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माउण्टबेटन प्लान

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माउण्टबेटन प्लान - www.bharatkaitihas.com
माउण्टबेटन प्लान

ब्रिटिश सरकार ने लॉर्ड माण्टबेटन को स्पष्ट आदेशों के साथ भारत भेजा था। उन्हें तीन लक्ष्य दिए गए थे- भारत का विभाजन करना, भारत को स्वतंत्र करना तथा भारत से अंग्रेजों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करना। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए लॉर्ड माउण्टबेटन ने एक योजना बनवाकर इंग्लैण्ड भिजवाई। इसे माउण्टबेटन प्लान कहा जाता है।

बेईमान रैफरी

यद्यपि कुछ अंग्रेज इतिहासकारों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग की लड़ाई में अंग्रेजों को रैफरी की भूमिका से युक्त बताया है। अब तक अंग्रेज-शक्ति मुस्लिम लीग का ही अधिक साथ देती आयी थी। वह उस बेईमान रैफरी की तरह थी जो मौका पाते ही चुपके से दो मुक्के उस प्रतिद्वंद्वी में जमा देती थी जो उसे पसंद नहीं था। अक्सर ये मुक्के कांग्रेस को पड़ते थे क्योंकि कांग्रेस हर हालत में भारत की आजादी चाहती थी जबकि मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग के माध्यम से भारत की आजादी का रास्ता अवरुद्ध कर रखा था।

नेहरू ने बचाया देश को

भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श के बाद माउण्टबेटन ने भारत विभाजन की एक योजना तैयार की जिसे माउंटबेटन प्लान कहा जाता है। वायसराय ने मई 1947 के आरम्भ में इस योजना को ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति के लिए लॉर्ड इस्मे के साथ लंदन भिजवा दिया। भारत की आजादी की योजना में लॉर्ड माउण्टबेटन ने प्रस्तावित किया कि भारत को दो स्वतंत्र देशों के रूप में आजादी दी जायेगी जिसमें से एक टुकड़ा पाकिस्तान होगा और दूसरा भारत। पाकिस्तानी क्षेत्रों का निर्धारण अंग्रेजों द्वारा नहीं किया जाएगा अपितु इसका निर्णय भारतीय स्वयं करेंगे।

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अंग्रेजों के अधीन 11 ब्रिटिश प्रांतों में से प्रत्येक प्रांत को पाकिस्तान या भारत में मिलने का निर्णय लेने का स्वतंत्र अधिकार होगा। यदि किसी ब्रिटिश प्रांत की जनता चाहे तो वह प्रांत भारत और पाकिस्तान दोनों में से किसी के भी साथ मिलने से इन्कार करके अपने प्रदेश को स्वतंत्र देश बना सकेगी। ऐसा करने के पीछे माउंटबेटन का तर्क यह था कि प्रजा पर न तो भारत थोपा जाये और न ही पाकिस्तान। प्रजा अपना निर्णय स्वयं करने के लिये पूर्ण स्वतंत्र रहे। जो प्रजा पाकिस्तान में मिलना चाहे, वह पाकिस्तान में मिले। जिसे भारत के साथ मिलना हो, वह भारत का अंग बने। जिसे दोनों से अलग रहना हो, वह सहर्ष अलग रहे। इसके निर्णय की प्रक्रिया ब्रिटिश प्रांतों में लम्बे समय से चल रही लेजिस्लेटिव एसम्बलियों के माध्यम से होनी थी। माउण्टबेटन द्वारा भारत में स्थित लगभग 565 देशी रियासतों के लिए भी यही प्रक्रिया प्रस्तावित की गई थी जिसके अनुसार प्रत्येक देशी रियासत को अधिकार होगा कि वह चाहे तो भारत में मिले, चाहे पाकिस्तान में मिले, चाहे स्वतंत्र रहे अथवा कुछ रियासतें मिलकर अपने लिए अलग-अलग देश बना लें। इस प्रकार माउंटबेटन ने कैबीनेट मिशन योजना की अनदेखी करके पाकिस्तान निर्माण के लिए क्रिप्स मिशन वाला खतरनाक रास्ता अपनाया।

यह अत्यंत खरतनाक योजना थी जिससे देश के टुकड़े-टुकड़े हो जाते और भारत बाल्कन द्वीपों की तरह बिखर जाता। भारत देश का कोई अस्तित्व ही नहीं होता। भारत में से निकलकर ब्रिटिश-प्रांत एवं देशी-रियासातें अलग-अलग देशों का ऐसा गुच्छा बन जातीं जो एक-दूसरे के रक्त की प्यासी होतीं। न तो कांग्रेसी नेताओं ने और न मुस्लिम लीग के नेताओं ने ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना कभी की थी।

इस स्वतंत्रता से तो देश अंग्रेजों के अधीन रहकर तब तक स्वतंत्रता की प्रतीक्षा कर सकता था जब तक कि भारत स्वयं को एक रूप में, एक साथ और एक आत्मा के साथ स्वतंत्र होने योग्य बना ले। जब माउण्टबेटन ने भारत-पाकिस्तान के विभाजन की योजना इंग्लैण्ड भेज दी तब एक दिन उन्होंने इस योजना का प्रारूप जवाहरलाल नेहरू को दिखाया। जवाहरलाल नेहरू उस समय तक माउण्टबेटन की पत्नी एडविना के गहरे मित्र बन चुके थे।

दोनों ही मिलकर सिगरेट पीते थे, साथ-साथ यात्राएं करते थे तथा चाय की चुस्कियों एवं डिनर के छुरी-कांटों के साथ भारत की राजनीति पर घण्टों बात करते थे। माउण्टबेटन को विश्वास था कि आजाद-खयालों एवं व्यक्तिगत आजादी के पक्षधर अंग्रेजी पढ़े-लिखे नेहरू ईमानदारी से बनाई गई इस योजना को देखते ही सहमत हो जाएंगे किंतु हुआ बिल्कुल ठीक उलटा। जवाहरलाल नेहरू इस योजना को देखते ही आग बबूला हो गये।

वे अखण्ड भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री थे तथा उनकी आंखों में अब भी अखण्ड एवं स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी तैर रही थी, जो उन्हें कभी नहीं मिलने वाली थी। यदि वे माउण्टबेटन प्लान को स्वीकार कर लेते तो वे संभवतः एक ऐसे देश के प्रधानमंत्री रह जाते जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होना था। इस योजना के आधार पर बनने वाले लगभग छः सौ देशों में से शायद ही कोई उन्हें प्रधानमंत्री बनाने को तैयार होता।

जवाहरलाल ने अत्यंत रूखे शब्दों में माउण्टबेटन प्लान को मानने से अस्वीकार कर दिया। जवाहरलाल का जवाब सुनकर माउण्टबेटन को निराशा हुई किंतु उन्होंने जवाहरलाल से ही कहा कि ठीक है वे लंदन भेजी जा चुकी योजना को रद्द कर देंगे और शीघ्र ही एक नई योजना तैयार करवाकर जवाहरलाल को दिखाएंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वी. पी. मेनन द्वारा भारत विभाजन योजना में संशोधन

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जवाहरलाल नेहरू ने माउण्टबेटन प्लान को यह कहकर नकार दिया कि ब्रिटिश प्रांतों को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता के वे स्वयं इस बात का निर्णय लें कि भारत में रहें या पाकिस्तान में, अपितु हिन्दू बहुल प्रांतों को अनिवार्यतः भारत में ही रखा जाएगा तथा केवल मुस्लिम बहुल प्रांतों को ही पाकिस्तान में जाने का अधिकार होगा तो माउण्टबेटन ने वी. पी. मेनन से माउण्टबेटन प्लान में कुछ संशोधन करने को कहा।

जवाहरलाल नेहरू के नाराज हो जाने पर माउण्टबेटन की दृष्टि सरदार पटेल पर गई किंतु अब तक माउण्टबेटन समझ चुके थे कि इस योजना के मामले में पटेल तो नेहरू से भी अधिक कठोर सिद्ध होंगे। अतः माउण्टबेटन ने भारत सरकार में दोहरी भूमिका निभा रहे अपने राजनीतिक सलाहकार एवं सरदार पटेल के रियासती विभाग के सचिव वी. पी. मेनन से दूसरी योजना तैयार करने को कहा।

जहाँ लॉर्ड माउण्टबेटन के स्टाफ में इण्डियन सिविल सर्विस के बड़े-बड़े दिग्गज अधिकरी मौजूद थे और जिनकी छातियां ऑक्सफोर्ड एवं कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटियों की बड़ी-बड़ी डिग्रियों से जगमगाती थीं और जिनकी बुद्धिमानी के डंके पूरे इंग्लैण्ड में बजते थे और जिन्होंने भारत में अपनी जिंदगी के बहुत बड़े हिस्से गुजार दिये थे, उन सभी को नकार कर माउण्टबेटन ने एक ऐसे आदमी को भारत विभाजन की संशोधितत योजना बनाने के लिए बुलाया जो बहुत साधारण भारतीय परिवार के बारह सदस्यों में से एक था ।

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वह केवल 13 वर्ष की आयु में अपना स्कूल, घर और गांव छोड़कर बरसों तक दिल्ली की सड़कों पर हमाली और मजदूरी करता रहा था और रेलवे के इंजनों में कोयला झौंककर पेट पालता रहा था और जो केवल दो अंगुलियों से अंग्रेजी का टाइपराइटर चलाता था। इसका नाम वी. पी. मेनन था। उन दिनों पटेल और मेनन के दिमागों का गठजोड़ बहुत खतरनाक माना जाता था।

माउण्टबेटन को अनुमान भी नहीं था कि शतरंज की जिस चौसर पर माउण्टबेटन और जवाहरलाल नेहरू अपने-अपने मोहरे आगे बढ़ा रहे थे उस चौसर पर माउण्टबेटन और जहवाहरलाल तो स्वयं ही प्यादों से अधिक हैसियत नहीं रखते थे। असली खेल तो वी. पी. मेनन और सरदार पटेल खेलने वाले थे। चौसर भी मेनन और पटेल की थी और प्यादे भी। पटेल और मेनन ने बहुत पहले ही एक योजना अपने दिमाग में बना रखी थी। अब समय आ गया था जब मेनन उसे कागजों पर उतार दें। जहवारलाल नेहरू से बात करने के बाद माउण्टबेटन ने वी. पी. मेनन को बुलवाया तथा उन्हें उसी समय एक योजना बनाकर देने को कहा।

माउण्टबेटन ने इस बात का ध्यान रखा कि मेनन को पटेल से नहीं मिलने दिया जाए क्योंकि योजना बनाने से पहले यदि मेनन पटेल से मिले तो जहवारलाल को संदेह होगा कि विभाजन की नई योजना पटेल ने तैयार की है।

जवाहरलाल कतई नहीं चाहते थे कि इस योजना को बनाने का श्रेय सरदार पटेल को मिले। वी. पी. मेनन उसी समय वायसरॉय निवास पर टाइपराइटर लेकर बैठ गए और उन्होंने चार घण्टों में टाइपराइटर की मदद से एक योजना कागजों पर उतार दी। ऐसा लगता था कि यह मेनन ने तैयार की है किंतु वास्तव में इस योजना का खाका सरदार पटेल द्वारा पहले ही वी. पी. मेनन को बता दिया गया था।

ऑफिस के पोर्च में बैठकर हिमालय के विहंगम दृश्य का आनंद लेते हुए, लंच से डिनर के बीच फैले समय में अर्थात् कठिनाई से छः घण्टे तक काम करके एक ऐसे व्यक्ति ने भारतीय आजादी को नए सांचे में ढालने का गौरव प्राप्त किया, जिसने अपनी सरकारी नौकरी दो अंगुलियों से टाइपिंग करते हुए शुरू की थी। उसने जो मसौदा दुबारा लिखकर तैयार किया, उस आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप को नए सिरे से व्यवस्थित किया जाना था और दुनिया का नक्शा भी बदल जाने वाला था।

इस योजना में प्रस्तावित किया गया कि हिन्दू-बहुल आबादी भारत में रहेगी। मुस्लिम-बहुल आबादी वाले क्षेत्र पाकिस्तान में जायेंगे। प्रत्येक ब्रिटिश प्रांत को अनिवार्यतः भारत या पाकिस्तान में मिलना होगा। पंजाब और बंगाल का आबादी के आधार पर बंटवारा होगा। देशी रजवाड़े अपनी मर्जी से हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में मिल सकेंगे या फिर अलग देश के रूप में स्वतंत्र रह सकेंगे। नेहरू ने इस योजना को देखते ही स्वीकार कर लिया।

वी. पी. मेनन ने माउण्टबेटन प्लान में जो बड़ा बदलाव किया था, वह था पंजाब और बंगाल का मजहब के आधार पर बंटवारा। सरदार पटेल आरम्भ से ही पूरे पंजाब और पूरे बंगाल को पाकिस्तान में शामिल किए जाने के विरोधी थे।

माउण्टबेटन जानते थे कि जिन्ना आसानी से इस योजना को स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि उसकी मांग पूरे पंजाब और पूरे बंगाल की थी। इसके साथ-साथ ब्लूचिस्तान, सिंध और खैबर-पख्तून तो धर्म के आधार पर जिन्ना के थे ही। फिर भी माउण्टबेटन ने पंजाब और बंगाल के विभाजन वाली यह योजना स्वीकृति के लिए अपने सहायक लॉर्ड इस्मे के साथ लंदन भेज दी।

जिन्ना से भय

लियोनार्ड मोसले ने लिखा है-

‘योजना को स्वीकृति के लिये लंदन भेज दिये जाने के बाद माउंटबेटन जिन्ना की तरफ से आशंकित हो गया। उसे लगा कि जिन्ना छंटे हुए पाकिस्तान का विरोध करेगा। इसलिये उसने जिन्ना से बात की और उससे आश्वस्त होकर इस्मे को लंदन में तार भेजा कि मुझे पूरा विश्वास है कि जिन्ना इसे मान लेगा। हालांकि मैं जानता हूँ कि जिन्ना बहुत ही चालाक और सौदेबाज है, वह मुझे बहका भी सकता है।

माउंटबेटन को इतने पर भी संतोष नहीं हुआ। उसने जिन्ना से निबटने के लिये एक आपात योजना भी तैयार की कि यदि जिन्ना एन वक्त पर मुकर गया तो उस समय क्या किया जायेगा। इस आपात् योजना में मुख्यतः यह प्रावधान किया गया था कि चूंकि जिन्ना ने योजना को अस्वीकार कर दिया है इसलिये सत्ता वर्तमान सरकार को ही सौंपी जा रही है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी का असमंजस और भारत को बीच में से चीरने की योजना

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ईस्वी 1909 में अखण्ड भारत में मुस्लिम जनसंख्या

जब माउण्टबेटन प्लान अर्थात् भारत के विभाजन की योजना लंदन से स्वीकार होकर आ गई तब कांग्रेसी नेता, मुस्लिमलीगी नेता और भारत की जनता इस बात को समझ गए कि अब भारत विभाजन को कोई नहीं रोक सकता किंतु गांधीजी का असमंजस अब भी बना रहा। इसी दौरान जिन्ना ने भारत को बीच में से चीरने की खतरनाक योजना बनाई।

मौलाना अबुल कलाम द्वारा विभाजन का विरोध

जब मौलाना अबुल कलाम आजाद को ज्ञात हुआ कि माउंटबेटन ब्रिटिश मंत्रिमण्डल से मिलने लंदन जा रहे हैं तो मौलाना ने शिमला जाकर माउंटबेटन से भेंट की और प्रस्ताव रखा कि कैबीनेट मिशन प्लान पर दृढ़ रहें ताकि देश का विभाजन टाला जा सके। इस पर लॉर्ड माउंटबेटन ने कहा कि यदि सत्ता हस्तांतरण में देरी की गयी तो लोग ब्रिटिश सरकार की नीयत पर शक करेंगे और सरकार की बदनामी होगी।

भारत विभाजन को लेकर केवल मौलाना के मन में ही असमंजस नहीं था, गांधीजी का असमंजस भी बरकरार था। इन दानों वृद्ध नेताओं को अब भी लगता था कि भारत का विभाजन रोका जा सकता है और अविभाजित भारत में मुसलमान अधिक शांति एवं समृद्धि के साथ रह सकेंगे। हिन्दुओं का क्या होगा, संभवतः इस सम्बन्ध में मौलाना और गांधीजी दोनों ही नहीं सोचते थे!

गांधीजी का असमंजस

वायसराय एवं गवर्नर जनरल माउण्टबेटन के प्रयासों से 6 मई 1947 को गांधीजी ने नई दिल्ली में मुहम्मद अली जिन्ना के निवास पर भेंट की। उन दोनों के बीच भारत का वह नक्शा रखा गया जिसमें पाकिस्तान हरे रंग से दिखाया गया था। गांधीजी ने जिन्ना से बहुत अनुनय-विनय की कि वह पाकिस्तान को लेने की जिद्द छोड़ दे।

गांधीजी ने जिन्ना से यहाँ तक कहा कि- ‘यदि वह पाकिस्तान की मांग छोड़ देता है तो उसे आजाद भारत का प्रधानमंत्री बना दिया जाएगा’ किंतु जिन्ना टस से मस नहीं हुआ। इस भेंट के बाद जिन्ना ने एक परिपत्र जारी किया जिसमें कहा गया कि मिस्टर गांधी बंटवारे के सिद्धांत को नहीं मानते हैं। उनके लिये बंटवारा अनिवार्य नहीं है। जबकि मेरी दृष्टि में न सिर्फ बंटवारा अनिवार्य है अपितु हिन्दुस्तान की राजनीतिक समस्या का एकमात्र व्यावहारिक हल भी है।

7 मई 1947 की प्रार्थना सभा में गांधीजी ने अपना निर्णय जनता के समक्ष रखा-

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‘कल में जिन्ना साहब के पास गया था। हमारे बीच राजनीतिक विरोध बहुत ज्यादा है। वे पाकिस्तान मांगते हैं, मैं उसका विरोधी हूँ परन्तु कांग्रेस वालों ने लगभग निर्णय कर लिया है कि पाकिस्तान की मांग पूरी कर दी जाए। हाँ पंजाब और बंगाल के जिन इलाकों में हिन्दुओं का बहुमत है, वे पाकिस्तान को न मिलें। केवल वे ही प्रदेश पाकिस्तान में जाएंगे जहाँ मुसलमानों का बहुमत है। मैं तो इसके भी विरुद्ध हूँ। देश के टुकड़े करने की बात से मैं कांप उठता हूँ। परन्तु यह विचार रखने वाला इस समय मैं अकेला हूँ। मैं किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं करता। जिन्ना साहब को मैंने साफ कह दिया है कि मैं तो हिन्दू, मुसलमान, पारसी सिक्ख, जैन, ईसाई आदि सभी जातियों का सेवक हूँ, ट्रस्टी हूँ। इसलिए पाकिस्तान के निर्माण में मैं दिलचस्पी नहीं लूंगा। और उसकी स्वीकृति पर मैं हस्ताक्षर नहीं करूंगा। मैंने जिन्ना साहब को यह भी नम्रतापूर्वक बताया कि आप हिंसा के जोर से या ऐसे नामर्दी भरे रवैये से पाकिस्तान नहीं ले सकते। समझाकर शांति से सारा देश भले ही आपको सौंप दिया जाए, उससे मैं खुश हो जाउंगा। ऐसा होगा तो मैं सबसे पहली बधाई दूंगा।’

गांधीजी द्वारा पाकिस्तान निर्माण का पुनः विरोध

18 मई 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन भारत-विभाजन की योजना लेकर दिल्ली से लंदन गए। पूरा देश जानता था कि लॉर्ड माउंटबेटन भारत-विभाजन की अनुमति लेने के लिए लंदन गए हैं किंतु 30 मई 1947 को जिस दिन भारत-विभाजन योजना पर एटली और चर्चिल का अनुमोदन लेकर वायसराय लंदन से भारत लौटे, उसी शाम को प्रार्थना सभा में गांधीजी ने विभाजन का कठोर शब्दों में विरोध करते हुए कहा- ‘देश अगर धू-धू करके जलने लगता है, तो भी….. पाकिस्तान के नाम पर हम एक इंच भूमि नहीं देंगे।

गांधीजी भले ही पाकिस्तान न बनने देने की गंभीर घोषणाएं कर रहे थे किंतु भीतर ही भीतर हताश थे और वे अच्छी तरह समझ चुके थे कि इस विषय पर अब कांग्रेस में उनके विचारों का समर्थन करने वालों की संख्या घट गई है। यहाँ तक कि उनके पुराने साथी नेहरू और पटेल भी पाकिस्तान निर्माण के समर्थक हो गए हैं।

इससे दुःखी होकर एक दिन उन्होंने प्रार्थना सभा में सबके सामने कहा- ‘आज मैं स्वयं को अकेला पाता हूँ। सरदार पटेल और जवाहरलाल भी सोचते हैं कि मेरा स्थिति का आकलन गलत है तथा विभाजन पर सहमति से शांति अवश्य वापस होगी….।’

भारत को बीच में से चीरने की योजना

जब माउंटबेटन नयी योजना की स्वीकृति लेकर भारत आ गये तो अचानक जिन्ना ने मांग की कि उसे पूर्वी-पाकिस्तान और पश्चिमी-पाकिस्तान को मिलाने के लिये हिंदुस्तान से होकर एक हजार मील का रास्ता चाहिये। इस पर कांग्रेस फिर बिफर पड़ी किंतु माउण्टबेटन ने किसी तरह दोनों पक्षों में बीच-बचाव किया।

गुरुदत्त ने लिखा है- ‘जिन्ना उत्तरी और पश्चिमी-पाकिस्तान को मिलाने के लिए हिमालय के नीचे-नीचे एक सौ मील चौड़ी पट्टी चाहता था।’

दिल्ली में सीधी कार्यवाही दिवस का खतरा मई 1947 के दूसरे सप्ताह में कलकत्ता डेली में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें एक संवाददाता द्वारा लिखा गया कि- ‘ परिस्थिति का मेरा अध्ययन इस प्रकार है……. दिल्ली में वैसा ही डायरेक्ट एक्शन शीघ्र होने वाला है। जैसा अभी-अभी पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में किया गया है। ……..

हिन्दुस्तान की केन्द्रीय सरकार के संचार विभाग को अविलम्ब मुसलमानी बना दिया गया है। दिल्ली टेलिफोन विभाग के समस्त आवश्यक स्थानों पर यूरोपियन, हिन्दू और सिक्ख अधिकारियों को निकालकर मुसलमान नियुक्त कर दिए गए हैं। जिससे वैसा ही समय पड़ने पर जैसा पंजाब और पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में अभी-अभी पड़ा था, समस्त संचार साधन दिल्ली के भीतर और दिल्ली के हिन्दुस्तान के अन्य भागों के साथ काट लिए जाएं अथवा नियंत्रण में कर लिए जाएं।’

सरकार द्वारा समय पर किए गए प्रबंध से यह आशंका निर्मूल सिद्ध हुई, दिल्ली में डायरेक्ट एक्शन नहीं हो सका।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

स्वतंत्र बंगाल की मांग – सुहरावर्दी द्वारा अलग बंगाल बनाने की योजना

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सुहरावर्दी गांधी और मुजीबुर्रहमान

लॉर्ड माउंटबेटन योजना को बदलने के लिए एक और चाल चली गई। बंगाल का मुख्यमंत्री सुहरावर्दी जो बंगाल में सीधी कार्यवाही का खलनायक था, गांधीजी के पास एक प्रस्ताव लेकर आया। उसकी योजना यह थी कि कांग्रेस मान जाए कि पूर्ण बंगाल को एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया जाए।

अर्थात् स्वतंत्र भारत की तरह न केवल स्वतंत्र पाकिस्तान की स्थापना की जाए अपितु स्वतंत्र बंगाल की भी स्थापना की जाए। गांधीजी इसके लिए तैयार हो गए।

इस दौर की राजनीति में गांधीजी न केवल कांग्रेस के सर्वमान्य नेता थे अपितु सम्पूर्ण हिन्दू समाज के भी नेता थे किंतु वे अपने मुस्लिम प्रेम के कारण जिस प्रकार के ऊट पंटाग निर्णय ले रहे थे, उन्हें देखकर हैरानी होती है। संभवतः गांधीजी को लग रहा था कि जैसे ही स्वतंत्र बंगाल की मांग सामने आएगी, भारत से पाकिस्तान के अलग होने की संभावना पर विराम लग जाएगा किंतु राजनीति को किंचिंत् भी समझने वाला नौसीखिया भी बता सकता है कि गांधीजी द्वारा स्वतंत्र बंगाल की मांग को समर्थन दिया जाना किसी भी तरह व्यावहारिक नहीं था।

यदि स्वतंत्र बंगाल की स्थापना हो जाती तो स्वतंत्र पंजाब की मांग को भी नैतिक समर्थन प्राप्त हो जाता। ऐसी स्थिति में देशी राज्यों के राजा भी अपने-अपने राज्यों को स्वतंत्र देश घोषित कर देते। इस प्रकार भारत खण्ड-खण्ड होकर बिखर जाता।

ऐसा नहीं था कि केवल गांधीजी जी सुहरावर्दी की चाल में फंसे, बाबू शरत्चन्द्र बोस और दूसरे बंगाली कांग्रेसी भी इस चाल में फंस गए और स्वतंत्र बंगाल की योजना बनने लगी किंतु हिन्दू महासभा के नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस योजना के पीछे काम कर रहे षड़यंत्र का रहस्योद्घाटन कर दिया। डॉ. मुखर्जी का कहना था कि यह स्वतंत्र बंगाल की योजना पूरे बंगाल को पाकिस्तान में सम्मिलित करने का षड़्यंत्र है।

उन्होंने बताया कि- ‘पहले बंगाल को एक स्वतंत्र देश बनाया जाएगा और जब यह स्वतंत्र देश अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने में असफल होगा तो वहाँ के बहुसंख्यक मुसलमान इसे पूरा का पूरा पाकिस्तान के हाथों में दे देंगे।’

डॉ. मुखर्जी द्वारा मुस्लिम लीग के षड़यंत्र का रहस्योद्घाटन कर दिए जाने के बाद गांधीजी ने सुहरावर्दी के समक्ष शर्त रखी कि गांधीजी इस योजना को तभी आशीर्वाद देना स्वीकार करेंगे जब बंगाल विधान सभा के तीन चौथाई सदस्य बहुमत से इस योजना को पारित कर देंगे। इसके साथ ही गांधीजी यह शर्त भी लगाना चाहते थे कि भविष्य में कभी भी कोई भी निश्चय तब तक मान्य नहीं होगा, जब तक स्वतंत्र बंगाल की विधान सभा के तीन चौथाई हिन्दू सदस्य उस निर्णय के पक्ष में नहीं होंगे।

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मुस्लिम लीग ने कहा कि स्वतंत्र बंगाल की विधान सभा के निर्णय तीन चौथाई मत से स्वीकार हुआ करेंगे किंतु गांधीजी की मांग का आशय यह नहीं था, वे तो हिन्दुओं के तीन-चौथाई बहुमत की बात कर रहे थे। कांग्रेसी नेताओं को मुस्लिम लीग के इस षड़यंत्र का भी पता चल गया कि बंगाल की मुस्लिम लीग सुहरावर्दी की सहायता से बंगाल विधान सभा के अछूत जाति के सदस्यों को मुस्लिम लीग की योजना के पक्ष में करने में लगी है। इस प्रकार मुस्लिम लीग की यह चाल भी असफल हुई।

सुहरावर्दी की इस योजना के पीछे एक खतरनाक मनोविज्ञान काम कर रहा था। वास्तव में पाकिस्तान का असम्भव-सपना सम्भव बनाने में सुहरावर्दी का सबसे अधिक योगदान था। उसने ही बंगाल में ‘लड़ कर लेंगे पाकिस्तान’ का आह्वान किया था। उसने ही कलकत्ता में सीधी कार्यवाही दिवस की योजना बनाई थी और अत्यंत क्रूरता-पूर्वक कार्यान्वित की थी। जिन्ना तो केवल जुबानी-नेतागिरी कर रहा था, धरती पर उसका कार्यान्वयन तो सुहरावर्दी और उसके जैसे लोग कर रहे थे किंतु अब जब पाकिस्तान बनने का समय आ गया तो सुहरावर्दी को अपने पैरों के तले धरती खिसकती हुई अनुभव हुई थी।

मुहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली, चौधरी मुहम्मद अली तथा अब्दुल रब निश्तर जैसे नेता जो अब तक दिल्ली में राजनीति करते रहे थे, वे पाकिस्तान बनने के बाद पश्चिमी-पाकिस्तान के कराची अथवा किसी अन्य नगर में बैठकर राजनीति करने वाले थे ।

पूर्वी बंगाल और उसके नेताओं की स्थिति द्वितीय श्रेणी के नेताओं जैसी होने जा रही थी। इसलिए उसने गांधीजी को दी गई योजना के माध्यम से भावी पूर्वी-पाकिस्तान की, भावी पश्चिमी-पाकिस्तान से मुक्ति का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया था।

मोसले ने इस ओर संकेत करते हुए लिखा है- ‘सुहरावर्दी ने स्वतंत्र बंगाल की मांग कबूल करवाने की आखिरी कोशिश की क्योंकि उसे पता था कि पाकिस्तान में उसे वह जगह नहीं मिलने वाली थी, जो वह चाहता था। जिन्ना ने पूर्वी बंगाल के लिए नाजीमुद्दीन को चुन लिया था। सुहरावर्दी भारत में ही रहने की सोच रहा था।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी के खिलाफ

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सब भीतर ही भीतर गांधीजी के खिलाफ थे

जब भारत के विभाजन हेतु माउण्टबेटन योजना लंदन से स्वीकृत होकर आ गई तो कांग्रेस सहित भारत के विभिन्न पक्षों ने विभाजन की अनिवार्यता को अनुभव कर लिया किंतु गांधीजी अब भी इसके खिलाफ थे इस कारण कांग्रेस एवं अन्य दल गांधीजी के खिलाफ हो गए किंतु वे अपने भावों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त नहीं कर पा रहे थे। माउण्टबेटन ने इस घटना को अपने संस्मरणों में लिखा है।

2 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने कांग्रेस की ओर से नेहरू, सरदार पटेल तथा कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य कृपलानी को, मुस्लिम लीग की ओर से जिन्ना, लियाकत अली तथा रबनिस्तर को एवं साठ लाख सिक्खों का प्रतिनिधित्व करने वाले सरदार बलदेवसिंह को अपने निवास पर आमंत्रित किया और उन्हें माउण्टबेटन योजना की प्रतिलिपियां सौंप दीं।

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इन नेताओं ने लॉर्ड माउंटबेटन से योजना की प्रतियां ले लीं किंतु वे गांधीजी के भावी कदम से आशंकित थे। इस बैठक में लॉर्ड माउंटबेटन के साथ लॉर्ड इस्मे तथा सर एरिक मेलविल भी सम्मिलित हुए। 2 जून 1947 को माउंटबेटन के निवास पर नेताओं के व्यवहार पर लॉर्ड माउंटबेटन ने टिप्पणी करते हुए लिखा है- ‘मैं एक अजीब बात अनुभव कर रहा था। वे सब अंदर ही अंदर चुपके-चुपके गांधी के खिलाफ थे। जल्द ही वे मेरे साथ आ गये। उन्होंने मुझे उकसाना आंरभ किया ……. कहना चाहिये कि एक तरह से वे गांधी को स्वयं चुनौती न देकर मेरे माध्यम से देना चाहते थे। ‘

कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा सिक्ख नेताओं के चले जाने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने गांधीजी को बुलाया और उनसे इस योजना का विरोध न करने की अपील की। गांधीजी ने उस दिन मौनव्रत रख लिया, इसलिये उन्होंने एक कागज पर लिखकर वायसराय को सूचित किया कि मैं आज बोल नहीं सकता फिर कभी आपसे अवश्य चर्चा करना चाहूंगा। गांधीजी के इस रवैये से स्पष्ट है कि गांधीजी भारत विभाजन का ठीकरा अपने सिर पर फोड़े जाने से बचना चाहते थे।

जिन्ना की मक्कारी

2 जून 1947 को माउण्टबेटन ने अपने निवास पर पुनः जिन्ना से भेंट की तथा चाहा कि जिन्ना उन्हें लिखकर दे कि मुस्लिम लीग को विभाजन की योजना स्वीकार है। इस पर जिन्ना ने लिखकर देने से मना कर दिया तथा जवाब दिया कि- ‘इसका निर्णय मुस्लिम लीग की कार्यसमिति करेगी।’

स्टेनली वोलपर्ट ने इस वार्तालाप को इस प्रकार लिखा है-

माण्टबेटन ने जिन्ना से प्रश्न किया- ‘मुस्लिम लीग की कार्यसमिति इस योजना को स्वीकार करेगी या नहीं?’

जिन्ना ने जवाब दिया- ‘उम्मीद तो है।’

माउण्टबेटन ने पूछा- ‘क्या वह खुद इस योजना को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं?’

जिन्ना ने कहा- ‘वह निजी तौर पर माउण्टबेटन के साथ हैं और अपनी तरफ से पूरा प्रयास करेंगे कि अखिल भारतीय मुस्लिम लीग कौंसिल भी इसे स्वीकार कर ले।’

माउण्टबेटन ने जिन्ना को याद दिलाया- ‘आपके इस हथकण्डे से कांग्रेस पार्टी आपको हमेशा शक की निगाह से देखती रही है। आपका तरीका हमेशा यही रहा है कि आप पहले कांग्रेस द्वारा किसी भी योजना पर अंतिम निर्णय लिए जाने की प्रतीक्षा करते हैं, ताकि आपको मुस्लिम लीग के अनुकूल फैसला करने का अवसर मिल जाए। यदि आपका रवैया यही बना रहा तो सुबह की बैठक में कांग्रेस पार्टी के नेता और सिक्ख, योजना पर अपनी मुहर लगाने से इन्कार कर देंगे जिसका नतीजा अव्यवस्था में निकलेगा और आपके हाथ से आपका पाकिस्तान हमेशा के लिए निकल जाएगा।’

जिन्ना ने कहा- ‘जो होना है, वह तो होगा ही।’

माउण्टबेटन ने कहा- ‘मि. जिन्ना मैं आपको इस समझौते के लिए किए गए परिश्रम को व्यर्थ करने की अनुमति नहीं दे सकता। चूंकि आप मुस्लिम लीग की तरफ से स्वीकृति नहीं दे रहे हैं, इसलिए उसकी तरफ से मुझे स्वयं बोलना पड़ेगा। ….. मेरी केवल एक शर्त है कि सुबह की मीटिंग में जब मैं यह कहूं कि मि. जिन्ना ने मुझे यह आश्वासन दिया है, जिसे मैंने मान लिया है और जिससे मैं संतुष्ट हूँ तो आप किसी भी कीमत पर इसका खण्डन नहीं करेंगे और जब मैं आपकी तरफ देखूंगा तो आप सहमति में सिर हिलाएंगे……..।’  

वायसराय के इस प्रस्ताव का जवाब जिन्ना ने केवल सिर हिलाकर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भेड़ियों के सामने

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सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार खाँ पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहते थे, उन्होंने पाकिस्तान के लिए संघर्ष कर रही मुस्लिम लीग के नेताओं की तुलना भेड़ियों से करते हुए कहा कि कांग्रेस हमें भेड़ियों के सामने फैंक देना चाहती है।

3 जून 1947 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई जिसमें माउंटबेटन योजना स्वीकार कर ली गई। बैठक में इसे अस्थाई समाधान बताया गया तथा आशा व्यक्त की गई कि जब नफरत की आंधी थम जाएगी तो भारत की समस्याओं को सही दृष्टिकोण से देखा जाएगा और फिर द्विराष्ट्र का ये झूठा सिद्धांत हर किसी के द्वारा अस्वीकार कर दिया जाएगा।

आज जो भारत का स्वरूप है, इसे इस क्षेत्र के भूगोल यहाँ के पर्वतों और समुद्रों ने बनाया है ….. आर्थिक परिस्थितियों और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के चलते भारत की एकता और जरूरी हो जाती है। भारत का जो स्वरूप हमेशा से हमारी आंखों में बसा हुआ है वह हमारे दिलो-दिमाग में बरकरार रहेगा।

भेड़ियों के सामने

कांग्रेस कार्यसमिति के इस निर्णय से पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश के खानबंधु और खुदाई खिदमतगार, जो बराबर कांग्रेस का साथ दे रहे थे, बड़ी मुसीबत में पड़ गए। जब वर्किंग कमेटी की बैठक में गांधीजी ने भी माउंटबेटन की योजना का अर्थात् देश के बंटवारे की योजना का समर्थन किया तो सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार खाँ अवाक रह गए।

अब्दुल गफ्फार को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि खाँ आश्चर्य हुआ कि बंटवारा स्वीकार करने के पहले पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश के नेताओं से पूछा भी नहीं गया। उन्होंने देश के बंटवारे का विरोध करते हुए कहा कि- ‘अगर कांग्रेस अब खुदाई खिदमतगारों को भेड़ियों के सामने फेंक देती है तो सीमांत प्रदेश इसे दगाबाजी का काम समझेगा।’

रेडियो पर घोषणा

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3 जून 1947 को शाम सात बजे वायसराय तथा भारतीय नेताओं ने माउंटबेटन योजना को स्वीकार कर लिये जाने तथा अंग्रेजों द्वारा भारत को शीघ्र ही दो नये देशों के रूप में स्वतंत्रता दिये जाने की घोषणा की। वायसराय ने कहा कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच ऐसी किसी योजना पर समझौता हो पाना संभव नहीं हुआ है जिससे कि देश एक रह सके। इसलिये आजादी के साथ ही जनसंख्या के आधार पर देश का विभाजन हिंदुस्तान व पाकिस्तान के रूप में किया जायेगा।

वायसराय की घोषणा में पाकिस्तान के प्रांतीय और जिलेवार हिस्सों को गिनाया गया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर विधान सभा के भीतर जनमत संग्रह ‘साधारण बहुमत’ से विभाजन के पक्ष और विपक्ष में किस प्रकार किया जाएगा। देर से बचने के लिए विभिन्न प्रांतों के हिस्सों को स्वतंत्र रूप से यह कार्य करना होगा। मौजूदा संविधान सभा और नई संविधान सभा, संविधान रचना का काम करेगी। ये संस्थाएं अपने नियम स्वयं बनाने के लिए स्वतंत्र होंगी।

वायसराय माउण्टबेटन के संदेश के बाद जवाहरलाल नेहरू, सरदार बलदेवसिंह और मुहम्मद अली जिन्ना के संदेश प्रसारित किए गए। नेहरू ने अपने वक्तव्य के अंत में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया नारा उच्चारित किया- ‘जयहिन्द।’ जबकि जिन्ना ने अपना भाषण ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ कहकर समाप्त किया।

जवाहरलाल नेहरू ने वायसराय की घोषणा का स्वागत करते हुए देशवासियों से अपील की कि वे इस योजना को शांतिपूर्वक स्वीकार कर लें। नेहरू ने कहा- ‘हम भारत की स्वतंत्रता बल प्रयोग या दबाव से प्राप्त नहीं कर रहे हैं। यदि देश का विभाजन हो भी जाता है तो कुछ दिनों पश्चात् दोनों भाग पुनः एक हो जायेंगे और फिर अखण्ड भारत की नींव और मजबूत हो जायेगी।’

जिन्ना ने अपने भाषण में कहा- ‘यह हम लोगों के लिये सोचने की बात है कि जो योजना बर्तानिया सरकार सामने रख रही है, उसे हम लोग समझौता- आखिरी सौदे के रूप में स्वीकार कर लें।’

सिक्खों के नेता बलदेवसिंह ने कहा- ‘यह समझौता नहीं था, आखिरी सौदा था। इससे हर किसी को खुशी नहीं होती। सिक्खों को तो होती ही नहीं। फिर भी यह गुजारे लायक है हमें इसे मान लेना चाहिये।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी से भय

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जब माउण्टबेटन योजना लंदन से लेकर भारत में समस्त पक्षों द्वारा स्वीकार कर ली गई तब अचानक ही समस्त पक्षों में गांधीजी से भय व्याप्त हो गया क्योंकि गांधीजी ने अब तक एक बार भी भारत विभाजन को स्वीकार नहीं किया था।

गांधीजी के दो बड़े चेले नेहरू एवं पटेल गांधीजी से भय के कारण मन ही मन कांप रहे थे, वे दोनों ही गांधीजी को विभाजन के लिए तैयार नहीं कर पाए थे। नेहरू एवं पटेल ही नहीं, पूरी कांग्रेस गांधीजी से भय खा रही थी!

जिस वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन से हर कोई डरा हुआ था कि न जाने यह शक्तिशाली अंग्रेज भारत के भाग्य का क्या निर्णय करे, उस माउंटबेटन को भी गांधीजी से भय लग रहा था। 4 जून 1947 को माउंटबेटन को सूचना मिली कि आज शाम की प्रार्थना सभा में गांधीजी देशवासियों से अपील करेंगे कि वे विभाजन की योजना को अस्वीकार कर दें।

इस पर माउंटबेटन ने गांधीजी को वायराय भवन में बुलाया और उनसे कहा कि- ‘विभाजन की पूरी योजना आपके निर्देशानुसार बनायी गयी है। अतः आप इस योजना का विरोध न करें।’

गांधीजी ने वायसराय की किसी बात का जवाब नहीं दिया किंतु इस बार यह नहीं कहा कि उनका मौन व्रत है। गांधीजी ऐसा कह भी नहीं सकते थे क्योंकि उन्हें शाम को प्रार्थना सभा में अपने भक्तों को सम्बोधित करना था। गांधीजी राजनीति के चतुर खिलाड़ी थे, उन्होंने वायसराय की आंख में कुछ ऐसा पढ़ लिया था जो पहले कभी नहीं पढ़ा गया था। गांधीजी ने मन ही मन कुछ निर्णय लिया और वे वायसराय भवन से बाहर आ गए।

जब गांधीजी बिना कुछ कहे, बिना कोई प्रतिवाद किए, बिना कोई आश्वासन दिए वायसराय के पास से उठकर चले गए तो वायसराय को हैरानी हुई। उसे गांधीजी से भय अब भी लग रहा था किंतु जिस प्रकार गांधीजी ने कोई निर्णय ले लिया था, उसी प्रकार वायसराय ने भी गांधीजी के सम्बन्ध में कुछ निर्णय ले लिया था।

उस शाम गांधीजी ने प्रार्थना सभा में इतना ही कहा कि- ‘वायसराय को दोष देकर ही क्या हो जायेगा? जो हो रहा है और जो होने जा रहा है, उसका जवाब तो स्वयं हमारे दिलों में छिपा है। किसी को कुछ कहने से पहले क्यों न हम अपने दिलों में झांक कर देख लें?’

हंसराज रहबर ने गांधी के इस वक्तव्य पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- ‘गांधी ने कहा था कि पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा और जब बन गया तो निर्णय सुनाने का यह धूर्तता भरा ढंग अपनाया।’

विभाजित भारत की विदेश नीति एक रहे

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5 जून 1947 को माउण्टबेटन ने पुनः विभिन्न दलों के नेताओं से भेंट करके विभाजन की योजना को कार्यान्वित करने पर विचार-विमर्श किया। इस बैठक में जिन्ना ने अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुए कहा कि भविष्य में बनने वाले दोनों राज्यों को हर तरह से स्वाधीन और समान स्तर पर रहना चाहिए। नेहरू का कहना था कि इस मामले में हमें अलग दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। भारत का प्रशासन पहले की ही तरह चलाया जा रहा है। यदि कुछ असंतुष्ट प्रांतों को अलग होने की अनुमति दी जाती है तो उस स्थिति में भी भारत सरकार का काम या उसकी विदेश नीति का कार्यान्वयन बाधित नहीं होना चाहिए। इस बैठक में काफी तनाव था।

स्वतंत्रता की तिथि की घोषणा जब भारत के हिन्दुओं की पार्टी कांग्रेस, मुसलमानों की पार्टी मुस्लिम लीग और सिक्खों के नेता बलदेव सिंह ने भारत विभाजन की योजना स्वीकार कर ली तो माउण्टबेटन ने पत्रकार सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन में उन्होंने भारत को निकट भविष्य में दो उपनिवेशों के रूप में स्वतंत्र किए जाने की घोषणा की।

जब एक पत्रकार ने माउंटबेटन से स्वतंत्रता की तिथि के बारे में प्रश्न किया तो माउंटबेटन ने 15 अगस्त 1947 की तिथि घोषित कर दी। यह द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के समर्पण की तिथि थी।

अब किसी को गांधीजी से भय नहीं था। यहाँ तक का सफलर बहुंत शांत ढंग से निबट गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खाकसारों का हमला

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बाएं से दाएं- जिन्ना की बहिन फातिमा जिन्ना, मुहम्मद अली जिन्ना, पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली तथा उसकी पत्नी राना लियाकत

खाकसारों का हमला – मुहम्मद अली जिन्ना की हत्या का प्रयास

जिस समय मुहम्मद अली जिन्ना कलकत्ता में आयोजित एक बैठक में मुस्लिम लीग के सदस्यों को यह बता रहा था कि भारत का विभाजन किस प्रकार होना संभावित है तथा उसे किस प्रकार कार्यान्वित किया जाना संभावित है, उसी समय जिन्ना की बैठक पर खाकसारों का हमला हुआ।

माउंटबेटन योजना पर विचार करने के लिए 9-10 जून 1947 को दिल्ली के इम्पीरियल होटल में ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग की बैठक बुलाई गई। इसमें पूरे देश से चार सौ प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। लीग ने बहुत बड़े बहुमत से इस योजना को स्वीकार कर लिया। बैठक में 400 सदस्य उपस्थित थे जिनमें से केवल 10 सदस्यों ने विरोध किया तथा 390 सदस्यों ने भारत-विभाजन के प्रस्ताव का समर्थन किया।

इस बैठक में कायद-ए-आजम मुहम्मद अली जिन्ना को योजना के बुनियादी उसूलों को समझौते के रूप में स्वीकार करने का पूरा अधिकार दिया गया और योजना के बुनियादी उसूलों को मानते हुए वाजिब और न्यायसंगत ढंग से उसका पूरा ब्यौरा तैयार करने की जिम्मेदारी पूरी तरह उसी पर छोड़ दी।

जब जिन्ना होटल में बैठक कर रहा था, तभी कुछ लोगों ने विभाजन का विरोध किया। विभिन्न प्रांतों से आए हुए उग्रवादी मुसलमानों, कट्टरपंथी मुल्लाओं और पंजाब के विभाजन से होने वाले नुकसान से परेशान ताकतवर भूस्वामियों का इरादा कुछ और ही था। ये लोग मीटिंग हॉल के बाहर जमा हो गए और विभाजन योजना के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार करने लगे।

विरोध करने वाले लोग खाकसार नामक संगठन के सदस्य थे। इनके संगठन का नाम भी खाकसार था और इसके सदस्यों को भी खाकसार कहा जाता था।

खाकसार, मुसलमानों का एक उग्रवादी संगठन था। इसका संस्थापक इनायतुल्लाह खान उर्फ़ अल्लामा मशरिकी था। उसने 1930 के दशक में अविभाजित पंजाब के लाहौर नगर में खाकसार आंदोलन खड़ा किया। इस आतंकी संगठन का उद्देश्य भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के शासन से मुक्त करवाना था। इस संगठन में 50 लाख मुसलमान शामिल थे। खाकसार इस बात से नाराज थे कि जिन्ना पाकिस्तान के रूप में एक ऐसा मुल्क स्वीकार कर रहा है जिसमें पंजाब और बंगाल खण्डित रूप से शामिल होंगे।

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खाकसारों में वे बड़े-बड़े व्यापारी भी शामिल थे जो कलकत्ता को अपने हिन्दू प्रतिद्वंद्वियों के हाथ में छोड़ने के विचार से भी भड़क उठते थे। इन लोगों ने ‘हमारे साथ धोखा हुआ है’ और ‘पाकिस्तान के साथ बड़ा बुरा हुआ’ कहना शुरू कर दिया। खाकसारों का हजूम तो होटल के शांत बगीचे को रौंद कर बेलचे लहराता ….. ‘जिन्ना को मारो’ चिल्लाता हुआ होटल के लाउंज में घुस गया। बैठक के हॉल की तरफ जाने वाली सीढ़ियों के आधे रास्ते पर ही लीग के नेशनल गार्ड्स ने उन्हें रोक लिया और उन्हें बलपूर्वक पीछे धकेला। कुछ लोग मीटिंग हॉल में भी घुसने में सफल रहे थे किंतु उन्हें तुरंत निकाल दिया गया।

जिन्ना इनसे बेपरवाह रहकर मीटिंग करता रहा। होटल की सबसे ऊँची मंजिल पर भी जिन्ना के नेशनल गार्ड्स और खाकसारों के बीच हाथापाई होती रही। फर्नीचर तोड़ दिया गया, खिड़कियों के कांच टूटे …… कुछ लोगों को घाव भी आए। पुलिस को आंसू गैस चलानी पड़ी, तब कहीं जाकर हंगामा शांत हुआ। खाकसारों का हमला विफल कर दिया गया।

अगले दिन के समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ- ‘जिन्ना की हत्या करने के लिए झपटने वाले खाकसारों का हमला विफल कर दिया गया तथा लगभग 50 खाकसारों को गिरफ्तार कर लिया गया।’

रहमत अली द्वारा जिन्ना पर गद्दारी का आरोप

जब मुस्लिम लीग ने भारत विभाजन की योजना स्वीकार कर ली जिसमें पाकिस्तान को आधे बंगाल, आधे पंजाब एवं सिलहट जिले को छोड़कर शेष सम्पूर्ण असम से वंचित रखा गया तो कैम्ब्रिज स्थित रहमत अली के पाकिस्तान नेशनल मूवमेंट ने जिन्ना पर कौम से गद्दारी करने का आरोप लगाया-

‘मि. जिन्ना ने पूरी मिल्लत के साथ पूरी तरह से गद्दारी करके उसका सौदा कर लिया है और उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं। ब्रिटिश योजना स्वीकार करने की उसकी कार्यवाही से मिल्लत के सभी देशों और राष्ट्रों की बुनियाद छिन्न-भिन्न हो गई है।

दीनिया (इण्डिया) के महाद्वीप में रहने वाले उसके सभी दस करोड़ सदस्यों के मुस्तकबिल के साथ भितरघात किया गया है। …… यदि यह फैसला रद्द नहीं हुआ तो इससे पाकिस्तानी राष्ट्र का जीवन हमेशा के लिए विकलांग हो जाएगा, दीनिया में मिल्लत का वजूद मुरझा जाएगा और सारी दुनिया में बिरादरान-ए-इस्लाम की आजादी जोखिम में पड़ जाएगी। ….. हम यह जद्दोजहद अंत तक चलाएंगे।

….. न हम मैदान छोड़ेंगे और न हथियार डालेंगे। ….. हमारे ऊपर यह इल्जाम कभी नहीं लगाया जा सकेगा कि जब मिल्लत के लिए सबसे बड़ी जंग लड़ने और सबसे बड़ी गद्दारी के बीच चुनने की नौबत आई तो ….. हमने भी क्विजलिंगों के नक्शेकदम पर चलते हुए गद्दारी को चुना। …… मिल्लत जिंदाबाद। ‘

लियाकत अली और जवाहर लाल नेहरू में झगड़ा

वायसराय द्वारा विभाजन की घोषणा किए जाने के बाद 12 जून को अंतरिम सरकार के मंत्रिमण्डल की पहली बैठक हुई। इस बैठक में भारत की तरफ से इंग्लैण्ड में राजदूत नियुक्त किए जाने के निर्णय पर लियाकत अली ने जवाहरलाल नेहरू की खूब आलोचना की क्योंकि नेहरू ने अपनी बहन विजयलक्ष्मी पण्डित को इस पर नियुक्त किया था। जवाहरलाल ने भी लियाकत अली का विरोध किया।

मंत्रिमण्डल की बैठक में दोनों के बीच इतनी तीखी तकारार हुई कि माउंटबेटन ने चिल्लाकर कहा- ‘महानुभावो! यदि इस पहली चर्चा का नतीजा ही इस कदर भद्दे दृश्य में निकल रहा है तो शांतिपूर्ण विभाजन की आशा भला हम कैसे कर सकते हैं?’

इसके बाद जवाहरलाल नेहरू और जिन्ना के बीच बोल-चाल बंद हो गई और यह तब तक बंद रही जब तक कि दोनों नेता दो अलग- अलग देशों के प्रधानमंत्री नहीं बन गए।

एक ओर तो मुस्लिम लीग कांग्रेस से संघर्ष में उलझी हुई थी और दूसरी ओर खाकसारों का हमला कभी भी हो सकता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत विभाजन को स्वीकृति

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मुस्लिम लीग अपनी कार्यकारिणी में माउण्टबेटन प्लान के अनुसार भारत विभाजन को स्वीकृति दे चुकी थी। कांग्रेस को भी अपनी कार्यकारिणी में भारत विभाजन को स्वीकृति देनी थी। सिंध के हिन्दुओं ने कांग्रेस कार्यकारिणी में भारत विभाजन का पुरजोर विरोध किया इस कारण ऐसा लगने लगा कि कांग्रेस कार्यकारिणी में भारत विभाजन को स्वीकृति नहीं दी जा सकेगी।

कांग्रेस अधिवेशन में भारत विभाजन को स्वीकृति

14 जून 1947 को कांग्रेस महासमिति (एआईसीसी) की बैठक में गोविंदवल्लभ पंत ने देश के विभाजन की माउंटबेटन योजना को स्वीकार करने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। कांग्रेस कार्यसमिति में यह प्रस्ताव पहले ही पारित किया जा चुका था। यह प्रस्ताव इस प्रकार था-

‘यह देश की स्वतंत्रता प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है। इससे सुनिश्चित हो जाएगा कि भारतीय संघ का एक शक्तिशाली केन्द्र होगा…… कांग्रेस ने एकता के लिए बड़ा प्रयास किया है और प्रत्येक वस्तु बलिदान कर दी है किंतु एक सीमा है जिसके आगे हम भी नहीं जा सकते। आज हमारे सामने दो ही रास्ते हैं, या तो हम 3 जून के वक्तव्य को स्वीकार कर लें या आत्महत्या कर लें।’

मौलाना आजाद ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि- ‘कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने सही फैसला नहीं लिया है लेकिन कांग्रेस के सामने कोई विकल्प नहीं।……. बंटवारे को स्वीकार करना कांग्रेस की राजनीतिक विफलता है…. राजनीतिक दृष्टि से हम विफल हुए हैं और इसलिए देश का बंटवारा कर रहे हैं। हमें अपनी हार स्वीकार करनी चाहिए…..।’

पटेल और नेहरू ने विभाजन के प्रस्ताव का समर्थन किया किंतु एआईसीसी में इस प्रस्ताव का विरोध इतना अधिक था कि इसका पारित होना कठिन था। इस प्रस्ताव का विरोध करने वाले नेताओं में सिंध कांग्रेस के नेता चौथराम गिडवानी, पख्तून नेता डॉ. अब्दुल गफ्फार खान, पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. किचलू, पुरुषोत्तम दास टण्डन, मौलाना हफीजुर्रहमान आदि प्रमुख थे। जब कांग्रेसी नेता भाषण दे रहे थे तो एआईसीसी के कुछ सदस्य ‘प्राप्तं-प्राप्तं उपासीत’ (जो मिल रहा है, ले लो) के नारे लगा रहे थे।

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एन. वी. गाडगिल ने लिखा है- ‘चौथराम गिडवानी का भाषण सर्वाधिक हृदय विदीर्ण करने वाला था। जब वे बोल रहे थे तो हम में से बहुत से, निर्लज्जों की भांति रो रहे थे। उन्होंने चित्र खींचकर वर्णन किया कि कांग्रेस ने कैसे सिन्धी हिन्दुओं की भयानक अवहेलना की है और कैसे उन्हें सामयिक राजनीतिक सुविधा की वेदी पर बलि किया गया है? उन्होंने इस विचार का खण्डन किया कि जो कुछ हुआ है, वह होना ही था, बदला नहीं जा सकता था। इसको स्वीकार करना मानवता से गद्दारी करना है। यह पूरा भाषण बहुत ही भावुकता से भरा पड़ा था। इस पर भी इसमें बुद्धिमत्ता और विचारशीलता की कमी नहीं थी। उन्होंने कहा था कि अन्याय के सामने झुक जाना बुद्धिमत्ता के लक्षण नहीं हैं।’

जिस समय डॉ. चौथराम भाषण कर रहे थे, नेहरू और पटेल को अपने पांव तले से मिट्टी खिसकती हुई दिखाई देने लगी। उस समय गांधीजी अपना साप्ताहिक व्रत रखे हुए हरिजन कॉलोनी में बैठे थे। कांग्रेसी नेताओं को यह समझ में आने लगा था कि यदि डॉ. चौथमल के व्याख्यान के बाद मतगणना की गई तो माउण्टबेटन की योजना को अस्वीकार कर दिया जाएगा।

अतः उन्होंने एक विशेष दूत गांधीजी के पास भेजा कि वे कांग्रेस कमेटी में आकर अपने प्रिय जवाहरलाल की रक्षा करें। गांधीजी अपना व्रत समय से पहले तोड़कर भागे-भागे ‘कांस्टीट्शनल क्लब’ पहुंचे और डॉक्टर साहब के भाषण के उपरांत अपने नेताओं के मान की रक्षा का वास्ता डालकर प्रस्ताव पारित करने के लिए आग्रह करने लगे।

अबुल कलाम आजाद ने इस प्रस्ताव के संस्मरणों के साथ लिखा है-

‘इस बड़े दुखांत नाटक के दौरान कुछ हास्यास्पद बातें भी देखी गईं। कांग्रेस में कुछ ऐसे लोग जो राष्ट्रवादी होने का दिखावा करते रहे हैं लेकिन उनका दृष्टिकोण वास्तव में सोलह आने साम्प्रदायिक रहा है। वे हमेशा तर्क देते रहे हैं कि हिन्दुस्तान की कोई ऐक्यबद्ध संस्कृति नहीं है। उनकी सदैव राय रही है कि कांग्रेस जो कुछ कहे, हिंदुओं और मुसलमानों के सामाजिक जीवन एकदम भिन्न हैं। यह देखकर आश्चर्य हुआ कि ऐसे दृष्टिकोण वाले सदस्य एकाएक भारत की एकता के सबसे बड़े समर्थक बनकर मंच पर प्रकट हुए।’

गांधीजी, नेहरू और पटेल के जबर्दस्त समर्थन के उपरांत भी कांग्रेस वर्किंग कमेटी का यह प्रस्ताव एआईसीसी में सर्वसम्मति से पारित नहीं हो सका। बैठक में 218 सदस्य उपस्थित थे। इनमें से कांग्रेस वर्किंग कमेटी के प्रस्ताव के पक्ष में 157 वोट तथा विपक्ष में 29 वोट पड़े और 32 सदस्य तटस्थ रहे।

कांग्रेस द्वारा भारत विभाजन का प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश के खुदाई खिदमतगारों ने अब्दुल गफ्फार खां के नेतृत्व में मांग की कि प्रांतों के पास सिर्फ भारतीय संघ या पाकिस्तान में सम्मिलित होने का विकल्प नहीं होना चाहिए अपितु हमें अलग पठानिस्तान या पख्तूनिस्तान की स्थापना के निर्णय का भी अधिकार होना चाहिए और इसके लिए पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश में जनमत कराया जाना चाहिए।

माउंटबेटन ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया लेकिन जब पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत की जनता ने जबर्दस्त आंदोलन का मार्ग अपनाया तो वहाँ भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित होने के लिए जनमत संग्रहण करवाया गया। मतदान के समय मुस्लिम लीग के गुण्डों ने जमकर उत्पात मचाया तथा असली वोटरों को वोट करने से रोककर जाली वोटिंग करवाई जिसके कारण खुदाई खिदमतगार की हार हो गई तथा पाकिस्तान में शामिल होने के प्रस्ताव को एक तरफा वोट प्राप्त हो गए।

इस प्रकार पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत को पाकिस्तान में सम्मिलित होने के लिए विवश किया गया। सीमांत प्रदेश में उस समय मतदाताओं की संख्या 5,73,000 थी। इनमें से सिर्फ 2,93,000 लोग ही मतदान कर पाए। इनमें से केवल 3000 वोट भारतीय संघ में शामिल होने के पक्ष में पड़े। पूर्वी-बंगाल, पश्चिमी पंजाब, सिंध तथा बलूचिस्तान को पाकिस्तान में शामिल करने का फैसला लिया गया।

पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत की तरह असम के सिलहट जिले में मुसलमानों की संख्या अधिक थी इसलिए वहाँ भी जनमत संग्रह करवाया गया। सिलहट की जनता ने पाकिस्तान में जाने का निर्णय लिया।

प्रांतीय विधान सभाओं ने पाकिस्तान प्रस्ताव पारित किए

20 जून 1947 को बंगाल विधान सभा ने अपने प्रांत के विभाजन का प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित कर दिया। तीन दिन बाद पंजाब विधान सभा के सदस्यों ने अपने प्रांत के दो टुकड़े करने का प्रस्ताव पारित किया। सिंध की विधान सभा में पाकिस्तान में जाने या न जाने के प्रस्ताव पर मतदान हुआ।

इसमें 33 मत पाकिस्तान में जाने के पक्ष में तथा 20 मत भारत में रहने के पक्ष में पड़े। इस प्रकर सिंध प्रांत में रहने वाले लाखों हिन्दुओं के हाहाकर, चीत्कार और करुण क्रंदन को अनसुना करके समूचे सिंध को पाकिस्तान में धकेलने का निर्णय हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947

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4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में भारतीय स्वाधीनता विधेयक प्रस्तुत किया गया। 15 जुलाई को वह बिना किसी संशोधन के हाउस ऑफ कॉमन्स द्वारा और 16 जुलाई को हाउस ऑफ लॉर्ड्स द्वारा पारित कर दिया गया। 18 जुलाई 1947 को उस पर ब्रिटिश सम्राट के हस्ताक्षर हो गए। इस प्रकार भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 अस्तित्व में आया।

भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की कुल 20 धाराएं थीं, जिनका सारांश इस प्रकार है-

(1) ब्रिटिश सरकार द्वारा सत्ता हस्तांतरित करने से 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वाधीन सम्प्रभु अधिराज्य (डोमिनियन) अस्तित्व में आएंगे।

(2) पाकिस्तान में सिंध, बलूचिस्तान, उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रान्त, असम का सिलहट जिला, पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल होंगे। शेष प्रांत भारतीय अधिराज्य में रहेंगे। सत्ता हस्तांतरण की तिथि को देशी राज्यों से परमोच्चता विलोपित हो जायेगी तथा देशी राज्यों एवं ब्रिटिश ताज के मध्य समस्त संधियां एवं व्यवस्थाएं समाप्त हो जायेंगी। देशी रियासतें अपना निर्णय स्वयं लेंगी कि वे भारत में सम्मिलित हों या पाकिस्तान में, या फिर दोनों से अलग रहें अथवा किसी या किन्ही अलग समूह या समूहों का निर्माण करें।

(3) पाकिस्तान और भारत दोनों को अपना संविधान लागू करने की स्वतंत्रता होगी। ब्रिटिश राष्ट्र-मण्डल की सदस्यता दोनों देशों के लिए स्वैच्छिक होगी। 15 अगस्त के बाद दोनों अधिराज्यों में ब्रिटिश संसद का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाएगा।

(4) दोनों अधिराज्य अपना पृथक् अथवा संयुक्त गवर्नर जनरल रख सकेंगे।

(5) 15 अगस्त से ब्रिटिश सरकार का भारत सचिव पद सेवामुक्त हो जाएगा। सेना का आवंटन दोनों अधिराज्यों में होगा, हिज मेजस्टी की सेना विसर्जित हो जाएगी।

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भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में भारत एवं पाकिस्तान को ‘सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन अधिराज्य’ (कम्पलीट सोवरीन डोमिनियन स्टेट) का दर्जा दिया गया किंतु डोमिनियन का वास्तविक अर्थ- ‘ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल के अधीन स्वायत्तशासी देश’ (सेल्फ गवर्निंग मेम्बर नेशन ऑफ द कॉमनवैल्थ) होता है। सम्पूर्ण-प्रभुत्व सम्पन्न राष्ट्र को ‘अधिराज्य‘ (डोमिनियन) नहीं कहा जाता। ब्रिटिश क्राउन चाहता था कि आजाद भारत को डोमिनियन स्टेटस दिया जाए किंतु भारतीय नेता चाहते थे कि भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न राज्य के रूप में स्वतंत्रता दी जाए। इसलिए इस अधिनियम में दोनों शब्दों के एक साथ प्रयोग किया गया था।

लॉर्ड माउंटबेटन को इस उद्देश्य के साथ भारत भेजा गया था कि वे 20 जून 1948 तक भारत को स्वतंत्र करके अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को भारत से निकालकर इंग्लैण्ड ले आएंगे किंतु माउण्टबेटन ने जिस तेज गति से काम किया था उसके कारण यह तिथि खिसककर और नजदीक आ गई थी और अब भारत की आजादी एवं विभाजन में एक माह से भी कम समय रह गया था।

इस कारण देश में अफरा-तफरी, मार-काट और पलायन का सिलसिला तेज हो गया। हालांकि लोगों को यह ठीक से पता नहीं था कि भारत की सीमाएं कहाँ समाप्त होंगी और पाकिस्तान कहाँ से आरम्भ होगा!

एन. वी. गाडगिल ने अपनी पुस्तक ‘गवर्नमेंट फ्रॉम इनसाइड’ में लिखा है-

‘देश में मुख्य राजनीतिक शक्ति ‘इण्डियन नेशनल कांग्रेस’ थी और इसके नेता गण थके हुए लोग थे। उनको पिछले चालीस वर्ष के निरन्तर संघर्ष से होने वाले लाभ पर विश्वास नहीं था। उनको भविष्य के विषय में भी भरोसा नहीं था। वे इस बात से डरते थे कि यदि कुछ अधिक खींचा-तानी की गई तो सब-कुछ टूट-फूट कर विनष्ट हो जाएगा। परिणाम यह था कि पुराने बहादुर संघर्ष करने वाले भी समझौता करने पर तैयार थे और प्राप्त को खतरे में डालने की इच्छा नहीं रखते थे।

इस कारण भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में जो भी प्रावधान किए गए, उन्हें भारतीय नेताओं ने चुपचाप स्वीकार कर लिया। बात-बात पर हल्ला मचाने वाले नेता इस समय दम साधे पड़े थे। वे जानते थे कि इस समय सत्ता का हस्तांतरण ही नहीं होने वाला है, अपितु सत्ता की मलाई भी बंटने वाली है। जिसके जितना हाथ आ सके, शांति के साथ ले लो।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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