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नदी जल विभाजन – पाकिस्तान का पानी खतरे में

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जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो केवल जनसंख्या एवं भूमि का ही बंटवारा नहीं हुआ, नदियों का बंटवारा भी हुआ किंतु पाकिस्तान ने जिस तरह भूमि के बंटवारे को विवादास्पद बना दिया, उसी प्रकार नदी जल विभाजन को भी विवादास्पद बना दिया।

जबकि वास्तविकता यह थी कि जितनी जनसंख्या पाकिस्तान को मिली थी उसके अनुपात में पाकिस्तान को भूमि भी अधिक मिली थी और नदी जन विभाजन भी पिकस्तान के पक्ष में हुआ था। अविभाजित भारत में हुई 1941 की जनगणना रिपोर्ट में कहा गया था कि सिंधु नदी जल प्रणाली पर 4.60 करोड़ जनसंख्या निर्भर करती है।

रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हुए विभाजन के बाद इसमें से 2.50 करोड़ जनसंख्या पाकिस्तान में चली गई तथा 2.10 करोड़ जनसंख्या भारत में रह गई। …… इस विभाजन के बाद सतलज, रावी और व्यास नदियों से निकलने वाली नहरों के हैडवर्क्स तथा इन नदियों से निकलने वाली 25 में से 20 नहरें भारत में रहीं। एक नहर भारत और पाकिस्तान दोनों के क्षेत्रों में बहती है। भारत चाहता तो पाकिस्तान को जाने वाली समस्त नहरों का पानी रोक सकता था किंतु भारत ने ऐसा नहीं किया।

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20 दिसम्बर 1947 को पाकिस्तान एवं भारत के अभियंताओं के बीच नदी जल विभाजन के लिए इन नहरों के सम्बन्ध में एक यथास्थिति समझौता हुआ जिसकी अवधि 31 मार्च 1948 को समाप्त होनी थी। इसके बाद नया समझौता किया जाना था किंतु वह नहीं हुआ। जिस दिन समझौता समाप्त हुआ, भारत ने उसी दिन दो महत्वपूर्ण नहरों में पानी की आपूर्ति बंद कर दी और एक नया स्थाई समझौता किए जाने की मांग की। पानी की आपूर्ति पुनः एक माह बाद आरम्भ हुई जब दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति हुई कि पाकिस्तान को दूसरे विकल्प का समय दिए बिना पानी की आपूर्ति बंद नहीं की जाएगी।

भारत के नेता नदी जल विभाजन को एक तकनीकी समस्या मानते थे किंतु पाकिस्तान के नेताओं ने इसे पाकिस्तान की कृषि बर्बाद करने की भारतीय साजिश माना। भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार पुनः यथास्थिति बनाए रखने का अस्थाई समझौता हो गया किंतु स्थाई समझौता होना आवश्यक था। इसलिए विश्व बैंक के अध्यक्ष की मध्यस्थता स्वीकार की गई।

विश्व बैंक के अध्यक्ष यूजीन ब्लैक ने इस समस्या के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन किया जिसमें भारत, पाकिस्तान एवं विश्वबैंक के अभियंता सम्मिलित किए गए। इस समिति ने 5 जून 1954 को भारत एवं पाकिस्तान को निम्नलिखित सुझाव दिए-

(1) सिंधु, झेलम और चिनाव के सारे जल का उपयोग पाकिस्तान को करने दिया जाए तथा झेलम नदी के उस जल को जो काश्मीर में उपयोग में लाया जाता है, उसे भारत को उपयोग में लेने दिया जाए।

(2) सतलज, रावी और व्यास का समस्त जल भारत को उपयोग में लेने दिया जाए। उसमें से कुछ जल भारत 5 वर्ष तक पाकिस्तान को दे।

(3) प्रत्येक देश अपनी भूमि में बांध इत्यादि बनाएगा परंतु योजक नहरों का खर्च भारत उस सीमा तक सहन करेगा, जहाँ तक उसका लाभ भारत को मिलेगा। यह खर्च 40 से 60 लाख के बीच आता है।

(4) विश्व-बैंक की समिति के अनुसार भारत को अपनी 2 लाख एकड़ भूमि के लिए सिंधु नदी जलक्षेत्र का 20 प्रतिशत जल मिलना था। पाकिस्तान को अपनी 4 लाख एकड़ भूमि के लिए 80 प्रतिशत जल मिलना था।

इस समिति की सिफारिशों को मानने से भारत को बहुत हानि होने वाली थी तथा पाकिस्तान को बहुत लाभ होने वाला था क्योंकि योजक नहरों का निर्माण भारत को करना था और उसे केवल 20 प्रतिशत जल मिलना था साथ ही भारत को चिनाव नदी के जल से सदा के लिए वंचित कर दिया गया था। इसके बावजूद भारत ने इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया जबकि पाकिस्तान ने बहुत सारी ना-नुकर एवं शर्तों के साथ 5 अगस्त 1954 को इन प्रस्तावों को स्वीकार किया।

विश्व-बैंक समिति द्वारा प्रस्तावित इस समझौते को स्वीकार करने के बाद पाकिस्तान ने भारत में सतलुज नदी पर बन रहे भाखड़ा बांध पर आपत्ति खड़ी कर दी एवं विश्व-बैंक से भारत द्वारा समझौते के उल्लंघन की शिकायत की। विश्व-बैंक ने इस शिकायत की जांच की तो पाया कि इस बांध की योजना ई.1920 में बनी थी तथा ई.1946 से इस बांध पर काम चल रहा था।

ई.1952 में गठित विश्व-बैंक समिति को भी इस बांध के बारे में बताया गया था तथा इसका निर्माण समझौते के अंतर्गत ही हो रहा है। ई.1957 में जब सुहरावर्दी पाकिस्तान का प्रधानमंत्री था, उसने नहरों के जल-बंटवारे को लेकर एक बार फिर से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

1 जून 1957 को सुहरावर्दी ने एसोसिएटेड प्रेस को दिए गए साक्षात्कार में कहा-

‘हम पर भारत की पकड़ के दो शिकंजे नहरी जल एवं काश्मीर हैं। …… भारत ने बांध बना लिए हैं तथा सतलुज एवं दो अन्य नदियों जो पाकिस्तान के पश्चिमी भाग में सिंचाई हेतु जल की आपूर्ति करती हैं, को काट देने का भारत का इरादा है। ऐसा करने के लिए वे अगले वर्ष तैयार रहेंगे। काश्मीर से निकलने वाली तीन नदियों के जल को भी वे नियंत्रित कर सकते हैं।

भारत दावा करता है कि उसे राजस्थान के रेगिस्तान को सिंचित करने के लिए पानी चाहिए। वे पाकिस्तान से कहते हैं कि जल में आने वाली कमी की पूर्ति काश्मीर से निकलने वाली तीनों नदियों के पानी की आवक से कर लें। इसके लिए खर्चीले बांधों एवं नहरों की आवश्यकता होगी, परन्तु मैं नहीं सोचता कि इस योजना के लिए वे हमें कुछ भी चुकाने का सच्चा इरादा रखते हैं।’

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि पाकिस्तान का प्रधानमंत्री सुहरावर्दी बड़ी बेशर्मी के साथ भारत से निकलने वाली नदियों के पानी को पाकिस्तान में काम लेने के लिए, न केवल भारत में बनने वाली योजक नहरों एवं बांधों के लिए पैसा मांग रहा था अपितु बड़ी बेशर्मी और ढिठाई के साथ उसे पाकिस्तान में बनने वाले बांधों एवं नहरों के लिए भी भारत से पैसा चाहिए था।

इस पर टिप्पणी करते हुए भारतीय सिंचाई मंत्री एस. के. पाटिल ने एक वक्तव्य दिया-

‘सुहरावर्दी ने इसे अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है कि वे नहरी जल-विवाद के बारे में सभी तथ्य एवं सत्य को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करेंगे।’

30 अक्टूबर 1958 को कराची में एक समाचारपत्र सम्मेलन में पाकिस्तान के नए सैनिक शासक जनरल अयूब खाँ ने काश्मीर एवं नहरी जल मसलों पर भारत के साथ युद्ध छेड़ने की धमकी दी। उसने यह भी कहा-

‘पाकिस्तान की जल समस्या के निपटारे के लिए बनी परियोजनाओं को पूरा होने के लिए 10 से 15 वर्ष लगेंगे। अतः इस अवधि में भारत को उसे जल देना चाहिए तथा इन योजनाओं का व्यय भी वहन करना चाहिए। पानी की जो मात्रा हमें अब तक मिलती रही है, वह मिलती रहनी चाहिए अन्यथा हमारी भूमि बंजर हो जाएगी। हमारे पास जो भी संभव है, उसके लिए अन्य रास्ता अपनाने के अतिरिक्त हमारे पास और कोई विकल्प नहीं रहेगा।’

बेशर्मी के मामले में पाकिस्तानी सैनिक शासक अयूब खाँ प्रधानमंत्री सुहरावर्दी से भी मीलों आगे निकल गया था। वह न केवल पाकिस्तान में बनने वाली नहरों एवं बांधों के लिए भारत से धनराशि मांग रहा था अपितु उसके लिए युद्ध छेड़ने की धमकी भी दे रहा था। यह तो पिण्डारियों की भाषा थी जिन्हें ई.1818 में अंग्रेजों ने कुचलकर पूरे भारत से मिटा दिया था। लगता था अब वही भाषा एक बार फिर से, पाकिस्तान में प्रकट हो रही थी।

भारत के अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बनाए गए दबाव के बाद 17 अप्रेल 1959 को वाशिंगटन में नहरी जल के सम्बन्ध में एक नए अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर हुए। 6 एवं 7 मई 1959 को भारतीय संसद में इस समझौते की जानकारी देते हुए भारत के सिंचाई एवं ऊर्जा मंत्री एम. एम. इब्राहीम ने कहा कि दोनों देशों की सरकारों ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया है तथा यह विश्वास दिलाया है कि इस समझौते से राजस्थान नहर का कार्य प्रभावित नहीं होगा।

19 सितम्बर 1960 को कराची में जनरल अयूब एवं भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के मध्य सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते की मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं-

1. भारत को तीन पूर्वी नदियों- सतलुज, रावी और व्यास के पानी का प्रयोग करने का पूर्ण अधिकार होगा।

2. पाकिस्तान को पश्चिम की तीन नदियों- झेलम, चिनाव एवं सिन्धु के पानी के पूर्ण प्रयोग का अधिकार होगा।

3. विश्व बैंक और 6 मित्र राष्ट्र अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड और पश्चिमी जर्मनी, भारत एवं पाकिस्तान दोनों के योजक नहरों के निर्माण हेतु 1977 तक धन देंगे। तब तक के लिए भारत पाकिस्तान को यथावत् पानी देना जारी रखेगा।

4. भारत ने पाकिस्तान को नई नहरें एवं बांध निर्माण हेतु 100 करोड़ रुपया देना स्वीकार किया।

5. पाकिस्तान को जो पानी मिलेगा, उसकी अवधि पाकिस्तान की प्रार्थना पर बढ़ाई भी जा सकती है परन्तु उसी अनुपात में दी जाने वाली धनराशि की मात्रा में कमी हो सकती है।

भारत-विभाजन के साथ ही पाकिस्तान से चल रहे गम्भीर जल-विवाद के उपरांत भी भारत सरकार की ढिलाई के कारण पिछले बहत्तर सालों से भारत के हिस्से का पानी पाकिस्तान की तरफ बहने वाली नदियों एवं नहरों में बहता रहा है जिसके कारण भारत के पंजाब, हरियाणा एवं दिल्ली आदि राज्यों की जनता प्रादेशिक नदी-जल समझौतों के अनुसार जल की मात्रा प्राप्त करने में असमर्थ है एवं दिल्ली सरकार पर दबाव बनाकर अधिक जल प्राप्त करने तथा दूसरे प्रांत को जल न देने के लिए संघर्षरत है।

भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान की ओर से हुए उरीएवं पुलमावा आतंकवादी हमलों के बाद भारत की पुरानी नीति में बदलाव करते हुए भारत की जनता से वायदा किया है कि वे पाकिस्तान के साथ हुए नदी जल विभाजन समझौते के अनुसार पाकिस्तान को जल जाने देंगे। भारत की नदियों से पाकिस्तान को जा रहे अतिरिक्त जल में से भारतीयों के हिस्से के जल को पाकिस्तान की ओर बहने से रोकेंगे।

यदि ऐसा हुआ तो पंजाब, दिल्ली, हरियाणा एवं राजस्थान की तरफ बहने वाली नदियों एवं नहरों में पर्याप्त जल बहने लगेगा तथा उत्तर-पश्चिमी भारत की जनता को सिंचाई एवं पेयजल के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध हो सकेगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाकिस्तान की सेना ही पाकिस्तान का सबसे बड़ा शत्रु

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जब से पाकिस्तान अस्तित्व में आया है, वह भारत को अपना सबसे बड़ा शत्रु बताता है तथा भारत से दो बड़ी लड़ाइयां एवं कई बार छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ चुका है। वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान की सेना ही पाकिस्तान का सबसे बड़ा शत्रु है।

भारत विभाजन के समय पाकिस्तान को भारत के 17.5 प्रतिशत राजस्व स्रोत मिले जबकि सेना का 33 प्रतिशत हिस्सा मिला। अखण्ड भारत की थलसेना का 33 प्रतिशत, नौसेना का 40 प्रतिशत और हवाई सेवा का 20 प्रतिशत मिला। इस कारण ई.1948 में पाकिस्तान के पहले बजट में विशालाकाय सेना के रख-रखाव एवं वेतन-भत्तों के लिए 75 प्रतिशत हिस्सा समर्पित करना पड़ा।

……. इस विशाल सेना को नियंत्रण में रखने के लिए किसी बड़े खतरे का भय दिखाना और सेना को उस खतरे में उलझाये रखना आवश्यक था, अन्यथा यह सेना अपने ही देश के नेताओं और जनता पर कब्जा कर लेती।

जबकि दूसरी ओर पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष इस बड़ी सेना के बल पर पाकिस्तान पर शासन करने का सपना देखने लगे। यही कारण था कि पाकिस्तानी सेना के पहले कमाण्डर इन चीफ अय्यूब खाँ ने यह कहना शुरू कर दिया कि भारत की ब्राह्मणवादी राष्ट्रीयता और अहंकार के कारण पाकिस्तान के निर्माण की जरूरत पड़ी। इसलिए पाकिस्तान की रक्षा के लिए पाकिस्तान को एक बड़ी सेना की आवश्यकता है। इस प्रकार वह पाकिस्तान की गैर-आनुपातिक सेना को कम करने की बजाए, और अधिक बढ़ाने में जुट गया।

तख्ता पलट से बनती हैं पाकिस्तान में सरकारें

अंतराष्ट्रीय पत्रकारिता जगत में पाकिस्तान के लिए विख्यात है कि पाकिस्तान को अल्लाह, आर्मी और अमेरिका चलाते हैं। आर्मी के वर्चस्व के कारण पाकिस्तान में सरकारों के तख्ता-पलट का लम्बा इतिहास रहा है। ई.1951 में भारत का पूर्व नौकरशाह सर गुलाम मुहम्मद पाकिस्तान का गवर्नर जनरल बना। उसके कार्यकाल में ई.1954 में पाकिस्तान में प्रांतीय विधान सभाओं के लिए चुनाव हुए जिनमें सत्तारूढ़ दल बुरी तरह हार गया।

इस कारण 25 दिसम्बर 1954 को गुलाम मुहम्मद ने संविधान सभा को भंग कर दिया। उसका तर्क था कि जब गवर्नर जनरल जिन्ना सूबे की विधानसभाओं को भंग कर सकते थे तो निश्चित रूप से उनके उत्तराधिकारी भी संघीय संरचनाओं को भंग कर सकते हैं। सत्ता के इस संघर्ष के बीच पाकिस्तान ने मार्शल लॉ का स्वाद पहली बार तब चखा जब एक व्यापक नरसंहार के बाद देश के अहमदिया समुदाय के लोगों को खदेड़ने का अभियान शुरू हुआ।

23 मार्च 1956 से देश में नया संविधान लागू हुआ जिसके माध्यम से पाकिस्तान ने स्वयं को ब्रिटिश कॉमनवैल्थ के अंतर्गत मिले डोमिनियन स्टेटस से मुक्त करके इस्लामिक रिपब्लिक स्टेट घोषित कर लिया। इस संविाधान में देश के लिए संसदीय प्रणाली स्वीकार की गई तथा प्रावधान किया गया कि ई.1959 के आरम्भ में पाकिस्तानी संसद के लिए पहले आम चुनाव करवाए जाएंगे। गवर्नर जनरल का पद समाप्त करके राष्ट्रपति का पद सृजित किया गया।

संसद के नेता को प्रधानमंत्री बनाना प्रस्तावित किया गया जिसे राष्ट्रपति के नीचे रहकर देश का शासन चलाना था। इससे पहले कि पाकिस्तान में आम चुनाव हों, सितम्बर 1958 में सरकार के तख्ता पलट का इतिहास तब एक बार पुनः दोहराया गया जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति मेजर जनरल इस्कंदर मिर्जा ने पाकिस्तान के तत्कालीन संविधान को स्थगित करके प्रधानमंत्री फिरोज खान नून को गद्दी से उतार दिया तथा देश में मिलिट्री शासन की घोषणा कर दी।

मिर्जा द्वारा नियुक्त मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर अय्यूब खान ने 13 दिन बाद अर्थात् 7 अक्टूबर 1958 को राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा का तख्ता पलट दिया और स्वयं को राष्ट्रपति घोषित कर दिया। जनरल अयूब खान ने पूरे 9 साल पाकिस्तान पर शासन किया।

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1 मार्च 1962 से देश में नए संविधान की घोषणा की गई तथा पाकिस्तान को रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान घोषित किया गया। देश में राष्ट्रपति शासन प्रणाली स्वीकार की गई तथा मतदान के लिए अप्रत्यक्ष प्रणाली का प्रावधान किया गया। नए संविधान के तहत 2 फरवरी 1965 को पाकिस्तान में राष्ट्रपति के चुनाव करवाए गए। इन चुनावों में हुई धांधली के बाद राष्ट्रपति अयूब खान को ही फिर से राष्ट्रपति घोषित किया गया। इस प्रकार देश का शासन हमेशा के लिए सेना की छत्रछाया में चला गया। आज भी पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई ही देश पर शासन करती हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के जज, सेना के हाथों की कठपुतली होते हैं।

ई.1969 में जनरल याह्या खाँ ने अयूब खाँ का तख्ता पलट दिया तथा स्वयं राष्ट्रपति बन गया। उसने ई.1970 में देश में पहले आम चुनाव करवाए किंतु चुनाव परिणाम आने के बाद सरकार बनवाने में आनाकानी करता रहा। अंत में 7 दिसम्बर 1971 को नूरूल अमीन की सरकार बनी किंतु यह सरकार केवल 13 दिन ही शासन कर सकी।

ई.1973 में जुल्फिकार अली भुट्टो को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवाई गई। उसने यूएनओ में वक्तव्य दिया कि वे भारत से एक हजार साल तक लड़ने के लिए तैयार हैं। भुट्टो ने अपने विश्वस्त सैनिक अधिकारी जनरल जियाउल हक को पाकिस्तानी सेना का प्रमुख बनाया किंतु उसने भुट्टो के साथ गद्दारी करके 4 जुलाई 1977 को भुट्टो को उसकी पार्टी के सदस्यों सहित गिरफ्तार करके नेशनल एसेंबली भंग कर दी और स्वयं राष्ट्रपति बन गया।

यह पाकिस्तान के इतिहास में सबसे लंबे समय तक चलने वाला मार्शल लॉ था। जियाउल हक ने जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटका दिया। ई.1988 में जियाउल हक की एक विमान हादसे में मौत हो गई।

इसके बाद ई.1988 में मरहूम जुल्फिकार अली भुट्टो द्वारा स्थापित पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी दुबारा सत्ता में आई और जुल्फिकार अली भुट्टो की पुत्री बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी। दो साल बाद 1990 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति ग़ुलाम इशाक ख़ान ने भुट्टो सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया।

उसके बाद 1 नवम्बर 1990 से 18 जुलाई 1993 तक नवाज शरीफ की सरकार अस्तित्व में रही। यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। ई.1993 से ई.1996 तक बेनजीर भुट्टो दूसरी बार देश की प्रधानमंत्री रही किंतु वह इस बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। ई.1997 के आम चुनावों में पुनः नवाज शरीफ की जीत हुई और 17 फरवरी 1997 से 12 अक्टूबर 1999 तक वह दूसरी बार प्रधानमंत्री के पद पर रहा।

नवाज शरीफ ने जनरल परवेज मुशर्रफ को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाया। अक्टूबर 1999 में जब परवेज मुशर्रफ श्रीलंका यात्रा पर गया हुआ था, नवाज शरीफ ने उसे अपदस्थ करके जनरल अजीज को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ नियुक्त किया। नवाज शरीफ यह नहीं जानता था कि जनरल अजीज परवेज मुशर्रफ का विश्वस्त है। जनरल परवेज मुशर्रफ ने श्रीलंका से लौटकर नवाज शरीफ और उसके मंत्रियों को गिरफ्तार करके जेल में ठूंस दिया और स्वयं राष्ट्रपति बन गया।

उसी वर्ष अर्थात् ई.1999 में भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो ने भी पाकिस्तान छोड़ दिया और संयुक्त अरब इमारात के नगर दुबई में जाकर रहने लगी। पाकिस्तान की सैनिक सरकार ने भुट्टो पर लगे भ्रष्टाचार के विभिन्न आरोपों की जाँच की और बेनजीर भुट्टो को दोष मुक्त कर दिया । 18 अक्टूबर 2007 को बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान लौटी। उसी दिन कराची में एक रैली के दौरान बेनजीर भुट्टो पर दो आत्मघाती हमले हुए जिनमें 140 लोग मारे गए किंतु बेनज़ीर बच गई किंतु 27 दिसम्बर 2007 को एक चुनाव रैली में बेनजीर की हत्या कर दी गई।

ई.2000 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार के मामले में दोषी घोषित किया। इस आधार पर परवेज मुशर्रफ नवाज शरीफ को भुट्टो की तरह फांसी पर चढ़ाना चाहता था किंतु सऊदी अरब और अमेरिका ने हस्तक्षेप करके नवाज शरीफ को फांसी पर चढ़ने से बचाया। इस पर मुशर्रफ ने शरीफ को पाकिस्तान से बाहर निकाल दिया। नवाज शरीफ लगभग सात साल तक जेद्दा में रहा।

10 सितम्बर 2007 को नवाज शरीफ पुनः पाकिस्तान लौटा किंतु उसे हवाई-अड्डे से ही तुरन्त जेद्दा वापस भेज दिया गया। वर्ष 2011 में नवाज शरीफ को पाकिस्तान आने की अनुमति मिली और 5 जून 2013 को वह तीसरी बार पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बना। ई.2016 में पानमा पेपर लीक में नाम आने के बाद पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री के पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया।

इस कारण 28 जुलाई 2017 को नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद से हटाना पड़ा। तब से नवाज शरीफ पुनः जेल में दिन बिता रहा है। उस पर पाकिस्तान से बाहर जाने पर रोक लगा दी गई है। 18 अगस्त 2018 को इमरान खाँ पाकिस्तान का बाईसवां प्रधानमंत्री बना। वह भी सेना के हाथों की कठपुतली से अधिक कुछ भी नहीं है।

राजनीतिक हत्याओं की स्थली पाकिस्तान

पाकिस्तान राजनीतिक हत्याओं एवं संदेहास्पद परिस्थितियों में मृत्यु की स्थली है। पाकिस्तान बनने के कुछ माह बाद प्रथम गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना की मृत्यु उपेक्षा एवं टीबी से हुई। ई.1951 में पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खाँ की हत्या हुई। उसके बाद याह्या खाँ, जुल्फिकार अली भुट्टो, जनरल मुहम्मद जियाउल हक तथा बेनजीर भुट्टो आदि पाकिस्तानी राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री आतंकवादी गतिविधियों, राजनीतिक हत्याओं एवं फांसी आदि के माध्यम से मारे गए।

पुस्तक लिखे जाते समय पूर्व-प्रधानमंत्री नवाज शरीफ, पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी तथा सैनिक तानाशाह से राष्ट्रपति बना परवेज मुशर्रफ पाकिस्तानी जेलों में बंद हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं की हत्या

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जिस समय पाकिस्तान का निर्माण हुआ, उस समय पंजाब के विभाजन से पश्चिमी पाकिस्तान अस्तित्व में आया तथा बंगाल के विभाजन से पूर्वी पाकिस्तान बना। पाकिस्तान बनने के बाद पश्चिमी पाकिस्तान की तरह पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं की हत्या का लम्बा सिलसिला चला।

ई.1947 में जिस समय उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत से लेकर पंजाब एवं सिन्ध तक के भू-भाग में मारकाट मची, उस समय भारत की पूर्वी सीमा अर्थात् बंगाल अपेक्षाकृत शांत रहा था।

जहाँ विभाजन के समय पंजाब एवं सिंध में धर्म के आधार पर भगदड़ एवं मारकाट मची थी, वहीं बंगाल में मारकाट का आधार धर्म के साथ-साथ भाषाई भी था। इस कारण पूर्वी-पाकिस्तान में रह रहे बिहारी मुसलमानों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। इतिहास ने उन्हें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ उन्हें पैर रखने के लिए धरती कम पड़ गई थी।

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जब पूर्वी-पाकिस्तान में हिन्दुओं को सताया जाता था अथवा मारा जाता था तो वे भारत की ओर भागने का प्रयास करते थे किंतु जब पूर्वी पाकिस्तान के उर्दू बोलने वाले बिहारी मुसमलमानों को बंग्ला-भाषी मुसलमानों द्वारा सताया जाता था या मारा जाता था, तो उन्हें ऐसे देश की तरफ भागना पड़ता था जहाँ से वे अथवा उनके धर्म के लोग कुछ समय पूर्व ही धर्म के आधार पर भाग कर आए थे। इस प्रकार पूर्वी-पाकिस्तान में भयानक मारकाट मच गई।

बहुत से इतिहासकार इस शांति का श्रेय गांधीजी को देते हैं किंतु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि बंगाल ई.1946 के उत्तरार्ध में सीधी कार्यवाही एवं उसके बाद हुए रक्तपात में खून की होली खेलकर निबटा ही था इसलिए बंगाल के हिन्दू और मुसलमान 1947 के विभाजन के समय एक-दूसरे के विरुद्ध हथियार उठाने की स्थिति में नहीं आ पाए थे और जिन्हें पश्चिमी बंगाल से पूर्वी-पाकिस्तान में जाना था या पूर्वी-पाकिस्तान से पश्चिमी बंगाल में आना था, सामान्यतः बिना रक्तपात करे हुए आ गए किंतु जैसे ही एक-दो वर्ष का समय व्यतीत हुआ, पूर्वी-पाकिस्तान में असंतोष एवं हिंसा की लहर फूट पड़ी।

बंग्ला-भाषी मुसलमान एक ओर तो बंग्ला-भाषी हिन्दुओं को मारकर भगा रहे थे तो दूसरी ओर उर्दू-भाषी बिहारी मुसलमानों को। पूरा पूर्वी-पाकिस्तान खून से भीग गया और पश्चिमी बंगाल जान बचाकर भाग आने वाले शरणार्थियों से भर गया।

श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा बांग्लादेश से भूमि की मांग

8 अप्रेल 1950 को शरणार्थी समस्या के समाधान के लिए नेहरू-लियाकत समझौता हुआ। इसे दिल्ली समझौता भी कहते हैं। इस समझौते के अनुसार दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने अल्पसंख्यकों की रक्षा करने एवं साम्प्रदायिक उपद्रवों को रोकने की जिम्मेदारी ली। दोनों ने ऐसा वातातरण तैयार करने की जिम्मेदारी भी ली जिससे अल्पसंख्यकों को अपना देश छोड़ने पर मजबूर नहीं होना पड़े।

इसी के साथ उन्होंने विस्थापितों के पुनर्वास की व्यवस्था करने की भी जिम्मेदारी ली। भारत के पुनर्वास मंत्री डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने मांग की कि या तो बंगाल के विभाजन को अस्वीकार कर दिया जाए या पाकिस्तान से विस्थापितों को बसाने हेतु अतिरिक्त भूमि मांगी जाए।

भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने पुनर्वास एवं आपूर्तिमंत्री डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के प्रस्तावों को अव्यावहारिक बताया। इससे नाराज होकर 8 अप्रेल 1950 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा क्षितीश चन्द्र न्योगी ने नेहरू मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

बांग्लादेश से शरणार्थियों के जत्थे

पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं की हत्या एक बड़ी साजिश के तहत की जा रही थी इसलिए ई.1954 में पूर्वी-पाकिस्तान से पुनः बड़ी संख्या में हिन्दू विस्थापित होकर भारत आने लगे। वे आज तक भी आ रहे हैं। ई.1954 में औसतन प्रति माह 6,600 विस्थापित-हिन्दू भारत आए। ई.1955 में इस औसत में वृद्धि हुई तथा 13,500 विस्थापित प्रतिमाह भारत आने लगे।

अगले वर्ष इनका औसत बढ़कर 20,003 प्रतिमाह से ऊपर हो गया। पूर्वी-पाकिस्तान से जनवरी 1956 में 19,206 हिन्दू तथा फरवरी 1956 में 43,534 हिन्दू भारत आए। ई.1956 के अंत तक कुल मिलाकर 3.2 लाख हिन्दू भारत आए।

इस पर भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वक्तव्य दिया- ‘यह समस्या काश्मीर समस्या भी अधिक भयंकर एवं जटिल है।’  

अप्रेल 1956 में भारत सरकार ने पूर्वी-पाकिस्तान से भारत आने के इच्छुक विस्थापितों के लिए पारगमन नियमों को कठोर बना दिया गया। इससे विस्थापितों के भारत आगमन की प्रक्रिया कुछ मंदी पड़ी किंतु वह लगातार जारी रही। भारत सरकार के पुनर्वास मंत्री एम. सी. खन्ना ने विस्थापितों के लगातार भारत आने के कारण बताते हुए कहा-

‘इन लोगों को घर त्यागने के लिए बाध्य किया जाता है एवं इन्हें दैनिक जीवन में असुरक्षा तथा भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसलिए ये लोग भारत आते हैं। वर्ष 1957 में 10,920 तथा 1958 में 4,898 हिन्दू भारत आए।’

ई.1958 में अयूब खाँ द्वारा पाकिस्तान पर सैनिक शासन लादे जाने के बाद पूर्वी-बंगाल, पश्चिमी पाकिस्तान से आए सैनिकों की संगीनों के साए में जीने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बंगालियों की हत्या

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बंगालियों की हत्या ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में उस समय से आरम्भ हुई जब इस्लाम का पहली बार बंगाल में प्रवेश हुआ। जब जिन्ना ने अपनी मांग मनवाने के लिए कलकत्ता में सीधी कार्यवाही दिवस मनाया, तब भी बंगालियों की हत्या बड़े स्तर पर की गई।

जब पाकिस्तान बन गया तब भी यह सिलसिला नहीं रुका। पूर्वी बंगाल में धर्म के नाम पर न केवल हिन्दुओं की हत्या हुई अपितु भाषा के नाम पर उन बिहारी मुसलमानों की भी हत्या हुई जो बंग्ला-भाषा बोलना नहीं जानते थे। पश्चिमी-पाकिस्तान की सेना ने तीस लाख बंगालियों एवं बिहारियों का संहार किया

पाकिस्तान के निर्माण के साथ मुस्लिम लीग के नेतृत्व में जो सरकार अस्तित्व में आई उसमें पंजाबी तत्व का बाहुल्य था तथा सिंधी, पख्तूनी, बलोच एवं बंगाली तत्वों की उपेक्षा की गई थी। इस कारण पूरे देश में केन्द्र सरकार के विरुद्ध अंसतोष का वातावरण शुरू से ही बनने लगा।

चूंकि पुरानी राजधानी कराची और नई राजधानी इस्लमाबाद दोनों ही पश्चिमी-पाकिस्तान में बनीं तथा पूर्वी-पाकिस्तान इन राजधानियों से 1600 किलोमीटर दूर था इसलिए शासन में सभी महत्वपूर्ण पद पंजाब के मुसलमानों द्वारा हथिया लिए गए थे।

यद्यपि पूर्वी पाकिस्तान का निवासी सुहरावर्दी कुछ समय के लिए पाकिस्तान का प्रधानमंत्री भी रहा तथापि पाकिस्तान की सत्ता में पूर्वी-पाकिस्तान की कोई आवाज नहीं थी। ई.1966 में पूर्वी-पाकिस्तान के अवामी लीग नामक राजनीतिक दल के नेता शेख मुजीब-उर-रहमान ने राष्ट्रपति अयूब के सैनिक शासन का विरोध करते हुए पूर्वी-पाकिस्तान के नागरिकों के लिए स्वायत्त शासन के अधिकारों की मांग की। इस पर पाकिस्तान की सरकार शेख मुजीब-उर-रहमान की शत्रु हो गई और बंगालियों की हत्या करने लगी।

पाकिस्तान की सरकार ने ई.1968 में मुजीब-उर-रहमान पर पाकिस्तान सरकार के विरुद्ध षड़यंत्र करने का आरोप लगाया जिसमें कहा गया कि मुजीब ने ई.1962 के भारत-चीन युद्ध में एवं ई.1965 के भारत-पाक युद्ध में भारत के सैन्य अधिकारियों के साथ मिलकर पाकिस्तान के विरुद्ध षड़यंत्र किया। अयूब खाँ के इन मिथ्या आरोपों के कारण पूरे पूर्वी-बंगाल में अयूब खाँ की सरकार के विरुद्ध घृणा फैल गई।

पूर्वी पाकिस्तान में चल रही राजनीतिक गतिविधियों का असर पश्चिमी-पाकिस्तान के गैर-पंजाबी मुसलमानों पर पड़े बिना भी नहीं रहा। ई.1967 में अयूब खाँ की सरकार के विदेश मंत्री एवं सिन्धी नेता जुल्फिकार अली भुट्टो ने सरकार से त्याग-पत्र देकर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी बनाई। इसी बीच पाकिस्तान के अन्य प्रांतों द्वारा भी स्वायत्तता की मांग की जाने लगी और अयूब खाँ के लिए देश का शासन चलाना असम्भव हो गया।

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26 मार्च 1969 को जनरल मुहम्मद याह्या खाँ ने अयूब खाँ की सरकार का तख्ता पलट दिया तथा स्वयं राष्ट्रपति बन गया। इस प्रकार पाकिस्तान में एक सैनिक शासन हटकर दूसरा सैनिक शासन आ गया। 31 मार्च 1970 को पाकिस्तान का संविधान फिर से स्थगित कर दिया गया। याह्या खाँ ने एक लीगल फ्रेमवर्क ऑर्डर जारी करके देश में एक-सदन वाली संसदीय पद्धति के लिए चुनाव करवाने का निर्णय लिया जबकि सामान्यतः विश्व के समस्त लोकतांत्रिक देशों में दो सदन होते हैं जिन्हें लोकसभा एवं राज्यसभा अथवा कॉमन हाउस एवं अपर हाउस आदि कहा जाता है। याह्या खाँ ने आदेश जारी किए कि जनरल इलैक्शन्स के बाद ही देश का नया संविधान लिखा जाएगा।

22 नवम्बर 1954 को पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान एवं नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटीयर प्रोविंसेज को मिलाकर ‘इण्टिीग्रेटेड प्रोविंस ऑफ वेस्ट पाकिस्तान’ का गठन किया गया था किंतु याह्या खाँ की सरकार ने ‘इण्टिीग्रेटेड प्रोविंस ऑफ वेस्ट पाकिस्तान’ का विघटन करके फिर से पुरानी वाली स्थिति बहाल कर दी। इस कारण पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान एवं नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटीयर प्रोविंसेज नामक प्रांत फिर से अस्तित्व में आ गए। 7 दिसम्बर 1970 को नए विधिक नियमों के तहत पाकिस्तान में केन्द्रीय सरकार के गठन के लिए एकल सदन हेतु चुनाव करवाए गए।

चुनावों से ठीक एक माह पहले पूर्वी-पाकिस्तान में ‘भोला-चक्रवात’ ने कहर बरपाया। यह संसार में अब तक आए चक्रवाती तूफानों में सर्वाधिक भयावह सिद्ध हुआ। इसमें 5 लाख लोगों की मृत्यु हो गई। पाकिस्तान की याह्या खाँ सरकार ने चक्रवात से प्रभावित परिवारों की सहायता के लिए कोई कदम नहीं उठाए। इससे पूर्वी-पाकिस्तान में पश्चिमी-पाकिस्तान के नेतृत्व में चल रही सरकार के विरुद्ध पहले से ही व्याप्त घृणा अपने चरम पर पहुंच गई।

इस समय तक पूर्वी-पाकिस्तान की जनसंख्या पश्चिमी-पाकिस्तान से अधिक हो चुकी थी। क्योंकि पश्चिमी पाकिस्तान के लाखों हिन्दू या तो मार डाले गए थे, या फिर वे भारत भाग गए थे। यही हाल पश्चिमी पाकिस्तान में भारत से आए मुसलमानों का किया गया था। इसलिए इन चुनावों में पूर्वी-पाकिस्तान की शेख मुजीबुररहमान की पार्टी अवामी लीग को अभूतपूर्व विजय प्राप्त हुई।

केन्द्रीय सदन अर्थात् नेशनल एसेम्बली में कुल 313 सीटों का प्रावधान किया गया था जिनमें से 169 सीटों पर पूर्वी-पाकिस्तान के नेता मुजीबुररहमान की अवामी लीग पार्टी ने जीत प्राप्त कर ली। इसी प्रकार प्रांतीय विधान सभा में 310 सीटों में से शेख मुजीब की पार्टी ने 298 सीटें प्राप्त कर लीं।

नेशनल एसेम्बली में जुल्फिकार अली भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को 81 सीटें मिलीं और वह मुख्य विपक्षी पार्टी बनी। जिस मुस्लिम लीग ने भारत से लड़कर पाकिस्तान लिया था, उसका इन चुनावों में तिनका-तिनका बिखर गया। इन चुनावों में मुस्लिम लीग के नाम से दो पार्टियों ने चुनाव लड़ा। इनमें से कौंसिल मुस्लिम लीग को केवल 7 सीटें, तथा मुस्लिम लीग (कय्यूम) को 9 सीटें मिलीं।

बाकी सीटें विभिन्न छोटी-छोटी पार्टियों में बिखर गईं। नेशनल एसेम्बली में अवामी लीग को पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद याह्या खाँ ने अवामी लीग को सरकार बनाने का निमंत्रण नहीं दिया। जब अवामी पार्टी ने विरोध प्रदर्शन किए तो शेख मुजीबुररहमान को बंदी बना लिया गया। इस पर पूर्वी-बंगाल की जनता ने अवामी लीग के नेतृत्व में पश्चिमी-पाकिस्तान से अलग होने के लिए बांग्ला मुक्ति आंदोलन शुरू कर दिया। जब पाकिस्तान ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए पूर्वी-पाकिस्तान में सेना तैनात की तो पूर्वी-पाकिस्तान से बहुत बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत आने लगे।

बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम के दौरान भयानक हिंसा हुई। इस आंदोलन को कुचलने के लिए पाकिस्तान की सेना द्वारा 26 मार्च 1971 को पूर्वी-पाकिस्तान में ऑपरेशन सर्चलाइट आरम्भ किया गया। इस ऑपरेशन की आड़ में पाकिस्तान की सेना ने बंगाली मुसलमानों का जमकर नरसंहार किया।

बंगालियों की हत्या का ऐसा सिलसिला चला, जिसकी मिसाल इतिहास में मिलनी कठिन है। पहले मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारा था, अब मुसलमान मुसलमानों को ही मार रहे थे। उनके लिए इंसान किसी कीड़े-मकोड़े की तरह था जिसे कभी भी, कितनी भी क्रूरता से मारा जा सकता था। जमात-ए-इस्लाम नामक संगठन के लड़ाकों ने इस युद्ध में पाकिस्तान की सेना का साथ दिया।

नौ माह तक चले इस मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान की सेना और जमात-ए-इस्लाम के लड़ाकों ने पूर्वी-पाकिस्तान में कई लाख बंगालियों एवं बिहारियों का संहार किया। यह संख्या 3 लाख से 30 लाख के बीच बताई जाती है। इस दौरान 2 लाख से 4 लाख बंगाली औरतों से बलात्कार किए जिनमें हिन्दू एवं मुस्लिम औरतें बिना किसी भेद के बलात्कार की शिकार हुईं। दिसम्बर 2011 में बीबीसी न्यूज रिपोर्ट में एक रिसर्च के हवाले से दावा किया गया कि बांग्ला देश के मुक्ति संग्राम में तीन लाख से पांच लाख लोग मारे गए। इस दौरान कुछ कट्टर धार्मिक लोगों ने नारा दिया कि बंगाली महिलाएं पब्लिक प्रोपर्टी हैं।

इस नरसंहार एवं बलात्कारों के कारण अस्सी लाख से एक करोड़ हिन्दुओं ने पूर्वी-पाकिस्तान छोड़ दिया और वे भारत आ गए। लगभग 3 करोड़ लोग पूर्वी-पाकिस्तान से विस्थापित हुए। इस दौरान उर्दू-भाषी बिहारियों एवं बंाग्ला-भाषी बंगालियों के बीच भी हिंसक झड़पें हुईं। इन झड़पों में लगभग डेढ़ लाख उर्दू-भाषी बिहारी मारे गए। एक अन्य अनुमान के अनुसार मरने वाले उर्दू-भाषी बिहारियों की संख्या पांच लाख थी।

सुप्रसिद्ध पत्रकार तारेक फतह ने 1970 के बांगलादेश नरसंहार में मारे गए लोगों की संख्या 10 लाख बताई है। बांग्लादेश के नरसंहार पर टिप्पणी करते हुए तारेक फतेह ने लिखा है- ‘बंगाल जो नवजागरण का पालना था, हत्यारों के हत्थे चढ़ गया था।’ याह्या खाँ एवं उसके साथियों ने पूर्वी-पाकिस्तान के मुक्ति-आंदोलन को भारत-समर्थित युद्ध माना एवं उसका बदला लेने के लिए भारत पर आक्रमण कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप 1971 का भारत-पाक युद्ध हुआ और पूर्वी पाकिस्तान, बांग्लादेश नाम से अलग राष्ट्र बना।

शेख हसीना का संयुक्त राष्ट्र महासभा में वक्तव्य

22 सितम्बर 2017 को बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक वक्तव्य दिया कि पाकिस्तान की सेना ने वर्ष 1971 में जघन्य सैन्य अभियान चलाकर मुक्ति संग्राम के दौरान 30 लाख निर्दाेष बंगालियों की हत्या की। उन्होंने कहा कि बांग्ला देश की संसद ने नरसंहार के पीड़ितों को श्रद्धांजलि देने के लिए 25 मार्च 2017 को नरसंहार दिवस घोषित किया।

पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी-पाकिस्तान पर 25 मार्च 1971 की आधी रात को हमला किया जिसके बाद आधिकारिक तौर पर 9 महीने चले युद्ध में 30 लाख लोग मारे गए। तथा 20,000 से ज्यादा महिलाओं का शोषण किया गया। बांगलादेश भले ही पाकिस्तान से अलग हो गया हो किंतु वहाँ की परिस्थितियाँ भी पाकिस्तान से कुछ कम बुरी नहीं हैं।

बांग्लादेश बनने के केवल चार साल बाद ई.1975 में शेख मुजीब-उर-रहमान की सरकार को सैनिक-तख्ता-पलट के माध्यम से हटा दिया गया। इस दौरान शेख मुजीब, उसकी पत्नी तथा तीन पुत्र मौत के घाट उतार दिए गए। लम्बी राजनीतिक लड़ाई के बाद शेख मुजीब की पुत्री शेख हसीना ने ई.1996 में बांग्लादेश में सरकार बनाई किंतु उसे भी सैनिक-तख्ता-पलट के माध्यम से हटाकर जेल में डाल दिया गया।

इस पुस्तक के लिखे जाने के समय यही शेख हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हैं, वे तीसरी बार प्रधानमंत्री बनी हैं। बांग्लादेश में लोकतांत्रिक सरकारें बहुत कम रही हैं जबकि जनता को सैनिक शासन और आपतकाल अधिक झेलना पड़ा है। बंगालियों की हत्या का सिलसिला कुछ कम अवश्य हुआ है किंतु थमा नहीं है।

अब बांगलादेश में तो बंगालियों की हत्या होती ही है, भारत में रह गए पश्चिमी बंगाल भी हिन्दुओं की हत्या का सिलसिला आरम्भ हो गया है। ऐसा लगता है मानो बंगाली जनता हत्याओं के लिए अभिशप्त है। बंगाली भद्रलोक बंगालियों की रक्षा करने में असमर्थ है। वर्तमान समय में पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगभग वही काम कर रही हैं जो बंगाल के विभाजन से पहले हुसैन सुहरावर्दी ने किया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता

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पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता – दूसरे धर्म वालों के लिए पाकिस्तान में जगह नहीं!

पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता इस कदर हावी है कि वहाँ हिन्दू, सिख, बौद्ध एवं ईसाई ही नहीं, मुहाजिरों, शियाओं, अहमदियों और सूफियों का अस्तित्व भी खतरे में है। भारत से पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर अलग हुआ किंतु पाकिस्तान से बांग्लादेश केवल इस कारण अलग हुआ कि पाकिस्तान के मुसलमान अपने आप को बांग्लादेश के मुसलमानों से अधिक श्रेष्ठ मानते थे तथा वे पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल की राजनीतिक पार्टी की सरकार नहीं बनने देना चाहते थे।

भारत-पाकिस्तान के विभाजन ने तो 5 से 10 लाख मानवों के प्राण लिए थे किंतु पाकिस्तान-बांग्लादेश के विभाजन ने 30 लाख लोगों के प्राण लिए। घृणा का यह चक्र अभी थमा नहीं है। पाकिस्तान में आज भी पंजाबी मुसलमान, सिंधी मुसलमान, बिलोचिस्तानी मुसलमान, खैबर-पख्तूनी मुसलमान तथा पाक अधिकृत काश्मीर के मुसलमान एक-दूसरे को नीचा समझते हैं।

भारत से पाकिस्तान गए मुसलमानों को मुहाजिर कहा जाता है तथा उन्हें नीची दृष्टि से देखा जाता है। पाकिस्तान के विगत 72 साल के इतिहास को देखकर कहा जा सकता है कि पाकिस्तान के लोग तब तक लड़ते रहेंगे जब तक कि पाकिस्तान के कुछ विभाजन और नहीं हो जाएंगे। क्योंकि घृणा से घृणा ही जन्म लेती है।

पैंसठ के युद्धकाल में हिन्दुओं का दमन

ई.1965 के युद्धकाल में पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक हिन्दुओं को पाकिस्तानी मुसलमानों द्वारा जासूस और देशद्रोही घोषित किया गया। उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। इसलिए वे भागकर चोरी-छिपे भारत आने लगे। 10 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौते में अल्पसंख्यकों की रक्षा पर भी बल दिया गया किंतु पाकिस्तान ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। आज भी वहाँ हिन्दुओं को द्वितीय स्तर का नागरिक समझा जाता है।

इकहत्तर के युद्धकाल में कई लाख हिन्दू शरणार्थियों का भारत आगमन

ई.1947 के बाद सिंध से हिंदुस्तान की तरफ हिंदुओं का एक बड़ा पलायन 1971 की लड़ाई के समय हुआ और 90,000 सिंधी-हिंदू पाकिस्तान से भारत आ गए। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि उस समय भारत की सेना पाकिस्तान के सिंध प्रांत के थारपारकार जिले में घुस गई थी जिसके संरक्षण के कारण सिंधी-हिन्दू रातों-रात पाकिस्तान छोड़कर भारत में प्रवेश करने में सफल हुए। 1971 के पलायन के समय देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी।

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वह इन हिन्दुओं को भारत में लेने के लिए तैयार नहीं हुई तथा सरकार ने इन हिंदुओं को भारत से पुनः पाकिस्तान की सीमा में धकेलने का प्रयास किया। सरकार ने इन शरणार्थियों पर गोली चलाने तक की धमकी दी किंतु ये शरणार्थी भारत की भूमि पर ही जीने-मरने को अटल थे, वे किसी भी सूरत में वापस पाकिस्तान लौटने को तैयार नहीं थे। अंत में भारत सरकार ने इन्हें स्वीकार किया तथा इन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान की।

28 हजार से अधिक हिन्दू, पाकिस्तान से भारत के बाड़मेर जिले में आए। इन हिन्दुओं में गुरड़ा, लोहार, सिन्धी, पुरोहित, देशान्तरी, नाई, सुथार, बजीर, राजपूत, ग्वारिया, जाट, स्वामी, माहेश्वरी, दर्जी, ब्राह्मण, चारण, भील, मेघवाल, सुनार, लखवारा, भाट, ढोली, खत्री, कलबी आदि विभिन्न जातियों के लोग थे। इनमें से अधिकांश शरणार्थी बाड़मेर जिले में रहे और शेष भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर बस गए।

स्थिर हो गई है पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या

ई.1951 की जनगणना के अनुसार पश्चिमी पाकिस्तान की जनसंख्या 33.7 मिलियन थी जो वर्ष 2017 में बढ़कर 207.77 मिलियन हो गई। 1951 की जनगणना के अनुसार पश्चिमी पाकिस्तान में 1.6 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या थी, सैंतालिस वर्षों के पश्चात् 1997 में भी पाकिस्तान की हिन्दू जनसंख्या 1.6 प्रतिशत ही पाई गई। 1998 की जनगणना के अनुसार पाकिस्तान में 2.1 लाख हिन्दू जनसंख्या बची है। अधिकतर हिंदू पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रहते हैं। पाकिस्तान में रहने वाले कुल हिन्दुओं में से सिंध में 93 प्रतिशत, पंजाब में 5 प्रतिशत तथा ब्लूचिस्तान में 2 प्रतिशत रहते हैं।

पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता के चलते जिस तेजी के साथ हिन्दू गायब हो गए, उसके कारण वर्ष 1998 के बाद से पाकिस्तान में हिन्दुओं के आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं। यदि 1950 से 1998 की अवधि को ही लिया जाए तो इस अवधि में हिन्दुओं की जनसंख्या स्थिर रही जबकि पाकिस्तान की कुल जनसंख्या 6 गुने से अधिक हो गई।

पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या में इसलिए वृद्धि नहीं हुई क्योंकि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू या तो मुसलमान बन गए हैं या फिर पाकिस्तान से हिन्दुओं की जनसंख्या प्रकट एवं परोक्ष रूप से भारत में आई है जिसका अधिकांश हिस्सा सीमावर्ती रेगिस्तानी जिलों बाड़मेर, जैसलमेर तथा जोधपुर में निवास करता है।

पाकिस्तान से आज भी हिन्दुओं का पलायन जारी है। वे अपनी तथा अपने बच्चों की सुरक्षा की आशा में भारत आते हैं तथा भारत सरकार उन्हें नागरिकता से लेकर आवास, पेयजल, रोजगार, शिक्षा-चिकित्सा उपलब्ध कराने का प्रयास करती है।

पाकिस्तान में मुस्लिम लड़कों द्वारा जिस बड़ी तादाद में हिन्दू लड़कियों का बलपूर्वक अपहरण एवं बलात्कार करके उन्हें मुसलमानों से निकाह करने के लिए विवश किया जा रहा है तथा उनका धर्म-परिवर्तन करके उन्हें मुसलमान बनाया जा रहा है, इसको देखते हुए लगता है कि आने वाले कुछ दशकों में पाकिस्तान हिन्दू-विहीन देश हो जाएगा। पाकिस्तान के निर्माताओं ने ऐसे ही पाकिस्तान की कल्पना तो की थी!

सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल

भारत विभाजन के समय उत्तर प्रदेश एवं बिहार से पाकिस्तान गए मुहाजिर मुसलमानों के नेता अल्ताफ हुसैन ने सितम्बर 2000 में लंदन में सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया कि पाकिस्तान का निर्माण सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल थी।

पाकिस्तान एवं बांग्लादेश से आए शरणार्थियों के कारण भारत में जनसंख्या विस्फोट हो गया

ई.1947 में अखण्ड भारत की कुल जनंसख्या लगभग 39.5 करोड़ थी। भारत विभाजन के समय 23.85 प्रतिशत भूमि तथा 16 प्रतिशत जनसंख्या पाकिस्तान को मिली। अर्थात् 33 करोड़ जनसंख्या भारत को एवं 6.5 करोड़ जनसंख्या पाकिस्तान को मिली। आजादी के बाद भारत में जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चलाया गया जबकि पाकिस्तान में इस्लामिक मान्यताओं के कारण जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम नहीं चलाया गया।

पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता के कारण पाकिस्तान से भारत की ओर हुए बड़े स्तर पर जनसंख्या पलायन हुआ जिसके कारण भारत की जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई। 1947 से 2019 के बीच भारत की जनसंख्या 33 करोड़ से बढ़कर 135 करोड़ हो गई तथा भारत में न केवल जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम विफल हो गया अपितु जनसंख्या विस्फोट भी हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार

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अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार जिन्ना के पाकिस्तान पर बहुत बड़ा कलंक है। पाकिस्तान के मुसलमान अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार इसलिए करते हैं क्योंकि सुन्नियों और शियाओं की दृष्टि में अहमदिया मुसलमान, मुसलमान नहीं हैं।

अहमदिया सम्प्रदाय एक धार्मिक आंदोलन है, जो अविभाजित भारत में 23 मार्च 1889 को आरम्भ हुआ। इस सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक मिर्जा गुलाम अहमद (ई.1835-1908) थे। उनके अनुयाई गुलाम अहमद को मुहम्मद के बाद एक और पैगम्बर एवं नबी मानते हैं जबकि इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार ‘पैगम्बर मोहम्मद’ ख़ुदा के भेजे हुए अन्तिम पैगम्बर हैं। पाकिस्तान में अहमदियाओं को मुसलमान नहीं, अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। इन्हें मिरजई मुसलमान भी कहा जाता है।

अहमदिया समुदाय अल्लाह, कुरान शरीफ ,नमाज़, दाढ़ी, टोपी, बातचीत एवं जीवन-शैली आदि में मुसलमान प्रतीत होते हैं किंतु वे हज़रत मोहम्मद को अपना अंतिम पैगम्बर स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि नबुअत (पैगम्बरी ) की परंपरा अब भी जारी है। इस कारण अन्य मुस्लिम समुदायों के लोग सामूहिक रूप से इस समुदाय का घोर विरोध करते हैं।


अहमदिया मुसलमानों को कादियानी भी कहा जाता है क्योंकि इनका आरम्भ पंजाब के गुरदासपुर जिले के कादियान कस्बे में हुआ था। भारत की आजादी से पहले अहमदिया नेता चौधरी जफरुल्ला खाँ द्वारा दो-राष्ट्र के सिद्धांत के पक्ष में दी गई सशक्त दलीलों के कारण मुहम्मद अली जिन्ना उससे अत्यंत प्रभावित था।

जिन्ना ने चौधरी जफरुल्ला खाँ को 1947 में पाकिस्तान का पहला विदेश मंत्री बनाया। भारत विभाजन के बाद अधिकतर अहमदिया पाकिस्तान चले गए, लेकिन विभाजन के बाद से ही वहाँ उन पर अत्याचार होने लगे, जो धीरे-धीरे चरम पर पहुंच गए। पाकिस्तान में अब इन लोगों का अस्तित्व खतरे में है। अहमदिया खुद को मुसलमान कहते हैं लेकिन पाकिस्तान का कानून उन्हें मुसलमान नहीं मानता।

पाकिस्तान में ई.1953 में पहली बार अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार हुआ जिसमें सैकड़ों अहमदिया मुसलमानों को मौत के घाट उतारा गया। ई.1974 में प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के नेतृत्व में पाकिस्तानी संसद ने अहमदियों को गैरमुस्लिम घोषित किया। इसके बाद पूरे पाकिस्तान में अहमदियों के खिलाफ दंगे हुए। तब से यह समुदाय इस्लामिक देश पाकिस्तान में कानूनी और सामाजिक भेदभाव का शिकार है। उन्हें काफिर कहा जाता है। जब अहमदिया मुसलमान पाकिस्तान पहुंचे तो उन्होंने पाकिस्तान के पंजाब सूबे में अपने लिए रबवा नामक अलग शहर बसाया। रबवा में 50 लाख से अधिक अहमदी रहते थे।

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ई.1974 में सुन्नी कट्टरपंथियों ने अहमदियों की दुकानें और घर लूट लिए और उनमें आग लगा दी। इस हिंसा में हजारों अहमदी मारे गए और कई हजार घायल हुए। पाकिस्तानी सरकार, पाकिस्तानी मुस्लिम समाज एवं आतंकवादी संगठनों द्वारा जुल्म ढाए जाने पर बहुत से अहमदिया पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैण्ड चले गए। अहमदियों का बहुत बड़ा समूह रबवा से पलायन करके चीन की सीमा पर शरणार्थी बनकर रहने लगा, शेष अहमदिया पाकिस्तान के भीतर ही रहकर अपने अस्तित्व को समाप्त होते हुए देख रहे हैं।

1980 के दशक में पाकिस्तान के सैनिक शासक जियाउल हक ने पाकिस्तान को पूरी तरह इस्लामिक मुल्क बनाया तब सरकार द्वारा अहमदियों के उपासना स्थल बंद कर दिए गए या ढहा दिए गए। अब वे अपनी इबादतगाहों को मस्जिद नहीं कह सकते। ई.1982 में राष्ट्रपति जिया उल हक ने पाकिस्तान के संविधान में फिर से संशोधन किया। इसके तहत अहमदियों पर पाबंदी लगा दी गई कि वे खुद को मुसलमान नहीं कह सकते और पैगंबर मुहम्मद की तौहीन करने पर मौत की सजा तय कर दी गई।

उनके कब्रिस्तान अलग कर दिए गए। सरकारी आदेश पर अहमदियों की मस्जिदों को ढहा दिया गया। उनके कब्रिस्तान की कब्रों पर लिखी आयतें हटा दी गईं। इस कारण भारी संख्या में अहमदियों का पलायन हुआ।

हजारों अहमदियों ने अपना देश छोड़कर दूसरे देशों में शरण ली। 28 मई 2010 में तालिबानी आतंकियों ने पाकिस्तान में 2 अहमदी मस्जिदों को निशाना बनाया। लाहौर की बैतुल नूर मस्जिद पर फायरिंग की गई, ग्रेनेड फेंके गए और कुछ आतंकी अपने शरीर पर बम बांधकर मस्जिद में घुस गए। इस हमले में 94 लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए। दूसरी मस्जिद दारुल जिक्र भी लाहौर की ही थी।

यहाँ 67 अहमदी मारे गए। इसके बाद उन पर लगातार हमले होते रहे हैं। आज विश्व के 206 देशों में कई करोड़ अहमदी निवास करते हैं किंतु उनके अपने देश पाकिस्तान में अहमदियों की संख्या केवल 30 लाख बची है। भारत में 10 लाख, नाइजीरिया में 25 लाख और इंडोनेशिया में लगभग 4 लाख अहमदिया मुसलमान रहते हैं। अहमदिया मुसलमान सर्वाधिक संख्या में इंग्लैड में निवास करते हैं।

यदि पाकिस्तान में किसी अहमदिया मुसमान को चोरी-छिपे सुन्नी कब्रिस्तान में दफना दिया जाता है तो उसके शव को कब्र एवं कब्रिस्तान दोनों से बाहर निकाल दिया जाता है।

वर्ष 2000 के दशक में चंदासिंह गांव की शिक्षिका नादिया हनीफ के शव को इसी कारण से कब्र से बाहर निकाल दिया गया। इसी प्रकार यदि किसी स्कूल में चोरी-छिपे किसी अहमदिया बालक का नाम लिखवा दिया जाता है तो उसकी पहचान होते ही उसे स्कूल से निकाल दिया जाता है और उसे किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में प्रवेश नहीं दिया जाता।

कुछ साल पहले मानसेरा नामक गांव के हाईस्कूल में एक अहमदी छात्र रहील अहमद के नाम में कादियानी जोड़ दिया गया इस कारण उसे पाकिस्तान की किसी भी यूनिवर्सिटी ने आगे पढ़ने के लिए प्रवेश नहीं दिया। पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार आज भी जारी है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता



शिया मुसलमानों की हत्या – पाकिस्तान में शियाओं का सफाया

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मुहम्मद अली जिन्ना ने जिस पाकिस्तान के लिए पांच लाख से अधिक हिन्दुओं एवं सिक्खों का खून बहाया, उस पाकिस्तान में शिया मुसलमानों की हत्या ठीक वैसे ही होती है जैसे कि जिन्ना के अनुयायी भारत में हिन्दुओं एवं सिक्खों की हत्या करते थे।

पाकिस्तान निर्माण के समय पाकिस्तान में शियाओं की जनसंख्या लगभग 35 प्रतिशत थी किंतु 2019 में यह 10 से 15 प्रतिशत अनुमानित की गई। शिया-मुसलमान पाकिस्तान का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। शिया मुसलमान भी अलग-अलग समूहों में विभक्त हैं। अधिकतर शिया तवेलवर समुदाय के हैं। इनके अलावा इस्माइली, खोजा और बोहरा समुदायों की भी अच्छी संख्या है। पाकिस्तान के कट्टर मुसलमान एवं आतंकी संठन इन सभी शिया मुसलमानों की हत्या बिना किसी भेदभाव के करते हैं।

तवेलवर शियाओं में सबसे ज्यादा हाजरा जनजाति के शिया हैं। ये क्वेटा और आसपास के इलाकों में केन्द्रित हैं तथा क्वेटा में इनकी संख्या लगभग 7 लाख है। आतंकी हमलों में मारे जाने वाले हर 10 शिया मुसलमानों में से 5 हाजरा समुदाय के होते हैं। अर्थात् पाकिस्तान में तवेलवर शिया मुसलमानों की हत्या सबसे अधिक होती है।

पाकिस्तान में शिया विरोधी आंदोलन लगभग 34 साल पहले ईरान की क्रांति के बाद आरम्भ हुआ। सुन्नी कट्टरपंथियों की मांग है कि शियाओं को भी काफिर घोषित किया जाए। अलगाववादियों के खूनी संघर्ष के कारण कुर्रम, पराचिनार और हंगू आदि क्षेत्र शियाओं की कब्रगाह बन चुके हैं।

कराची के शिया मोहल्लों को लगभग किलों में बदल दिया गया है। आत्मघाती हमलावर बारूद से भरी कारें लेकर अब्बास टाउन तथा अन्य शिया बहुल नगरों में घुस जाते हैं और बड़ी संख्या में शियाओं की लाशें दिखाई देने लगती हैं।

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ई.1980 से 1985 के बीच जनरल जिया उल हक की सरकार के समय पाकिस्तान का नए सिरे से इस्लामीकरण हुआ और सिपाह-ए-साहबा जैसे कट्टारपंथी संगठनों को फैलने का अवसर मिला। सिपाह-ए-साहबा ने अपने अस्तित्व में आने के बाद से ही शिया संप्रदाय के लोगों पर हमले आरम्भ कर दिए। सुन्नी चरमपंथियों से मुकाबला करने के लिए शियाओं ने तहरीक-ए-निफाज़-ए-फिकाह-जाफरिया नामक संगठन खड़ा किया लेकिन इसके बाद से ही शियाओं पर खूनी हमले आरम्भ हो गए, जो अब तक जारी हैं। पाकिस्तान के अधिकतर आतंकवादी संगठन सुन्नी मुसलमानों के हैं।

ये सभी संगठन शियाओं के खिलाफ कुछ न कुछ हिंसक कार्यवाही करते रहते हैं। तालिबान, अलकायदा और लश्कर-ए-झांगवी ‘देवबंदी मुसलमान’ हैं, जो शियाओं का अस्तित्व मिटा देना चाहते हैं। लश्कर-ए-झांगवी नामक आतंकवादी संगठन ने ई.2011 में पाकिस्तान के शिया मुसलमानों को धमकी दी कि पाकिस्तान के समस्त शिया मुसलमानों को मौत के घाट उतारा जाएगा और पाकिस्तान उनकी कब्रगाह बनेगा।

तब से लश्कर-ए-झांगवी लगातार शियाओं के धार्मिक स्थानों पर हिंसक कार्यवाहियां कर रहा है। हर साल शियाओं पर बड़े हमले करके दहशत फैलाई जाती है ताकि शिया भयभीत होकर अपने घरों को छोड़ दें और एक जगह इकट्ठे हो जाएं।

ई.2012 में 125 से अधिक शिया मुसलमानों की हत्या की गई। ई.2013 में बलूचिस्तान में शिया-हज़ारा-समुदाय के लगभग 200 लोगों को मारा गया। 10 जनवरी 2013 को क्वेटा में हुए 2 धमाकों में 115 लोगों की मौत हो गई जिनमें से अधिकतर ‘हजारा शिया’ थे। इस घटना के एक माह के भीतर ही कैरानी रोड धमाके में 89 शिया मारे गए। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2013 से 2016 तक हुए बम धमाकों में 2,000 से अधिक शिया मुसलमानों को मौत के घाट उतारा गया और लाखों शियाओं को सुन्नी बहुल इलाकों से पलायन करने के लिए विवश किया गया।

पाकिस्तान में शियाओं के लिए सरकारी नौकरी और सुविधाएं भी धीरे-धीरे घटा दी गई हैं। वर्ष 2018 में सैनिक वर्दी पहने कुछ आतंकियों ने रावलपिंडी से गिलगित जा रही चार बसें रुकवाकर अब्बास या जाफरी जैसे शिया नाम वाले 46 लोगों को उतार कर मार डाला। मस्तुंग और क्वेटा में हजारा शिया मुसलमानों की हत्या किसी बड़े नरसंहार से कम नहीं होती। ऐसा नरसंहार पाकिस्तान में अनेक स्थानों पर बार-बार दोहराया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सूफी दरगाहों पर हमले

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भारत में लगभग प्रत्येक मुसलमान चाहे वह शिया हो, सुन्नी हो, अहमदिया हो, बोहरा हो, या कुछ और और हो, सूफियों की मजारों पर जाता है, ताजियों में शामिल होता है तथा जियारत करता है किंतु पाकिस्तान में सूफी दरगाहों पर हमले होते हैं क्योंकि वहाँ सूफियों को काफिर माना जाता है।

सदियों से पाकिस्तान सूफी संतों की जमीन रहा है किंतु आज का पाकिस्तान दुनियाभर के आतंकवादियों की शरणगाह बन चुका है। वहाँ मुहाजिरों, शियाओं और अहमदियों के साथ-साथ सूफी समुदाय भी सुन्नी आतंकी संगठनों के निशाने पर है। सूफियों को पाकिस्तान में काफिर और मूर्तिपूजक माना जाता है।

पाकिस्तान में सूफियों की सभी दरगाहें आतंकवादियों के निशाने पर हैं। अहमदियों की तरह सूफियों को भी नागरिक अधिकार और सुविधाएं नहीं दी जाती हैं। पाकिस्तान के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन तहरीके तालिबान ने 2005 से वर्ष 2017 तक 30 सूफी दरगाहों को निशाना बनाया जिनमें से कई दरगाहें 100 साल से अधिक पुरानी हैं।

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इस्लामाबाद में बड़ी इमाम दरगाह, मोहम्मद एजेंसी में हाजी साहब तुरंगजई की दरगाह, पेशावर के चमखानी में अब्दुल शकूर बाबा की दरगाह समेत कई मकबरों, पेशावर में 17वीं सदी के सूफी कवि अब्दुल रहमान बाबा, डेरा गाजी खान में साखी सरवर दरगाह, पाकपत्तन शहर की सूफी दरगाह, चमकानी में फंडू बाबा की दरगाह, सूफी हजरत बाबा फरीद, सूफी अब्दुल्लाह शाह गाजी की दरगाह सहित अनेक दरगाहों पर आतंकी हमले हो चुके हैं। इन हमलों में बड़ी संख्या में सूफी मत में विश्वास रखने वाले मुसलमान मारे गए। कभी अफगानिस्तान भी सूफी पीर औलिया और दरवेशों का केंद्र था लेकिन तालिबानियों ने उन सब को मिटा दिया। फरवरी 2017 में पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में लाल शाहबाज कलंदर की दरगाह पर हुए आतंकी हमले में 100 से अधिक लोग मारे गए और 250 लोग घायल हुए थे।

इससे पहले बलूचिस्तान प्रांत की मशहूर सूफी दरगाह शाह नूरानी पर आतंकी हमले में 52 लोगों की मौत हुई थी। वास्तव में ये आतंकी हमले वहाबी संप्रदाय की सूफियों के खिलाफ चल रही जंग का हिस्सा हैं।

भारत में भी पाकिस्तानी आतंकवादियों ने चरारे शरीफ मजार तथा हजरत बल दरगाह सहित अनेक स्थानों पर बड़े हमले किए हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दीनदारों तथा सयैदों की जिंदगियों का अंतर

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पाकिस्तान में दीनदार तथा सैयद मुसमलमानों की जिंदगियों में इतना अंतर है जितना अंतर पौराणिक भारत में चाण्डालों और ब्राह्मणों की जिंदगियों में हुआ करता था।

मुस्लिम समाज में सभी मुसलमानों को बराबर समझा जाता है तथा जाति-प्रथा का प्रचलन नहीं है किंतु पाकिस्तान का पूरा मुस्लिम समाज शिया, सुन्नी, अहमदिया, मुहाजिर, सूफी, शेख, सैयद तथा दीनदार आदि कई वर्गों में बंट गया है जो उनकी सामाजिक एवं राजनीतिक हैसियत का आधार है।

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पाकिस्तान में इंसानों का मैला ढोने वाले, मृत पशुओं की खाल उतारने वाले एवं भिश्तियों आदि को दीनदार मुसलमान कहा जाता है। एक तो ये वैसे ही कमतरी के शिकार हैं, और उनकी औलाद अपना पैतृक पेशा अपनाने को मजबूर हैं, दूसरे पाकिस्तान में इन्हें वे सुविधाएं हासिल नहीं हैं जो भारत में हरिजनों को मिलती हैं। इनकी जुर्रत नहीं होती, अपने से ऊँची जात के मुसलमानों के बराबर बैठने की। अधिकतर इन लोगों का काम अपना पैतृक पेशा करना, मजदूरी करना, मरे हुए जानवरों की खाल उतारना और हड्डियों का व्यापार करना है। कोई इक्का-दुक्का दीनदार ही किसी इज्जतदार जगह को हासिल कर पाता है। वरना अधिकतर दीनदारों की जिंदगी शेखों के तलवे चाटते गुजरती है।

इसके विपरीत सैयदों को आले रसूल हजरत मुहम्मद का वंशज कहा जाता है। उनको हक हासिल है दूसरों की बहू-बेटी हथियाने का, लेकिन किसी दूसरे की मजाल नहीं कि वह सयैदानी की तरफ आंख उठाकर भी देख सके। सैयद चाहे चोर, बदमाश या लफंगा ही क्यों न हो, लोग फिर भी उसकी कदम-बोसी ही करते हैं।

उससे ताबीज बनवाते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं। उनकी शान के खिलाफ गलती से भी अगर कोई लफ्ज निकल जाए तो अस्तफिगार पढ़ते हैं। उसकी हुक्म अदूली करना गुनाह समझते हैं। उसके खिलाफ आवाज उठाने को आले रसूल के खिलाफ बगावत समझा जाता है, जिसके कारण मरने के बाद दोजख में जाना होता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ये कैसा पाकिस्तान !

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पाकिस्तान के जनक मुहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों को अच्छी जिंदगी देने के नाम पर पांच लाख हिन्दुओं एवं सिक्खों का खून बहाकर पाकिस्तान बनवाया था किंतु ये कैसा पाकिस्तान है जिसमें करोड़ों मुसलमान नर्क से भी बदतर जिंदगी जी रहे हैं।

नोबेल विजेताओं के लिए जगह नहीं

पाकिस्तान निर्माण के बाद से लेकर यह पुस्तक लिखे जाने तक अर्थात् ई.1947 से 2019 तक पाकिस्तान में केवल दो पाकिस्तानी नागरिकों को नोबेल पुरस्कार मिले हैं। पहले हैं- भौतिकी के वैज्ञानिक डॉक्टर अब्दुस सलाम और दूसरी हैं स्वात क्षेत्र के मिंगोरा शहर की रहने वाली मलाला युसुफ़ज़ई। डॉक्टर अब्दुस सलाम अहमदिया मुसलमान हैं। इस कारण पाकिस्तान उन्हें अपना नागरिक ही स्वीकार नहीं करता जबकि मलाला युसुफ़ज़ई को तालिबानी आतंकी मार डालना चाहते हैं।

ये कैसा पाकिस्तान है जिसमें वैज्ञानिकों के नाम पर चोर पैदा होते हैं जो दूसरे देशों का विज्ञान चुराते हैं और नागरिकों के नाम पर आतंकवादी पैदा होते हैं जो मलाला जैसी लड़कियों को मार डालना चाहते हैं। ये कैसा पाकिस्तान है जहाँ मलाला जैसी लड़कियां आतंक की शिकार होने के बाद पाकिस्तान के राजनेताओं की बजाय भारत के राजनेताओं को गाली देती हैं!

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ओसामा बिन लादेन को शरण

ये कैसा पाकिस्तान है जो पाकिस्तान आतंकियों के शरणस्थली के तौर पर बदनाम हो चुका है। उसने अमीरका पर नौ ग्यारह का आतंकवादी हमला करने के सूत्रधार ओसामा बिन लादेन को एबोटाबाद में शरण दी और जब पाकिस्तान पर ओसामा को शरण देने के आरोप लगे तो पाकिस्तान ने आसोमा बिन लादेन के पाकिस्तान में होने से इन्कार कर दिया।

2 मई 2011 की रात्रि में अमरीकी वायुसेना ने अचानक पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मार डाला तथा उसका शव समुद्र में अज्ञात स्थान पर लेजाकर गाढ़ दिया। ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्तों में दरार आ गई और अमेरिका की जगह चीन ने ले ली।

मेमोगेट प्रकरण से पाकिस्तान की बदनामी

ओसामा बिन लादेन के मारे जाते ही पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी नेताओं के बीच अविश्वास बढ़ गया जिसकी पुष्टि मेमोगेट प्रकरण से हुई। अमेरिका द्वारा ओसामा बिन लादेन को मार गिराए जाने के बाद राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को पाकिस्तान में सैन्य-तख्ता-पलट का डर सताने लगा। जरदारी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा से अनुरोध किया कि वे पाक सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी को ऐसी किसी भी कार्यवाही करने से रोकें। इस प्रकरण के उजागर होने के बाद अमेरिका में पाकिस्तानी राजदूत हुसैन हक्कानी को इस्तीफा देना पड़ा।

प्रधानमंत्री गिलानी बेईमान घोषित

ये कैसा पाकिस्तान है जहां के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से लेकर सेनाध्यक्ष तक पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट द्वारा बेईमान घोषित किये जाते हैं! पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी एवं प्रधानमंत्री सयैद यूसुफ रजा गिलानी सहित सहित अनेक पाकिस्तानी नेताओं एवं सरकारी अधिकारियों पर पाकिस्तान के न्यायालयों में भ्रष्टाचार के मामले लम्बित थे।

वर्ष 2011 में पाकिस्तान सरकार ने नेशनल रिकॉन्सिलिएशन ऑर्डिनेंस (एनआरओ) लागू करके भ्रष्टाचार के लगभग आठ हजार मामलों को समाप्त कर दिया। इस पर पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (एनएबी) को आदेश दिया कि भ्रष्टाचार के इन प्रकरणों को दुबारा खोला जाए।

सर्वोच्च न्यायालय के पांच सदस्यों की बेंच ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि गिलानी की ईमानदारी संदेहास्पद है और उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ की मर्यादा नहीं रखी। कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद पाकिस्तान की सेना एवं आईएसआई ने गिलानी और जरदारी पर दबाव बनाना आरम्भ किया।

पाकिस्तानी सेना के प्रमुख अशफाक परवेज कयानी ने सरकार को चेतावनी दी कि मेमोगेट प्रकरण पर प्रधानमंत्री द्वारा उनके और आईएसआई प्रमुख के खिलाफ की गई गंभीर टिप्पणी देश के लिए बेहद गंभीर है। सरकार ने सेना प्रमुख के करीबी समझे जाने वाले रक्षा सचिव लेफ्टिनेंट जनरल खालिद नईम लोधी को बर्खास्त कर दिया।

26 अप्रेल 2012 को पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री गिलानी को पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को फिर से खोलने के लिए स्विस अधिकारियों को पत्र लिखने के आदेश का पालन न करने के कारण अवमानना का दोषी करार दिया। 19 जून 2012 को सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए अयोग्य ठहरा दिया। पाकिस्तान की इमरान खाँ सरकार ने गिलानी पर देश से बाहर जाने से रोक लगा दी है।

ये कैसा पाकिस्तान है जहां के प्रत्येक प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के साथ ऐसा ही कुछ होता है!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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