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प्रधानमंत्री एटली की घोषणा

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प्रधानमंत्री एटली की घोषणा – जिन्ना को मिल गया पाकिस्तान

प्रधानमंत्री एटली की घोषणा

भारत में चल रही अंतरिम सरकार की मुस्लिम लीग द्वारा बनाई जा रही गत को देखकर अंग्रेजों ने भारत से किसी भी तरह छुटकारा पाने का मन बना लिया। इसलिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने अचानक 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश-पार्लियामेंट में घोषणा की। प्रधानमंत्री एटली की घोषणा इस प्रकार थी-

‘अनिश्चितता की वर्तमान स्थिति खतरे से भरी है और अनिश्चित काल तक जारी नहीं रखी जा सकती। महामहिम की सरकार स्पष्ट कर देना चाहती है कि 20 जून 1948 के पहले ही जिम्मेदार भारतीय हाथों में सत्ता के हस्तांतरण को पूरा करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का उसका निश्चित संकल्प है।

……….. अगर पूर्ण प्रतिनिधित्व करने वाली संविधान सभा जून 1948 तक कोई संविधान तैयार नहीं कर सकी तो महामहिम की सरकार विचार करेगी कि ब्रिटिश-भारत में केन्द्रीय सत्ता किसके हाथ में सौंपी जाए। किसी एक केन्द्रीय सरकार के हाथों में या कुछ अंचलों में प्रांतीय सरकारों के हाथों में।’

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इसी प्रस्ताव के अंत में लॉर्ड वैवेल के स्थान पर लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का नया वायसराय बनाने की घोषणा की गई थी ताकि वे भारत के शासन का उत्तरदायित्व भारतीय हाथों में इस प्रकार हस्तांतरित कर सकें जो भारत के भावी सुख और सम्पन्नता को सर्वोत्तम ढंग से सुनिश्चित कर सके। इस घोषणा में प्रयुक्त शब्दों की आंच को प्रत्येक भारतीय सहज ही समझ सकता था। घोषणा का मंतव्य स्पष्ट था- सत्ता का हस्तांतरण हर हालत में होगा, चाहे जिसे भी करना पड़े, जैसे भी करना पड़े। चाहे भारत एक रहे या उसके टुकड़े हों।

इसीलिए सत्ता के हस्तांतरण को महामना सम्राट की उदारता पूर्वक की गई घोषणा नहीं कहा जा सकता था अपितु इसके माध्यम से छिपे-शब्दों में चुनौती दी गई कि इस बार जिस भारतीय तत्व ने अंग्रेज सरकार पर अपनी शर्तें मनवाने का दबाव बनाने का प्रयास किया, वह निश्चित रूप से घाटे में रहेगा और सत्ता का हस्तांतरण उसे कर दिया जाएगा जो अंग्रेज सरकार की बात मानेगा।

इस प्रकार इस बार सत्ता हस्तांतरण की जिम्मेदारी अंग्रेजों पर कम रह गई थी और भारतीयों पर अधिक आ गई थी कि वे शांति-पूर्वक आजादी ले लें……… अन्यथा अंग्रेज भारत को लावारिस छोड़कर चले जाएंगे।

प्रधानमंत्री एटली की घोषणा से कांग्रेस समझ गई कि जिन्ना को पाकिस्तान मिल गया है। अब अंग्रेजों से लड़ने का समय समाप्त हो चुका है, अब उन्हें मुस्लिम लीग के हाथों से अपने देश को बचाना है, देश का कम से कम नुक्सान करके, अधिक से अधिक हिस्सा बचाना है। मुस्लिम लीग भी समझ गई कि अब उन्हें अंग्रेजों की तरफ से चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें अपने मुक्के केवल कांग्रेस पर बर्बाद करने हैं तथा भारत के देशी-राजाओं और दलित नेताओं को अपने पक्ष में करके अधिक से अधिक पाकिस्तान प्राप्त करना है।

एक ऐसा पाकिस्तान जिसमें नेहरू, गांधी और पटेल न हों, कांग्रेस न हो, जनेऊधारी मालवीय जैसे पण्डित न हों, केवल जिन्ना हो, लियाकत अली हो, चौधरी मोहम्मद अली हो और आंख मूंद कर उनके पीछे चलने वाले सुहरावर्दी जैसे अनुयाई हों।

इसलिए प्रधानमंत्री एटली की घोषणा के साथ ही भारत में अफरा-तफरी मच गई। किसी को आशा नहीं थी कि इंग्लैण्ड अपनी महारानी के मुकुट में जड़े सबसे कीमती हीरे को इतनी आसानी से छोड़ देगा। इसका श्रेय किसी एक तत्व को नहीं दिया जा सकता था। न तो भारत में चल रहे स्वाधीनता संग्राम को, न कांग्रेस को, न गांधीजी को…… जैसा कि बाद में दावा किया गया। अपितु यह एक बहुत सी घटनाओं और घटना-चक्रों का सम्मिलित परिणाम था जिनमें से कुछ इस प्रकार थीं-

(1) अमरीका, रूस, फ्रांस, चीन जैसी अंतराष्ट्रीय शक्तियां इंग्लैण्ड पर दबाव डाल रही थीं कि वह भारत को स्वतंत्र करे।

(2) भारत में चल रहे कम्यूनिस्ट आंदोलनों के कारण मजदूरों द्वारा हड़तालों की ऐसी शृंखला आरम्भ कर दी गई थी जिससे निबट पाना अंग्रेज सरकार के वश में नहीं रह गया था।

(3) द्वितीय विश्व-युद्ध के मोर्चे पर इंग्लैण्ड की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि वह भारत जैसे बड़े देश पर नियंत्रण रखने योग्य ही नहीं रह गया था।

(4) नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आकस्मिक निधन से भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति अविश्वास अपने चरम पर पहुंच गया था। अधिकांश भारतीयों का मानना था कि सुभाष बाबू की हत्या की गई है और इस कार्य में अंग्रेज शामिल हैं।

(5) मुस्लिम लीग सीधी कार्यवाही दिवस का आयोजन करके यह सिद्ध कर चुकी थी कि उसके गुण्डों को रोक पाना किसी के वश में नहीं है, न अंग्रेजी हुकूमत के और न कांग्रेस के।

(6) कांग्रेस भी अब अंग्रेजों से ज्यादा मुस्लिम लीग से छुटकारा पाने को व्याकुल हो उठी थी।

(7) भारतीय सेनाओं के सशस्त्र विद्रोहों में अंग्रेज अधिकारियों की हत्याएं होने से अंग्रेजों का आत्म-विश्वास पूरी तरह नष्ट हो गया।

 इन सबसे एक-साथ निबटने की शक्ति निश्चित रूप से ब्रिटेन में नहीं रह गई थी। अब परिस्थिति उस दौर में पहुंच चुकी थी जिसमें से अंग्रेजों को भारत से अपना पीछा छुड़ाना था ताकि भारत में रह रहे अंग्रेज अधिकारी एवं उनके परिवार सुरक्षित रूप से भारत से निकलकर इंग्लैण्ड पहुंच सकें। इसके लिए उन्हें भारत के दो तो क्या हजार टुकड़े भी करने पड़ते तो अंग्रेज उससे नहीं हिचकिचाते।

प्रधानमंत्री एटली की घोषणा ने मुसलमानों को मुंहमांगा वरदान दे दिया था किंतु भारत के अंग्रेजों को चिंतित कर दिया था और हिन्दुओं को दुखी कर दिया था। हिन्दू इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि एक दिन मुसलमान उनके प्यारे भारत के टुकड़े कर देंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सिक्खों का नरसंहार

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गुरु नानक के उपदेशों से प्रभावित होकर बहुत से हिन्दू उनके शिष्य हो गए थे। उन्हें पंजाबी में सिक्ख कहा जाता था। सिक्खों ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए बड़े बलिदान दिए थे। जब जिन्ना को पाकिस्तान मिल गया तो उसने पंजाब के सिक्खों का नरसंहार करने की योजना बनाई ताकि सिक्ख पंजाब से भाग जाएं तथा पूरा पंजाब पाकिस्तान में शामिल हो जाए!

प्रधानमंत्री एटली की घोषणा से जिन्ना समझ गया था कि अब पाकिस्तान बनने से कोई नहीं रोक सकता फिर भी वह स्वयं को हर स्थिति के लिए तैयार रखना चाहता था। पाकिस्तान के निर्माण को स्वीकार न किए जाने की संभावित स्थिति में जिन्ना बहुत ही चालाकी से मुसलमानों को एक खूनी गृहयुद्ध के लिए तैयार कर रहा था। उसका अगला कदम बहुत निर्णायक था।

वह जानता था कि उसे पाकिस्तान मुस्लिम लीग के मंचों पर दिए गए राजनीतिक भाषणों से नहीं मिलेगा। पाकिस्तान मिलेगा मुस्लिम नेशनल गार्ड्स के चमकीले और पैने हथियारों से, जिसकी तैयारी वह पिछले सात साल से कर रहा था और सीधी कार्यवाही में वह हथियारों को सफल प्रयोग कर भी चुका था।

15 जून 1940 को बम्बई के मुस्लिम लीग अधिवेशन में मुसलमानों की जान-माल की हिफाजत के लिए मुस्लिम नेशनल गार्ड को संगठित तथा मजबूत करने के लिए प्रांतीय मुस्लिीम लीगों को दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। तभी से यह स्पष्ट था कि मुस्लिम लीग जल्दी या बाद में एक गृहयुद्ध आरम्भ करने वाली थी।

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मुस्लिम नेशनल गार्ड् को विभिन्न प्रकार के हथियारों से लड़ने, चाकू मारकर हत्या करने और धावा बोलने का प्रशिक्षण दिया जाता था। इस सेना के लिए बड़ी संख्या में हथियार एकत्रित किये गये थे और भारतीय सेना के विघटित मुस्लिम सैनिकों को लीग की सेना में भर्ती किया गया था। इस सेना का विस्तार एवं सैन्य उपकरणों से लैस होना निरंतर जारी रहता था।

इसके दो संगठन बनाये गये थे, एक था मुस्लिम लीग वालंटियर कॉर्प तथा दूसरा था मुस्लिम नेशनल गार्ड। नेशनल गार्ड मुस्लिम लीग का गुप्त संगठन था। उसकी सदस्यता गुप्त थी और उसके अपने प्रशिक्षण केंद्र एवं मुख्यालय थे जहाँ उसके सदस्यों को सैन्य प्रशिक्षण और ऐसे निर्देश दिये जाते थे जो उन्हें दंगों के समय लाभ पहुंचायें, जैसे लाठी, भाले और चाकू का इस्तेमाल। मुस्लिम नेशनल गार्ड के यूनिट कमाण्डरों को ‘सालार’ कहा जाता था।

नेशनल गार्ड के लम्बे चौड़े जवान, हथियारों से लैस होकर जिन्ना के चारों ओर बने रहकर उसकी सुरक्षा करते थे। जनवरी 1947 में पंजाब पुलिस ने मुस्लिम नेशनल गार्ड के लाहौर कार्यालय पर छापा मारा तो वहाँ से बड़ी संख्या में स्टील के हेलमेट, बिल्ले तथा सैन्य उपकरण बरामद हुए।

मुस्लिम नेशनल गार्ड के पास अपनी लारियां और जीपें थीं जिनका उपयोग हिंदू और सिक्ख क्षेत्रों पर आक्रमण करने तथा अकेले मुसाफिरों को लूटने में होता था। मुस्लिम नेशनल गार्ड के लोग अपने साथ पैट्रोल रखते थे जिसका उपयोग आगजनी में होता था। इन हथियारों से स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम नेशनल गार्ड की योजना पंजाब के हिन्दुओं एवं सिक्खों का नरसंहार करने की थी।

अप्रेल 1947 में पंजाब सरकार के प्रमुख सचिव अख्तर हुसैन ने पंजाब के गवर्नर को रिपोर्ट दी कि मुस्लिम लीग ने 5,630 गार्ड भरती किये हैं। इसके 15 दिन बाद की रिपोर्ट में कहा गया कि मुस्लिम लीग के नेशनल गार्डों की संख्या अब लगभग 39,000 है।

मुस्लिम लीग ने सशस्त्र तैयारी करने के साथ ही उन प्रांतों में चल रही सरकारों एवं विधानसभाओं में दबाव बनाना आरम्भ किया जिन्हें वह भावी पाकिस्तान में सम्मिलित करना चाहती थी। असम में मुसलमानों का बहुमत नहीं था किंतु फिर भी मुस्लिम लीग उसे पाकिस्तान में शामिल करना चाहती थी।

इन प्रांतों से मुस्लिम लीग ने हिन्दुओं को भगाना आरम्भ कर दिया ताकि हिन्दू स्वयं ही तंग आकर मुस्लिम लीग को उसका मनचाहा पाकिस्तान दे दें। जिस समय अंतरिम सरकार में देश के धन-सम्पदा को पाकिस्तान और भारत में बांटा जा रहा था, मुस्लिम लीग लॉर्ड माउण्टबेटन येाजना को विफल बनाने का यत्न कर रही थी।

एक ओर जिन्ना हिंदुओं को काट रहा था और और सिक्खों का नरसंहार कर रहा था तो दूसरी ओर गांधीजी का मुस्लिम प्रेम और जिन्ना प्रेम दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रहा था। गांधीजी के इसी मुस्लिम प्रेम एवं जिन्ना प्रेम के चलते मिस्टर जिन्ना और गांधीजी ने एक संयुक्त वक्तव्य निकाला था और दोनों समुदायों के घटकों को परस्पर मैत्री भाव रखने के लिए कहा था।

कम से कम मुस्लिम लीग की ओर से यह वक्तव्य हिन्दुओं की आंखों में धूल झोंकने के सदृश्य था। मुस्लिम लीग ने उस वक्तव्य की अवहेलना कर यह यत्न करना आरम्भ कर दिया कि हिन्दुस्तान के वे क्षेत्र जो जिन्ना पाकिस्तान में चाहते थे और जो माउण्टबेटन योजना के अनुसार पाकिस्तान को नहीं मिले थे, उन पर यत्न-पूर्वक अधिकार कर लिया जाए।

पंजाब में विगत 10 वर्षों से यूनियनिस्ट पार्टी के मलिक खिजिर हयात खाँ की संयुक्त सरकार थी जिसमें हिन्दू, मुसलमान एवं सिक्ख तीनों शामिल थे। लीग के कार्यकर्ताओं ने गुण्डागर्दी करके पंजाब में कानून एवं व्यवस्था इतनी अधिक बिगड़ गई कि 2 मार्च 1947 को हयात खाँ की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा और गवर्नर ने मुस्लिम लीग की सरकार बनवा दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सिक्खिस्तान

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कुछ सिक्खों ने सिक्खिस्तान बनाने की मांग की!

पंजाब सदियों से हिन्दुओं की भूमि थी। ई.1881 की जनगणना में पंजाब की कुल जनसंख्या 1.76 करोड़ थी जिसमें से 43.8 प्रतिशत हिन्दू, 8.2 प्रतिशत सिक्ख, 47.6 प्रतिशत मुस्लिम, 0.1 प्रतिशत ईसाई तथा शेष अन्य धर्मों के लोग थे।

ई.1941 की जनगणना में पंजाब की कुल आबादी 3.43 करोड़ थी जिनमें से हिन्दू केवल 29.1 प्रतिशत पाए गए। मुस्लिम 53.2 प्रतिशत, सिक्ख 14.9 प्रतिशत, ईसाई 1.9 प्रतिशत तथा शेष 1.3 प्रतिशत पाए गए।

इस प्रकार 60 साल में हिन्दुओं की संख्या में 14.7 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि मुसलमानों की जनसंख्या में 5.6 प्रतिशत, सिक्खों की जनसंख्या में 6.7 प्रतिशत और ईसाइयों की जनसंख्या में 1.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।

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इस अवधि में पंजाब के लाखों हिन्दू कहाँ चले गए, इसका कोई हिसाब गोरी सरकार के पास नहीं था।

पंजाब की भूमि पर यदि किसी का अधिकार हो सकता था तो वह हिन्दुओं एवं सिक्खों का सम्मिलित रूप से हो सकता था किंतु अब जबकि पंजाब का विभाजन होने जा रहा था, मुस्लिम लीग गुण्डागर्दी करके पंजाब पर अधिकार जमाना चाहती थी ताकि हिन्दुओं एवं सिक्खों को पंजाब से बेदखल करके पूरा पंजाब पाकिस्तान में मिलाया जा सके।

सिक्खों की वीर जाति को यह सहन नहीं हुआ। उनके नेता मास्टर तारासिंह ने अलग सिक्खिस्तान की मांग की तथा सरे आम सिक्खों का आह्वान किया कि वे मुस्लिम लीग को समाप्त कर दें। मास्टर तारासिंह के आह्वान पर सिक्खों ने 4 मार्च 1947 को लाहौर में मुस्लिम लीग एवं पाकिस्तान के विरुद्ध विशाल प्रदर्शन किया। मुस्लिम लीग के गुण्डों ने इस जुलूस पर हमला कर दिया जिससे बलवा मच गया।

मास्टर तारासिंह के सिक्खों को सिक्खिस्तान तो नहीं मिला किंतु उनकी बेवकूफी भरी कार्यवाहियों की सजा पूरी सिक्ख कौम को भुगतनी पड़ी। लाहौर, अमृतसर, तक्षशिला एवं रावलपिण्डी सहित पंजाब के लगभग सभी बड़े शहरों में मार-काट मच गई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2,049 आदमी मारे गए, 1000 से अधिक लोग बुरी तरह से घायल हुए।

प्रेस रिपोर्टों के अनुसार इन दंगों में मुस्लिम लीग द्वारा मशीनगनें एवं राइफलें भी काम में ली गईं। अर्थात् पंजाब की मुस्लिम लीग सरकार ने पुलिस एवं सैनिक शास्त्रागारों के मुँह मुस्लिम लीग के गुण्डों के लिए खोल दिए थे।

जनवरी 1947 से पूरे पंजाब में मुस्लिम लीग द्वारा गुप्त-रैलियां आयोजित होती रही थीं। हिन्दुओं की मक्कारी और निर्दयता के शिकार लोगों की खोपड़ियां और तस्वीरें उन रैलियों में प्रदर्शित होतीं। यदाकदा, जिन्दा और घायल मनुष्यों को भी एक रैली से दूसरी रैली में घुमाया जाता जो सबके सामने अपने घाव दिखाते और बयान करते कि वे घाव उन्हें किस प्रकार मक्कार और निर्दय हिन्दुओं के कारण लगे।

ये रैलियां कभी गुप्त होतीं तो कभी सार्वजनिक, उस क्षेत्र की धार्मिक उदारता का भक्षण करती जा रही थीं। हिन्दुओं, मुसलमानों और सिक्खों की जिस मिली-जुली राज्य सरकार ने दस वर्षों तक सफलतापूर्वक शासन चलाया था, उसे एकाएक जो इस्तीफा देना पड़ा, उसके पीछे धार्मिक उदारता में पड़ चुकी दरारें ही थीं।

हिंसा की पहली लहर मार्च में आई जब एक सिक्ख नेता (मास्टर तारासिंह) ने मुस्लिम लीग के झण्डे को ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारे के साथ नीचे गिरा दिया। 3000 लोग जिनमें अधिकांश सिक्ख थे इन दंगों में मारे गए जो नगर-नगर, देहात-देहात में फूट पड़े, क्योंकि लीग के अपमान का बदला लेने के लिए मुसलमानों ने हथियार उठाकर घर से निकलने में कोई देरी नहीं की।

लगभग 1 लाख व्यक्ति लाहौर छोड़कर भाग गए। बेहद जरूरी काम से ही लोग घरों से बाहर निकलते। घर से बाहर गया हुआ मनुष्य वापस लौट कर आएगा भी या नहीं कभी भरोसा नहीं होता। जैसा कि एक पुलिस अधिकारी ने लिखा है- ‘लाहौर में मौत बिजली की तरह आया करती। यों आई, यों गई। इससे पहले कि कोई चिल्ला सके, बचाओ! लाश गिर चुकी होती। हर दरवाजा बंद, हर गली सूनी, पता ही नहीं चलता, कातिल कौन था और कहाँ चला गया।’ सिक्ख और मुसलमान दोनों, एक-दूसरे से बढ़कर हिंसा कर रहे थे। सिक्खिस्तानकी मांग का इतना भयंकर परिणाम होगा, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था।

मार्च 1947 में मुसलमानों ने पंजाब के सिक्खों का जो संहार किया, उसकी प्रतिक्रिया में सिक्खों को भी तुरंत हथियार लेकर निकल पड़ना चाहिए था। जब ऐसा न हुआ तो सुरक्षा अधिकारियों और राजनीतिज्ञों के लिए यह घोर आश्चर्य की बात थी। उन्होंने यही समझा कि सिक्खों जैसी वीर और युद्ध-प्रिय कौम ने अपनी गर्म-जोशी खो दी है। दौलत ने उन्हें आरामपसंद बना दिया है। लेकिन सिक्खों के मानस का यह मूल्यांकन पूर्णतः गलत था।

जून के प्रारंभिक दिनों में लाहौर के एक होटल में सिक्ख नेताओं की गुप्त बैठक हुई। ये नेता तय करना चाहते थे कि यदि सचमुच विभाजन हो गया तो सिक्खों की मोर्चाबन्दी क्या हो। सिक्खों को सिक्खिस्तान कैसे मिले?

उस बैठक में मास्टर तारासिंह ने कहा- ‘जैसे जापानियों और नाजियों ने आत्म-बलिदान दिया, वैसे ही हमें भी आत्म-बलिदान के लिए तैयार हो जाना है। वह दिन दूर नहीं, जब हमारी धरती पर आक्रमण होगा और हमारी औरतों की इज्जत दांव पर लग जाएगी। उठो! इन मुगल आक्रमणकारियों को एक बार फिर तबाह कर दो। हमारी जन्मभूमि खून मांग रही है। धरती माता की प्यास हम जरूर बुझाएंगे- अपने खून से और दुश्मनों के खून से।’

कहा नहीं जा सकता कि लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने तारासिंह के भाषण के उक्त अंश किस स्रोत से लिए हैं! क्योंकि उन्होंने कोई स्रोत नहीं बताया है। वे लिखते हैं-

‘भारत के साठ लाख सिक्खों में से पचास लाख उन दिनों अकेले पंजाब में बसे हुए थे। भले ही वे पंजाब की कुल आबादी के मात्र 13 प्रतिशत थे किंतु 40 प्रतिशत भूमि उन्हीं के कब्जे में थी। पंजाब की अनोखी फसलों का दो-तिहाई हिस्सा सिक्खों के ही हाथों पैदा होता था। हथियारों के प्रति उनके आकर्षण का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि भारतीय सशस्त्र फौज के एक तिहाई सदस्य सिक्ख थे और दोनों विश्व-युद्धों में भारतीय सेना ने जो पदक जीते, उनमें से आधे सिक्खों के ही कारण जीते।’

कुछ ही दिनों में सिक्ख जाति सिक्खिस्तान की बात भूलकर केवल इस बात पर ध्यान केन्द्रित करने वाली थी कि उनका गांव भारत में ही रह गया है या फिर पाकिस्तान में चला गया है?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मेवस्थान

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भारत में मेवस्थान बनाने की योजना

जब भारत आजाद होने लगा तो मुसलमानों ने अपने लिए अलग देश की मांग की, सिक्खों ने अपने लिए अलग देश की मांग की, उसी प्रकार मेवात के मेवों ने भी अपने लिए अलग मेवस्थान नामक देश की मांग की। हालांकि मेवात के मेव मुसलमान ही थे किंतु वे पाकिस्तान में नहीं जाना चाहते थे अपितु उन्होंने गुड़गांव के आसपास के क्षेत्र में ही मेवस्थान की स्थापना का सपना देखा।

कांग्रेस में शामिल वामपंथी विचारों के नेता डॉ. अशरफ के विद्यार्थी काल में शिक्षा प्राप्ति हेतु अलवर राज्य द्वारा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई गई थी। वह मेव मुसलमान था तथा कांग्रेस में रहकर मेवों की राजनीति करता था। उसने अलग मेवस्थान प्रस्थापित कर पाकिस्तान में संलग्न होने का शरारतपूर्ण सुझाव दिया था। मेवस्थान के लिए मची मारकाट से मार्च 1947 तक इस पूरे क्षेत्र में शांति व्यवस्था सर्वथा भंग हो गई।

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गुड़गांवा में मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने बहुत लूटमार मचा रखी थी। वहाँ का डिप्टी कमिश्नर गुण्डों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर रहा था। वल्लभभाई पटेल ने गुड़गांवा पहुंचकर डिप्टी कमिश्नर से इसके बारे में सवाल पूछे तो डिप्टी कमिश्नर ने उत्तर देने से इन्कार कर दिया। वल्लभभाई अपना सा मुख लेकर वापस आ गए। गुड़गांवा जिले में मेव जाति के मुसलमान बड़ी भारी संख्या में बसे हुए थे।

सन् 1947 के आरम्भ से जुलाई 1947 तक जिला गुड़गांवा के गांव-गांव में बलवे हुए। वहाँ के गूजर और जाटों ने मुसलमानों का विरोध किया। इस पर भी हिन्दुओं के सैंकड़ों गांव जला डाले गए और वहाँ के गूजर, अहीर तथा जाट दिल्ली और गुड़गांवा में आश्रय पाने के लिए एकत्रित होने लगे। योजना कुछ ऐसी थी कि दिल्ली और गुड़गांवा हिन्दुओं से खाली करा दिए जाएं और यहाँ पर मुस्लिम लीग का अधिकार जमा लिया जाए। इसके लिए शस्त्रास्त्र भी स्मगल करके लाए गए थे।

मुस्लिम लीग की यह योजना कुछ तो दिल्ली के हिन्दू युवकों ने विफल कर दी और कुछ अलवर राज्य जो जिला गुड़गांवा के किनारे पर था, ने चलने नहीं दी। अलवर के राजा ने अपने राज्य का मुख्यमंत्री हिन्दू सभा के एक नेता को बना रखा था। इस राज्य के प्रयत्न से वहाँ के मेव अपनी योजना में सफल नहीं हो सके।

गांधीजी के सहयोगी मास्टर प्यारे लाल ने लिखा है-

‘मुस्लिम लीग और इसके सहायकों के षड्यंत्र के सूत्रों का नवीन प्रमाण मिला था। कुछ सैनिक अधिकारी जो युद्धकाल में जापान की सेना के पीछे बर्मा में ब्रिगेडियर विंगेट के अधीन काम कर रहे थे, विध्वंसात्मक कार्यवाही करते पकड़े गए। वह किस प्रकार हिन्दुस्तान में घुस सके, यह एक रहस्यमय बात है।

शस्त्रास्त्र के अवैधानिक रूप से हिन्दुस्तान में लाने की कार्यवाही बहुत तेजी से चल रही थी। इसमें हिन्दुस्तानी सेना के अंग्रेज अधिकारी सक्रिय सहयोग दे रहे थे।

यह एक खुली निंदनीय बात थी। अवैधानिक शस्त्रास्त्रों के छिपे हुए कोश जिनमें हजारों स्टेनगन्स थीं, नागपुर, जबलपुर, कानपुर और कई स्थानों पर पाए गए। कांग्रेस हाईकमाण्ड को इन कोशों के लिखित प्रमाण मिले थे और पता चला था कि ब्रिटिश सरकार का राजनीतिक विभाग भी इस कार्य में सम्मिलित है।

यह विभाग कुछ राजाओं-महाराजाओं से मिलकर एक षड्यंत्र बना रहा था, जिससे हिन्दुस्तान की एकता भंग हो सके। ऐसे भी प्रमाण मिले, जिससे एक व्यवस्थित योजना का पता चला कि शस्त्रास्त्र देशी रियासतों से हिन्दुस्तान भर में भेजकर एक डी-डे मनाया जा सके।’

बहुत से शस्त्रास्त्र मस्जिदों में एकत्रित किए हुए मिले। ये निःसंदेह मुस्लिम लीगी राज्य स्थापित करने के लिए थे।…. जबलपुर, नागपुर इत्यादि नगरों में जो शस्त्रास्त्रों के कोश मिले थे, वे कदाचित् मुस्लिम लीग के विशाल षड़्यंत्र का ही परिणाम था। इन कोशों के निर्माण में राजा-महाराजाओं का कितना हाथ था, कहना कठिन है।

……. वास्तविक बात यह है कि अंतरिम सरकार बनने के अपरांत पूरे हिन्दुस्तान में मुस्लिम लीग का षड़्यंत्र चल रहा था जिससे यदि पूर्ण हिन्दुस्तान नहीं तो हिन्दुस्तान के बहुत से भाग को पाकिस्तान बनाया जा सके। मेवस्थान की योजना भी उसी षड़यंत्र का अंग थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लॉर्ड माउण्टबेटन

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भारत को आजादी देने के लिए लॉर्ड माउण्टबेटन को भेजा गया!

इस समय तक ब्रिटिश सरकार के लिए भारत बहुत बड़ी समस्या बन चुका था। ब्रिटिश सरकार समझ नहीं पा रही थी कि विभिन्न जातियों, अलग-अलग मजहबों एवं धर्मों तथा अलग-अलग सांस्कृतिक पहचान रखने वाले चालीस करोड़ भारतीयों को आजादी किस प्रकार दी जाए कि निरीह जनता का रक्तपात न हो तथा भारत में नियुक्त अंग्रेज नौकरशाही तथा ब्रिटिश सेनाएं सकुशल इंग्लैण्ड लौट आएं! इस समस्या के समाधान के लिए लॉर्ड माउण्टबेटन की भारत के नए वायसराय के रूप में नियुक्ति की गई।

वायसरॉय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड वैवेल को भारतीय राजनीति में तभी से असफल माना जाने लगा था जब वे जून 1945 की शिमला बैठक में वायसराय की काउंसिल में मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति के मसले पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग को सहमत नहीं कर सके थे। जब अगस्त 1946 में मुस्लिम लीग द्वारा की गयी सीधी कार्यवाही से बंगाल और बिहार खून से नहा उठे तब वायसराय वैवेल की भारत में विश्वसनीयता पूरी तरह समाप्त हो गयी।

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उनके स्थान पर मार्च 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का वायसराय बनाया गया। लॉर्ड माउंटबेटन का पूरा नाम लुइस फ्रांसिस एल्बर्ट विक्टर निकोलस जॉर्ज माउंटबेटन था। उन्हें फर्स्ट अर्ल-माउण्टबेटन ऑफ बर्मा भी कहा जाता था। वे बेटनबर्ग के राजकुमार थे तथा ब्रिटिश राजपरिवार के सदस्य थे।  माउंटबेटन ब्रिटिश नौसेना में एडमिरल थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें केजी, जीसीबी, ओएम, जीसीएसआई, जीसीआईई, जीसीवीओ, डीएसओ, पीसी, एफआरएस आदि उपाधियां दे रखी थीं। उनका जन्म 25 जून 1900 को इंग्लैण्ड में हुआ था। लॉर्ड माउंटबेटन इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पति राजकुमार फिलिप (ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग) के मामा थे।

लॉर्ड माउंटबेटन भारत के आखिरी वायसरॉय थे और स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल थे। स्पष्ट दृष्टिकोण एवं सुलझे हुए विचारों का धनी होने के कारण लॉर्ड माउंटबेटन का व्यक्तित्व बहुत शानदार था। वे प्रभावशाली वक्ता, कुशल सेनापति एवं इंग्लैण्ड के जाने-माने लोगों में से एक थे। ब्रिटेन के लिए प्राप्त की गई सामरिक सफलताओं के कारण माउण्टबेटन इंग्लैण्ड की संसद से जो चाहते थे, प्राप्त कर लेते थे।

यद्यपि वे लोकतंत्र के समर्थक थे तथापि ब्रिटिश राज-परिवार का सदस्य होने के कारण तथा ब्रिटेन के इतिहास से परिचित होने के कारण उनके मन में भारतीय राजाओं के प्रति विशेष सहानुभूति थी। उनकी पत्नी एडविना सरल स्वभाव एवं कोमल विचारों की स्वामिनी थीं। वे युद्धक्षेत्र में जाकर घायलों का उपचार करने, लोककल्याण का काम करने तथा अपने पति के कामों में उनका हाथ बंटाने के लिए जानी जाती थीं।

लॉर्ड इस्मे को माउण्टबेटन का चीफ-ऑफ-स्टाफ नियुक्त किया गया। इस्मे एक परिपक्व अधिकारी था। वह ई.1940 से 45 के बीच ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल का चीफ-ऑफ-स्टाफ रह चुका था। एलन कैम्पबेल जॉनसन को माउण्टबेटन का प्रेस अटैची नियुक्त किया गया। वह ई.1939 से माउण्टबेटन के स्टाफ में काम कर रहा था।

भारतीय सिविल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी सर जॉर्ज एबेल को लॉर्ड माउण्टबेटन का निजी सचिव नियुक्त किया गया। वह पंजाब के गवर्नर के निजी सचिव एवं लॉर्ड वैवेल के निजी सचिव के पद पर कार्य कर चुका था इसलिए उसे भारत की समस्याओं का अच्छी तरह से ज्ञान था।

जॉर्ज एबेल ने माउण्टबेटन से कहा कि भारत की वर्तमान दशा उस जहाज जैसी है जिसमें से आग की लपटें धू-धू कर उठ रही हों और जिसके गर्भ में बारूद भरा हुआ हो। सारी लड़ाई इसी बात की है कि आग बारूद तक पहले पहुंचेगी या उससे पहले हम उसे काबू में कर चुके होंगे।

वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन के राजनीतिक सलाहकार तथा राजनीतिक विभाग का सचिव के रूप में सर कोनार्ड कोरफील्ड की नियुक्ति की गई। वह एक मिशनरी का बेटा था तथा इण्डियन सिविल सर्विस के अधिकारी के रूप में ई.1920 में लॉर्ड रीडिंग के समय भारत आया था। उसका कार्य भारतीय रजवाड़ों के साथ अधिक रहा था।

वह हैदराबाद, रेवा, जयपुर तथा कुछ अन्य भारतीय रियासतों में पॉलिटिकल एजेंट के रूप में नियुक्त रहा। लॉर्ड वैवेल के समय उसे क्राउन रिप्रजेंटेटिव अर्थात् वायसराय का पोलिटिकल एडवाइजर बनाया गया। उसका काम वैवेल तथा देशी राजाओं के बीच सेतु के रूप में काम करने का था। लगभग पूरा जीवन भारतीय राजाओं के साथ व्यतीत करने के कारण वह देशी-राजाओं के बीच अधिक लोकप्रिय था तथा भारतीय नेताओं को पसंद नहीं करता था।

हैदराबाद का नवाब उसका दोस्त था। इसलिए कोरफील्ड को हिन्दू राजाओं की बजाय मुस्लिम शासकों द्वारा अधिक पसंद किया जाता था। लॉर्ड माउण्टबेटन समय रहते कोरफील्ड के व्यक्तित्व की इस कमजोरी को समझ नहीं सका। इसलिए आगे चलकर माउण्टबेटन को सरदार पटेल एवं जवाहरलाल नेहरू आदि भारतीय नेताओं के सामने नीचा देखना पड़ा।

भारत में वायसरॉय एवं गवर्नर जनरल के रूप में लॉर्ड माउण्टबेटन का काम केवल इतना था कि वे भारत को आजाद करके अंग्रेजों को उनकी पूरी गरिमा और शांति के साथ भारत से सुरक्षित निकाल ले जायें। 24 मार्च 1947 को माउंटबेटन ने भारत में वायसराय एवं गवर्नर जनरल का कार्यभार संभाला।

उस समय भारत बड़ी विचित्र स्थिति में फंसा हुआ था। देश की जनसंख्या लगभग 35 करोड़ थी जिसमें से 10 करोड़ मुस्लिम एवं 25 करोड़ हिन्दू तथा अन्य मतावलम्बी थे। कांग्रेस देश का सबसे बड़ा राजनैतिक दल था जिसे विश्वास था कि उसे 100 प्रतिशत हिन्दू, सिक्ख एवं अन्य मतावलम्बियों का तथा 90 प्रतिशत मुसलमानों का नेतृत्व प्राप्त था। जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि लीग को देश के 90 प्रतिशत मुसलमानों का समर्थन प्राप्त था।

कांग्रेस चाहती थी कि अंग्रेज भारत की सत्ता कांग्रेस को सौंपकर भारत से चले जाएं। मुस्लिम लीग चाहती थी कि अंग्रेज पहले भारत का विभाजन करें तथा मुसलमानों का अलग देश बनाएं। उसके बाद वे भारत को आजाद करें। हिन्दू-बहुल देश की सत्ता कांग्रेस को एवं मुस्लिम-बहुल देश की सत्ता मुस्लिम लीग को मिले। तीसरा बड़ा पक्ष भारतीय राजाओं का भी था जो कतई नहीं चाहते थे कि भारत को आजाद करके 565 देशी रियासतों को कांग्रेस के हाथों में सौंप दिया जाए।

भारत में काम कर रही कम्यूनिस्ट पार्टियाँ तथा राष्ट्रवादी एवं हिन्दू प्रभाव वाले राजनीतिक दल विशेषकर हिन्दू महासभा चाहते थे कि अंग्रेज भारत को विभाजित नहीं करें, भारत अखण्ड रहे तथा उसकी सत्ता केवल कांग्रेस को नहीं देकर भारत की समस्त राजनीतिक पार्टियों को साझा रूप से सौंपी जाए तथा देश में लोकतंत्र की स्थापना हो। सिक्खों, दलितों, ईसाईयों एवं एंग्लो-इण्डियनों के भी अपने-अपने पक्ष थे।

माउण्टबेटन को इन समस्त तत्वों से निबटना था, उन्हें संतुष्ट करना था तथा ब्रिटिश अधिकारियों, ब्रिटिश सैनिकों, उनके परिवारों, उनकी सम्पत्तियों तथा उनके घोड़ों आदि को सुरक्षित रूप से भारत से निकालकर इंग्लैण्ड ले जाना था। माउण्टबेटन को यह व्यवस्था भी करनी थी कि जिस समय रॉयल सेनाएं भारत छोड़कर जा रही हों, उस समय उपद्रवी, गुण्डे एवं हत्यारे किस्म के लोग भारत की निरीह जनता पर आक्रमण करके उसे हानि नहीं पहुँचाएं।

भारतीय लोग आजादी का समरोह मनाएं, उनकी सम्पत्ति, ढोर-डंगर सुरक्षित रहें तथा स्त्रियों के साथ बलात्कार नहीं हों। इतने सारे लक्ष्यों को एक साथ अर्जित करना कोई हँसी-खेल नहीं था। इन अर्थों में लॉर्ड माउण्टबेटन को अपने पूर्ववर्ती समस्त वायसरायों से अधिक कठिन काम करना था, उनसे भी अधिक जिन्होंने इंग्लैण्ड के लिए भारत को जीता था।

माउंटबेटन ने भारत में अपने प्रथम भाषण में कहा कि उनका कार्यालय सामान्य वायसराय का नहीं रहेगा। वे ब्रिटिश सरकार की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में जून 1948 तक सत्ता का हस्तांतरण करने तथा कुछ ही माह में भारत की समस्या का समाधान ढूंढने के लिये आये हैं।

माउंटबेटन ने एटली सरकार को 2 अप्रेल 1947 को अपनी पहली रिपोर्ट भेजी जिसमें उन्होंने लिखा कि- ‘देश का आंतरिक तनाव सीमा से बाहर जा चुका है। चाहे कितनी भी शीघ्रता से काम किया जाये, गृहयुद्ध आरंभ हो जाने का पूरा खतरा है। ‘

माउण्टबेटन ने गांधी, जिन्ना, नेहरू, लियाकत अली तथा पटेल से वार्त्ताएं कीं। इन नेताओं ने माउण्टबेटन को बताया कि वे भारत की स्वतंत्रता और विभाजन के सम्बन्ध में क्या विचार रखते थे और भारत की समस्या का क्या समाधान चाहते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी की जिद

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गांधीजी की जिद – जिन्ना को दे दो पूरी सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी का मानना था कि जिन्ना को पाकिस्तान कभी नहीं मिलेगा, जब तक कि अंग्रेज पाकिस्तान बनाकर उसे न दे दें। इसलिए गांधीजी की जिद थी कि कांग्रेस कभी भी पाकिस्तान की मांग न माने! कांग्रेस के अन्य नेताओं का कहना था कि यदि कांग्रेस न माने तो भी अंग्रेज जिन्ना को पाकिस्तान दे ही देंगे।

गांधीजी अपने साथियों को समझा-समझा कर हार गए थे, अंग्रेज ऐसा कभी नहीं करेंगे, जब तक कांग्रेस का बहुमत इसके विरोध में खड़ा है। विभाजन का फैसला वायसराय के नहीं कांग्रेस के हाथ में है। कांग्रेस चाहे तो इसे रोक सकती है। अंग्रेजों से कह दो कि वे चले जाएं। जो जैसा है, उसे वैसा ही छोड़कर चले जाएं। उनके पीछे जो भी होगा, हम देख लेंगे। भुगत लेंगे। अगर देश भर में आग लग जाती है, तो लग जाने दो, देश इस आग में तप कर कुन्दन की तरह निखर कर सामने आएगा, देश को अखण्ड रहने दो।

गांधीजी की जिद के सामने कांग्रेसी नेता स्वयं को असहाय पाते थे जबकि देशवासियों के लिए एक-एक दिन भारी पड़ रहा था। जिन्ना के मुसलमान प्रतिदिन सैंकड़ों हिन्दुओं की हत्या कर रहे थे।

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गांधीजी की जिद थी कि यदि अंग्रेज सरकार और कांग्रेस धैर्यपूर्वक कुछ समय व्यतीत करें और भारत की आजादी को कुछ दिन के लिए टाल दिया जाए तो भारत का विभाजन रुक सकता है। इसलिए जब गांधीजी ने माउण्टबेटन से पहली बार वार्ता की तो गांधीजी ने उनसे बार बार कहा- ‘भारत को तोड़ियेगा नहीं, काटियेगा नहीं। खून की नदियां बहती हैं तो बहें।’

31 मार्च 1947 को गांधीजी ने एक सार्वजनिक वक्तव्य में कहा– ‘यदि कांग्रेस विभाजन के लिए तैयार होगी तो यह मेरी मृत्यु के बाद ही होगा। मैं भारत का विभाजन आजीवन नहीं होने दूंगा।’ जब अंतरिम सरकार पूरी तरह विफल साबित होने लगी और जिन्ना किसी भी तरह पाकिस्तान का हठ छोड़ने को तैयार नहीं हुआ तब गांधीजी ने वायसराय को सुझाव दिया कि वे जवाहरलाल के स्थान पर जिन्ना को पूरी सरकार दे दें।

माउण्टबेटन के प्रेस अटैची एलन कैम्पबेल जॉनसन ने लिखा है- ‘गांधी ने सम्पूर्ण समस्या को हल करने के लिए आश्चर्यजनक प्रस्ताव रखा। वह यह था कि वर्तमान मंत्रिमण्डल को भंग करके जिन्ना को पूर्णतः मुस्लिम मंत्रिमंडल बनाने के लिए आमंत्रित किया जाए।’

माउंटबेटन ने पूछा- ‘जिन्ना की प्रतिक्रिया क्या होगी?’

गांधी ने उत्तर दिया- ‘जिन्ना कहेंगे, यह धूर्त गांधी की चाल है।’

माउंटबेटन ने प्रश्न किया- ‘और क्या उनका कहना सही नहीं होगा?’

गांधी ने कहा- ‘नहीं। मैं बिल्कुल दिल से कह रहा हूँ।’

इस पर माउंटबेटन ने कहा- ‘यदि आप इस प्रस्ताव पर कांग्रेस की औपचारिक स्वीकृति ला कर दे सकें तो ……. मैं भी विचार करने को राजी हूँ।’

मोसले ने इस घटना को इस प्रकार लिखा है-

‘गाधीजी ने दो दिन माउण्टबेटन से लगातार मुलाकात की तथा दूसरे दिन माउण्टबेटन के समक्ष एक योजना रखी। यह योजना ऐसी थी जिसे देखकर वैवेल चीख उठता। उसकी योजना थी कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग का गतिरोध आसानी से हटाया जा सकता है।

वायसराय को चाहिए कि मि. जिन्ना को बुलाकर सरकार बनाने का काम सौंपा जाए। इस सरकार में सिर्फ मुसलमान ही रहें या हिन्दू और मुसलमान दोनों, यह जिन्ना की मर्जी पर छोड़ दिया जाए। वायसराय के वीटो के अलावा यह सरकार अपनी मर्जी से शासन चलाने में पूर्ण स्वतंत्र हो।

वायसराय ने तुरन्त जवाब दिया कि योजना बड़ी आकर्षक है और वह सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगा, यदि कांग्रेस भी इसे व्यावहारिक समझे।

….. कांग्रेस ने इस योजना को बुरी तरह ठुकरा दिया और वायसराय ने भी गांधी को लिखा कि इस योजना के सम्बन्ध में उसके विचारों के बारे में भी गलतफहमी हुई है।’

मोसले ने इस योजना की विफलता का दोष वायसराय पर मंढ़ा है। वे लिखते हैं-

‘बैठक के तुरंत बाद माउण्टबेटन और उसके अधिकारियों ने इस योजना की हत्या शुरू कर दी क्योंकि उनका यह विश्वास था कि यह योजना काम में नहीं लाई जा सकती। यह काम इतनी अच्छी तरह से किया गया कि बहुत जल्द गांधी ने घोषणा कर दी कि वह वायसराय के साथ बातचीत में और हिस्सा नहीं लेगा, सिर्फ कांग्रेस के मामलों में सलाह दिया करेगा।’

आशा और निराशा में झूलने लगा देश

गांधी, नेहरू एवं पटेल आदि अधिकतर कांग्रेसी हिन्दू नेता भारत के विभाजन के विरुद्ध थे। नेहरू विभाजन को लेकर संभवतः अब भी असमंजस में थे। उन्हें लगता था कि कांग्रेस के राष्ट्रवादी मुसलमानों की सहायता से भारत विभाजन को रोका जा सकता है। वे इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि अधिकतर कांग्रेसी मुस्लिम नेता नेहरू-पटेल और गांधी की राजनीति में विश्वास नहीं करते थे।

एक बार वल्लभभाई पटेल ने हंसी-हंसी में परंतु अति दुःख के साथ कहा था कि- ‘कांग्रेस में केवल एक राष्ट्रीय मुसलमान रह गया है और वह जवाहरलाल नेहरू है।’

राजाजी राजगोपालाचारी जैसे कुछ लोग बेकार के पचड़े में पड़कर भारत की आजादी के मामले को उलझाये जाने से अच्छा समझते थे कि भारत का युक्ति-युक्त आधार पर विभाजन कर दिया जाये। उस समय भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक घनश्यामदास बिड़ला जो कि पिछले बहुत समय से कांग्रेस के बड़े नेताओं को आजादी की लड़ाई के लिए धन एवं संसाधन उपलब्ध कराते रहे थे, भी राजाजी के विचारों से सहमत थे।

घनश्यामदास बिड़ला ने नेहरू से विभाजन स्वीकार करने का अनुरोध किया

घनश्यामदास बिड़ला ने नेहरूजी के नाम एक पत्र लिखकर उन्हें विभाजन की मांग को स्वीकार कर लेने का सुझाव दिया-

‘साझे के व्यापार में अगर कोई साझेदार संतुष्ट नहीं हो तो उसे अलग होने का अधिकार मिलना ही चाहिये। विभाजन युक्ति-युक्त अवश्य होना चाहिये लेकिन विभाजन का ही विरोध कैसे किया जा सकता है……।

अगर मैं मुसलमान होता तो पाकिस्तान न कभी मांगता न कभी लेता। क्योंकि विभाजन के बाद इस्लामी भारत बहुत ही गरीब राज्य होगा जिसके पास न लोहा होगा न कोयला। यह तो मुसलमानों के सोचने की बात है। मुझे तो पूरा विश्वास है कि अगर आप पाकिस्तान देने को तैयार हो जायें तो मुसलमान उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे।

उनका स्वीकार करना या न करना बाद की बात है फिलहाल हमारा पाकिस्तान की मांग का विरोध करना मुसलमानों के मन में पाकिस्तान की प्यास ही बढ़ायेगा।’

बँटवारा ही एकमात्र रास्ता

वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना ने 1947 की गर्मियों में पंजाब के दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया। अस्पतालों और दंगे से तबाह गांवों में उसने साम्प्रदायिक क्रूरता के दृश्य देखे- हाथ-कटे बच्चे, पेट-कटे हुए गर्भवती औरतें, सारे परिवार में अकेला बचा रहने वाला बच्चा! ….. उसका दृढ़ विश्वास हो गया कि उसके पति और साथी ठीक कहते है, बंटवारा ही एकमात्र रास्ता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

एडविना माउण्टबेटन

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एडविना माउण्टबेटन ने जवाहर लाल नेहरू को भारत-विभाजन के लिए तैयार किया

बँटवारा ही एकमात्र रास्ता

वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना माउण्टबेटन ने 1947 की गर्मियों में पंजाब के दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया। अस्पतालों और दंगे से तबाह गांवों में उसने साम्प्रदायिक क्रूरता के दृश्य देखे- हाथ-कटे बच्चे, पेट-कटे हुए गर्भवती औरतें, सारे परिवार में अकेला बचा रहने वाला बच्चा! ….. उसका दृढ़ विश्वास हो गया कि उसके पति और साथी ठीक कहते है, बंटवारा ही एकमात्र रास्ता है।

एडविना एडविना माउण्टबेटन के तर्क से सहमत होकर माउंटबेटन ने गांधी, नेहरू और पटेल को भारत के विभाजन के लिये तैयार किया। गांधीजी ने विभाजन को मानने से इंकार कर दिया किंतु नेहरू और पटेल मान गये। जब मौलाना ने नेहरू को विभाजन का समर्थन करते देखा तो वह दंग रह गए।

मौलाना ने लिखा है- ‘विभाजन के सबसे बड़े विरोधी जवाहरलाल नेहरू माउण्टबेटन के भारत आगमन के एक माह में ही भारत विभाजन की आवश्यकता से सहमत हो गए।’

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जवाहरलाल नेहरू के विचारों में परिवर्तन के लिए माउण्टबेटन को जिम्मेदार बताते हुए मौलाना आजाद ने एडविना की भूमिका की ओर भी संकेत किया है- ‘जवाहरलाल नेहरू माउंटबेटन से प्रभावित थे किंतु नेहरू माउंटबेटन से भी अधिक एडविना से प्रभावित थे। वह न केवल अत्यंत बुद्धिमती थी अपितु अत्यधिक आकर्षक एवं मैत्रीपूर्ण स्वभाव की महिला थी। वह अपने पति की गहरी प्रशंसक थी तथा बहुत से मामलों में उसने अपने पति को अपने विचार बदलने पर विवश भी किया था।’

मौलाना ने नेहरू के विचारों में परिवर्तन के लिए नेहरू के मित्र कृष्णा मेनन को भी संभावित उत्तरदायी माना है। वे लिखते हैं- ‘नेहरू प्रायः कृष्णा मेनन की सलाह सुनते थे। मुझे यह देखकर बहुत प्रसन्नता नहीं हुई कि मेनन ने इस मामले में नेहरू को गलत सलाह दी थी।’

पटेल भारत-विभाजन के लिए पहले से तैयार थे। यह कहना गलत होगा कि सरदार पटेल को माउण्टबेटन ने भारत-विभाजन के लिए समझाया या तैयार किया। सरदार तो पहले से ही विभाजन के पक्ष में थे किंतु वे न केवल प्रमुख कांग्रेसी नेता थे अपितु उस काल की राजनीति में गांधीजी के सबसे बड़े सहायक थे, इसलिए प्रकट रूप से वे गांधीजी की नीति का समर्थन करते थे कि देश का विभाजन नहीं होना चाहिए किंतु वे जानते थे कि तत्कालीन परिस्थितियों में यह संभव नहीं था।

अबुल कलाम का दुःख

अबुल कलाम ने लिखा है- ‘मैं आश्चर्यचकित एवं दुःखी हुआ जब पेटल ने यह कहा कि हम पसंद करें या नहीं किंतु भारत में दो राष्ट्र हैं। पटेल इस बात से सहमत थे कि मुसलमानों और हिन्दुओं को अब एक देश में एकीकृत नहीं किया जा सकता।’

मौलाना एवं गांधी के विचारों में बहुत समानता थी किंतु पटेल और मौलाना के विचारों में इतना अधिक अंतर था कि मौलाना और पटेल कभी एक दूसरे की आंखों में आंखें डालकर बात नहीं करते थे। इस बात का क्या अर्थ था?

लेखक की राय में इस बात का सीधा सा अर्थ यही निकलता था कि पटेल और गांधीजी के विचारों में भी बहुत विरोध था किंतु पटेल गांधीजी का विरोध नहीं करते थे। मौलाना और गांधीजी विभाजन नहीं चाहते थे किंतु पटेल चाहते थे, और वे इसे भारत की राजनीतिक एवं साम्प्रदायिक समस्याओं के अंत के लिए एकमात्र उपाय के रूप में देख रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जिन्ना का उन्माद

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जहाँ एक ओर गांधीजी की जिद थी कि वे मुसलमानों को भारत से अलग नहीं जाने देंगे, वहीं दूसरी ओर जिन्ना का उन्माद उसके सिर पर हावी था। वह हर कीमत में पाकिस्तान चाहता था। माउण्टबेटन की दृष्टि में जिन्ना उन्मादी था!

जहाँ भारत के मुसलमान भारत से अलग पाकिस्तान देश के निर्माण को जेहाद समझ रहे थे, वहीं दूसरी ओर जिन्ना का उन्माद इस्लाम के लिए नहीं था, गांधी, नेहरू और सरदार पटेल जैसे कांग्रेसी नेताओं को नीचा दिखाने के लिए था। वह स्वयं को धरती के नक्शे पर एक राष्ट के जनक के रूप में देखना चाहता था। जिन्ना के लिए जेहाद कोई मायने नहीं रखता था।

जहाँ गांधीजी, खान अब्दुल गफ्फार खान और मौलाना आजाद सहित बहुत से कांग्रेसी नेता अब भी यह समझ रहे थे कि किसी न किसी तरह से विभाजन टल जाएगा किंतु माउण्टबेटन जानते थे कि सच्चाई क्या है! माउण्टबेटन ने लिखा है-

‘देश का विभाजन करने पर जिन्ना इस कदर आमादा थे कि मेरे किसी शब्द ने उनके कानों में प्रवेश किया ही नहीं, हालांकि मैंने ऐसी हर चाल चली जो मैं चल सकता था, ऐसी हर अपील मैंने की जो मेरी कल्पना में आ सकती थी। पाकिस्तान को जन्म देने का सपना उन्हें घुन की तरह लग चुका था। कोई तर्क काम न आया।

……. दो कारणों से जिन्ना की ताकत बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। उन्होंने स्वयं को मुस्लिम लीग का बादशाह बनाने में सफलता पा ली थी। लीग के अन्य सदस्य समझौते के लिए शायद तैयार हो भी जाते, लेकिन जब तक जिन्ना जिन्दा थे, उन सदस्यों की जुबान नहीं खुल सकती थी।’

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जिन्ना का उन्माद माउण्टबेटन से छिपा नहीं रह सका। बहस किए जाइए, किए जाइए, किए जाइए। जिन्ना कुछ सुनने वाला नहीं। जब सुनने वाला ही नहीं, फिर बहस के पीछे समय जाया करके, गृह-युद्ध के खतरे को और-और बढ़ाते जाने कोई अर्थ नहीं था। जिन्ना का उन्माद सरदार पटेल से अधिक और काई नहीं जानता था। पटेल ने पंजाब एवं बंगाल के विभाजन का एक प्रस्ताव पारित किया तथा कांग्रेसियों को समझाया कि चूंकि पाकिस्तान का निर्माण इस्लामिक एवं गैर-इस्लामिक जनसंख्या के आधार पर होना है इसलिए पंजाब एवं बंगाल के हिन्दुओं को भारत में रहने का अधिकार है, जिन्ना उन्हें पाकिस्तान में शामिल नहीं कर सकते इसलिए भारत विभाजन से पहले पंजाब एवं बंगाल का विभाजन किया जाए।

पटेल ने कांग्रेसियों को समझाया कि जिन्ना किसी भी हालत में ऐसे पाकिस्तान को स्वीकार नहीं करेगा जिसमें पूरा पंजाब एवं पूरा बंगाल नहीं हो, इस प्रकार भारत के विभाजन को टाला जा सकता है। पटेल की बात कांग्रेसियों को उचित लगी। कुछ लोगों का मानना था कि पटेल ने भारत के विभाजन को रोकने के लिए प्रांतीय विभाजन का प्रस्ताव तैयार किया था।

मोसले ने लिखा है-

‘अपने सभी साथियों की अपेक्षा पटेल ही ठीक-ठीक जानते थे कि वे क्या कह रहे हैं। कांग्रेस कार्यसमिति के समक्ष भारत विभाजन के प्रस्ताव को पटेल ने प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव में पंजाब को दो टुकड़ों में बांटने की सिफारिश थी। एक टुकड़ा हिन्दुओं का, दूसरा मुसलमानों का। सिक्खों को यह आजादी थी कि वे कहाँ रहेंगे इसका निर्णय वे स्वयं कर सकें।

निर्णय का संकेत स्पष्ट था। यदि कांग्रेस एक प्रदेश का बंटवारा मान सकती है तो देश के बंटवारे का कैसे विरोध कर सकती है! कांग्रेस के संगठनकर्त्ता और संचालक की हैसियत से वह महसूस करता था कि आजाद हिन्दुस्तान में विरोधी दल के रूप में मुस्लिम लीग का मतलब है मुसीबत, कांग्रेस की योजनाओं का अंत, कानूनों पर रोकथाम।

…… पटेल ने वर्किंग कमेटी के एक सदस्य को लिखा- ‘यदि लीग पाकिस्तान के लिए अड़ जाती है तो फिर उसका एकमात्र तरीका है बंगाल और पंजाब का बंटवारा।

…… मैं नहीं समझता कि ब्रिटिश सरकार इस बंटवारे के लिए सहमत हो जाएगी। आखिरकार शक्तिशाली दल के हाथों सरकार सौंप देने की अक्ल आएगी। और यदि नहीं आई तो भी कोई बात नहीं। केन्द्र की मजबूत सरकार होगी, पूर्वी बंगाल, पंजाब का कुछ हिस्सा, सिंध और बलूचिस्तान इस केन्द्र के अधीन स्वतंत्र होंगे। केन्द्र इतना शक्तिशाली होगा कि अंततः वह भी इसमें आ जाएंगे।’

नेहरू को यह योजना पसंद आई। वह इस बंटवारे के माध्यम से जिन्ना को संदेश देना चाहता था कि यदि वह बंटवारा मांगेगा तो उसका हश्र यह भी हो सकता है। जब मौलाना आजाद और गांधीजी दिल्ली से बाहर थे तब यह प्रस्ताव कांग्रेस वर्किंग कमेटी में पारित करा लिया गया।

पटेल भले ही कांग्रेसियों को यह समझा रहे थे कि वे पाकिस्तान की मांग को दबाने के लिए यह चाल चल रहे हैं किंतु वस्तुतः वे इस प्रस्ताव के माध्यम से अंत्यत चतुराई से भारत-विभाजन की ओर बढ़ रहे थे क्योंकि जब तक कांग्रेस पंजाब एवं बंगाल के विभाजन का निर्णय नहीं लेती है, तब तक भारत के विभाजन का निर्णय संभव ही नहीं था और पटेल ने गांधी तथा मौलाना आजाद की अनुपस्थिति में कांग्रेस से यह निर्णय करवा लिया।

पटेल के प्रयत्नों से जिन्ना का उन्माद अब ठोस सच्चाई में बदलने जा रहा था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पंजाब और बंगाल

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मुहम्मद अली जिन्ना भारत का विभाजन चाहता था न कि पंजाब और बंगाल का। पंजाब और बंगाल को वह समूचा ही हड़प जाना चाहता था। सरदार पटेल उसकी इस मंशा को किसी भी कीमत पर पूरी नहीं होने दे सकते थे!

मुहम्मद अली जिन्ना को जिस पाकिस्तान की चाहत थी उसके अंतर्गत पांच नदियों से सिंचित विशाल पंजाब में लहलहाते गेहूं और गन्ने के खेत और गंगा तथा ब्रह्मपुत्र के जलों से सिंचित बंगाल में लहलहाते चावल, गन्ने और पटसन के खेत शामिल थे। उसमें पंजाब के लाहौर, अमृतसर, रावपिण्डी और कराची तथा बंगाल के कलकत्ता और ढाका जैसे विशाल व्यावसायिक एवं औद्योगिक नगर शामिल थे।

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जिन्ना पंजाब और बंगाल के बल पर खैबर-पख्तून, बलोचिस्तान तथा सिंध के निर्धन क्षेत्रों के लोगों का पेट भरना चाहता था। सरदार पटेल ने जिन्ना की इस कमजोरी को पकड़ लिया था और वे भारत का विभाजन रोकने के लिए इन दोनों प्रांतों का विभाजन करने की बात करने लगते थे। उनका तर्क था कि इन दोनों प्रांतों के साथ इन प्रांतों के हिन्दू पाकिस्तान को नहीं सौंपे जा सकते। जब माउण्टबेटन ने जिन्ना से भेंट की तो वायसराय ने उसे बताया कि वे भारत का विभाजन नहीं कर सकते। इस पर जिन्ना ने कहा कि विभाजन तो उन्हें करना ही होगा।

ई.1938-39 में उन लोगों ने (हिन्दुओं ने) हमारे साथ जो किया था, उसके कारण उन पर हमें भरोसा नहीं। आपके जाने के बाद हम कुछ चुने हुए हिन्दुओं के रहम पर रह जाएंगे। हमें दबाया जाएगा। हमारे साथ बहुत बुरा होगा। माउण्टबेटन ने जिन्ना को भरोसा दिलाना चाहा कि- ‘नेहरू और उनके साथियों का ऐसा करने का कोई इरादा नहीं है। फिर भी यदि आपको पाकिस्तान चाहिए तो मुझे पंजाब और बंगाल का विभाजन करना होगा। आप पंजाब और बंगाल के हिन्दुओं को पाकिस्तान नहीं ले जा सकते।’

 जिन्ना ने कहा- ‘आप यह नहीं समझते कि पंजाब एक राष्ट्र है, बंगाल एक राष्ट्र है। एक आदमी पंजाबी या बंगाली पहले है, बाद में हिन्दू या मुसलमान। अगर आप ये सूबे हमें देंगे तो किसी भी हालत में उनका बंटवारा नहीं करेंगे। इससे खून खराबा होगा।’

माउण्टबेटन ने कहा- ‘हिन्दू-मुसलमान, पंजाबी-बंगाली से पहले वह भारतीय है। इसलिए आप भारत के एक बने रहने के पक्ष में दलील दे रहे हैं। ….. यदि आप कैबीनेट मिशन प्लान को मान लेते तो आपको बहुत अधिक स्वायत्त अधिकार मिल जाते। पंजाब और बंगाल अपना शासन स्वयं संभालते। संयुक्त राष्ट्र अमरीका से भी अधिक स्वायत्तता होगी। फिर आप अल्पसंख्यक जनता को मनचाहे ढंग से दबाने की खुशी भी हासिल कर सकेंगे क्योंकि आप केन्द्र को हस्तक्षेप करने से टोक सकेंगे। क्या यह बात आपको अनुकूल लगती है?’

जिन्ना ने कहा- ‘नहीं! मैं भारत का एक हिस्सा नहीं बनना चाहता। हिन्दू राज्य के अधीन होने से तो मैं सब-कुछ खो देना ज्यादा पसंद करूंगा।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत विभाजन केवल पागलपन

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जिस समय लॉर्ड माउण्टबेटन भारत का विभाजन करने एवं उसे आजादी देने के उद्देश्य से भारत पहुंचे तो भारत के नेता और जनता दो धड़ों में बंट गए। एक धड़ा भारत विभाजन के लिए पागल हुआ पड़ा था और दूसरा धड़ा भारत विभाजन को ही पागलपन समझता था।

कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के नेताओं से हुए विचार-विमर्श से भारत के नए वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन तुरंत समझ गए कि भारत का बंटवारा अनिवार्य है। मुसलमानों को पाकिस्तान देना ही होगा। अन्यथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग अनन्त काल तक एक दूसरे से लड़ते ही रहेंगे। इसलिए उन्होंने भारत विभाजन की एक योजना तैयार की तथा इंग्लैण्ड की एटली सरकार को भेज दी।

इस योजना के साथ माउण्टबेटन ने एक पत्र भी लिखा- ‘विभाजन केवल पागलपन है। अगर इन अविश्वसनीय कौमी दंगों ने एक-एक व्यक्ति को वहशी न बना दिया होता, अगर विभाजन का एक भी विकल्प ढूंढ सकने की स्थिति होती तो दुनिया का कोई व्यक्ति मुझे इस पागलपन को स्वीकार करने के लिये बहका नहीं सकता। विश्व के सामने स्पष्ट रहना चाहिये कि ऐसे दीवानगी भरे फैसले की पूरी जिम्मेदारी भारतीय कंधों पर है, क्योंकि एक दिन ऐसा जरूर आयेगा जब स्वयं भारतीय अपने इस फैसले पर बुरी तरह पछतायेंगे।’

यह एक बड़ी विचित्र बात थी कि जिन भारतीय नेताओं को माउंटबेटन ने भारत विभाजन के लिये बड़ी मुश्किल से तैयार किया था, उन्हीं भारतीय नेताओं पर माउंटबेटन ने भारत विभाजन का आरोप रख दिया। माउंटबेटन को अपने प्रतिवेदन में ‘भारतीयों’ शब्द का प्रयोग न करके ‘लीगी नेताओं’ शब्द प्रयुक्त करने चाहिये थे।

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31 मार्च 1947 को गांधीजी ने माउण्टबेटन से भेंट की और गांधीजी को यह जानकर दुःख हुआ कि पटेल और नेहरू भी विभाजन के समर्थक हो गए हैं। गांधीजी की वायसराय से हुई भेंट के बाद मौलाना अबुल कलाम आजाद गांधीजी से मिलने पहुंचे। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने इस भेंट के संस्मरण अपनी पुस्तक इण्डिया विन्स फ्रीडम में लिखे हैं- ‘मैं फौरन उनसे मिलने गया । गांधीजी का पहला कटाक्ष था- बंटवारा अब खतरा बन गया है। लगता है कि वल्लभभाई और यहाँ तक कि जवाहरलाल ने भी घुटने टेक दिए हैं। अब आप क्या कीजिएगा? क्या आप मेरा साथ देंगे या आप भी बदल गए हैं?’

मौलाना ने जवाब दिया- ‘मैं बंटवारे के खिलाफ रहा हूँ और अब भी हूँ। बंटवारे के खिलाफ जितना मैं आज हूँ उतना पहले कभी न था लेकिन मुझे यह देखकर अफसोस है कि जवाहरलाल और सरदार पटेल ने भी हार मंजूर कर ली है और आपके शब्दों में हथियार डाल दिए हैं। मेरी आशा अब एकमात्र आप पर टिकी है। अगर आप बंटवारे के खिलाफ खड़े हों तो हम अब भी उसे रोक सकते हैं। अगर आप भी मंजूर कर लेते हैं तो मुझे यह डर है कि हिंदुस्तान का सर्वनाश हो जाएगा।’

गांधीजी ने कहा- ‘आप भी कैसा सवाल पूछते हैं? अगर कांग्रेस बंटवारा मंजूर करेगी तो उसे मेरी लाश के ऊपर करना पड़ेगा। जब तक मैं जिंदा हूं मैं भारत के बंटवारे के लिए कभी राजी न हूंगा। और अगर मेरा वश चला तो कांग्रेस को भी इसे मंजूर करने की इजाजत नहीं दूंगा।

…….. बाद में उसी दिन गांधीजी लॉर्ड माउंटबेटन से मिले। वे दूसरे दिन भी उनसे मिले और फिर दो अप्रैल को भी मिले। ज्यों ही वे लॉर्ड माउंटबेटन से पहली बार मिलकर वापस आए त्यों ही सरदार पटेल उनके पास पहुंचे और दो घण्टे तक गुप्त वार्ता करते रहे। इस मुलाकात में क्या हुआ, मैं नहीं जानता। लेकिन जब मैं फिर गांधीजी से मिला तो मुझे इतना बड़ा आघात लगा जितना जिंदगी में कभी भी नहीं लगा था, क्योंकि मैंने देखा कि वह भी बदल गए हैं।’

गांधीजी भी क्यों बदल गए और बंटवारे के पक्ष में हो गए, इसके ऊपर प्रकाश डालते हुए आजाद ने बताया कि देश की एकता बचाए रखने के लिए गांधीजी ने लॉर्ड माउंटबेटन को सुझाव दिया था कि जिन्ना को सरकार बनाने दी जाए और उन्हें अपने मंत्रिमण्डल के सदस्यों का चुनाव करने दिया जाए। माउंटबेटन को यह बात कुछ जंच गई थी किंतु इस सुझाव का जबर्दस्त विरोध नेहरू और पटेल दोनों ने किया और इसे वापस लेने के लिए गांधीजी को बाध्य किया।

आजाद ने लिखा- ‘गांधीजी ने मुझे यह बात याद दिलाई और कहा कि परिस्थितियां अब ऐसी हैं कि बंटवारा अवश्यंभावी लगता है।’ मौलाना अबुल कलाम आजाद का विचार था कि गांधीजी, सरदार पटेल के प्रभाव के कारण बंटवारे का विरोध नहीं कर सके और उसके समर्थक बन गए।

भारत स्वतंत्रता के द्वार पर खड़ा था और उसके नेता अभी भी घनघोर असमंजस में थे। उस काल के कुछ मुस्लिम नेता भारत विभाजन के माध्यम से मुसलमानों का भला करना चाहते थे तो कुछ नेता मुसलमानों को भारत में रखकर ही उनका भला करना चाहते थे। मौलान आजाद भी उन मुस्लिम नेताओं में से थे जो इस बात को समझते थे कि यदि मुसलमना भारत में रहेंगे तो उन्हें अधिक संसाधन एवं अवसर उपलब्ध होंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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