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बाबर की तोपें (24)

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बाबर की तोपें

बाबर की तोपें (canons of Babur) भारत का इतिहास बदलने के लिए पर्याप्त सिद्ध हुईं। न तो दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) और न चित्तौड़ का महाराणा सांगा (Maharana Sanga) जैसे वीर भारतीय राजा, कोई भी इन तोपों के आगे नहीं टिक सके! भारतीय सिपाही इन तोपों के सामने आकर मर तो सकते थे किंतु लड़ नहीं सकते थे! जीतने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी!

दिल्ली और आगरा के लाल किलों (Red Forts Of Delhi and Agra) में संचित खजाने तथा भेरा से लेकर बिहार तक के हरे-भरे मैदान अधिकार में आने के साथ ही बाबर Babur) का जीवन भर का सपना पूरा हो गया था किंतु अब वह भारत में रहकर, भारत पर शासन करना चाहता था।

बाबर वापस काबुल या कांधार जाकर जीवन भर की निर्धनता नहीं भोगना चाहता था किंतु बाबर के कई विश्वस्त सेनापतियों एवं मंत्रियों ने आगरा की गर्मी से परेशान होकर भारत में रहने से मना कर दिया तथा वे बाबर को छोड़कर गजनी, काबुल एवं कांधार लौट गए।

बाबर ने सम्भल, बयाना तथा धौलपुर के तुर्की एवं अफगान अमीरों को संदेश भिजवाए कि वे बाबर की अधीनता स्वीकार कर लें। इन तीनों स्थानों पर इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के अमीरों का शासन था। उन तीनों ने ही बाबर का आदेश मानने से मना कर दिया।

बाबर (Babur) ने उस्ताद अली कुली से कहा कि वह बड़ी-बड़ी तोपें ढाले जो बाबर के दुश्मनों पर काफी दूर से गोलों की बरसात कर सकें। उस्ताद अली ने आगरा में बड़ी-बड़ी आठ भट्टियां लगवाईं। इन भट्टियों में पिघला हुए लोहा पानी की तरह बहता हुआ बाहर निकलता था और नालियों से होता हुआ सांचों में भर जाता था। जब इन सांचों के ठण्डा होने पर उन्हें हटाया जाता था तो तोपें तैयार हो जाती थीं।

उस्ताद अली अपने काम में बड़ा निष्णात था, वह अपने काम को इतने समर्पण भाव से करता था कि बाबर ने उसे कई बार सम्मानित किया ताकि वह पूरे जोश से अपने काम में लगा रहे। जब ये बड़ी तोपें ढल गईं तथा उनके लिए बारूद के पर्याप्त गोले बन गए तब बाबर ने संभल, बयाना, धौलपुर तथा रापरी के लिए एक-एक सेना भिजवाई। बाबर की तोपें (Canons of Babur) हिन्दुस्तानियों को भूनने के लिए तैयार थीं।

इस समय आगरा और कन्नौज के बीच सत्ता-च्युत अफगानों ने एक सैनिक-शिविर लगा रखा था। इनका उल्लेख करते हुए बाबर ने लिखा है- ‘हुमायूँ को एक सेना के साथ कन्नौज की तरफ भेजा गया जिसके रास्ते में 30-40 हजार अफगान सैनिक जमा हो रखे थे। जब उन्होंने सुना कि हुमायूँ आ रहा है, तब वे लोग भाग खड़े हुए।’

उपरोक्त विवरण को पढ़कर कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से समझ सकता है कि बाबर ने अपनी सेना की वास्तविक संख्या के बारे में आरम्भ से लेकर अंत तक झूठ लिखा है। बाबर ने लिखा है कि- ‘पानीपत के मैदान में मेरे पास केवल 12 हजार सैनिक थे, जिनमें से आधे बावर्ची, खानसामा, भिश्ती और कुली थे।’

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इस प्रकार बाबर ने अपने वास्तविक सैनिकों की संख्या 6 हजार ही बताई है। इन 6 हजार सैनिकों में से दो-चार हजार सैनिक पानीपत के युद्ध (Battle of Panipat) में मारे भी गए होंगे। कुछ हजार सैनिक इटावा, धौलपुर, बयाना तथा रापरी के अभियानों पर भेजे जा चुके होंगे और कुछ हजार सैनिकों को गजनी का गवर्नर ख्वाजा कलां और हजारा का गवर्नर सुल्तान मसऊदी भी अपने साथ ले गए होंगे। कुछ सैनिकों को आगरा और दिल्ली की सुरक्षा में भी नियुक्त किया गया होगा! ऐसीस्थिति में हुमायूँ को अपने साथ ले जाने के लिए 2-4 हजार सैनिक भी नहीं मिलने चाहिए थे! अतः हुमायूँ के आगमन का समाचार सुनकर ही 30-40 हजार अफगान सैनिक कैसे भाग सकते थे! स्पष्ट है कि बाबर झूठ बोल रहा था, पानीपत से लेकर महाराणा सांगा (Maharana Sanga) के विरुद्ध किए गए अभियान तक बाबर के पास सैनिकों की संख्या 40-50 हजार से लेकर एक लाख से कम नहीं रही होगी! पाठकों को स्मरण होगा कि हमने दिल्ली की दर्दभरी दास्तान में आजम हुमायूँ नामक एक तुर्की अमीर का इतिहास बताया था। वह दिल्ली सल्तनत में बड़ा शक्तिशाली माना जाता था और दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी का बड़ा विरोधी था।

जब सिकंदर लोदी का पुत्र इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) दिल्ली का सुल्तान बना तो इब्राहीम लोदी ने आजम हुमायूँ को ग्वालियर के तोमरों के विरुद्ध अभियान करने भेजा था।

इब्राहीम लोदी का अनुमान था कि इस अभियान से या तो इब्राहीम लोदी को तोमरों पर विजय मिल जाएगी या फिर आजम हुमायूँ मारा जाएगा और उससे छुटकारा मिल जाएगा। जब चार साल की घेरेबंदी के बाद आजम हुमायूँ ग्वालियर दुर्ग पर विजय प्राप्त करने वाला ही था, तब इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) ने आजम हुमायूँ को दिल्ली में बुलाकर कैद कर लिया था और कैद में ही उसकी हत्या करवा दी थी। इस कारण आजम हुमायूँ के पुत्र इब्राहीम लोदी के शत्रु हो गए थे।

उसी आजम हुमायूँ का बड़ा पुत्र फतेह खाँ सरवानी रायबरेली के निकट दलमऊ में बाबर के पुत्र मिर्जा हुमायूँ की सेवा में उपस्थित हुआ। मिर्जा हुमायूँ ने फतेह खाँ सरवानी का बड़ा सम्मान किया तथा उसे महदी ख्वाजा और मुहम्मद सुल्तान मिर्जा के साथ अपने पिता बाबर की सेवा में भेज दिया।

बाबर ने फतेह खाँ को उसके पिता आजम हुमायूँ के अधिकार वाले परगने तथा कुछ अन्य परगने प्रदान किए जिनसे प्रतिवर्ष 1 करोड़ 60 लाख रुपए का भूराजस्व प्राप्त होता था। फतेह खाँ के पिता को आजम हुमायूँ की उपाधि प्राप्त थी किंतु बाबर ने फतेह खाँ को यह उपाधि इसलिए प्रदान नहीं की क्योंकि बाबर के बड़े पुत्र का नाम भी हुमायूँ था। बाबर ने फतेह खाँ को खानेजहाँ की उपाधि प्रदान की। तभी से मुगल दरबार में खाने जहाँ बहुत बड़ी उपाधि मानी जाने लगी जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- ‘संसार का राजा।’

बयाना पर उन दिनों निजाम खाँ नामक अफगानी अमीर का अधिकार था। उसका बड़ा भाई आलम खाँ निजाम खाँ को हटाकर स्वयं किले पर अधिकार करना चाहता था। इसलिए उसने बाबर से सम्पर्क करके बाबर को आश्वासन दिया कि यदि बाबर की सेना बयाना पर हमला करेगी तो मैं बाबर की सहायता करूंगा।

इस पर बाबर ने बयाना (Bayana) के लिए एक सेना रवाना की। बयाना के शासक निजाम खाँ ने बाबर की सेना को परास्त कर दिया। बाबर और अधिक सेना भेजने की स्थिति में नहीं था। इसलिए बाबर ने निजाम खाँ से संधि कर ली तथा उसे 20 लाख रुपए वार्षिक आय की जागीर देकर अपनी सेवा में रख लिया। निजाम खाँ की जगह महदी ख्वाजा को बयाना का गवर्नर नियुक्त किया गया। उसके अधीन 70 लाख रुपए वार्षिक आय वाली जागीर रखी गई।

इस समय तातार खाँ सारंगखानी ग्वालियर पर शासन करता था। वह भी इब्राहीम लोदी का अमीर था किंतु जब इब्राहीम लोदी मारा गया तो तातार खाँ के शत्रुओं ने ग्वालियर का किला घेर लिया। इस पर तातार खाँ ने बाबर से सहायता मांगी।

बाबर ने लिखा है कि इस समय मेरे अधिकांश बेग या तो हुमायूँ के साथ थे या अन्य अभियानों पर गए थे, इसलिए मैंने भेरा के अमीर रहीम दाद को आदेश दिया कि वह ग्वालियर जाकर दुर्ग पर अधिकार कर ले। जब रहीम दाद ग्वालियर के निकट पहुंचा तो किले में रह रहे एक दरवेश ने रहीम दाद को सूचना भेजी कि तू किले में मत आना, तातार खाँ दगा करेगा।

इस पर रहीम दाद ने तातार खाँ को संदेश भिजवाया कि मैं काफिरों से घिर गया हूँ, इसलिए मुझे थोड़े से सैनिकों के साथ किले में आने दिया जाए। तातार खाँ ने उसकी बात का विश्वास करके उसे थोड़े से सैनिकों सहित किले के भीतर ले लिया।

रात में तातार खाँ के आदमियों ने किले के दरवाजे भीतर से खोल दिए और रहीम दाद की सेना ग्वालियर के किले Gwalior Fort) में घुस गई। इन लोगों ने तातार खाँ को किले से निकाल दिया। जब तातार खाँ बाबर (Babur) की शरण में आगरा पहुंचा तो बाबर ने उसे भी 20 लाख रुपए आय की जागीर प्रदान करके अपनी सेवा में रख लिया। इस प्रकार बाबर की तोपों (Canons of Babur) ने हिन्दुस्तान का बड़ा हिस्सा फतह कर लिया।              

                                                     – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर को जहर दे दिया इब्राहीम लोदी की माता ने (25)

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बाबर को जहर दे दिया इब्राहीम लोदी की माता ने

जब बाबर (Babur) ने इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) को मारकर दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) पर अधिकार कर लिया तब उसने इब्राहीम के परिवार की औरतों को आदर सहित अपने राज्य में रहने दिया किंतु इब्राहीम की माता बुआ बेगम (Bua Begum) ने बाबर को जहर दे दिया।

आगरा पर अधिकार करने के बाद बाबर कई तरह की कठिनाइयों में घिर गया। फिर भी उसने रापरी, बयाना और ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। कन्नौज की तरफ से आकर एकत्रित हुए अफगान विद्रोहियों को भी भगा दिया तथा इटावा एवं धौलपुर के विरुद्ध सैनिक अभियान आरम्भ कर दिए।

बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि- ’21 दिसम्बर 1526 को एक विचित्र घटना घटी। इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की माता बुआ बेगम को किसी तरह ज्ञात हो गया कि मैं हिन्दुस्तानी बावर्चियों के हाथ का बना भोजन खाने लगा हूँ तथा मैंने चार हिन्दुस्तानी बावर्ची नियुक्त किए हैं।

उनमें से एक बावर्ची को चार परगनों का लालच देकर इब्राहीम लोदी की माता ने अपनी तरफ मिला लिया। बाबर की माता ने एक दासी के हाथों एक तोला जहर उस बावर्ची के पास भिजवाया। जब मेरे बावर्ची खाना बना रहे थे तब उस हिन्दुस्तानी बावर्ची ने सबकी निगाह बचाकर एक चीनी की प्लेट पर पतली-पतली चपातियां लगाईं और उन पर कागज की पुड़िया में से आधे से कम जहर छिड़क दिया तथा रोटियों पर रोगनदार पका हुआ मांस रख दिया।

उस बावर्ची ने शेष बचा हुआ आधा जहर आग में डाल दिया। उस दिन शुक्रवार था। मैं दोपहर बाद की नमाज पढ़ने के बाद भोजन करने बैठा। मैंने खरगोश का बहुत सा मांस बड़े शौक से खाया तथा कुछ ग्रास विष मिली हुई हिन्दुस्तानी रोटी के भी खाए। मुझे उसके स्वाद में कोई अंतर ज्ञात नहीं हुआ। मैंने कुछ तली हुई गाजरें खाने के बाद सूखा मांस खाया। इसे खाते ही मेरा जी मचलने लगा।’

बाबर ने लिखा है- ‘पहले भी एक बार सूखा मांस खाने पर मेरा जी मचलने लगा था, इसलिए मैंने सोचा कि यह उसी का प्रभाव होगा। थोड़ी ही देर में मुझे उल्टी आने लगी। मुझे लगा कि मैं दस्तरखान पर ही कै कर दूंगा। मैं बड़ी कठिनाई से उठकर आबखाने अर्थात् पानी रखने के स्थान तक जा सका।

वहाँ पहुंचकर मैंने बहुत जोर से उलटी की। मैंने भोजन के बाद कभी वमन नहीं किया था। यहाँ तक कि मदिरापान के बाद भी कभी वमन नहीं किया था। मुझे संदेह हो गया। मैंने बावर्चियों पर दृष्टि रखने के आदेश दिए तथा एक कुत्ते को बुलाकर उसे कै खिलवाई और उस पर दृष्टि रखने के आदेश दिए।

उस दिन तो कुत्ते को कुछ नहीं हुआ किंतु अगले दिन एक पहर के बाद कुत्ते की दशा बिगड़ने लगी। उसका पेट फूल गया। लोग उसे कितने ही पत्थर मारते और हिलाते-डुलाते किंतु वह न उठता। मध्याह्न तक वह उसी दशा में पड़ा रहा। तदुपरांत वह उठ खड़ा हुआ, मरा नहीं। मैंने दो सैनिकों को भी अपनी रकाबी में से भोजन खिलाया था। उन्हें भी दूसरे दिन बड़ी जबर्दस्त कै हुई। एक की दशा तो बड़ी ही खराब हो गई।’

बाबर ने लिखा है- ‘आफत आई थी किंतु कुशलतापूर्वक टल गई। अल्लाह ने मुझे नया जीवन दिकया। मैं परलोक से आ रहा हूँ। मैं अल्लाह की दया से जी रहा हूँ। मैंने आज जीवन का मूल्य समझा। मैंने सुल्तान मुहम्मद बख्शी को आदेश दिया कि वह बावरचियों पर निगरानी रखे। सैनिक उसे दारुण पीड़ा पहुंचाने के लिए ले गए। बावर्ची ने सारी घटना का वर्णन कर दिया।’

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पाठकों को स्मरण होगा कि बाबर ने इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की माता बुआ बेगम (Bua Begum) का सम्मान अपनी माता की तरह किया था और उसे अपने धन-सम्पत्ति एवं दास-दासियों सहित रहने के लिए यमुनाजी के निचले क्षेत्र में एक महल प्रदान किया था। बाबर के सेवकों द्वारा बुआ बेगम का सम्मान राजमाता की तरह किया जाता था तथा उसके एक पुत्र को भी बहुत इज्जत दी जाती थी। संभवतः इस पुत्र की आयु बहुत कम थी। जब बाबर को ज्ञात हुआ कि शत्रु की माता बुआ बेगम को इतना सम्मान दिए जाने पर भी उसने बाबर के प्राण लेने का षड़यंत्र रचा तो बाबर के क्रोध का पार नहीं रहा। इसलिए उसने यह बात सबके सामने लाने का निश्चय किया। बाबर ने लिखा है- ‘सोमवार को मैंने दरबार का आयोजन किया तथा मैंने आदेश दिया कि उसमें समस्त प्रतिष्ठित एवं सम्मानित लोग, अमीर एवं वजीर उपस्थित हों। उन दोनों पुरुषों तथा स्त्रियों को बुलवाकर उनसे प्रश्न किए जाएं। उन लोगों ने वहाँ सब हाल बताया। मैंने बकावल अर्थात् खाना परोसने वाले के टुकड़े-टुकड़े करवा दिए। भोजन में जहर मिलाने वाले बावर्ची अर्थात् खाना बनाने वाले की जीवित ही खाल खिंचवा ली गई। एक स्त्री को हाथी के पांव के नीचे डलवाया गया। दूसरी स्त्री को तोप के मुँह पर रखकर उड़वा दिया।

बाबर ने लिखा है- ‘मैंने अभागिनी बुआ बेगम अर्थात् इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की माता पर निगरानी रखने का आदेश दिया। वह अपने कुकर्म का फल भोग रही है, उसे इसका परिणाम मिल जाएगा।’

बाबर ने इस विष के प्रभाव से आने के कई उपाय किए। वह लिखता है- ‘शनिवार को मैंने एक प्याला दूध पिया। रविवार को मैंने अरक पिया जिसमें गिले मख्तूम मिली हुई थी। गिले मख्तूम एक विशेष प्रकार की मिट्टी होती है जो मुहर लगाने के काम आती थी। सोमवार को मैंने दूध पिया जिसमें गिले मख्तूम तथा तिर्याक मिला हुआ था। तिर्याक एक प्रकार की औषधि होती थी जिसके सेवन से जहर का असर कम अथवा समाप्त हो जाता था।’

बाबर इस विष के प्रभाव से बच तो गया किंतु इस घटना का बाबर के मन पर गहरा प्रभाव हुआ। अपनी परिवार को काबुल भेजे एक पत्र में बाबर ने इस घटना का विस्तार से उल्लेख करते हुए लिखा-

‘अल्लाह को धन्यवाद है कि मुझे कोई हानि नहीं हुई। मुझे आज तक यह पता नहीं था कि प्राण इतने प्यारे हो सकते हैं। इसीलिए यह कहा जाता है कि जो कोई मृत्यु के निकट पहुंच जाता है, उसे जीवन का मूल्य ज्ञात हो जाता है। जैसे ही इस भयंकर दुर्घटना का स्मरण हो जाता है, तो मेरी दशा खराब हो जाती है। यह अल्लाह की महान् कृपा है कि उसने मुझे पुनः जीवन प्रदान किया। मैं उसके प्रति किन शब्दों में कृतज्ञता प्रकट कर सकता हूँ। यद्यपि यह दुर्घटना इतनी भयंकर है कि शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता फिर भी मैंने पूरी घटना का विस्तार से उल्लेख कर दिया है।’

बाबर ने इब्राहीम (Ibrahim Lodi) की माता बुआ बेगम यूनूस अली तथा ख्वाजगी असद नामक मुगल अधिकारियों को सौंप दी। उन लोगों ने बुआ बेगम की समस्त नगदी एवं अन्य सम्पत्ति पर अधिकार कर लिया तथा उसकी दास-दासियों को छीन लिया। बुआ बेगम को अब्दुर्रहीम शगावल नामक सैनिक अधिकारी की निगरानी में रख दिया गया।

बाबर के आदेश से बुआ बेगम (Bua Begum) तथा उसके पुत्र को अत्यधिक सम्मान दिया जाता था किंतु इस घटना के बाद बुआ बेगम को आगरा में रखना उचित नहीं था। इसलिए 3 जनवरी 1527 को बुआ बेगम को कामरान के पास भेज दिया गया। बाबर ने बुआ बेगम के बारे में केवल इतना ही लिखा है किंतु बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने हुमायूंनामा में लिखा है कि बुआ बेगम ने काबुल में आत्महत्या कर ली।

उस समय कामरान की नियुक्ति कांधार में थी, संभव है कि कामरान ने बुआ बेगम (Bua Begum) को कांधार की बजाय काबुल में रखने के आदेश दिए थे। गुलबदन ने यह भी लिखा है कि बाबर ने जहर मिली हुई रोटी का टुकड़ा उस बावर्ची को भी खिलाया था जिसने जहर मिलाया था। इसके प्रभाव से बावर्ची अंधा-बहरा हो गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराणा सांगा पर आरोप लगाया बाबर ने (26)

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महाराणा सांगा पर आरोप लगाया बाबर ने

बाबर ने महाराणा सांगा पर आरोप लगाया है कि सांगा ने ही बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण भिजवाया था ताकि दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम को मारकर उसके राज्य को बाबर तथा सांगा आधा-आधा बांट लें।

इब्राहीम लोदी की माता ने 25 दिसम्बर 1526 को आगरा में बाबर को जहर दे दिया। इस कारण बाबर मरते-मरते बचा। उस समय बाबर की विभिन्न सेनाएं संभल, जौनपुर, गाजीपुर, रापरी, धौलपुर, बयाना, ग्वालियर, इटावा, कालपी तथा हिसार आदि स्थानों पर युद्ध कर रही थीं। भारत के बहुत से अफगान सेनापति एवं गवर्नर या तो पराजय के कारण या फिर पुराने सुल्तान इब्राहीम लोदी से असंतुष्ट होने के कारण बाबर से आ-आ कर मिलते जा रहे थे।

जब बाबर की सेना धौलपुर पहुंची तो वहाँ के अफगान अमीर मुहम्मद जैतून ने धौलपुर का किला बाबर के सेनापतियों को समर्पित कर दिया और वह स्वयं बाबर की सेवा में उपस्थित हुआ। बाबर ने धौलपुर को खालसा में शामिल करके मुहम्मद जैतून को कई लाख रुपए वार्षिक राजस्व वाली जागीर प्रदान करके अपनी सेवा में रख लिया।

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उन्हीं दिनों समाचार मिला कि हिसार फिरोजा के पास हमीद खाँ सारंगखानी चार हजार अफगानों के साथ उपद्रव मचा रहा है। बाबर ने भारत के पंजाब में स्थित हिसार के लिए हिसार फिरोजा नाम का प्रयोग किया है। उस काल में अफगानिस्तान में भी हिसार फिरोजा नामक स्थान था। जब हमीद खाँ सारंगखानी हिसार में उपद्रव मचाने लगा तो बाबर ने एक सेना उसके विरुद्ध भेजी। इस सेना ने तेज गति से हिसार पहुंचकर बहुत से अफगानों के सिर काट लिए तथा कटे हुए सिर बाबर के पास भिजवा दिए। इस समय बाबर का सबसे बड़ा पुत्र हुमायूं अपने पिता बाबर के लिए बहुत बड़ा सहायक सिद्ध हुआ। उसने न केवल कन्नौज की तरफ एकत्रित हुए 30-40 हजार अफगानों को छिन्न-भिन्न कर दिया अपितु जौनपुर एवं अवध पर अधिकार करके वहाँ मुगल अधिकारी तैनात कर दिए। जब हुमायूँ कालपी की ओर रवाना हुआ तो कालपी का गवर्नर आलम खाँ अत्यंत भयभीत होकर हुमायूँ की शरण में पहुंचा। हुमायूँ ने उसे अपनी सेवा में रख लिया। उन्हीं दिनों बाबर को एक ऐसा समाचार मिला जिससे बाबर को अपने पैरों तले से धरती खिसकती हुई प्रतीत हुई।

बाबर के गुप्तचरों ने उसे सूचना दी कि महाराणा सांगा बड़ी सेना लेकर आगरा की तरफ आ रहा है। इसलिए उसने हुमायूँ को संदेश भिजवाया- ‘चूंकि अफगानों को भगाने का तुम्हारा काम पूरा हो गया है, इसलिए तुम तत्काल  अपनी सेना लेकर मेरे पास पहुंचो क्योंकि काफिर राणा सांगा काफी निकट पहुंच चुका है। हमें सर्वप्रथम उसका उपाय करना चाहिए।’ इस पर 6 जनवरी 1527 को हुमायूँ आगरा पहुंच गया।

बाबर ने लिखा है- ‘जब हम लोग काबुल में ही थे, तब राणा सांगा के दूत ने उपस्थित होकर सांगा की तरफ से निष्ठा प्रदर्शित की थी और यह निश्चय प्रकट किया था कि सम्मानित बादशाह काबुल की ओर से दिल्ली के निकट पहुंच जाएं तो मैं इस ओर से आगरा पर आक्रमण कर दूंगा। मैंने इब्राहीम को भी परास्त कर दिया, दिल्ली तथा आगरा पर भी अधिकार जमा लिया किंतु इस काफिर के किसी ओर हिलने के चिह्न दृष्टिगत नहीं हुए। कुछ समय पश्चात् उसने कन्दार नामक किले को घेर लिया जो मकन के पुत्र हसन के अधीन था। हसन ने सहायता पाने के लिए अपने दूत मेरे पास भिजवाए किंतु मैंने उसकी कोई सहायता नहीं की क्योंकि मैं अभी तक इटावा, धौलपुर तथा बयाना पर अधिकार नहीं कर सका था।’

बाबर ने महाराणा सांगा पर आरोप लगाया है कि महाराणा सांगा ने बाबर को भारत आने का निमंत्रण दिया था किंतु राणा सांगा बाबर की सहायता के लिए नहीं आया। बाबर का महाराणा सांगा पर यह आरोप नितांत मिथ्या है।

पाठकों को स्मरण होगा कि ‘दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान’ में हमने स्पष्ट किया था कि महाराणा सांगा गुजरात, मालवा, अहमदनगर तथा दिल्ली के मुस्लिम शासकों के विरुद्ध लम्बे समय से संघर्ष कर रहा था और उनके क्षेत्रों पर तेजी से अधिकार जमाता जा रहा था।

महाराणा सांगा का उद्देश्य भारत भूमि को मुस्लिम शासकों से मुक्त करवाने का था। ऐसी स्थिति में महाराणा सांगा बाबर को क्यों बुलाता? वह तो स्वयं ही दिल्ली और आगरा पर दृष्टि गढ़ाए बैठा था! इसलिए बाबर द्वारा महाराणा सांगा के सम्बन्ध में लिखी गई बात बिल्कुल झूठी है। किसी अन्य समकालीन लेखक ने इस बात का उल्लेख नहीं किया है।

जब बाबर स्वयं ही अपने संस्मरणों में जमकर झूठ लिख रहा था, तब बाबर के इतिहासकारों द्वारा लिखे गए तथ्यों का कितना विश्वास किया जा सकता है, यह एक विचारणीय प्रश्न है!

बाबर को सूचना मिली कि मकन के पुत्र हसन ने कन्दार का किला राणा सांगा को समर्पित कर दिया। इससे बाबर को समझ में आ गया कि यदि बाबर ने महाराणा सांगा के विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाया तो महाराणा सांगा और भी किलों पर अधिकार कर लेगा। कुछ ही समय में बाबर की सेना ने इटावा पर अधिकार कर लिया।

बाबर ने इटावा के तुर्क गवर्नर को निकालकर इटावा महदी ख्वाजा को दे दिया। धौलपुर पर भी बाबर का अधिकार हो गया तथा धौलपुर जुनैद बरलस को प्रदान किया गया। इसी प्रकार कन्नौज सुल्तान मुहम्मद दूल्दाई को दिया गया।

इस प्रकार सांगा की ओर अग्रसर होने से पहले बाबर ने उत्तर भारत के मैदानों में स्थित अनेक नगरों एवं राज्यों पर अधिकार कर लिया जिससे उसके सैनिकों की संख्या में भी अभूतपूर्व वृद्धि हो गई थी।

बाबर चाहता था कि मेवात का शासक हसन खाँ मेवाती भी बाबर की अधीनता स्वीकार कर ले किंतु हसन खाँ मेवाती किसी भी कीमत पर बाबर को मारना चाहता था क्योंकि बाबर ने पानीपत के युद्ध में हसन खाँ मेवाती के पुत्र नाहर खाँ को बंदी बना लिया था जो कि इब्राहीम लोदी की तरफ से युद्ध करने गया था। बाबर ने अब तक नाहर खाँ को बंधक बना रखा था।

हसन खाँ मेवाती कई बार स्वयं आगरा जाकर बाबर से मिला किंतु बाबर ने हसन खाँ से कहा कि यदि उसे अपना पुत्र वापस चाहिए तो उसे बाबर की अधीनता स्वीकार करनी होगी किंतु हसन खाँ मेवाती बाबर की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं था।

जब बाबर ने सुना कि हसन खाँ मेवाती महाराणा सांगा से मिल सकता है तो बाबर ने नाहर खाँ को बंदीगृह से बाहर निकालकर उसे खिलअत प्रदान की तथा अपने पिता के पास जाने की अनुमति दे दी। नाहर खाँ ने बाबर को आश्वासन दिया कि वह हर हाल में अपने पिता हसन खाँ को बाबर के पक्ष में ले आएगा।

बाबर ने लिखा है- ‘यह दुष्ट धूर्त अर्थात् हसन खाँ केवल अपने पुत्र की मुक्ति की प्रतीक्षा में चुपचाप बैठा था। जैसे ही उसे ज्ञात हुआ कि उसका पुत्र मुक्त हो गया है और अलवर आ गया है तो हसन खाँ आगरा के निकट टोडा भीम में महाराणा सांगा से मिल गया। हसन खाँ के पुत्र को इस अवसर पर मुक्त करना उचित नहीं था।’                                  

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सांगा से भयभीत बाबर तोपगाड़ियों के पीछे छिपकर रहता था (27)

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सांगा से भयभीत बाबर तोपगाड़ियों के पीछे छिपकर रहता था

खानवा के मैदान में बाबर अपनी बड़ी-बड़ी तोपों के साथ युद्ध में उतरा था जबकि सांगा के पास पैदल तीरंदाजों और घुड़सवार तलवारबाजों के अतिरिक्त और किसी प्रकार के संसाधन नहीं थे। इस पर भी महाराणा सांगा से भयभीत बाबर तोपगाड़ियों के पीछे छिपकर रहता था।

सांगा से भयभीत बाबर ने मेवात के शासक हसन खाँ मेवाती को अपनी ओर मिलाने के हर संभव प्रयास किए किंतु हसन खाँ मेवाती अपने पुत्र नाहर खाँ पर किए गए अत्याचारों का बदला लेने के लिए महाराणा सांगा के पक्ष में हो गया। जब बाबर ने सुना कि महाराणा सांगा एक विशाल सेना लेकर बाबर की ओर बढ़ रहा है तो बाबर ने भी अपनी सेना को तैयार होने के आदेश दिए।

बाबर ने किस्मती बेग को थोड़ी सी सेना देकर बयाना की तरफ भेजा, वह कुछ लोगों को सिर काटकर ले आया और 70-80 आदमियों को बंदी बना लाया। किस्मती ने ये कटे हुए सिर बाबर को भेंट किए।

10 फरवरी 1527 को बाबर ने उस्ताद अली कुली द्वारा बनाई गई सबसे बड़ी तोप से पत्थरों के गोले चलवाकर उसका परीक्षण किया। इसने 1600 कदम तक पत्थर के गोलों को फैंका। यदि एक कदम को डेड़ फुट का माना जाए तो इस तोप से निकला हुआ गोला लगभग ढाई किलोमीटर दूर जा सकता था।

यह बाबर के लिए एक अद्भुत एवं उत्साहवर्द्धक बात थी! तोप की इस सफलता के लिए बाबर ने उस्ताद अली को तलवार की एक पेटी, खिलअत और तीपूचाक घोड़ा इनाम में प्रदान किया। 11 फरवरी को बाबर ने आगरा से प्रस्थान करके एक खुले मैदान में शिविर लगाया और सेना की भरती की जाने लगी।

बाबर के समस्त गवर्नर और सेनापति अपनी-अपनी सेनाएं लेकर उस मैदान में एकत्रित होने लगे। बाबर ने उन सबको एक क्रम में जमाना आरम्भ किया। बाबर ने अपनी सेना के एक अग्रिम दल को बयाना की तरफ रवाना किया और स्वयं मुख्य सेना के साथ रहा। जब यह सेना बयाना पहुंची तो सांगा के सैनिकों द्वारा घेर ली गई।

महाराणा सांगा अब तक अट्ठारह युद्ध लड़ चुका था जिनमें उसके शरीर पर 80 घाव लगे थे। युद्धों में ही उसने अपनी एक आँख, एक भुजा तथा एक पैर खो दिये थे। वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक था और लोदी साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था।

महाराणा सांगा संभवतः पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की ओर से भाग लेना चाहता था किंतु वह गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह के संभावित आक्रमण के कारण पानीपत नहीं जा सका। अब मुजफ्फरशाह की मृत्यु हो चुकी थी और महाराणा का ध्यान दिल्ली तथा आगरा पर केन्द्रित था जहाँ बाबर ने अधिकार कर लिया था।

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महाराणा सांगा का अनुमान था कि बाबर अपने पूर्वज तैमूर लंग की भांति दिल्ली को लूट-पाट कर काबुल लौट जाएगा परन्तु बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया था। ऐसी स्थिति में महाराणा तथा बाबर में संघर्ष होना अनिवार्य था क्योंकि बाबर के निश्चय ने राणा सांगा की योजना पर पानी फेर दिया था। जब बाबर की सेना का अग्रिम दल बयाना पहुंचा तो सांगा के सैनिकों ने बाबर की सेना के अग्रिम दल पर आक्रमण करके उसे परास्त कर दिया। उस दल का नायक संगुल खाँ जनजूहा वहीं मारा गया। सांगा के सैनिकों ने कित्ता बेग का कंधा फाड़कर बांह काट डाली। इस कारण किस्मती बेग तथा मनसूर बरलास सहित अनेक सेनापति भयभीत होकर भाग खड़े हुए। उन्होंने बाबर को सांगा की सेना की प्रचण्डता के ऐसे किस्से सुनाए कि बाबर चिंता में पड़ गया। महदी ख्वाजा इस समय बयाना के किले में था किंतु वह भी बाबर की सेना के अग्रिम दल की कोई सहायता नहीं कर सका। इसलिए बाबर ने बायाना की ओर तेज गति से बढ़ने की बजाय अपनी गति धीमी कर दी।

सांगा से भयभीत बाबर ने बेलदारों को भेजकर मंधाकुर के पास कुछ कुंए खुदवाए और अपनी सेना को वहीं पड़ाव करने के आदेश दिए। 16 फरवरी 1527 को बाबर मंधाकुर से चलकर सीकरी पहुंच गया क्योंकि सीकरी में बाबर की सेना के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध था। तब तक महाराणा सांगा की सेना बयाना से 10-12 मील दूर बसावर के निकट पहुंच गई।

कुछ दिन बाद अब्दुल अजीज को महाराणा सांगा की वास्तविक स्थिति जानने के लिए भेजा गया। अब्दुल अजीज के पास 1000-1500 सैनिक थे। सांगा की सेना ने उन सैनिकों को देख लिया तथा उनमें कसकर मार लगाई। सांगा की सेना ने बाबर के बहुत से सैनिकों को बंदी बना लिया। इस प्रकार अब्दुल अजीज महाराणा सांगा की वास्तविक स्थिति का पता नहीं लगा सका।

इस पर बाबर के मंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा के अमीर मुहिब अली को निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा के सेवकों सहित सांगा की तरफ भेजा गया। मुहम्मद अली जंगजंग को भी भेजा गया। सांगा की सेना ने इस बार भी बाबर के बहुत से सैनिकों को पकड़कर मार डाला। मुहिब अली भी जंग में गिरने वाला था किंतु बाल्तू नामक एक सैनिक ने पीछे से पहुंचकर मुहिब अली को बचा लिया।

एक दिन बाबर को समाचार मिला कि शत्रु तेजी से निकट आ रहा है, इस पर बाबर की सेना ने अस्त्र-शस्त्र धारण कर लिए तथा घोड़ों को कवच पहना दिए। बाबर ने लिखा है- ‘हम एक कोस तक बढ़ते चले गए। हमारे सामने एक बड़ी झील थी। इसलिए हम वहीं उतर पड़े। हमने अपने सामने का भाग गाड़ियों से सुरक्षित कर लिया और गाड़ियों को जंजीरों से जकड़ दिया। दो गाड़ियों के बीच में 7-8 गज की दूरी रखी गई।’

संभवतः गाड़ियों से बाबर का आशय तोपगाड़ियों से है। क्योंकि वह लिखता है-  ‘मुस्तफा रूमी ने रूमी ढंग से गाड़ियां तैयार करवाई थीं। वे बड़ी मजबूत थीं। चूंकि उस्ताद कुली को मुस्तफा से ईर्ष्या थी, इसलिए मुस्तफा को सेना के दाहिनी ओर हुमायूँ के सामने नियुक्त किया गया एवं उस्ताद अली कुली को बाईं ओर नियुक्त किया गया। जिन स्थानों पर गाड़ियां नहीं पहुंच पाई थीं, वहाँ खुरासानी एवं हिन्दुस्तानी बेलदारों द्वारा खाइयाँ खुदवा दी गईं।’

बाबर ने लिखा है- ‘मेरी सेना, इतनी सुरक्षा के बावजूद हतोत्साहित थी। इसलिए मैंने जिन स्थानों पर गाड़ियां नहीं पहुंच सकती थीं, उन स्थानों पर 7-8 गज की दूरी पर लकड़ी की तिपाइयां रखवा दीं और उन्हें कच्चे चमड़े की रस्सियों द्वारा खिंचवाकर बंधवा दिया। इन कार्य में 20-25 दिन लग गए।’

इसी बीच कासिम हुसैन सुल्तान, अहमद यूसुफ तथा बाबर के बहुत से दोस्त काबुल से बाबर के पास आ गए। बाबर ने उनकी संख्या 500 बताई है। मुहम्मद शरीफ तथा बाबा दोस्त बहुत से ऊंटों पर गजनी से शराब रखवाकर ले आये।

बाबर ने लिखा है- ‘मुहम्मद शरीफ ज्योतिषी था। उसने भविष्यवाणी की कि इन दिनों मंगल ग्रह पश्चिम दिशा में है, इस कारण जो कोई इस ओर से युद्ध करने जाएगा, वह पराजित होगा। इस भविष्यवाणी को सुनकर मेरी सेना में अत्यधिक घबराहट फैल गई। मैंने मुहम्मद शरीफ की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया।’

अब बाबर ने हसन खाँ मेवाती को सांगा से अलग करने की योजना बनाई। बाबर ने एक सेना मेवात के लिए रवाना की ताकि वह मेवात में लूटमार करके अशांति फैला दे और हसन खाँ मेवाती को युद्ध का मैदान छोड़कर मेवात जाना पड़े किंतु हसन खाँ एक अनुभवी सेनापति था। इसलिए वह मोर्चा छोड़कर नहीं गया।

                                                 – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सांगा के डर से बाबर ने शराब छोड़ दी! (28)

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सांगा के डर से बाबर ने शराब छोड़ दी!

ठण्डे ट्रांसऑक्सियाना क्षेत्र के निवासी होने के कारण मुगल शराब पीने के आदी थे किंतु खानवा के युद्ध में सांगा के डर से बाबर ने शराब छोड़ दी और अपने सैनिकों के सामने ही सोने-चांदी के बरतन भिखारियों में बांट दिए!

जब फरवरी 1527 में महाराणा सांगा आगरा की ओर बढ़ने लगा तो जहीरुद्दीन बाबर भी एक सेना लेकर महाराणा सांगा से युद्ध करने के लिए चल पड़ा। महाराणा की सेना ने बाबर की सेना के कई अग्रिम दलों पर हमला करके उन्हें भारी क्षति पहुंचाई थी।

इस कारण बाबर की सेना में सांगा की सेना का आतंक फैल गया और सांगा के डर से वह तोपगाड़ियों एवं लकड़ी की तिपाहियों के पीछे छिपकर रहने लगी। उन्हीं दिनों शरीफ मुहम्मद नामक एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि इस युद्ध में बाबर की पराजय होगी। इससे बाबर की सेना में और अधिक घबराहट फैल गई।

बाबर की सेना में शराब, अरक, बूजा तथा माजून आदि मादक द्रव्यों का बहुतायत से प्रयोग होता था। बादशाह से लेकर पैदल सिपाही तक सभी नशा करते थे और नशा करना बाबर की सेना की कमजोरी बन गया था। स्वयं बाबर ने अपनी आत्मकथा में अपनी तथा अपनी सेना की इस लत का कई बार उल्लेख किया है।

बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘जब मेरी सेना ने धौलपुर पर अधिकार किया तब मैं स्वयं धौलपुर गया। मैं धौलपुर में मीराने बाग अर्थात् कमल उद्यान देखने गया। इस बाग का स्थापत्य देखते ही बनता था। लाल पत्थर में तराशे गये कमल पुष्पा में फव्वारे लगे हुए थे। इस बाग में कमल की आकृति का एक सुंदर कुण्ड स्थित था। मैंने अपने सिपाहियों से कहा कि यदि वे महाराणा सांगा को परास्त कर देंगे तो मैं इस कुण्ड को शराब से भरवा दूंगा ताकि मेरे सैनिक छककर शराब पी सकें और मौज-मस्ती मना सकें।’

जब महाराणा सांगा की सेना बाबर के सामने आकर खड़ी हो गई तो बाबर के विचार बदलने लगे। संभवतः बाबर के अवचेतन पर मृत्यु का भय छा जाने से ऐसा हुआ।

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बाबर ने लिखा है- ’25 फरवरी 1527 को जब मैं प्रातःकाल की सैर पर निकला तो मेरे हृदय में पाप से तौबा करने का विचार आया और मैंने शराब पीना छोड़ने का निश्चय किया। मैंने सोने-चांदी की सुराहियां तथा प्याले और दावत के बरतन मंगवाए और उन्हें तत्काल तोड़ दिया। इस प्रकार मदिरापान का त्याग करके मेरे हृदय को शांति प्राप्त हो गई। मैंने सोने-चांदी के बरतनों को तुड़वाकर उन्हें निर्धनों एवं दरवेशों में बांट दिया। मेरे रात्रिकालीन पहरेदार असस ने इस कार्य में मेरा साथ दिया। वह दाढ़ी न मुंडवाने के निर्णय में भी मेरा साथ दे चुका था। उस रात्रि में तथा दूसरे दिन तक बेगों, अंगरक्षकों एवं लगभग 300 लोगों ने शराब से तौबा कर ली। जो मदिरा हमारे साथ थी, वह भूमि पर फैंक दी गई। जो मदिरा बाबा दोस्त गजनी से लाया था, उसके लिए आदेश हुआ कि उसमें नमक मिला कर सिरका बना दिया जाए। जिस स्थान पर शराब फैंकी गई थी, उस स्थान पर एक कुआं खुदवाने तथा उसके निकट एक खैरातखाना बनाने का आदेश दिया।’

बाबर की ओर से अपने समस्त गवर्नरों और बेगों के नाम यह फरमान जारी किया गया कि वे भी अपने अधीनस्थों को शराब पीने से तौबा करने के लिए प्रेरित करें। हालांकि बहुत से इतिहासकारों ने यह लिखा है कि सांगा के डर से बाबर ने अपने सैनिकों को प्रोत्साहित करने के लिए शराब के बर्तन तोड़े तथा शराब न पीने का प्रण किया किंतु बाबर ने अपने संस्मरणों में शराब छोड़ने का कारण बताते हुए लिखा है- ‘मैंने अपने मुँह में मौत को देख लिया था, इसलिए अब मैं पाप से तौबा करना चाहता था।’

बाबर ने अपने मुँह में मौत देखने की बात को स्पष्ट नहीं किया है। संभव है कि बाबर को महाराणा सांगा से होने वाले युद्ध में अपनी सेना की पराजय दिखाई देने लगी थी जिसमें बाबर की मृत्यु भी हो सकती थी। इसलिए वह मरने से पहले पापमुक्त होना चाहता था। सांगा के डर से ही उसने शराब पीनी छोड़ी थी!

बाबर ने लिखा है- ‘मेरी सेना की निराशा बढ़ती जा रही थी। कोई भी बेग और खान वीरता एवं साहसपूर्ण सलाह नहीं देता था। वजीरों द्वारा, जिन्हें बात करनी चाहिए कोई पौरुष सम्बन्धी बात नहीं होती थी। और जो अमीर बड़े-बड़े प्रदेशों को हजम कर जाते हैं, कोई बात नहीं करते थे। न तो कोई साहसपूर्ण परामर्श देता था ओर न कोई किसी आक्रमण के विषय में कोई योजना बनाता था। मैंने अपने लोगों को हतोत्साहित और शिथिल देखकर एक उपाय करने का विचार किया। मैंने अपने समस्त बेगों एवं वीरों को बुलाकर एक भाषण दिया।’

बाबर लिखता है- ‘मैंने अपने बेगों एवं सैनिकों से कहा कि जो कोई भी जीवन की सभा में प्रवष्टि हुआ है, अंत में वह मृत्यु का प्याला पिएगा। जो जीवन की सराय में आया है, अंत में भूमि के दुःख भरे घर से चला जाएगा। कुख्यात होकर जीवित रहने से यश पाकर मृत्यु को प्राप्त होना अच्छा है। महान् अल्लाह ने हमें इतना बड़ा सौभाग्य प्रदान किया है और इतने बड़े यश को हमारे निकट कर दिया है कि हम लोग या तो शहीद होंगे या गाजी। अतः सबको कुरान शरीफ की शपथ लेनी चाहिए कि कोई भी, शत्रु के सामने मुँह मोड़ने के विषय में नहीं सोचेगा और जब तक शरीर में प्राण हैं, उस समय तक रणक्षेत्र एवं युद्ध से पृथक नहीं होगा। मेरे कहने से समस्त बेगों, सेवकों तथा सैनिकों ने हाथ में कुरान लेकर शपथ ली।’

अभी युद्ध आरम्भ भी नहीं हुआ था कि बाबर को विभिन्न क्षेत्रों से चिंताजनक समाचार मिलने लगे कि जिन क्षेत्रों को बाबर ने अपने अधीन किया था, उन क्षेत्रों के लोग बाबर को सांगा की दाढ़ में फंसा हुआ जानकर विद्रोह करने लगे। रापरी, चंदवार, दो-आब के क्षेत्र, ग्वालियर, संभल में स्थान-स्थान पर हिन्दुस्तानियों ने बाबर के अधिकारियों को निकालना आरम्भ कर दिया।

बाबर ने लिखा है- ‘मैंने इन समाचारों की कोई चिंता नहीं की तथा अपने कार्य में लगा रहा।’

13 मार्च 1527 को सांगा के डर से बाबर की सेना ने तोपगाड़ियों और पैदल सैनिकों को सीकरी से आगे बढ़ाना आरम्भ किया। उन्होंने गाड़ियों को तो अपने सामने कर लिया तथा सेना के तीनों तरफ लकड़ी की पहियेदार तिपाइयां लगा लीं ताकि सांगा की सेना अचानक बाबर की सेना पर हमला नहीं कर सके।

सांगा के डर से बाबर ने सीकरी से प्रस्थान करने से पहले ही अपनी सेनाओं को कतारबद्ध कर लिया था ताकि कहीं अचानक ही शत्रू का आक्रमण हो जाए तो बाबर की सेना में अफरा-तफरी न मचे। उसने सेना के चार स्पष्ट विभाग किए जिन्हें वह आगे का भाग, दायां भाग, बायां भाग तथा मध्य भाग कहता था। बाबर अपने सेनापतियों सहित घोड़ों पर सवार होकर इस सेना के चारों ओर चक्कर लगाता रहता था ताकि सेना की पंक्तियाँ न बिखरें।

इस दौरान बाबर सैनिकों को समझाता रहता था कि उन्हें किस प्रकार युद्ध करना है और किस परिस्थिति में क्या करना है! यह सचमुच बाबर के लिए जीवन-मरण का प्रश्न था और बाबर ने इस प्रश्न को हल करने के लिए हर संभव तैयारी की।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दज्जाल था महाराणा सांगा (29)

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दज्जाल था महाराणा सांगा

अरब की लोककथाओं में एक आंख वाले शैतान को दज्जाल कहा जाता है जो कयामत के दिन लोगों को उनके पापों की सजा देता है। शेख जैनी ने लिखा है कि मुसलमानों के लिए दज्जाल था महाराणा सांगा!

 जब बाबर को सांगा की सेना दिखाई दी तो बाबर को अपनी मृत्यु साक्षात् दिखाई देने लगी। भयभीत बाबर ने अपने पापों से तौबा करने का निश्चय किया तथा शराब का सेवन न करने की शपथ ली। इस समय बाबर अपनी जन्मभूमि फरगना और अपनी राजधानी काबुल से हजारों किलोमीटर दूर अनजानी भूमि पर खड़ा था।

उसके सिर पर प्रबल शत्रु खड़ा था और उसके संगी-सहायक विश्वसनीय नहीं थे, जो थे वे भी हिम्मत हार चुके थे। हिन्दुस्तानियों अर्थात् हिन्दुस्तान में सदियों से शासन कर रहे अफगानियों की योग्यता एवं नीयत पर बाबर तनिक भी भरोसा नहीं करता था। बाबर ने अपने आत्मकथा में बार-बार लिखा है कि हिन्दुस्तानियों अर्थात् अफगानी सेनापतियों को जिम्मेदारी भरे कार्य नहीं सौंपे जा सकते क्योंकि वे अयोग्य हैं तथा धोखेबाज हैं।

बाबर के पास काबुल से आए अफगानी सैनिकों एवं बेगों की संख्या कई हजार थी जिन्हें बाबर अग्रिम मोर्चे सौंपकर युद्ध करना चाहता था। 17 मार्च 1526 को बाबर की सेना ने खानवा के मैदान में शिविर लगाया। खेमे गाढ़ दिए गए और उनके चारों ओर तेजी से खाइयां खोदी जाने लगीं ताकि रात्रि में शत्रु मुगल शिविर में न घुस सके।

बाबर ने अपने सैनिकों की संख्या का उल्लेख नहीं किया है किंतु अपनी आत्मकथा में अपने समकालीन लेखक शेख जैनी की पुस्तक फतहनामा के हवाले से राणा सांगा की सेना का विवरण देते हुए लिखा है कि-

‘सांगा के पास कम से कम 2 लाख 22 हजार सैनिक थे जिनमें 1 लाख सैनिक राणा तथा उसके अधीन-सामंतों के थे और 1 लाख 22 हजार सैनिक मित्र-राजाओं के थे जिनमें वागड़ अर्थात् डूंगरपुर के रावल उदयसिंह के पास 12 हजार, चंदेरी के शासक मेदिनीराय के पास 12 हजार, सलहदी के पास 30 हजार, हसन खाँ मेवाती के पास 12 हजार, ईडर के राजा वारमल के पास 4 हजार, नरपत हाड़ा के पास 7 हजार, कच्छ के राजा सत्रवी के पास 6 हजार, धर्मदेव के पास 4 हजार, वीरसिंह देव के पास 4 हजार और सिकंदर लोदी के पुत्र महमूद खाँ के पास 10 हजार घुड़सवार सैनिक थे।’

शेख जैनी ने एक ओर तो सांगा के दल में एकत्रित सैनिकों की संख्या अत्यंत बढ़ा-चढ़ाकर लिखी है तो दूसरी ओर मारवाड़ के राव गांगा की सेना, आम्बेर के राव पृथ्वीराज की सेना, बीकानेर के कुंवर कल्याणमल की सेना, अन्तरवेद से चंद्रभाण चौहान और माणिकचंद चौहान आदि बड़े राजाओं की सेनाओं का उल्लेख ही नहीं किया है। स्पष्ट है कि शेख जैनी ने बिना जानकारी के ही सांगा की सेना का वर्णन किया है और चालाक बाबर ने उसी विवरण को अपनी पुस्तक में लिख दिया है।

 शेख जैनी ने लिखा है- ‘वह अभिमानी काफिर अर्थात् राणा सांगा जो कि दिल का अंधा और पत्थर-हृदय वाला था, अभागे एवं विनाश को प्राप्त होने वाले काफिरों की सेना लेकर इस्लाम के अनुयाइयों से युद्ध करने हजरत मुहम्मद की जिन पर अल्लाह की कृपा हो, शरीअत के विनाश हेतु अग्रसर हुआ। बादशाही सेना के मुजाहिद आसमानी आदेश के समान काने दज्जाल पर टूट पड़े।’

इस्लाम में मान्यता है कि कयामत से पहले दज्जाल नामक शैतान प्रकट होगा जो एक आंख से काना होगा। शेख जैनी ने महाराणा सांगा की तुलना उसी दज्जाल से की है क्योंकि महाराणा सांगा भी एक युद्ध में अपनी एक आंख गंवा चुका था! देखा जाए तो शेख जैनी ने ठीक ही लिखा है कि दज्जाल था महाराणा सांगा क्योंकि मुगलों के लिए वह मौत और कयामत का संदेश लेकर आया था।

शेख जैनी ने लिखा है- ‘उस दज्जाल ने बुद्धिमानों पर यह बात स्पष्ट कर दी कि जब दुर्भाग्य प्रारम्भ हो जाता है तो आंखें भी अंधी हो जाती हैं और उनके सामने यह आयत रख दी- जो कोई भी व्यक्ति सच्चे धर्म को उन्नति देने की चेष्टा करता है वह अपनी आत्मा के भले के लिए ही प्रयत्नशील होता है।’

अर्थात् शेख जैनी के अनुसार राणा सांगा ने हिन्दुओं को समझाया कि वे सच्चे धर्म की उन्नति के लिए प्रयत्नशील होकर अपनी आत्मा का भला करें। चूंकि हिन्दुओं का दुर्भाग्य आरम्भ हो गया था इसलिए वे अंधे हो गए थे और उन्हें दज्जाल अर्थात् राणा सांगा की बातें अच्छी लगने लगी थीं!

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शेख जैनी ने लिखा है- ‘इस समय काफिर सेना खानवा गांव के क्षेत्र में स्थित एक पहाड़ी के निकट पड़ाव किए हुए थी और हमारी सेना से दो कुरोह अर्थात् 4 मील दूर थी। जब दुष्ट काफिरों ने इस्लाम की सेना की गूंज सुनी तो उन्होंने अपनी अभागी सेना की पंक्तियाँ सुव्यवस्थित कर लीं और वे संगठित एवं एक-हृदय होकर पर्वत रूपी एवं देव सरीखे हाथियों पर भरोसा करके इस्लामिक शिविर की ओर अग्रसर हुए। उन्हें देखकर इस्लामी सेना के योद्धा भी अपने सेना की पंक्तियों को सुव्यवस्थित करके अपने कलगी को ऊंचा किए हुए अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए अग्रसर हुए। हमने सावधानी के लिए रूम के गाजियों का अनुसरण करते हुए तुफंगचियों अर्थात् बंदूकचियों और राद-अंदाजों अर्थात् तोपचियों को सेना के आगे रखा तथा गाड़ियों की पंक्तियों को जंजीरों से बांधकर उनके आगे रखा।’ शेख जैनी ने बाबर की सेना के सेनापतियों की एक लम्बी सूची दी है तथा बाबर की सेना के दाईं एवं बाईं ओर नियुक्त तूलगमा सेना का भी वर्णन किया है।

बाबर ने अपनी सेना में कुछ ऐसे अधिकारी नियुक्त किए जो युद्ध के दौरान सेना के प्रत्येक हिस्से से सूचनाएं बाबर तक पहुंचाते रहें तथा बाबर के आदेश लेकर सेना के प्रत्येक हिस्से में ‘खानों’ एवं ‘बेगों’ तक पहुंचाएं। संभवतः युद्ध के दौरान नियुक्त होने वाले इस तरह के संदेशवाहकों का उल्लेख भारत के इतिहास में पहली बार मिलता है। इस व्यवस्था के कारण सेना के प्रत्येक अंग में तालमेल बना रहता था और अफवाहें नहीं फैल पाती थीं।

हिन्दुओं की सेना में इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए हिन्दुओं की सेना में किसी भी अफवाह का फैल जाना एक आम समस्या थी। मुस्लिम सेनाओं को भारतीयों की इस कमजोरी का पता था इसलिए वे युद्ध के दौरान हिन्दू-सेना में अफवाहें फैलाते रहते थे।

अफगानिस्तान से आने वाली मुस्लिम सेनाओं में पानी पिलाने वालों की नियुक्ति भी की जाती थी जो युद्ध के मैदान में घूम-घूमकर सैनिकों एवं घायलों को पानी पिलाते रहते थे। हिन्दुओं की सेना में इस तरह की नियुक्तियों के बारे में इतिहास की किसी भी पुस्तक में उल्लेख नहीं मिलता है।

लगभग एक पहर तथा दो घड़ी दिन व्यतीत हो जाने पर दोनों ओर की सेनाएं एक दूसरे के निकट पहुंच गईं। अब युद्ध किसी भी क्षण आरम्भ हो सकता था।

बाबर ने लिखा है- ‘जिस प्रकार प्रकाश का अंधकार से युद्ध हुआ करता है, उसी प्रकार दोनों दलों की मुठभेड़ हुई। दायें तथा बायें बाजू में ऐसा घनघोर युद्ध आरम्भ हुआ मानो भूकम्प आ गया हो और आकाश की अंतिम सीमा पर तेज झनझनाहट होने लगी हो!’

बाबर और शेख जैनी के विवरणों के आधार पर यह सत्य ही प्रतीत होता है कि मुगल सैनिकों के लिए दज्जाल था महाराणा सांगा जो मुसलमानों का विनाश के लिए कयामत का दूत बनकर आया था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मेड़तिया राठौड़ महाराणा सांगा को खानवा के मैदान से बाहर ले गए! (30)

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मेड़तिया राठौड़ महाराणा सांगा को खानवा के मैदान से बाहर ले गए!

जब खानवा के मैदान में बाबर से लड़ते हुए महाराणा सांगा के प्राण संकट में आ गए तब मेड़तिया राठौड़ महाराणा सांगा को खानवा के मैदान से बाहर ले गए!

17 मार्च 1527 को बाबर तथा महाराणा सांगा की सेनाएं खानवा के मैदान में लगभग एक पहर तथा दो घड़ी दिन व्यतीत हो जाने पर एक दूसरे के बिल्कुल निकट आ गईं। आधुनिक शब्दावली में इसे लगभग प्रातः साढ़े नौ बजे का समय कह सकते हैं। अब किसी भी समय युद्ध आरम्भ हो सकता था।

इस युद्ध का इतिहास लिखने वाले समस्त लेखकों ने लिखा है कि युद्ध का आरम्भ राजपूतों ने किया। कुछ ख्यातों के अनुसार हिन्दुओं की ओर से युद्ध का पहला डंका मेड़तिया राठौड़ राजा वीरमदेव ने बजाया जो भगवान श्रीकृष्ण की भक्त मीरांबाई का ताऊ था।

राजपूतों ने बाबर की सेना के दाहिने पक्ष पर धावा बोलकर उसे अस्त-व्यस्त कर दिया। इस पर बाबर ने राजपूतों के बायें पक्ष पर अपने चुने हुए सैनिकों को लगा दिया। इससे युद्ध ने विकराल रूप ले लिया। थोड़ी ही देर में राजपूतों की सेना में घुसने के लिये वामपक्ष तथा मध्यभाग का मार्ग खुल गया।

मुस्तफा रूमी ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपने तोपखाने को आगे बढ़ाया और राजपूत सेना पर गोलों तथा जलते हुए बारूद की वर्षा आरम्भ कर दी। मुगलों के बायें पक्ष पर भी भयानक युद्ध हो रहा था। इसी समय तूलगमा सेना ने हिन्दुओं पर पीछे से आक्रमण किया। देखते ही देखते हिन्दू सेना चारों ओर से घेर ली गई। हिन्दुओं के लिये तोपों की मार के समक्ष ठहरना असम्भव हो गया। वे तेजी से घटने लगे।

बाबर ने लिखा है कि काफिरों की सेना के बाएं बाजू ने इस्लामी सेना के दाएं बाजू पर निरंतर कड़े आक्रमण किए। वे गाजियों पर टूट-टूट पड़ते थे किंतु हर बार धकेल दिए जाते थे या विजय की तलवार द्वारा दोजख में जहाँ वे जलने के लिए फैंक दिए जाएंगे और जहाँ वे कष्ट में जीवन व्यतीत किया करेंगे, भेज दिए जाते थे। प्रत्येक जिहादी अपना उत्साह प्रदर्शित करने के लिए उद्यत था।

शेख जैनी ने लिखा है- ‘जब कुछ देर युद्ध होता रहा तो यह आदेश दिया गया कि शाही सेना के विशेष दस्ते जिनमें बड़े-बड़े योद्धा तथा निष्ठा के जंगल के सिंह थे और जो गाड़ियों के पीछे बंधे हुए सिंहों की भांति खड़े थे, केन्द्र की दाईं एवं बाईं ओर से निकलकर तुफंगचियों अर्थात् बंदूकचियों को बीच में छोड़कर दोनों ओर से युद्ध आरम्भ कर दें।’

वस्तुतः शेख जैनी ने जिन्हें विशेष शाही दस्ते लिखा है, वे तूलगमा की टुकड़ियां थीं जिन्हें युद्ध के बीच में अपनी सेना से अलग होकर शत्रु के पार्श्वों एवं पीछे के भाग पर धावा बोलने के लिए प्रशिक्षित किया गया था।

शेख जैनी ने लिखा है- ‘जिस प्रकार उषा क्षितिज की दरार से निकलती है उसी प्रकार शाही सैनिक गाड़ियों के पीछे से निकले। उन्होंने उन अभागे काफिरों के रक्त को रणक्षेत्र में जो आकाश के समान था, बहा दिया और विद्रोहियों के सिरों को सितारों के अस्तित्व के समान मिटा दिया।’

जैनी ने लिखा है- ‘अली कुली ने जो अपने सैनिकों सहित केन्द्र में था, अत्यधिक पौरुष का प्रदर्शन किया। उसने लोहे के वस्त्र वाले काफिरों के शरीरों पर इतने बड़े-बड़े पत्थर फैंके जो उस तराजू पर रखने योग्य हैं जिन पर लोगों के कर्म तोले जाएंगे। जर्जबन एवं तुफंग अर्थात् बंदूक चलाने वालों ने भी गाड़ियों के पीछे से निकल कर काफिरों को मृत्यु का विष चखा दिया। पैदल सैनिकों ने भी एक बड़े ही खतरनाक स्थान से शत्रुदल में प्रविष्ट होकर स्वयं को सिंह सिद्ध किया। कुछ तोपें सेना के केन्द्र में भी रखी गई थीं, बादशाह उन्हें अपने साथ लेकर स्वयं शत्रु की सेना की ओर अग्रसर हुआ।’

शेख जैनी ने लिखा है- ‘जिस समय गाजी, काफिरों के सिर काट रहे थे, उस समय आकाशवाणी हुई कि यदि तुम विश्वास रखते हो तो तुम्हें अविश्वासियों पर विजय प्राप्त होगी। अल्लाह की ओर से सहायता एवं तत्काल विजय है, तुम यह सुखद समाचार मोमिनों के पास ले जाओ। इस आकाशवाणी को सुनकर गाजियों ने इतना जी लगाकर युद्ध किया कि फरिश्ते उनको शाबासी देने लगे तथा पतंगों के समान गाजियों के सिरों के चारों ओर चक्कर काटने लगे।’

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इसी बीच महाराणा सांगा किसी हथियार की चपेट में आ जाने से बेहोश हो गया। इस पर मेड़तिया राठौड़ वीरमदेव महाराणा सांगा को युद्ध भूमि में से निकाल ले गया। इस प्रयास में राजा वीरमदेव स्वयं बुरी तरह घायल हुआ और उसके दोनों भाई रायमल मेड़तिया एवं रतनसिंह मेड़तिया युद्ध-क्षेत्र में ही वीरगति को प्राप्त हुए। पाठकों की सुविधा के लिए बताना समीचीन होगा कि राणा सांगा की एक रानी जोधपुर की राजकुमारी थी तथा जोधपुर के शासक राव गांगा की बहिन थी। राव गांगा किसी कारण से इस युद्ध में स्वयं नहीं जा सका था। इसलिए गांगा ने मेड़तिया राठौड़ राजा वीरमदेव को चार हजार सैनिक देकर सांगा की तरफ से लड़ने के लिए भेजा था जो कि गांगा के ही कुल का राजकुमार था। कुछ ख्यातों में लिखा है कि खानवा के युद्ध-क्षेत्र में नगाड़े की पहली चोट वीरमदेव मेड़तिया ने ही की थी। वीरमदेव के छोटे भाई रतनसिंह विख्यात कृष्ण.भक्त मीरांबाई के पिता थे जो इस युद्ध में काम आए। मीराबाई का विवाह राणा सांगा के बड़े पुत्र भोजराज से हुआ था। भोजराज भी एक युद्ध में शत्रुओं से लड़ते हुए काम आया था।

जब मेड़तिया राठौड़ राणा को युद्ध-क्षेत्र से बाहर ले जाने लगे तो मेवाड़ी सरदारों ने सलूम्बर के रावत रत्नसिंह से अनुरोध किया कि वह राज्यचिह्न धारण करके हाथी पर सवार हो जाए ताकि राणा के पक्ष के सैनिक उस हाथी को देखकर युद्ध करते रहें। रावत रत्नसिंह महाराणा के ही कुल का राजा था।

रावत रत्नसिंह ने सरदारों का यह प्रस्ताव यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि- ‘मेरे पूर्वज मेवाड़ छोड़ चुके हैं, इसलिए मैं एक क्षण के लिए भी राज्यचिह्न धारण नहीं कर सकता किंतु तुम में से जो कोई भी मेवाड़ के राज्यचिह्न धारण करेगा मैं उसके लिए प्राण रहने तक शत्रु से लड़ूंगा।’

इस पर मेवाड़ के सरदारों ने हलवद के राजा झाला अज्जा को समस्त राज्य चिह्नों के साथ महाराणा के हाथी पर सवार कर दिया। हलवद गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित था। समस्त हिन्दू सेना झाला अज्जा को ही महाराणा समझकर युद्ध करती रही। थोड़ी देर के लिए राजपूतों के दल में खलबली मची किंतु अंत में वे बाबर की सेना को चीरते हुए बाबर के निकट पहुंच गए।

इसी समय राजपूतों पर तोपों से गोले बरसाए गए और राजपूतों को एक बार फिर पीछे हट जाना पड़ा। यह एक विचित्र लड़ाई थी। बंदूक से तीर लड़ रहे थे और तोपों से तलवारें लड़ रही थीं। यह मुकाबला किसी भी तरह बराबरी का नहीं था।

डूंगरपुर का राजा उदयसिंह, अंतरवेद के माणिकचंद चौहान और चंद्रभाण चौहान, रत्नसिंह चूण्डावत, झाला अज्जा, रामदास सोनगरा, परमार गोकलदास और खेतसी आदि अनेक हिन्दू राजा इस युद्ध में काम आये। इस प्रकार राजपूताना के अनेक राजाओं तथा उनकी सेनाओं ने इस युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी।

यह हिन्दुओं की ओर से मुसलमानों के विरुद्ध लड़ा गया संभवतः अंतिम युद्ध था जिसमें आम्बेर के कच्छवाहे, मेवाड़ के गुहिल, मेड़तिया राठौड़, चौहान, चूण्डावत, झाला, कच्छवाहा, सोनगरा और परमार सहित राजस्थान के समस्त राजकुलों के राजा, राजकुमार एवं सामंत मेवाड़ के महाराणा के नेतृत्व में एक साथ होकर लड़े।

दुर्भाग्य से इस युद्ध में हिन्दुओं की हार हुई तथा मुगलों ने डेरों तक उनका पीछा किया।                         

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सलहदी और खानजादा ने युद्ध के बीच में सांगा को छोड़ दिया (31)

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सलहदी और खानजादा - www.bharatkaitihas.com
सलहदी और खानजादा ने युद्ध के बीच में सांगा को छोड़ दिया!

जिस समय महाराणा सांगा बाबर से लड़ने के लिए खानवा के मैदान में उतरा, उस समय दो मुसलमान सरदार सलहदी और खानजादा भी सांगा की तरफ से मैदान में उतरे किंतु उन्होंने युद्ध आरम्भ होते ही महाराणा सांगा को छोड़ दिया तथा बाबर से जा मिले!

17 मार्च 1527 को खानवा के मैदान में बाबर एवं महाराणा सांगा के बीच हुए युद्ध में सांगा किसी हथियार के लगने से घायल होकर मूर्च्छित हो गया तथा मेड़ता का राजा वीरमदेव सांगा को युद्ध के मैदान से बाहर ले गया। आम्बेर, मेवाड़, मेड़ता, जोधपुर, बीकानेर आदि राज्यों की ख्यातों में बड़ी संख्या में उन हिन्दू योद्धाओं के नाम दिए गए हैं जो इस युद्ध में काम आए थे। राजपूतों की ऐसी कोई शाखा नहीं थी जिसका कोई प्रमुख राजा इस युद्ध में न काम आया हो!

दूसरी ओर बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में इस बात पर मौन ही धारण किया है कि बाबर के पक्ष के कौन-कौन से मुसलमान सेनापति एवं बेग इस युद्ध में काम आए।

भाटों के एक दोहे से प्रकट होता है कि बाबर की सेना के पचास हजार सैनिक इस युद्ध में काम आए थे। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है कि यह संभव है कि बाबर की सेना का भीषण संहार हुआ हो। इसमें कोई दो राय नहीं कि बाबर ने यह लड़ाई तोपों और बंदूकों के बल पर जीती थी और हिन्दुओं ने यह लड़ाई तीरों एवं तलवारों पर आश्रित होने के कारण हारी थी। फिर भी कुछ ऐसे अवसर आए थे जब महाराणा सांगा इस युद्ध को अपने पक्ष में कर सकता था।

पानीपत के युद्ध की समाप्ति के तुरंत बाद महाराणा सांगा के पास एक बड़ा अवसर था जब वह बाबर को परास्त कर सकता था। सांगा को चाहिए था कि वह स्वयं पानीपत, दिल्ली अथवा आगरा के आसपास अपनी सेनाओं को लेकर तैयार रहता ताकि जैसे ही बाबर पानीपत के मैदान से आगे बढ़ता, सांगा उस पर टूट पड़ता और उसे दिल्ली तथा आगरा पहुंचने ही नहीं देता।

सांगा ने बाबर को अगले युद्ध की तैयारी का पूरा अवसर दिया, इसे सांगा की रणनीतिक कमजोरी ही कहना चाहिए। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि सांगा को आशंका थी कि गुजरात का सुल्तान मेवाड़ पर आक्रमण करने की तैयारियां कर रहा था, इसलिए सांगा पानीपत से दूर रहा।

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बाबर ने पानीपत के युद्ध में तूलगमा टुकड़ियों का प्रयोग किया था, यदि सांगा ने अपने गुप्तचरों को पानीपत के युद्ध की टोह लेने भेजा होता तो सांगा को इन टुकड़ियों की कार्यप्रणाली के बारे में ज्ञात हो जाता और वह भी इसी प्रकार की तैयारी कर सकता था किंतु सांगा परम्परागत युद्ध तकनीक पर ही आंख मूंद कर भरोसा किये रहा और शत्रु-दल के छल-बल के बारे में नहीं जान सका। पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की पराजय के बाद राणा सांगा को यह ज्ञात हो चुका होगा कि तोपों और बंदूकों के सामने तीरों और तलवारों से कुछ नहीं हो सकेगा। इसलिए सांगा को चाहिए था कि वह बाबर को अपनी तोपें लेकर खानवा तक नहीं पहुंचने देता। यदि वह बाबर पर उस समय हमला बोलता जब बाबर अपनी तोपों को आगरा से मंधाकुर तथा सीकरी होता हुआ खानवा की ओर बढ़ा रहा था तो बाबर को तोपों में बारूद भरने का समय ही नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में बाबर को तीरों, भालों और तलवारों से लड़ना पड़ता। उसे बंदूकों से कुछ सहायता मिलती फिर भी राजपूत मुगलों को आसानी से काबू कर लेते। एल्फिंस्टन ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ इण्डिया में लिखा है- ‘यदि राणा मुसलमानों की पहली घबराहट पर ही आगे बढ़ जाता तो उसकी विजय निश्चित थी।’

इसमें कोई संदेह नहीं कि हिन्दू-राजा हिन्दू-अस्मिता की रक्षा के लिए लड़े किंतु उनकी युद्ध-तकनीक हजारों साल पुरानी थी इस कारण वे समरकंद और अफगानिस्तान से आए बाबर के सामने टिक नहीं सके जिनके पास मंगोलों, तुर्कों, उज्बेकों, रूमियों तथा ईरानियों से प्राप्त युद्ध कौशल एवं युद्ध तकनीकें थीं। यद्यपि यह कहा जा सकता है कि खानवा के युद्ध में बाबर की तोपें और बंदूकें जीत गईं तथा हिन्दुओं के तीर-कमान, तलवारें और भाले हार गये तथापि यह भी सच है कि गुहिलों के नेतृत्व में लड़े गये इस युद्ध में हिन्दू राजाओं की पराजय के और भी बड़े कारण थे। हिन्दू राजा अब भी युद्ध सम्बन्धी नैतिकताओं का पालन करते हुए शत्रु पर सामने से आक्रमण करने के सिद्धांत पर डटे हुए थे।

दूसरी ओर बाबर पर युद्ध सम्बन्धी नैतिकता का कोई बंधन नहीं था। उसकी तूलगमा युद्ध-पद्धति का तो आधार ही पीछे से वार करना, धोखा देकर युद्ध-क्षेत्र में घुसना और शत्रु को चारों तरफ से घेरकर मारने का था। जब हिन्दू सामने खड़े शत्रु से लड़ रहे थे तब बाबर की सेनाओं ने दोनों ओर से प्रहार करके हिन्दुओं को पराजित कर दिया।

बाबर घोड़े पर सवार था जबकि महाराणा अपने राज्यचिह्नों को धारण करके हाथी पर सवार हुआ। यह हिन्दू-पक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी थी। इससे बाबर के सैनिकों ने राणा को दूर से ही पहचान लिया और दूर से ही उस पर निशाना साध लिया।

युद्ध में सांगा की हार का एक कारण यह भी था कि युद्ध आरम्भ होते ही सलहदी और खानजादा सांगा का पक्ष छोड़कर बाबर की तरफ भाग गए। विभिन्न ख्यातों के संदर्भ से कविराजा श्यामलदास ने अपने ग्रंथ वीरविनोद में लिखा है कि युद्ध आरम्भ होते ही रायसेन का मुस्लिम शासक सलहदी महाराणा सांगा का पक्ष त्यागकर बाबर की तरफ चला गया।

कर्नल टॉड तथा हरबिलास सारड़ा ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है। डॉ. के. एस. गुप्ता तथा उनके साथी लेखकों ने लिखा है कि जब राणा सांगा घायल हो गया तब रायसेन का मुस्लिम शासक सलहदी तथा नागौर का मुस्लिम शासक खानजादा, महाराणा सांगा का पक्ष त्यागकर बाबर से जा मिले। सलहदी और खानजादा ने बाबर को बताया कि सांगा युद्ध-क्षेत्र में घायल होकर मूर्च्छित हो गया है। इस कारण सांगा को युद्ध-क्षेत्र में से निकाल लिया गया है।

गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने सलहदी द्वारा सांगा का पक्ष त्यागकर बाबर के पक्ष में जाने को स्वीकार नहीं किया है। अंग्रेज इतिहासकारों रशब्रुक विलियम्स, अर्सकिन तथा स्टेन्ली लेनपूल ने भी इस मत का विरोध किया है कि सलहदी बाबर से मिल गया था। सलहदी अपने जन्म के समय पंवार राजपूत था किंतु बाद में किसी काल में मुसलमान हो गया था। बाबर ने उसका नाम सलाहुद्दीन लिखा है।

उसका पुत्र भूपत राव संभवतः हिन्दू ही बना रहा था। कहा नहीं जा सकता कि जिस समय सलहदी सांगा का पक्ष त्यागकर बाबर की तरफ गया उस समय भूपतराव ने क्या निर्णय लिया किंतु इस बात की संभावना अधिक है कि भूपतराव सांगा के पक्ष में बना रहा और युद्ध-क्षेत्र में लड़ते हुए काम आया।

सलहदी तथा खानजादा द्वारा सांगा का पक्ष छोड़कर बाबर की तरफ भागने का कारण यह प्रतीत होता है कि बाबर ने इस युद्ध को जेहाद घोषित किया था और अपनी सेनाओं को इस्लाम की सेना घोषित किया था। फिर भी इस युद्ध में कम से कम तीन बड़े मुस्लिम सेनापति राणा सांगा की तरफ से लड़े। इनमें मेवात का शासक हसन खाँ मेवाती, सिकंदर लोदी का पुत्र महमूद खाँ तथा रायसेन का शासक सलहदी सम्मिलित थे। ये लोग खानवा के मैदान में सांगा की सहायता करके अपने राज्यों की मुक्ति का मार्ग खोलना चाहते थे।

इन तीन मुस्लिम सेनापतियों में से केवल हसन खाँ मेवाती वीरतापूर्वक लड़ते हुए रणक्षेत्र में काम आया। सलहदी और खानजादा की गद्दारी हसन खाँ मेवाती को अपने निश्चय से नहीं डिगा सकी। सिकंदर लोदी का पुत्र महमूद खाँ लोदी युद्ध-क्षेत्र से पलायन कर गया। सलहदी तो युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले ही सांगा को छोड़कर बाबर से जा मिला था।

बाबर ने हिन्दुओं पर विजयचिह्न के तौर पर शत्रु सैनिकों के सिरों की एक मीनार बनवाई। इसके बाद बाबर बयाना की ओर चला। अब वह राणा के देश पर चढ़ाई करना चाहता था किंतु ग्रीष्म ऋतु का आगमन जानकर उसने यह विचार त्याग दिया।                                                      

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराणा सांगा की शपथ (32)

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महाराणा सांगा की शपथ

जब मेवाड़ी सरदार युद्धक्षेत्र में बेहोश हो गए सांगा को युद्धक्षेत्र से बाहर निकाल लाए। होश में आने पर महाराणा सांगा को बहुत दुख हुआ। उसने अपने सरदारों को बहुत कोसा तथा फिर से लड़ने के लिए तैयार हो गया। महाराणा की शपथ थी कि वह बाबर को जीते बिना चित्तौड़ वापस नहीं जाएगा! 

बंदूकों और तोपों तथा तूलगमा टुकड़ियों के बल पर बाबर ने खानवा का युद्ध जीत लिया तथा महाराणा सांगा के घायल हो जाने के कारण सांगा के सामंत सांगा को युद्ध-क्षेत्र से बाहर ले गए। बाबर तोपों और बंदूकों के बल पर ही काबुल से आगरा तक आया था किंतु खानवा के मैदान में मिली जीत उसके लिए अप्रत्याशित थी। सलहदी के 30 हजार सैनिकों का युद्ध-क्षेत्र में सांगा को छोड़कर बाबर की तरफ जाना भी बाबर की विजययात्रा में मील का पत्थर सिद्ध हुआ था।

बाबर ने लिखा है- ‘शत्रुओं को पराजित करके हमने उन्हें एक-एक करके घोड़ों से गिराते हुए उनका पीछा किया। काफिरों का शिविर हमारे शिविर से दो कोस दूरी पर रहा होगा। हमने सांगा के शिविर में पहुंच कर मुहम्मदी, अब्दुल अजीज, अली खाँ तथा कुछ अन्य लोगों को सांगा का पीछा करने के लिए भेजा।’

बाबर ने पश्चाताप करते हुए लिखा है- ‘काफिर के शिविर से लगभग एक कोस आगे निकल जाने के उपरांत दिन का अंत हो गया। इस कारण मैं लौट आया। मैंने सांगा का पीछा करने में थोड़ी शिथिलता कर दी। मुझे स्वयं जाना चाहिए था और जिस कार्य की मुझे इच्छा थी, उसे अन्य लोगों पर नहीं छोड़ना चाहिए था। मैं अपने शिविर में सोने के समय की नमाज के वक्त पहुंचा।’

बाबर ने लिखा है- ‘मुहम्मद शरीफ ज्योतिषी ने मेरी पराजय की भविष्यवाणी करके मुझे परेशानी और चिंता में डाल दिया था किंतु वह मुझे बधाई देने के लिए आया। मैंने उसे बहुत सारी गालियां देकर उसे खूब अपमानित किया किंतु उसकी पिछली सेवाओं का विचार करके उसे एक लाख मुद्राएं दीं तथा उससे कहा कि अब वह मेरा राज्य छोड़कर चला जाए। मेरे राज्य में न ठहरे।’

अगले दिन बाबर ने खानवा में ही पड़ाव किया तथा खानवा की पहाड़ी पर हिन्दुओं के कटे हुए सिरों की मीनार बनवाकर गाजी की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है काफिरों पर बिजली गिराने वाला या काफिरों पर बिजली बनकर गिरने वाला।

शेख जैनी ने लिखा है कि खानवा की जीत के बाद शाही तुगरा में बाबर को गाजी लिखा जाने लगा। बाबर ने लिखा है कि फतहनामा के तुगरा के नीचे मैंने यह रुबाई लिखी-

इस्लाम के लिए मैं वनों में चक्कर लगाता रहा।

काफिरों तथा हिन्दुओं से युद्ध की तैयारी करता रहा।

मैंने शहीदों के समान मरना निश्चय किया

अल्लाह को धन्यवाद है, मैं गाजी हो गया।

कुछ समय बाद जब बाबर ने राजपूतों के विरुद्ध कई युद्ध जीत लिए तब उसने भारत के क्षत्रियों का विश्लेषण करते हुए लिखा- ‘राजपूत मरना जानते हैं पर जीतना नहीं जानते!’ खानवा के मैदान से भी केवल यही कटु-सत्य सामने आया था। खानवा में राजपूत बड़ी संख्या में मृत्यु को प्राप्त हुए किंतु जीत नहीं सके!

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उधर जब मूर्च्छित महाराणा को लेकर उसके सामंत आम्बेर राज्य में स्थित बसवा गांव में पहुंचे, तब महाराणा सचेत हुआ और उसने अपने मंत्रियों से पूछा कि सेना की क्या हालत है तथा विजय किसकी हुई? अपने सामंतों से युद्ध-क्षेत्र का समस्त वृत्तांत सुनकर महाराणा ने अपने मंत्रियों एवं सेनापतियों पर रोष प्रकट किया कि वे उसे युद्धस्थल से इतना दूर क्यों ले आए हैं! सांगा ने अपने मंत्रियों एवं सेनापतियों को आदेश दिया कि यहीं डेरा डाल दें तथा बाबर से पुनः युद्ध की तैयारी आरम्भ करें। महाराणा की शपथ थी कि जब तक बाबर को विजय न कर लूंगा, चित्तौड़ नहीं लौटूंगा। राणा अपनी सेना एवं सामंतों को लेकर बसवा से रणथंभौर चला गया। अपनी पराजय के कारण महाराणा बहुत उदास रहा करता था। एक दिन टोडरमल चांचल्या नामक एक चारण सांगा के पास आया। उसने महाराणा को एक गीत सुनाया जिसमें महाभारत एवं रामायण के महान् योद्धाओं पर आए संकटों के बारे में बताया गया था। इस गीत को सुनकर महाराणा के मन में फिर से उत्साह का संचार हुआ तथा उसने चारण को एक गांव पुरस्कार में दिया। महाराणा सांगा की शपथ थी और पक्की हो गई।

जनवरी 1528 में बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण करने का निश्चय किया। पाठकों को स्मरण होगा कि चंदेरी का किला महाराणा सांगा के अधीन था और उसने मेदिनीराय को चंदेरी का शासक नियुक्त किया था। बाबर कालपी, इरिच और खजवा होता हुआ 19 जनवरी 1528 को चंदेरी पहुंचा।

जब राणा सांगा को सूचना मिली कि बाबर चंदेरी पहुंच गया है तो सांगा ने भी बाबर के पीछे चंदेरी जाने का निर्णय लिया ताकि बाबर से अपनी पराजय का बदला लिया जा सके तथा महाराणा की शपथ पूरी हो सके। कुछ ही समय में सांगा भी कालपी के निकट इरिच गांव पहुंच गया।

कविराज श्यामलदास ने वीरविनोद में, हर विलास सारड़ा ने महाराणा सांगा में, गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने उदयपुर राज्य का इतिहास में लिखा है कि इरिच में सांगा के साथी राजपूतों ने जो नए युद्ध के विरोधी थे, सांगा को फिर से युद्ध में प्रवष्टि होता देखकर उसे विष दे दिया। विष का प्रभाव बढ़ता देखकर राणा के मंत्री एवं सामंत सांगा को लेकर वापस रणथंभौर लौटने लगे किंतु 30 जनवरी 1528 को कालपी में सांगा की मृत्यु हो गई। महाराणा सांगा की शपथ अधूरी रह गई।

इस प्रकार उस समय के सबसे प्रतापी हिन्दूपति महाराणा सांगा की जीवन-लीला का अंत हुआ। डॉ. के. एस. गुप्ता ने लिखा है कि राणा सांगा का स्वास्थ्य पुनः खराब हो जाने से सांगा का निधन हुआ। वीरविनोद में महाराणा की मृत्यु अप्रेल 1527 में होनी लिखी है जो कि स्वीकार्य नहीं है। चतुरकुल चरित्र में महाराणा की मृत्यु 30 जनवरी 1528 को होनी लिखी है, यह तिथि सत्य जान पड़ती है।

महाराणा की पार्थिव देह माण्डलगढ़ लाई गई और वहीं उसका अंतिम संस्कार किया गया। अमरकाव्य के अनुसार महाराणा का निधन कालपी में हुआ तथा माण्डलगढ़ में दाहक्रिया हुई। कविराज श्यामलदास ने खानवा के युद्ध-क्षेत्र से महाराणा को बसवा में लाये जाने, बसवा में ही निधन होने एवं बसवा में ही अंतिमक्रिया होने का उल्लेख किया है। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अमर काव्य के विवरण को सही माना है। अर्थात् महाराणा की मृत्यु कालपी में हुई तथा अंतिम क्रिया माण्डलगढ़ में हुई।

महाराणा की मृत्यु होते ही दिल्ली की सल्तनत पर बाबर का अधिकार पक्का हो गया। भारत में अब बाबर का मार्ग रोक सकने योग्य कोई शक्ति शेष न रही। खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा की पराजय ने भारत का इतिहास बदल दिया।

यदि बाबर का आगमन न हुआ होता तो इस बात की पूरी संभावना थी कि महाराणा संग्रामसिंह दिल्ली पर अधिकार कर लेता और जो दिल्ली, पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद तुर्कों के अधिकार में चली गई थी, एक बार पुनः हिन्दुओं के पास आ जाती किंतु भारत के भाग्य में ऐसा होना लिखा नहीं था!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया! (33)

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खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया

खानवा के युद्ध में हिन्दू राजाओं के पास एक अवसर था जब वे म्लेच्छों के शासन से सदैव के लिए मुक्ति पा सकते थे किंतु हिन्दुओं की पुरानी युद्ध पद्धति ने तथा महाराणा सांगा द्वारा सलहदी तथा खानजादा जैसे मुसलमान राजाओं पर भरोसा किए जाने की भूल ने यह अवसर खो दिया। खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया!

जब महाराणा सांगा का कालपी में निधन हो गया तो राजपूतों का संघ बिखर गया। सांगा के बाद राजपूतों का नेतृत्व करने वाला कोई प्रभावशाली हिन्दू नरेश नहीं रहा। इस कारण हिन्दुओं के प्रभाव को बड़ा धक्का लगा और पास-पड़ौस के मुसलमान राज्यों में राजपूतों का भय समाप्त हो गया।

इब्राहीम लोदी के समय में लोदी-सल्तनत के कमजोर पड़ जाने के समय से ही हिन्दू-शासक उत्तरी भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने का स्वप्न देख रहे थे किंतु खानवा के मैदान में हिन्दू-राजाओं की हार के कारण वह स्वप्न बिखर गया। भारत पर राज्य करने के लिए तुर्क भले ही जीवित नहीं बचे थे किंतु अब उनका स्थान मुगलों ने ले लिया।

इस प्रकार खानवा की पराजय हिन्दुओं के लिए अतीत में हो चुकी एवं भविष्य में होने वाली ढेर सारी पराजयों की तरह एक सामान्य पराजय नहीं थी अपितु यह एक युगांतकारी पराजय थी। इस युद्ध में पराजय के कारण हिन्दू नरेशों के हाथों से हिन्दुस्तान का राज्य मुट्ठी में बंद रेत की तरह फिसल गया। खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया!

यह पराजय इतनी ही दुर्भाग्यपूर्ण थी जितनी कि ई.1192 में हुई सम्राट पृथ्वीराज चौहान की पराजय, जितनी कि ई.1556 में हुई दिल्ली के हिन्दू सम्राट विक्रमादित्य हेमचंद्र की पराजय, जितनी कि ई.1761 में हुई मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ की पराजय।

खानवा युद्ध की पराजय के बाद राजपूताना एक बार फिर असुरक्षित हो गया और उस पर पास-पड़ोस के राज्यों के आक्रमण आरम्भ हो गये। राजपूताना की स्वतन्त्रता फिर से खतरे में पड़ गई। खानवा युद्ध ने भारत में विशाल मुगल साम्राज्य की स्थापना का मार्ग खोल दिया। अब बाबर की रुचि अफगानिस्तान से समाप्त होकर पूरी तरह भारत में हो गई।

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खानवा विजय के उपरान्त बाबर बयाना चला गया। उन दिनों बयाना को राजपूताने का दरवाजा कहा जाता था जहाँ से बाबर राजपूताना के भीतर घुसना चाहता था परन्तु भीषण गर्मी के कारण वह अलवर से आगे नहीं बढ़ सका। चूंकि हसन खाँ मेवाती की मृत्यु हो चुकी थी और उसके पुत्र नाहर खाँ को बाबर ने फिर से बंदी बना लिया था, इसलिए मेवात की रक्षा करने वाला कोई नहीं था। यही कारण था कि बाबर ने थोड़े से ही प्रयास से मेवात पर अधिकार कर लिया। बाबर ने लिखा है कि मेवात से सालाना चार करोड़ रुपए मालगुजारी प्राप्त होती थी। सांगा से मुक्ति पाने के बाद बाबर को अपने पक्ष की आंतरिक समस्याओं पर ध्यान देने का समय मिला। बाबर ने बदख्शां, काबुल, कांधार, गजनी एवं मध्य-एशिया के अन्य देशों से अपने साथ आए सिपाहियों से वायदा किया था कि जब खानवा का युद्ध समाप्त हो जाएगा, तब जो भी सिपाही अपने देश जाना चाहेगा, उसे लौटने की अनुमति दी जाएगी। अब वे सिपाही फिर से अपने देश जाने की मांग करने लगे। इस पर बाबर ने हुमायूँ को आदेश दिया कि वह इन सिपाहियों को अपने साथ लेकर काबुल चला जाए।

इसका कारण यह था कि बाबर की सेना में अधिकांश सैनिक बदख्शां तथा उसके आसपास के क्षेत्रों के रहने वाले थे और वे किसी भी कीमत पर भारत में रहने को तैयार नहीं थे।

बाबर का दायां हाथ समझा जाने वाला महदी ख्वाजा भी अपने देश लौट जाने को बड़ा व्याकुल था। उसे भी काबुल जाने की अनुमति दी गई। महदी ख्वाजा के पुत्र जाफर ख्वाजा ने भारत में रहना स्वीकार किया इसलिए उसे इटावा का गवर्नर नियुक्त किया गया। खानवा के युद्ध के बाद बाबर ने फतहनामा लिखवाया जिसमें उसने अपनी भारत- विजय का वर्णन विस्तार से करवाया तथा उसे मोमिन अली तवाची के साथ काबुल भेजा गया।

बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में लिखा है- ‘इस दौरान हसन खाँ मेवाती का पुत्र नाहर खाँ अब्दुर्रहीम की निगरानी से भाग गया।’

बाबर ने चंदवार तथा रापरी के लिए कुछ सैनिक टुकड़ियां रवाना कीं जहाँ इन स्थानों के पुराने तुर्क शासकों ने बाबर को खानवा के युद्ध में व्यस्त जानकर अधिकार कर लिया था। कुछ ही दिनों में चंदवार तथा रापरी फिर से बाबर के अधीन हो गए।

इटावा पर भी कुतुब खाँ ने अधिकार कर लिया था किंतु जब उसे ज्ञात हुआ कि महदी ख्वाजा का पुत्र जाफर ख्वाजा इटावा आ रहा है तो कुतुब खाँ इटावा छोड़कर भाग गया। इस प्रकार इटावा भी पुनः बाबर के अधिकार में आ गया।

बाबर ने सुल्तान मुहम्मद दूल्दाई को कन्नौज का गवर्नर नियुक्त किया था किंतु कन्नौज वालों ने उसे मारकर भगा दिया। इस पर बाबर ने दूल्दाई को सरहिंद का गवर्नर नियुक्त कर दिया तथा कन्नौज मुहम्मद सुल्तान मिर्जा को प्रदान कर दिया। कासिम हुसैन सुल्तान को बदायूं का गवर्नर नियुक्त किया गया।

मेवात पर विजय प्राप्त करने के बाद बाबर सम्भल गया और वहाँ से चन्देरी पर आक्रमण करने की योजनाएँ बनाने लगा। चन्देरी का दुर्ग चन्देरी नगर के सामने 230 फुट ऊँची चट्टान पर स्थित था। यह दुर्ग मालवा तथा बुन्देलखण्ड की सीमाओं पर स्थित था और मालवा से राजपूताना जाने वाली सड़क पर बना हुआ था। इस कारण चंदेरी व्यापारिक तथा सामरिक दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। चन्देरी दुर्ग पर इन दिनों राणा सांगा के दुर्गपति मेदिनी राय का अधिकार था तथा चन्देरी नगर में बहुत से धनपति रहते थे।

राणा सांगा की पराजय के बाद भी मेदिनी राय ने बाबर के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं किया था। इसलिए जनवरी 1528 में बाबर अपनी सेना के साथ चन्देरी पहुँचा। बाबर ने अपने सैनिकों को युद्ध के लिये प्रेरित करने हेतु इस युद्ध को भी ‘जेहाद’ का नाम दिया।

बाबर ने चन्देरी के दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। राजपूतांे ने अपनी पराजय निश्चित जानकर अपनी स्त्रियों को मौत के घाट उतार दिया तथा मरते दम तक मुगलों का सामना करते हुए रणखेत रहे। भीषण युद्ध के उपरान्त बाबर ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में भी राजपूतों का भीषण संहार हुआ। अहमदशाह को चन्देरी का शासक नियुक्त किया गया। राजा मेदिनी राय की दो कन्याएँ इस युद्ध में पकड़ी गईं जिनमें से एक कामरान को और दूसरी हुमायूँ को भेजी गई।

बाबर ने मेदिनी राय की कन्याओं के पकड़े जाने का उल्लेख नहीं किया है। वह लिखता है- ‘जब मेरे सैनिक मेदिनीराय के घर में घुसे तो उन्होंने देखा कि मेदिनीराय के आदमी मेदिनीराय के घर के सदस्यों की हत्या कर रहे थे। एक आदमी हाथ में तलवार लेकर खड़ा होता था और घर के सदस्य उस तलवार के नीचे गर्दन रखकर गर्दन कटवाते थे।’ यहाँ बाबर ने आधा सत्य बोला है। वस्तुतः मेदिनी राय के आदेश से उसके परिवार की महिलाओं की गर्दनें काटी गई थीं ताकि वे शत्रु के हाथों में न पड़ें और दुर्गति होने से बच सकें।

चंदेरी विजय बाबर की बड़ी विजयों मे से एक मानी जाती है। यहाँ से बाबर को विपुल धन राशि प्राप्त हुई। इस प्रकार पानीपत, चंदेरी एवं खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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