Home Blog Page 84

चंगेज खाँ ने मुस्लिम देशों में विनाश किया (4)

0
चंगेज खाँ ने मुस्लिम देशों में विनाश किया - www.bharatkaitihas.com
चंगेज खाँ ने मुस्लिम देशों में विनाश किया

एक छोटे से कबीले का मुखिया चंगेज खाँ (Genghis Khan or Changes Khan) अब पेकिंग तथा खीवा के दो विशाल साम्राज्यों का स्वामी था किंतु इन राज्यों से संतुष्ट होने की बजाय दुनिया को अपने अधीन करने की उसकी भूख बढ़ गई। इस कारण चंगेज खाँ की सेनाएं पश्चिम दिशा में बढ़ती ही चली गईं। उन्होंने कैस्पियन सागर के उत्तर में स्थित रूस पर हमला किया। रूस भी मंगोलों (Mangols) के सामने नहीं टिक सका। कालासागर के उत्तर में स्थित ‘कीफ’ नामक स्थान पर रूसी सेनाएं मंगोलों से हार गईं। मंगोलों ने रूस के राजा को कैद कर लिया।

ई.1221 में मंगोलों ने चंगेज खाँ के नेतृत्व में आमू नदी के किनारे पर स्थित ख्वारिज्म नामक राज्य पर आक्रमण किया। चंगेज खाँ के जन्म के समय ख्वारिज्म खीवा के तुर्की (Turkey) राज्य का ही हिस्सा था किंतु जब मंगोलों ने खीवा पर अधिकार कर लिया तब ख्वारिज्म खीवा से अलग स्वतंत्र राज्य बन गया। चंगेज खाँ ख्वारिज्म को इस तरह नहीं छोड़ सकता था क्योंकि वे किसी भी समय मंगोलों के लिए खतरा बन सकते थे।

इसलिए चंगेज खाँ (Genghis Khan or Changes Khan) ने पूरी तैयारी के साथ ख्वारिज्म पर आक्रमण किया। ख्वारिज्म (Khwarezm or Khwarazm) का शहजादा जलालुद्दीन अपनी जान बचाने के लिए भारत भाग आया। शहजादे जलालुद्दीन ने सिन्धु नदी के तट पर अपना खेमा लगाया तथा दिल्ली के तुर्क सुल्तान से शरण मांगी। वर्तमान समय में ख्वारिज्म राज्य का कुछ हिस्सा उज्बेकिस्तान में तथा कुछ हिस्सा तुर्कमेनिस्तान (Turkmenistan) में है।

उस समय उत्तरी भारत में अफगानिस्तान से आए तुर्क सुल्तानों (Turk Sultan) का शासन था। उनकी राजधानी दिल्ली थी तथा तुर्कों के इल्बरी कबीले में उत्पन्न इल्तुतमिश (Shams-ud-Din Iltutmish) दिल्ली का सुल्तान था। चंगेज खाँ (Genghis Khan or Changes Khan) भी बिफरे हुए तूफान की भाँति, ख्वारिज्म के शहजादे जलालुद्दीन का पीछा करते हुए भारत में घुस आया। चंगेज खाँ ने हिन्दुकुश पर्वत को लांघकर सिंधु नदी पार की तथा पंजाब में लाहौर तक के प्रदेश पर अधिकार कर लिया। लाहौर से दिल्ली केवल 250 मील रह जाता है। इसलिए दिल्ली का सुल्तान इल्तुतमिश चंगेज खाँ के आक्रमण की संभावना से भयभीत हो गया।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इल्तुतमिश ने मंगोलों की क्रूरताओं (Mongol Atrocities) के बड़े किस्से सुने थे। इल्तुतमिश जानता था कि मंगोलों की शक्ति के समक्ष दिल्ली सल्तनत कुछ भी नहीं है तथा मंगोल (Mongol) इस समय तुर्कों के राज्य (Turk Principalities) नष्ट करने के अभियान पर हैं। इसलिए दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने ख्वारिज्म के शहजादे को शरण देने से मना कर दिया तथा चंगेज खाँ को उपहार भेजकर उसे प्रसन्न करने का प्रयास किया। जब ख्वारिज्म के तुर्क शहजादे को यह बात ज्ञात हुई तो वह दिल्ली के तुर्क सुल्तान की तरफ से निराश होकर भारत से चला गया। इल्तुतमिश के सौभाग्य से चंगेज खाँ (Genghis Khan or Changes Khan) भी उसके पीछे-पीछे चला गया क्योंकि चंगेज खाँ भारत में अपना राज्य जमाने का इच्छुक नहीं था। चंगेज खाँ तो चला गया किंतु इस अभियान के माध्यम से मंगोलों के पैर भारत की भूमि पर पड़ चुके थे तथा उन्हें भारत की राजनीतिक कमजोरी का भी पता लग चुका था। इस कारण कुछ ही वर्षों में मंगोलों ने सिन्धु नदी पार करके सिन्ध तथा पश्चिमी पंजाब में अपने गवर्नर नियुक्त कर दिये। उस समय दिल्ली सल्तनत पर तुर्की सुल्तान बलबन का शासन था। हालांकि बलबन ने मंगोलों से कई युद्ध किए तथा मंगोलों को परास्त किया किंतु बलबन के लिये यह संभव नहीं था कि वह मंगोलों को भारत से पूरी तरह निष्कासित कर सके।

ई.1227 में चंगेज खाँ की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के समय उसका साम्राज्य प्रशांत महासागर से आरम्भ होकर काला सागर तक विस्तृत था। यदि हम एशिया का नक्शा देखते हैं तो सम्पूर्ण एशिया अपने पूर्वी छोर से लेकर पश्चिमी छोर तक प्रशांत महासागर से लेकर काला सागर के बीच ही स्थित है।

चंगेज खाँ (Genghis Khan or Changes Khan) ने चीन का अधिकांश भाग, रूस का दक्षिणी भाग, मध्य-एशिया का सम्पूर्ण भाग, तुर्की अर्थात् एशिया कोचक, पर्शिया अर्थात् ईरान और अफगानिस्तान के विशाल प्रदेशों को जीत लिया। विश्व-इतिहास में सिकंदर महान् तथा अशोक महान् के नामों से विख्यात विजेताओं के साम्राज्य भी चंगेज खाँ के साम्राज्य की तुलना में तुच्छ थे।

इस विशाल मंगोल साम्राज्य की राजधानी चीन के उत्तर में स्थित थी जिसे कराकुरम के नाम से जाना जाता था। यह मंगोलों की सबसे बड़ी बस्ती थी। इस क्षेत्र को आज भी मंगोलिया के नाम से जाना जाता है। इस काल में मंगोल, इस्लाम से घृणा करते थे। इस कारण जब मंगोल सेनाएं किसी मुस्लिम राज्य पर अधिकार करती थीं तो अत्यधिक विनाश मचाती थीं। चंगेज खाँ द्वारा खीवा, ख्वारिज्म तथा अफगानिस्तान के मुस्लिम राज्यों को मसलकर धूल में मिला देने का मुख्य कारण यही था।

चंगेज खाँ (Genghis Khan or Changes Khan) के बाद उसका पुत्र उदगई खाँ मंगोलों का राजा हुआ। उसे ओगताई खाँ भी कहा जाता है। उसने अपने राज्य को काला सागर से भी आगे बढ़ा लिया। उसने सम्पूर्ण चीन पर अधिकार कर लिया तथा चीन का ‘सुंग’ राज्य भी मंगोल राज्य का हिस्सा बन गया। उदगई खाँ के भाई बातू खाँ ने सम्पूर्ण रूस एवं पौलेण्ड को भी मंगोलों के अधीन कर लिया।

अब यूरोप कभी भी मंगोल साम्राज्य (Mangol Samrajya) की झोली में गिर सकता था। बातू खाँ ने पवित्र रोमन साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया। जर्मनी का शासक फ्रेडरिक (द्वितीय) उस समय ‘पवित्र रोमन साम्राज्य’ का स्वामी था। उसने अपनी सेनाओं को बातू खाँ से युद्ध करने भेजा। बातू खाँ ने जर्मनी की सेनाओं को भी परास्त कर दिया किंतु इसी समय ई.1242 में मंगोल सम्राट (Mangol Samrat) उदगई खाँ (Udgai Khan or Udegei Khan or Udgay Khan) की मृत्यु हो गई तथा अगले सुल्तान के प्रश्न पर मंगोलों में गृहयुद्ध छिड़ गया। इस कारण पश्चिमी यूरोप मंगोलों की दाढ़ में जाने से बच गया।

ई.1251 में मंगू खाँ अथवा मोंगके खान (Mangu Khan or Möngke Khan) मंगोलों का सम्राट हुआ। उसने तिब्बत पर भयानक आक्रमण किया तथा देखते ही देखते विशाल तिब्बत पर भी मंगोलों का अधिकार हो गया। मंगू खाँ को मंगोलों के इतिहास में ‘खान महान’ (Khan Mahan, The fourth Great Khan of the Mongol Empire) कहा जाता है। वह अपने भाई हलाकू अथवा हुलागू (Hulagu Khan or Halaku or Hulegu) की अपेक्षा थोड़ा उदार था। इसलिए मुसलमानों, ईसाइयों तथा बौद्धों में होड़ मची कि किसी तरह मंगू खाँ को प्रसन्न करके उसे अपने धर्म में सम्मिलित कर लिया जाए। रोम के पोप ने भी अपने कैथोलिक-एलची मंगू खाँ के पास भेजे। नस्तोरियन-ईसाई भी पूरी तैयारी के साथ मंगू खाँ के चारों ओर मण्डराने लगे।

मुसलमान और बौद्ध प्रचारक भी तेजी से अपने काम में जुट गए। मंगू खाँ को धर्म जैसी चीज में अधिक रुचि नहीं थी फिर भी वह ईसाई बनने को तैयार हो गया। जब रोम के एलचियों ने मंगू खाँ को पोप तथा उसके चमत्कारों की कहानियां सुनाईं तो मंगू खाँ भड़क गया और उसने कोई भी धर्म स्वीकार करने से मना कर दिया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खलीफा की औरतें बगदाद की गलियों में घसीटी गईं (5)

0
खलीफा की औरतें बगदाद की गलियों में घसीटी गईं - www.bharatkaitihas.com
खलीफा की औरतें बगदाद की गलियों में घसीटी गईं

मंगोल (Mongol) बगदाद (Baghdad) में भूखे गधों की तरह घुस गए और जिस तरह भूखे भेड़िये, भेड़ों पर हमला करते हैं, वैसा करने लगे। बिस्तर और तकिए चाकूओं से फाड़ दिए गए। खलीफा (Caliph or Khalīfa) की औरतें बगदाद की गलियों में घसीटी गईं और तातरियों का खिलौना बनकर रह गईं।

जब मंगू खाँ अथवा मोंगके खाँ मंगोलों का सम्राट (Mongol Empire) हुआ तो उसने अपने चचेरे भाई हुलागू खान अथवा हलाकू को बगदाद पर आक्रमण करने भेजा जो कि उस काल में मुसलमानों के सबसे बड़े शासक खलीफा (Caliph or Khalifa) की राजधानी था। मंगू खाँ (Mangu Khan, 1209–1259) तथा हुलागू खान (Hulagu Khan c. 1217–1265), चंगेज खाँ (Genghis Khan c. 1162–1227) के पोते थे और आपस में चचेरे भाई लगते थे।

हुलागू खान (Hulagu Khan) एक विशाल सेना लेकर बगदाद (Baghdad) की तरफ रवाना हुआ तथा उसने एक संदेशवाहक के हाथों बगदाद के खलीफा (Khalifa) को एक पत्र भिजवाया जिसमें लिखा था- ‘लोहे के सूए को मुक्का मारने की कोशिश न करो। सूरज को बुझी हुई मोमबत्ती समझने की गलती न करो। बगदाद की दीवारें तुरन्त गिरा दो। उसकी खाइयां पाट दो, हुकूमत छोड़ दो और हमारे पास आ जाओ। यदि हमने बगदाद पर चढ़ाई की तो तुम्हें न गहरे पाताल में शरण मिलेगी और न ऊंचे आसमान में।’

इस समय बगदाद (Baghdad) पर अब्बासी (Abbasi) परिवार का 37वां खलीफा (Khalifa) मुसतआसिम बिल्लाह शासन करता था। उसके पास वह सैनिक-शक्ति नहीं थी जो उसके पूर्वज खलीफाओं के पास थी किंतु फिर भी एशिया के समस्त मुस्लिम राज्यों पर उसका प्रभाव था। खलीफा को आशा थी कि बगदाद पर हमले की सूचना पाकर मराकश से लेकर ईरान तक की मुस्लिम सेनाएं स्वतः ही बगदाद एवं खलीफा की रक्षा के लिए चली आएंगी।

इसलिए खलीफा (Khalifa) ने हलाकू को कठोर भाषा में उत्तर भिजवाया। इस पत्र में खलीफा ने लिखा-‘नौजवान! दस दिन की ख़ुशकिस्मती से तुम स्वयं को संसार का स्वामी समझने लगे हो। मेरे पास पूरब से लेकर पश्चिम तक ख़ुदा को मानने वाली रियाया है। यदि अपनी सलामती चाहते हो तो वहीं से लौट जाओ।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

खलीफा (Khalifa) का जवाब पाकर हलाकू अथवा हुलागू खान (Hulagu Khan) के क्रोध का पार नहीं रहा। इसलिए वह एक विशाल सेना लेकर ईराक की ओर बढ़ा। उन्हीं दिनों कुछ शिया सरदारों ने खलीफा का आधिपत्य मानने से मना कर दिया। इस कारण नजफ, करबला और मोसुल आदि शिया बहुल शहरों ने युद्ध के बिना ही मंगोलों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। 29 जनवरी 1258 को हलाकू ने एक विशाल मंगोल सेना के साथ बगदाद को घेर लिया। यद्यपि इस समय वह अपनी मातृभूमि मंगोलिया (Mangolia) से साढ़े छः हजार किलोमीटर दूर था किंतु उसे अपने मंगोल सिपाहियों की क्षमता पर पूरा भरोसा था। इसलिए उसने खलीफा (Khalifa) की धमकी में नहीं आने का निश्चय किया तथा अपने चचेरे भाई मंगू खान को संदेश भिजवाकर उससे कुछ और सेनाएं मंगवा लीं। आरमेनिया और जॉर्जिया से भी इसाई सेनाएं हलाकू के साथ आ मिलीं। इतिहासकारों के अनुसार आरमेनिया तथा जॉर्जिया के शासक मुसलमानों के खलीफा को समाप्त करके क्रूसेड्स में हुई अपनी पुरानी पराजयों का बदला लेना चाहते थे।

संभवतः ये इतिहासकार गलत हैं क्योंकि ईसाई सेनाएं हलाकू की सहायता के लिए इसलिए आई थीं क्योंकि हलाकू की मुख्य रानी दोकुज खातून ‘नोस्टोरियाई-ईसाई’ थी और हलाकू ‘बौद्ध’ था।

इस कारण वे दोनों ही स्वयं को मुसलमानों के शत्रु समझते थे और उस काल के ‘ईसाई’ हुलागू खान (Hulagu Khan) को अपना स्वाभाविक मित्र मानते थे।

ईसाइयों की सहायता मिल जाने से हुलागू खान (Hulagu Khan) की सेना अत्यंत विशाल हो गई। तकनीकी दृष्टि से भी हलाकू की सेना, बगदाद की सेना से अधिक शक्तिशाली थी। उसकी सेना में चीनी इंजीनियरों की एक इकाई युद्ध-क्षेत्र में बारूद का प्रयोग करना जानती थी।

चीनी सैनिक तीरों पर आग लगाकर बगदाद (Baghdad) में फैंकने लगे जबकि बगदाद के सैनिकों के पास इस प्रकार के तीर नहीं थे। जब चीनी सेना के बारूद लगे तीर बगदाद नगर में जाकर गिरते थे तो कुछ समय बाद उन तीरों पर बंधे हुए बारूद में विस्फोट हो जाता था।

चीनी सैनिकों ने मिट्टी के पाईप में बारूद भरकर उसमें आग लगाने का तरीका ढूंढ लिया था जिससे युद्ध-क्षेत्र में अचानक धमाके होते थे और गहरा धुंआ फैल जाता था। इस धुएं की ओट में मंगोल सैनिक अपने शत्रु पर हावी हो जाते थे।

चंगेज खाँ के मंगोल सैनिकों ने कुछ ऐसी मंजनीकें बना ली थीं जिनसे बहुत बड़े पत्थरों पर तेल में भीगे हुए और आग में जलते हुए कपड़े बांधकर शहर के भीतर फैंके जा सकते थे। बगदाद के लोग इन मंजनीकों से भी परिचित नहीं थे। मंगोलों ने बगदाद शहर की चारदीवारी के नीचे बारूद लगाकर उसे भी जगह-जगह से तोड़ना आरम्भ कर दिया। बगदाद के निवासियों ने ऐसी बारूदी मुसीबत इससे पहले कभी नहीं देखी थी।

अभी घेराबंदी को एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि खलीफा (Khalifa) ने हुलागू खान (Hulagu Khan) के पास एक विचित्र प्रस्ताव भिजवाया। खलीफा ने लिखा कि- ‘यदि हलाकू खलीफा को अपना सुल्तान मान ले तथा जुमे के खुतबे में खलीफा का नाम पढ़वाए तो खलीफा, हलाकू को काफी धन प्रदान कर सकता है। हलाकू समझ गया कि अब खलीफा किसी भी समय हार मान सकता है। इसलिए हलाकू ने खलीफा के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।’

अन्ततः केवल 13 दिन की घेराबंदी के बाद 10 फरवरी 1258 को बगदाद का पतन हो गया। 37वें अब्बासी खलीफा (Khalifa) मुस्तआसिम बिल्लाह को अपने वजीरों के साथ नगर के मुख्य द्वार पर आकर हुलागू खान (Hulagu Khan) के समक्ष समर्पण करना पड़ा। हलाकू ने खलीफा को अपने सैनिकों के पहरे में रख दिया तथा खलीफा के वजीरों एवं सेनापतियों को मौत के घाट उतार दिया।

हुलागू खान (Hulagu Khan) ने खलीफा को विश्वास दिलाया कि वह बगदाद (Baghdad) में खलीफा का अतिथि है इसलिए वह खलीफा के प्राण नहीं लेगा। खलीफा इस बात पर संतोष कर सकता था किंतु हलाकू ने अपने सैनिकों को आदेश दिए कि वे खलीफा को भूखा रखें तथा उसे खाने के लिए नहीं दें।

इसके बाद मंगोल सेना बगदाद में प्रविष्ट हो गई। इस समय तक मंगोल (Mongol) किसी भी धर्म को नहीं मानते थे तथा मुसलमानों के बड़े दुश्मन थे। इसलिए मंगोलों में बगदाद (Baghdad) में बहुत विध्वंस किया। अब्दुल्ला वस्साफ़ शिराज़ी नामक एक बगदादी लेखक ने बगदाद पर हुए इस आक्रमण का विस्तार से वर्णन किया है।

अब्दुल्ला वस्साफ़ शिराज़ी ने लिखा है- ‘मंगोल बगदाद (Baghdad) में भूखे गधों की तरह घुस गए और जिस तरह भूखे भेड़िये, भेड़ों पर हमला करते हैं, वैसा करने लगे। बिस्तर और तकिए चाकूओं से फाड़ दिए गए। खलीफा के महलों की औरतें बगदाद की गलियों में घसीटी गईं और तातरियों का खिलौना बनकर रह गईं। इस बात का सही अनुमान लगाना कठिन है कि कितने लोग इस कत्लेआम का शिकार हुए।’

कुछ इतिहासकारों के अनुसार मंगोलों द्वारा बगदाद (Baghdad) में दो लाख से लेकर दस लाख मुसलमान तलवार, तीर या भाले से मार डाले गए। इतिहास की पुरानी पुस्तकों में लिखा है-‘बगदाद की गलियां लाशों से अटी पड़ी थीं। इन लाशों को उठाने के लिए बगदाद में कोई जीवित नहीं बचा था। इस कारण लाशें सड़ने लगीं और उनमें से सड़ांध उठने लगी। इस कारण हलाकू को बगदाद खाली करना पड़ा और उसे अपने तम्बू शहर से बाहर गाढ़ने पड़े।’

खलीफा (Khalifa) की औरतें अपने नंगे बदन लिए बगदाद की गलियों में घूम रहे मंगोलों एवं तातारों के सामने दो रोटियों के लिए गिड़गिड़ा रही थी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हलाकू ने खलीफा को नमदे में लपेट कर मार डाला (6)

0
हलाकू ने खलीफा को नमदे में लपेट कर मार डाला - www.bharatkaitihas.com

जब बगदाद (Baghdad) शहर में खलीफा (Caliph or Khalifa) के सैनिकों एवं नागरिकों के शव सड़ने लगे तो हलाकू (Hulagu Khan) ने अपने तम्बू बगदाद शहर के बाहर गढ़वाए तथा बगदाद को जलाकर राख करने के आदेश दिए। मंगोल (Mangol) सैनिकों ने खलीफा के विशाल महल में आग लगा दी। इस कारण महलों में प्रयुक्त आबनूस और चंदन की क़ीमती लकड़ी की सुगंध शहर की गलियों से उठ रही सड़ांध में जाकर मिल गई।

उस काल के इतिहासकारों ने लिखा है- ‘मंगोलों ने हजारों बगदाद-वासियों के शव दजला नदी में फैंक दिए जिनके कारण नदी का पानी लाल हो गया। उस काल में बगदार में एक विशाल पुस्तकालय हुआ करता था जिसमें विश्व के अनेक भागों से लूटकर लाए गए हस्तलिखित ग्रंथ रखे हुए थे।

मंगोल सिपाहियों ने इन लाखों हस्तलिखित ग्रंथों को दजला नदी में फेंक दिया। इन पुस्तकों की नीली स्याही दजला के पानी में घुल गई और नदी का रंग नीला हो गया।’

हलाकू (Hulagu Khan) के मंत्री नसीरूद्दीन तोसी ने अपने संस्मरणों में लिखा है- ‘खलीफा (Khalifa) को कुछ दिनों तक भूखा रखने के बाद उसके सामने एक ढका हुआ बर्तन लाया गया। भूख से व्याकुल खलीफा ने सोचा कि इसमें खाने की वस्तु होगी किंतु जब उसने बर्तन का ढक्कन उठाया तो देखा कि बर्तन हीरे-जवाहरात से भरा हुआ है।’

हलाकू ने कहा- ‘खाओ।’

खलीफा मुसतआसिम बिल्लाह ने कहा- ‘हीरे कैसे खाऊं?’

हलाकू ने जवाब दिया- ‘यदि तुम इन हीरों से अपने सिपाहियों के लिए तलवारें और तीर बना लेते तो मैं नदी पार नहीं कर पाता।’

खलीफा ने उत्तर दिया- ‘ख़ुदा की यही मर्ज़ी थी।’

इस पर हलाकू ने कहा- ‘अच्छा तो अब मैं जो तुम्हारे साथ करने जा रहा हूँ, वह भी ख़ुदा की मर्ज़ी है।’

खलीफा समझ गया कि हलाकू (Hulagu Khan) खलीफा के प्राण लिए बिना नहीं छोड़ेगा।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

जब हलाकू (Hulagu Khan) ने बगदाद (Baghdad) पर अधिकार किया था, तब उसने खलीफा (Khalifa) मुस्तआसिम बिल्लाह को विश्वास दिलाया था कि वह बगदाद में खलीफा का अतिथि बनकर आया है, इसलिए वह खलीफा को नहीं मारेगा किंतु अंत में हलाकू ने खलीफा को भी मौत के घाट उतार दिया। खलीफा को कैसे मारा गया, इस सम्बन्ध में अनेक किस्से विख्यात हैं जिनमें सर्वाधिक विश्वसनीय किस्सा हलाकू के मंत्री नसीरूद्दीन तोसी का माना जा सकता है जो उस अवसर पर स्वयं उपस्थित था। हलाकू ने खलीफा मुसतआसिम बिल्लाह को नमदों में लपेटकर उसके ऊपर घोड़े दौड़ा दिए ताकि खलीफा का रक्त धरती पर न बहे, क्योंकि मंगोलों में किसी बादशाह का रक्त धरती पर गिराना अशुभ माना जाता था। इस प्रकार मंगोलों ने बगदाद को बुरी तरह नष्ट-भ्रष्ट करके खलीफा को मार दिया। खलीफा द्वारा हलाकू को दी गई धमकी कोरी डींग ही साबित हुई कि पूर्व और पश्चिम के मुसलमान मिलकर मंगोलों को मार डालेंगे। खलीफा की सहायता के लिए कोई नहीं आया। शिया मुसलमानों ने हलाकू के समक्ष बिना लड़े ही समर्पण किया, ईसाइयों ने हलाकू (Hulagu Khan) का साथ दिया और खलीफा के अपने सिपाही पूरी तरह अयोग्य सिद्ध हुए।

खलीफा (Khalifa) को मारने और बगदाद (Baghdad) को जलाने के बाद विजयी मंगोल (Mongol) बगदाद से आगे बढ़े। उन्होंने सीरिया और एशिया माइनर (Asia Minor) को भी अपने अधिकार में ले लिया। पाठकों की सुविधा के लिए बता देना समीचीन होगा कि एशिया माइनर को एशिया कोचक तथा तुर्की (Kochak or Türkiye) भी कहा जाता है। यह यूरोप तथा एशिया की सीमाओं पर एशिया महाद्वीप के अंतर्गत स्थित है।

दुनिया भर के मुसलमान जिस खलीफा (Khalifa) को अजेय समझते थे, उस खलीफा (Khalifa) को हलाकू (Hulagu Khan) ने लातों से मारकर जहन्नुम में पहुंचा दिया किंतु किसी मुस्लिम शासक की हिम्मत नहीं हुई कि वह हलाकू या अन्य मंगोल आक्रांताओं (Mongol Invaders) का सामना करने के लिए सामने आएं।

इस काल में कुस्तुंतुनिया (Constantinople, Istanbul) पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी थी। रोमन सम्राट एशिया की तरफ से रोमन साम्राज्य की ओर बढ़ रहे हूणों को रोकने के लिए अपनी राजधानी रोम से हटाकर कुस्तुंतुनिया में लाए थे। इस समय तक हूण तो तुर्कों में बदलकर अपनी पुरानी पहचान खो चुके थे किंतु अब तेरहवीं शताब्दी में हूणों के पुराने पड़ौसी मंगोल नई मुसीबत बनकर कुस्तुंतुनिया की ओर बढ़ रहे थे।

एशिया माइनर को जीतने के बाद मंगोल कुस्तुंतुनिया के दरवाजे तक आ पहुंचे थे और ‘पूर्वी रोमन साम्राज्य’ का किसी भी समय पतन हो सकता था किंतु ई.1259 में अचानक ही मंगोल सम्राट मंगू खाँ की मृत्यु हो गई और पूर्वी रोमन साम्राज्य को जीवन-दान मिल गया।

मंगू खाँ की मृत्यु के बाद विशाल मंगोल साम्राज्य (Mongol Empire) चार भागों में विभक्त हो गया। पहला था चीन जिसका शासक कुबले खाँ बना। उसने कराकुरम की जगह पेकिंग को अपनी राजधानी बनाया। वर्तमान समय में पेकिंग को बीजिंग के नाम से जाना जाता है तथा यह चीन की राजधानी है। मंगोलिया, चीन, तिब्बत और तुर्किस्तान कुबले खाँ के अधीन थे। दूसरा मंगोल राज्य था पर्शिया। इसका शासक हलाकू था। अफगानिस्तान, ईरान, मैसोपोटामिया और सीरिया के प्रदेश हलाकू के अधीन थे। एशिया माइनर के तुर्क सरदार भी हलाकू को अपना अधिपति समझते थे।

तीसरा मंगोल राज्य (Mongol Rajya) था रूस। कैस्पियन सागर (Caspian Sea) से लेकर काला सागर (Kala Sagar or Black Sea) के उत्तर में रूस और पौलेण्ड के प्रदेश इसके अंतर्गत थे। इसे किपचक भी कहा जाता था। चौथा मंगोल राज्य था साइबेरिया (Siberia) यह किपचक (Kipchak) और चीन के मंगोल राज्यों के बीच में स्थित था। इस प्रकार एशिया और यूरोप का काफी बड़ा हिस्सा मंगोलों के अधीन था। एशिया में भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई-द्वीप तथा यूरोप में पूर्वी रोमन-साम्राज्य एवं पश्चिमी रोमन-साम्राज्य ही मंगोल साम्राज्यों से बाहर रह पाए थे।

जब तक कुबले खाँ (Kublai Khan) जीवित रहा, तब तक सभी मंगोल-राजा (Mongol Chiefs) कुबले खाँ को अपना सम्राट मानते रहे किंतु जब ई.1294 में कुबले खाँ की मृत्यु हुई तो चारों मंगोल राज्य (Mangol Samrajya) एक दूसरे से पूरी तरह अलग हो गए।

ई.1260 तक मंगोलों (Mongol) ने सीरिया पर विजय प्राप्त की और वे फिलिस्तीन को अधीन करने के लिए दक्षिण में आगे बढ़े। कुछ ही समय में मंगोलों ने अलीपो, दमस्कस और फिलिस्तीन को भी जीत लिया। मंगोलों के फिलिस्तीन तक आ जाने से मिस्र को खतरा उत्पन्न हो गया। इस समय मामलुक-तुर्क (Mamluk Turks) मिस्र के शासक थे और काहिरा उनकी राजधानी थी। वस्तुतः इस काल में फिलिस्तीन भी मामलुक तुर्कों के अधीन था जिसे मंगोलों ने छीन लिया था।

इस कारण मामलुक-सुल्तान कुतुज़ ने अपने सेनापति बेबार्स को फिलिस्तीन भेजा। मिस्र की सेना ने फिलीस्तीन के युद्ध में मंगोलों को हरा दिया और इसी के साथ मंगोलों का विजय-अभियान रुक गया। मंगोल सेनापति पकड़ा गया और मार डाला गया।

इस प्रकार मामलुक तुर्कों ने बहुत कम समय में फिलिस्तीन और सीरिया मंगोलों से वापस छीन लिए। मंगोलों की हार का प्रमुख कारण यह था कि इस समय फिलीस्तीन में मंगोलों की बहुत कम सेना अभियान पर थी तथा मंगोल (Mongol) सेनाओं का बड़ा हिस्सा तुर्की में मंगोलों के बीच चल रहे परस्पर संघर्ष में व्यस्त था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मंगोल सम्राट बरके खाँ (7)

0
मंगोल सम्राट बरके खाँ - www.bharatkaitihas.com
मंगोल सम्राट बरके खाँ

मंगोल सम्राट बरके खाँ (Berke Khan) के इस्लाम स्वीकार करने से मंगोल राजनीति (Mongol Politics)उलझ गई! मुसलमान बनने वाला वह पहला मंगोल शासक था।

तेरहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में मंगोल सेनाएं मध्य-एशिया के खीवा (Khiva), ख्वारिज्म (Khwarazm), बगदाद (Baghdad), एशिया-कोचक (Asia Kochak) आदि राज्यों को जीतने के बाद सीरिया, अलीपो, दमस्कस तथा फिलिस्तीन को जीतने में सफल रहीं किंतु मिस्र के मामलुक तुर्कों ने फिलिस्तीन पर अधिकार करने वाली मंगोल सेना को परास्त करके मंगोलों का विजय रथ (Mongol Victory Chariot) रोक दिया।

ई.1259 में मंगू खाँ की मृत्यु हो जाने से मंगोल साम्राज्य पर अधिकार करने को लेकर मंगोलों में अंतर्कलह आरम्भ हो गई थी, इसलिए फिलीस्तीन में हारने वाली मंगोल सेना को मंगोल सम्राट की ओर से सहायता नहीं भिजवाई जा सकी।

ई.1265 में हलाकू खाँ (Hulagu Khan) की तथा ई.1266 में बरके खाँ की भी मृत्यु हो जाने से मंगोलों की शक्ति को बड़ा धक्का लगा। हलाकू तथा बरके खाँ (Berke Khan) के वंशजों में परस्पर मनमुटाव होने से मंगोलों का आंतरिक संघर्ष अपने चरम पर पहुंच गया। फिर भी हलाकू ने अपनी मृत्यु से पहले फारस में अपनी शक्ति को मजबूत बना लिया था। इस कारण हलाकू के वंशज ई.1265 से लेकर ई.1335 तक फारस पर शासन करते रहे।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

मंगोल सम्राट (Mongol Chief) मंगू खाँ (Mangu Khan) की मृत्यु के समय जो मंगोल सरदार जिस क्षेत्र में राज्य करता था, उसने वहीं के लोगों का धर्म अपना लिया। चीन और मंगोलिया के मंगोल (Mongol) ‘बौद्ध’ हो गए। रूस और हंगरी में रह रहे मंगोल ‘ईसाई’ हो गए। जबकि मध्य-एशिया के मंगोलों ने अब तक कोई धर्म स्वीकार नहीं किया था। मान्यता है कि बरके खाँ (Berke Khan) पहला मंगोल शासक था जिसने ‘इस्लाम’ कुबूल किया। पाठकों को स्मरण होगा कि चंगेज खाँ की बड़ी रानी बोर्ते को एक शत्रु कबीला उठाकर ले गया था। जब चंगेज खाँ की रानी वापस चंगेज खाँ के पास आई तब उसके पेट से जोच्चि नामक पुत्र का जन्म हुआ। चंगेज खाँ ने जोच्चि को अपना पुत्र घोषित करके उसका पालन-पोषण किया था। मंगोल सम्राट बरके खाँ इसी जोच्चि का पुत्र था। बरके खाँ का जन्म मंगोलिया में हुआ था। बरके खाँ द्वारा इस्लाम अपनाए जाने के सम्बन्ध में अरब देशों में अलग-अलग कहानियाँ प्रचलित हैं। एक कहानी के अनुसार एक बार शहजादा बरके खाँ (Berke Khan) बाजार से गुजर रहा था। उसने देखा कि लम्बी दाढ़ी वाला एक दरवेश सड़क के किनारे सो रहा है, उसके पास एक कुत्ता भी सो रहा है। शहजादे ने सवारी से उतरकर उस दरवेश के मुँह पर अपना पैर रख दिया और उसकी दाढ़ी की ओर बड़ी हिकारत भरी दृष्टि से देखकर पूछा- ‘बता तू अच्छा या यह कुत्ता?’

दरवेश ने कहा- ‘यदि मेरी मौत ईमान पर हुई तो मैं अच्छा, वर्ना यह कुत्ता अच्छा!’

दरवेश का उत्तर सनुकर बरके बरके खाँ (Berke Khan) ने दरवेश के मुँह से अपना पैर हटा लिया और उससे पूछा- ‘यह ईमान क्या चीज़ है?’

दरवेश ने कहा- ‘ईमान एक ऐसी दौलत है जिसे न तुम्हारा दादा लूट सका और न यह तुम्हारे हाथ आएगी, चाहे तुम सौ साल हुकूमत कर लो।’

शहजादे ने कहा- ‘किन्तु मुझे वह चाहिये।’

दरवेश ने कहा- ‘अभी तुम बहुत छोटे हो इसलिए ईमान की दौलत को नही संभाल सकते।’

इस पर शहज़ादे ने अपने हाथ से अंगूठी निकालकर उस दरवेश को दी और बोला- ‘जब मैं खान बनूं, तब तुम यह अंगूठी लेकर मेरे पास आना।’

इस घटना को बहुत दिन बीत गए और शहजादा बरके खाँ (Berke Khan) युवा होकर खान बन गया। इस पर वह दरवेश एक दिन वही अंगूठी लेकर बरके खाँ के पास पहुंचा और बोला- ‘अब तुम इस लायक हो गए हो कि ईमान की दौलत संभाल सको।’

बरके खाँ ने पूछा- ‘ईमान की दौलत संभालने के लिए क्या करना होगा?’

बूढ़े ने कहा- ‘इसके लिए तुम्हें मुसलमान बनना पड़ेगा। मैं तुम्हें इस्लाम की दावत देता हूँ।’

बरके खाँ ने इस्लाम की दावत स्वीकार कर ली और मुसलमान बन गया। अरब में प्रचलित कहानियों के अनुसार उस बूढ़े दरवेश का नाम सैफुद्दीन था।

अरब में प्रचलित एक अन्य कहानी के अनुसार आधुनिक कज़ाकिस्तान (Kazakhstan) के पश्चिम में सरय-जुक नामक नगर में एक दिन बरके खाँ (Berke Khan) की भेंट बुखारा (Bukhara) से आए एक कारवां से हुई। उस कारवां में सूफी शेख (Sufi Shekh) नामक एक दरवेश भी था। उसने मंगोल सम्राट बरके खाँ को बहुत प्रभावित किया। सूफी शेख द्वारा इस्लाम की प्रशंसा किए जाने पर बरके खाँ ने मुसलमान बनना स्वीकार किया। बरके खाँ का भाई तुख-तिमुर भी बरके खाँ के साथ मुसलमान बन गया।

मुसलमान हो जाने के बाद मंगोल सम्राट बरके खाँ (Berke Khan) अपने ही कुल के उन मंगोलों का शत्रु हो गया जो इस्लाम को नहीं मानते थे। बरके खाँ ने अनेक मुस्लिम नगरों को मंगोल आक्रमणों (Mongol Attacks) में नष्ट होने से बचाया। जब बरके खाँ को हलाकू द्वारा बगदाद के खलीफा को मारने तथा बगदाद को नष्ट करने के समाचार मिले तो बरके खाँ आग बबूला हो गया। उसने प्रतिज्ञा की कि अल्लाह की सहायता से मैं निर्दाेष खलीफा के खून का बदला लूँगा।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि जब हलाकू कोमंगोल सम्राट बरके खाँ की इस प्रतिज्ञा के बारे में पता लगा तब तक हलाकू सीरिया को भी जीत चुका था किंतु वह बरके खाँ से उलझना नहीं चाहता था इसलिए हलाकू ने अपने एक सेनापति को सेना की कमान देकर फिलीस्तीन पर आक्रमण करने भेजा और स्वयं एक सेना के साथ फारस लौट गया।

मंगोल सम्राट बरके खाँ द्वारा इस्लाम स्वीकार किए जाने से मंगोलों की राजनीति उलझ गई। अब वे दो स्पष्ट धड़ों में बंट चुके थे। इनमें से एक धड़ा इस्लाम का शत्रु था और दूसरा धड़ा इस्लाम स्वीकार करके उसका अनुयायी बन चुका था। ई.1266 में अज़रबैजान में बरके खाँ (Berke Khan) की मृत्यु हुई।

ई.1292 में हलाकू के पोते अब्दुल्ला के नेतृत्व में एक मंगोल सेना ने भारत पर आक्रमण किया। दिल्ली के तुर्क सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी (Jalaluddin Khilji) ने अब्दुल्ला की सेना पर हमला करके उसे परास्त कर दिया तथा अब्दुल्ला को मुसलमान बनने का निमंत्रण दिया। अब्दुल्ला ने मुसलमान बनने से मना कर दिया तथा वह फारस लौट गया जबकि अब्दुल्ला के एक भाई उलूग खाँ ने मुसलमान बनने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने उलूग खाँ (Ulugh Khan) से अपनी पुत्री का विवाह कर दिया तथा उसके साथी मंगोलों को दिल्ली के निकट रहने की आज्ञा दी। इस प्रकार कई हजार मंगोल (Mongol) दिल्ली के निकट रहने लगे जिन्हें नव-मुस्लिम कहा जाता था। भारत में मंगोलों का यह पहला समूह था जिसने इस्लाम स्वीकार किया था। बाद में अल्लाउद्दीन खिलजी के समय में मंगोल पुरी के मंगोलों का कत्ले-आम किया गया। उनकी औरतों के साथ बलात्कार किए गए और उन्हें पूरी तरह बरबाद कर दिया गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तैमूरलंग और चंगेज खाँ का रक्त बहता था बाबर की नसों में (8)

0
तैमूरलंग और चंगेज खाँ का रक्त बहता था बाबर की नसों में - www.bharatkaitihas.com
तैमूरलंग और चंगेज खाँ का रक्त बहता था बाबर की नसों में

बाबर (Babur) की नसों में तैमूरलंग और चंगेज खाँ का रक्त बहता था। वह तैमूरलंग (Timur Lang) की पांचवी पीढ़ी का वंशज था और उसकी माता चंगेज खाँ (Changes Khan) की वंशज थी।

तुर्कों (Turks) का उद्भव हूणों Hoons) के रक्त से हुआ था, उन्होंने बड़ी तेजी से मध्य एशिया में अपनी संख्या बढ़ाई और उनके विभिन्न कबीले कई शाखाओं में बंट गए, जैसे मामलुक तुर्क, सैल्जुक तुर्क (Seljuk Turks), ऑटोमन तुर्क (Ottoman Turks), समानी तुर्क (Samanid Turks), इल्बरी तुर्क (Ilbari Turks) आदि। जब सातवीं शताब्दी ईस्वी में अरब के मुसलमानों ने मध्य-एशियाई देशों पर आक्रमण करने आरम्भ किए तो तुर्कों ने अरबी सेनाओं का भारी विरोध किया किंतु अरब वाले मध्य-एशिया पर अधिकार जमाने में सफल हो गये।

अरब लोगों के प्रभाव से आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में तुर्कों ने भी मुसलमान होना आरंभ कर दिया। तुर्कों के मुसलमान हो जाने के बाद मध्य-एशिया में इस्लाम का प्रसार बहुत तेजी से हुआ। तुर्कों की खूनी ताकत को देखते हुए अरब के खलीफाओं (Caliph or Khalifa) ने उन्हें अपना अंगरक्षक नियुक्त किया। नौवीं-दसवीं शताब्दी में ये तुर्क इतने ताकतवर हो गये कि उन्होंने बगदाद और बुखारा (Bukhara) में अपने स्वामियों के तखते पलट दिये और उनके स्थान पर स्वयं खलीफा बन गये।

जिस प्रकार भारत में लोगों के इस्लाम स्वीकार करने की प्रक्रिया सैंकड़ों सालों तक चलती रही, उसी प्रकार तुर्कों में भी इस्लाम को स्वीकार करने की प्रक्रिया लम्बे समय तक चली। चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में ‘आमू’ और ‘सर’ नदियों के बीच ट्रांस-आक्सियाना नामक क्षेत्र में बरलस तुर्कों का एक प्रभावशाली कबीला रहता था। ट्रांस-आक्सियाना क्षेत्र में स्थित ‘मावरा उन्नहर’ अथवा ‘केश’ नामक शहर बरलस तुर्कों का प्रमुख केन्द्र था। यह इतना हरा-भरा था कि इसे ‘शहर-ए-सब्ज’ भी कहा जाता था।

चूंकि मध्य-एशिया में तुर्कों एवं मंगोलों (Mangols) के अनेक राज्य हो गए थे एवं दोनों ने ही इस्लाम स्वीकार कर लिया था, इसलिए तुर्कों एवं मंगोलों में वैवाहिक सम्बन्ध होने लगे और इन दोनों जातियों में रक्त-मिश्रण की प्रक्रिया आरम्भ हुई। इस कारण कुछ ऐसे कबीले अस्तित्व में आने लगे जिन्हें ‘तुर्को-मंगोल’ माना जाता था। बरलस तुर्क भी वस्तुतः तुर्को-मंगोल कबीला था।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इस कबीले के मुखिया तुरगाई बरलस (Turgai Barlas) ने चौदहवीं शताब्दी में इस्लाम स्वीकार कर लिया। इसी तुरगाई की एक स्त्री के पेट से ई.1336 में तैमूरलंग (Timur Lang) नामक पुत्र का जन्म हुआ। तैमूर का कुरान एवं इस्लाम में बहुत विश्वास था। उसकी नसों में तुर्कों एवं मंगोलों का रक्त बह रहा था। वह प्रतिभावान और महत्वाकांक्षी युवक था। उसने तुर्क सम्राट बूमिन (Bumin) तथा तोबा खाँ (Toba Khan) और मंगोल सम्राट चंगेज खाँ (Genghis Khan or Changes Khan) और हलाकू (Hulagu or Halaku) की वीरता के अनेक किस्से सुने थे। तैमूरलंग (Timur Lang) की रगों में भी इन योद्धाओं का रक्त बह रहा था। तैमूर ने निश्चय किया कि वह भी अपने पूर्वजों की तरह एक विशाल साम्राज्य की स्थापना करेगा तथा समस्त संसार को अपनी शक्ति से रौंद डालेगा। ई.1369 में समरकंद (Samarkand) के मंगोल शासक के मर जाने पर तैमूर लंग ने समरकंद पर अधिकार कर लिया और मध्य-एशिया में ‘तैमूरी राजवंश’ की स्थापना की। वास्तव में यह एक ‘तुर्को-मंगोल’ राजवंश था जो तुर्कों एवं मंगोलों के रक्त-मिश्रण से उत्पन्न हुआ था। वर्तमान समय में समरकंद ‘उज्बेकिस्तान’ नामक देश में स्थित है।

ई.1380 से ई.1387 के बीच तैमूर लंग ने खुरासान, सीस्तान, अफगानिस्तान, फारस, अजरबैजान और कुर्दिस्तान (Kurdistan) तक के विशाल क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया।

ई.1393 में उसने बगदाद (Baghdad) तथा समस्त ईराक पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त कर ली। ई.1398-99 में उसने हिन्दुकुश पर्वत को पार करके सिंधु नदी से लेकर पंजाब, दिल्ली तथा जम्मू-काश्मीर तक के विशाल भू-भाग में स्थित राज्यों को जीता तथा पंजाब में अपना गवर्नर नियुक्त कर दिया। तैमूर के भारत आक्रमण के इतिहास की चर्चा हम ‘दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान‘ में विस्तार से कर चुके हैं।

ई.1405 में तैमूरलंग (Timur Lang) की मृत्यु हुई। उस समय उसका राज्य पश्चिम एशिया से लेकर मध्य-एशिया एवं दक्षिण-एशिया में भारत के पंजाब प्रांत तक फैला था। उसकी गणना संसार के क्रूरतम व्यक्तियों में होती है। तैमूर लंग ने अमीर, बेग, गुरकानी, मिर्जा, साहिब किरन, सुल्तान, शाह तथा बादशाह आदि उपाधियां धारण कीं। तभी से इस वंश के शहजादों को इन समस्त उपाधियों से पुकारा जाने लगा।

इनमें से कुछ उपाधियां मंगोल होने के कारण, कुछ उपाधियां तुर्क होने के कारण, कुछ उपाधियां ईरान का शासक होने के कारण तथा कुछ उपाधियां उज्बेकिस्तान का शासक होने के कारण ग्रहण की गई थीं। इस खानदान को मुगल खानदान, चंगेजी खानदान, तैमूरी खानदान, चगताई खानदान तथा कजलबाश आदि नामों से पुकारा जाता था।

तैमूरलंग (Timur Lang) के बाद उसका पुत्र मिर्जा मीरनशाह बेग समरकंद का शासक हुआ। उसकी मृत्यु ई.1408 में हुई। उसके बाद मीरनशाह का पुत्र सुल्तान मुहम्मद मिर्जा बादशाह हुआ। उसके बाद उसका पुत्र अबू सईद मिर्जा समरकंद के तख्त पर बैठा जो ई.1469 में मृत्यु को प्राप्त हुआ। सईद मिर्जा का पुत्र उमर शेख मिर्जा हुआ जो ई.1494 तक समरकंद का शासक रहा। वह नाटे कद का, बलिष्ठ एवं मनोरंजन-प्रिय शासक था।

उमर शेख मिर्जा (Shekh Mirza) की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर (Zahir-ud-din Muhammad Babur) समरकंद का शासक हुआ। इस प्रकार बाबर तैमूरलंग और चंगेज खाँ का वंशज था। वह ‘तैमूर लंग’ की पांचवी पीढ़ी का वंशज था। बाबर की माता कुतलुख निगार खानम, मंगोल शासक ‘चंगेज खाँ’ की तेरहवीं पीढ़ी की वंशज थी। हालांकि बाबर स्वयं भी चंगेज खाँ की लगभग इतनी ही पीढ़ी का वंशज रहा होगा।

इस प्रकार बाबर की रगों में तैमूरलंग (Timur Lang) और चंगेज खाँ (Changes Khan) जैसे क्रूर आतताइयों का रक्त बहता था। इसी बाबर ने ई.1526 में भारत में एक नवीन इस्लामी राज्य की स्थापना की जो सभ्यता एवं संस्कृति के स्तर पर अपने पूर्ववर्ती ‘दिल्ली सल्तनत’ से पूर्णतः भिन्न था। दिल्ली सल्तनत अरब वालों के मध्य-एशियाई तुर्की गुलामों द्वारा स्थापित की गई थी जबकि मुगल सल्तनत मध्य-एशिया के तुर्कों एवं मंगोलों के रक्त-मिश्रण से उत्पन्न तैमूरी राजवंश द्वारा स्थापित की गई थी।

इस प्रकार भारत का मुगल साम्राज्य ‘इस्लामी-तुर्की-मंगोल’ साम्राज्य था जिसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि इस वंश के शासकों में मध्य-एशिया एवं पूर्वी-एशिया की दो बड़ी क्रूर एवं लड़ाका जातियों- तुर्क एवं मंगोलों के रक्त का मिश्रण था और वे इस्लाम के अनुयायी थे।

सामान्यतः भारत में मुगलों को मंगोलों का वंशज माना जाता है, जबकि बाबर मंगोलों की तेरहवीं पीढ़ी में एवं तुर्कों की पांचवीं पीढ़ी में उत्पन्न हुआ था। इस दृष्टि से वह तुर्क था न कि मंगोल। बाबर के पिता का वंश तैमूर के वंश में उत्पन्न हुआ था जिसके माता-पिता तुर्क थे न कि मंगोल।

इतिहासकारों ने बाबर के वंश को मुगलिया खानदान, चंगेजी खानदान, तैमूरी खानदान आदि नामों से सम्बोधित किया जाता था। तत्कालीन इतिहासकारों ने इस विषय में कुछ भी नहीं लिखा है कि मुगलों को मंगोल क्यों माना जाता था, जबकि उन्हें तुर्क कहना अधिक उचित था।

तैमूरलंग (Timur Lang) और चंगेज खाँ (Changes Khan) के वंशज बाबर ने अपने ग्रंथ में स्वयं को ‘तीमूरिया तुर्क’ तथा ‘आधा चगताई’ (Half Chagatai) कहा है। वह मंगोलों पर चोट करने में चूक नहीं करता था। उसने अपने ग्रंथ की भाषा भी ‘चगताई-तुर्की’ बताई है। यह भाषा ‘आमू’ एवं ‘सर’ नदियों के बीच बोली जाती थी। बाबर के पुत्र हुमायूँ ने तो स्पष्ट रूप से मंगोलों की निंदा की है।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर का बचपन (9)

0
बाबर का बचपन - www.bharatkaitihas.com
बाबर का बचपन

बाबर का बचपन – बचपन में ही बूढ़ा हो गया था बाबर!

बाबर (Babur) का बचपन अत्यंत विषम परिस्थितियों में बीता था। इस कारण वह बहुत कम आयु में ही संसार की जटिलताओं को समझ गया था। इसी कारण इतिहासकारों ने लिखा है कि बचपन में ही बूढ़ा हो गया था बाबर!

तुर्को-मंगोल वंश में उत्पन्न मिर्जा उमर शेख तैमूर लंग (Tamerlane or Timur the Lame) का चौथा वंशज था। मिर्जा उमर शेख (Mirza Umar Shekh) भी अपने बाप-दादों की तरह परम असंतोषी था। उसे समरकंद (Samarkand) के विशाल राज्य में स्थित फरगना नामक एक छोटा सा क्षेत्र शासन करने के लिए मिला था किंतु मिर्जा उमर शेख अपने छोटे राज्य और अल्प साधनों से संतुष्ट नहीं था। अपने बड़े भाई अहमद मिर्जा से उसकी गहरी शत्रुता थी जो समरकंद और बुखारा का शासक था।

मिर्जा उमर शेख (Mirza Umar Shekh) का विवाह कुतलुग निगार खानम (Qutlugh Nigar Khanum) नामक औरत से हुआ था जो मंगोल सम्राट चंगेज खान की तेरहवीं पीढ़ी में थी। मिर्जा उमर शेख और कुतलुगनिगार खानम के कुल आठ संतानें हुई जिनमें जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर (Babur) सबसे बड़ा था। इस प्रकार बाबर की धमनियों में मध्य ऐशिया के दो खूंखार आक्रांताओं- चंगेज खाँ और तैमूर लंगड़े के खून का संगम हो गया।

मिर्जा उमर शेख (Mirza Umar Shekh) बहुत रंगीन तबियत का आदमी था और सदा मौज-मस्ती में डूबा रहता था। 8 जून 1494 को जब मिर्जा उमर शेख कबूतर उड़ा रहा था तो उसके ऊपर एक मकान आ गिरा और उसी समय उसकी मृत्यु हो गयी।

बाप की आकस्मिक मौत के कारण मात्र ग्यारह साल चार महीने का बाबर फरगना का शासक हुआ। इतिहासकारों ने उसे ‘अकाल प्रौढ़ बालक’ कहा है। अर्थात् जिम्मेदारियों के बोझ के कारण वह अपने बचपन में ही बूढ़ा हो गया था और अपने बाप-दादाओं से भी बढ़कर महत्वाकांक्षी एवं दुस्साहसी था। बाबर का बचपन अपने पिता और अपनी माता के परिवार वालों से लड़ते हुए बीता!

मिर्जा उमर शेख के मरते ही बाबर (Babur) के तीन दुश्मनों ने अलग-अलग दिशाओं से बाबर के फरगना राज्य पर आक्रमण कर दिया। इनमें से एक तो बाबर का सगा ताऊ अहमद मिर्जा था और दूसरा बाबर का सगा मामा महमूद खाँ था। काशनगर के सुल्तान ने भी फरगना का कुछ हिस्सा दबा लिया।

बाबर की नानी ऐसान दौलत बेगम (Aisan Daulat Begum) ने बाबर को समस्त विपत्तियों से बचाया जिसके कारण बाबर के दुश्मन मैदान छोड़कर भाग गये। ऐसान दौलत बेगम के कहने पर बाबर ने अपने ताऊ अहमद मिर्जा को संदेश भिजवाया कि मैं आपकी अधीनता स्वीकार करने को तैयार हूँ अतः आप मेरे राज्य पर आक्रमण नहीं करें किंतु अहमद मिर्जा फरगना की ओर बढ़ता रहा।

इस पर बाबर (Babur) भी अपनी छोटी सी सेना लेकर अहमद मिर्जा (Ahmad Mirza) के मार्ग में जा बैठा। बाबर के भाग्य से अहमद मिर्जा मार्ग में ही बीमार हो गया जिसके कारण उसे युद्ध किए बिना ही समरकंद वापस लौट जाना पड़ा। बाबर भी अपनी सेना सहित फरगना लौट आया।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इसके बाद बाबर ने अपने मामा महमूद खाँ को अक्षी के कड़े युद्ध में परास्त किया। दो शत्रुओं से निबटने के बाद बाबर ने काशनगर की सेना पर आक्रमण किया तथा उसे बुरी तरह परास्त किया। इस प्रकार बाबर को तीनों शत्रुओं से छुटकारा मिल गया तथा उसकी आरम्भिक कठिनाइयां दूर हो गईं। ई.1496 में समरकंद (Samarkand) के शासक अहमद मिर्जा की मृत्यु हो गई तथा उसके पुत्रों में समरकंद पर अधिकार को लेकर उत्तराधिकार का युद्ध आरम्भ हो गया। यद्यपि बाबर इस समय लगभग चौदह वर्ष का ही हुआ था तथापि उसने समरकंद की स्थिति का लाभ उठाने के लिए अपने पूर्वजों की राजधानी समरकंद पर आक्रमण कर दिया किंतु वह समरकंद पर अधिकार नहीं कर सका। अगले ही वर्ष अर्थात् ई.1497 में बाबर ने एक बार पुनः समरकंद पर आक्रमण किया। इस बार बाबर समरंकद (Samarkand) पर अधिकार करने में सफल हो गया किंतु कुछ ही समय बाद बाबर को समरकंद खाली करना पड़ा। संभवतः शैबानी खाँ द्वारा समरकंद पर हमला किए जाने के कारण ऐसा हुआ। शैबानी खाँ एक उज्बेक नेता था और तैमूर के वंशजों से मध्य-एशिया छीनने के अभियान पर था।

शैबानी खाँ (Shaybani Khan) ने तैमूरी बादशाहों के बहुत से राज्य छीन लिए। इस कारण शैबानी खाँ बाबर (Babur) के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया।

बाबर को समरकंद (Samarkand) तो खाली करना पड़ा किंतु उसी अभियान के दौरान बाबर की मौसी हबीबा सुल्तान बेगम अपनी पुत्री मासूमा को लेकर बाबर के शिविर में आई और उसने बाबर से शरण मांगी। हबीबा सुल्तान बेगम बाबर की मौसी तो थी ही, साथ ही वह बाबर की ताई भी थी। वह बाबर के मरहूम ताऊ अहमद मिर्जा की बेवा थी। बाबर ने अपने मौसी एवं ताई हबीबा को न केवल अपने हरम में शरण दी अपितु उसकी पुत्री मासूमा से निकाह भी कर लिया।

ई.1501 में बाबर ने पुनः समरकंद पर हमला किया जिसके कारण शैबानी खाँ को समरकंद खाली करके भाग जाना पड़ा। यह बाबर की बहुत बड़ी विजय थी जिसके कारण बाबर ने अपनी पत्नी मासूमा को अपने लिए भाग्यशाली समझा किंतु यह जीत बहुत कम समय तक ही टिकी रह सकी।

शैबानी खाँ फिर से एक विशाल सेना लेकर आया और समरकंद (Samarkand) पर चढ़ बैठा। सर-ए-पुल की लड़ाई में शैबानी खाँ की सेना ने बाबर की सेना को परास्त कर दिया। इस कारण केवल एक सौ दिन के अधिकार के बाद समरकंद पुनः बाबर के हाथ से निकल गया।

इस बार शैबानी खाँ ने समरकंद (Samarkand) के साथ-साथ बाबर की राजधानी फरगना (Fargana) पर भी अधिकार कर लिया तथा बाबर को बंदी बना लिया। बाबर ने अपनी बहिन खानजादः बेगम का विवाह शैबानी खाँ से करके कैद से मुक्ति पायी और बे-घरबार हो कर पहाड़ों मंे भाग गया।

पूरे तीन साल तक बाबर (Babur) अपने मुट्ठी भर साथियों के साथ पहाड़ों और जंगलों में भटकता रहा। इस दौरान उसके घोड़े मर गये, जूते फट गये और वह दाने-दाने को मोहताज हो गया। वह मीलों दूर तक पैदल चलकर किसी गाँव तक जाता तथा किसी तरह दो जून रोटी का जुगाड़ करता।

इस समय दुनिया में कोई भी बाबर का सहायक नहीं था। इसलिये वह दुनिया की दो क्रूरतम प्रबल शक्तियों का वंशज होने के उपरांत भी किसी को अपना नाम तक नहीं बताता था। उसके मुट्ठी भर साथी ही उसके बारे में जानते थे कि वह कौन था और कहाँ रहता था! एक दिन पहाड़ियों में भटकता हुआ भूखा-प्यासा बाबर अपने कुछ साथियों के साथ दिखकाट नामक गांव में पहुंचा।

किसी समय यह गांव बाबर (Babur) के दादा अबू सईद मिर्जा की सल्तनत में हुआ करता था जिसकी राजधानी समरकंद (Samarkand) थी। जब बाबर का पिता मिर्जा उमर शेख फरगना का शासक बना तो अबू सईद मिर्जा ने यह गांव फरगना राज्य में शामिल कर दिया। जब बाबर फरगना का बादशाह बना तो दिखकाट गांव बाबर के अधीन हो गया।

आज उसी गांव में बाबर वेश बदलकर पहुंचा ताकि किसी तरह पेट भरने का जुगाड़ कर सके। बाबर को ज्ञात था कि इस गांव का मुखिया उसके पिता मिर्जा उमर शेख (Mirza Umar Shekh) का विश्वासपात्र हुआ करता था। इसलिए बाबर ने उसी मुखिया से मदद लेने का निश्चय किया। गांव के लोगों से पूछताछ करते हुए बाबर और उसका एक साथी गांव के मुखिया के घर तक पहुंचे। मुखिया तो घर में नहीं था किंतु घर के बाहर एक बुढ़िया बैठी थी। बाबर तथा उसका साथी बुढ़िया का अभिवादन करके चुपचाप खड़े हो गये।

बुढ़िया ने अजनबियों को घर के दरवाजे पर खड़े देखा तो पूछा कि तुम कौन हो और क्या चाहते हो! बाबर ने अपना असली परिचय छिपा लिया तथा राहगीर होने का वास्ता देकर खाने के लिए कुछ मांगा। बुढ़िया ने कहा कि यदि तुम यहाँ पड़ी लकड़ियों को चीर दो तो मैं तुम्हें खाने के लिए दे सकती हूँ। बाबर (Babur) और उसके साथियों ने बुढ़िया की बात मान ली तथा लकड़ियां चीर दीं। बुढ़िया ने उन दोनों को भरपेट रोटियाँ खिलाईं।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

एक सौ ग्यारह साल की बुढ़िया ने बाबर को रास्ता दिखाया (10)

0
एक सौ ग्यारह साल की बुढ़िया ने बाबर को रास्ता दिखाया - www.bharatkaitihas.com
एक सौ ग्यारह साल की बुढ़िया ने बाबर को रास्ता दिखाया

दिखकाट गांव में बाबर (Babur) की भेंट एक बुढ़िया से हुई। उसने तैमूर लंग (Timur Lang) और उसकी सेना को समरकंद (Samarkand) से हिन्दुस्तान पर हमला करने के लिए जाते हुए देखा था। उस एक सौ ग्यारह साल की बुढ़िया ने बाबर को रास्ता दिखाया !

उज्बेक योद्धा शैबानी खाँ (Shaybani Khan) से परास्त हो जाने के कारण समरकंद (Samarkand) और फरगना (Fargana) बाबर (Babur) के हाथों से निकल गए और बाबर को अपनी बहिन का विवाह शैबानी खाँ के साथ करके उसकी कैद से मुक्ति पानी पड़ी। इसके बाद लगभग तीन साल तक बाबर को पहाड़ियों में छिपकर रहना पड़ा।

एक दिन बाबर (Babur) और उसके साथी पेट भरने के लिए दिखकाट नामक गांव में पहुंचे। दिखकाट गांव में बाबर की भेंट एक बुढ़िया से हुई। उस बुढ़िया ने बाबर को बताया कि मेरी आयु एक सौ ग्यारह साल है तथा मैंने तैमूर लंग और उसकी सेना को समरकंद से हिन्दुस्तान पर हमला करने के लिए जाते हुए देखा था।

मेरा बाप भी तैमूर के साथ भारत गया था। जब बाबर ने बुढ़िया से पूछा कि क्या उन्हें इस गांव में कोई काम मिल सकता है तो बुढ़िया ने सलाह दी कि गांव में रोजगार तलाशने की बजाय उन्हें किसी तैमूरी बादशाह की सेना में जाकर भर्ती हो जाना चाहिए और मौका मिलने पर उनके साथ हिन्दुस्तान जाना चाहिए।

हिन्दुस्तान पर हमला करने की ताकत केवल तैमूरी बादशाहों में है। वहाँ इतना सोना-चाँदी और हीरे-जवाहरात हैं कि तुम्हारी सारी परेशानी दूर हो जाएगी। बुढ़िया की बातें सुनकर बाबर (Babur) के मन में उत्साह का संचार हुआ। आखिर वह भी एक तैमूरी बादशाह था! उसने कुछ सैनिक एकत्रित करने तथा हिन्दुस्तान जाने का निर्णय लिया। बाबरनामा में लिखा है कि उस उस एक सौ ग्यारह साल की बुढ़िया ने बाबर को रास्ता दिखाया !

बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा है- ‘जब मैं 22 साल का हुआ तो ईलाक-यीलाक की घाटी में पहुंचा जो हिसार की चारागाह के पास है। मेरे पास इस समय कुछ ही सैनिक थे जिनकी संख्या 200 से 300 के बीच थी। वे बड़ी आशा से मेरे साथ रहते थे। उनके हाथों में डण्डे, पैरों में चारूक तथा बदन पर चापान थे।’ चारूक पशुओं के मोटे चमड़े को कहा जाता था जिसे पैरों में जूतों की तरह बांध लिया जाता था और चापान ऊनी नमदे से बने कोट को कहते थे।

बाबर ने लिखा है- ‘हम लोग इतनी दीनता को प्राप्त हो गए थे कि हमारे पास केवल दो ही खेमे बचे थे। मेरा खेमा मेरी माता के लिए लगाया जाता था और दूसरा खेमा मेरे लिए लगाया जाता था। मेरे बैठने के लिए प्रत्येक पड़ाव पर अलाचूक लगाया जाता था। अलाचूक ऊनी नमदे जैसा होता था जिसे तह करके रख दिया जाता था ताकि बैठने के काम आ सके।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

बाबर (Babur) ने यहीं पर अपने मुँह पर पहली बार उस्तरा फिरवाया। तुर्की कबीलों में यह प्रथा थी कि जब कोई नौजवान पहली बार अपने मुँह पर उस्तरा फिरवाता था तो उस अवसर पर बड़ा समारोह किया जाता था किंतु बाबर की दशा इतनी शोचनीय थी कि किसी प्रकार के समारोह एवं उत्सव के आयोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। बाबर चाहता था कि कुंदूज का शासक खुसरोशाह बाबर की सहायता करे ताकि बाबर उज्बेकों पर आक्रमण करके अपना राज्य पुनः प्राप्त कर सके किंतु खुसरोशाह (Khusraushah or Khusro Shah) ने बाबर की कोई सहायता नहीं की। इससे बाबर को बड़ी निराशा हुई। एक बार बाबर ने जलालाबाद (Jalalabad) पर आक्रमण किया जो उस समय शैबानी खाँ के राज्य में जा चुका था और अब अफगानिस्तान में है। जलालाबाद में बाबर को सफलता नहीं मिली और उसे फिर से पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी। बाबर प्रयास तो बहुत करता था किंतु भाग्य के आगे बेबस था। अन्ततः भाग्य ने बाबर की फिर से सुधि ली। एक दिन बाबर अपने मुट्ठी-भर साथियों के साथ पहाड़ियों में घूम रहा था। उसकी दृष्टि पहाड़ियों में छिपे हुए कुछ सैनिकों पर पड़ी।

जब बाबर (Babur) ने उनसे पूछताछ की तो उन सैनिकों ने बताया- ‘शैबानी खाँ ने कुन्दूज के बादशाह खुसरोशाह को हराकर उसके राज्य पर अधिकार कर लिया है। हम बादशाह खुसरोशाह के सैनिक हैं तथा शैबानी खाँ की सेना के हाथों से बचने के लिए पहाड़ियों में छिपे हुए हैं। हम यहाँ आपसे मिलने ही आए हैं।’

 खुसरोशाह भी बाबर की ही तरह तैमूरी बादशाह था। बाबर ने उन सैनिकों को अपने साथ आने आने का निमंत्रण दिया। उन सैनिकों की संख्या चार हजार थी। जब खुसरोशाह को ज्ञात हुआ कि उसके सैनिक बाबर के पास चले गए हैं तो उसने अपने जवांई याकूब को दूत बनाकर बाबर के पास भेजा।

याकूब ने बाबर (Babur) से कहा कि बादशाह खुसरोशाह आपसे भेंट करने के लिए आना चाहते हैं। यदि आप उनके प्राण न लें तथा उनकी सम्पत्ति को हानि नहीं पहुंचाने का वचन दें तभी बादशाह खुसरोशाह आपकी सेवा में उपस्थित हो सकते हैं।

बाबर ने खुसरोशाह के दूत को वचन दिया कि तुम्हारे बादशाह को किसी तरह की हानि नहीं पहुंचाई जाएगी, वे मुझसे मिलने के लिए आ सकते हैं। जब खुसरोशाह बाबर से मिलने आया तो बाबर के सैनिकों ने उसे चुनार के एक पेड़ के नीचे बैठाया। अब यही बाबर का दरबार था।

बाबर ने लिखा है- ‘खुसरोशाह बड़े वैभव और बहुत से सैनिकों के साथ मुझसे मिलने आया। नियम तथा प्रथा के अनुसार वह दूरी पर ही घोड़े से उतर पड़ा तथा मेरे निकट आकर तीन बार घुटनों के सहारे झुका। मुझसे कुशल-क्षेम पूछने के बाद वह एक बार फिर घुटनों पर झुका। जब वह उपहार प्रस्तुत कर चुका तो फिर घुटनों के सहारे झुका।

वह आलसी वृद्ध 25-26 बार झुकने के कारण थक गया और जब गिरने ही वाला था तब मैंने उसे बैठने के लिए कहा। उसका इतने वर्षों पुराना राज्य छिन जाने से और सेना के नष्ट हो जाने से वह पूरी तरह निराश और हताश था। कायर और नमकहराम तो वह था ही, उसकी बातें भी नीरस थीं।’

बाबर ने लिखा है- ‘एक समय था जब खुसरोशाह के अधीन 20-30 हजार सैनिक हुआ करते थे, महमूद मिर्जा का सम्पूर्ण राज्य उसके अधीन था जो कहलूगा जिसे लोहे का फाटक कहते थे, से लेकर हिन्दूकुश पर्वत तक फैला हुआ था। आज वह मेरे सामने बैठकर अपमानित हो रहा था। एक-दो घड़ी की वार्त्ता के बाद मैं उठ खड़ा हुआ तथा घोड़े पर सवार हो गया। उस समय भी खुसरोशाह तीन बार घुटनों के सहारे झुका।’

 खुसरोशाह भी अपने खेमे में चला गया। उसे आशा थी कि बाबर (Babur) का साथ मिल जाने से वह फिर से अपना राज्य प्राप्त कर लेगा किंतु खुसरोशाह को इस भेंट से लाभ के स्थान पर हानि हुई। खुसरोशाह के बचे-खुचे सैनिकों, अमीरों और बेगों ने उसी शाम तक खुसरोशाह को छोड़ दिया और वे बाबर की सेवा में आ गए।

यद्यपि आज न तो बाबर (Babur) कहीं का बादशाह था और न खुसरोशाह किंतु एक समय था जब बाबर समरकंद (Samarkand) का शासक था और खुसरोशाह कुंदूज (Kunduz) का। संभवतः इस कारण मर्यादा में बाबर खुसरोशाह से बहुत बड़ा था। इसी कारण खुसरोशाह ने बाबर के समक्ष इतनी विनय प्रकट की थी। एक समय वह भी था जब बाबर ने खुसरोशाह से सहायता पाने के लिए कई बार दूत भेजे थे किंतु आज खुसरोशाह बाबर से सहायता लेने आया था। समय-समय का फेर है, अब बाबर को खुसरोशाह में कोई रुचि नहीं थी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर के सैनिक भारत की भेड़, बकरियों एवं भैंसों पर टूट पड़े (11)

0
बाबर के सैनिक - www.bharatkaitihas.com
बाबर के सैनिक भारत की भेड़, बकरियों एवं भैंसों पर टूट पड़े !

बाबर के सैनिक भारत की भेड़, बकरियों एवं भैंसों पर टूट पड़े! उन्हें भारत के सोने, चांदी और गुलामों से भी अधिक आकर्षक ये भेड़ बकरी लगते थे जिन्हें खाने के लिए वे बरसों से तरस रहे थे!

उज्बेक योद्धा शैबानी खाँ (Shaibani Khan) द्वारा मध्य-एशिया में तैमूरी बादशाहों के राज्य छीन लिए जाने के कारण बहुत से बादशाह अपने राज्यों से वंचित होकर जंगलों में भटकने लगे। इनमें से समरकंद (Samarkand) तथा फरगना (Fargana) का शासक बाबर (Babur) और कुंदूज (Kunduz) का शासक खुसरोशाह (Khusro Shah) भी थे जिनके पास कभी बड़ी-बड़ी सल्तनतें हुआ करती थीं।

बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा है- ‘अल्लाह ही सल्तनतों का स्वामी है। वह जिसे चाहता है, सल्तनत देता है तथा जिसे नहीं चाहता है, उससे सल्तनत वापस ले लेता है क्योंकि तू सर्वशक्तिमान है।’

कुंदूज के बादशाह खुसरोशाह (Khusro Shah) की सेना में लगभग 20-30 हजार सिपाही थे जो खुसरोशाह का राज्य छिन जाने के बाद पहाड़ों में भटक रहे थे। मध्य-एशिया में शैबानी खाँ का राज्य हो चुका था जो कि एक उज्बेक था। इस कारण ऐसा एक भी बादशाह नहीं बचा था जो खुसरोशाह के तुर्को-मंगोल सिपाहियों को अपनी सेना में नौकरी दे सके। इसलिए लगभग चार हजार सैनिक बाबर के पास चले आए। एक दिन खुसरोशाह भी बाबर से मिलने आया जिसका विवरण हम पिछली कड़ी में बता चुके हैं।

जब खुसरोशाह (Khusro Shah) बाबर से मिलकर वापस चला गया तब बाबर के साथियों ने बाबर (Babur) को सलाह दी कि वह खुसरोशाह को मारकर उसकी सम्पत्ति छीन ले क्योंकि खुसरोशाह ने बाबर के खानदान के कई शहजादों को मारा था किंतु बाबर ने खुसरोशाह के प्राण नहीं लेने तथा उसकी सम्पत्ति नहीं लूटने का वचन दिया था। इसलिए बाबर ने खुसरोशाह को अपने सैनिकों की सुरक्षा में ईलाक-यीलाक की घाटी से बाहर निकलवा दिया ताकि वह काहमर्द की तरफ जा सके।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

जब खुसरोशाह उस घाटी से चला गया तब बाबर के सैनिकों ने खुसरोशाह के खाली डेरे पर छापा मारा। बाबर के सैनिकों को यहाँ से बड़ी मात्रा में हथियार प्राप्त हुए जिन्हें बाबर ने अपने उन सैनिकों में बांट दिया जिनके पास हथियारों के नाम पर केवल डण्डे थे। बाबर ने भाग्य से हाथ आयी सेना तथा हथियारों का उपयोग करने का निश्चय किया और तत्काल ही काबुल के लिए रवाना हो गया। मार्ग में खुसरोशाह (Khusro Shah) की सेना को छोड़कर भागे हुए कुछ और सैनिक दस्ते बाबर से आ मिले। इससे बाबर की सेना तो बड़ी हो गई किंतु बाबर के सामने एक और समस्या आ खड़ी हुई। बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि खुसरोशाह के सैनिक उद्दण्ड तथा अत्याचारी थे। इसलिए उन्हें अनुशासन में रखना कठिन था। एक बार खुसरोशाह के एक सैनिक ने किसी अन्य सैनिक से तेल से भरा हुआ घड़ा छीन लिया। इस पर बाबर ने उस उद्दण्ड सैनिक को इतना पिटवाया कि वह सैनिक मर गया। इसके बाद खुसरोशाह के सैनिक सहम गए और अनुशासन में रहने लगे।

जब खुसरोशाह काहमर्द (Kahmard) की तरफ पहुंचा तो उसे ज्ञात हुआ कि बाबर (Babur) का परिवार इन दिनों काहमर्द में रह रहा है जिनमें बाबर की माता भी थी। खुसरोशाह ने बाबर के परिवार को मारने का निश्चय किया क्योंकि वह बाबर द्वारा किए गए व्यवहार से प्रसन्न नहीं था किंतु बाबर के परिवार के रक्षक सैनिकों ने खुसरोशाह (Khusro Shah) का सामना किया जिसके बाद खुसरोशाह भयभीत होकर खुरासान की तरफ भाग गया।

जब बाबर काबुल के मार्ग में था, तब बाबर का परिवार बाबर से आ मिला। बाबर ने काबुल के दुर्ग पर घेरा डाल दिया। इस दुर्ग का निर्माण काबुल शाह नामक एक हिन्दू राजा ने करवाया था। इस कारण काबुल के किले को ‘काबुल शाह का किला’ कहा जाता था।

काबुल का शासक अब्दुर्रज्जाक भी एक तैमूरी बादशाह था एवं बाबर का चचेरा भाई था किंतु अब्दुर्रज्जाक को उसके सेनापति मुकीम आरगो ने काबुल से निकाल कर उसके किले एवं राज्य पर अधिकार कर लिया था। बाबर (Babur) ने मुकीम आरगो को काबुल से मार भगाया तथा काबुल के किले एवं राज्य पर अधिकार कर लिया।

बाबर ने अपने चचेरे भाई अब्दुर्रज्जाक को एक छोटी सी जागीर दे दी। इस प्रकार बाबर ने काबुल में अपने लिए एक नवीन राज्य की नींव रखी। काबुल पर अधिकार करने के बाद बाबर ने गजनी और उससे लगते हुए बहुत सारे क्षेत्र अपने अधीन कर लिए।

कुछ समय बाद शैबानी खाँ (Shaibani Khan) ने ट्रांस आक्सियाना क्षेत्र में स्थित कई अन्य तैमूरी राज्यों को भी समाप्त कर दिया। इस कारण उन तैमूरी राज्यों के सैनिक भाग-भाग कर बाबर के पास आने लगे और उसकी सेना में भरती होने लगे। इससे बाबर के पास काफी बड़ी सेना एकत्रित हो गई।

दिखकाट की बुढ़िया के शब्द बाबर (Babur) को बार-बार याद आते थे कि तुझे तैमूरी बादशाह की सेना में भरती होकर हिन्दुस्तान जाना चाहिए क्योंकि वहाँ इतना सोना-चांदी और हीरे-जवाहरात हैं कि तेरी सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी। इस समय बाबर के पास काफी बड़ी सेना हो गई थी जिसे वेतन देने के लिए धन की आवश्यकता थी। इसलिए काबुल तथा गजनी पर अधिकार हो जाने के बाद बाबर ने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया।

बाबर ने लिखा है- ‘काबुल की ओर से हिन्दुस्तान जाने के चार रास्ते हैं। एक रास्ता खैबर पर्वत से होकर, दूसरा मार्ग बंगश की ओर से, तीसरा मार्ग नग्र अथवा नग्ज की ओर से और चौथा मार्ग फरमूल की ओर से जाता है। ये चारों रास्ते बहुत नीचे दर्रों से होकर गुजरते हैं। सिन्द अर्थात् हारू नदी के तीन घाटों से होते हुए उन चारों रास्तों तक पहुंचा जाता है। काबुल से भारत आने के लिए सिन्द, काबुल तथा अटक आदि नदियां पार करनी होती हैं। यह सिंद नदी भारत की सिंधु नदी से अलग है।’

जनवरी 1505 में बाबर (Babur) अपने सैनिकों के साथ बादाम चश्मा तथा जगदाली के मार्ग से अदीनापुर होता हुआ नीनगनहार नामक स्थान पर पहुंचा। यह एक गर्म-स्थान था। बाबर ने लिखा है-‘मैंने इससे पहले कभी गर्म-प्रदेश नहीं देखा था। यहाँ इतनी सुंदर वनस्पति एवं पशु-पक्षी थे जो मैंने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखे थे। यहाँ की घास भी बहुत सुंदर थी तथा लोगों के रीति-रिवाज भी भिन्न प्रकार के थे। इसके बाद हम खैबर दर्रा पार करके जाम पहुंच गए।’

बाबर यहाँ से गूरखत्तरी (गोरक्ष-उत्तरी) नामक स्थान पर जाना चाहता था जो हिन्दू योगियों का बड़ा तीर्थस्थल था। यहाँ हजारों योगी एवं हिन्दू सिर तथा दाढ़ी मुंडवाने आते थे। किंतु गूरखत्तरी तक पहुंचने का मार्ग बहुत कठिन था इसलिए बाबर जाम से कोहाट (Kohat) के लिए रवाना हुआ जहाँ अनेक धनी अफगानी कबीले रहते थे।

कोहाट (Kohat) से बाबर (Babur) को बहुत बड़ी संख्या में भेड़-बकरियां तथा भैंसे प्राप्त हुईं। बाबर के भूखे-नंगे सैनिकों को सोने-चांदी की मोहरों से भी अधिक मूल्यवान ये पशु लगते थे जिन्हें वे बिना कोई मूल्य चुकाए मारकर खा सकते थे। बाबर ने लिखा है- ‘कोहाट वालों के घरों से हमें बहुत बड़ी मात्रा में अनाज तथा सफेद कपड़े प्राप्त हुए।’

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर की सेना पहाड़ी डाकुओं जैसी थी (12)

0
बाबर की सेना - www.bharatkaitihas.com
बाबर की सेना पहाड़ी डाकुओं जैसी थी

जिस समय बाबर (Babur) ने भारत पर आक्रमण आरम्भ किए, उस समय बाबर की सेना किसी बादशाह की नियमित सेना जैसी नहीं दिखती थी। उसका पहनावा, युद्ध पद्धति तथा नैतिकता पहाड़ी डाकुओं से मेल खाती थी जो फटेहाल मैले-कुचैले कपड़ों में रहती थी और लाठी-डण्डों से लड़ती थी! बाबर के सैनिकों को किसी तरह का युद्ध-प्रशिक्षण नहीं मिलता था।

काबुल (Kabul) तथा गजनी (Ghazni) पर अधिकार करने के बाद बाबर ने भारत पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। जनवरी 1505 में बाबर हिन्दूकुश पर्वत में स्थित खैबर दर्रा पार करके कोहाट (Kohat) तक चला आया। उस काल में खैबर दर्रे को पार करते ही भारत की सीमा प्रारम्भ हो जाती थी।

कोहाट वर्तमान समय में पाकिस्तान के खैबर पख्तून (Khyber Pakhtunkhwa)जिले में है। आज कोहाट के क्षेत्र में केवल मुसलमान ही रहते हैं किंतु उस काल में कुछ अफगानी कबीले रहते थे जो हिन्दू धर्म में विश्वास रखते थे। यही कारण है कि आज भी इस क्षेत्र में हिन्दी बहुत अच्छी तरह से बोली जाती है।

जब बाबर (Babur) कोहाट से बंगश के लिए रवाना हुआ तो एक संकरी घाटी में हजारों अफगान युद्धघोष करते हुए बाबर का रास्ता रोककर खड़े हो गए। बाबर के सैनिकों ने इन अफगानों के सिर काट डाले। जो लोग जीवित बचे वे दांत में तिनका दबाकर बाबर की शरण में आए जिसका अर्थ होता है कि हम तुम्हारी गऊ हैं, हमें मत मारो। बाबर ने लिखा है कि पराजित सैनिकों की यह प्रथा मैंने पहली बार देखी।

TO read THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

बाबर ने उन लोगों के धर्म के बारे में नहीं लिखा है किंतु अनुमान होता है कि ये लोग हिन्दू थे तथा उनमें प्राचीन हिन्दुओं की प्रथाएं प्रचलित थीं जिनमें मुँह में घास रखकर विजेता की शरण में जाना भी शामिल था। निश्चित रूप वे मुसलमान नहीं थे, इसीलिए बाबर ने उन सबके सिर काटकर कटे हुए सिरों की मीनार बनाने के आदेश दिए। बाबर के आदेश की पालना की गई। बाबर (Babur) ने कोहाट से चलकर चौपारा नामक गांव पर हमला किया। यहाँ से भी बाबर की सेना को भेड़ों, अनाज के गल्लों तथा अन्य वस्तुओं की प्राप्ति हुई। रात के समय ईसाखेल गांव के अफगानों ने बाबर के सैनिक शिविर पर हमला किया किंतु बाबर की सेना ने उन्हें शिविर में प्रवेश नहीं करने दिया। बाबर रात के समय स्वयं अपने शिविर का चक्कर लगाता था। यदि कोई सैनिक अपने पहरे वाले स्थान पर नहीं मिलता था तो बाबर उसकी नाक कटवा लेता था। यहाँ से बाबर की सेना बन्नू (Bannu) तथा दश्त (Dasht) नामक गांवों को लूटने गई। इस क्षेत्र में एक सूखी नदी थी, इस कारण बाबर द्वारा लूटे गए पशुओं के लिए पानी की कमी हो गई। बाबर के सैनिकों द्वारा स्थानीय लोगों को पकड़कर पूछताछ करने से उन्होंने बताया कि यदि वे सूखी नदी में एक-डेढ़ गज खुदाई करेंगे तो उन्हें पर्याप्त जल मिल जाएगा।

बाबर ने लिखा है- ‘उनकी बात सही निकली। एक-डेढ़ गज खुदाई करते ही पानी निकल आया जिससे हमारे जानवरों एवं सैनिकों का काम चल गया। भारत की सभी नदियों की यही विशेषता है कि थोड़ी सी खुदाई करने पर पानी निकल आता है।’

आगे चलकर यह जानकारी बड़े अभियानों के दौरान बाबर के बहुत काम आई। दश्त क्षेत्र से बाबर को बड़ी संख्या में घोड़े मिले जो व्यापार के लिए पाले जाते थे। इस क्षेत्र में दिन भर ऊंटों एवं घोड़ों के झुण्ड आते-जाते रहते थे जिन पर दूर-दूर तक व्यापार करने वाले व्यापारियों का सामान लदा रहता था। रात में भी यह सिलसिला नहीं रुकता था। बाबर के सैनिकों ने अपने मार्ग में पड़ने वाले व्यापारियों के सिर काटकर उनके ऊंट एवं घोड़े लूट लिए जिन पर कीमती सामान लदा हुआ था।

इस सामान में सफेद कपड़े, सुगंधित जड़ें, तथा शक्कर प्रमुख थे। इस क्षेत्र से बाबर को तीपूचाक नस्ल के घोड़े बड़ी संख्या में मिले जो पहाड़ी क्षेत्र के लिए अत्यंत उपयोगी थे।

यहाँ से बाबर की सेना वापस काबुल (Kabul) के लिए लौट पड़ी। इस समय तक इस क्षेत्र में वर्षा आरम्भ हो चुकी थी और नदियों में बाढ़ आने लगी थी। इस कारण बहुत बड़ी संख्या में भैंसों, भेड़-बकरियों, ऊँटों एवं घोड़ों के कारण नदियों को पार करना बहुत कठिन हो गया। यहाँ से काबुल जाने के लिए कई मार्ग मिलते थे किंतु बाबर को ऐसा मार्ग चुनना था जिसमें नदियों की संख्या कम से कम हो।

7 मार्च 1505 को ईद थी। इसलिए बाबर की सेना एक नदी के किनारे ईद का स्नान करके गूमाल नदी की तरफ बढ़ गई। गूमाल के तट पर बाबर की सेना ने ईद की नमाज पढ़ी। बाबर की सेना गूमाल को पार करके जैसे ही एक पहाड़ पर चढ़ने लगी, एक तरफ से अफगानों ने आकर बाबर की सेना को घेर लिया। देखते ही देखते भयानक युद्ध आरम्भ हो गया जिसके कारण सैनिक चट्टानों से नीचे गिर-गिर कर मरने लगे। बाबर की सेना ने समस्त अफगान सैनिकों को मार डाला।

जब बाबर की सेना सिंद नदी के तट पर स्थित बीलह कस्बे में पहुंची तो यहाँ के लोग नावों में बैठकर भाग गए। बहुत से लोगों ने नदी में बने एक टापू पर शरण ली। बाबर की सेना ने टापू पर पहुंचकर लोगों को मार डाला तथा उनका सामान छीन लिया। इस दौरान बहुत से लोग नदी में बह गए।

इनमें बाबर के भी कुछ आदमी थे। बाबर की सेना ने हर उस आदमी को लूटा जो उसके मार्ग में पड़ा। इस मायने में बाबर की सेना पहाड़ी डाकुओं के किसी खूंखार गिरोह से कम नहीं थी जो निर्धन एवं निरीह नागरिकों एवं व्यापारियों के तन पर कपड़े तक नहीं छोड़ते थे।

जब बाबर (Babur) तथा उसकी सेना पीर कानू की मजार (Tomb of Peer Kanu) पर पहुंचे तो बाबर के कुछ सैनिकों ने मजार के मुजाविरों को भी लूट लिया। जब बाबर को यह बात ज्ञात हुई तो बाबर ने उन सैनिकों को पकड़कर उनके टुकड़े करवा दिए। यहाँ से बाबर की सेना चूटीआली गांव में पहुंची।

इससे आगे का क्षेत्र इतना दुर्गम हो गया कि वहाँ घोड़े नहीं चल सकते थे। अतः बाबर की सेना को अपने अधिकांश घोड़े यहीं छोड़ने पड़े। इससे बाबर के पास केवल 300 घोड़े रह गए। हालांकि अधिकतकर भैंसें मारकर खाई जा चुकी थीं फिर भी बची हुई भैंसों को यहीं छोड़ देना पड़ा। यहाँ तक कि बाबर को एक कीमती बड़ा खेमा भी छोड़ना पड़ा जो उसने चौपरा के व्यापारियों से लूटा था।

चूटीआली से आगे निकलते ही एक रात भयानक वर्षा हुई। इससे बाबर के खेमे में घुटनों तक पानी भर गया और बाबर को सारी रात कम्बलों के एक ढेर पर बैठकर निकालनी पड़ी। बाबर (Babur) ने लिखा है कि मार्ग में हमें एक ऐसी नदी पार करनी पड़ी जो चौड़ी तो बहुत नहीं थी किंतु गहरी बहुत थी।

इसलिए उसमें से ऊंटों एवं घोड़ों को तैराकर पार करवाया गया। कुछ सामान नावों द्वारा पार करवाया गया। अंत में बाबर की सेना गजनी (Gazni) पहुंच गई जो इन दिनों बाबर के अधिकार में था। गजनी में कुछ दिन रुकने के बाद मई 1505 में बाबर पुनः काबुल (Kabul) पहुंच गया।

इस प्रकार बाबर द्वारा भारत पर किए गए प्रथम आक्रमण में बाबर को दिखकाट की बुढ़िया द्वारा दिखाए गए सपने वाली सोने-चांदी की मोहरें और हीरे-जवाहरात तो नहीं मिले किंतु बाबर भारत से कुछ भैंसें, ऊंट, घोड़े, भेड़ें, कपड़े और शक्कर की बोरियां लूट लाया।

इसमें से अधिकांश सामग्री मार्ग में ही समाप्त हो गई। भारत से लूटी गई भेड़ें बाबर (Babur) के साथ नहीं आ सकती थीं। अतः सेना की एक टुकड़ी उन भेड़ों को पीछे-पीछे ला रही थी। जब बाबर के ये सैनिक इन भेड़ों को लेकर नूर घाटी में पहुंचे तो नूर घाटी वालों ने बाबर के इन सैनिकों को मार डाला तथा उनकी भेड़ें छीनकर खा गए। काबुल (Kabul) पहुंचते-पहुंचते बाबर की सेना फिर से खाली हाथ रह गई।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर शिया बन गया ताकि उज्बेकों को मार सके (13)

0
बाबर शिया बन गया - www.bharatkaitihas.com
बाबर शिया बन गया

उज्बेकों ने बाबर (Babur) का राज्य छीन लिया और उसकी सेना नष्ट कर दी। अपने राज्य पर फिर से अधिकार प्राप्त करने के लिए बाबर को ईरान के शाह की मदद की आवश्यकता थी। ईरान के शाह के कहने पर बाबर शिया बन गया ताकि शाह से सहायता प्राप्त की जा सके।

 जनवरी 1505 में बाबर ने भारत के लिए एक अभियान किया किंतु वह कोहाट (Kohat) तक आकर वापस लौट गया जो इस समय पाकिस्तान के खैबर पख्तून (Khyber Pakhtunkhwa) जिले में है। इस अभियान में बाबर कुछ भैंसें, भेड़ें, ऊंट, घोड़े, अनाज, शक्कर और कपड़े लूट कर ले जा सका था।

हालांकि बाबर (Babur) ने यह अभियान सोने-चांदी की मोहरों एवं हीरे-मोतियों की आशा में किया था किंतु इस क्षेत्र का सोना-चांदी तो महमूद गजनवी (Ghazni) से लेकर मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक जैसे आक्रांता पहले ही लूटकर ले जा चुके थे। अतः बाबर को इस क्षेत्र से अधिक कुछ नहीं मिल सकता था।

इस काल में बाबर कोहाट (Kohat) से आगे चलकर सिंधु नदी पार करने की हिम्मत नहीं कर सका। उसके पास न तो सेना थी और न भारत पर अभियान करने के लिए आवश्यक हथियार। अतः बाबर ने वापस काबुल (Kabul) लौट जाने में ही भलाई समझी।

 ई.1508 में बाबर ने कांधार दुर्ग (Kandhar Fort) पर अधिकार कर लिया। महाभारत काल में इसे गांधार कहा जाता था तथा गांधार की राजकुमारी गांधारी हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र की रानी थी। मौर्यों के काल में यह क्षेत्र मगध के मौर्यों के अधीन था तथा इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में बौद्ध-धर्मावलम्बी रहते थे किंतु दसवी शताब्दी ईस्वी से लेकर सोलहवीं शताब्दी के बीच में इस क्षेत्र की पूरी आबादी मुसलमान बन चुकी थी।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

बाबर को कांधार के दुर्ग (Kandhar Fort) में बहुत बड़ी संख्या में चांदी के टंके प्राप्त हुए। कांधार का किला दो परकोटों से घिरा हुआ था जिन्हें बाहरी किला और भीतरी किला कहा जाता था। बाबर ने इन टंकों को भीतरी दुर्ग में सुरक्षित रखवा दिया। चांदी के टंकों के अलावा भी इस दुर्ग से बहुत सारी वस्तुएं प्राप्त हुईं जिन्हें ऊंटों पर लदवाकर बाबर काबुल (Kabul) के लिए रवाना हो गया। कुछ ही दिनों बाद शैबानी खाँ ने कांधार का दुर्ग घेर लिया। बाबर इस स्थिति में नहीं था कि शैबानी खाँ से युद्ध कर सके। इस कारण कठिनाई से हाथ आई हुई एक बड़ी सम्पत्ति बाबर के हाथों से निकल गई। सितम्बर 1507 में बाबर ने एक फिर भारत चलकर भाग्य आजमाने का निर्णय लिया। वह काबुल (Kabul) से चलकर लगमान (Laghman) पहुंचा। लमगान अफगानिस्तान में जलालाबाद के निकट था। लमगान से मौर्य-सम्राट अशोक के शिलालेख प्राप्त हुए हैं जिनसे सिद्ध होता है कि यह क्षेत्र मगध के मौर्य-सम्राटों के अधीन हुआ करता था। दसवीं शताब्दी इस्वी में इस क्षेत्र पर पंजाब के हिन्दूशाही वंश के राजा जयपाल (Raja Jaipal) का शासन था किंतु सुबुक्तुगीन ने जयपाल को परास्त करके लगमान (Laghman) को गजनी (Ghazni) के अधीन किया था।

बाबर के समय काबुल से लगमान (Kabul to Laghman) तक के मार्ग में डाकुओं के बड़े-बड़े गिरोह रहा करते थे। इन डाकुओं ने स्थान-स्थान पर बाबर की सेना का मार्ग रोका किंतु बाबर इन डाकुओं का दमन करके नीनगनहार होता हुआ पूरअमीन घाटी पहुंच गया। उस समय इस क्षेत्र में भील रहा करते थे और बड़े स्तर पर चावल की खेती किया करते थे। ये हिन्दू परम्पराओं में विश्वास करते थे।

बाबर के सैनिकों ने सैंकड़ों भीलों को मारकर उनका चावल छीन लिया। उन्हीं दिनों बाबर को समाचार मिला कि शैबानी खाँ कांधार का घेरा उठाकर वापस चला गया। चांदी के वे सिक्के जिन्हें बाबर कांधार के भीतरी किले में छोड़ आया था, वे फिर से बाबर के अधिकार में आ गए।

इस पर बाबर ने भी हिन्दुस्तान जाने का विचार छोड़ दिया तथा गजनी (Ghazni) होते हुए वापस काबुल (Kabul) लौट गया। काबुल पहुंचकर बाबर ने मिर्जा की उपाधि की जगह बादशाह की उपाधि धारण की। इसके कुछ ही दिन बाद बाबर के पहले बेटे हुमायूँ का जन्म हुआ।

ई.1510 में बाबर ने एक बार फिर से समरकंद पर अधिकार करने का निश्चय किया। इसका मुख्य कारण यह था कि उन्हीं दिनों समरकंद के उज्बेक शासक शैबानी खाँ (Shaibani Khan) तथा ईरान के सफवी शासक शाह इस्माइल में मर्व नामक स्थान पर भीषण युद्ध हुआ जिसमें शैबानी खाँ पराजित होकर मारा गया।

बाबर ने इसे अपने लिए अच्छा अवसर समझा और वह ई.1511 में अपने पूर्वजों की राजधानी समरकंद पर चढ़ बैठा तथा समरकंद पर अधिकार करने में सफल हो गया। बाबर ने समझा कि उसके बुरे दिन अब समाप्त हो चुके हैं किंतु शायद वह गलत सोच रहा था। कुछ समय बाद शैबानी खाँ (Shaibani Khan) के उत्तराधिकारी उबैदुल्ला खाँ ने समरकंद पर आक्रमण किया और एक बार फिर से समरकंद बाबर (Babur) के हाथों से निकल गया।

बाबर ने एक बार फिर से अपने बाप-दादों के राज्य पर अधिकार करने का प्रयत्न किया और ईरान के शाह से सहायता मांगी। ईरान के शाह ने शर्त रखी कि यदि बाबर सुन्नी मत त्याग कर शिया हो जाये तो उसे ईरान की सेना मिल जायेगी।

बाबर की महत्वाकांक्षा ने बाबर को ईरान के शाह की बात मान लेने के लिये मजबूर किया। इस पर बाबर शिया बन गया । इस अहसान का बदला चुकाने के लिये ईरान का शाह बड़ी भारी सेना लेकर बाबर की मदद के लिये आ गया। उसकी सहायता से बाबर ने समरकंद, बुखारा, फरगना, ताशकंद, कुंदूज और खुरासान फिर से जीत लिये। यह पूरा क्षेत्र ट्रान्स-ऑक्सियाना कहलाता था और इस सारे क्षेत्र में सुन्नी-मुसलमान रहते थे।

ईरान के शाह के साथ हुई संधि के अनुसार बाबर के लिये आवश्यक था कि वह ट्रान्स-ऑक्सियाना के लोगों को शिया बनाये किंतु ट्रान्स-ऑक्सियाना के निवासियों को यह स्वीकार नहीं हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि ईरान के शाह की सेना के जाते ही ट्रान्स-ऑक्सियाना के लोगों ने बाबर को वहाँ से मार भगाया। बाबर के अनेक मंत्री भी बाबर के शिया बन जाने से नाराज होकर उसे छोड़ गए थे। जबकि बहुत से मंत्री जानते थे कि शाह की आंखों में धूल झौंकने के लिए बाबर शिया बन गया है। वास्तव में वह सुन्नी मत का ही पालन कर रहा है।

अब मध्य-एशिया में बदख्शां (Badakhshan) ही एकमात्र ऐसा प्रदेश रह गया जिस पर बाबर (Babur) का अधिकार था। इस एक प्रदेश के भरोसे बाबर ट्रान्स-ऑक्सियाना (Transoxiana) में बना नहीं रह सकता था। उसने बदख्शां को हुसैन मिर्जा नामक गवर्नर की देखरेख में देकर ट्रान्स-ऑक्सियाना छोड़ दिया। अपने बाप-दादों की जमीन से एक बार फिर से नाता टूट जाने से बाबर का दिल बुरी तरह टूट गया। वह सिर धुनता हुआ काबुल लौट आया।

ई.1513 में बाबर (Babur) ने ईरान के शाह की सहायता से पुनः उज्बेकों पर आक्रमण किया। गजदावान (गज-दाह-वन) नामक स्थान पर दोनों पक्षों में भीषण लड़ाई हुई किंतु बाबर पुनः हार गया और युद्ध-क्षेत्र से काबुल (Kabul) भाग आया। इस युद्ध में बाबर को बहुत क्षति उठानी पड़ी। उसके बहुत से सैनिक मारे गए।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

0
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

0
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

0
तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...