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विभाजन कौंसिल का गठन

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विभाजन का काम दक्षता से निबटाने के लिये वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन की अध्यक्षता में एक विभाजन कौंसिल का गठन किया गया जिसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में एच. एम. पटेल तथा पाकिस्तान के प्रतिनिधि के रूप में चौधरी मोहम्मद अली को रखा गया। उनकी सहायता के लिये बीस समितियां और उपसमितियां गठित की गयीं जिनमें लगभग सौ उच्च अधिकारियों की सेवाएं ली गयीं। इन समितियों का काम विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव तैयार करके अनुमोदन के लिये विभाजन कौंसिल के पास भेजना था।

लैरी कांलिन्स तथा दॉमिनिक लैपियर ने इस विभाजन प्रक्रिया का बड़ा रोचक वर्णन किया है-

’15 अगस्त के आने में अब ठीक 73 दिन बाकी बच रहे थे। तलाक के कागजात इस बीच हर सूरत में तैयार हो जाने चाहिए। कर्मचारियों को लगातार सावधान और चुस्त रखने के लिए माउण्टबेटन ने एक विशिष्ट कलैण्डर छपवाकर दिल्ली के प्रत्येक सम्बन्धित कार्यालय में लगवा दिया। उस कैलेण्डर का एक पन्ना रोज फाड़ा जाता।

प्रत्येक पन्ने के बीचों-बीच लाल घेरे के अंदर वह आंकड़ा छपा दिखाई देता जो यह बताता कि 15 अगस्त के आने में अब कुल कितने दिन शेष रह गए हैं। मानो किसी अणु-विस्फोट की उलटी गिनती शुरू हो गई हो, इस प्रकार रोज एक-एक दिन गिना जा रहा था- और रोज एक-एक दिन कम हो रहा था।’

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उस अलौकिक भारतीय तलाक में, मालमत्ता के कागजात तैयार करने का भारी भरकम काम, आखिर जिन दो व्यक्तियों के कंधों पर आकर पड़ा, वे दोनों समान रुतबे के वकील थे। …… उनमें से एक मुसलमान था और दूसरा हिन्दू …… चौधरी मोहम्मद अली और एच. एम. पटेल क्रमशः मुसलमानों और हिन्दुओं के हितों की रक्षा करते हुए रोज फाइल पर फाइल निबटा रहे थे। लगभग एक सौ कर्मचारी जिन्हें बीसेक समितियों और उप समितियों में विभाजित किया गया था, रोज उन वकीलों को तरह-तरह की रिपोर्ट देते थे। उस आधार पर दोनों वकील जो अनुशंसा पत्र तैयार करते, उन्हें विभाजन कौंसिल के पास अंतिम अनुमोदन के लिए भेज दिया जाता। स्वयं वायसराय इस विभाजन कौंसिल के अध्यक्ष थे।

…… दोनों पार्टियों के बीच उग्रतम बहसें धन को लेकर हुईं। सबसे नाजुक प्रश्न उस उधारी का था, जिसे अंग्रेजों से वसूल करना आसान नहीं लग रहा था, क्योंकि उनका खजाना खाली था। …… जब अंग्रेज भारत को छोड़ रहे थे, तब भारत के 500 अरब डॉलर उनकी तरफ निकलते थे। कर्ज का यह जबर्दस्त बोझ इंग्लैण्ड पर विश्व-युद्ध के दौरान चढ़ गया था।

राष्ट्रीय उधारी के अलावा धन और भी कई रूपों में फंसा हुआ था। स्टेट बैंकों की नकदी। बैंक ऑफ इण्डिया के वाल्टों में रखी सोने की ईंटें। चुटकियों में सिर काट लेते नागाओं के बीच, झौंपड़ी में बस कर अपनी ड्यूटी निभा रहे जिला कमिश्नरों के पास रखी छोटी-छोटी रकमें देश भर में फैले डाक-घरों की स्टेशनरी इत्यादि का मूल्य।

…… कौंसिल द्वारा बैंकों, सरकारी विभागों तथा पोस्ट ऑफिस में रखे हुए रुपयों, सामान और यहाँ तक कि फर्नीचर के बंटवारे हेतु निर्णय लिये गये। बंटवारे में तय किया गया कि पाकिस्तान को बैंकों में रखी नकदी का और स्टर्लिंग शेष का 17.5 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होगा।

यह भी तय किया गया कि पाकिस्तान को भारत के राष्ट्रीय कर्ज का 17.5 प्रतिशत हिस्सा चुकाना पड़ेगा। यह भी तय किया गया कि देश के विशाल सरकारी तंत्र में जो कुछ भी स्थानानंतरण द्वारा हटाया जा सकता है, उसका 80 प्रतिशत भारत को एवं 20 प्रतिशत पाकिस्तान को दिया जाये।

…….. देश में कुल 18 हजार 77 मील लम्बी सड़कें तथा 26 हजार 421 मील रेल की पटरियां थीं। इनमें से 4 हजार 913 मील सड़कें तथा 7 हजार 112 मील रेल पटरियां पाकिस्तान के हिस्से में गईं। वायसराय की सफेद सुनहरी ट्रेन भारत के हिस्से में आयी, उसके बदले में भारतीय सेना के कमाण्डर इन चीफ तथा पंजाब के गर्वनर की सभी कारें पाकिस्तान को दे दी गयीं।

वायसराय के पास सोने के पतरों वाली छः तथा चांदी के पतरों वाली छः बग्घियां थीं। इनमें से सोने के पतरों वाली बग्घियां भारत के हिस्से में आयीं तथा चांदी के पतरों वाली बग्घियां पाकिस्तान के हिस्से में गयीं।

मोसले ने लिखा है- चार जजों के दो अलग-अलग बोर्ड पंजाब और बंगाल के लिए बनाए गए। हर बोर्ड में दो जज भारत की ओर से और दो पाकिस्तान की ओर से रखे गए। दो जजों को छोड़कर शेष सभी जज हिन्दुस्तान की हाईकोर्ट के जज थे।

सर सिरिल की देखरेख में सी. सी. बिस्वास और बी. के. मुखर्जी (कांग्रेस की ओर से) तथा सालेह मोहम्मद अकरम और एम. ए. रहमान (मुस्लिम लीग की ओर से) बंगाल का बंटवारा करेंगे। मेहरचंद महाजन और तेजसिंह (कांग्रेस की ओर से) और दीन मोहम्मद तथा मोहम्मद मुनीर (मुस्लिम लीग की ओर से) पंजाब का बंटवारा करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय सेना का विभाजन

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भारतीय सेना का विभाजन – भावी देशों के लिए वैकल्पिक सरकारें

जब भारत का विभाजन करके भारत और पाकिस्तान नामक दो देश बनाने का समय आया तो दोनों देशों के बीच न केवल भूमि का बंटवारा करने का निश्चय किया गया अपितु सरकारी तंत्र से लेकर, रेल, वायुयान आदि सभी कुछ बांटने की प्रक्रिया आरम्भ की गई। भारतीय सेना का विभाजन सबसे कष्टकारी प्रक्रिया थी।

भारत में चुनी हुई वैधानिक संसद के अस्तित्व में नहीं होने से संविधान सभा को ही संसद तथा संविधान सभा का दोहरा दर्जा दिया गया। विभाजन से पहले भारत में जो अंतरिम सरकार चल रही थी उसमें से लॉर्ड माउंटबेटन ने दो वैकल्पिक सरकारों का निर्माण किया जो 15 अगस्त को अस्तित्व में आने वाले दोनों देशों के प्रशासन को संभाल सकें। ई.1935 के भारत सरकार अधिनियम में सुविधापूर्ण सुधार करके भारत में ई.1947 से ई.1950 तक तथा पाकिस्तान में ई.1947 से 1956 तक संविधान का काम लिया गया।

भारतीय सेना का विभाजन

अंग्रेजों के समय भारत की सेना विश्व की विशाल सेनाओं में से एक थी। भारतीय सेना न केवल प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध में अपितु समय-समय पर होने वाले चीन युद्ध, बॉक्सर युद्ध आदि में भी लड़ने जाती रहती थीं। युद्ध समाप्ति के बाद भी भारत की सेना में लगभग 25 लाख सैन्य अधिकारी एवं सैनिक थे किंतु युद्ध के कारण इंग्लैण्ड सरकार की आर्थिक स्थिति खराब हो जाने से भारत की सेनाओं में भारी कटौतियां की गईं।

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यही कारण था कि ई.1947 में भारत विभाजन के समय भारत की सेनाओं में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, गोरखा, एंग्लोइण्डियन एवं आदिवासी आदि समस्त जातियों के सैन्य अधिकारियों एवं सैनिकों की संख्या केवल 12 लाख के आसपास रह गई थी। इनका भी बंटवारा किया गया। हिन्दू, सिक्ख एवं ईसाई सैनिकों के लिए अपने देश के चयन का निर्णय करना बहुत आसान था। उन्हें भारत में ही रहना था क्योंकि जिन्ना के पाकिस्तान में उनके लिए जगह नहीं थी किंतु मुसलमान सैनिकों के लिए यह निर्णय बहुत हृदय विदारक था। देश-भक्ति के जज्बे से ओत-प्रोत हजारों मुस्लिम सैनिक भारत को ही अपना देश मानते आए थे, वे इस देश के लिए जीने-मरने की कसमें खाते आए थे, अब कुछ नेताओं की जिद पर वे अपने देश को छोड़कर जाने का निर्णय इतनी आसानी से कैसे कर सकते थे!

इसलिए यद्यपि अधिकांश मुस्लिम सैनिक अपना भग्न-हृदय लेकर पाकिस्तान जाने के लिए तैयार हो गए तथापि बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिकों ने भारत में रहने का संकल्प व्यक्त किया। भारत माता ने इन मुस्लिम सैनिकों को अपना पुत्र मानकर सहर्ष सीने से लगा लिया। यह इस्लाम के नाम पर उन्माद फैलाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना और उसके साथियों की करारी हार थी।

पंजाब बाउण्ड्री फोर्स का गठन

देश के विभाजन से पहले ही सरकार ने पंजाब बाउण्ड्री फोर्स का गठन किया। इसके लिए जारी आदेश में कहा गया कि पंजाब में शांति बनाए रखने के लिए दोनों सरकारों ने 1 अगस्त 1947 से विशेष सैनिक कमाण्ड स्थापित करने का फैसला किया है जो सियालकोट, गुजरांवाला, शेखपुरा, लायलपुरा, मौंटमुगरी, लाहौर, अमृतसर, गुरदासपुर, होशियारपुर, जालंधर, फिरोजपुर और लुधियाना के जिलों में काम करेगा।

दोनों सरकारों की सहमति से इसका फौजी कमाण्डर मेजर जनरल रीस नियुक्त किया गया है। भारत की ओर से ब्रिगेडियर दिगम्बरसिंह तथा पाकिस्तान की ओर से कर्नल अयूब खान सलाहकार के रूप में रहेंगे। 15 अगस्त के बाद दोनों नई सरकारों की फौज पर इन क्षेत्रों में मेजर जनरल रीस का नियंत्रण रहेगा जो सुप्रीम कमाण्डर और सम्मिलित सुरक्षा कौंसिल की मारफत दोनों सरकारों के प्रति जिम्मेदार रहेगा।

यदि आवश्यकता समझी गई तो दोनों सरकारें बंगाल में भी ऐसे संगठन खड़े करने से नहीं हिचकेंगी। पंजाब बाउण्ड्री फोर्स में 50 हजार सैनिक नियुक्त किए गए। पंजाब बाउण्ड्री फोर्स के अधिकांश सैनिक चौथी हिन्दुस्तानी डिवीजन के थे। ये सैनिक द्वितीय विश्वयुद्ध के समय इरिट्रिया, पश्चिमी रेगिस्तान और इटली, इसालियन पूर्वी अफ्रीका, अलामियेन, मोंटे केसीनो आदि देशों में मोर्चे संभाल चुके थे।

कर्मचारियों के लिये विशेष रेल

उच्च सरकारी अधिकारियों, सैनिक अधिकारियों, चपरासियों, रसोइयों, बाबुओं, हरिजनों आदि से एक फॉर्म भरवाकर उन्हें भारत सरकार में रहने या पाकिस्तान सरकार में जाने का विकल्प उपलब्ध कराया गया। पाकिस्तान जाने वाले कर्मचारियों और उनके साथ जाने वाले कागजों के लिये रेलवे ने 3 अगस्त 1947 से दिल्ली से करांची तक विशेष रेलगाड़ियों का संचालन किया। इन रेलगाड़ियों को लौटती बार में पाकिस्तान से भारत आने वाले कर्मचारियों को लेकर आना था।

उस समय तक रेल गाड़ियां भयानक सांप्रदायिक उन्माद की चपेट में आ चुकी थीं। इसलिये स्टेट्समैन ने आम जनता से अपील की कि आम जनता गाड़ियों का उपयोग न करे। स्टेट्समैन को आशा थी कि कर्मचारियों की रेलगाड़ियां सुरक्षित रहेंगी किंतु स्टेट्समैन की उम्मीद से परे पाकिस्तान से कर्मचारियों को लेकर आने वाली रेलगाड़ियां भी सांप्रदायिक हमलों की चपेट में आयीं।

भारतीय सेना का विभाजन, भावी देशों के लिए वैकल्पिक सरकारें, पंजाब बाउण्ड्री फोर्स का गठन तथा सरकारी कर्मचारियों के लिए विशेष रेलगाड़ियों का संचालन आदि ऐसे उपाय थे जिनसे भारत के विभाजन की प्रक्रिया को त्वरित एवं सुगम बनाया जाना था किंतु पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों को देश का बंटवारा करवाकर भी संतोष नहीं हुआ, वे भारत के हिन्दुओं का खून बहाकर ही आखिरी संतोष प्राप्त करना चाहते थे क्योंकि इसके बाद उन्हें कभी ऐसा करने का सौभाग्य मिलने वाला नहीं था।

पाकिस्तान की तरफ रहने वाले मुसलमान पाकिस्तान की तरफ से भारत की तरफ आने वाली रेलगाड़ियों में बैठे हिंदुओं की धरती छीनकर भी खुश नहीं हुए, इसलिए उन्होंने रेलों में बैठे हिंदुओं को भी काटना आरम्भ कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रैडक्लिफ आयोग ने खींची विभाजन रेखा

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रैडक्लिफ आयोग

भारत एवं पाकिस्तान की सीमाओं का निर्धारण करने के लिये 27 जून 1947 को रैडक्लिफ आयोग का गठन किया गया। इसका अध्यक्ष सर सिरिल रैडक्लिफ इंगलैण्ड का प्रसिद्ध वकील था। रैडक्लिफ 8 जुलाई 1947 को दिल्ली पहुंचा। रैडक्लिफ आयोग की सहायता के लिये प्रत्येक प्रांत में चार-चार न्यायाधीशों के एक बोर्ड की नियुक्ति की गयी। इन न्यायाधीशों में से आधे कांग्रेस द्वारा एवं आधे मुस्लिम लीग द्वारा नियुक्त किये गये थे।

पंजाब के गवर्नर जैन्किन्स ने माउंटबेटन को पत्र लिखकर मांग की कि रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट 15 अगस्त से पूर्व अवश्य ही प्रकाशित कर देनी चाहिये ताकि लोगों की भगदड़ खत्म हो। भारत विभाजन कौंसिल ने भी वायसराय से यही अपील की। रैडक्लिफ जहाँ भी जाता लोग उसे घेर लेते और अपने पक्ष में प्रभावित करने की कोशिश करते। रैडक्लिफ की कलम का एक झटका उन्हें जमा या उखाड़ सकता था।

उस अंग्रेज को प्रसन्न करने के लिये वे किसी भी सीमा तक कुछ भी कर सकते थे। रेडक्लिफ पर नक्शों, दरख्वास्तों, धमकियों और घूस की बारिश होने लगी। उसकी रिपोर्ट 9 अगस्त 1947 को तैयार हो गयी किंतु माउण्टबेटन ने उसे 17 अगस्त को उजागर करने का निर्णय लिया ताकि स्वतंत्रता दिवस के आनंद में रसभंग की स्थिति न बने। इस कारण पंजाब और बंगाल में असमंजस की स्थिति बनी रही।

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रैडक्लिफ आयोग के काम से न तो भारतीय नेता प्रसन्न हुए और न ही पाकिस्तानी नेता। दोनों ने ही जमकर रैडक्लिफ की आलोचना की। इससे रुष्ट होकर रैडक्ल्फि ने पारिश्रमिक के रूप में निश्चित की गयी दो हजार पौण्ड की राशि को लेने से मना कर दिया। विभाजन रेखाअएं खींचते समय सिरिल रैडक्लिफ ने सर्वाधिक गौर इसी पर किया था कि बहुसंख्य जनता का धर्म क्या है। फलस्वरूप जो विभाजन रेखा खींची गई, वह तकनीकी दृष्टि से सही थी किंतु व्यावहारिक दृष्टि से सत्यानाशी। …… बंगाल की विभाजन रेखा ने दोनों भागों को एक आर्थिक अभिशाप दिया। विश्व का 85 प्रतिशत पटसन जिस क्षेत्र में पैदा होता था, वह पाकिस्तान को मिला लकिन वहाँ एक भी ऐसी मिल नहीं था जहाँ पटसन की खपत हो सकती थी।

उसकी सौ से भी ज्यादा मिलें कलकत्ता में थीं। यह महानगर भारत के हिस्से में आया किंतु पटसन नहीं। ……. पंजाब की विभाजन रेखा काश्मीर की सरहद पर स्थित एक घने जंगल के बीच से शुरू हुई जहाँ से ऊझ नामक नदी की पश्चिमी धारा पंजाब में प्रवेश करती है। जहाँ-जहाँ संभव हुआ, विभाजन रेखा ने रावी और सतलुज नदियों का पीछा किया। दो सौ मील दक्षिण में उतरकर उसने भारतीय मरुभूमि को छुआ। लाहौर पाकिस्तान को मिला और अमृतसर अपने स्वर्ण-मंदिर के साथ भारत के हिस्से में आया।

ताजमहल को पाकिस्तान ले जाने की मांग

भारत विभाजन की तिथि घोषित हो जाने के बाद पाकिस्तान जाने वाले कुछ मुसलमानों ने मांग की कि ताजमहल को तोड़कर पाकिस्तान ले जाना चाहिये और वहाँ फिर से निर्मित किया जाना चाहिये, क्योंकि उसका निर्माण एक मुगल ने किया था किंतु यह मांग कोई जोर नहीं पकड़ सकी।

नए गवर्नर जनरलों की नियुक्ति

भारत विभाजन के साथ ही अस्तित्व में आने वाले दो नवीन राष्ट्रों में राष्ट्राध्यक्षों की नियुक्ति का प्रश्न कम जटिल नहीं था। भारत के अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे तथा स्वाधीन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के पद पर वही नियुक्त किए जाने थे किंतु गवर्नर जनरल एवं वायसराय की जगह किसी नए व्यक्ति को नियुक्त किया जाना था। पाकिस्तान में इन दोनों पदों में से एक पद पर मुहम्मद अली जिन्ना को एवं दूसरे पद पर किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त किया जाना था।

भारतीय नेताओं ने लॉर्ड माउंटबेटन को ही स्वाधीन भारत का गवर्नर जनरल बनाए रखना स्वीकार किया किंतु माउंटबेटन ने इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। इस पर इंग्लैण्ड में भारतीय नेताओं की उदारता की धूम मच गई। प्रधानमंत्री एटली, विपक्ष के नेता विंस्टन चर्चिल तथा स्वयं ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज षष्ठम् ने माउंटबेटन को तार भेजकर निर्देश दिए कि वे भारतीय नेताओं के प्रस्ताव को स्वीकार कर लें।

इस प्रकार भावी स्वतंत्र भारत के लिए भावी गवर्नर जनरल के पद का निर्धारण अत्यंत गरिमामय ढंग से कर लिया गया। मुहम्मद अली जिन्ना ने भावी पाकिस्तान के गवर्नर जनरल के पद के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया तथा प्रधानमंत्री का पद लियाकत अली के लिए तय किया। माउण्टबेटन ने जिन्ना को याद दिलाया कि लोकतांत्रिक प्रणाली में शासन की समस्त शक्तियां प्रधानमंत्री में निहित होती हैं न कि गवर्नर जनरल में। जिन्ना ने कहा, पाकिस्तान में गवर्नर जनरल तो मैं ही होऊंगा तथा प्रधानमंत्री को वही करना होगा जो मैं कहूंगा।

वायसराय की काउंसिल के सदस्य, संविधान सभा के सदस्य एवं अलवर राज्य के प्रधानमंत्री आदि विभिन्न पदों पर रहे हिन्दू महासभाई नेता नारायण भास्कर खरे ने अपनी पुस्तक मेरी देश सेवा के भाग-दो में 14 नवम्बर 1954 को टाइम्स ऑफ इण्डिया में प्रकाशित एक आलेख का हवाला दिया है। इसमें एक अमरीकी पत्रकार द्वारा लुई फिशर एवं गांधीजी के बीच हुए एक वार्तालाप का उल्लेख किया गया है ।

गांधीजी ने लुई फिशर से कहा- ‘जब मैं हिन्दुस्तान का वायसराय होऊंगा, तब दक्षिण अफ्रीका के गोरों को अपनी कुटिया में बुलाऊंगा और कहूंगा कि आप लोगों ने मेरे लोगों को कुचला है किंतु मैं आपका अनुसरण नहीं करूंगा। मैं आपके साथ उदारता का व्यवहार करूंगा। मैं आपके समान कालों को लिंच करके नहीं मारूंगा। आपकी ओर भयंकर क्रूरता है। एक गोरा मारा गया तो सब का सब गांव नष्ट कर दिया जाता है।’

इस तरह कुछ और भी उदाहरणों के साथ नारायण भास्कर ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि गांधीजी के मन में ‘स्वदेशी-वायसराय’ बनने की इच्छा थी। जब भारत को स्वतंत्रता मिली तब एक भी मंच से यह बात नहीं उठी। उस समय गांधीजी की आयु 78 वर्ष हो चुकी थी तथा वे शारीरिक रूप से इतने कमजोर हो चुके थे कि वे मनु, आभा तथा सुशीला बेन आदि का सहारा लिए बिना चल भी नहीं पाते थे।

इधर भारत में नए वायसराय एवं गवर्नर जनरल की नियुक्ति पर विचार हो रहा था और उधर रैडक्लिफ आयोग अपना काम करके भारत से जा चुका था। उसने अपनी रिपोर्ट एक लिफाफे में बंद करके माउण्टबेटन को सौंप दी थी। इस लिफाफे में रैडक्ल्फि की रिपार्ट नहीं थी अपितु एक ऐसा भयानक विशाल अजगर था जो कराड़ों लोगों की जिंदगी को एक ही फूत्कार में निगल जाने वाला था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अहमदपुर चौरोली

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अंग्रेजों का बनाया हुआ यूनाईटेड प्रोविंस (यू.पी.) अब उत्तर प्रदेश (यू.पी.) कहलाता है। इस प्रांत के पश्चिमी हिस्से में एक छोटा सा गांव है अहमदपुर चौरोली।

यह गांव अविभाजित पंजाब एवं संयुक्त प्रांत की सीमा पर बहने वाली यमुना नदी से लगभग 10-12 किलोमीटर दूर था। गांव के चारों ओर गेहूँ और गन्ने के विशाल खेत लहलहाते थे और धरती के चप्पे-चप्पे पर खुशहाली का साम्राज्य था।

अहमदपुर चौरोली गांव में सभी जातियों के लोग सदियों से मिलजुल कर रहते आए थे। गांव के शांत वातावरण एवं खुशहाली को देखते हुए ही मुगलों के समय में निकटवर्ती रन्हेरा गांव से शाहजी सेढ़ूराम ने अहमदपुर चौरोली में आकर डेरा जमाया। उनके दो पुत्र थे- लाला केवलराम एवं लाला काशीराम।

समय के साथ शाहजी सेढ़ूराम के परिश्रमी वंशजों ने बहुत उन्नति की। जब इलाहाबाद की संधि के बाद ई.1765 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह को पेंशन पर भेज दिया तो अहमदपुर चौरोली का क्षेत्र भी अंग्रेजों के अधीन हो गया।

अंग्रेजों ने देश में नया राजस्व ढांचा खड़ा किया जिसका आधार जमींदारी प्रथा थी। लाला काशीराम के वंशजों ने भी अहमदपुर चौरोली एवं उसके आसपास बड़ी-बड़ी जमींदारियां खरीदीं तथा वे रईस कहलाने लगे। आसपास के सारे गांवों से बिल्कुल अलग इस गांव में लालाओं की बड़ी हवेलियां, नोहरे एवं दुकानें थीं।

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जब 4 जून 1947 को माउण्टबेटन योजना घोषित हो गई और भारत विभाजन में कुछ ही दिन रह गए तब चौरोली गांव के लोगों में भी वैसी ही बेचैनी फैल गई, जैसी उन दिनों भारत के प्रत्येक गांव में देखी जा सकती थी। गांव में एकाध मुस्लिम परिवार भी रहा करता था जिसके कुछ युवक तांगा चलाया करते थे। एक युवक हर शुक्रवार को नमाज पढ़ने के लिए निकटवर्ती जेवर कस्बे में भी जाया करता था जहाँ मस्जिद थी। उन्हीं दिनों कुछ मस्जिदों में पाकिस्तान निर्माण के लिए चंदा एकत्रित किया जाने लगा। गांव के एक युवक ने भी दो सौ रुपए दिए ताकि किसी तरह पाकिस्तान बन जाए। उन दिनों एक तांगा चलाने वाले परिवार के लिए 200 रुपया बहुत बड़ी बात थी। तब जार्ज षष्ठम् का आधी चांदी वाला एक रुपया, एक रुपए में ही चला करता था जो अब लगभग 400 रुपए मूल्य का है।

उन दिनों पूरे क्षेत्र में यह अफवाह जोरों पर थी कि आने वाली 15 अगस्त को पूरे देश में बहुत बड़ा बलवा होगा। ग्रंथ लेखक के पिता श्री गिरिराज प्रसाद गुप्ता को भी उन्हीं युवकों में से किसी ने संभावित बलवे की बात बताई थी। उन्होंने (ग्रंथ लेखक के पिता ने) अपने विद्यालय के शिक्षक पण्डित कर्णसिंहजी से इस बारे में पूछा जो कि दूर-दूर तक के गांवों में बहुत ख्याति-प्राप्त एवं सम्मानित व्यक्ति थे।

पण्डितजी ने जवाब दिया कि उस दिन कुछ नहीं होगा, पूरी तरह शांति रहेगी। पण्डितजी की बात पूरी तरह सही निकली क्योंकि जब 15 अगस्त आया तो अहमदपुर चौरोली गांव वैसे ही शांत और सामान्य बना रहा जैसा अन्य दिनों में रहा करता था।

गांव के लोगों के भाईचारे के कारण चौराली गांव तथा उसके आसपास के लगभग सारे गांव पूरी तरह शांत रहे किंतु अहमदपुर चौरोली गांव से लगभग 10-12 किलोमीटर दूर बहने वाली यमुनाजी के उस पार से चिंताजनक खबरें आने लगीं। यमुना-पार का वह क्षेत्र उन दिनों अविभाजित पंजाब में था तथा आजकल हरियाणा प्रांत में है। इस क्षेत्र से कुछ दूरी पर रेवाड़ी-गुड़गांव का इलाका लगता था जहाँ उन दिनों मेवों ने पृथक् मेवस्थान के लिए हिंसक कार्यवाहियां चला रखी थीं।

महाभारत में आए प्रसंग एवं पौराणिक आख्यानों के अनुसार, प्रस्तावित मेवस्थान वही क्षेत्र था जहाँ भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने खाण्डव वन का दहन करके नागों का सफाया किया था। ई.1947 के आसपास इस पूरे क्षेत्र में मेव जाति बड़ी संख्या में निवास करती थी। एक दिन गांव में खबर आई कि मेव बड़ी संख्या में एकत्रित होकर यमुना-पार के गांवों पर हमला करेंगे।

मेवों की योजना यह थी कि हिन्दुओं से यह पूरा इलाका खाली कराकर इसे मेवस्थान में बदल दिया जाए। उनकी धारणा थी कि चूंकि पंजाब पाकिस्तान में जा रहा है इसलिए मेवों द्वारा बनाया जा रहा मेवस्थान भारत-पाकिस्तान के बीच में होगा तथा आसानी से पाकिस्तान में शामिल हो जाएगा।

जब मेवों के आक्रमण के समाचार आए तो चौरोली एवं उसके आस-पास के बहुत से गांवों के हिन्दू युवक लाठी, बल्लम और भाले लेकर यमुना पार के उन गांवों में जाकर जमा हो गए जहाँ मेवों के हमले होने की आशंका थी। ये खेतीहर गांव थे जिनमें किसी भी घर में तलवार का पाया जाना एक कठिन बात थी। गांव के लोग जानवरों से अपने खेतों को बचाने के लिए लाठी, बल्लम एवं भाले ही रखा करते थे।

जब सशस्त्र मेवों ने हमले किए तो हिन्दू युवकों ने उनका मार्ग रोका और उन्हें सफलता पूर्वक रेवाड़ी की ओर खदेड़ दिया। इस संघर्ष में भाग लेने वालों में ग्रंथ लेखक के पितामह श्री मुकुंदीलाल गुप्ता भी थे, हालांकि उस समय अपने परिवार में वे अकेले वयस्क पुरुष थे तथा घर की महिलाओं के मना करने पर भी वे इस संघर्ष में भाग लेने के लिए गए। मेवों के भाग जाने के तीन-चार दिन बाद गांव के युवक वापस लौटकर आए।

उन दिनों गढ़-गंगा में प्रत्येक पूर्णिमा को मेला लगता था। इस अवसर पर चौरोली गांव से लगभग 20-25 गाड़ियों में बैठकर लोग गंगा-स्नान को जाया करते थे। इस क्षेत्र में मुसलमानों के कई गांव थे। जब साम्प्रदायिक दंगे अपने चरम पर थे तो एक बार पूर्णिमा के मेले में बलवा मचा इस अवसर पर निकटवर्ती भुन्ना गांव के जाट लड़कों ने बड़े पराक्रम का प्रदर्शन किया। उस समय यह कहावत चल पड़ी थी- ‘गढ़ गंगा के जाट न होते, तो लोगों के ठाठ न होते।’

इस दंगे के बाद मची भगदड़ में कुछ युवकों ने लगभग 25-30 औरतों को पकड़ लिया। उन्होंने अपनी गाड़ियों में से सवारियां उतार दीं और इन पकड़ी हुई औरतों को बैठा लिया। अहमदपुर चौरोली तथा उसके आसपास के कुछ गांवों के युवक जिनके विवाह नहीं हो रहे थे, उन्होंने उन औरतों से विवाह करके गृहस्थियां बसा लीं। इस सम्बन्ध में एक मुक्तक भी बना था जिसके कुछ अंश इस प्रकार थे-

संवत् 2003 का किस्सा तुम्हें सुनाते हैं…….

सुतन्ने उनके फाड़-फाड़ धोती उनको पहराय दई……..

गंगाजी उनको नह्वा-नह्वा गंगादेई उनका नाम धरा……..।

कहने को यह अहमदपुर चौरोली जैसे एक छोटे से गांव की छुट-पुट घटनाएं हैं किंतु उन दिनों उत्तर भारत के गांवों में इस तरह के दृश्य बहुत साधारण बात बन गए थे। इन दंगों में बहुत से लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोने पड़े। बहुत से घायल हुए और अनगिनत स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया। वे स्त्रियां सचमुच भाग्यशाली थीं जिन्हें दंगों की हिंसा के बाद भी अपना लिया जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

आखिर बन गया पाकिस्तान

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मुहम्मद अली जिन्ना ने अपनी जिंदगी के आखिरी 13 साल पाकिस्तान बनाने के लिए संघर्ष करते हुए बिताई। केवल इसी अवधि में उसे इतना बड़ा देश मिल गया। उसे स्वयं को विश्वास नहीं था कि कभी ऐसा हो गया किंतु उसके जीते जी आखिर बन गया पाकिस्तान।

भारत के शरीर से जहर अलग

7 अगस्त 1947 को जिन्ना वायसराय के डकोटा पर कराची चला गया। जाते समय वायसराय ने उसे रॉल्स रायस गाड़ी और मुसलमान एडीसी लेफ्टिनेंट अहसन का उपहार दिया तथा स्वयं छोड़ने के लिए हवाई अड्डे तक गया।

जिन्ना के लिए यही बहुत था कि तमाम बदनामियों के बावजूद आखिर बन गया पाकिस्तान किंतु भारतीय नेता इसे किस दृष्टि से देखते थे। इसका सबसे बढ़िया उदाहरण सरदार पटेल के वक्तव्यों में देखा जा सकता है। जिन्ना के जाने के अगले दिन पटेल ने वक्तव्य दिया-

‘भारत के शरीर से जहर अलग कर दिया गया। हम लोग अब एक हैं और अब हमें कोई अलग नहीं कर सकता। नदी या समुद्र के पानी के टुकड़े नहीं हो सकते। जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, उनकी जड़ें, उनके धार्मिक स्थान और केंद्र यहाँ हैं। मुझे पता नहीं कि वे पाकिस्तान में क्या करेंगे। बहुत जल्दी वे हमारे पास लौट आयेंगे।’

जिस दिन जिन्ना कराची पहुंचा, उसने अपने एडीसी से कहा- ‘मैंने कभी सोचा नहीं था कि यह मुमकिन होगा। मैंने अपनी जिन्दगी में पाकिस्तान देखने की उम्मीद भी नहीं की थी।’

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जिन्ना के भारत-मोह के बारे में और भी लोगों ने लिखा है। यह ठीक वैसा ही था मानो कोई झगड़ालू बच्चा अपने खिलौने लड़-झगड़ कर दूसरों से अलग कर रहा हो और फिर सारे खिलौनों को अपना समझ रहा हो। 1946 के अंत में जब पाकिस्तान का बनना लगभग तय हो गया था, जिन्ना कुल्लू घाटी में व्यास नदी के किनारे शांत और रमणीक कस्बे कटराइन में ‘द रिट्रीट’ नामक एक सुंदर बंगला खरीदने की बातचती चला रहा था। पाकिस्तान का जो नक्शा उस समय आकार ग्रहण कर रहा था, उसकी सीमा में कुल्लू घाटी किसी भी हालत में नहीं आने वाली थी। 13 अगस्त 1947 को गवर्नर जनरल एवं वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने कराची पहुंचकर पाकिस्तान की एसेम्बली में भाषण दिया तथा जिन्ना को गवर्नर जनरल के पद की शपथ दिलवाकर तीसरे पहर भारत लौट आए।

पाकिस्तान के नेता माउण्टबेटन के भारत-प्रेम के कारण उनसे इतनी घृणा करते थे कि कई साल बाद जब माउण्बेटन भारत आए तो पाकिस्तान ने उनके हवाई जहाज को पाकिस्तान के ऊपर होकर उड़ने की अनुमति नहीं दी।

इस प्रकार 14 अगस्त 1947 को हिन्दू एवं मुस्लिम बहुल जनसंख्या के आधार पर भारत दो देशों में बंट गया। ब्रिटिश शासन के अधीन हिन्दू बहुल क्षेत्र ‘भारत संघ’ के रूप में तथा मुस्लिम बहुल क्षेत्र ‘पाकिस्तान’ के रूप में अस्तित्व में आया। 14 अगस्त की मध्यरात्रि में वायसराय ने भारत की संविधान निर्मात्री परिषद में भाषण देकर भारत की स्वतंत्रता की घोषणा की।

दो सिरों वाला कटा-फटा पाकिस्तान

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया। इस प्रकार वायसराय माउण्टबेटन एवं मुहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान के निर्माण के लिए केवल 72 दिन का समय प्राप्त हुआ। पाकिस्तान के पास न कोई राजधानी मौजूद थी, न कोई संविधान मौजूद था, न भावी देश की कोई रूपरेखा मौजूद थी, न पाकिस्तान की सीमाएं मौजूद थीं, न उसकी सेनाएं मौजूद थीं और न राजस्व के स्रोत निश्चित थे।

72 दिन में बनने वाले पाकिस्तान के लिए केवल एक योजक तत्व था जिसके आधार पर पाकिस्तान का निर्माण किया जाना था और वह था- पाकिस्तान में सब-कुछ इस्लामिक होना चाहिए। और कुछ हो न हो, जिन्ना के लिए यही बहुत था कि जैसा भी था आखिर बन गया पाकिस्तान।

रैडक्लिफ रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद जो पाकिस्तान अस्तित्व में आया उसके किसी भी अंग में कोई तारतम्य निर्मित नहीं हो पाया। अखण्ड भारत की कुल भूमि 43,16,746 वर्ग किलोमीटर थी जिसमें से 10,29,483 वर्ग किलोमीटर अर्थात् 23.85 प्रतिशत भूमि पाकिस्तान को मिली। ई.1947 में अखण्ड भारत की कुल जनंसख्या लगभग 39.5 करोड़ थी जिसमें से 3 करोड़ से कुछ अधिक पूर्वी-पाकिस्तान में तथा लगभग 3.5 करोड़ पश्चिमी-पाकिस्तान में चली गई।

इस प्रकार अखण्ड भारत की अनुमानतः 16 प्रतिशत जनसंख्या पाकिस्तान में चली गई। ई.1951 की जनगणनाओं में भारत की कुल जनसंख्या 36.10 करोड़ तथा पाकिस्तान की कुल जनसंख्या 7.50 करोड़ पाई गई। इस प्रकार पाकिस्तान की जनंसख्या दोनों की सम्मिलित जनसंख्या का 17.2 प्रतिशत थी। भारत की राजस्व-आय का 17 प्रतिशत तथा सेना का 33 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान को प्राप्त हुआ।

जिन्ना के पाकिस्तान के दो सिर थे, पहला सिर हिमालय की पहाड़ियों में था जिसे पश्चिमी पाकिस्तान कहा गया। पाकिस्तान की राजधानी का मालिक यही सिर था। दूसरा सिर बंगाल की खाड़ी में था, इसकी नैसर्गिक राजधानी कलकत्ता थी जो भारत में रह गई थी और कृत्रिम राजधानी कराची में थी जो इस सिर से 1600 किलोमीटर दूर थी।

पहला सिर पंजाबी मिश्रित उर्दू बोलता था तथा दूसरे सिर के द्वारा बोली जाने वाली बांग्ला भाषा को हेय समझता था। इस सिर का कुछ हिस्सा केवल सिंधी और कुछ हिस्सा केवल पश्तून समझता था। बंगाल की खाड़ी में स्थित पाकिस्तान का दूसरा सिर बंगला बोलता और समझता था तथा उर्दू बोलने वालों को जान से मार डालना चाहता था। यही था पाकिस्तान …… ऐसा ही बना था जिन्ना का पाकिस्तान।

सिक्खों की पीड़ा समझने वाला कोई नहीं था

जब पाकिस्तान बना तो सबसे अधिक क्षति सिक्खों को हुई। सम्पूर्ण सिक्ख जाति को बहुत बड़ी मात्रा में जन, धन एवं भूमि का बलिदान देना पड़ा। रावी, चिनाव, झेलम, सतलुज एवं व्यास के हरे-भरे मैदानों में सिक्ख तब से रहते आए थे जब उनके पुरखे हिन्दू हुआ करते थे। वे कब धीरे-धीरे हिन्दू से सिक्ख हो गए, उन्हें पता ही नहीं चला किंतु ई.1947 के भारत विभाजन ने पंजाब को दो टुकड़ों में बांट दिया।

इससे पंजाब के हरे-भरे मैदान तो उनसे छिने ही, साथ ही लाखों सिक्खों को जान से हाथ धोना पड़ा और पचास लाख से अधिक सिक्खों को पूर्वी-पंजाब से भागकर पश्चिमी-पंजाब आना पड़ा। सिक्खों के प्राणों से भी प्रिय ऐतिहासिक नगर एवं गुरुद्वारे पाकिस्तान में चले गए। इनमें लाहौर, गुजरांवाला, ननकाना साहब तथा रावलपिण्डी के इतिहास गुरुओं के इतिहास से जुड़े हुए थे। ननकाना साहब में गुरु नानक का जन्म हुआ था।

लाहौर के बारे में तो पंजाबियों में यह कहावत कही जाती थी- ‘जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई।’ हसन अब्दाल में गुरुद्वारा पंजी साहिब था, लाहौर के गुरुद्वारा डेरा साहिब में पांचवे गुरु अर्जुन देव की हत्या हुई थी, करतारपुर में गुरुद्वारा करतारपुर साहब था जहाँ गुरु नानक का निधन हुआ था। इनके साथ ही सिक्खों ने लाहौर स्थित महाराजा रंजीत सिंह के पवित्र स्थान को भी गंवा दिया। सिक्खों की पीड़ा को कोई समझे न समझे, मुस्लिमलीगियों के लिए यही बहुत था कि आखिर बन गया पाकिस्तान।

सिंधियों की पीड़ा सबसे भयानक थी

भारत विभाजन में सिंधी जाति ने अपने पुरखों की पूरी धरती ही खो दी। सिंधी जाति हजारों साल से सिंध क्षेत्र में रहती आई थी किंतु ई.712 से लेकर ई.1947 के बीच की अवधि में सिंधियों को पूरी तरह से या तो अपनी धरती खोनी पड़ी या अपना धर्म बदलना पड़ा। ई.1947 में हुए भारत विभाजन के समय सम्पूर्ण सिंध क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया। इसमें खैरपुर, दादू, लाड़कवा, जेकबाबाद, हैदराबाद, कराची, मीरपुर खास, जिला नवाबशाह, टण्डो आदम आदि मिलाकर लगभग 65 हजार वर्गमील का क्षेत्र था।

इस कारण इन क्षेत्रों में रहने वाले हिन्दू-सिंधी भारत में आ गए और मुस्लिम-सिंधी पाकिस्तान में रह गए। वर्तमान समय में पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र की जनसंख्या में लगभग 94 प्रतिशत मुसलमान एवं लगभग 6 प्रतिशत हिन्दू हैं। भारत में इस समय लगभग 38 लाख सिंधी रहते हैं। विभाजन के समय हिन्दू-सिंधियों की पीड़ा को समझने वाला कोई नहीं था, समझने की तो कौन कहे, सुनने वाला तक कोई नहीं था।

सिंधियों की पीड़ा को कोई समझे न समझे, पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों के लिए यही सबसे बड़ी खुशी थी कि आखिर बन गया पाकिस्तान।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया ने पाकिस्तान आंदोलन में सहायता की!

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ई.1940 में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया ने ब्रिटिशों से संघर्ष न करने के लिए गांधीजी के नेतृत्व पर प्रहार किया। ई.1941 में जब हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया तो मास्को ने विश्व की सभी कम्युनिस्ट और प्रगतिशील शक्तियों को सोवियत रूस के संघर्ष या सोवियत संघ के मित्र राष्ट्रों के संघर्ष में अपना योगदान देने का आग्रह किया।

उस समय कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया के महासचिव पी. सी. जोशी ने यह मत व्यक्त किया कि मुस्लिम लीग प्रमुख राजनीतिक संगठन है। उसने कांग्रेस से अलग राष्ट्र की मांग को स्वीकार करने का आग्रह किया।

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सितम्बर 1942 में सी.पी.आई. की केन्द्रीय समिति ने यह प्रस्ताव अंगीकार किया- भारतीय जनसमुदाय के प्रत्यंक अंग जिसका उसके देश में सम्बद्ध क्षेत्र, समान ऐतिहासिक परम्परा, समान भाषा, संस्कृति, मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति, समान आर्थिक जीवन हो, उसे स्वतंत्र भारतीय केन्द्र या संघ में एक स्वायत्त राज्य के रूप में रहने के अधिकार के साथ एक भिन्न राष्ट्रीयता प्रदान करनी चाहिए और अपनी इच्छा पर उसे केन्द्र या संघ से अलग होने का भी अधिकार होना चाहिए।

1940 के दशक के मध्य में ई. एम. एस. नंबूदिरीपाद ने ए. के. गोपालन के साथ केरल में मुसलमानों के एक जुलूस का नेतृत्व किया जिसमें पाकिस्तान जिंदाबाद और मोपलिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि ख्वाजा अहमद अब्बास जो कि एक वामंथी थे, को यह कहना पड़ा कि कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया ने भारत को नुकसान पहुंचाया जिसमें मुस्लिम अलगाववादियों को एक सैद्धांतिक आधार प्रदान किया जाना शामिल था।

ई.1946 में ब्रिटिश कम्यूनिट पार्टी के एक नेता रजनी पामदत्ता के दबाव में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया ने अपना रुख बदलते हुए पाकिस्तान को ब्रिटिश साम्राज्यवाद तथा मुस्लिम पूंजीवाद के बीच का एक षड्यंत्र बताया। उस समय तक मुस्लिम-कम्युनिस्टों का दृष्टिकोण बदलने के लिए काफी देर हो चुकी थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अविभाजित पंजाब में दंगे

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जैसे ही रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित हुई, वैसे ही अविभाजित पंजाब में दंगे आरम्भ हो गए। इन दंगों से रक्त की नदी सी बह निकली। पाकिस्तान को रक्त की इसी नदी में से तैरकर निकलना था। बेशक सिक्ख जाति को भी रक्त की इसी नदी में से तैरकर अपना अस्तित्व बचाना था।

अविभाजित पंजाब में दंगों की शुरुआत

कलकत्ते से बढ़कर दंगे उत्तर, पूर्व और पश्चिमी की ओर फैलने लगे, पूर्वी बंगाल में नोआखाली तक, जहाँ मुसलमानों ने हिन्दुओं का कत्ल किया था और इधर बिहार तक जहाँ हिन्दुओं ने मुसलमानों का। अविभाजित पंजाब में दंगे पहले से ही चल रहे थे। मुल्ले लोग पंजाब और सरहदी सूबों में इंसानों की खोपड़ियाँ संदूकों में भर-भरकर घूमने लगे।

मुल्ले इन खोपड़ियों का प्रदर्शन मुसलमानों के सामने करते तथा उन्हें कहते कि ये उन मुसलमानों की खोपड़ियां हैं जिन्हें हिंदुओं ने बिहार केदंगों में मार डाला है। सदियों से देश के उत्तर-पश्चिमी सरहदी इलाकों में रहते आ रहे हिंदू और सिक्ख अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षा के लिए पूरब की तरफ अर्थात् हिन्दू और सिक्खों की बहुतायत वाले इलाकों की तरफ भागने लगे।

कोई पैदल ही चल पड़े, कोई बैलगाड़ियों में, कोई ठसाठस भरी लारियों में लदे, तो कोई रेलगाड़ियों में लटके या उनकी छतों पर पटे। रास्तों में उनकी मुठभेड़ें वैसे ही त्रस्त मुसलमानों से हुई, जो सुरक्षा के लिए पश्चिम में भाग रहे थे। दंगे भगदड़ में बदल गए। 1947 की गर्मियों तक जबकि पाकिस्तान के नए राज्य के निर्माण की विविधवत् घोषणा की जा चुकी थी, लगभग एक करोड़ हिंदू, मुसलमान और सिख इसी भगदड़ में फँसे थे।

मानसून के आगमन तक दस लाख के लगभग मनुष्य मारे जा चुके थे। पूरे उत्तरी भारत में हथियार तने हुए थे, लोग भय-त्रस्त थे और लुक छिप रहे थे। शांति के एकाकी अवशिष्ट मरुद्वीप थे दूर सरहद पर पड़ने वाले छिटके-छितरे छोटे-छोटे दुर्गम गांव।

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सिरिल रैडक्लिफ की विभाजन रेखा ने पचास लाख हिन्दुओं और सिक्खों को पाकिस्तानी पंजाब में छोड़ दिया था। भारतीय पंजाब में पचास लाख मुसलमान छूट गए थे। ये तीनों जातियां एक दूसरे पर टूट पड़ीं। कांलिन्स एवं लैपियर ने लिखा है- जब यूरोप के लोगों एक दूसरे की जान ली तो बम, हथगोलों और गैस चैम्बरों का इस्तेमाल हुआ। जब पंजाब की जनता खुद अपना सर्वनाश करने निकली तो लाठियों, हॉकी-स्टिकों, बर्फ तोड़ने के सूजों, छुरों, मुद्गरों, तलवारों, कुल्हाड़ियों, हथौड़ों, ईंटों और बघनखों का उपयोग हुआ।

अविभाजित पंजाब में दंगे बहुत भयानक थे। जनता ने इस हद तक आपसी घृणा, क्रूरता और राक्षस-प्रवृत्ति का परिचय दिया कि सभी नेता हक्के-बक्के रह गए। …… उस छोटी सी अवधि में न्यूनतम विवेक और अधिकतम उन्माद के साथ भारत और पाकिस्तान की शैतान पूजा की। …… लाहौर की नालियां एक दम लाल पड़ गई थीं क्योंकि उनमें मानव-रक्त प्रवाहित हो रहा था। 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनते ही लाहौर में हिन्दू और सिक्ख मौहल्लों में पानी की आपूर्ति काट दी गई। भयानक गर्मी ने लोगों को प्यास का दीवाना कर दिया।

उनके मुहल्लों के बाहर मुस्लिम टुकड़ियां हथियार ताने खड़ी थीं। पानी की एक डोल की भीख मांगने के लिए जो भी स्त्रियां और बच्चे मुहल्ले से बाहर आ रहे थे, उन्हें निर्दयता से मौत के घाट उतारा जा रहा था। कम से कम आधा दर्जन स्थानों पर शहर धू-धू कर जल रहा था।

कैप्टेन रॉबर्ट एटकिन्स को लाहौर में शांति-व्यवस्था बहाल करने के लिए गोरखों की सेना के साथ भेजा गया। उसे शहर में इक्की-दुक्की अटैचियों और बच्चों को थामे हुए गिड़गिड़ाते हुए हिन्दुओं और सिक्खों ने घेर लिया। वे चाहते थे कि उन्हें शिविरों में रखा जाए। लगभग एक लाख हिन्दू और सिक्ख पुराने लाहौर में कैद हो चुके थे। चारों ओर आग लगाकर उनकी पानी की आपूर्ति काट दी गई थी। …… शाह आलम गेट के पास जो प्रसिद्ध गुरुद्वारा था, उसे एक भीड़ ने घेर कर आग लगा दी।

15 अगस्त को पाकिस्तान से भारत आने वाली 10 डाउन एक्सप्रेस ट्रेन भारत पंजाब के अमृतसर रेलवे स्टेशन पर आकर रुकी। पूरी ट्रेन के मुसाफिरों को बुरी तरह से काट डाला गया था। ट्रेन की समस्त आठों बोगियों में कटे हुए गले, फटी हुई खोपड़ियां, बाहर निकली आंतें, कटे-कटाए हाथ-पैर और धड़ पड़े थे। कुछ घायल लोग अब भी जीवित थे और पीड़ा से कराह रहे थे।

ट्रेन के अंतिम हिस्से में एक डिब्बे पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- ‘यह ट्रेन हम नेहरू और पटेल के नाम आजादी की सौगात के बतौर भेज रहे हैं।’ उस समय अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पश्चिमी पंजाब से पहले की आई हुई ट्रेनों में आए हुए शरणार्थियों की भारी भीड़ बैठी थी। वे इन लाशों को देखकर क्रोध एवं उन्माद से फट पड़े।

अविभाजित पंजाब में दंगे तब और भी बढ़ गए जब यह तय हो गया कि पंजाब का कौनसा गांव भारत में रहेगा और कौनसा पाकिस्तान में जाएगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पश्चिमी-पंजाब में सांप्रदायिक दंगे

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जब पूर्वी पंजाब की तरफ मुसलमानों ने सिक्खों को काटना आरम्भ किया तथा पश्चिमी-पंजाब में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए। जब मुसमलमानों ने पूर्वी पंजाब में ट्रेनों में बैठे हिन्दुओं एवं सिक्खों को काटना आरम्भ किया तो पश्चिमी पंजाब के हिन्दुओं और सिक्खों ने भी भारत से पाकिस्तान की ओर जाने वाली ट्रेनों पर हमले आरम्भ कर दिए।

भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ ट्रेनों पर एक-जैसे हमले हो रहे थे। दोनों ही तरफ मुनष्य का लिंग उसकी पहचान बना गया। भारत में सिक्खों और हिन्दुओं ने ऐसे प्रत्येक ट्रेन यात्री को कत्ल लिया जो मर्द हो ओर जिसका खतना हो चुका हो। पाकिस्तान में भी आक्रमणकारी प्रत्येक मर्द यात्री के लिंग की जांच करते। खतना नहीं, जिंदगी नहीं। ऐसे दौर कई बार आए, जब लाहौर और अमृतसर के स्टेशनों पर पहुंचने वाली प्रत्येक ट्रेन लाशों और घायलों से ही लदी हुई मिली।

पश्चिमी-पंजाब में सांप्रदायिक दंगे इसलिए आश्चर्यचकित करने वाले थे कि न तो अंग्रेजों को और न मुसलमानों को उम्मीद थी कि हिन्दू और सिक्ख मिलकर मुसलमानों की हिंसा का जवाब इतनी करारी हिंसा से देंगे।

आजादी की कितनी बड़ी कीमत दोनों देशों की जनता चुका रही थी, इसका साक्षात् उदाहरण अश्विनी दुबे नामक एक कर्नल ने लाहौर में देखा, जहाँ वह भारत की ओर से शांति स्थापना अधिकारी के रूप में भेजा गया था। घायलों और लाशों से लदी एक ट्रेन लाहौर के प्लेटफार्म पर आकर रुकी। हर डिब्बे में सन्नाटा छाया हुआ था। हर दरवाजे के नीचे से खून रिस-रिस कर पटरियों पर गिर रहा था, जैसे किसी रेफ्रिजिरेटर की बर्फ अत्यधिक गर्मी के कारण पिघलकर बहती जा रही थी।

ट्रेनों की सुरक्षा के लिए सशस्त्र सैनिक साथ चलते तो थे किंतु जब हिन्दुओं द्वारा आक्रमण होता तो हिन्दू सैनिक उन पर गोली न चला पाते। इसी प्रकार मुसलमान सैनिक मुसलमानों के आक्रमणों को रोक पाने में समर्थ नहीं थे।

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न्यूयार्क टाइम्स के एक संवाददाता रॉबर्ट ट्रम्बुल ने लिखा- ‘वीभत्सतम दृश्यों ने भी मुझे उतना आघात नहीं पहुंचाया है, जितना भारत के इन दृश्यों ने। भारत में इन दिनों जितनी बारिश नहीं होती, उतना खूर गिर रहा है। सैंकड़ों की दर से लाशें तो नजर आती ही हैं, उन हजारों हिन्दुस्तानियों को किसने गिना है जो आंख, या नाक के बिना, हाथ-पैरों या यौन-अंगों के बिना अभिशप्त भूतों की तरह भटक रहे हैं? गोली से मरने का मौका तो शायद ही किसी भाग्यवान को मिलता है। आम तौर पर मर्दों, औरतों और बच्चों को भी मुदगरों या पत्थरों इत्यादि से इतना पीटा जाता है कि उनकी मौत सुनिश्चित हो जाए लेकिन उन्हें पूरी तरह मारे बिना छोड़ दिया जाता है।

भीषण गर्मी और झूमती मक्खियों के कारण वे कितनी बुरी मौत, कितने धीमे-धीमे मरतेे होंगे, इसकी क्या कल्पना भी की जा सकती है? राक्षसीपने में कोई जाति किसी से कम नहीं थी। पंजाब बाउण्ड्री फोर्स के एक अधिकारी ने जब सिक्खों के आक्रमण के बाद एक गांव में प्रवेश किया तो पाया कि चार मुसलमान शिशु खुली अंगीठियों पर उसी तरह भूने गए थे, जिस तरह से सूअर के बच्चे भूने जाते। एक और अधिकारी ने ऐसी हिन्दू औरतों को देखा जिन्हें जूथ बनाकर कत्ल करने के लिए ले जाया जा रहा था और जिनके स्तनों को मुसलमान उन्मादियों ने काट डाला था।’

अड़तालीस घण्टे भी नहीं बीते होंगे कि पूर्वी-पंजाब से लेकर पश्चिमी-पंजाब से भयंकर सांप्रदायिक दंगों की खबरें आने लगीं और दिल्ली से कराची तक कोई भी इनकी आग से अछूता नहीं बचा। भारत और पाकिस्तान दोनों ही में इन हंगामों की आग धू-धू कर जलने लगी। सेना के विभाजन का परिणाम यह हुआ कि उसके अंदर खुद सांप्रदायिकता घुस गई। सैनिक, हंगामों को शांत करने की जगह स्वयं उसमें सम्मिलित हो गए। सेना और प्रशासन के अधिकारियों ने इन हंगामों को खूब बढ़ाने की कोशिश की।

पंजाब के ब्रिटिश गवर्नर सर फ्रांसिस मूडी ने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना के नाम 5 सितम्बर 1947 को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया- ‘मैं हर एक से कह रहा हूँ कि मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि सिक्ख सरहद कैसे पार कर रहे हैं। बड़ी बात यह है कि जितनी जल्दी हो उतनी ही जल्दी इनसे पिंण्ड छुड़ाया जाए।’

इन साम्प्रदायिक दंगों में पाकिस्तान और भारत दोनों में कितने आदमी मारे गए, कितने शरणार्थी बनाए गए, कितनी युवतियों का अपहरण किया गया और उन्हें नीलाम किया गया, इसका सही हिसाब देना किसी के लिए भी संभव नहीं।

केवल पंजाब में ऐसी घटनाओं का हिसाब निम्नलिखित था- ‘छः लाख मारे गए। 1,40,00,000 शरणार्थी बना दिए गए। दोनों पक्षों द्वारा 1,00,000 युवतियों का अपहरण किया गया, बलपूर्वक उनका धर्मांतरण किया गया और उन्हें नीलाम कर दिया गया। पंजाब और बंगाल को और फिर दोनों देशों को मिलाकर विचार करने पर ऐसी घटनाओं की संख्या दूने से कम न होगी।’

अंग्रेज अधिकारियों की दृष्टि में पश्चिमी-पंजाब में सांप्रदायिक दंगे अधिक भयानक थे जबकि मृतकों के आंकड़ों के अनुसार पूर्वी पंजाब में मुसलमानों ने बड़ी संख्या में हिन्दुओं एवं सिक्खों को मारा था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू एवं सिक्ख शरणार्थी

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जब पूर्वी पंजाब में हिन्दुओं एवं सिक्खों का कत्लेआम किया जाने लगा तो हिन्दू एवं सिक्ख शरणार्थी बनकर दिल्ली की ओर भागे। हिन्दुओं एवं सिक्खों के पुरखे एक ही थे। वे विगत लाखों सालों से इस देश में रह रहे थे। ंबंदर से इंसान बनने की प्रक्रिया उन्होंने भारत भूमि पर ही रहकर पूरी की थी। आज हिन्दू और सिक्ख शरणार्थी बनकर अपने ही देश में भटक रहे थे। अपने ही देश में उन्हें कोई पहचानने वाला नहीं था।

माइकल ब्रीचर ने लिखा है कि- ‘अफवाह, भय तथा उन्माद के कारण लगभग एक करोड़ बीस लाख लोगों की अदला बदली हुई जिनमें से आधे हिन्दू तथा आधे मुसलमान थे। एक साल समाप्त होने से पूर्व लगभग पाँच लाख लोग या तो मर गये या मार डाले गये। दिल्ली की गलियां शरणार्थियों से भर गयीं। ‘

मोसले ने लिखा है कि- ‘इस अदला बदली में छः लाख लोग मारे गये, एक करोड़ चालीस लाख लोग घरों से निकाले गये तथा एक लाख जवान लड़कियों का अपहरण हुआ या जबर्दस्ती उनको नीलाम किया गया। …… बच्चों की टांगों को पकड़ कर दीवारों पर पटक दिया गया, लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ और उनकी छातियां काट दी गयीं। गर्भवती औरतों के पेट चीर दिये गये।’

जिन्ना और लियाकत अली की नीति पर सवाल उठाते हुए अयोध्यासिंह ने लिखा है- ‘क्या जिन्ना या प्रधानमंत्री लियाकत अली ने पाकिस्तान में हिंदुओं और सिक्खों का कत्लेआम रोकने के लिए फौरन कदम उठाए? क्या उन्होंने साम्राज्यवाद के मूडी जैसे एजेंटों को फौरन निकाल बाहर किया? नहीं, उन्होंने उल्टे बढ़ावा दिया। हिंदुओं और सिक्खों को पाकिस्तान से निकाल बाहर करना चंद मुस्लिम सरमाएदारों और जमींदारों के इन चाकरों की नीति बन गई।’

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सिक्ख और हिन्दू शरणार्थियों का पहला जत्था पश्चिमी पंजाब से भारत आ गया था। ये पंजाब के लगभग 100 गांवों एवं शहरों से आए थे तथा इनकी संख्या लगभग बत्तीस हजार थी। ये लोग वीभत्स अत्याचार और अपमान सहकर जान हथेली पर रखे हुए भारत आए थे और उन्हें दिल्ली से 120 मील के फासले पर धूप और धूल के बीच भारत के प्रथम शरणार्थी शिविर में बसाया गया था। गांधीजी ने आग्रह किया कि वह उन शरणार्थियों से मिलना चाहेंगे और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को साथ चलना चाहिए। जब गांधी और नेहरू की गाड़ियां शरणार्थी शिविर में पहुंचीं तो क्रोध से चीखते हुए लोगों ने उन्हें घेर लिया।

अगस्त माह में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली ने एक खुली जीप में बैठक भारतीय-पंजाब एवं पाकिस्तानी-पंजाब के दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा किया। गांधीजी को पंजाब जाने का अवसर ही न मिला। उन्हें दिल्ली में रुक जाना पड़ा। घृणा और हिंसा की महामारियों का रोगाणु भारत की राजधानी दिल्ली तक पहुंच चुका था।

उधर गांधीजी ने कलकत्ता में अपना उपवास तोड़ा और इधर दिल्ली में आग सुलगनी शुरू हो गई। लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने आरोप लगाया है कि- ‘सिक्खों के अकाली दल और हिन्दुओं के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मिलकर दिल्ली को भी कौमी दंगों की लपटों में झौंक दिया।’

दिल्ली के मुसलमानों को, जिनमें से अधिकांश अब पाकिस्तान चले जाना चाहते थे, ऐसे शरणार्थी शिविरों में बसाया गया जो हिन्दुओं एवं सिक्खों के आक्रमणों से तो बचे हुए थे किंतु उस गंदगी से नहीं जिसके कारण बीमारियां उत्पन्न हो रही थीं और लोगों की जान ले रही थीं। हुमायूं के मकबरे और पुराने किले में डेढ़-दो लाख मुसलमान शरणार्थी बसाए गए। वे इस हद तक डरे हुए थे कि अपने मृतकों को दफनाने के लिए भी वे उन दीवारों से बाहर नहीं निकलते थे अपितु लाशों को ऊंची दीवारों से बाहर की तरफ गिरा दिया करते थे जिधर गिद्धों और कुत्तों द्वारा खा लिए जाते।

दिल्ली में ज्यों ही गांधी का आगमन हुआ, मुसलमान शरणार्थियों में नई जान पड़ गई। जब तक जिन्ना भारत में था, मुसलमानों ने हमेशा उसे अपना मसीहा माना। अब जब जिन्ना पाकिस्तान चला गया था, मुसलमानों ने उसके राजनीतिक दुश्मन गांधीजी को मसीहा मान लिया था।

आगामी दो महीनों तक पंजाब के मैदानों से गुजर रही त्रस्त मानवता के प्रचण्ड कारवां, लाल सिरों वाली छोटी-छोटी पिनों का रूप पाकर गर्वनमेंट-हाउस के नक्शों पर चींटी जैसी चाल से सकरते रहने वाले थे। पिनों के वे जरा-जरा से लालसिर, भयंकरतम, मानवीय पीड़ाओं के प्रतीक थे- ऐसी पीड़ाएं कि जिन्हें मनुष्य सहन नहीं कर सके, लेकिन जिन्हें मनुष्यों ने ही सहन किया।

शरणार्थियों की समस्या दुनिया में समय-समय पर पैदा होती रही है, जिसके कारण अनेक असाधारण और अविस्मरणीय दृश्य सामने आए हैं लेकिन क्या कोई दृश्य उस कारवां के नजदीक खड़ा हो सकता है जिसमें आठ लाख व्यक्ति चलते देखे गए थे? भारत-विभाजन का उपहार वह कारवां, मानव इतिहास का सबसे बड़ा कारवां था, जिसकी प्रचण्डता की कल्पना मात्र से दिल बैठने लगता है।

छोटे-बड़े अनेक कारवां इधर से उधर और उधर से इधर सरक रहे थे। प्रत्येक कारवां की प्रगति के अनुसार गवर्नमेंट हाउस के उन नक्शों पर लालसिरों वाली पिनों को धीरे-धीरे सरकाया जाता रहता। हर सुबह सरकारी हवाई जहाज अपनी निरीक्षण उड़ानों पर उड़ते। भोजन और दवा के नाम पर जो भी उपलब्ध हो सकता, उसे वे उन कारवांओं पर गिराते। लूट-खसोट न मच जाए, इसलिए हर प्रमुख कारवां के साथ सुरक्षा सैनिक चलते थे।

वे बंदूक की नोक पर ही हर चीज के बंटवारे का प्रयास करते। धीमे-धीमे सरकते कारवां को आसमान से देखना एक ऐसा अनुभव था जिसे वे पायलट कभी न भूल सके। एक पायलट ने लिखा है कि वे दो सौ मील प्रति घण्टे की गति से पूरे पन्द्रह मिनट तक उड़ता रहा किंतु कारवां के इस छोर से उस छोर तक नहीं पहुंच सका। दिन के वक्त कारवां के चलने से धूल की लम्बी लकीर आसमान की तरफ उठने लगती। हजारों गाय-भैंस-बैलगाड़ियां और ऊँट गाड़ियां इन कारवाओं के साथ चलतीं और धूल उड़ातीं।

रात को हिन्दू एवं सिक्ख शरणार्थी ठहर जाते थकान और भूख के मारे। हर परिवार अपनी-अपनी आग जलाता, ताकि जो भी रूखा-सूखा तैयार हो सकता है उससे पेट की आग बुझ जाए। धूल की बजाए अब धुएं की लकीर आसमान की तरफ उठने लगती। लम्बी और ऊंची लकीर जो आगे-पीछे सरकती न हो, एक ही जगह खड़ी-खड़ी उठ रही हो और जिसकी तली में धधक रही हो आग……..।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शरणार्थियों के कारवां

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भारत के विभाजन के बाद शरणार्थियों के कारवां पूर्व से पश्चिम की ओर तथा पश्चिम से पूर्व की ओर जाते हुए दिखाई देने लगे। हिन्दू एवं सिक्ख शरणार्थियों के कारवां मुस्लिम शरणार्थियों के कारवां की अपेक्षा अधिक बड़े होते थे। हन्दू एवं सिक्ख शरणार्थियों के कारवां कितने बड़े थे, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इनमें से एक कांरवां में लगभग आठ लाख शरणार्थी चल रहे थे जिनकी सुरक्षा के लिए भारतीय सेना के हैलिकॉप्टर हर समय उड़ते रहते थे।

कैप्टेन एटकिन्स और उसके गोरखा सैनिकों ने शरणार्थियों की सुरक्षा के पीछे अनेक सप्ताह व्यतीत किए। हिन्दुओं का कारवां भारत में जाते और मुसलमानों के कारवां को पाकिस्तान तक पहुंचाते। ……. शरणार्थी रवानगी के समय प्रसन्न दिखाई देते फिर ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते, त्यों-त्यों भूख-प्यास और थकान के मारे बेहाल हो जाते। भीषण गर्मी उनसे सहन नहीं होती। उन्हें डर सा लगने लगता कि यह देशान्तर यात्रा कभी खत्म होगी भी या नहीं?

छोटी-से छोटी चीज का वजन भी उन्हें भारी पड़ने लगता। एक-एक करके वे चीजें फैंकना शुरू करते। अंत में जब वे अपनी मंजिल तक पहुंचते, उनके पास कुछ भी शेष नहीं रहता। बिल्कुल कुछ नहीं। सबसे दुर्भाग्यशाली वे होते जो अपनी देशान्तर यात्रा पूरी कर ही न पाते। बूढ़े, बीमार और बच्चे जल्दी थक जाते। जिन मां-बापों की शक्तियां इतना साथ न देती कि वे बच्चों को उठाकर आगे बढ़ते रह सकें, वे उन्हें रास्ते में ही त्यागकर खुद कारवां के साथ निकल जाते।

ऐसे बच्चे भूख-प्यास से तड़प कर मरते। चलते करवां में से अचानक वृद्ध अलग निकल जाते। वे रास्ते के निकट किसी छाया की खोज करते जिसकी शांति में बैठकर वे अपने कष्टपूर्ण जीवन के अंत की प्रतीक्षा कर सकें। इन कारवाओं के साथ चल रहे सैनिकों को अपने स्टेशन वैगनों में गर्भवती स्त्रियों के प्रसव भी करवाने पड़ रहे थे। प्रसव के तुरंत बाद अपने नवजात शिशु को लेकर वह स्त्री भारत या पाकिस्तान की दिशा में पैदल चल देती।

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कारवां अपने पीछे लाशों की जो गंदगी छोड़ जाते, उसका वर्णन कठिन है। लाहौर से अमृतसर के बीच की 45 मील लम्बी सड़क पर से अनेक कारवां गुजरे। वह पूरी सड़क खुली कब्र में बदल गई। इस सड़क पर भयानक दुर्गंध आती थी। …… गिद्ध लाशें खा-खाकर इतने भारी हो गए थे कि उड़ भी नहीं सकते थे। जंगली कुत्तों को स्वाद का ऐसा नशा पड़ गया कि वे लाशों के केवल यकृत खाते, बाकी अंगों को छोड़ देते।

भारत विभाजन के समय पूर्वी पंजाब से बीकानेर आए ऐसे ही एक परिवार की सदस्य श्रीमती कैलाश वर्मा ने मुझे बताया था कि लोगों में अपने दुधमुँहे शिशुओं को अपने साथ लाने की चाहत अंत तक समाप्त नहीं होती थी किंतु जब उन्हें भूख, बीमारी, अशक्तता आदि के कारण बच्चों को लेकर चल पाना असंभव हो जाता तो वे अपने लड़के को गोदी से उतार कर जीवित ही सड़क के किनारे छोड़ देते ताकि यदि ईश्वर ने उसके भाग्य में जिंदगी लिखी हो तो वह जिंदा बच जाए किंतु गोद से उतारी हुई लड़की को धरती पर रखकर उसका गला अपने पैरों से दबा देते थे ताकि उसे बड़ी होकर वेश्यावृत्ति न करनी पड़े।

लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने आरोप लगाया है कि सिक्खों के आक्रमण सबसे भयानक हुआ करते थे। उनके जत्थे गन्ने और गेहूं के खेतों में से अचानक प्रकट होकर, भयंकर चीत्कार के साथ, कारवां के उस हिस्से पर टूट पड़ते, जहाँ सुरक्षा प्रबंध सबसे कमजोर होता। कारवां के जो लोग लड़खड़ा कर पीछे रह जाते, उन पर भी वे भयानक आक्रमण करते।

कई बार हिन्दुओं और मुसममानों के कारवां आमने सामने से एक ही सड़क पर पार होने लगते। तब उनका व्यवहार कैसा रहेगा, पहले से कोई अनुमान नहीं लगा सकता। घृणा की आग में झुलसते वे लोग एक-दूसरे पर टूट पड़ते और उन्हें छुड़ाना कठिन हो जाता। इन आपसी झगड़ों में लाशें तक गिर जातीं। कई बार एक दूसरे को पार करते मुसलमान हिन्दुओं को बताते और हिन्दू भी मुसलमानों को बताते कि वे अपने पीछे कौन-कौन सी जगहें खाली छोड़ आए हैं कि जहाँ आप लोग जाकर कब्जा जमा लें।

विभिन्न अनुमानों के अनुसार इन दंगों में 5 लाख लोग मारे गए। 1,20,00,000 लोगों को जन-धन की हानि हुई। इस दौरान पूरे देश में स्थान-स्थान पर बलवे, अग्निकाण्ड, स्त्रियों के अपहरण एवं लूट-मार हो रही थी। जस्टिस जी. डी. खोसला ने अपनी पुस्तक ‘स्टर्न रैकनिंग’ में पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त, सिन्ध और बंगाल में हो रहे बलवों इत्यादि का स्पष्ट चित्र चित्रित किया है। कांग्रेस के नेता जो अंतरिम सरकार में पहुंचे थे, अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं कर सके। वे इस पद के सर्वथा अयोग्य थे।

न्यायाधीश जी. डी. खोसला जिन्हें उन हत्याकाण्डों और विपदाओं का प्रमुख अध्येता माना जाता है, के अनुमान के अनुसार 16 अगस्त 1946 से ई.1947 के अंत तक 10 लाख लोगों की हत्या हुई थी। इंग्लैण्ड के दो प्रमुख इतिहासकारों पेण्डरल मून और एच. वी. हडसन ने क्रमशः 2 लाख और 2..5 लाख मौतें होने का अंदाजा लगाया। शरणार्थियों के काफिले तब तक आते रहे जब तक कि 1 करोड़ 50 लाख शरणार्थियों का आवागमन पूरा नहीं हो गया।

बंगाल की सरहद अपेक्षाकृत शांत रही जहाँ 10 लाख व्यक्ति शरणार्थी बनकर इस पार से उस पार आए-गए। इस तबाही के कारण भारत के सभी प्रमुख नेताओं एवं अंतिम वायसराय को पूरे विश्व में कटुतम आलोचना का सामना करना पड़ा। केवल 55 हजार सैनिकों की पंजाब बाउण्ड्री फोर्स उन दंगों को काबू में रखने के लिए इतनी संक्षिप्त थी कि उस सेना के निर्माता लॉर्ड माउण्टबेटन एवं उनके सलाहकारों की अदूरदर्शिता पर सभी इतिहासकार आश्चर्य करते रहे गए।

…… पंजाब के दंगे चाहे कितने प्रचण्ड रहे हों, कुल मिलाकर उन्होंने भारत की सम्पूर्ण आबादी के केवल दसवें हिस्से को प्रभावित किया और वे पंजाब के अलावा अन्य प्रांतों में प्रायः नहीं फैल सके। शरणार्थियों के कारवां रक्त की नदी में तैरकर हिन्दुस्तान की तरफ आते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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