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पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया (38)

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पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया

जब मुहम्मद गौरी रात के अंधेरे में छल से पृथ्वीराज चौहान के शिविर में घुसकर हिन्दू सैनिकों को काटने लगा तब पृथ्वीराज चौहान घोड़े पर सवार होकर अपने शिविर से निकला किंतु सिरसा के आसपास मुहम्मद गौरी के सैनिकों के हाथ लग गया । इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया।

मुहम्मद गौरी ने तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को संधि का छलावा दिया तथा अपनी मुख्य सेना को पीछे की ओर छिपाकर तड़का होने से पहले ही पृथ्वीराज चौहान के शिविर पह हमला बोल दिया तथा बहुत से हिन्दू सैनिकों को काट डाला। बड़ी कठिनाई से पृथ्वीराज चौहान की सेना का कुछ हिस्सा युद्ध के लिए सन्नद्ध हो पाया जिसमें दिल्ली के तोमर शासक गोविंदराज की हाथी सेना तथा स्वयं सम्राट पृथ्वीराज चौहान के अधीन केन्द्रीय सेना प्रमुख थे।

हसन निजामी, इसामी तथा नयनचंद्र सूरी ने लिखा है कि गोविंदराय तोमर की हाथी सेना ने तुर्क सेना पर दबाव बढ़ा दिया तो मुहम्मद गौरी के सेनापति खरमेल ने हाथियों की सेना के पीेछे जोर-जोर से नगाड़े पिटवाए। इस कारण हाथी भ्रमित हो गए तथा इधर-उधर भागने लगे। सम्राट पृथ्वीराज चौहान का हाथी भी अनियंत्रित हो गया। इस कारण गौरी के सैनिकों ने पृथ्वीराज के हाथी को घेर लिया और उस पर ताबड़तोड़ वार करने लगे। जब पृथ्वीराज का हाथी घायल हो गया तब पृथ्वीराज हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार हुआ।

मिनहाज उस् सिराज लिखता है कि काफिरों ने बड़ी बहादुरी से सुल्तान की सेना का सामना किया जो चारों ओर से आक्रमण कर रही थी। शाम होने तक युद्ध चलता रहा तथा शाम होते ही मुहम्मद ने अपनी आरक्षित सेना को थके हुए राजपूतों पर आक्रमण करने के आदेश दिए। इस अंतिम प्रहार को राजपूत योद्धा नहीं झेल सके।

पृथ्वीराज का सेनापति खाण्डेराव जिसने तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गौरी की सेना को परास्त किया था, मारा गया और पृथ्वीराज का उत्साह भंग हो गया। यह खाण्डेराव दिल्ली का शासक गोविंदराज था जिसे मिनहाज उस् सिराज ने खाण्डेराव लिखा है।

मिनहाज उस् सिराज के अनुसार जब युद्ध काफिरों के हाथों से निकलता हुआ दिखाई दिया तो पृथ्वीराज अपने हाथी को छोड़कर घोड़े पर सवार हुआ और युद्धक्षेत्र से निकल गया किंतु सरस्वती के पास पकड़ा गया और मुहम्मद पूर्ण रूप से विजयी हुआ। पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया , इस सम्बन्ध में कई मत मिलते हैं।

इलियट तथा डाउसन ने प्राचीन ग्रंथों के आधार पर इस युद्ध का वर्णन करते हुए लिखा है कि जब सम्राट पृथ्वीराज अपने हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार हुआ तो हिन्दुओं ने बाजे बजवाए जिन्हें सुनकर घोड़ा नाचने लगा। पृथ्वीराज को समझते हुए देर नहीं लगी कि क्या होने वाला है। वह घोड़े से उतरकर पैदल ही युद्ध करने लगा। इसी समय किसी तुर्क ने सम्राट के गले में एक सिंगनी डाल दी। इस प्रकार पृथ्वीराज पकड़ा गया।

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 मिनहाज उस् सिराज लिखता है कि इस युक्ति से अल्लाह ने मुहम्मद की सेना को विजयी बनाया तथा काफिरों की सेना भाग खड़ी हुई। पृथ्वीराज को तुरंत ही मार दिया गया। जबकि हसन निजामी लिखता है कि राजा पृथ्वीराज को पकड़कर अजमेर लाया गया।

कुछ लेखकों के अनुसार सम्राट पृथ्वीराज सिरसा के आसपास मुहम्मद गौरी के सैनिकों के हाथ लग गया और मारा गया। राजा गोविंदराय और अनेक सामंत, वीर योद्धाओं की भांति लड़ते हुए काम आए। किंतु बाद की घटनाएं इस बात की पुष्टि नहीं करतीं। अतः इस सम्बन्ध में यही मत स्थिर किया जा सकता है कि युद्धक्षेत्र में अथवा सिरसा के निकट पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया।

अधिकातर लेखकों के अनुसार तराइन की पहली लड़ाई का विजेता गोविन्दराज तोमर तथा चितौड़ का राजा समरसिंह भी तराइन की दूसरी लड़ाई में काम आए। तुर्कों ने भागती हुई हिन्दू सेना का पीछा किया तथा उन्हें बिखेर दिया।

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विभिन्न लेखकों ने इस युद्ध की तिथि भी अलग-अलग लिखी है। पृथ्वीराज रासो ने विक्रम संवत् 1158 के श्रावण मास की अमावस्या को शनिवार के दिन यह युद्ध होना बताया है किंतु यह तिथि ऐतिहासिक कसौटी पर खरी नहीं उतरती। क्योंकि विक्रम संवत 1158 का अर्थ होता है ई.1101 जबकि यह युद्ध तो ई.1192 में हुआ था। हसन निजामी ने लिखा है कि यह लड़ाई हिजरी 588 के रमजान महीने के आरम्भ होने से पहले ही जीती जा चुकी थी। इस प्रकार निजामी कोई निश्चित तिथि नहीं बताता है। हिजरी 588 में रमजान का महीना 10 सितम्बर 1192 को आरम्भ हुआ था। अतः तराइन की दूसरी लड़ाई 10 सितम्बर 1192 से पहले किसी महीने में हुई थी। राजस्थान के अजमेर, नागौर गोठमांगलोद आदि स्थानों पर उन राजपूत वीरों के नामों के शिलालेख मिलते हैं जिनके इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने पर उनकी रानियां एवं ठकरानियां सती हुई थीं। ये शिलालेख अप्रेल एवं मई 1192 की तिथियों के हैं। इनसे सिद्ध होता है कि तराइन का दूसरा युद्ध अप्रेल 1192 से पहले ही हो चुका था। ‘दिल्ली के तोमर’ नामक ग्रंथ के लेखक हरिहर निवास द्विवेदी ने विभिन्न तथ्यों के आधार पर युद्ध की तिथि 1 मार्च 1192 मानी है, उस दिन रविवार था तथा होली का त्यौहार था। युद्ध के आरम्भ होने एवं समाप्त होने की यही तिथि सही जान पड़ती है।

17 मार्च 1192 को दिल्ली भी तुर्कों के अधिकार में चली गई। बारहवीं शताब्दी ईस्वी में उत्तर भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट पृथ्वीराज चौहान पर गजनी के छोटे से राज्य के शासक के छोटे भाई मुहम्मद गौरी की विजय के अनेक कारण बताए जाते हैं जिनमें से एक कारण गुप्तचर प्रबंधन को भी बताया जाता है।

मिनहाज उस् सिराज ने ‘तबकाते नासिरी’, अब्दुल फजल ने ‘अकबरनामा’ तथा मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने ‘मुंतखाब अत् तवारीख’ में लिखा है कि मुहम्मद गौरी ने जनता में पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध असंतोष उत्पन्न करने के लिए गौर के निकट चिश्त नामक स्थान पर रहने वाले मुईनुद्दीन संजरी को अजमेर भेज दिया था। वह तराइन की पहली लड़ाई के बाद अपने अनुयाइयों के साथ अजमेर आया था तथा अजमेर के राजमहल में सम्राट के विरुद्ध चल रहे असंतोष एवं षड़यंत्रों के समाचार मुहम्मद गौरी को भेजता रहता था। इसलिए बहुत से लोग मुईनुद्दीन संजरी को मुहम्मद गौरी का जासूस मानते हैं।

‘फुतुहूस्सलातीन’ के अंग्रेजी अनुवाद में भी अजमेर के राजमहल में घटित इन घटनाओं का उल्लेख किया गया है। रानी संयोगिता तथा रानी पद्मावती के बीच सौतिया डाह के कारण चलने वाले षड़यंत्र, पृथ्वीराज चौहान के मंत्री कैमास का एक दासी के साथ प्रेम प्रसंग एवं पृथ्वीराज के सेनापति प्रतापसिंह एवं प्रधानमंत्री कैमास के बीच के द्वेष के कारण कैमास के वध आदि बहुत सी बातें मुईनुद्दीन संजरी द्वारा ही गौरी को पहुंचाई गई थीं।

इसामी के अनुसार जिस समय पृथ्वीराज मुल्तान से तराइन के लिए रवाना हुआ, उस समय उसे ज्ञात हो चुका था कि कैमास की हत्या हो चुकी है तथा पृथ्वीराज के सेनापतियों एवं मंत्रियों में मन-मुटाव अपने चरम पर है। इसलिए गौरी ने अजमेर के कुछ सेनापतियों एवं मंत्रियों को अपनी ओर मिला लिया और पृथ्वीराज तराइन का दूसरा युद्ध हार गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पृथ्वीराज चौहान की हत्या के लिए मंत्री प्रतापसिंह जिम्मेदार था (39)

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पृथ्वीराज चौहान की हत्या के लिए मंत्री प्रतापसिंह जिम्मेदार था

निःसंदेह पृथ्वीराज चौहान की हत्या स्वयं मुहम्मद गौरी ने की थी किंतु पृथ्वीराज चौहान की हत्या के लिए मंत्री प्रतापसिंह अधिक जिम्मेदार था जिसने अपने पुराने वैर को निकालने के लिए अपने ही राजा के साथ छल किया तथा अपना देश दुश्मनों के हाथों बेच दिया।

तराइन के दूसरे युद्ध में मुहम्मद गौरी ने छल-बल से पृथ्वीराज चौहान की सेना को मार दिया तथा सम्राट पृथ्वीराज चौहान को जीवित ही पकड़ लिया। पृथ्वीराज चौहान के अंत के सम्बन्ध में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। ‘पृथ्वीराज रासो’ में पृथ्वीराज चौहान की हत्या गजनी में होनी दिखाई गई है। इस विवरण के अनुसार पृथ्वीराज को पकड़ कर गजनी ले जाया गया जहाँ उसकी आँखें फोड़ दी गईं। इस ग्रंथ का रचयिता चंद बरदाई सम्राट पृथ्वीराज का बाल-सखा था, वह भी सम्राट के साथ गजनी गया।

पृथ्वीराज रासो कहता है कि चंद बरदाई ने पृथ्वीराज की मृत्यु निश्चित जानकर शत्रु के विनाश का कार्यक्रम बनाया तथा मुहम्मद गौरी से आग्रह किया कि आँखें फूट जाने पर भी राजा पृथ्वीराज शब्दबेधी बाण मार सकता है। इस मनोरंजक दृश्य को देखने के लिए गौरी ने एक विशाल दरबार का आयोजन किया। उसने एक ऊँचे मंच पर बैठकर एक घण्टा बजाया तथा पृथ्वीराज को लक्ष्य वेधने का संकेत दिया। उसी समय कवि चन्द बरदाई ने यह दोहा पढ़ा-

           चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण। ता उपर सुल्तान है, मत चूके चौहान।।

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इससे सम्राट पृथ्वीराज को गौरी की स्थिति का अनुमान हो गया और सम्राट ने जो तीर छोड़ा वह मुहम्मद गौरी के कण्ठ में जाकर लगा तथा उसके प्राण पंखेरू उड़ गए। अपने राजा को शत्रु-सैनिकों के हाथों में पड़कर अपमानजनक मृत्यु से बचने के लिए कवि चन्द बरदाई ने राजा पृथ्वीराज के पेट में अपनी कटार भौंक दी और स्वयं भी उसके साथ मृत्यु को प्राप्त हुआ। उस समय पृथ्वीराज की आयु मात्र 26 वर्ष थी।

आधुनिक शोधों से स्पष्ट हो चुका है कि पृथ्वीराज रासो में इतना अधिक क्षेपक जोड़ दिया गया है कि इसके मूल तथ्य ही बदल गए हैं। ‘हम्मीर महाकाव्य’ नामक ग्रंथ में सम्राट पृथ्वीराज को कैद किए जाने और अंत में उसे मरवा दिए जाने का उल्लेख है। विरुद्धविधिविध्वंस नामक ग्रंथ में पृथ्वीराज का युद्ध-स्थल में काम आना लिखा है।

‘पृथ्वीराज प्रबन्ध’ के अनुसार विजयी शत्रु पृथ्वीराज को अजमेर ले आए और वहाँ उसे एक महल में बंदी के रूप में रखा गया। इसी महल के सामने मुहम्मद गौरी अपना दरबार लगाता था जिसे देखकर पृथ्वीराज को बड़ा दुःख होता था। एक दिन राजा पृथ्वीराज ने अपने मंत्री प्रतापसिंह से धनुष-बाण लाने को कहा ताकि वह मुहम्मद गौरी का अंत कर दे। प्रतापसिंह पृथ्वीराज चौहान का अत्यंत विश्वसनीय मंत्री था किंतु आरम्भ से लेकर अंत तक यही प्रतापसिंह पृथ्वीराज के सर्वनाश का प्रमुख कारण बना।

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पृथ्वीराज की माता के शासन काल में कदम्बवास राज्य का प्रधानमंत्री था किंतु प्रतापसिंह ने षड़यंत्र रचकर कदम्बवास को सम्राट की दृष्टि से गिरा दिया तथा पृथ्वीराज ने कदम्बवास की हत्या करवा दी। तब से प्रतापसिंह ही राज्य का समस्त कार्य देखता था किंतु जब मुहम्मद गौरी तराइन के दूसरे युद्ध के लिए आया तो प्रतापसिंह सम्राट को धोखा देकर भीतर ही भीतर मुहम्मद गौरी से मिल गया। पृथ्वीराज प्रतापसिंह पर इतना अधिक विश्वास करता था कि वह अंत तक इस बात को नहीं जान सका। जब सम्राट ने प्रतापसिंह को धनुष-बाण लाने के लिए कहा तो प्रतापसिंह ने उसकी सूचना मुहम्मद गौरी को दे दी। मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज की परीक्षा लेने के लिए अपनी एक प्रतिमा बनवाकर एक स्थान पर रखवाई जिसे पृथ्वीराज ने अपने बाण से तोड़ दिया। यह देखकर मुहम्मद गौरी ने अंधे पृथ्वीराज को गड्ढे में फिंकवा दिया जहाँ पत्थरों की चोटों से उसका अंत कर दिया गया। दो समसामयिक लेखकों यूफी तथा हसन निजामी ने पृथ्वीराज को कैद किया जाना तो लिखा है किंतु निजामी यह भी लिखता है कि जब बंदी पृथ्वीराज जो इस्लाम का शत्रु था, सुल्तान के विरुद्ध षड़यंत्र करता हुआ पाया गया तो उसकी हत्या कर दी गई।

मिनहाज उस् सिराज पृथ्वीराज के भागने पर पकड़ा जाना और फिर मरवाया जाना लिखता है। फरिश्ता भी पृथ्वीराज चौहान की हत्या के सम्बन्ध में इसी कथन का अनुमोदन करता है। सोलहवीं शताब्दी का लेखक अबुलफजल लिखता है कि पृथ्वीराज को सुलतान गजनी ले गया जहाँ पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई। पृथ्वीराज की मृत्यु के चार सौ साल बाद लिखी गई इस बात का अधिक महत्त्व नहीं है।

अजमेर से सम्राट पृथ्वीराज चौहान का एक सिक्का मिला है जिसके दूसरी तरफ मुहम्मद गौरी का नाम भी अंकित है। यह सिक्का इस बात का द्योतक है कि पृथ्वीराज को युद्ध के मैदान से जीवित ही पकड़कर अजमेर लाया गया तथा मुहम्मद गौरी ने उसके कुछ सिक्कों को जब्त करके उनके पीछे अपना नाम अंकित करवाया। इससे यह सिद्ध होता है कि पृथ्वीराज को युद्ध के मैदान में नहीं मारा गया था। न ही उसे गजनी ले जाया गया था। पृथ्वीराज को तराइन के मैदान से अजमेर लाया गया था और अजमेर में ही पृथ्वीराज चौहान की हत्या की गई थी।

बहुत से लोगों ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान की हत्या के इतिहास को रहस्यमय एवं रोमांचक बनाने के लिए पृथ्वीराज के अंत के सम्बन्ध में कई तरह के किस्से गढ़ लिए हैं किंतु इतिहास की सच्चाइयां रहस्य रोमांच से अलग, बहुत भयानक एवं बदसूरत होती हैं, सम्राट पृथ्वीराज का अंत भी वैसा ही भयानक और बदसूरत था।

भारतीय राजा किसी दूसरे राजा को पकड़ लेने पर जिस गरिमा और उदारता का परिचय देते थे, मुहम्मद गौरी की तरफ से वैसा कुछ नहीं किया गया। उसने सम्राट पृथ्वीराज चौहान को क्रूर मौत के हवाले किया। मुहम्मद गौरी को यह भी स्मरण नहीं रहा कि इसी पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी तथा काजी शिराज से केवल कर लेकर उन्हीं जीवित ही छोड़ दिया था।

ई.1192 में पृथ्वीराज चौहान की हत्या के बाद शहाबुद्दीन गौरी ने पृथ्वीराज चौहान के अवयस्क पुत्र गोविन्दराज से विपुल कर-राशि लेकर उसे अजमेर की गद्दी पर बैठाया। इसके बाद शहाबुद्दीन गौरी कुछ समय तक अजमेर में रहकर दिल्ली चला गया जो इस समय मुहम्मद गौरी के सेनापतियों के अधीन था। मुहम्मद गौरी ने अपने जेरखरीद गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में अपने द्वारा विजित क्षेत्रों का गवर्नर नियुक्त किया। कुछ दिन दिल्ली में निवास करने के बाद मुहम्मद गौरी फिर से गजनी चला गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा जयचंद का हाथी (40)

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राजा जयचंद का हाथी

राजा जयचंद के पास एक सफेद रंग का हाथी था। उसे मुहम्मद गौरी की सेना ने पकड़ लिया। महावत के बार-बार प्रयास करने पर भी राजा जयचंद का हाथी मुहम्मद गौरी को प्रणाम करने के लिए तैयार नहीं हुआ। हाथी मनुष्यों से अधिक वफादार निकला।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान के मंत्री प्रतापसिंह ने अपने राजा को धोखा देकर उसे मुहम्मद गौरी के हाथों मरवा दिया। भारत में अधिकांश लोग यह मानते हैं कि मुहम्मद गौरी की मृत्यु गजनी में सम्राट पृथ्वीराज चौहान के शब्दबेधी बाण से हुई थी किंतु ऐतिहासिक साक्ष्य इन तथ्यों की पुष्टि कर चुके हैं कि न तो सम्राट पृथ्वीराज चौहान कभी गजनी गया था और न मुहम्मद गौरी की मृत्यु गजनी में किसी शब्दबेधी बाण से हुई थी।

मुहम्मद गौरी सम्राट पृथ्वीराज चौहान की अजमेर में हत्या करने के बाद लगभग 14 साल तक जीवित रहा और भारत का रक्त पीता रहा। ई.1194 में मुहम्मद गौरी ने कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद पर आक्रमण किया। चंदावर के मैदान में दोनों पक्षों में भयानक युद्ध हुआ। यह मैदान आगरा तथा इटावा के बीच यमुना के तट पर स्थित था। अब इस स्थान को फीरोजाबाद कहा जाता है।

ई.1349 में लिखित राजशेखर सूरि कृत ‘प्रबंधकोश’ में लिखा है कि सुहावादेवी नामक एक रूपवती एवं बुद्धिमती विधवा राजा जयचंद गाहड़वाल के प्रधानमंत्री पद्माकर द्वारा अन्हिलपुर पाटण अर्थात् गुजरात से लाकर राजा जयचंद को भेंट की गई। महाराज जयचंद ने उस स्त्री के रूप-लावण्य पर मोहित होकर उसे अपनी पासवान बना लिया। इस स्त्री के गर्भ से मेघचंद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

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जब मेघचंद युवा हुआ तो सुहावादेवी ने महाराज जयचंद से कहा कि वह मेघचंद को युवराज बनाए। महाराज जयचंद इस बात पर सहमत हो गया किंतु जयचंद के मंत्री विद्याधर ने इसे कुल-मर्यादा के विरुद्ध बताकर इस विचार का विरोध किया। इस कारण सुहावादेवी ने कन्नौज राज्य का विनाश करने का निश्चय किया। उसने अपना एक दूत तक्षशिला भेजा, जहाँ इन दिनों मुहम्मद गौरी निवास कर रहा था। सुहावादेवी ने मुहम्मद से कहलवाया कि वह जयचंद पर आक्रमण करे।

महाराज जयचंद के मंत्री विद्याधर को सुहावादेवी के इस षड़यंत्र की जानकारी हो गई तथा उसने महाराज को सुहावादेवी के द्वारा दूत भेजे जाने की सूचना दे दी। जयचंद अपनी पासवान पर विश्वास करता था इसलिए उसने मंत्री की बात पर विश्वास नहीं किया। विद्याधर को अपनी स्वामिभक्ति पर संदेह किए जाने से इतनी अधिक ग्लानि हुई कि उसने गंगाजी में डूबकर प्राण त्याग दिए।

कुछ काल के पश्चात् सुल्तान मुहम्मद गौरी ने कन्नौज राज्य पर आक्रण किया। ‘कन्नौज का इतिहास’ नामक ग्रंथ के लेखक आनंद स्वरूप मिश्र ने लिखा है कि गौरी ने यह आक्रमण किया अवश्य था किंतु सुहावा देवी के कहने पर नहीं किया था। जब राजा जयचंद को मुहम्मद के आने का पता चला तो वह भी एक सेना लेकर मुहम्मद की तरफ बढ़ा। यमुना नदी के तट पर चंदावर के मैदान में दोनों सेनाएं एक-दूसरे के सामने हो गईं तथा दोनों पक्षों में विकराल युद्ध हुआ।

राजशेखर सूरि का ग्रंथ ‘प्रबंधकोश’ इस बात की सूचना नहीं देता है कि इस युद्ध में महाराज जयचंद की मृत्यु कैसे हुई। ‘प्रबंधकोष’ की रचना ई.1349 में हुई थी जबकि यह युद्ध ई.1194 में हुआ था। अर्थात् यह ग्रंथ इस युद्ध के लगभग 155 वर्ष बाद लिखा गया। इस कारण इस ग्रंथ में जनश्रुति का भी कुछ अंश हो सकता है। ‘प्रबंधचिंतामणि’ से भी सुहावादेवी की घटना का समर्थन होता है। विद्यापति की ‘पुरुष परीक्षा’ में भी लिखा है कि राजा जयचंद को उसकी रानी शुभा देवी ने धोखा देकर उसे शहाबुद्दीन से मरवा दिया।

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यहाँ हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि समस्त हिन्दू राजाओं का इतिहास इसी प्रकार विकृत किया गया है। जयचंद पर आरोप लगाया जाता है कि उसने मुहम्मद गौरी को सम्राट पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। यही आरोप अन्हिलवाड़ा के चौलुक्यों पर लगाया जाता है।

जयचंद की पासवान सुहावा देवी पर आरोप लगाया जाता है कि उसने मुहम्मद गौरी को महाराज जयचंद पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। महाराणा सांगा पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने समरकंद के शासक बाबर को आमंत्रित किया कि वह दिल्ली के इब्राहीम लोदी पर आक्रमण करे। पाठक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कहीं यह हिन्दू राजाओं को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश तो नहीं है!

यदि तत्कालीन मुस्लिम लेखकों के ग्रंथों को देखें तो हम पाएंगे कि किसी भी मुस्लिम लेखकर ने सुहावादेवी के प्रकरण का उल्लेख नहीं किया है जबकि तीन बड़े हिन्दू लेखक सुहावा देवी द्वारा किए गए षड़यंत्र का उल्लेख करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दू लेखकों द्वारा अपने राजा को वीर दिखाने एवं उसे शत्रु द्वारा छल से मारे जाने की भावना के वशीभूत होकर ऐसी बातें लिखी गईं। जब एक लेखक ने किसी बात को लिख दिया तो दूसरे लेखकों ने उसका रूप बदल कर उसे अपने ग्रंथों में दोहरा दिया। इस कारण सम्राट पृथ्वीराज की तरह महाराज जयचंद का इतिहास भी झूठ के नीचे दब गया है।

ख्वाजा हसन निजामी ने ‘ताज-उल-मासिर’ में लिखा है कि दिल्ली पर अधिकार करने के दो साल बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने जयचंद पर चढ़ाई की। सुल्तान शहाबुद्दीन भी मार्ग में ऐबक से आ मिला। सेना में 50,000 घुड़सवार थे। कुतुबुद्दीन ऐबक को शाही सेना के हरावल में रखा गया। जयचंद ने इटावा के पास चंदावर में शाही सेना का सामना किया। राजा जयचंद ने हाथी पर बैठकर युद्ध किया। अंत में वह मारा गया। सुल्तान ने असनी के दुर्ग में रखा हुआ राजा जयचंद का खजाना लूट लिया। असनी का दुर्ग गंगा नदी के बाएं तट पर स्थित था। सुल्तान ने आगे बढ़कर बनारस की भी यही दशा की। इस लूट में 300 हाथी मिले जिनमें एक सफेद हाथी भी था।

इब्न अल असीर नामक एक समकालीन लेखक ने लिखा है कि पकड़े गए हाथी सुल्तान को सलाम करने के लिए लाए गए। फीलवानों के निर्देश पर सभी हाथियों ने सुल्तान का अभिवादन किया किंतु राजा जयचंद का हाथी महावत के बार-बार प्रयास करने पर भी मुहम्मद प्रणाम करने के लिए तैयार नहीं हुआ। अंग्रेज लेखक सर थॉमक होल्डिच ने भी इस घटना का वर्णन किया है।

‘तबकाते नासिरी’ में लिखा है कि हिजरी 590 अर्थात् ई.1194 में सुल्तान शहाबुद्दीन ने अपने दो सेनापतियों कुतुबुद्दीन तथा इजुद्दीन को जयचंद से लड़ने भेजा जिन्होंने चंद्रावर के पास जयचंद को हराया। महाराज जयचंद युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ किंतु उसका मृत शरीर मुहम्मद की सेना के हाथ नहीं लग सका। ‘कामिलुत्तवारीख’ में लिखा है कि हिजरी 590 में शहाबुद्दीन ने चंदावर में जयचंद को हराया और बनारस को लूट लिया। वह बनारस से मिला सामान 1400 ऊंटों पर लादकर गजनी ले गया। यह मुहम्मद गौरी का भारत पर अंतिम अभियान था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पांच सौ मन हीरों का मालिक अपनी बेटी के मकबरे में दफनाया गया (41)

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मुहम्मद गौरी की हत्या

अंग्रेज लेखक स्मिथ ने लिखा है कि शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी की हत्या पंजाब के झेलम जिले में ढामियाक अथवा दामयेक नामक स्थान पर कट्टरपंथी मुसलमानों के एक समूह द्वारा की गई थी। कुछ लेखकों के अनुसार मुहम्मद गौरी का वध विद्रोही गक्खरों ने किया था। 

मुहम्मद गौरी ई.1194 में कन्नौज के शासक महाराज जयचंद को मार दिया। मुहम्मद गौरी ने इस अभियान में कन्नौज, काशी एवं बनारस में भी भारी विध्वंस किया। इन नगरों में स्थित मंदिरों, महलों एवं किलों से मिली सम्पत्ति को 1400 ऊँटों पर लादकर गजनी चला गया। सर थॉमस होल्डिच ने लिखा है कि लूट का माल 4 हजार ऊँटों पर लादकर ले जाया गया। यह भारत पर मुहम्मद का अंतिम अभियान था।

‘उत्तर प्रदेश में बौद्धधर्म का विकास’ नामक ग्रंथ के लेखक डॉ. नलिनाक्ष दत्त तथा डॉ. कृष्णदत्त बाजपेई ने लिखा है कि सारनाथ भी मुहम्मद गौरी के हाथों से नहीं बच सका। वहाँ के अनेक विशाल भवन नष्ट कर दिए गए। सारनाथ के बौद्ध भिक्षु या तो मारे गए या अन्यत्र चले गए।

धीरे-धीरे यह स्थान पूर्णतः निर्जन बन गया। मुगल काल में यहाँ के टीलों पर एक भवन बना जिसे चौखण्डी कहते हैं। कुछ लेखकों का मानना है कि सारनाथ का विध्वंस तो महमूद गजनवी के सेनापति नियाल्तगीन ने बनारस अभियान के समय ही कर दिया था। सारनाथ तभी से वीरान पड़ा था।

ई.1197 में मुहम्मद गौरी के बड़े भाई गयासुद्दीन की मृत्यु हो गई। उस समय गयासुद्दीन का एक नाबालिग पुत्र जीवित था जिसका नाम महमूद था। मुहम्मद गौरी ने महमूद को एक बड़े प्रांत का प्रांतपति बना दिया तथा स्वयं गजनी एवं गौर सहित सम्पूर्ण सल्तनत का स्वामी बन गया।

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा प्रकाशित ‘कन्नौज का इतिहास’ के लेखक आनन्द स्वरूप मिश्र ने लिखा है कि मुहम्मद गौरी की हत्या ई.1205-1206 में झेलम के समीप जंगली लोगों नेकी थी, जब वह रात को अपने खेमे में सो रहा था।

अंग्रेज लेखक स्मिथ ने लिखा है कि शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी की हत्या पंजाब के झेलम जिले में ढामियाक अथवा दामयेक नामक स्थान पर कट्टरपंथी मुसलमानों के एक समूह द्वारा की गई थी। कुछ लेखकों के अनुसार मुहम्मद गौरी का वध विद्रोही गक्खरों ने किया था।  भारत में कुछ लोग मानते हैं कि मुहम्मद गौरी की हत्या पंजाब में रहने वाले खोखर जाटों ने की थी। संभवतः खोखरों को ही मुस्लिम इतिहासकारों ने गक्खर लिखा है।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

आनन्द स्वरूप मिश्र ने लिखा है कि मुहम्मद गौरी ने भारत पर नौ बड़े आक्रमण किए थे जिनमें से सात आक्रमणों में उसे विपुल सम्पत्ति हाथ लगी थी। मुहम्मद गौरी की सम्पत्ति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके पास 500 मन हीरे थे। यह विशाल सम्पत्ति मुहम्मद की रक्षा नहीं कर सकी। वह भी उन अभागे सुल्तानों एवं बादशाहों की तरह गुमनाम लोगों द्वारा निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया गया जिन्हें अपनी शक्ति, साम्राज्य एवं सम्पत्ति का बड़ा घमण्ड था।

आज भले ही अफगानिस्तान, पाकिस्तान एवं भारत के करोड़ों लोग मुहम्मद गौरी के नाम की आहें भरते हैं, उसके नाम की मिसाइलें और स्मारक बनवाते हैं किंतु इतिहास की कड़वी सच्चाई यह है कि उस काल में किसी को मुहम्मद के प्रति कोई सहानुभूति नहीं थी।

मुहम्मद का मृत शरीर मुहम्मद गौरी के किसी भी सेनापति, किसी भी गुलाम और किसी भी शाही व्यक्ति के काम का नहीं था। इसलिए उसके मृत शरीर के लिए एक मकबरा तक बनवाने की आवश्यकता अनुभव नहीं की गई और उसका शव उस मकबरे में दफनाया गया जो मुहम्मद गौरी की पुत्री के लिए बनाया जा रहा था।

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ई.1192 में चौहान पृथ्वीराज (तृतीय) की मृत्यु तथा ई.1194 में महाराज जयचंद की मृत्यु भारत के प्राचीन इतिहास के काल खण्ड की अंतिम बड़ी घटनाएं मानी जाती हैं। इसके बाद उत्तर भारत के मैदानों में हिन्दू राज्यों के स्थान पर तुर्क शासन की स्थापना हो गई और भारत का इतिहास मध्यकाल में प्रवेश कर गया। कुछ इतिहासकारों ने भारत के इतिहास के वर्गीकरण में हर्षवर्द्ध्रन की मृत्यु के बाद से लेकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु तक के काल को ‘राजपूत काल’ कहा है। यह ई.648 से लेकर ई.1192 तक का काल है किंतु दिल्ली सल्तनत की स्थापना मुहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद ई.1206 में हुई थी, इसलिए सामान्यतः ई.648 से लेकर ई.1206 तक की अवधि को भारत के इतिहास में राजपूत काल कहा जाता है। ई.1192 में दिल्ली पर मुहम्मद गौरी का अधिकार हो जाने से लेकर ई.1206 में मुहम्मद गौरी की मृत्यु होने तक दिल्ली पर मुहम्मद गौरी का हिन्दुस्तानी गवर्नर कुतुबुद्दीन ऐबक शासन करता रहा। उसके अधीन पंजाब के बहुत बड़े हिस्से से लेकर दिल्ली, अजमेर, कन्नौज, बनारस तथा बदायूं आदि के क्षेत्र थे। ये क्षेत्र सिंधु और सरस्वती से लेकर पंजाब की पांचों बड़ी नदियों- झेलम, चिनाव, रावी, सतलुज, व्यास से होते हुए गंगा एवं यमुना की अंतर्वेदी तक विस्तृत थे।

अंतर्वेदी को अब गंगा-यमुना का दो-आब कहा जाता है। सिंधु के तट से लेकर गंगा के मैदान तक विस्तृत यह क्षेत्र संसार के सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्रों में से एक था। धरती के इस भूखण्ड पर संसार की सर्वाधिक उन्नत एवं समृद्ध संस्कृति का प्रसार था। वेदों के मंत्र इसी क्षेत्र में प्रकट हुए थे।

पुराणों की गाथाएं इन्हीं क्षेत्रों में लिखी गई। श्री राम की अयोध्या, श्री कृष्ण की मथुरा, भगवान भोलेनाथ शिव की काशी इसी भूक्षेत्र में स्थित थी। भगवान वेदव्यास ने गीता का तथा महर्षि वाल्मीकि ने रामायण का प्रणयन इसी क्षेत्र में किया था। शकुंतला का पुत्र भरत इन्हीं मैदानों में खेला था। पाण्डवों ने इन्हीं मैदानों में अपनी दिग्विजय यात्रा की थी। चाणक्य और चंद्रगुप्त जैसे गुरु-शिष्य इसी भूखण्ड में प्रकट हुए थे। सम्राट समुद्रगुप्त ने इन्हीं मैदानों को जीतकर भारत राष्ट्र की कल्पना को साकार किया था।

दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही भारत के इतिहास का वह स्वर्णकाल बीत चुका था जब थाणेश्वर का सम्राट हर्षवर्द्धन, मरुभूमि के गुर्जर प्रतिहार नरेश तथा सपादलक्ष के चौहान इन मैदानों के स्वामी हुआ करते थे। समय बदल चुका था, वेदों की ऋचाएं शांत हो चुकी थीं, स्वर्ग से आने वाली हवाएं रास्ता भूल चुकी थीं तथा नदी तटों से उठने वाले यज्ञकुण्डों के धूम्र-वलय काल के गाल में समा चुके थे।

अब इन मैदानों तथा उनमें बहने वाली नदियों का स्वामी मुहम्मद गौरी का जेर-खरीद गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक था और निर्दोष हिन्दुओं के रक्त से भीग-भीग कर धरती लाल हो चुकी थी।

जैसे ही ई.1206 में मुहम्मद गौरी की हत्या हुई, उसके गवर्नरों में सल्तनत पर अधिकार करने के लिए छीना-झपटी मच गई क्योंकि मुहम्मद गौरी के कोई पुत्र नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कुरूप तुर्की गुलाम भारत का भविष्य बन गया (42)

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कुरूप तुर्की गुलाम भारत का भविष्य बन गया

मुहम्मद गौरी की हत्या हो जाने के बार कुरूप तुर्की गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का स्वामी बन गया। अब वही भारत का भाग्य-विधाता था और अब वही भारत के लोगों का भविष्य तय करने वाला था।

ई.1206 में मुहम्मद गौरी की हत्या हो गई। मुहम्मद गौरी निःसंतान था, इसलिए उसके गुलामों एवं उसके रक्त सम्बन्धियों में उसके साम्राज्य पर अधिकार करने को लेकर झगड़ा हुआ। अंत में उसके गुलाम ताजुद्दीन यल्दूज ने गजनी पर तथा दिल्ली के गवर्नर कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारतीय क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया जो कि मुहम्मद गौरी का जेरखरीद कुरूप तुर्की गुलाम था।

इस प्रकार दिल्ली में पहली बार मुस्लिम सत्ता की स्थापना हुई। उसके दिल्ली का सुल्तान बनने के समय भारत में दिल्ली, अजमेर तथा लाहौर प्रमुख राजनीतिक केन्द्र थे। ये तीनों ही मुहम्मद गौरी और उसके गवर्नरों के अधीन जा चुके थे। इनके साथ ही हांसी, सिरसा, समाना, कोहराम, कन्नौज, बनारस तक के क्षेत्र भी नई सल्तनत के अधीन थे।

नई सल्तनत द्वारा देश में इस्लामी राज्य स्थापित हो जाने की घोषणा के साथ ही उत्तर भारत के सैंकड़ों मन्दिर एवम् पाठशालाएं ध्वस्त करके अग्नि को समर्पित कर दी गईं। हजारों-लाखों हिन्दू मौत के घाट उतार दिए गए तथा हजारों हिन्दू स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया।

हिन्दू राजाओं का मनोबल टूट गया तथा जैन एवं बौद्ध साधु उत्तरी भारत छोड़कर नेपाल तथा तिब्बत आदि देशों को भाग गए। देश की अपार सम्पत्ति म्लेच्छों के हाथ लगी। उन्होंने पूरे उत्तर भारत में भय और आतंक का वातावरण बना दिया जिससे भारतीय जन-जीवन में हाहाकार मच गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने ई.1206 से लेकर 1210 में अपनी मृत्यु होने तक दिल्ली पर स्वतंत्र शासक के रूप में शासन किया। उसने भारत में ‘तुर्की सल्तनत’ की स्थापना की किंतु उसे ‘दिल्ली सल्तनत’ के नाम से जाना गया। चूंकि कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गौरी का जेरखरीद गुलाम था इसलिए उसने दिल्ली में जिस राजवंश की स्थापना की उसे भारत के इतिहास में ‘गुलाम-वंश’ कहते हैं। इस वंश के समस्त शासक अपने जीवन के प्रारम्भिक काल में या तो गुलाम रह चुके थे या फिर वे किसी गुलाम की संतान थे।

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इस वंश का पहला शासक कुतुबुद्दीन ऐबक, मुहम्मद गौरी का गुलाम था। इस वंश का दूसरा शासक इल्तुतमिश, कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम था। इस वंश का तीसरा प्रभावशाली शासक बलबन, इल्तुतमिश का गुलाम था। अतः यह वंश, गुलाम वंश कहलाता है। गुलाम वंश के समस्त शासक तुर्क थे।

कुछ इतिहासकार गुलाम वंश नामकरण उचित नहीं मानते। उनके अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में ‘कुतुबी’, इल्तुतमिश ने ‘शम्मी’ तथा बलबन ने ‘बलबनी’ राजवंश की स्थापना की। इस प्रकार इस समय में दिल्ली में एक वंश ने नहीं, अपितु तीन वंशों ने शासन किया। इन इतिहासकारों के अनुसार इस काल को ‘दिल्ली सल्तनत’ का काल कहना चाहिये।

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इस प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक भारत में तुर्की सल्तनत का संस्थापक, दिल्ली सल्तनत का संस्थापक, गुलाम वंश का संस्थापक तथा कुतुबी वंश का संस्थापक था। वह दिल्ली का पहला मुसलमान सुल्तान था। उसका जन्म तुर्किस्तान के कुलीन तुर्क परिवार में हुआ था किंतु वह बचपन में अपने परिवार से बिछुड़ गया तथा गुलाम के रूप में बाजार में बेच दिया गया। वह कुरूप किंतु प्रतिभावान बालक था। एक व्यापारी उसे दास के रूप में बेचने के लिए तुर्किस्तान से गजनी ले आया। सबसे पहले अब्दुल अजीज कूकी नामक एक काजी ने कुतुबुद्दीन को खरीदा। उस समय कुतुबुद्दीन बालक ही था। इसलिए उसने काजी के बच्चों के साथ घुड़सवारी सीखी तथा थोड़ी-बहुत शिक्षा प्राप्त की। गजनी के काजी ने कुतुबुद्दीन को कुछ समय बाद फिर से बाजार में बेच दिया। इस प्रकार कुतुबुद्दीन कई बार बिका। एक बार उसे मुहम्मद गौरी के सामने लाया गया। मुहम्मद गौरी ने कुतुबुद्दीन की कुरूपता पर विचार न करके उसे खरीद लिया। कुतुबुद्दीन ने अपने गुणों से मुहम्मद गौरी को मुग्ध कर लिया और उसका अत्यन्त प्रिय तथा विश्वासपात्र गुलाम बन गया। वह अपनी योग्यता के बल पर धीरे-धीरे एक पद से दूसरे पद पर पहुँचता गया और ‘अमीर आखूर’ अर्थात् घुड़साल रक्षक के पद पर पहुँच गया।

कुछ समय बाद कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गौरी का इतना प्रिय बन गया कि गौरी ने उसे ‘ऐबक’ अर्थात् ‘चन्द्रमुखी’ के नाम से पुकारना आरम्भ किया। जब मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण करना आरम्भ किया तब ऐबक भी उसके साथ भारत आया और अपने सैनिक-गुणों का परिचय दिया। मुहम्मद गौरी को अपनी भारतीय विजयों में ऐबक से बड़ा सहयोग मिला। तराइन के दूसरे युद्ध में कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गौरी के साथ मौजूद था। कन्नौज के राजा जयचंद के विरुद्ध किए गए सैनिक अभियान में तो कुतुबुद्दीन ऐबक को मुस्लिम सेना के हरावल में रखा गया था। 

ई.1194 में जब मुहम्मद गौरी कन्नौज विजय के उपरान्त गजनी लौटा, तब उसने भारत के विजित भागों का प्रबन्ध कुतुबुद्दीन ऐबक के हाथों में दे दिया। इस प्रकार ऐबक मुहम्मद गौरी के भारतीय राज्य का वाइसराय बन गया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गौरी के विजय अभियान को जारी रखा। ई.1195 में उसने कोयल को जीता जिसे अब अलीगढ़ कहा जाता है। इसके बाद उसने अन्हिलवाड़ा को नष्ट किया। जिस अन्हिलवाड़ा को मुहम्मद गौरी नहीं जीत पाया था, उसी अन्हिलवाड़ा को जलाकर राख करने का काम कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया।

ई.1196 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने मेड़ राजपूतों को परास्त किया जो चौहानों की सहायता कर रहे थे। ई.1197 में उसने बदायूँ, चन्दावर और कन्नौज पर पुनः अधिकार किया। ये क्षेत्र संभवतः फिर से हिन्दुओं द्वारा छीन लिए गए थे।

ई.1202 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने चंदेलों को परास्त करके बुंदेलखण्ड का क्षेत्र अपने साम्राज्य में मिला लिया। इस प्रकार गौरी की मृत्यु से पूर्व ऐबक ने लगभग सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार कर लिया। इस विशाल मुस्लिम साम्राज्य को परास्त करके पुनः दिल्ली तथा उत्तर भारत के राज्यों पर अधिकार करना हिन्दू राजकुलों के वश की बात नहीं रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कुतुबुद्दीन ऐबक ने यल्दूज की बेटी से ब्याह कर लिया (43)

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कुतुबुद्दीन ऐबक ने यल्दूज की बेटी से ब्याह कर लिया

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के समय उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का गवर्नर था। वह एक तुर्की गुलाम था जिसे तुर्किस्तान से लेकर अफगानिस्तान में कई बार बेचा गया था किंतु उसने अपनी योग्यता एवं सुल्तान की कृपा के बल पर अमीर तथा दिल्ली का गवर्नर होने का गौरव प्राप्त किया था।

मुहम्मद गौरी के कोई पुत्र नहीं था इसलिए उसके अमीरों में सल्तनत पर अधिकार करने की होड़ आरम्भ हो गई। ताजुद्दीन यल्दूज नामक एक अमीर ने गजनी पर अधिकार कर लिया। पाठकों को स्मरण होगा कि मुहम्मद गौरी ने अपने बड़े भाई मरहूम गयासुद्दीन गौरी के पुत्र महमूद को फीरोजकोह नामक क्षेत्र का गवर्नर बनाया था जो कि अफगानिस्तान में ही स्थित था। महमूद का पूरा नाम महमूद बिन गियासुद्दीन बताया जाता है।

जब मुहम्मद गौरी मर गया और ताजुद्दीन यल्दूज ने गजनी पर अधिकार कर लिया तो फीरोजकोह के गवर्नर महमूद बिन गियासुद्दीन ने गजनी पर आक्रमण करके स्वयं को गजनी का सुल्तान घोषित कर दिया क्योंकि सल्तनत का वास्तविक अधिकारी गियासुद्दीन ही था न कि ताजुद्दीन याल्दुज।

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के समय कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली में था। जब मुहम्मद गौरी की मृत्यु का समाचार लाहौर पहुँचा तो लाहौर के नागरिकों ने कुतुबुद्दीन ऐबक को लाहौर का शासन अपने हाथों में लेने का निमंत्रण भिजवाया। यह निमंत्रण पाकर कुतुबुद्दीन तुरन्त दिल्ली से लाहौर के लिए चल पड़ा और वहाँ पहुँच कर उसने लाहौर का शासन अपने हाथ में ले लिया।

उसने 24 जून 1206 को लाहौर में ही अपना राज्यारोहण समारोह आयोजित करवाया। उस समय मुहम्मद गौरी की मृत्यु को केवल तीन माह ही हुए थे। तख्त पर बैठने के बाद भी ऐबक ने स्वयं को अमीर, मलिक, सिपहसलार ही कहलवाना जारी रखा तथा सुल्तान की उपाधि का प्रयोग नहीं किया।

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पूरे दो साल तक कुतुबुद्दीन ऐबक बिना सुल्तान बने ही सल्तनत चलाता रहा। उसने न तो अपने नाम की मुद्रायें चलवाईं और न अपने नाम से खुतबा ही पढ़वाया। संभवतः वह गजनी के सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन से वैमनस्य उत्पन्न किये बिना, भारत में एक स्वतन्त्र तुर्की शासन की स्थापना करना चाहता था।

ई.1208 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने एक दूत के माध्यम से एक प्रस्ताव सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन के पास भेजा कि यदि सुल्तान, कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत का स्वतन्त्र सुल्तान बना दे तो कुतुबुद्दीन ऐबक ख्वारिज्म के शाह के विरुद्ध गियासुद्दीन महमूद की सहायता करेगा। उस समय ख्वारिज्म का शाह गजनी के लिए बहुत बड़ी मुसीबत बना हुआ था। उसने मुहम्मद गौरी के अंतिम दिनों में ही मुहम्मद गौरी से मध्यएशिया का बहुत बड़ा भूभाग छीन लिया था और अब वह गजनी के राज्य का समाप्त करने पर उतारू था।

गजनी के सुल्तान गियासुद्दीन महमूद ने कुतुबुद्दीन ऐबक का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। ई.1208 में गियासुद्दीन ने कुतुबुद्दीन ऐबक को राजछत्र, ध्वजा, सिंहासन तथा दुंदुभि आदि राज्यसूचक वस्तुएँ भेजीं तथा उसे सुल्तान की उपाधि से विभूषित किया। इस प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का स्वतन्त्र शासक बन गया।


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गजनी के नए सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन में इतनी योग्यता नहीं थी कि वह मुहम्मद गौरी द्वारा स्थापित विशाल सल्तनत पर शासन कर सके। इसलिए कुछ ही समय बाद सल्तनत के तीन अमीरों द्वारा सल्तनत के विभिन्न भागों पर अधिकार करने की चेष्टाएं आरम्भ हो गईं। ताजुद्दीन यल्दूज ने महमूद बिन गियासुद्दीन को गजनी से हटा दिया तथा पुनः गजनी का सुल्तान बन गया। कुतुबुद्दीन ऐबक पहले ही भारत का स्वतंत्र सुल्तान बन चुका था। मुहम्मद गौरी के समय से ही कुबाचा नामक एक अमीर मुल्तान तथा सिंध क्षेत्र का गवर्नर था। उसने भी स्वयं को गजनी से स्वतंत्र कर लिया। ताजुद्दीन यल्दूज ने ई.1208 में गजनी में एक बड़ी सेना तैयार की और कुबाचा को परास्त करके मुल्तान पर अधिकार कर लिया। इस पर कुबाचा ने कुतुबुद्दीन ऐबक को सहायता के लिए बुलवाया। ऐबक ने एक विशाल सेना लेकर मुल्तान पर आक्रमण किया तथा यल्दूज की सेना को मुल्तान से मार भगाया। इस अवसर पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी एक पुत्री का विवाह कुबाचा से कर दिया तथा कुबाचा ने जीवन भर कुतुबुद्दीन के प्रति निष्ठा रखने का वचन दिया। मुल्तान विजय के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने आगे बढ़कर गजनी पर भी आक्रमण किया। यल्दूज गजनी छोड़कर भाग गया और गजनी पर कुतुबुद्दीन का अधिकार हो गया।

गजनी के इतिहासकारों के अनुसार ऐबक अपनी विजय से मदांध होकर शराब पीने में व्यस्त हो गया। उसकी सेना ने गजनी के लोगों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। इससे तंग आकर गजनी के अमीरों ने यल्दूज को फिर से गजनी में आने के लिए आमन्त्रित किया।

ऐसा प्रतीत होता है कि गजनी के इतिहासकारों ने जानबूझ कर कुतुबुद्दीन पर झूठे आक्षेप लगाए हैं कि वह शराब पीने में व्यस्त हो गया तथा उसकी सेना ने जनता पर अत्याचार किए। कुतुबुद्दीन लम्बे समय से सुल्तान के पद पर कार्य कर रहा था और उसे सुल्तान के द्वारा किए जाने वाले आचरण की जानकारी थी।

वस्तुतः कुतुबुद्दीन ऐबक ई.1192 से दिल्ली का शासक था तथा उसे दिल्ली पर शासन करते हुए 16 साल हो गए थे। इस कारण गजनी वालों के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक अब दिल्ली का सुल्तान था। गजनी के लोग यह सहन नहीं कर सकते थे कि दिल्ली का सुल्तान गजनी पर शासन करे और गजनी उसके साम्राज्य का एक प्रान्त बन कर रहे। यह गजनी तथा उसके निवासियों, दोनों के लिये अपमानजनक बात थी।

इसलिए जब गजनी के लोगों ने यल्दूज को फिर से गजनी पर अधिकार करने के लिए आमंत्रित किया तो यल्दूज ने गजनी को अफगानियों के स्वाभिमान का प्रश्न बना दिया। इस कारण गजनी के हजारों युवक यल्दूज की तरफ से लड़ने के लिए आ गए। उनकी सहायता से यल्दूज ने फिर से गजनी पर अधिकार कर लिया।

कुतुबुद्दीन ऐबक को यल्दूज से संधि करनी पड़ी। ऐबक ने यल्दूज को वचन दिया कि अब वह गजनी के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। इस संधि को मजबूत बनाने के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक ने यल्दूज की बेटी से ब्याह कर लिया।

इस प्रकार कुतुबुद्दीन ने कुबाचा और यल्दूज दोनों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए तथा भविष्य में होने वाले संघर्षों को टाल दिया ताकि वह शांति पूर्वक दिल्ली पर शासन कर सके। कुतुबुद्दीन के भाग्य से ख्वारिज्म के शाह ने गौर प्रदेश पर अधिकार कर लिया जिससे गजनी सल्तनत की नींव हिल गई तथा ई.1215 के आते-आते गजनी सल्तनत पूरी तरह समाप्त हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत का राजमुकुट युद्ध के मैदानों में मिला था कुतुबुद्दीन ऐबक को (44)

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भारत का राजमुकुट युद्ध के मैदानों में मिला था कुतुबुद्दीन ऐबक को

गजनी के एक कुरूप गुलाम के सिर पर भारत का राजमुकुट सज गया किंतु उसे भारत का राजमुकुट किसी की कृपा से प्राप्त नहीं हुआ था। उसने यह मुकुट युद्ध के मैदानों में तलवार के जोर पर हासिल किया था।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने गजनी के सुल्तान यल्दूज तथा मुल्तान के सुल्तान कुबाचा से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करके अपने राज्य की पश्चिमी सीमाओं को सुरक्षित बना लिया था। अब वह बड़ी शान से राजमुकुट धारण करके दिल्ली में बैठा। उसने एक ऐसी सल्तनत की नींव डाली थी जो अगले सवा तीन सौ साल तक अस्तित्व में रहने वाली थी।

कुतुबुद्दीन ऐबक के इतिहास में आगे बढ़ने से पहले हम युद्ध और विजयों के सम्बन्ध में कही जाने वाली एक लैटिन कहावत की चर्चा करेंगे। ईसा के जन्म से 47 साल पहले रोमन योद्धा जूलियस सीजर ने अपने लिए कहा था- ‘मैं आया, मैंने देखा और मैंने जीत लिया।’

इसी प्रकार अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के फ्रांसीसी योद्धा नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने बारे में कहा था- ‘फ्रांस का राजमुकुट मैंने युद्ध के मैदानों में पड़ा हुआ देखा, मैंने उसे अपनी तलवार से उठा लिया!’

भारत में तुर्की इतिहास के संदर्भ में इनमें से पहली कहावत मुहम्मद गौरी पर लागू होती है- ‘वह आया, उसने देखा और जीत लिया।’ जबकि दूसरी कहावत कुतुबुद्दीन ऐबक पर लागू होती है- ‘भारत का राजमुकुट उसे युद्ध के मैदानों में गिरा हुआ मिला।’

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ऐबक किसी सुल्तान का बेटा नहीं था, अपितु मध्यएशिया के बाजारों में पशुओं की तरह बिका हुआ एक निरीह गुलाम था। यदि बारहवीं सदी के गला-काट बेरहम युग में एक तुच्छ गुलाम दिल्ली का सुल्तान बना था तो उसके पीछे केवल उसका भाग्य ही काम नहीं कर रहा था। उसका उद्यम, परिश्रम, संघर्ष और उसके द्वारा चलाई गई तलवारें भी उसे सुल्तान के तख्त तक लेकर आए थे।

मुहम्मद गौरी ने भले ही उत्तरी भारत के बहुत बड़े हिस्से को अपनी तलवार की धार पर जीत लिया था किंतु इस विशाल भू-भाग पर अधिकार बनाए रखना, उसे जीतने की अपेक्षा कहीं अधिक दुष्कर था। इसके लिए कुतुबुद्दीन ऐबक को बहुत परिश्रम करना था। उसे मृत्यु-पर्यंत तलवार को कसकर पकड़े रखना ही था। वह स्वयं भी इस बात को समझता था कि जिस भी क्षण उसके हाथ से तलवार छूटेगी, उसी क्षण यह सल्तनत मुट्ठी में पकड़ी हुई रेत की तरह फिसल जाएगी। भारत में उसके शत्रुओं की कमी नहीं थी।

खलीक अहमद निजामी ने लिखा है- ‘यदि भारतीय जनता ने भारत में तुर्की शासन की स्थापना का प्रतिरोध किया होता तो गौरवंशी, भारतीय क्षेत्र में एक इंच भी भूमि नहीं जीत सकते थे।’

खलीक अहमद का यह कहना गलत है कि भारतीय जनता ने तुर्की शासन का विरोध नहीं किया था। वास्तविकता यह है कि पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद भी भारतीय प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ था। भारत के प्रमुख हिन्दू राजा उसी दिन से अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास करने लगे थे जिस दिन से पृथ्वीराज चौहान ने तराइन का मैदान हारा था।

इस कारण मेरठ, बरन (अब बुलंदशहर), कोयल (अब अलीगढ़), चंदावर, बयाना, ग्वालियर, गुजरात, कालिंजर तथा बदायूं आदि अनेक क्षेत्रों में कुतुबुद्दीन ऐबक को हिन्दू राजाओं एवं हिन्दू सरदारों का सशस्त्र प्रतिरोध झेलना पड़ा। हांसी (अब हिसार जिले में), दिल्ली तथा अजमेर में उसे राजपूतों के भयानक विद्रोहों का सामना करना पड़ा।

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ई.1208 में जिस समय कुतुबुद्दीन ऐबक मुल्तान तथा गजनी के अभियान में व्यस्त था, उस समय अवसर देखकर चंदेल राजपूतों ने अपनी राजधानी कालिंजर पर फिर से अधिकार स्थापित कर लिया था। चंदेलों ने न केवल कालिंजर पर अपितु अजयगढ़, झांसी, सौगोर, बिजवार, पन्ना और छत्तरपुर आदि अपने सभी पुराने क्षेत्र मुसलमानों से मुक्त करवा लिए। गहड़वाल राजपूतों ने हरिश्चन्द्र के नेतृत्व में फर्रूखाबाद तथा बदायूँ में फिर से धाक जमा ली थी। ग्वालियर फिर से प्रतिहार राजपूतों के हाथों में चला गया था। अन्तर्वेद (गंगा-यमुना के बीच के प्रदेश) में भी कई छोटे-छोटे राज्यों ने दिल्ली सल्तनत को कर देना बन्द कर दिया था और तुर्कों को इस क्षेत्र से बाहर निकाल दिया था। हांसी में जटवन नामक एक हिन्दू सरदार ने तुर्की सेना को घेर लिया। ऐबक को दिल्ली से एक बड़ी सेना लेकर हांसी पहुंचना पड़ा और इस विद्रोह को दबाना पड़ा। जटवन बागड़ के पास हुए युद्ध में काम आया। बरन नामक स्थान पर चंद्रसेन के नेतृत्व में डोर राजपूतों ने विद्रोह का झण्डा बुलंद कर दिया। कुतुबुद्दीन ऐबक वहाँ भी सेना लेकर पहुंचा और उसने डोर राजपूतों के नेता चंद्रसेन का दमन किया। कहते हैं कि चंद्रसेन का एक सम्बन्धी अजयपाल चंद्रसेन को धोखा देकर कुतुबुद्दीन ऐबक से मिल गया, इस कारण डोर राजपूत हार गए।

मेरठ में भी हिन्दुओं ने विद्रोह किया किंतु कुतुबुद्दीन ऐबक ने मेरठ का विद्रोह भी सफलतापूर्वक दबा दिया तथा वहाँ तुर्की सैनिकों की एक टुकड़ी तैनात कर दी।

ई.1193 में दिल्ली के तोमरों ने कुतुबुद्दीन ऐबक के विरुद्ध फिर से हथियार उठा लिए। इस पर ऐबक ने तोमरों को बुरी तरह परास्त किया। इसी बीच अजमेर में चौहान राजपूतों ने भयानक विद्रोह किया। इस विद्रोह की हम आगे चलकर विस्तार से चर्चा करेंगे।

इस प्रकार निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक को मुहम्मद गौरी ने दिल्ली का गवर्नर भले ही बना दिया हो किंतु गवर्नर से सुल्तान बनने तथा भारत का राजमुकुट सुल्तान के सिर पर सजे रहने के लिए कुतुबुद्दीन को जीवन भर तलवार चलानी पड़ी थी। वह चारों ओर शत्रुओं से घिरा हुआ था। हर समय मौत का खतरा उसके सिर पर मण्डराता रहता था। हिन्दू राजा एवं सरदार जो कि इस देश के वास्तविक स्वामी थे तथा जिन्हें कुतुबुद्दीन ऐबक और उसके सेनापति विद्रोही कहते थे, प्राण-प्रण से अपनी भूमि फिर से प्राप्त करने के लिए जूझ रहे थे।

कुतुबुद्दीन ऐबक को जितना भय इन विद्रोही हिन्दू राजाओं से था, उससे कहीं अधिक भय मध्य-एशिया की तरफ से होने वाले आक्रमण का था क्योंकि ख्वारिज्म के शाह की दृष्टि गजनी तथा दिल्ली पर लगी हुई थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सैयद हुसैन खनगसवार मीरन को राजपूतों ने मार डाला (45)

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सैयद हुसैन खनगसवार मीरन को राजपूतों ने मार डाला

कुतुबद्दीन ऐबक ने सैयद हुसैन खनगसवार मीरन साहिब को अजमेर का दरोगा नियुक्त किया। इस प्रकार बारहवीं शताब्दी के अंत में अजमेर के चौहान नेपथ्य में चले गये तथा शाकंभरी राज्य पूरी तरह लुप्त हो गया।

दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बनने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक को रावी से लेकर ब्रह्मपुत्र की घाटी तक हिन्दू राजाओं एवं सरदारों द्वारा स्वतंत्र होने के लिए किए गए सशस्त्र प्रयासों का सामना करना पड़ा था। हम अपनी पूर्व में चर्चा कर चुके हैं कि ई.1192 में शहाबुद्दीन गौरी, स्वर्गीय राजा पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविंदराज को अजमेर की गद्दी पर बैठाकर पुनः दिल्ली लौट गया।

जब वह दिल्ली से गजनी जा रहा था, तब एक चौहान सरदार ने हांसी के निकट मुहम्मद गौरी का मार्ग रोका। ताजुल मासिर के लेखक हसन निजामी ने इस चौहान मुखिया का नाम नहीं लिखा है। हसन निजामी के अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा इस चौहान मुखिया का वध किया गया। कुछ भाट-ग्रंथों में इस चौहान मुखिया को पृथ्वीराज का बड़ा पुत्र रेणसी बताया गया है जो इस युद्ध में काम आया।

वस्तुतः पृथ्वीराज के किसी भी पुत्र का नाम रेणसी नहीं था। अतः हांसी के निकट मुहम्मद गौरी का मार्ग रोकने वाला चौहान योद्धा पृथ्वीराज का पुत्र न होकर कोई और रेणसी रहा होगा।

हसन निजामी ने लिखा है कि जब शहाबुद्दीन गौरी कुतबुद्दीन ऐबक को भारत में विजित क्षेत्रों का गवर्नर नियुक्त करके गजनी चला गया तब पृथ्वीराज चौहान के छोटे भाई हरिराज ने पृथ्वीराज के पुत्र गोविन्दराज को अजमेर से मार भगाया तथा स्वयं अजमेर का राजा बन गया क्योंकि गोविंदराज ने मुसलमानों की अधीनता स्वीकार कर ली थी।

इस समय कुतुबद्दीन ऐबक, बनारस, कन्नौज तथा कोयल (अलीगढ़) में हिन्दू विरोध से निबटने में व्यस्त था। इस कारण कुतुबुद्दीन ऐबक गोविंदराज को कोई सहायता उपलब्ध नहीं करा सका। इसलिए गोविंदराज अजमेर का दुर्ग खाली करके रणथंभौर चला गया।

हरिराज ने अजमेर पर अधिकार करके रणथंभौर को घेर लिया। गोविंदराज ने पुनः कुतुबुद्दीन ऐबक से सहायता मांगी। जब कुतुबुद्दीन ऐबक की सेना गोविंदराज की सहायता के लिये आई तो हरिराज रणथम्भौर का घेरा उठाकर अजमेर चला आया।

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ई.1194 में हरिराज ने अपने सेनापति चतरराज को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये भेजा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने चतरराज को परास्त कर दिया। चतरराज फिर से अजमेर लौट आया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने चतरराज का पीछा किया तथा वह भी सेना लेकर अजमेर आ गया और उसने तारागढ़ घेर लिया। हरिराज ने आगे बढ़कर कुतुबुद्दीन पर आक्रमण किया किंतु थोड़े से संघर्ष के बाद हरिराज परास्त हो गया।

हम्मीर महाकाव्य के अनुसार अपनी पराजय निश्चित जानकर हरिराज और उसका सेनापति जैत्रसिंह, अपने स्त्री समूह सहित, जीवित ही अग्नि में प्रवेश कर गये। इस प्रकार ई.1195 में अजमेर पर फिर से मुसलमानों का अधिकार हो गया। कुतुबद्दीन ऐबक ने सैयद हुसैन खनगसवार मीरन साहिब को अजमेर का दरोगा नियुक्त किया। इस प्रकार बारहवीं शताब्दी के अंत में अजमेर के चौहान नेपथ्य में चले गये तथा शाकंभरी राज्य पूरी तरह लुप्त हो गया।

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सम्राट पृथ्वीराज चौहान को वीरगति प्राप्त हुए 10 साल बीत गए थे किंतु अजमेर के चौहान अब भी अजमेर को स्वतंत्र कराने का स्वप्न देखते रहे। 12 अप्रेल 1202 की रात में, तारागढ़ के आसपास रहने वाले राठौड़ों एवं चौहानों के एक समूह ने अजमेर दुर्ग पर आक्रमण किया। राजपूत सैनिक किसी तरह बीठली दुर्ग में घुसने में सफल हो गए। रात के अंधेरे में दोनों पक्षों के बीच भयानक युद्ध हुआ जिसमें दुर्ग के भीतर स्थित समस्त मुस्लिम सैनिकों को मार डाला गया। राजपूतों ने दरोगा सैयद हुसैन खनगसवार मीरन को भी मार डाला। इस प्रकार अजमेर दुर्ग एक बार फिर से हिन्दुओं के अधिकार में आ गया। दुर्ग से भागे हुए मुस्लिम सिपाही जब यह समाचार लेकर दिल्ली पहुँचे तो कुतबुद्दीन ऐबक के होश उड़ गये। इस समय उसकी सेनाएं चारों दिशाओं में फैली हुई थीं तथा हिन्दू राजाओं एवं सरदारों से उलझी हुई थीं। इसलिए कुतुबुद्दीन ऐबक ने गजनी से सेना मंगवाई। गजनी से आई विशाल सेना ने राजपूतों से बीठली का दुर्ग फिर से छीन लिया तथा अजमेर में कत्लेआम किया। गजनी की सेना का यह प्रतिशोध बहुत भयानक था। गजनी से आई सेना ने तारागढ़ में स्थित राजपूत सैनिकों को मारने के बाद दुर्ग के बाहर रहने वाले राजपूत परिवारों को पकड़कर उनकी सुन्नत की और उन्हें मुसलमान बनाया।

इस्लाम में परिवर्तित होने के बाद ये राजपूत परिवार तारागढ़ के निकट ही रहने लगे। बाद में इन्हें देशवाली मुसलमान कहा जाने लगा। गजनी एवं गौर से आए मुसलमानों द्वारा इन्हें बहुत नीची दृष्टि से देखा जाता था। गजनी के मुसलमानों द्वारा देशवाली मुसलमानों को बराबर का स्तर नहीं दिया गया। उन्हें सेना में भी भर्ती नहीं किया जाता था। इसलिये देशवाली मुसलमान उपेक्षित जीवन जीने लगे और उनकी आर्थिक दशा दिन पर दिन गिरने लगी। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बख्तियार खिलजी ने नालंदा एवं विक्रमशिला के बौद्ध भिक्षुओं को क्रूरता से मारा (46)

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बख्तियार खिलजी ने नालंदा एवं विक्रमशिला के बौद्ध भिक्षुओं को क्रूरता से मारा

इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने नालंदा एवं विक्रमशिला में निहत्थे आचार्यों, बटुकों, बौद्ध भिक्षुओं तथा स्नातकों के साथ उसी निर्दयता, नृशंसता एवं क्रूरता का प्रदर्शन किया जो मुहम्मद गौरी ने अजमेर में चौहानों के साथ एवं कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में तोमरों के साथ किया था।

ई.1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक मुल्तान एवं गजनी के अभियान पर गया तो भारत के अन्य भू-भागों की तरह बंगाल से भी उसे बड़ी चुनौती मिली। इस चुनौती का इतिहास जानने से पहले हमें एक बार ई.1193 में लौटना होगा जब कुतुबुद्दीन ऐबक ने इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी नामक एक सेनापति को बिहार की तरफ अभियान करने के लिए भेजा था।

बख्तियार खिलजी बड़ी तेजी से बिहार की ओर बढ़ा। उसने मार्ग में पड़ने वाले नगरों, गांवों और कस्बों को उजाड़कर वीरान बना दिया। देखते ही देखते उसने बिहार पर भी अधिकार कर लिया। उन दिनों बिहार में नालंदा एवं विक्रमशिला के विश्वविद्यालय अपने चरम पर थे। ये दोनों विश्वविद्यालय भारत की पश्चिमी सीमा पर स्थित तक्षशिला विश्वविद्यालय तथा गुजरात के वलभी विश्वविद्यालय की तरह विश्व-विख्यात थे तथा सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में भारतीय ज्ञान के प्रकाश-स्तंभ की तरह कार्य करते थे।

बख्तियार खिलजी जानता था कि उसकी सेना द्वारा किए गए युद्ध-अभियान तब तक अधूरे हैं जब तक कि भारतीय संस्कृति की जड़ों पर चोट नहीं की जाए। वह यह भी जानता था कि उत्तरी भारत में स्थित हिन्दुओं एवं बौद्धों के मंदिर, मठ, उपाश्रय तो भारतीय संस्कृति को सुशोभित करने वाले पुष्प मात्र हैं। इनके टूटने से भारतीय संस्कृति की चमक-दमक भले ही कुछ कम हो जाए किंतु इससे संस्कृति की जड़ों को कुछ नहीं होगा।

बख्तियार खिलजी अच्छी तरह जानता था कि भारतीय संस्कृति की जड़ें भारत भर में फैले गुरुकुलों, विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से निकलती हैं। अतः बख्तियार खिलजी ने अपने मार्ग में पड़ने वाले शिक्षा के समस्त केन्द्रों को प्रमुख रूप से निशाने पर लिया। उसने नालंदा एवं विक्रमशिला के विश्वविद्यालयों को जलाकर राख कर दिया। इन विश्वविद्यालयों में चीन, तिब्बत तथा लंका आदि देशों के हजारों विद्यार्थी एवं शिक्षक पढ़ने-पढ़ाने के लिए आया करते थे।

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ये दोनों विश्वविद्यालय पहले वैदिक शिक्षा के केन्द्र हुआ करते थे किंतु बाद में इनमें बौद्ध शिक्षा का बोलबाला हो जाने से इन दोनों विश्वविद्यालयों में बौद्ध भिक्षुओं की प्रमुखता हो गई थी। चूंकि पिछले कई सौ सालों से भारतीय राजाओं में बौद्धधर्म को राजधर्म बनाने का प्रचलन समाप्त हो गया था इसलिए दोनों ही विश्वविद्यालयों में बौद्धधर्म के साथ-साथ वैदिक धर्म के आचार्य एवं स्नातक भी पठन-पाठन करते थे।

बख्तियार खिलजी की क्रूर सेनाएं इन विश्वविद्यालयों में घुस गईं तथा शिक्षकों, स्नातकों, बटुकों एवं बौद्ध भिक्षुओं को बड़ी निर्ममता से मारने लगीं। विश्वविद्यालयों में स्थित आचार्यों एवं विद्यार्थियों के आवास, विहार, पुस्तकालय, यज्ञशालाएं एवं भोजनशालाएं नष्ट कर दिए गए।

बख्तियार खिलजी ने नालंदा एवं विक्रमशिला में निहत्थे आचार्यों, बटुकों, बौद्ध भिक्षुओं तथा स्नातकों के साथ उसी निर्दयता, नृशंसता एवं क्रूरता का प्रदर्शन किया जो मुहम्मद गौरी ने अजमेर में चौहानों के साथ एवं कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में तोमरों के साथ किया था। कई हजार आचार्यों, बटुकों, बौद्ध भिक्षुओं तथा स्नातकों के सिर धड़ से काटकर धरती पर फैंक दिए गए। महीनों तक उनके शव सड़ते रहे।

इनमें से हजारों विद्यार्थी चीन, तिब्बत, लंका, बर्मा, स्याम, जावा, सुमात्रा, बाली आदि सैंकड़ों देशों एवं द्वीपों से आए हुए थे जो भारत की संस्कृति को सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में प्रसारित करने का काम करते थे। विश्वविद्यालयों की जिन वाटिकाओं एवं कक्षों से वेदमंत्र एवं बौद्ध-सूत्र गूंजा करते थे, वहाँ अब चील, कौए, गिद्ध, सियार एवं श्वान चीखा करते थे।

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विश्वविद्यालयों में स्थित संसार के दुर्लभ ग्रंथों के पुस्तकालय आग के हवाले कर दिए गए जिसके कारण मीलों दूर तक धुआं फैल गया। विश्वविद्यालयों के जिन परिसरों में स्थित यज्ञकुण्डों से हवन के सुवासित वलय उठा करते थे, अब वहाँ से मौत का काला धुआं उठ रहा था। ये दोनों विश्वविद्यालय फिर कभी अस्तित्व में नहीं आ सके। ई.1203 में ऐबक के आदेश पर बख्तियार खिलजी ने बंगाल के शासक लक्ष्मण सेन पर आक्रमण किया। इस युद्ध में लक्ष्मण सेन परास्त हो गया तथा बंगाल का काफी बड़ा हिस्सा बख्तियार खिलजी के अधीन हो गया। उन दिनों बंगाल में देवकोट नामक अत्यंत प्राचीन नगर हुआ करता था। इसे कोटिवर्ष भी कहते थे। यह स्थान इतना पुराना था कि इसका नाम वायु पुराण आदि ग्रंथों में भी मिलता है। इख्तियारुद्दीन ने इसी देवकोट को अपनी राजधानी बनाया। अब यह नगर अस्तित्व में नहीं है किंतु इस नगर के ध्वंसावशेष बंगाल के दिनाजपुर जिले में मिले हैं। बख्तियार खिलजी से परास्त होने के बाद बंगाल के सेन-वंशी शासक पश्चिमी बंगाल के हिस्सों को खाली करके बंगाल के पूर्वी भाग में चले गये परन्तु वे अपने राज्य के खोए हुए हिस्सों को प्राप्त करने के लिए निरंतर सचेष्ट बने रहे।

ई.1206 में इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के उपरान्त बंगाल तथा बिहार के मुस्लिम सेनापतियों ने दिल्ली से अपने सम्बन्ध-विच्छेद करने के प्रयत्न किए। अलीमर्दा खाँ नामक एक अफगान सरदार ने लखनौती को अपनी राजधानी बनाकर स्वतंत्रता पूर्वक शासन करना आरम्भ कर दिया। कुछ समय बाद खिलजी अमीरों ने उसे कैद कर लिया और उसके स्थान पर मुहम्मद शेख को बंगाल और बिहार का शासक बना दिया। अलीमर्दा खाँ कारगार से निकल भागा। उसने दिल्ली पहुँच कर कुतुबुद्दीन ऐबक से, बंगाल में हस्तक्षेप करने के लिए कहा।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने अलीमर्दा खाँ के पुराने अपराध माफ करके उसे बिहार एवं बंगाल का गवर्नर बना दिया। इस प्रकार बिहार एवं बंगाल फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गए और रावी के तट से लेकर ब्रह्मपुत्र की घाटी तक कुतुबुद्दीन ऐबक की तलवार की धाक जम गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु (47)

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कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु

ई.1210 में जब कुतुबुद्दीन ऐबक लाहौर में चौगान खेल रहा था तब वह अचानक घोड़े से गिर पड़ा। घोड़े की काठी का उभरा हुआ भाग ऐबक के पेट में घुस गया और इस चोट से कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु हो गई। उसे लाहौर में ही दफना दिया गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक के सेनापति इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने नालंदा एवं विक्रमशिला के विश्विविद्यालयों को जलाकर राख कर दिया तथा बंगाल के सेन शासकों को पूर्व की ओर खिसक जाने पर विवश कर दिया। इस प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक ने रावी नदी से लेकर ब्रह्मपुत्र की घाटी तक हो रहे विद्रोहों का दमन कर लिया तथा भारत के बड़े हिस्से पर ऐबक की पकड़ मजबूत हो गई किंतु कुतुबुद्दीन ऐबक जब तक दिल्ली के तख्त पर बैठा रहा, उसे भारतीय हिन्दू नरेशों एवं सामंतों से युद्ध करते रहना पड़ा। इन युद्धों में कई बार कुतुबुद्दीन ऐबक के प्राणों पर बन आई किंतु वह हर बार बच गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक के सौभाग्य से इस काल में गजनी ख्वारिज्म के शाह के आक्रमणों से त्रस्त था और भारतीय राजा अपना-अपना राज्य प्राप्त करने के लिए अलग-अलग प्रयास कर रहे थे। उनका कोई संघ तैयार नहीं हो सका जो एक साथ कुतुबुद्दीन की शक्ति को चूर-चूर करके उसे धूल में मिला सकता। गजनी की खराब परिस्थिति के कारण कुतुबुद्दीन स्वयं को भारत पर केन्द्रित कर पा रहा था और भारतीय राजाओं का संघ नहीं बनने के कारण कुतुबुद्दीन उनके विद्रोहों को दबा पा रहा था।

इस काल में भारतीय भले ही संगठित नहीं थे किंतु हिन्दू प्रतिरोध का एक दूसरा पक्ष भी था जो बहुत उजला था। उस काल के भारत में तुर्की सत्ता का विरोध करने वालों में केवल राजा एवं स्थानीय शासक ही नहीं थे, जन सामान्य भी तुर्कों का विरोध करता था जिनमें जाटों, गुर्जरों एवं मेरों की भूमिका उल्लेखनीय थी। इसलिए कुतुबुद्दीन ऐबक ने ऐसे विद्रोहों को दबाने के लिए स्थानीय हिन्दू सैनिकों को अपनी सेना में भरती करना प्रारम्भ किया तथा स्थानीय छोटे सामंतों को नौकरी पर रख लिया जिन्हें रावत, राणा एवं ठाकुर कहते थे। ई.1208 में जब कुतुबुद्दीन ऐबक गजनी के अभियान पर तो उसकी सेना में कई हिन्दू राणा और ठाकुर भी थे।

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विद्रोहों एवं विरोधों के इस काल में बदायूं के राठौड़ों ने स्वयं को दिल्ली की सत्ता से मुक्त करवा लिया किंतु कुतुबुद्दीन ऐबक ने एक सेना भेजकर बदायूं पर फिर से अधिकार कर लिया तथा अपने गुलाम इल्तुतमिश को बदायूं का गवर्नर बना दिया। कालिंजर तथा ग्वालियर पर भी राजपूतों ने फिर से अधिकार कर लिया था किंतु कुतुबुद्दीन ऐबक अपने जीवन काल में इन दोनों स्थानों पर फिर से अधिकार नहीं कर सका।

ई.1210 में जब कुतुबुद्दीन ऐबक लाहौर में चौगान खेल रहा था तब वह अचानक घोड़े से गिर पड़ा। घोड़े की काठी का उभरा हुआ भाग ऐबक के पेट में घुस गया और इस चोट से कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु हो गई। उसे लाहौर में ही दफना दिया गया। उसके लिए एक साधारण सी कब्र बनाई गई तथा उस पर अत्यन्त साधारण स्मारक खड़ा किया गया।

मुहम्मद गौरी के शव की ही भांति कुतुबुद्दीन ऐबक का शव भी न तो शाही परिवार के किसी सदस्य के लिए और न उसके किसी गुलाम के लिए आदरणीय था। कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु से दुनिया में किसी को कोई दुःख नहीं हुआ।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के समय तक दिल्ली पर ऐबक का शासन 12 साल तक मुहम्मद गौरी के गवर्नर के रूप में तथा 4 साल तक स्वतंत्र शासक के रूप में रहा। मुहम्मद गौरी के जीवित रहते, ऐबक उत्तर भारत को विजित करने में लगा रहा। स्वतंत्र शासक के रूप में उसका काल अत्यन्त संक्षिप्त था। इस कारण शासक के रूप में उसकी उपलब्धियाँ विशेष नहीं थीं फिर भी अपने चार वर्ष के कार्यकाल में उसने भारत में दिल्ली सल्तनत की जड़ें मजबूत कर दीं।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु से भले ही उस काल में दुनिया में किसी को कोई दुःख नहीं हुआ किंतु बाद के इतिहासकारों के लिए कुतुबुद्दीन बहुत महत्वपूर्ण हो गया। भारत के मुस्लिम इतिहासकारों एवं कम्युनिस्ट लेखकों ने कुतुबुद्दीन ऐबक का इतिहास अत्यंत गौरवशाली बना दिया।

मुस्लिम इतिहासकारों ने ऐबक के शासन की प्रशंसा में बड़ी स्तुतियां गाई हैं। उसे उदार, साहसी एवं न्यायप्रिय शासक बताया है। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है- ‘ऐबक ने लोगों को इनाम में एक लाख जीतल देकर लाख-बख्श की ख्याति प्राप्त की।’

फख्र ए तुदब्बिर ने लिखा है- ‘ऐबक ने अपनी सेना में तुर्क, गौरी, खुरासानी, खलजी और हिन्दुस्तानी सैनिक भरती किए। उसने किसानों से बलपूर्वक घास की एक पत्ती तक नहीं ली।’

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16वीं सदी के मुगल दरबारी अबुल फजल ने लिखा है- ‘मुहम्मद गौरी ने भारत में खून की नदियां बहाईं किंतु ऐबक ने लोगों की भलाई के लिए अच्छे और महान काम किए।’ फरिश्ता ने भी ऐबक के शासन की बहुत प्रंशसा की है। यदि हम उस काल के मुस्लिम इतिहासकारों की पुस्तकों को ध्यान से देखें तो स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि ये प्रशंसाएं नितांत झूठी हैं। वास्तविकता तो यह थी कि उसने भारत से हजारों निर्दोष लोगों को पकड़कर गुलाम बनाया और मध्यएशिया के देशों में बिकने के लिए भेज दिया। ऐबक के समकालीन लेखक हसन निजामी ने लिखा है कि अकेले गुजरात अभियान में ही ऐबक ने बीस हजार लोगों को पकड़ कर गुलाम बनाया। इरफान हबीब ने इन आंकड़ों को गलत एवं ज्यादा बताया है। जबकि वास्तविकता यह थी कि वास्तविक आंकड़े लाखों में रहे होंगे क्योंकि 20 हजार गुलामों का आंकड़ा तो केवल गुजरात अभियान का है। मुस्लिम इतिहासकारों ने ऐबक के न्याय तथा उदारता की मुक्त-कण्ठ से प्रशंसा की है और लिखा है कि उसके शासन में भेड़ तथा भेड़िया एक ही घाट पर पानी पीते थे। उसने अपनी प्रजा को शांति प्रदान की जिसकी उन दिनों बड़ी आवश्यकता थी। सड़कों पर डाकुओं का भय नहीं रहता था और शाँति तथा सुव्यवस्था स्थापित थी

भारत के मुस्लिम इतिहासकारों का यह वर्णन गजनी के मुस्लिम इतिहासकारों के वर्णन से मेल नहीं खाता। गजनी के इतिहासकारों के अनुसार ई.1208 में जब ऐबक ने गजनी पर अधिकार किया तब वह मद्यपान में व्यस्त हो गया तथा उसकी सेना ने गजनी-वासियों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया जिससे दुःखी होकर गजनी की जनता ने पुराने शासक यल्दूज को गजनी पर पुनः आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब ऐबक ने अपनी मातृभूमि गजनी में इतना भयानक रक्तपात किया तब वह भारत में आदर्श शासन कैसे स्थापित कर सकता था?

वास्तविकता यह थी कि युद्ध के समय ऐबक ने सहस्रों हिन्दुओं की हत्या करवाई और सहस्रों हिन्दुओं को गुलाम बनाया। इस पर भी भारत के मुस्लिम इतिहासकारों ने उसकी यह कहकर प्रशंसा की है कि शांतिकाल में उसने हिन्दुओं के साथ उदारता का व्यवहार किया। जबकि वास्तविकता यह है कि उसने हिन्दुओं की धार्मिक स्वतंत्रता छीन ली। उसने हिन्दुओं के मन्दिरों को तुड़वाकर उनके स्थान पर मस्जिदों का निर्माण करवाया। उसके शासन में हिन्दू दूसरे दर्जे के नागरिक थे। उन्हें शासन में उच्च पद नहीं दिये गये।

यदि फिर भी मुस्लिम लेखक यह लिखते हैं कि उसके शासन में भेड़ और भेड़िए एक ही घाट पर पानी पीते थे तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भेड़ कौन थे और भेड़िए कौन थे? उस काल में भेड़ियों को क्या पड़ी थी जो वे भेड़ों को अपने घाट पर पानी पीने देते? जो भेड़ें भेड़ियों के घाट पर पानी पी रही थीं तो उन्हें इस पानी की क्या कीमत चुकानी पड़ रही थी?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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