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मिर्जा हिंदाल का तरकस देखकर कामरान ने अपनी पगड़ी धरती पर फैंक दी (87)

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मिर्जा हिंदाल - www.bharatkaitihas.com
मिर्जा हिंदाल का तरकस देखकर कामरान ने अपनी पगड़ी धरती पर फैंक दी

उधर ख्वाजा इब्राहीम ने मिर्जा हिंदाल के शव को पहचान लिया तथा उसे उठाकर मिर्जा हिंदाल के डेरे पर ले गया। उसने हुमायूँ के समक्ष मिर्जा हिंदाल की मृत्यु का समाचार प्रकट नहीं किया, अपितु कहा कि इस विजय पर मिर्जा हिंदाल ने आपको बधाई भिजवाई है।

जब कामरान काबुल छोड़कर भाग गया ओर हुमायूँ की सेना ने अकबर को बरामद कर लिया तो हुमायूँ ने काबुल दुर्ग में प्रवेश करके अपने परिवार की महिलाओं से भेंट की तथा उन्हें सांत्वना प्रदान की। परिवार में सबको सकुशल देखकर हुमायूँ ने निर्धनों एवं दरवेशों में धन बंटवाया। उसने अपने विश्वस्त सेवकों को पुरस्कृत किया तथा दुष्ट मनुष्यों को सजा दी।

दीनदार बेग, हैदर दोस्त, मुगल कानजी और मस्तअली कुरची को प्राणदण्ड दिया गया। बादशाह ने अपनी पुत्री बख्शी बानू का विवाह मिर्जा सुलेमान के पुत्र मिर्जा इब्राहीम के साथ कर दिया तथा सुलेमान और इब्राहीम को पुरस्कृत करके बदख्शां भेज दिया।

हुमायूँ ने बंदी बनाकर रखे गए मिर्जा अस्करी को सुलेमान के साथ भेज दिया ताकि अस्करी को कड़े पहरे में रखा जा सके। जब हुमायूँ को ज्ञात हुआ कि कामरान दरवेश बन गया है तो हुमायूँ को बड़ा दुःख हुआ किंतु कुछ दिनों में उसके चित्त में शांति हो गई। उसने मिर्जा सुलेमान को आदेश भिजवाया कि वह मिर्जा अस्करी को बल्ख के रास्ते हज्जा भेज दे।

इस समय मिर्जा सुलेमान की एक पुत्री अविवाहित थी। हुमायूँ उससे विवाह करना चाहता था। अबुल फजल ने लिखा है कि बादशाह हुमायूँ सुलेमान की प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहता था इसलिए हुमायूँ ने मिर्जा सुलेमान के पास प्रस्ताव भिजवाया कि वह अपनी पुत्री का विवाह बादशाह के साथ कर दे।

इस प्रस्ताव को पाकर मिर्जा सुलेमान चिंतित हो गया। इस समय तक हुमायूँ 42 वर्ष का प्रौढ़ हो चुका था जबकि मिर्जा सुलेमान की पुत्री अभी छोटी बालिका ही थी। यह एक अजीब सी बात थाी क्योंकि कुछ ही दिनों पहले हुमायूं ने अपनी पुत्री का विवाह मिर्जा सुलेमान के पुत्र से किया था और अब हुमायूं मिर्जा सुलेमान की पुत्री से विवाह करना चाहता था।

मिर्जा सुलेमान बादशाह हुमायूँ के इस प्रस्ताव को अस्वीकार करके बादशाह से अपने सम्बन्ध नहीं बिगाड़ना चाहता था इसलिए उसने बादशाह से कहलवाया कि मैं बादशाह से अपनी पुत्री का विवाह करने के लिए तैयार हूँ किंतु अभी वह छोटी है, अतः उसके बड़े होने पर ही बादशाह से उसका विवाह करना उचित रहेगा। हुमायूँ ने मिर्जा सुलेमान की बात मान ली।

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उधर कामरान कुछ दिनों तक शांत रहने के बाद फिर से सक्रिय हो गया। उसने खलील और महमंद कबीलों के अफगानों को तथा कुछ बदमाश किस्म के भगोड़े सैनिकों को अपने साथ मिलाकर एक सेना खड़ी कर ली। गजनी के गवर्नर हाजी मुहम्मद खाँ पर हुमायूँ को बड़ा भरोसा था, वह भी कामरान के साथ मिलकर बादशाह हुमायूँ के विरुद्ध षड़यंत्र करने लगा। हुमायूँ ने कांधार के गवर्नर बैराम खाँ को निर्देश दिए कि वह हाजी मुहम्मद खाँ को समझा-बुझा कर बादशाह की सेवा में ले आए। जब हाजी मुहम्मद खाँ को बैराम खाँ के आने की जानकारी हुई तो उसने बैराम खाँ को काराबाग दुर्ग में छल से बंदी बनाने का षड़यंत्र रचा किंतु बैराम खाँ को समय रहते इस षड़यंत्र का पता लग गया और वह काराबाग दुर्ग में प्रवेश करने की बजाय दुर्ग के बाहर ही खेमा लगाकर बैठ गया। अंत में हाजी मुहम्मद तथा उसके भाई शाह मुहम्मद ने बैराम खाँ के साथ बादशाह की सेवा में चलना स्वीकार कर लिया। काबुल में बादशाह के सामने इन दोनों भाइयों का व्यवहार अत्यंत आपत्तिजनक था।

इस पर हुमायूँ ने बैराम खाँ को आदेश दिया कि इन दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया जाए। बादशाह ने उन दोनों भाइयों के अपराधों और उनके द्वारा बादशाह के प्रति की गई सेवाओं की सूची बनवाई। जांच अधिकारी ने बादशाह को उन 102 अपराधों की सूची दी जो इन दोनों भाइयों द्वारा किए गए थे। जबकि इन भाइयों ने बादशाह के प्रति अब तक एक भी सेवा का कार्य नहीं किया था। इस पर बादशाह ने इन दोनों भाइयों को मरवा दिया तथा बहादुर खाँ नामक एक अमीर को गजनी का शासक बना दिया।

एक बार कामरान सेना लेकर काबुल से केवल एक पड़ाव की दूरी तक आ पहुंचा। इस पर बादशाह हुमायूँ मिर्जा कामरान से लड़ने के लिए सेना लेकर गया। थोड़ी देर की लड़ाई के बाद कामरान पराजित होकर भाग गया। इस घटना के बाद मिर्जा कामरान ने सीधे काबुल पर आक्रमण करने की बजाय हुमायूँ की सल्तनत में स्थित अनेक स्थानों पर हमले किए तथा शाही खजाने को लूट कर भागता रहा।

कुछ समय बाद जब कामरान का जोर काफी बढ़ गया तो नवम्बर 1551 में बादशाह हुमायूँ ने मिर्जा हिंदाल तथा अकबर को अपने साथ लेकर कामरान के विरुद्ध अभियान किया। जब तूमान क्षेत्र के जपरियार गांव में शाही शिविर लगा हुआ था तब एक रात कामरान ने अफगानों की एक बड़ी सेना के साथ शाही शिविर पर हमला बोल दिया।

अंधेरे के कारण शत्रु और मित्र की पहचान करना संभव नहीं था। इसलिए हुमायूँ और अकबर अपने डेरे के पीछे एक ऊँचे स्थान पर खड़े हो गए। थोड़ी ही देर में चंद्रमा का उजाला हो गया और शत्रु की पहचान आसान हो गई। इस युद्ध में मिर्जा कामरान तो हारकर भाग गया किंतु मिर्जा हिंदाल मारा गया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि जब कामरान तथा हुमायूँ की सेनाओं के बीच युद्ध समाप्त हो गया और मिर्जा हिंदाल अपने डेरे को लौट रहा था तब हिंदाल को एक खाई से एक आदमी के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। कोई व्यक्ति सहायता के लिए पुकार लगाते हुए कह रहा था कि ये लोग मुझे तलवार से मार रहे हैं, कोई मुझे बचाओ।

हिंदाल ने इस आवाज को पहचान लिया। यह आवाज हिंदाल के तबकची की थी। हिंदाल अपने तबकची के प्राण बचाने के लिए उसी समय उस खाई में कूद पड़ा। उसी दौरान मिर्जा हिंदाल वीरगति को प्राप्त हुआ।

अबुल फजल ने लिखा है कि जिस अफगान सैनिक ने मिर्जा हिंदाल को जहर-बुझा भाला मारा था, वह हिंदाल के शरीर से उसका तरकस उतार कर ले गया तथा उस तरकस को मिर्जा कामरान के समक्ष प्रस्तुत किया। मिर्जा कामरान ने उस तरकस को देखते ही पहचान लिया और वह समझ गया कि यह मिर्जा हिंदाल का तरकस है। भाई के मरने का समाचार सुनते ही कामरान ने अपनी पगड़ी उतारकर धरती पर फैंक दी।

उधर ख्वाजा इब्राहीम ने मिर्जा हिंदाल के शव को पहचान लिया तथा उसे उठाकर मिर्जा हिंदाल के डेरे पर ले गया। उसने हुमायूँ के समक्ष मिर्जा हिंदाल की मृत्यु का समाचार प्रकट नहीं किया, अपितु कहा कि इस विजय पर मिर्जा हिंदाल ने आपको बधाई भिजवाई है।

हुमायूँ इस वाक्य में छिपे हुए मर्मान्तक संदेश को समझ गया। उसने गुलबदन के पति ख्वाजा खिज्र खाँ से कहा कि वह मिर्जा हिंदाल का शव लेकर काबुल जाए। जब ख्वाजा खिज्र खाँ रोने लगा तो हुमायूँ ने कहा कि अभी शत्रु पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ है इसलिए कमजोरी दिखाना उचित नहीं है।

हुमायूँ के आदेश से मिर्जा हिंदाल का शव काबुल ले जाया गया तथा बाकर के पैरों की तरफ दफना दिया गया। इस पर बाबर के एक और बेटे की इस असार संसार से विदाई हो गई। पाठकों को स्मरण होगा कि बाबर के बहुत से पुत्र बाबर के जीवन काल में ही मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। बाबर की मृत्यु के 21 साल बाद बाबर का यह पहला पुत्र था जो मृत्यु को प्राप्त हुआ।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ को चकमा देकर कामरान अफगानिस्तान से भारत भाग गया (88)

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हुमायूँ को चकमा देकर कामरान अफगानिस्तान से भारत भाग गया

अब हुमायूँ कामरान से सदैव के लिए छुटकारा पाने का निश्चय कर चुका था। इसलिए वह सेना लेकर कामरान को ढूंढने लगा। कामरान भी समझ गया कि अंब हमायूँ के हाथों में पड़कर बचना कठिन है। इसलिए वह हुमायूँ को चकमा देकर अफगानिस्तान से भारत भाग जाने की जुगत भिड़ाने लगा!

मिर्जा हिंदाल की मृत्यु पर मुगलों के खेमे में भयानक शोक छा गया। बाबर के बेटों की आपसी लड़ाई का ऐसा भयावह परिणाम निकलेगा, इसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी। जिस सल्तनत को बनाने के लिए बाबर ने अपना पूरा जीवन खपा दिया था, बाबर के बेटे न तो उस सल्तनत को आगे बढ़ा पा रहे थे और न उसे सुरक्षित रख पा रहे थे। हुमायूँ के लाख प्रयास करने पर भी कामरान मुगलों की आपसी कलह को समाप्त नहीं होने दे रहा था।

अब तक तो हुमायूँ ने मिर्जा कामरान और मिर्जा अस्करी के विरुद्ध कोई सख्त कदम नहीं उठाया था तथा हर बार उनके अपराधों को भुलाकर उन्हें गले लगाया था किंतु अब कामरान ने इसकी संभावनाएं समाप्त कर दी थीं। मिर्जा हिंदाल की हत्या एक ऐसा अपराध था, जिसे किसी भी कीमत पर क्षमा नहीं किया जा सकता था।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि मिर्जा हिंदाल की हत्या के बाद मिर्जा कामरान के जीवन में दुर्भाग्य का अंधेरा छा गया, उसे फिर किसी भी युद्ध में सफलता नहीं मिली। हुमायूँ ने कुछ समय पहले ही हिंदाल को गजनी की जागीर दी थी। हुमायूँ ने अब अपने पुत्र अकबर को गजनी का शासक बनाया तथा हिंदाल के समस्त सेवक भी अकबर को सौंप दिए। इस समय अकबर 10 वर्ष का हो चुका था।

हिंदाल की जागीर तथा सेवक अकबर को सौंपे जाने के पीछे अबुल फजल ने एक अजीब सा तर्क दिया है। वह लिखता है कि जब हिंदाल जीवित था, तब एक बार अकबर की पगड़ी उसके सिर से नीचे गिर गई। इस पर हिंदाल ने अकबर की पगड़ी उठाकर उसके सिर पर वापस रखी। इसलिए मिर्जा हिंदाल को अकबर के लिए शुभ माना गया।

मिर्जा हिंदाल के पास 14 स्वामिभक्त सेवक थे जो हिंदाल के प्रति अनन्य निष्ठा रखते थे, ये समस्त सेवक अब अकबर के लिए निष्ठा रखने लगे। हिंदाल के सेवकों में बाबा दोस्त नामक एक अमीर भी था किंतु उसकी संगति और चरित्र अच्छा नहीं था, इसलिए हुमायूँ ने अकबर को बुरी संगति से बचाने के लिए बाबा दोस्त को अकबर की सेवा में नियुक्त नहीं किया।

हिंदाल की सेवा में मुहम्मद ताहिर खाँ नामक एक वृद्ध अमीर भी रहता था। वह बहुत अनुभवी एवं वीर माना जाता था। उसने भी इच्छा प्रकट की कि वह शहजादे अकबर की सेवा करना चाहता है किंतु हुमायूँ ने ताहिर खाँ को इसलिए अकबर की सेवा में नियुक्त करने से मना कर दिया क्योंकि ताहिर खाँ कामरान के हाथों से कुंदूज की रक्षा नहीं कर सका था।

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जपरियार गांव में मिर्जा हिंदाल को मारने के बाद मिर्जा कामरान की सेना जपरियार से बीहसूद भाग गई। हुमायूँ ने अकबर को तो उसके सेवकों के साथ काबुल भेज दिया तथा स्वयं कामरान का पीछा करते हुए बीहसूद पहुंच गया। हुमायूँ ने बीहसूद में एक मजबूत किला बनाने के आदेश दिए ताकि इस क्षेत्र के अफगान जागीरदारों की गतिविधियों पर नियंत्रण करने के लिए इस क्षेत्र में एक स्थाई सेना रखी जा सके। हुमायूँ ने अपने गुप्तचरों की टोलियां चारों तरफ भिजवाईं ताकि कामरान की स्थिति का पता लगाया जा सके किंतु कामरान लगातार अपना ठिकाना बदलता रहा। अफगान कबीलों के सरदारों ने कामरान को न केवल अपने यहाँ शरण दी अपितु उसे हर संभव सहायता भी उपलब्ध करवाई। कुछ अमीरों ने हुमायूँ को सलाह दी कि अब कामरान में बादशाह का विरोध करने की शक्ति शेष नहीं बची है, इसलिए बादशाह को काबुल लौट चलना चाहिए। इतने लम्बे समय तक राजधानी से दूर रहना ठीक नहीं है। जबकि कुछ अमीरों की सलाह थी कि बादशाह को यहीं पर रुककर उन अफगान कबीलों को दण्ड देना चाहिए जिन्होंने कामरान को शरण दे रखी है।

इस बार हुमायूँ कामरान के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करना चाहता था। संभवतः मिर्जा हिंदाल की मृत्यु से हुमायूँ किसी कठोर निश्चय पर पहुंच गया था। इसलिए उसने अफगान कबीलों पर कार्यवाही करने का निर्णय लिया ताकि कामरान को ढूंढा जा सके। अफगान कबीले दूर-दूर तक फैले हुए थे तथा अब तक यह ज्ञात नहीं हो सका था कि कामरान किस कबीले में छिपा हुआ है।

हुमायूँ ने अपनी सेनाओं को आदेश दिया कि आगे बढ़ा जाए तथा जो भी कबीला विरोध करे उसे दण्ड दिया जाए। जब हुमायूँ ने यह अभियान आरम्भ किया तो एक दिन माहम अली कुली खाँ तथा बाबा खिजरी नामक दो अमीर हुमायूँ की सेना द्वारा पकड़े गए। ये दोनों अमीर कामरान के विश्वस्त थे तथा मलिक मुहम्मद मंदरोरी से सहायता प्राप्त करने के लिए जा रहे थे। इन दोनों को हुमायूँ के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

हुमायूँ ने उनसे पूछा कि इस समय कामरान किस कबीले में है? माहम अली कुली खाँ ने बादशाह को गुमराह करने के उद्देश्य से एक दूरस्थ कबीले का नाम बताया किंतु बाबा खिजरी ने कहा कि मुझे ज्ञात है कि कामरान कहाँ है, इस समय वह बहुत घबराया हुआ है। यदि आप कुछ सैनिक मेरे साथ भेज दें तो मैं उन्हें कामरान के पास ले जा सकता हूँ।

बादशाह ने बाबा खिजरी की बात पर विश्वास करके अपने कुछ अमीरों को बाबा खिजरी के साथ जाने के आदेश दिए। ये लोग उसी रात कामरान को पकड़ने के लिए रवाना हो गए। पौ फटते ही हुमायूँ की सेना ने वह गांव घेर लिया तथा उस कबीले के अधिकांश स्त्री-पुरुष एवं बच्चों को मार दिया। उन्होंने बहुत से लोगों को बंदी बना लिया। अंत में ये लोग एक मकान में पहुंचे। उस समय कामरान मुँह ढंक कर सोया हुआ था। उसकी सेवा में केवल दो आदमी थे।

हुमायूँ के अमीरों ने उन दो आदमियों में से एक को पकड़ लिया तथा दूसरा भाग गया। पकड़े गए आदमी का नाम शाहकुली नारंजी था। इसके बाद खाट पर सोए हुए कामरान को उठाया गया। जब वह उठा तो हुमायूँ के अमीर यह देखकर चौंक गए कि वह कामरान नहीं है, वह तो कामरान होने का नाटक कर रहा था।

वास्तव में जो दूसरा आदमी भाग गया था, वही मिर्जा कामरान था जो हुमायूँ को चकमा देकर भाग जाने में सफल रहा था। इसके बाद मिर्जा कामरान की बहुत तलाश की गई किंतु वह हाथ नहीं आया। बहुत दिनों बाद हुमायूँ को अपने विश्वस्त आदमियों से सूचना मिली कि कामरान भारत चला गया है। अबुल फजल तथा गुलबदन बेगम दोनों ने लिखा है कि कामरान भारत के शासक सलीमशाह की सेवा में चला गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अकबर के शौक देखकर हुमायूँ चिंतित हो गया (89)

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अकबर के शौक - www.bharatkaitihas.com
अकबर के शौक देखकर हुमायूँ चिंतित हो गया

किशोरावस्था की दहलीज पर पैर रख चुका अकबर पहाड़ी ऊंटों एवं अरबी घोड़ों की पीठ पर बैठकर उन्हें तेज गति से दौड़ाने में अपना दिन व्यतीत करता था। मुल्लाजाद असामुद्दीन अकबर को पढ़ाई लिखाई की ओर नहीं खींच सका तो वह भी कबूतर उड़ाने के अपने पुराने शौक में व्यस्त हो गया। धीरे-धीरे अकबर को भी कबूतर उड़ाने की लत लग गई। अकबर के शौक देखकर हुमायूँ चिंतित हो गया।

जब हुमायूँ को कामरान के भारत भाग जाने की सूचना मिली तो हुमायूँ बड़ा प्रसन्न हुआ। वह अपने हाथ भाई के रक्त से नहीं रंगना चाहता था। कामरान के चले जाने के बाद इस रक्तपात की आवश्यकता ही नहीं रह गई थी। अतः हुमायूँ ने बाग-ए-सफा नामक स्थान पर एक बड़े उत्सव का आयोजन करने का निश्चय किया।

हुमायूँ ने अपने संदेशवाहक काबुल भेजकर अकबर को तथा हरम की समस्त बेगमों को वहीं पर बुला लिया। अपने परिवार के आने पर इस विशाल उत्सव का आयोजन किया गया। इस उत्सव में हुमायूँ के सभी अमीरों एवं गणमान्य लोगों ने भाग लिया।

इस उत्सव के समापन के बाद हुमायूँ ने अपने परिवार एवं अमीरों सहित काबुल के लिए प्रस्थान किया। इस समय तक हुमायूँ को काबुल छोड़े हुए छः माह से भी अधिक समय हो चुका था। जब भी हुमायूँ किसी सैनिक अभियान पर काबुल से बाहर जाता था, कामरान काबुल पर अधिकार कर लेता था किंतु इस बार कामरान काबुल पर अधिकार नहीं कर सका। यह हुमायूँ की बड़ी सफलता थी और इससे भी बड़ी सफलता यह थी कि अब कामरान पूरी तरह शक्तिहीन होकर अफगानिस्तान से चला गया था। अब हुमायूँ अपने परिवार एवं राज्य पर अधिक ध्यान दे सकता था।

अबुल फजल ने लिखा है कि हुमायूँ का पुत्र जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर दस साल का हो चुका था किंतु अब तक उसकी विधिवत् शिक्षा आरम्भ नहीं हुई थी। विगत दस वर्षों में हुमायूँ लगातार भागता रहा था, इसलिए उसे अकबर को अपने साथ रखने का अवसर बहुत कम ही मिला था। इस भागमभाग और राजधानी की छीना-झपटी के कारण अकबर की शिक्षा का प्रबंध नहीं हो सका था।

अब जबकि कामरान अफगानिस्तान की धरती से दूर जा चुका था, हुमायूँ को अकबर की शिक्षा पर ध्यान देने का समय मिला। उसने मुल्लाजाद असामुद्दीन को अकबर का शिक्षक नियुक्त किया। मुल्लाजाद एक योग्य शिक्षक था और अकबर को पढ़ाने का पूरा प्रयास करता था किंतु अकबर ने शिक्षा प्राप्त करने में कोई रुचि नहीं दिखाई।

किशोरावस्था की दहलीज पर पैर रख चुका अकबर पहाड़ी ऊंटों एवं अरबी घोड़ों की पीठ पर बैठकर उन्हें तेज गति से दौड़ाने में अपना दिन व्यतीत करता था। उसके चाटुकार सेवक उसकी तारीफ करते न थकते थे। जब मुल्लाजाद असामुद्दीन अकबर को पढ़ाई लिखाई की ओर नहीं खींच सका तो वह भी कबूतर उड़ाने के अपने पुराने शौक में व्यस्त हो गया। धीरे-धीरे अकबर को भी कबूतर उड़ाने की लत लग गई।

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एक दिन किसी ने हुमायूँ को बता दिया कि गुरु-चेला सारे दिन कबूतर उड़ाने में व्यस्त रहते हैं। इस पर हुमायूँ ने मुल्लाजाद असामुद्दीन को हटा दिया तथा मौलाना बायाजीन को अकबर का शिक्षक नियुक्त किया। मौलाना ने भी बहुत प्रयास किया कि अकबर थोड़ा पढ़-लिख ले किंतु अकबर को अपने शौक पूरे करने में ही आनंद आता था। अब अकबर ने कुत्तों द्वारा हिरणों का शिकार करने का नया शौक पाल लिया। मौलाना बायाजीन ने हार-थक कर हाथ खड़े कर दिए और हुमायूँ से कहा कि शहजादे को पढ़ाना संभव नहीं है। इस पर हुमायूँ ने काबुल के अच्छे आलिमों, मुल्लाओं, मौलवियों एवं मौलानाओं को बुलाकर उनसे पूछा कि आपमें से कौनसा आलिम ऐसा है जो शहजादे को पढ़ा सके! सभी मुल्ला-मौलवी एवं मौलाना चाहते थे कि वे अकबर को पढ़ाएं इसलिए उन्होंने अपनी योग्यता के बारे में बढ़-चढ़कर दावे किए। इस पर हुमायूँ ने कागज की पर्चियों पर उनके नाम लिखवाए। जब उन पर्चियों में से पहली पर्ची खोली गई तो उसमें मौलाना अब्दुल कादिर का नाम आया। उसी को अकबर का शिक्षक नियुक्त किया गया। एक दिन बादशाह ने शाहम खाँ जलाईर नामक एक अमीर को यह देखने के लिए भेजा कि अकबर क्या करता है?

उस युग में जिस प्रकार गद्दारों की कमी नहीं थी, उसी प्रकार चाटुकारों की भी कमी नहीं थी। उसने जाकर देखा कि अकबर के रंग-ढंग अच्छे नहीं हैं किंतु वह अपने मुँह से यह बात हुमायूँ से नहीं कहना चाहता था। सच बोलने की बजाय वह कोई ऐसी बात बादशाह से कहना चाहता था जिससे वह बादशाह से बड़ा ईनाम पा सके।

अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है कि शाहम खाँ ने बादशाह को बताया कि जब वह शहजादे अकबर के कक्ष में पहुंचा तो उस समय शहजादा पलंग पर लेटा हुआ था। उसके चेहरे पर दिव्य प्रकाश था और ऐसा जान पड़ता था जैसे वह सोया हुआ है परंतु वास्तव में वह फरिश्तों से बात कर रहा था। इस बातचीत में अकबर फरिश्तों से कह रहा था कि यदि अल्लाह ने चाहा तो मैं संसार के उत्तम भाग को जीत लूंगा और दुःखी लोगों की अभिलाषाएं पूरी कर दूंगा।

यह तो नहीं कहा जा सकता कि शाहम खाँ की बात का हुमायूँ पर क्या प्रभाव पड़ा क्योंकि इसके सम्बन्ध में कहीं पर कोई उल्लेख नहीं मिलता है किंतु यह तय है कि शाहम खाँ जलाईर जीवन भर इस बात को दोहराता रहा। अबुल फजल ने लिखा है कि जब अकबर बादशाह बना तब भी शाहम खाँ इस बात को कहता था किंतु अकबर को चाटुकारिता पसंद नहीं थी।

हुमायूँ समझ गया कि शिक्षा प्राप्त करना अकबर के वश की बात नहीं है, इसलिए उसने अकबर को आदेश दिया कि वह गजनी जाकर अपनी जागीर संभाले। अकबर के विश्वसनीय अतगा खाँ को अकबर के साथ भेजा गया। उसके साथ ही अकबर के समस्त सेवक तथा मरहूम मिर्जा हिंदाल के समस्त सेवक भी गजनी भेजे गए। हुमायूँ ने छः महीने तक अकबर को गजनी में रखा तथा उसके आचरण के समाचार लेता रहा।

अकबर के भाग्य से उन दिनों गजनी में बाबा विलास नामक एक दरवेश रहा करता था। अकबर उसके सम्पर्क में आया तथा उससे इतना अधिक प्रभावित हुआ कि अकबर प्रतिदिन उस दरवेश से मिलने के लिए जाने लगा। जब हुमायूँ को यह समाचार मिला तो हुमायूँ बहुत संतुष्ट हुआ।

गजनी में रहने वाले चाटुकार लोग नित्य ही अकबर की कुशाग्र बुद्धि एवं न्यायप्रियता के समाचार हुमायूँ को भिजवाने लगे। उन्हें सुनकर हुमायूँ को लगने लगा कि बाबर के बेटों ने जो कुछ भी भूमि खोई है, उस समस्त भूमि को बाबर का यह वंशज अवश्य ही फिर से प्राप्त कर लेगा। छः माह की अवधि बीत जाने पर हुमायूँ ने अकबर को आदेश भिजवाए कि वह काबुल आकर बादशाह की सेवा में उपस्थित हो। हुमायूँ का आदेश मिलते ही अकबर काबुल के लिए रवाना हो गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर का बेटा औरतों के कपड़े पहनकर भाग निकला (90)

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बाबर का बेटा औरतों के कपड़े पहनकर भाग निकला

हुमायूँ के भय से बाबर का बेटा मिर्जा कामरान बीहसूद से निकल कर हिन्दूकुश पर्वत को पार करके भारत चला आया। इस समय कामरान के पास केवल 12 अनुचर थे जिनमें अमीर तथा सेवक दोनों ही शामिल थे।

भारत आकर मिर्जा कामरान को ज्ञात हुआ कि इस समय दिल्ली का शासक इस्लामशाह सूरी पंजाब के बान नामक गांव में ठहरा हुआ है। पाठकों को स्मरण होगा कि ईस्वी 1540 में शेर खाँ सूरी ने हुमायूँ से भारत का राज्य छीना था तथा शेरशाह सूरी के नाम से भारत का सुल्तान बन गया था किंतु इसके बाद शेरशाह सूरी केवल पांच साल ही जीवित रहा और एक दिन कालिंजर दुर्ग पर अभियान के समय अपनी ही तोप के फट जाने से मृत्यु को प्राप्त हुआ था।

शेरशाह के बाद उसका पुत्र जलाल खाँ इस्लामशाह सूरी के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। गुलबदन बेगम तथा अबुल फजल दोनों ने इस्लामशाह को सलीमशाह कहकर सम्बोधित किया है। इससे प्रतीत होता है कि जलाल खाँ को सुल्तान बनने के बाद इन दोनों नामों से जाना जाता था।

शाह बुदाग नामक एक अमीर ने मिर्जा कामरान को सलाह दी कि हमें इस्लामशाह सूरी से सम्पर्क करना चाहिए। कामरान को यह सलाह अच्छी लगी और उसने शाह बुदाग को अपना दूत बनाकर इस्लामशाह के पास भेजा। अबुल फजल ने लिखा है कि सलीम खाँ को बाबर के बेटे पर दया आ गई तथा उसने शाह बुदाग के हाथों कुछ रुपया कामरान के लिए भिजवाया। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि सलीमशाह ने कामरान के लिए एक हजार रुपए भिजवाए।

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कामरान एक उतावला व्यक्ति था। इसलिए इससे पहले कि शाह बुदाग लौट कर आता, मिर्जा कामरान स्वयं ही इस्लामशाह से मिलने चल पड़ा। जब मिर्जा कामरान के आदमियों ने सुल्तान इस्लामशाह को सूचना दी कि मिर्जा कामरान सुल्तान से मिलने के लिए आ रहा है तो इस्लामशाह ने अपने तीन अमीरों को कामरान का स्वागत करने के लिए भेजा। उन अमीरों ने चार कोस आगे जाकर कामरान का स्वागत किया तथा बड़े आदर के साथ कामरान को इस्लामशाह के पास ले आए। सुल्तान इस्लामशाह ने कामरान पर दया करके उसे रुपए भिजवाए थे तथा शाही तौर-तरीकों की पालना करते हुए अपने अमीरों को कामरान का स्वागत करने भेजा था किंतु इस्लामशाह यह नहीं भूला था कि यह शत्रु का पुत्र है। इसलिए इस्लामशाह ने कामरान के साथ वैसा व्यवहार नहीं किया जैसा कि किसी महत्वपूर्ण शहजादे के साथ उन दिनों किया जाता था। इस्लामशाह के इस रूखे व्यवहार से कामरान को बहुत धक्का लगा किंतु इस समय वह हुमायूँ का भगोड़ा और इस्लामशाह का शरणागत था। इसलिए कामरान इस अपमान को सह गया। इस्लामशाह ने कामरान से कहा कि वह शाही लश्कर के साथ हमारा मेहमान बनकर रहे तथा हमारे साथ दिल्ली चले।

इस्लामशाह की योजना थी कि वह कामरान को दिल्ली ले जाकर किसी दुर्ग में बंद कर दे। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि सलीमशाह ने प्रकट रूप से तो कामरान से कुछ नहीं कहा किंतु जब कामरान कक्ष से बाहर जा रहा था, तब सलीमशाह ने कहा कि जिस इंसान ने अपने भाई मिर्जा हिंदाल को मारा है, मैं उसकी सहायता किस प्रकार कर सकता हूँ? ऐसे मनुष्य को तो नष्ट करना उचित है।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि जब कामरान ने सुना कि सलीमशाह कामरान के बारे में बुरे विचार रखता है तो वह किसी से कुछ कहे-सुने बिना ही वहाँ से भाग गया। जब सलीमशाह को पता लगा तो उसने कामरान के साथियों को पकड़कर बंदी बना लिया। बाबर का बेटा मिर्जा कामरान भीरा और खुशआब होते हुए गक्खरों की तरफ गया। अभी वह गक्खरों की सीमा पर ही था कि गक्खरों ने उसे पकड़ लिया तथा बादशाह हुमायूँ के पास भेज दिया।

हालांकि गुलबदन बेगम तथा अबुल फजल दोनों ही अकबर के समकालीन थे तथापि उन दोनों द्वारा लिखे गए विवरणों में पर्याप्त अंतर है। अबुल फजल ने लिखा है कि कामरान ने अपने अमीर जोगी खाँ को माचीवाड़ा के निकटवर्ती क्षेत्र के राजा बक्कू से सहायता मांगने के लिए भेजा। राजा बक्कू ने कामरान की सहायता करने का वचन दिया।

जब इस्लामशाह ने पंजाब से दिल्ली जाने के लिए माचीवाड़ा की नदी पार की तो कामरान ने युसूफ आफ ताबंची को अपने कपड़े पहनाकर अपने बिस्तर पर सुला दिया तथा बाबा सईद से कहा कि बैठे-बैठे कुछ गुनगुनाता रहे ताकि देखने वाले को लगे कि मिर्जा सो रहा है। इसके बाद बाबर का बेटा कामरान वेश बदल कर अपने डेरे से निकला तथा माचीवाड़ा के राजा बक्कू के पास चला गया।

कुछ दिन बाद जब इस्लामशाह की सेना कामरान को ढूंढती हुई माचीवाड़ा पहुंची तो माचीवाड़ा के राजा बक्कू ने कामरान को कहलूर के राजा के पास भेज दिया। कहलूर के राजा ने मिर्जा को जम्मू के राजा के पास भिजवा दिया। जम्मू के राजा ने कामरान को अपने राज्य में नहीं घुसने दिया। इस पर मिर्जा कामरान मानकोट चला गया। मानकोट व्यास नदी के तट पर स्थित एक पहाड़ी किला था और इसका पुराना नाम रामकोट था, वहाँ एक हिंदू राजा राज्य करता था।

मानकोट के राजा ने मिर्जा कामरान को पकड़कर इस्लामशाह को सौंपने की योजना बनाई। जब मानकोट के सैनिक कामरान के पास पहुंचकर उसके सेवकों से बात करने लगे तो कामरान को अनुमान हो गया कि मानकोट के राजा ने अपने आदमियों को किस उद्देश्य से भेजा है। इसलिए कामरान ने मानकोट के सैनिकों से बचने के लिए स्त्री का वेश बनाया तथा एक अफगान घुड़सौदागर के साथ गक्खर प्रदेश के लिए रवाना हो गया।

तत्कालीन ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर यह अनुमान होता है कि अपने शत्रुओं से बचने के लिए कामरान प्रायः वेश बदलकर रहता था, कभी अपने सेवकों के वेश में तो कभी स्त्री के वेश में ताकि संकट-काल में तुरंत प्राण बचा कर भागा जा सके।

ई.1525 में बाबर इन्हीं गक्खरों को परास्त करके पंजाब होता हुआ दिल्ली, आगरा और चंदेरी तक पहुंचा था। आज उसी बाबर का बेटा गक्खरों का शरणार्थी था। इस प्रकार इतिहास की धारा एक बार फिर से घूमकर उसी बिंदु पर लौट आई थी!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कामरान की हत्या करने को कहा मुल्लाओं ने (91)

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कामरान की हत्या करने को कहा मुल्लाओं ने!

हुमायूँ ने अपने दरबारियों की यह बात मानने से अस्वीकार कर दिया तथा उनसे कहा कि मरहूम बादशाह बाबर ने इस संसार को छोड़ते समय मुझे आदेश दिया था कि मैं अपने भाइयों को क्षमा करूं चाहे वे मेरे विरुद्ध कितना भी अपराध क्यों न करें। मैं कुछ भी कर सकता हूँ किंतु अपने मरहूम पिता के आदेशों की अवहेलना नहीं कर सकता। मैं कामरान की हत्या नहीं कर सकता!

सिंधु और झेलम नदी के बीच में बड़ी संख्या में गक्खर लोग रहा करते थे जो अत्यंत युद्धप्रिय थे। कुछ इतिहासकारों ने इन्हें खोखर कहा है। उन्हीं के नाम पर यह क्षेत्र गक्खड़ प्रदेश, घक्कर प्रदेश अथवा खोखर प्रदेश कहलाता था।

किसी समय ये लोग हिन्दू थे किंतु ई.712 से लेकर ई.1555 तक की दीर्घ अवधि में बेरहम समय के थपेड़े खाकर इनमें से बहुत से लोग इस्लाम स्वीकार करने का विवश हुए। इन्हें महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी तथा तैमूर लंग जैसे प्रबल आक्रांताओं से युद्ध करना पड़ा था। आज भी भारत में गक्खर एवं खोखर उपजातियां रहती हैं जो स्वयं को जाट बताती हैं। गक्खर एवं खोखर उपजाति के कुछ लोग स्वयं को राजपूत बताते हैं तो इन उपजातियों के लोग मुसलमान भी हैं।

काश्मीर के सुल्तान जैनुल ओबेदीन के समय गक्खर का यह विशाल प्रदेश काश्मीर राज्य के अधीन था किंतु जैनुल की मृत्यु के बाद गजनी के गवर्नर मलिक किद ने गक्खर के काफी बड़े हिस्से पर अधिकार कर लिया था। चूंकि उस समय गजनी काबुल के अधीन था इसलिए तब से गक्खर प्रदेश भी काबुल राज्य के अंतर्गत माना जाता था। मलिक किद ने अपने पुत्र पीर खाँ को गक्खर प्रदेश का शासक नियुक्त किया था। पीर खाँ के मरने पर पीर खाँ का पुत्र तातार खाँ गक्खर का शासक हुआ।

गजनी का गवर्नर मलिक किद बाबर के किसी पूर्वज का निकट सम्बन्धी था। इस नाते मलिक किद के वंशज बाबर तथा उसके पुत्रों के प्रति अत्यंत निष्ठा रखते थे। जब बाबर भारत पर आक्रमण करने आया तो गक्खर के शासक तातार खाँ ने पानीपत तथा खानवा के युद्धों में बाबर का साथ दिया था।

जब ई.1540 में मिर्जा हुमायूँ को आगरा एवं दिल्ली छोड़कर सिंध की तरफ भागना पड़ा था तब शेरशाह सूरी ने तातार खाँ के राज्य पर आक्रमण करके गक्खर प्रदेश को छीनने का प्रयास किया था किंतु वह तातार खाँ को परास्त नहीं कर सका था।

शेरशाह सूरी के बाद जब शेरशाह का पुत्र इस्लामशाह सूरी सुल्तान हुआ तब इस्लामशाह ने भी तातार खाँ पर आक्रमण किया किंतु इस्लामशाह को भी सफलता नहीं मिली थी।

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जब मिर्जा मिर्जा कामरान मानकोट से भागकर गक्खरों के प्रदेश में पहुंचा तो तातार खाँ का पुत्र सुल्तान आदम गक्खर प्रदेश का शासक था। वह भी हुमायूँ को अपना बादशाह मानता था। अतः सुल्तान आदम ने कामरान को पकड़कर हुमायूँ के सुपुर्द करने की योजना बनाई। जब कामरान ने सुल्तान आदम से सम्पर्क किया तो सुल्तान आदम ने उसकी बड़ी आवभगत की तथा उसे अपने पास रख लिया ताकि आसानी से हाथ आया हुआ कामरान इधर-उधर न भाग जाए। सुल्तान आदम ने अपने कुछ आदमियों को कामरान की सेवा में रख दिया। देखने में तो वे सेवक लगते थे किंतु वास्तव में वे सुल्तान आदम के सैनिक थे जो इस बात को सुनिश्चित करते थे कि कामरान यहाँ से भाग न जाए। सुल्तान आदम ने बादशाह हुमायूँ के पास प्रार्थना-पत्र भिजवाया कि मिर्जा कामरान हमारे पहरे में है, अतः आप यहाँ आकर कामरान का उपचार करें। जब कामरान को ज्ञात हुआ कि सुल्तान आदम ने कामरान के साथ छल किया है, तब कामरान ने भी एक योजना बनाई। उसने हुमायूँ के पास पत्र भेजकर निवेदन किया कि मैं बादशाह की सेवा में आ रहा था किंतु मुझे गक्खरों ने पकड़ लिया है। इसलिए आप यहाँ आकर मुझे इनकी कैद से मुक्त करवाएं।

कामरान को लगता था कि अपने भाई की पीड़ा के बारे में जानकर हुमायूँ अवश्य ही कामरान को गक्खरों से छुड़ाएगा तथा गक्खरों को दण्डित करेगा।

सुल्तान आदम का पत्र पाकर हुमायूँ ने गक्खर प्रदेश पर अभियान करने का निश्चय किया। ई.1541 में हुमायूँ भारत भूमि को छोड़कर अफगानिस्तान आया था। इस घटना को अब 12 साल का समय हो चुका था। तब से ही हुमायूँ की बड़ी इच्छा थी कि वह एक फिर से भारत पर अभियान करे। चूंकि गक्खरों का यह प्रदेश भारत की भूमि पर स्थित था इसलिए हुमायूँ ने स्वयं ही इस अभियान पर जाना निश्चित किया।

उसने काबुल का शासन ख्वाजा जलालुद्दीन महमूद नामक एक अमीर को सौंपा तथा स्वयं अकबर को अपने साथ लेकर सिंधु नदी की तरफ चला। सिंधु नदी पर पहुंचकर हुमायूँ ने गक्खर प्रदेश के शासक सुल्तान आदम को पत्र भिजवाया कि हम सिंधु नदी तक आ गए हैं, तुम तुरंत हमारी सेवा में आओ।

सुल्तान आदम बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। हुमायूँ ने कामरान को भी वहीं बुलवा लिया। जब कामरान बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ तो हुमायूँ बड़ा प्रसन्न हुआ। पहले की ही तरह हुमायूँ ने अपने भाई को गले लगा लिया। कामरान से मिलने की प्रसन्नता में हुमायूँ के शिविर में रात भर जश्न मनाया गया।

हुमायूँ के दरबारियों ने हुमायूँ के ऐसे रंग-ढंग देखे तो उन्हें बड़ा क्षोभ हुआ। वे तो कामरान की हत्या करना चाहते थे किंतु हुमायूँ कामरान की आवभगत कर रहा था। जिस कामरान के कारण बादशाह तथा उसके अमीरों एवं उनके परिवार के लोगों के प्राण कई बार संकट में पड़ चुके थे, बादशाह उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं था। इस पर दरबारियों ने एकत्रित होकर बादशाह से निवेदन किया कि न्याय की दृष्टि से कामरान की हत्या कर देना ही उचित है। यह आपका भाई नहीं है, शत्रु है। आपके इस काम से अल्लाह को प्रसन्नता होगी।

हुमायूँ ने अपने दरबारियों की यह बात मानने से अस्वीकार कर दिया तथा उनसे कहा कि मरहूम बादशाह बाबर ने इस संसार को छोड़ते समय मुझे आदेश दिया था कि मैं अपने भाइयों को क्षमा करूं चाहे वे मेरे विरुद्ध कितना भी अपराध क्यों न करें। मैं कुछ भी कर सकता हूँ किंतु अपने मरहूम पिता के आदेशों की अवहेलना नहीं कर सकता। मैं कामरान की हत्या नहीं कर सकता!

इस पर समस्त दरबारियों ने एकराय होकर मुल्लाओं से सम्पर्क किया तथा उनसे एक कागज लिखवाया जिसमें कहा गया था कि इस्लाम के कानून के अनुसार कामरान की हत्या करना ही उचित है। इस कागज पर बहुत बड़ी संख्या में मुल्लाओं से हस्ताक्षर करवाए गए। जब यह कागज हुमायूँ के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो हुमायूँ ने उन्हें बुलाकर उनसे विचार-विमर्श किया तथा मुल्लाओं को इस बात पर सहमत कर लिया कि कामरान की हत्या नहीं की जाए, कामरान की आंखें फोड़ कर उसके प्राण बख्श दिए जाएं।

जब कामरान को बादशाह के इस निर्णय की जानकारी मिली तो उसने बादशाह से कहलवाया कि जिन लोगों ने आपको यह सलाह दी है, उन्हीं लोगों ने मेरी यह हालत की है किंतु बादशाह ने कामरान को कोई जवाब नहीं दिया। मिर्जा कामरान जीवन भर हुमायूँ की पीठ में छुरी भौंकता आया था, किंतु अब वे दिन लद चुके थे।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कामरान की आंखों में नश्तर फिरवा दिया हुमायूँ ने (92)

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कामरान की आंखों में नश्तर फिरवा दिया हुमायूँ ने

हुमायूँ का सौतेला भाई मिर्जा कामरान बादशाहत पाने के लालच में जीवन भर हुमायूँ की पीठ में छुरी भौंकता रहा था, किंतु अब मुल्ला-मौलवियों के आदेश पर हुमायूँ ने कामरान की आंखों में नश्तर फिरवा दिया।

हुमायूँ ने मुल्ला-मौलवियों को इस बात पर राजी कर लिया कि मिर्जा कामरान की आंखें फोड़ दी जाएं तथा उसके प्राण बक्श दिए जाएं। हुमायूँ ने अपने दरबारियों को आदेश दिया कि मुल्ला-मौलवियों के आदेश की पालना की जाए। इए पर अली दोस्त बारवेगी आदि कुछ लोगों को कामरान की आंखें फोड़ने का काम सौंपा गया।

जब अली दोस्त बारवेगी, सईद मुहम्मद पकना, गुलाम अली और शश अगुश्त कामरान की आंखें फोड़ने के लिए उसके डेरे में घुसे तो कामरान उन लोगों को मुक्कों से मारने लगा। अली दोस्त ने कामरान से कहा कि आप इतना क्रोध क्यों कर रहे हैं? आपने भी सईद अली तथा अनेक निर्दोष लोगों की आंखें फुड़वाई हैं! आज आपकी जो स्थिति होने जा रही है, उसके लिए आप स्वयं जिम्मेदार हैं!

अली दोस्त के आदेश से उसके सहायकों ने कामरान को पकड़ लिया। अली दोस्त ने कामरान की आंखों में नश्तर चलाया। अली दोस्त ने कामरान की दोनों आंखों में कई बार नश्तर घुमाया ताकि उसकी आंखों में जरा सी भी रौशनी न रह जाए। इस बात से यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि हुमायूँ के अधिकारियों में कामरान के विरुद्ध कितना गुस्सा भरा हुआ था! गुलबदन बेगम ने भी कामरान की आंखें फुड़वाने का प्रकरण लिखा है जिसमें यही सब बातें कही गई हैं।

हुमायूँ द्वारा कामरान की आंखें फुड़वाने की घटना नवम्बर 1553 में हुई थी। मुगल शहजादों की आंखें फुड़वाने का जो सिलसिला कामरान की आंखें फोड़कर शुरु किया गया, वह ई.1788 में बादशाह शाहआलम (द्वितीय) की आंखें फुड़वाए जाने तक चलता रहा। अब बाबर के चार पुत्रों में से सबसे छोटा, हिन्दाल मारा जा चुका था, हिंदाल से बड़े मिर्जा अस्करी को मक्का भेजा जा चुका था और अस्करी से बड़े कामरान को अंधा किया जा चुका था। इस प्रकार हुमायूँ के भाइयों में एक भी हुमायूँ का विरोध करने की स्थिति में नहीं रह गया था।

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जब हुमायूँ को बताया गया कि शाही आदेशों की पालना कर दी गई है तथा मिर्जा कामरान की आंखों में नश्तर चला दिया गया है तो हुमायूँ को बहुत कष्ट हुआ। उसी दिन मिर्जा कामरान ने बादशाह की सेवा में मुनीम खाँ को भेज कर निवेदन किया कि बेग मुलुक को मेरी सेवा में नियुक्त किया जाए। बादशाह ने मिर्जा कामरान का यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। इस घटना के कुछ दिन बाद बादशाह ने जानूहा नामक अफगान कबीले के विरुद्ध सैनिक अभियान किया। इस अभियान में हुमायूँ का फूफा महदी ख्वाजा मारा गया। पाठकों को स्मरण होगा कि यह वही महदी ख्वाजा था जिसने भारत विजय के समय बाबर की बहुत सहायता की थी तथा खानवा के युद्ध के बाद वह बाबर को नाराज करके अफगानिस्तान आ गया था। अबुल फजल ने लिखा है कि इस युद्ध में हुमायूँ के कई अन्य अमीर भी मारे गए। यहाँ से हुमायूँ काश्मीर विजय के लिए जाना चाहता था किंतु उसके अमीर इस अभियान के लिए तैयार नहीं हुए। इस कारण हुमायूँ वहीं से काबुल के लिए लौट पड़ा। जब हुमायूँ का डेरा सिंधु नदी के किनारे लगा हुआ था

तब मिर्जा कामरान ने हुमायूँ को एक प्रार्थना पत्र भिजवाया कि मुझे हजाज जाने की अनुमति दी जाए। हुमायूँ ने कामरान की प्रार्थना स्वीकार कर ली।

जिस दिन कामरान हजाज के लिए रवाना होने लगा तो हुमायूँ ने मिर्जा कामरान से कहलवाया कि मैं इस शर्त पर तुम्हें विदा करने के लिए आना चाहता हूँ कि तुम मुझे देखकर रोओगे नहीं। जब कामरान ने हुमायूँ की इस शर्त को मान लिया तो हुमायूँ कामरान के डेरे पर उपस्थित हुआ तथा उसने कामरान को भावभीनी विदाई दी।

हुमायूँ ने कामरान से कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के मन की गुप्त बातें जानने वाले अल्लाह को पता है कि तुम्हारी आंखें फुड़वाकर मैं कितना लज्जित हूँ! यह कार्य मेरी इच्छा से नहीं हुआ है। अच्छा होता कि तुम ऐसा ही दण्ड मुझे देते।

हुमायूँ की यह बात सुनकर मिर्जा को भी अपने कृत्यों पर बड़ी लज्जा आई तथा उसने हाजी यूसुफ से पूछा कि यहाँ कौन-कौन विद्यमान है। हाजी यूसुफ ने कामरान को उन लोगों के नाम बताए जो बादशाह हुमायूँ के साथ कामरान के डेरे पर आए थे। कामरान ने हुमायूँ के साथ आए अधिकारियों के नाम लेकर कहा कि दोस्तो! मैं वध किए जाने के योग्य था किंतु बादशाह ने मुझे प्राणदान देकर हज्जाज जाने की अनुमति दी है। मैं बादशाह को हजार बार धन्यवाद देता हूँ।

इसके बाद कामरान ने बादशाह से कहा कि वह मेरे बच्चों का ध्यान रखे। हुमायूँ ने कामरान को वचन दिया कि वह हर हाल में कामरान के बच्चों का ध्यान रखेगा। इसके बाद हुमायूँ ने कामरान के डेरे से प्रस्थान किया। चूंकि कामरान ने हुमायूँ को वचन दिया था कि वह हुमायूँ के सामने नहीं रोएगा, इसलिए कामरान ने धैर्य रखा किंतु हुमायूँ के जाते ही कामरान बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोया।

हुमायूँ ने अपने डेरे पर आकर अपने तथा मिर्जा कामरान के सेवकों को आदेश दिया कि जो कोई भी कामरान के साथ जाना चाहे, जा सकता है। बादशाह की यह बात सुनकर हुमायूँ तथा कामरान के सेवक चुप खड़े रहे, उनमें से कोई भी व्यक्ति भाग्यहीन शहजादे कामरान के साथ नहीं जाना चाहता था।

यह देखकर हुमायूँ के एक विश्वस्त सेवक को कामरान पर दया आई तथा उसने कामरान के साथ जाने का निश्चय किया। हुमायूँ ने अपने इस सेवक को कुछ दिनों से कामरान को भोजन परोसने के काम पर लगा रखा था। बादशाह ने उसे मिर्जा के साथ जाने की अनुमति दे दी तथा कामरान की यात्रा का सम्पूर्ण खर्च भी उसी को दे दिया।

बेग मलूम मिर्जा कामरान का घनिष्ठ सेवक था, उसे भी कामरान पर दया आ गई तथा वह भी कामरान के साथ चलने का तैयार हो गया। उसे भी अनुमति दे दी गई किंतु वह दो-चार मंजिल जाकर वापस हुमायूँ की सेवा में लौट आया। इस प्रकार मिर्जा कामरान केवल अपनी एक बेगम तथा एक अनुचर के साथ अपने बाप का राज्य छोड़कर हज के लिए चला गया।

अब कामरान को अपना शेष जीवन इन्हीं दो मनुष्यों, फूटी हुई दो आंखों और रूठी हुई किस्मत के सहारे काटना था किंतु कुदरत ने कामरान के जीवन में अधिक दिनों के लिए दुःख की गाथा नहीं लिखी थी। 5 अक्टूबर 1557 को मक्का में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसकी बेगम तथा उसके सेवक का क्या हुआ, इस सम्बन्ध में कोई इतिहास नहीं मिलता।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत की जूतियां लेकर आया दरवेश (93)

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भारत की जूतियां लेकर आया दरवेश

अबुल फजल ने बादशाह के पास आने वाले फकीरों के सम्बन्ध में दो विचित्र घटनाओं का उल्लेख किया है। वह लिखता है कि एक दिन एक दरवेश भारत की जूतियां लेकर हुमायूँ के पास पहुंचा और उसने बादशाह को भारत की जूतियां भेंट कीं। बादशाह को इससे पहले किसी ने भी ऐसी भेंट नहीं दी। इसलिए बादशाह ने इन जूतियों को भारत विजय के शुभ समय के आगमन के चिह्न के रूप में ग्रहण किया।

जब मिर्जा कामरान सिंधु नदी से हुमायूं का शिविर छोड़कर हज के लिए मक्का चला गया तब हुमायूँ सिंधु नदी पार करके विक्रम नामक स्थान पर पहुंचा। इस स्थान पर अत्यंत प्राचीन काल में निर्मित एक दुर्ग हुआ करता था जिसे इस क्षेत्र के प्राचीन हिन्दू-शासकों ने बनवाया था। जब बादशाह हुमायूँ गक्खर पर अभियान करने गया था, तब कुछ अफगान कबायलियों ने विक्रम दुर्ग को नष्ट कर दिया। हुमायूँ ने इस दुर्ग को फिर से बनाने के आदेश दिए।

दुर्ग के काम को अपनी देखरेख में आरम्भ करवाने के लिए हुमायूँ काफी समय तक वहीं पर ठहरा रहा। जब दुर्ग की दीवारें ऊंची हो गईं तो हुमायूँ ने उस दुर्ग का नाम पेशावर रखा। इसके बाद हुमायूँ काबुल के लिए रवाना हो गया। अब बाबर के कुनबे में कोई भी ऐसा नहीं बचा था जो हुमायूँ का विरोध करे। इसलिए कामरान तथा अस्करी के पक्ष के बहुत से अमीर जो इधर-उधर मारे-मारे फिर रहे थे, किसी न किसी तरह बादशाह से माफी मांगकर बादशाह की तरफ आ गए।

अब तक हुमायूँ के एक ही पुत्र था जिसका नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर था और अब वह 12 वर्ष का हो चुका था। पाठकों को स्मरण होगा कि अकबर का जन्म हमीदा बानो बेगम के गर्भ से हुआ था। अप्रेल 1554 में हुमायूँ की एक अन्य पत्नी चूचक बेगम के गर्भ से एक और पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम मिर्जा हकीम रखा गया।

नवम्बर 1554 में हुमायूँ ने भारत विजय के लिए प्रस्थान करने का मन बनाया। उस काल में मुसलमान दरवेश लम्बी-लम्बी पैदल यात्राएँ किया करते थे और निरंतर चलते हुए एक देश से दूसरे देश जाया करते थे। भारत से भी कुछ मुस्लिम दरवेश हुमायूँ से मिलने के लिए आया करते थे। ये दरवेश भारत की राजनीतिक स्थिति की जानकारी हुमायूँ को दिया करते थे।

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अबुल फजल ने बादशाह के पास आने वाले फकीरों के सम्बन्ध में दो विचित्र घटनाओं का उल्लेख किया है। वह लिखता है कि एक दिन एक दरवेश भारत की जूतियां लेकर हुमायूँ के पास पहुंचा और उसने बादशाह को जूतियां भेंट कीं। बादशाह को इससे पहले किसी ने भी ऐसी भेंट नहीं दी। इसलिए बादशाह ने इन जूतियों को भारत विजय के शुभ समय के आगमन के चिह्न के रूप में ग्रहण किया। एक अन्य दरवेश ने नाश्ते के समय बादशाह को भेड़ के सीने की हड्डी परोसी। बादशाह ने इसे भी भारत विजय के लिए शुभ शकुन के रूप में स्वीकार किया। संभवतः उसने सोचा कि भारत एक भेड़ की तरह है जिसके सीने की हड्डी वह नाश्ते में खा सकता है। इस प्रकार जब बादशाह को शुभ संकेत मिलने लगे तो उसने भारत अभियान के बारे में सोचना आरम्भ कर दिया। हुमायूँ को भारत की राजनीतिक दुर्दशा के समाचार समय-समय पर मिलते रहते थे। हुमायूँ इस समय तक राजनीतिक रूप से काफी परिपक्व हो चुका था, हुमायूँ के भाइयों का भी सफाया हो चुका था, हुमायूँ के अमीर भी उसके आज्ञाकारी बन गये थे, इसलिए हुुमायूँ ने भारत की राजनीतिक कमजोरी का लाभ उठाने का निश्चय किया।

हुमायूँ ने मुनीम खाँ को जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर का तथा शाहवली बकावल बेगी को मिर्जा हकीम का संरक्षक नियुक्त कर रखा था। हालांकि हुमायूँ ने अकबर को भारत अभियान पर अपने साथ ले जाने का निश्चय किया किंतु उसके संरक्षक मुनीम खाँ को अपने साथ भारत अभियान पर ले जाने की बजाय उसे मुगल हरम की औरतों और मुगल राज्य की राजधानी काबुल की रक्षा के निमित्त काबुल में ही रहने का आदेश दिया।

बादशाह की अनुपस्थिति में कोई व्यक्ति मुनीम खाँ के आदेशों की अवहेलना न करे, इसके लिए हुमायूँ ने मुनीम खाँ को काबुल प्रांत का गवर्नर बना दिया तथा शाही हरम की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी भी उसी को सौंप दी। इसके बाद हुमायूँ ने नजूमियों से शुभ मुहूर्त निकलवाकर नवम्बर 1554 में भारत के लिए प्रस्थान किया।

अबुल फजल ने लिखा है कि उस समय हुमायूँ की सेना में तीन हजार से अधिक सैनिक नहीं थे किंतु अल्लाह उसकी सहायता कर रहा था। हुमायूँ बैराम खाँ को अपने साथ भारत ले जाना चाहता था किंतु बैराम खाँ कुछ सरकारी मामलों की व्यवस्था करने के लिए हुमायूँ से अनुमति लेकर कुछ दिनों के लिए काबुल में रुक गया। हुमायूँ की सेना में अधिकांशतः घुड़सवार थे किंतु कुछ सैनिक ऊंटों पर भी चलते थे जबकि असैनिक कर्मचारी प्रायः खच्चरों एवं टट्टुओं पर चला करते थे। हुमायूँ की सेना थलमार्ग से चलती हुई जलालाबाद पहुंची तथा वहाँ से बेड़ों में सवार होकर दिसम्बर 1554 के अंतिम दिनों में पेशावर पहुंच गई।

31 दिसम्बर 1554 को हुमायूँ ने सिंधु नदी के किनारे अपना खेमा गाढ़ा और बैराम खाँ के आने की प्रतीक्षा करने लगा। सिंधु नदी को उन दिनों अफगानिस्तान में नीलाब नदी के नाम से जाना जाता था। यहाँ से हुमायूँ ने गक्खड़ प्रदेश के शासक सुल्तान आदम को पत्र भिजवाया कि वह बादशाह की सेवा में उपस्थित हो।

सुल्तान आदम हुमायूँ की सेवा में नहीं आना चाहता था। इसलिए उसने हुमायूँ को स्पष्ट लिख भेजा कि इस समय मैं पंजाब के शासक सिकंदरशाह सूरी के साथ संधि में बंधा हुआ हूँ और मेरा पुत्र लश्करी सिकंदरशाह की सेवा में गया हुआ है। यदि मैं आपकी सेवा में आता हूँ तो सिकंदरशाह मेरे पुत्र लश्करी को मार डालेगा। अतः मैं बादशाह की सेवा में उपस्थित होने में असमर्थ हूँ।

सुल्तान आदम की ऐसी बदतमीजी देखकर हुमायूँ के दरबारियों ने उसे सलाह दी कि इस बागी को दण्डित करना चाहिए किंतु हुमायूँ ने उसकी पुरानी सेवाओं का स्मरण करके सुल्तान आदम के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही करने से मना कर दिया। तीन दिन बाद बैराम खाँ अपनी टुकड़ी के साथ आ पहुंचा। अब हुमायूँ ने सिंधु नदी पार करके भारत की भूमि पर फिर से पैर रखा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शेरशाह सूरी राष्ट्रनिर्माता नहीं था (94)

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शेरशाह सूरी राष्ट्रनिर्माता नहीं था

शेरशाह सूरी एक धर्मांध शासक था किंतु अंग्रेजों के संरक्षण में लिखे गए इतिहास में क्रूर एवं धर्मांध शेरशाह सूरी को राष्ट्रनिर्माता घोषित कर दिया गया। साम्यवादी लेखकों ने भी उसे महान् राष्ट्रनिर्माता बताया किंतु वास्तव में शेरशाह सूरी राष्ट्रनिर्माता नहीं था।

नवम्बर 1554 में हुमायूँ अकबर को अपने साथ लेकर भारत अभियान के लिए चल पड़ा। उस समय हुमायूँ का छोटा पुत्र मिर्जा हकीम केवल छः माह का शिशु था जिसे हुमायूँ ने काबुल में ही छोड़ दिया था।

ई.1540 में जिस समय हुमायूँ भारत छोड़कर गया था, उस समय शेराशाह सूरी के राज्य का उदय हो रहा था और जब ई.1554 में हुमायूँ वापस लौट रहा था, तब शेरशाह का राज्य किसी धूमकेतु की तरह अपनी चमक बिखेकर लुप्त हो रहा था। इस समय शेरशाह सूरी की सल्तनत खण्ड-खण्ड हो चुकी थी। बची-खुची सल्तनत में भी तीन सुल्तान हो गए थे जो एक दूसरे के प्राणों के प्यासे थे। उन तीनों में से किसी को होश नहीं था कि हुमायूँ रूपी आफत उनके सिर पर मण्डरा रही है।

हुमायूँ के भारत में प्रवेश करने से पहले हमें उस शेरशाह सूरी के सम्बन्ध में कुछ चर्चा करनी चाहिए जिसने ई.1540 में हुमायूँ से उसकी सल्तनत छीनी थी। हुमायूँ पर विजय प्राप्त करने के बाद शेरशाह सूरी केवल 5 वर्ष ही शासन कर सका। ई.1545 में कालिंजर दुर्ग पर किए गए अभियान में अपनी ही तोप के फट जाने से शेरशाह की मृत्यु हो गई।

शेरशाह सूरी ने अपने शासन की पांच साल की संक्षिप्त अवधि का अधिकांश भाग युद्ध के मैदानों में व्यतीत किया था और उसने आगरा तथा दिल्ली में कुछ महीने ही बिताए थे। इस कारण शेरशाह को अपनी सल्तनत को व्यवस्थित करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला था। फिर भी भारतीय इतिहासकारों ने शेरशाह सूरी के शासनतंत्र, करप्रणाली, अर्थव्यवस्था, भूमि-प्रबंधन, न्याय व्यवस्था, यातायात व्यवस्था, कृषि प्रबंधन तथा सार्वजनिक निर्माण के इतने गुण गाए हैं कि भारत के इतिहास के आधे पन्ने शेरशाह सूरी के गुणगान से भर गए हैं और वह मौर्य सम्राटों चंद्रगुप्त मौर्य एवं अशोक तथा गुप्त सम्राटों समुद्रगुप्त एवं चंद्रगुप्त द्वितीय से भी अधिक सफल एवं महान् ठहरा दिया गया है।

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इन इतिहासकारों के ग्रंथों को पढ़कर ऐसा लगता है कि आज भारत में शासन व्यवस्था के जो विभिन्न तत्व मौजूद हैं वे शेरशाह सूरी द्वारा ही निर्मित किए गए थे। उससे पहले भारत में कुछ भी नहीं था। भारत के लोगों को न तो भूमि की नपाई करनी आती थी, न सड़कें बनानी आती थीं, न सड़कों के किनारे पेड़ लगाने आते थे, न प्याऊ और धर्मशालाओं के बारे में कोई चिंतन था। न कोई डाक-व्यवस्था उपलब्ध थी। दूरस्थ-व्यापार और वाणिज्य के बारे में तो कोई सोच भी नहीं सकता था! जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। भारत में शासन के ये तत्व हजारों साल से व्यवहार में लाए जा रहे थे। शेरशाह सूरी की प्रशंसा में लिखा गया अधिकांश इतिहास साम्यवादी विद्वानों, मुस्लिम इतिहासकारों एवं जवाहरलाल नेहरू के समाजवादी चिंतन से ग्रस्त लेखकों द्वारा लिखा गया है। इन इतिहासकारों की सम्मति में शेरशाह सूरी की शासन व्यवस्थाओं का मुकाबला भारत का केवल एक ही शासक कर सका था और वह था शेरशाह का परवर्ती बादशाह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर!

इतिहास लेखन की दृष्टि से यह एक शर्मनाक स्थिति है किंतु अन्य भारतीय इतिहासकारों ने भी इन इतिहासकारों की तुष्टिकरण करने वाली लेखनी को सामान्यतः चुनौती नहीं दी है। वस्तुतः भारत विश्व के प्राचीनतम देशों में से एक है। इस देश में शासन व्यवस्था, कर प्रणाली, कृषि प्रबंधन, अर्थव्यवस्था, भूमि प्रबंधन, न्याय व्यवस्था, यातायात व्यवस्था तथा सार्वजनिक निर्माण के तत्व विगत हजारों वर्षों से मौजूद हैं।

भारत में हजारों ऐसे ग्रंथ थे जो भारत की प्राचीन शासन व्यवस्थाओं एवं प्रणालियों की जानकारी देते थे किंतु उन्हें शक, कुषाण, हूण, तुर्क एवं मुगल आदि बर्बर आक्रांताओं द्वारा जलाकर नष्ट कर दिया गया। फिर भी अथर्ववेद, मनुस्मृति तथा आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य का अर्थशास्त्र जैसे कुछ ग्रंथ अब भी हमारे पास उपलब्ध हैं जो भारत देश की प्राचीनतम प्रशासनिक व्यवस्थाओं एवं प्रणालियों की जानकारी देते हैं।

भारतीय इतिहासकारों द्वारा कहा जाता है कि शेरशाह सूरी ने जी.टी. रोड अर्थात् ग्रांड ट्रंक रोड का निर्माण करवाया। इससे बड़ा झूठ और कोई हो नहीं सकता! भारत भूमि के पूरब से पश्चिम तक जाने वाला यह विशाल मार्ग न केवल महात्मा बुद्ध के काल में भी अस्तित्व में था, अपितु महात्मा बुद्ध से भी हजारों साल पहले उपलब्ध था जिस पर विशाल वाणिज्यिक सार्थवाह बंगाल के समुद्री तट से लेकर हिंदुकुश पर्वत तक विचरण किया करते थे।

कौटिल्य की पुस्तक अर्थशास्त्र के अनुसार मौर्यकाल में भारत में आन्तरिक व्यापार की सुविधा के लिए बड़े-बड़े राजमार्ग उपलब्ध थे। पाटलिपुत्र से पश्चिमोत्तर को जाने वाला मार्ग 1500 कोस लम्बा था। दूसरा महत्वपूर्ण मार्ग हैमवतपथ था जो हिमालय की ओर जाता था। दक्षिण भारत के विभिन्न हिस्सों में जाने के लिए भी अनेक मार्ग बनाए गए थे। कौटिल्य के अनुसार दक्षिणापथ में भी वह मार्ग सबसे अधिक महत्वपूर्ण था जो खानों से होकर जाता है जिस पर गमनागमन बहुत होता है और जिस पर परिश्रम कम पड़ता है।

केवल इसी एक तथ्य से इस बात की पोल खुल जाती है कि भारतीय इतिहासकारों ने शेरशाह सूरी के विषय में कितना पिष्टपेषण किया है और तुष्टिकरण की कैसी सीमाएं लांघी हैं!

कुछ इतिहासकारों ने तो शेरशाह सूरी को राष्ट्रनिर्माता तक घोषित कर दिया है। जब हम इस विषय में विचार करते हैं तो पाते हैं कि शेरशाह ने मुसलमान प्रजा को हिन्दू प्रजा की अपेक्षा अधिक सुविधायें दीं तथा अफगानों को अन्य मुसलमानों की अपेक्षा आर्थिक एवं राजनीतिक उन्नति के अधिक अवसर उपलब्ध करवाए।

शेरशाह ने हिन्दुओं तथा मुसलमानों के मुकदमों का निर्णय करने के लिये अलग-अलग कानून बनाए। हिन्दुओं पर जजिया पूर्ववत् जारी रखा। उसके राज्य में हिन्दू अपने धर्म का पालन तभी कर सकते थे जब वे जजिया चुका दें। उसने हिन्दुओं के राज्यों का उन्मूल करने में साधारण नैतिकता का भी पालन नहीं किया और हिन्दुओं को शासन तथा सेना में उच्च पद नहीं दिये।

ऐसी स्थिति में शेरशाह को भारत राष्ट्र का निर्माता नहीं माना जा सकता। हाँ, वह भारत में द्वितीय अफगान राष्ट्र का निर्माता अवश्य था जिसमें इस देश के बहुसंख्य हिन्दुओं के लिए बराबरी का स्थान नहीं था। फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि शेरशाह सूरी का शासन उसके पूर्ववर्ती तुर्क शासकों एवं बाबर तथा हुमायूँ के शासन से अच्छा था। शेरशाह के शासन में उत्तर भारत के हिन्दुओं पर वैसे अत्याचार नहीं हुए थे जैसे अत्याचार उसके पूर्ववर्ती अफगान शासकों के काल में हुए थे!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अफगान औरतें मुगलों की हवस बुझाने लगीं (95)

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अफगान औरतें मुगलों की हवस बुझाने लगीं

सुप्रसिद्ध इतिहासकार पी. एन. ओक ने लिखा है कि दीपालपुर में पराजित होने के बाद अफगानों ने अपनी औरतें मुगलों को सौंप दीं। अफगान औरतें मुगलों की हवस बुझाने लगीं।

ई.1545 में शेरशाह सूरी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जलाल खाँ सलीमशाह अथवा इस्लामशाह के नाम से दिल्ली का सुल्तान हआ। यद्यपि उसने आठ साल शासन किया तथापि उसे इस पूरी अवधि में अपने भाइयों एवं अमीरों के विद्रोहों का सामना करना पड़ा। पंजाब के गवर्नर हैबत खाँ के विद्रोह को दबाने में उसे आठ साल लग गए।

इन विद्रोहों के कारण इस्लामशाह का राज्य छीज गया तथा उसकी सेना कमजोर हो गई। सितम्बर 1553 में इस्लामशाह बीमारी के कारण मर गया। उस समय इस्लामशाह का 12 वर्षीय पुत्र फीरोजशाह ग्वालियर में था। अमीरों ने ग्वालियर में ही उसकी ताजपोशी करके उसे सुल्तान घोषित कर दिया परंतु तीन दिन बाद ही मुबारिज खाँ ने फीरोजशाह की हत्या कर दी। मुबारिज खाँ फीरोज खाँ के पिता का सगा भाई तथा माता का चचेरा भाई था। इस प्रकार वह फीरोज खाँ का चाचा और मामा दोनों था।

मुबारिज खाँ महमूदशाह आदिल के नाम से तख्त पर बैठा। वह अत्यंत दुष्ट व्यक्ति था। उसके सुल्तान बनते ही सारे राज्य में विद्रोह की अग्नि भड़क उठी। बिहार में ताज खाँ ने विद्रोह कर दिया जो कि एक प्रबल प्रांतपति था। जब मुहम्मदशाह ताज खाँ का दमन करने के लिए बिहार गया, तब अवसर पाकर उनका चचेरा भाई इब्राहीम खाँ दिल्ली के तख्त पर बैठ गया और आगरा की ओर बढ़ा। इसकी सूचना पाने पर महमूदशाह चुनार की ओर चला गया। इस प्रकार साम्राज्य के पूर्वी भाग में महमूदशाह और पश्चिमी भाग में इब्राहीम खाँ शासन करने लगा।

इसी समय पंजाब में शेरशाह के भतीजे अहमद खाँ ने विद्रोह कर दिया। उसने सिकन्दरशाह की उपाधि धारण की और अपनी सेना के साथ आगरा के लिए प्रस्थान किया। इब्राहीम खाँ ने उसका सामना किया परन्तु परास्त होकर सम्भल की ओर भाग गया। सिकन्दरशाह ने दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार कर लिया।

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इस प्रकार इस समय सूर सल्तनत में तीन सुल्तान हो गए। महमूदशाह चुनार में, इब्राहीम खाँ सम्भल में और सिकंदरशाह दिल्ली एवं आगरा पर शासन करने लगा। राज्य की शक्ति बुरी तरह छीज गई। सेना का संगठन बिखर गया। वस्तुतः इस काल में सूरी सल्तनत ताश के महल की तरह रह गई थी जिसे केवल फूंक मारकर ही ढहाया जा सकता था। जब ई.1540 में हुमायूँ आगरा, दिल्ली और पंजाब छोड़कर भागा था तो हुमायूँ एक भावुक युवक था और अब ई.1554 में जब वह भारत लौटा तो एक परिपक्व प्रौढ़ बन चुका था, जीवन के थपेड़ों ने उसे अनुभवी बना दिया था किंतु उसके मन की भावुकता अभी भी गई नहीं थी। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि हुमायूँ के मन में जितनी भावुकता अपने परिवार के लिए थी, उतनी अपने अमीरों के लिए नहीं थी। जितनी भावुकता काबुल की मुस्लिम जनता के लिए थी, उतनी भारत की हिंदू जनता के लिए नहीं थी। ऐसी मनःस्थिति में हुमायूँ के लिए भारत को जीत लेना कठिन नहीं था। अबुल फजल ने लिखा है कि हुमायूँ की सेना में तीन हजार से अधिक सैनिक नहीं थे किंतु उसकी सेवा में 57 बड़े अमीर थे जिनमें बैराम खां, शाह अबुल मआली, खिज्र ख्वाजा खां, तर्दी बेग खां, अशरहम खाँ तथा शिहाबुद्दीन अहमद खाँ आदि प्रमुख थे।

हुमायूँ की सेना ने सिंधु नदी पार करते ही मारकाट मचा दी। इस क्षेत्र में अफगानों के बहुत से गांव बसे हुए थे। हुमायूँ की सेना ने उन गांवों को घेर लिया। देखते ही देखते अफगानों के गांव काटे जाने लगे। जो भी सामने आया, मिट गया। संभवतः क्रूरता का यह नंगा नाच हुमायूँ की शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए किया गया था ताकि अफगानों के मन में हुमायूँ के नाम की दहशत बैठ जाए और वे मुकाबले के लिए न आएं।

शीघ्र ही यह सेना पंजाब के कालानूर नामक स्थान पर पहुंच गई। यहाँ से हुमायूँ ने अपने कुछ अमीरों को एक सेना के साथ लाहौर भेजा। उन्हें यह आदेश दिया गया कि वे लाहौर पहुंचकर नगर पर अधिकार करें तथा हुमायूँ के नाम का खुतबा पढ़वाएं। बादशाह हुमायूँ के लाहौर पहुंचने से पहले ही मुगल अधिकारी लाहौर में बादशाह के नाम के सिक्के ढलवाएं।

लाहौर भेजे जाने वाले अधिकारियों में शिहाबुद्दीन अहमद खां, अशरहम खाँ तथा फरहद खाँ प्रमुख थे। जब यह सेना लाहौर के लिए प्रस्थान कर गई तब बैराम खाँ एवं तर्दी बेग खाँ आदि को एक बड़ी सेना के साथ हरियाणा की तरफ भेजा गया। उस समय हरियाणा में सिकंदरशाह की ओर से नसीब खाँ पंजभैया नामक अमीर शासन करता था।

जब यह सेना भी अपने लक्ष्य के लिए चली गई तो हुमायूँ ने एक सेना के साथ लाहौर के लिए प्रस्थान किया ताकि यदि लाहौर विजय में कठिनाई आ रही हो तो उस सेना की सहायता की जा सके। इस विवरण से प्रतीत होता है कि इस समय हुमायूँ की सेना में केवल तीन हजार सैनिक नहीं थे अपितु कई हजार सैनिक थे। यह संभव है कि पंजाब में नए सैनिकों की भर्ती भी की गई होगी।

इतिहास का कोई नौसीखिया विद्यार्थी भी बता सकता है कि हुमायूँ ने केवल तीन हजार सैनिकों के बल पर भारत विजय की योजना नहीं बनाई होगी! क्योंकि इस समय दिल्ली, आगरा और पंजाब के शासक सिकंदरशाह सूरी की सेना में लगभग पचास हजार सैनिक थे। दीपालपुर के हाकिम शाहबाज खाँ की सेना में भी कई हजार सैनिक रहा करते थे।

24 फरवरी 1555 को हुमायूँ लाहौर पहुंचा। तब तक हुमायूँ की अग्रिम सेना ने दीपालपुर तथा लाहौर पर कब्जा कर लिया था। लाहौर के अमीरों ने बादशाह का लाहौर नगर में भव्य स्वागत किया। लाहौर नगर के गणमान्य व्यक्ति भी हुमायूँ के स्वागत के लिए उपस्थित हुए। लाहौर पर हुमायूँ का अधिकार हो जाना बहुत बड़ी सफलता तो न थी किंतु यह आगे के अभियान को चलाने में बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होने वाली थी।

कुछ समय बाद हुमायूँ को सूचना मिली कि शाहबाज खाँ अफगान बहुत से अफगानों को एकत्रित करके दीपालपुर पर अधिकार करने की योजना बना रहा है। इस पर हुमायूँ ने शाह अबुल मआली तथा अलीकुली खाँ शैबानी को शाहबाज खाँ अफगान के विरुद्ध कार्यवाही करने भेजा। इस सेना ने शाहबाज खाँ अफगान को नष्ट कर दिया तथा सुरक्षित रूप से लाहौर लौट आई। सुप्रसिद्ध इतिहासकार पी. एन. ओक ने लिखा है कि दीपालपुर में पराजित होने के बाद अफगानों ने अपनी औरतें मुगलों की हवस बुझाने के लिए उन्हें सौंप दीं।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ की ठोकर से ताश के पत्तों की तरह ढह गई सूर सल्तनत (96)

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हुमायूँ की ठोकर से ताश के पत्तों की तरह ढह गई सूर सल्तनत

शेर खाँ सूरी ने हुमायूँ के चौसा युद्ध तथा बिलग्राम युद्ध में हराकर हुमायूँ को हिन्दुस्तान से बाहर कर दिया था और सूर सल्तनत की स्थापना की थी किंतु जब हुमायूँ के अच्छे दिन आए तो हुमायूँ की ठोकर से ताश के पत्तों की तरह ढह गई सूर सल्तनत!

पंजाब पर अधिकार

हुमायूँ ने कालानूर, दीपालपुर तथा लाहौर सहित पंजाब के अनेक नगरों एवं गांवों पर कब्जा कर लिया। हुमायूँ ने अपनी एक सेना बैराम खाँ के नेतृत्व में हरियाणा की तरफ भेजी थी। उस काल में हरियाणा पंजाब प्रांत का ही एक हिस्सा था।

जब बैराम खाँ अपनी सेना लेकर हरियाणा पहुंचा तो नसीब खाँ अफगान ने बैराम खाँ का मार्ग रोका किंतु कुछ देर की लड़ाई के बाद नसीब खाँ पराजित होकर भाग गया। इस प्रकार हुमायूँ की ठोकर से पंजाब मिट्टी की चिड़िया की तरह उसके कदमों में आ गिरा।

नसीब खाँ का बहुत सा माल शाही सेना ने लूट लिया और उसके कुटुम्ब को भी पकड़ लिया। बैराम खाँ ने नसीब खाँ के परिवार की स्त्रियों एवं बच्चों को नसीब खाँ के पास भिजवा दिया और लूट का माल बादशाह के पास भेज दिया। यहाँ से बैराम खाँ जालंधर आया और नगर पर अधिकार करके बैठ गया। उसने जलंधर के परगने अपने अधिकारियों को दे दिए।

इसी बीच हुमायूँ के अमीर इस्कंदर खाँ उजबेक ने सरहिंद पर कब्जा कर लिया। इस पर सिकंदरशाह सूरी ने आगरा से एक सेना तातार खाँ नामक सेनापति के नेतृत्व में भेजी। तातार खाँ ने इस्कंदर खाँ उजबेक में कसकर मार लगाई। इस कारण इस्कंदर खाँ उजबेक को सरहिंद खाली करना पड़ा। बैराम खाँ ने इस्कंदर खाँ उजबेक की इस कायरता को पसंद नहीं किया तथा खुलेआम इस्कंदर खाँ उजबेक की भर्त्सना की।

मच्छीवाड़ा की लड़ाई

कुछ दिनों बाद हुमायूँ भी लाहौर से चलकर जलंधर आ गया और बैरामखां से मिला। यहाँ से हुमायूँ मच्छीवाड़ा की तरफ बढ़ा। जब वह मच्छीवाड़ा के निकट पहुंचा तब तक उस क्षेत्र में बरसात आरम्भ हो चुकी थी तथा सतलुज नदी में बाढ़ आने की आशंका थी। इसलिए अमीरों ने हुमायूँ को सलाह दी कि इस समय नावों पर कब्जा कर लेना चाहिए किंतु नदी पार करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

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बैराम खाँ को ज्ञात था कि अफगानों की एक बड़ी सेना नदी के दूसरी तरफ आ रही है। इस समय विलम्ब करने से अफगानों को तैयारी करने का समय मिल जाना निश्चित था। यदि अफगानों की सेना नदी के उस पार पहुंच जाती तो बादशाह की सेना उस पार नहीं जा पाती। इसलिए बैराम खाँ ने अमीरों से कहा कि मैं नदी पार करके आगे जाता हूँ। आप लोग पीछे आ जाना। जब बैराम खाँ ने नदी पार कर ली तब अन्य अमीरों को भी उसका अनुसरण करना पड़ा और बादशाह भी नदी पार करके दूसरी ओर आ गया। कुछ ही समय बाद अफगानों की सेना भी आ पहुंची। दोनों पक्षों में उसी समय युद्ध आरम्भ हो गया। निश्चित रूप से अफगानों की सेना हुमायूँ पर भारी पड़ने वाली थी किंतु थोड़ी ही देर में अंधेरा होने से विलम्ब हो गया। जिस स्थान पर अफगान सेना ने पड़ाव डाला, उसके पास ही एक गांव था जिसमें कच्चे फूस की झौंपड़ियां बनी हुई थीं। पता नहीं मुगलों अथवा अफगानों, किसकी दुष्टता से उन झौंपड़ियों में आग लग गई और चारों ओर उजाला हो गया। इस उजाले में अफगानों की सेना साफ दिखाई देने लगी। इस पर हुमायूँ के पक्ष के अमीरों ने अफगानों पर हमला बोल दिया।

इधर भारत के निर्धन किसानों की झौंपड़ियां धू-धू कर जल रहीं थी और उधर मुगलों एवं अफगानों में हिंदुस्तान के ताज को लेकर फैसला हो रहा था। पी. एन. ओक ने लिखा है कि इन झौंपड़ियों में आग जानबूझ कर लगाई गई थी ताकि उस आग की रौशनी में अफगान और मुगल युद्ध लड सकें।

मुगलों द्वारा किए गए हमले के समय अफगान सेना असावधान थी। उसने सोचा भी नहीं था कि हुमायूँ की सेना रात में उन पर हमला कर देगी। इसलिए इस बार हुमायूँ की सेना भारी पड़ी और रात के तीसरे पहर में हुमायूँ की सेना को विजय प्राप्त हो गई। बहुत से अफगान मारे गए और बहुत से प्राण बचाकर भाग गए। हुमायूँ की ठोकर से मच्छीवाड़ा भी नष्ट हो गया।

सरहिंद की लड़ाई

मच्छीवाड़ा से हुमायूँ की सेना सरहिंद की तरफ बढ़ी। बैरामखां ने एक प्रबल धावा बोलकर सरहिंद पर अधिकार कर लिया। सिकंदरशाह सूरी का सेनापति तातार खाँ सरहिंद खाली करके मच्छीवाड़ा की तरफ चला गया। जब सरहिंद के क्षेत्र में अफगानों की हलचल बंद हो गई तो हुमायूँ लाहौर चला गया। कुछ ही दिनों में सिकंरदशाह सूरी ने 40 हजार घुड़सवारों के साथ सरहिंद को घेर लिया। तातार खाँ तथा नसीब खाँ भी अपनी सेनाएं लेकर सिकंदरशाह सूरी की सहायता के लिए आ पहुंचे।

बैराम खाँ ने सरहिंद के दुर्ग में मोर्चाबंदी की किंतु उसके पास इतने सैनिक नहीं थे जो सरहिंद की रक्षा कर पाते। इसलिए बैराम खाँ ने बादशाह हुमायूँ को संदेश भिजवाया कि वह तुरंत लाहौर से प्रस्थान करके सरहिंद आए किंतु उस समय हुमायूँ उदरशूल से पीड़ित था। अतः वह लाहौर से रवाना नहीं हो सका।

बैराम खाँ जी-जान से सरहिंद की रक्षा कर रहा था। वह नहीं चाहता था कि सरहिंद को खाली करके भागने का कलंक इस्कंदर खाँ उजबेग की तरह बैराम खाँ के माथे पर भी लगे। अतः वह संघर्ष करता रहा। कुछ ही दिनों में स्थिति यह हो गई कि न तो बैराम खाँ सरहिंद खाली करता था, न हुमायूँ लाहौर से सेना लेकर आता था और न सिकंदरशाह सूरी सरहिंद को छोड़कर जाता था।

जब बैराम खाँ के पास सरहिंद की रक्षा का अन्य कोई उपाय नहीं बचा तो उसने बादशाह को सरहिंद आने के लिए अंतिम संदेश भिजवाया। इस संदेश को पाकर हुमायूँ विचलित हो गया। वह बीमार था और युद्ध करने की स्थिति में नहीं था। इसलिए उसने तेरह वर्ष के अकबर को ही सेना का नेतृत्व सौंपकर सरहिंद के लिए रवाना कर दिया।

जब यह सेना सरहिंद पहुंची तो बैराम खाँ को सहारा मिल गया किंतु अब भी सिकंदरशाह की सेना भारी पड़ रही थी। अतः कुछ दिनों बाद हुमायूँ भी अपनी बची-खुची सेना लेकर सरहिंद के लिए चल पड़ा। इस समय तक बैराम खाँ तथा सिकंदरशाह के बीच युद्ध चलते हुए 25 दिन हो चुके थे।

सुल्तान सिकंदरशाह सूरी तथा बादशाह हुमायूँ के सरहिंद के युद्ध में उपस्थित होने के कारण यह लड़ाई आर-पार की हो गई। दोनों ओर से सर्वस्व दांव पर लगा था। हुमायूँ के आने के बाद 15 दिवस तक दोनों ओर से भीषण संघर्ष किया गया। हुमायूँ ने अपनी सेना के चार भाग किए जिनका नेतृत्व अकबर, अतगा खां, ख्वाजा मोअज्जम तथा इस्कंदर खाँ उजबेक ने किया। बैराम खाँ सरहिंद के भीतर से मोर्चा संभाल रहा था।

हुमायूँ की ठोकर

अंत में मुगलों की विजय हुई और अफगान पीठ दिखाकर भाग गए। सिकंदरशाह सूरी भी उन्हीं के साथ भाग छूटा। इस समय तेज आंधी चल रही थी। इसलिए हुमायूँ की सेना भागते हुए अफगानों का पीछा नहीं कर सकी। हुमायूँ के सैनिकों ने सिकंदरशाह का खेमा लूट लिया जहाँ से अपार धन प्राप्त हुआ। यह धन बादशाह को समर्पित कर दिया गया।

अब हुमायूँ के लिए दिल्ली दूर नहीं थी। इस्कंदर खाँ उजबेक को उसी दिन दिल्ली पर अधिकार करने के लिए रवाना कर दिया गया। हुमायूँ की ठोकर से सूर सल्तनत ताश के पत्तों की तरह ढह चुकी थी!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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