के समय श्री स्वदेशराज वर्मा अपने पिता डॉ. गोविंदराम तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बहावलपुर स्टेट के खानपुर कस्बे से हिन्दूमल कोट आए थे। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता कराची रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर हुआ करते थे।

भारत विभाजन के समय चूंकि पाकिस्तान से भारत आने वाली ट्रेनों में कत्ले-आम मचा हुआ था इसलिए यह परिवार कराची से वायुयान द्वारा दिल्ली पहुंचा। वहाँ से यह परिवार पहले मेरठ और फिर अमृतसर चला गया। श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता श्री मूलचंद मल्होत्रा का परिवार मूलतः मुल्तान के सक्खर क्षेत्र का रहने वाला था। श्री स्वदेश वर्मा और श्रीमती कैलाश वर्मा अक्सर भारत विभाजन के समय की आंखों-देखी घटनाओं का उल्लेख किया करते थे।

चूंकि उन दोनों के परिवारों की पृष्ठभूमि सम्पन्न थी तथा वे समय रहते ही वहाँ से निकल आए थे तब भी उनके मन एवं मस्तिष्क से उन दिनों की यादें मिटती नहीं थीं। यहाँ तक कि श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता श्री मूलचंद मल्होत्रा को भारत सरकार ने मेरठ रेल्वे स्टेशन पर नियुक्ति भी दी किंतु वे अपने सगे-सम्बन्धियों, मित्रों एवं अपनी अचल सम्पत्ति के पाकिस्तान में छूट जाने के कारण मानसिक रूप से इतने परेशान हो चुके थे कि वे नौकरी छोड़कर अमृतसर चले गए। उनके संगी-साथी तथा घर-सम्पत्ति पाकिस्तान में ही रह गए थे।

मैं जब वर्मा-दम्पत्ति की बातें सुनता था तो अक्सर भारत-विभाजन की त्रासदी झेलने वाले उन लाखों लोगों के बारे में सोचा करता था जो पैदल ही पाकिस्तान से भारत आए थे या भारत से पाकिस्तान गए थे! पांच लाख लोग तो अपने गंतव्य पर पहुंचने से पहले ही दंगाइयों के क्रूर हाथों में पड़कर मौत की खाई मंे जा गिरे थे। भारत से पाकिस्तान का अलग होना, मानवीय इतिहास की एक क्रूरतम एवं रक्तरंजित घटना थी। संसार के कई अन्य देशों को भी ऐसी भीषण त्रासदियां झेलनी पड़ी हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि आदमी कभी सभ्य नहीं बन पाया, वह असभ्य था, है और रहेगा।

1980 के दशक में अजमेर प्रवास के दौरान मैं एक ऐसे परिवार के सम्पर्क में रहा जिसकी गृह-स्वामिनी श्रीमती द्रौपदी यादव अपने पिता एवं उनके परिवार के साथ भारत की आजादी से लगभग दो साल पहले उस समय बर्मा से भारत आई थीं जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज एवं जापानी सेनाएं अंग्रेज सेनाओं को बर्मा से मारकर भगा रही थीं। श्रीमती यादव जो उस समय छोटी बच्ची ही थीं, का परिवार किसी बड़े दल के साथ पैदल चल कर ही बर्मा से असम तक आया था और वहाँ से इलाहाबाद गया।

इस दौरान उन्हें युद्धक-विमानों से होने वाली बम-वर्षा से लेकर हिंसक हाथियों तथा पुलिस के सिपाहियों के अत्याचारों का सामना करना पड़ा। इन्हीं में से एक घटना के दौरान उनके एक भाई अथवा एक बहिन की मृत्यु हो गई थी। श्रीमती द्रौपदी भी प्रायः उस पलायन के बहुत से लोमहर्षक प्रसंग कभी हँस कर तो कभी रो कर सुनाया करती थीं।

मेरे पितामह श्री मुकुंदी लाल गुप्ता भी ई.1947 में यमुनाजी के किनारे हुए मेवों के आक्रमण के समय अपने कुनबे के युवकों तथा संगी-साथियों के साथ सशस्त्र संघर्ष में सम्मिलित हुए थे। मेरी दादी श्रीमती जय देवी (अब स्वर्गीय) एवं पिताजी अक्सर उस संघर्ष की चर्चा करते रहे हैं।

वर्ष 1993 में मैंने भारत-पाकिस्तान की सरहद पर स्थित आकुड़ियां गांव देखा था। यह जालोर जिले के नेहड़ क्षेत्र में स्थित है जहाँ लूनी नदी का मुहाना है। यह पूरी तरह से सुनसान और उजड़ा हुआ गांव था। पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि भारत की आजादी से पहले यह भरा-पूरा गांव था जिसमें मुसलमान परिवार रहा करते थे किंतु आजादी के बाद इस गांव के सारे लोग भारत की सीमा पार करके पाकिस्तान के क्षेत्र में चले गए और उन्होंने वहाँ पर एक नया गांव बसा लिया जिसका नाम भी आकुड़िया है। अब भारतीय आकुड़िया पूरी तरह सुनसान है।

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के समय जो कुछ हुआ, वह भी इस बात की पुष्टि करता है कि सभ्यता के कैनवास पर मनुष्य सदैव गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करता आया है। नयी जीत की आशा में वह पुरानी उपलब्धियों को आग में झौंक डालता है। मनपसंद खिलौना प्राप्त करने की प्रत्याशा में वह अपनी हथेली पर रखे खिलौने को क्रूरता से तोड़ डालता है। जो कुछ भी मानव के पास है, उसमें वह कभी भी संतुष्ट नहीं है, और जो कुछ उसे संतुष्ट कर सके, उसे कभी भी मिलता नहीं है।

ई.1906 में भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, तब से लेकर ई.1947 तक मुस्लिम लीग पाकिस्तान के लिये झगड़ती रही और उसे लेकर ही रही। ऊपरी तौर से देखने पर पाकिस्तान का निर्माण इन्हीं 41 वर्षों के संघर्ष का परिणाम लगता है किंतु सच्चाई यह है कि पाकिस्तान की नींव तो ई.712 में मुहम्मद बिन कासिम ने उसी समय डाल दी थी जब उसने सिंध पर आक्रमण करके महाराजा दाहिर सेन और उनके राज्य को समाप्त किया था। तब से लेकर ई.1947 तक तिल-तिल करके भारत का इतिहास पाकिस्तान की ओर बढ़ता रहा।

मेरी दृष्टि में पाकिस्तान इकतालीस वर्ष के संघर्ष का परिणाम नहीं था। अपितु पूरे 1225 वर्ष के संघर्ष का परिणाम था। भारत के इतिहास में यह पूरी अवधि नफरत, हिंसा, रक्तपात और दंगों से भरी हुई थी।

कैसे बना था पाकिस्तान पुस्तक में भारत विभाजन के समय हुए राजनीतिक संघर्ष की एक झलक भर है। इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य इतिहास के उन पन्नों को टटोल कर देखना है ताकि हम भविष्य में उन्हीं गलतियों को फिर से न दोहराएं जिनके कारण हम भारत-पाकिस्तान के विभाजन के खतरनाक निर्णय पर पहुंचे थे। आज भी हमारे सामने अवसर है कि हम शांति की साधना करें तथा अच्छे पड़ौसियों की तरह जिम्मेदारी के साथ रहें।

प्रत्येक भारतीय की पहली और आखिरी इच्छा भारत-पाकिस्तान के बीच शांति की स्थापना करने की ही है किंतु केवल भारत की ओर से की गई शांति की इच्छाएं भारत-पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित नहीं कर सकतीं। इसके लिए पाकिस्तान के राष्ट्रीय चरित्र में भी शांति की लहर उठनी चाहिए। पाकिस्तानी शासकों द्वारा की जा रही नफरतों की खेती के बीच भारत की ओर से जाने वाले शांति के कबूतर लहूलुहान ही किए जाते रहेंगे और शांति केवल एक ढकोसला सिद्ध होगी।

कैसे बना था पाकिस्तान शीर्षक से लिखी गई यह पुस्तक पाकिस्तान निर्माण की पूरी कहानी नहीं है। यह भारत-पाकिस्तान विभाजन की दुखःद त्रासदी की पृष्ठभूमि पर लिखी गई एक संक्षिप्त गाथा है जो उस समय के कुछ ऐसे दृश्यों से साक्षात्कार करवाती है जिनकी पृष्ठभूमि में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया।

इस पुस्तक में कुल 11 अध्याय हैं जिनमें भारत में इस्लाम के प्रवेश से लेकर भारत के तीन टुकड़ों में बंटने अर्थात् भारत पाकिस्तान एवं बांगला देश के निर्माण तक का इतिहास लिखा गया है।

यह पुस्तक भारत विभाजन का इतिहास पढ़ने वाले पाठकों के लिए बेहद उपयोगी है। कृपया अपने मित्रों को भी इस पुस्तक के बारे में जानकारी दें।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नेहरू की अंतरिम सरकार

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कैबीनेट मिशन ने भारत की आजादी के लिए जो योजना बनाई थी, उसमें एक ऐसी अंतरिम सरकार के गठन का प्रस्ताव किया गया था जिसमें समस्त सदस्य हिन्दू हों। वायसराय के निमंत्रण पर नेहरू की अंतरिम सरकार का गठन हुआ।

लॉर्ड वैवेल ने कैबीनेट मिशन के प्रस्तावों के अनुसार 2 सितम्बर 1946 को दिल्ली में अंतरिम सरकार का गठन करवाया। इसमें केवल कांग्रेसी नेता शामिल हुए। इस सरकार में जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया। साथ ही सरदार पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, एम. आसफ अली, सी. राजगोपालाचारी, शरतचंद्र बोस, डॉ. जॉन मथाई, सरदार बलदेवसिंह, सर शफाअत अहमद खाँ, जगजीवनराम, सैयद अली जहीर ओर कोवेसजी होरमुसजी भाभा को मंत्री बनाया गया।

पाँच पद स्थानापन्न रखे गए जो कि मुस्लिम लीग के लिए थे। कांग्रेस ने तीन गैर-मुस्लिम लीगी मुसलमानों को मंत्री बनाया था, यह मुस्लिम लीग के लिए किसी भी परिस्थिति में सह्य नहीं हुआ।

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जिन्ना ने घोषणा की- ‘वायसराय ने मुस्लिम लीग और मुसलमानों पर जबर्दस्त चोट की है किंतु मुझे विश्वास है कि भारत के मुसलमान दृढ़ता और साहस से इस आघात को झेल लेंगे। इस अंतरिम सरकार में अपने लिए न्यायपूर्ण और सम्मानजनक भागीदारी हासिल करने में असफल रहने से उन्हें सबक मिलेगा।

….. मैं अभी कहता हूँ कि जो कदम उन्होंने उठाया है, उसमें न तो कोई बुद्धिमानी दिखाई है और न ही राजनीतिज्ञता का परिचय दिया है। इसके खतरनाक और गंभीर परिणाम निकल सकते हैं। ऊपर से उन्होंने तीन मुसलमानों को नामजद करके हमारे आहत मन को और अधिक आहत किया है। जबकि उन्हें पता है कि उन्हें मुसलमान-भारत का सम्मान और विश्वास हासिल नहीं है।’

कांग्रेस द्वारा अंतरिम सरकार की शपथ लेने की पूर्व संध्या पर 1 सितम्बर 1946 को बम्बई साम्प्रदायिक दंगों से थर्रा उठा।

सेंडहर्स्ट रोड पर मुसलमानों के घरों पर काले झण्डे लहराने लगे। कर्फ्यू लगा दिया गया, सेना बुला ली गई परन्तु एक रात्रि तक चले हिंसा के अनुष्ठान में 35 लोगों की जान ले ली गईं और 175 व्यक्ति घायल हो गए। एक सप्ताह तक बम्बई में छिटपुट दंगे चलते रहे। 10 सितम्बर तक 200 नागरिकों की जान जा चुकी थी। कराची में भी हिंसा हुई किंतु लीग के मुख्यमंत्री शेख गुलाम हुसैन द्वारा प्रसारित शांति और सहिष्णुता की अपील से शहर के मुसलमानों को अपने जज्बात थामने में मदद मिली।

सिंध के अंग्रेज मुख्य सचिव का कहना था- ‘कलकत्ता की खौफनाक घटनाओं के कारण एक पक्ष तो मनहूस नाराजगी लिए बैठा है और दूसरा बेवकूफाना घबराहट का शिकार है।’

मुख्य सचिव की रिपोर्ट के अनुसार दोनों समुदाय खुफिया तौर पर हथियारबंद होने में लगे हैं। 2 सितम्बर 1946 को जवाहरलाल ने अंतरिम सरकार का गठन किया तथा 7 सितम्बर को देश की जनता के नाम प्रसारित संदेश में नेहरू ने कहा- ‘इस प्राचीन धरती पर एक नई सरकार बनी है। हम इसे अंतरिम या अस्थाई सरकार कहते हैं। ….. हमारी यह प्राचीन और प्यारी भूमि एक बार फिर तकलीफों और दुःखों से निकल कर अपनी अस्मिता प्राप्त कर रही है। एक बार फिर युवावस्था प्राप्त करके उसकी आंखों में साहस की चमक आई है। एक बार फिर उसने स्वयं में विश्वास और अपनी मंजिल के दर्शन किए हैं।’

सरकार के शपथ लेने के कुछ दिना बाद अंतरिम सरकार के गैर-मुस्लिमलीगी मंत्री सर शफात अहमद खाँ को शिमला में मुस्लिम लीग के कट्टरपंथियों ने चाकू से सात बार गोद डाला। वैवेल द्वारा बार-बार प्रयास किए जाने पर तथा नेहरू द्वारा अपने मंत्रिमण्डल से गैर-मुस्लिम लीगी मुसलमान मंत्रियों एवं सुभाष चंद्र बोस के भाई शरत्चंद्र बोस को मंत्रिमण्डल से हटा दिए जाने पर मुस्लिम लीग ने भी अंतरिम सरकार में शामिल होने की स्वीकृति दे दी ताकि कांग्रेस सरकार को परेशान किया जा सके।

मुस्लिम लीग की तरफ से लियाकत अली, आई. आई. चुंदरीगर, अब्दुल रब निश्तर और जोगेन्द्रनाथ मण्डल मंत्री बनाए गए। जिन्ना ने जोगेन्द्रनाथ को संभवतः इसलिए मुस्लिम लीग की ओर से मंत्री बनवाया ताकि कांग्रेस यह दावा न करे कि वह देश के सम्पूर्ण हिन्दुओं का नेतृत्व करती है।

2 नवम्बर को मुस्लिम लीग के सदस्य अंतरिम सरकार में सम्मिलित होने के लिए सौगंध लेने के लिए वायसराय भवन में गए। नेहरू भी वहाँ पर गए थे। इनकी मोटर गाड़ी भवन के बाहर खड़ी थी और कहा जाता है कि मुसलमान भीड़ ने मोटर गाड़ी को आग लगा दी।

इसी दिन लियाकत अली इत्यादि मुसलमान नेता केन्द्रीय विधान सभा में भाग लेने के लिए आए जवाहर लाल की गाड़ी को मुसलमान भीड़ ने घेर लेने का यत्न किया और यदि उस समय कुछ हिन्दू युवक नेहरू को बचाने लिए उस मुस्लिम भीड़ पर आक्रमण न कर देते, तो नेहरू पर क्या बीतती, कहना कठिन है।

उसी शाम दिल्ली के सदर बाजाद में मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने गाड़ियां रोक-रोक कर हिन्दुओं को मुसलमानों से पृथक् करके मारना आरम्भ कर दिया। हिन्दू भी उनके विरोध में उतर आए। इससे कई घण्टे तक मार-काट की स्थिति रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

संविधान सभा

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कैबीनेट योजना के प्रस्तावों के तहत कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने संविधान सभा में भाग लेने पर अपनी सहमति दी थी किंतु बाद में कुछ बिंदुओं की व्याख्या पर दोनों दलों में विवाद हो गया। जुलाई 1946 में संविधान निर्मात्री समिति के सदस्यों का चुनाव संपन्न हुआ जिसमें कांग्रेस के 212 सदस्यों के मुकाबले मुस्लिम लीग के मात्र 73 सदस्य ही हो पाये। मुस्लिम लीग ने अपने आप को इससे अलग कर लिया। वह संविधान सभा के जाल में फंसना नहीं चाहती थी।

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जिन्ना ने कहा– ‘हिंदुस्तान में गतिरोध हिन्दुस्तानियों और अंग्रेजों के बीच उतना ज्यादा नहीं। वह हिन्दू-कांग्रेस और मुसलिम-लीग के बीच है। …… जब तक पाकिस्तान मंजूर नहीं किया जाता, कुछ भी हल नहीं किया जा सकता और न हल किया जा सकेगा। …… एक नहीं दो संविधान सभाएं होंगी, एक हिन्दुस्तान का संविधान बनाने और निश्चित करने के लिए और दूसरी पाकिस्तान का संविधान बनाने और निश्चित करने के लिए। …… हम भारतीय समस्या को दस मिनट में हल कर सकते हैं, यदि मि. गांधी कह दें कि वे सहमत हैं कि पाकिस्तान होना चाहिए तथा अपनी वर्तमान सीमाओं के साथ छः प्रांतों- सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, बंगाल और असम के बने चौथाई भारत को लेकर पाकिस्तान राज्य बनेगा।’

जिन्ना के इस वक्तव्य पर गांधीजी ने टिप्पणी की- ‘हो सकता है कि केवल कांग्रेस प्रांत और देशी नरेश ही संविधान सभा में सम्मिलित हों। मेरे विचार से यह शोभनीय और पूर्णतः तथ्यसंगत होगा।’ 9 दिसम्बर 1946 को विधान निर्मात्री समिति ने कार्य करना आरम्भ किया। डी. आर. मानकेकर ने लिखा है- ‘तनाव, निराशा एवं अनिश्चतता के वातावरण में विधान निर्मात्री समिति ने कार्य करना आरंभ किया।’

लंदन में जिन्ना पाकिस्तान को लेकर भावुक हो गया

13 दिसम्बर 1946 को जिन्ना ने लंदन के किंग्जवे हॉल में ब्रिटिश सरकार से मुस्लिम राष्ट्र के लिये भाव विह्वल अपील की- ‘पाकिस्तान में एक सौ मिलियन लोग केवल मुसलमान होंगे। भारत के उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में जो हमारी अपनी भूमि है और जहाँ हम सत्तर प्रतिशत बहुमत में हैं, में अपना एक राष्ट्र चाहते हैं। वहाँ हम अपनी जीवन शैली के अनुसार रह सकते हैं। हमें कहा गया कि तथाकथित एकीकृत भारत अंग्र्रेजों द्वारा बनाया गया है। वह तलवार के जोर पर था। उसे उसी तरह नियंत्रित रखा जा सकता है जैसे नियंत्रित रखा गया है। किसी के कहने पर भ्रमित न हों कि भारत एक है तथा वह एक क्यों नहीं रह सकता? हमसे पूछिये कि हम क्या चाहते हैं? मैं कहता हूँ कि पाकिस्तान। इसके अलावा हम कुछ नहीं चाहते।’

जवाहर लाल नेहरू ने फिर दोहराई अपनी गलती

जवाहर लाल नेहरू अत्यंत महत्वाकांक्षी राजनेता थे। वे पहले भी अनावश्यक वक्तव्य देकर अपनी महत्वाकांक्षाओं की बलिवेदी पर कैबीनेट मिशन को मृत्यु के मुख में धकेल चुके थे। इस बार उन्होंने देशी-राज्यों के शासकों के विरुद्ध वक्तव्य दे मारा। 21 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा ने नरेन्द्र मण्डल द्वारा गठित राज्य संविधान वार्ता समिति से वार्ता करने के लिए संविधान वार्ता समिति नियुक्त की। इ

सके प्रस्ताव पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा- ‘मैं स्पष्ट कहता हूँ कि मुझे खेद है कि हमें राजाओं की समिति से वार्ता करनी पड़ेगी। मैं सोचता हूँ कि राज्यों की तरफ से हमें राज्यों के लोगों से बात करनी चाहिए थी। मैं अब भी यह सोचता हूँ कि यदि वार्ता समिति सही कार्य करना चाहती है तो उसे समिति में ऐसे प्रतिनिधि सम्मिलित करने चाहिए किंतु मैं अनुभव करता हूँ कि इस स्तर पर आकर हम इसके लिए जोर नहीं डाल सकते।’

देशी राजा चाहते तो नेहरू के इस वक्तव्य के लिए वे कांग्रेस को कड़ी सजा दे सकते थे और संविधान सभा के गठन की प्रक्रिया को निष्फल कर सकते थे किंतु देशी राज्यों के शासकों ने देश-हित की बलिवेदी पर नेहरू की गलती को नजर-अंदाज कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुस्लिम लीग का षड़यंत्र

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कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने वायसराय के आमंत्रण पर अंतरिम सरकार में शामिल होना स्वीकार किया किंतु बाद में मुस्लिम लीग सरकार में शामिल नहीं हुई। जब नेहरू की अंतरिम सरकार जोरदार चलने लगी तो जिन्ना को होश आया। उसने सरकार में शामिल होकर सरकार को ठप्प करने का निश्चय किया इसके साथ ही मुस्लिम लीग का षड़यंत्र आरम्भ हो गया।

वीरेन्द्र कुमार बरनवाल ने लिखा है- ‘अंतरिम सरकार में लीग की भागीदारी वस्तुतः जिन्ना की गृहयुद्ध की रणनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मंच पर विस्तार था।’

जब मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में सम्मिलित हुई तो वायसराय लॉर्ड वैवेल ने कांग्रेस को सलाह दी कि वित्त मंत्रालय कांग्रेस के पास रहे तथा सरदार पटेल उसके मंत्री बनें। क्योंकि सरकार चलाने के लिये उन्हें कदम-कदम पर इस मंत्रालय की आवश्यकता होगी।

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पटेल तब तक जिन्ना तथा उसकी मुस्लिम लीग को अच्छी तरह समझ चुके थे कि यह मुस्लिम लीग का षड़यंत्र है इसलिये उन्होंने मुस्लिम लीग को वित्त मंत्रालय देना बेहतर समझा ताकि गृह मंत्रालय और रियासती मंत्रालय अपने पास रख सकें तथा इन मंत्रालयों का उपयोग आजादी के समय देशी रजवाड़ों को भारत में ही बनाये रखने में किया जा सके। मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली खाँ को अंतरिम सरकार में वित्तमंत्री बनाया गया किंतु लियाकत अली खाँ वित्त मंत्रालय मिलने से खुश नहीं था। वह अपने लिये गृह मंत्रालय चाहता था।

चौधरी मोहम्मद अली ने, लियाकत अली को समझाया कि यह पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस मंत्रालय के माध्यम से भी मुस्लिम लीग का षड़यंत्र बहुत अच्छी तरह सफल हो सकता है। वह ऐसा बजट बनाये कि कांग्रेस की सहायता करने वाले करोड़पतियों का दम निकल जाये। कांग्रेस अपने आप बिलबिला जाएगी।

चौधरी मोहम्मद अली भारतीय अंकेक्षण और लेखा सेवा का अधिकारी था। उसने लंदन से अर्थशास्त्र तथा विधि में शिक्षा प्राप्त की थी। चौधरी के सुझाव पर लियाकत अली ने वित्तमंत्री बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और खर्चे के मदों पर आपत्ति उठाने लगा। ऐसा करके मुस्लिम लीग, सरकार में होते हुए भी सरकार को ठप्प कर देना चाहती थी।

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लिखा है- ‘मंत्रिमण्डल के मुस्लिम लीगी सदस्य प्रत्येक कदम पर सरकार के कार्र्यों में बाधा डालते थे। वे सरकार में थे और फिर भी सरकार के खिलाफ थे। वास्तव में वे इस स्थिति में थे कि हमारे प्रत्येक कदम को ध्वस्त कर सकें। लियाकतअली खाँ ने जो प्रथम बजट प्रस्तुत किया, वह कांग्रेस के लिये नया झटका था। कांग्रेस की घोषित नीति थी कि आर्थिक असमानताओं को समाप्त किया जाये और पूंजीवादी समाज के स्थान पर शनैः शनैः समाजवादी पद्धति अपनायी जाये।

जवाहरलाल नेहरू और मैं भी युद्धकाल में व्यापारियों और उद्योगपतियों द्वारा कमाये जा रहे मुनाफे पर कई बार बोल चुके थे। यह भी सबको पता था कि इस आय का बहुत सा हिस्सा आयकर से छुपा लिया जाता था। आयकर वसूली के लिये भारत सरकार द्वारा सख्त कदम उठाये जाने की आवश्यकता थी। लियाकत अली ने जो बजट प्रस्तुत किया उसमें उद्योग और व्यापार पर इतने भारी कर लगाये कि उद्योगपति और व्यापारी त्राहि-त्राहि करने लगे।

इससे न केवल कांग्रेस को अपितु देश के व्यापार और उद्योग को स्थाई रूप से भारी क्षति पहुंचती। लियाकत अली ने बजट भाषण में एक आयोग बैठाने का प्रस्ताव किया जो उद्योगपतियों और व्यापारियों पर आयकर न चुकाने के आरोपों की जांच करे और पुराने आयकर की वसूली करे। उसने घोषणा की कि ये प्रस्ताव कांग्रेसी घोषणा पत्र के आधार पर तैयार किये गये हैं।

कांग्रेसी नेता उद्योगपतियों और व्यापारियों के पक्ष में खुले रूप में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे। लियाकत अली ने बहुत चालाकी से काम लिया था। उसने मंत्रिमण्डल की स्वीकृति पहले ही प्राप्त कर ली थी कि बजट साम्यवादी नीतियों पर आधारित हो। उसने करों आदि के विषय में मंत्रिमण्डल को कोई विस्तृत सूचना नहीं दी थी। जब उसने बजट प्रस्तुत किया तो कांग्रेसी नेता भौंचक्के रह गये। राजगोपालाचारी और सरदार पटेल ने अत्यंत आक्रोश से इस बजट का विरोध किया।’

वित्तमंत्री की हैसियत से लियाकत अली खाँ को सरकार के प्रत्येक विभाग में दखल देने का अधिकार मिल गया। वह प्रत्येक प्रस्ताव को या तो अस्वीकार कर देता था या फिर उसमें बदलाव कर देता था। उसने अपने कार्यकलापों से मंत्रिमण्डल को पंगु बना दिया। मंत्रिगण लियाकत अली खाँ की अनुमति के बिना एक चपरासी भी नहीं रख सकते थे।

लियाकत अली खाँ ने कांग्रेसी मंत्रियों को ऐसी उलझन में डाला कि वे कर्तव्यविमूढ़ हो गये। घनश्यामदास बिड़ला ने गांधीजी और जिन्ना के बीच खाई पाटने के उद्देश्य से लियाकत अली खाँ को समझाने की बहुत चेष्टा की किंतु इसका कोई परिणाम नहीं निकला। अंत में कांग्रेस के अनुरोध पर वायसराय ने लियाकत अली खाँ से बात की और करों की दरें काफी कम करवाईं।

कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच बढ़ती जा रही कड़वाहट को दूर करने के लिए 3-6 दिसम्बर 1946 को लंदन में एक सम्मेलन बुलाया गया जिसमें ब्रिटिश प्रधानमंत्री मि. एटली, वायसरॉय लॉर्ड वैवेल, कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना ने भाग लिया।

यह सम्मेलन भी कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के मतभेदों को दूर करने में असमर्थ रहा। इस सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार को भारत का भविष्य पूरी तरह से दिखाई दे गया। ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट संकेत कर दिया कि अब वह भारत के बंटवारे की तरफ बढ़ेगी। मुस्लिम लीग का षड़यंत्र हर हाल में सफल होना ही था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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