Home Blog Page 91

शाहहुसैन का षड़यंत्र (67)

0
शाहहुसैन का षड़यंत्र - www.bharatkaitihas.com
शाहहुसैन का षड़यंत्र

शाहहुसैन का षड़यंत्र इतना घिनौना था कि उसने न केवल हुमायूँ को बर्बाद कर दिया अपितु मानवता को भी शर्मसार किया। कोई शायद ही इस बात पर विश्वास कर सकता है कि इंसान अपने बादशाह के साथ ऐसा घृणित व्यवहार भी कर सकता है!

कामरान ने मिर्जा हिंदाल को लमगानात और उसके निकटवर्ती दर्रों का गवर्नर नियुक्त किया तो मिर्जा हिंदाल नाराज होकर बदख्शां चला गया तथा वहाँ एकांतवास करने लगा। हिंदाल की माता उसे बदख्शां से काबुल ले आई। उधर हुमायूँ सिंध के ‘जून’ नामक स्थान पर अपनी बुआ खानजादः बेगम के लौटकर आने की प्रतीक्षा करता रहा। हुमायूँ का आर्थिक संकट गहराता जा रहा था और उसके पास सैनिकों की संख्या भी बहुत कम रह गई थी। इसलिए हुमायूँ स्वयं ही कांधार की तरफ जाने का विचार करने लगा।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि ठट्ठा के शासक मिर्जा शाहहुसैन ने हुमायूँ के पास अपने दूत भेजकर उससे कहलवाया कि अब आपके लिए उचित है कि आप सिंध छोड़कर कांधार चले जाएं। हुमायूँ को लगा कि मेरी स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि अब तो दुश्मनों को भी मुझ पर दया आ गई।

पाठकों को स्मरण होगा कि सेहवन के किलेदार मीर अलैकः ने हुमायूँ की नावों को सामान सहित पकड़ लिया था और हुमायूँ को सलाह दी थी कि पुराने नमक का विचार करके मैं आपको सलाह देता हूँ कि आप सेहवन से चले जाएं। इस पर हुमायूँ ने सेहवन के किलेदार की सलाह मानकर सेहवन का क्षेत्र छोड़ दिया था। अब ठीक यही सलाह ठट्ठा का शासक भी दे रहा था।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

हुमायूँ ने मिर्जा शाहहुसैन की यह सलाह स्वीकार कर ली तथा मिर्जा शाहहुसैन को सूचित किया कि मेरे कंप (शिविर) में घोड़े एवं ऊंट बहुत कम बचे हैं, यदि तुम हमें कुछ घोड़े एवं ऊंट दे दो तो हम कांधार चले जावें। मिर्जा शाहहुसैन ने हुमायूँ की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली तथा उससे कहलवाया कि जब आप नदी पार करेंगे, तब एक हजार ऊंट जो उस पार हैं, हम आपके पास पास भेज देंगे। इस पर हुमायूँ अपने स्त्री, पुत्र, सैनिक एवं कर्मचारियों के साथ नावों में सवार हुआ और तीन दिन तक नदी में चलता रहा। ठट्ठा राज्य की सीमा के पार ‘नवासी’ नामक एक गांव था जहाँ हुमायूँ तथा उसके साथियों ने नावों से उतर कर स्थल मार्ग से यात्रा करने का विचार किया। हुमायूँ ने अपने मुख्य ऊंटवान सुल्तान कुली को मिर्जा शाह हुसैन के अधिकारियों के पास भेजा ताकि वह शाह द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे ऊंटों को ले आए। सुल्तान कुली हुमायूँ के आदेशानुसार मिर्जाशाह के अधिकारियों से एक हजार ऊंट ले आया। हुमायूँ ने सभी ऊंट अपने उन सैनिकों को दे दिए जिनके पास सवारी करने के लिए घोड़ा या ऊंट नहीं बचा था।

शेष बचे हुए ऊंट सामान ढोने के लिए नियत किए गए। गुलबदन बेगम ने मिर्जा शाहहुसैन द्वारा उपलब्ध कराए गए ऊंटों का बड़ा रोचक वर्णन किया है जिससे ज्ञात होता है कि मिर्जा ने हुमायूँ को ऊंट उपलब्ध करवाकर उसके प्रति उदारता का परिचय नहीं दिया था अपितु यह भी मिर्जा शाहहुसैन का षड़यंत्र था जिसने हुमायूँ को बरबादी के अंतिम छोर पर पहुंचा दिया।

ये ऊंट सीधे जंगलों से पकड़ कर लाए गए थे और इन पर कभी भी किसी मनुष्य ने सवारी नहीं की थी। इसलिए जब इन ऊंटों पर सैनिक और अन्य मनुष्य सवार हुए तो ऊंट उन्हें धरती पर पटक कर जंगल की तरफ भाग गए। जिन ऊंटों पर बोझा लादा गया, वे या तो बोझा गिराकर जंगलों में भाग गए या फिर पीठ पर बोझा लिए हुए ही उछलते-कूदते हुए जंगलों की तरफ भाग गए।

बहुत से ऊंट घोड़ों की टापों से बिदक जाते थे और उछलने लगते थे। इस कारण बहुत से सैनिक घायल हो गए और ऊंटों की पीठ पर लदा हुआ सामान ऊंटों की ही लातों द्वारा कुचल कर नष्ट कर दिया गया। इस प्रकार हुमायूँ का बहुत सा रसद और आवश्यकता का अन्य सामान नष्ट हो गया। तब कहीं जाकर हुमायूँ को शाहहुसैन का षड़यंत्र समझ में आया कि दुश्मन ने हुमायूँ पर दया नहीं की थी, अपितु बर्बादी का जाल रचा था। दो सौ से अधिक ऊंट हुमायूँ को बरबाद करके जंगलों में भाग गए।

इस प्रकार हर ओर से मायूस होकर हुमायूँ ने भारत की भूमि छोड़ दी और उसने जीवन में एक बार फिर कांधार की तरफ कूच करने का निर्णय किया।

जब हुमायूँ का काफिला ‘सीबी’ के निकट पहुंचा तो वहाँ मिर्जा शाह हुसैन का मुख्य ऊंटवान महमूद स्वयं मौजूद था। उसने सीबी के किले को भीतर से बंद कर लिया और हुमायूँ के लिए नया जाल बुनने लगा। हुमायूँ ने सीबी से छः कोस की दूरी पर अपना डेरा लगाया।

यह स्थान वर्तमान समय में पाकिस्तान के बलोचिस्तान नामक प्रांत में स्थित है तथा दुनिया की सबसे गर्म पहाड़ियों के लिए जाना जाता है। इन पहाड़ियों का तापमान गर्मियों में 52 डिग्री सैल्सियस तक पहुंच जाता है किंतु इस समय सर्दियां थीं इसलिए हुमायूँ को मौसम की तरफ से कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई।

हुमायूँ ने अपने कुछ गुप्तचर हुमायूँ के प्रति कामरान की मनोदशा जानने के लिए मीर अलादोस्त नामक अपने एक परिचित के पास भेजे जो कांधार में रहता था। इन गुप्तचरों के लौट कर आने तक हुमायूँ ने इसी स्थान पर टिके रहने का निश्चय किया। मिर्जा शाह हुसैन के मुख्य ऊंटवान महमूद ने हुमायूँ के गुप्तचरों को पकड़ लिया किंतु हुमायूँ को यह बात ज्ञात नहीं हो सकी। वह उन गुप्तचरों की प्रतीक्षा में सीबी के निकट ही रुका रहा। किसी तरह से ये गुप्तचर स्वयं को मुक्त करवाकर मीर अलादोस्त तक पहुंचे।

मीर अलादोस्त ने उन गुप्तचरों के साथ तीन हजार अनार तथा कुछ मेवा हुमायूँ के लिए भिजवाई और उसे सलाह दी- ‘इस समय मिर्जा अस्करी कांधार में है। यदि वह हुमायूँ को आमंत्रित करे तभी हुमायूँ कांधार की तरफ जाए अन्यथा कांधार और काबुल से दूर ही रहे। बादशाह को समझना चाहिए कि उनके पास सेना नहीं है अतः बादशाह स्वयं ही सोच लें कि कामरान उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा!’

इस विचित्र संदेश को सुनकर बादशाह हुमायूँ गहरी चिंता में डूब गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पिशाचों के देश में पहुंच गया हुमायूँ (68)

0
पिशाचों के देश में - www.bharatkaitihas.com
पिशाचों के देश में पहुंच गया हुमायूँ

जब हुमायूँ का काफिला उस गांव के पास पहुंचा तो वहाँ पर बहुत ही कम घर दिखाई दिए जिनमें कुछ जंगली बिलूची पहाड़ के नीचे बैठे हुए थे। उनकी बोली पिशाचों जैसी थी। हुमायूँ पिशाचों के देश में पहुंच गया !

सिंध के अंतिम छोर पर स्थित सीबी के निकट पहुंचकर हुमायूँ ने कामरान की मनोदशा जानने के लिए अपने कुछ गुप्तचर मीर अलादोस्त के पास भिजवाए। मीर अलादोस्त ने कहलवाया कि यदि कामरान हुमायूँ को आमंत्रित करे तभी हुमायूँ कांधार की तरफ जाए अन्यथा कांधार और काबुल से दूर ही रहे। बादशाह को समझना चाहिए कि उनके पास सेना नहीं है, अतः कामरान उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा! इस विचित्र संदेश को सुनकर हुमायूँ चिंता में डूब गया। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि बादशाह आश्चर्य और विचार में पड़ गए कि क्या करें और कहाँ जाएं!

तर्दी मुहम्मद खाँ एवं बैराम खाँ ने सम्मति दी कि- ‘उत्तर और शाल मस्तान को छोड़कर जो कि कांधार की सीमा पर स्थित है, कहीं और जाने का विचार करना संभव नहीं है। शाल मस्तान में बहुत सारे अफगान रहते हैं, जिन्हें अपनी ओर मिलाया जा सकता है। वहाँ चलने से एक लाभ यह भी है कि जो सैनिक, अमीर और बेग; मिर्जा अस्करी को छोड़कर आएंगे, वे भी हमारी ओर हो जाएंगे।’

इस पर हुमायूँ ने शाल मस्तान के लिए कूच किया। जब शाल मस्तान के निकट पहुंचे तब दोपहर की नमाज के समय एक उजबेग जवान टट्टू पर बैठकर वहाँ आया। उसने चिल्ला कर कहा- ‘बादशाह तुरंत घोड़े पर सवार हों, मैं रास्ते में सारी बात कहूंगा क्योंकि इस समय बात करने का समय नहीं है।’

उसका संदेश सुनते ही हुमायूँ एक घोड़े पर सवार होकर उस सैनिक के साथ चल दिया। ख्वाजा मुअज्जम तथा बैराम खाँ आदि कुछ अमीर एवं बेग भी हुमायूँ के साथ चले। जब दो तीर  रास्ता निकल गया तब उस सैनिक ने बताया कि मैं इसलिए आपको कंप से बाहर निकालकर लाया क्योंकि मिर्जा अस्करी दो हजार सैनिकों को लेकर आपके कैंप के बिल्कुल निकट आ गया था। उसका इरादा आपको गिरफ्तार करने का है।

उस सैनिक की बात सुनकर सबको बादशाह के परिवार का ध्यान आया जो पीछे कंप में ही छूट गया था। इस पर हुमायूँ ने ख्वाजा मुअज्जम तथा बैराम खाँ को वापस कंप में भेजा ताकि वे हमीदा बानू बेगम को ले आएं। ये लोग उल्टे पैरों हुमायूँ के शिविर में गए। तब तक अस्करी की सेना काफी निकट पहुंच चुकी थी। इसलिए ख्वाजा मुअज्जम तथा बैराम खाँ ने बेगम को आनन-फानन में घोड़े पर सवार कराया और उसे लेकर शाही शिविर से निकल गए।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

उन्हें इतना भी समय नहीं मिला कि एक साल के शिशु अकबर को भी साथ ले लें। जैसे ही बेगम कंप से निकलकर गई वैसे ही मिर्जा अस्कारी अपने दो हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ हुमायूँ के शिविर में घुस गया। हुमायूँ के शिविर में उपस्थित अधिकांश लोगों को अब तक ज्ञात नहीं हुआ था कि क्या हो रहा है! इसलिए अस्करी के घुड़सवारों को शाही डेरे में घुसते हुए देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग जोर-जोर से चिल्लाने लगे। चारों ओर भगदड़ मच गई किंतु अस्करी के सिपाहियों ने किसी को भी शिविर से बाहर नहीं निकलने दिया। मिर्जा अस्करी ने शाही तम्बू में घुसकर पूछा कि बादशाह कहाँ है। बादशाह के तम्बू में उपस्थित लोगों ने कहा कि बादशाह सलामत तो बहुत समय हुआ शिकार खेलने गए हैं। अस्करी समझ गया कि बादशाह बच निकला। अस्करी ने कंप में स्थित शिशु अकबर को पकड़ लिया। शाही डेरे में इस समय शाही परिवार के कई सदस्य थे। अस्करी ने उनसे कहा कि आप सब मेरे साथ कांधार चलें किंतु वे अस्करी के साथ नहीं जाना चाहते थे। इस पर अस्करी उन्हें जबर्दस्ती अपने साथ कांधार ले गया। अस्करी ने एक साल के बालक अकबर को अपनी बेगम सुल्तानम को सौंप दिया।

गुलबदन बेगम ने सोलह अमीरों एवं बेगों के नाम लिखे हैं जो इस समय हुमायूँ के साथ बच गए थे। हमीदा बानू बेगम के हवाले से गुलबदन बेगम ने तीस मनुष्यों के साथ होने की बात लिखी है। गुलबदन ने लिखा है कि बादशाह के साथ इस समय केवल दो ही स्त्रियां चल सकी थीं जिनमें से एक तो हुमायूँ की बेगम हमीदा बेगम थी और दूसरी हसन अली एशक आगा की पत्नी थी।

गुलबदन ने लिखा है कि बादशाह हुमायूँ पहाड़ की ओर चार कोस तक चलते चले गए। जिस समय हमीदा बानू बेगम और हसन अली एशक आगा की पत्नी हुमायूँ के काफिले के पास पहुंचीं तो हुमायूँ ने अपनी गति बढ़ा दी। हुमायूँ के पास खाने के लिए कुछ नहीं था। इस इलाके में बरसात होकर चुकी थी और भारी बर्फबारी हो रही थी।

फिर भी इस कड़कड़ाती हुई ठण्ड में भूखे-प्यासे मुगल अपने ही खानदान के शहजादे अस्करी के डर से रात भर चलते रहे। जब ऐसा लगने लगा कि लोग ठण्ड और भूख से मर जाएंगे, तब एक स्थान पर रुककर आग जलाई गई तथा एक घोड़े को मारकर लोहे की टोपी में उसका मांस उबालकर खाया गया।

हुमायूँ ने मांस का एक टुकड़ा खुद ही आग पर भूना और उससे पेट भरा जिससे शरीर को ठण्ड से कुछ आराम मिला। दिन निकलने पर उन्हें एक विशाल पहाड़ दिखाई दिया जिसके उस पार बलूच लोगों का गांव होने का अनुमान था। उस गांव तक पहुंचने के लिए हुमायूँ के काफिले को दो दिन का समय लग गया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि जब हुमायूँ का काफिला उस गांव के पास पहुंचा तो वहाँ पर बहुत ही कम घर दिखाई दिए जिनमें कुछ जंगली बिलूची पहाड़ के नीचे बैठे हुए थे। उनकी बोली पिशाचों जैसी थी। हुमायूँ के साथियों ने पिशाचों के देश में डेरा डाल दिया। इस पर बहुत से बिलूच एकत्रित होकर उनके निकट आ गए और अपनी भाषा में बात करने लगे। उनके शब्द तो मुगलों के समझ में नहीं आ रहे थे किंतु उन्हें सुनकर भय अवश्य लगता था।

हुमायूँ के सौभाग्य से हसन अली एशक आगा की पत्नी बलूच थी और वह बलूचों के इस कबीले की भाषा को समझ पा रही थी। उसने हुमायूँ को बताया कि ये लोग आपस में बात कर रहे हैं कि यदि हम बादशाह हुमायूँ को पकड़कर मिर्जा अस्करी को सौंप दें तो वह हमें बहुत सारा ईनाम देगा। हुमायूँ समझ गया कि अस्करी के सिपाही इस क्षेत्र में घूम रहे हैं। उन्होंने ही यह बात इन्हें बताई है।

हुमायूँ समझ गया कि वह न तो हिंदुस्तान में सुरक्षित रह पाया था, न सिंध और थट्टा के रेगिस्तान में छिप पाया था और न पिशाचों के देश में उसे पैर टिकाने की जगह मिलने वाली थी। इंसान का दुर्भाग्य उसे जो दिखा दे, वह कम है।

हुमायूँ ने अपने साथियों से कहा कि रात होने से पहले ही हमें यहाँ से निकल चलना चाहिए। रात में ये लोग हमें नुक्सान पहुंचाएंगे। जब हुमायूँ और उसके साथी वहाँ से चलने लगे तो पिशाच जैसे लोगों ने यह कहकर उन्हें रोक लिया कि उनका सरदार आने वाला है, उससे पहले तुम लोग यहाँ से नहीं जा सकते!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ईरान की बेगम ने हमीदा बानू बेगम का शानदार स्वागत किया (69)

0
ईरान की बेगम - www.bharatkaitihas.com
ईरान की बेगम ने हमीदा बानू बेगम का शानदार स्वागत किया

एक दिन शाहजादा सुल्तानम ने हमीदा बानू बेगम का आतिथ्य किया। शाह ने अपनी बहिन से कहा कि हिंदुस्तान की मलिका के सम्मान में राजधानी से बाहर उत्सव रखना। ईरान की बेगम ने हमीदा बानू बेगम का शानदार स्वागत किया।

हुमायूँ अपनी पत्नी हमीदा बानू बेगम तथा तीस लोगों के साथ एक ऐसे बलूच कबीले में पहुंच गया जिसके लोग पिशाचों जैसी भाषा बोलते थे। हसन अली एशक आगा की बलूच पत्नी ने हुमायूँ को बताया कि ये लोग हमें पकड़कर मिर्जा अस्करी को सौंपने की बात कर रहे हैं।

जब हुमायूँ और उसके साथी वहाँ से चलने लगे तो बलूचों ने शाही काफिले को यह कहकर रोक लिया कि उनका सरदार आने वाला है, उससे पहले तुम लोग यहाँ से नहीं जा सकते। हुमायूँ और उसके साथियों ने विचार किया कि इस समय लड़ने में नुक्सान है। इसलिए रात होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए और रात के अंधेरे में चुपचाप निकलना चाहिए किंतु आधी रात से पहले ही उस कबीले का सरदार आ गया।

बलूच सरदार ने हुमायूँ के समक्ष उपस्थित होकर कहा कि मेरा विचार आपको पकड़कर मिर्जा अस्करी एवं कामरान को सौंपने का था किंतु अब मैंने आपके दर्शन कर लिए हैं इसलिए मेरे मन के भाव बदल गए हैं। जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं तथा मेरे छः पुत्र जीवित हैं, तब तक हम आपके एक-एक बाल पर निछावर हैं। भले ही मिर्जा अस्करी और कामरान मेरी खाल ही क्यों न खिंचवा लें।

बलूच सरदार की बात सुनकर हुमायूँ ने अपने कपड़ों से निकालकर एक मोती तथा एक लाल बलूच सरदार को दिए ओर अगले दिन बाबा हाजी दुर्ग की ओर चल दिया। वह बलूच सरदार भी अपने लड़ाकों के साथ लेकर हुमायूँ को वहाँ तक पहुंचाने गया। दो दिन तक चलते रहने के बाद हुमायूँ तथा उसके साथी गर्मसीर प्रांत में स्थित नदी के तट पर पहुंचे।

जब गर्मसीर क्षेत्र में रहने वाले सैयदों को ज्ञात हुआ कि बादशाह हुमायूँ अपनी बेगम सहित आया है तो बहुत से सैयदों ने एकत्रित होकर हुमायूँ का स्वागत किया। अगले दिन प्रातः काल में ख्वाजा अलाउद्दीन महमूद नामक एक अमीर मिर्जा अस्करी के यहाँ से भागकर हुमायूँ की शरण में आया और उसने बहुत से खच्चर, घोड़े, शामियाने आदि बादशाह हुमायूँ को भेंट किए। दूसरे दिन हाजी मुहम्मद खाँ कोकी अपने तीस-चालीस घुड़सवारों सहित आया और उसने भी हुमायूँ को बहुत से खच्चर तथा रसद सामग्री भेंट की।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

यहाँ से हुमायूँ ने खुरासान जाने का निश्चय किया। उस काल में खुरासान अफगानिस्तान की सीमा पर स्थित सीस्तान तथा फारस राज्यों के बीच स्थित था। फारस को आजकल ईरान कहते हैं तथा वर्तमान समय में खुरासान तथा सीस्तान दोनों ही ईरान में हैं। हुमायूँ का विचार खुरासान पहुंचकर फारस के शासक से सम्पर्क करने का था। पाठकों को स्मरण होगा कि जब ई.1501 में उज्बेगों के नेता शैबानी खाँ ने बाबर को समरकंद से बाहर निकाल दिया था तब फारस के सफवी शासक शाह इस्माइल ने इस शर्त पर बाबर की सहायता की थी कि यदि बाबर शिया हो जाए तो उसे समरकंद विजय के लिए फारस की सेना उपलब्ध कराई जा सकती है। इस समय उसी इस्माइल का पुत्र तहमास्प फारस का शाह था। हुमायूँ को आशा थी कि फारस का शाह एक बार पुनः उसी शर्त पर हुमायूँ को अपनी सेना दे सकता है। इस समय ई.1543 का दिसम्बर महीना लग चुका था। हुमायूँ ने मार्ग में ही एक पत्र फारस के शाह तहमास्प को भिजवाकर अपने फारस आने की सूचना भिजवाई। इस पर तहमास्प ने अपने सूबेदारों को आदेश भिजवाया कि हूमायू का फारस राज्य में हर स्थान पर स्वागत किया जाए।

फलतः जब हुमायूँ सीस्तान पहुँचा तब वहाँ के गवर्नर ने हुमायूँ का बड़ा स्वागत किया। हुमायूँ सीस्तान से हिरात (हेासत) तथा नशसीमा होता हुआ फारस पहुँचा। पहाड़ियों एवं रेगिस्तानी क्षेत्र में कठिन सर्दियां झेलता हुआ हुमायूँ का काफिला कई महीनों की यात्रा के बाद जुलाई 1544 में खुरासान के निकट हलमंद नदी के तट पर पहुंचा। जब फारस के शाह के पास यह समाचार पहुंचा कि हुमायूँ का काफिला हलमंद नदी के तट पर डेरा डाले हुए है तो फारस के शाह ने अपने मंत्रियों, अमीरों एवं भाइयों को हुमायूँ का स्वागत करने भेजा।

ये लोग बड़े आदर से हुमायूँ तथा उसके साथियों को राजधानी कजवीन की ओर ले गए। जब यह काफिला राजधानी के निकट पहुंचा तो फारस के शाह तहमास्प ने अपने पिता इस्माइल तथा हुमायूँ के पिता बाबर के बीच रही मित्रता का स्मरण करके अपनी राजधानी कजवीन से थोड़ा आगे आकर हुमायूँ का स्वागत किया और उसे अपने महलों में लिवा लाया।

आजकल कजवीन को तेहरान कहा जाता है। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि फारस के महलों में हुमायूँ और तहमास्प के बीच ऐसी दोस्ती हो गई मानो एक बादाम के भीतर दो बीज हों। जितने दिनों तक हुमायूँ वहाँ रहा, उतने दिनों तक या तो तहमास्प हुमायूँ से मिलने के लिए उसके निवास पर आया, या फिर हुमायूँ तहमास्प से मिलने उसके महल में गया।

तहमास्प कई बार हुमायूँ को अपने साथ शिकार खेलने ले गया। इस दौरान हमीदा बानू बेगम कभी पालकी में बैठकर तो कभी ऊंट पर सवार होकर शिकार देखने जाती थी। इस दौरान ईरान के शाह की बहिन शाहजादा सुलतानम भी घोड़े पर सवार होकर फारस के शाह के पीछे खड़ी रहती थी।

हुमायूँ ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि शाह के पीछे एक स्त्री घोड़े पर सवार रहती थी जिसकी बाग एक सफेद दाढ़ी वाले मनुष्य के हाथ में रहती थी। वह शाह की बहिन शाहजादा सुल्तानानम थी। हुमायूँ तथा गुलबदन ने शाह की बहिन का नाम ईरानी परम्परा के अनुसार शाहजादा सुल्तानम लिखा है जबकि मुगल परम्परा के अनुसार यह शाहजादी सुल्तानम होना चाहिए था।

एक दिन शाहजादा सुल्तानम ने हमीदा बानू बेगम का आतिथ्य किया। शाह ने अपनी बहिन से कहा कि हिंदुस्तान की मलिका के सम्मान में राजधानी से बाहर उत्सव रखना। सुल्तानम के आदेश से नगर से दो कोस की दूरी पर एक अच्छे मैदान में खेमा, तंबू, बारगाह, छत्र, मेहराब आदि खड़े किए गए तथा शाह के हरम की औरतें सजधज कर उस खेमे में उपस्थित हुईं।

गुलबदन ने लिखा है कि ये सब शाह की आपसवाली, बुआएं, बहिनें, हरमवालियां और खानों तथा सरदारों की स्त्रियां थीं जिनकी संख्या एक हजार के आसपास थी और वे सब बहुत सज-धज कर आई थीं।

फारस की शाही औरतों ने हमीदा बानू का भव्य स्वागत-सत्कार किया। दिन भर उत्सव चलता रहा तथा शाम होने पर खानों एवं सरदारों की स्त्रियों ने स्वयं खड़े होकर हमीदा बानू बेगम एवं शाह की औरतों, बहिनों एवं बुआओं को भोजन करवाया। इस दौरान ईरान का शाह तहमास्प भी हुमायूँ को अपने साथ लेकर इस उत्सव में भोजन करने आया।

इस दौरान तहमास्प की बुआ ने हमीदा बानू से पूछा- ‘हिंदुस्तान के खेमे और तम्बू सुंदर हैं या फारस के?’

इस पर हमीदा बानू ने कहा- ‘जो वस्तु फारस में दो दांग में मिलती है, वह हिंदुस्तान में चार दांग में मिलती है और वहाँ के खेमे तथा तम्बू सहित प्रत्येक वस्तु सुंदर है।’

संभवतः शाह की बुआ को हमीदा का यह उत्तर अच्छा नहीं लगा किंतु ईरान की बेगम शाहजादा सुल्तानाम ने हमीदा की बात का समर्थन किया। देर रात में यह उत्सव समाप्त हुआ।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रौशन कोका ने बादशाह के हीरे चुरा लिए (70)

0
रौशन कोका - www.bharatkaitihas.com
रौशन कोका ने बादशाह के हीरे चुरा लिए

एक दिन हमीदा बानो सिर धोने गई तो उस थैली को रूमाल में लपेटकर बादशाह के पलंग के सिराहने रख गई। रौशन कोका ने रूमाल में लिपटी हुई थैली को देख लिया और उसे खोलकर उसमें से पांच लाल चुराकर ख्वाजा गाजी को सौंप दिए।

हुमायूँ अपनी बेगम हमीदा बानो एवं 20-22 अमीरों के साथ हिन्दुस्तान, बलोचिस्तान, अफगानिस्तान, सीस्तान तथा खुरासान को पार करके अनेक तकलीफें झेलता हुआ फारस पहुंचा जहाँ फारस के शाह तहमास्प ने हुमायूँ का जोरदार स्वागत किया तथा फारस के शाह की बेगम ने हुमायूँ की बेगम हमीदा बानो के सम्मान में शाही भोज का आयोजन किया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि रौशन कोका बादशाह हुमायूँ का स्वामिभक्त एवं पुराना सेवक था किंतु उसने संकट में बादशाह के साथ बड़ी गद्दारी की। हुमायूँ के कपड़ों में हर समय एक थैली छिपी हुई रहती है जिसमें हीरे भरे हुए रहते हैं। इस बात को केवल दो ही व्यक्ति जानते थे एक तो हुमायूँ स्वयं और दूसरी हमीदा बानो। यदि बादशाह कहीं जाता था तो हीरों से भरी हुई यह थैली हमीदा बानो बेगम को देकर जाता था।

एक दिन हमीदा बानो सिर धोने गई तो उस थैली को रूमाल में लपेटकर बादशाह के पलंग के सिराहने रख गई। रौशन कोका ने रूमाल में लिपटी हुई थैली को देख लिया और उसे खोलकर उसमें से पांच लाल चुराकर ख्वाजा गाजी को सौंप दिए। रौशन कोका ने कहा कि तुम ये लाल छिपाकर रख दो, समय मिलने पर हम इन्हें कहीं बेच देंगे।

उसी बीच में बादशाह आ गया और उसने वह थैली अपने पास रख ली। जब हमीदा बानू बेगम सिर धोकर आई तो बादशाह ने वह थैली बेगम को दे दी। बेगम ने थैली हाथ में लेते ही जान लिया कि थैली हल्की है और उसने यह बात उसी समय बादशाह को बता दी। बादशाह ने चकित होकर कहा कि इस बात का क्या अर्थ है क्योंकि इस थैली के बारे में मेरे और आपके सिवाय कोई नहीं जानता! लाल कौन चुराकर ले गया? उस काल में लाल का आशय एक कीमती हीरे से होता था।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

हमीदा बानो ने अपने भाई ख्वाजा मुअज्जम से कहा कि ऐसी घटना हो गई है। यदि तुम अपने भाई होने के कर्त्तव्य का निर्वहन करते हुए उन हीरों के बारे में इस प्रकार पता लगा सको कि इस बात को कोई जान न पाए तो मेरी लाज बचेगी अन्यथा मैं जब तक जीवित रहूंगी, बादशाह के सामने लज्जित रहूंगी। इस पर ख्वाजा मुअज्जम ने कहा कि मेरा बादशाह से इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है फिर भी मैं एक मरियल टट्टू पर चलता हूँ और मेरी सामर्थ्य एक नया टट्टू खरीदने की नहीं है किंतु रौशन कोका तथा ख्वाजा गाजी ने अपने लिए अच्छी किस्म के नए घोड़े खरीदे हैं। हालांकि अभी तक उन्होंने घोड़े के मालिक को कीमत नहीं चुकाई है, फिर भी उनके पास घोड़ों की कीमत चुकाने का कोई न कोई प्रबंध अवश्य है। हमीदा बानू ने ख्वाजा मुअज्जम से कहा कि तुम इस बात की जांच करके सच्चाई का पता लगाओ। ख्वाजा ने हमीदा से कहा कि माह चीचम तुम यह बात किसी से मत कहना, मैं इस सच्चाई का पता लगा कर रहूंगा। संभवतः माह चीचम तुर्की, अरबी या फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ आदरणीय अथवा प्यारी बहन जैसा कुछ होता होगा!

ख्वाजा मुअज्जम घोड़े के उस व्यापारी के पास गया जिन्होंने रौशन कोका तथा ख्वाजा गाजी को घोड़े बेचे थे। ख्वाजा मुअज्जम ने उससे पूछा कि तुम्हें इन घोड़ों का कितना दाम मिला है? इस पर व्यापारी ने कहा कि अभी दाम नहीं मिला है किंतु उन दोनों ने मुझे वचन दिया है कि वे इन घोड़ों के बदले में मुझे लाल लाकर देंगे।

इसके बाद ख्वाजा मुअज्जम ख्वाजा गाजी के डेरे पर गया और उसके सेवक से कहा कि तुम्हारे मालिक के कपड़े या गठरी कहाँ हैं? सेवक ने कहा कि मेरे मालिक के पास गठरी आदि नहीं है, केवल एक लम्बी टोपी है जिसे वह सोते समय कभी सिर के नीचे तो कभी बगल में रखते हैं। ख्वाजा मुअज्जम सारी बात समझ गया और उसने बादशाह हुमायूँ के पास जाकर उसे यह सारी बात बता दी।

ख्वाजा मुअज्जम ने बादशाह से कहा कि मैं आपके सामने ख्वाजा गाजी से हंसी ठिठोली करूंगा किंतु आप मुझे कुछ मत कहना। हुमायूँ ने यह बात मान ली। अगले दिन जब ख्वाजा गाजी हुमायूँ के समक्ष दीवानखाने में आकर बैठा तो ख्वाजा मुअज्जम ख्वाजा गाजी के साथ हंसी-ठिठोली करने लगा और ताने कसने लगा।

ख्वाजा गाजी कुछ देर तक तो ख्वाजा मुअज्जम की हरकतों को सहन करता रहा किंतु अंत में तंग आकर हुमायूँ के समक्ष विनय प्रदर्शित करते हुए बोला कि यह आयु में मुझसे बहुत छोटा है किंतु यह आपके सामने ही मुझसे हंसी-ठिठोली कर रहा है और ऐसी छिछोरी बातें कर रहा है!

इस पर हुमायूँ ने कहा कि यह आयु में छोटा है इसलिए इसे अक्ल नहीं है कि बड़ों के साथ किस अदब से पेश आना चाहिए। आप बिल्कुल भी चिंता नहीं करें।

इसी बीच ख्वाजा मुअज्जम ने ख्वाजा गाजी की टोपी पर हाथ मारा। इससे टोपी गिर गई और ख्वाजा मुअज्जम ने लपक कर उठा ली। टोपी के गिरते ही ख्वाजा गाजी परेशान हो गया किंतु ख्वाजा मुअज्जम ने टोपी में हाथ डालकर उसमें से लाल निकाल लिए। ख्वाजा मुअज्जम ने वे लाल बादशाह को दे दिए।

जब ख्वाजा ने देखा कि उसकी चोरी पकड़ी गई तो उसने उसी समय दीवानखाना छोड़ दिया और रौशन कोका को अपने साथ लेकर फारस के शाह तहमास्प के पास चला गया। उन दोनों ने तहमास्प से हुमायूँ की बहुत बुराई की तथा अनेक गोपनीय बातें बताकर शाह का विश्वास जीत लिया।

उन्होंने शाह को बताया कि हुमायूँ के पास खूब सारे लाल, मानिक और मोती हैं, वह निर्धन नहीं है। इस पर तहमास्प का मन हुमायूँ की तरफ से फिर गया और उसके व्यवहार में परिवर्तन आ गया। कुछ ही दिनों में हुमायूँ भी इस बात को ताड़ गया।

इस पर हुमायूँ ने अपनी हीरों की थैली तहमास्प के पास भेज दी और उससे कहलवाया कि मेरे पास इनके अतिरिक्त कुछ नहीं है। यदि आप इनके लिए मन मैला करते हैं तो ये आप रख लें। हुमायूँ की यह बात सुनकर तहमास्प को बड़ी ग्लानि हुई और उसने हुमायूँ से कहा कि मेरे मन में रौशन कोका तथा ख्वाजा गाजी ने दुश्मनी भरी बातें भर दी थीं। उन्होंने हमको आपसे पराया कर दिया।

शाह ने रौशन कोका तथा ख्वाजा गाजी के लाल छीनकर उन्हें जेल में बंद कर दिया तथा दोनों बादशाहों में फिर से दोस्ती हो गई। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि इसके बाद जितने भी दिन हुमायूँ शाह के महल में रहा, शाह उसके लिए प्रतिदिन कीमती उपहार भेजता रहा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फारस की शहजादी ने हुमायूँ के प्राणों की रक्षा की (71)

0
फारस की शहजादी - www.bharatkaitihas.com
फारस की शहजादी ने हुमायूँ के प्राणों की रक्षा की

ईरान का शाह तहमास्प हुमायूँ से खुश नहीं रहता था। तहमास्प का एक भाई भी हुमायूँ से दुश्मनी रखने लगा। ऐसी स्थिति में फारस की शहजादी ने हुमायूँ के प्राणों की रक्षा की।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि तहमास्प का एक भाई हुमायूँ से वैमनस्य रखने लगा। उसने कुछ लोगों के साथ मिलकर हुमायूँ के विरुद्ध तहमास्प के कान भरने आरम्भ किये इससे तहमास्प हुमायूँ से अप्रसन्न हो गया। यहाँ तक कि हुमायूँ की जान खतरे में पड़ गई। इस स्थिति में फारस की शहजादी सुल्तानम ने हूमायू की बड़ी सहायता की।

फारस की शहजादी तहमास्प की वही बहिन थी जो शिकार के समय तहमास्प के पीछे खड़ी रहा करती थी और जिसके घोड़े की बाग एक सफेद दाढ़ी वाला मनुष्य लिए रहता था। पाठकों को स्मरण होगा कि सुल्तानाम ने शाही भोज के अवसर पर हमीदा बानू बेगम द्वारा की गई हिंदुस्तान की प्रशंसा का भी समर्थन किया था।

हुमायूँ द्वारा हीरों की थैली तहमास्प के पास भिजवाए जाने और उसके बाद तहमास्प का मन साफ होने की बात से लगता है कि तहमास्प को हुमायूँ के पास अत्यधिक धन होने की जानकारी मिलने पर तहमास्प ने हुमायूँ के प्राण लेने की साजिश रची हो तथा फारस की शहजादी तहमास्प की बहिन ने दोनों के बीच मध्यस्थता करके हुमायूँ की जान बचाई हो!

कुछ इतिहासकारों के अनुसार फारस में हुमायूँ अधिक प्रसन्न नहीं रहता था। वह सुन्नी मुसलमान था परन्तु फारस का शाह शिया था। इसलिये एक शिया की शरण में रहना हुमायूँ के लिए पीड़ाजनक था। हुमायूँ को पारसीकों जैसे कपड़े पहनने पड़ते थे तथा उन्हीं की तरह व्यवहार करना पड़ता था।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इन इतिहासकारों के अनुसार तहमास्प की बहिन ने तहमास्प को हुमायूँ की सहायता करने के लिये तैयार किया ताकि हुमायूँ फिर से अपने खोये हुए राज्य को प्राप्त कर सके। ईरान के शाह ने हुमायूँ को ईरान के शाहजादे मुराद की अध्यक्षता में 14 हजार अश्वारोही दिये ताकि हुमायूँ कन्दहार  पर आक्रमण कर सके। इस सहायता के बदले में हुमायूँ से यह वचन लिया गया कि वह शाह की बहिन की पुत्री से विवाह करेगा और जब फारस की सेना कन्दहार, काबुल तथा गजनी जीत कर हूमायू को सौंप देगी, तब हुमायूँ कन्दहार का दुर्ग फारस के शाह को प्रदान करेगा तथा काबुल एवं गजनी हुमायूँ के पास रहेंगे। इन इतिहासकारों के अनुसार इसके अतिरिक्त अन्य कोई धार्मिक, साम्प्रदायिक अथवा राजनीतिक शर्त नहीं रखी गई किंतु इन इतिहासकारों का यह कहना गलत है। गुलबदन बेगम ने इन तथ्यों का उल्लेख नहीं किया है किंतु इतिहास की अन्य पुस्तकों के अनुसार ईरान के शाह ने भारत-विजय की योजना बनाई तथा अपनी बहिन सुल्तानम की पुत्री का विवाह इस शर्त पर हुमायूँ के साथ कर दिया कि हुमायूँ शिया-मत ग्रहण कर ले। इसके बाद शाह ने हुमायूँ को अपनी सेना देकर हिंदुस्तान-विजय के लिए रवाना किया।

गुलबदन बेगम की तरह अबुल फजल ने भी हुमायूँ के शिया बनने के सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखा है कितु कट्टर सुन्नी लेखक मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं ने लिखा है कि दोनों बादशाहों में मेल हो जाने के उपरांत शाह ने हुमायूँ से शिया मत स्वीकार करने को कहा और हुमायूँ ने इस दिशा में कदम उठाया। उसने फारस में शिया धर्म से सम्बन्धित स्थानों तथा हसरत अली के मजार की यात्रा की।

गुलबबदन बेगम ने लिखा है कि अंत में शाह ने अपने पुत्र मुराद को खानों, सुल्तानों और सरदारों के साथ हुमायूँ की इच्छानुसार खेमे, तंबू, छत्र, मेहराब, शामियाने, रेशमी गलीचे, कलाबत्तू की दरियां तथा हर प्रकार का सामान, तोषकखाना, कोष, हर प्रकार के कारखाने, बावरची खाना और रिकाब-खाना बनाकर बादशाह हुमायूँ को दिए और एक शुभ समय में हुमायूँ को कांधार के लिए विदा किया। उस समय हुमायूँ ने ईरान के शाह से कहा कि वह ख्वाजा गाजी तथा रौशन कोका को क्षमा करके उन्हें मुक्त कर दे ताकि मैं उन्हें अपने साथ कांधार ले जा सकूं।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार हुमायूँ की रुचि भारत लौटने की बजाय फारस में ही मौज-मस्ती करने में थी। इसलिए जब फारस के शाह ने हुमायूँ को कजवीन के पास ही मौज-मस्ती में डूबा हुआ देखा तो एक दिन शाह ने हुमायूँ को फटकार लगाई तथा उसे जबर्दस्ती हिंदुस्तान के लिए रवाना किया। फारस के शाह का पुत्र मुराद चौदह हजार सैनिकों के साथ इस अभियान के लिए भेजा गया।

गुलबदन बेगम ने जिन वस्तुओं को शाह द्वारा हुमायूँ के साथ भेजे जाने की बात लिखी है, वास्तव में वह सब सामग्री तथा सेना शाह ने अपने पुत्र मुराद को दी थीं न कि हुमायूँ को। हुमायूँ को तो इस सेना के साथ भेजा गया था। ईरान का शाह तो स्वयं ही अफगानिस्तान एवं भारत पर अधिकार करने का स्वप्न देख रहा था।

ई.1545 में हुमायूँ फारस की सेना को साथ लेकर कांधार के निकट पहुंच गया। जब मिर्जा अस्करी ने सुना कि हुमायूँ खुरासान से लौटकर आ रहा है तब उसने हुमायूँ के पुत्र जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर को मिर्जा कामरान के पास काबुल भेज दिया। कुछ इतिहासकारों के अनुसार कामरान के आदेश से ऐसा किया गया।

पाठकों को स्मरण होगा कि जब हुमायूँ शाल मस्तान से बलूचिस्तान की ओर भागा था। तब उसका 15 महीने का शिशु अकबर पीछे ही छूट गया था और उसे मिर्जा अस्करी अपने साथ कांधार ले गया था। जब अस्करी ने अकबर को कांधार से काबुल भेजा तब अकबर ढाई साल का हो चुका था। मिर्जा कामरान ने अकबर को अपनी बुआ खानजादः बेगम को सौंप दिया।

फारस की तरफ से अफगानिस्तान में प्रवेश करने पर सबसे पहले बुस्त किला आता है जिस पर इस समय कामरान का अधिकार था। हुमायूँ ने बुस्त किले पर अधिकार कर लिया। इसके बाद हुमायूँ ने कांधार घेर लिया।

गुलबदन ने लिखा है कि जब मिर्जा कामरान को ज्ञात हुआ कि बादशाह लौट आया है तो कामरान ने खानजादः बेगम के समक्ष विनम्रता का प्रदर्शन करके तथा कुछ रो-पीटकर कहा कि आप हुमायूँ के पास कांधार जाएं तथा हम लोगों में संधि करवा दें।

इस पर खानजादः बेगम ने शिशु अकबर; मिर्जा कामरान तथा उसकी स्त्री खानम को सौंप दिया तथा स्वयं काबुल से कांधार जाने की तैयारी करने लगी। इससे पहले कि खानजादः बेगम काबुल से रवाना हो पाती, बैराम खाँ कांधार से काबुल आ पहुंचा। उसे हुमायूँ ने अपना दूत बनाकर कामरान के पास भेजा था तथा कामरान के नाम यह आदेश भिजवाया था कि वह काबुल खाली करके हुमायूँ की शरण में आ जाए किंतु कामरान ने बैराम खाँ की बात मानने से मना कर दिया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कांधार दुर्ग के धन को लेकर मारकाट मच गई (72)

0
कांधार दुर्ग - www.bharatkaitihas.com
कांधार दुर्ग के धन को लेकर मारकाट मच गई

हुमायूँ ने फारस के शाह की सेना लेकर कांधार दुर्ग पर आक्रमण किया तथा 40 दिन की घेरेबंदी के बाद कांधार पर अधिकार कर लिया। हुमायूँ ने बैराम खाँ को काबुल भेजकर कामरान से कहलवाया कि वह काबुल खाली करके हुमायूँ की शरण में आ जाए किंतु कामरान ने काबुल खाली करने से मना कर दिया।

इस पर बैराम खाँ पुनः कांधार के लिए रवाना हो गया। खानजादः बेगम भी बैराम खाँ के साथ ही कांधार के लिए रवाना हुई। जिस समय ये लोग कांधार पहुंचे, उस समय हुमायूँ ने कांधार दुर्ग पर घेरा डाल रखा था। चालीस दिन की घेराबंदी के बाद मिर्जा अस्करी ने अपनी पराजय स्वीकार कर ली तथा बादशाह हुमायूँ की सेवा में उपस्थित होना स्वीकार कर लिया। कुछ लेखकों के अनुसार मिर्जा अस्करी ने कांधार से खजाना लेकर भागने का प्रयास किया किंतु हुमायूँ के पाँच सौ सैनिकों ने मिर्जा अस्करी को भागने से रोका।

4 दिसम्बर 1545 को हुमायूँ ने कांधार पर अधिकार कर लिया तथा कांधार दुर्ग फारस के शाह तहमास्प के पुत्र मुराद को सौंप दिया। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि कुछ दिन बाद ही शाह का पुत्र बीमार होकर मर गया तथा हुमायूँ ने कांधार का शासन बैराम खाँ को सौंप दिया।

वस्तुतः गुलबदन बेगम ने यहाँ झूठ बोला है कि तहमास्प के पुत्र के बीमारी से मर जाने के कारण हुमायूँ ने कांधार दुर्ग पर अधिकार कर लिया। वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग थी। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि ईरानी सैनिकों ने कांधार दुर्ग पर अधिकार करके वहाँ जो भी खजाना मिला, उसे तहमास्प के पास फारस भेज दिया। हुमायूँ को यह अच्छा नहीं लगा। कुछ ही समय बाद हुमायूँ ने अचानक ही ईरान की सेना पर आक्रमण करके उससे कांधार छीन लिया। ईरान की सेना अपमानित होकर वापस ईरान लौट गई।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

तत्कालीन इतिहासकारों ने इस विषय पर अधिक नहीं लिखा है किंतु घटनाओं के आलोक में यह कहा जा सकता है कि जब ईरान के शहजादे ने कांधार के दुर्ग में रखा धन ईरान भेज दिया तो हुमायूँ यह सहन नहीं कर सका। यह धन वास्तव में बाबर ने अपने हाथों से कांधार के दुर्ग में रखवाया था। इस धन पर ईरान का कोई अधिकार नहीं बनता था। इस धन के वास्तविक हकदार बाबर के बेटे थे। इसलिए हुमायूँ ने ईरान की सेना पर हमला कर दिया। इस समय तक अफगानिस्तान के हजारों युवक अपने पुराने बादशाह हुमायूँ के झण्डे के नीचे आकर एकत्रित हो गए थे और मिर्जा कामरान की सेनाएं भी अस्करी तथा कामरान का पक्ष छोड़कर हुमायूँ की तरफ आ गई थीं। यही कारण था कि हुमायूँ ने ईरान के 14 हजार सैनिकों पर हमला करने का साहस किया तथा उनसे कांधार छीन लिया। यह कहना मुश्किल है कि ईरान का शहजादा कैसे मारा गया किंतु अनुमान लगाया जा सकता है कि वह हुमायूँ से हुए युद्ध में मारा गया। इस सम्बन्ध में भी कोई तथ्य प्राप्त नहीं होता कि कांधार के किले का धन वास्तव में ईरान पहुंच गया अथवा हुमायूँ ने किले के साथ-साथ ईरान की सेना से वह धन भी छीन लिया!

कुछ इतिहासकारों ने कन्दहार प्रकरण में हुमायूँ द्वारा शाह से विश्वासघात किए जाने का आरोप लगाया है परन्तु यह आरोप उचित नहीं हैं। हुमायूँ ने ईरान के शाह को इस शर्त पर कन्दहार देने का वचन दिया था कि शाह हुमायूँ को काबुल, गजनी तथा बदख्शाँ जीतने में सहायता करेगा। इसलिये जब तक इन तीनों स्थानों पर हुमायूँ का अधिकार नहीं हो जाता, तब तक फारस के शाह द्वारा हुमायूँ से कांधार दुर्ग माँगना उचित नहीं था।

सुन्नी लेखकों के अनुसार फारस के शासक शिया थे जबकि कन्दहार की जनता सुन्नी थी। इस कारण फारस के शिया मुसलमान कन्दहार के सुन्नी मुसलमानों पर अत्याचार कर सकते थे। इसलिए कन्दहार की जनता उन्हें घोर घृणा की दृष्टि से देखती थी। ऐसी स्थिति में कन्दहार फारस वालों को सौंपना उचित नहीं था।

इतना ही नहीं, जब तक हुमायूँ अफगानिस्तान की विजय में संलग्न था, तब तक के लिए फारस के शाह द्वारा हुमायूँ के परिवार को दुर्ग में रहने की अनुमति नहीं दी गई। इससे हुमायूँ को बड़ी पीड़ा हुई। हुमायूँ को एक सुरक्षित आधार की आवश्यकता थी जहाँ से वह अपने युद्धों का संचालन कर सकता। उसकी इस आवश्यकता की पूर्ति कन्दहार ही कर सकता था। अतः हुमायूँ का फारस के शाह को कन्दहार नहीं देना ही उचित था।

इस समय हुमायूँ के पास पर्याप्त सेना एवं धन हो गया था जिसके बल पर वह एक ओर तो ईरान के शासक को नाराज कर सकता था और दूसरी ओर काबुल के शासक कामरान से पंजा लड़ा सकता था। जब कामरान ने सुना कि हुमायूँ ने कांधार दुर्ग पर अधिकार कर लिया है तो कामरान शिकार खेलने के लिए चला गया ताकि अपने अमीरों के समक्ष यह जता सके कि उसे हुमायूँ की कोई परवाह नहीं है!

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि मिर्जा हिंदाल ने एकांतवास ले लिया था किंतु जब उसने सुना कि बादशाह हुमायूँ खुरासान से लौट आया है तथा उसने कांधार दुर्ग पर अधिकार कर लिया है तब मिर्जा हिंदाल ने मिर्जा यादगार नासिर को बुलवाकर कहा कि मिर्जा कामरान ने खानजादः बेगम को मिर्जा हुमायूँ के पास संधि के लिए भेजा था किंतु बादशाह ने उस संधि को नहीं माना है।

बादशाह ने बैराम खाँ को अपना दूत बनाकर भेजा था किंतु कामरान ने उसकी बात को नहीं माना है। अब बादशाह कांधार बैराम खाँ को सौंपकर स्वयं काबुल आ रहे हैं। इसलिए उचित होगा कि हम एक दूसरे के प्रति विश्वसनीयता रखने की प्रतिज्ञा करके बादशाह हुमायूँ के पास पहुंचने का प्रयत्न करें।

मिर्जा यादगार ने मिर्जा हिंदाल की बात मान ली तथा दोनों ने एक दूसरे के प्रति विश्वसनीय रहने की प्रतिज्ञा की। मिर्जा हिंदाल ने मिर्जा यादगार नासिर से कहा कि तुम यहाँ से भागने का प्रयास करो। जब तुम यहाँ से भाग जाआगे तब मिर्जा कामरान मुझसे कहेगा कि मिर्जा यादगार भाग गया है, जाकर उसे समझाओ और वापस लिवा कर लाओ। हमारे पहुंचने तक तुम धीरे-धीरे चलना और जब हम आ जाएंगे, तब हम दोनों फुर्ती से चलकर बादशाह की सेवा में पहुंच जाएंगे।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि यह सम्मति निश्चित होने पर मिर्जा यादगीर नासिर भाग गया। जब यह बात मिर्जा कामरान को ज्ञात हुई तो वह शिकार खेलना छोड़कर काबुल आया तथा उसने मिर्जा हिंदाल को बुलाकर कहा कि तुम मिर्जा यादगार नासिर को वापस लिवा लाओ।

मिर्जा हिंदाल तो यही चाहता था। वह उसी समय एक तेज घोड़े पर सवार हुआ और दो-तीन दिन में मिर्जा यादगार के पास जा पहुंचा। यहाँ से वे दोनों मिर्जा हुमायूँ की तरफ चले गए।

जब तैमूरी खानदान के ये दोनों शहजादे बादशाह हुमायूँ के समक्ष प्रस्तुत हुए तो हुमायूँ ने उन दोनों को क्षमा कर दिया और अपनी सेवा में रख लिया। उन दोनों ने बादशाह को सलाह दी कि हमें तकिया हिमार के रास्ते काबुल के लिए प्रस्थान करना चाहिए। हालांकि हुमायूँ काबुल जा रहा था जहाँ हमीदा बानो बेगम का पुत्र अकबर भी था किंतु हुमायूँ ने किसी अनहोनी की आशंका से हमीदा बानो को अपने साथ नहीं लिया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि अक्टूबर 1545 में हुमायूँ अपनी सेना के साथ तकिया हिमार पहुंच गया जिसका हिंदी में अर्थ होता है गदहे का दर्रा। गुलबदन द्वारा दी गई यह तिथि सही नहीं हैं। अवश्य ही यह घटना दिसम्बर 1545 के बाद की है। अबुल फजल ने यह घटना गुलबदन द्वारा वर्णित तिथि से एक साल बाद की बताई है।

खानजादः बेगम भी हुमायूँ के साथ थी किंतु मार्ग में कबलचाक नामक स्थान पर खानजादः बेगम को बुखार आ गया जिसके कारण हुमायूँ को कबलचाक में ही रुक जाना पड़ा। हुमायूँ ने हकीमों से अपनी बुआ का खूब उपचार करवाया किंतु चौथे दिन खानजादः बेगम की मृत्यु हो गई। यह बाबर के दुर्भाग्यशाली बेटों के लिए किसी कहर टूटने से कम नहीं था!

बाबर के बेटों को इस समय खानजादः बेगम की सर्वाधिक आवश्यकता थी। मुगलिया इतिहास के रंगमंच पर केवल वही ऐसी पात्र थी जो बाबर के बेटों को भविष्य में होने वाली बरबादी से बचा सकती थी किंतु कुदरत ने बाबर के बेटों की दर्द भरी दास्तान के दृश्य इतनी गहरी स्याही से लिख रखे थे कि उन्हें मंचित करने के लिए कुदरत ने खानजादः बेगम को ही रंगमंच से उठा लिया।

बाबर के बेटों की बरबादी हर हाल में होनी ही थी जिसे कोई नहीं रोक सकता था, यहाँ तक कि स्वयं हुमायूँ भी नहीं, जिसके पास कांधार दुर्ग ही नहीं, सत्ता और शक्ति बड़े जोर-शोर से स्वयं ही लौट आई थी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खानजादः बेगम मुगलिया राजनीति की आधार थी (73)

0
खानजादः बेगम - www.bharatkaitihas.com
खानजादः बेगम मुगलिया राजनीति की आधार थी

दिसम्बर 1545 में जब हुमायूँ ने कांधार पर अधिकार कर लिया तो वह कांधार बैराम खां के संरक्षण में देकर अपनी बुआ खानजादः बेगम के साथ काबुल के लिए रवाना हुआ ताकि मिर्जा कामरान से निबटा जा सके किंतु कबलचाक नामक स्थान पर अचानक ही खानजादः बेगम का निधन हो गया।

हुमायूँ के इतिहास में आगे बढ़ने से पहले हमें खानजादः बेगम के इतिहास पर एक दृष्टि डालनी चाहिए। जब तक वह जीवित रही, मुगलिया राजनीति के प्रमुख आधार स्तम्भ के रूप में भूमिका निभाती रही। खानजादः का जन्म ई.1478 में फरगना के तुर्को-मंगोल शासक उमर शेख मिर्जा की बड़ी पुत्री के रूप में हुआ था। बाबर और खानजादः दोनों की माँ एक ही थी जो कुतलुग निगार खानम के नाम से जानी जाती थी और उमर शेख की पहली तथा प्रधान बेगम थी।

खानजादः बाबर से पांच साल बड़ी थी। बाल्यकाल से ही खानजादः तथा बाबर के बीच प्रगाढ़ प्रेम था। चूंकि खानजादः की माता कुतलुग निगार खानम मंगोल साम्राज्य के शासक यूनुस खाँ की पुत्री थी जो मध्य-एशिया में महान् मंगोल के नाम से जाना जाता था। इसलिए कुतलुग निगार खानम मध्य-एशिया की राजनीति को अच्छी तरह से समझती थी और यही समझदारी खानजादः बेगम तथा बाबर को भी प्राप्त हुई थी। इस कारण बाबर मध्य-एशिया के राजनीतिक विषयों पर अपनी बड़ी बहिन खानजादः बेगम से विचार-विमर्श किया करता था।

खानजादः बेगम ने मध्य-एशिया में स्थित अपने पिता के छोटे से राज्य से लेकर अपने भाई एवं भतीजों को भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल क्षेत्रों पर शासन करते हुए अपनी आंखों से देखा था। बादशाह बनने के बाद बाबर ने खानजादः बेगम को पादशाह बेगम की उपाधि दी थी।

बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में खानजादः बेगम का उल्लेख बहुत प्रेम एवं आदर के साथ अनेक प्रसंगों में किया है। गुलबदन बेगम ने भी अपनी पुस्तक हुमायूंनामा में खानजादः बेगम का उल्लेख कई बार किया है। गुलबदन उसे आकः जानम कहा करती थी।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

जब बाबर समरकंद का शासक था, तब ई.1500 में बाबर पर उज्बेगों ने आक्रमण करने आरम्भ किए। ई.1501 में यह संघर्ष अपने चरम पर पहुंच गया। उज्बेग नेता शैबानी खाँ ने पूरे छः माह तक समरकंद पर घेरा डाले रखा। बाबर को आशा थी कि उसका चाचा सुल्तान हुसैन मिर्जा बायकरा बाबर की सहायता करेगा जो कि ग्रेटर खुरासान का शासक था किंतु बाबर के चाचा ने बाबर की कोई सहायता नहीं की। इस बीच बाबर की लगभग सारी सेना नष्ट हो गई तथा शैबानी खाँ किसी भी समय समरकंद में घुसकर बाबर तथा उसके पूरे परिवार को बंदी बना सकता था। कुछ लेखकों के अनुसार शैबानी खाँ ने बाबर को बंदी बना लिया तथा उसके समक्ष यह शर्त रखी कि यदि बाबर अपनी बड़ी बहिन खानजादः शैबानी खाँ को सौंप दे तो शैबानी खाँ बाबर को समरकंद से जीवित ही निकलने दे सकता है। पराजित बाबर ने अपनी बड़ी बहिन का विवाह शैबानी खाँ से कर दिया तथा स्वयं बिना कोई हथियार, बिना कोई सम्पत्ति, बिना कोई घोड़ा लिए समरकंद से बाहर आ गया। शैबानी खाँ ने बाबर के परिवार को भी जीवित ही समरकंद से बाहर जाने की अनुमति दे दी।

इसके बाद बाबर बदख्शां, काबुल, कांधार, गजनी, दिल्ली तथा आगरा पर विजय प्राप्त करता हुआ अफगानिस्तान और हिंदुस्तान का बादशाह बना था। अबुल फजल तथा हेनरी बेवरीज ने इस विवाह को शैबानी खाँ तथा खानजादः बेगम के प्रेम-प्रसंग का परिणाम बताया है जो कि पूरी तरह मनगढ़ंत लगता है।

ई.1500 में बाबर की मौसी मिहिर निगार खानम को शैबानी खाँ ने पकड़ लिया तथा उससे बलपूर्वक विवाह कर लिया था। जब ई.1501 में शैबानी खाँ ने मिहिर निगार खानम की बहिन की पुत्री खानजादः बेगम से विवाह करने का निर्णय लिया तो शैबानी खाँ ने खानजादः की मौसी मिहिर निगार खानम को तलाक दे दिया। क्योंकि मौसी और भांजी के एक ही पुरुष से विवाह को तब के मध्य-एशिया में इस्लाम के नियमों के विरुद्ध माना जाता था।

खानजादः बेगम तथा शैबानी खाँ के दाम्पत्य से एक पुत्र भी हुआ था किंतु वह शैशव अवस्था में ही मर गया था। जब एक बार बाबर ने ईरान के शाह की सहायता से समरकंद पर पुनः अधिकार कर लिया तो खानजादः बेगम ने यह कहकर बाबर का पक्ष लिया कि समरकंद पर पहला अधिकार तो बाबर का ही है। इस बात से नाराज होकर शैबानी खाँ ने खानजादः बेगम को तलाक दे दिया और उसे दण्डित करने के लिए उसका विवाह सैयद हादा से करवा दिया जो एक नीचे ओहदे का कर्मचारी था।

ई.1511 में जब ईरान के शाह ईस्माल तथा शैबानी खाँ के बीच मर्व का युद्ध हुआ तो खानजादः का पूर्व पति शैबानी खाँ तथा वर्तमान पति सैयद हादा दोनों ही उस युद्ध में मारे गए। ईरान के शाह ईस्माइल ने शैबानी खाँ के हरम की औरतों को पकड़ लिया। पकड़ी गई औरतों में खानजादः बेगम भी सम्मिलित थी। शाह इस्माइल ने खानजादः को अपने सिपाहियों के संरक्षण में अपने मित्र बाबर के पास भेज दिया। उस समय बाबर कुंदूज में निवास कर रहा था।

इस प्रकार ई.1511 में खानजादः बेगम का उज्बेगों से पीछा छूट गया और वह फिर से तुर्को-मंगोल परिवार में अर्थात् बाबर के पास आ गई। उस समय खानजादः 33 साल की हो चुकी थी। शाह इस्लाइल की इस उदारता के लिए बाबर ने अपने अमीर, शाह के दरबार में भेजकर शाह का धन्यवाद किया तथा उसे उपहार भी भिजवाए।

बाबर ने अपनी बहिन खानजादः बेगम का तीसरा विवाह मुहम्मद महदी ख्वाजा से किया जो बाबर के सबसे विश्वस्त अमीरों में से माना जाता था और जिसने पानीपत तथा खानवा के युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और जो बाद में भारत छोड़कर पुनः अफगानिस्तान चला गया था।

जिस समय खानजादः का महदी ख्वाजा से विवाह हुआ, उस समय महदी ख्वाजा की एक बहिन केवल दो वर्ष की थी। उसका नाम सुल्तानम बेगम था। खानजादः बेगम ने अपनी इस ननद का पालन-पोषण किया तथा जब वह बड़ी हो गई तो ई.1537 में उसका विवाह बाबर के पुत्र मिर्जा हिंदाल से करवा दिया।

इस प्रकार मिर्जा हिंदाल खानजादः का भतीजा और नंदोई दोनों था। इस विवाह के अवसर पर खानजादः बेगम ने इतने बड़े शाहीभोज का आयोजन किया जो बरसों तक मुगल राज्य में चर्चा का विषय बना रहा। बाबर के किसी अन्य बेटे के विवाह का आयोजन इतना भव्य और विशाल नहीं हुआ था।

गुलबदन बेगम के अनुसार खानजादः बेगम ने बाबर के बेटों के परस्पर विवादों में अनेक अवसरों पर हस्तक्षेप किया था और उनमें समझौता करवाया था किंतु अब वह मुगलिया राजनीति के रंगमंच से प्रस्थान कर चुकी थी और बाबर के बेटों की दर्द भरी दास्तान का सबसे क्रूर अध्याय आरम्भ होने वाला था!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कामरान हुमायूँ को चकमा देकर भाग गया (74)

0
कामरान - www.bharatkaitihas.com
कामरान हुमायूँ को चकमा देकर भाग गया

कामरान की सेना के बहुत से अमीर और बेग कामरान को छोड़ भागे और अपनी-अपनी सेनाएं लेकर हुमायूँ की सेवा में आ गए। इनमें से बहुतों के पास घोड़े और हथियार नहीं थे। हुमायूँ ने तुर्कमान लोगों से एक हजार घोड़े खरीदे तथा घोड़ों के व्यापारियों से कहा कि जब काबुल विजय हो जाएगी, तब इन घोड़ों का मूल्य चुकाया जाएगा।

जब हुमायूँ कांधार पर अधिकार करने के बाद काबुल के लिए रवाना हुआ तो मार्ग में हुमायूँ की बुआ खानजादः बेगम का निधन हो गया। इससे हुमायूँ तथा उसके भाइयों के बीच की अंतिम योजक-कड़ी भी टूट गई। अब हुमायूँ तथा उसके भाइयों के बीच समझौता करवाने वाला कोई प्रभावशाली व्यक्ति मुगलिया खानदान में जीवित नहीं बचा था।

कामरान भी एक सेना लेकर हुमायूँ की ओर बढ़ रहा था। इधर हुमायूँ तीपा घाटी में पहुंच गया और उधर कामरान गुजरगार के पास पहुंच गया। इन दोनों स्थानों के लगभग बीच में बाबर का बाग स्थित था जहाँ बाबर का मकबरा बना हुआ है। यह कैसी विडम्बना थी कि एक ओर बाबर का सबसे बड़ा और सबसे छोटा बेटा तलवार उठाए हुए था तो दूसरी ओर बाबर के दोनों मंझले बेटों ने खंजर तान रखे थे। अपने चारों बेटों के बीच में बाबर का शव धरती के नीचे लेटा हुआ इस हैरतअंगेज दृश्य का साक्षी बन रहा था।

लगभग इसी स्थान पर कामरान की सेना के बहुत से अमीर और बेग कामरान को छोड़ भागे और अपनी-अपनी सेनाएं लेकर हुमायूँ की सेवा में आ गए। इनमें से बहुतों के पास घोड़े और हथियार नहीं थे। इस पर हुमायूँ ने तुर्कमान लोगों से एक हजार घोड़े खरीदे तथा घोड़ों के व्यापारियों से कहा कि जब काबुल विजय हो जाएगी, तब इन घोड़ों का मूल्य चुकाया जाएगा। तुर्कमान लोगों ने हुमायूँ की यह बात मान ली। हुमायूँ की तरफ से इन व्यापारियों को लिखित में वचन दिया गया कि इन घोड़ों का मूल्य चुकाने की जिम्मेदारी हुमायूँ बादशाह की है।

तुर्कमान लोगों से खरीदे गए घोड़ों में से अच्छे घोड़े शाही तबेले में ले लिए गए तथा शेष घोड़े मुगल अधिकारियों में बांट दिए गए। जब ये लोग तीरी नामक स्थान पर पहुंचे तो वहाँ के मुखिया ने कुछ भेड़ें तथा घोड़े हुमायूँ को भेंट किए।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

हुमायूँ के दुर्भाग्य से इन दिनों गर्मी तेज हो गई और उसके बहुत से सैनिक हैजे से मर गए। इस कारण मिर्जा हिंदाल ने हुमायूँ को सुझाव दिया कि इस समय काबुल जाने की बजाय, कांधार लौटना उचित होगा। इस पर हुमायूँ ने हिंदाल से कहा कि यदि तू चाहे तो कांधार जा सकता है, मैं तो अब काबुल पहुंचकर ही विश्राम करूंगा। इस पर हिंदाल को बड़ी लज्जा आई और उसने बादशाह से निवेदन किया कि मुझे आपकी सेना के हरावल अर्थात् अग्रिम भाग में तैनात किया जाए। एक रात कामरान के सबसे विश्वस्त बेगों में गिना जाने वाला बापूस कामरान को छोड़कर भाग खड़ा हुआ और हुमायूँ के चरण चूमकर उसका वफादार बन गया। कामरान को बापूस से ऐसी आशा नहीं थी। बापूस के दुर्भाग्य से बापूस का एक घर उसी क्षेत्र में मौजूद था जहाँ कामरान की सेना ठहरी हुई थी। कामरान ने उस घर को गिराकर अपनी भड़ास निकाली। इतना सब होने के उपरांत भी कामरान अभी इतना कमजोर नहीं हुआ था कि वह हुमायूँ का सामना न कर सके। अब भी कामरान के पास लगभग 12 हजार सैनिक थे किंतु अब कामरान का भरोसा अपने सैनिकों पर से पूरी तरह उठ गया था।

 कामरान को आभास हो गया था कि हुमायूँ का सूरज फिर से चढ़ रहा है, इस चढ़ते हुए सूरज का सीधे-सीधे मुकाबला कर पाना कठिन है। इसलिए उसने एक कपट भरी योजना बनाई। कामरान ने हुमायूँ को भुलावे में डालने के लिए अपनी सेना भंग कर दी तथा अपने विश्वस्त साथियों ख्वाजा खाविंद महमूद और ख्वाजा अब्दुल खालिक को क्षमा मांगने हुमायूँ के पास भेजा।

हुमायूँ अपने भाइयों की अपेक्षा अधिक उदार, सहनशील एवं समझदार था। इसलिए हुमायूँ ने कामरान को क्षमा कर दिया तथा दोनों ख्वाजाओं से कहा कि वे कामरान को मेरी सेवा में ले आएं।

वस्तुतः कामरान हुमायूँ से क्षमा नहीं मांगना चाहता था, उसने तो हुमायूँ को चकमा देकर गजनी भाग जाने का कार्यक्रम बनाया था। अतः जब हुमायूँ ने मिर्जा कामरान को क्षमा करने का वचन दिया तो हुमायूँ की सेना ढीली पड़ गई और रात के अंधेरे का लाभ उठाकर कामरान काबुल की तरफ भागा। हुमायूँ सहित कोई नहीं जान सका कि कामरान अचानक ही कहाँ गायब हो गया!

काबुल के निकट पहुंचकर कामरान स्वयं तो बाबा दश्ती के निकट एक तालाब पर रुक गया और अपने आदमियों को नगर में भेजकर वहाँ से अपनी पुत्री हबीबा बेगम, पुत्र इब्राहीम सुल्तान मिर्जा, खिज्र खाँ की भतीजी हजारा बेगम, हरम बेगम की बहिन माह बेगम, हाजी बेगम की माता मेहअफरोज बेगम और बाकी कोका आदि को बुलवा लिया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि जब कामरान का परिवार बाबा गश्ती पर आया तो कामरान अपने परिवार के साथ ठट्ठा तथा बक्खर की तरफ भाग गया जबकि अबुल फजल ने लिखा है कि कामरान गजनी की तरफ चला गया। जब हुमायूँ को ज्ञात हुआ कि कामरान भाग गया तो हुमायूँ ने मिर्जा हिंदाल को कामरान के पीछे भेजा ताकि हिंदाल कामरान को पकड़कर ले आए।

हुमायूँ ने बापूस आदि कुछ बेगों को काबुल पर अधिकार करने भेजा ताकि कामरान के सैनिक काबुल के लोगों को न सताएं। हुमायूँ ने कांधार दुर्ग में प्रतीक्षा कर रही हमीदा बानो को काबुल विजय का शुभ समाचार भिजवाया तथा स्वयं अपने मंत्रियों एवं सेनापतियों सहित तीपा घाटी से चलकर काबुल चला गया।

एक शुभ मुहूर्त में हुमायूँ ने अपने पिता की पुरानी राजधानी काबुल में प्रवेश किया। जो मुगल सैनिक कल तक अपनी छातियां चौड़ी करके, शाही डंके पीटते हुए कामरान के आगे चला करते थे, आज वही सैनिक हुमायूँ के आगे-आगे चल रहे थे। उनकी छातियों की चौड़ाई, उनके डंके की आवाजें और उनके गर्व की मात्रा में कोई अंतर नहीं आया था। वह युग ऐसा ही था, निष्ठाएं पल भर में बनती-बिगड़ती और बिकती थीं।

इस प्रकार ई.1546 में जब हुमायूँ ने काबुल पर अधिकार किया तब अकबर को अपने पिता को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अबुल फजल के अनुसार इस समय अकबर की आयु तीन वर्ष दो मास आठ दिन थी। दूसरे दिन प्रातः हुमायूँ अपने पिता के तख्त पर बैठा। उस दिन दरबारे आम का आयोजन किया गया जिसमें समस्त बेग, मंत्री, अमीर तथा जागीरदार; बादशाह की सेवा में उपस्थित हुए। जन साधारण की विभिन्न कौमों के मुखिया भी दरबार में उपस्थित हुए।

इस प्रकार दर-दर की ठोकरें खाने वाला हुमायूँ एक बार फिर भाग्य के जोर मारने पर बादशाह बन गया। प्राचीन काल से ही धरती के प्रत्येक भू-भाग में राजा, सम्राट, बादशाह और सुल्तान उसे माना जाता था जिसके पास किला हो, कोष हो, सेना हो, धरती हो और प्रजा हो! आज हुमायूँ के पास किला भी था, कोष भी था, सेना भी थी, भूमि भी थी और प्रजा भी थी! जहाँ तक बात मुकुट और सिंहासन की है, वे तो राजा के आभूषण मात्र हैं। वे राजा से हैं, राजा उनसे नहीं है!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चालीस लड़कियां हरे कपड़े पहनकर पहाड़ों पर घूमने लगीं (75)

0
चालीस लड़कियां - www.bharatkaitihas.com
चालीस लड़कियां हरे कपड़े पहनकर पहाड़ों पर घूमने लगीं

कुछ दिन बाद नौरोज का त्यौहार मनाया गया। इस अवसर पर चालीस लड़कियां हरे कपड़े पहनकर पहाड़ों पर घूमने लगीं। ये जवान और खूबसूरत लड़कियां कई दिनों तक पहाड़ों पर विचरण करके अपने रूप की छटा बिखेरती रहीं ताकि दूर-दूर तक यह संदेश चला जाए कि बादशाह हुमायूँ के राज्य में हर ओर सुख-शांति है।

ई.1546 में कांधार पर अधिकार करने के बाद हुमायूँ ने काबुल पर भी अधिकार कर लिया। कामरान काबुल को खाली करके ठट्ठा अथवा बक्खर अथवा गजनी चला गया। हुमायूँ ने काबुल में दरबारे-आम का आयोजन करके अपने पुराने अधिकारियों को अवसर दिया कि वे बादशाह की सेवा में फिर से उपस्थित होकर निष्ठा का प्रदर्शन करें।

हुमायूँ ने मिर्जा हिंदाल को अपना विश्वसनीय जानकर उसे गजनी का गवर्नर बना दिया तथा हमीन्दावर एवं तीरी के इलाके उलूक मिर्जा को सौंप दिए। बहुत से मुगल अमीर जो समय-समय पर हुमायूँ से बगावत करके कामरान की तरफ चले गए थे, वे प्रतिदिन बड़ी संख्या में आ-आकर हुमायूँ के समक्ष उपस्थित होते थे और क्षमा-याचना करके हुमायूँ की अधीनता स्वीकार करते थे। हुमायूँ ने उन सभी को बिना किसी संकोच के अपनी सेवा में ले लिया।

कुछ अमीर ऐसे भी थे जिन्होंने हुमायूँ के प्रति बड़े अपराध किए थे, ऐसे लोगों की हिम्मत स्वयं उपस्थित होने के नहीं होती थी। इसलिए वे स्वयं आने की बजाय अपने प्रतिनिधि भिजवाते थे तथा स्वयं उपस्थित न होने के सम्बन्ध में कोई बहाना बताकर क्षमा-याचना करते थे। हुमायूँ ने ऐसे अमीरों के बहाने स्वीकार नहीं किए तथा उनके प्रतिनिधियों से कहा कि तुम्हारे मालिक की बादशाह के प्रति स्वामिभक्ति तभी मानी जाएगी, जब वे स्वयं हमारे हुजूर में हाजिर होंगे।

कुछ दिन बाद ही हुमायूँ ने अकबर का खतना करने के आदेश दिए। इस अवसर पर भव्य समारोह का आयोजन किया गया तथा काबुल से मरियम मकानी अर्थात् हमीदा बानू को भी बुलाया गया। बाबर के खानदान की अन्य समस्त औरतें तो पहले से ही काबुल में मौजूद थीं। अबुल फजल ने लिखा है कि इस अवसर पर ईरान के शाह तहमास्प के राजदूतों ने आकर बादशाह हुमायूँ को विजय की बधाई दी। बादशाह हुमायूँ ईरानी राजदूत मण्डल के अध्यक्ष वलद बेग से बड़ी कृपा-पूर्वक मिला।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

मीर सैयद अली भी हुमायूँ की सेवा में हाजिर हुआ। वह अफगानिस्तान एवं बलूचिस्तन में अपनी सम्पत्ति तथा ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध था। हुमायूँ ने उस पर बड़ी कृपा दिखाई। बलूचों के बहुत से कबीलों के सरदार बादशाह की सेवा में उपस्थित हुए। हुमायूँ ने बलूचों के एक सरदार जिसका नाम लवंग बलूच था, उसे शाल और मस्तंग (मस्तान) का जागीरदार बना दिया। चौसा, कन्नौज और बक्खर आदि के युद्धों में जो सेनापति अथवा सैनिक हुमायूँ के लिए लड़ते हुए मारे गए थे, उनकी विधवाओं, आश्रित भाई-बहिनों, वृद्ध माता-पिता एवं अवयस्क संतानों को वेतन, भूमि, नौकरी आदि देकर उनका सम्मान किया गया। अबुल फजल ने लिखा है कि यादगार नासिर मिर्जा के मन में फिर से दुष्टता उत्पन्न होने लगी। वह मिर्जा अस्करी के धायभाई मुजफ्फर कोका की सलाह सुना करता था। जब ये बातें बादशाह के कानों तक पहुंची तो हुमायूँ ने मुजफ्फर कोका को पकड़कर मरवा दिया और यादगार नासिर मिर्जा को अपने दरबार में बुलाया। जब यादगार नासिर मिर्जा हुमायूँ के दरबार में उपस्थित हुआ तब हुमायूँ तो चुप रहा किंतु कराचः खाँ ने भरे दरबार में यादगार नासिर मिर्जा को खूब खरी-खोटी सुनाई।

इसके बाद बादशाह के आदेश से यादगार नासिर मिर्जा को काबुल के दुर्ग में कैद कर दिया। उसके पास ही मिर्जा अस्करी भी बंदी बनाकर रखा गया था जिसे कांधार विजय के बाद ही बंदी बना लिया गया था और इस समय तक कांधार के दुर्ग से काबुल के दुर्ग में स्थानांतरित कर दिया गया था।

कुछ दिन बाद नौरोज का त्यौहार मनाया गया। इस अवसर पर चालीस लड़कियां हरे कपड़े पहनकर पहाड़ों पर घूमने लगीं। ये जवान और खूबसूरत लड़कियां कई दिनों तक पहाड़ों पर विचरण करके अपने रूप की छटा बिखेरती रहीं ताकि दूर-दूर तक यह संदेश चला जाए कि बादशाह हुमायूँ के राज्य में हर ओर सुख-शांति है।

कुछ समय बाद हुमायूँ को समाचार मिला कि बदख्शां के शासक मिर्जा सुलेमान ने विद्रोह करके स्वयं को बदख्शां तथा कुंदूज का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया है और अपने नाम का खुतबा पढ़वा रहा है। इस पर मार्च 1546 में हुमायूँ ने एक सेना के साथ बदख्शां के लिए प्रस्थान किया। उसने काबुल की सुरक्षा की जिम्मेदारी मुहम्मद अली तगाई पर छोड़ी।

अबुल फजल ने लिखा है कि हुमायूँ ने मिर्जा अस्करी को इस अभियान के लिए अपने साथ लिया। इससे प्रतीत होता है कि हुमायूँ ने मिर्जा अस्करी को क्षमा करके उसे कैद से मुक्त कर दिया था। अबुल फजल ने यह भी लिखा है कि जब हुमायूँ काबुल नगर से निकलकर कराबाग के निकट पहुंचा तो हुमायूँ को यादगार नासिर मिर्जा की तरफ से आशंका हुई। इसलिए हुमायूँ ने मुहम्मद अली तगाई को आदेश भिजवाया कि वह यादगर नासिर मिर्जा को मार डाले।

इस पर मुहम्मद अली तगाई ने बादशाह को उत्तर भेजा कि मैंने तो कभी एक चिड़िया भी नहीं मारी है, मैं मिर्जा को कैसे मार सकता हूँ। तब हुमायूँ ने यह कार्य मुहम्मद कासिम मंजी को सौंपा। मंजी ने यादगार नासिर मिर्जा के गले पर छुरी फेर दी।

सबसे पहले हुमायूँ ने जफर दुर्ग पर चढ़ाई की। जफर दुर्ग पर बड़ी आसानी से हुमायूँ का अधिकार हो गया। इसके बाद हुमायूँ अंदराब पहुंचा। उधर मिर्जा सुलेमान ने तिरगीरान नामक गांव के पास मोर्चा बांधा। इस पर हुमायूँ ने मिर्जा हिंदाल तथा कराचः खाँ को आगे बढ़कर मिर्जा सुल्तान पर हमला करने के लिए कहा।

दोनों पक्षों में हुए तुमुल संघर्ष के बाद मिर्जा सुलेमान खोस्त की घाटी में भाग गया। उसके पक्ष के बहुत से अमीर भागकर हुमायूँ की शरण में आ गए। इनमें वलद कासिम बेग, मिर्जा बेग बरलास प्रमुख थे। हुमायूँ तथा मिर्जा हिंदाल ने अपने घुड़सवार लेकर मिर्जा सुलेमान का पीछा किया किंतु मिर्जा सुलेमान इनके हाथ नहीं आया। हुमायूँ ने मिर्जा हिंदाल को कुंदूज तथा बदख्शां का गवर्नर बना दिया।

इतिहास घूमकर फिर उसी बिंदु पर आ गया था। ई.1525 में जब बाबर जीवित था, तब हुमायूँ इसी मिर्जा हिंदाल को बदख्शां का गवर्नर बनाकर हिंदुस्तान गया था और आज ई.1546 में हुमायूँ ने एक बार फिर हिंदाल को बदख्शां का गवर्नर बनाया।

हुमायूँ ने कुछ दिन खोस्त की घाटी में शिकार खेलने में बिताए तथा इसके बाद वह किशम दुर्ग पर अधिकार करने पहुंचा। किशम दुर्ग पर हुमायूँ का अधिकार तो हो गया किंतु हुमायूँ किशम में बुरी तरह बीमार हो गया। यहाँ तक कि वह कुछ दिनों तक अचेत पड़ा रहा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ के मित्रों की औरतें कामरान ने एक-दूसरे को दे दीं (76)

0
हुमायूँ के मित्रों की औरतें - www.bharatkaitihas.com
हुमायूँ के मित्रों की औरतें कामरान ने एक-दूसरे को दे दीं

जब कामरान किसी भी तरह से हुमायूँ को नीचा नहीं दिखा सका तो उसने और अधिक नीचता करने का निश्चय किया तथा हुमायूँ के मित्रों की औरतें एक-दूसरे को बांट दीं! वैसे भी कोई मुगल बादशाह या अमीर किसी की भी औरत को भोगने में शर्म नहीं करता था।

हुमायूँ का चचेरा भाई मिर्जा सुलेमान हुमायूँ से परास्त होकर खोस्त की घाटी में भाग गया तथा हुमायूँ ने जफर दुर्ग एवं किशम दुर्ग पर अधिकार कर लिया। किशम दुर्ग में हुमायूँ बीमार पड़ गया और कुछ दिनों तक अचेत पड़ा रहा।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि जब बक्खर में कामरान को समाचार मिला कि हुमायूँ किशम के किले में बेहोश पड़ा है तो कामरान ने गजनी पहुंचकर बेगा बेगम की बहिन के पति जाहिद बेग को मार डाला तथा गजनी पर अधिकार कर लिया। इसके बाद कामरान कांधार के लिए चल दिया किंतु कांधार दुर्ग पर बैराम खाँ का पहरा था। बैराम खाँ ने कामरान को कांधार दुर्ग में नहीं घुसने दिया। इस पर कामरान कांधार छोड़कर काबुल के लिए रवाना हुआ।

एक दिन सूर्य निकलते ही कामरान ने काबुल नगर पर धावा मारा। इस समय काबुल के दरवाजे खुले हुए थे और भिश्ती तथा घसियारे आदि स्त्री-पुरुष नगर के भीतर और बाहर आ-जा रहे थे। उन्हीं के साथ कामरान तथा उसके सिपाही काबुल नगर में घुस गए। उस समय हुमायूँ की मातस माहम बेगम का भाई अली मामा स्नानघर में था, कामरान ने उसे स्नानघर में ही मार डाला।

कामरान ने मुल्ला अब्दुल खालिक के मदरसे में डेरा डाला। कामरान के सैनिकों ने हुमायूँ के महल का कीमती सामान लूटकर कामरान के डेरे में डाल दिया। कामरान ने हुमायूँ के विश्वस्त अमीर फजायल बेग तथा मेहतर वकील को पकड़कर उनकी आंखों में सलाई फिरवा दी अर्थात् उन्हें अंधा कर दिया।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इसके बाद कामरान ने हुमायूँ के परिवार की औरतों को पकड़ कर मिर्जा अस्करी के मकान में बंद कर दिया और उस मकान का दरवार्जा ईंटों की पक्की चिनाई से बंद करवा दिया। इन औरतों को दीवार के ऊपर से खाना पहुंचाया जाता था। हुमायूँ का पुत्र अकबर भी हुमायूँ के हरम की स्त्रियों के साथ इस घर में बंद किया गया। जो मिर्जा, बेग, अमीर और सिपाही कामरान का साथ छोड़कर हुमायूँ की तरफ भाग गए थे, उनके घरों की पहचान करके उन्हें गिराया गया तथा उनके परिवारों को बहुत बुरी सजाएं दी गईं। इन परिवारों की औरतों को दूसरे परिवारों को सौंप दिया गया। यह कामरान के नैतिक पतन की पराकाष्ठा थी। जिन लोगों पर तथा जिन लोगों की सहायता से उसे शासन करना था, कामरान उन्हीं लोगों के परिवारों के साथ मानव-गरिमा से नीचे का बरताव कर रहा था। शाही आदेश से अमीरों की स्त्रियों की अदला-बदली जैसा कुकृत्य इससे पहले किसी भी मुगल विजेता द्वारा नहीं किया गया था। कामरान के साथ आई औरतों को हुमायूँ की औरतों के महलों में ठहराया गया। हुमायूँ के हरम के नौकरों तथा उनकी औरतों पर अत्याचार ढाए गए। हुमायूँ के मित्रों की औरतें दूसरे मर्दों द्वारा बेइज्जत की गईं किंतु हुमायूँ कुछ नहीं कर सका!

कामरान ने अपने भाई-भतीजों, बहिन-भाइयों एवं बुआ-चाचियों आदि किसी के भी साथ किसी सम्बन्ध की परवाह नहीं की। वह बदले की आग में जल रहा था। उसे हर उस व्यक्ति से चुन-चुन कर बदला लेना था जो कामरान के स्थान पर हुमायूँ के पक्ष में था।

कामरान ने जैसा वीभत्स व्यवहार अपने ही कुल के सदस्यों के साथ किया, वैसा व्यवहार तो शेरशाह सूरी सहित किसी भी शत्रु ने हुमायूँ के परिवार के साथ अब तक नहीं किया था। हुमायूँ के परिवार के सदस्यों को विश्वास नहीं हुआ कि निर्दयी समय थोड़ा सा दयालु होकर इतनी शीघ्र ही फिर से बुरा हो जाएगा!

कामरान ने गुलबदन की माता दिलदार बेगम और गुलबदन को अपने पास बुलाया। उसने दिलदार बेगम से कहा कि वह लुहारखाने में जाकर रहे। कामरान ने गुलबदन बेगम से कहा कि मेरा घर भी तुम्हारा ही है, तुम यहीं पर रहो। इस पर गुलबदन बेेगम ने कामरान से कहा कि मैं यहाँ क्यों रहूँ। जहाँ मेरी माता रहेगी, मैं भी वहीं पर रहूंगी।

कामरान ने कहा कि ठीक है, तुम्हारी जहाँ इच्छा हो रहो किंतु तुम खिज्र ख्वाजा खाँ को पत्र लिखो कि जिस प्रकार हिंदाल और अस्करी मेरे भाई हैं, उसी प्रकार खिज्र ख्वाजा खाँ भी मेरा भाई है, इसलिए खिज्र ख्वाजा खाँ तुंरत मुझसे  आकर मिलो, यह समय मेरी सहायता करने का है।

इस पर गुलबदन ने कहा कि वह मेरे दस्तखत नहीं पहचानता है इसलिए तुम्हारी जो मर्जी हो तुम ही उसे पत्र लिखो। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि मैंने मिर्जा ख्वाजा खाँ को लिखा कि हालांकि तुम्हारे सब भाई कामरान की तरफ हो गए हैं किंतु तुम कभी सपने में भी कामरान के साथ मत होना, बादशाह की तरफ ही रहना।

पाठकों की सुविधा के लिए बताना समीचीन होगा कि उस काल में जितने पुरुषों के नाम के साथ मिर्जा लगता था, वे तैमूरी खानदान अथवा मुगल खानदान के शहजादे थे और जिन पुरुषों के नाम के आगे ख्वाजा अथवा खोजा लगता था, वे अधिकांशतः बाबर की बेगम माहम सुल्ताना के पीहर पक्ष के अर्थात् हुमायूँ के ननिहाल से आए हुए थे।

खिज्र ख्वाजा खाँ गुलबदन बेगम का पति था। इस समय वह अपने परिवार के साथ खोस्त में था किंतु उसकी पत्नी गुलबदन बेगम काबुल के किले में कामरान की कैद में थी। कामरान चाहता था कि गुलबदन बेगम और उसका पति खिज्र ख्वाजा खाँ हुमायूँ के पक्ष में रहने की बजाय, कामरान के पक्ष में रहे किंतु जब गुलबदन ने खिज्र ख्वाजा खाँ को बुलाने के लिए पत्र नहीं लिखा तो कामरान ने मेहदी सुल्तान तथा शेर अली नामक दो अमीरों को खिज्र ख्वाजा खाँ को लाने के लिए भेजा।

जिस तरह मुगलिया खानदान में बाबर की बेगम माहम सुल्ताना का अत्यधिक सम्मान एवं आदर था, उसी प्रकार मुगलिया खानदान में बाबर की बहिन खानजादः बेगम और गुलबदन बेगम का भी अत्यधिक सम्मान था, उनकी कोई बात टाली नहीं जाती थी। माहम सुल्ताना एवं खानजादः बेगम तो अब काल के प्रवाह में तिरोहित हो चुकी थीं, इसलिए गुलबदन बेगम का अपने किसी भाई के पक्ष में होने का महत्व अत्यधिक बढ़ गया था।

यदि खोस्त का ख्वाजा परिवार अर्थात् गुलबदन के पति का परिवार कामरान के पक्ष में चला जाता तो हुमायूँ को बदख्शां, खोस्त एवं हेरात के क्षेत्र में नैतिक समर्थन प्राप्त हो जाता और हुमायूँ का पक्ष कमजोर हो जाता। इसलिए कामरान ने गुलबदन बेगम एवं खिज्र ख्वाजा खाँ को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया।

घमण्डी कामरान ये सब बातें तो जानता था किंतु यह नहीं जानता था कि गुलबदन बेगम और उसके पति का समर्थन पाने के लिए गुलबदन की माता दिलदार बेगम के साथ भी अच्छा व्यवहार करना होगा। चूंकि कामरान ने गुलबदन की माता को उसके महल से निकालकर शस्त्रागार में रहने के आदेश दिए थे, इसलिए कामरान को गुलबदन बेगम का समर्थन कैसे मिल सकता था!

जब बादशाह को ज्ञात हुआ कि कामरान ने खिज्र ख्वाजा खाँ को बुलाया है तो बादशाह हुमायूँ ने भी खिज्र ख्वाजा खाँ को पत्र लिखकर अपने पास आने के लिए लिखा। इस पर खिज्र ख्वाजा खाँ बादशाह हुमायूँ की सेवा में उपस्थित हो गया। उस समय हुमायूँ उकाबैन नामक स्थान पर ठहरा हुआ था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

पुराणों में कालगणना - bharatkaitihas.com

पुराणों में कालगणना

0
पुराणों में कालगणना: भारतीय परम्परा में समय का विशाल स्वरूप पुराणों में कालगणना की मूल अवधारणा कालगणना भारतीय परम्परा में समय को समझने की एक विशिष्ट...
Ebook The Quantum Universe and Vedanta - bharatkaitihas.com

Ebook The Quantum Universe and Vedanta

0
The Ebook The Quantum Universe and Vedanta by Dr. Mohanlal Gupta explores the fascinating relationship between quantum physics, consciousness, cosmic origins, and the philosophical insights of ancient Indian Vedanta.
पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण - bharatkaitihas.com

पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण

0
पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण करते समय उनकी साहित्यिक परम्परा, रचनाकाल, विषयवस्तु और ऐतिहासिक उपयोगिता का अध्ययन आवश्यक है। 1. पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण : उद्गम...
पुराणों की पौराणिकता - bharatkaitihas.com

पुराणों की पौराणिकता

0
1. भारतीय वाङ्मय में पुराणों का महत्त्व भारतीय वाङ्मय में पुराणों का स्थान अतुलनीय है। पुराण धार्मिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ज्ञान के महत्त्वपूर्ण स्रोत...
पुराण का वास्तविक स्वरूप - bharatkaitihas.com

पुराणों का वास्तविक स्वरूप

0
पुराणों का वास्तविक स्वरूप जानने के लिए मूल ग्रन्थों, वैदिक सन्दर्भों, पारिभाषिक शब्दावली और ऐतिहासिक प्रमाणों का आलोचनात्मक अध्ययन आवश्यक है। 1. प्रस्तावना : पुराणों...