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कैसे बना पाकिस्तान

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कैसे बना पाकिस्तान

कैसे बना पाकिस्तान प्रश्न का उत्तर वस्तुतः भारत विभाजन का इतिहास ही है। इसी प्रश्न का हल ढूंढते हुए मैंने कैसे बना था पाकिस्तान शीर्षक से यह पुस्तक लिखी। इस पुस्तक को देश-विदेश में अपार लोकप्रियता प्राप्त हुई है।

इस पुस्तक का लेखन मैंने वर्ष 2017 में किया था। अब तक इस पुस्तक के दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इसका प्रसारण शुभदा प्रकाशन जोधपुर द्वारा किया गया है।

इस पुस्तक को लिखने का विचार मुझे वर्ष 1985 में आया था। यह वह दौर था जब श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली एवं उत्तर भारत के कुछ नगरों में सिक्खों का बड़ा नर-संहार होकर ही चुका था तथा पंजाब में ‘घल्लूघारा’ चल रहा था। उन्हीं दिनों मुझे भारत पाक सीमा पर स्थित गंगानर जिले के ‘बिलोचिया’ गांव जाने का अवसर मिला। इस गांव में सैंकड़ों कच्चे घर थे जो पूरी तरह खाली पड़े थे। गांव के एक कौने में हिन्दुओं की एक छोटी सी बस्ती थी।

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उन्हीं लोगों ने मुझे बताया कि आजादी से पहले यह गांव पूरी तरह आबाद था तथा इन खाली पड़े घरों में मुसलमान रहा करते थे जो 1947 में पाकिस्तान चले गए। उसके बाद से इन घरों में रहने के लिए कोई नहीं आया और इन्हें राजस्थान सरकार ने नजूल सम्पत्ति घोषित कर दिया है।

बिलोचिया से आने के कुछ ही दिनों बाद मुझे ‘हिन्दूमल कोट’ जाना पड़ा। यह पक्के घरों और साफ-सुथरी गलियों वाला एक सुंदर सा कस्बा था किंतु वहाँ भी सैंकड़ों घरों पर ताले पड़े हुए थे। मैंने लोगों से पूछा कि क्या इस कस्बे के लोग भी भारत विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए? वहाँ के लोगों ने मुझे बताया कि नहीं पाकिस्तान नहीं गए, अधिकतर लोग गंगानगर, बीकानेर, अबोहर, फाजिल्का तथा बम्बई आदि शहरों में गए हैं।

मैंने पूछा- ‘क्यों?’ तो उन्होंने बताया- ‘यह कस्बा भारत विभाजन से पहले अनाज की अच्छी मण्डी हुआ करता था किंतु भारत-विभाजन के बाद यह कस्बा अचानक पाकिस्तान की सीमा पर आ गया। इस कारण 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में यह कस्बा उजड़ गया। लोग अपने परिवारों को लेकर अन्य शहरों को चले गए और इस कस्बे का वाणिज्य-व्यापार ठप्प हो गया। उनके घरों पर आज भी ताले लगे हुए हैं।’

गंगानगर के पांच साल के प्रवास के दौरान मैं श्री स्वदेशराज वर्मा के परिवार के सम्पर्क में आया। यह एक आर्यसमाजी परिवार है और बहुत खुले हुए आधुनिक विचारों का परिवार है। भारत-विभाजन के समय श्री स्वदेशराज वर्मा अपने पिता डॉ. गोविंदराम तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बहावलपुर स्टेट के खानपुर कस्बे से हिन्दूमल कोट आए थे। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता कराची रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर हुआ करते थे।

भारत विभाजन के समय चूंकि पाकिस्तान से भारत आने वाली ट्रेनों में कत्ले-आम मचा हुआ था इसलिए यह परिवार कराची से वायुयान द्वारा दिल्ली पहुंचा। वहाँ से यह परिवार पहले मेरठ और फिर अमृतसर चला गया। श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता श्री मूलचंद मल्होत्रा का परिवार मूलतः मुल्तान के सक्खर क्षेत्र का रहने वाला था। श्री स्वदेश वर्मा और श्रीमती कैलाश वर्मा अक्सर भारत विभाजन के समय की आंखों-देखी घटनाओं का उल्लेख किया करते थे।

चूंकि उन दोनों के परिवारों की पृष्ठभूमि सम्पन्न थी तथा वे समय रहते ही वहाँ से निकल आए थे तब भी उनके मन एवं मस्तिष्क से उन दिनों की यादें मिटती नहीं थीं। यहाँ तक कि श्रीमती कैलाश वर्मा के पिता श्री मूलचंद मल्होत्रा को भारत सरकार ने मेरठ रेल्वे स्टेशन पर नियुक्ति भी दी किंतु वे अपने सगे-सम्बन्धियों, मित्रों एवं अपनी अचल सम्पत्ति के पाकिस्तान में छूट जाने के कारण मानसिक रूप से इतने परेशान हो चुके थे कि वे नौकरी छोड़कर अमृतसर चले गए। उनके संगी-साथी तथा घर-सम्पत्ति पाकिस्तान में ही रह गए थे।

मैं जब वर्मा-दम्पत्ति की बातें सुनता था तो अक्सर भारत-विभाजन की त्रासदी झेलने वाले उन लाखों लोगों के बारे में सोचा करता था जो पैदल ही पाकिस्तान से भारत आए थे या भारत से पाकिस्तान गए थे! पांच लाख लोग तो अपने गंतव्य पर पहुंचने से पहले ही दंगाइयों के क्रूर हाथों में पड़कर मौत की खाई मंे जा गिरे थे। भारत से पाकिस्तान का अलग होना, मानवीय इतिहास की एक क्रूरतम एवं रक्तरंजित घटना थी। संसार के कई अन्य देशों को भी ऐसी भीषण त्रासदियां झेलनी पड़ी हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि आदमी कभी सभ्य नहीं बन पाया, वह असभ्य था, है और रहेगा।

1980 के दशक में अजमेर प्रवास के दौरान मैं एक ऐसे परिवार के सम्पर्क में रहा जिसकी गृह-स्वामिनी श्रीमती द्रौपदी यादव अपने पिता एवं उनके परिवार के साथ भारत की आजादी से लगभग दो साल पहले उस समय बर्मा से भारत आई थीं जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज एवं जापानी सेनाएं अंग्रेज सेनाओं को बर्मा से मारकर भगा रही थीं। श्रीमती यादव जो उस समय छोटी बच्ची ही थीं, का परिवार किसी बड़े दल के साथ पैदल चल कर ही बर्मा से असम तक आया था और वहाँ से इलाहाबाद गया।

इस दौरान उन्हें युद्धक-विमानों से होने वाली बम-वर्षा से लेकर हिंसक हाथियों तथा पुलिस के सिपाहियों के अत्याचारों का सामना करना पड़ा। इन्हीं में से एक घटना के दौरान उनके एक भाई अथवा एक बहिन की मृत्यु हो गई थी। श्रीमती द्रौपदी भी प्रायः उस पलायन के बहुत से लोमहर्षक प्रसंग कभी हँस कर तो कभी रो कर सुनाया करती थीं।

मेरे पितामह श्री मुकुंदी लाल गुप्ता भी ई.1947 में यमुनाजी के किनारे हुए मेवों के आक्रमण के समय अपने कुनबे के युवकों तथा संगी-साथियों के साथ सशस्त्र संघर्ष में सम्मिलित हुए थे। मेरी दादी श्रीमती जय देवी (अब स्वर्गीय) एवं पिताजी अक्सर उस संघर्ष की चर्चा करते रहे हैं।

वर्ष 1993 में मैंने भारत-पाकिस्तान की सरहद पर स्थित आकुड़ियां गांव देखा था। यह जालोर जिले के नेहड़ क्षेत्र में स्थित है जहाँ लूनी नदी का मुहाना है। यह पूरी तरह से सुनसान और उजड़ा हुआ गांव था। पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि भारत की आजादी से पहले यह भरा-पूरा गांव था जिसमें मुसलमान परिवार रहा करते थे किंतु आजादी के बाद इस गांव के सारे लोग भारत की सीमा पार करके पाकिस्तान के क्षेत्र में चले गए और उन्होंने वहाँ पर एक नया गांव बसा लिया जिसका नाम भी आकुड़िया है। अब भारतीय आकुड़िया पूरी तरह सुनसान है।

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के समय जो कुछ हुआ, वह भी इस बात की पुष्टि करता है कि सभ्यता के कैनवास पर मनुष्य सदैव गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करता आया है। नयी जीत की आशा में वह पुरानी उपलब्धियों को आग में झौंक डालता है। मनपसंद खिलौना प्राप्त करने की प्रत्याशा में वह अपनी हथेली पर रखे खिलौने को क्रूरता से तोड़ डालता है। जो कुछ भी मानव के पास है, उसमें वह कभी भी संतुष्ट नहीं है, और जो कुछ उसे संतुष्ट कर सके, उसे कभी भी मिलता नहीं है।

ई.1906 में भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, तब से लेकर ई.1947 तक मुस्लिम लीग पाकिस्तान के लिये झगड़ती रही और उसे लेकर ही रही। ऊपरी तौर से देखने पर पाकिस्तान का निर्माण इन्हीं 41 वर्षों के संघर्ष का परिणाम लगता है किंतु सच्चाई यह है कि पाकिस्तान की नींव तो ई.712 में मुहम्मद बिन कासिम ने उसी समय डाल दी थी जब उसने सिंध पर आक्रमण करके महाराजा दाहिर सेन और उनके राज्य को समाप्त किया था। तब से लेकर ई.1947 तक तिल-तिल करके भारत का इतिहास पाकिस्तान की ओर बढ़ता रहा।

मेरी दृष्टि में पाकिस्तान इकतालीस वर्ष के संघर्ष का परिणाम नहीं था। अपितु पूरे 1225 वर्ष के संघर्ष का परिणाम था। भारत के इतिहास में यह पूरी अवधि नफरत, हिंसा, रक्तपात और दंगों से भरी हुई थी।

कैसे बना था पाकिस्तान पुस्तक में भारत विभाजन के समय हुए राजनीतिक संघर्ष की एक झलक भर है। इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य इतिहास के उन पन्नों को टटोल कर देखना है ताकि हम भविष्य में उन्हीं गलतियों को फिर से न दोहराएं जिनके कारण हम भारत-पाकिस्तान के विभाजन के खतरनाक निर्णय पर पहुंचे थे। आज भी हमारे सामने अवसर है कि हम शांति की साधना करें तथा अच्छे पड़ौसियों की तरह जिम्मेदारी के साथ रहें।

प्रत्येक भारतीय की पहली और आखिरी इच्छा भारत-पाकिस्तान के बीच शांति की स्थापना करने की ही है किंतु केवल भारत की ओर से की गई शांति की इच्छाएं भारत-पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित नहीं कर सकतीं। इसके लिए पाकिस्तान के राष्ट्रीय चरित्र में भी शांति की लहर उठनी चाहिए। पाकिस्तानी शासकों द्वारा की जा रही नफरतों की खेती के बीच भारत की ओर से जाने वाले शांति के कबूतर लहूलुहान ही किए जाते रहेंगे और शांति केवल एक ढकोसला सिद्ध होगी।

कैसे बना था पाकिस्तान शीर्षक से लिखी गई यह पुस्तक पाकिस्तान निर्माण की पूरी कहानी नहीं है। यह भारत-पाकिस्तान विभाजन की दुखःद त्रासदी की पृष्ठभूमि पर लिखी गई एक संक्षिप्त गाथा है जो उस समय के कुछ ऐसे दृश्यों से साक्षात्कार करवाती है जिनकी पृष्ठभूमि में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया।

इस पुस्तक में कुल 11 अध्याय हैं जिनमें भारत में इस्लाम के प्रवेश से लेकर भारत के तीन टुकड़ों में बंटने अर्थात् भारत पाकिस्तान एवं बांगला देश के निर्माण तक का इतिहास लिखा गया है।

यह पुस्तक भारत विभाजन का इतिहास पढ़ने वाले पाठकों के लिए बेहद उपयोगी है। कृपया अपने मित्रों को भी इस पुस्तक के बारे में जानकारी दें।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नेहरू की अंतरिम सरकार

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कैबीनेट मिशन ने भारत की आजादी के लिए जो योजना बनाई थी, उसमें एक ऐसी अंतरिम सरकार के गठन का प्रस्ताव किया गया था जिसमें समस्त सदस्य हिन्दू हों। वायसराय के निमंत्रण पर नेहरू की अंतरिम सरकार का गठन हुआ।

लॉर्ड वैवेल ने कैबीनेट मिशन के प्रस्तावों के अनुसार 2 सितम्बर 1946 को दिल्ली में अंतरिम सरकार का गठन करवाया। इसमें केवल कांग्रेसी नेता शामिल हुए। इस सरकार में जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया। साथ ही सरदार पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, एम. आसफ अली, सी. राजगोपालाचारी, शरतचंद्र बोस, डॉ. जॉन मथाई, सरदार बलदेवसिंह, सर शफाअत अहमद खाँ, जगजीवनराम, सैयद अली जहीर ओर कोवेसजी होरमुसजी भाभा को मंत्री बनाया गया।

पाँच पद स्थानापन्न रखे गए जो कि मुस्लिम लीग के लिए थे। कांग्रेस ने तीन गैर-मुस्लिम लीगी मुसलमानों को मंत्री बनाया था, यह मुस्लिम लीग के लिए किसी भी परिस्थिति में सह्य नहीं हुआ।

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जिन्ना ने घोषणा की- ‘वायसराय ने मुस्लिम लीग और मुसलमानों पर जबर्दस्त चोट की है किंतु मुझे विश्वास है कि भारत के मुसलमान दृढ़ता और साहस से इस आघात को झेल लेंगे। इस अंतरिम सरकार में अपने लिए न्यायपूर्ण और सम्मानजनक भागीदारी हासिल करने में असफल रहने से उन्हें सबक मिलेगा।

….. मैं अभी कहता हूँ कि जो कदम उन्होंने उठाया है, उसमें न तो कोई बुद्धिमानी दिखाई है और न ही राजनीतिज्ञता का परिचय दिया है। इसके खतरनाक और गंभीर परिणाम निकल सकते हैं। ऊपर से उन्होंने तीन मुसलमानों को नामजद करके हमारे आहत मन को और अधिक आहत किया है। जबकि उन्हें पता है कि उन्हें मुसलमान-भारत का सम्मान और विश्वास हासिल नहीं है।’

कांग्रेस द्वारा अंतरिम सरकार की शपथ लेने की पूर्व संध्या पर 1 सितम्बर 1946 को बम्बई साम्प्रदायिक दंगों से थर्रा उठा।

सेंडहर्स्ट रोड पर मुसलमानों के घरों पर काले झण्डे लहराने लगे। कर्फ्यू लगा दिया गया, सेना बुला ली गई परन्तु एक रात्रि तक चले हिंसा के अनुष्ठान में 35 लोगों की जान ले ली गईं और 175 व्यक्ति घायल हो गए। एक सप्ताह तक बम्बई में छिटपुट दंगे चलते रहे। 10 सितम्बर तक 200 नागरिकों की जान जा चुकी थी। कराची में भी हिंसा हुई किंतु लीग के मुख्यमंत्री शेख गुलाम हुसैन द्वारा प्रसारित शांति और सहिष्णुता की अपील से शहर के मुसलमानों को अपने जज्बात थामने में मदद मिली।

सिंध के अंग्रेज मुख्य सचिव का कहना था- ‘कलकत्ता की खौफनाक घटनाओं के कारण एक पक्ष तो मनहूस नाराजगी लिए बैठा है और दूसरा बेवकूफाना घबराहट का शिकार है।’

मुख्य सचिव की रिपोर्ट के अनुसार दोनों समुदाय खुफिया तौर पर हथियारबंद होने में लगे हैं। 2 सितम्बर 1946 को जवाहरलाल ने अंतरिम सरकार का गठन किया तथा 7 सितम्बर को देश की जनता के नाम प्रसारित संदेश में नेहरू ने कहा- ‘इस प्राचीन धरती पर एक नई सरकार बनी है। हम इसे अंतरिम या अस्थाई सरकार कहते हैं। ….. हमारी यह प्राचीन और प्यारी भूमि एक बार फिर तकलीफों और दुःखों से निकल कर अपनी अस्मिता प्राप्त कर रही है। एक बार फिर युवावस्था प्राप्त करके उसकी आंखों में साहस की चमक आई है। एक बार फिर उसने स्वयं में विश्वास और अपनी मंजिल के दर्शन किए हैं।’

सरकार के शपथ लेने के कुछ दिना बाद अंतरिम सरकार के गैर-मुस्लिमलीगी मंत्री सर शफात अहमद खाँ को शिमला में मुस्लिम लीग के कट्टरपंथियों ने चाकू से सात बार गोद डाला। वैवेल द्वारा बार-बार प्रयास किए जाने पर तथा नेहरू द्वारा अपने मंत्रिमण्डल से गैर-मुस्लिम लीगी मुसलमान मंत्रियों एवं सुभाष चंद्र बोस के भाई शरत्चंद्र बोस को मंत्रिमण्डल से हटा दिए जाने पर मुस्लिम लीग ने भी अंतरिम सरकार में शामिल होने की स्वीकृति दे दी ताकि कांग्रेस सरकार को परेशान किया जा सके।

मुस्लिम लीग की तरफ से लियाकत अली, आई. आई. चुंदरीगर, अब्दुल रब निश्तर और जोगेन्द्रनाथ मण्डल मंत्री बनाए गए। जिन्ना ने जोगेन्द्रनाथ को संभवतः इसलिए मुस्लिम लीग की ओर से मंत्री बनवाया ताकि कांग्रेस यह दावा न करे कि वह देश के सम्पूर्ण हिन्दुओं का नेतृत्व करती है।

2 नवम्बर को मुस्लिम लीग के सदस्य अंतरिम सरकार में सम्मिलित होने के लिए सौगंध लेने के लिए वायसराय भवन में गए। नेहरू भी वहाँ पर गए थे। इनकी मोटर गाड़ी भवन के बाहर खड़ी थी और कहा जाता है कि मुसलमान भीड़ ने मोटर गाड़ी को आग लगा दी।

इसी दिन लियाकत अली इत्यादि मुसलमान नेता केन्द्रीय विधान सभा में भाग लेने के लिए आए जवाहर लाल की गाड़ी को मुसलमान भीड़ ने घेर लेने का यत्न किया और यदि उस समय कुछ हिन्दू युवक नेहरू को बचाने लिए उस मुस्लिम भीड़ पर आक्रमण न कर देते, तो नेहरू पर क्या बीतती, कहना कठिन है।

उसी शाम दिल्ली के सदर बाजाद में मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने गाड़ियां रोक-रोक कर हिन्दुओं को मुसलमानों से पृथक् करके मारना आरम्भ कर दिया। हिन्दू भी उनके विरोध में उतर आए। इससे कई घण्टे तक मार-काट की स्थिति रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

संविधान सभा

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कैबीनेट योजना के प्रस्तावों के तहत कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने संविधान सभा में भाग लेने पर अपनी सहमति दी थी किंतु बाद में कुछ बिंदुओं की व्याख्या पर दोनों दलों में विवाद हो गया। जुलाई 1946 में संविधान निर्मात्री समिति के सदस्यों का चुनाव संपन्न हुआ जिसमें कांग्रेस के 212 सदस्यों के मुकाबले मुस्लिम लीग के मात्र 73 सदस्य ही हो पाये। मुस्लिम लीग ने अपने आप को इससे अलग कर लिया। वह संविधान सभा के जाल में फंसना नहीं चाहती थी।

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जिन्ना ने कहा– ‘हिंदुस्तान में गतिरोध हिन्दुस्तानियों और अंग्रेजों के बीच उतना ज्यादा नहीं। वह हिन्दू-कांग्रेस और मुसलिम-लीग के बीच है। …… जब तक पाकिस्तान मंजूर नहीं किया जाता, कुछ भी हल नहीं किया जा सकता और न हल किया जा सकेगा। …… एक नहीं दो संविधान सभाएं होंगी, एक हिन्दुस्तान का संविधान बनाने और निश्चित करने के लिए और दूसरी पाकिस्तान का संविधान बनाने और निश्चित करने के लिए। …… हम भारतीय समस्या को दस मिनट में हल कर सकते हैं, यदि मि. गांधी कह दें कि वे सहमत हैं कि पाकिस्तान होना चाहिए तथा अपनी वर्तमान सीमाओं के साथ छः प्रांतों- सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, बंगाल और असम के बने चौथाई भारत को लेकर पाकिस्तान राज्य बनेगा।’

जिन्ना के इस वक्तव्य पर गांधीजी ने टिप्पणी की- ‘हो सकता है कि केवल कांग्रेस प्रांत और देशी नरेश ही संविधान सभा में सम्मिलित हों। मेरे विचार से यह शोभनीय और पूर्णतः तथ्यसंगत होगा।’ 9 दिसम्बर 1946 को विधान निर्मात्री समिति ने कार्य करना आरम्भ किया। डी. आर. मानकेकर ने लिखा है- ‘तनाव, निराशा एवं अनिश्चतता के वातावरण में विधान निर्मात्री समिति ने कार्य करना आरंभ किया।’

लंदन में जिन्ना पाकिस्तान को लेकर भावुक हो गया

13 दिसम्बर 1946 को जिन्ना ने लंदन के किंग्जवे हॉल में ब्रिटिश सरकार से मुस्लिम राष्ट्र के लिये भाव विह्वल अपील की- ‘पाकिस्तान में एक सौ मिलियन लोग केवल मुसलमान होंगे। भारत के उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में जो हमारी अपनी भूमि है और जहाँ हम सत्तर प्रतिशत बहुमत में हैं, में अपना एक राष्ट्र चाहते हैं। वहाँ हम अपनी जीवन शैली के अनुसार रह सकते हैं। हमें कहा गया कि तथाकथित एकीकृत भारत अंग्र्रेजों द्वारा बनाया गया है। वह तलवार के जोर पर था। उसे उसी तरह नियंत्रित रखा जा सकता है जैसे नियंत्रित रखा गया है। किसी के कहने पर भ्रमित न हों कि भारत एक है तथा वह एक क्यों नहीं रह सकता? हमसे पूछिये कि हम क्या चाहते हैं? मैं कहता हूँ कि पाकिस्तान। इसके अलावा हम कुछ नहीं चाहते।’

जवाहर लाल नेहरू ने फिर दोहराई अपनी गलती

जवाहर लाल नेहरू अत्यंत महत्वाकांक्षी राजनेता थे। वे पहले भी अनावश्यक वक्तव्य देकर अपनी महत्वाकांक्षाओं की बलिवेदी पर कैबीनेट मिशन को मृत्यु के मुख में धकेल चुके थे। इस बार उन्होंने देशी-राज्यों के शासकों के विरुद्ध वक्तव्य दे मारा। 21 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा ने नरेन्द्र मण्डल द्वारा गठित राज्य संविधान वार्ता समिति से वार्ता करने के लिए संविधान वार्ता समिति नियुक्त की। इ

सके प्रस्ताव पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा- ‘मैं स्पष्ट कहता हूँ कि मुझे खेद है कि हमें राजाओं की समिति से वार्ता करनी पड़ेगी। मैं सोचता हूँ कि राज्यों की तरफ से हमें राज्यों के लोगों से बात करनी चाहिए थी। मैं अब भी यह सोचता हूँ कि यदि वार्ता समिति सही कार्य करना चाहती है तो उसे समिति में ऐसे प्रतिनिधि सम्मिलित करने चाहिए किंतु मैं अनुभव करता हूँ कि इस स्तर पर आकर हम इसके लिए जोर नहीं डाल सकते।’

देशी राजा चाहते तो नेहरू के इस वक्तव्य के लिए वे कांग्रेस को कड़ी सजा दे सकते थे और संविधान सभा के गठन की प्रक्रिया को निष्फल कर सकते थे किंतु देशी राज्यों के शासकों ने देश-हित की बलिवेदी पर नेहरू की गलती को नजर-अंदाज कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुस्लिम लीग का षड़यंत्र

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कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने वायसराय के आमंत्रण पर अंतरिम सरकार में शामिल होना स्वीकार किया किंतु बाद में मुस्लिम लीग सरकार में शामिल नहीं हुई। जब नेहरू की अंतरिम सरकार जोरदार चलने लगी तो जिन्ना को होश आया। उसने सरकार में शामिल होकर सरकार को ठप्प करने का निश्चय किया इसके साथ ही मुस्लिम लीग का षड़यंत्र आरम्भ हो गया।

वीरेन्द्र कुमार बरनवाल ने लिखा है- ‘अंतरिम सरकार में लीग की भागीदारी वस्तुतः जिन्ना की गृहयुद्ध की रणनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मंच पर विस्तार था।’

जब मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में सम्मिलित हुई तो वायसराय लॉर्ड वैवेल ने कांग्रेस को सलाह दी कि वित्त मंत्रालय कांग्रेस के पास रहे तथा सरदार पटेल उसके मंत्री बनें। क्योंकि सरकार चलाने के लिये उन्हें कदम-कदम पर इस मंत्रालय की आवश्यकता होगी।

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पटेल तब तक जिन्ना तथा उसकी मुस्लिम लीग को अच्छी तरह समझ चुके थे कि यह मुस्लिम लीग का षड़यंत्र है इसलिये उन्होंने मुस्लिम लीग को वित्त मंत्रालय देना बेहतर समझा ताकि गृह मंत्रालय और रियासती मंत्रालय अपने पास रख सकें तथा इन मंत्रालयों का उपयोग आजादी के समय देशी रजवाड़ों को भारत में ही बनाये रखने में किया जा सके। मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली खाँ को अंतरिम सरकार में वित्तमंत्री बनाया गया किंतु लियाकत अली खाँ वित्त मंत्रालय मिलने से खुश नहीं था। वह अपने लिये गृह मंत्रालय चाहता था।

चौधरी मोहम्मद अली ने, लियाकत अली को समझाया कि यह पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस मंत्रालय के माध्यम से भी मुस्लिम लीग का षड़यंत्र बहुत अच्छी तरह सफल हो सकता है। वह ऐसा बजट बनाये कि कांग्रेस की सहायता करने वाले करोड़पतियों का दम निकल जाये। कांग्रेस अपने आप बिलबिला जाएगी।

चौधरी मोहम्मद अली भारतीय अंकेक्षण और लेखा सेवा का अधिकारी था। उसने लंदन से अर्थशास्त्र तथा विधि में शिक्षा प्राप्त की थी। चौधरी के सुझाव पर लियाकत अली ने वित्तमंत्री बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और खर्चे के मदों पर आपत्ति उठाने लगा। ऐसा करके मुस्लिम लीग, सरकार में होते हुए भी सरकार को ठप्प कर देना चाहती थी।

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लिखा है- ‘मंत्रिमण्डल के मुस्लिम लीगी सदस्य प्रत्येक कदम पर सरकार के कार्र्यों में बाधा डालते थे। वे सरकार में थे और फिर भी सरकार के खिलाफ थे। वास्तव में वे इस स्थिति में थे कि हमारे प्रत्येक कदम को ध्वस्त कर सकें। लियाकतअली खाँ ने जो प्रथम बजट प्रस्तुत किया, वह कांग्रेस के लिये नया झटका था। कांग्रेस की घोषित नीति थी कि आर्थिक असमानताओं को समाप्त किया जाये और पूंजीवादी समाज के स्थान पर शनैः शनैः समाजवादी पद्धति अपनायी जाये।

जवाहरलाल नेहरू और मैं भी युद्धकाल में व्यापारियों और उद्योगपतियों द्वारा कमाये जा रहे मुनाफे पर कई बार बोल चुके थे। यह भी सबको पता था कि इस आय का बहुत सा हिस्सा आयकर से छुपा लिया जाता था। आयकर वसूली के लिये भारत सरकार द्वारा सख्त कदम उठाये जाने की आवश्यकता थी। लियाकत अली ने जो बजट प्रस्तुत किया उसमें उद्योग और व्यापार पर इतने भारी कर लगाये कि उद्योगपति और व्यापारी त्राहि-त्राहि करने लगे।

इससे न केवल कांग्रेस को अपितु देश के व्यापार और उद्योग को स्थाई रूप से भारी क्षति पहुंचती। लियाकत अली ने बजट भाषण में एक आयोग बैठाने का प्रस्ताव किया जो उद्योगपतियों और व्यापारियों पर आयकर न चुकाने के आरोपों की जांच करे और पुराने आयकर की वसूली करे। उसने घोषणा की कि ये प्रस्ताव कांग्रेसी घोषणा पत्र के आधार पर तैयार किये गये हैं।

कांग्रेसी नेता उद्योगपतियों और व्यापारियों के पक्ष में खुले रूप में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे। लियाकत अली ने बहुत चालाकी से काम लिया था। उसने मंत्रिमण्डल की स्वीकृति पहले ही प्राप्त कर ली थी कि बजट साम्यवादी नीतियों पर आधारित हो। उसने करों आदि के विषय में मंत्रिमण्डल को कोई विस्तृत सूचना नहीं दी थी। जब उसने बजट प्रस्तुत किया तो कांग्रेसी नेता भौंचक्के रह गये। राजगोपालाचारी और सरदार पटेल ने अत्यंत आक्रोश से इस बजट का विरोध किया।’

वित्तमंत्री की हैसियत से लियाकत अली खाँ को सरकार के प्रत्येक विभाग में दखल देने का अधिकार मिल गया। वह प्रत्येक प्रस्ताव को या तो अस्वीकार कर देता था या फिर उसमें बदलाव कर देता था। उसने अपने कार्यकलापों से मंत्रिमण्डल को पंगु बना दिया। मंत्रिगण लियाकत अली खाँ की अनुमति के बिना एक चपरासी भी नहीं रख सकते थे।

लियाकत अली खाँ ने कांग्रेसी मंत्रियों को ऐसी उलझन में डाला कि वे कर्तव्यविमूढ़ हो गये। घनश्यामदास बिड़ला ने गांधीजी और जिन्ना के बीच खाई पाटने के उद्देश्य से लियाकत अली खाँ को समझाने की बहुत चेष्टा की किंतु इसका कोई परिणाम नहीं निकला। अंत में कांग्रेस के अनुरोध पर वायसराय ने लियाकत अली खाँ से बात की और करों की दरें काफी कम करवाईं।

कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच बढ़ती जा रही कड़वाहट को दूर करने के लिए 3-6 दिसम्बर 1946 को लंदन में एक सम्मेलन बुलाया गया जिसमें ब्रिटिश प्रधानमंत्री मि. एटली, वायसरॉय लॉर्ड वैवेल, कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना ने भाग लिया।

यह सम्मेलन भी कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के मतभेदों को दूर करने में असमर्थ रहा। इस सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार को भारत का भविष्य पूरी तरह से दिखाई दे गया। ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट संकेत कर दिया कि अब वह भारत के बंटवारे की तरफ बढ़ेगी। मुस्लिम लीग का षड़यंत्र हर हाल में सफल होना ही था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

प्रधानमंत्री एटली की घोषणा

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प्रधानमंत्री एटली की घोषणा – जिन्ना को मिल गया पाकिस्तान

प्रधानमंत्री एटली की घोषणा

भारत में चल रही अंतरिम सरकार की मुस्लिम लीग द्वारा बनाई जा रही गत को देखकर अंग्रेजों ने भारत से किसी भी तरह छुटकारा पाने का मन बना लिया। इसलिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने अचानक 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश-पार्लियामेंट में घोषणा की। प्रधानमंत्री एटली की घोषणा इस प्रकार थी-

‘अनिश्चितता की वर्तमान स्थिति खतरे से भरी है और अनिश्चित काल तक जारी नहीं रखी जा सकती। महामहिम की सरकार स्पष्ट कर देना चाहती है कि 20 जून 1948 के पहले ही जिम्मेदार भारतीय हाथों में सत्ता के हस्तांतरण को पूरा करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का उसका निश्चित संकल्प है।

……….. अगर पूर्ण प्रतिनिधित्व करने वाली संविधान सभा जून 1948 तक कोई संविधान तैयार नहीं कर सकी तो महामहिम की सरकार विचार करेगी कि ब्रिटिश-भारत में केन्द्रीय सत्ता किसके हाथ में सौंपी जाए। किसी एक केन्द्रीय सरकार के हाथों में या कुछ अंचलों में प्रांतीय सरकारों के हाथों में।’

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इसी प्रस्ताव के अंत में लॉर्ड वैवेल के स्थान पर लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का नया वायसराय बनाने की घोषणा की गई थी ताकि वे भारत के शासन का उत्तरदायित्व भारतीय हाथों में इस प्रकार हस्तांतरित कर सकें जो भारत के भावी सुख और सम्पन्नता को सर्वोत्तम ढंग से सुनिश्चित कर सके। इस घोषणा में प्रयुक्त शब्दों की आंच को प्रत्येक भारतीय सहज ही समझ सकता था। घोषणा का मंतव्य स्पष्ट था- सत्ता का हस्तांतरण हर हालत में होगा, चाहे जिसे भी करना पड़े, जैसे भी करना पड़े। चाहे भारत एक रहे या उसके टुकड़े हों।

इसीलिए सत्ता के हस्तांतरण को महामना सम्राट की उदारता पूर्वक की गई घोषणा नहीं कहा जा सकता था अपितु इसके माध्यम से छिपे-शब्दों में चुनौती दी गई कि इस बार जिस भारतीय तत्व ने अंग्रेज सरकार पर अपनी शर्तें मनवाने का दबाव बनाने का प्रयास किया, वह निश्चित रूप से घाटे में रहेगा और सत्ता का हस्तांतरण उसे कर दिया जाएगा जो अंग्रेज सरकार की बात मानेगा।

इस प्रकार इस बार सत्ता हस्तांतरण की जिम्मेदारी अंग्रेजों पर कम रह गई थी और भारतीयों पर अधिक आ गई थी कि वे शांति-पूर्वक आजादी ले लें……… अन्यथा अंग्रेज भारत को लावारिस छोड़कर चले जाएंगे।

प्रधानमंत्री एटली की घोषणा से कांग्रेस समझ गई कि जिन्ना को पाकिस्तान मिल गया है। अब अंग्रेजों से लड़ने का समय समाप्त हो चुका है, अब उन्हें मुस्लिम लीग के हाथों से अपने देश को बचाना है, देश का कम से कम नुक्सान करके, अधिक से अधिक हिस्सा बचाना है। मुस्लिम लीग भी समझ गई कि अब उन्हें अंग्रेजों की तरफ से चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें अपने मुक्के केवल कांग्रेस पर बर्बाद करने हैं तथा भारत के देशी-राजाओं और दलित नेताओं को अपने पक्ष में करके अधिक से अधिक पाकिस्तान प्राप्त करना है।

एक ऐसा पाकिस्तान जिसमें नेहरू, गांधी और पटेल न हों, कांग्रेस न हो, जनेऊधारी मालवीय जैसे पण्डित न हों, केवल जिन्ना हो, लियाकत अली हो, चौधरी मोहम्मद अली हो और आंख मूंद कर उनके पीछे चलने वाले सुहरावर्दी जैसे अनुयाई हों।

इसलिए प्रधानमंत्री एटली की घोषणा के साथ ही भारत में अफरा-तफरी मच गई। किसी को आशा नहीं थी कि इंग्लैण्ड अपनी महारानी के मुकुट में जड़े सबसे कीमती हीरे को इतनी आसानी से छोड़ देगा। इसका श्रेय किसी एक तत्व को नहीं दिया जा सकता था। न तो भारत में चल रहे स्वाधीनता संग्राम को, न कांग्रेस को, न गांधीजी को…… जैसा कि बाद में दावा किया गया। अपितु यह एक बहुत सी घटनाओं और घटना-चक्रों का सम्मिलित परिणाम था जिनमें से कुछ इस प्रकार थीं-

(1) अमरीका, रूस, फ्रांस, चीन जैसी अंतराष्ट्रीय शक्तियां इंग्लैण्ड पर दबाव डाल रही थीं कि वह भारत को स्वतंत्र करे।

(2) भारत में चल रहे कम्यूनिस्ट आंदोलनों के कारण मजदूरों द्वारा हड़तालों की ऐसी शृंखला आरम्भ कर दी गई थी जिससे निबट पाना अंग्रेज सरकार के वश में नहीं रह गया था।

(3) द्वितीय विश्व-युद्ध के मोर्चे पर इंग्लैण्ड की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि वह भारत जैसे बड़े देश पर नियंत्रण रखने योग्य ही नहीं रह गया था।

(4) नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आकस्मिक निधन से भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति अविश्वास अपने चरम पर पहुंच गया था। अधिकांश भारतीयों का मानना था कि सुभाष बाबू की हत्या की गई है और इस कार्य में अंग्रेज शामिल हैं।

(5) मुस्लिम लीग सीधी कार्यवाही दिवस का आयोजन करके यह सिद्ध कर चुकी थी कि उसके गुण्डों को रोक पाना किसी के वश में नहीं है, न अंग्रेजी हुकूमत के और न कांग्रेस के।

(6) कांग्रेस भी अब अंग्रेजों से ज्यादा मुस्लिम लीग से छुटकारा पाने को व्याकुल हो उठी थी।

(7) भारतीय सेनाओं के सशस्त्र विद्रोहों में अंग्रेज अधिकारियों की हत्याएं होने से अंग्रेजों का आत्म-विश्वास पूरी तरह नष्ट हो गया।

 इन सबसे एक-साथ निबटने की शक्ति निश्चित रूप से ब्रिटेन में नहीं रह गई थी। अब परिस्थिति उस दौर में पहुंच चुकी थी जिसमें से अंग्रेजों को भारत से अपना पीछा छुड़ाना था ताकि भारत में रह रहे अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवार सुरक्षित रूप से भारत से निकलकर इंग्लैण्ड पहुंच सकें। इसके लिए उन्हें भारत के दो तो क्या हजार टुकड़े भी करने पड़ते तो अंग्रेज उससे नहीं हिचकिचाते।

प्रधानमंत्री एटली की घोषणा ने मुसलमानों को मुंहमांगा वरदान दे दिया था किंतु भारत के अंग्रेजों को चिंतित कर दिया था और हिन्दुओं को दुखी कर दिया था। हिन्दू इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि एक दिन मुसलमान उनके प्यारे भारत के टुकड़े कर देंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सिक्खों का नरसंहार

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गुरु नानक के उपदेशों से प्रभावित होकर बहुत से हिन्दू उनके शिष्य हो गए थे। उन्हें पंजाबी में सिक्ख कहा जाता था। सिक्खों ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए बड़े बलिदान दिए थे। जब जिन्ना को पाकिस्तान मिल गया तो उसने पंजाब के सिक्खों का नरसंहार करने की योजना बनाई ताकि सिक्ख पंजाब से भाग जाएं तथा पूरा पंजाब पाकिस्तान में शामिल हो जाए!

प्रधानमंत्री एटली की घोषणा से जिन्ना समझ गया था कि अब पाकिस्तान बनने से कोई नहीं रोक सकता फिर भी वह स्वयं को हर स्थिति के लिए तैयार रखना चाहता था। पाकिस्तान के निर्माण को स्वीकार न किए जाने की संभावित स्थिति में जिन्ना बहुत ही चालाकी से मुसलमानों को एक खूनी गृहयुद्ध के लिए तैयार कर रहा था। उसका अगला कदम बहुत निर्णायक था।

वह जानता था कि उसे पाकिस्तान मुस्लिम लीग के मंचों पर दिए गए राजनीतिक भाषणों से नहीं मिलेगा। पाकिस्तान मिलेगा मुस्लिम नेशनल गार्ड्स के चमकीले और पैने हथियारों से, जिसकी तैयारी वह पिछले सात साल से कर रहा था और सीधी कार्यवाही में वह हथियारों को सफल प्रयोग कर भी चुका था।

15 जून 1940 को बम्बई के मुस्लिम लीग अधिवेशन में मुसलमानों की जान-माल की हिफाजत के लिए मुस्लिम नेशनल गार्ड को संगठित तथा मजबूत करने के लिए प्रांतीय मुस्लिीम लीगों को दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। तभी से यह स्पष्ट था कि मुस्लिम लीग जल्दी या बाद में एक गृहयुद्ध आरम्भ करने वाली थी।

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मुस्लिम नेशनल गार्ड् को विभिन्न प्रकार के हथियारों से लड़ने, चाकू मारकर हत्या करने और धावा बोलने का प्रशिक्षण दिया जाता था। इस सेना के लिए बड़ी संख्या में हथियार एकत्रित किये गये थे और भारतीय सेना के विघटित मुस्लिम सैनिकों को लीग की सेना में भर्ती किया गया था। इस सेना का विस्तार एवं सैन्य उपकरणों से लैस होना निरंतर जारी रहता था।

इसके दो संगठन बनाये गये थे, एक था मुस्लिम लीग वालंटियर कॉर्प तथा दूसरा था मुस्लिम नेशनल गार्ड। नेशनल गार्ड मुस्लिम लीग का गुप्त संगठन था। उसकी सदस्यता गुप्त थी और उसके अपने प्रशिक्षण केंद्र एवं मुख्यालय थे जहाँ उसके सदस्यों को सैन्य प्रशिक्षण और ऐसे निर्देश दिये जाते थे जो उन्हें दंगों के समय लाभ पहुंचायें, जैसे लाठी, भाले और चाकू का इस्तेमाल। मुस्लिम नेशनल गार्ड के यूनिट कमाण्डरों को ‘सालार’ कहा जाता था।

नेशनल गार्ड के लम्बे चौड़े जवान, हथियारों से लैस होकर जिन्ना के चारों ओर बने रहकर उसकी सुरक्षा करते थे। जनवरी 1947 में पंजाब पुलिस ने मुस्लिम नेशनल गार्ड के लाहौर कार्यालय पर छापा मारा तो वहाँ से बड़ी संख्या में स्टील के हेलमेट, बिल्ले तथा सैन्य उपकरण बरामद हुए।

मुस्लिम नेशनल गार्ड के पास अपनी लारियां और जीपें थीं जिनका उपयोग हिंदू और सिक्ख क्षेत्रों पर आक्रमण करने तथा अकेले मुसाफिरों को लूटने में होता था। मुस्लिम नेशनल गार्ड के लोग अपने साथ पैट्रोल रखते थे जिसका उपयोग आगजनी में होता था। इन हथियारों से स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम नेशनल गार्ड की योजना पंजाब के हिन्दुओं एवं सिक्खों का नरसंहार करने की थी।

अप्रेल 1947 में पंजाब सरकार के प्रमुख सचिव अख्तर हुसैन ने पंजाब के गवर्नर को रिपोर्ट दी कि मुस्लिम लीग ने 5,630 गार्ड भरती किये हैं। इसके 15 दिन बाद की रिपोर्ट में कहा गया कि मुस्लिम लीग के नेशनल गार्डों की संख्या अब लगभग 39,000 है।

मुस्लिम लीग ने सशस्त्र तैयारी करने के साथ ही उन प्रांतों में चल रही सरकारों एवं विधानसभाओं में दबाव बनाना आरम्भ किया जिन्हें वह भावी पाकिस्तान में सम्मिलित करना चाहती थी। असम में मुसलमानों का बहुमत नहीं था किंतु फिर भी मुस्लिम लीग उसे पाकिस्तान में शामिल करना चाहती थी।

इन प्रांतों से मुस्लिम लीग ने हिन्दुओं को भगाना आरम्भ कर दिया ताकि हिन्दू स्वयं ही तंग आकर मुस्लिम लीग को उसका मनचाहा पाकिस्तान दे दें। जिस समय अंतरिम सरकार में देश के धन-सम्पदा को पाकिस्तान और भारत में बांटा जा रहा था, मुस्लिम लीग लॉर्ड माउण्टबेटन येाजना को विफल बनाने का यत्न कर रही थी।

एक ओर जिन्ना हिंदुओं को काट रहा था और और सिक्खों का नरसंहार कर रहा था तो दूसरी ओर गांधीजी का मुस्लिम प्रेम और जिन्ना प्रेम दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रहा था। गांधीजी के इसी मुस्लिम प्रेम एवं जिन्ना प्रेम के चलते मिस्टर जिन्ना और गांधीजी ने एक संयुक्त वक्तव्य निकाला था और दोनों समुदायों के घटकों को परस्पर मैत्री भाव रखने के लिए कहा था।

कम से कम मुस्लिम लीग की ओर से यह वक्तव्य हिन्दुओं की आंखों में धूल झोंकने के सदृश्य था। मुस्लिम लीग ने उस वक्तव्य की अवहेलना कर यह यत्न करना आरम्भ कर दिया कि हिन्दुस्तान के वे क्षेत्र जो जिन्ना पाकिस्तान में चाहते थे और जो माउण्टबेटन योजना के अनुसार पाकिस्तान को नहीं मिले थे, उन पर यत्न-पूर्वक अधिकार कर लिया जाए।

पंजाब में विगत 10 वर्षों से यूनियनिस्ट पार्टी के मलिक खिजिर हयात खाँ की संयुक्त सरकार थी जिसमें हिन्दू, मुसलमान एवं सिक्ख तीनों शामिल थे। लीग के कार्यकर्ताओं ने गुण्डागर्दी करके पंजाब में कानून एवं व्यवस्था इतनी अधिक बिगड़ गई कि 2 मार्च 1947 को हयात खाँ की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा और गवर्नर ने मुस्लिम लीग की सरकार बनवा दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सिक्खिस्तान

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कुछ सिक्खों ने सिक्खिस्तान बनाने की मांग की!

पंजाब सदियों से हिन्दुओं की भूमि थी। ई.1881 की जनगणना में पंजाब की कुल जनसंख्या 1.76 करोड़ थी जिसमें से 43.8 प्रतिशत हिन्दू, 8.2 प्रतिशत सिक्ख, 47.6 प्रतिशत मुस्लिम, 0.1 प्रतिशत ईसाई तथा शेष अन्य धर्मों के लोग थे।

ई.1941 की जनगणना में पंजाब की कुल आबादी 3.43 करोड़ थी जिनमें से हिन्दू केवल 29.1 प्रतिशत पाए गए। मुस्लिम 53.2 प्रतिशत, सिक्ख 14.9 प्रतिशत, ईसाई 1.9 प्रतिशत तथा शेष 1.3 प्रतिशत पाए गए।

इस प्रकार 60 साल में हिन्दुओं की संख्या में 14.7 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि मुसलमानों की जनसंख्या में 5.6 प्रतिशत, सिक्खों की जनसंख्या में 6.7 प्रतिशत और ईसाइयों की जनसंख्या में 1.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।

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इस अवधि में पंजाब के लाखों हिन्दू कहाँ चले गए, इसका कोई हिसाब गोरी सरकार के पास नहीं था।

पंजाब की भूमि पर यदि किसी का अधिकार हो सकता था तो वह हिन्दुओं एवं सिक्खों का सम्मिलित रूप से हो सकता था किंतु अब जबकि पंजाब का विभाजन होने जा रहा था, मुस्लिम लीग गुण्डागर्दी करके पंजाब पर अधिकार जमाना चाहती थी ताकि हिन्दुओं एवं सिक्खों को पंजाब से बेदखल करके पूरा पंजाब पाकिस्तान में मिलाया जा सके।

सिक्खों की वीर जाति को यह सहन नहीं हुआ। उनके नेता मास्टर तारासिंह ने अलग सिक्खिस्तान की मांग की तथा सरे आम सिक्खों का आह्वान किया कि वे मुस्लिम लीग को समाप्त कर दें। मास्टर तारासिंह के आह्वान पर सिक्खों ने 4 मार्च 1947 को लाहौर में मुस्लिम लीग एवं पाकिस्तान के विरुद्ध विशाल प्रदर्शन किया। मुस्लिम लीग के गुण्डों ने इस जुलूस पर हमला कर दिया जिससे बलवा मच गया।

मास्टर तारासिंह के सिक्खों को सिक्खिस्तान तो नहीं मिला किंतु उनकी बेवकूफी भरी कार्यवाहियों की सजा पूरी सिक्ख कौम को भुगतनी पड़ी। लाहौर, अमृतसर, तक्षशिला एवं रावलपिण्डी सहित पंजाब के लगभग सभी बड़े शहरों में मार-काट मच गई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2,049 आदमी मारे गए, 1000 से अधिक लोग बुरी तरह से घायल हुए।

प्रेस रिपोर्टों के अनुसार इन दंगों में मुस्लिम लीग द्वारा मशीनगनें एवं राइफलें भी काम में ली गईं। अर्थात् पंजाब की मुस्लिम लीग सरकार ने पुलिस एवं सैनिक शास्त्रागारों के मुँह मुस्लिम लीग के गुण्डों के लिए खोल दिए थे।

जनवरी 1947 से पूरे पंजाब में मुस्लिम लीग द्वारा गुप्त-रैलियां आयोजित होती रही थीं। हिन्दुओं की मक्कारी और निर्दयता के शिकार लोगों की खोपड़ियां और तस्वीरें उन रैलियों में प्रदर्शित होतीं। यदाकदा, जिन्दा और घायल मनुष्यों को भी एक रैली से दूसरी रैली में घुमाया जाता जो सबके सामने अपने घाव दिखाते और बयान करते कि वे घाव उन्हें किस प्रकार मक्कार और निर्दय हिन्दुओं के कारण लगे।

ये रैलियां कभी गुप्त होतीं तो कभी सार्वजनिक, उस क्षेत्र की धार्मिक उदारता का भक्षण करती जा रही थीं। हिन्दुओं, मुसलमानों और सिक्खों की जिस मिली-जुली राज्य सरकार ने दस वर्षों तक सफलतापूर्वक शासन चलाया था, उसे एकाएक जो इस्तीफा देना पड़ा, उसके पीछे धार्मिक उदारता में पड़ चुकी दरारें ही थीं।

हिंसा की पहली लहर मार्च में आई जब एक सिक्ख नेता (मास्टर तारासिंह) ने मुस्लिम लीग के झण्डे को ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारे के साथ नीचे गिरा दिया। 3000 लोग जिनमें अधिकांश सिक्ख थे इन दंगों में मारे गए जो नगर-नगर, देहात-देहात में फूट पड़े, क्योंकि लीग के अपमान का बदला लेने के लिए मुसलमानों ने हथियार उठाकर घर से निकलने में कोई देरी नहीं की।

लगभग 1 लाख व्यक्ति लाहौर छोड़कर भाग गए। बेहद जरूरी काम से ही लोग घरों से बाहर निकलते। घर से बाहर गया हुआ मनुष्य वापस लौट कर आएगा भी या नहीं कभी भरोसा नहीं होता। जैसा कि एक पुलिस अधिकारी ने लिखा है- ‘लाहौर में मौत बिजली की तरह आया करती। यों आई, यों गई। इससे पहले कि कोई चिल्ला सके, बचाओ! लाश गिर चुकी होती। हर दरवाजा बंद, हर गली सूनी, पता ही नहीं चलता, कातिल कौन था और कहाँ चला गया।’ सिक्ख और मुसलमान दोनों, एक-दूसरे से बढ़कर हिंसा कर रहे थे। सिक्खिस्तानकी मांग का इतना भयंकर परिणाम होगा, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था।

मार्च 1947 में मुसलमानों ने पंजाब के सिक्खों का जो संहार किया, उसकी प्रतिक्रिया में सिक्खों को भी तुरंत हथियार लेकर निकल पड़ना चाहिए था। जब ऐसा न हुआ तो सुरक्षा अधिकारियों और राजनीतिज्ञों के लिए यह घोर आश्चर्य की बात थी। उन्होंने यही समझा कि सिक्खों जैसी वीर और युद्ध-प्रिय कौम ने अपनी गर्म-जोशी खो दी है। दौलत ने उन्हें आरामपसंद बना दिया है। लेकिन सिक्खों के मानस का यह मूल्यांकन पूर्णतः गलत था।

जून के प्रारंभिक दिनों में लाहौर के एक होटल में सिक्ख नेताओं की गुप्त बैठक हुई। ये नेता तय करना चाहते थे कि यदि सचमुच विभाजन हो गया तो सिक्खों की मोर्चाबन्दी क्या हो। सिक्खों को सिक्खिस्तान कैसे मिले?

उस बैठक में मास्टर तारासिंह ने कहा- ‘जैसे जापानियों और नाजियों ने आत्म-बलिदान दिया, वैसे ही हमें भी आत्म-बलिदान के लिए तैयार हो जाना है। वह दिन दूर नहीं, जब हमारी धरती पर आक्रमण होगा और हमारी औरतों की इज्जत दांव पर लग जाएगी। उठो! इन मुगल आक्रमणकारियों को एक बार फिर तबाह कर दो। हमारी जन्मभूमि खून मांग रही है। धरती माता की प्यास हम जरूर बुझाएंगे- अपने खून से और दुश्मनों के खून से।’

कहा नहीं जा सकता कि लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने तारासिंह के भाषण के उक्त अंश किस स्रोत से लिए हैं! क्योंकि उन्होंने कोई स्रोत नहीं बताया है। वे लिखते हैं-

‘भारत के साठ लाख सिक्खों में से पचास लाख उन दिनों अकेले पंजाब में बसे हुए थे। भले ही वे पंजाब की कुल आबादी के मात्र 13 प्रतिशत थे किंतु 40 प्रतिशत भूमि उन्हीं के कब्जे में थी। पंजाब की अनोखी फसलों का दो-तिहाई हिस्सा सिक्खों के ही हाथों पैदा होता था। हथियारों के प्रति उनके आकर्षण का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि भारतीय सशस्त्र फौज के एक तिहाई सदस्य सिक्ख थे और दोनों विश्व-युद्धों में भारतीय सेना ने जो पदक जीते, उनमें से आधे सिक्खों के ही कारण जीते।’

कुछ ही दिनों में सिक्ख जाति सिक्खिस्तान की बात भूलकर केवल इस बात पर ध्यान केन्द्रित करने वाली थी कि उनका गांव भारत में ही रह गया है या फिर पाकिस्तान में चला गया है?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मेवस्थान

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भारत में मेवस्थान बनाने की योजना

जब भारत आजाद होने लगा तो मुसलमानों ने अपने लिए अलग देश की मांग की, सिक्खों ने अपने लिए अलग देश की मांग की, उसी प्रकार मेवात के मेवों ने भी अपने लिए अलग मेवस्थान नामक देश की मांग की। हालांकि मेवात के मेव मुसलमान ही थे किंतु वे पाकिस्तान में नहीं जाना चाहते थे अपितु उन्होंने गुड़गांव के आसपास के क्षेत्र में ही मेवस्थान की स्थापना का सपना देखा।

कांग्रेस में शामिल वामपंथी विचारों के नेता डॉ. अशरफ के विद्यार्थी काल में शिक्षा प्राप्ति हेतु अलवर राज्य द्वारा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई गई थी। वह मेव मुसलमान था तथा कांग्रेस में रहकर मेवों की राजनीति करता था। उसने अलग मेवस्थान प्रस्थापित कर पाकिस्तान में संलग्न होने का शरारतपूर्ण सुझाव दिया था। मेवस्थान के लिए मची मारकाट से मार्च 1947 तक इस पूरे क्षेत्र में शांति व्यवस्था सर्वथा भंग हो गई।

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गुड़गांवा में मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने बहुत लूटमार मचा रखी थी। वहाँ का डिप्टी कमिश्नर गुण्डों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर रहा था। वल्लभभाई पटेल ने गुड़गांवा पहुंचकर डिप्टी कमिश्नर से इसके बारे में सवाल पूछे तो डिप्टी कमिश्नर ने उत्तर देने से इन्कार कर दिया। वल्लभभाई अपना सा मुख लेकर वापस आ गए। गुड़गांवा जिले में मेव जाति के मुसलमान बड़ी भारी संख्या में बसे हुए थे।

सन् 1947 के आरम्भ से जुलाई 1947 तक जिला गुड़गांवा के गांव-गांव में बलवे हुए। वहाँ के गूजर और जाटों ने मुसलमानों का विरोध किया। इस पर भी हिन्दुओं के सैंकड़ों गांव जला डाले गए और वहाँ के गूजर, अहीर तथा जाट दिल्ली और गुड़गांवा में आश्रय पाने के लिए एकत्रित होने लगे। योजना कुछ ऐसी थी कि दिल्ली और गुड़गांवा हिन्दुओं से खाली करा दिए जाएं और यहाँ पर मुस्लिम लीग का अधिकार जमा लिया जाए। इसके लिए शस्त्रास्त्र भी स्मगल करके लाए गए थे।

मुस्लिम लीग की यह योजना कुछ तो दिल्ली के हिन्दू युवकों ने विफल कर दी और कुछ अलवर राज्य जो जिला गुड़गांवा के किनारे पर था, ने चलने नहीं दी। अलवर के राजा ने अपने राज्य का मुख्यमंत्री हिन्दू सभा के एक नेता को बना रखा था। इस राज्य के प्रयत्न से वहाँ के मेव अपनी योजना में सफल नहीं हो सके।

गांधीजी के सहयोगी मास्टर प्यारे लाल ने लिखा है-

‘मुस्लिम लीग और इसके सहायकों के षड्यंत्र के सूत्रों का नवीन प्रमाण मिला था। कुछ सैनिक अधिकारी जो युद्धकाल में जापान की सेना के पीछे बर्मा में ब्रिगेडियर विंगेट के अधीन काम कर रहे थे, विध्वंसात्मक कार्यवाही करते पकड़े गए। वह किस प्रकार हिन्दुस्तान में घुस सके, यह एक रहस्यमय बात है।

शस्त्रास्त्र के अवैधानिक रूप से हिन्दुस्तान में लाने की कार्यवाही बहुत तेजी से चल रही थी। इसमें हिन्दुस्तानी सेना के अंग्रेज अधिकारी सक्रिय सहयोग दे रहे थे।

यह एक खुली निंदनीय बात थी। अवैधानिक शस्त्रास्त्रों के छिपे हुए कोश जिनमें हजारों स्टेनगन्स थीं, नागपुर, जबलपुर, कानपुर और कई स्थानों पर पाए गए। कांग्रेस हाईकमाण्ड को इन कोशों के लिखित प्रमाण मिले थे और पता चला था कि ब्रिटिश सरकार का राजनीतिक विभाग भी इस कार्य में सम्मिलित है।

यह विभाग कुछ राजाओं-महाराजाओं से मिलकर एक षड्यंत्र बना रहा था, जिससे हिन्दुस्तान की एकता भंग हो सके। ऐसे भी प्रमाण मिले, जिससे एक व्यवस्थित योजना का पता चला कि शस्त्रास्त्र देशी रियासतों से हिन्दुस्तान भर में भेजकर एक डी-डे मनाया जा सके।’

बहुत से शस्त्रास्त्र मस्जिदों में एकत्रित किए हुए मिले। ये निःसंदेह मुस्लिम लीगी राज्य स्थापित करने के लिए थे।…. जबलपुर, नागपुर इत्यादि नगरों में जो शस्त्रास्त्रों के कोश मिले थे, वे कदाचित् मुस्लिम लीग के विशाल षड़्यंत्र का ही परिणाम था। इन कोशों के निर्माण में राजा-महाराजाओं का कितना हाथ था, कहना कठिन है।

……. वास्तविक बात यह है कि अंतरिम सरकार बनने के अपरांत पूरे हिन्दुस्तान में मुस्लिम लीग का षड़्यंत्र चल रहा था जिससे यदि पूर्ण हिन्दुस्तान नहीं तो हिन्दुस्तान के बहुत से भाग को पाकिस्तान बनाया जा सके। मेवस्थान की योजना भी उसी षड़यंत्र का अंग थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लॉर्ड माउण्टबेटन

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भारत को आजादी देने के लिए लॉर्ड माउण्टबेटन को भेजा गया!

इस समय तक ब्रिटिश सरकार के लिए भारत बहुत बड़ी समस्या बन चुका था। ब्रिटिश सरकार समझ नहीं पा रही थी कि विभिन्न जातियों, अलग-अलग मजहबों एवं धर्मों तथा अलग-अलग सांस्कृतिक पहचान रखने वाले चालीस करोड़ भारतीयों को आजादी किस प्रकार दी जाए कि निरीह जनता का रक्तपात न हो तथा भारत में नियुक्त अंग्रेज नौकरशाही तथा ब्रिटिश सेनाएं सकुशल इंग्लैण्ड लौट आएं! इस समस्या के समाधान के लिए लॉर्ड माउण्टबेटन की भारत के नए वायसराय के रूप में नियुक्ति की गई।

वायसरॉय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड वैवेल को भारतीय राजनीति में तभी से असफल माना जाने लगा था जब वे जून 1945 की शिमला बैठक में वायसराय की काउंसिल में मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति के मसले पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग को सहमत नहीं कर सके थे। जब अगस्त 1946 में मुस्लिम लीग द्वारा की गयी सीधी कार्यवाही से बंगाल और बिहार खून से नहा उठे तब वायसराय वैवेल की भारत में विश्वसनीयता पूरी तरह समाप्त हो गयी।

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उनके स्थान पर मार्च 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का वायसराय बनाया गया। लॉर्ड माउंटबेटन का पूरा नाम लुइस फ्रांसिस एल्बर्ट विक्टर निकोलस जॉर्ज माउंटबेटन था। उन्हें फर्स्ट अर्ल-माउण्टबेटन ऑफ बर्मा भी कहा जाता था। वे बेटनबर्ग के राजकुमार थे तथा ब्रिटिश राजपरिवार के सदस्य थे।  माउंटबेटन ब्रिटिश नौसेना में एडमिरल थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें केजी, जीसीबी, ओएम, जीसीएसआई, जीसीआईई, जीसीवीओ, डीएसओ, पीसी, एफआरएस आदि उपाधियां दे रखी थीं। उनका जन्म 25 जून 1900 को इंग्लैण्ड में हुआ था। लॉर्ड माउंटबेटन इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पति राजकुमार फिलिप (ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग) के मामा थे।

लॉर्ड माउंटबेटन भारत के आखिरी वायसरॉय थे और स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल थे। स्पष्ट दृष्टिकोण एवं सुलझे हुए विचारों का धनी होने के कारण लॉर्ड माउंटबेटन का व्यक्तित्व बहुत शानदार था। वे प्रभावशाली वक्ता, कुशल सेनापति एवं इंग्लैण्ड के जाने-माने लोगों में से एक थे। ब्रिटेन के लिए प्राप्त की गई सामरिक सफलताओं के कारण माउण्टबेटन इंग्लैण्ड की संसद से जो चाहते थे, प्राप्त कर लेते थे।

यद्यपि वे लोकतंत्र के समर्थक थे तथापि ब्रिटिश राज-परिवार का सदस्य होने के कारण तथा ब्रिटेन के इतिहास से परिचित होने के कारण उनके मन में भारतीय राजाओं के प्रति विशेष सहानुभूति थी। उनकी पत्नी एडविना सरल स्वभाव एवं कोमल विचारों की स्वामिनी थीं। वे युद्धक्षेत्र में जाकर घायलों का उपचार करने, लोककल्याण का काम करने तथा अपने पति के कामों में उनका हाथ बंटाने के लिए जानी जाती थीं।

लॉर्ड इस्मे को माउण्टबेटन का चीफ-ऑफ-स्टाफ नियुक्त किया गया। इस्मे एक परिपक्व अधिकारी था। वह ई.1940 से 45 के बीच ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल का चीफ-ऑफ-स्टाफ रह चुका था। एलन कैम्पबेल जॉनसन को माउण्टबेटन का प्रेस अटैची नियुक्त किया गया। वह ई.1939 से माउण्टबेटन के स्टाफ में काम कर रहा था।

भारतीय सिविल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी सर जॉर्ज एबेल को लॉर्ड माउण्टबेटन का निजी सचिव नियुक्त किया गया। वह पंजाब के गवर्नर के निजी सचिव एवं लॉर्ड वैवेल के निजी सचिव के पद पर कार्य कर चुका था इसलिए उसे भारत की समस्याओं का अच्छी तरह से ज्ञान था।

जॉर्ज एबेल ने माउण्टबेटन से कहा कि भारत की वर्तमान दशा उस जहाज जैसी है जिसमें से आग की लपटें धू-धू कर उठ रही हों और जिसके गर्भ में बारूद भरा हुआ हो। सारी लड़ाई इसी बात की है कि आग बारूद तक पहले पहुंचेगी या उससे पहले हम उसे काबू में कर चुके होंगे।

वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन के राजनीतिक सलाहकार तथा राजनीतिक विभाग का सचिव के रूप में सर कोनार्ड कोरफील्ड की नियुक्ति की गई। वह एक मिशनरी का बेटा था तथा इण्डियन सिविल सर्विस के अधिकारी के रूप में ई.1920 में लॉर्ड रीडिंग के समय भारत आया था। उसका कार्य भारतीय रजवाड़ों के साथ अधिक रहा था।

वह हैदराबाद, रेवा, जयपुर तथा कुछ अन्य भारतीय रियासतों में पॉलिटिकल एजेंट के रूप में नियुक्त रहा। लॉर्ड वैवेल के समय उसे क्राउन रिप्रजेंटेटिव अर्थात् वायसराय का पोलिटिकल एडवाइजर बनाया गया। उसका काम वैवेल तथा देशी राजाओं के बीच सेतु के रूप में काम करने का था। लगभग पूरा जीवन भारतीय राजाओं के साथ व्यतीत करने के कारण वह देशी-राजाओं के बीच अधिक लोकप्रिय था तथा भारतीय नेताओं को पसंद नहीं करता था।

हैदराबाद का नवाब उसका दोस्त था। इसलिए कोरफील्ड को हिन्दू राजाओं की बजाय मुस्लिम शासकों द्वारा अधिक पसंद किया जाता था। लॉर्ड माउण्टबेटन समय रहते कोरफील्ड के व्यक्तित्व की इस कमजोरी को समझ नहीं सका। इसलिए आगे चलकर माउण्टबेटन को सरदार पटेल एवं जवाहरलाल नेहरू आदि भारतीय नेताओं के सामने नीचा देखना पड़ा।

भारत में वायसरॉय एवं गवर्नर जनरल के रूप में लॉर्ड माउण्टबेटन का काम केवल इतना था कि वे भारत को आजाद करके अंग्रेजों को उनकी पूरी गरिमा और शांति के साथ भारत से सुरक्षित निकाल ले जायें। 24 मार्च 1947 को माउंटबेटन ने भारत में वायसराय एवं गवर्नर जनरल का कार्यभार संभाला।

उस समय भारत बड़ी विचित्र स्थिति में फंसा हुआ था। देश की जनसंख्या लगभग 35 करोड़ थी जिसमें से 10 करोड़ मुस्लिम एवं 25 करोड़ हिन्दू तथा अन्य मतावलम्बी थे। कांग्रेस देश का सबसे बड़ा राजनैतिक दल था जिसे विश्वास था कि उसे 100 प्रतिशत हिन्दू, सिक्ख एवं अन्य मतावलम्बियों का तथा 90 प्रतिशत मुसलमानों का नेतृत्व प्राप्त था। जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि लीग को देश के 90 प्रतिशत मुसलमानों का समर्थन प्राप्त था।

कांग्रेस चाहती थी कि अंग्रेज भारत की सत्ता कांग्रेस को सौंपकर भारत से चले जाएं। मुस्लिम लीग चाहती थी कि अंग्रेज पहले भारत का विभाजन करें तथा मुसलमानों का अलग देश बनाएं। उसके बाद वे भारत को आजाद करें। हिन्दू-बहुल देश की सत्ता कांग्रेस को एवं मुस्लिम-बहुल देश की सत्ता मुस्लिम लीग को मिले। तीसरा बड़ा पक्ष भारतीय राजाओं का भी था जो कतई नहीं चाहते थे कि भारत को आजाद करके 565 देशी रियासतों को कांग्रेस के हाथों में सौंप दिया जाए।

भारत में काम कर रही कम्यूनिस्ट पार्टियाँ तथा राष्ट्रवादी एवं हिन्दू प्रभाव वाले राजनीतिक दल विशेषकर हिन्दू महासभा चाहते थे कि अंग्रेज भारत को विभाजित नहीं करें, भारत अखण्ड रहे तथा उसकी सत्ता केवल कांग्रेस को नहीं देकर भारत की समस्त राजनीतिक पार्टियों को साझा रूप से सौंपी जाए तथा देश में लोकतंत्र की स्थापना हो। सिक्खों, दलितों, ईसाईयों एवं एंग्लो-इण्डियनों के भी अपने-अपने पक्ष थे।

माउण्टबेटन को इन समस्त तत्वों से निबटना था, उन्हें संतुष्ट करना था तथा ब्रिटिश अधिकारियों, ब्रिटिश सैनिकों, उनके परिवारों, उनकी सम्पत्तियों तथा उनके घोड़ों आदि को सुरक्षित रूप से भारत से निकालकर इंग्लैण्ड ले जाना था। माउण्टबेटन को यह व्यवस्था भी करनी थी कि जिस समय रॉयल सेनाएं भारत छोड़कर जा रही हों, उस समय उपद्रवी, गुण्डे एवं हत्यारे किस्म के लोग भारत की निरीह जनता पर आक्रमण करके उसे हानि नहीं पहुँचाएं।

भारतीय लोग आजादी का समरोह मनाएं, उनकी सम्पत्ति, ढोर-डंगर सुरक्षित रहें तथा स्त्रियों के साथ बलात्कार नहीं हों। इतने सारे लक्ष्यों को एक साथ अर्जित करना कोई हँसी-खेल नहीं था। इन अर्थों में लॉर्ड माउण्टबेटन को अपने पूर्ववर्ती समस्त वायसरायों से अधिक कठिन काम करना था, उनसे भी अधिक जिन्होंने इंग्लैण्ड के लिए भारत को जीता था।

माउंटबेटन ने भारत में अपने प्रथम भाषण में कहा कि उनका कार्यालय सामान्य वायसराय का नहीं रहेगा। वे ब्रिटिश सरकार की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में जून 1948 तक सत्ता का हस्तांतरण करने तथा कुछ ही माह में भारत की समस्या का समाधान ढूंढने के लिये आये हैं।

माउंटबेटन ने एटली सरकार को 2 अप्रेल 1947 को अपनी पहली रिपोर्ट भेजी जिसमें उन्होंने लिखा कि- ‘देश का आंतरिक तनाव सीमा से बाहर जा चुका है। चाहे कितनी भी शीघ्रता से काम किया जाये, गृहयुद्ध आरंभ हो जाने का पूरा खतरा है। ‘

माउण्टबेटन ने गांधी, जिन्ना, नेहरू, लियाकत अली तथा पटेल से वार्त्ताएं कीं। इन नेताओं ने माउण्टबेटन को बताया कि वे भारत की स्वतंत्रता और विभाजन के सम्बन्ध में क्या विचार रखते थे और भारत की समस्या का क्या समाधान चाहते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी की जिद

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गांधीजी की जिद – जिन्ना को दे दो पूरी सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी का मानना था कि जिन्ना को पाकिस्तान कभी नहीं मिलेगा, जब तक कि अंग्रेज पाकिस्तान बनाकर उसे न दे दें। इसलिए गांधीजी की जिद थी कि कांग्रेस कभी भी पाकिस्तान की मांग न माने! कांग्रेस के अन्य नेताओं का कहना था कि यदि कांग्रेस न माने तो भी अंग्रेज जिन्ना को पाकिस्तान दे ही देंगे।

गांधीजी अपने साथियों को समझा-समझा कर हार गए थे, अंग्रेज ऐसा कभी नहीं करेंगे, जब तक कांग्रेस का बहुमत इसके विरोध में खड़ा है। विभाजन का फैसला वायसराय के नहीं कांग्रेस के हाथ में है। कांग्रेस चाहे तो इसे रोक सकती है। अंग्रेजों से कह दो कि वे चले जाएं। जो जैसा है, उसे वैसा ही छोड़कर चले जाएं। उनके पीछे जो भी होगा, हम देख लेंगे। भुगत लेंगे। अगर देश भर में आग लग जाती है, तो लग जाने दो, देश इस आग में तप कर कुन्दन की तरह निखर कर सामने आएगा, देश को अखण्ड रहने दो।

गांधीजी की जिद के सामने कांग्रेसी नेता स्वयं को असहाय पाते थे जबकि देशवासियों के लिए एक-एक दिन भारी पड़ रहा था। जिन्ना के मुसलमान प्रतिदिन सैंकड़ों हिन्दुओं की हत्या कर रहे थे।

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गांधीजी की जिद थी कि यदि अंग्रेज सरकार और कांग्रेस धैर्यपूर्वक कुछ समय व्यतीत करें और भारत की आजादी को कुछ दिन के लिए टाल दिया जाए तो भारत का विभाजन रुक सकता है। इसलिए जब गांधीजी ने माउण्टबेटन से पहली बार वार्ता की तो गांधीजी ने उनसे बार बार कहा- ‘भारत को तोड़ियेगा नहीं, काटियेगा नहीं। खून की नदियां बहती हैं तो बहें।’

31 मार्च 1947 को गांधीजी ने एक सार्वजनिक वक्तव्य में कहा– ‘यदि कांग्रेस विभाजन के लिए तैयार होगी तो यह मेरी मृत्यु के बाद ही होगा। मैं भारत का विभाजन आजीवन नहीं होने दूंगा।’ जब अंतरिम सरकार पूरी तरह विफल साबित होने लगी और जिन्ना किसी भी तरह पाकिस्तान का हठ छोड़ने को तैयार नहीं हुआ तब गांधीजी ने वायसराय को सुझाव दिया कि वे जवाहरलाल के स्थान पर जिन्ना को पूरी सरकार दे दें।

माउण्टबेटन के प्रेस अटैची एलन कैम्पबेल जॉनसन ने लिखा है- ‘गांधी ने सम्पूर्ण समस्या को हल करने के लिए आश्चर्यजनक प्रस्ताव रखा। वह यह था कि वर्तमान मंत्रिमण्डल को भंग करके जिन्ना को पूर्णतः मुस्लिम मंत्रिमंडल बनाने के लिए आमंत्रित किया जाए।’

माउंटबेटन ने पूछा- ‘जिन्ना की प्रतिक्रिया क्या होगी?’

गांधी ने उत्तर दिया- ‘जिन्ना कहेंगे, यह धूर्त गांधी की चाल है।’

माउंटबेटन ने प्रश्न किया- ‘और क्या उनका कहना सही नहीं होगा?’

गांधी ने कहा- ‘नहीं। मैं बिल्कुल दिल से कह रहा हूँ।’

इस पर माउंटबेटन ने कहा- ‘यदि आप इस प्रस्ताव पर कांग्रेस की औपचारिक स्वीकृति ला कर दे सकें तो ……. मैं भी विचार करने को राजी हूँ।’

मोसले ने इस घटना को इस प्रकार लिखा है-

‘गाधीजी ने दो दिन माउण्टबेटन से लगातार मुलाकात की तथा दूसरे दिन माउण्टबेटन के समक्ष एक योजना रखी। यह योजना ऐसी थी जिसे देखकर वैवेल चीख उठता। उसकी योजना थी कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग का गतिरोध आसानी से हटाया जा सकता है।

वायसराय को चाहिए कि मि. जिन्ना को बुलाकर सरकार बनाने का काम सौंपा जाए। इस सरकार में सिर्फ मुसलमान ही रहें या हिन्दू और मुसलमान दोनों, यह जिन्ना की मर्जी पर छोड़ दिया जाए। वायसराय के वीटो के अलावा यह सरकार अपनी मर्जी से शासन चलाने में पूर्ण स्वतंत्र हो।

वायसराय ने तुरन्त जवाब दिया कि योजना बड़ी आकर्षक है और वह सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगा, यदि कांग्रेस भी इसे व्यावहारिक समझे।

….. कांग्रेस ने इस योजना को बुरी तरह ठुकरा दिया और वायसराय ने भी गांधी को लिखा कि इस योजना के सम्बन्ध में उसके विचारों के बारे में भी गलतफहमी हुई है।’

मोसले ने इस योजना की विफलता का दोष वायसराय पर मंढ़ा है। वे लिखते हैं-

‘बैठक के तुरंत बाद माउण्टबेटन और उसके अधिकारियों ने इस योजना की हत्या शुरू कर दी क्योंकि उनका यह विश्वास था कि यह योजना काम में नहीं लाई जा सकती। यह काम इतनी अच्छी तरह से किया गया कि बहुत जल्द गांधी ने घोषणा कर दी कि वह वायसराय के साथ बातचीत में और हिस्सा नहीं लेगा, सिर्फ कांग्रेस के मामलों में सलाह दिया करेगा।’

आशा और निराशा में झूलने लगा देश

गांधी, नेहरू एवं पटेल आदि अधिकतर कांग्रेसी हिन्दू नेता भारत के विभाजन के विरुद्ध थे। नेहरू विभाजन को लेकर संभवतः अब भी असमंजस में थे। उन्हें लगता था कि कांग्रेस के राष्ट्रवादी मुसलमानों की सहायता से भारत विभाजन को रोका जा सकता है। वे इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि अधिकतर कांग्रेसी मुस्लिम नेता नेहरू-पटेल और गांधी की राजनीति में विश्वास नहीं करते थे।

एक बार वल्लभभाई पटेल ने हंसी-हंसी में परंतु अति दुःख के साथ कहा था कि- ‘कांग्रेस में केवल एक राष्ट्रीय मुसलमान रह गया है और वह जवाहरलाल नेहरू है।’

राजाजी राजगोपालाचारी जैसे कुछ लोग बेकार के पचड़े में पड़कर भारत की आजादी के मामले को उलझाये जाने से अच्छा समझते थे कि भारत का युक्ति-युक्त आधार पर विभाजन कर दिया जाये। उस समय भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक घनश्यामदास बिड़ला जो कि पिछले बहुत समय से कांग्रेस के बड़े नेताओं को आजादी की लड़ाई के लिए धन एवं संसाधन उपलब्ध कराते रहे थे, भी राजाजी के विचारों से सहमत थे।

घनश्यामदास बिड़ला ने नेहरू से विभाजन स्वीकार करने का अनुरोध किया

घनश्यामदास बिड़ला ने नेहरूजी के नाम एक पत्र लिखकर उन्हें विभाजन की मांग को स्वीकार कर लेने का सुझाव दिया-

‘साझे के व्यापार में अगर कोई साझेदार संतुष्ट नहीं हो तो उसे अलग होने का अधिकार मिलना ही चाहिये। विभाजन युक्ति-युक्त अवश्य होना चाहिये लेकिन विभाजन का ही विरोध कैसे किया जा सकता है……।

अगर मैं मुसलमान होता तो पाकिस्तान न कभी मांगता न कभी लेता। क्योंकि विभाजन के बाद इस्लामी भारत बहुत ही गरीब राज्य होगा जिसके पास न लोहा होगा न कोयला। यह तो मुसलमानों के सोचने की बात है। मुझे तो पूरा विश्वास है कि अगर आप पाकिस्तान देने को तैयार हो जायें तो मुसलमान उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे।

उनका स्वीकार करना या न करना बाद की बात है फिलहाल हमारा पाकिस्तान की मांग का विरोध करना मुसलमानों के मन में पाकिस्तान की प्यास ही बढ़ायेगा।’

बँटवारा ही एकमात्र रास्ता

वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना ने 1947 की गर्मियों में पंजाब के दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया। अस्पतालों और दंगे से तबाह गांवों में उसने साम्प्रदायिक क्रूरता के दृश्य देखे- हाथ-कटे बच्चे, पेट-कटे हुए गर्भवती औरतें, सारे परिवार में अकेला बचा रहने वाला बच्चा! ….. उसका दृढ़ विश्वास हो गया कि उसके पति और साथी ठीक कहते है, बंटवारा ही एकमात्र रास्ता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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