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गजनी के गवर्नर डेढ़ सौ साल तक भारत को खोखला करते रहे (29)

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गजनी के गवर्नर डेढ़ सौ साल तक भारत को खोखला करते रहे

महमूद गजनवी के समय में मुल्तान से लेकर लाहौर तक के क्षेत्र में गजनी के गवर्नर किलों पर अधिकार करके अपनी सत्ता जमाना आरम्भ कर चुके थे। लगभग डेड़ सौ साल तक गजनी के गवर्नर भारत को खोखला करते रहे।

गजनी द्वारा पंजाब में नियुक्त गवर्नरों द्वारा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बारबार किए गए अभियानों के कारण वे उत्तरी भारत के चप्पे-चप्पे से परिचित हो गए। अब वह दिन दूर नहीं था जब वे पंजाब की तरह भारत के किसी अन्य भाग में अपनी सल्तनत की स्थापना कर सकें। फिर भी हिन्दू राजाओं का मनोबल पूरी तरह भंग नहीं हुआ था। वे गजनी के इन अमीरों और गवर्नरों से लड़ते रहे और किसी ने किसी रूप में अपना अस्तित्व बनाए रहे।

‘पृथ्वीराज विजय’ नामक ग्रंथ में लिखा है कि शाकम्भरी नरेश चौहान दुर्लभराज (तृतीय) मतंगों से हुए युद्ध में मारा गया। वस्तुतः ये मतंग गजनी के सुल्तान इब्राहीम के सैनिक थे। उस काल के एक ताम्रपत्र में लिखा गया है कि आसराज ने तुरुष्कों से घिरे अपने भाई पृृथ्वीपाल को बचाया था। एक अन्य ताम्रपत्र के अनुसार आसराज के साले हरिपाल ने तुरुष्कों के प्यासे घोड़ों को पानी नहीं पीने दिया। डॉ. दशरथ शर्मा का अनुमान है कि ये दोनों ताम्रपत्र इब्राहीम की सेना से हुई लड़ाई से सम्बन्धित हैं।

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परमार राजा लक्ष्मणदेव ई.1086 से 1094 तक मालवा का शासक रहा। उसने भी इब्रहाहीम की सेनाओं को परास्त किया। उसके शिलालेखों में भी इब्राहीम की सेना को तुरुष्कों की सेना कहा गया।

इन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उस काल के भारतीय लेखों में गजनी के मुसलमानों को मतंग, तुरुष्क, कीरा तथा म्लेच्छ कहा जाता था जबकि मुस्लिम अमीरों को हम्मीर लिखा गया है।

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ई.1099 में गजनी के शासक इब्राहीम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मसूद (तृतीय) गजनी का सुल्तान हुआ। उसने उज्दुद्दौलावाद्दीन को पंजाब का सूबेदार बनाया तथा तुगातिगीन को भारत के विभिन्न राज्यों पर आक्रमण करने के निर्देश दिए। तुगातिगीन ने गंगा-पार के क्षेत्रों तक धावे किए। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है कि तुगातिगीन उस स्थान तक पहुंचने में सफल हो गया जहाँ तक महमूद के अतिरिक्त और कोई नहीं पहुंच सका था। तुगातिगीन ने कन्नौज के गाहड़वाल शासक मदनचंद्र को पकड़ लिया तथा उसे अपने साथ लाहौर ले गया। मदनचंद्र के पुत्र गोविंदचंद्र गाहड़वाल ने लाहौर के मुसलमानों को पराजित करके अपने पिता को मुक्त करवाया। इस युद्ध में मदनपाल राठौड़ ने गोविंदचंद्र की बहुत सहायता की जो कि गोविंदचंद्र के अधीन बदायूं का सामंत था। श्रीधर कवि की रचना पार्श्वनाथ चरित में लिखा है कि ई.1132 में दिल्ली के तोमर शासक अनंगपाल ने हम्मीर को पराजित किया। वस्तुतः लाहौर के किसी अमीर को ही इस कविता में ‘हम्मीर’ लिखा गया है। इस काल में गजनी के सूबेदार पंजाब के तबरहिंद तथा रूपाल तक शासन करते थे जो दिल्ली से बहुत अधिक दूर नहीं थे।

इस प्रकार गजनी के सुल्तान तथा लाहौर में नियुक्त उनके अमीर भारतीय राजाओं पर निरंतर हमले करके उनकी सैनिक शक्ति का ह्रास करते रहे तथा भारत में अपने पैर मजबूत करते रहे। अब वे किसी भी दिन दिल्ली पर अधिकार करके भारत के सुल्तान होने का दावा कर सकते थे किंतु इस कार्य में सबसे बड़ी बाधा शाकम्भरी के चौहान थे जो अजमेर तथा दिल्ली पर शासन करते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चौहान रूपी चट्टान को तोड़ना आवश्यक हो गया गजनवियों के लिए (30)

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चौहान रूपी चट्टान को तोड़ना आवश्यक हो गया गजनवियों के लिए

गजनी के सुल्तान एवं अमीर अब भारत में अपनी स्थाई सत्ता स्थापित करना चाहते थे किंतु उनके लिए चौहान रूपी चट्टान को तोड़ना आवश्यक हो गया! शक्तिशाली चौहानों के रहते वे भारत में अपनी सत्ता स्थापित नहीं कर सकते थे!

गजनी के सुल्तानों, अमीरों एवं गजनी के गवर्नरों को भारत पर आक्रमण करते हुए लगभग डेढ़ सौ साल हो गए थे। इस बीच रावी नदी के पूर्वी किनारों तक का पंजाब पूरी तरह गजनी के अधीन हो चुका था और गजनी के सेनापति पंजाब की नदियों को पार करके, यमुना नदी के मैदानों से लेकर मध्य-गंगा के मैदानों तक धावे मार रहे थे। फिर भी वे भारत में सिंध एवं पंजाब के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में अपने पैर स्थाई रूप से नहीं टिका पा रहे थे।

शाकम्भरी नरेश अर्थात् अजमेर के चौहान शासक गजनी के आक्रांताओं में किसी अजेय चट्टान की तरह डट गए थे। चौहान रूपी चट्टान को तोड़ पाना गजनवियों के लिए अभी तक संभव नहीं हो पाया था। ई.724 के लगभग खलीफा वली अब्दुल मलिक की सेना व्यापारियों के वेष में सिंध के मार्ग से अजमेर तक चढ़ आई।

उस समय दुर्लभराज (प्रथम) अजमेर का शासक था। खलीफा की सेना ने अजमेर दुर्ग पर अधिकार कर लिया किंतु कुछ ही समय पश्चात् दुर्लभराज के पुत्र गूवक ने अजमेर का दुर्ग वापस छीन लिया। तभी से चौहान-शक्ति खलीफा की आँखों की किरकिरी बनी हुई थी।

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अजमेर के शासक गोविंदराज (द्वितीय) तथा वीर्यराम ने महमूद गजनवी को दो बार परास्त किया। वीर्यराम का उत्तराधिकारी चामुण्डराज हुआ। उसने शक मुसलमानों के स्वामी हेजामुद्दीन को पकड़ लिया। चामुण्डराज के बाद ई.1075 में दुर्लभराज (तृतीय) उत्तराधिकारी हुआ। उसने मुसलमान सेनापति शहाबुद्दीन को परास्त किया।

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दुर्लभराज (तृतीय) के बाद विग्रहराज (तृतीय) अजमेर का शासक हुआ। उसने दिल्ली के तोमर शासक के साथ मिलकर मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध एक संघ बनाया तथा हांसी, थाणेश्वर और नगरकोट से मुस्लिम गवर्नरों को मार भगाया। इस विजय के बाद दिल्ली में एक स्तम्भ लेख लगावाया गया जिसमें कहा गया है कि विन्ध्याचल से हिमालय तक के क्षेत्र से म्लेच्छों को निकाल बाहर किया गया जिससे आयावर्त एक बार फिर से पुण्यभूमि बन गया। अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज (प्रथम) का भी गजनी के तुर्कों से युद्ध हुआ। इस युद्ध में पृथ्वीराज (प्रथम) ने गजनी के सेनापति तुगातिगीन को परास्त करके भगा दिया। पृथ्वीराज (प्रथम) के बाद ई.1113 के लगभग अजयदेव अजमेर का राजा हुआ। ई.1115 में बहरामशाह गजनी का शासक हुआ। उसने 6 दिसम्बर 1118 को मुहम्मद बाहलीम को अपने हिन्दुस्तानी प्रान्तों का प्रान्तपति नियुक्त किया। ई.1119 में बाहलीम ने सुल्तान बहराम से विद्रोह करके स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। बाहलीम ने दक्षिण की ओर बढ़कर नागौर पर आक्रमण किया। उस समय नागौर, अजमेर के चौहान शासक अजयराज के अधीन था। राजा अजयराज चौहान को अपने कई क्षेत्र गजनी के शासक बहराम तथा उसके गवर्नर बाहलीम के हाथों खोने पड़े।

बाहलीम ने नागौर दुर्ग में कुछ निर्माण करवाए तथा अपना खजाना और सेना नागौर में केन्द्रित कर लिए। इस प्रकार भारत में सिंध तथा पंजाब से बाहर गजनी के मुसलमानों का यह पहला राज्य स्थापित हो गया। हालांकि कुछ ही समय बाद बाहलीम ने गजनी से विद्रोह कर दिया इसलिए गजनी के सुल्तान बहराम शाह ने बाहलीम पर चढ़ाई करके उसे मार डाला।

बाहलीम से छुटकारा पाकर बहरामशाह ने इब्राहीम अलवी के पुत्र सालार हुसैन को अपने हिन्दुस्तानी प्रांतों का गवर्नर बनाया। इन प्रांतों में नागौर भी सम्मिलित था। राजा अजयदेव ने ई.1123 में अजमेर पर चढ़कर आए मुस्लिम आक्रांताओं को परास्त कर दिया तथा उनका बड़ी संख्या में संहार किया। चौहान रूपी चट्टान एक बार फिर अजेय सिद्ध हुई।

ई.1133 के आसपास अजयदेव का पुत्र अर्णोराज, अजयदेव का उत्तराधिकारी हुआ। अर्णोराज को आनाजी भी कहते हैं। उसने गजनी के गवर्नर सालार हुसैन को परास्त करके नागौर दुर्ग फिर से अपने अधीन कर लिया। वह ई.1155 तक शासन करता रहा।

अजमेर संग्रहालय की खण्ड प्रशस्ति से विदित होता है कि आनाजी ने उन तुर्कों को पराजित किया जो मरुस्थल को पार करके अजमेर तक आ पहुँचे थे। इस आक्रमण की तिथि ई.1135 होनी चाहिए। गजनी की सेना हिन्दुओं के प्रसिद्ध तीर्थ पुष्कर को नष्ट करके अजमेर नगर के बाहर तक आ पहुँची। अर्णोराज ने उन पर विजय प्राप्त करके उनका संहार किया।

जिस स्थल पर यवनों का रक्त गिरा था उस स्थल को शुद्ध करने के लिए वहाँ उसने एक हवन किया तथा उस स्थान पर आनासागर झील बनवाई। आज भी आनासागर झील चौहान रूपी चट्टान की अजेयता का बखान करती है।

अजमेर के प्रतापी शासक विग्रहराज (चतुर्थ) को बीसलदेव भी कहा जाता है। वह ई.1152-63 तक अजमेर का राजा रहा। उसका शासन न केवल अजमेर के इतिहास के लिए अपितु सम्पूर्ण भारत के इतिहास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उसने गजनी के मुसलमानों से अनेक युद्ध लड़े। वीसलदेव के समय गजनी के मुसलमानों की सेना वव्वेरा गांव तक पहुंच गई जो अब राजस्थान के शेखावाटी अंचल में स्थित है।

राजा वीसलदेव उस सेना को परास्त करके गजनी के मुसलमानों को आर्यावर्त्त से बाहर निकालने के लिए उत्तर की तरफ बढ़ा।

दिल्ली से अशोक का एक स्तंभ-लेख मिला है जिस पर वीसलदेव के समय में एक और लेख उत्कीर्ण किया गया। यह लेख 9 अप्रेल 1163 का है तथा इसे शिवालिक स्तंभ-लेख कहते हैं। इस शिलालेख के अनुसार वीसलदेव ने देश से मुसलमानों का सफाया कर दिया तथा अपने उत्तराधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मुसलमानों को अटक नदी के उस पार तक सीमित रखें। अर्थात् ईस्वी 1163 तक चौहान रूपी चट्टान मुसलमानों के मार्ग में मजबूती से डटी हुई थी।

वीसलदेव के राज्य की सीमाएं शिवालिक पहाड़ी, सहारनपुर तथा उत्तर प्रदेश तक प्रसारित थीं। चौहान-शिलालेखों के अनुसार जयपुर और उदयपुर जिले के कुछ भाग वीसलदेव चौहान के राज्य के अंतर्गत थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि अपनी शक्ति और बल से विग्रहराज ने म्लेच्छों का दमन करके आर्यावर्त्त को वास्तव में आर्यभूमि बना दिया था। जिस मुस्लिम शासक हम्मीर को परास्त करने का उल्लेख ‘ललितविग्रह’ नाटक में किया गया है, वह गजनी का अमीर खुशरूशाह था।

शिवालिक लेख के अनुसार वीसलदेव के राज्य की सीमाएं हिमालय से लेकर विंध्याचल पर्वत तक विस्तृत थीं। इस पूरे क्षेत्र से उसने मुस्लिम गवर्नरों को परास्त करके अटक के उस पार तक मार भगाया था। प्रबन्धकोष उसे तुरुष्कों का विजेता बताता है। इस काल में दिल्ली केवल ठिकाणा बन कर रह गई जिसकी राजधानी अजमेर थी। इतिहास की पुस्तकों में उसे भारत का प्रथम चौहान सम्राट कहा गया है। उसकी विशाल सेना में एक हजार हाथी, एक लाख घुड़सवार तथा उससे भी अधिक संख्या में पैदल सिपाही थे।

इस प्रकार अजमेर के चौहान गजनी के सुल्तानों के लिए एक अलंघ्य चट्टान बन गए थे। चौहान रूपी चट्टान को चूर-चूर किए बिना गजनी के सुल्तानों का भारत में साम्राज्य की स्थापना का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गजनी में सत्ता परिवर्तन ने भारत में तुर्की साम्राज्य का मार्ग खोल दिया (31)

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गजनी में सत्ता परिवर्तन ने भारत में तुर्की साम्राज्य का मार्ग खोल दिया

ई.1173 में गजनी के राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा उलट-फेर हुआ। गजनी में सत्ता परिवर्तन ने भारत में तुर्की साम्राज्य का मार्ग खोल दिया

महमूद गजनवी के वंशज ई.999 से लेकर ई.1173 तक गजनी पर शासन करते रहे। महमूद के वंशजों ने भारत में अपने साम्राज्य की स्थापना के लिए बहुत प्रयास किए किंतु लगभग डेढ़ सौ साल तक भारत के राजाओं ने गजनवियों को रावी नदी से आगे पैर नहीं जमाने दिए।

ई.1173 में गजनी के राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा उलट-फेर हुआ। उन दिनों गजनी साम्राज्य के अंतर्गत गौर नामक एक छोटा सा उपेक्षित कस्बा हुआ करता था। यह कस्बा साम्राज्य की राजधानी गजनी से लगभग 200 मील पश्चिम में था। इस नगर पर गयासुद्दीन गौरी नामक एक अमीर शासन करता था।

ई.1173 में गयासुद्दीन गौरी ने गजनी के सुल्तान खुसरव मलिक की कमजोरी का लाभ उठाते हुए गजनी पर अधिकार कर लिया और अपने छोटे भाई शहाबुद्दीन को गजनी का शासक नियुक्त किया। यही शहाबुद्दीन आगे चलकर मुहम्मद गौरी के नाम से जाना गया। गजनी में सत्ता परिवर्तन ने भारत में तुर्की साम्राज्य का मार्ग खोल दिया! आगे बढ़ने से पहले हमें ‘गोर’ अथवा ‘गौर’ प्रदेश की प्राचीन संस्कृति पर कुछ चर्चा करनी चाहिए।

वर्तमान समय में गौर का पहाड़ी क्षेत्र अफगानिस्तान के केन्द्रीय भाग में स्थित है तथा गजनी और हिरात के बीच में बसा हुआ है। गौर प्रदेश के निवासी भारत में गौरी एवं गौरान कहे जाते हैं। यह एक निर्धन पहाड़ी क्षेत्र था। संस्कृत भाषा का शब्द ‘गिरि’ ही फारसी भाषा के प्रभाव से ‘गोर’ बन गया था।

गौर क्षेत्र में स्थित ‘हरि’ नामक नदी के दक्षिणी तट पर ‘चगचरण’ नामक शहर की पुरातात्विक खुदाई में ईसा से लगभग पांच हजार साल पुरानी सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिनमें नगर की दीवार तथा दुर्गनुमा रचनाएं भी पाई गई हैं। ये बस्तियां निश्चित रूप से भारत की वैदिक एवं सिंधु नदी घाटी सभ्यताओं की समकालीन थीं। ‘हेरात’ नामक नगर का नामकरण ‘हरि’ नदी के नाम पर ठीक उसी प्रकार हुआ है, जिस प्रकार भारत में ‘हरि’ शब्द से ‘हरिद्वार’ नामक नगर का नामकरण हुआ है।

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जब बौद्ध सम्राट अशोक ने अफगानिस्तान में बौद्धधर्म का प्रचार किया, तब गौर क्षेत्र में संस्कृत-भाषी हिन्दू रहा करते थे जिनकी सभ्यता ईसा से लगभग पांच हजार साल पुरानी थी। अशोक के प्रयासों से इस क्षेत्र में बौद्धधर्म का प्रचार हआ तथा लगभग एक हजार साल तक इस क्षेत्र में बौद्धधर्म फलता-फूलता रहा। इस क्षेत्र की पहाड़ियां बौद्ध भिक्षुओं के आकर्षण का केन्द्र थीं जिनमें रहकर वे भगवान बुद्ध की उपासना किया करते थे। जब दसवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में गौर क्षेत्र में इस्लाम का प्रवेश हुआ तब गौर क्षेत्र में बौद्ध बस्तियों के साथ-साथ हिन्दू, पारसी एवं यहूदी बस्तियां भी हुआ करती थीं। भारत के यदुवंशी भाटियों ने भी गजनी और गौर के बीच अपने दुर्ग बना रखे थे। गौर की जनता अरब की ओर से आने वाले तुर्की आक्रांताओं से अपनी रक्षा नहीं कर सकी तथा अपने प्राचीन धर्मों से हाथ धो बैठीं। ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में गजनी के शासक महमूद गजनवी ने सम्पूर्ण गौर क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया तथा इस क्षेत्र में, बची-खुची हिन्दू, बौद्ध, पारसी एवं यहूदी बस्तियों को नष्ट कर दिया। बहुत से लोगों ने गजनवी के सैनिकों के हाथों प्राण जाने के भय से इस्लाम स्वीकार कर लिया।

महमूद गजनवी की मृत्यु के बाद गौर प्रदेश में एक नए राजवंश का उदय हुआ जो गौर शहर के नाम पर गौरी कहलाया। इस वंश के शासक मुसलमान बनने से पहले बौद्ध हुआ करते थे। जब ई.1173 में गौर वंश के शासक गयासुद्दीन गौरी ने गजनी के शासक खुसरव मलिक से गजनी छीनकर अपने छोटे भाई शहाबुद्दीन गौरी को दे दिया तो खुसरव मलिक, गजनी से भागकर पंजाब आ गया तथा पंजाब के एक छोटे से क्षेत्र पर शासन करने लगा। इस प्रकार गजनी से महमूद वंश का राज्य पूर्णतः समाप्त हो गया।

लगभग पौने दो सौ साल तक गजनी विशाल साम्राज्य की राजधानी रहा था। इसलिए जब शहाबुद्दीन गौरी गजनी का शासक बना तो उसकी आकांक्षाओं को नए पंख मिल गए। उसने भी गजनी के सबसे प्रबल सुल्तान महमूद गजनवी की भांति भारत पर आक्रमण करके भारत की सम्पदा लूटने तथा अपने राज्य का विस्तार करने का निर्णय लिया। इस प्रकार गजनी में सत्ता परिवर्तन ने भारत के लिए एक बार फिर से बड़ा खतरा उत्पन्न कर दिया।

शहाबुद्दीन गौरी को भारत के इतिहास में मुहम्मद गौरी के नाम से जाना जाता है। महमूद गजनवी ने भारत पर पूरे 26 साल तक आक्रमण किए थे किंतु मुहम्मद गौरी ई.1175 से ई.1206 तक अर्थात् पूरे इकत्तीस साल तक भारत पर आक्रमण करता रहा। ई.1186 में मुहम्मद गौरी ने गजनी के अपदस्थ सुल्तान खुसरव मलिक को जान से मरवा दिया।

इस समय तक गजनी का पुराना शासक वंश अर्थात् महमूद गजनवी का वंश पूरी तरह कमजोर पड़ चुका था तथा उसमें इतनी शक्ति शेष नहीं बची थी कि वह पंजाब से बाहर निकलकर भारत के अन्य क्षेत्रों पर अधिकार कर सके किंतु गजनी का नया शक्ति-सम्पन्न शासक वंश भारत में अपने क्षेत्रों के विस्तार के लिए उत्सुक था। इस प्रकार गजनी में सत्ता परिवर्तन से भारत में तुर्की स्थापना का मार्ग खुल गया।

मुहम्मद गौरी के कोई औलाद नहीं थी, इसलिए वह अपने गुलामों को अपनी औलाद मानता था। इस कारण मुहम्मद गौरी जो भी नया प्रदेश जीतता था, अपने किसी विश्वसनीय गुलाम को उस प्रदेश का शासक बना देता था। भारत में भी उसने यही पद्धति अपनाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय बिखरा हुआ था भारत (32)

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मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय बिखरा हुआ था भारत

जिस काल में मुहम्मद गौरी के आक्रमण आरम्भ हुए, उस काल में भारत का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बिखरा हुआ था। सिंधु नदी से लेकर पंजाब की अंतिम नदी तक के क्षेत्र में मुसलमानों के छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो चुके थे। शेष भारत में हिन्दू राजाओं के राज्य थे जो हर समय आपस में लड़कर अपने-अपने राज्य का विस्तार करते रहते थे और पड़ौसी राज्य को मिटाते रहते थे।

ई.1173 में शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी अफगानिस्तान में स्थित गजनी का नया शासक बना। गजनी का नया राजवंश अधिक शक्ति-सम्पन्न था, इसलिए उसने भारत में तुर्की साम्राज्य के विस्तार के लिए नए रास्ते खोल दिए। महमूद गजनवी की तरह मुहम्मद गौरी के भी भारत पर आक्रमण करने के पीछे कई उद्देश्य थे। उसका सबसे पहला उद्देश्य पंजाब में गजनवी वंश के शासक खुसरवशाह को तथा उसके राज्य को समूल नष्ट करना था ताकि भविष्य में मुहम्मद गौरी के साम्राज्य को कोई खतरा नहीं हो।

मुहम्मद गौरी के आक्रमण एक साथ बहुत सारे उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आरम्भ हुए थे। मुहम्मद गौरी भारत में एक नए मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना करके इतिहास में अपना नाम अमर करना चाहता था तथा अरब के खलीफाओं से अपने लिए प्रशंसा प्राप्त करना चाहता था। महमूद गौरी भी महमूद गजनवी की तरह भारत से विपुल धन-दौलत एवं गुलामों को प्राप्त करना चाहता था।

मुहम्मद गौरी अपने युग के अन्य मध्यएशियाई मुस्लिम शासकों की तरह कट्टर सुन्नी मुसलमान था, इसलिए वह भारत से बुत-परस्ती अर्थात् मूर्ति-पूजा को समाप्त करना अपना परम कर्त्तव्य समझता था। इस प्रकार मुहम्मद गौरी द्वारा भारत पर आक्रमण करने के राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक कारण थे। अपने जीवन के अंतिम 20 वर्षों में वह इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति में लगा रहा। ईस्वी 1173 से ईस्वी 1193 तक भारत पर मुहम्मद गौरी के आक्रमण होते रहे।

मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय भारत वर्ष कहने को ही एक राष्ट्र था किंतु राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि से बुरी तरह से बिखरा हुआ था। केवल प्राकृतिक सीमाएं ही भारत के एक राष्ट्र होने का आभास करवाती थीं। उत्तर में हिमालय तथा उत्तर-पश्चिम में हिन्दूकुश पर्वत, पूर्व में बंगाल की खाड़ी, दक्षिण में हिन्दू महासागर एवं पश्चिम में अरब की खाड़ी इस देश को एक प्राकृतिक राष्ट्र का स्वरूप प्रदान करते थे।

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वह समय बीत चुका था जब वेद, उपनिषद्, पुराण, रामायण, महाभारत एवं गीता आदि महान् ग्रंथ इस देश को एक सांस्कृतिक राष्ट्र बनाते थे। इस समय के भारत में हिन्दू धर्म की शैव, शाक्त तथा वैष्णव शाखाएं विभिन्न उपशाखाओं में विभक्त हो रही थीं तथा उनका बिखराव अपने चरम पर था। बौद्धधर्म का भारत में नाश हो चुका था किंतु शैवों और बौद्धों के मिश्रण से नाथ सम्प्रदाय से लेकर विभिन्न तांत्रिक मत, कापालिक एवं अघोर सम्प्रदाय आदि जन्म ले चुके थे। जैन धर्म दक्षिण भारत तथा पश्चिम के मरुस्थल में जीवित था तथा दूसरे धर्मों एवं सम्प्रदायों से असम्पृक्त रहकर अपने अलग स्वरूप में फल-फूल रहा था। यद्यपि दक्षिण भारत के आलवार, शंकराचार्य एवं रामानुजाचार्य जैसे गुरुओं ने भारत की सांस्कृतिक आत्मा के पुनर्जागरण के राष्ट्रव्यापी अभियान चलाए थे तथापि भारत के सहज विश्वासी और सरल लोग पाखण्डियों के चक्करों में फंस चुके थे और प्रजा को इस भंवर से निकालने के लिए वैष्णव संतों और भक्त कवियों के धरती पर आने में अभी कुछ समय शेष था। मुहम्मद गौरी के आक्रमणों के समय सिंध, मुल्तान और पंजाब के अधिकांश क्षेत्र गजनी के मुसलमानों के अधिकार में थे तथा वहाँ अलग-अलग मुस्लिम शासक शासन कर रहे थे।

रावी नदी के पूर्व में भी बहुत से दुर्ग गजनी के मुसलमानों के अधीन हो गए थे जिनमें हांसी से लेकर लाहौर तथा कांगड़ा तक के दुर्ग सम्मिलित थे। जिस समय मुहम्मद गौरी गजनी का शासक हुआ, उस समय उत्तर भारत में चार प्रमुख हिन्दू राजा शासन कर रहे थे-

(1.) दिल्ली तथा अजमेर में चौहान वंश का राजा पृथ्वीराज तृतीय (ई.1179-92),

(2.) कन्नौज में गहड़वाल वंश का राजा जयचंद (ई.1170-94),

(3.) बिहार में पाल वंश का राजा पालपाल (ई.1165-1200)

(4.) बंगाल में सेन वंश का राजा लक्ष्मण सेन (ई.1178-1206)

इनके साथ ही मध्य चेदि में कलचुरि वंश, मालवा में परमार वंश, गुजरात में चौलुक्य वंश, बदायूं में राष्ट्रकूट वंश सहित अनेक राजपूत वंश छोटे-छोटे राज्यों के स्वामी थे। इन राज्यों में परस्पर फूट थी तथा वे परस्पर संघर्षों में व्यस्त थे। पृथ्वीराज तथा जयचंद में वैमनस्य था। दक्षिण भारत भी बुरी तरह बिखरा हुआ था। देवगिरि में यादव, वारांगल में काकतीय, द्वारसमुद्र में होयसल तथा मदुरा में पाण्ड्य वंश का शासन था। ये राज्य भी परस्पर युद्ध करके एक दूसरे को नष्ट करके अपनी आनुवांशिक परम्परा निभा रहे थे।

सिंध, मुलतान तथा पंजाब में मुस्लिम शासित क्षेत्रों में इस्लाम का प्रसार हो गया था। वहाँ हिन्दुओं को बल-पूर्वक इस्लाम स्वीकार करवाया जा रहा था। जो लोग मुसलमान नहीं बनना चाहते थे, उन्हें या तो उस क्षेत्र से पलायन करना पड़ रहा था अथवा वे भारी भू-राजस्व एवं जजिया आदि कर देकर निर्धनता को प्राप्त कर रहे थे।

सामाजिक दृष्टि से भी इस काल में भारत की दशा बहुत शोचनीय थी। समाज का प्रायः नैतिक पतन हो चुका था। शत्रु से देश की रक्षा और युद्ध का समस्त भार अब भी राजपूत जाति पर था, शेष प्रजा इससे उदासीन थी। हिन्दू शासकों को द्वेष, अहंकार तथा विलास-प्रियता के घुन खाए जा रहे थे। राष्ट्रीय उत्साह पहले की ही भांति विलुप्त था। कुछ शासकों में देश तथा धर्म के लिए मर मिटने का उत्साह था किंतु वे परस्पर फूट का शिकार थे। स्त्रियों की सामाजिक दशा, उत्तर वैदिक काल की अपेक्षा काफी गिर चुकी थी।

इस प्रकार मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय भारत की जैसी स्थिति थी उसे देखते हुए भारत को गुलाम बना लेना, उसकी संस्कृति को उखाड़ फैंकना, उसकी प्रजा को सदा के लिए विपन्न बना देना मुहम्मद गौरी जैसे प्रबल विदेशी आक्रांता के लिए बहुत आसान नहीं था तो बहुत कठिन भी नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मद गौरी ने भारत के समस्त मुस्लिम अमीरों के राज्य छीन लिए (33)

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मुहम्मद गौरी ने भारत के समस्त मुस्लिम अमीरों के राज्य छीन लिए

जिस समय मुहम्मद गौरी ने भारत की ओर रुख किया, भारत राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से बिखरा हुआ था। यद्यपि महमूद गजनवी भारत की आर्थिक सम्पदा को बड़े स्तर पर लूटने में सफल रहा था तथापि उसने जो कुछ भी लूटा था, वह भारत की समृद्धि का शतांश भी नहीं था, सहस्रांश भी नहीं था।

सिंधु और सरस्वती से लेकर रावी, व्यास, चिनाब, झेलम, गंगा, यमुना, गोमती, नर्मदा, कृष्णा और कावेरी जैसी सैंकड़ों नदियां युगों-युगों से भारत भूमि को सम्पन्न बना रही थीं। अकेले महमूद के वश की बात नहीं थी कि वह भारत की उस अपार सम्पदा को लूट ले।

यदि रावी से हिन्दूकुश पर्वत तक का वह क्षेत्र जो गजनी के मुसलमानों के अधीन चला गया था, उसे छोड़ दें तो शेष भारत में कृषि, शिल्प, उद्योग एवं व्यापार पहले की ही तरह उन्नत अवस्था में थे। जन-साधारण सुखी था और राजवंश धनी थे। मुहम्मद गौरी की दृष्टि इन हिन्दू राज्यों एवं हिन्दू प्रजा पर गढ़ी हुई थी किंतु भारत के हिन्दुओं पर हाथ डालने से पहले उसने मुल्तान तथा सिंध क्षेत्र के मुस्लिम अमीरों के राज्य छीनने का निश्चय किया।

मुहम्मद गौरी का भारत पर पहला आक्रमण ई.1175 में मुल्तान पर हुआ। मुल्तान पर उस समय शिया मुसलमान करमाथियों का शासन था। गौरी ने करमाथियों को परास्त करके मुल्तान पर अधिकार कर लिया। उसी वर्ष गौरी ने ऊपरी सिंध के कच्छ क्षेत्र पर आक्रमण किया तथा उसे अपने अधिकार में ले लिया।

कुछ मुस्लिम ग्रंथों में लिखा है कि उस काल में सिंध क्षेत्र में स्थित ‘उच’ में एक भाटी राजा राज्य करता था। मुहम्मद शिहाबुद्दीन गौरी ने उसकी रानी को प्रलोभन देकर अपनी तरफ मिला लिया। उस रानी ने अपने पति को विष देकर मार डाला तथा किले पर मुहम्मद शिहाबुद्दीन गौरी का अधिकार करवा दिया। आधुनिक शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि बारहवीं शताब्दी ईस्वी में सिंध के रेगिस्तान में स्थित ‘उच’ नामक स्थान पर किसी भी भाटी शासक का शासन नहीं था। उस समय यह किला एक करमाथी मुसलमान के अधीन था। अतः यह पूरी घटना ही मनगढ़ंत है।

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सिंध पर आक्रमण के बाद पूरे 7 साल तक मुहम्मद भारत से दूर रहा। संभवतः इस अवधि में वह ख्वाज्मि के बादशाह से लड़ने में व्यस्त रहा। उससे निबटने के बाद ई.1182 में मुहम्मद ने एक बार फिर से भारत की ओर रुख किया तथा निचले सिंध क्षेत्र पर आक्रमण किया। उन दिनों निचले सिंध में देवल का राज्य स्थित था जिस पर शिया सम्प्रदाय के ‘सुम्र’ मुसलमान शासन करते थे। इन्हीं सुम्र मुसलमानों को ढोला-मारू की कथा में ‘सुमरा’ कहा गया है। मुहम्मद गौरी ने सुमरा मुसलमानों को अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया।

मुहम्मद गौरी का अगला आक्रमण ई.1178 में गुजरात के चौलुक्य राज्य पर हुआ जो उस समय एक धनी राज्य था। गुजरात पर इस समय मूलराज (द्वितीय) शासन कर रहा था। उसकी राजधानी अन्हिलवाड़ा थी। चौलुक्यों ने कुछ ही साल पहले मालवा के परमारों एवं चित्तौड़ के गुहिलों से उनके राज्य के अधिकांश भाग छीनकर अपनी शक्ति बहुत बढ़ा ली थी।

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मुहम्मद गौरी मुल्तान, कच्छ और पश्चिमी राजपूताना में होकर आबू के निकट पहुंचा। वहाँ कयाद्रा गांव के निकट मूलराज (द्वितीय) की सेना से उसका युद्ध हुआ। इस युद्ध में गौरी बुरी तरह परास्त होकर अपनी जान बचाकर भाग गया। यह भारत में उसकी पहली पराजय थी। गुजरात में मिली पराजय से मुहम्मद गौरी इतना आतंकित हो गया कि अगले बीस साल तक उसने गुजरात पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं की। गुजरात में पराजय का स्वाद चखने के बाद गौरी ने स्वयं को पंजाब पर केन्द्रित करने का निश्चय किया तथा ई.1179 में पेशावर पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। उसके दो साल बाद ई.1181 में गौरी ने लाहौर पर आक्रमण किया। उन दिनों गजनी का पूर्व शासक खुसरव शाह लाहौर में निवास करता था। खुसरव शाह ने मुहम्मद गौरी को विपुल धन देकर उससे संधि कर ली तथा अपना पुत्र जमानत के तौर पर शिहाबुद्दीन गौरी की सेवा में भेज दिया। ई.1185 में गौरी ने पंजाब पर तीसरा आक्रमण किया तथा सियालकोट तक का प्रदेश जीत लिया। उसने सियालकोट दुर्ग पर अधिकार करके उसकी मरम्मत करवाई तथा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को लूटकर अपनी शक्ति का परिचय दिया।

इस पर लाहौर के शासक खुसरव शाह ने नमक की पहाड़ियों के निकट रहने वाली खोखर जाति से मित्रता कर ली। खोखर उन दिनों हिन्दू हुआ करते थे। वे बड़े वीर एवं युद्धप्रिय लोग थे। वर्तमान समय में उत्तरी भारत में खोखर जाट एवं खोखर राजपूत पाए जाते हैं। हरियाणा की तरफ के खोखर जाट हैं जबकि राजस्थान की तरफ के खोखर राजपूत हैं। राजस्थान में हजारों खोखर मुसलमान भी निवास करते हैं।

जिस समय गौरी ने सियालकोट पर आक्रमण किया, उस समय खोखरों तथा जम्मू के राजा चक्रदेव के बीच शत्रुता चल रही थी। अतः खोखरों ने खुसरव शाह से दोस्ती का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

खुसरव शाह तथा खोखरों की सम्मिलित सेना ने सियालकोट को घेर लिया किंतु मुहम्मद गौरी की सेना ने खुसरव शाह तथा खोखरों की सेना को मार भगाया। इस पर ई.1186 में मुहम्मद गौरी ने पुनः लाहौर पर आक्रमण किया। मुहम्मद गौरी ने जम्मू के राजा चक्रदेव के पास मित्रता का प्रस्ताव भेजा। चूंकि जम्मू घाटी में रहने वाले खोखर जो कि चक्रदेव के शत्रु थे, खुसरव शाह से मिल गए, इसलिए चक्रदेव ने मुहम्मद गौरी से मित्रता करने में भलाई समझी तथा उसने अपनी एक सेना मुहम्मद गौरी की सहायता के लिए भेज दी।

जब मुहम्मद गौरी लाहौर के निकट पहुंचा तो उसने लाहौर के शासक खुसरव शाह को संधि करने के बहाने अपने शिविर में आमंत्रित किया। जब खुसरव शाह मुहम्मद गौरी के शिविर में गया तो मुहम्मद गौरी ने छल से उसे बंदी बना लिया तथा ‘गरजिस्तान’ नामक स्थान पर एक दुर्ग में बंद कर दिया। ‘गरजिस्तान’ को आजकल ‘गिलगिस्तान’ कहते हैं। पूरे छः साल तक खुसरव शाह को इस दुर्ग में बंदी रखा गया। ई.1192 में मुहम्मद गौरी की आज्ञा से उसकी हत्या कर दी गई।

इस प्रकार भारत के समस्त मुस्लिम अमीरों के राज्य मुहम्मद शिहाबुद्दीन गौरी के अधीन आ गए। मुहम्मद ने उनके स्थान पर अपने गुलामों को वहाँ का शासक नियुक्त किया। ये मुस्लिम राज्य मुहम्मद के लिए भारत में आधार शिविर का कार्य करने लगे जहाँ से वह अपने आगे के अभियान चला सकता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पराजय की पीड़ा छिपाने का प्रयास किया भारतीयों ने (34)

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पराजय की पीड़ा छिपाने का प्रयास किया भारतीयों ने

पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच 21 लड़ाइयां हुईं जिनमें चौहान विजयी रहे। स्पष्ट है कि भारतीयों ने झूठ बोलकर पराजय की पीड़ा छिपाने का प्रयास किया!

मुहम्मद गौरी ने भारत में अपना रास्ता साफ करने के लिए हिन्दू राजाओं पर हाथ डालने से पहले भारत में स्थित मुस्लिम अमीरों के राज्य छीन लिए। करमाथी मुसलमानों, सुमरा मुसलमानों तथा लाहौर के गजनवियों का सफाया करने के बाद मुहम्मद गौरी मुल्तान, सिंध तथा पंजाब क्षेत्र का स्वामी बन गया।

पंजाब पर अधिकार कर लेने से मुहम्मद गौरी के क्षेत्र की सीमा दिल्ली एवं अजमेर के चौहान साम्राज्य से जा लगी। इस समय सोमेश्वर का पुत्र पृथ्वीराज (तृतीय) चौहानों का राजा था। भारत के इतिहास में उसे पृथ्वीराज चौहान तथा रायपिथौरा कहा जाता है। वह ई.1179 में केवल 11 वर्ष की आयु में सम्राट बना था।

ई.1175 से मुहम्मद गौरी भारत पर निरंतर आक्रमण कर रहा था किंतु पृथ्वीराज चौहान ने उसकी ओर ध्यान न देकर, अपने साम्राज्य की सीमाओं पर स्थित हिन्दू राजाओं का दमन करके अपने राज्य का विस्तार करने में लगा रहा। पृथ्वीराज ने नागों, भण्डानकों तथा चंदेलों का दमन किया। पृथ्वीराज ने गहड़वालों की राजकुमारी संयोगिता का अपहरण करके उन्हें अपना शत्रु बना लिया तथा गुजरात के चौलुक्यों से अपने वंशानुगत झगड़े को चरम पर पहुंचा दिया।

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उस काल में अजमेर के चौहानों की ही तरह अन्हिलवाड़ा के चौलुक्य भी परमारों तथा गुहिलों के राज्यों को क्षति पहुंचाकर अपना क्षेत्र बढ़ाने में लगे हुए थे। इन समस्त युद्धों के परिणाम स्वरूप चौहानों तथा चौलुक्यों के राज्य तो दूर-दूर तक फैल गए किंतु हिन्दू वीरों की भयानक क्षति होने से राष्ट्र दुर्बल हो गया। सम्राट पृथ्वीराज चौहान यद्यपि वीर, शक्तिशाली एवं युद्ध-प्रिय राजा था तथापि वह इस बात को समझने में विफल रहा कि मुहम्मद गौरी के रूप में कितनी भयानक विपत्ति देश एवं धर्म के समक्ष मुँह बाए खड़ी है।

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राजा पृथ्वीराज चौहान ने हिन्दू राजाओं का संगठन खड़ा करने की बजाय उनसे शत्रुता बढ़ाने का अदूरदर्शी कार्य किया। यह अदूरदर्शिता हजारों साल से भारत वर्ष के राजाओं में चली आ रही थी। वे रक्त-रंजित युद्धों के माध्यम से अपने-अपने राज्य का प्रसार करते थे किंतु इस प्रयास में अपनी सेना, हिन्दू धर्म एवं भारत राष्ट्र की अजेय शक्ति का क्षय करते थे। जब पृथ्वीराज चौहान का राज्य अजमेर से बढ़कर दिल्ली होता हुआ पंजाब के भटिण्डा, सरहिंद तथा उसके आगे के क्षेत्रों में भी फैल गया तो मुहम्मद गौरी की सीमाएं उसके राज्य तक आ पहुँचीं। पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच 21 लड़ाइयां हुईं जिनमें चौहान विजयी रहे। हम्मीर महाकाव्य ने पृथ्वीराज द्वारा 7 बार गौरी को परास्त किया जाना लिखा है। पृथ्वीराज प्रबन्ध 8 बार हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का उल्लेख करता है। प्रबन्ध कोष का लेखक 20 बार गौरी को पृथ्वीराज द्वारा कैद करके मुक्त करना बताता है। सुर्जन चरित्र में 21 बार और प्रबन्ध चिन्तामणि में 23 बार गौरी का हारना अंकित है। इस प्रकार भारतीय लेखक झूठ पर झूठ बोलते रहे और पराजय की पीड़ा छिपाने के लिए मुहम्मद गौरी की काल्पनिक पराजयों को अपनी पुस्तकों में अंकित करते रहे।

पराजय की पीड़ा छिपाने का यह प्रयास ठीक वैसा ही था जिस प्रकार कबूतर बिल्ली पर अपनी विजयों के दावे करता रहे और बिल्ली आकर कबूतर को दबोच ले! झूठ बोलकर न पराजय छिपाई जा सकती है और न पराजय की पीड़ा!

इस बात में कोई संदेह नहीं कि मुहम्मद गौरी तथा पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं के बीच चौहान साम्राज्य की सीमाओं पर कई बार झड़पें हुई होंगी जिनमें मुहम्मद गौरी की सेनाएं हारी होंगी किंतु प्रबंध कोष द्वारा यह लिखना कि पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी को इक्कीस बार कैद करके मुक्त किया, अत्यंत ही संदेहास्पद जान पड़ता है।

अपने शत्रु को 20 बार कैद करके मुक्त किया जाना जाना सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों ही दृष्टि से गलत एवं हास्यास्पद प्रतीत होता है। अब तक प्राप्त विश्वसनीय उल्लेखों के अनुसार ई.1189 में मुहम्मद गौरी ने पहली बार पृथ्वीराज चौहान के राज्य में प्रवेश किया तथा भटिण्डा के दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

भटिण्डा का दुर्ग पृथ्वीराज (द्वितीय) के समय से अजमेर राज्य के अधीन था किंतु पृथ्वीराज (तृतीय) ने दुर्ग के छिन जाने पर भी मुहम्मद गौरी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की। संभवतः पृथ्वीराज चौहान उस समय किसी अन्य अभियान में व्यस्त था।

मुहम्मद गौरी ने भटिण्डा दुर्ग में जियाउद्दीन नामक एक काजी को दुर्गपति नियुक्त कर दिया। इस प्रकार चौहानों के विरुद्ध यह पहला हमला था जिसमें मुहम्मद गौरी ने विजय प्राप्त की थी। यह हमला धोखे से किया गया था तथा मुहम्मद गौरी इस विजय के उपरांत भी यह समझता था कि चौहानों की वास्तविक शक्ति इतनी अधिक है कि मुहम्मद गौरी के लिए यह संभव नहीं है कि वह भटिण्डा से आगे बढ़कर दिल्ली या अजमेर तक पहुंच सके। अतः वह वापस गजनी लौट गया।       

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा धीर पुण्ढीर ने मुहम्मद गौरी को जीवित ही पकड़ लिया (35)

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राजा धीर पुण्ढीर ने मुहम्मद गौरी को जीवित ही पकड़ लिया

कवि चंद बरदाई ने पृथ्वीराज रासो में लिखा है कि राजा धीर पुण्ढीर ने मुहम्मद गौरी को पकड़ लिया। कवि चंद बरदाई ने यह भी लिखा है कि पृथ्वीराज ने हाथी, घोड़े एवं स्वर्ण लेकर मुहम्मद गौरी को मुक्त कर दिया।

ई.1189 में मुहम्मद गौरी ने भटिण्डा दुर्ग पर आक्रमण करके उस पर छल-पूर्वक अधिकार कर लिया। यह दुर्ग पृथ्वीराज चौहान के अधीन था। पृथ्वीराज चौहान ने उस समय कोई कार्यवाही नहीं की।

वह संभवतः किसी अन्य अभियान में संलग्न था। ई.1191 में मुहम्मद गौरी ने भारत पर पुनः आक्रमण किया तथा पंजाब में स्थित सरहिंद के दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया। इस पर पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं ने करनाल जिले में स्थित तराइन के मैदान में मुहम्मद गौरी का रास्ता रोका।

यह लड़ाई भारत के इतिहास में ‘तराइन की पहली लड़ाई’ के नाम से प्रसिद्ध है। युद्ध के मैदान में गौरी का सामना दिल्ली के राजा गोविंदराय तोमर से हुआ जो पृथ्वीराज चौहान के अधीन सामंत था तथा पृथ्वीराज का निकट सम्बन्धी भी था।

इस युद्ध के सम्बन्ध में अलग-अलग और विरोधाभासी तथ्य मिलते हैं। हिन्दू ग्रंथों एवं मुस्लिम ग्रंथों के विवरणों में काफी अंतर है। कुछ मुस्लिम ग्रंथों के अनुसार जब युद्ध क्षेत्र में पृथ्वीराज चौहान की सेना भारी पड़ने लगी तो मुहम्मद गौरी की सेना युद्ध के मैदान से भाग छूटी।

सेना को भागते हुए देखकर मुहम्मद गौरी राजपूत सेना के हरावल को चीरता हुआ गोविंदराज तक जा पहुंचा तथा अपना घोड़ा उस पर कुदा कर भाले से वार कर दिया जिससे राजा गोविंदराज के दो दांत टूट गए। इस पर गोविंदराज ने सांग फैंकी जिससे गौरी की बांह में घाव हो गया। 

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‘तबकात ए नासिरी’ में लिखा है कि राजा गोविंदराज के वार से मुहम्मद गौरी घायल होकर घोड़े से गिर गया और अत्यधिक रक्त बह जाने से बेसुध हो गया। तबकात ए नासिरी की अलग-अलग प्रतियों में मिले वर्णनों में भी अंतर है। इस ग्रंथ की एक प्रति में कहा गया है कि मुहम्मद को घायल हुआ देखकर एक खिलजी नवयुवक फुर्ती से मुहम्मद के घोड़े पर सवार होकर गौरी को युद्ध के मैदान से बाहर ले गया।

एक अन्य ग्रंथ में लिखा है कि खिलजी सैनिक सुल्तान को अपने घोड़े पर बैठाकर बाहर ले गया। एक अन्य ग्रंथ में लिखा है कि खिलजी सैनिक अपने सुल्तान को युद्ध के मैदान से घसीटते हुए बाहर खींच ले गया।

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‘तबकात ए नासिरी’ की एक अन्य प्रति में लिखा है कि जब यवन सेना भागकर सुरक्षित स्थान पर पहुंची और उसने सुल्तान को अपने साथ नहीं पाया तो वह विलाप करने लगी। ‘जैन उल मासरी’ नामक ग्रंथ में लिखा है कि मुहम्मद गौरी को उसकी सेना ने गिरते हुए नहीं देखा इसलिए कोई भी गौरी की सहायता के लिए नहीं पहुंचा। रात भर गौरी युद्ध के मैदान में बेसुध पड़ा रहा। बाद में तुर्की गुलाम आए और उठाकर ले गए। इन समस्त वृत्तांतों पर यदि विचार किया जाए तो ऐसा लगता है कि मुहम्मद गौरी युद्ध में घायल हुआ था और उसकी सेना युद्ध के मैदान छोड़कर भाग गई थी। एक खिलजी सैनिक द्वारा मुहम्मद को पृथ्वीराज की सेना के बीच में से लेकर निकल भागने की संभवना बहुत ही क्षीण है। अवश्य ही मुहम्मद गौरी पकड़ा गया होगा, जैसा कि हिन्दू ग्रंथ लिखते हैं। कवि चंद बरदाई ने पृथ्वीराज रासो में लिखा है कि राजा धीर पुण्ढीर ने मुहम्मद गौरी को पकड़ लिया। कवि चंद बरदाई ने यह भी लिखा है कि पृथ्वीराज ने हाथी, घोड़े एवं स्वर्ण लेकर मुहम्मद गौरी को मुक्त कर दिया। प्रबंध कोष कहता है कि पृथ्वीराज ने गौरी को पकड़ कर छोड़ दिया। प्रबंध चिंतामणि भी इसकी पुष्टि करता है। हम्मीर महाकाव्य में लिखा है कि गौरी के क्षमा-याचना करने पर पृथ्वीराज ने दया करके उसे छोड़ दिया।

कुछ जैन ग्रंथों में लिखा है कि अपनी माता कर्पूरदेवी के कहने पर पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी को मुक्त कर दिया। फरिश्ता ने लिखा है कि राजपूतों ने गौरी की भागती हुई सेना का चालीस मील तक पीछा किया। मुहम्मद गौरी बुरी तरह भयभीत हो गया फिर भी लाहौर तक पहुंच गया। लाहौर में उसने अपने घावों का उपचार करवाया। इसके पश्चात् वह गजनी लौट गया। मिनहाज उस् सिराज लिखता है कि विजय के बाद राजपूत सेना पृथ्वीराज के नेतृत्व में आगे बढ़ी और तबरहिंद अर्थात् सरहिंद के किले पर पुनः अधिकार कर लिया जिसे शहाबुद्दीन ने राजपूतों से छीना था।

तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकार जमीउल हिकायत और हसन निजामी तराइन के प्रथम युद्ध का उल्लेख नहीं करते हैं, इससे स्पष्ट होता है कि इस युद्ध में मुहम्मद गौरी को पराजय के साथ-साथ अत्यंत शर्मिंदगी भी उठानी पड़ी थी। जब सम्राट पृथ्वीराज की सेना ने आगे बढ़कर तबरहिंद का दुर्ग घेर लिया तो मुहम्मद गौरी के अमीर काजी जियाउद्दीन ने चौहन सेना का डटकर मुकाबला किया तथा 13 महीने तक हिन्दुओं को दुर्ग में नहीं घुसने दिया।

अंत में हिन्दुओं ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया तथा काजी जियाउद्दीन को पकड़कर अजमेर लाया गया। काजी ने पृथ्वीराज के मंत्रियों के समक्ष प्रस्ताव रखा कि यदि उसे मुक्त करके गजनी जाने की अनुमति दी जाए तो वह सम्राट को विपुल धन प्रदान करेगा। काजी का यह अनुरोध स्वीकार कर लिया गया तथा उससे धन लेकर उसे गजनी जाने की अनुमति दे दी गई।

इसमें कोई संदेह प्रतीत नहीं होता कि तराइन की पहली लड़ाई में राजा धीर पुण्ढीर ने मुहम्मद गौरी को जीवित ही पकड़ लिया था किंतु मुहम्मद गौरी द्वारा क्षमा याचना किए जाने पर पृथ्वीराज चौहान ने उसे जीवित ही छोड़ दिया था। इसी प्रकार काजी जियाउद्दीन भी पकड़कर अजमेर लाया गया होगा और दण्डराशि लेकर जीवित ही छोड़ दिया गया होगा!

संभवतः इन्हीं दो घटनाओं को पृथ्वीराज रासो, हम्मीर महाकाव्य, पृथ्वीराज प्रबन्ध, सुर्जन चरित्र तथा प्रबन्ध चिन्तामणि आदि ग्रंथों में पृथ्वीराज चौहान द्वारा मुहम्मद गौरी को अनेक बार परास्त करके बंदी बनाए जाने एवं क्षमा करके मुक्त किए जाने जैसी बातें लिखी हैं। इनमें से पहले घटना तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद को बंदी बनाए जाने की है तथा दूसरी घटना सरहिंद के दुर्ग में काजी को बंदी बनाए जाने की है।

भारतीय इतिहासकारों ने पृथ्वीराज द्वारा मुहम्मद गौरी को 20-21 बार हराने और बंदी बनाकर छोड़ने जैसी बातें लिखकर इस पूरे प्रकरण को संदेहास्पद बना दिया। कोई युद्धनीति यह नहीं कहती कि शत्रु को तब तक बंदी बनाकर मुक्त करते रहो जब तक कि वह तुम्हें ही पकड़ कर नहीं मार डाले! न पृथ्वीराज ने ऐसा किया होगा!

यह मिथक पृथ्वीराज रासो नामक ग्रंथ की उपज है जिसे बाद में अन्य हिन्दू लेखकों ने भी बढ़ा-चढ़ा कर लिख दिया क्योंकि पृथ्वीराज रासो पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच 21 लड़ाइयों का उल्लेख करता है जिनमें चौहान विजयी रहे किंतु वह पृथ्वीराज द्वारा मुहम्मद गौरी को केवल एक बार बंदी बनाए जाने का उल्लेख करता है। इस प्रकार के मिथ्या वर्णनों के कारण राजा धीर पुण्ढीर जैसे महान् वीरों की वीरता समाज के सामने नहीं आ पाती!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पृथ्वीराज चौहान के मंत्री और सेनापति मुहम्मद गौरी से मिल गए (36)

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पृथ्वीराज चौहान के मंत्री और सेनापति मुहम्मद गौरी से मिल गए

ऐतिहासिक तथ्य इस कड़वी सच्चाई की पुष्टि करते हैं कि पृथ्वीराज चौहान के मंत्री और सेनापति मुहम्मद गौरी से मिल गए जिनके कारण पृथ्वीराज चौहान तराइन की दूसरी लड़ाई हार गया।

मुहम्मद गौरी तराइन के युद्ध में घायल होकर राजा धीर पुण्ढीर के हाथों पकड़ लिया गया तथा सम्राट पृथ्वीराज चौहान को विपुल धन देकर बंदीगृह से छूट गया तथा फिर से गजनी चला गया। गजनी पहुँचने के बाद पूरे एक साल तक मुहम्मद गौरी अपनी सेना में वृद्धि करता रहा। जब उसकी सेना में 1,20,000 सैनिक जमा हो गए तो ई.1192 में वह पुनः सम्राट पृथ्वीराज चौहान से लड़ने के लिए भारत की ओर चल दिया।

‘तबकात ए नासिरी’ नामक ग्रंथ के अनुसार शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी को कन्नौज तथा जम्मू के राजाओं द्वारा सैन्य सहायता भी उपलब्ध करवाई गई किंतु किसी भी समकालीन इतिहास ग्रंथ में तराइन के द्वितीय युद्ध में राजा जयचन्द गाहड़वाल की किसी भी तरह की भूमिका के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। यहाँ तक कि मुहम्मद गौरी के दरबारी लेखक हसन निजामी ने भी अपने ग्रंथों में इस बात का कोई उल्लेख नहीं किया है।

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बीसवीं शताब्दी ईस्वी में अजमेर का इतिहास लिखने वाले लेखक हर बिलास शारदा ने तबकात ए नासिरी नामक ग्रंथ के आधार पर लिखा है कि कन्नौज के राठौड़ों तथा गुजरात के सोलंकियों ने एक साथ षड़यंत्र करके पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए शहाबुद्दीन को आमंत्रित किया। वस्तुतः हर बिलास शारदा ने यहाँ एक साथ कई गलतियां की हैं। कन्नौज के शासक राठौड़ नहीं थे, गाहड़वाल थे। दूसरी गलती यह कि कन्नौज की सेना इस युद्ध से पूरी तरह दूर रही। ऐसी स्थिति में मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण करने हेतु आमंत्रित करने वाली बात कैसे स्वीकार की जा सकती है!

तीसरी गलती यह है कि शारदा ने गुजरात के सोलंकियों को भी इस षड़यंत्र में शामिल कर लिया है। गुजरात के सोलंकी तो ई.1178 में ही मुहम्मद गौरी को पीटकर भगा चुके थे तथा उसके बाद से मुहम्मद ने गुजरात की बजाय पंजाब पर अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया था। ऐसी स्थिति में गुजरात के चौलुक्यों को क्या आवश्यकता थी कि वे मुहम्मद के साथ षड़यंत्र में सम्मिलित होते!

चौथी गलती यह कि जब गुजरात के चौलुक्यों ने इस युद्ध में भाग ही नहीं लिया तो उनके द्वारा गौरी को आमंत्रित करने की बात कैसे स्वीकार की जा सकती है? पांचवी गलती यह कि जब मुहम्मद गौरी लगभग प्रतिवर्ष भारत पर आक्रमण कर रहा था, तब इस आक्रमण के लिए उसे कन्नौज द्वारा आमंत्रित किए जाने की क्या आवश्यकता आन पड़ी थी!

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वस्तुतः तबकात ए नासिरी का लेखक मिनहाजुद्दीन सिराज, मुहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद दिल्ली में स्थापित दिल्ली सल्तनत के अधीन दिल्ली का शहर-काजी था, उसने दिल्ली के सुल्तानों को खुश करने के लिए अपने ग्रंथ में यह मिथ्या बात लिखी। काजी मिनहाजुद्दीन सिराज की बात का विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि इसकी पुष्टि किसी भी समकालीन स्रोत से नहीं होती है किंतु दुर्भाग्य से हर बिलास शारदा ने इसे अपने ग्रंथ में उद्धृत कर दिया और तभी से भारत में ये धारणाएं प्रचलित हो गईं कि कन्नौज का राजा राठौड़ था और उसने देश के साथ गद्दारी करके मुहम्मद गौरी को देश पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। वस्तुतः सम्राट उसे धोखा कन्नौज या गुजरात के शासकों ने नहीं दिया था, उसे धोखा पृथ्वीराज चौहान के मंत्री एवं सेनापतियों ने दिया था जो सम्राट पृथ्वीराज से नाराज थे। जब मुहम्मद गौरी लाहौर पहुँचा तो उसने किवाम उल मुल्क को अपने दूत के रूप में अजमेर भेजकर सम्राट पृथ्वीराज से कहलवाया कि वह इस्लाम स्वीकार कर ले और गौरी की अधीनता मान ले। पृथ्वीराज ने गौरी को प्रत्युत्तर भिजवाया कि वह गजनी लौट जाए अन्यथा युद्ध-क्षेत्र में भेंट करने के लिए तैयार रहे।

मुहम्मद गौरी, पृथ्वीराज को छल से जीतना चाहता था। इसलिए गौरी ने अपना दूत दुबारा अजमेर भेजकर कहलवाया कि मैं युद्ध की अपेक्षा सन्धि को अच्छा मानता हूँ, इसलिए मैंने एक दूत अपने भाई के पास गजनी भेजा है। ज्योंही गजनी से आदेश प्राप्त हो जाएंगे, मैं स्वदेश लौट जाऊंगा तथा पंजाब, मुल्तान एवं सरहिंद को लेकर संतुष्ट हो जाऊँगा।

इस संधि वार्त्ता ने पृथ्वीराज को भ्रम में डाल दिया। फिर भी पृथ्वीराज कोई संकट मोल नहीं लेना चाहता था इसलिए वह स्वयं सेना लेकर तराइन पहुंचा। सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी के लेखक फरिश्ता ने लिखा है कि राजा पृथ्वीराज अपने साथ पांच लाख घुड़सवार तथा तीन हजार हाथी लेकर युद्ध के मैदान में पहुंचा। यह संख्या बहुत अधिक है, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

विभिन्न लेखकों के अनुसार उस समय सम्राट के पास बहुत कम सेना थी। अधिकतर सेना पृथ्वीराज चौहान के मंत्री स्कंद के साथ थी किंतु वह सम्राट के साथ युद्धक्षेत्र में नहीं जा सकी। इस पर राजा पृथ्वीराज अपने साथ उपलब्ध सेना को लेकर तराइन की ओर बढ़ा।

पृथ्वीराज का दूसरा सेनाध्यक्ष उदयराज भी समय पर अजमेर से रवाना नहीं हो सका। पृथ्वीराज चौहान के मंत्री सोमेश्वर ने इस युद्ध का विरोध किया था और कुछ समय पूर्व ही पृथ्वीराज द्वारा दण्डित किया गया था, वह अजमेर से रवाना होकर शत्रु से जा मिला।

जब राजा पृथ्वीराज की सेना तराइन के मैदान में पहुँची तो भी संधिवार्त्ता के भुलावे में पड़ी रही। उधर मुहम्मद गौरी ने अपनी सेना के पांच भाग किए। चार भागों को भारतीय सेना पर चारों ओर से आक्रमण करने का काम सौंपा गया तथा एक बड़ा हिस्सा आरक्षित रखा गया ताकि संकट के समय काम आ सके अथवा पृथ्वीराज की भागती हुई सेना की हत्या कर सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पृथ्वीराज चौहान का शिविर बूचड़खाने में बदल दिया मुहम्मद गौरी ने (37)

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पृथ्वीराज चौहान का शिविर बूचड़खाने में बदल दिया मुहम्मद गौरी ने

तराइन की दूसरी लड़ाई में जिस समय हिन्दू सेना इस विश्वास के साथ अपने शिविर में रात्रि विश्राम कर रही थी कि संधि हो चुकी है और अब युद्ध नहीं होगा, उस समय मुहम्मद गौरी ने अचानक ही हमला करके हिन्दू सैनिकों को काट दिया और पृथ्वीराज चौहान का शिविर बूचड़खाने में बदल दिया।

मुहम्मद गौरी द्वारा संधिवार्त्ता का भुलावा देने पर भी पृथ्वीराज चौहान अपनी सेना लेकर तराइन के मैदान में आ गया। यद्यपि चौहान सम्राट के साथ बहुत कम सेना युद्धक्षेत्र में पहुंची थी तथापि मुहम्मद गौरी जानता था कि यदि सम्मुख युद्ध होता है तो यह हिन्दू सेना मुहम्मद गौरी की सेना पर भारी पड़ेगी। इसलिए मुहम्मद गौरी ने कई प्रकार के छल रचे तथा पृथ्वीराज के कुछ मंत्रियों एवं सेनापतियों को अपनी ओर मिला लिया जिनका विवरण हम पिछले आलेख में कर चुके हैं।

मुहम्मद गौरी के समकालीन लेखक हसन निजामी की पुस्तक ‘ताजुल मासिर’ को इस युद्ध का आँखों देखा हाल माना जा सकता है क्योंकि वह स्वयं मुहम्मद गौरी के साथ था किंतु आधुनिक शोधों से स्पष्ट हो चुका है कि हसन निजामी निष्पक्ष नहीं था। उसने तथ्यों एवं घटनाओं को बहुत तोड़-मरोड़कर एवं बढ़ा-चढ़ाकर लिखा है।

चंदबरदाई के ग्रंथ ‘पृथ्वीराज रासो’ को भी आँखों देखा हाल माना जा सकता है क्योंकि इसका लेखक युद्धक्षेत्र में पृथ्वीराज के साथ था किंतु इस पुस्तक में बाद में इतना अधिक लेखन जोड़ दिया गया कि पुस्तक का मूल स्वरूप लुप्त हो गया तथा अनेक भ्रामक बातें इतिहास बनकर खड़ी हो गईं।

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‘विविध तीर्थ कल्प’ आदि ग्रंथों में जैन लेखकों ने जो विवरण लिखे हैं वे भी इन्हीं दो पुस्तकों के आधार पर लिखे गए हैं क्योंकि उनमें से कोई भी समकालीन नहीं था। उदाहरण के लिए ‘विविध तीर्थ कल्प’ का लेखक जिनप्रभ सूरी चौदहवीं शताब्दी ईस्वी के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के समकालीन था।

सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध लेखक फरिश्ता ने लिखा है कि पृथ्वीराज की सेना सरस्वती नदी के एक ओर आकर बैठ गई। इसके बाद मुहम्मद अपनी छोटी सेना लेकर आया तथा नदी के दूसरी ओर खेमा गाढ़कर बैठ गया। उसकी मुख्य सेना पीछे थी जिसे पृथ्वीराज की सेना देख नहीं सकी और यह सोचकर आनंदित होती रही कि दुश्मन की सेना बहुत छोटी है।

फरिश्ता लिखता है कि जब दोनों सेनाएं कुछ दूरी पर आमने-सामने खेमाजन हुईं तब राजपूतों ने गौरी को धमकाते हुए कुछ दूत भेजे। उन दूतों ने गौरी को यह संदेश सुनाया कि यदि वह गजनी लौट जाता है तो वे लोग उसे बिना नुक्सान पहुंचाए लौट जाने देंगे और यदि वह युद्ध करना चाहता है तो उसे तथा उसकी सेना को समूल नष्ट कर दिया जाएगा।

फरिश्ता लिखता है कि गौरी ने जवाब दिया- ‘मैं अपनी मर्जी से नहीं आया हूँ, अपितु अपने सुल्तान भाई की आज्ञा से आया हूँ। मैं तो सिर्फ सेनापति हूँ, मालिक तो वही है। यद्यपि मैं बहुत कष्ट और परेशानी उठाकर गजनी से यहाँ पहुंचा हूँ फिर भी आप लोगों की नेक सलाह मानते हुए आप लोगों से कुछ वक्त मांगता हूँ। आप लोगों की तरह मैं खुद चाहता हूँ कि हमारे बीच सुलह-सफाई हो जाए। सरहिन्द और मुल्तान मेरा तथा बाकी हिस्सा आपका। मैं इसी काम की खातिर एक सफीर अपने भाई के पास फीरोजकोह भेज रहा हूँ। इसलिए जब तक वह सफीर फीरोजकोह से वापस यहाँ लौट कर न आ जाए, तब तक जंग-बंदी रहे।’

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हिन्दू सेनापति मुहम्मद गौरी की कूटनीतिक भाषा को समझ नहीं सके और इसे इस्लामी सेना की दुर्बलता समझकर राग-रंग एवं नाच-गाने में डूब गए। मुहम्मद गौरी ने हिन्दू सैनिकों को भ्रम में डाले रखने के लिए अपने शिविर में रात भर आग जलाए रखी और अपने सैनिकों को शत्रुदल के चारों ओर घेरा डालने के लिए रवाना कर दिया। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है कि मुहम्मद ने अपनी मुख्य सेना को अपने पीछे रखा जिसके पास हाथी, झण्डे तथा शामियाने थे। जबकि दस-दस हजार घुड़सवारों के चार दल बनाकर काफिरों की सेना के चारों ओर अलग-अलग दिशाओं से भेज दिए। इन घुड़सवारों के पास हल्के हथियार थे।  ज्योंही प्रभात हुआ, तुर्कों ने अजमेर की सेना पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया। हिन्दू सेना तो अभी नींद में ही थी तथा कुछ सैनिक शौचादि का उपक्रम कर रहे थे। उसी समय 40 हजार घुड़सवार चारों दिशाओं से हिन्दू शिविर पर टूट पड़े। बहुत से हिन्दू सैनिकों को तो हथियार उठाने तक का अवसर नहीं मिला। इस कारण कई हजार सैनिकों को उनके शिविरों में ही निहत्थे मार दिया गया।

डॉ. बिंध्यराज चौहान ने लिखा है- ‘नरायन का दूसरा संग्राम युद्ध नहीं था, एक भयंकर दुर्घटना थी जिसमें न रणगजों पर हौदे चढ़ाए जा सके, न अश्वों पर जीनें कसी जा सकीं। न तो कोई राजपूत स्नान-ध्यान करके माथे पर रोली का टीका लगा सका, न कुसुम्बे का प्याला पी सका, न घोड़े पर सवार हाते समय चारणों एवं भाटों द्वारा गढ़ी गई चमत्कारी वंशोत्पत्ति का बखान सुन सका और न ही तुरही, भेरी नगाड़े बजाए जा सके, क्योंकि तब तक चारों तरफ हड़बड़ाहट से मची भगदड़ के बीच तुर्कों ने पशुओं के साथ राजपूतों को काट-काट कर ढेर लगा दिए।’

इस अनपेक्षित, असमय एवं आकस्मिक आक्रमण से पृथ्वीराज की सेना में चारों ओर भगदड़ मच गई। पृथ्वीराज चौहान का शिविर बूचड़खाने में बदल गया प्रतीत होता था। सम्राट पृथ्वीराज चौहान उसी समय हाथी पर चढ़कर युद्ध के लिए तैयार हो गया।

डॉ. बिंध्यराज ने लिखा है- ‘आरम्भिक क्षति उठाने के बाद राजपूती सेना संगठित हुई जिसका प्रधान सेनापति दिल्ली का गोविंदराय तोमर था।’

फुतुहूस्सलातीन ने लिखा है- ‘भयंकर हाथियों की सेना लेकर गोविंदराय आगे बढ़ा। उस समय राय पिथौरा अपनी केन्द्रीय सेना के साथ युद्ध कर रहा था।’

गोविंदराय के दाहिने ओर की कमान पदमशा रावल संभाले था और बायां दस्ता भोला अर्थात् भुवनैकमल्ल के अधीन था। मुईजुद्दीन साम की सेना के केन्द्रीय भाग का नेतृत्व मुहम्मद स्वयं कर रहा था। उसके दाहिने ओर इलाह था तथा बाएं दस्ते का नेतृत्व मुकल्बा के अधीन था। कुतुबुद्दीन सचल-दस्ते की व्यवस्था देख रहा था और सदैव ‘मुइजुद्दीन साम’ अर्थात् मुहम्मद गौरी के निकट रहता था। उस समय मुईजुद्दीन की सेना में 1,30,000 अश्वारोही थे। प्रत्येक सैनिक जिरह बख्तर और हथियारों से सुसज्जित था।

गोविंदराय हाथियों की सेना के साथ आगे बढ़ा और खारबक के अग्रिम दल पर हमला बोल दिया। खारबक ने अपने मुंह पर ढाल लगाकर अपनी रक्षा की और अपने तीरंदाजों को आदेश दिया कि वे केवल हाथियों और महावतों पर हमला करें। खारबक का आदेश पाते ही तुर्कों ने हाथियों पर इतना जबर्दस्त हमला किया कि चौहान सेना के हाथियों की सेना अस्त-व्यस्त हो गई तथा हिन्दुओं की सेना पराजय की ओर उन्मुख हो गई।

इसे ‘तराइन का द्वितीय युद्ध’ कहते हैं। यह कोई युद्ध नहीं था, निर्दोष एवं निहत्थे हिन्दू सैनिकों का कत्ले आम था, धोखा था, षड़यंत्र था, छल था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया (38)

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पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया

जब मुहम्मद गौरी रात के अंधेरे में छल से पृथ्वीराज चौहान के शिविर में घुसकर हिन्दू सैनिकों को काटने लगा तब पृथ्वीराज चौहान घोड़े पर सवार होकर अपने शिविर से निकला किंतु सिरसा के आसपास मुहम्मद गौरी के सैनिकों के हाथ लग गया । इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया।

मुहम्मद गौरी ने तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को संधि का छलावा दिया तथा अपनी मुख्य सेना को पीछे की ओर छिपाकर तड़का होने से पहले ही पृथ्वीराज चौहान के शिविर पह हमला बोल दिया तथा बहुत से हिन्दू सैनिकों को काट डाला। बड़ी कठिनाई से पृथ्वीराज चौहान की सेना का कुछ हिस्सा युद्ध के लिए सन्नद्ध हो पाया जिसमें दिल्ली के तोमर शासक गोविंदराज की हाथी सेना तथा स्वयं सम्राट पृथ्वीराज चौहान के अधीन केन्द्रीय सेना प्रमुख थे।

हसन निजामी, इसामी तथा नयनचंद्र सूरी ने लिखा है कि गोविंदराय तोमर की हाथी सेना ने तुर्क सेना पर दबाव बढ़ा दिया तो मुहम्मद गौरी के सेनापति खरमेल ने हाथियों की सेना के पीेछे जोर-जोर से नगाड़े पिटवाए। इस कारण हाथी भ्रमित हो गए तथा इधर-उधर भागने लगे। सम्राट पृथ्वीराज चौहान का हाथी भी अनियंत्रित हो गया। इस कारण गौरी के सैनिकों ने पृथ्वीराज के हाथी को घेर लिया और उस पर ताबड़तोड़ वार करने लगे। जब पृथ्वीराज का हाथी घायल हो गया तब पृथ्वीराज हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार हुआ।

मिनहाज उस् सिराज लिखता है कि काफिरों ने बड़ी बहादुरी से सुल्तान की सेना का सामना किया जो चारों ओर से आक्रमण कर रही थी। शाम होने तक युद्ध चलता रहा तथा शाम होते ही मुहम्मद ने अपनी आरक्षित सेना को थके हुए राजपूतों पर आक्रमण करने के आदेश दिए। इस अंतिम प्रहार को राजपूत योद्धा नहीं झेल सके।

पृथ्वीराज का सेनापति खाण्डेराव जिसने तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गौरी की सेना को परास्त किया था, मारा गया और पृथ्वीराज का उत्साह भंग हो गया। यह खाण्डेराव दिल्ली का शासक गोविंदराज था जिसे मिनहाज उस् सिराज ने खाण्डेराव लिखा है।

मिनहाज उस् सिराज के अनुसार जब युद्ध काफिरों के हाथों से निकलता हुआ दिखाई दिया तो पृथ्वीराज अपने हाथी को छोड़कर घोड़े पर सवार हुआ और युद्धक्षेत्र से निकल गया किंतु सरस्वती के पास पकड़ा गया और मुहम्मद पूर्ण रूप से विजयी हुआ। पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया , इस सम्बन्ध में कई मत मिलते हैं।

इलियट तथा डाउसन ने प्राचीन ग्रंथों के आधार पर इस युद्ध का वर्णन करते हुए लिखा है कि जब सम्राट पृथ्वीराज अपने हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार हुआ तो हिन्दुओं ने बाजे बजवाए जिन्हें सुनकर घोड़ा नाचने लगा। पृथ्वीराज को समझते हुए देर नहीं लगी कि क्या होने वाला है। वह घोड़े से उतरकर पैदल ही युद्ध करने लगा। इसी समय किसी तुर्क ने सम्राट के गले में एक सिंगनी डाल दी। इस प्रकार पृथ्वीराज पकड़ा गया।

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 मिनहाज उस् सिराज लिखता है कि इस युक्ति से अल्लाह ने मुहम्मद की सेना को विजयी बनाया तथा काफिरों की सेना भाग खड़ी हुई। पृथ्वीराज को तुरंत ही मार दिया गया। जबकि हसन निजामी लिखता है कि राजा पृथ्वीराज को पकड़कर अजमेर लाया गया।

कुछ लेखकों के अनुसार सम्राट पृथ्वीराज सिरसा के आसपास मुहम्मद गौरी के सैनिकों के हाथ लग गया और मारा गया। राजा गोविंदराय और अनेक सामंत, वीर योद्धाओं की भांति लड़ते हुए काम आए। किंतु बाद की घटनाएं इस बात की पुष्टि नहीं करतीं। अतः इस सम्बन्ध में यही मत स्थिर किया जा सकता है कि युद्धक्षेत्र में अथवा सिरसा के निकट पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया।

अधिकातर लेखकों के अनुसार तराइन की पहली लड़ाई का विजेता गोविन्दराज तोमर तथा चितौड़ का राजा समरसिंह भी तराइन की दूसरी लड़ाई में काम आए। तुर्कों ने भागती हुई हिन्दू सेना का पीछा किया तथा उन्हें बिखेर दिया।

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विभिन्न लेखकों ने इस युद्ध की तिथि भी अलग-अलग लिखी है। पृथ्वीराज रासो ने विक्रम संवत् 1158 के श्रावण मास की अमावस्या को शनिवार के दिन यह युद्ध होना बताया है किंतु यह तिथि ऐतिहासिक कसौटी पर खरी नहीं उतरती। क्योंकि विक्रम संवत 1158 का अर्थ होता है ई.1101 जबकि यह युद्ध तो ई.1192 में हुआ था। हसन निजामी ने लिखा है कि यह लड़ाई हिजरी 588 के रमजान महीने के आरम्भ होने से पहले ही जीती जा चुकी थी। इस प्रकार निजामी कोई निश्चित तिथि नहीं बताता है। हिजरी 588 में रमजान का महीना 10 सितम्बर 1192 को आरम्भ हुआ था। अतः तराइन की दूसरी लड़ाई 10 सितम्बर 1192 से पहले किसी महीने में हुई थी। राजस्थान के अजमेर, नागौर गोठमांगलोद आदि स्थानों पर उन राजपूत वीरों के नामों के शिलालेख मिलते हैं जिनके इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने पर उनकी रानियां एवं ठकरानियां सती हुई थीं। ये शिलालेख अप्रेल एवं मई 1192 की तिथियों के हैं। इनसे सिद्ध होता है कि तराइन का दूसरा युद्ध अप्रेल 1192 से पहले ही हो चुका था। ‘दिल्ली के तोमर’ नामक ग्रंथ के लेखक हरिहर निवास द्विवेदी ने विभिन्न तथ्यों के आधार पर युद्ध की तिथि 1 मार्च 1192 मानी है, उस दिन रविवार था तथा होली का त्यौहार था। युद्ध के आरम्भ होने एवं समाप्त होने की यही तिथि सही जान पड़ती है।

17 मार्च 1192 को दिल्ली भी तुर्कों के अधिकार में चली गई। बारहवीं शताब्दी ईस्वी में उत्तर भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट पृथ्वीराज चौहान पर गजनी के छोटे से राज्य के शासक के छोटे भाई मुहम्मद गौरी की विजय के अनेक कारण बताए जाते हैं जिनमें से एक कारण गुप्तचर प्रबंधन को भी बताया जाता है।

मिनहाज उस् सिराज ने ‘तबकाते नासिरी’, अब्दुल फजल ने ‘अकबरनामा’ तथा मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने ‘मुंतखाब अत् तवारीख’ में लिखा है कि मुहम्मद गौरी ने जनता में पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध असंतोष उत्पन्न करने के लिए गौर के निकट चिश्त नामक स्थान पर रहने वाले मुईनुद्दीन संजरी को अजमेर भेज दिया था। वह तराइन की पहली लड़ाई के बाद अपने अनुयाइयों के साथ अजमेर आया था तथा अजमेर के राजमहल में सम्राट के विरुद्ध चल रहे असंतोष एवं षड़यंत्रों के समाचार मुहम्मद गौरी को भेजता रहता था। इसलिए बहुत से लोग मुईनुद्दीन संजरी को मुहम्मद गौरी का जासूस मानते हैं।

‘फुतुहूस्सलातीन’ के अंग्रेजी अनुवाद में भी अजमेर के राजमहल में घटित इन घटनाओं का उल्लेख किया गया है। रानी संयोगिता तथा रानी पद्मावती के बीच सौतिया डाह के कारण चलने वाले षड़यंत्र, पृथ्वीराज चौहान के मंत्री कैमास का एक दासी के साथ प्रेम प्रसंग एवं पृथ्वीराज के सेनापति प्रतापसिंह एवं प्रधानमंत्री कैमास के बीच के द्वेष के कारण कैमास के वध आदि बहुत सी बातें मुईनुद्दीन संजरी द्वारा ही गौरी को पहुंचाई गई थीं।

इसामी के अनुसार जिस समय पृथ्वीराज मुल्तान से तराइन के लिए रवाना हुआ, उस समय उसे ज्ञात हो चुका था कि कैमास की हत्या हो चुकी है तथा पृथ्वीराज के सेनापतियों एवं मंत्रियों में मन-मुटाव अपने चरम पर है। इसलिए गौरी ने अजमेर के कुछ सेनापतियों एवं मंत्रियों को अपनी ओर मिला लिया और पृथ्वीराज तराइन का दूसरा युद्ध हार गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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