Home Blog Page 85

सुंदर दासियाँ पाने के लिए हजारों नौजवान अफगानिस्तान से भारत चल पड़े (15)

0
सुंदर दासियाँ - www.bharatkaitihas.com
सुंदर दासियाँ पाने के लिए हजारों नौजवान अफगानिस्तान से भारत चल पड़े

अफगानिस्तान के लोगों ने भारत की सुंदर औरतों के किस्से सुन रखे थे। जब बाबर भारत पर अधिकार करने के लिए चला तो भारत से सुंदर दासियाँ पाने के लालच में हजारों नौजवान बाबर की सेना (Babur Ki Sena) में भरती हो गए।

ई.1513 में उज्बेगों द्वारा बाबर (Babur) को एक बार फिर समरकंद (Samarkand) से बाहर कर दिए जाने के कारण बाबर पुनः काबुल (Kabul) आ गया। तीसरी बार समरकंद हाथ से निकल जाने के बाद बाबर ने मध्य-एशिया पर राज करने का लालच छोड़ दिया तथा दिखकाट की बुढ़िया की सलाह के अनुसार भारत जाकर भाग्य आजमाने का निर्णय लिया।

ई.1519 में बाबर ने बिजौर के लिए अभियान किया। बाबर की बहिन गुलबदन बेगम (Gulbadan Begum) ने अपनी पुस्तक ‘हुुमायूंनामा’ (Humayun-nama) में लिखा है कि बिजौर में हिन्दुओं की बस्ती थी।

गुलबदन बेगम के अनुसार बाबर ने दो-ढाई घड़ी में बिजौर को जीत लिया जबकि बाबर ने लिखा है कि बिजौर को जीतने में कई दिन लगे। बाबर ने बिजौर के दुर्ग में रह रहे समस्त मनुष्यों को मरवा दिया। बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘बिजौर के दुर्ग में मैंने अपने लोगों को बसा दिया।’

बिजौर के हत्याकाण्ड से बाबर को कोई विशेष धन या सामग्री प्राप्त नहीं हुई। इससे बाबर को बड़ी निराशा हुई और वह भेरा के लिए रवाना हो गया।

16 फरवरी 1519 को बाबर (Babur) ने पहली बार सिंधु नदी (Sindhu River) पार की। 18 फरवरी को बाबर तथा उसकी सेना ने कचाकोट (Kachakot River) नामक नदी पार की तथा वहाँ रहने वाले गूजरों को मार डाला। 19 फरवरी को बाबर की सेना ने सूहान नदी पार की। इसके बाद उसने झेलम नदी के किनारे स्थित खूशआब, चीनाब तथा चीनी ऊत नामक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

TO READ THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

उस काल में ये क्षेत्र पंजाब के अंतर्गत थे जिस पर कुछ काल के लिए तैमूर लंग (Timur Lang) का शासन रहा था। इसलिए बाबर (Babur) ने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि इस क्षेत्र में किसी की भेड़, सूत का एक टुकड़ा या किसी भी प्रकार का सामन न छीनें। भेरा भारत के सीमांत पर झेलम नदी (Jhelum River) के किनारे भारत की सीमा में स्थित था। जब बाबर की सेना ने भेरा को घेर लिया तो भेरा के मुस्लिम शासक ने बाबर को चांदी के चार लाख सिक्के देकर बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली जिन्हें शाहरुखी कहा जाता था। संभवतः समरकंद के शासक शाहरुख के शासनकाल में चलाए जाने के कारण इन्हें शाहरुखी कहा जाता था। इन सिक्कों का प्रचलन अफगानिस्तान में भी होता था। भेरा के शासक द्वारा कर दिए जाने के कारण बाबर ने भेरा में न तो लूटपाट मचाई और न किसी को मारा। यहाँ से बाबर ने अपना एक दूत लाहौर तथा दिल्ली भिजवाया। इस दूत को दो पत्र दिए गए। पहला पत्र पंजाब के गवर्नर दौलत खाँ के नाम था और दूसरा पत्र दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के नाम था।

इन पत्रों में कहा गया था- ‘पंजाब के वे समस्त क्षेत्र जो मेरे मरहूम दादा के दादा तैमूर लंग ने अपने अधीन किए थे, वापस मुझे लौटा दिए जाएं।’

इस दूत ने लाहौर पहुंचकर दौलत खाँ से भेंट करने का प्रयास किया किंतु दौलत खाँ न तो स्वयं उस दूत से मिला और न उस दूत को दिल्ली जाने दिया। बाबर ने लिखा है- ‘अवश्य ही भारत वाले कम अक्ल के रहे होंगे जो उन्होंने मेरे दूत के साथ ऐसा व्यवहार किया।’

जब बाबर का दूत अपेक्षित अवधि में लौट कर नहीं आया तो बाबर ने झेलम नदी के निकटवर्ती क्षेत्रों में अपने गवर्नर नियुक्त कर दिए तथा स्वयं काबुल लौट गया। बाबर का दूत भी कुछ महीने तक लाहौर में प्रतीक्षा करने के बाद काबुल लौट आया।

एक दिन बाबर (Babur) की भेंट उस्ताद अली नामक एक तुर्क से हुई। उस्ताद अली कमाल का आदमी था। उसे बंदूक बनाने की कला आती थी और वह कुछ अन्य तरह का विस्फोटक जखीरा भी बनाना जानता था। बाबर ने उसकी बड़ी आवभगत की और उसकी मदद से अपने लिये नये तरह का असला तैयार करवाया।

कुछ ही समय बाद बाबर के पास एक और ऐसा चमत्कारी आदमी आया। उसका नाम मुस्तफा था। उसे बारूद के गोले चलाने वाली तोप बनाना और उसे सफलता पूर्वक चलाना आता था। बाबर ने इन दोनों आदमियों की सहायता से अपने लिये एक शक्तिशाली तोपखाने का निर्माण करवाया।

गोला-बारूद, बंदूक और तोप की शक्ति हाथ में आ जाने के बाद बाबर (Babur) ने अपनी योजना पर तेजी से काम किया। नवम्बर 1525 में बाबर ने एक बार फिर भारत की ओर रुख किया। इस बार बाबर ने दिल्ली तक जाने का निश्चय किया।

अब तक बाबर (Babur) समझ चुका था कि यदि उसे भारत को जीतना है तो उसे कैसी तैयारी करनी चाहिए! बाबर ने अपने आदमी पूरे अफगानिस्तान में फैला दिये जिन्होंने घूम-घूम कर प्रचार किया कि बाबर फिर से सुन्नी हो गया है और हिन्दुस्तान की बेशुमार दौलत लूटने के लिये हिन्दुस्तान जा रहा है। हिन्दुस्तान से मिलने वाला सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात और सुंदर दासियाँ बाबर के सिपाहियों में बांटी जायेंगी।

सैंकड़ों साल से बाबर के तुर्क एवं मंगोल-पूर्वज अफगानी बर्बर-लड़ाकों की सेना लेकर हिन्दुस्तान पर हमला बोलते आये थे। जब उनके सैनिक भारत से लौटते तो उनकी जेबें बेशुमार दौलत से भरी रहतीं। सोने-चांदी की अशर्फियाँ, हीरे-जवाहरात और कीमती आभूषण उन्हें लूट में मिलते थे।

प्रत्येक सैनिक के पास दस-बीस से लेकर सौ-दौ सौ तक की संख्या में गुलाम होते थे जो बहुत ऊँचे दामों में मध्य-एशिया के बाजारों में बिका करते थे। हिन्दुस्तान से लूटी गयी सुंदर दासियाँ उनके हरम में शामिल होती थीं। भारत में युद्ध-अभियान करके लौटे हुए सैनिकों का सब ओर बहुत आदर होता था क्योंकि वे सैनिक अनेक काफिरों को मारकर अपने लिये जन्नत में जगह सुरक्षित कर चुके होते थे और उनके घरों में सुंदर भारतीय दासियां काम करती थीं।

चंगेज खाँ (Changes Khan) और तैमूर लंग (Timur Lang) के समय के किस्से अब भी मध्य-एशियाई देशों में बहुत चाव से कहे और सुने जाते थे। जब उन लोगों ने सुना कि बाबर (Babur) फिर से सुन्नी हो गया है और बहुत बड़ी सेना लेकर हिन्दुस्तान पर हमला करने जा रहा है तो मध्य-एशिया के बेकार नौजवानों ने बाबर की सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया।

बेशुमार दौलत और सुंदर दासियाँ पाने के लालच में हजारों नौजवान अपने घर-बार छोड़कर काबुल (Kabul) के लिये रवाना हो गये। जिन युवकों को उनके स्वजनों ने अनुमति नहीं दी, वे भी रात के अंधेरे में अपने घरों से भाग लिये। ये नौजवान पहाड़ों में डफलियां और चंग बजाते, नाचते-गाते और जश्न मनाते हुए काबुल की ओर चल पड़े।

इन नौजवानों ने बचपन से ही भारत की अमीरी के किस्से सुने थे। अपने पुरखों की वीरताओं के किस्से सुने थे। सुल्तान महमूद गजनवी (Mahmud Ghaznavi) , सुल्तान मुहम्मद गौरी और तैमूर लंग के किस्से सुने थे। बहुत से नौजवानों के पुरखे इन महान् सुल्तानों की सेनाओं में सैनिक हुआ करते थे।

उनके द्वारा भारत से सोने-चांदी के बर्तन, सिक्के और कीमती पत्थर लूट कर लाए गए थे वे खानदानी गौरव के रूप में कई पुश्तों से उनके घरों में सजे हुए थे। महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी के इतिहास परी-कथाओं की तरह अफगानिस्तान से लेकर सम्पूर्ण मध्य-एशिया में व्याप्त थे।

जब कराकूयलू कबीले के नौजवान बैराम खाँ ने सुना कि बाबर (Babur) हिन्दुस्तान की बेशुमार दौलत लूटने के लिये हिन्दुस्तान जा रहा है तब उसने भी बाबर के साथ भारत जाने का निश्चय किया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बंदूक और तोप बनाने वाले मिल गए बाबर को (14)

0
बंदूक और तोप बनाने वाले मिल गए बाबर को- www.bharatkaitihas.com
बंदूक और तोप बनाने वाले मिल गए बाबर को

दुनिया अत्यंत प्राचीन काल से बारूद (Barood) से परिचित थी तथा पत्थर के गोले छोड़ने वाली तोप का भी प्रयोग करत थी किंतु सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ तक बारूद से चलने वाली बंदूक और तोप के प्रयोग से अनजान थी। भारत के दुर्भाग्य से बाबर (Babur) को ऐसे लोग मिल गए जो बारूद को बंदूक और तोप में भरकर चला सकते थे।

बाबर (Babur) ने कई बार समरकंद (Samarkand) पर अधिकार करने का प्रयास किया था तथा तीन बार समरकंद पर अधिकार भी किया था किंतु हर बार कुछ ही समय में समरकंद उसके हाथों से निकल गया था। इसका मुख्य कारण यह था कि बाबर तुर्को-मंगोल कबीले का तैमूरी बादशाह था और इस काल तक समरकंद के ट्रान्स-ऑक्सियाना (Transoxiana) क्षेत्र में उज्बेगों (Uzbek) की संख्या बहुत बढ़ गई थी। इसलिए बाबर को समरकंद (Samarkand), बुखारा (Bukhara), फरगना (Fargana), ताशकंद (Tashkent or Tashkand), कुंदूज (Kunduz) और खुरासान (Khurasan) की जनता से सहयोग नहीं मिल पा रहा था।

उज्बेगों ने इस काल में मध्य-एशिया के समस्त तैमूरी बादशाहों को नष्ट कर दिया था। इस कारण बाबर (Babur) अकेला अपने दम पर ट्रान्स-ऑक्सियाना (Transoxiana) पर अधिकार नहीं रख सकता था। बाबर ने फारस के शिया शासक की सहायता से समरकंद एवं समस्त ट्रान्स-ऑक्सियाना क्षेत्र पर अधिकार कर लिया किंतु बाबर के मंत्री, सेनापति एवं सैनिक ही नहीं ट्रान्स-ऑक्सियाना क्षेत्र की जनता भी सुन्नी मत को मानने वाली थी। इस कारण शियाओं की सहायता लेने से बाबर का दांव उलटा पड़ गया।

यही कारण था कि इस बार उसे हमेशा के लिए ट्रान्स-ऑक्सियाना (Transoxiana) अर्थात् समरकंद (Samarkand), बुखारा, फरगना, ताशकंद, कुंदूज और खुरासान के क्षेत्र छोड़ देने पड़े। बदख्शां (Badakhshan) में अवश्य ही बाबर के अधीन गवर्नर शासन करता था किंतु बाबर का भाग्य मुख्यतः अफगानिस्तान में सिमट कर रह गया था जहाँ काबुल, कांधार और गजनी उसके अधीन थे किंतु यह क्षेत्र इतना निर्धन था कि वह बाबर जैसे महत्वाकांक्षी बादशाह का पेट नहीं भर सकता था।

ट्रान्स-ऑक्सियाना (Transoxiana) क्षेत्र में यूसुफजाई जाति के कबीले (Yousafzai or Yusafzai Tribes) बड़ी संख्या में रहते थे। उस काल में ये लोग बड़े झगड़ालू, विद्रोही और हद दर्जे तक बर्बर थे। वे किसी भी तरह के अनुशासन में रहने की आदी नहीं थे तथा किसी को भी कर के रूप में फूटी कौड़ी नहीं देना चाहते थे। बाबर ने उन्हें बलपूर्वक कुचलना चाहा किंतु उसे सफलता नहीं मिली। पहाड़ी और अनुपजाऊ क्षेत्र होने के कारण बाबर इस क्षेत्र से इतनी आय भी नहीं जुटा पाया जिससे उसका और उसकी सेना का निर्वहन हो सके।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

जीवन भर की लड़ाइयों के चलते तुर्क, मंगोल, ईरानी, उजबेग और अफगानी लड़ाके बाबर (Babur) के खून के प्यासे हो गये थे। इस कारण यह आवश्यक था कि उसके पास एक विशाल सेना रहे किंतु इस निर्धन प्रदेश में सेना को चुकाने के लिये वेतन एवं घोड़ों के लिए दाने का प्रबंध करना बाबर के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई थी। एक सौ ग्यारह साल की बुढ़िया से बाबर ने भारत की सम्पन्नता और तैमूर के भारत आक्रमण की जो कहानियाँ सुनीं थीं वे अब भी बाबर के अवचेतन मस्तिष्क में घर बनाये हुए बैठी थीं। इसलिये इस बार बाबर ने देवभूमि भारत में अपना भाग्य आजमाने का निर्णय लिया। इन सब से भी बढ़कर एक और चीज थी जो उसे अफगानिस्तान में चैन से बैठने नहीं दे रही थी। वह थी उसकी खूनी ताकत। आखिर उसके खून में चंगेज खाँ और तैमूर लंग का सम्मिलित खून ठाठें मार रहा था जो क्रूरता की सारी सीमायें पार करके नई मिसाल स्थापित करना चाहता था। बाबर को अपनी खूनी ताकत पर पूरा भरोसा था जिसके बल पर वह अपना भाग्य नये सिरे से लिख सकता था। हालांकि बाबर एक दुर्भाग्यशाली व्यक्ति था किंतु परिश्रम के मामले में वह अपने युग के लोगों में सबसे आगे रहने वाला था।

संभवतः बाबर का भाग्य और भारत का दुर्भाग्य बाबर (Babur) को हिन्दुस्तान की ओर खींच रहे थे। भारत के दुर्भाग्य से बाबर को ऐसे लोग मिल गए जो बारूद को बंदूक और तोप में भरकर चला सकते थे।

मुगलों के इतिहास में आगे बढ़ने से पहले हम थोड़ी सी चर्चा बैराम खाँ तथा उसके पूर्वजों के सम्बन्ध में करनी चाहिए जो शीघ्र ही मुगलों का संरक्षक बनने वाला था। बैरम खाँ शिया मुसलमान था और तुर्कों की कराकूयलू शाखा में उत्पन्न हुआ था।

हम चर्चा कर चुके हैं कि मध्य-एशिया में तुर्कों के कई कबीले थे जिन्होंने अलग-अलग स्थानों पर अपने कई राज्य स्थापित किये। जो ‘तुुर्क’ (Turk) तुर्किस्तान से आकर ईरान में बस गये थे, उन्हें तुर्कमान (Turkman) कहा जाता था। तुर्कमानों का जो कबीला काली बकरियां चराता था वह ‘कराकूयलू‘ कहलाता था। तुर्की भाषा में ‘करा’ काले को कहते हैं, ‘कूय’ माने बकरी और ‘लू’ का अर्थ होता है- वाले। इस प्रकार काली बकरियों वाले कराकूयलू कहलाये।

सफेद बकरियां चराने वाले उनके भाई आककूयलू कहलाते थे। तुर्कों के कराकूयलू तथा आककूयलू कबीले वर्तमान अजरबैजान में निवास करते थे जो एशिया कोचक अर्थात् वर्तमान टर्की और रूस की सीमाओं पर स्थित है।

सोलहवीं शताब्दी ईस्वी तक कराकूयलू कबीले की कई शाखायें हो चुकी थीं जिनमें से एक प्रमुख शाखा थी- ‘बहारलू’। मुगल अमीर तैमूर लंगड़े के समय में बहारलू शाखा में अली शकरबेग नाम का एक योद्धा हुआ जिसकी जागीर में हमदान, देनूर और गुर्दिस्तान के इलाके आते थे। यह जागीर ‘अली शकर बेग की विलायत’ कहलाता था। अली शकर बेग इतना नामी आदमी था कि जब इस क्षेत्र से तुर्कमानों का राज्य चला गया तब भी यह क्षेत्र ‘अलीशकर बेग की विलायत’ कहलाता रहा।

अलीशकर बेग का बेटा पीरअली हुआ जिसने अपनी बहिन का विवाह ट्रान्स-ऑक्सियाना (Transoxiana) क्षेत्र के समरकंद (Samarkand) के शाह महमूद मिरजा से कर दिया और वह महमूद मिरजा का अमीर हो गया। यहीं से बहारलू खानदान मुगल खानदान से जुड़ा। समरकंद से महमूद मिर्जा का राज्य खत्म होने के बाद पीर अली तूरान से खुरासान (Khurasan) चला गया। खुरसान के अमीरों ने पीरअली को शक्तिशाली समझ कर और आने वाले समय में अपने लिये प्रबल प्रतिद्वंद्वी जानकर उसकी हत्या कर दी।

पीरअली का बेटा यारबेग हुआ जो ईरान में रहता था। जब ईरान का वह क्षेत्र आककूयलू शाखा के हाथों से निकल गया तो यारबेग भाग कर बदख्शां आ गया और बदख्शां (Badakhshan) के कुन्दूज (Kunduz) नामक शहर में रहने लगा। बदख्शां उस समय उमर शेख के पिता अर्थात बाबर के बाबा अबू सईद के अधीन था।

जब उमर शेख बदख्शां का शासक हुआ था तब यारबेग कुन्दूज में रहता था। यारबेग के बेटे सैफ अली ने बदख्शां (Badakhshan) की सेना में नौकरी कर ली। सैफअली का बेटा बैरम बेग उमर शेख के बेटे बाबर की सेना में शामिल हो गया। जब ईस्वी 1513 में बाबर अंतिम बार बदख्शां से अफगानिस्तान के लिये रवाना हुआ तो कराकायलू शाखा का यह वंशज भी अपना भाग्य आजमाने के लिये बाबर के साथ लग लिया।

बाबर ने अपने मौसा हुसैन मिर्जा को बदख्शां (Badakhshan) का गवर्नर नियुक्त किया था। ई.1520 में अचानक हुसैन मिर्जा की मृत्यु हो गई। उस समय हुसैन मिर्जा का पुत्र मिर्जा सुलेमान बहुत छोटा था। इसलिए बाबर की मौसी अपने पुत्र सुलेमान को लेकर बाबर के पास चली आई।

बाबर ने अपनी मौसी की इच्छा के अनुसार उसके पुत्र मिर्जा सुलेमान को बदख्शां (Badakhshan) का गवर्नर बने रहने दिया तथा अपने पुत्र हुमायूँ को उसका मार्गदर्शन करने के लिए बदख्शां भेज दिया। हुमायूँ का जन्म ई.1508 में हुआ था। इसलिए हुमायूँ इस समय केवल 12 साल का किशोर था। कुछ समय बाद बाबर ने अपने दूसरे अल्पवय-पुत्र कामरान (Kamran or Qamran) को कांधार (Kandhar) का शासक नियुक्त कर दिया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अफगान लुटेरे डफलियाँ और चंग बजाते हुए भारत के लिए चल पड़े (16)

0
अफगान लुटेरे - www.bharatkaitihas.com
अफगान लुटेरे डफलियाँ और चंग बजाते हुए भारत के लिए चल पड़े

भारत की अकूत सम्पदा और सुन्दर दासियाँ पाने के लालच में हजारों अफगान लुटेरे (Afghan robbers) डफलियाँ और चंग बजाते हुए भारत के लिए चल पड़े। मानवता के मूल्यों से विहीन, प्राणीमात्र के प्रति संवेदना से रहित, करुणा और प्रेम के सुख से अंजान, शांति के मूल्य से अपरिचित ये दुर्दांत लुटेरे शीघ्रातिशीघ्र शस्य-श्यामलाम् एवं सुजलाम्-सुफलाम भारत-भूमि को रौंदने, लूटने एवं नौंचने को लालायित थे।

जैसे ही बाबर (Babur) को बारूद फैंकने वाली तोपें एवं बंदूकें बनाने वाले मिले, बाबर ने भारत पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। उसने अफगानिस्तान एवं मध्य-एशिया में अपने भारत अभियान की मुनादी करवाई तथा नौजवानों को अपनी सेना में भरती होकर भारत चलने का निमंत्रण दिया।

भारत से बड़ी मात्रा में मिलने वाले सोने, चांदी, गुलाम और सुंदर दासियाँ पाने की लालसा में हजारों अफगान लुटेरे (Afghan robbers) बाबर की सेना में आ-आकर एकत्रित होने लगे। देखते ही देखते बाबर की सेना में पच्चीस हजार अफगान लुटेरे एकत्रित हो गये।

ये अफगान लुटेरे (Afghan robbers) अपने राष्ट्र की रक्षा करने जैसे किसी पवित्र उद्देश्य के लिए एकत्रित नहीं हुए थे। अपितु अपने पड़ौस में स्थित भारत नामक एक सुखी और सम्पन्न राष्ट्र के सुख एवं सम्पत्ति को लूटकर अपना भविष्य संवारने के लालच में एकत्रित हुए थे!

बाबर की सेना (Babur Ki Sena) में भरती होने वाले ये नौजवान कहने को तो मनुष्य ही थे किंतु वास्तव में वे दो हाथों एवं दो पैरों वाले धन-पिपासु एवं रक्त-पिपासु हिंसक जन्तु थे। मानवता के मूल्यों से विहीन, प्राणीमात्र के प्रति संवेदना से रहित, करुणा और प्रेम के सुख से अंजान, शांति के मूल्य से अपरिचित ये दुर्दांत अफगान लुटेरे (Afghan robbers) शीघ्रातिशीघ्र शस्य-श्यामलाम् एवं सुजलाम्-सुफलाम भारत-भूमि को रौंदने, लूटने एवं नौंचने को लालायित थे।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

ये अफगान लुटेरे (Afghan robbers) भारत को लूटकर अपना भविष्य बनाना चाहते थे, अपने कबीले का गौरव बनना चाहते थे, अपनी आने वाली पीढ़ियों को सुनाए जा सकने लायक इतिहास के नायक बनना चाहते थे किंतु वे नहीं जानते थे कि कुछ ही दिनों में उनमें से बहुतों के शव युद्ध के मैदानों में गिरकर नष्ट हो जाएंगे! जो लोग जीवित बचेंगे, वे भी सदा के लिए भारत में रह जाएंगे। वे नहीं जानते थे कि उनमें से एक भी नौजवान अपने कबीले और अपने कुटुम्ब के पास कभी भी लौट कर नहीं आएगा! वे रक्त के सौदागर थे जो अपना रक्त बहाने की कीमत पर भारत के निरीह एवं निर्दोष लोगों का रक्त बहाकर उनका सोना-चांदी और स्त्रियां छीनना चाहते थे। उन नौजवानों को ज्ञात नहीं था कि काबुल से दिल्ली तक का मार्ग कितना कठिन है! वे नहीं जानते थे कि उन्हें खाने को भी प्रतिदिन मिलेगा या नहीं! उन्हें सोने को ठिकाना मिलेगा या नहीं! चलने को सवारी मिलेगी या नहीं! उनके हाथ-पैर भी सलामत बचेंगे या नहीं! वे जीवित भी बचेंगे या नहीं! वे बस इतना जानते थे कि भारत से उन्हें सोने-चांदी की मोहरें तथा सुंदर औरतें मिलेंगी, ढेरों गुलाम मिलेंगे जिन्हें मध्य-एशिया के बाजारों में बेचकर वे इतना धन कमा लेंगे कि उनका शेष जीवन ऐशो-आराम से कट जाएगा!

बाबर (Babur) ने इन अफगान लुटेरों (Afghan robbers) को बड़े-बड़े सपने दिखाए, उन्हें हथियार और बख्तरबंद दिए। घोड़े पर जीन कसना और उस पर सवारी करना सिखाया, घोड़े की पीठ पर बैठकर बंदूक और तलवार चलाना सिखाया। कुछ ही समय में बाबर की सेना सज गई।

काबुल के निकट डीहे याकूब में इस सेना को एकत्रित किया गया। गोला-बारूद, बंदूकों और तोपखाने से सुसज्जित पच्चीस हजार सैनिकों को देखकर बाबर की छाती घमण्ड से फूल गयी। वह जानता था कि इन पच्चीस हजार सैनिकों की ताकत उसके पूर्वज तैमूर लंग के बरानवे हजार अश्वारोही सैनिकों से कहीं अधिक है क्योंकि तैमूर के सैनिक केवल तीर, तलवार और भाले चलाना जानते थे जबकि बाबर के सैनिकों के पास मौत उगलने वाले बंदूकें और तोपें थीं जिनका मुकाबला भारत वाले किसी भी प्रकार से नहीं कर सकते थे।

बाबर (Babur) ने अपनी सात सौ तोपों को घोड़ों की पीठ पर रखवाया। उस्ताद अली को सेना के दाहिनी ओर तथा मुस्तफा को सेना के बायीं ओर तैनात करके बाबर स्वयं सेना के केन्द्र में जा खड़ा हुआ। इसके बाद उसने सेना को हिन्दुस्तान की ओर कूच करने का आदेश दिया।

प्रयाण का आदेश मिलते ही बाबर की सेना में डफलियां और चंग बजने लगे, जोशीले गीत गाए जाने लगे तथा इन गीतों के माध्यम से नौजवान सिपाहियों को सोने-चांदी, भारत की सुंदर औरतों और युद्ध में काम आने पर जन्नत में मिलने वाली हूरों के हसीन सपने दिखाए जाते थे। अफगानिस्तान की बर्फीली और निर्जीव घाटियां तुमुल युद्ध-घोष से गूंजने लगीं।

बारूद और तोपों से लदे हुए घोड़ों एवं सैनिकों को हिन्दुस्तान की ओर बढ़ता हुआ देखकर बाबर की खूनी ताकत हिलोरें लेने लगी। आज उसमें इतनी शक्ति थी कि वह दुनिया की किसी भी सामरिक शक्ति से सीधा लोहा ले सकता था। देवभूमि भारत को रौंदने का बरसों पहले देखा गया बाबर का सपना शीघ्र ही पूरा होने वाला था।

इस समय बाबर (Babur) की कुछ सेना बदख्शां में हुमायूँ के पास, कुछ सेना कांधार में कामरान के पास तथा कुछ सेना गजनी में ख्वाजा कलां के पास मौजूद थी। बाबर ने अपनी सेना का एक हिस्सा काबुल की रक्षा के लिए छोड़ा तथा शेष सेना को हिन्दुस्तान ले जाने का निश्चय किया।

बाबर का बड़ा पुत्र हुमायूँ इस समय 17 वर्ष का हो चुका था, बाबर ने उसे भी भारत अभियान पर ले जाने का निश्चय किया। अतः बाबर जब बागेवफा नामक स्थान पर पहुंचा तो वहीं ठहर गया तथा हुमायूँ को तुंरत सेना लेकर आने का आदेश भिजवाया। हुमायूँ काबुल होता हुआ 3 दिसम्बर 1525 को बागेवफा पहुंचा तथा अपने पिता बाबर की सेवा में उपस्थित हुआ।

बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ को पूरे पांच साल बाद देखा था किंतु बाबर ने उसे देखते ही फटकार लगाई कि वह एक मास विलम्ब से क्यों आया है! हुमायूँ को दो कारणों से विलम्ब हुआ था। एक कारण तो यह था कि बदख्शां की सेना ने प्रस्थान की तैयारी करने में काफी समय लगा दिया और दूसरा कारण यह था कि हुमायूँ की माता माहम बेगम ने हुमायूँ को कुछ दिनों के लिए काबुल में रोक लिया था।

इस अभियान में बाबर (Babur) ने सेना द्वारा मदिरा-सेवन और माजून-सेवन के दिन निश्चित कर दिए ताकि उसकी सेना प्रतिदिन नशा करने की अभ्यस्त न हो जाए। अफगानिस्तान में अफीम को माजून कहते हैं। यद्यपि बाबर के शिक्षकों ने उसे कठोर चेतावनी दी थी कि यदि जीवन में उन्नति करनी है तो नशे का सेवन कभी नहीं करे किंतु संभवतः ई.1519 से बाबर ने शराब पीना तथा अफीम खाना शुरु कर दिया था।

वह कई तरह के नशे करता था जिनमें शराब, अरक, बूजा तथा माजून सम्मिलित थे। बाबर ने लिखा है कि कई बार पूरी रात तथा कई बार दिन भर शराब और माजून का सेवन होता था।

जब बाबर (Babur) ‘बारीक आब’ नामक स्थान पर ठहरा हुआ था, तब लाहौर के शासक ख्वाजा हुसैन का आदमी 20 हजार शाहरुखी लेकर बाबर की सेवा में उपस्थित हुआ। बाबर ने इस राशि के लिए मालगुजारी शब्द का प्रयोग किया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि लाहौर के शासक ने बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी और बाबर को मालगुजारी देना स्वीकार कर लिया था।

बाबर (Babur) ने यह राशि बल्ख शहर में रहने वाले सम्मानित लोगों को भिजवा दी। बीसवीं  सदी के आरम्भ में भारत में नियुक्त रहे अंग्रेज अधिकारी अर्सकिन ने बाबर द्वारा दिए गए विवरण के आधार पर 20 हजार शाहरुखी का मूल्य बाबर के समय में एक हजार ब्रिटिश पौण्ड बताया है।

बाबर ने गजनी (Ghazni) के गवर्नर ख्वाजा कलां को भी अपनी सेना लेकर आने के आदेश भिजवाए। वह भी एक बड़ी सेना लेकर बागेवफा में बाबर से आ मिला। इस सेना में भी अफगान लुटेरे (Afghan robbers) बड़ी संख्या में भरे हुए थे।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर की पंजाब विजय (17)

0
बाबर की पंजाब विजय - www.bharatkaitihas.com
बाबर की पंजाब विजय

बाबर (Babur) की पंजाब विजय (Babur’s Punjab Victory) उसकी अब तक की विजयों में सबसे महत्वपूर्ण थी। इतिहास की दृष्टि से बाबर की पंजाब विजय का मूल्यांकन भविष्य में होने वाली भारत विजय का पूर्वाभ्यास समझा जाना चाहिए।

17 नवम्बर 1525 को बाबर 25 हजार नौजवानों की एक सेना लेकर काबुल (Kabul) से भारत के लिए चल पड़ा। उसने बदख्शां से अपने बड़े पुत्र हुमायूँ (Humayun) को भी उसकी सेना के साथ बुलवा लिया ताकि वह भी इस अभियान पर चले। जब बाबर की सेना बीगराम पहुंची तो उसे लाहौर के शासक ख्वाजा हुसैन ने सूचना भिजवाई कि पंजाब का शासक दौलत खाँ तथा उसका पुत्र गाजी खाँ लगभग 30 हजार सैनिकों के साथ आ रहे हैं।

उन्होंने कालानूर पर अधिकार कर लिया है तथा लाहौर के लिए बढ़ रहे हैं। इस कारण बाबर ने (Babur) अपनी गति बढ़ा दी तथा 14 दिसम्बर 1525 को सिंधु नदी, 16 दिसम्बर को कचाकोट नदी और 24 दिसम्बर 1525 को झेलम नदीे पार करके पंजाब पहुंच गया।

बाबर ने इस मार्ग में स्थित जूद पर्वत का भी उल्लेख किया है जिसका प्राचीन नाम नमक की पहाड़ी था। बाबर ने इस क्षेत्र में रहने वाले बुगियालों का भी उल्लेख किया है जहाँ बरगोवह कबीला रहता था। बाद के इतिहासकारों ने इन्हें गक्खर कहा है। कुछ लोग इन्हें खोखर जाट मानते हैं।

25 दिसम्बर को बाबर ने लाहौर के लिए संदेशवाहक रवाना किए तथा वहाँ के गवर्नर को कहलवाया कि वह दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) की सेना से युद्ध न करे तथा सियालकोट आकर मुझसे भेंट करे।

बाबर के जासूसों ने बाबर को सूचना दी कि पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) ने वृद्धावस्था के बावजूद अपनी कमर में दो तलवारें बांध ली हैं तथा उसके पुत्र गाजी खाँ ने 30-40 हजार सैनिक एकत्रित कर लिए हैं। 27 दिसम्बर 1525 को बाबर चिनाब नदी के किनारे पहुंच गया।

29 दिसम्बर 1525 को बाबर तथा उसकी सेना ने सियालकोट पहुंचकर डेरा लगाया। बाबर ने लिखा है- ‘इस इलाके में जाट तथा गूजर बड़ी संख्या में रहते हैं जो रात में सैनिक शिविरों में घुसकर बैलों तथा भैंसों की लूटमार करते हैं। वे बड़े ही अभागे तथा निष्ठुर होते हैं। हमारा उनसे अभी तक पाला नहीं पड़ा था किंतु उस रात वे हमारे शिविर में घुस गए और लूटपाट करके भाग छूटे। मैंने उनकी खोज करवाई तथा जो भी पकड़े गए, उनके टुकड़े-टुकड़े करवा दिए।’

सैयद अतहर अब्बास रिजवी ने लिखा है- ‘बाबर ने इन्हें जाट तथा जट लिखा है, ये लोग पंजाब, सिंधु नदी के तट और सिविस्तान के मुसलमान किसान थे तथा यमुना के पश्चिम एवं आगरा तथा आसपास के जाटों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं था।’

TO READ THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

1 जनवरी 1526 को बाबर ने पंजाब के कालानूर नामक स्थान पर अधिकार कर लिया। 5 जनवरी को बाबर (Babur) तथा उसकी सेना ने मिलवट का किला घेर लिया। पंजाब का शासक दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) तथा उसका पुत्र गाजी खाँ इसी किले में मौजूद थे। जब दौलत खाँ को लगा कि बाबर से पार पाना कठिन है तो दौलत खाँ ने बाबर के पास प्रस्ताव भिजवाया कि- ‘मेरा पुत्र गाजी खाँ बाबर के भय से जंगलों में भाग गया है। यदि मुझे क्षमा कर दिया जाए तो मैं मिलवट का किला आपको समर्पित करने तथा आपकी सेवा में उपस्थित होने को तैयार हूँ।’ इस पर बाबर ने दौलत खाँ लोदी को अभयदान देते हुए अपने पास बुलवाया। जब दौलत खाँ बाबर के समक्ष उपस्थित हुआ तो बाबर ने उससे कहा कि वह घुटनों के बल झुककर सलाम करे। दौलत खाँ लोदी ने वैसा ही किया। इसके बाद बाबर ने एक दुभाषिये की सहायता से दौलत खाँ को फटकारा कि- ‘मैंने तुझे अपना पिता कहा, मैंने तेरी अभिलाषा से अधिक तुझे सम्मान दिया, मैंने तुझे तथा तेरे पुत्रों को बिलोचियों के दरवाजों की ठोकरें खाने से बचाया। तेरे परिवार तथा हरम को इब्राहीम लोदी की कैद से मुक्त करवाया। तातार खाँ की विलायत में तीन करोड़ तुझे प्रदान किया। मैंने तेरे साथ कौनसी बुराई की थी जो तूने इस प्रकार अपनी कमर में दोनों ओर तलवारें लटका कर मेरे राज्य पर आक्रमण किया?’

बाबर के इस कथन से ऐसा प्रतीत होता है कि जब दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) ने दौलत खाँ लोदी से नाराज होकर उसके परिवार को कैद कर लिया था तथा दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) बलोचों से सहायता की याचना कर रहा था। तब बाबर ने दौलत खाँ की सहायता की थी तथा दौलत खाँ को न केवल दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के कोप से बचाया था अपितु दौलत खाँ के पिता तातार खाँ के राज्य में से हिस्सा भी दिलवाया था।

बाबर (Babur) द्वारा लिखे गए विवरण से यह भी ज्ञात होता है कि दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) का बड़ा पुत्र गाजी खाँ तो अपने पिता के पक्ष में था किंतु दौलत खाँ का एक अन्य पुत्र दिलावर खाँ बाबर के पक्ष में था। इस कारण दौलत खाँ ने दिलावर खाँ को काफी समय तक जेल में भी रखा था। संभवतः ई.1519 में जब बाबर सिंधु नदी को पार करके पंजाब तक आया था, संभवतः उसी समय ये घटनाएं घटी होंगी। दौलत खाँ के समर्पण के साथ ही बाबर की पंजाब विजय का कार्य सम्पन्न हो चुका था।

7 जनवरी 1526 को बाबर ने मिलवट के दुर्ग के भीतर जाकर निरीक्षण किया। वहाँ बाबर ने एक विशाल पुस्तकालय देखा। यह पुस्तकालय दौलत खाँ लोदी के पुत्र गाजी खाँ का था। बाबर ने उस पुस्तकालय की कुछ श्रेष्ठ पुस्तकें अपने पुत्र हुमायूँ (Humayun) को दे दीं तथा कुछ श्रेष्ठ पुस्तकें कांधार दुर्ग की रक्षा कर रहे अपने दूसरे पुत्र कामरान को भिजवा दीं।

बाबर को संदेह था कि गाजी खाँ जंगल में नहीं भागा है अपितु इसी दुर्ग में कहीं पर छिपा हुआ है। गाजी खाँ तो इस दुर्ग में नहीं मिला किंतु उसकी बेगमें तथा बच्चे दुर्ग में ही मौजूद थे। बाबर ने दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) तथा उसके कुछ अमीरों को भेरा के किले में ले जाकर बंद करने के आदेश दिए।

जब बाबर का अमीर कित्ता खाँ बेग इन लोगों को लेकर जा रहा था, तब मार्ग में सुल्तानपुर नामक स्थान पर दौलत खाँ की मृत्यु हो गई।

बाबर (Babur) ने मिलवट के दुर्ग से मिली सम्पत्ति बाकी नामक एक कर्मचारी को दी तथा उसे आदेश दिए कि- ‘वह यह सम्पत्ति लेकर बल्ख जाए तथा इसे वहाँ के सम्मानित लोगों और मेरे रिश्तेदारों को सौंप दे। साथ ही वहाँ से एक सेना लेकर तुरंत दिल्ली आ जाए।’

दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में, 10 जनवरी 1526 को बाबर की सेना ने जमकर शराब पी। बाबर ने लिखा है- ‘गजनी का गवर्नर ख्वाजा कलां कई ऊंटों पर शराब लदवाकर लाया था। उस रात ज्यादातर लोगों ने वही शराब पी, कुछ लोगों ने अरक भी पिया।’

अगले दिन बाबर (Babur) ने अपनी सेना का एक टुकड़ा गाजी खाँ को ढूंढने के लिए आसपास के जंगलों में भिजवाया तथा स्वयं शेष सेना के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गया। इसी दौरान दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) का भाई अल्लाउद्दीन लोदी अपनी सेना के साथ बाबर की शरण में आया।

इसे आलम खाँ भी कहा जाता था। बाबर ने लिखा है कि- ‘वह अपने भाई इब्राहीम लोदी से हारने के बाद पैदल तथा नंगा-बुच्चा मेरे पास पहुंचा। मैंने अपने कुछ अमीरों तथा सम्बन्धियों को उसके स्वागतार्थ घोड़ा देकर भेजा।’

अल्लाउद्दीन खाँ ने बाबर (Babur) के समक्ष उपस्थित होकर उसकी अधीनता स्वीकार की। बाबर ने उसे भी अपने साथ ले लिया। जब बाबर जसवान घाटी में पहुंचा तो दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के कई अमीरों ने बाबर को पत्र भिजवाकर भारत विजय के लिए शुभकमानाएं प्रेषित कीं।

जसवान घाटी में कई छोटे-छोटे किले थे। हुमायूँ को इन किलों पर अधिकार करने भेजा गया। हुमायूँ (Humayun) ने न केवल इन किलों पर अधिकार कर लिया अपितु इन किलों से बड़ी राशि प्राप्त करके बाबर को समर्पित की। बाबर की पंजाब विजय ने हमेशा-हमेशा के लिए बाबर के भाग्य रूपी महल के दरवाजे खोल दिए।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ की हिसार विजय पर बाबर ने एक करोड़ रुपए दिए (18)

0
हुमायूँ की हिसार विजय - www.bharatkaitihas.com
हुमायूँ की हिसार विजय पर बाबर ने एक करोड़ रुपए दिए

बाबर (Babur) ने अपने बड़े पुत्र हुमायूँ (Humayun) को हिसार (Hisar) की तरफ भेजा। हुमायूँ की हिसार विजय पर बाबर ने उसे एक करोड़ रुपए का पुरस्कार दिया।

दौलत खाँ लोदी (Daulat Kahan Lodi) की पराजय के साथ ही बाबर की पंजाब विजय (Babur’s Hisar Victory) का कार्य पूरा हो चुका था किंतु फिर भी बाबर ने अपने सेनापतियों को पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों पर आक्रमण करने भेजा ताकि स्थानीय शासकों को भी अधीन किया जा सके।

जनवरी 1526 में पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी (Daulat Kahan Lodi) का पुत्र गाजी खाँ जंगलों में भाग गया तथा दौलत खाँ ने बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली। बाबर ने दौलत खाँ को बंदी बनाकर भेरा के किले में भेज दिया किंतु मार्ग में ही दौलत खाँ की मृत्यु हो गई। पंजाब के शासक का इस प्रकार समाप्त हो जाना, बाबर के लिए बहुत लाभप्रद सिद्ध हुआ। अब पंजाब से लेकर दिल्ली तक के मार्ग में एक भी ऐसी शक्ति नहीं बची थी जो बाबर का मार्ग रोक पाती।

बाबर काबुल (Kabul) से 25 हजार सैनिक लेकर चला था। अपनी आत्मकथा में बाबर ने बड़ी चालाकी से अपने सैनिकों की यही संख्या बताई है। उसमें गजनी के गवर्नर ख्वाजा कलां की सेना तथा बदख्शां (Badakhshan) के गवर्नर हुमायूँ (Humayun) की सेना को बाबर ने अपनी सेना में नहीं जोड़ा है। क्योंकि ये सेनाएं बाद में बाबर की सेना से आकर मिली थीं।

अब तो दौलत खाँ लोदी (Daulat Kahan Lodi) के पुत्र दिलावर खाँ की सेना भी बाबर के साथ हो गई थी, उसकी संख्या भी बाबर ने नहीं जोड़ी। इब्राहीम लोदी का भाई आलम खाँ भी अपने सैनिक लेकर बाबर से आ मिला, उनकी संख्या भी नहीं जोड़ी गई। अफगान अमीर बिबन के सैनिकों की संख्या भी इसमें नहीं जोड़ी गई।

इस दौरान बाबर (Babur) के मामा सुल्तान अहमद चगताई के पुत्र भी अपनी सेना लेकर बाबर की सेवा में आ गए थे, उन सैनिकों की संख्या भी बाबर के सैनिकों की संख्या में नहीं जोड़ी गई। यदि इन सबके सैनिकों की संख्या जोड़ ली जाए तो बाबर के सैनिकों की संख्या पच्चीस हजार से बहुत अधिक बैठती है।

दूसरी ओर बाबर ने इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के सैनिकों की संख्या एक लाख बताई है जबकि कुछ समय पहले ही इब्राहीम लोदी तथा उसके अमीरों के बीच भयानक संघर्ष हुआ था जिसमें कई हजार तुर्की सैनिक मारे गए थे। इसलिए इब्राहीम के पास मुट्ठी भर सैनिक ही बचे थे जिनमें ग्वालियर का राजा विक्रमादित्य तोमर प्रमुख था।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

संभवतः संख्याओं के गड़बड़-झाले से बाबर यह दिखाना चाहता था कि उसने 25 हजार सैनिकों के बल पर एक लाख सैनिकों को परास्त कर दिया। बाबर ने लिखा है कि इब्राहीम लोदी के अमीरों एवं वजीरों के हाथियों की संख्या एक हजार थी। यह बात भी नितांत मिथ्या है। जब बाबर की सेना सरहिंद के निकट करनाल पहुंची तो एक व्यक्ति बाबर की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने स्वयं को इब्राहीम लोदी का दूत बताया। उसके पास इब्राहीम का कोई पत्र नहीं था किंतु उसने बाबर से निवेदन किया कि मेरे सुल्तान ने कहलवाया है कि बाबर अपने दूत इब्राहीम लोदी की सेवा में भेजे। इस पर बाबर ने अपने कुछ आदमी उसके साथ भेज दिए। जब ये लोग इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के पास पहुंचे तो इब्राहीम लोदी ने उन्हें बंदी बना लिया। इससे स्पष्ट है कि जो व्यक्ति स्वयं को इब्राहीम का दूत बता रहा था, वह झूठ बोल रहा था। इस झूठ के पीछे उसका क्या उद्देश्य था, इसका पता नहीं चलता। 25 फरवरी 1526 को कित्ता खाँ बेग बदख्शां से एक सेना लेकर अम्बाला में बाबर से आ मिला। बिबन नामक एक अफगान भी अपनी सेना लेकर इसी स्थान पर बाबर की सेना से आ मिला। वह बाबर की तरफ से लड़ने के लिए आया था।

बाबर ने लिखा है कि- ‘ये अफगान बड़े गंवार तथा मूर्ख थे।’

बाबर ने ऐसा इसलिए लिखा है क्योंकि बाबर के समक्ष कोई बैठने की हिम्मत नहीं करता था किंतु बिबन ने बाबर के समक्ष बैठने की अनुमति मांगी। बाबर ने बिबन की असभ्यता की अनदेखी करके, उसकी बात का जवाब नहीं दिया।

बाबर ने लिखा है- ‘बिबन को इतना ज्ञान भी नहीं था कि दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी का भाई अल्लाउद्दीन खाँ और पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी (Daulat Kahan Lodi) का पुत्र दिलावर खाँ भी मेरे समक्ष अदब से खड़े हुए थे।’

जब बाबर करनाल में ठहरा हुआ था तब हुमायूँ को हमीद खाँ नामक किसी तुर्क सरदार के विरुद्ध अभियान करने भेजा गया। हुमायूँ (Humayun) ने हमीद खाँ की सेना को परास्त कर दिया तथा उसके एक सौ सैनिकों को बंदी बना लिया। उसने हमीद खाँ के 7-8 हाथी भी पकड़ लिए। जब हुमायूँ ने इन बंदियों को बाबर के सम्मुख प्रदर्शित किया तो बाबर ने आदेश दिया कि इन सभी को एक मैदान में खड़े करके बंदूक से गोली मार दी जाए।

बाबर के आदेश की पालना की गई। संभवतः बाबर भारत वालों को यह संदेश देना चाहता था कि बाबर का सामना करने की हिम्मत नहीं करें क्योंकि बाबर के पास ऐसे शस्त्र हैं जो भारतीयों ने पहले कभी देखे भी नहीं हैं। इसके बाद हुमायूँ को हिसार पर आक्रमण करने भेजा गया।

हिसार तथा उसके आसपास से हुमायूँ (Humayun) को काफी धन प्राप्त हुआ। हुमायूँ ने यह धन बाबर को समर्पित कर दिया। बाबर ने इस विजय के उपलक्ष्य में हुमायूँ को एक करोड़ रुपए पुरस्कार-स्वरूप प्रदान किए। हिसार-विजय के बाद बाबर की सेना करनाल से चलकर शाहाबाद पहुंच गई जो अब हरियाणा प्रांत की थानेश्वर तहसील में स्थित है। यहीं पर हुमायूँ 18 साल का हुआ तथा उसने अपने मुँह पर पहली बार उस्तरा चलवाया।

13 मार्च 1526 को शाहाबाद के पड़ाव पर ही बाबर को सूचना मिली कि दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) एक-एक दो-दो कोस चलता हुआ आगे बढ़ रहा है तथा प्रत्येक मंजिल पर वह दो-तीन दिन पड़ाव करता है। यह समाचार सुनकर बाबर भी दिल्ली की तरफ बढ़ने लगा और 16 मार्च 1526 को यमुना नदी के तट पर सिरसावा के सामने उतर पड़ा।

यहीं पर बाबर को सूचना मिली कि इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) ने दाउद खाँ लोदी तथा हातिम खाँ लोदी को पांच-छः हजार सैनिकों सहित दो-आब के पार भेज दिया है और अब वे इब्राहीम लोदी के शिविर से 3-4 कोस आगे पड़ाव किए हुए हैं। बाबर ने भी अपने कुछ वजीरों को सेना देकर उनके सामने भेजा। अफगान अमीर बिबन भी बाबर की इस सेना के साथ इब्राहीम लोदी की सेना पर आक्रमण करने गया। जैसे ही बाबर की सेना मेंयमुना नदी पार की, बिबन अपनी सेना लेकर भाग गया।

 2 अप्रेल 1526 को इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के अमीरों की एक सेना शक्ति-प्रदर्शन करती हुई बाबर के वजीरों की सेना के निकट चली आई। बाबर के वजीरों ने लोदियों की इस छोटी सेना को परास्त कर दिया तथा 60-70 सैनिक एवं 6-7 हाथी पकड़ लिए। बाबर के वजीरों ने लोदियों के सेनापति हातिम खाँ लोदी को पकड़ कर बाबर के सामने प्रस्तुत किया। बाबर ने पकड़े गए समस्त सैनिकों एवं हातिम खाँ लोदी की हत्या करवा दी।

बाबर ने लिखा है- ‘अगले दिन मैंने अपनी सेना को पंक्तिबद्ध किया तथा उसकी गिनती करवाई किंतु सैनिकों की संख्या मेरे अनुमान से कम थी।’

यहाँ भी बाबर (Babur) बड़ी चतुराई से अपने सैनिकों की संख्या छिपा गया किंतु आगे चलकर बाबर ने इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) से हुए युद्ध से पहले अपने सैनिकों की संख्या केवल 12 हजार बताई है। पाठकों को स्मरण होगा कि बाबर काबुल (Kabul) से सात सौ तोपें घोड़ों एवं खच्चरों की पीठ पर लदवा कर लाया था। अब बाबर ने उन तोपों के लिए लकड़ी की गाड़ियां बनवाईं तथा तोपों को उन पर जमा दिया।

इन तोपों को सेना के आगे रखा गया। रूमियों की प्रथा के अनुसार इन तोपों को आपस में जोड़ दिया गया। तोपों को आपस में जोड़ने के लिए लोहे की जंजीरों के स्थान पर पशुओं की कच्ची खाल से बनी रस्सियों का प्रयोग किया गया। तापों के पीछे आड़ बनाकर पैदल बंदूकचियों को तैनात किया गया। बंदूकचियों के पीछे घुड़सवारों को रखा गया।        

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली सल्तनत विजय में बाबर को पांच घण्टे लगे (19)

0
दिल्ली सल्तनत विजय - www.bharatkaitihas.com
दिल्ली सल्तनत विजय

बाबर Babur) मुग़ल साम्राज्य (Mughal Sultanate) के संस्थापक और पहले शासक था बाबर द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) विजय में बाबर को पांच घण्टे लगे!

पानीपत के निकट पहुंच कर बाबर ने अपनी तोपों को गाड़ियों पर चढ़ाकर सेना के आगे तैनात करवा दिया। इधर दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) विजय का सपना आंखों में लिए हुए बाबर तेजी से अपनी सेना को जमा रहा था और उधर दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी एक दिन में दो-तीन कोस चलता हुआ तथा प्रत्येक पड़ाव पर दो-तीन दिन विश्राम करता हुआ आगे बढ़ रहा था।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के पास संभवतः इतने सैनिक नहीं थे, जिनके बल पर वह युद्ध लड़ने एवं जीतने की आशा कर सके। कुछ समय पहले ही इब्राहीम लोदी का अपने अमीरों से भयानक संघर्ष हुआ था जिसमें इब्राहीम लोदी के कई हजार सैनिक मारे गए थे। बहुत से अमीर एवं सेनापति विद्रोही होकर अपने-अपने प्रांतों में चले गए थे और स्वतंत्र शासक की तरह व्यवहार कर रहे थे। वे इस युद्ध में इब्राहीम की सहायता करने के लिए नहीं आए थे। इसलिए इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) को न तो इस बात की जल्दी थी कि वह शत्रु को तैयारी करने का अवसर दिए बिना ही उस पर टूट पड़े और न इस बात की चिंता थी कि वह किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंच कर मोर्चा बांधे। जबकि बाबर ने न केवल पानीपत के बाहर एक सुरक्षित स्थान देखकर अपनी तोप गाड़ियों, बंदूकचियों एवं घुड़सवारों को क्रमबद्ध कर लिया अपितु अपने दोनों पार्श्व तथा पीछे की तरफ खाइयां खुदवाकर उनमें पेड़ों की शाखाएं काटकर डलवा दीं ताकि शत्रु सेना बाबर की सेना में नहीं घुस सके। बाबर ने अपने कुछ घुड़सवारों को सौ-सौ की संख्या में बांट दिया तथा उन्हें इस प्रकार खड़ा किया कि आवश्यकता पड़ने पर वे तुरंत सक्रिय होकर शत्रु सेना पर छापा मार सकें।

बाबर ने लिखा है- ‘इतनी तैयारियों के बावजूद मेरी सेना में घबराहट थी क्योंकि उन्हें लगता था कि वे एक ऐसी सेना से युद्ध करने जा रहे हैं जिसके लड़ने के तरीकों के बारे में बाबर की सेना को कुछ भी जानकारी नहीं थी।’

बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा है- ‘इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की सेना में एक लाख सैनिक थे तथा उसके पास अपने दादा बहलोल लोदी तथा अपने पिता सिकंदर लोदी द्वारा संचित खजाना था जिसके बल पर वह लाख – दो लाख सैनिक और भरती कर सकता था किंतु इब्राहीम लोदी स्वभाव से कंजूस था इसलिए वह अपने सैनिकों पर खजाना नहीं लुटा सका। वह एक अनुभवहीन नौजवान था। उसने अपनी सेना को किसी प्रकार का अनुभव नहीं करवाया था, न बढ़ने का, न खड़े रहने का और न युद्ध करने का।’

इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के इन कृत्यों को देखकर कोई भी कह सकता था कि बाबर को दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) विजय करने से रोकना उसके वश की बात नहीं है।

इब्राहीम लोदी पानीपत से कुछ दूर ही ठहर गया। इस पर बाबर ने कुछ घुड़सवार तीरंदाजों को इब्राहीम लोदी की सेना पर हमला करने के लिए भेजा ताकि इब्राहीम लोदी क्रोध में आकर बाबर की सेना पर आक्रमण करे। इब्राहीम लोदी की सेना मुगल तीरंदाजों को मारकर भगा देती थी किंतु अपने स्थान से हिलती नहीं थी। सात-आठ दिन तक ऐसा ही होता रहा। इस पर बाबर ने एक रात लगभग 5 हजार सैनिकों को इब्राहीम के शिविर पर हमला करने भेजा।

बाबर की सेना का हमला होने पर इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के सैनिक मशालें जलाकर अपने सुल्तान के खेमे के चारों ओर सिमट गए किंतु उन्होंने शिविर से बाहर आकर युद्ध नहीं किया। इस पर बाबर की सेना प्रातः होने से पहले ही लौट आई। अगले दिन बाबर ने हुमायूँ को सेना देकर इब्राहीम के शिविर की तरफ भेजा। यह सेना भी शक्ति का प्रदर्शन करके लौट आई।

20 अप्रेल 1526 को बाबर को प्रातः कुछ उजाला होते ही सूचना मिली कि शत्रु की सेना पंक्तिबद्ध होकर बाबर के शिविर की तरफ बढ़ रही है। इस पर बाबर की सेना तुरंत तैयार हो गई। बाबर के सैनिकों ने कवच पहन लिए तथा हथियार लेकर घोड़ों पर सवार हो गए। तोपचियों ने भी अपनी तोपों में बारूद भरना शुरु कर दिया। बंदूकची भी कंधों पर बंदूकें रखकर तैनात हो गए।

बाबर (Babur) ने अपनी सेना में कुछ तूलगमा दस्ते तैनात किए थे। इन्हें अनुभवी सेनानायकों के नेतृत्व में रखा गया। इनका काम यह था कि जब युद्ध अपने चरम पर पहुंच जाए तब ये दस्ते शत्रु सेना के दोनों पार्श्वों पर एवं पीछे पहुंचकर अचानक हमला बोल दे। जब इब्राहीम की सेना बाबर की सेना के निकट पहुंची तो कुछ दूरी पर ही ठिठक कर खड़ी हो गई।

बाबर के अनुसार- ‘ऐसा लगता था मानो इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की सेना सोच रही हो कि इन तोपों के सामने जाए या न जाए, यहाँ रुके अथवा न रुके किंतु कुछ देर की असमंजस के बाद इब्राहीम की सेना ने आगे बढ़ना आरम्भ किया।’

बाबर (Babur) को इसी क्षण की प्रतीक्षा थी। शत्रु मौत के मुँह में स्वयं ही बढ़ा चला आ रहा था। जैसे ही इब्राहीम की सेना तोपों की मार की सीमा में आई, बाबर की तोपों ने आग और बारूद उगलने आरम्भ कर दिए। इब्राहीम के सैनिक बारूदी गोलों की चपेट में आकर हवा में उछलने लगे। उन्होंने आज से पहले कभी तोप नहीं देखी थी। न वे यह जानते थे कि इनमें से क्या निकलेगा और सैनिकों को कैसे मारेगा!

जब इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की सेना पीछे की ओर मुड़ने लगी तो उसी समय तूलगमा दस्तों ने दाईं ओर से, बाईं ओर से और पीछे की ओर से हमला बोल दिया। अब तो इब्राहीम की सेना चारों ओर से मुगल सेना से घिर गई। इब्राहीम के सैनिक चारों तरफ भाग खड़े हुए। इस कारण वे आपस में ही उलझ गए। किसी को भागने का रास्ता नहीं मिला।

बाबर ने लिखा है- ‘जब युद्ध आरम्भ हुआ, तब सूर्य एक नेजा बलंद हो चुका था। अर्थात् दिन के 9-10 बजे का समय था। मध्याह्न तक घनघोर युद्ध होता रहा। मध्याह्न समाप्त होने तक युद्ध भी समाप्त हो चुका था। जिस स्थान पर इब्राहीम खड़ा था, उस स्थान पर ही 5-6 हजार आदमी मारे गए थे। अन्य स्थानों पर जो लाशें पड़ी थीं उनकी संख्या अनुमानतः 15-16 हजार रही होगी किंतु आगरा पहुंचने पर हिन्दुस्तानियों की बातों से पता चला कि इस युद्ध में 40-50 हजार आदमी मारे गए होंगे।’

बाबर (Babur) ने यहाँ भी बड़ी चालाकी से झूठ बोला है कि उसने अपने 12 हजार सैनिकों के बल पर इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के 40-50 हजार सैनिक मार दिए। बाबर ने सुल्तान इब्राहीम लोदी के निकट मरे हुए शवों की संख्या 5-6 हजार बताई है, संभवतः यही संख्या सही है। शेष दोनों संख्याएं गलत हैं तथा बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई हैं ताकि बाबर स्वयं को महान् विजेता सिद्ध कर सके।

फ़रिश्ता ने लिखा है- ‘इब्राहीम लोदी मृत्यु-पर्यन्त लड़ा और एक सैनिक की भाँति मारा गया।’

नियामतुल्लाह ने लिखा है- ‘सुल्तान इब्राहीम लोदी के अतिरिक्त भारत का कोई अन्य सुल्तान युद्ध-स्थल में नहीं मारा गया।’

बाबर द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार दिल्ली सल्तनत विजय में बाबर को पांच घण्टे लगे! जिस दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) की सम्पन्नता के आश्चर्यजनक किस्से रोम और मिस्र से लेकर बगदाद, कुस्तुंतुनिया, समरकंद, फारस, काबुल तथा कांधार की गलियों में गूंजते थे, उस दिल्ली को जीतने में बाबर (Babur) को पांच घण्टे ही लगे थे।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इब्राहीम लोदी का सिर मिल गया बाबर को (20)

0
इब्राहीम लोदी का सिर - www.bharatkaitihas.com
इब्राहीम लोदी का सिर मिल गया बाबर को!

वह शोकप्रद दृश्य देखकर बाबर (Babur) कांप उठा और इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) का सिर मिट्टी में से उठाकर कहा, तेरी वीरता को धन्य है। उसने आदेश दिया कि जरवफ्त के थान लाए जाएं और मिश्री का हलुआ तैयार किया जाए तथा सुल्तान के जनाजे को नहलाकर वहाँ दफ्न किया जाए, जहाँ वह शहीद हुआ था।

20 अप्रेल 1526 को पानीपत की लड़ाई (Panipat Ki Ladai or Battle of Panipat) में काबुल के बादशाह बाबर (Babur) ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी की सेना को परास्त कर दिया। यह युद्ध प्रातः 9-10 बजे आरम्भ हुआ और मध्याह्न समाप्त होने से पहले समाप्त हो गया था।

बाबर ने लिखा है- ‘जब शत्रु की पराजय हो गई तब उसकी सेना का पीछा करके शत्रु-सैनिकों को घोड़ों से गिराना आरम्भ किया गया। हजारों सैनिकों के सिर काट दिए गए तथा हजारों सैनिक बंदी बना लिए गए। हमारे आदमी प्रत्येक श्रेणी के अमीर तथा सरदार को बंदी बनाकर लाए। महावतों ने हाथियों के झुण्ड के झुण्ड पकड़कर मेरे समक्ष प्रस्तुत किए।’

इब्राहीम के विषय में बाबर के सेनापतियों एवं मंत्रियों का मानना था कि वह युद्ध-क्षेत्र से भाग गया। इसलिए बहुत से सैनिक एवं सेनापति विभिन्न दिशाओं में दौड़ाए गए ताकि उसे पकड़ा जा सके। कुछ सरदारों को आगरा तक भेजा गया तथा कुछ सैनिकों ने इब्राहीम लोदी के सैनिक शिविर की बारीकी से जांच की।

शाम होने से पहले ही बाबर (Babur) के मंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा का छोटा साला ताहिर तीबरी इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) का सिर लेकर आया। यह सिर लाशों के एक ढेर में पड़ा था। अब्दुल्ला नामक एक लेखक ने लिखा है- ‘वह शोकप्रद दृश्य देखकर बाबर कांप उठा और इब्राहीम लोदी का सिर मिट्टी में से उठाकर कहा, तेरी वीरता को धन्य है। उसने आदेश दिया कि जरवफ्त के थान लाए जाएं और मिश्री का हलुआ तैयार किया जाए तथा सुल्तान के जनाजे को नहलाकर वहाँ दफ्न किया जाए, जहाँ वह शहीद हुआ था।’

नियामतुल्ला ने लिखा है- ‘इब्राहीम की मजार पर बहुत से मुसलमान शुक्रवार के दिन एकत्रित हुआ करते थे और नरवर तथा कन्नौज के यात्री भी श्रद्धांजलि अर्पित करने आते थे।’

युद्ध की समाप्ति के बाद बाबर (Babur) मृतक शत्रुओं के सिरों का चबूतरा बनवाया करता था जिसे मुडचौरा कहा जाता था। पानीपत में भी बाबर ने मुडचौरा बनवाया।

‘ग्वालियर के तोमर’ (Gwalior Ke Tomar) नामक पुस्तक में हरिहर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है- ‘चूंकि इस युद्ध में शत्रुओं के सिर कम थे इसलिए दोनों ओर के मृतकों के सिरों से मुडचौरा बनवाया गया।’

TO READ THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

उसी दिन अर्थात् 20 अप्रेल 1526 को हुमायूँ (Humayun) को एक छोटी सेना लेकर तेजी से आगरा पहुंचने तथा आगरा के किले में रखे खजाने पर पहरा लगाने के आदेश दिए गए। महदी ख्वाजा को आदेश दिया गया कि वह एक छोटी सेना लेकर तुरंत दिल्ली पहुंचे तथा वहाँ के खजाने को अपनी सुरक्षा में ले ले। 21 अप्रेल को बाबर स्वयं भी सम्पूर्ण सेना के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुआ तथा दिल्ली से बाहर यमुनाजी के निकट डेरा लगाया। 24 अप्रेल को वह यमुनाजी के तट पर स्थित निजामुद्दीन औलिया की मजार पर पहुंचा तथा उसी रात उसने दिल्ली के किले में प्रवेश करके, रात्रि विश्राम वहीं किया। 25 अप्रेल 1526 को बाबर अपने मंत्रियों को साथ लेकर ख्वाजा कुतुबुद्दीन काकी की मजार पर गया। उसने सुल्तान गयासुद्दीन बलबन तथा सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के मकबरों, उनके द्वारा बनवाए गए महलों, कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाई गई कुतुबमीनार, शम्सुद्दीन इल्तुतमिश द्वारा बनवाया गया हौजे शम्सी, अलाउद्दीन खिलजी द्वारा बनवाया गया हौजे खास, सुल्तान बहलोल लोदी का मकबरा, सुल्तान सिकंदर लोदी का मकबरा एवं सिकंदर लोदी द्वारा बनवाए गए बागीचों की सैर की।

इसके बाद बाबर (Babur) बड़े ठाठ से यमुनाजी में नौका विहार करने के लिए निकला। नौका में बैठकर उसने अरक पिया। अगले दिन बाबर ने वली किजील नामक एक सेनापति को दिल्ली का शिकदार एवं दोस्तबेग को दिल्ली का दीवान नियुक्त किया और दिल्ली के लाल किले (Red Fort of Delhi) के खजाने पर मुहर लगाकर वह खजाना शिकदार एवं दीवान की सुरक्षा में सौंप दिया। 26 अप्रेल को बाबर ने यमुना नदी पर तुगलुकाबाद के सामने पड़ाव किया।

27 अप्रेल 1526 को शुक्रवार था। उस दिन बाबर के सिपाहियों, सेनापतियों एवं सैनिकों ने दिल्ली की मस्जिदों में सामूहिक नमाज पढ़ी तथा बाबर के नाम का खुतबा पढ़ा। इस अवसर पर फकीरों में धन वितरित किया गया। 28 अप्रेल को बाबर आगरा के लिए रवाना हो गया।

हुमायूँ (Humayun) बाबर (Babur) से सात दिन पहले ही आगरा पहुंच चुका था। जब हुमायूँ ने आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) में प्रवेश करना चाहा तो आगरा के किलेदार ने किले के फाटक नहीं खोले। इस पर हुमायूँ ने आगरा नगर के चारों ओर की सड़कों पर कड़ा पहरा लगा दिया ताकि कोई भी व्यक्ति आगरा के किले से खजाना लेकर न भाग सके। अन्ततः हुमायूँ ने दबाव बनाकर आगरा दुर्ग के फाटक खुलवा लिए। इब्राहीम लोदी का विशाल खजाना इसी किले में मौजूद था।

ग्वालियर के राजा विक्रमादित्य तोमर का परिवार भी अपने खजाने के साथ इसी किले में रहता था। विक्रमादित्य तोमर (Vikramaditya Tomar) का पूरा इतिहास हम ‘दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान’ में विस्तार पूर्वक बता चुके हैं।

राजा विक्रमादित्य तोमर ही पानीपत के युद्ध (Panipat Ki Ladai or Battle of Panipat) में सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) का एकमात्र सच्चा साथी था जिसके लिए बाबर ने लिखा है कि वह भी (अर्थात् राजा विक्रमादित्य तोमर) इस युद्ध में नरकगामी हुआ।

राजा विक्रमादित्य की विधवा रानी को अपना सारा खजाना हुमायूँ को समर्पित करना पड़ा। इसमें कोहिनूर का विख्यात हीरा भी सम्मिलित था। हुमायूँ ने यह हीरा बाबर को समर्पित कर दिया। बाबर ने इस हीरे का मूल्य ‘संसार के ढाई दिन के भोजन के बराबर’ लगाया तथा हीरा वापस हुमायूँ को दे दिया।

हुमायूँ (Humayun)के सैनिकों ने आगरा के लाल किले (Red Fort Of Agra) के महलों का बहुत सा अनुपयोगी सामान बाहर निकाला ताकि उसमें आग लगाई जा सके क्योंकि लाल किले के पुरानी स्वामी अर्थात् लोदी हमेशा के लिए नष्ट हो गए थे और अब यह सामान नए स्वामियों अर्थात् मुगलों के किसी भी काम का नहीं था। जब इस सामान में आग लगाई जा रही थी तब संयोगवश हुमायूँ भी वहाँ पहुंच गया।

हुमायूँ की दृष्टि इस कबाड़ में पड़े एक चित्र पर पड़ी। यह एक हिन्दू संत की तस्वीर थी जिनके चेहरे का तेज हुमायूँ को प्रभावित किए बिना नहीं रह सका। हुमायूँ ने उस चित्र को उस ढेर से उठवा लिया तथा स्थानीय लोगों से पूछताछ करवाई कि यह चित्र किसका है! लाल किले के पुराने दास-दासियों ने बताया कि यह चित्र हिंदुओं के गुसाईं वल्लभाचार्य (Gusai Vallabhacharya) का है जिसे सुल्तान सिकंदर लोदी (Sikandar Lodi) ने संत को अपने सामने बैठाकर बनवाया था।

सेवकों की बात सुनकरहुमायूँ (Humayun) ने उस चित्र को सुल्तान के महल की उसी दीवार पर फिर से लगवा दिया जिस पर वह लोदी सुल्तानों के समय में लगा हुआ था। आज गुसाईं वल्लभाचार्यजी का केवल यही एक चित्र उपलब्ध है जिसके आधार पर वल्लभाचार्यजी के अन्य चित्र बनाए गए हैं।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पानीपत के मैदान में बदायूनीं ने प्रेतों की आवाजें सुनीं (21)

0
पानीपत के मैदान में - www.bharatkaitihas.com
पानीपत के मैदान में बदायूनीं ने प्रेतों की आवाजें सुनीं

पानीपत (Panipat) के मैदान में पश्चिम की ओर से आने वाले आक्रांताओं एवं भारतीय राजाओं की सेनाओं के बीच कई युद्ध हुए थे। यह मैदान कई बार सैनिकों के क्षत-विक्षत शवों से पटा था। जब अकबर का दरबारी मुल्ला मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Badayuni) पानीपत के मैदान से होकर गुजरा तो उसने प्रेतों की मारकाट की आवाजें सुनीं।

पानीपत का युद्ध (Panipat Ki Ladai or Battle of Panipat) जीतने के बाद बाबर ने उसी शाम हुमायूँ (Humayun) को आगरा तथा महदी ख्वाजा को दिल्ली के लिए रवाना किया ताकि वे लोग आगरा और दिल्ली के किलों (Red Fort of Agra and Red Fort of Delhi) में रखे खजाने पर अधिकार कर सकें। बाबर के इतिहास में आगे बढ़ने से पहले हमें एक बार पुनः कुछ देर के लिए पानीपत के मैदान में चलना होगा।

पानीपत के युद्ध-क्षेत्र को मुगलों के शासनकाल में प्रेतग्रस्त माना जाता था। ई.1588 में अकबर (Akbar) के दरबारी मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं को पानीपत के मैदान में जाने का अवसर मिला।

उसने लिखा है कि मैंने एक दिन प्रातःकाल उस ओर से गुजरते समय, योद्धाओं के मारकाट की आवाजें सुनीं। पाठकों की सुविधा के लिए बताना समीचीन होगा कि यह वही मुल्ला बदायूनी है जिसने हल्दीघाटी के युद्ध-क्षेत्र में उपस्थित रहकर, मुगल सेना एवं महाराणा प्रताप के बीच हुए युद्ध का आंखों-देखा विवरण लिखा था।

वर्तमान समय में पानीपत (Panipat) भारत के हरियाणा प्रांत में स्थित है। इस प्रांत में स्थित कुरुक्षेत्र, तराईन, पानीपत तथा करनाल अनेक बड़े युद्धों के स्थल रहे हैं। पानीपत के मैदान में चार बड़े युद्ध लड़े गए। ई.1240 में दिल्ली की सुल्तान रजिया तथा उसके भाई बहरामशाह की सेनाओं के बीच भी पानीपत के मैदान में भयानक युद्ध हुआ।

ई.1526 में बाबर एवं इब्राहीम लोदी के बीच हुए युद्ध को पानीपत का पहला युद्ध (First Battle of Panipat) कहा जाता है। ई.1556 में इसी स्थान पर दिल्ली के शासक महाराज हेमचंद्र विक्रमादित्य Hem Chandra Vikramaditya) तथा अकबर की सेनाओं के बीच युद्ध लड़ा गया जिसे पानीपत का दूसरा युद्ध कहा जाता है। ई.1761 में अफगान आक्रांता अहमदशाह अब्दाली (Ahmad Shah Abdali) एवं मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ के बीच पानीपत का तीसरा युद्ध भी इसी स्थान पर हुआ था। इसे पानीपत का दूसरा युद्ध कहा जाता है।

महाभारत के युद्ध का मैदान कुरुक्षेत्र पानीपत से केवल 70 किलोमीटर दूर है। तराइन का युद्ध-क्षेत्र पानीपत से केवल 50 किलोमीटर दूर है जहाँ ई.1191 एवं ई.1192 में अफगान आक्रांता मुहम्मद गौरी तथा सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बीच दो युद्ध हुए थे जिन्हें क्रमशः तराइन की पहली लड़ाई एवं तराइन की दूसरी लड़ाई कहा जाता है।

ई.1739 में पानीपत से मात्र 30 किलोमीटर दूर स्थित करनाल में ईरानी आक्रांता नादिरशाह (Nadirshah) एवं दिल्ली के शासक मुहम्मदशाह रंगीला की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ था।

ई.1526 के बाबर-इब्राहीम युद्ध में मिली विजय की स्मृति में बाबर ने पानीपत (Panipat) कस्बे से एक मील उत्तर-पूर्व में एक मस्जिद का निर्माण करवाया। बाद में शेरशाह सूरी (Shershah Suri) ने इस स्थान पर दो स्मारक बनवाए। पहला था सुल्तान इब्राहीम लोदी का और दूसरा उन चगताई सैनिकों का था जिन्हें शेरशाह ने स्वयं मारा था। जब अंग्रेज इस देश के स्वामी हुए, तब ई.1910 में उन्होंने इस स्थान पर अहमदशाह अब्दाली का विजय-स्मारक बनवाया।

आगरा पहुंचने पर बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा- ‘मैं भारत को जीतने वाला तीसरा बादशाह हूँ। पहला था महमूद गाजी, दूसरा था शिहाबुद्दीन गौरी तथा तीसरा मैं हूँ।’

बाबर (Babur) ने इस सूची में अपने पूर्वज तैमूर लंग (Timur Lang) का स्मरण नहीं किया है। उसका कारण यह प्रतीत होता है कि महमूद गजनवी के वंशजों ने भारत के कुछ हिस्से पर लम्बे समय तक शासन किया। महमूद गौरी के गुलामों ने भी भारत के बहुत बड़े हिस्से पर बहुत लम्बे तक शासन किया जबकि तैमूर लंग के किसी उत्तराधिकारी ने भारत के किसी भी हिस्से पर शासन नहीं किया।

भारत को जीतने वाले तीन बादशाहों में भी बाबर ने स्वयं को सबसे बड़ा ठहराया है। वह लिखता है-

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

‘महमूद गजनवी (Mahmud Ghaznavi) खुरसान (Khurasan) का शासक होने के कारण साधन सम्पन्न था। खुरासान, दारुल मर्ज तथा समरकंद के बादशाह उसके अधीन थे और महमूद की सेना में 2 लाख सैनिक थे। मुहम्मद गौरी भी साधन-सम्पन्न था क्योंकि खुरासान का बादशाह गयासुद्दीन गौरी मुहम्मद गौरी का भाई था। उसने एक 1,20,000 सैनिकों के साथ भारत पर आक्रमण किया था। जबकि मैं उन दोनों बादशाहों की तुलना में, साधनहीन था। जब मैंने पहली बार भारत के भेरा शहर को जीता तब मेरे पास केवल डेढ़ हजार सैनिक थे। जब पांचवीं बार मैंने भारत को जीता, तब मेरे पास नौकर-चाकर, व्यापारी तथा अन्य सेवकों सहित केवल 12 हजार थी। मेरे पास बदख्शां, कंदूज, काबुल तथा कांधार जैसे गरीब देश थे जिनसे मुझे कुछ विशेष लाभ नहीं होता था। मेरे ये समस्त देश, शत्रुओं से घिरे हुए थे, इसलिए मुझे उनकी रक्षा पर बहुत अधिक खर्च करना पड़ता था। उजबेग मेरे शत्रु थे जिनकी सेना में एक लाख सैनिक थे। भेरा से लेकर बिहार तक इब्राहीम लोदी का शासन था। राज्य-विस्तार की दृष्टि से उसके सैनिकों की संख्या पांच लाख होनी चाहिए थी किंतु उसके अमीर उससे नाराज थे इसलिए केवल एक लाख सैनिक ही उसकी तरफ से लड़ने के लिए आए थे।’ 

इस प्रकार बाबर ने अपने संस्मरणों में आत्मप्रशंसा के साथ-साथ झूठ का भी पूरा सहारा लिया है।

बाबर ने लिखा है- ‘अब मैं भारत का बादशाह था किंतु चारों ओर अफगान-शत्रुओं से घिरा हुआ था। जौनपुर का सुल्तान हुसैन शर्की, गुजरात का सुल्तान मुजफ्फरशाह, दक्षिण में बहमनी सुल्तान थे, मालवा में महमूद खिलजी का राज्य था। बंगाल में नुसरतशाह सैयद का शासन था। काफिर शासकों में विजयनगर एवं चित्तौड़ के राज्य बड़े शक्तिशाली थे। चित्तौड़ के राणा ने रणथंभौर, सारंगपुर, भिलसा और चंदेरी पर अधिकार जमा लिया था। मैंने जल्दी ही चंदेरी के काफिरों का नाश करा दिया तथा जो स्थान वर्षों से दारुल-हर्ब बना हुआ था, उसे दारुल-इस्लाम बना दिया। इन राज्यों के अतिरिक्त हिन्दुस्तान में चारों ओर राय एवं राजा बड़ी संख्या में फैले हुए हैं। इनमें से बहुत से, मुसलमानों के आज्ञाकारी हैं किंतु कुछ दूरस्थ राजा मुसलमान बादशाहों के अधीन नहीं हैं।’

बाबर ने अपनी पुस्तक में भारत के भूगोल, नदियाँ, पर्वत, जलवायु, कृषि, सिंचाई के संसाधन आदि का उल्लेख किया है और लिखा है- ‘हिन्दुस्तान की विलायतों अर्थात् प्रांतों तथा नगरों में कोई आकर्षण नहीं है। समस्त नगर एवं समस्त भूमि एक ही प्रकार की है। यहाँ के उद्यानों में चाहरदीवारी नहीं होती।’

बाबर ने अपनी पुस्तक में भारत के वनों एवं नगरों में पाए जाने वाले तोता, मैना, मोर, तीतर, चकोर, जंगली मुर्ग, बटेर, बत्तख तथा नीलकण्ठ आदि ढेर सारे पक्षियों का बड़ा रोचक वर्णन किया है। बाबर ने बहुत सारे जलचरों के साथ-साथ पानी पर बारह फुट तक लम्बी दौड़ लगाने वाले मेंढकों का रोचक वर्णन किया है।

उसने हाथी, गेंडा, बारहसिंहगा, जंगली भैंसा तथा नील गाय आदि भारतीय वन्यपशुओं का भी बड़ा रोचक वर्णन किया है क्योंकि ये पशु अफगानिस्तान एवं उज्बेकिस्तान में नहीं पाए जाते थे।

बाबर के वर्णन में भारत में पाई जाने वाली ‘गीनी गाय’ नामक एक पशु का उल्लेख किया गया है जो मेंढे अर्थात् नरभेड़ के बराबर होती थी और जिसका मांस बड़ा नरम होता था। बाबर (Babur) ने अपने वर्णन में कई प्रकार के हिरणों, बंदरों, गिलहरियों एवं नेवलों आदि का भी उल्लेख किया है। उसने उत्तर भारत के मैदानों में पाए जाने वाले विविध प्रकार के फलों एवं फूलों का भी बड़ा रोचक वर्णन किया है।  

                                                           – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीयों की लंगोट का मजाक उड़ाता था बाबर (22)

0
भारतीयों की लंगोट - www.bharatkaitihas.com
भारतीयों की लंगोट का मजाक उड़ाता था बाबर

बाबर (Babur) स्वयं एक भूखे नंगे देश से आया था किंतु वह भारतीयों की गरीबी देखकर सहानुभूति व्यक्त करने के स्थान पर भारतीयों की लंगोट तक का मजाक बनाता था। बाबर यह नहीं समझ सका कि भारतीयों के शरीर के कपड़े तो अफगानिस्तान, ईरान तथा समरंकद के लुटेरे ले गए। अब केवल यह लंगोट ही भारतीयों को जीवित रखे हुए है!

पानीपत का युद्ध (Panipat Ki Ladai or Battle of Panipat) जीतने के बाद बाबर आगरा आ गया। आगरा आकर बाबर ने भारत के सम्बन्ध में कुछ संस्मरण लिखे। सोलहवीं शताब्दी की प्रथम चतुर्थांशी में लिखे गए इस विवरण में बाबर ने बहुत सी रोचक और उपयोगी बातें लिखी हैं किंतु भारतीयों का वर्णन करते समय उसने भारत के लोगों की बहुत निंदा की है तथा उन पर भूखे-नंगे एवं निकम्मे होने के आरोप लगाए हैं। इस पुस्तक को बाबरनामा (Baburnama or Memoirs of Babur) कहा जाता है।

बाबर ने लिखा है- ‘भारत में अधिकांश लोग कारीगर तथा श्रमिक हैं। वे पीढ़ियों से यही काम करते आ रहे हैं। हिन्दुस्तान में बहुत कम आकर्षण है। यहाँ के निवासी न तो रूपवान् होते हैं और न सामाजिक व्यवहार में कुशल होते हैं। ये न तो किसी से मिलने जाते हैं और न कोई इनसे मिलने आता है।

न इनमें प्रतिभा होती है और न कार्यक्षमता। न इनमें शिष्टाचार होता है और न उदारता! भारतीय लोग कला-कौशल में न तो किसी अनुपात पर ध्यान देते हैं और न नियम तथा गुण पर। न तो यहाँ अच्छे घोड़े होते हैं और न अच्छे कुत्ते। न अंगूर होता है, न खरबूजा और न उत्तम मेवे। यहाँ न तो बरफ मिलती है और न ठण्डा जल।

यहाँ के बाजारों में न तो अच्छी रोटी ही मिलती है और न अच्छा भोजन ही प्राप्त होता है। यहाँ न हम्माम अर्थात् गरमपानी के गुसलखाने हैं, न मदरसे, न शमा, न मशाल और न शमादान! शमा तथा मशाल के स्थान पर यहाँ बहुत से मैले कुचैले लोगों का एक समूह होता है जो डीवटी कहलाते हैं। वे अपने बाएं हाथ में एक छोटी सी तीन पांव की लकड़ी लिए रहते हैं।

उसके एक किनारे पर मोमबत्ती की नोक के समान एक वस्तु सी लगी रहती है। इसमें अंगूठे के बराबर एक मोटी सी बत्ती लगी रहती है। वे अपने दाएं हाथ में एक तुम्बी सी लिए रहते हैं। उसमें एक बारीक छेद होता है जिससे बत्ती में तेल की धार टपकाई जाती है। धनी लोग सौ-दो सौ दीवटियों को अपने यहाँ रखते हैं। जब बादशाह या बेगम को आवश्यकता होती है तो यही मैले-कुचैले दीवटी बत्ती लेकर उनके निकट खड़े हो जाते हैं।’

बाबर ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान में बड़ी नदियों एवं तालाबों के अतिरिक्त कहीं जलधाराएं नहीं होतीं। इनके उद्यानों तथा भवनों में भी जलधाराएं नहीं होतीं। इनके घरों में कोई आकर्षण नहीं होता। न उनमें हवा जाती है, न उनमें सुडौलपन होता है और न अनुपात।

कृषक तथा निम्नवर्ग के लोग अधिकांशतः नंगे ही रहते हैं। भारतीयों की लंगोट बड़ी विचित्र है। वे लोग लत्ते का एक टुकड़ा बांध लेते हैं जो लंगोटा कहलाता है। नाभि से नीचे एक लत्ते के टुकड़े को दोनों जांघों के नीचे से लेते हुए पीछे ले जाकर बांध देते हैं। स्त्रियां भी लुंगी बांधती हैं। इसका आधा भाग कमर के नीचे होता है ओर दूसरा सिर पर डाल लिया जाता है।’

बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा (Baburnama or Memoirs of Babur) में अनेक विरोधाभासी बातें लिखी हैं। एक स्थान पर वह भारत एवं भारतवासियों की प्रशंसा करते हुए कहता है- ‘भारत वालों को समय, संख्या एवं तौल सम्बन्धी ज्ञान बहुत अधिक है जिससे ज्ञात होता है कि यह एक धनी देश है। हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बहुत बड़ा देश है।

यहाँ अत्यधिक सोना-चांदी है। वर्षा ऋतु में यहाँ की हवा बड़ी ही उत्तम होती है। कभी-कभी दिन भर में 15-20 बार वर्षा हो जाती है। स्वास्थ्यवर्द्धक एवं आकर्षक होने के कारण उसकी तुलना असम्भव है। केवल वर्षा ऋतु में ही नहीं सर्दियों एवं गर्मियों में भी यहाँ बहुत अच्छी हवा चलती है।’

बाबर ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान में भीरा (भेरा) से लेकर बिहार तक जो प्रदेश इस समय मेरे अधीन हैं, उनका वार्षिक राजस्व संग्रह 52 करोड़ रुपए है।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

जिस देश के लोगों को बाबर (Babur) ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में बार-बार भूखा-नंगा और निकम्मा कहा है, उस देश के एक छोटे से हिस्से से बाबर को 52 करोड़ रुपए का राजस्व मिलता था। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि भारत के लोग भूखे-नंगे थे या बाबर स्वयं जो हजारों किलोमीटर की यात्रा के कष्ट सहकर भारत का सोना-चांदी और सुंदर औरतें लूटने आया था! बाबर ने स्वयं ही अपने संस्मरणों में रहंट, डोल, चरस तथा नहरों की जानकारी दी है जो इस बात के प्रमाण हैं कि भारत के किसान पूर्णतः बरसात पर निर्भर नहीं थे, वे धरती के गर्भ से जल लेकर खेतों में सिंचाई करते थे। ऐसे लोग भूखे-नंगे कैसे हो सकते थे! यदि थे तो उसके लिए क्या वे तुर्क एवं अफगान लुटेरे जिम्मेदार नहीं थे जो विगत साढ़े तीन सौ सालों से उत्तर भारत के मैदानों पर राज करते आ रहे थे! बाबर ने अपनी पुस्तक में भारत के गांवों एवं नगरों के सम्बन्ध में एक रोचक बात लिखी है जो भारत के लोगों की दुर्दशा के कारण का कच्चा चिट्ठा अनायास ही खोल देती है।

बाबर ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान में पुरवे, गांव तथा नगर क्षण भर में बस जाते हैं और उसी प्रकार नष्ट भी हो जाते हैं। इस प्रकार बड़े-बड़े नगरों के निवासी जो वर्षों से वहाँ बसे होते हैं, यदि वहाँ से भागना चाहते हैं तो वे एक या डेढ़ दिन में वहाँ से इस प्रकार भाग जाते हैं कि लेश-मात्र भी उनका वहाँ कोई चिह्न नहीं रह पाता।

दि उन्हें किसी स्थान को आबाद करना होता है तो उन्हें न तो नहर खोदने की आवश्यकता पड़ती है और न बंद बंधवाने की, क्योंकि यहाँ वर्षा के सहारे ही कृषि होती है। जनसंख्या की तो कोई सीमा ही नहीं। लोग एकत्र हो ही जाते हैं। कुआं अथवा तालाब खोद लेते हैं। घरों तथा दीवारों के बनाने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। घास बहुत होती है, वृक्षों की तो कोई संख्या ही नहीं बताई जा सकती। झौंपड़ियां बना ली जाती हैं और तत्काल ग्राम अथवा नगर बस जाता है।’

यदि हम बाबरनामा (Baburnama) में बाबर (Babur) के उक्त कथन पर विचार करें कि उस काल के भारत में गांवों एवं नगरों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर बिना कोई समय गंवाए स्थानांतरित कर देने की प्रवृत्ति क्यों विकसित हो गई थी तो हम पाएंगे कि विगत सैंकड़ों सालों से पश्चिम की ओर से हो रहे विदेशी आक्रमणों के कारण भारत के लोगों को अपने गांव या नगर खाली करके बार-बार इधर-उधर भागना पड़ता था, इस कारण लोगों में यह प्रवृत्ति विकसित हो गई थी।

गांवों एवं नगरों के त्वरित पलायन की इस प्रवृत्ति के माध्यम से एक और बात पर ध्यान जाता है कि उस काल में भारतीयों के पास इतना सामान ही नहीं होता था जिसे लेकर भागना पड़े। अधिकांश लोग निर्धन थे, उनके पास एकाध कपड़े, थोड़े से अनाज और मिट्टी के दो-चार बर्तनों के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं था। सारा धन महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी और तैमूर लंग (Timur Lang) जैसे तुर्क आक्रांता लूट कर ले जा चुके थे और तीन सौ सालों से दिल्ली के अफगान शासक लूट रहे थे।

उस काल के भारत में बहुत कम हिन्दू थे जिनके पास थोड़ा बहुत धन था किंतु वे भी निर्धनों की तरह रहते थे और अपना धन धरती में गाढ़ कर रखते थे। तुर्क एवं अफगान शासकों ने कई सौ सालों के शासन में हिन्दुओं पर यह प्रतिबंध लगा रखा था कि वे धन नहीं रख सकते, घोड़ा नहीं रख सकते, पक्का घर नहीं बना सकते, नए कपड़े नहीं पहन सकते। ऐसी स्थिति में लोगों को अपना शहर छोड़कर दूसरा शहर बसाने में भला क्या समय लग सकता था!

यदि बाबरनामा (Baburnama) की बात सही मान ली जाए तो भी भारतीयों को भूखा, नंगा और कुरूप बनाने के लिए कौन जिम्मेदार था! भारतीयों की लंगोट यदि भारतीयों का तन नहीं ढंक पाती थी तो इसके लिए जिम्मेदार कौन था? केवल और केवल बाबर के पूर्वज जो कभी हूण कबीलों (Hun Tribes) के रूप में, कभी तुर्की कबीलों (Turk Tribes) के रूप में, कभी मंगोल कबीलों (Mongol Tribes) के रूप में, कभी अफगानों (Afghans) के रूप में और कभी मुगलों (Mughals) के रूप में भारत में घुसते आ रहे थे और भारत की जनता का सर्वस्व हरण करते जा रहे थे।

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भारतीयों की लंगोट उन जूतों और कोट से अच्छी थी जिन्हें पहनकर बाबर और उसके सिपाही भारत आए थे।

  – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दुस्तान की इच्छा करूं तो मेरा मुँह काला हो (23)

0
हिन्दुस्तान की इच्छा - www.bharatkaitihas.com
हिन्दुस्तान की इच्छा करूं तो मेरा मुँह काला हो

अबूशका नामक एक लेखक ने लिखा है कि ख्वाजा कलां ने हौजे खास के निकट एक संगमरमर पर एक शेर खुदवाया जिसका अर्थ था कि मैं यदि हिन्दुस्तान की इच्छा करूं तो मेरा मुँह काला हो। जब बाबर (Babur) ने इस शेर को पढ़ा तो उसके क्रोध का पार नहीं रहा।

 पानीपत की लड़ाई (Panipat Ki Ladai or Battle of Panipat) में विजयी होने के बाद पहले हुमायूँ और फिर बाबर (Babur) आगरा पहुंचे। बाबर के आगरा पहुंचने से पहले ही हुमायूँ (Humayun) ने आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) में रखे खजाने पर अधिकार जमा लिया था।

जब बाबर आगरा के लाल किले में पहुंचा तब उसने उन लोगों को बुलवाया जिन्होंने हुमायूँ (Humayun) को किला सौंपने में आनाकानी की थी। ये लोग इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के शासन में बहुत ही प्रतिष्ठित हुआ करते थे किंतु बाबर ने उन्हें जान से मारने के आदेश दिए। उनमें एक अधिकारी का नाम मलिक दाद करारानी था। उसे भी मौत की सजा सुनाई गई किंतु आगरा के सैंकड़ों लोग बाबर के पैरों में गिरकर मलिक दाद करारानी के प्राणों की भीख मांगने लगे क्योंकि वह अत्यंत ही प्रतिष्ठित था। इसलिए बाबर ने उसे क्षमा कर दिया तथा उसकी समस्त सम्पत्ति भी लौटा दी।

इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की माता बुआ बेगम आगरा के लाल किले में स्थित एक महल में रहा करती थी। बाबर ने उसे राजमाता जैसा सम्मान दिया तथा उसे सेवकों सहित रहने के लिए आगरा से एक कोस दूरी पर नदी के उतार की ओर एक महल रहने के लिए दिया। 10 मई 1526 को बाबर आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) में प्रविष्ट हुआ तथा सुल्तान इब्राहीम लोदी के महल में रहने लगा।

बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा है- ‘आगरा के लोग मुझसे एवं मेरे सैनिकों से बहुत घृणा करते थे। हमें देखते ही वे दूर भाग जाते थे। आगरा के अधिकांश लोग शहर छोड़कर भाग गए। इस कारण हमारे घोड़ों के लिए चारा भी उपलब्ध नहीं हुआ। गांव वालों ने हमसे शत्रुता एवं घृणा के कारण चोरी तथा डकैती करनी आरम्भ कर दी। इस समय आगरा में बहुत गर्मी थी और जहरीली हवा के कारण मेरे लोग मरने लगे। इस कारण मेरे सैनिकों ने हिंदुस्तान छोड़ने का निर्णय लिया और वे वापस अफगानिस्तान जाने को तैयार हो गए।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

अपने स्वयं के मंत्रियों एवं सेनापतियों की बेरुखी का वर्णन करते हुए बाबर ने लिखा है- ‘जब मैं काबुल से चला था तो मैंने बहुत कम अनुभव एवं पद वाले लोगों को बेग अर्थात् मंत्री बना दिया था। इस कारण मुझे विश्वास था कि यदि मैं आग या जल में भी प्रवेश करूंगा तो ये लोग मेरे साथ वहाँ भी प्रवेश करेंगे किंतु अब उन्हें अपने घरों की याद सता रही थी। ऐसे बेग ही मेरा सबसे अधिक विरोध कर रहे थे। कुछ पुराने बेग जो वर्षों से मेरी सेवा कर रहे थे, वे भी हर कीमत पर वापस जाने के लिए शोर मचाने लगे। इनमें गजनी का सूबेदार ख्वाजा कलां भी शामिल था। मैंने अपने समस्त बेगों की एक सभा बुलाई तथा उनसे कहा कि जिस हिंदुस्तान को जीतने का सपना हर बादशाह देखता है, उस हिंदुस्तान को आप सबने अपने प्राणों की बाजी लगाकर जीता है। अब ऐसी क्या बात हुई जो हम ऐसा धनी देश छोड़कर वापस काबुल जाएं तथा जीवन भर निर्धनता भोगें? क्या हमारे भाग्य में सदा ही गरीबी भोगते रहना लिखा है?’

बाबर आगे लिखता है- ‘मेरी बातों का इन बेगों पर अच्छा असर हुआ तथा वे असमंजस से मुक्त हो गए किंतु ख्वाजा कलां तथा मुल्ला हसन भारत में रुकने को तैयार नहीं हुए। इस पर मैंने उन दोनों को अफगानिस्तान लौट जाने की अनुमति दे दी। मैंने ख्वाजा कलां को बहुत सारे उपहार देकर कहा कि वह इन उपहारों को गजनी जाकर अपने रिश्तेदारों को दे दे। इसी प्रकार मैंने मुल्ला हसन को भी बहुत से उपहार दिए तथा उससे कहा कि वह काबुल जाकर अपने और मेरे परिवार वालों को ये उपहार प्रदान कर दे।’

बाबर (Babur) ने ख्वाजा कलां को गजनी (Ghazni) तथा गिरदीज के इलाके प्रदान किए और सुल्तान मसऊदी को हजारा के इलाके तथा भारत में स्थित कुहराम नामक परगना भी दे दिया जो पंजाब में स्थित था और जिसकी आमदनी 3-4 लाख रुपए सालाना थी। इससे अनुमान होता है कि ये दोनों सेनापति बाबर के अत्यंत विश्वसनीय थे किंतु किसी भी तरह भारत में नहीं रुकना चाहते थे।

ख्वाजा कलां को हिन्दुस्तान के गर्म जलवायु से इतनी घृणा हो गई कि जब वह आगरा से दिल्ली होता हुआ अफगानिस्तान के लिए रवाना हुआ तो उसने दिल्ली में अपने घर के बाहर एक पत्थर पर शेर खुदवाया-

अगर ब खैर सलामत गुजारे सिन्द कुनम।

सियाह रु शवम गर हवाए हिन्द कुनम।

अर्थात्- ‘यदि मैं कुशलतापूर्वक सिंधु पार कर लूं तो मेरा मुँह काला हो जाए यदि मैं हिन्दुस्तान की इच्छा करूं!’

अबूशका नामक एक लेखक ने लिखा है कि ख्वाजा कलां ने यह शेर हौजे खास के निकट एक संगमरमर पर खुदवाया था। बाबर तो वैसे ही ख्वाजा कलां के गजनी चले जाने के कारण उससे नाराज था किंतु जब बाबर ने इस शेर को पढ़ा तो उसके क्रोध का पार नहीं रहा।

बाबर लिखता है- ‘मेरे हिन्दुस्तान में रहते इस प्रकार का व्यंग्यपूर्ण शेर लिखकर जाना, शिष्टता के विरुद्ध था। यदि उसके प्रस्थान पर मुझे एक क्रोध था तो इस व्यंग्य से वह दो हो गया। मैंने तत्काल एक रूबाई लिखकर उसे भिजवाई- सैंकड़ों धन्यवाद दे बाबर को जो उदार और क्षमा करने वाला है जिसने तुझे सिंध तथा हिन्द के साथ-साथ बहुत से राज्य दिए हैं। यदि तू इन स्थानों की गरमी सहन नहीं कर सकता और केवल ठण्डी दिशा ही देखनी है तो तेरे लिए केवल गजनी है।’

इस रूबाई से प्रतीत होता है कि बाबर ने ख्वाजा कलां से नाराज होकर, गिरदीज आदि प्रांत वापस छीन लिए जो बाबर ने उसे भारत से रवाना होते समय दिए थे।

बाबर ने लिखा है- ‘दिल्ली और आगरा के किलों (Red fort of Delhi and Red Fort of Agra)पर तो मेरा अधिकार हो चुका था किंतु आसपास के किलों के स्वामियों ने अपने किलों की मजबूती से मोर्चाबंदी कर ली थी। सम्भल में कासिम सम्भली, बयाना में निजाम खाँ, धौलपुर में मुहम्मद जेतून, ग्वालियर में तातार खाँ सारंगखानी, रापरी में हुसैन खाँ नोहानी, इटावा में कुतुब खाँ, कालपी में आलम खाँ तथा मेवात में हसन खाँ मेवाती मेरे विरोधी थे। इनमें सबसे अधिक दुष्ट वही मुलहिद था।’

 बाबर (Babur) ने दुष्ट मुलहिद शब्द का प्रयोग हसन खाँ मेवाती के लिए किया है। काफिर की तरह मुलहिद का अर्थ भी विधर्मी होता है। अतः अनुमान होता है मेवात का शासक हसन खाँ मेवाती शिया मुसलमान था। इन शब्दों से बाबर के चरित्र का दोहरापन उजागर होता है। समरकंद के उज्बेकों को जीतने के लिए बाबर ने ईरान के शाह के आदेश पर स्वयं शिया बनना स्वीकार किया था किंतु अब वह भारत आकर शियाओं को मुलहिद अर्थात् काफिर कह रहा था!

बाबर ने लिखा है- ‘कन्नौज तथा गंगापार के अफगान भी मेरा खुल्लम-खुल्ला विरोध कर रहे थे। इन लोगों ने दरया खाँ नोहानी के पुत्र बिहार खाँ को अपना बादशाह बनाकर उसे सुल्तान मुहम्मद की उपाधि दे रखी थी। ये लोग कन्नौज से चलकर आगरा की तरफ दो-तीन पड़ाव आगे आकर डेरा डालकर बैठ गए।’

   – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

0
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

0
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

0
तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...