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सांगा से भयभीत बाबर तोपगाड़ियों के पीछे छिपकर रहता था (27)

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सांगा से भयभीत बाबर - www.bharatkaitihas.com
सांगा से भयभीत बाबर तोपगाड़ियों के पीछे छिपकर रहता था

खानवा के मैदान में बाबर अपनी बड़ी-बड़ी तोपों के साथ युद्ध में उतरा था जबकि सांगा के पास पैदल तीरंदाजों और घुड़सवार तलवारबाजों के अतिरिक्त और किसी प्रकार के संसाधन नहीं थे। इस पर भी महाराणा सांगा से भयभीत बाबर तोपगाड़ियों के पीछे छिपकर रहता था।

सांगा से भयभीत बाबर ने मेवात के शासक हसन खाँ मेवाती को अपनी ओर मिलाने के हर संभव प्रयास किए किंतु हसन खाँ मेवाती अपने पुत्र नाहर खाँ पर किए गए अत्याचारों का बदला लेने के लिए महाराणा सांगा के पक्ष में हो गया। जब बाबर ने सुना कि महाराणा सांगा एक विशाल सेना लेकर बाबर की ओर बढ़ रहा है तो बाबर ने भी अपनी सेना को तैयार होने के आदेश दिए।

बाबर ने किस्मती बेग को थोड़ी सी सेना देकर बयाना की तरफ भेजा, वह कुछ लोगों को सिर काटकर ले आया और 70-80 आदमियों को बंदी बना लाया। किस्मती ने ये कटे हुए सिर बाबर को भेंट किए।

10 फरवरी 1527 को बाबर ने उस्ताद अली कुली द्वारा बनाई गई सबसे बड़ी तोप से पत्थरों के गोले चलवाकर उसका परीक्षण किया। इसने 1600 कदम तक पत्थर के गोलों को फैंका। यदि एक कदम को डेड़ फुट का माना जाए तो इस तोप से निकला हुआ गोला लगभग ढाई किलोमीटर दूर जा सकता था।

यह बाबर के लिए एक अद्भुत एवं उत्साहवर्द्धक बात थी! तोप की इस सफलता के लिए बाबर ने उस्ताद अली को तलवार की एक पेटी, खिलअत और तीपूचाक घोड़ा इनाम में प्रदान किया। 11 फरवरी को बाबर ने आगरा से प्रस्थान करके एक खुले मैदान में शिविर लगाया और सेना की भरती की जाने लगी।

बाबर के समस्त गवर्नर और सेनापति अपनी-अपनी सेनाएं लेकर उस मैदान में एकत्रित होने लगे। बाबर ने उन सबको एक क्रम में जमाना आरम्भ किया। बाबर ने अपनी सेना के एक अग्रिम दल को बयाना की तरफ रवाना किया और स्वयं मुख्य सेना के साथ रहा। जब यह सेना बयाना पहुंची तो सांगा के सैनिकों द्वारा घेर ली गई।

महाराणा सांगा अब तक अट्ठारह युद्ध लड़ चुका था जिनमें उसके शरीर पर 80 घाव लगे थे। युद्धों में ही उसने अपनी एक आँख, एक भुजा तथा एक पैर खो दिये थे। वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक था और लोदी साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था।

महाराणा सांगा संभवतः पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की ओर से भाग लेना चाहता था किंतु वह गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह के संभावित आक्रमण के कारण पानीपत नहीं जा सका। अब मुजफ्फरशाह की मृत्यु हो चुकी थी और महाराणा का ध्यान दिल्ली तथा आगरा पर केन्द्रित था जहाँ बाबर ने अधिकार कर लिया था।

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महाराणा सांगा का अनुमान था कि बाबर अपने पूर्वज तैमूर लंग की भांति दिल्ली को लूट-पाट कर काबुल लौट जाएगा परन्तु बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया था। ऐसी स्थिति में महाराणा तथा बाबर में संघर्ष होना अनिवार्य था क्योंकि बाबर के निश्चय ने राणा सांगा की योजना पर पानी फेर दिया था। जब बाबर की सेना का अग्रिम दल बयाना पहुंचा तो सांगा के सैनिकों ने बाबर की सेना के अग्रिम दल पर आक्रमण करके उसे परास्त कर दिया। उस दल का नायक संगुल खाँ जनजूहा वहीं मारा गया। सांगा के सैनिकों ने कित्ता बेग का कंधा फाड़कर बांह काट डाली। इस कारण किस्मती बेग तथा मनसूर बरलास सहित अनेक सेनापति भयभीत होकर भाग खड़े हुए। उन्होंने बाबर को सांगा की सेना की प्रचण्डता के ऐसे किस्से सुनाए कि बाबर चिंता में पड़ गया। महदी ख्वाजा इस समय बयाना के किले में था किंतु वह भी बाबर की सेना के अग्रिम दल की कोई सहायता नहीं कर सका। इसलिए बाबर ने बायाना की ओर तेज गति से बढ़ने की बजाय अपनी गति धीमी कर दी।

सांगा से भयभीत बाबर ने बेलदारों को भेजकर मंधाकुर के पास कुछ कुंए खुदवाए और अपनी सेना को वहीं पड़ाव करने के आदेश दिए। 16 फरवरी 1527 को बाबर मंधाकुर से चलकर सीकरी पहुंच गया क्योंकि सीकरी में बाबर की सेना के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध था। तब तक महाराणा सांगा की सेना बयाना से 10-12 मील दूर बसावर के निकट पहुंच गई।

कुछ दिन बाद अब्दुल अजीज को महाराणा सांगा की वास्तविक स्थिति जानने के लिए भेजा गया। अब्दुल अजीज के पास 1000-1500 सैनिक थे। सांगा की सेना ने उन सैनिकों को देख लिया तथा उनमें कसकर मार लगाई। सांगा की सेना ने बाबर के बहुत से सैनिकों को बंदी बना लिया। इस प्रकार अब्दुल अजीज महाराणा सांगा की वास्तविक स्थिति का पता नहीं लगा सका।

इस पर बाबर के मंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा के अमीर मुहिब अली को निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा के सेवकों सहित सांगा की तरफ भेजा गया। मुहम्मद अली जंगजंग को भी भेजा गया। सांगा की सेना ने इस बार भी बाबर के बहुत से सैनिकों को पकड़कर मार डाला। मुहिब अली भी जंग में गिरने वाला था किंतु बाल्तू नामक एक सैनिक ने पीछे से पहुंचकर मुहिब अली को बचा लिया।

एक दिन बाबर को समाचार मिला कि शत्रु तेजी से निकट आ रहा है, इस पर बाबर की सेना ने अस्त्र-शस्त्र धारण कर लिए तथा घोड़ों को कवच पहना दिए। बाबर ने लिखा है- ‘हम एक कोस तक बढ़ते चले गए। हमारे सामने एक बड़ी झील थी। इसलिए हम वहीं उतर पड़े। हमने अपने सामने का भाग गाड़ियों से सुरक्षित कर लिया और गाड़ियों को जंजीरों से जकड़ दिया। दो गाड़ियों के बीच में 7-8 गज की दूरी रखी गई।’

संभवतः गाड़ियों से बाबर का आशय तोपगाड़ियों से है। क्योंकि वह लिखता है-  ‘मुस्तफा रूमी ने रूमी ढंग से गाड़ियां तैयार करवाई थीं। वे बड़ी मजबूत थीं। चूंकि उस्ताद कुली को मुस्तफा से ईर्ष्या थी, इसलिए मुस्तफा को सेना के दाहिनी ओर हुमायूँ के सामने नियुक्त किया गया एवं उस्ताद अली कुली को बाईं ओर नियुक्त किया गया। जिन स्थानों पर गाड़ियां नहीं पहुंच पाई थीं, वहाँ खुरासानी एवं हिन्दुस्तानी बेलदारों द्वारा खाइयाँ खुदवा दी गईं।’

बाबर ने लिखा है- ‘मेरी सेना, इतनी सुरक्षा के बावजूद हतोत्साहित थी। इसलिए मैंने जिन स्थानों पर गाड़ियां नहीं पहुंच सकती थीं, उन स्थानों पर 7-8 गज की दूरी पर लकड़ी की तिपाइयां रखवा दीं और उन्हें कच्चे चमड़े की रस्सियों द्वारा खिंचवाकर बंधवा दिया। इन कार्य में 20-25 दिन लग गए।’

इसी बीच कासिम हुसैन सुल्तान, अहमद यूसुफ तथा बाबर के बहुत से दोस्त काबुल से बाबर के पास आ गए। बाबर ने उनकी संख्या 500 बताई है। मुहम्मद शरीफ तथा बाबा दोस्त बहुत से ऊंटों पर गजनी से शराब रखवाकर ले आये।

बाबर ने लिखा है- ‘मुहम्मद शरीफ ज्योतिषी था। उसने भविष्यवाणी की कि इन दिनों मंगल ग्रह पश्चिम दिशा में है, इस कारण जो कोई इस ओर से युद्ध करने जाएगा, वह पराजित होगा। इस भविष्यवाणी को सुनकर मेरी सेना में अत्यधिक घबराहट फैल गई। मैंने मुहम्मद शरीफ की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया।’

अब बाबर ने हसन खाँ मेवाती को सांगा से अलग करने की योजना बनाई। बाबर ने एक सेना मेवात के लिए रवाना की ताकि वह मेवात में लूटमार करके अशांति फैला दे और हसन खाँ मेवाती को युद्ध का मैदान छोड़कर मेवात जाना पड़े किंतु हसन खाँ एक अनुभवी सेनापति था। इसलिए वह मोर्चा छोड़कर नहीं गया।

                                                 – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सांगा के डर से बाबर ने शराब छोड़ दी! (28)

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सांगा के डर से बाबर ने शराब छोड़ दी!

ठण्डे ट्रांसऑक्सियाना क्षेत्र के निवासी होने के कारण मुगल शराब पीने के आदी थे किंतु खानवा के युद्ध में सांगा के डर से बाबर ने शराब छोड़ दी और अपने सैनिकों के सामने ही सोने-चांदी के बरतन भिखारियों में बांट दिए!

जब फरवरी 1527 में महाराणा सांगा आगरा की ओर बढ़ने लगा तो जहीरुद्दीन बाबर भी एक सेना लेकर महाराणा सांगा से युद्ध करने के लिए चल पड़ा। महाराणा की सेना ने बाबर की सेना के कई अग्रिम दलों पर हमला करके उन्हें भारी क्षति पहुंचाई थी।

इस कारण बाबर की सेना में सांगा की सेना का आतंक फैल गया और सांगा के डर से वह तोपगाड़ियों एवं लकड़ी की तिपाहियों के पीछे छिपकर रहने लगी। उन्हीं दिनों शरीफ मुहम्मद नामक एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि इस युद्ध में बाबर की पराजय होगी। इससे बाबर की सेना में और अधिक घबराहट फैल गई।

बाबर की सेना में शराब, अरक, बूजा तथा माजून आदि मादक द्रव्यों का बहुतायत से प्रयोग होता था। बादशाह से लेकर पैदल सिपाही तक सभी नशा करते थे और नशा करना बाबर की सेना की कमजोरी बन गया था। स्वयं बाबर ने अपनी आत्मकथा में अपनी तथा अपनी सेना की इस लत का कई बार उल्लेख किया है।

बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘जब मेरी सेना ने धौलपुर पर अधिकार किया तब मैं स्वयं धौलपुर गया। मैं धौलपुर में मीराने बाग अर्थात् कमल उद्यान देखने गया। इस बाग का स्थापत्य देखते ही बनता था। लाल पत्थर में तराशे गये कमल पुष्पा में फव्वारे लगे हुए थे। इस बाग में कमल की आकृति का एक सुंदर कुण्ड स्थित था। मैंने अपने सिपाहियों से कहा कि यदि वे महाराणा सांगा को परास्त कर देंगे तो मैं इस कुण्ड को शराब से भरवा दूंगा ताकि मेरे सैनिक छककर शराब पी सकें और मौज-मस्ती मना सकें।’

जब महाराणा सांगा की सेना बाबर के सामने आकर खड़ी हो गई तो बाबर के विचार बदलने लगे। संभवतः बाबर के अवचेतन पर मृत्यु का भय छा जाने से ऐसा हुआ।

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बाबर ने लिखा है- ’25 फरवरी 1527 को जब मैं प्रातःकाल की सैर पर निकला तो मेरे हृदय में पाप से तौबा करने का विचार आया और मैंने शराब पीना छोड़ने का निश्चय किया। मैंने सोने-चांदी की सुराहियां तथा प्याले और दावत के बरतन मंगवाए और उन्हें तत्काल तोड़ दिया। इस प्रकार मदिरापान का त्याग करके मेरे हृदय को शांति प्राप्त हो गई। मैंने सोने-चांदी के बरतनों को तुड़वाकर उन्हें निर्धनों एवं दरवेशों में बांट दिया। मेरे रात्रिकालीन पहरेदार असस ने इस कार्य में मेरा साथ दिया। वह दाढ़ी न मुंडवाने के निर्णय में भी मेरा साथ दे चुका था। उस रात्रि में तथा दूसरे दिन तक बेगों, अंगरक्षकों एवं लगभग 300 लोगों ने शराब से तौबा कर ली। जो मदिरा हमारे साथ थी, वह भूमि पर फैंक दी गई। जो मदिरा बाबा दोस्त गजनी से लाया था, उसके लिए आदेश हुआ कि उसमें नमक मिला कर सिरका बना दिया जाए। जिस स्थान पर शराब फैंकी गई थी, उस स्थान पर एक कुआं खुदवाने तथा उसके निकट एक खैरातखाना बनाने का आदेश दिया।’

बाबर की ओर से अपने समस्त गवर्नरों और बेगों के नाम यह फरमान जारी किया गया कि वे भी अपने अधीनस्थों को शराब पीने से तौबा करने के लिए प्रेरित करें। हालांकि बहुत से इतिहासकारों ने यह लिखा है कि सांगा के डर से बाबर ने अपने सैनिकों को प्रोत्साहित करने के लिए शराब के बर्तन तोड़े तथा शराब न पीने का प्रण किया किंतु बाबर ने अपने संस्मरणों में शराब छोड़ने का कारण बताते हुए लिखा है- ‘मैंने अपने मुँह में मौत को देख लिया था, इसलिए अब मैं पाप से तौबा करना चाहता था।’

बाबर ने अपने मुँह में मौत देखने की बात को स्पष्ट नहीं किया है। संभव है कि बाबर को महाराणा सांगा से होने वाले युद्ध में अपनी सेना की पराजय दिखाई देने लगी थी जिसमें बाबर की मृत्यु भी हो सकती थी। इसलिए वह मरने से पहले पापमुक्त होना चाहता था। सांगा के डर से ही उसने शराब पीनी छोड़ी थी!

बाबर ने लिखा है- ‘मेरी सेना की निराशा बढ़ती जा रही थी। कोई भी बेग और खान वीरता एवं साहसपूर्ण सलाह नहीं देता था। वजीरों द्वारा, जिन्हें बात करनी चाहिए कोई पौरुष सम्बन्धी बात नहीं होती थी। और जो अमीर बड़े-बड़े प्रदेशों को हजम कर जाते हैं, कोई बात नहीं करते थे। न तो कोई साहसपूर्ण परामर्श देता था ओर न कोई किसी आक्रमण के विषय में कोई योजना बनाता था। मैंने अपने लोगों को हतोत्साहित और शिथिल देखकर एक उपाय करने का विचार किया। मैंने अपने समस्त बेगों एवं वीरों को बुलाकर एक भाषण दिया।’

बाबर लिखता है- ‘मैंने अपने बेगों एवं सैनिकों से कहा कि जो कोई भी जीवन की सभा में प्रवष्टि हुआ है, अंत में वह मृत्यु का प्याला पिएगा। जो जीवन की सराय में आया है, अंत में भूमि के दुःख भरे घर से चला जाएगा। कुख्यात होकर जीवित रहने से यश पाकर मृत्यु को प्राप्त होना अच्छा है। महान् अल्लाह ने हमें इतना बड़ा सौभाग्य प्रदान किया है और इतने बड़े यश को हमारे निकट कर दिया है कि हम लोग या तो शहीद होंगे या गाजी। अतः सबको कुरान शरीफ की शपथ लेनी चाहिए कि कोई भी, शत्रु के सामने मुँह मोड़ने के विषय में नहीं सोचेगा और जब तक शरीर में प्राण हैं, उस समय तक रणक्षेत्र एवं युद्ध से पृथक नहीं होगा। मेरे कहने से समस्त बेगों, सेवकों तथा सैनिकों ने हाथ में कुरान लेकर शपथ ली।’

अभी युद्ध आरम्भ भी नहीं हुआ था कि बाबर को विभिन्न क्षेत्रों से चिंताजनक समाचार मिलने लगे कि जिन क्षेत्रों को बाबर ने अपने अधीन किया था, उन क्षेत्रों के लोग बाबर को सांगा की दाढ़ में फंसा हुआ जानकर विद्रोह करने लगे। रापरी, चंदवार, दो-आब के क्षेत्र, ग्वालियर, संभल में स्थान-स्थान पर हिन्दुस्तानियों ने बाबर के अधिकारियों को निकालना आरम्भ कर दिया।

बाबर ने लिखा है- ‘मैंने इन समाचारों की कोई चिंता नहीं की तथा अपने कार्य में लगा रहा।’

13 मार्च 1527 को सांगा के डर से बाबर की सेना ने तोपगाड़ियों और पैदल सैनिकों को सीकरी से आगे बढ़ाना आरम्भ किया। उन्होंने गाड़ियों को तो अपने सामने कर लिया तथा सेना के तीनों तरफ लकड़ी की पहियेदार तिपाइयां लगा लीं ताकि सांगा की सेना अचानक बाबर की सेना पर हमला नहीं कर सके।

सांगा के डर से बाबर ने सीकरी से प्रस्थान करने से पहले ही अपनी सेनाओं को कतारबद्ध कर लिया था ताकि कहीं अचानक ही शत्रू का आक्रमण हो जाए तो बाबर की सेना में अफरा-तफरी न मचे। उसने सेना के चार स्पष्ट विभाग किए जिन्हें वह आगे का भाग, दायां भाग, बायां भाग तथा मध्य भाग कहता था। बाबर अपने सेनापतियों सहित घोड़ों पर सवार होकर इस सेना के चारों ओर चक्कर लगाता रहता था ताकि सेना की पंक्तियाँ न बिखरें।

इस दौरान बाबर सैनिकों को समझाता रहता था कि उन्हें किस प्रकार युद्ध करना है और किस परिस्थिति में क्या करना है! यह सचमुच बाबर के लिए जीवन-मरण का प्रश्न था और बाबर ने इस प्रश्न को हल करने के लिए हर संभव तैयारी की।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दज्जाल था महाराणा सांगा (29)

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दज्जाल था महाराणा सांगा

अरब की लोककथाओं में एक आंख वाले शैतान को दज्जाल कहा जाता है जो कयामत के दिन लोगों को उनके पापों की सजा देता है। शेख जैनी ने लिखा है कि मुसलमानों के लिए दज्जाल था महाराणा सांगा!

 जब बाबर को सांगा की सेना दिखाई दी तो बाबर को अपनी मृत्यु साक्षात् दिखाई देने लगी। भयभीत बाबर ने अपने पापों से तौबा करने का निश्चय किया तथा शराब का सेवन न करने की शपथ ली। इस समय बाबर अपनी जन्मभूमि फरगना और अपनी राजधानी काबुल से हजारों किलोमीटर दूर अनजानी भूमि पर खड़ा था।

उसके सिर पर प्रबल शत्रु खड़ा था और उसके संगी-सहायक विश्वसनीय नहीं थे, जो थे वे भी हिम्मत हार चुके थे। हिन्दुस्तानियों अर्थात् हिन्दुस्तान में सदियों से शासन कर रहे अफगानियों की योग्यता एवं नीयत पर बाबर तनिक भी भरोसा नहीं करता था। बाबर ने अपने आत्मकथा में बार-बार लिखा है कि हिन्दुस्तानियों अर्थात् अफगानी सेनापतियों को जिम्मेदारी भरे कार्य नहीं सौंपे जा सकते क्योंकि वे अयोग्य हैं तथा धोखेबाज हैं।

बाबर के पास काबुल से आए अफगानी सैनिकों एवं बेगों की संख्या कई हजार थी जिन्हें बाबर अग्रिम मोर्चे सौंपकर युद्ध करना चाहता था। 17 मार्च 1526 को बाबर की सेना ने खानवा के मैदान में शिविर लगाया। खेमे गाढ़ दिए गए और उनके चारों ओर तेजी से खाइयां खोदी जाने लगीं ताकि रात्रि में शत्रु मुगल शिविर में न घुस सके।

बाबर ने अपने सैनिकों की संख्या का उल्लेख नहीं किया है किंतु अपनी आत्मकथा में अपने समकालीन लेखक शेख जैनी की पुस्तक फतहनामा के हवाले से राणा सांगा की सेना का विवरण देते हुए लिखा है कि-

‘सांगा के पास कम से कम 2 लाख 22 हजार सैनिक थे जिनमें 1 लाख सैनिक राणा तथा उसके अधीन-सामंतों के थे और 1 लाख 22 हजार सैनिक मित्र-राजाओं के थे जिनमें वागड़ अर्थात् डूंगरपुर के रावल उदयसिंह के पास 12 हजार, चंदेरी के शासक मेदिनीराय के पास 12 हजार, सलहदी के पास 30 हजार, हसन खाँ मेवाती के पास 12 हजार, ईडर के राजा वारमल के पास 4 हजार, नरपत हाड़ा के पास 7 हजार, कच्छ के राजा सत्रवी के पास 6 हजार, धर्मदेव के पास 4 हजार, वीरसिंह देव के पास 4 हजार और सिकंदर लोदी के पुत्र महमूद खाँ के पास 10 हजार घुड़सवार सैनिक थे।’

शेख जैनी ने एक ओर तो सांगा के दल में एकत्रित सैनिकों की संख्या अत्यंत बढ़ा-चढ़ाकर लिखी है तो दूसरी ओर मारवाड़ के राव गांगा की सेना, आम्बेर के राव पृथ्वीराज की सेना, बीकानेर के कुंवर कल्याणमल की सेना, अन्तरवेद से चंद्रभाण चौहान और माणिकचंद चौहान आदि बड़े राजाओं की सेनाओं का उल्लेख ही नहीं किया है। स्पष्ट है कि शेख जैनी ने बिना जानकारी के ही सांगा की सेना का वर्णन किया है और चालाक बाबर ने उसी विवरण को अपनी पुस्तक में लिख दिया है।

 शेख जैनी ने लिखा है- ‘वह अभिमानी काफिर अर्थात् राणा सांगा जो कि दिल का अंधा और पत्थर-हृदय वाला था, अभागे एवं विनाश को प्राप्त होने वाले काफिरों की सेना लेकर इस्लाम के अनुयाइयों से युद्ध करने हजरत मुहम्मद की जिन पर अल्लाह की कृपा हो, शरीअत के विनाश हेतु अग्रसर हुआ। बादशाही सेना के मुजाहिद आसमानी आदेश के समान काने दज्जाल पर टूट पड़े।’

इस्लाम में मान्यता है कि कयामत से पहले दज्जाल नामक शैतान प्रकट होगा जो एक आंख से काना होगा। शेख जैनी ने महाराणा सांगा की तुलना उसी दज्जाल से की है क्योंकि महाराणा सांगा भी एक युद्ध में अपनी एक आंख गंवा चुका था! देखा जाए तो शेख जैनी ने ठीक ही लिखा है कि दज्जाल था महाराणा सांगा क्योंकि मुगलों के लिए वह मौत और कयामत का संदेश लेकर आया था।

शेख जैनी ने लिखा है- ‘उस दज्जाल ने बुद्धिमानों पर यह बात स्पष्ट कर दी कि जब दुर्भाग्य प्रारम्भ हो जाता है तो आंखें भी अंधी हो जाती हैं और उनके सामने यह आयत रख दी- जो कोई भी व्यक्ति सच्चे धर्म को उन्नति देने की चेष्टा करता है वह अपनी आत्मा के भले के लिए ही प्रयत्नशील होता है।’

अर्थात् शेख जैनी के अनुसार राणा सांगा ने हिन्दुओं को समझाया कि वे सच्चे धर्म की उन्नति के लिए प्रयत्नशील होकर अपनी आत्मा का भला करें। चूंकि हिन्दुओं का दुर्भाग्य आरम्भ हो गया था इसलिए वे अंधे हो गए थे और उन्हें दज्जाल अर्थात् राणा सांगा की बातें अच्छी लगने लगी थीं!

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शेख जैनी ने लिखा है- ‘इस समय काफिर सेना खानवा गांव के क्षेत्र में स्थित एक पहाड़ी के निकट पड़ाव किए हुए थी और हमारी सेना से दो कुरोह अर्थात् 4 मील दूर थी। जब दुष्ट काफिरों ने इस्लाम की सेना की गूंज सुनी तो उन्होंने अपनी अभागी सेना की पंक्तियाँ सुव्यवस्थित कर लीं और वे संगठित एवं एक-हृदय होकर पर्वत रूपी एवं देव सरीखे हाथियों पर भरोसा करके इस्लामिक शिविर की ओर अग्रसर हुए। उन्हें देखकर इस्लामी सेना के योद्धा भी अपने सेना की पंक्तियों को सुव्यवस्थित करके अपने कलगी को ऊंचा किए हुए अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए अग्रसर हुए। हमने सावधानी के लिए रूम के गाजियों का अनुसरण करते हुए तुफंगचियों अर्थात् बंदूकचियों और राद-अंदाजों अर्थात् तोपचियों को सेना के आगे रखा तथा गाड़ियों की पंक्तियों को जंजीरों से बांधकर उनके आगे रखा।’ शेख जैनी ने बाबर की सेना के सेनापतियों की एक लम्बी सूची दी है तथा बाबर की सेना के दाईं एवं बाईं ओर नियुक्त तूलगमा सेना का भी वर्णन किया है।

बाबर ने अपनी सेना में कुछ ऐसे अधिकारी नियुक्त किए जो युद्ध के दौरान सेना के प्रत्येक हिस्से से सूचनाएं बाबर तक पहुंचाते रहें तथा बाबर के आदेश लेकर सेना के प्रत्येक हिस्से में ‘खानों’ एवं ‘बेगों’ तक पहुंचाएं। संभवतः युद्ध के दौरान नियुक्त होने वाले इस तरह के संदेशवाहकों का उल्लेख भारत के इतिहास में पहली बार मिलता है। इस व्यवस्था के कारण सेना के प्रत्येक अंग में तालमेल बना रहता था और अफवाहें नहीं फैल पाती थीं।

हिन्दुओं की सेना में इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए हिन्दुओं की सेना में किसी भी अफवाह का फैल जाना एक आम समस्या थी। मुस्लिम सेनाओं को भारतीयों की इस कमजोरी का पता था इसलिए वे युद्ध के दौरान हिन्दू-सेना में अफवाहें फैलाते रहते थे।

अफगानिस्तान से आने वाली मुस्लिम सेनाओं में पानी पिलाने वालों की नियुक्ति भी की जाती थी जो युद्ध के मैदान में घूम-घूमकर सैनिकों एवं घायलों को पानी पिलाते रहते थे। हिन्दुओं की सेना में इस तरह की नियुक्तियों के बारे में इतिहास की किसी भी पुस्तक में उल्लेख नहीं मिलता है।

लगभग एक पहर तथा दो घड़ी दिन व्यतीत हो जाने पर दोनों ओर की सेनाएं एक दूसरे के निकट पहुंच गईं। अब युद्ध किसी भी क्षण आरम्भ हो सकता था।

बाबर ने लिखा है- ‘जिस प्रकार प्रकाश का अंधकार से युद्ध हुआ करता है, उसी प्रकार दोनों दलों की मुठभेड़ हुई। दायें तथा बायें बाजू में ऐसा घनघोर युद्ध आरम्भ हुआ मानो भूकम्प आ गया हो और आकाश की अंतिम सीमा पर तेज झनझनाहट होने लगी हो!’

बाबर और शेख जैनी के विवरणों के आधार पर यह सत्य ही प्रतीत होता है कि मुगल सैनिकों के लिए दज्जाल था महाराणा सांगा जो मुसलमानों का विनाश के लिए कयामत का दूत बनकर आया था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मेड़तिया राठौड़ महाराणा सांगा को खानवा के मैदान से बाहर ले गए! (30)

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मेड़तिया राठौड़ महाराणा सांगा को खानवा के मैदान से बाहर ले गए!

जब खानवा के मैदान में बाबर से लड़ते हुए महाराणा सांगा के प्राण संकट में आ गए तब मेड़तिया राठौड़ महाराणा सांगा को खानवा के मैदान से बाहर ले गए!

17 मार्च 1527 को बाबर तथा महाराणा सांगा की सेनाएं खानवा के मैदान में लगभग एक पहर तथा दो घड़ी दिन व्यतीत हो जाने पर एक दूसरे के बिल्कुल निकट आ गईं। आधुनिक शब्दावली में इसे लगभग प्रातः साढ़े नौ बजे का समय कह सकते हैं। अब किसी भी समय युद्ध आरम्भ हो सकता था।

इस युद्ध का इतिहास लिखने वाले समस्त लेखकों ने लिखा है कि युद्ध का आरम्भ राजपूतों ने किया। कुछ ख्यातों के अनुसार हिन्दुओं की ओर से युद्ध का पहला डंका मेड़तिया राठौड़ राजा वीरमदेव ने बजाया जो भगवान श्रीकृष्ण की भक्त मीरांबाई का ताऊ था।

राजपूतों ने बाबर की सेना के दाहिने पक्ष पर धावा बोलकर उसे अस्त-व्यस्त कर दिया। इस पर बाबर ने राजपूतों के बायें पक्ष पर अपने चुने हुए सैनिकों को लगा दिया। इससे युद्ध ने विकराल रूप ले लिया। थोड़ी ही देर में राजपूतों की सेना में घुसने के लिये वामपक्ष तथा मध्यभाग का मार्ग खुल गया।

मुस्तफा रूमी ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपने तोपखाने को आगे बढ़ाया और राजपूत सेना पर गोलों तथा जलते हुए बारूद की वर्षा आरम्भ कर दी। मुगलों के बायें पक्ष पर भी भयानक युद्ध हो रहा था। इसी समय तूलगमा सेना ने हिन्दुओं पर पीछे से आक्रमण किया। देखते ही देखते हिन्दू सेना चारों ओर से घेर ली गई। हिन्दुओं के लिये तोपों की मार के समक्ष ठहरना असम्भव हो गया। वे तेजी से घटने लगे।

बाबर ने लिखा है कि काफिरों की सेना के बाएं बाजू ने इस्लामी सेना के दाएं बाजू पर निरंतर कड़े आक्रमण किए। वे गाजियों पर टूट-टूट पड़ते थे किंतु हर बार धकेल दिए जाते थे या विजय की तलवार द्वारा दोजख में जहाँ वे जलने के लिए फैंक दिए जाएंगे और जहाँ वे कष्ट में जीवन व्यतीत किया करेंगे, भेज दिए जाते थे। प्रत्येक जिहादी अपना उत्साह प्रदर्शित करने के लिए उद्यत था।

शेख जैनी ने लिखा है- ‘जब कुछ देर युद्ध होता रहा तो यह आदेश दिया गया कि शाही सेना के विशेष दस्ते जिनमें बड़े-बड़े योद्धा तथा निष्ठा के जंगल के सिंह थे और जो गाड़ियों के पीछे बंधे हुए सिंहों की भांति खड़े थे, केन्द्र की दाईं एवं बाईं ओर से निकलकर तुफंगचियों अर्थात् बंदूकचियों को बीच में छोड़कर दोनों ओर से युद्ध आरम्भ कर दें।’

वस्तुतः शेख जैनी ने जिन्हें विशेष शाही दस्ते लिखा है, वे तूलगमा की टुकड़ियां थीं जिन्हें युद्ध के बीच में अपनी सेना से अलग होकर शत्रु के पार्श्वों एवं पीछे के भाग पर धावा बोलने के लिए प्रशिक्षित किया गया था।

शेख जैनी ने लिखा है- ‘जिस प्रकार उषा क्षितिज की दरार से निकलती है उसी प्रकार शाही सैनिक गाड़ियों के पीछे से निकले। उन्होंने उन अभागे काफिरों के रक्त को रणक्षेत्र में जो आकाश के समान था, बहा दिया और विद्रोहियों के सिरों को सितारों के अस्तित्व के समान मिटा दिया।’

जैनी ने लिखा है- ‘अली कुली ने जो अपने सैनिकों सहित केन्द्र में था, अत्यधिक पौरुष का प्रदर्शन किया। उसने लोहे के वस्त्र वाले काफिरों के शरीरों पर इतने बड़े-बड़े पत्थर फैंके जो उस तराजू पर रखने योग्य हैं जिन पर लोगों के कर्म तोले जाएंगे। जर्जबन एवं तुफंग अर्थात् बंदूक चलाने वालों ने भी गाड़ियों के पीछे से निकल कर काफिरों को मृत्यु का विष चखा दिया। पैदल सैनिकों ने भी एक बड़े ही खतरनाक स्थान से शत्रुदल में प्रविष्ट होकर स्वयं को सिंह सिद्ध किया। कुछ तोपें सेना के केन्द्र में भी रखी गई थीं, बादशाह उन्हें अपने साथ लेकर स्वयं शत्रु की सेना की ओर अग्रसर हुआ।’

शेख जैनी ने लिखा है- ‘जिस समय गाजी, काफिरों के सिर काट रहे थे, उस समय आकाशवाणी हुई कि यदि तुम विश्वास रखते हो तो तुम्हें अविश्वासियों पर विजय प्राप्त होगी। अल्लाह की ओर से सहायता एवं तत्काल विजय है, तुम यह सुखद समाचार मोमिनों के पास ले जाओ। इस आकाशवाणी को सुनकर गाजियों ने इतना जी लगाकर युद्ध किया कि फरिश्ते उनको शाबासी देने लगे तथा पतंगों के समान गाजियों के सिरों के चारों ओर चक्कर काटने लगे।’

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इसी बीच महाराणा सांगा किसी हथियार की चपेट में आ जाने से बेहोश हो गया। इस पर मेड़तिया राठौड़ वीरमदेव महाराणा सांगा को युद्ध भूमि में से निकाल ले गया। इस प्रयास में राजा वीरमदेव स्वयं बुरी तरह घायल हुआ और उसके दोनों भाई रायमल मेड़तिया एवं रतनसिंह मेड़तिया युद्ध-क्षेत्र में ही वीरगति को प्राप्त हुए। पाठकों की सुविधा के लिए बताना समीचीन होगा कि राणा सांगा की एक रानी जोधपुर की राजकुमारी थी तथा जोधपुर के शासक राव गांगा की बहिन थी। राव गांगा किसी कारण से इस युद्ध में स्वयं नहीं जा सका था। इसलिए गांगा ने मेड़तिया राठौड़ राजा वीरमदेव को चार हजार सैनिक देकर सांगा की तरफ से लड़ने के लिए भेजा था जो कि गांगा के ही कुल का राजकुमार था। कुछ ख्यातों में लिखा है कि खानवा के युद्ध-क्षेत्र में नगाड़े की पहली चोट वीरमदेव मेड़तिया ने ही की थी। वीरमदेव के छोटे भाई रतनसिंह विख्यात कृष्ण.भक्त मीरांबाई के पिता थे जो इस युद्ध में काम आए। मीराबाई का विवाह राणा सांगा के बड़े पुत्र भोजराज से हुआ था। भोजराज भी एक युद्ध में शत्रुओं से लड़ते हुए काम आया था।

जब मेड़तिया राठौड़ राणा को युद्ध-क्षेत्र से बाहर ले जाने लगे तो मेवाड़ी सरदारों ने सलूम्बर के रावत रत्नसिंह से अनुरोध किया कि वह राज्यचिह्न धारण करके हाथी पर सवार हो जाए ताकि राणा के पक्ष के सैनिक उस हाथी को देखकर युद्ध करते रहें। रावत रत्नसिंह महाराणा के ही कुल का राजा था।

रावत रत्नसिंह ने सरदारों का यह प्रस्ताव यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि- ‘मेरे पूर्वज मेवाड़ छोड़ चुके हैं, इसलिए मैं एक क्षण के लिए भी राज्यचिह्न धारण नहीं कर सकता किंतु तुम में से जो कोई भी मेवाड़ के राज्यचिह्न धारण करेगा मैं उसके लिए प्राण रहने तक शत्रु से लड़ूंगा।’

इस पर मेवाड़ के सरदारों ने हलवद के राजा झाला अज्जा को समस्त राज्य चिह्नों के साथ महाराणा के हाथी पर सवार कर दिया। हलवद गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित था। समस्त हिन्दू सेना झाला अज्जा को ही महाराणा समझकर युद्ध करती रही। थोड़ी देर के लिए राजपूतों के दल में खलबली मची किंतु अंत में वे बाबर की सेना को चीरते हुए बाबर के निकट पहुंच गए।

इसी समय राजपूतों पर तोपों से गोले बरसाए गए और राजपूतों को एक बार फिर पीछे हट जाना पड़ा। यह एक विचित्र लड़ाई थी। बंदूक से तीर लड़ रहे थे और तोपों से तलवारें लड़ रही थीं। यह मुकाबला किसी भी तरह बराबरी का नहीं था।

डूंगरपुर का राजा उदयसिंह, अंतरवेद के माणिकचंद चौहान और चंद्रभाण चौहान, रत्नसिंह चूण्डावत, झाला अज्जा, रामदास सोनगरा, परमार गोकलदास और खेतसी आदि अनेक हिन्दू राजा इस युद्ध में काम आये। इस प्रकार राजपूताना के अनेक राजाओं तथा उनकी सेनाओं ने इस युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी।

यह हिन्दुओं की ओर से मुसलमानों के विरुद्ध लड़ा गया संभवतः अंतिम युद्ध था जिसमें आम्बेर के कच्छवाहे, मेवाड़ के गुहिल, मेड़तिया राठौड़, चौहान, चूण्डावत, झाला, कच्छवाहा, सोनगरा और परमार सहित राजस्थान के समस्त राजकुलों के राजा, राजकुमार एवं सामंत मेवाड़ के महाराणा के नेतृत्व में एक साथ होकर लड़े।

दुर्भाग्य से इस युद्ध में हिन्दुओं की हार हुई तथा मुगलों ने डेरों तक उनका पीछा किया।                         

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सलहदी और खानजादा ने युद्ध के बीच में सांगा को छोड़ दिया (31)

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सलहदी और खानजादा - www.bharatkaitihas.com
सलहदी और खानजादा ने युद्ध के बीच में सांगा को छोड़ दिया!

जिस समय महाराणा सांगा बाबर से लड़ने के लिए खानवा के मैदान में उतरा, उस समय दो मुसलमान सरदार सलहदी और खानजादा भी सांगा की तरफ से मैदान में उतरे किंतु उन्होंने युद्ध आरम्भ होते ही महाराणा सांगा को छोड़ दिया तथा बाबर से जा मिले!

17 मार्च 1527 को खानवा के मैदान में बाबर एवं महाराणा सांगा के बीच हुए युद्ध में सांगा किसी हथियार के लगने से घायल होकर मूर्च्छित हो गया तथा मेड़ता का राजा वीरमदेव सांगा को युद्ध के मैदान से बाहर ले गया। आम्बेर, मेवाड़, मेड़ता, जोधपुर, बीकानेर आदि राज्यों की ख्यातों में बड़ी संख्या में उन हिन्दू योद्धाओं के नाम दिए गए हैं जो इस युद्ध में काम आए थे। राजपूतों की ऐसी कोई शाखा नहीं थी जिसका कोई प्रमुख राजा इस युद्ध में न काम आया हो!

दूसरी ओर बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में इस बात पर मौन ही धारण किया है कि बाबर के पक्ष के कौन-कौन से मुसलमान सेनापति एवं बेग इस युद्ध में काम आए।

भाटों के एक दोहे से प्रकट होता है कि बाबर की सेना के पचास हजार सैनिक इस युद्ध में काम आए थे। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि यह संभव है कि बाबर की सेना का भीषण संहार हुआ हो। इसमें कोई दो राय नहीं कि बाबर ने यह लड़ाई तोपों और बंदूकों के बल पर जीती थी और हिन्दुओं ने यह लड़ाई तीरों एवं तलवारों पर आश्रित होने के कारण हारी थी। फिर भी कुछ ऐसे अवसर आए थे जब महाराणा सांगा इस युद्ध को अपने पक्ष में कर सकता था।

पानीपत के युद्ध की समाप्ति के तुरंत बाद महाराणा सांगा के पास एक बड़ा अवसर था जब वह बाबर को परास्त कर सकता था। सांगा को चाहिए था कि वह स्वयं पानीपत, दिल्ली अथवा आगरा के आसपास अपनी सेनाओं को लेकर तैयार रहता ताकि जैसे ही बाबर पानीपत के मैदान से आगे बढ़ता, सांगा उस पर टूट पड़ता और उसे दिल्ली तथा आगरा पहुंचने ही नहीं देता।

सांगा ने बाबर को अगले युद्ध की तैयारी का पूरा अवसर दिया, इसे सांगा की रणनीतिक कमजोरी ही कहना चाहिए। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि सांगा को आशंका थी कि गुजरात का सुल्तान मेवाड़ पर आक्रमण करने की तैयारियां कर रहा था, इसलिए सांगा पानीपत से दूर रहा।

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बाबर ने पानीपत के युद्ध में तूलगमा टुकड़ियों का प्रयोग किया था, यदि सांगा ने अपने गुप्तचरों को पानीपत के युद्ध की टोह लेने भेजा होता तो सांगा को इन टुकड़ियों की कार्यप्रणाली के बारे में ज्ञात हो जाता और वह भी इसी प्रकार की तैयारी कर सकता था किंतु सांगा परम्परागत युद्ध तकनीक पर ही आंख मूंद कर भरोसा किये रहा और शत्रु-दल के छल-बल के बारे में नहीं जान सका। पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की पराजय के बाद राणा सांगा को यह ज्ञात हो चुका होगा कि तोपों और बंदूकों के सामने तीरों और तलवारों से कुछ नहीं हो सकेगा। इसलिए सांगा को चाहिए था कि वह बाबर को अपनी तोपें लेकर खानवा तक नहीं पहुंचने देता। यदि वह बाबर पर उस समय हमला बोलता जब बाबर अपनी तोपों को आगरा से मंधाकुर तथा सीकरी होता हुआ खानवा की ओर बढ़ा रहा था तो बाबर को तोपों में बारूद भरने का समय ही नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में बाबर को तीरों, भालों और तलवारों से लड़ना पड़ता। उसे बंदूकों से कुछ सहायता मिलती फिर भी राजपूत मुगलों को आसानी से काबू कर लेते। एल्फिंस्टन ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ इण्डिया में लिखा है- ‘यदि राणा मुसलमानों की पहली घबराहट पर ही आगे बढ़ जाता तो उसकी विजय निश्चित थी।’

इसमें कोई संदेह नहीं कि हिन्दू-राजा हिन्दू-अस्मिता की रक्षा के लिए लड़े किंतु उनकी युद्ध-तकनीक हजारों साल पुरानी थी इस कारण वे समरकंद और अफगानिस्तान से आए बाबर के सामने टिक नहीं सके जिनके पास मंगोलों, तुर्कों, उज्बेकों, रूमियों तथा ईरानियों से प्राप्त युद्ध कौशल एवं युद्ध तकनीकें थीं। यद्यपि यह कहा जा सकता है कि खानवा के युद्ध में बाबर की तोपें और बंदूकें जीत गईं तथा हिन्दुओं के तीर-कमान, तलवारें और भाले हार गये तथापि यह भी सच है कि गुहिलों के नेतृत्व में लड़े गये इस युद्ध में हिन्दू राजाओं की पराजय के और भी बड़े कारण थे। हिन्दू राजा अब भी युद्ध सम्बन्धी नैतिकताओं का पालन करते हुए शत्रु पर सामने से आक्रमण करने के सिद्धांत पर डटे हुए थे।

दूसरी ओर बाबर पर युद्ध सम्बन्धी नैतिकता का कोई बंधन नहीं था। उसकी तूलगमा युद्ध-पद्धति का तो आधार ही पीछे से वार करना, धोखा देकर युद्ध-क्षेत्र में घुसना और शत्रु को चारों तरफ से घेरकर मारने का था। जब हिन्दू सामने खड़े शत्रु से लड़ रहे थे तब बाबर की सेनाओं ने दोनों ओर से प्रहार करके हिन्दुओं को पराजित कर दिया।

बाबर घोड़े पर सवार था जबकि महाराणा अपने राज्यचिह्नों को धारण करके हाथी पर सवार हुआ। यह हिन्दू-पक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी थी। इससे बाबर के सैनिकों ने राणा को दूर से ही पहचान लिया और दूर से ही उस पर निशाना साध लिया।

युद्ध में सांगा की हार का एक कारण यह भी था कि युद्ध आरम्भ होते ही सलहदी और खानजादा सांगा का पक्ष छोड़कर बाबर की तरफ भाग गए। विभिन्न ख्यातों के संदर्भ से कविराजा श्यामलदास ने अपने ग्रंथ वीरविनोद में लिखा है कि युद्ध आरम्भ होते ही रायसेन का मुस्लिम शासक सलहदी महाराणा सांगा का पक्ष त्यागकर बाबर की तरफ चला गया।

कर्नल टॉड तथा हरबिलास सारड़ा ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है। डॉ. के. एस. गुप्ता तथा उनके साथी लेखकों ने लिखा है कि जब राणा सांगा घायल हो गया तब रायसेन का मुस्लिम शासक सलहदी तथा नागौर का मुस्लिम शासक खानजादा, महाराणा सांगा का पक्ष त्यागकर बाबर से जा मिले। सलहदी और खानजादा ने बाबर को बताया कि सांगा युद्ध-क्षेत्र में घायल होकर मूर्च्छित हो गया है। इस कारण सांगा को युद्ध-क्षेत्र में से निकाल लिया गया है।

गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने सलहदी द्वारा सांगा का पक्ष त्यागकर बाबर के पक्ष में जाने को स्वीकार नहीं किया है। अंग्रेज इतिहासकारों रशब्रुक विलियम्स, अर्सकिन तथा स्टेन्ली लेनपूल ने भी इस मत का विरोध किया है कि सलहदी बाबर से मिल गया था। सलहदी अपने जन्म के समय पंवार राजपूत था किंतु बाद में किसी काल में मुसलमान हो गया था। बाबर ने उसका नाम सलाहुद्दीन लिखा है।

उसका पुत्र भूपत राव संभवतः हिन्दू ही बना रहा था। कहा नहीं जा सकता कि जिस समय सलहदी सांगा का पक्ष त्यागकर बाबर की तरफ गया उस समय भूपतराव ने क्या निर्णय लिया किंतु इस बात की संभावना अधिक है कि भूपतराव सांगा के पक्ष में बना रहा और युद्ध-क्षेत्र में लड़ते हुए काम आया।

सलहदी तथा खानजादा द्वारा सांगा का पक्ष छोड़कर बाबर की तरफ भागने का कारण यह प्रतीत होता है कि बाबर ने इस युद्ध को जेहाद घोषित किया था और अपनी सेनाओं को इस्लाम की सेना घोषित किया था। फिर भी इस युद्ध में कम से कम तीन बड़े मुस्लिम सेनापति राणा सांगा की तरफ से लड़े। इनमें मेवात का शासक हसन खाँ मेवाती, सिकंदर लोदी का पुत्र महमूद खाँ तथा रायसेन का शासक सलहदी सम्मिलित थे। ये लोग खानवा के मैदान में सांगा की सहायता करके अपने राज्यों की मुक्ति का मार्ग खोलना चाहते थे।

इन तीन मुस्लिम सेनापतियों में से केवल हसन खाँ मेवाती वीरतापूर्वक लड़ते हुए रणक्षेत्र में काम आया। सलहदी और खानजादा की गद्दारी हसन खाँ मेवाती को अपने निश्चय से नहीं डिगा सकी। सिकंदर लोदी का पुत्र महमूद खाँ लोदी युद्ध-क्षेत्र से पलायन कर गया। सलहदी तो युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले ही सांगा को छोड़कर बाबर से जा मिला था।

बाबर ने हिन्दुओं पर विजयचिह्न के तौर पर शत्रु सैनिकों के सिरों की एक मीनार बनवाई। इसके बाद बाबर बयाना की ओर चला। अब वह राणा के देश पर चढ़ाई करना चाहता था किंतु ग्रीष्म ऋतु का आगमन जानकर उसने यह विचार त्याग दिया।                                                      

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराणा सांगा की शपथ (32)

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महाराणा सांगा की शपथ

जब मेवाड़ी सरदार युद्धक्षेत्र में बेहोश हो गए सांगा को युद्धक्षेत्र से बाहर निकाल लाए। होश में आने पर महाराणा सांगा को बहुत दुख हुआ। उसने अपने सरदारों को बहुत कोसा तथा फिर से लड़ने के लिए तैयार हो गया। महाराणा की शपथ थी कि वह बाबर को जीते बिना चित्तौड़ वापस नहीं जाएगा! 

बंदूकों और तोपों तथा तूलगमा टुकड़ियों के बल पर बाबर ने खानवा का युद्ध जीत लिया तथा महाराणा सांगा के घायल हो जाने के कारण सांगा के सामंत सांगा को युद्ध-क्षेत्र से बाहर ले गए। बाबर तोपों और बंदूकों के बल पर ही काबुल से आगरा तक आया था किंतु खानवा के मैदान में मिली जीत उसके लिए अप्रत्याशित थी। सलहदी के 30 हजार सैनिकों का युद्ध-क्षेत्र में सांगा को छोड़कर बाबर की तरफ जाना भी बाबर की विजययात्रा में मील का पत्थर सिद्ध हुआ था।

बाबर ने लिखा है- ‘शत्रुओं को पराजित करके हमने उन्हें एक-एक करके घोड़ों से गिराते हुए उनका पीछा किया। काफिरों का शिविर हमारे शिविर से दो कोस दूरी पर रहा होगा। हमने सांगा के शिविर में पहुंच कर मुहम्मदी, अब्दुल अजीज, अली खाँ तथा कुछ अन्य लोगों को सांगा का पीछा करने के लिए भेजा।’

बाबर ने पश्चाताप करते हुए लिखा है- ‘काफिर के शिविर से लगभग एक कोस आगे निकल जाने के उपरांत दिन का अंत हो गया। इस कारण मैं लौट आया। मैंने सांगा का पीछा करने में थोड़ी शिथिलता कर दी। मुझे स्वयं जाना चाहिए था और जिस कार्य की मुझे इच्छा थी, उसे अन्य लोगों पर नहीं छोड़ना चाहिए था। मैं अपने शिविर में सोने के समय की नमाज के वक्त पहुंचा।’

बाबर ने लिखा है- ‘मुहम्मद शरीफ ज्योतिषी ने मेरी पराजय की भविष्यवाणी करके मुझे परेशानी और चिंता में डाल दिया था किंतु वह मुझे बधाई देने के लिए आया। मैंने उसे बहुत सारी गालियां देकर उसे खूब अपमानित किया किंतु उसकी पिछली सेवाओं का विचार करके उसे एक लाख मुद्राएं दीं तथा उससे कहा कि अब वह मेरा राज्य छोड़कर चला जाए। मेरे राज्य में न ठहरे।’

अगले दिन बाबर ने खानवा में ही पड़ाव किया तथा खानवा की पहाड़ी पर हिन्दुओं के कटे हुए सिरों की मीनार बनवाकर गाजी की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है काफिरों पर बिजली गिराने वाला या काफिरों पर बिजली बनकर गिरने वाला।

शेख जैनी ने लिखा है कि खानवा की जीत के बाद शाही तुगरा में बाबर को गाजी लिखा जाने लगा। बाबर ने लिखा है कि फतहनामा के तुगरा के नीचे मैंने यह रुबाई लिखी-

इस्लाम के लिए मैं वनों में चक्कर लगाता रहा।

काफिरों तथा हिन्दुओं से युद्ध की तैयारी करता रहा।

मैंने शहीदों के समान मरना निश्चय किया

अल्लाह को धन्यवाद है, मैं गाजी हो गया।

कुछ समय बाद जब बाबर ने राजपूतों के विरुद्ध कई युद्ध जीत लिए तब उसने भारत के क्षत्रियों का विश्लेषण करते हुए लिखा- ‘राजपूत मरना जानते हैं पर जीतना नहीं जानते!’ खानवा के मैदान से भी केवल यही कटु-सत्य सामने आया था। खानवा में राजपूत बड़ी संख्या में मृत्यु को प्राप्त हुए किंतु जीत नहीं सके!

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उधर जब मूर्च्छित महाराणा को लेकर उसके सामंत आम्बेर राज्य में स्थित बसवा गांव में पहुंचे, तब महाराणा सचेत हुआ और उसने अपने मंत्रियों से पूछा कि सेना की क्या हालत है तथा विजय किसकी हुई? अपने सामंतों से युद्ध-क्षेत्र का समस्त वृत्तांत सुनकर महाराणा ने अपने मंत्रियों एवं सेनापतियों पर रोष प्रकट किया कि वे उसे युद्धस्थल से इतना दूर क्यों ले आए हैं! सांगा ने अपने मंत्रियों एवं सेनापतियों को आदेश दिया कि यहीं डेरा डाल दें तथा बाबर से पुनः युद्ध की तैयारी आरम्भ करें। महाराणा की शपथ थी कि जब तक बाबर को विजय न कर लूंगा, चित्तौड़ नहीं लौटूंगा। राणा अपनी सेना एवं सामंतों को लेकर बसवा से रणथंभौर चला गया। अपनी पराजय के कारण महाराणा बहुत उदास रहा करता था। एक दिन टोडरमल चांचल्या नामक एक चारण सांगा के पास आया। उसने महाराणा को एक गीत सुनाया जिसमें महाभारत एवं रामायण के महान् योद्धाओं पर आए संकटों के बारे में बताया गया था। इस गीत को सुनकर महाराणा के मन में फिर से उत्साह का संचार हुआ तथा उसने चारण को एक गांव पुरस्कार में दिया। महाराणा सांगा की शपथ थी और पक्की हो गई।

जनवरी 1528 में बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण करने का निश्चय किया। पाठकों को स्मरण होगा कि चंदेरी का किला महाराणा सांगा के अधीन था और उसने मेदिनीराय को चंदेरी का शासक नियुक्त किया था। बाबर कालपी, इरिच और खजवा होता हुआ 19 जनवरी 1528 को चंदेरी पहुंचा।

जब राणा सांगा को सूचना मिली कि बाबर चंदेरी पहुंच गया है तो सांगा ने भी बाबर के पीछे चंदेरी जाने का निर्णय लिया ताकि बाबर से अपनी पराजय का बदला लिया जा सके तथा महाराणा की शपथ पूरी हो सके। कुछ ही समय में सांगा भी कालपी के निकट इरिच गांव पहुंच गया।

कविराज श्यामलदास ने वीरविनोद में, हर विलास सारड़ा ने महाराणा सांगा में, गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने उदयपुर राज्य का इतिहास में लिखा है कि इरिच में सांगा के साथी राजपूतों ने जो नए युद्ध के विरोधी थे, सांगा को फिर से युद्ध में प्रवष्टि होता देखकर उसे विष दे दिया। विष का प्रभाव बढ़ता देखकर राणा के मंत्री एवं सामंत सांगा को लेकर वापस रणथंभौर लौटने लगे किंतु 30 जनवरी 1528 को कालपी में सांगा की मृत्यु हो गई। महाराणा सांगा की शपथ अधूरी रह गई।

इस प्रकार उस समय के सबसे प्रतापी हिन्दूपति महाराणा सांगा की जीवन-लीला का अंत हुआ। डॉ. के. एस. गुप्ता ने लिखा है कि राणा सांगा का स्वास्थ्य पुनः खराब हो जाने से सांगा का निधन हुआ। वीरविनोद में महाराणा की मृत्यु अप्रेल 1527 में होनी लिखी है जो कि स्वीकार्य नहीं है। चतुरकुल चरित्र में महाराणा की मृत्यु 30 जनवरी 1528 को होनी लिखी है, यह तिथि सत्य जान पड़ती है।

महाराणा की पार्थिव देह माण्डलगढ़ लाई गई और वहीं उसका अंतिम संस्कार किया गया। अमरकाव्य के अनुसार महाराणा का निधन कालपी में हुआ तथा माण्डलगढ़ में दाहक्रिया हुई। कविराज श्यामलदास ने खानवा के युद्ध-क्षेत्र से महाराणा को बसवा में लाये जाने, बसवा में ही निधन होने एवं बसवा में ही अंतिमक्रिया होने का उल्लेख किया है। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अमर काव्य के विवरण को सही माना है। अर्थात् महाराणा की मृत्यु कालपी में हुई तथा अंतिम क्रिया माण्डलगढ़ में हुई।

महाराणा की मृत्यु होते ही दिल्ली की सल्तनत पर बाबर का अधिकार पक्का हो गया। भारत में अब बाबर का मार्ग रोक सकने योग्य कोई शक्ति शेष न रही। खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा की पराजय ने भारत का इतिहास बदल दिया।

यदि बाबर का आगमन न हुआ होता तो इस बात की पूरी संभावना थी कि महाराणा संग्रामसिंह दिल्ली पर अधिकार कर लेता और जो दिल्ली, पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद तुर्कों के अधिकार में चली गई थी, एक बार पुनः हिन्दुओं के पास आ जाती किंतु भारत के भाग्य में ऐसा होना लिखा नहीं था!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया! (33)

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खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया

खानवा के युद्ध में हिन्दू राजाओं के पास एक अवसर था जब वे म्लेच्छों के शासन से सदैव के लिए मुक्ति पा सकते थे किंतु हिन्दुओं की पुरानी युद्ध पद्धति ने तथा महाराणा सांगा द्वारा सलहदी तथा खानजादा जैसे मुसलमान राजाओं पर भरोसा किए जाने की भूल ने यह अवसर खो दिया। खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया!

जब महाराणा सांगा का कालपी में निधन हो गया तो राजपूतों का संघ बिखर गया। सांगा के बाद राजपूतों का नेतृत्व करने वाला कोई प्रभावशाली हिन्दू नरेश नहीं रहा। इस कारण हिन्दुओं के प्रभाव को बड़ा धक्का लगा और पास-पड़ौस के मुसलमान राज्यों में राजपूतों का भय समाप्त हो गया।

इब्राहीम लोदी के समय में लोदी-सल्तनत के कमजोर पड़ जाने के समय से ही हिन्दू-शासक उत्तरी भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने का स्वप्न देख रहे थे किंतु खानवा के मैदान में हिन्दू-राजाओं की हार के कारण वह स्वप्न बिखर गया। भारत पर राज्य करने के लिए तुर्क भले ही जीवित नहीं बचे थे किंतु अब उनका स्थान मुगलों ने ले लिया।

इस प्रकार खानवा की पराजय हिन्दुओं के लिए अतीत में हो चुकी एवं भविष्य में होने वाली ढेर सारी पराजयों की तरह एक सामान्य पराजय नहीं थी अपितु यह एक युगांतकारी पराजय थी। इस युद्ध में पराजय के कारण हिन्दू नरेशों के हाथों से हिन्दुस्तान का राज्य मुट्ठी में बंद रेत की तरह फिसल गया। खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया!

यह पराजय इतनी ही दुर्भाग्यपूर्ण थी जितनी कि ई.1192 में हुई सम्राट पृथ्वीराज चौहान की पराजय, जितनी कि ई.1556 में हुई दिल्ली के हिन्दू सम्राट विक्रमादित्य हेमचंद्र की पराजय, जितनी कि ई.1761 में हुई मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ की पराजय।

खानवा युद्ध की पराजय के बाद राजपूताना एक बार फिर असुरक्षित हो गया और उस पर पास-पड़ोस के राज्यों के आक्रमण आरम्भ हो गये। राजपूताना की स्वतन्त्रता फिर से खतरे में पड़ गई। खानवा युद्ध ने भारत में विशाल मुगल साम्राज्य की स्थापना का मार्ग खोल दिया। अब बाबर की रुचि अफगानिस्तान से समाप्त होकर पूरी तरह भारत में हो गई।

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खानवा विजय के उपरान्त बाबर बयाना चला गया। उन दिनों बयाना को राजपूताने का दरवाजा कहा जाता था जहाँ से बाबर राजपूताना के भीतर घुसना चाहता था परन्तु भीषण गर्मी के कारण वह अलवर से आगे नहीं बढ़ सका। चूंकि हसन खाँ मेवाती की मृत्यु हो चुकी थी और उसके पुत्र नाहर खाँ को बाबर ने फिर से बंदी बना लिया था, इसलिए मेवात की रक्षा करने वाला कोई नहीं था। यही कारण था कि बाबर ने थोड़े से ही प्रयास से मेवात पर अधिकार कर लिया। बाबर ने लिखा है कि मेवात से सालाना चार करोड़ रुपए मालगुजारी प्राप्त होती थी। सांगा से मुक्ति पाने के बाद बाबर को अपने पक्ष की आंतरिक समस्याओं पर ध्यान देने का समय मिला। बाबर ने बदख्शां, काबुल, कांधार, गजनी एवं मध्य-एशिया के अन्य देशों से अपने साथ आए सिपाहियों से वायदा किया था कि जब खानवा का युद्ध समाप्त हो जाएगा, तब जो भी सिपाही अपने देश जाना चाहेगा, उसे लौटने की अनुमति दी जाएगी। अब वे सिपाही फिर से अपने देश जाने की मांग करने लगे। इस पर बाबर ने हुमायूँ को आदेश दिया कि वह इन सिपाहियों को अपने साथ लेकर काबुल चला जाए।

इसका कारण यह था कि बाबर की सेना में अधिकांश सैनिक बदख्शां तथा उसके आसपास के क्षेत्रों के रहने वाले थे और वे किसी भी कीमत पर भारत में रहने को तैयार नहीं थे।

बाबर का दायां हाथ समझा जाने वाला महदी ख्वाजा भी अपने देश लौट जाने को बड़ा व्याकुल था। उसे भी काबुल जाने की अनुमति दी गई। महदी ख्वाजा के पुत्र जाफर ख्वाजा ने भारत में रहना स्वीकार किया इसलिए उसे इटावा का गवर्नर नियुक्त किया गया। खानवा के युद्ध के बाद बाबर ने फतहनामा लिखवाया जिसमें उसने अपनी भारत- विजय का वर्णन विस्तार से करवाया तथा उसे मोमिन अली तवाची के साथ काबुल भेजा गया।

बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में लिखा है- ‘इस दौरान हसन खाँ मेवाती का पुत्र नाहर खाँ अब्दुर्रहीम की निगरानी से भाग गया।’

बाबर ने चंदवार तथा रापरी के लिए कुछ सैनिक टुकड़ियां रवाना कीं जहाँ इन स्थानों के पुराने तुर्क शासकों ने बाबर को खानवा के युद्ध में व्यस्त जानकर अधिकार कर लिया था। कुछ ही दिनों में चंदवार तथा रापरी फिर से बाबर के अधीन हो गए।

इटावा पर भी कुतुब खाँ ने अधिकार कर लिया था किंतु जब उसे ज्ञात हुआ कि महदी ख्वाजा का पुत्र जाफर ख्वाजा इटावा आ रहा है तो कुतुब खाँ इटावा छोड़कर भाग गया। इस प्रकार इटावा भी पुनः बाबर के अधिकार में आ गया।

बाबर ने सुल्तान मुहम्मद दूल्दाई को कन्नौज का गवर्नर नियुक्त किया था किंतु कन्नौज वालों ने उसे मारकर भगा दिया। इस पर बाबर ने दूल्दाई को सरहिंद का गवर्नर नियुक्त कर दिया तथा कन्नौज मुहम्मद सुल्तान मिर्जा को प्रदान कर दिया। कासिम हुसैन सुल्तान को बदायूं का गवर्नर नियुक्त किया गया।

मेवात पर विजय प्राप्त करने के बाद बाबर सम्भल गया और वहाँ से चन्देरी पर आक्रमण करने की योजनाएँ बनाने लगा। चन्देरी का दुर्ग चन्देरी नगर के सामने 230 फुट ऊँची चट्टान पर स्थित था। यह दुर्ग मालवा तथा बुन्देलखण्ड की सीमाओं पर स्थित था और मालवा से राजपूताना जाने वाली सड़क पर बना हुआ था। इस कारण चंदेरी व्यापारिक तथा सामरिक दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। चन्देरी दुर्ग पर इन दिनों राणा सांगा के दुर्गपति मेदिनी राय का अधिकार था तथा चन्देरी नगर में बहुत से धनपति रहते थे।

राणा सांगा की पराजय के बाद भी मेदिनी राय ने बाबर के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं किया था। इसलिए जनवरी 1528 में बाबर अपनी सेना के साथ चन्देरी पहुँचा। बाबर ने अपने सैनिकों को युद्ध के लिये प्रेरित करने हेतु इस युद्ध को भी ‘जेहाद’ का नाम दिया।

बाबर ने चन्देरी के दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। राजपूतांे ने अपनी पराजय निश्चित जानकर अपनी स्त्रियों को मौत के घाट उतार दिया तथा मरते दम तक मुगलों का सामना करते हुए रणखेत रहे। भीषण युद्ध के उपरान्त बाबर ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में भी राजपूतों का भीषण संहार हुआ। अहमदशाह को चन्देरी का शासक नियुक्त किया गया। राजा मेदिनी राय की दो कन्याएँ इस युद्ध में पकड़ी गईं जिनमें से एक कामरान को और दूसरी हुमायूँ को भेजी गई।

बाबर ने मेदिनी राय की कन्याओं के पकड़े जाने का उल्लेख नहीं किया है। वह लिखता है- ‘जब मेरे सैनिक मेदिनीराय के घर में घुसे तो उन्होंने देखा कि मेदिनीराय के आदमी मेदिनीराय के घर के सदस्यों की हत्या कर रहे थे। एक आदमी हाथ में तलवार लेकर खड़ा होता था और घर के सदस्य उस तलवार के नीचे गर्दन रखकर गर्दन कटवाते थे।’ यहाँ बाबर ने आधा सत्य बोला है। वस्तुतः मेदिनी राय के आदेश से उसके परिवार की महिलाओं की गर्दनें काटी गई थीं ताकि वे शत्रु के हाथों में न पड़ें और दुर्गति होने से बच सकें।

चंदेरी विजय बाबर की बड़ी विजयों मे से एक मानी जाती है। यहाँ से बाबर को विपुल धन राशि प्राप्त हुई। इस प्रकार पानीपत, चंदेरी एवं खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर की बेगमें और बेटे एक-एक करके हिन्दुस्तान आने लगे (34)

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बाबर की बेगमें और बेटे एक-एक करके हिन्दुस्तान आने लगे

बाबर ने पानीपत, खानवा एवं चंदेरी के युद्धों में जीत हासिल करके भारत में अपना राज्य जमा लिया था किंतु उसका परिवार अभी तक अफगानिस्तान में था। इसलिए बाबर ने अपने परिवार को भारत बुलाने का निश्चय किया। इस कारण बाबर की बेगमें और बेटे एक-एक करके हिन्दुस्तान आने लगे।

खानवा का युद्ध जीतने के बाद बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण किया। चंदेरी का शासक मेदिनीराय इस युद्ध में काम आया जो महाराणा सांगा का सामंत था। चंदेरी से अवकाश पाकर बाबर ने उन क्षेत्रों पर फिर से अधिकार कर लिया जो उसकी खानवा एवं चंदेरी युद्धों की व्यस्तताओं के कारण अफगानों ने दबा लिए थे।

पाठकों को स्मरण होगा कि बाबर ने हुमायूँ को बदख्शां के सैनिकों के साथ अफगानिस्तान लौट जाने की आज्ञा दी थी। बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘मुझे सूचना मिली कि हुमायूँ ने दिल्ली पहुंचकर दिल्ली के किले में रखा खजाना खुलवाया तथा उसमें से बहुत सा खजाना मेरी अनुमति के बिना अपने अधिकार में ले लिया। मुझे हुमायूँ से ऐसी आशा नहीं थी। इसलिए मैंने हुमायूँ को बड़ी कठोर चिट्ठियां लिखकर उसे भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी दी।’

बाबर ने अपनी पुस्तक में अपनी सेना में नियुक्त तरदी बेग खाकसार नामक एक सेनापति का उल्लेख किया है जो एक दरवेश था और बाबर के कहने से दरवेश का जीवन त्यागकर सैनिक बन गया था किंतु अब वह फिर से दरवेश बनना चाहता था। बाबर ने उसे ऐसा करने की अनुमति दे दी तथा उसे अपना राजदूत नियुक्त करके कामरान के पास कांधार भेज दिया।

बाबर ने उसके हाथों कामरान के लिए 3 लाख रुपए भी भिजवाए। अब बाबर ने कभी भी काबुल या कांधार न लौटने तथा आगरा में ही रहने का निश्चय कर लिया था इसलिए उसने अपनी बेगमों को संदेश भिजवाया कि वे आगरा आ जाएं। बाबर का परिवार बहुत लम्बा-चौड़ा था। बाबर की कई बेगमें थीं जिनमें आयशा सुल्तान बेगम, जैनब सुल्तान बेगम, मासूमा सुल्तान बेगम, बीबी मुबारिका, गुलरुख बेगम, दिलदार बेगम, गुलनार बेगम, नाजगुल अगाचा तथा सलिहा सुल्तान बेगम के नाम मिलते हैं।

इन बेगमों से बाबर को ढेर सारी औलादें प्राप्त हुईं। इनमें हुमायूँ मिर्जा, कामरान मिर्जा, हिंदाल मिर्जा, अस्करी मिर्जा, अहमद मिर्जा, शाहरुख मिर्जा, बरबुल मिर्जा, अलवार मिर्जा, फारूख मिर्जा, फख्रउन्निसा बेगम, ऐसान दौलत बेगम, मेहर जहान बेगम, मासूमा सुल्तान बेगम, गुलजार बेगम, गुलरुख बेगम, गुलबदन बेगम, गुलचेहरा बेगम तथा गुलरांग बेगम के नाम प्रमुखता से मिलते हैं। इनमें से कुछ पुत्रों एवं पुत्रियों की मृत्यु बाबर के जीवनकाल में हो गई थी। बाबर की कुछ बेगमों एवं पुत्रियों के नाम एक जैसे मिलते हैं।

यद्यपि बाबर का परिवार बहुत बड़ा था तथापि बाबर अपने परिवार से बहुत प्रेम करता था। इसका एक बहुत बड़ा कारण यह था कि बाबर की तरह बाबर के परिवार ने भी जीवन भर अनेक कष्ट सहे थे और दर-दर की ठोकरें खाई थीं किंतु हर हालत में बाबर का साथ दिया था। इन बेगमों के अतिरिक्त बाबर की बहिनें, बुआएं, मौसियां, मामियां आदि भी बाबर के साथ ही रहती थीं।

बाबर का पिता बहुत कम आयु में अचानक ही मृत्यु को प्राप्त हो गया था। इसलिए वह बाबर की बहिनों का विवाह नहीं कर सका था। बाबर स्वयं भी 11 वर्ष की आयु से ही युद्धों में व्यस्त हो गया था इस कारण उसे भी अपनी बहिनों एवं पुत्रियों का विवाह करने का अवसर नहीं मिला था। बाबर की कुछ विधवा बुआएं, मौसियां एवं मामियां भी बाबर के हरम में रहा करती थीं। इनमें से कइयों की पुत्रियों के साथ बाबर ने विवाह कर लिए थे।

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बाबर को अपने पुत्रों से विशेष स्नेह था क्योंकि बाबर के बेटों ने भी बाबर की तरह ही बहुत कम आयु में जिम्मेदारियों का बोझ अपने कंधों पर ले लिया था और कदम-कदम पर अपने पिता का साथ दिया था। इनमें हुमायूँ तथा कामरान प्रमुख थे। जब बाबर काबुल, कांधार, गजनी तथा बदख्शां पर अधिकार करने में सफल हो गया तो उसने हुमायूँ को बदख्शां का और कामरान को कांधार का गवर्नर नियुक्त किया था। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने लिखा है कि सबसे पहले 23 नवम्बर 1527 को दादी बेगमें फख्रेजहाँ बेगम तथा खदीजा सुल्तान बेगम का भारत आगमन हुआ। बादशाह उनके स्वागत के लिए सिकंदराबाद में उपस्थित हुआ। बाबर ने भी अपने संस्मरणों में बेगमों के प्रथम दल के आगमन की यही तिथि दी है। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि राणा सांगा पर विजय के एक वर्ष बाद आकाम माहम बेगम काबुल से हिन्दुस्तान आई। मैं भी उन्हीं के साथ अपनी बहिनों के आगे ही आकर अपने पिता से मिली। जब आकाम आगरा से कुछ दूरी पर स्थित अलीगढ़ पहुंची तब बादशाह ने दो पालकी तीन सवारों के साथ भेजीं।

जब बादशाह को समाचार मिला कि आकाम बेगम आगरा के निकट पहुंच गई है, तब बाबर पैदल ही बेगम की अगवानी के लिए रवाना हो गया तथा पैदल चलकर ही बेगम को अपने महल तक लाया, बेगम अपनी पालकी में बैठी रही।

आकाम के साथ सौ मुगलानी दासियां अच्छे घोड़ों पर सवार होकर आई थीं और बेहद सजी-धजी थीं। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम तथा उसकी कुछ अन्य बहिनें भी इसी दल के साथ हिन्दुस्तान आई थीं किंतु उन्हें एक बाग में रोक दिया गया और अगले दिन बादशाह के समक्ष प्रस्तुत होने को कहा गया। बाबर ने अगले दिन अपने मंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा को उसकी औरत के साथ शहजादियों की अगवानी करने भेजा।

बेगमों के इस दल के आगरा पहुंचने के कुछ दिन बाद ही बेगमों का एक और दल काबुल से आगरा पहुंचा। इस दल में बाबर की बड़ी बहिन खानजाद बेगम थी जिसका नाम आकः जानम था। अपनी बड़ी बहिन के स्वागत के लिए बाबर आगरा से चलकर नौग्राम तक गया। आकः जानम के साथ बाबर के कुल की बहुत सी बेगमें आई थीं जिनमें बाबर की मौसियां, मामियां, ताइयां आदि शामिल थीं। बाबर इन सबको बड़े प्रेम से आगरा लेकर आया और उन्हें रहने के लिए आवास प्रदान किए।

18 सितम्बर 1528 को बाबर का पुत्र मिर्जा अस्करी भी बाबर के आदेश पर भारत आ गया। इस समय तक मिर्जा अस्करी 12 साल का हो चुका था। बाबर ने उसे मुल्तान का गवर्नर नियुक्त किया। संभवतः अस्करी को मुल्तान में नियुक्त किए जाने से कुछ समय पहले ही कामरान की नियुक्ति कांधार से मुल्तान की जा चुकी थी किंतु अब बाबर ने कामरान की जगह अस्करी को मुल्तान का गवर्नर बनाया और कामरान को काबुल का गवर्नर बनाकर भेज दिया। इस समय हुमायूँ बदख्शां के गवर्नर के पद पर नियुक्त था और बाबर के आदेश पर बदख्शां में ही निवास कर रहा था।

बाबर ने लिखा है कि 15 अक्टूबर 1528 को मैंने आगरा पहुंचकर खदीजा बेगम से भेंट की तथा 17 अक्टूबर 1528 को अपनी तीन दादी बेगमों गौहर शाद बेगम, बदी उल जमाल बेगम तथा आकः बेगम और अन्य छोटी बेगमों सुल्तान मसऊद मिर्जा की पुत्री खानजादा बेगम, सुल्तान बख्त बेगम की पुत्री मेरी यीनका और जैनम सुल्तान बेगम से भेंट की। अर्थात् इस समय तक लगभग सारी बेगमें काबुल से भारत आ चुकी थीं। बाबर ने लिखा है कि वह मुगल बेगमों को आगरा, सीकरी, धौलपुर एवं बयाना आदि स्थानों पर बाबर द्वारा बनवाए गए बगीचे, पानी के हौज तथा भवन आदि दिखाने ले गया।

एक दिन बाबर ने बेगमों के सामने उस्ताद अली कुली द्वारा बनाई गई विशाल तोप का प्रदर्शन करवाया जो बहुत दूरी तक पत्थर के गोले फैंकती थी। प्रदर्शन के दौरान यह तोप फट गई जिससे आठ सैनिकों की मृत्यु हो गई किंतु फटने से पहले तोप ने पत्थर का गोला काफी दूरी तक फैंक दिया था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फजल अब्बास कलंदर ने बाबर से अयोध्या में मस्जिद बनाने को कहा (35)

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फजल अब्बास कलंदर ने बाबर से अयोध्या में मस्जिद बनाने को कहा

फकीर फजल अब्बास कलंदर ने कहा कि जन्मस्थान मंदिर तुड़वा कर मेरी नमाज के लिए एक मस्जिद बनवा दो। बाबर ने कहा कि मैं आपके लिए इसी मंदिर के पास एक मस्जिद बनवा देता हूँ। इस पर फकीर फजल अब्बास कलंदर ने कहा मैं इस मंदिर को तुड़वाकर उसकी जगह मस्जिद बनवाना चाहता हूँ। तू न मानेगा तो मैं तुझे बद्दुआ दूंगा। बाबर को फकीर की बात माननी पड़ी।

खानवा और चंदेरी के युद्धों से निबटकर बाबर ने हुमायूँ को बदख्शां का, कामरान को काबुल का तथा मिर्जा अस्करी को मुल्तान का गवर्नर नियुक्त कर दिया और स्वयं आगरा में रहने लगा। अब बाबर ने अपने हरम में रहने वाली कई पीढ़ियों की बहुत सारी बेगमों और शहजादियों को भारत बुला लिया।

पाठकों को स्मरण होगा कि पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की मृत्यु के बाद उसका भाई मुहम्मद खाँ लोदी अपने बाप-दादों के राज्य को मुक्त करवाने के लिए संघर्ष कर रहा था। लोदियों के समय के बहुत से अफगान गवर्नर भी अपने-अपने प्रांतों पर फिर से कब्जा करने के लिए प्राण-प्रण से जूझ रहे थे। यही कारण था कि पंजाब एवं सिंध से लेकर बदायूं, रापरी, कन्नौज एवं बिहार तक के विशाल क्षेत्र में अफगान स्थान-स्थान पर बाबर की सेनाओं से युद्ध कर रहे थे।

महमूद खाँ लोदी, दिल्ली के मरहूम सुल्तान सिकन्दर लोदी का पुत्र और दिल्ली के मरहूम सुल्तान इब्राहीम लोदी का भाई था। पानीपत के युद्ध के उपरान्त हसन खाँ मेवाती तथा राणा सांगा ने महमूद खाँ लोदी को इब्राहीम लोदी का उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया था। खानवा के युद्ध में वह बाबर के विरुद्ध लड़ा भी था और परास्त होकर कुछ दिनों के लिये मेवाड़ चला गया जहाँ से वह बिहार पहुँचा और अफगानों को मुगलों के विरुद्ध संगठित करने लगा।

बाबर भारत में अब तक पंजाब, दिल्ली, खानवा, मेवात तथा चन्देरी सहित अनेक युद्ध जीत चुका था। अब वह रायसेन, भिलसा, सारंगपुर तथा चित्तौड़ पर आक्रमण करना चाहता था परन्तु इसी समय उसे कन्नौज की तरफ से अफगानों के बड़े उपद्रव की सूचना मिली।

इसलिये बाबर अपनी योजना बदल कर अफगानों के दमन के लिए चल पड़ा। बहुत से अफगान सेनापति भयभीत होकर बिहार तथा बंगाल की ओर भाग गये और महमूद खाँ लोदी की अध्यक्षता में संगठित होने लगे।

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मारूफ का पुत्र भी बाबर की सेना आने से पहले ही भाग खड़ा हुआ। बिबन, बायजीद तथा मारूफ गंगाजी के पूर्वी घाट पर कन्नौज के सामने बाबर का मार्ग रोककर खड़े हो गए। इस पर बाबर की सेना ने गंगाजी पर पुल बनाने का निर्णय लिया। अफगान अमीरों को गंगाजी पर पुल बनाने का बाबर का विचार बड़ा ही हास्यास्पद प्रतीत हुआ इसलिए वे बाबर की खिल्ली उड़ाने लगे और पुल बनाने वालों पर तीर फैंकने लगे। अफगानों को पुल के काम में बाधा उत्पन्न करने से रोकने के लिए उस्ताद अली कुली ने गंगाजी के किनारे पत्थर फैंकने की तोपें लगा दीं। मुस्तफा रूमी ने भी जर्जबन की गाड़ियां पुल के आसपास तैनात कर दीं तथा बंदूकचियों को भी पुल का निर्माण करने वालों की रक्षा पर तैनात किया। बाबर की जीवनी पढ़ने से ऐसा लगता है कि उस काल में जो मशीन पत्थर फैंकती थी, उसे तोप कहा जाता था और जो मशीनें बारूद फैंकती थीं, उन्हें फिरंगी और जर्जबन कहा जाता था। बंदूकों को तुफंग कहा जाता था।

उस्ताद अली कुली ने गाजी नामक तोप का निर्माण किया जो पत्थर दागने में बड़ी सफल मानी गई। इस तोप ने राणा सांगा के विरुद्ध खानवा के मैदान में भी कहर ढाया था। उस्ताद अली ने एक और बड़ी तोप बनाई थी जो बेगमों के सामने किए गए प्रदर्शन के दौरान फट जाने से बेकार हो गई थी।

जब गंगाजी पर पुल बनकर तैयार हो गया तब 13 मार्च 1528 को बाबर की सेना उस पर चढ़कर पार हो गई। अफगानियों को आशा नहीं थी कि बाबर इतनी चौड़ी नदी पर पुल बनाने में सफल हो जाएगा। इसलिए वे बाबर की सेना को अपनी तरफ आता देखकर हैरान रह गए। फिर भी अफगान सेना किसी भी स्थिति से निबटने को तैयार थी। अफगान सेना हाथियों पर चढ़कर बाबर की सेना से लड़ने के लिए आई।

इस दौरान बाबर के बंदूकचियों ने अच्छा काम किया। उन्होंने अफगानियों को पीछे धकेल दिया और जो अफगान गोली लगने से घोड़ों से गिर गए थे, उनके सिर कलम कर दिए। 15 मार्च 1528 को बाबर की तोपगाड़ियों को भी नदी के पार उतार दिया गया। उस दिन बाबर ने युद्ध का नक्कारा बजाया जिसे सुनकर अफगानी भाग खड़े हुए।

चीन तीमूर तथा सुल्तान खाँ आदि अनेक सेनापतियों को आदेश दिया गया कि वे अपनी-अपनी टुकड़ियां लेकर अफगानियों का पीछा करें और उन्हें मौत के घाट उतारें। इन सभी सेनापतियों को आदेश दिया गया कि वे चीन तीमूर के आदेशों का पालन करें। बाबर इस बार कुछ ऊंट भी अपने साथ लाया था ताकि युद्ध का मैदान छोड़कर भाग रहे शत्रु का तेजी से पीछा किया जा सके। फिर भी बाबर की सेना अफगानियों का पीछा करने में विशेष सफलता प्राप्त नहीं कर सकी। इस विजय के बाद बाबर अयोध्या पहुंचा।

बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मार्च 1528 में बाबर अवध पहुंचा था किंतु बाबर ने यह नहीं लिखा है कि वह अवध क्यों गया था? बाबर की आत्मकथा में उल्लिखित अवध की यह यात्रा भारत के इतिहास को दिया गया ऐसा घाव है जिसका बाबर ने उल्लेख तक नहीं किया है किंतु लाला सीताराम बीए आदि कुछ लेखकों ने बाबर की इस यात्रा का विस्तार से वर्णन किया है।

लाला सीताराम बी ए ने अपनी पुस्तक अयोध्या का इतिहास में लिखा है कि ईस्वी 1528 में बाबर दलबल सहित अयोध्या की ओर बढ़ा और उसने घाघरा के संगम पर डेरा डाला। यह संगम अयोध्या से तीन कोस पूर्व में स्थित था। यहाँ वह एक सप्ताह तक आसपास के क्षेत्रों का प्रबंध करता रहा। एक दिन वह अयोध्या के फकीर फजल अब्बास कलंदर के दर्शन करने आया। उस कलंदर ने बाबर को एक चमत्कार दिखाया जिसे देखकर बाबर हैरान रह गया और प्रतिदिन फकीर के दर्शन को आने लगा।

एक दिन फकीर फजल अब्बास कलंदर ने कहा कि जन्मस्थान मंदिर तुड़वा कर मेरी नमाज के लिए एक मस्जिद बनवा दो। बाबर ने कहा कि मैं आपके लिए इसी मंदिर के पास एक मस्जिद बनवा देता हूँ। मंदिर तोड़ना मेरे उसूल के खिलाफ है। इस पर फकीर फजल अब्बास कलंदर ने कहा मैं इस मंदिर को तुड़वाकर उसकी जगह मस्जिद बनवाना चाहता हूँ। तू न मानेगा तो मैं तुझे बद्दुआ दूंगा। भयभीत बाबर को फकीर की बात माननी पड़ी और वह मीर बाकी को फकीर की इच्छा पूरी करने की आज्ञा देकर आगरा लौट गया।

‘तारीख पानीना मदीनतुल औलिया’ नामक पुस्तक में लिखा है कि बाबर अपनी किशोरावस्था में एक बार हिंदुस्तान आया था और अयोध्या के दो मुसलमान फकीरों से मिला था। एक का नाम फजल अब्बास कलंदर था और दूसरे का नाम मूसा अशिकान था।

बाबर ने इन फकीरों से प्रार्थना की कि मुझे आशीर्वाद दीजिए जिससे मैं हिन्दुस्तान का बादशाह बन जाऊं। फकीरों ने उत्तर दिया कि तुम जन्मस्थान मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनवाने की प्रतिज्ञा करो तो हम तुम्हारे लिए दुआ करें। बाबर ने फकीरों की बात मान ली और अपने देश को लौट गया। इतिहास गवाह है कि तारीख पानीना मदीनतुल औलिया में लिखी गई ये बातें बिल्कुल झूठी हैं। बाबर अपनी किशोरावस्था में कभी हिन्दुस्तान नहीं आया था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजगुरु देवीनाथ पांडे

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राजगुरु देवीनाथ पांडे

राजगुरु देवीनाथ पांडे ने श्रीराम जन्मभूमि हेतु पहला बलिदान दिया!

जिस समय बाबर के सेनापति मीर बाकी ने राममंदिर तोडने के लिए अयोध्या पर अभियान किया, उस समय राजगुरु देवीनाथ पांडे पहला व्यक्ति था जिसने सेना लेकर मीर बाकी का मार्ग रोका तथा अपने प्राणों का बलिदाऩ दिया।

बाबर मार्च 1528 में अफगानियों से लड़ने के लिए पूरब में गया तो उसने घाघरा के किनारे पर अपना शिविर लगाया तथा अयोध्या में रहने वाले फकीर फजल अब्बास कलंदर से मिला। कलंदर ने बाबर से कहा कि मेरे लिए अयोध्या में रामजन्म भूमि मंदिर के स्थान पर मस्जिद बनाई जाए।

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कुछ लेखकों के अनुसार यह अनुरोध फजल अब्बास कलंदर और मूसा अशिकान दोनों ने किया था। महात्मा बालकराम विनायक ने अपनी पुस्तक कनकभवन रहस्य में लिखा है- बाबर के शिया सेनापति मीर बाकी ने ई.1528 में अयोध्या की तरफ अभियान किया। 17 दिनों तक हिंदुओं से लड़ाई होती रही। अंत में हिन्दुओं की हार हुई।’ कुछ अन्य लेखकों ने लिखा है कि भाटी नरेश महताबसिंह तथा हँसवर नरेश रणविजयसिंह ने अयोध्या में मीरबाकी का मार्ग रोका। उनका नेतृत्व हँसवर के राजगुरु देवीनाथ पांडे ने किया। सर्वप्रथम राजगुरु ने ही अपनी सेना के साथ मीर बाकी पर आक्रमण किया। वह स्वयं भी तलवार हाथ में लेकर मीरबाकी के सैनिकों पर टूट पड़ा। मीरबाकी ने छिपकर राजगुरु देवीनाथ पांडे को गोली मारी। हिन्दू सैनिक तलवार लेकर लड़ रहे थे जबकि मीर बाकी ने तोपों का सहारा लिया। लखनऊ गजट के लेखक कनिंघम के अनुसार इस युद्ध में 1,74,000 हिन्दू सैनिकों ने प्राणों की आहुति दी। हिंदुओं से हुए युद्ध में मीर बाकी विजयी हुआ। उसने राम जन्मभूमि पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया।

कनिंघम द्वारा दी गई संख्या बहुत अधिक लगती है किंतु संभवतः यह संख्या मीर बाकी द्वारा अयोध्या पर आक्रमण किए जाने से लेकर कनिंघम द्वारा गजेटियर लिखे जाने तक हिंदुओं द्वारा दिए गए बलिदानों की कुल संख्या है। लाला सीताराम बीए ने लिखा है- ‘जब मीर बाकी ने जन्मभूमि मंदिर के भीतर प्रवेश करना चाहा तो मंदिर का पुजारी चौखट पर खड़ा होकर बोला कि मेरे जीते जी तुम भीतर नहीं जा सकते। इस पर बाकी झल्लाया और तलवार खींचकर उसे कत्ल कर दिया। जब मीर बाकी मंदिर के भीतर गया तो उसने देखा कि मूर्तियां नहीं हैं, वे अदृश्य हो गई हैं। वह पछताकर रह गया। कालांतर में लक्ष्मणघाट पर सरयूजी में स्नान करते हुए एक दक्षिणी ब्राह्माण को ये मूर्तियां मिलीं। वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसने स्वर्गद्वारम् मंदिर में उन मूर्तियों की स्थापना की।’

लाला सीताराम बीए ने लिखा है- ‘इस मंदिर के ठाकुर काले रामजी के नाम से प्रसिद्ध थे। इसमें एक बड़े काले पत्थर पर राम पंचायतन की पांच मूर्तियां खुदी हुई थीं। बाकी बेग ने मंदिर की ही सामग्री से मस्जिद बनवाई थी। मस्जिद के भीतर बारह और बाहर फाटक पर दो काले कसौटी पत्थर के स्तम्भ लगे हुए हैं। केवल वे स्तम्भ ही अब प्राचीन मंदिर के स्मारक रह गए हैं। इस मंदिर के चार स्तम्भ शाह की कब्र पर लगवाए गए थे जिनमें से दो स्तम्भ अब फैजाबाद के संग्रहालय में रखे हुए हैं।’

लाला सीताराम बीए ने लिखा है- ‘जब मूसा आशिकान मरने लगा तो उसने अपने चेलों से कहा कि जन्मस्थान मंदिर हमारे ही कहने से तोड़ा गया है, इसके दो खंभे बिछाकर हमारी लाश रखी जाए और दो खंभे हमारे सिरहाने गाड़ दिए जाएं। मूसा के चेलों द्वारा ऐसा ही किया गया। मीर बाकी ने इस ढांचे के फाटक पर तीन पंक्तियों का एक लेख लगवाया जिसमें लिखा था-

बनामे आँ कि दाना हस्त अकबर

कि खालिक जुमला आलम लामकानी।

हरूदे मुस्तफ़ा बाहज़ सतायश

कि सरवर अम्बियाए दोजहानी।

फिसाना दर जहाँ बाबर कलंदर

कि शुद दर दौरे गेती कामरानी।’

अर्थात्- उस अल्लाह के नाम से जो महान् और बुद्धिमान है, जो सम्पूर्ण जगत् का सृष्टिकर्ता और स्वयं निवास-रहित है। अल्लाह के बाद मुस्तफ़ा की कथा प्रसिद्ध है जो दोनों जहान और पैगम्बरों के सरदार हैं। संसार में बाबर और कलंदर की कथा प्रसिद्ध है जिससे उसे संसार-चक्र में सफलता मिलती है।

मस्जिद के भीतर भी तीन पंक्तियों का एक लेख था जिसमें लिखा गया था-

बकरमूद ऐ शाह बाबर कि अहलश

बनाईस्त ता काखे गरहूं मुलाकी।

बिना कर्द महबते कुहसियां अमीरे स आहत निशां मीर बाकी।

बुअह खैर बाकी यूं साले बिनायश।

अर्थात्- बादशाह बाबर की आज्ञा से जिसके न्याय की ध्वजा आकाश तक पहुंची है। नेकदिल मीर बाकी ने फरिश्तों के उतरने के लिए यह स्थान बनवाया है। उसकी कृपा सदा बनी रहे।

इस लेख के आधार पर माना जाता है कि इसमें वर्णित फरिश्तों के उतरने के स्थान का आशय रामजी की जन्मभूमि से है। जबकि मुसलमानों का मानना है कि यहाँ जिन फरिश्तों के उतरने के लिए स्थान बनाया गया है वह मस्जिद है न कि मंदिर। उनके अनुसार यह स्थान इस्लाम में वर्णित उन फरिश्तों से सम्बन्धित है जो धरती पर अल्लाह का संदेश लेकर आते हैं।

इस लेख को बाद के वर्षों में तोड़कर वहीं पटक दिया गया किंतु इसके टुकड़ों से इस इमारत के बनाने का वर्ष 935 हिजरी (ई.1528) भी ज्ञात हो जाता है। चूंकि इस शिलालेख में बाबर के आदेश का उल्लेख हुआ है इसलिए इस इमारत को बाबरी ढांचा कहा जाने लगा। इस मंदिर को फिर से प्राप्त करने के लिए हिन्दू पांच सौ सालों तक संघर्ष करते रहे और तब तक अपने प्राणों का बलिदान देते रहे जब तक कि ई.2019 में यह मंदिर हिंदुओं को वापस नहीं मिल गया।

सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में ऑस्ट्रिया के एक पादरी, फादर टाइफैन्थेलर ने अयोध्या की यात्रा की तथा लगभग 50 पृष्ठों में अयोध्या यात्रा का वर्णन किया। इस वर्णन का फ्रैंच अनुवाद ई.1786 में बर्लिन से प्रकाशित हुआ। उसने लिखा- ‘अयोध्या के रामकोट मौहल्ले में तीन गुम्बदों वाला ढांचा है जिसमें काले रंग की कसौटी के 14 स्तम्भ लगे हुए हैं। इसी स्थान पर भगवान श्रीराम ने अपने तीन भाइयों सहित जन्म लिया। जन्मभूमि पर बने मंदिर को बाबर ने तुड़वाया। आज भी हिन्दू इस स्थान की परिक्रमा करते हैं और साष्टांग दण्डवत करते हैं।’

भारत की आजादी के बाद 22 दिसम्बर 1949 की रात्रि में लगभग तीन बजे अचानक बाबरी ढांचे में भगवान का प्राकट्य हुआ वर्ष 1992 में बाबर द्वारा बनाए गए ढांचे को तोड़ दिया गया तथा रामलला को कपड़े के एक टैंट में विराजमान कर दिया गया। वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने यह मंदिर फिर से हिन्दुओं को लौटा दिया। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने एक ट्रस्ट का गठन करके इस स्थान पर भव्य राममंदिर का निर्माण आरम्भ करवाया है।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार जिस ढांचे को बाबरी-मस्जिद अथवा बाबरी ढांचा कहा जाता था, उसे वास्तव में इल्तुतमिश के पुत्र तथा अयोध्या के गवर्नर नासिरुद्दीन ने बनवाया था। मीर बाकी ने उस ढांचे की मरम्मत करवाकर उसमें अपने शिलालेख लगवा दिए ताकि बाबर को खुश किया जा सके और स्वयं इस मस्जिद को बनाने का श्रेय लिया जा सके।

कुछ इतिहासकारों ने सिद्ध करने की चेष्टा की है कि यह मस्जिद औरंगजेब के समय में बनी तथा इसे बाबरी मस्जिद कहा गया किंतु औरंगजेब के समकालीन इतिहासकारों ने अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि मंदिर तोड़े जाने और उसके स्थान पर मस्जिद बनवाए जाने का कोई उल्लेख नहीं किया है। औरंगजेब के काल के सरकारी फरमानों में भी इस बात का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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