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बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान बन गया (49)

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बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान बन गया

कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद आरामशाह नामक लड़का दिल्ली का सुल्तान हुआ किंतु कुछ ही दिनों में अमीरों के निमंत्रण पर बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत के तख्त पर बैठ गया।

जिस विध्वंसक कुतुबुद्दीन ऐबक ने उत्तरी भारत में हिंसा, विध्वंस एवं विनाश का ताण्डव किया, उसे निजामी एवं हबीबुल्ला जैसे मुस्लिम इतिहासकारों ने महान् सुल्तान बताकर उसका गुणगान किया। अल्लाउद्दीन नामक एक लेखक ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-जहान गुशा’ में लिखा है कि कुतुबुद्दीन ऐबक के कोई पुत्र नहीं था। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है कि कुतुबुद्दीन ऐबक के तीन पुत्रियां थीं। इनमें से बड़ी पुत्री का विवाह मुल्तान के शासक कुबाचा के साथ हुआ था।

जब इस बड़ी पुत्री की मृत्यु हो गई तो कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी दूसरी पुत्री का विवाह भी कुबाचा से कर दिया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी तीसरी पुत्री का विवाह इल्तुतमिश नामक एक गुलाम के साथ किया जो ऐबक की सेना में उच्च पद पा गया था।

कुछ लेखकों के अनुसार कुतुबुद्दीन के एक पुत्र था जिसका नाम आरामशाह था। वह लाहौर का सूबेदार था। ई.1210 में कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद, लाहौर के तुर्क सरदारों ने कुतुबुद्दीन ऐबक के पुत्र आरामशाह को भारत का सुल्तान घोषित कर दिया किंतु दिल्ली के अमीर नहीं चाहते थे कि लाहौर के अमीरों की पसंद का व्यक्ति दिल्ली का सुल्तान बने क्योंकि इससे साम्राज्य में अधिकांश उच्च पद तथा सम्मानित स्थान लाहौर के अमीरों को ही प्राप्त हो जाते तथा दिल्ली के अमीर उपेक्षित हो जाते।

अतः दिल्ली के अमीरों ने आरामशाह को गद्दी से हटाने के प्रयत्न आरम्भ किए। उन्होंने ऐबक के दामाद और बदायूं के गवर्नर इल्तुतमिश को दिल्ली के तख्त पर बैठने के लिए आमन्त्रित किया। आरामशाह को हटाकर इल्तुतमिश को सुल्तान बनाने के लिए आमंत्रित करने से ऐसा लगता है कि आरामशाह कुतुबुद्दीन ऐबक का पुत्र नहीं था।

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दिल्ली के अमीरों का निमंत्रण पाकर बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश अपनी सेना के साथ बदायूँ से दिल्ली की ओर चल दिया। आरामशाह भी लाहौर से दिल्ली की ओर चला परन्तु दिल्ली के अमीरों ने आरामशाह का स्वागत नहीं किया। इस पर दिल्ली नगर के बाहर आरामशाह तथा इल्तुतमिश की सेनाओं में मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में आरामशाह पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया।

दिल्ली के अमीरों ने इल्तुतमिश को दिल्ली का नया सुल्तान घोषित कर दिया। इस प्रकार ई.1211 में बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान बन गया। ऐबक वंश का अन्त हो गया और उसके स्थान पर इल्बरी तुर्कों के शम्सी वंश का राज्य स्थापित हो गया।

इल्तुतमिश का पिता आलम खाँ तुर्कों के इल्बरी कबीले का प्रधान व्यक्ति था। इल्तुतमिश बाल्यकाल से प्रतिभाशाली तथा रूपवान था। इस कारण उसे अपने पिता की विशेष कृपा तथा वात्सल्य प्राप्त था। इससे अन्य भाइयों तथा सम्बन्धियों को इल्तुतमिश से बड़ी ईर्ष्या होती थी।

वे लोग बालक इल्तुतमिश को घर से बहकाकर ले गये और बुखारा जाने वाले घोड़ों के एक सौदागर के हाथों बेच दिया। घोड़ों के सौदागर ने बालक इल्तुतमिश को बुखारा के मुख्य काजी के एक सम्बन्धी को बेच दिया। इस प्रकार वह बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश के रूप में जाना गया।

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इसके बाद इल्तुतमिश दो बार और बेचा गया। अन्त में जमालुद्दीन नामक एक सौदागर इल्तुतमिश को गजनी ले गया। गजनी के सुल्तान मुहम्मद गौरी के एक अनुचर की दृष्टि इल्तुतमिश पर पड़ी। उसने सुल्तान से इल्तुतमिश की प्रशंसा की परन्तु मूल्य का निर्णय न होने से उस समय इल्तुतमिश खरीदा नहीं जा सका। इस पर इल्तुतमिश को बेचने के लिए भारत लाया गया। कुछ दिनों के उपरान्त कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को दिल्ली में खरीद लिया। इस प्रकार इल्तुतमिश मुहम्मद गौरी के गुलाम का गुलाम था। ई.1205 में जब मुहम्मद गौरी ने पंजाब में खोखरों के विरुद्ध अभियान किया तो उसमें इल्तुतमिश ने असाधारण पराक्रम का परिचय दिया। इससे प्रसन्न होकर मुहम्मद गौरी ने कुतुबुद्दीन को आदेश दिया कि वह इल्तुतमिश को गुलामी से मुक्त कर दे तथा उसके साथ अच्छा व्यवहार करे। इसके बाद ऐबक इल्तुतमिश के साथ सौम्य व्यवहार करने लगा तथा उसे सदैव अपने साथ रखने लगा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को ‘सर जानदार’ के पद पर नियुक्त किया और बाद में ‘अमीरे शिकार’ बना दिया। जब ग्वालियर पर कुतुबुद्दीन का अधिकार स्थापित हो गया तब इल्तुतमिश को वहाँ का अमीर नियुक्त किया गया। कुतुबुद्दीन ने अपनी एक पुत्री कुतुब बेगम का विवाह इल्तुतमिश के साथ कर दिया तथा जब कुतुबुद्दीन सुल्तान बना तो उसने इल्तुतमिश को बदायूँ का गवर्नर नियुक्त कर दिया।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के समय इल्तुतमिश बदायूं का गवर्नर था। जिस समय लाहौर के अमीरों ने आरामशाह को ऐबक का उत्तराधिकारी घोषित किया, उस समय दिल्ली का सेनापति अली इस्माइल, दिल्ली के मुख्य काजी के पद पर भी कार्य कर रहा था। उसने कुछ अमीरों को अपने साथ मिलाकर, इल्तुतमिश को सुल्तान बनने के लिये दिल्ली आमंत्रित किया।

इससे इल्तुतमिश को दिल्ली की सेना एवं अमीरों का विश्वास प्राप्त हो गया। इल्तुतमिश ने पहले भी कई अवसरों पर अपने रण-कौशल का परिचय दिया था इसलिये सेना तथा अमीर उसकी नेतृत्व-प्रतिभा से परिचित थे।

आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि जब उच के शासक नासिरुद्दीन कुबाचा को आरामशाह तथा इल्तुतमिश के संघर्ष की जानकारी मिली तो उसने स्वयं को उच तथा मुल्तान का स्वतंत्र सुल्तान घोषित कर दिया। अवसर देखकर बंगाल के शासक अलीमर्दान ने भी स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया।

इस प्रकार कुछ समय के लिए दिल्ली सल्तनत चार स्वतंत्र राज्यों में विभक्त हो गई। इनमें से पहला राज्य उच तथा मुल्तान था जिसका सुल्तान कुबाचा था। दूसरा राज्य लाहौर तथा दिल्ली था जिसका सुल्तान आरामशाह था, तीसरा राज्य बदायूं था जिसका सुल्तान इल्तुतमिश था और चौथा राज्य बिहार एवं बंगाल था जिसका सुल्तान अलीमर्दान था। यह स्थिति लगभग आठ माह तक रही।

दिल्ली की सेना का प्रिय तथा विश्वासपात्र बन जाने से इल्तुतमिश की स्थिति सुदृढ़़ हो गई। इल्तुतमिश ने दिल्ली के बाहर ही आरामशाह का मुकाबला किया तथा उसे परास्त करके दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार अपनी योग्यता एवं भाग्य के बल पर इल्तुतमिश गुलाम से सुल्तान बन गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कुबाचा यल्दूज और अलीमर्दान इल्तुतमिश की जान के दुश्मन बन गए (50)

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कुबाचा यल्दूज और अलीमर्दान - www.bharatkaitihas.com
कुबाचा यल्दूज और अलीमर्दान इल्तुतमिश की जान के दुश्मन बन गए

जब इल्तुतमिश आरामशाह को बंदी बनाकर स्वयं सुल्तान बन गया तो कुबाचा यल्दूज और अलीमर्दान इल्तुतमिश की जान के दुश्मन बन गए। कुबाचा यल्दूज और अलीमर्दान इल्तुतमिश को बुखारा के बाजार में कई बार बिके हुए एक गुलाम से अधिक कुछ नहीं मानते थे।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत चार भागों में बंट गई। मुल्तान तथा उच (सिंध) पर कुबाचा ने, लाहौर एवं दिल्ली पर आरामशाह ने, बदायूं पर इल्तुतमिश ने एवं बिहार तथा बंगाल पर अलीमर्दान ने अधिकार कर लिया किंतु लगभग आठ माह की इस अराजकता के बाद इल्तुतमिश ने दिल्ली के निकट आरामशाह को परास्त कर दिया तथा स्वयं दिल्ली का सुल्तान बन गया।

सुल्तान बनते ही इल्तुतमिश को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। उसके समक्ष अनेक चुनौतियाँ मुंह बाए खड़ी थीं। इनमें से पहली चुनौती आरामशाह की थी जिसे इल्तुतमिश ने बंदी बना लिया था। इसके बाद आरामशाह का कुछ पता नहीं चला। सम्भवतः उसे मार डाला गया।

यद्यपि दिल्ली के काजी अली इस्माइल की सहायता से इल्तुतमिश दिल्ली के तख्त पर बैठ गया था तथापि उसने इस पद को उत्तराधिकार के नियम से प्र्राप्त नहीं किया था। यह पद उसने कुछ अमीरों के सहयोग से प्राप्त किया था। चूूँकि इल्तुतमिश एक गुलाम का गुलाम था, इसलिए बहुत से कुतुबी तथा मुइज्जी अमीरों ने इल्तुतमिश को सुल्तान स्वीकार नहीं किया। स्वतन्त्र तुर्क सरदार गुलाम के गुलाम को अपना स्वामी स्वीकार करने में अपना अपमान समझते थे। वे उसे राज्य का अपहर्त्ता मानते थे। इल्तुतमिश ने धैर्य के साथ इन विरोधियों का दमन किया।

सुल्तान बनने के पूर्व इल्तुतमिश एक छोटे से प्रान्त का गवर्नर था। अधिकांश तुर्क-सरदार उसके समकक्ष थे। तुर्क-सरदार कुबाचा तथा अलीमर्दान तो कुतुबुद्दीन ऐबक के काल में पद तथा प्रतिष्ठा में इल्तुतमिश से कहीं अधिक ऊँचे थे। उन्हें इल्तुतमिश का उत्कर्ष सहन नहीं था। उन्हें अपने वश में करने के लिए साहस, बुद्धि तथा धैर्य की आवश्यकता थी। इल्तुतमिश में ये समस्त गुण विद्यमान थे, अतः वह सफलतापूर्वक अपने समकक्ष विरोधियों का सामना कर सका।

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तुर्कों में यह परम्परा थी कि कोई वंश-विशेष सदैव के लिए राज्य का अधिकारी नहीं होता था। नया सुल्तान, तुर्क अमीरों के निर्वाचन द्वारा नियुक्त किया जा सकता था। फलतः पुराने सुल्तान का निधन होने पर समस्त योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी सेनापति राजपद प्राप्त करने की चेष्टा करते थे। ऐसी स्थिति में राज्य में सैनिक विद्रोह होने की सम्भावना सदैव बनी रहती थी।

बंगाल में अलीमर्दान खाँ बड़ी निर्दयता तथा निरंकुशता से शासन कर रहा था और अल्लाउद्दीन का विरुद धारण करके स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर चुका था। कुबाचा भी ऐबक की तरह मुहम्मद गौरी का गुलाम था। उसने भी मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक की वैसी ही सेवा की थी जैसी ऐबक ने की थी। कुबाचा भी इल्तुतमिश की तरह कुतुबुद्दीन ऐबक का दामाद था। इसलिए उसने इल्तुतमिश को अपना स्वामी स्वीकार करने से मना कर दिया तथा स्वयं को मुल्तान तथा सिन्ध का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। उसने पंजाब का बहुत सा भाग दबा लिया और लाहौर, भटिन्डा, सरसुती, कुहराम आदि दुर्गों पर अपनी चौकियाँ स्थापित कर दीं। अब उसकी दृष्टि दिल्ली पर लगी हुई थी।

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गजनी का शासक ताजुद्दीन यल्दूज, कुतुबुद्दीन ऐबक का श्वसुर था। उसने गजनी पर अधिकार स्थापित कर लिया था इसलिये वह स्वयं को मुहम्मद गौरी का उत्तराधिकारी समझता था और उस सम्पूर्ण भारतीय भू-भाग को अपने साम्राज्य के अंतर्गत मानता था जो मुहम्मद गौरी ने जीता था। इस नाते यल्दूज दिल्ली के नए सुल्तान इल्तुतमिश को अपना प्रान्तपति समझता था। इसलिये यल्दूज ने इल्तुतमिश के पास राजकीय चिह्न भेजकर अपनी प्रभुता का प्रदर्शन किया। संकटपूर्ण परिस्थितियों में इल्तुतमिश ने उन वस्तुओं को स्वीकार कर लिया परन्तु इल्तुतमिश ने इस अपमान को स्मरण रखा तथा समय आने पर भरपूर बदला लिया। इस प्रकार कुबाचा, यल्दूज एवं अलीमर्दान इल्तुतमिश की जान के दुश्मन बन गए। वे तीनों ही अलग-अलग कारणों से स्वयं को दिल्ली का स्वामी समझते थे और दिल्ली पर अधिकार करना चाहते थे। इन दिनों दिल्ली की राजनीति में भारतीय मुसलमानों का भी एक प्रबल दल खड़ा हो गया था। उनमें तथा विदेशी मुसलमानों में बड़ा वैमनस्य था। इस कारण राज्य में आंतरिक संघर्ष की सम्भावना सदैव बनी रहती थी। ये लोग विद्रोह करने तथा अपना प्राबल्य स्थापित करने के लिए सचेष्ट रहते थे। इन विद्रोही-दलों पर नियन्त्रण रखना नितान्त आवश्यक था।

मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक ने जिन राजपूत वंशों से उनके राज्य छीन लिये थे, वे ऐबक के मरते ही अपने खोये हुए राज्य प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे। जालौर तथा रणथम्भौर के शासक फिर से स्वतन्त्र हो गये। अजमेर, ग्वालियर तथा दो-आब में भी तुर्की सत्ता समाप्त हो गई। इल्तुतमिश के बदायूँ छोड़ते ही गाहड़वालों की प्रतिक्रिया भी आरम्भ हो गई और उनके आक्रमणों का वेग बढ़ गया। कालिंजर तथा ग्वालियर तो ऐबक के शासन काल में ही स्वतन्त्र हो चुके थे।

इस काल में भारत की पश्चिमोत्तर सीमा की रक्षा की समुचित व्यवस्था करना नितान्त आवश्यक था क्योंकि मध्य-एशिया में स्थित तुर्क तथा मंगोल राज्यों में इस समय बड़ी खलबली मची हुई थी। अनेक मंगोल सरदारों को अपना देश छोड़कर पलायन करना पड़ रहा था। मंगोल सरदार, नये राज्य स्थापित करने की कामना से प्रेरित होकर अन्य देशों पर आक्रमण कर रहे थे। भारत उनके लिए आसान शिकारगाह बन सकता था।

पश्चिमोत्तर की समस्या के जटिल हो जाने का एक कारण यह भी था कि पंजाब में निवास करने वाले खोखर बड़े विद्रोही प्रवृत्ति के थे जो प्रायः लाहौर तथा दिल्ली के सुल्तानों की शान्ति भंग कर देते थे।

इल्तुतमिश ने विपत्तियों से घबराने के स्थान पर, निर्भीकता के साथ उनका सामना किया तथा एक-एक करके समस्त बाधाओं पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इल्तुतमिश के शत्रु चुन-चुन कर मारे गए (51)

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इल्तुतमिश के शत्रु - www.bharatkaitihas.com
इल्तुतमिश के शत्रु चुन-चुन कर मारे गए

इल्तुतमिश अपने शत्रुओं को चुन-चुन कर मारता जा रहा था किंतु इल्तुतमिश के शत्रु कम होने का नाम नहीं लेते थे। फिर भी इल्तुतमिश ने धैर्य नहीं खोया। वह जीवन भर तलवार चलाता रहा था और अब भी उसे बस तलवार ही चलानी थी।

बदायूं का गवर्नर इल्तुतमिश जो किसी समय बुखारा के बाजार में गुलाम के रूप में बेचा गया था, जब भारत का सुल्तान बन गया तो मुल्तान का शासक कुबाचा, गजनी का शासक यल्दूज तथा बंगाल का शासक अलीमर्दान इल्तुतमिश के शत्रु हो गए। दिल्ली के कुछ विद्रोही सरदार इन शत्रुओं के साथ हो गए।

पिछले सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के तुर्की अंग-रक्षकों का सरदार तथा कुछ कुतुबी एवं मुइज्जी सरदार नहीं चाहते थे कि इल्तुतमिश सुल्तान बने। इसलिए वे दिल्ली के आस-पास अपनी सेनाएँ एकत्रित करने लगे। इल्तुतमिश को उनकी विद्रोही गतिविधियों के बारे में समय रहते ही पता चल गया।

इसलिए इल्तुतमिश ने उन पर अचानक आक्रमण करके उन्हें बुरी तरह परास्त किया। उनमें से बहुतों को मौत के घाट उतार दिया तथा उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया। इस प्रकार इल्तुतमिश ने राजधानी दिल्ली को आंतरिक रूप से सुरक्षित बना लिया।

इस पर भी इल्तुतमिश के शत्रु कम नहीं हुए। आरामशाह तथा इल्तुतमिश के संघर्ष का लाभ उठाकर दो-आब के कई हिन्दू शासक भी स्वतन्त्र हो गये।

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इल्तुतमिश ने राजधानी में अपनी स्थिति सुदृढ़़ करके दो-आब के विद्रोही हिन्दुओं की ओर ध्यान दिया। उसने बदायूँ, कन्नौज तथा बहराइच पर आक्रमण करके वहाँ के शासकों का दमन किया। कछार के प्रान्त पर भी उसने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इसके बाद उसने बहराइच को जीत कर वहाँ पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया।

इल्तुतमिश ने अवध पर भी आक्रमण किया तथा उसे अपनी सल्तनत में मिला लिया परन्तु सम्भवतः तिरहुत को अपने राज्य में नहीं मिला पाया। इल्तुतमिश ने बनारस तथा तराई क्षेत्र के तुर्क-सरदारों एवं हिन्दू-राजाओं को परास्त करके उन्हें अपना आधिपत्य स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।

इल्तुतमिश के गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद ख्वारिज्म के शाह ने गजनी पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार कर लिया। इस पर गजनी का सुल्तान यल्दूज गजनी से भागकर लाहौर आ गया। लाहौर से उसने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। इल्तुतमिश पहले से ही इस विपत्ति का सामना करने के लिए तैयार था। उसने अपनी सुसज्जित सेना के साथ दिल्ली से प्रस्थान कर दिया और ई.1215 में तराइन के मैदान में यल्दूज को बुरी तरह परास्त किया। यल्दूज को बंदी बनाकर बदायूँ के दुर्ग में भेज दिया गया जहाँ कुछ समय बाद यल्दूज की हत्या कर दी गई। इस प्रकार एक बड़े इल्तुतमिश के शत्रु का नाश हो गया।

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इल्तुतमिश द्वारा यल्दूज को पराजित किए जाने के कुछ समय उपरान्त मुल्तान तथा उच के शासक कुबाचा ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। इस पर इल्तुतमिश ने एक सेना लाहौर भेजी। इस सेना ने कुबाचा को परास्त कर दिया। कुबाचा ने इल्तुतमिश का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। इसी समय ख्वारिज्म के शाह का पुत्र जलालुद्दीन मंगोलों के आक्रमण से त्रस्त होकर भारत आ गया तथा उसने उसने कुबाचा के राज्य को लूटकर उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इससे कुबाचा की शक्ति तथा प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा। थोड़े ही दिनों बाद, मंगोल सेना ने भी मुल्तान पर आक्रमण किया तथा कुबाचा को बड़ी क्षति पहुँचाई। ई.1221 में मंगोलों ने चंगेज खाँ के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। चंगेज खाँ तूफान की भाँति मध्यएशिया से चला था। जब उसने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया, तब वहाँ के शाह का पुत्र जलालुद्दीन भारत भाग आया परन्तु मंगोल उसका पीछा करते हुए भारत तक आ पहुँचे। इस समय जलालुद्दीन ने सिन्धु नदी के तट पर अपना खेमा लगा रखा था। जलालुद्दीन ने इल्तुतमिश से शरण मांगी।  इल्तुतमिश जानता था कि दिल्ली में ख्वारिज्म के शहजादे जलालुद्दीन की उपस्थिति इल्तुतमिश के तुर्की अमीरों पर अच्छा प्रभाव नहीं डालेगी।

इसलिये उसने जलालुद्दीन के पास कहला भेजा कि दिल्ली की जलवायु उसके अनुकूल नहीं होगी और उसके दूत को मरवा दिया। निराश होकर जलालुद्दीन सिन्ध की ओर बढ़ा और कुबाचा के राज्य में लूटमार करता हुआ फारस की ओर चल दिया परन्तु मार्ग में ही उसकी हत्या कर दी गई। जलालुद्दीन का अंत हुआ देखकर मंगोल भी लौट गये। इस प्रकार इल्तुतमिश ने अपनी दूरदर्शिता से जलालुद्दीन तथा मंगोलों से भी अपने राज्य की रक्षा कर ली।

खिलजी तुर्क भी इन दिनों सीमान्त प्रदेशों में बड़ा उपद्रव मचा रहे थे। इस प्रकार कुबाचा की स्थिति बड़ी संकटापन्न हो गई। इस स्थिति से लाभ उठा कर ई.1227 में इल्तुतमिश ने मुल्तान पर आक्रमण कर दिया तथा मुल्तान पर अपना अधिकार जमा लिया।

ख्वारिज्म के शहजादे जलालुद्दीन तथा मंगोल सम्राट चंगेज खाँ के भारत से चले जाने के बाद इल्तुतमिश ने दिल्ली से उच के लिए प्रस्थान किया। वह कुबाचा को दण्डित करना चाहता था। इस पर कुबाचा ने अपनी सेना तथा कोष के साथ भक्कर के दुर्ग में शरण ली। तीन महीने के घेरे के बाद उच पर इल्तुतमिश का अधिकार हो गया।

कुबाचा इतना आंतकित हो गया कि उसने अपने प्राणों की रक्षा के लिए सिन्धु नदी के उस-पार भाग जाने का निश्चय किया। जब कुबाचा एक नाव में बैठ कर सिन्धु नदी पार कर रहा था तब नाव उलट गई और कुबाचा नदी में डूब कर मर गया। इस प्रकार इल्तुतमिश के दूसरे बड़े प्रतिद्वन्द्वी का भी नाश हो गया।

अब इल्तुतमिश को पंजाब में अपने दो शत्रुओं का दमन करना था। एक थे विद्रोही खोखर और दूसरा था खोखरों का मित्र सैफुद्दीन करलुग जो ख्वारिज्म के शाह की ओर से पश्चिमी पंजाब में नियुक्त था। इल्तुतमिश ने खोखरों पर आक्रमण करके उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न करना आरम्भ किया और उनके राज्य के कुछ भाग पर अधिकार जमा लिया।

लाहौर तो इल्तुतमिश के अधिकार में पहले से ही था। पंजाब के अन्य प्रमुख नगर- स्यालकोट, जालन्धर, नन्दना आदि भी इल्तुतमिश के अधिकार में आ गये। इल्तुतमिश ने खोखरों के गांव तुर्की अमीरों को जागीर में दे दिये। इससे इल्तुतमिश के राज्य की पश्चिमी सीमा सुरक्षित हो गई।

पश्चिम की ओर से निबट कर इल्तुतमिश ने अपने राज्य के पूर्व की ओर अर्थात् बंगाल की ओर रुख किया। इस समय तक अलीमर्दान मर चुका था और हिसामुद्दीन इवाज, सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी की उपाधि धारण करके बंगाल में शासन कर रहा था। ई.1225 में इल्तुतमिश ने बंगाल पर आक्रमण किया। गयासुद्दीन ने इल्तुतमिश की अधीनता स्वीकार कर ली और बिहार पर अपना अधिकार त्याग दिया। इल्तुतमिश संतुष्ट होकर लौट आया, परन्तु उसके दिल्ली पहुँचते ही गयासुद्दीन ने फिर से स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और बिहार पर भी अधिकार कर लिया।

इस पर ई.1226 में इल्तुतमिश ने अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को बंगाल पर आक्रमण करने भेजा जो उन दिनों अवध का गवर्नर था। नासिरुद्दीन ने गयासुद्दीन खिलजी को मारकर लखनौती पर अधिकार कर लिया। इल्तुतमिश ने नासिरुद्दीन को बंगाल का गवर्नर बना दिया। ई.1229 में नासिरुद्दीन के हटते ही बंगाल में फिर से विद्रोह की चिन्गारी फूट पड़ी।

इस पर इल्तुतमिश ने ई.1230 में पुनः बंगाल पर अधिकार कर लिया और अल्लाउद्दीन जैनी को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया। उसने बंगाल के विद्रोहियों को चुन-चुन कर मौत के घाट उतारा। इस प्रकार इल्तुतमिश के शत्रु चुन-चुन कर मारे जाते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इल्तुतमिश को राजपूत चुनौती देने लगे (52)

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इल्तुतमिश को राजपूत चुनौती देने लगे

मुहम्मद गौरी तथा उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में जिस सल्तनत की स्थापना की थी उसे दिल्ली सल्तनतक कहा जाता था। जब इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत का विस्तार करना आरम्भ किया तो इल्तुतमिश को राजपूत चुनौती देने लगे!

कुतुबुद्दीन ऐबक के समय से ही उत्तरी भारत के हिन्दू राजा स्वतंत्र होने के प्रयास कर रहे थे। ई.1210 में ऐबक की मृत्यु होते ही हिन्दुओं ने अपने प्रयास और तेज कर दिए। जब इल्तुतमिश ने यल्दूज कुबाचा और अलीमर्दान तथा गयासुद्दीन खिलजी की शक्ति को नष्ट कर दिया तथा मंगोलों के भय से मुक्ति पा ली, तब इल्तुतमिश ने हिन्दू राजाओं पर कार्यवाही आरम्भ की। इनमें जालौर तथा रणथंभौर के चौहान प्रमुख थे।

सपादलक्ष के चौहानों की एक शाखा पृथ्वीराज चौहान के जन्म से भी पहले मारवाड़ के नाडौल नामक क्षेत्र में स्थापित हो चुकी थी। इसी शाखा में से जालोर के सोनगरा चौहानों एवं आबू के देवड़ा चौहानों की दो शाखाएं अलग हुई थीं। ई.1178 में जालोर के चौहान शासक कीर्तिपाल ने मुहम्मद गौरी की सेना को भयानक पराजय का स्वाद चखाया था। उसे मारवाड़ के इतिहास में कीतू के नाम से भी जाना जाता है। इल्तुतमिश के समय में इसी कीतू का पोता उदयसिंह जालौर का शासक था। वह एक वीर राजा था। उसने लाहौर के शासक आरामशाह की एक सेना को पराजित करके कीर्ति अर्जित की थी।

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इल्तुतमिश जालौर के चौहानों का मान-मर्दन करने की इच्छा रखता था क्योंकि उदयसिंह ने दिल्ली सल्तनत की कमजोरी का लाभ उठाकर अपना राज्य काफी दूर-दूर तक बढ़ा लिया था। ई.1215 में इल्तुतमिश ने एक सेना जालोर राज्य पर आक्रमण करने के लिए भेजी। महाराजा उदयसिंह जालोर दुर्ग के चारों ओर ऊंची और अभेद्य दीवारें खड़ी करके उसमें बैठ गया।

‘ताजुल मआसिर’ में लिखा है कि जब सुल्तान की सेना जालौर पहुंची तो उदयसिंह क्षमा याचना करने लगा तथा संधि के लिए अनुरोध करने लगा। राजा उदयसिंह ने सुल्तान इल्तुतमिश को 100 ऊँट तथा 20 घोड़े प्रदान किए। इसके बदले में सुल्तान ने उदयसिंह का राज्य उसे लौटा दिया।

मूथा नैणसी एवं डॉ. दशरथ शर्मा सहित अनेक इतिहासकारों ने इस युद्ध का एवं उसके परिणाम का उल्लेख किया है। इस विवरण के अनुसार दोनों सेनाओं में सशस्त्र युद्ध हुआ था। तथा युद्ध के बाद हुई संधि में राजा उदयसिंह ने इल्तुतमिश को नाडौल तथा मण्डोर के वे क्षेत्र पुनः लौटाने स्वीकार कर लिए जो उदयसिंह ने आरामशाह के समय में दिल्ली सल्तनत से छीनकर अपने अधिकार में लिए थे।

राजा उदयसिंह ने अपने पैतृक अधिकार वाले क्षेत्र में से एक इंच धरती भी इल्तुतमिश को नहीं दी थी। इस विवरण से स्पष्ट है कि ताजुल मआसिर का लेखक नितांत झूठ बोल रहा है।

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इतिहास में किसी भी सुल्तान या बादशाह ने केवल 100 घोड़े तथा 20 ऊंट लेकर किसी शत्रु राजा को उसका राज्य वापस लौटाने का उल्लेख नहीं मिलता है। न ही इल्तुतमिश ने अपने पूरे जीवन काल में किसी हिन्दू राजा को उसका राज्य लौटाया था। इससे सिद्ध होता है कि राजा उदयसिंह चौहान, इल्तुतमिश की सेना से परास्त नहीं हुआ था अपितु दोनों पक्षों में एक सम्मानजनक संधि हुई थी। राजा उदयसिंह ने पूरे 54 साल तक जालौर राज्य पर शासन किया तथा दिल्ली सल्तनत की सेना उसका बाल भी बांका नहीं कर सकी। इस काल में मेवाड़ तथा जालौर के शासकों के बीच परम्परागत शत्रुता चली आ रही थी और दोनों राज्य एक दूसरे की क्षति कर रहे थे किंतु जालौर के राजा उदयसिंह ने दूरदर्शिता दिखाते हुए अपनी पुत्री का विवाह मेवाड़ के रावल जैत्रसिंह के साथ कर दिया जिससे चौहानों एवं गुहिलों के बीच चल रहे संघर्ष पर विराम लग गया। डॉ. गोपीनाथ शर्मा एवं गौरीशकंर हीराचंद ओझा के अनुसार इल्तुतमिश ने ई.1222 से 1229 के बीच किसी समय, मेवाड़ पर चढ़ाई की। उसने मेवाड़ की प्राचीन राजधानी नागदा के निवासियों को तलवार के घाट उतार दिया तथा नागदा को जला कर नष्ट कर दिया।

इल्तुतमिश की सेना ने मेवाड़ की एक और प्राचीन राजधानी आहाड़ को भी तोड़ दिया तथा आसपास के कई गांवों को जला कर राख कर दिया।

इस सेना ने स्त्रियों तथा बच्चों को भी निर्दयता से मारा। इस कारण लोगों में त्राहि-त्राहि मच गई। इस पर मेवाड़ का राजा जैत्रसिंह अपनी सेना के साथ तुर्की सेना का मुकाबला करने आगे बढ़ा। उसने भूताला के निकट मुस्लिम सेना का सामना किया तथा मुस्लिम सेना को पराजित करके भाग दिया। इल्तुतमिश को राजपूत चुनौती भारी पड़ी।

इल्तुतमिश की सेना, गुहिलों की प्राचीन राजधानियों- नागदा एवं आहाड़ को तोड़ने में सफल रही थी। अतः जैत्रसिंह अपनी राजधानी को स्थाई रूप से चित्तौड़ ले आया।

जैत्रसिंह की इस विजय का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए डॉ. दशरथ शर्मा ने लिखा है- ‘यह जैत्रसिंह का ही प्रताप था कि उसने मुस्लिम सेना को पीछे धकेल दिया जो कि गुजरात की तरफ आगे बढ़ रही थी।’ चीरवा तथा घाघसे के शिलालेखों में इस युद्ध एवं उसके परिणाम का उल्लेख किया गया है।

इस युद्ध पर उस काल में ‘हंमीर-मद-मर्दन’ शीर्षक से एक नाटक भी लिखा गया था जिसमें अमीर इल्तुतमिश का मान-मर्दन किए जाने का उल्लेख है। रावल समरसिंह के आबू शिलालेख में जैत्रसिंह को ‘तुरुष्क रूपी समुद्र का पान करने के लिये अगस्त्य के समान’ बताया गया है।

जब जालौर के राजा उदयसिंह चौहान को ज्ञात हुआ कि इल्तुतमिश मेवाड़ पर चढ़ बैठा है तथा उसका निश्चय मेवाड़ को पराभूत करके गुजरात जाने का है तो राजा उदयसिंह चौहान ने मारवाड़ क्षेत्र के राजा सोमसिंह, परमार शासक धारावर्ष, धोलका के शासक धवल एवं उसके मंत्री वास्तुपाल के साथ एक संघ बनाया तथा इल्तुतमिश का मुकाबला करने के लिए तैयार हो गया। चूंकि इल्तुतमिश मेवाड़ में ही परास्त हो चुका था, इसलिए वह आगे नहीं बढ़ सकता था।

इस प्रकार इल्तुतमिश को राजपूत चुनौती देने में सफल रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू राजा लड़ते रहे और अपनी धरती बचाते रहे (53)

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हिन्दू राजा लड़ते रहे और अपनी धरती बचाते रहे

जब मुसलमानों ने उत्तर भारत के बहुत बड़े क्षेत्र पर अधिकार करके दिल्ली सल्तनत की स्थापना कर दी तो हिन्दुओं के पास अपनी सुरक्षा करने के लिए सिवाय युद्ध का मार्ग अपनाने के, और कोई उपाय नहीं बचा। इसलिए हिन्दू राजा लड़ते रहे और मुसलमानों से अपनी धरती बचाते रहे!

जालौर के चौहान शासक उदयसिंह तथा मेवाड़ के गुहिल शासक जैत्रसिंह ने दो अलग-अलग युद्धों में इल्तुतमिश की सेना को परास्त किया। इस कारण वह गुजरात की ओर नहीं बढ़ सका तथा उसने अपना ध्यान राजपूताने एवं गुजरात से हटाकर मध्य-गंगा क्षेत्र की ओर किया।

ई.1226 में इल्तुतमिश ने पुराने गाहड़वाल राज्य के अंतर्गत स्थित चंदावर पर हमला किया। अजमेर के चौहानों की एक शाखा चंदावर में आकर शासन करने लगी थी। इस काल में राजा भरतपाल चौहान चंदावर राज्य का स्वामी था। राजा भरतपाल को भारत के इतिहास में समुचित स्थान नहीं मिल सका है। जबकि भरतपाल चौहान ने मुसलमानों के विरुद्ध जो सफलता अर्जित की थी, वह तो स्वयं सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने भी प्राप्त नहीं की थी।

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ई.1226 में सुल्तान इल्तुतमिश ने अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को अवध का सूबेदार नियुक्त किया। मिनहाज उस् सिराज ने अपनी पुस्तक ‘तबकाते नासिरी’ में लिखा है कि जब नासिरुद्दीन एक विशाल सेना के साथ अवध में पहुंचा तो राजा भरतपाल चौहान ने नासिरुद्दीन की सेना पर आक्रमण करके नासिरुद्दीन महमूद के 1,20,000 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।

इस घटना से दिल्ली सल्तनत में राजा भरतपाल का आतंक छा गया। अतः इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत की बहुत सी सेनाओं को इकट्ठा करके भरतपाल पर आक्रमण किया। चंदावर के निकट पुनः दोनों पक्षों में भयानक युद्ध हुआ जिसमें राजा भरतपाल चौहान लड़ते हुए काम आया।

राजा भरतपाल के एक पुत्र को लद्दातिमुर खाँ नामक सेनापति द्वारा बंदी बना लिया गया। चौहान राजकुमार को पकड़कर दिल्ली लाया गया और बेरहमी से मारा गया। फिर भी इस राजवंश के राजकुमारों ने अपनी पराजय स्वीकार नहीं की। उनका राज्य बना रहा तथा इस राज्य में भरतपाल के बाद जाहड़, बल्लाल, आहबमल्ल और रायबद्दिय नामक राजा हुए।

राजा आहबमल्ल के दरबार में लक्ष्मण नामक एक कवि रहता था। उसने राजा आहबमल की प्रशंसा करते हुए अपने ग्रंथ ‘अनृवर्त रत्न प्रदीप’ में लिखा है – ‘उसने शत्रुओं का मण्डल उजाड़ दिया। वह छल, बल, नीति और नयार्थ में निपुण था। दुष्पेक्ष्य म्लेच्छ से रणरंग में भिड़ने वाला वही एक मल्ल था। मुसलमानों के हृदय में वह कांटे की तरह चुभता था।’


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ई.1226 में इल्तुतमिश ने रणथम्भौर का घेरा डाला। पाठकों को स्मरण होगा कि अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज के पुत्र गोविंदराज को अजमेर का शासक नियुक्त किया था किंतु पृथ्वीराज चौहान के भाई हरिराज ने गोविंदराज चौहान को अजमेर से मार भगाया था। इस पर गोविंदराज रणथंभौर आ गया। तब से चौहानों की एक शाखा रणथंभौर में स्थापित हो गई। राजा गोविंदराज के बाद उसका पुत्र बाल्हण, बाल्हण के बाद प्रहलाद और उसके बाद वीरनारायण चौहान रणथंभौर के राजा बने। ये सभी दिल्ली सल्तनत के अधीन करद राजा थे। वीरनारायण के अल्पवयस्क होने के कारण उसका चाचा वागभट उसका संरक्षक बना। जब इल्तुतमिश अपने शत्रुओं से लड़ने में व्यस्त था, तब अवसर देखकर वागभट ने रणथंभौर को दिल्ली सल्तनत से स्वतंत्र कर लिया। ई.1226 में जब इल्तुतमिश ने अपने शत्रुओं से छुटकारा पाया तो उसने एक विशाल सेना लेकर रणथंभौर पर आक्रमण किया। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है कि अल्लाह की रहमत से ई.1226 में रणथंभौर के उस मजबूत किले पर अधिकार हो गया, जिसे लेने में 70 बादशाह असफल हो गए थे।

रणथंभौर में असफल होने वाले 70 बादशाह कौनसे थे, इसके बारे में मिनहाज कुछ भी सूचना नहीं देता है। फिर भी मिनहाज के इस कथन से इस बात का आभास हो जाता है कि दिल्ली के मुसलमानों को रणथंभौर पर आसानी से जीत नहीं मिल सकी थी।

‘हम्मीर महाकाव्य’ में भी इस युद्ध का वर्णन हुआ है। इसके अनुसार एक बार राजा वीरनारायण चौहान कच्छवाहों की राजकुमारी से विवाह करने ढूंढाड़ गया। मार्ग में उस पर शम्सुद्दीन शक ने आक्रमण किया। फलस्वरूप वीरनारायण रणथंभौर आकर शम्सुद्दीन का मुकाबला करने लगा।

मुसलमान जब शक्ति एवं बल से दुर्ग लेने में असफल हो गए तो उन्होंने राजा वीरनारायण के साथ मित्रता करने का छल किया। वीरनारायण के चाचा वागभट ने राजा को चेताया तथा कहा कि इस मित्रता के भ्रम में न रहे किंतु वीरनारायण ने अपने चाचा की सलाह अनसुनी कर दी तथा वह इल्तुतमिश के निमंत्रण पर दिल्ली चला गया।

इस पर वागभट चौहान नाराज होकर रणथंभौर छोड़कर मालवा चला गया। उधर जब वीरनारायण चौहान दिल्ली पहुंचा तो इल्तुतमिश के अमीरों ने धोखे से वीरनारायण की हत्या कर दी। इसके बाद मुस्लिम सेना ने फिर से रणथंभौर पर आक्रमण किया तथा किले पर अधिकार कर लिया। रणथम्भौर पर तुर्कों का अधिकार हो गया और उसकी सुरक्षा के लिए मुस्लिम सेना नियुक्त की गई।

इसके बाद पूरे दस साल तक रणथंभौर दुर्ग पर मुसलमानों का अधिकार रहा। जब इल्तुतमिश की मृत्यु हो गई तब वागभट मालवा से पुनः रणथंभौर आया तथा उसने मुसलमानों की सेना से रणथंभौर पुनः छीन लिया।

इस प्रकार पूरे उत्तर भारत के हिन्दू राजा लड़ते रहे और मुसलमानों से अपनी धरती बचाते रहे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ग्वालियर दुर्ग के सामने आठ सौ मनुष्यों का कत्ल किया इल्तुतमिश ने (54)

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ग्वालियर दुर्ग के सामने आठ सौ मनुष्यों का कत्ल किया इल्तुतमिश ने

लगभग 11 महीने तक मुस्लिम सेनाएं ग्वालियर दुर्ग लेने का प्रयास करती रहीं। जब किले में रसद सामग्री समाप्त हो गई तो राजा मलयवर्मन एक रात्रि में चुपचाप दुर्ग खाली करके चला गया। जब मुस्लिम सेनाएं दुर्ग में घुसीं तो दुर्ग पूरी तरह खाली था। इस पर इल्तुतमिश ने 800 मनुष्यों को पकड़कर मंगवाया तथा दुर्ग-विजय की प्रसन्नता में ग्वालियर दुर्ग के सामने उनका कत्ल किया।

चंदावर एवं रणथंभौर के चौहानों के राज्य छल से छीनने के बाद इल्तुतमिश ने ग्वालियर पर अधिकार करने का निश्चय किया। ग्वालियर पर गजनी के तुर्कों ने सर्वप्रथम ई.1197 में अधिकार किया था। उस युद्ध का नेतृत्व मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया था।

जब ई.1210 में कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्य होने पर आरामशाह ने स्वयं को दिल्ली सल्तनत का स्वामी घोषित कर दिया तथा इल्तुतमिश ने उसका विरोध किया तो प्रतिहार वंशीय राजकुमार विग्रह ने इसे अपने लिए अच्छा अवसर देखकर ग्वालियर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। तब से यही प्रतिहार ग्वालियर पर शासन कर रह थे।

ई.1232 में शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने एक विशाल सेना लेकर ग्वालियर का दुर्ग घेर लिया। उसने अपने अनेक अमीरों एवं सेनापतियों को अपनी-अपनी सेनाएं लेकर ग्वालियर पहुंचने के आदेश दिए। इस समय राजा मलयवर्मन ग्वालियर का शासक था।

उसने अपनी सेनाओं को ग्वालियर दुर्ग में केन्द्रित कर लिया तथा बड़ी बहादुरी से मुस्लिम सेनाओं का सामना करने लगा। शाहजहांकालीन लेखक खड्गराय ने अपनी पुस्तक ‘गोपाचल आख्यान’ में लिखा है कि शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ग्वालियर के पश्चिम से ग्वालियर की घाटी में पहुंचा और उसने दुर्ग को घेर लिया किंतु जब बहुत समय बीत जाने पर भी दुर्ग पर अधिकार नहीं हो सका तो इल्तुतमिश ने हैवत खाँ चौहान को अपना दूत बनाकर प्रतिहार राजा के पास भेजा।

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दूत ने दुर्ग में प्रवेश करके राजा मलयवर्मन से भेंट की तथा उससे कहा कि सुल्तान चाहता है कि राजा मलयवर्मन अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान से कर दे तथा स्वयं आत्मसमर्पण कर दे तो घेरा उठा लिया जाएगा। राजा मलयवर्मा ने सुल्तान का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इससे नाराज होकर इल्तुतमिश ने अपनी सेनाओं को दुर्ग पर हमला करने के आदेश दिए। मुस्लिम सेना ने दुर्ग के सामने स्थान-स्थान पर मचान बना लिए तथा उन मचानों पर चढ़कर दुर्ग पर पत्थर और तीर बरसाने लगे।

राजपूत सैनिक भी दुर्ग की प्राचीरों पर चढ़कर मचानों पर खड़े मुसलमान सैनिकों पर तीरों और पत्थरों की बौछार करने लगे। कई माह तक इसी तरह युद्ध चलता रहा जिसमें दोनों ओर के सैनिक मारे जाते रहे। अंत में राजपूतों ने दुर्ग से बाहर निकलकर युद्ध करने का निश्चय किया। दुर्ग की स्त्रियों ने जौहर किया और राजा मलयदेव (मलयवर्मन) अपने सैनिकों सहित दुर्ग से बाहर आकर लड़ने लगा। इस युद्ध में 5,360 मुस्लिम सैनिक मारे गए जबकि राजा मलयदेव भी अपने डेढ़ हजार सैनिकों सहित युद्धक्षेत्र में काम आया।

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खड्गराय द्वारा किया गया यह वर्णन इस युद्ध से लगभग पांच सौ साल बाद का है इसलिए इसमें सच्चाई का अंश कितना है, कहा नहीं जा सकता। फिर भी अनुमान होता है कि यह वर्णन किसी अन्य प्राचीन ग्रंथ के आधार पर किया गया होगा जो कि अब उपलब्ध नहीं है। इल्तुतिमश कालीन मुस्लिम लेखक मिनहाज उस् सिराज इस घेरेबंदी में इल्तुतमिश के साथ ग्वालियर में उपस्थित था। उसने ग्वालियर दुर्ग की घेराबंदी का बहुत संक्षिप्त उल्लेख किया है तथा घेरेबंदी के समय घटी घटनाओं का कोई वर्णन नहीं किया है। मिनहाज ने लिखा है- ‘लगभग 11 महीने तक मुस्लिम सेनाएं ग्वालियर का दुर्ग लेने का प्रयास करती रहीं। जब किले में रसद सामग्री समाप्त हो गई तो राजा मलयवर्मन एक रात्रि में चुपचाप दुर्ग खाली करके चला गया। जब मुस्लिम सेनाएं दुर्ग में घुसीं तो दुर्ग पूरी तरह खाली था। इस पर इल्तुतमिश ने 800 मनुष्यों को पकड़कर मंगवाया तथा दुर्ग-विजय की प्रसन्नता में दुर्ग के सामने उनका कत्ल किया। दुर्ग पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में सुल्तान ने अपने अमीरों के पदों में वृद्धि की तथा उन्हें सम्मानित किया तथा बयाना एवं सुल्तानकोट के प्रमुख अधिकारी को ग्वालियर का प्रबंधक बना दिया। कन्नौज, महिर और महाबन की सेनाएं उसके अधीन कर दी गईं ताकि कालिंजर और चंदेरी के हिन्दू दुर्गपतियों के विरुद्ध कार्यवाही की जा सके।’

इसके बाद ई.1233 में सुल्तान इल्तुतमिश दिल्ली चला गया।

ग्वालियर के स्वर्गीय प्रतिहार शासक मलयवर्मन के भाई नरवर्मन का एक ताम्रपत्र ग्वालियर के निकट शिवपुरी से तथा एक शिलालेख ग्वालियर के निकट गांगोला ताल से मिले हैं। ये दोनों लेख ई.1247 के हैं। इनमें राजा नरवर्मन द्वारा ब्राह्मणों को गांव दान दिए जाने के उल्लेख हैं।

इससे सिद्ध होता है कि ग्वालियर का दुर्ग भले ही प्रतिहारों के हाथों से निकल गया था किंतु उसके आसपास के क्षेत्र पर प्रतिहारों का अधिकार बना रहा। हरिहरनिवास द्विवेदी का मत है कि मलयवर्मा के भाई नरवर्मन ने अपने भाई से विश्वासघात करके इल्तुतमिश का साथ दिया था।

इस कारण इल्तुतमिश ने कुछ समय तक ‘गोपाचल’ अर्थात् ग्वालियर दुर्ग उसके अधीन रहने दिया था। ई.1280 का एक शिलालेख चंदेल राजा वीरवर्मन का मिला है। इसमें भी एक ब्राह्मण को एक गांव दिए जाने का उल्लेख है तथा कहा गया है कि इस राजा ने गोपालगिरि अर्थात् ग्वालियर के राजा हरिराज को जीता था।

इस काल में दिल्ली सल्तनत पर बलबन का शासन था। इस शिलालेख से यह सिद्ध होता है कि ग्वालियर के प्रतिहार राजा ई.1280 में भी अस्तित्व में थे जो भले ही ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार खो बैठे थे किंतु वे इस क्षेत्र के किसी भूभाग के स्वामी थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इल्तुतमिश के सेनापति हिन्दू राजाओं को भेड़िया और स्वयं को भेड़ समझते थे (55)

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इल्तुतमिश के सेनापति हिन्दू राजाओं को भेड़िया और स्वयं को भेड़ समझते थे

हालांकि इल्तुतमिश की सेनाओं के आगे हिन्दू सेनाएं अनेक स्थानों पर पराजित हो गई थीं किंतु इल्तुतमिश के सेनापति जानते थे कि वे हिन्दू राजाओं को धोखे से मारते थे न कि ताकत से। इसलिए इल्तुतमिश के सेनापति हिन्दू राजाओं से इतने भयभीत रहते थे कि वे हिन्दू राजाओं को भेड़िया और स्वयं को भेड़ समझते थे!

ग्वालियर दुर्ग पर विजय के बाद इल्तुतमिश स्वयं तो दिल्ली चला गया तथा उसने अपने सेनापति मलिक नुसरतुद्दीन तायसी को कालिंजर पर आक्रमण करने के लिए भेजा। इस समय चंदेल राजा त्रैलोक्यवर्मन कालिंजर का स्वामी था। पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1205 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कालिंजर जीतकर पहली बार उसे मुसलमानों के अधीन किया था किंतु कुछ ही समय बाद चंदेल राजा परमार्दिदेव के पुत्र त्रैलोक्यवर्मन ने मुसलमानों को कालिंजर से मार भगाया था तथा पुनः चंदेल राजपूतों के अधीन कर लिया था।

राजा त्रैलोक्यवर्मन इतना वीर था कि उसने मुसलमानों से न केवल कालिंजर छीन लिया था अपितु अजयगढ़, झांसी, सांगौर, बिजवार, पन्ना और छत्तरपुर भी छीन लिए थे। इसलिए इल्तुतमिश को लगता था कि कालिंजर अभियान बहुत कठिन होने वाला है तथा वहाँ से अपयश मिलने की भी पूरी संभावना है। अतः उसने कालिंजर अभियान स्वयं न करके अपने सेनापति मलिक नुसरतुद्दीन तायसी को कालिंजर पर आक्रमण करने के लिए भेजा।

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जिस समय मलिक नुसरतुद्दीन तायसी अपनी विशाल सेना के साथ कालिंजर पहुंचा, उस समय राजा त्रैलोक्यवर्मन कालिंजर के दुर्ग में ही था तथा उसके पास बहुत कम सेना थी। इसलिए त्रैलोक्यवर्मन कालिंजर से निकलकर अजयगढ़ दुर्ग में चला गया।

मलिक नुसरतुद्दीन तायसी ने कालिंजर दुर्ग पर अधिकार कर लिया तथा आसपास के क्षेत्र को लूटकर बहुत सा धन प्राप्त किया। इसके बाद वह अजयगढ़ की ओर बढ़ा। इस स्थान पर राजा त्रैलोक्यवर्मन ने मलिक नुसरतुद्दीन तायसी का सामना किया किंतु राजा त्रैलोक्यवर्मन परास्त हो गया तथा उसे अजयगढ़ का दुर्ग भी खाली करना पड़ा।

इसके बाद मलिक नुसरतुद्दीन तायसी ने जमू का दुर्ग भी अपने अधिकार में कर लिया। पाठकों को बताना समीचीन होगा कि यह जमू, जम्मू-कश्मीर वाले जम्मू से अलग था।

जब मलिक नुसरतुद्दीन तायसी चंदेल राज्य से बटोरी गई सम्पत्ति लेकर दिल्ली जा रहा था तब मार्ग में नरवर के राजा चाहड़देव ने तायसी का मार्ग रोका। राजा चाहड़देव जज्वपेल वंश का राजा था। उसने ग्वालियर के प्रतिहार राजा नरवर्मन से नरवर का दुर्ग छीना था। स्वयं मलिक नुसरतुद्दीन तायसी ने राजा चाहड़देव द्वारा मुस्लिम सेना का मार्ग रोके जाने की घटना के बारे में लिखा है- ‘उस दिन उस हिन्दू ने मेरे ऊपर इस प्रकार आक्रमण किया जैसे भेड़िया भेड़ों के समूह पर आक्रमण करता है।’

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चाहड़देव के इस आकस्मिक एवं विद्युत गति से आक्रमण के फलस्वरूप मलिक तायसी को सेना सहित जान बचाकर भागना पड़ा। उसका खजाना चाहड़देव ने घेर लिया। इस पर मलिक नुसरतुद्दीन तायसी ने अपनी सेना के तीन भाग किए तथा चाहड़देव की सेना पर तीन ओर से एक साथ आक्रमण किए। चाहड़देव तायसी के जाल में फंस गया तथा दोनों पक्षों में भयानक युद्ध हुआ जिसमें दोनों ओर के सैनिक बड़ी संख्या में मौत के घाट उतार दिए गए। मलिक नुसरतुद्दीन तायसी अपने खजाने को लेकर किसी तरह ग्वालियर के दुर्ग में पहुंच गया। राजा चाहड़देव भी अपनी राजधानी नरवर लौट गया। मलिक नुसरतुद्दीन तायसी के वापस चले जाने के पांच साल बाद राजा त्रैलोक्यवर्मन ने पुनः कालिंजर दुर्ग पर आक्रमण किया तथा न केवल कालिंजर, अपितु अजयगढ़ तथा महोबा भी मुसलमानों से छीन लिए। ई.1234 में इल्तुतमिश ने मालवा पर आक्रमण किया जहाँ परमारवंशी राजा देवपाल का शासन था। मुस्लिम स्रोतों के अनुसार सुल्तान की सेना ने भिलसा के दुर्ग पर अधिकार कर लिया तथा भिलसा के 300 वर्ष पुराने देवालय को नष्ट कर दिया। इसके बाद इल्तुतमिश ने उज्जैन पर आक्रमण किया तथा महाकाल मंदिर को तोड़कर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

जिन लोगों ने सुल्तान की सेना का प्रतिरोध किया, उन्हें मार दिया गया। इल्तुतमिश को उज्जैन नगर से सम्राट विक्रमादित्य की एक प्रतिमा तथा महाकाल का शिवलिंग प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त सात अन्य प्रमुख मूर्तियां भी सुल्तान के हाथ लगीं। इल्तुतमिश इन सभी मूर्तियों को अपने साथ दिल्ली ले गया तथा उनके टुकड़े करवाकर अपने महल की सीढ़ियों में चुनवा दिया।

जिस समय इल्तुतमिश ने मालवा पर अभियान किया, उस समय राजा देवपाल दूर हट गया था और जब इल्तुतमिश वापस चला गया तो उसने फिर से मालवा के उन क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया जो इल्तुतमिश ने अपने अधिकार में ले लिए थे। राजा जयसिंह के मान्धाता अभिलेख में लिखा है- ‘भिल्लस्वामिन नगर के समीप एक युद्ध में देवपाल ने म्लेच्छों के अधिपति को मार डाला।’ इस शिलालेख का तात्पर्य यह है कि राजा देवपाल ने इल्तुतमिश द्वारा भिलसा नगर में नियुक्त गवर्नर को मार डाला।

इल्तुतमिश के काल में यदुवंशी राजकुमारों ने तिहुनगढ़ और बयाना, चौहानों ने अजमेर तथा मेनाल, गाहड़वालों ने कन्नौज एवं बनारस, राष्ट्रकूटों ने बदायूं और कटेहरिया राजपूतों ने रूहेलखण्ड पर फिर से अधिकार कर लिए।

इल्तुतमिश ने इन सभी स्थानों पर सेनाएं भेजकर हिन्दू सरदारों एवं राजाओं का दमन किया तथा इन क्षेत्रों को फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन किया। इनका परिणाम यह हुआ कि कन्नौज अंतिम रूप से मुसलमानों के अधीन हो गया तथा बदायूं के राष्ट्रकूटों को अपना वंशानुगत क्षेत्र छोड़कर राजस्थान के रेगिस्तान में आना पड़ा।

कटेहरिया राजपूत अब भी अपनी आजादी की लड़ाई लड़ते रहे। बूंदी के हाड़ा चौहानों ने स्वयं को स्वतंत्र कर लिया। इस पर अजमेर के गवर्नर नासिरुद्दीन एतिमुर बहाई ने बूंदी पर आक्रमण किया। बूंदी के चौहानों ने नासिरुद्दीन एतिमुर बहाई को मार डाला।

इल्तुतमिश को दक्षिण बिहार में तिरहुत तथा उड़ीसा के गंग राज्य पर भी सैनिक अभियान करने पड़े किंतु वहाँ के हिन्दू राजाओं ने इल्तुतमिश को बिना किसी सफलता के ही भाग जाने पर विवश कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चालीसा का गठन करके अपनी ही औलादों की कब्र खोद दी इल्तुतमिश ने (56)

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चालीसा का गठन करके अपनी ही औलादों की कब्र खोद दी इल्तुतमिश ने

चालीसा का गठन करके इल्तुतमिश ने अपने शासन को मजबूती देने का बुद्धिमान प्रयास किया था। भारतीय शासन नीति के अनुसार यह उचित कदम ही था किंतु तुर्की राज्य कभी भी वंशानुगत नहीं होते थे। कोई भी ताकतवर तुर्क कभी भी सल्तनत पर अधिकार कर सकता था।

पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1208 में दिल्ली के पहले मुस्लिम सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक ने गजनी के सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन से प्रार्थना करके अपने लिए सुल्तान की उपाधि प्राप्त की थी किंतु मुस्लिम जगत् में केवल खलीफा को ही यह अधिकार था कि वह किसी शासक को सुल्तान की उपाधि दे।

अतः दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने ई.1229 में बगदाद के खलीफा के पास प्रार्थना भिजवाई कि खलीफा इल्तुतमिश को भारत का सुल्तान स्वीकार कर ले। खलीफा ने इल्तुतमिश की प्रार्थना मान ली तथा इल्तुतमिश को सुल्तान-ए-हिन्द की उपाधि और एक खिलवत भिजवाई।

इस प्रकार इल्तुतमिश खलीफा द्वारा भारत का मान्यता प्राप्त पहला सुल्तान बना। इस उपलब्धि को इल्तुतमिश ने अपनी चांदी की मुद्रा पर अंकित करवाया जिसे वह टंक कहता था। इल्तुतमिश ने टंक के एक ओर अपना तथा दूसरी ओर खलीफा का नाम अंकित करवाया। उसने कुतुबुद्दीन द्वारा अपनाई गई उस भारतीय परम्परा को बंद कर दिया जिसके अंतर्गत सिक्कों के एक तरफ घोड़े का तथा दूसरी तरफ बैल का अंकन किया जाता था।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

इल्तुतमिश जिस शासन व्यवस्था में सुल्तान बना था, उस शासन व्यवस्था का जन्म युद्ध के मैदानों में हुआ था। उस शासन व्यवस्था में शत्रु पर आक्रमण करना, शत्रु की भूमि को जीतना, विद्रोहों को दबना तथा शत्रु के क्षेत्र से लूटे गए माल से अपनी सेना का खर्चा चलाना ही प्रमुख थे किंतु अब इल्तुतमिश कुछ भू-भागों का स्थाई रूप से स्वामी बन गया था। इसलिए यह आवश्यक हो गया था कि इस तरह की शासन व्यवस्था की जाए ताकि विद्रोह न हों तथा उन्हें दबाने में सैनिक शक्ति एवं धन व्यय न करना पड़े।

इल्तुतमिश ने अनुभव किया कि राज्याधिकारियों में पूर्ण स्वामि-भक्ति संचारित करने का सबसे बड़ा उपाय यही है कि परम्परागत एवं वंशानुगत पदों को समाप्त करके राज्य के समस्त उच्च पदों पर उन्हीं व्यक्तियों को नियुक्त किया जाये जो अपनी उन्नति के लिए पूर्णतः सुल्तान की कृपा-दृष्टि पर निर्भर हों।

इस उद्देश्य से उसने चालीस तुर्की अमीरों अथवा गुलामों के दल का गठन किया। इसे चरगान अथवा तुर्कान ए चिहालगानी अर्थात् चालीस गुलामों का दल कहते थे। ये लोग अपनी राजभक्ति के लिए प्रसिद्ध थे और इनका उत्थान तथा पतन सुल्तान की इच्छा पर निर्भर रहता था। 

चालीसा का गठन करके इल्तुतमिश ने अपने शासन को सुदृढ़़ बनाने के लिए केवल स्वामिभक्ति को ही आधार नहीं बनाया अपितु स्वामिभक्ति के साथ-साथ योग्यता को भी ध्यान में रखा। उसने विदेशी मुसलमानों के साथ-साथ भारतीय मुसलमानों को भी शासन व्यवस्था में समुचित स्थान दिया। उसने मिनहाज उस् सिराज को दिल्ली के प्रधान काजी तथा सद्रेजहाँ के पद पर और मखरुल्मुल्क इमामी को वजीर के पद पर नियुक्त किया। मिनहाज उस् सिराज इस्लामिक सिद्धांतों का विद्वान था और इमामी तीस वर्ष तक तुर्की के खलीफा का वजीर रह चुका था।

चालीसा का गठन करके इल्तुतमिश ने अपने शासन को मजबूती देने का बुद्धिमान प्रयास किया था। भारतीय शासन नीति के अनुसार यह उचित कदम ही था किंतु तुर्की राज्य कभी भी वंशानुगत नहीं होते थे। कोई भी ताकतवर तुर्क कभी भी सल्तनत पर अधिकार कर सकता था। चालीस तुर्कों का यह दल भविष्य के सुल्तानों के लिए भयानक मुसीबत बनने वाला था। इसलिए चालीसा का गठन करके इल्तुतमिश ने अपनी ही औलादों की कब्र खोद दी।

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इल्तुतमिश ने अनुभव किया कि भारत के पर्वतीय क्षेत्रों, गंगा-यमुना के दो-आब क्षेत्र तथा खोखरों के प्रदेश में बार-बार विद्रोह होते थे। इसलिए इल्तुतमिश ने उन प्रदेशों में विश्वसनीय तुर्क सरदारों को जागीरें देकर वहाँ तुर्कों की बस्तियाँ बसाईं। प्रजा के झगड़ों को निबटाने के लिये इल्तुतमिश ने दिल्ली में अनेक काजी नियुक्त किए तथा सल्तनत के बड़े नगरों में ‘अमीर दादा’ नियुक्त किए। उनके कार्यों का निरीक्षण करने तथा उनके निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनने का भार प्रधान काजी तथा सुल्तान पर रहता था। इब्नबतूता लिखता है कि पीड़ित व्यक्ति को दिन में विशेष प्रकार के वस्त्र पहन कर अमीर दादा अथवा काजी के समक्ष उपस्थित होकर शिकायत करनी होती थी। रात्रि काल के लिये अलग तरह की व्यवस्था थी। सुल्तान के महल के सामने संगमरमर के दो सिंह बने हुए थे जिनके गलों में घण्टियाँ लटकी रहती थीं। जब रात्रिकाल में कोई पीड़ित व्यक्ति इन घण्टियों को बजाता था तब उसकी फरियाद सुनी जाती थी तथा उसके साथ न्याय किया जाता था। यद्यपि इल्तुतमिश के समय में साहित्य तथा कला सम्बन्धी उपलब्धियों की जानकारी नहीं मिलती है तथापि मुस्लिम इतिहासकारों ने उसे कला-प्रेमी सुल्तान बताया है जिसने अनेक साहित्यकारों को आश्रय दिया।

इल्तुतमिश ने मध्यएशिया के बहुत से सुन्नी विद्वानों, इतिहासकारों, कवियों तथा दार्शनिकों को दिल्ली में आश्रय प्रदान किया। इससे दिल्ली मुस्लिम सभ्यता तथा संस्कृति का केन्द्र बन गई। कुतुबमीनार को पूरा करवाने के अलावा उसने दिल्ली में कई मस्जिदें भी बनवाईं।

इल्तुतमिश अपनी मुस्लिम प्रजा के प्रति जितना उदार था, उतना हिन्दू प्रजा के प्रति नहीं था। उसने दिल्ली को मुस्लिम संस्कृति का केन्द्र बना दिया तथा हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त करके मुस्लिम इतिहासकारों से प्रशंसा प्राप्त की। उस काल में अधिकांश भारतीय मुसलमान तथा विदेशी तुर्क, सुन्नी मत को मानते थे। इस कारण सुल्तान ने सुन्नियों के साथ अपना समर्थन दिखाया। इल्तुतमिश ने सुन्नी उलेमाओं की सम्मति को इतना अधिक महत्त्व दिया कि वे शियाओं पर अत्याचार करने लगे। इससे इल्तुतमिश नेे शिया सम्प्रदाय की सहानुभूति खो दी।

मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि इल्तुतमिश बेसहारा दीन-दुखियों के प्रति दया एवं सहानुभूति रखता था। इस कारण सुल्तान के सम्बन्ध में अनेक कहानियाँ प्रचलित हो गईं। इल्तुतमिश दिन में पांच बार नमाज पढ़ता था, फकीरों को आश्रय देता था और रमजान के महीने में रोजा रखता था।

इल्तुतमिश की उदारता केवल सुन्नी मुसलमानों के साथ थी। हिन्दुओं की तो बात ही क्या, वह शिया मुसलमानों के साथ भी सहिष्णुता का व्यवहार नहीं कर सका। उसकी इस धार्मिक कट्टरता के कारण ही दिल्ली के इस्माइली अथवा इस्माइलिया शिया मुसलमानों ने विद्रोह का झंडा खड़ा किया और इल्तुतमिश की हत्या करने का षड्यन्त्र रचा। हिन्दुओं के साथ सुल्तान का व्यवहार और भी अधिक कठोर था। इल्तुतमिश सुन्नी उलेमाओं का बड़ा आदर करता था और वे ही उसके धार्मिक अत्याचार के साधन थे।

डॉ. निजामी ने लिखा है कि इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत को इक्ता शासन व्यवस्था और सुल्तान की निजी सेना के निर्माण का विचार प्रदान किया तथा मुद्रा में सुधार किया। जबकि डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि इल्तुतमिश रचनात्मक प्रतिभा सम्पन्न राजनीतिज्ञ नहीं था। उसने शासन संस्थाओं का निर्माण नहीं किया। ई.1236 में इल्तुतमिश बीमार पड़ा और उसका निधन हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुस्लिम सल्तनत का संस्थापक कौन था भारत में (57)

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मुस्लिम सल्तनत का संस्थापक कौन था भारत में

महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, कुतुबुद्दीन ऐबक तथा इल्तुतमिश में से भारत में मुस्लिम सल्तनत का संस्थापक कौन था? इसका निर्णय करना कठिन है।

विभिन्न इतिहासकार मुहम्मद बिन कासिम से लेकर, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, कुतुबुद्दीन ऐबक तथा इल्तुतमिश को भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय देते हैं। अधिकांश इतिहासकारों की धारणा है कि भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक इल्तुतमिश था किंतु किसी भी निश्चय तक पहुंचने के लिए हमें इन तुर्की आक्रांताओं की उपलब्धियों पर विचार करना होगा।

मुहम्मद बिन कासिम भारत पर आक्रमण करने वाला पहला मुस्लिम आक्रांता था। उसने अरब से सिंध के रास्ते भारत में प्रवेश किया था और सिन्ध में अपनी राज-संस्था स्थापित कर ली थी परन्तु खलीफा को लूट में हिस्सा नहीं देने के कारण खिलीफा ने मुहम्मद बिन कासिम को बगदाद में बुलवाकर मरवाया।

इस कारण कासिम की राजसत्ता का शीघ्र ही उल्मूलन हो गया। अतः मुहम्मद बिन कासिम को भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता। लेनपूल ने लिखा है- ‘सिंध में अरबों की विजय इस्लाम के इतिहास में एक घटना मात्र थी और इसका परिणाम शून्य था।’

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मुहम्मद बिन कासिम के बाद महमूद गजनवी दूसरा प्रबल मुस्लिम आक्रांता था जिसने भारत पर किए गए आक्रमणों में बड़ी सफलताएं अर्जित कीं। यदि वह चाहता तो भारत में मुस्लिम साम्राज्य स्थापित कर सकता था परन्तु उसका ध्येय भारत की अपार सम्पत्ति को लूटना, गुलामों को प्राप्त करना, भारत से औरतें लूटकर गजनी ले जाना तथा हिन्दू काफिरों को मारकर खलीफा को प्रसन्न करना था। उसने भारत में अपना राज्य स्थापित नहीं किया। अतः महमूद गजनवी को भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता। भारत में मुस्लिम साम्राज्य स्थापित करने के लक्ष्य से प्रेरित होकर सर्वप्रथम मुहम्मद गौरी ने आक्रमण किए। वह उत्तरी भारत में विशाल भूभाग को जीतने में सफल भी हुआ परन्तु उसने भारत में कोई अलग राज्य स्थापित नहीं किया और न भारत में वह स्थायी रूप से रहा, वरन् उसने विजित भारतीय क्षेत्रों को गजनी के राज्य में मिला लिया तथा अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में अपना गवर्नर नियुक्त करके स्वयं गजनी चला गया। इसलिये उसे भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का श्रेय नहीं दिया जा सकता। मुहम्मद गौरी की मृत्यु के उपरान्त कुतुबुद्दीन ऐबक, मुहमम गौरी के भारतीय क्षेत्रों का स्वामी बना। उसने उत्तरी भारत में अपनी सत्ता स्थापित कर ली और एक बड़े साम्राज्य का निर्माण किया।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने प्रथम बार दिल्ली में मुस्लिम सल्तनत की स्थापना की। उसने इस सल्तनत का गजनी से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया और स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगा परन्तु इतिहासकारों को उसे भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मानने में कई आपत्तियाँ है-

(1.) कुतुबुद्दीन ऐबक को खलीफा से स्वतन्त्र राज-सत्ता का कोई प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं हुआ इसलिये कुछ इतिहासकार उसे गजनी के मुस्लिम राज्य के भारतीय प्रांतों का प्रान्तपति ही मानते हैं।

(2.) अब तकएक भी ऐसी मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है जिसमें ऐबक का नाम अंकित हो।

(3.) इतिहासकारों को इस बात पर भी सन्देह है कि उसके नाम का कोई खुतबा पढ़ा गया था या उसने सुल्तान की उपाधि धारण की थी।

(4.) मुहम्मद गौरी के उत्तराधिकारी एवं गजनी के शासक महमूद बिन गियासुद्दीन ने कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का सुल्तान स्वीकार किया था परन्तु गियासुद्दीन को किसी को भी सुल्तान की उपाधि देने का अधिकार नहीं था। यह उपाधि केवल खलीफा ही दे सकता था।

(5.) गजनी के दूसरे शासक ताजुद्दीन यल्दूज ने कुतुबुद्दीन ऐबक की सत्ता को स्वीकार नहीं किया था।

(6.) ऐबक द्वारा स्थापित राज्य, असम्बद्ध तथा अव्यवस्थित संघ जैसा था। ऐबक की मृत्यु के उपरान्त उसकी सल्तनत चार टुकड़ों में बिखर गई।

इन तथ्यों के आधार पर बहुत से विद्वान कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक नहीं मानते।

कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद आरामशाह लाहौर में शासक बना। आरामशाह ने अपने नाम से खुतबा पढ़वाया और अपने नाम की मुद्राएं चलवाईं। इतना होने पर भी उसे भारत में मुस्लिम सल्तनत का संस्थापक नहीं कहा जा सकता। उसे दिल्ली में प्रवेश करने से पहले ही इल्तुतमिश ने परास्त कर दिया था। ऐसी दशा में केवल अपने नाम का खुतबा पढ़वाने तथा मुद्रा चलाने से उसे दिल्ली का सुल्तान मान लेना ठीक नहीं है। उसे खलीफा ने सुल्तान स्वीकार नहीं किया था।

अधिकांश इतिहासकार इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक मानते हैं। इसके पक्ष में कई तर्क दिये जाते हैं-

(1.) दिल्ली के अमीरों ने जिस समय आरामशाह के स्थान पर इल्तुतमिश को दिल्ली का सुल्तान निर्वाचित किया, उस समय तक दिल्ली की सल्तनत लगभग समाप्त हो चुकी थी।

(2.) इल्तुतमिश ने विभिन्न तुर्की अमीरों का दमन करके, नये हिन्दू राज्यों को जीतकर तथा यल्दूज, कुबाचा और अली मर्दान जैसे प्रतिद्वन्द्वियों को समाप्त करके नये सिरे से दिल्ली सल्तनत का निर्माण किया तथा उसे स्थायित्व प्रदान किया।

(3.) इल्तुतमिश ने मंगोलों के आक्रमण से दिल्ली सल्तनत की रक्षा की।

(4.) इल्तुतमिश ने बंगाल तथा बिहार फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन कर लिये और दो-आब के विद्रोहियों का दमन करके राजधानी दिल्ली को सुरक्षित बनाया।

(5.) इल्तुतमिश ने न केवल उन राजपूतों को दिल्ली की अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जो ऐबक की मृत्यु के उपरान्त स्वतन्त्र हो गये थे, वरन् अन्य राजपूतों को भी परास्त करके सल्तनत की सीमा में वृद्धि की।

(6.) इल्तुतमिश ने खलीफा से सुल्तान की उपाधि प्राप्त करके दिल्ली सल्तनत को इस्मालिक जगत में नैतिक आधार दिलवाया।

(8.) इल्तुतमिश को 26 साल के दीर्घ शासनकाल में सल्तनत को संगठित करने का पर्याप्त समय मिला। इस कारण उसने जिस दिल्ली सल्तनत का निर्माण किया, वह इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद लगभग 300 सालों तक अस्तित्व में रही।

इस प्रकार इल्तुतमिश को ही भारत में मुस्लिम सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। फिर भी इतिहासकार इस तथ्य से मना नहीं कर सकते कि दिल्ली का पहला मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ही था जिसे मुहम्मद गौरी ने दिल्ली में सत्तारूढ़ किया था। ऐसी स्थिति में भारत में मुस्लिम सल्तनत की स्थापना करने का श्रेय अकेले इल्तुतमिश को कैसे दिया जा सकता है?

निष्कर्ष रूप में केवल इतना कहा जा सकता है कि दिल्ली सल्तनत की स्थापना का जो कार्य मुहम्मद गौरी ने आरम्भ किया, उसे कुतुबुद्दीन ऐबक एवं इल्तुतमिश द्वारा पूरा किया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाह तुर्कान ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा कर लिया (58)

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शाह तुर्कान ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा कर लिया

रुकुनुद्दीन की माँ शाह तुर्कान ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। शाह तुर्कान बला की खूबसूरत औरत थी। उसका जन्म अभिजात्य तुर्कों में न होकर निम्न समझे जाने वाले वंश में हुआ था। वह अपने दैहिक सौन्दर्य के बल पर इल्तुतमिश जैसे प्रबल सुल्तान की बेगम बनी थी।

छब्बीस साल तक शासन करने के बाद शम्सुद्दीन इल्तुतमिश बीमार पड़ा तथा मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसे कुतुबमीनार के पास दफना दिया गया। बुखारा के बाजार में अदने से गुलाम के रूप में बिकने के बाद अपनी जिंदगी आरम्भ करने वाले इल्तुतमिश ने अपने छोटे से जीवन काल में भारत जैसे पराए देश में न केवल नए सिरे से दिल्ली सल्तनत की स्थापना की थी अपितु उसे दूर-दूर तक फैलाकर मजबूत सैनिक एवं प्रशासनिक आधार भी प्रदान किया था। फिर भी इल्तुतमिश के मरते ही दिल्ली सल्तनत की नैया हिचकोले खाने लगी। सल्तनत की कमजोरी के दो बड़े कारण थे।

इनमें से पहला था इल्तुतमिश का दरबार जो परस्पर ईर्ष्या करने वाले, षड़यन्त्री, दगाबाज एवं ऐसे फरेबी तुर्की अमीरों से भरा पड़ा था जो पलक झपकते ही किसी की भी हत्या करने में तनिक भी संकोच नहीं करते थे। प्रत्येक अमीर चाहता था कि वह अधिक से अधिक सत्ता हासिल करके सुल्तान का प्रिय बने और अपना घर सोने-चांदी के सिक्कों से भरे। स्वयं सुल्तान को भी कुछ अमीरों के साथ मिलकर दूसरे अमीरों के विरुद्ध षड़यंत्र रचने पड़ते थे और उनकी हत्याएं करवाकर उनका समस्त धन, सम्पत्ति तथा जागीर हड़पने पड़ते थे।

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सल्तनत की कमजोरी का दूसरा सबसे बड़ा कारण था इल्तुतमिश का हरम! उसके हरम में कई देशों की खूबसूरत औरतें शामिल थीं जिन्हें अपनी-अपनी खूबसूरती तथा अपने-अपने पिता की हैसियत की ठसक थी। वे अपने-अपने देश की संस्कृति लेकर आई थीं तथा एक-दूसरे की संस्कृति को हेय दृष्टि से देखती थीं।

ये औरतें अपने-अपने पुत्र को सुल्तान का उत्तराधिकारी घोषित करवाना चाहती थीं जबकि सुल्तान अपने निकम्मे बेटों की बजाय अपनी बेटी रजिया को अगली सुल्तान बनाना चाहता था। इस कारण हरम की औरतों में वैमनस्य अपने चरम पर था। इल्तुतमिश की बेगम शाह तुर्कान अपने पुत्र रुकनुद्दीन को सुल्तान बनाना चाहती थी।

तुर्कों में औरत को सुल्तान बनाने की परम्परा नहीं थी फिर भी यदि इल्तुतमिश अपनी पुत्री को सुल्तान बनाना चाहता था तो उसके कुछ कारण थे। तुर्क चीन से निकले थे किंतु इस्लाम स्वीकार करके अपनी संस्कृति खो बैठे थे। उन्होंने जो संस्कृति अपनाई थी, वह न पूरी तरह अरबी थी, न पूरी तरह अफगानी थी। तुर्कों की संस्कृति में चीन के खूनी कबीलों की कुछ परम्पराएं अब भी जीवित थीं। भारत में आने के बाद उनमें भारतीय संस्कृति के भी कुछ तत्व शामिल होने लगे थे।

तुर्कों में उत्तराधिकार के नियम निश्चित नहीं थे। सुल्तान के मरते ही सुल्तान के बेटों और सल्तनत के ताकतवर अमीरों में खूनी संघर्ष होता था और विजयी शहजादा अथवा विजयी अमीर सल्तनत पर अधिकार कर लेता था। इल्तुतमिश का योग्य एवं बड़ा पुत्र नासिरुद्दीन महमूद, इल्तुतमिश के जीवनकाल में ही मर गया था जबकि दूसरा पुत्र रुकुनुद्दीन निकम्मा और अयोग्य था। इल्तुतमिश के अन्य पुत्र अवयस्क थे। इसलिये इल्तुतमिश को अपने उत्तराधिकारी की चिंता रहती थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि जब कुतुबुद्दीन ऐबक का ग्वालियर पर अधिकार स्थापित हो गया था तब कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को वहाँ का अमीर नियुक्त किया था और उसके साथ अपनी पुत्री कुतुब बेगम का विवाह कर दिया था। इस दाम्पत्य से इल्तुतमिश को एक पुत्री प्राप्त हुई थी जिसका नाम रजिया रखा गया था। कुछ दिन बाद इल्तुतमिश को बदायूँ का गवर्नर नियुक्त कर दिया गया।

चूंकि रजिया का जन्म कुतुबुद्दीन ऐबक की शहजादी के पेट से हुआ था, इसलिये न केवल इल्तुतमिश के हरम में अपितु कुतुबुद्दीन के हरम में भी शहजादी रजिया की विशेष स्थिति थी। उसे न केवल शाही हरम में बहुत लाड़-प्यार, नजाकत और शाही सम्मान से पाला गया था, अपितु सुल्तान के दरबार में भी निर्भय होकर जाने का अधिकार मिला था।

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रजिया की इस गरिमामय स्थिति के विपरीत, रजिया के सौतेले भाइयों का जन्म साधारण समझी जाने वाली गुलाम औरतों के पेट से हुआ था। वे सुल्तान कुतुबुद्दीन के हरम अथवा दरबार में नहीं जा सकते थे। इस कारण उनका लालन-पालन राजकीय परम्पराओं और शानो-शौकत से दूर, साधारण लड़कों की तरह हुआ। जब रजिया पांच साल की हुई तब उसके नाना अर्थात् सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु हो गई तथा रजिया के पिता इल्तुतमिश को दिल्ली के तख्त पर बैठने का अवसर मिला। प्रकृति ने रजिया को जितना सुंदर चेहरा दिया था, उतना ही मजबूत मस्तिष्क भी दिया था। इासलिए वह अपने पिता के कार्यों में हाथ बंटाने लगी। इल्तुतमिश भी अपनी इस पुत्री से बड़ा प्रेम करता था तथा उसकी योग्यता को कई बार परख चुका था। कुछ बड़ी होने पर रजिया इल्तुतमिश की अनुपस्थिति में राज्यकार्य करने लगी। इन सब बातों को देखते हुए इल्तुतमिश ने अपने अमीरों से रजिया को उत्तराधिकारी नियुक्त करने की सहमति प्राप्त की तथा रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इल्तुतमिश के जीवन काल में ही रजिया का नाम, सुल्तान के नाम के साथ चांदी के टंक पर खुदवाया जाने लगा। इससे रजिया के सौतेले भाइयों की छाती पर सांप लोटने लगे।

जब इल्तुतमिश की मृत्यु हुई तो तुर्की अमीर, विशेषकर चालीसा समूह के अमीर एक औरत को सुल्तान के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए। भारत में मुस्लिम सुल्तान अरब के खलीफा के प्रतिनिधि के रूप में शासन करते थे। अरब वालों के रिवाजों के अनुसार औरत, मर्दों के द्वारा भोगे जाने के लिये बनाई गई है न कि शासन करने के लिये। इस कारण मर्द अमीरों को, औरत सुल्तान का अनुशासन मानना बड़े शर्म की बात थी।

इसलिए दिल्ली के तुर्की अमीरों ने रजिया को सुल्तान बनाने से मना कर दिया तथा वे इल्तुतमिश के पुत्रों में से किसी एक को सुल्तान बनाने का प्रयास करने लगे। उन्होंने इल्तुतमिश के सबसे बड़े जीवित पुत्र रुकुनुद्दीन फीरोजशाह को तख्त पर बैठा दिया।

तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार रुकुनुद्दीन रूपवान, दयालु तथा दानी सुल्तान था परन्तु उसमें दूरदृष्टि नहीं थी। वह प्रायः मद्यपान करके हाथी पर चढ़कर दिल्ली की सड़कों पर स्वर्ण-मुद्राएँ बाँटा करता था। वह अपने पिता इल्तुतमिश के जीवन काल में बदायूँ तथा लाहौर का गवर्नर रह चुका था परन्तु उसने सुल्तान बनने के बाद मिले अवसर से कोई लाभ नही उठाया।

मद्यपान में धुत्त रहने के कारण रुकुनुद्दीन राज्य कार्यों की उपेक्षा करता था। इसलिये उसकी माँ शाह तुर्कान ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। शाह तुर्कान बला की खूबसूरत औरत थी। उसका जन्म अभिजात्य तुर्कों में न होकर निम्न समझे जाने वाले वंश में हुआ था। वह अपने दैहिक सौन्दर्य के बल पर इल्तुतमिश जैसे प्रबल सुल्तान की बेगम बनी थी। बला की खूबसूरत होने के कारण वह सुल्तान की चहेती थी और अब रुकुनुद्दीन जैसे निकम्मे सुल्तान की राजमाता बन गई थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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