पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता – दूसरे धर्म वालों के लिए पाकिस्तान में जगह नहीं!
पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता इस कदर हावी है कि वहाँ हिन्दू, सिख, बौद्ध एवं ईसाई ही नहीं, मुहाजिरों, शियाओं, अहमदियों और सूफियों का अस्तित्व भी खतरे में है। भारत से पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर अलग हुआ किंतु पाकिस्तान से बांग्लादेश केवल इस कारण अलग हुआ कि पाकिस्तान के मुसलमान अपने आप को बांग्लादेश के मुसलमानों से अधिक श्रेष्ठ मानते थे तथा वे पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल की राजनीतिक पार्टी की सरकार नहीं बनने देना चाहते थे।
भारत-पाकिस्तान के विभाजन ने तो 5 से 10 लाख मानवों के प्राण लिए थे किंतु पाकिस्तान-बांग्लादेश के विभाजन ने 30 लाख लोगों के प्राण लिए। घृणा का यह चक्र अभी थमा नहीं है। पाकिस्तान में आज भी पंजाबी मुसलमान, सिंधी मुसलमान, बिलोचिस्तानी मुसलमान, खैबर-पख्तूनी मुसलमान तथा पाक अधिकृत काश्मीर के मुसलमान एक-दूसरे को नीचा समझते हैं।
भारत से पाकिस्तान गए मुसलमानों को मुहाजिर कहा जाता है तथा उन्हें नीची दृष्टि से देखा जाता है। पाकिस्तान के विगत 72 साल के इतिहास को देखकर कहा जा सकता है कि पाकिस्तान के लोग तब तक लड़ते रहेंगे जब तक कि पाकिस्तान के कुछ विभाजन और नहीं हो जाएंगे। क्योंकि घृणा से घृणा ही जन्म लेती है।
पैंसठ के युद्धकाल में हिन्दुओं का दमन
ई.1965 के युद्धकाल में पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक हिन्दुओं को पाकिस्तानी मुसलमानों द्वारा जासूस और देशद्रोही घोषित किया गया। उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। इसलिए वे भागकर चोरी-छिपे भारत आने लगे। 10 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौते में अल्पसंख्यकों की रक्षा पर भी बल दिया गया किंतु पाकिस्तान ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। आज भी वहाँ हिन्दुओं को द्वितीय स्तर का नागरिक समझा जाता है।
इकहत्तर के युद्धकाल में कई लाख हिन्दू शरणार्थियों का भारत आगमन
ई.1947 के बाद सिंध से हिंदुस्तान की तरफ हिंदुओं का एक बड़ा पलायन 1971 की लड़ाई के समय हुआ और 90,000 सिंधी-हिंदू पाकिस्तान से भारत आ गए। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि उस समय भारत की सेना पाकिस्तान के सिंध प्रांत के थारपारकार जिले में घुस गई थी जिसके संरक्षण के कारण सिंधी-हिन्दू रातों-रात पाकिस्तान छोड़कर भारत में प्रवेश करने में सफल हुए। 1971 के पलायन के समय देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी।
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वह इन हिन्दुओं को भारत में लेने के लिए तैयार नहीं हुई तथा सरकार ने इन हिंदुओं को भारत से पुनः पाकिस्तान की सीमा में धकेलने का प्रयास किया। सरकार ने इन शरणार्थियों पर गोली चलाने तक की धमकी दी किंतु ये शरणार्थी भारत की भूमि पर ही जीने-मरने को अटल थे, वे किसी भी सूरत में वापस पाकिस्तान लौटने को तैयार नहीं थे। अंत में भारत सरकार ने इन्हें स्वीकार किया तथा इन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान की।
28 हजार से अधिक हिन्दू, पाकिस्तान से भारत के बाड़मेर जिले में आए। इन हिन्दुओं में गुरड़ा, लोहार, सिन्धी, पुरोहित, देशान्तरी, नाई, सुथार, बजीर, राजपूत, ग्वारिया, जाट, स्वामी, माहेश्वरी, दर्जी, ब्राह्मण, चारण, भील, मेघवाल, सुनार, लखवारा, भाट, ढोली, खत्री, कलबी आदि विभिन्न जातियों के लोग थे। इनमें से अधिकांश शरणार्थी बाड़मेर जिले में रहे और शेष भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर बस गए।
स्थिर हो गई है पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या
ई.1951 की जनगणना के अनुसार पश्चिमी पाकिस्तान की जनसंख्या 33.7 मिलियन थी जो वर्ष 2017 में बढ़कर 207.77 मिलियन हो गई। 1951 की जनगणना के अनुसार पश्चिमी पाकिस्तान में 1.6 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या थी, सैंतालिस वर्षों के पश्चात् 1997 में भी पाकिस्तान की हिन्दू जनसंख्या 1.6 प्रतिशत ही पाई गई। 1998 की जनगणना के अनुसार पाकिस्तान में 2.1 लाख हिन्दू जनसंख्या बची है। अधिकतर हिंदू पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रहते हैं। पाकिस्तान में रहने वाले कुल हिन्दुओं में से सिंध में 93 प्रतिशत, पंजाब में 5 प्रतिशत तथा ब्लूचिस्तान में 2 प्रतिशत रहते हैं।
पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता के चलते जिस तेजी के साथ हिन्दू गायब हो गए, उसके कारण वर्ष 1998 के बाद से पाकिस्तान में हिन्दुओं के आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं। यदि 1950 से 1998 की अवधि को ही लिया जाए तो इस अवधि में हिन्दुओं की जनसंख्या स्थिर रही जबकि पाकिस्तान की कुल जनसंख्या 6 गुने से अधिक हो गई।
पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या में इसलिए वृद्धि नहीं हुई क्योंकि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू या तो मुसलमान बन गए हैं या फिर पाकिस्तान से हिन्दुओं की जनसंख्या प्रकट एवं परोक्ष रूप से भारत में आई है जिसका अधिकांश हिस्सा सीमावर्ती रेगिस्तानी जिलों बाड़मेर, जैसलमेर तथा जोधपुर में निवास करता है।
पाकिस्तान से आज भी हिन्दुओं का पलायन जारी है। वे अपनी तथा अपने बच्चों की सुरक्षा की आशा में भारत आते हैं तथा भारत सरकार उन्हें नागरिकता से लेकर आवास, पेयजल, रोजगार, शिक्षा-चिकित्सा उपलब्ध कराने का प्रयास करती है।
पाकिस्तान में मुस्लिम लड़कों द्वारा जिस बड़ी तादाद में हिन्दू लड़कियों का बलपूर्वक अपहरण एवं बलात्कार करके उन्हें मुसलमानों से निकाह करने के लिए विवश किया जा रहा है तथा उनका धर्म-परिवर्तन करके उन्हें मुसलमान बनाया जा रहा है, इसको देखते हुए लगता है कि आने वाले कुछ दशकों में पाकिस्तान हिन्दू-विहीन देश हो जाएगा। पाकिस्तान के निर्माताओं ने ऐसे ही पाकिस्तान की कल्पना तो की थी!
सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल
भारत विभाजन के समय उत्तर प्रदेश एवं बिहार से पाकिस्तान गए मुहाजिर मुसलमानों के नेता अल्ताफ हुसैन ने सितम्बर 2000 में लंदन में सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया कि पाकिस्तान का निर्माण सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल थी।
पाकिस्तान एवं बांग्लादेश से आए शरणार्थियों के कारण भारत में जनसंख्या विस्फोट हो गया
ई.1947 में अखण्ड भारत की कुल जनंसख्या लगभग 39.5 करोड़ थी। भारत विभाजन के समय 23.85 प्रतिशत भूमि तथा 16 प्रतिशत जनसंख्या पाकिस्तान को मिली। अर्थात् 33 करोड़ जनसंख्या भारत को एवं 6.5 करोड़ जनसंख्या पाकिस्तान को मिली। आजादी के बाद भारत में जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चलाया गया जबकि पाकिस्तान में इस्लामिक मान्यताओं के कारण जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम नहीं चलाया गया।
पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता के कारण पाकिस्तान से भारत की ओर हुए बड़े स्तर पर जनसंख्या पलायन हुआ जिसके कारण भारत की जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई। 1947 से 2019 के बीच भारत की जनसंख्या 33 करोड़ से बढ़कर 135 करोड़ हो गई तथा भारत में न केवल जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम विफल हो गया अपितु जनसंख्या विस्फोट भी हो गया।
अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार जिन्ना के पाकिस्तान पर बहुत बड़ा कलंक है। पाकिस्तान के मुसलमान अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार इसलिए करते हैं क्योंकि सुन्नियों और शियाओं की दृष्टि में अहमदिया मुसलमान, मुसलमान नहीं हैं।
अहमदिया सम्प्रदाय एक धार्मिक आंदोलन है, जो अविभाजित भारत में 23 मार्च 1889 को आरम्भ हुआ। इस सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक मिर्जा गुलाम अहमद (ई.1835-1908) थे। उनके अनुयाई गुलाम अहमद को मुहम्मद के बाद एक और पैगम्बर एवं नबी मानते हैं जबकि इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार ‘पैगम्बर मोहम्मद’ ख़ुदा के भेजे हुए अन्तिम पैगम्बर हैं। पाकिस्तान में अहमदियाओं को मुसलमान नहीं, अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। इन्हें मिरजई मुसलमान भी कहा जाता है।
अहमदिया समुदाय अल्लाह, कुरान शरीफ ,नमाज़, दाढ़ी, टोपी, बातचीत एवं जीवन-शैली आदि में मुसलमान प्रतीत होते हैं किंतु वे हज़रत मोहम्मद को अपना अंतिम पैगम्बर स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि नबुअत (पैगम्बरी ) की परंपरा अब भी जारी है। इस कारण अन्य मुस्लिम समुदायों के लोग सामूहिक रूप से इस समुदाय का घोर विरोध करते हैं।
अहमदिया मुसलमानों को कादियानी भी कहा जाता है क्योंकि इनका आरम्भ पंजाब के गुरदासपुर जिले के कादियान कस्बे में हुआ था। भारत की आजादी से पहले अहमदिया नेता चौधरी जफरुल्ला खाँ द्वारा दो-राष्ट्र के सिद्धांत के पक्ष में दी गई सशक्त दलीलों के कारण मुहम्मद अली जिन्ना उससे अत्यंत प्रभावित था।
जिन्ना ने चौधरी जफरुल्ला खाँ को 1947 में पाकिस्तान का पहला विदेश मंत्री बनाया। भारत विभाजन के बाद अधिकतर अहमदिया पाकिस्तान चले गए, लेकिन विभाजन के बाद से ही वहाँ उन पर अत्याचार होने लगे, जो धीरे-धीरे चरम पर पहुंच गए। पाकिस्तान में अब इन लोगों का अस्तित्व खतरे में है। अहमदिया खुद को मुसलमान कहते हैं लेकिन पाकिस्तान का कानून उन्हें मुसलमान नहीं मानता।
पाकिस्तान में ई.1953 में पहली बार अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार हुआ जिसमें सैकड़ों अहमदिया मुसलमानों को मौत के घाट उतारा गया। ई.1974 में प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के नेतृत्व में पाकिस्तानी संसद ने अहमदियों को गैरमुस्लिम घोषित किया। इसके बाद पूरे पाकिस्तान में अहमदियों के खिलाफ दंगे हुए। तब से यह समुदाय इस्लामिक देश पाकिस्तान में कानूनी और सामाजिक भेदभाव का शिकार है। उन्हें काफिर कहा जाता है। जब अहमदिया मुसलमान पाकिस्तान पहुंचे तो उन्होंने पाकिस्तान के पंजाब सूबे में अपने लिए रबवा नामक अलग शहर बसाया। रबवा में 50 लाख से अधिक अहमदी रहते थे।
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ई.1974 में सुन्नी कट्टरपंथियों ने अहमदियों की दुकानें और घर लूट लिए और उनमें आग लगा दी। इस हिंसा में हजारों अहमदी मारे गए और कई हजार घायल हुए। पाकिस्तानी सरकार, पाकिस्तानी मुस्लिम समाज एवं आतंकवादी संगठनों द्वारा जुल्म ढाए जाने पर बहुत से अहमदिया पाकिस्तान छोड़कर इंग्लैण्ड चले गए। अहमदियों का बहुत बड़ा समूह रबवा से पलायन करके चीन की सीमा पर शरणार्थी बनकर रहने लगा, शेष अहमदिया पाकिस्तान के भीतर ही रहकर अपने अस्तित्व को समाप्त होते हुए देख रहे हैं।
1980 के दशक में पाकिस्तान के सैनिक शासक जियाउल हक ने पाकिस्तान को पूरी तरह इस्लामिक मुल्क बनाया तब सरकार द्वारा अहमदियों के उपासना स्थल बंद कर दिए गए या ढहा दिए गए। अब वे अपनी इबादतगाहों को मस्जिद नहीं कह सकते। ई.1982 में राष्ट्रपति जिया उल हक ने पाकिस्तान के संविधान में फिर से संशोधन किया। इसके तहत अहमदियों पर पाबंदी लगा दी गई कि वे खुद को मुसलमान नहीं कह सकते और पैगंबर मुहम्मद की तौहीन करने पर मौत की सजा तय कर दी गई।
उनके कब्रिस्तान अलग कर दिए गए। सरकारी आदेश पर अहमदियों की मस्जिदों को ढहा दिया गया। उनके कब्रिस्तान की कब्रों पर लिखी आयतें हटा दी गईं। इस कारण भारी संख्या में अहमदियों का पलायन हुआ।
हजारों अहमदियों ने अपना देश छोड़कर दूसरे देशों में शरण ली। 28 मई 2010 में तालिबानी आतंकियों ने पाकिस्तान में 2 अहमदी मस्जिदों को निशाना बनाया। लाहौर की बैतुल नूर मस्जिद पर फायरिंग की गई, ग्रेनेड फेंके गए और कुछ आतंकी अपने शरीर पर बम बांधकर मस्जिद में घुस गए। इस हमले में 94 लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए। दूसरी मस्जिद दारुल जिक्र भी लाहौर की ही थी।
यहाँ 67 अहमदी मारे गए। इसके बाद उन पर लगातार हमले होते रहे हैं। आज विश्व के 206 देशों में कई करोड़ अहमदी निवास करते हैं किंतु उनके अपने देश पाकिस्तान में अहमदियों की संख्या केवल 30 लाख बची है। भारत में 10 लाख, नाइजीरिया में 25 लाख और इंडोनेशिया में लगभग 4 लाख अहमदिया मुसलमान रहते हैं। अहमदिया मुसलमान सर्वाधिक संख्या में इंग्लैड में निवास करते हैं।
यदि पाकिस्तान में किसी अहमदिया मुसमान को चोरी-छिपे सुन्नी कब्रिस्तान में दफना दिया जाता है तो उसके शव को कब्र एवं कब्रिस्तान दोनों से बाहर निकाल दिया जाता है।
वर्ष 2000 के दशक में चंदासिंह गांव की शिक्षिका नादिया हनीफ के शव को इसी कारण से कब्र से बाहर निकाल दिया गया। इसी प्रकार यदि किसी स्कूल में चोरी-छिपे किसी अहमदिया बालक का नाम लिखवा दिया जाता है तो उसकी पहचान होते ही उसे स्कूल से निकाल दिया जाता है और उसे किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में प्रवेश नहीं दिया जाता।
कुछ साल पहले मानसेरा नामक गांव के हाईस्कूल में एक अहमदी छात्र रहील अहमद के नाम में कादियानी जोड़ दिया गया इस कारण उसे पाकिस्तान की किसी भी यूनिवर्सिटी ने आगे पढ़ने के लिए प्रवेश नहीं दिया। पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों का नरसंहार आज भी जारी है।
मुहम्मद अली जिन्ना ने जिस पाकिस्तान के लिए पांच लाख से अधिक हिन्दुओं एवं सिक्खों का खून बहाया, उस पाकिस्तान में शिया मुसलमानों की हत्या ठीक वैसे ही होती है जैसे कि जिन्ना के अनुयायी भारत में हिन्दुओं एवं सिक्खों की हत्या करते थे।
पाकिस्तान निर्माण के समय पाकिस्तान में शियाओं की जनसंख्या लगभग 35 प्रतिशत थी किंतु 2019 में यह 10 से 15 प्रतिशत अनुमानित की गई। शिया-मुसलमान पाकिस्तान का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। शिया मुसलमान भी अलग-अलग समूहों में विभक्त हैं। अधिकतर शिया तवेलवर समुदाय के हैं। इनके अलावा इस्माइली, खोजा और बोहरा समुदायों की भी अच्छी संख्या है। पाकिस्तान के कट्टर मुसलमान एवं आतंकी संठन इन सभी शिया मुसलमानों की हत्या बिना किसी भेदभाव के करते हैं।
तवेलवर शियाओं में सबसे ज्यादा हाजरा जनजाति के शिया हैं। ये क्वेटा और आसपास के इलाकों में केन्द्रित हैं तथा क्वेटा में इनकी संख्या लगभग 7 लाख है। आतंकी हमलों में मारे जाने वाले हर 10 शिया मुसलमानों में से 5 हाजरा समुदाय के होते हैं। अर्थात् पाकिस्तान में तवेलवर शिया मुसलमानों की हत्या सबसे अधिक होती है।
पाकिस्तान में शिया विरोधी आंदोलन लगभग 34 साल पहले ईरान की क्रांति के बाद आरम्भ हुआ। सुन्नी कट्टरपंथियों की मांग है कि शियाओं को भी काफिर घोषित किया जाए। अलगाववादियों के खूनी संघर्ष के कारण कुर्रम, पराचिनार और हंगू आदि क्षेत्र शियाओं की कब्रगाह बन चुके हैं।
कराची के शिया मोहल्लों को लगभग किलों में बदल दिया गया है। आत्मघाती हमलावर बारूद से भरी कारें लेकर अब्बास टाउन तथा अन्य शिया बहुल नगरों में घुस जाते हैं और बड़ी संख्या में शियाओं की लाशें दिखाई देने लगती हैं।
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ई.1980 से 1985 के बीच जनरल जिया उल हक की सरकार के समय पाकिस्तान का नए सिरे से इस्लामीकरण हुआ और सिपाह-ए-साहबा जैसे कट्टारपंथी संगठनों को फैलने का अवसर मिला। सिपाह-ए-साहबा ने अपने अस्तित्व में आने के बाद से ही शिया संप्रदाय के लोगों पर हमले आरम्भ कर दिए। सुन्नी चरमपंथियों से मुकाबला करने के लिए शियाओं ने तहरीक-ए-निफाज़-ए-फिकाह-जाफरिया नामक संगठन खड़ा किया लेकिन इसके बाद से ही शियाओं पर खूनी हमले आरम्भ हो गए, जो अब तक जारी हैं। पाकिस्तान के अधिकतर आतंकवादी संगठन सुन्नी मुसलमानों के हैं।
ये सभी संगठन शियाओं के खिलाफ कुछ न कुछ हिंसक कार्यवाही करते रहते हैं। तालिबान, अलकायदा और लश्कर-ए-झांगवी ‘देवबंदी मुसलमान’ हैं, जो शियाओं का अस्तित्व मिटा देना चाहते हैं। लश्कर-ए-झांगवी नामक आतंकवादी संगठन ने ई.2011 में पाकिस्तान के शिया मुसलमानों को धमकी दी कि पाकिस्तान के समस्त शिया मुसलमानों को मौत के घाट उतारा जाएगा और पाकिस्तान उनकी कब्रगाह बनेगा।
तब से लश्कर-ए-झांगवी लगातार शियाओं के धार्मिक स्थानों पर हिंसक कार्यवाहियां कर रहा है। हर साल शियाओं पर बड़े हमले करके दहशत फैलाई जाती है ताकि शिया भयभीत होकर अपने घरों को छोड़ दें और एक जगह इकट्ठे हो जाएं।
ई.2012 में 125 से अधिक शिया मुसलमानों की हत्या की गई। ई.2013 में बलूचिस्तान में शिया-हज़ारा-समुदाय के लगभग 200 लोगों को मारा गया। 10 जनवरी 2013 को क्वेटा में हुए 2 धमाकों में 115 लोगों की मौत हो गई जिनमें से अधिकतर ‘हजारा शिया’ थे। इस घटना के एक माह के भीतर ही कैरानी रोड धमाके में 89 शिया मारे गए। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2013 से 2016 तक हुए बम धमाकों में 2,000 से अधिक शिया मुसलमानों को मौत के घाट उतारा गया और लाखों शियाओं को सुन्नी बहुल इलाकों से पलायन करने के लिए विवश किया गया।
पाकिस्तान में शियाओं के लिए सरकारी नौकरी और सुविधाएं भी धीरे-धीरे घटा दी गई हैं। वर्ष 2018 में सैनिक वर्दी पहने कुछ आतंकियों ने रावलपिंडी से गिलगित जा रही चार बसें रुकवाकर अब्बास या जाफरी जैसे शिया नाम वाले 46 लोगों को उतार कर मार डाला। मस्तुंग और क्वेटा में हजारा शिया मुसलमानों की हत्या किसी बड़े नरसंहार से कम नहीं होती। ऐसा नरसंहार पाकिस्तान में अनेक स्थानों पर बार-बार दोहराया गया है।
भारत में लगभग प्रत्येक मुसलमान चाहे वह शिया हो, सुन्नी हो, अहमदिया हो, बोहरा हो, या कुछ और और हो, सूफियों की मजारों पर जाता है, ताजियों में शामिल होता है तथा जियारत करता है किंतु पाकिस्तान में सूफी दरगाहों पर हमले होते हैं क्योंकि वहाँ सूफियों को काफिर माना जाता है।
सदियों से पाकिस्तान सूफी संतों की जमीन रहा है किंतु आज का पाकिस्तान दुनियाभर के आतंकवादियों की शरणगाह बन चुका है। वहाँ मुहाजिरों, शियाओं और अहमदियों के साथ-साथ सूफी समुदाय भी सुन्नी आतंकी संगठनों के निशाने पर है। सूफियों को पाकिस्तान में काफिर और मूर्तिपूजक माना जाता है।
पाकिस्तान में सूफियों की सभी दरगाहें आतंकवादियों के निशाने पर हैं। अहमदियों की तरह सूफियों को भी नागरिक अधिकार और सुविधाएं नहीं दी जाती हैं। पाकिस्तान के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन तहरीके तालिबान ने 2005 से वर्ष 2017 तक 30 सूफी दरगाहों को निशाना बनाया जिनमें से कई दरगाहें 100 साल से अधिक पुरानी हैं।
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इस्लामाबाद में बड़ी इमाम दरगाह, मोहम्मद एजेंसी में हाजी साहब तुरंगजई की दरगाह, पेशावर के चमखानी में अब्दुल शकूर बाबा की दरगाह समेत कई मकबरों, पेशावर में 17वीं सदी के सूफी कवि अब्दुल रहमान बाबा, डेरा गाजी खान में साखी सरवर दरगाह, पाकपत्तन शहर की सूफी दरगाह, चमकानी में फंडू बाबा की दरगाह, सूफी हजरत बाबा फरीद, सूफी अब्दुल्लाह शाह गाजी की दरगाह सहित अनेक दरगाहों पर आतंकी हमले हो चुके हैं। इन हमलों में बड़ी संख्या में सूफी मत में विश्वास रखने वाले मुसलमान मारे गए। कभी अफगानिस्तान भी सूफी पीर औलिया और दरवेशों का केंद्र था लेकिन तालिबानियों ने उन सब को मिटा दिया। फरवरी 2017 में पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में लाल शाहबाज कलंदर की दरगाह पर हुए आतंकी हमले में 100 से अधिक लोग मारे गए और 250 लोग घायल हुए थे।
इससे पहले बलूचिस्तान प्रांत की मशहूर सूफी दरगाह शाह नूरानी पर आतंकी हमले में 52 लोगों की मौत हुई थी। वास्तव में ये आतंकी हमले वहाबी संप्रदाय की सूफियों के खिलाफ चल रही जंग का हिस्सा हैं।
भारत में भी पाकिस्तानी आतंकवादियों ने चरारे शरीफ मजार तथा हजरत बल दरगाह सहित अनेक स्थानों पर बड़े हमले किए हैं।
पाकिस्तान में दीनदार तथा सैयद मुसमलमानों की जिंदगियों में इतना अंतर है जितना अंतर पौराणिक भारत में चाण्डालों और ब्राह्मणों की जिंदगियों में हुआ करता था।
मुस्लिम समाज में सभी मुसलमानों को बराबर समझा जाता है तथा जाति-प्रथा का प्रचलन नहीं है किंतु पाकिस्तान का पूरा मुस्लिम समाज शिया, सुन्नी, अहमदिया, मुहाजिर, सूफी, शेख, सैयद तथा दीनदार आदि कई वर्गों में बंट गया है जो उनकी सामाजिक एवं राजनीतिक हैसियत का आधार है।
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पाकिस्तान में इंसानों का मैला ढोने वाले, मृत पशुओं की खाल उतारने वाले एवं भिश्तियों आदि को दीनदार मुसलमान कहा जाता है। एक तो ये वैसे ही कमतरी के शिकार हैं, और उनकी औलाद अपना पैतृक पेशा अपनाने को मजबूर हैं, दूसरे पाकिस्तान में इन्हें वे सुविधाएं हासिल नहीं हैं जो भारत में हरिजनों को मिलती हैं। इनकी जुर्रत नहीं होती, अपने से ऊँची जात के मुसलमानों के बराबर बैठने की। अधिकतर इन लोगों का काम अपना पैतृक पेशा करना, मजदूरी करना, मरे हुए जानवरों की खाल उतारना और हड्डियों का व्यापार करना है। कोई इक्का-दुक्का दीनदार ही किसी इज्जतदार जगह को हासिल कर पाता है। वरना अधिकतर दीनदारों की जिंदगी शेखों के तलवे चाटते गुजरती है।
इसके विपरीत सैयदों को आले रसूल हजरत मुहम्मद का वंशज कहा जाता है। उनको हक हासिल है दूसरों की बहू-बेटी हथियाने का, लेकिन किसी दूसरे की मजाल नहीं कि वह सयैदानी की तरफ आंख उठाकर भी देख सके। सैयद चाहे चोर, बदमाश या लफंगा ही क्यों न हो, लोग फिर भी उसकी कदम-बोसी ही करते हैं।
उससे ताबीज बनवाते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं। उनकी शान के खिलाफ गलती से भी अगर कोई लफ्ज निकल जाए तो अस्तफिगार पढ़ते हैं। उसकी हुक्म अदूली करना गुनाह समझते हैं। उसके खिलाफ आवाज उठाने को आले रसूल के खिलाफ बगावत समझा जाता है, जिसके कारण मरने के बाद दोजख में जाना होता है।
पाकिस्तान के जनक मुहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों को अच्छी जिंदगी देने के नाम पर पांच लाख हिन्दुओं एवं सिक्खों का खून बहाकर पाकिस्तान बनवाया था किंतु ये कैसा पाकिस्तान है जिसमें करोड़ों मुसलमान नर्क से भी बदतर जिंदगी जी रहे हैं।
नोबेल विजेताओं के लिए जगह नहीं
पाकिस्तान निर्माण के बाद से लेकर यह पुस्तक लिखे जाने तक अर्थात् ई.1947 से 2019 तक पाकिस्तान में केवल दो पाकिस्तानी नागरिकों को नोबेल पुरस्कार मिले हैं। पहले हैं- भौतिकी के वैज्ञानिक डॉक्टर अब्दुस सलाम और दूसरी हैं स्वात क्षेत्र के मिंगोरा शहर की रहने वाली मलाला युसुफ़ज़ई। डॉक्टर अब्दुस सलाम अहमदिया मुसलमान हैं। इस कारण पाकिस्तान उन्हें अपना नागरिक ही स्वीकार नहीं करता जबकि मलाला युसुफ़ज़ई को तालिबानी आतंकी मार डालना चाहते हैं।
ये कैसा पाकिस्तान है जिसमें वैज्ञानिकों के नाम पर चोर पैदा होते हैं जो दूसरे देशों का विज्ञान चुराते हैं और नागरिकों के नाम पर आतंकवादी पैदा होते हैं जो मलाला जैसी लड़कियों को मार डालना चाहते हैं। ये कैसा पाकिस्तान है जहाँ मलाला जैसी लड़कियां आतंक की शिकार होने के बाद पाकिस्तान के राजनेताओं की बजाय भारत के राजनेताओं को गाली देती हैं!
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ओसामा बिन लादेन को शरण
ये कैसा पाकिस्तान है जो पाकिस्तान आतंकियों के शरणस्थली के तौर पर बदनाम हो चुका है। उसने अमीरका पर नौ ग्यारह का आतंकवादी हमला करने के सूत्रधार ओसामा बिन लादेन को एबोटाबाद में शरण दी और जब पाकिस्तान पर ओसामा को शरण देने के आरोप लगे तो पाकिस्तान ने आसोमा बिन लादेन के पाकिस्तान में होने से इन्कार कर दिया।
2 मई 2011 की रात्रि में अमरीकी वायुसेना ने अचानक पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मार डाला तथा उसका शव समुद्र में अज्ञात स्थान पर लेजाकर गाढ़ दिया। ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्तों में दरार आ गई और अमेरिका की जगह चीन ने ले ली।
मेमोगेट प्रकरण से पाकिस्तान की बदनामी
ओसामा बिन लादेन के मारे जाते ही पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी नेताओं के बीच अविश्वास बढ़ गया जिसकी पुष्टि मेमोगेट प्रकरण से हुई। अमेरिका द्वारा ओसामा बिन लादेन को मार गिराए जाने के बाद राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को पाकिस्तान में सैन्य-तख्ता-पलट का डर सताने लगा। जरदारी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा से अनुरोध किया कि वे पाक सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी को ऐसी किसी भी कार्यवाही करने से रोकें। इस प्रकरण के उजागर होने के बाद अमेरिका में पाकिस्तानी राजदूत हुसैन हक्कानी को इस्तीफा देना पड़ा।
प्रधानमंत्री गिलानी बेईमान घोषित
ये कैसा पाकिस्तान है जहां के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से लेकर सेनाध्यक्ष तक पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट द्वारा बेईमान घोषित किये जाते हैं! पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी एवं प्रधानमंत्री सयैद यूसुफ रजा गिलानी सहित सहित अनेक पाकिस्तानी नेताओं एवं सरकारी अधिकारियों पर पाकिस्तान के न्यायालयों में भ्रष्टाचार के मामले लम्बित थे।
वर्ष 2011 में पाकिस्तान सरकार ने नेशनल रिकॉन्सिलिएशन ऑर्डिनेंस (एनआरओ) लागू करके भ्रष्टाचार के लगभग आठ हजार मामलों को समाप्त कर दिया। इस पर पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (एनएबी) को आदेश दिया कि भ्रष्टाचार के इन प्रकरणों को दुबारा खोला जाए।
सर्वोच्च न्यायालय के पांच सदस्यों की बेंच ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि गिलानी की ईमानदारी संदेहास्पद है और उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ की मर्यादा नहीं रखी। कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद पाकिस्तान की सेना एवं आईएसआई ने गिलानी और जरदारी पर दबाव बनाना आरम्भ किया।
पाकिस्तानी सेना के प्रमुख अशफाक परवेज कयानी ने सरकार को चेतावनी दी कि मेमोगेट प्रकरण पर प्रधानमंत्री द्वारा उनके और आईएसआई प्रमुख के खिलाफ की गई गंभीर टिप्पणी देश के लिए बेहद गंभीर है। सरकार ने सेना प्रमुख के करीबी समझे जाने वाले रक्षा सचिव लेफ्टिनेंट जनरल खालिद नईम लोधी को बर्खास्त कर दिया।
26 अप्रेल 2012 को पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री गिलानी को पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को फिर से खोलने के लिए स्विस अधिकारियों को पत्र लिखने के आदेश का पालन न करने के कारण अवमानना का दोषी करार दिया। 19 जून 2012 को सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए अयोग्य ठहरा दिया। पाकिस्तान की इमरान खाँ सरकार ने गिलानी पर देश से बाहर जाने से रोक लगा दी है।
ये कैसा पाकिस्तान है जहां के प्रत्येक प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के साथ ऐसा ही कुछ होता है!
पाकिस्तान की नींव में पाँच लाख हिन्दुओं एवं सिक्खों का खून दबा हुआ है और कम से कम पांच करोड़ लोगों का पलायन छिपा हुआ है। पाकिस्तान बनने के 70 वर्ष बाद भी मौत एवं पलायन ही है पाकिस्तान की नियति !
मर कर भी न मिला चैन
भारत के तीन टुकड़े हो गये किंतु मर कर भी न मिला चैन वाली उक्ति चरितार्थ हुई। अलग होकर भी काश्मीर का विवाद ऊँट की पूँछ की तरह हवा में अटक गया। उसे लेकर पहले ई.1948 में, फिर ई.1965 में, उसके बाद ई.1971 में और उसके बाद ई.1993 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किये।
काश्मीर का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी पाकिस्तान दबाये हुए बैठा है जिसमें से काफी बड़ा हिस्सा उसने चीन को लीज पर दे दिया है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि जम्मू-काश्मीर रियासत से भारत को जो भू-भाग प्राप्त हुआ था उसमें से आज भारत के नियंत्रण में जम्मू, काश्मीर घाटी, लद्दाख एवं सियाचिन ग्लेशियर को मिलाकर केवल 45 प्रतिशत ही बचा है। जबकि पाकिस्तान के नियंत्रण में गिलगित, बाल्टिस्तान एवं आजाद काश्मीर के नाम से 35 प्रतिशत हिस्सा है। शेष 20 प्र्रतिशत हिस्सा अर्थात् अक्साई-चिन तथा ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट चीन के नियंत्रण में है।
ई.1971 में जब पश्चिमी-पाकिस्तान ने पूर्वी-पाकिस्तान की जनता पर जुल्म ढाये तो लगभग एक करोड़ बांगलादेशी भारत में घुस गए। इस पर भारत ने मुक्तिवाहिनी भेजकर बांगलादेशियों की रक्षा की और पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये। इससे पाकिस्तान को विश्व-समुदाय के समक्ष नीचा देखना पड़ा। इसकी कसक आज भी पाकिस्तान के मन में है और विगत कई दशकों से सीमापार से आतंकी हमले हो रहे हैं जिनमें हजारों भारतीय नागरिक और सिपाही अपनी जान गंवा चुके हैं।
आज का भारत मानव सभ्यता के उस मोड़ पर है जहाँ से उसे चंद्रमा और मंगल के धरातल पर मानव के विकास की कहानी नये सिरे से लिखनी है। विज्ञान के क्षेत्र में हमारे कदम इतने आगे बढ़ चुके हैं कि हमने एक साथ 29 सैटेलाइट अंतरिक्ष में लॉन्च किए हैं, अंतरिक्ष में घूमते हुए सैटेलाइट को मार गिराया है तथा भारतीय वैज्ञानिक अंतरिक्ष में युद्धाभ्यास कर रहे हैं किंतु दुर्भाग्य की बात है कि आतंकवादियों के बोझ तले दबा हुआ पाकिस्तान हमारे आगे बढ़ते हुए कदमों को पीछे की ओर खींचता रहता है।
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पिछले 72 वर्षों में पाकिस्तान में हिन्दुस्तान के विरुद्ध नफरत और बैर पलता रहा है। पाकिस्तान के मदरसों में बच्चों को भारत के विरुद्ध नफरत का पाठ पढ़ाया जाता है। जिसके चलते मौत एवं पलायन का सिलसिला जारी है। पाकिस्तान के सैन्य प्रशिक्षण संस्थानों में भारत को शत्रु राष्ट्र के रूप में चित्रित किया जाता है। पाकिस्तान के नेता भारत के विरुद्ध अनर्गल दुष्प्रचार करके चुनाव जीतते हैं। विभाजन के बहत्तर साल बाद भी हमारी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। हम अच्छे पड़ौसी नहीं बन सके हैं।
भारत से अलग होने के बाद से ही पाकिस्तान की तरफ से भारतीय सीमा पर निरंतर बमबारी हो रही है और भारतीय जवान उसका जवाब दे रहे हैं। इस कारण दोनों ओर के सैनिक अनवरत मारे जा रहे हैं। पाकिस्तान से हर साल सैंकड़ों आतंकवादी भारत में घुस आते हैं और निर्दोष प्रजा एवं सैनिकों का संहार करते हुए मारे जाते हैं। पूरी दुनिया यह तमाशा देख रही है और हम पाकिस्तान से शांति की आशा कर रहे हैं।
हमारी पहली और आखिरी इच्छा विश्व में शांति की स्थापना करने की है किंतु क्या हमें पाकिस्तान से उस समझदारी की आशा करनी चाहिये जो भारत और पाकिस्तान को भविष्य में कभी भी दो अच्छे पड़ौसियों के रूप में स्थापित होने में सहायता कर सकती है!
भारत ने अपनी ओर से समझदारी दिखाने के लिये क्या कुछ नहीं किया! सीमापार से लगातार हो रहे आतंकी हमलों और वहाँ से आ रही नकली मुद्रा एवं हथियारों के उपरांत भी भारत ने पाकिस्तान के साथ अपने राजनयिक सम्बन्ध बनाए रखे हैं किंतु इस पर भी पाकिस्तान की ओर से मौत एवं पलायन का क्रम बंद नहीं होता!
पाकिस्तान में आने वाली बाढ़ एवं भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं में उसकी सहायता की है। यहाँ तक कि उसके साथ रेल एवं बस की परिवहन सेवाएं भी चला रखी हैं। बहत्तर साल तक ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा दिए रखने के बाद हमने ‘पुलमावा-त्रासदी’ होने पर उसका यह दर्जा समाप्त किया है।
इसे विडम्बना ही कहा जाना चाहिए कि पुलमावा हमले के बाद भारत को आने वाली कोई भी अंतर्राष्ट्रीय उड़ान पाकिस्तान के ऊपर से होकर नहीं होती, उसे हिन्द महासागर में डेढ़ हजार किलोमीटर का अतिरिक्त मार्ग तय करना पड़ता है किंतु बस और रेल आज भी चल रही हैं!
भारत के वायुयान का अपहरण एवं दहन
जनवरी 1971 में दो काश्मीरी युवकों मोहम्मद अशरफ एवं हाशिम कुरैशी ने श्रीनगर से जम्मू जा रहे भारतीय विमान का अपहरण कर लिया एवं उसे पाकिस्तान ले गए। पाकिस्तान की नियति में मौत एवं पलायन का यह रूप भी लिखा है!
इस पर पाकिस्तान में भारी समारोह मनाया गया। पाकिस्तान सरकार ने भारत सरकार की सहायता करने के स्थान पर भारत पर ही आरोप लगाया कि उसने जान-बूझ कर अपना विमान अपहरण करवाया और उसे पाकिस्तान भेज दिया। पाकिस्तान सरकार ने विमान को खाली करवाकर उसमें बैठे भारतीय नागरिकों को अमृतसर जाने वाले सड़कमार्ग पर छोड़ दिया तथा लाहौर हवाईअड्डे पर खड़े भारतीय विमान में आग लगा दी।
विमान के अपहर्ता मोहम्मद अशरफ एवं हाशिम कुरैशी पाकिस्तान में नायकों की तरह पूजे जाने लगे। लाहौर यूनिवर्सिटी की लड़कियाँ उन्हें सिर आंखों पर बिठाती थीं और कइयों की तो उनके पास रात गुजारने के लिए आपस में तकरार हो जाती थी, क्योंकि वे फख्र महसूस करती थीं कि मुजाहदीने कौम के सााि अपनी रात बिता रही हैं।
इन आतंकियों ने लाहौर, लायलपुर, मुल्तान, मिंटमुगरी आदि स्थानों पर सार्वजनिक रूप से सभाएं की एवं भारत के विरुद्ध भाषण दिए। भारत सरकार के अत्यधिक दबाव बनाए जाने पर इन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें भारत की जेलों से भागकर आया हुआ आतंकवादी मकबूल बट्ट भी शामिल था। इन लोगों ने कोर्ट में बयान दिया कि पाकिस्तान सरकार हम पर बिना मतलब मुकदमा चला रही है, हमने तो यह कार्य पाकिस्तान सरकार की सहमति से किया था।
आतंक की खेती
विगत कुछ दशकों से पाकिस्तान में खुले रूप में आतंक की खेती हो रही है। ताकि मौत एवं पलायन का क्रम अनवतरत रूप से चलता रहे! हजारों देशी-विदेशी आतंकवादी पाकिस्तान में मिलिट्री ट्रेनिंग लेते है। उन्हें हथियार तथा रुपया देकर भारत की सीमा में धकेल दिया जाता है। जब भारत इन आतंकवादियों को पकड़ लेता है तो पाकिस्स्तान की सरकार और मिलिट्री उन्हें छुड़वाने के लिये कई तरह के हथकण्डे अपनाती है।
कांधार प्रकरण इसकी जीती-जागती मिसाल है जब भारत सरकार ने अजहर मसूद को कांधार ले जाकर छोड़ा और वह आज भी पाकिस्तान में रहकर आतंकवादी घटनाओं की साजिश रचता है। वास्तविकता तो यह है कि मसूद अजहर एवं हाफिज सईद जैसे आतंकवादी पाकिस्तान के वास्तविक शासक बन गये हैं।
मौत एवं पलायन के इन आकाओं के आदेश से पाकिस्तान का शासन संचालित होता है। कसाब जैसे आतंकियों को भारत भेजते रहना और भारत की जनता में भय का वातावरण बनाये रखना ही इन आतंकवादियों का वास्तविक उद्देश्य है।
वर्ष 2008 में इस्लामाबाद के मेरियेट होटल में आतंकवादियों ने 50 से अधिक विदेशी नागरिकों को मार डाला। इसके बाद ब्रिटिश एयरवेज ने 11 साल तक पाकिस्तान को अपनी एक भी उड़ान नहीं भरी। सितम्बर 2016 में काश्मीर के उरी मिलिट्री कैम्प पर हमला होने के बाद भारतीय सेना ने 30 सितम्बर 2016 की रात्रि में पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकी लांचिंग पैड्स पर सर्जिकल स्ट्राइक की जिसमें लगभग 50 आतंकी मारे गये तथा आतंकियों के 7 बड़े कैम्प नष्ट हुए। पुलमावा प्रकरण के बाद 26 फरवरी 2019 को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के बालाकोट आतंकी प्रशिक्षण केन्द्र पर हवाई हमला करके बड़ी संख्या में आतंकियों को मार डाला।
परमाणु बम फैंकने की धमकी
डॉ. अब्दुल कादिर खान को पाकिस्तान परमाणु कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। वह ई.1972-75 के बीच एम्सटरडम में फिजिक्स डायनैमिक्स रिसर्च लैबोरेटरी में काम करता था। इस दौरान उसने यूरेनियम के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाईं तथा ई.1976 में नीदरलैंड से कुछ गोपनीय दस्तावेज चुराकर पाकिस्तान भाग आया। पाकिस्तान में कादिर खान ने यूरेनियम संवर्धन प्लांट विकसित किया। वह चोरी-छिपे काम करता रहा। ई.1983 में कादिर खान पर नीदरलैण्ड से न्यूक्लिअर दस्तावेजों की चोरी का आरोप लगा।
इसके बाद कादिर खान का नाम उत्तर कोरिया, ईरान, ईराक और लीबिया को न्यूक्लियर डिजाइन्स और सामग्री बेचने से भी जुड़ा। कादिर खान द्वारा नीदरलैण्ड के यूरेंका ग्रुप की प्रयोगशालाओं से चुराई गई जानकारी के आधार पर ही पाकिस्तान में अपना परमाणु बम विकसित किया।
यूएनओ द्वारा पाकिस्तान से कादिर खान के विरुद्ध कार्यवाही करने को कहा गया। कादिर खान को बंदी बना लिया गया किंतु पाकिस्तान की कोर्ट ने उसे निर्दोष पाया। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर माना जाता है कि पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम में चीन ने मदद की। पाकिस्तान द्वारा परमाणु बम विकसित कर लिए जाने के बाद से, जब भी भारत पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कदम उठाता है तो पाकिस्तान, भारत पर परमाणु बम फैंकने की धमकी देता है।
पाकिस्तान में परमाणु बम का बटन पाकिस्तानी सेना के पास है जो आतंकवाद के अंतर्राष्ट्रीय सरगनाओं द्वारा नियन्त्रित होती है और पाकिस्तान की सरकार को अंधेरे में रखकर कभी भी कोई खतरनाक कदम उठा सकती है।
इसलिये भारत की कार्यवाहियां हमेशा कमजोर दिखाई देती हैं किंतु उरी और पुलमावा हमले के बाद पूरी दुनिया में पाकिस्तान के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन आया है। दुनिया के बहुत से देशों ने भारत द्वारा 30 सितम्बर 2016 तथा 26 फरवरी 2019 को पाकिस्तान में घुस कर किये गये मिलिट्री ऑपरेशन्स को समर्थन दिया है।
भविष्य की आशंकाएँ
इंटरनैशनल फिजिशंस फॉर द प्रिवेंशन ऑफ न्यूक्लियर वार (आईपीपीएनडब्ल्यू) द्वारा दिसंबर 2013 में जारी रिपोर्ट ‘परमाणु अकाल: दो अरब लोगों को खतरा’ में कहा गया कि यदि भारत पाकिस्तान में एक और युद्ध हुआ और उसमें परमाणु हथियारों का प्रयोग किया गया तो सम्भवतः पृथ्वी पर मानव सभ्यता का ही अंत हो जाएगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, परमाणु युद्ध वैश्विक पर्यावरण और कृषि उत्पादन पर इतना बुरा प्रभाव डालेगा कि दुनिया की एक-चौथाई जनसंख्या अर्थात् दो अरब से अधिक लोगों की मृत्यु हो सकती है। ऐसा भी हो सकता है कि भारत और पाकिस्तान के साथ ही चीन की भी पूरी की पूरी मानव जनसंख्या समाप्त हो जाए।
चीन है पाकिस्तान के आतंकियों का समर्थक
भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार ने यूएनओ के माध्यम से मसूद अजहर को अंतराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करवाने के प्रयास नए सिरे से प्रारम्भ किए। पूरी दुनिया को भारत का समर्थन मिला किंतु चीन ने वीटो करके पाकिस्तान का समर्थन किया तथा मसूद अजहर को आतंकी घोषित नहीं किया जा सका। चीन ने कई वर्षों तक यही नीति अपनाई। अंततः अमरीका, रूस, फ्रांस, इंग्लैण्ड सहित विश्व के अनेक देशों के दबाव पर 2 मई 2019 को मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया गया।
नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान को एक्सपोज कर रहे हैं
अमरीका विगत लगभग 70 साल से पाकिस्तान की गरीब जनता को मदद पहुंचाने की आड़ में भारत-रूस मैत्री के विरुद्ध अपनी गतिविधियां चलाता रहा है किंतु त्रासदी यह है कि अमरीका से मिला धन पाकिस्तान के आतंकवादी छीन लेते हैं और उसी धन से वे अमरीका सहित पूरे विश्व में आतंकी गतिविधियों का संचालन करते हैं तथा मौत एवं पलायन का घृणित खेल खेलते हैं।
जब उत्तरी कोरिया ने अमरीका पर परमाणु बम फोड़ने की धमकी दी और चीन पाकिस्तान की सरकार को पैसे देकर ग्वादर बंदरगाह तक चढ़ आया तो अमरीका को एशिया में विश्वसनीय और मजबूत मित्र देश की आवश्यकता पड़ी जो अमरीका और उत्तरी कोरिया के बीच होने वाले संभावित युद्ध के समय अमरीका की सहायता कर सके तथा चीन के विरुद्ध मजबूती से खड़ा रह सके।
इसलिये वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी के भारत का प्रधानमंत्री बनने के बाद से अमरीका के रुख में तेजी से परिवर्तन आया है और उसने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की बजाय भारत का समर्थन करना आरम्भ किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अमरीका, इजराइल एवं जापान के साथ किए गए समझौतों एवं प्रयासों के कारण रूस एवं चीन को भी भारत की तरफ ध्यान देने पर विवश किया है और ये देश पाकिस्तान की बजाय भारत को प्राथमिकता दे रहे हैं।
इस प्रकार भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों के आइने में अन्तर्राष्ट्रीय समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और संसार भर के सामने पाकिस्तान की वास्तविक तस्वीर पहुंच रही है। दुनिया जान रही है कि मौत एवं पलायन के अतिरिक्त पाकिस्तान के पास और कुछ नहीं है।
वे फिर आ रहे हैं …….
रोहिंग्या मुसलमान मूलतः पूर्वी-पाकिस्तान के निवासी हैं किंतु 1960 के दशक में वे भुखमरी से जूझ रहे पूर्वी-पाकिस्तान को छोड़कर म्यांमार (बर्मा) के रखाइन प्रांत में घुस गए। ई.1962 से 2011 तक बर्मा में सैनिक शासन रहा। इस अवधि में रोहिंग्या शांत बैठे रहे किंतु जैसे ही वहाँ लोकतंत्र आया, रोहिंग्या मुसलमान बदमाशी पर उतर आए।
जून 2012 में बर्मा के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों ने एक बौद्ध युवती से बलात्कार किया। जब स्थानीय बौद्धों ने इसका विरोध किया तो रोहिंग्याओं ने बौद्धों पर हमला बोल दिया। इस संघर्ष में लगभग 200 लोग मरे जिनमें रोहिंग्याओं की संख्या अधिक थी।
रोहिंग्याओं ने ‘अराकान रोहिंग्या रक्षा सेना’ का निर्माण किया तथा बौद्धों के कई गांव नष्ट करके बौद्धों के शव खड्डों में गाढ़ दिए। रोहिंग्या रक्षा सेना ने अक्टूबर 2016 में रखाइन में कई पुलिस कर्मियों की भी हत्या कर दी। इसके बाद बर्मा-पुलिस, रोहिंग्याओं को बेरहमी से मारने और उनके घर जलाने लगी।
इस कारण बर्मा से रोहिंग्याओं के पलायन का नया सिलसिला आरम्भ हुआ। उन्होंने नावों में बैठकर थाइलैण्ड की ओर पलायन किया किंतु थाइलैण्ड ने इन नावों को अपने देश के तटों पर नहीं रुकने दिया। इसके बाद रोहिंग्या मुसलमानों की नावें इण्डोनेशिया की ओर गईं और वहाँ की सरकार ने उन्हें शरण दी।
बहुत से रोहिंग्या मुसलमानों ने भागकर बांग्लादेश में शरण ली किंतु भुखमरी तथा जनसंख्या विस्फोट से संत्रस्त बांग्लादेश, रोहिंग्या मुसलमानों का भार उठाने की स्थिति में नहीं है, इसलिए रोहिंग्याओं ने भारत की राह पकड़ी। भारत का पूर्वी क्षेत्र पहले से ही बांग्लादेशी घुसपैठियों से भरा हुआ है, अतः भारत रोहिंग्याओं को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है।
भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा तथा मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले संगठनों से जुड़े बुद्धिजीवियों ने भारत सरकार पर दबाव बनाया कि रोहिंग्या मुसलमानों को भारत स्वीकार करे क्योंकि श्रीलंका तथा तिब्बत से आए बौद्ध शरणार्थियों को, पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों को एवं बांग्लादेश से आए हिन्दू एवं बिहारी-मुस्लिम शरणार्थियों को भारत स्वीकार करता रहा है।
बांग्लादेश तथा बर्मा से आए रोहिंग्या मुसलमान 1980 के दशक से भारत में रह रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी के अनुसार भारत में रोहिंग्या मुसलमानों की पंजीकृत संख्या 14 हजार से अधिक है। भारतीय एजेंसियों के अनुसार भारत में 40 हजार रोहिंग्या अवैध रूप से रह रहे हैं। ये मुख्य रूप से भारत के जम्मू, हरियाणा, हैदराबाद, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि प्रदेशों में रहते हैं। जम्मू में रोहिंग्या मुसलमानों ने हिन्दुओं पर आक्रमण भी किए हैं।
पाकिस्तानियों का पेट भरने वाला कोई नहीं!
अविभाजित भारत का क्षेत्रफल 43,16,746 वर्ग किमी, जनसंख्या 39.50 करोड़ तथा जनसंख्या घनत्व लगभग 92 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी था। ई.1947 में विभाजन के बाद भारत का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी, जनसंख्या 33 करोड़ तथा जनसंख्या घनत्व 100 हो गया।
नवनिर्मित पूर्वी-पाकिस्तान का क्षेत्रफल 1,47,570 वर्ग किमी, जनसंख्या 3.00 करोड़ एवं जनसंख्या घनत्व 203 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी था जबकि पश्चिमी पाकिस्तान का कुल क्षेत्रफल 8,81,913 वर्ग किमी, जनसंख्या 3.5 करोड़ एवं जनसंख्या घनत्व 40 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी था।
इस प्रकार पूर्वी-पाकिस्तान एवं पश्चिमी-पाकिस्तान में जनसंख्या का असमान वितरण हुआ। विगत 72 सालों में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) एवं पश्चिमी पाकिस्तान (अब पाकिस्तान) से भारत की ओर जनसंख्या का पलायन होते रहने पर भी वर्तमान में भारत का जनसंख्या घनत्व 416, बांग्लादेश का 1,116 तथा पाकिस्तान का 265 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है।
परिवार नियोजन का विरोध करने वाले बांग्लादेश एवं पाकिस्तान का जनसंख्या घनत्व तेजी से बढ़ रहा है। बांग्लादेश और पाकिस्तान इस विशाल जनसंख्या का पेट नहीं भर सकते। इस कारण वहाँ की जनता पश्चिमी बंगाल तथा असम सहित भारत के विभिन्न भागों में आकर छिप रही है।
ये वही लोग हैं जिनके लिए जिन्ना ने भारत के शांति-प्रिय लोगों का रक्त बहाकर पाकिस्तान बनाया था। आज इनका पेट भरने वाला कोई नहीं है। संसार में आज इनका कोई दोस्त नहीं है। इन्हें संसार में किसी बात से कोई लेना-देना नहीं है, यदि इनका सम्बन्ध किसी बात से है तो वह है मौत एवं पलायन का अनंतकाल तक चलने वाला सिलसिला!
भारत-पाक सम्बन्ध तो पाकिस्तान बनने से पहले ही बिगड़ चुके थे। पांच लाख हिन्दुओं और सिक्खों का कत्ल करके अस्तित्व में आने वाले पाकिस्तान से भारत के सम्बन्ध कभी भी अच्छे कैसे हो सकते हैं!
3 जून 1947 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी में माउंटबेटन योजना को स्वीकार करते समय भारत-विभाजन की योजना को अस्थाई समाधान बताया गया तथा आशा व्यक्त की गई कि जब नफरत की आंधी थम जाएगी तो भारत की समस्याओं को सही दृष्टिकोण से देखा जाएगा और फिर द्विराष्ट्र का ये झूठा सिद्धांत हर किसी के द्वारा अस्वीकार कर दिया जाएगा।
जिन्ना के कराची चले जाने के बाद सरदार पटेल ने कहा था कि- ‘मुसलमानों की जड़ें, उनके धार्मिक स्थान और केंद्र भारत में हैं, मुझे पता नहीं कि वे पाकिस्तान में क्या करेंगे। बहुत जल्दी वे हमारे पास लौट आयेंगे।’ पाकिस्तान बन जाने के बाद महर्षि अरविंद ने कहा था कि भारत फिर से अखण्ड होगा, यह विभाजन अप्राकृतिक है, यह रह नहीं सकता।
गांधीजी ने कहा था- ‘पाकिस्तान का भारत से अलग होना ठीक वैसा ही है जैसे घर का कोई सदस्य घर से अलग होकर अपने स्वयं के घर में चला गया हो। हमें पाकिस्तानियों का दिल जीतने की जरूरत है न कि उसे मूल परिवार से अलग-थलग करने की।’
तमाम हिन्दूवादी शक्तियां जो हिन्दुओं और मुसलमानों को दो अलग राष्ट्र मानती आई हैं, वे भी पाकिस्तान के बनने के बाद से अखण्ड भारत के पुनर्निर्माण का स्वप्न देख रही हैं किंतु विगत 72 वर्षों से भारत एवं पाकिस्तान के बीच जैसा विषाक्त वातावरण बना हुआ है, उससे लगता नहीं है कि अखण्ड भारत के पुनर्निर्माण की कल्पना कभी सत्य सिद्ध होगी या भारत एवं पाकिस्तान के बीच कभी दोस्ती जैसा कोई सम्बन्ध विकसित होगा।
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भारत-पाकिस्तान के सम्बन्ध सामान्य नहीं होने के वही कारण आज भी मौजूद हैं जो उनके अलग होने के समय मौजूद थे। एक दूसरे के प्रति घृणा और अविश्वास आज भी बना हुआ है। भारत और पाकिस्तान की जनता के बीच स्थाई रूप से विद्यमान इस घृणा को पाकिस्तानी राजनेता ‘कभी न एक्सपायर होने वाले तथा बार-बार एनकैश किए जा सकने वाले चैक’ की तरह भुनाते हैं। भारत-पाकिस्तान में दोस्ती क्यों नहीं हो सकती, इस विषय पर अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक्कानी ने लिखा है- ‘भारत और पाकिस्तान की साझा विरासत के बारे में किसी भी बातचीत को सीधे तौर पर पाकिस्तान की बुनियाद पर हमला माना गया, इसे एक अलग राष्ट्र के तौर पर पाकिस्तान की पहचान को खत्म करने की साजिश समझा गया।’
यह कैसी विचित्र विडम्बना है कि यदि दोनों में से किसी भी तरफ, भारत और पाकिस्तान को एक समझने या एक बताने का प्रयास किया जाता है तो दोनों तरफ से विरोध होता है और यदि इन्हें अलग-अलग बताने का प्रयास किया जाता है तो भी दोनों तरफ से विरोध होता है। इस कारण भारत-पाक सम्बन्ध निचले स्तर पर पहुंच जाते हैं। इस मामले में जवाहरलाल नेहरू का दृष्टिकोण अधिक स्पष्ट जान पड़ता है।
जनवरी 1948 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दिए गए एक भाषण में जवाहरलाल नेहरू ने पाकिस्तान को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि-
‘भारत पाकिस्तान के अलग देश होने के सम्बन्ध में सवाल खड़े नहीं करता। यदि आज किसी भी तरीके से मुझे भारत और पाकिस्तान को फिर से एक करने का मौका दिया जाए तो मैं इसे तुरंत ठुकरा दूंगा, वजह बिल्कुल साफ है। मैं मुश्किलों से भरे पाकिस्तान की दुश्वारियों का बोझ नहीं उठाना चाहता।
मेरे पास अपने मुल्क की बहुत समस्याएं हैं। किसी भी तरह का करीबी सहयोग एक सामान्य तरीके से पैदा होना चाहिए और ऐेसे दोस्तान ढंग से जिसमें पाकिस्तान एक राज्य के तौर पर खत्म न किया जाए अपितु उसे एक बड़े संघ में बराबर का साझीदार बनाया जा सके जिसमें दूसरे कई देश भी जुड़ सकें।’
हक्कानी ने भारत-पाकिस्तान के बीच दोस्ती नहीं पनपने का दोष नेहरू एवं पटेल पर डाल दिया है-
‘नेहरू और उनके ताकतवर गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल ने हालांकि पाकिस्तान के प्रति ऐसा तिरस्कार दिखाया जैसा मुगल बादशाह अपने बागी सूबों के साथ भी नहीं दिखाते थे, पाकिस्तान को अंग्रेजों के इशारों पर इस उपमहाद्वीप के टुकड़े करने का दोषी बताने का कोई मौका नहीं छोड़ा गया।
पटेल ने एक अलग राष्ट्र के तौर पर पाकिस्तान के टिके रह पाने की संभावना पर खुले आम शक जाहिर किया और इस बात पर जोर देते रहे कि देर-सवेर हम फिर से अपने राष्ट्र के प्रति अधीनता दिखाते हुए एक हो जाएंगे। साफतौर पर यह संकेत अखण्ड भारत के लिए था।’
पटेल ने दिसम्बर 1950 में अपनी मृत्यु से पूर्व भारतीयों को याद दिलाया था- ‘मत भूलो कि तुम्हारी भारत माता के अहम अंगों को काट दिया गया है।’ इनमें से किसी भी आश्वासन से पाकिस्तान के उच्च वर्ग को शांत करने में सहायता नहीं मिली। पाकिस्तानी नेता यही मानते रहे कि भारत का अंतिम रणनीतिक लक्ष्य पाकिस्तान को फिर से खुद में मिला लेना है।
हक्कानी ने इसके लिए भारत से पाकिस्तान आए नेताओं को भी दोषी बताया है-
‘नए देश की कमान संभालने वाले बहुत से नेता भारत से पालयन करके आए थे और उस क्षेत्र के निवासी नहीं थे जो कि अब पाकिस्तान बन चुका था। इस कारण उन्होंने पाकिस्तान के विचार को और अधिक मजबूत तरीके से पेश किया ताकि उससे उनका रिश्ता आसानी से जुड़ सके।
उन्होंने हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच कभी न खत्म हो सकने वाले टकराव और दो राष्ट्रों के सिद्धांत पर विशेष जोर दिया। उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री लियाकत अली खाँ हरियाणा की एक छोटी सी रियासत का नवाब था, उसने बार-बार दोहराया कि पाकिस्तान ही वह देश हो सकता था जहाँ पर इस्लामी तौर-तरीके लागू किए जा सकते थे और मुसलमान अपनी काबिलियत के हिसाब से रह सकते थे।
ठीक ऐसे ही विचार भारत से आए समस्त अन्य मंत्रियों ने भी प्रकट किए। प्रशासनिक सेवा के प्रमुख चौधरी मुहम्मद अली ने भी यही कहा जो जालंधर से आया था।
पाकिस्तान को इस्लाम का गढ़ बताना और ‘हिन्दू-भारत’ को ‘मुस्लिम-पाकिस्तान’ से अलग बताना उन सवालों से मुँह तोड़ने का आसान तरीका था कि आखिर जो लोग यूपी, दिल्ली, बम्बई और कलकत्ता जैसी जगहों पर पैदा हुए और वहाँ लगभग पूरी जिंदगी बिता दी थी, आखिर एक ऐसे देश को क्यों भाग रहे थे जहाँ ऐसी जगहें नहीं थीं।’
गुलाम मुर्तजा सईद जो कि सिंध की विख्यात शख्सियत था, उसने अपने सूबे में बाहर से आए अजनबियों को भारी तादाद में बसाए जाने की आलोचना की थी, ये अजनबी लोग बंटवारे के बाद भागकर आए पंजाबी और उर्दू बोलने वाले मोहाजिर थे, उन्हें सिंधी बोलनी नहीं आती थी। पख्तून नेता अब्दुल गफ्फार खान ने इन नेताओं की यह कहकर आलोचना की थी कि उन्होंने आम पाकिस्तानी लोगों को कब्जे में रखने के लिए उनकी जिंदगी को दंगों, हमलों और जिहाद में उलझा कर रख दिया।
हुसैन हक्कानी ने भारत-पाकिस्तान के सम्बन्धों की वास्तविकता बताते हुए लिखा है-
‘जब दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ सीधे तौर पर कोई गड़बड़ी नहीं करते हैं, तब दोनों परमाणु शक्ति सम्पन्न देश एक दूसरे से शीत युद्ध में लगे रहते हैं। पिछले कई सालों से दोनों देशों के नेता मौके-बेमौके मुलाकात करते रहते हैं, आमतौर पर ये मुलाकातें किसी अंतर्राष्ट्रीय बैठक के मौके पर होती हैं और इनमें आधिकारिक स्तर पर बातचीत को फिर से शुरू करने का ऐलान होता है।
कुछ दिनों में भारत में एक आतंकवादी हमला होता है जिसके तार पाकिस्तान में मौजूद जिहादी गुटों से जुड़े होते हैं, यह आपसी बातचीत के इस माहौल को खत्म कर देता है, या फिर जम्मू-काश्मीर से लगी लाइन ऑफ कंट्रोल पर युद्धविराम के उल्लंघन के आरोप लगने लगते हैं।’ हर बार भारत-पाक सम्बन्ध इसी बिंदु पर आकर उलझ जाते हैं!
जिस दिन भारतवासी यह सोचेंगे कि भारत-पाक सम्बन्ध सुधर सकते हैं तो निश्चित समझना चाहिए कि अब भारत अपनी पीठ में एक और छुरी खाने को तैयार है! भारत-पाक सम्बन्ध भूतकाल, वर्तमान एवं भविष्य तीनों ही काल में अंधकारमय होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकते!
पाकिस्तानियों की पहचान आदमियों के ऐसे समूह के रूप में है जो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से भीख मांगकर अपना गुजारा करते हैं और अपने देश को कभी अमरीकियों के हाथों तो कभी चीनियों के हाथों बेचने को मजबूर हैं।
पाकिस्तान का कोई भविष्य नहीं है हर आदमी यहाँ से भाग जाना चाहता है!
पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खाँ की पत्नी राना लियाकत अली खाँ को पाकिस्तान में डायनेमो इन सिल्क कहा जाता है। वे जीवन भर अपने पति लियाकत अली खाँ की हत्या के दोषियों को पकड़ने के लिए संघर्ष करती रहीं तथा पाकिस्तानी महिलाओं के जीवन में सुधार लाने के लिए काम करती रहीं।
11 दिसम्बर 1978 को उन्हें यूनाईटेड नेशन्स द्वारा मानव अधिकार के क्षेत्र में काम करने के लिए सर्वोच्च पुरस्कार दिया गया। वे इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली पहली एशियाई महिला थीं। इस अवसर पर अफ़शीन जुबेर नामक महिला पत्रकार ने राना से लम्बा साक्षात्कार लिया तथा इस दौरान उनसे दो महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे।
पहला प्रश्न यह था कि- ‘क्या आज का पाकिस्तान वैसा ही है जिस पाकिस्तान की कल्पना 1947 में की गई थी?’
इस पर राना ने कहा- ‘नहीं इस पाकिस्तान की कल्पना नहीं की गई थी। यह चाहा गया था कि पाकिस्तान में प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छा से अपने धर्म को मानेगा, यह व्यक्ति और उसके भगवान के बीच का मामला माना जाएगा तथा राजनीति को धर्म से दूर रखा जाएगा किंतु ऐसा बिल्कुल नहीं होने दिया गया। धर्म और राजनीति की घालमेल से लोग अधिक बेईमान हो गए।’
दूसरा प्रश्न- ‘आप पाकिस्तान के भविष्य को किस तरह देखती हैं?’
इस पर राना का जवाब था-
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‘बहुत बदरंग। मैं अच्छे के लिए होने वाले किसी बदलाव को नहीं देख रही। हम नीचे और नीचे जा रहे हैं। मैं पाकिस्तान में किसी ऐसे नेता को नहीं देखती जो पाकिस्तान के समस्त प्रांतों में स्वीकार्य हो। आज हमारे जैसे लोग स्वयं से प्रश्न करते हैं कि पाकिस्तान क्यों बना था किंतु हम स्वयं से यह नहीं पूछते कि आखिर यह प्रश्न पूछना क्यों पड़ रहा है।
पाकिस्तान बनाने का उद्देश्य यह था कि हम संसार को यह दिखा सकें कि आधुनिक राजनीति में इस्लाम, अल्पसंख्यकों के साथ सदाशय होकर, किस तरह से अच्छा करके दिखा सकता है! क्यों आज प्रत्येक व्यक्ति यहाँ से भाग जाना चाहता है? लोगों के साथ जो हो रहा है, उससे वे निराश हो गए हैं। आज की युवा पीढ़ी न तो अपने देश के बारे में जानती है, न नेताओं के बारे में और न उनके गुणों के बारे में।’ अर्थात् राना स्पष्ट शब्दों में कह रही हैं कि पाकिस्तानियों को उनकी जो पहचान मिलनी थी, मिल चुकी है, हालांकि पाकिस्तानियों की पहचान इस रूप में किसी को नहीं चाहिए थी!
दुनिया के लोग पाकिस्तान में नहीं रहना चाहते
पाकिस्तानी लेखक एवं पत्रकार तारेक फतह ने फेस बुक पर एक सवाल लिखकर उस पर आम आदमी की राय मांगी-
‘यदि आपको एक मुस्लिम देश में रहना हो तो निम्नलिखित में से किसमें रहना पसंद करेंगे- ईरान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की या इण्डोनेशिया?’
इस सर्वे में भाग लेने वाले 500 लोगों में से 78 प्रतिशत ने धर्मनिरपेक्ष तुर्की या फिर अपेक्षाकृत उदार इण्डोनेशिया को चुना। तीन स्वघोषित इस्लामिक राष्ट्रों ईरान, पाकिस्तान और सऊदी अरब की स्थिति बहुत बुरी थी। इस सर्वे से पाकिस्तानियों की पहचान की वास्तविक तस्वीर सबके सामने आती है।
नागरिक एवं सैनिक चरित्र का पतन
पाकिस्तान के नागरिक एवं सैनिक जीवन के चरित्र में कितनी गिरावट है, इसके बहुत से उदाहरण पाकिस्तान में भारत के जासूस रहे मोहनलाल भास्कर ने अपनी पुस्तक में लिखे हैं-
किसी ने याह्या खाँ की रखैल अकलीम अखतर उर्फ जेनरल रानी के पुलिस अधिकारी पति से कहा कि तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आती, तुम्हारी बेगम को जनरल लिए घूमता-फिरता है, तो उस पुलिस अधिकारी ने जवाब दिया-‘हमने समाज में जीने के लिए सोचने का तरीका बदल लिया है। हम यह सोचते हैं कि यह बेगम तो जनरल साहब की है, और हमारी रखैल है जिसे कभी-कभी एक रात के लिए हम भी अपने पास रख लेते हैं।’
पाकिस्तान के हर बड़े शहर में वेश्यालय और कॉल हाउस तथा सड़कों पर, बस स्टैण्ड पर शरीर बेचने वाली स्त्रियाँ काफी अधिक संख्या में मिलती हैं। फिर भी इस देश में समलिंगी मैथुन की कुटैव शायद एशिया में सबसे अधिक है। लौंडे पालने का यह रोग पठानी इलाकों से शुरु हुआ और धीरे-धीरे सिंध, बिलोचिस्तान, यहाँ तक कि सारे पाकिस्तान में फैल गया।
70 प्रतिशत फौजी इसके शिकार हैं। पठानों में तो जिस खान के पास लौंडा नहीं होता, उसकी कद्र नहीं होती। हर हमीर खान अपने लौंडे को लड़कियों से अधिक सजाकर रखता है। लंबे पट्टेदार बाल, काजल की धारवाली आंखें, यहाँ तक कि लौंडों पर कत्ल हो जाते हैं। खान अपनी बीवी को तो अकेला छोड़ दे लेकिन लौंडे को नहीं छोड़ता।
कई तो नमाज अदा करते हुए उसे दूर आंखों के सामने बैठा लेते हैं कि कहीं ऐसा न हो कोई उसे उड़ा ले जाए। इस कुटैव के कारण 25 प्रतिशत लोग जिंसी रोगों जैसे सूजाक आतशक आदि के शिकार हैं। ये है बहुसंख्य पाकिस्तानियों की पहचान!
भास्कर ने पाकिस्तान की जेलों में चारित्रिक पतन के वीभत्स दृश्यों का आंखों देखा वर्णन करते हुए लिखा है कि भले घर के कैदियों पर सफाई कर्मचारियों को अप्राकृतिक मैथुन के लिए चढ़ा दिया जाता ……. जब कोई कमसिन लौंडा कैदी होकर आता तो जेल की ड्यौढ़ी में ही गुरु-घंटालों में इस बात पर चाकू निकल जाते थे कि उसका बिस्तरा किसके साथ लगेगा।
अक्सर कैदी लौण्डे बदमाश जेबतराश, उठाइगिरे और वेश्याओं के दलाल हुआ करते थे। इन लोगों का जेल के बाहर भी चरित्र कोई अच्छा नहीं होता था कि जेल में होने वाली कुत्ता-घसीट का विरोध करते, बल्कि खुश होते थे कि चलो कैद तो आराम से कटेगी।
…… जेल के बादशाह खान इनको बीवी की तरह सजा कर रखते। इन्हें जेल की परियां कहा जाता। जिधर से ये गुजर जाते इतर की खुशबू चारों तरफ लहराने लगती। मैंने अपनी जिंदगी में इतना नखरा स्कूल और कॉलेज की लड़कियों में भी नहीं देखा, जितना इन लौंडों में होता था।
रंगदार सब्ज गुलाब, नसवारी या मोतिया रंग के रेशमी कुर्ते और सलवारें पहने, पट्टेदार बाल बढ़ाए आंखों में कजरे की धार और मुुंह पर पाउडर लगाए हाथ में तीतर या बटेर पकड़े ये जेल में यूं चला करते जैसे मुगल राजाओं के रहम में बेगमें मटका करती थीं।
और तो और इनकी सलवार के नाड़े भी जालीदार होते जिनके सिरों पर मोतियों की झालरें लगी होती थीं। मोहनलाल भास्कर ने और भी बहुत से आंखों देखे विवरण लिखे हैं जिन्हें यहाँ मनुष्य की नैतिक मर्यादा को ध्यान में रखते हुए, न लिखना ही ठीक होगा किंतु इन्हें पढ़कर पाकिस्तानी जन-जीवन की नैतिक गिरावट का वास्तविक अनुमान हो जाता है।
मुल्ला और सेना का रास्ता
अगस्त 1947 में भारी खून-खराबे के साथ पैदा होने से लेकर आज तक पाकिस्तान का इतिहास उथल-पुथल, युद्ध और नागरिक कलह वाला रहा है। बीच-बीच में छन-छन कर कभी-कभी खुशी के मौके भी आते रहे हैं। हालांकि उनका अंत ज्यादा दुःख देने वाला ही रहा है।
ऐसा ही दुर्लभ मौका फरवरी 2008 में चुनाव के बाद आया था जब पूरे देश में मानो बिजली सी दौड़ गई थी। मरहूम बेनजीर भुट्टो की पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग ने मिलकर पाकिस्तान के मुल्ला-सैन्य सत्ता प्रतिष्ठान को ध्वस्त कर दिया था लेकिन क्या ये फैसला कोई मायने रखता है?
पाकिस्तान के अवाम की इच्छा को रौंदकर हमेशा मुल्ला और सेना के लिए रास्ता बनाया जाता रहा है। 60 साल के इतिहास में पाकिस्तानियों ने प्रत्येक चुनाव में उन लोगों को खारिज किया है जो इस्लाम को अपनी राजनीति बताते हैं।
…… पाकिस्तानियों ने अपने देश को इस्लामी भविष्य से दूर रखने के लिए वोट दिया। तालिबान समर्थक इस्लामिक दलों की भीषण हार और सैक्यूलर मध्य दक्षिण एवं मध्य-वाम पार्टियों की सफलता यहाँ तक कि अफगानिस्तान से सटी कट्टर पख्तून पट्टी में यह कारनामा मुल्ला, सेना और बाकी दुनिया को साफ संदेश हैः ज्यादातर मुसलमानों की तरह पाकिस्तानी भी इस्लामी आतंकवादियों के मध्ययुगीन शासन के तहत नहीं रहना चाहते हैं। सवाल यह है कि क्या कोई सुन रहा है?
वास्तविक जड़ों की ओर लौटना ही एकमात्र उपाय
इतिहासकार अकबर एस. अहमद ने लिखा है- ‘सामान्य भारतीय मुसलमान के दिमाग में तीन आदर्श पुरुष थे- महमूद गजनवी, औरंगजेब और मुहम्मद अली जिन्ना।’
हालांकि यह बीते युग की बात है, आज भारतीय मुसलमानों के नायक बदल गए हैं। हमारे पास कैप्टेन हमीद और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे बहुत से नाम हैं किंतु दुर्भाग्य से पाकिस्तान के मुसलमान अपने पुराने अथवा नए नायकों में से केवल एक नाम ले सकते हैं- मुहम्मद अली जिन्ना!
उनके पास दूसरा कोई ऐसा नाम नहीं है जिसे पाकिस्तान से बाहर किसी भी देश का नागरिक जानता हो, न अल्लामा इकबाल को न लियाकत अली खाँ को, न रहमत अली चौधरी को और न परमाणु बम का फार्मूला चुराने वाले डॉ. अब्दुल कादिर खान को। जबकि प्रत्येक देश के पास अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गिनाने के लिए दो-चार-पांच या दस-बीस और सौ-दो सौ नाम होते ही हैं जिन्हें दुनिया के दूसरे देशों में भी जाना जाता है।
यही कारण है कि आज पूरी दुनिया में पाकिस्तानियों के सामने पहचान का संकट है। उनकी राष्ट्रीय पहचान क्या है? क्या केवल जिन्ना? भले ही पाकिस्तान में आज जिन्ना को पूजा जाता हो किंतु जब एक पढ़ा-लिखा एवं चिंतनशील पाकिस्तानी-युवा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर खड़ा होता है तो गजनवी, गौरी और जिन्ना उसके नायक नहीं रह जाते।
उसे अपने असली नायकों की तलाश अपने ही देश के भीतर करनी होती है। जब उसकी दृष्टि जनरल अयूब खाँ, जनरल याह्या खाँ, जनरल जिया-उल हक और जनरल मुशर्रफ जैसे फौजी शासकों पर जाती है तो उसका सिर शर्म से झुक जाता है।
पाकिस्तान की राजनीतिक विरासत से ध्यान हटाकर जब पाकिस्तान का चिंतनशील युवा पाकिस्तान की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को टटोलता है, तब वह पाता है हजारों साल पुराने वेदों को जिनकी रचना सिंधु-सरस्वती के उन तटों पर हुई जो आज पाकिस्तान के हिस्से हैं।
अपने देश के भीतर झांकने पर एक बुद्धिजीवी पाकिस्तानी को तक्षशिला में पढ़ाते हुए पाणिनी और चाणक्य दिखाई देते हैं। उसे सिंधु सभ्यता के खण्डहरों में हड़प्पा और मोहेनजोदड़ो के गौरवशाली नगर दिखाई देते हैं। उसे स्वीकार करना पड़ता है कि वास्तव में यही उसकी सांस्कृतिक जड़ें हैं। इनसे दूर वह कब तक और कैसे भाग सकता है?
इतना होने भर से क्या होता है, पाकिस्तानी भी जानते हैं और हम भी जानते हैं कि पाकिस्तानियों की पहचान कभी भी पाणिनी या तक्षशिला नहीं हो सकते, उनकी पहचान चाकू छुरे, बम, गोले ही हो सकते हैं। कसाब और हाफिज सईद ही हो सकते हैं!
आज पाकिस्तान के कुछ बुद्धिजीवी पाणिनी को अपना भाग मान रहे हैं और उनकी उपासना शुरू हो गई है। तक्षशिला उनके लिए गौरव बनता जा रहा है। वे कहते हैं कि वेद पाकिस्तान की धरोहर हैं। भले ही बहुसंख्य पाकिस्तानी उनकी (बुद्धिजीवी पाकिस्तानियों की) बातों से सहमत हों, असहमत हों किंतु आज पाकिस्तान में ये बातें हो रही हैं।
क्योंकि कोई भी समाज बहुत दिनों तक अपने मूल से कटकर जिंदा नहीं रह सकता। सिंध (पाकिस्तान) के नेता जी. एम. सैयद गिलानी ने एक बार दिल्ली आने पर इच्छा व्यक्त की कि मैं देवनागरी नहीं पढ़ सकता, अतः मुझे उर्दू लिपि में मीरा और कबीर का साहित्य चाहिए।
तो क्या हमें आशा करनी चाहिए कि एक दिन सचमुच पाकिस्तान अपनी जड़ों को पहचान कर उनकी ओर का रुख करेगा? ये अलग बात है कि उस दिन को देखने के लिए हम इस दुनिया में नहीं होंगे। हमारे जीवनकाल में पाकिस्तानियों की पहचान वही बनी रहेगी, जो कल थी या जो आज है!
इस पुस्तक को लिखते समय मेरे मन में कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रह गए, उनमें से कुछ कुछ अनुत्तरित प्रश्न पाठकों के समक्ष रख रहा हूँ-
(1) बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपतराय, विपिन चंद्र पाल, अरविंद घोष, मोहनदास गांधी, जवाहर लाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, सुभाषचंद्र बोस आदि कांग्रेसी नेताओं तथा वीर सावरकर जैसे गैर-कांग्रेसी नेताओं को भारत की आजादी मांगने के अपराध में जाने कितनी ही बार जेल जाना पड़ा किंतु जिन्ना, लियाकत अली सहित मुस्लिम लीग के किसी भी नेता को बिना एक बार भी जेल गए, पाकिस्तान कैसे मिल गया?
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(2) पंजाब में ई.1937 से हिन्दुओं, मुसलमानों एवं सिक्खों की मिली-जुली सरकार चल रही थी जिसका नेतृत्व यूनियनिस्ट पार्टी का नेता मलिक खिजिर हयात खाँ कर रहा था। फरवरी-मार्च 1947 में लीग के गुण्डों ने सड़कों पर छुरेबाजी एवं आगजनी करके हयात खाँ की सरकार को इस्तीफा देने पर विवश कर दिया तब अंग्रेज गवर्नर ने पंजाब में मुस्लिम लीग की सरकार क्यों बनवाई?
(3) जब जिन्ना एवं लियाकत अली द्वारा आहूत सीधी कार्यवाही के दौरान हजारों निर्दोष नागरिकों की निर्मम हत्या कर दी गई तब वैवेल सरकार ने जिन्ना और लियाकत अली सहित मुस्लिम लीग के किसी भी नेता को गिरफ्तार क्यों नहीं किया! उन पर कोई मुकदमा क्यों नहीं चलाया?
(4) जब सीधी कार्यवाही के दौरान बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने खुलेआम हिंसा की कार्यवाही में भाग लिया तब वैवेल सरकार ने सुहरावर्दी की सरकार को बर्खास्त क्यों नहीं किया, उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया! उस पर कोई मुकदमा क्यों नहीं चलाया?
(5) कांग्रेस के नेताओं तथा अंग्रेज अधिकारियों को राष्ट्रीय स्वयं संगठन हिंसक कार्यवाहियों वाला संगठन दिखता था किंतु उन्हें यह दिखाई क्यों नहीं दिया कि मुस्लिम लीग ने ‘मुस्लिम नेशनल गार्ड’ के नाम से 39 हजार लोगों की खूनी एवं हथियारबंद फौज खड़ी कर ली है और वह प्रतिदिन निर्दोष नागरिकों के साथ हिंसा कर रही है।
(6) यदि कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के ई.1940 के पाकिस्तान प्रस्ताव को समय रहते मान लिया होता तो क्या बंटवारे के समय हुए 10 लाख लोगों की हत्या और 1 लाख महिलाओं के बलात्कार को टाला जा सकता था?
(7) गांधीजी बार-बार यह क्यों कहते रहे कि कांग्रेस भारत-विभाजन का विरोध करेगी, यदि भयानक उपद्रव का खतरा हो तो भी! यहाँ तक कि यदि सम्पूर्ण भारत जल जाए तब भी?
(8) पटेल और नेहरू की असहमति के बावजूद गांधीजी ने पाकिस्तान को उस समय 55 करोड़ रुपए क्यों दिलवाए जबकि पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ रखा था तथा भारत सरकार पाकिस्तानी प्रांतों से लगभग 300 करोड़ रुपए मांगती थी। क्या गांधीजी को पता नहीं था कि पाकिस्तान उन रुपयों से गोला-बारूद खरीदकर भारत की निर्दोष जनता को ही मारेगा?
(9) भारत से पाकिस्तान गए शरणार्थियों को पाकिस्तान सरकार ने हिन्दुओं द्वारा छोड़े गए घर तुरन्त दे दिए किंतु भारत सरकार ने पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को सड़कों पर खुले आकाश में रहने के लिए विवश क्यों किया?
(10) नदी जल समझौते के अनुसार जिन तीन नदियों का जल भारत को मिला है, भारत विगत 72 साल से उस जल का उपयोग क्यों नहीं कर रहा है, वह जल पाकिस्तान को क्यों जा रहा है जबकि भारत में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान इन नदियों से आने वाले जल के लिए आपस में लड़ रहे हैं।
(11) भारत के विभाजन के बाद भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में आज तक शांति स्थापित क्यों नहीं हो पाई?
प्रश्न और भी हैं और रहेंगे ……. प्रश्न कभी खत्म नहीं होते। कुछ अनुत्तरित प्रश्न इतिहास का दरवाजा खटखटाते रहते हैं।
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...