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शाह तुर्कान का सिर काट दिया गुण्डों ने (59)

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शाह तुर्कान का सिर काट दिया गुण्डों ने

रजिया ने बूढ़े मुसलमानों की परवाह नहीं की तथा वह मस्जिद से निकलने वाले नौजवानों के सामने अपनी बात बार-बार दोहराने लगी। मुस्लिम नौजवानों पर रजिया का जादू चल गया। उन्होंने रजिया की गुहार स्वीकार कर ली। कुछ गुण्डों ने शाह तुर्कान का सिर काट दिया!

इल्तुतमिश ने अपने पुत्रों को निकम्मा जानकर अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया किंतु तुर्की अमीरों ने रजिया को औरत जानकर उसे सुल्तान के रूप में स्वीकार नहीं किया तथा इल्तुतमिश के सबसे बड़े जीवित पुत्र रुकनुद्दीन को सुल्तान बना दिया। रुकनुद्दीन दिन-रात शराब के नशे में धुत्त रहता था, इस कारण शासन की बागडोर रुकनुद्दीन की माता शाह तुर्कान के हाथों में आ गई।

कुछ इतिहासकारों ने शाह तुर्कान को इल्तुतमिश की बेगम न मानकर उसकी रखैल माना है। आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि तुर्कान शाही महल में दासी थी किंतु उसने राज्य की नीति पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया था। चूंकि वह उच्च तुर्की कुल से सम्बन्ध नहीं रखती थी इसलिए इल्तुतमिश की उच्च तुर्की कुल की बेगमों ने इल्तुतमिश के जीवन काल में शाह तुर्कान के साथ बड़ा खराब व्यवहार किया था।

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अब चूंकि शासन की बागडोर स्वयं तुर्कान के हाथों में आ गई थी इसलिए उसे, कुलीन कहलाई जाने वाली बेगमों से बदला लेने का अवसर मिल गया। शाह तुर्कान तुर्की बेगमों को गंदी-गंदी गालियां देती तथा यदि कोई बेगम विरोध करती तो उन्हें कोड़ों से पिटवाने में भी देर नहीं लगाती। ईरान, तूरान, मकरान, अफगानिस्तान, बल्ख, बुखारा, तथा समरकंद आदि देशों से लाई गए ये बेगमें अपमानित होकर अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहाती रहती थीं किंतु उन्हें इस संकट से छुटकारे का कोई उपाय नहीं सूझता था। 

जब कुछ बेगमों ने शाह तुर्कान का अधिक विरोध किया तो शाह तुर्कान ने उनमें से कुछ बेगमों की हत्या करवा दी। इस पर तुर्की अमीरों ने इल्तुतमिश के एक अवयस्क पुत्र कुतुबुद्दीन को सुल्तान बनाने का प्रयास किया। जब शाह तुर्कान को अमीरों के इन इरादों की भनक लगी तो उसने इल्तुतमिश के अवयस्क पुत्र कुतुबुद्दीन की आँखें फुड़कवार उसे जेल में बंद कर दिया तथा कुछ दिन बाद शहजादे की हत्या करवा दी।

शाह तुर्कान ने उन अमीरों की भी हत्या करवा दी जो रुकनुद्दीन को हटाकर कुतुबुद्दीन को सुल्तान बनाने का प्रयास कर रहे थे। इस कारण हरम से लेकर दरबार तक सुल्तान रुकुनुद्दीन तथा शाह तुर्कान के विरुद्ध असंतोष भड़क गया।

उन्हीं दिनों पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण आरम्भ हो गए। गजनी, किरमान तथा बामियान के शासक सैफुद्दीन हसन कार्लूग ने सिंध तथा उच पर आक्रमण किया। सीमाओं पर नियुक्त दिल्ली की सेनाओं ने इन आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया परन्तु सल्तनत में आन्तरिक अंशाति बढ़ती चली गई। चारों ओर विरोध की अग्नि भड़क उठी। सुल्तान रुकुनुद्दीन फीरोजशाह तथा उसकी माँ शाह तुर्कान इस विरोध को शांत करने में असमर्थ रहे।

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रुकुनुद्दीन का सौतेला भाई गियासुद्दीन जो अवध का सूबेदार था, खुले रूप में विद्रोह करने पर उतर आया। उसने बंगाल से दिल्ली आने वाले राजकोष को मार्ग में ही छीन लिया तथा भारत के कई बड़े नगरों को लूट लिया। मुल्तान, हांसी, लाहौर तथा बदायूं के गवर्नर परस्पर समझौता करके रुकुनुद्दीन को गद्दी से उतारने के लिये दिल्ली की ओर चल पड़े। जब दिल्ली के अमीरों को पता लगा कि मुल्तान, हांसी, लाहौर तथा बदायूं के अमीर मिलकर गियासुद्दीन को नया सुल्तान बनाना चाहते हैं तो दिल्ली के अमीर घबरा गए। वे किसी भी कीमत पर अपनी ही पसंद के शहजादे को सुल्तान बनाए रखना चाहते थे ताकि दिल्ली के अमीरों की रोजी-रोटी चलती रहे तथा उनकी हवेलियों एवं सम्पत्ति को कोई नुक्सान नहीं पहुंचे। इन अमीरों ने इल्तुतमिश के एक अन्य छोटे शहजादे बहराम को सुल्तान बनाने के प्रयास आरम्भ किए किंतु बहराम इतना छोटा था कि इस स्थिति को संभाल नहीं सकता था। इसलिए दिल्ली के अमीर रजिया को सुल्तान बनाने की चर्चा करने लगे जिनमें चालीसा मण्डल के अमीर अग्रणी थे। इस पर शाह तुर्कान ने शहजादी रजिया की हत्या कराने का प्रयत्न किया किंतु रजिया सतर्क थी।

रजिया शाह तुर्कान की प्रत्येक गतिविधि पर तब से दृष्टि रख रही थी जब से उसने शहजादे कुतुबुद्दीन की हत्या करवाई थी। इसलिए रजिया बच गई तथा शाह तुर्कान का षड़यंत्र असफल हो गया।

शहजादी रजिया की हत्या का षड़यंत्र असफल रहने पर दिल्ली में शाही हरम से लेकर दरबार तक में परिस्थितियां गंभीर हो गईं। रजिया ने चालीसा के अमीरों से सम्पर्क किया तथा उनसे सहायता मांगी। रजिया इल्तुतमिश की बेटी ही नहीं थी अपितु उसकी रगों में कुतुबुद्दीन ऐबक का भी रक्त बह रहा था। इसलिए चालीसा मण्डल के कुछ अमीरों को रजिया से सहानुभूति थी तथा उन्हें शाह तुर्कान का यह कदम बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। फिर भी चालीसा के अमीर एक औरत को सुल्तान बनाने के सम्बन्ध में कोई निर्णय नहीं ले सके।

जब सुल्तान रुकनुद्दीन फीरोजशाह मुल्तान, लाहौर, हांसी तथा बदायूं के गवर्नरों के विरुद्ध लड़ने दिल्ली से बाहर गया, तब रजिया ने उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठाने का निश्चय किया। एक शुक्रवार को जब दिल्ली के मुसलमान, मध्याह्न की नमाज के लिए एकत्रित हो रहे थे, तब रजिया अचानक ही लाल कपड़े पहनकर मस्जिद के सामने आ खड़ी हुई और शाह तुर्कान के विरुद्ध अभियोग लगाते हुए अपने लिये न्याय की गुहार लगाने लगी।

रजिया ने मस्जिद में नमाज पढ़कर निकल रहे लड़कों को सम्बोधित किया तथा अपने पिता शाह इल्तुतमिश की अंतिम इच्छा से लेकर, चालीसा अमीरों के कारनामे तथा शाह तुर्कान के घिनौने षड़यंत्र की कहानी अत्यंत जोशीले शब्दों में कह सुनाई। उसने दिल्ली की जनता से कहा कि मरहूम सुल्तान इल्तुतमिश ने रजिया को ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था किंतु शाह तुर्कान ने सत्ता हड़प ली है इसलिए अब जनता ही इस बात कर निर्णय करे कि सल्तनत का वास्तविक हकदार कौन है!

सर्दियों में दोपहर की सुहाती हुई धूप में लाल कपड़ों में सजी-धजी गोरी-चिट्टी रजिया का रूप, देखने वालों की आँखों को चौंधा रहा था। वह घोड़े पर सवार होकर और हाथ में तलवार लेकर आई थी। उसने सिर पर वही मुकुट पहना हुआ था जिसे वह शहजादी की हैसियत से अपने नाना कुतुबुद्दीन के समय से पहनती थी। रजिया ने अपने मुंह पर कोई कपड़ा भी नहीं लपेट रखा था। वह अपने चेहरे के जादू का असर अच्छी तरह जानती थी। इस समय यही एक जादू था जो रजिया की सहायता कर सकता था।

कुछ बूढ़े मुसलमानों ने रजिया को फटकारा कि उसका यह तरीका ठीक नहीं है। औरतों को अपने घर के मसले घर से बाहर नहीं लाने चाहिए। हरम की औरतों के लिए यह अच्छा नहीं है कि वे इस तरह खुलेआम सुल्तान के खिलाफ जनता को भड़काएं।

रजिया ने उन बूढ़े मुसलमानों की परवाह नहीं की तथा वह मस्जिद से निकलने वाले नौजवानों के सामने अपनी बात बार-बार दोहराने लगी। मुस्लिम नौजवानों पर रजिया का जादू चल गया। उन्होंने रजिया की गुहार स्वीकार कर ली। देखते ही देखते मुस्लिम लड़कों की भीड़ सुल्तान के महल के सामने एकत्रित होने लगी। वे शाह तुर्कान को महल से बाहर आकर रियाया की गुहार सुनने की पुकार लगा रहे थे और रजिया के लिए न्याय मांग रहे थे।

थोड़ी ही देर में यह सूचना दिल्ली की अन्य मस्जिदों में भी पहुंच गई तथा मनचले लड़कों की भीड़ दिल्ली की संकरी गलियों से निकलकर शाही महल की तरफ दौड़ पड़ी। जब महल के सामने काफी भीड़ एकत्रित हो गई तो मनचले लड़कों ने बलवा शुरु कर दिया।

जब उनकी संख्या कई हजार हो गई तो उनके मन से सुल्तान के सिपाहियों का भय जाता रहा और वे सिपाहियों को धकेल कर महल में घुस गये। सुल्तान के सिपाही भी सुल्तान के प्रति ज्यादा वफादार नहीं थे। वे भी विद्रोहियों के साथ हो गए तथा रजिया को न्याय दिलवाने के लिए शाह तुर्कान को बंदी बनाकर महल से बाहर ले आए और कुछ गुण्डों ने शाह तुर्कान का सिर काट दिया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रजिया सुल्ताना तुर्की अमीरों को फटकारने लगी (60)

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रजिया सुल्ताना तुर्की अमीरों को फटकारने लगी

दिल्ली के नौजवानों को भड़का कर शाह तुर्कान का सिर कटवाकर रजिया दिल्ली की सुल्तान बन गई। चालीसा के जिन अमीरों ने रजिया के उत्तराधिकार का विरोध किया था, उन्हीं अमीरों ने रजिया को सुल्तान स्वीकार कर लिया। रजिया को भारत के इतिहास में रजिया सुल्ताना कहा जाता है।

दिल्ली के अमीरों द्वारा रजिया को सुल्तान स्वीकार करने का एक विशेष कारण यह भी था कि दिल्ली की सीमा पर लड़ रहा सुल्तान रुकनुद्दीन फीरोज मुल्तान, लाहौर, हांसी तथा बदायूं के गवर्नरों की सम्मिलित सेनाओं का सामना नहीं कर पा रहा था और ऐसा लगने लगा था कि सुल्तान की सेनाएं कभी भी परास्त हो जाएंगी।

दिल्ली के अमीर जानते थे कि यदि प्रांतीय गवर्नरों की सेनाएं विजयी होने के बाद दिल्ली में प्रवेश करेंगी तो वे अपनी पसंद का सुल्तान नियुक्त करेंगी और वह सुल्तान दिल्ली के अमीरों की बजाय उनके दुश्मनों को बढ़ावा देगा। इसलिए दिल्ली के अमीरों ने रजिया से समझौता कर लिया और उसे अपनी सुल्तान स्वीकार कर लिया।

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चालीसा के अमीरों ने दिल्ली की जनता के समक्ष ऐसा भाव प्रस्तुत किया मानो रजिया को सुल्तान स्वीकार करना अमीरों की मजबूरी नहीं है अपितु वे तो मरहूम सुल्तान इल्तुतमिश की इच्छा की पूर्ति कर रहे हैं तथा मरहूम सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के प्रति स्वामिभक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं।

जब रुकुनुद्दीन फीरोजशाह ने सुना कि अमीरों ने रजिया को सुल्तान बना दिया है तो वह प्रांतीय गवर्नरों के साथ चल रही लड़ाई का कोई निर्णय हुए बिना ही दिल्ली लौट आया। रजिया सुल्ताना ने अपने भाई रुकनुद्दीन फीरोजशाह को बंदी बना लिया तथा 9 नवम्बर 1236 को उसकी हत्या कर दी। इस प्रकार इस शराबी और विलासी सुल्तान की सल्तनत केवल सात महीने ही चल पाई।

जब रुकनुद्दीन मोर्चा छोड़कर दिल्ली चला गया तो विद्रोही गवर्नरों ने बदली हुई परिस्थिति पर विचार किया कि अब क्या करना चाहिए! सल्तनत का वजीर कमालुद्दीन जुनैदी भी दिल्ली से भागकर इन विद्रोही गवर्नरों के पास आ गया। वह स्वयं दिल्ली का सुल्तान बनना चाहता था। इसलिए उसने प्रांतीय गवर्नरों को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए उकसाया ताकि रजिया सुल्ताना को तख्त से उतारकर जुनैदी को सुल्तान बनाया जा सके।

विद्रोही प्रांतीय गवर्नर वजीर कमालुद्दीन जुनैदी के इस प्रस्ताव से सहमत हो गए तथा अपनी सेनाओं के साथ दिल्ली की तरफ बढ़ने लगे। बहुत कम समय में उन्होंने दिल्ली घेर ली। रजिया अभी सुल्तान बनी ही थी, इसलिए स्थितियां पूरी तरह से उसके नियंत्रण में नहीं आ पाई थीं। फिर भी कुछ युवा तुर्क और दिल्ली के सामान्य नागरिक रजिया के साथ थे। वे लोग वजीर कमालुद्दीन जुनैदी तथा विद्रोही सरदारों का विरोध करने करने को उद्धत हो गए।

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दिल्ली के वे तुर्की अमीर जिन्हें न तो रजिया के सुल्तान बनने में लाभ था और न कमालुद्दीन जुनैदी के सुल्तान बनने में लाभ था, उन्होंने एक नया षड़यंत्र रचा। उनके अलग-अलग दल इल्तुतमिश के अलग-अलग पुत्रों का समर्थन करने लगे और अपने पक्ष के शहजादे को सुल्तान बनाने का प्रयास करने लगे। अधिकतर तुर्की अमीर, कट्टर सुन्नी थे। उन्हें एक औरत के अधीन रहकर काम करना सहन नहीं था। इसलिये वे रजिया को राजपद के लिए सर्वथा अनुपयुक्त समझते थे। इन अमीरों द्वारा भी रजिया सुल्ताना के विरुद्ध विद्रोह किये जाने की पूरी संभावना थी। दिल्ली के शासन में आंतरिक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होते ही चौहान राजपूतों ने फिर से अपने राज्य प्राप्त करने का प्रयास आरम्भ कर दिए तथा रणथम्भौर दुर्ग पर घेरा डाल दिया जिसे इल्तुतमिश ने बड़ी कठिनाई से अपने अधीन किया था। इन कठिनाइयों का निस्तारण किये बिना रजिया दिल्ली पर शासन नहीं कर सकती थी किंतु अपने नाना के समय से ही दिल्ली की राजनीति को निकट से देखने और समझने के कारण वह इन परिस्थितियों से निबटने की समझ रखती थी।

इब्नबतूता, इसामी, फरिश्ता, निजामुद्दीन तथा बदायूनीं आदि मुस्लिम इतिहासकारों ने रजिया सुल्ताना के स्त्री होने के कारण उसके इस आचरण को निंदनीय ठहराया है कि वह औरत होकर भी सुल्तान बन गई थी। इन लेखकों में से अधिकतर स्वयं कट्टर सुन्नी उलेमा थे और औरत के शासन को हिकारत की दृष्टि से देखते थे।

रूढ़िवादी मुस्लिम इतिहासकार रजिया के विरुद्ध कुछ भी क्यों न कहें किंतु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि तेरहवीं सदी की तुर्की राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए एक औरत में जिस प्रतिभा की आवश्यकता थी, रजिया उस प्रतिभा से सम्पन्न थी। उसमें अपने विरोधियों का सामना करने तथा अपने साम्राज्य को सुदृढ़़ बनाने की इच्छाशक्ति भी उपलब्ध थी।

सुल्तान बनने के बाद रजिया ने पर्दे का पूरी तरह परित्याग कर दिया। वह स्त्रियों के वस्त्र त्यागकर पुरुषों के वस्त्र धारण करने लगी। वह शाही दरबार से लेकर सैनिक छावनी में राज्य के कार्यों को स्वयं देखने लगी। वह स्वयं सेना का संचालन करने लगी और युद्ध में भाग लेने लगी। वह घोड़े पर बैठकर सेना का निरीक्षण करती तथा तख्त पर बैठकर अपने नाना कुतुबुद्दीन ऐबक और पिता इल्तुतमिश की तरह पूरे आत्मविश्वास के साथ आदेश देती थी।

रजिया सुल्ताना तुर्की अमीरों की कमजोरियों को अच्छी तरह समझती थी। इसलिए उसने बड़े से बड़े अमीर की आँख में आँख डालकर बात की तथा उसे बेझिझक आदेश दिए। जिन बूढ़े अमीरों के सामने इल्तुतमिश तख्त पर बैठने में संकोच किया करता था, रजिया ने उन बूढ़े अमीरों के दिलों में भी सुल्तान के पद की दहशत भर दी। सुल्तान के आदेश के प्रति असम्मान दिखाने वाले अमीर को फटकारने एवं दण्डित करने में भी रजिया पीछे नहीं रहती थी।

राज्यकार्य से अवसर मिलते ही रजिया सुल्ताना घोड़े पर बैठकर दिल्ली की गलियों में निकल पड़ती। दिल्ली के बहुत सारे लोग उसे सल्तनत में चल रही गतिविधियों की जानकारी देते थे। इस कारण दिल्ली की गलियों में रजिया के हजारों समर्थक तैयार हो गए थे। इस प्रकार रजिया ने अपनी योग्यता तथा शासन क्षमता से न केवल अमीरों को अपितु दिल्ली की जनता को प्रभावित कर लिया किंतु विद्रोहों की आंधी थमने का नाम नहीं ले रही थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रजिया का सौंदर्य और प्रेम के किस्से इतिहास पर हावी हो गए (61)

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रजिया का सौंदर्य और प्रेम के किस्से इतिहास पर हावी हो गए

इतिहास के साथ किंवदन्तियाँ और मिथक भी अवश्य ही जुड़ जाते हैं जिनके कारण सत्य और असत्य का निर्धारण कठिन हो जाता है। इसी प्रवृत्ति के कारण रजिया का सौंदर्य और प्रेम के किस्से इतिहास पर हावी हो गए!

तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में जब दिल्ली पर अफगानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्रों से आए लड़ाका तुर्की कबीले काबिज थे, एक यतीम शहजादी का दिल्ली सल्तनत पर काबिज हो जाना बहुत ही आश्चर्य जनक घटना थी किंतु सख्त इरादों की मलिका रजिया सुल्ताना ने उस युग में ऐसा कर दिखाया।

अपनी सल्तनत और तख्त की रक्षा करने के लिये रजिया सुल्ताना तलवार और कलम दोनों चलाना जानती थी। वह युद्ध अभियानों का संचालन कर सकती थी। वह तख्त पर बैठकर अमीरों और रियाया पर शासन कर सकती थी। वह दिल्ली की गलियों में घूमकर जनता का विश्वास जीतने में समर्थ थी।

वह पतली-दुबली सी लड़की, विद्राहियों के विरुद्ध रण में जूझने को तत्पर रहती थी। जब वह घोड़े की पीठ पर बैठती तो घोड़े हवाओं से बातें करने लगते। जब वह अपनी सेनाओं को प्रयाण का आदेश देती तो बड़े-बड़े योद्धा मैदान छोड़कर भाग जाते। अपने दृढ़ निश्चय के बल पर ही रजिया ने मध्यकालीन भारत का इतिहास कुछ समय के लिए बदल दिया।

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रजिया के तख्त पर बैठते ही सबसे पहले रुकुनुद्दीन के मुख्य वजीर कमालुद्दीन मुहम्मद जुनैदी ने रजिया के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा किया और बदायूं, मुल्तान, झांसी तथा लाहौर के गर्वनरों से जा मिला जो अपनी-अपनी सेनाओं के साथ दिल्ली के निकट ही मौजूद थे। ये गवर्नर अपनी-अपनी सेनाएं लेकर दिल्ली की ओर बढ़ने लगे। इनका लक्ष्य रजिया के स्थान पर इल्तुतमिश के छोटे पुत्र बहराम को सुल्तान बनाना था।

इन लोगों ने योजना बनाई कि बजाय इसके कि वे दिल्ली पर आक्रमण करें, रजिया को दिल्ली से बाहर खींचा जाये क्योंकि आम रियाया के समर्थन के चलते, दिल्ली में रजिया की स्थिति काफी मजबूत थी। रजिया का सौंदर्य रजिया को दिल्ली के युवकों का समर्थन दिलवाने में सहायक बना हुआ था।

रजिया के लिये यह परीक्षा की घड़ी थी किंतु उसने हिम्मत से काम लिया तथा प्रांतपतियों की संयुक्त सेनाओं से लड़ने के लिये दिल्ली नगर से बाहर निकलकर अपना सैनिक शिविर स्थापित किया। रजिया ने अपने विरोधियों में फूट पैदा कर दी। इस कार्य के लिए उसने अपने सौन्दर्य तथा अपने अविवाहित होने का लाभ उठाया। रजिया का सौंदर्य रजिया की ऐसी ताकत बन गया जिसका तोड़ दिल्ली के तुर्क अमीरों के पास नहीं था।

रजिया ने अपने विरोधी गवर्नरों के पास अलग-अलग दूत भेजकर उनके साथ विवाह करने की इच्छा व्यक्त की। कोई भी विरोधी गवर्नर रजिया की इस चाल को नहीं समझ सका और वह इस युद्ध से अलग होने के लिए बहानेबाजी करने लगा।

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इस प्रकार गवर्नरों में मन-मुटाव उत्पन्न हो गया और वे विभिन्न दिशाओं में भाग खड़े हुए। अब रजिया की सेनाओं ने इन बागी गवर्नरों के नेता अर्थात् पंजाब के गवर्नर कबीर खाँ अयाज का पीछा किया और उसका बुरी तरह से दमन किया। इस प्रकार रजिया ने दिल्ली से लेकर पंजाब तक के क्षेत्र में अपनी सत्ता स्थापित कर ली। दूसरी ओर बंगाल तथा सिंध के गवर्नरों ने बिना लड़े ही रजिया के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया क्योंकि उन दोनों को लगता था कि रजिया उसके साथ विवाह करेगी। यद्यपि रजिया ने अपने पिता इल्तुतमिश को ही अपना आदर्श माना था तथा उसी के पदचिह्नों पर चलकर वह शासन का संचालन करती थी तथापि कई मामलों में वह अपने पिता से भी दो कदम आगे थी। जिन तुर्की अमीरों के समक्ष इल्तुतमिश तख्त पर बैठने में संकोच करता था, रजिया उन्हीं अमीरों को सख्ती से आदेश देती और उन आदेशों की पालना करवाती थी। इल्तुतमिश ने तुर्की अमीरों को खुश करने के लिये हिन्दू जनता पर भयानक अत्याचार किये किंतु रजिया ने अपने अमीरों को निर्देश दिये कि वे हिन्दू रियाया के साथ नरमी से पेश आएं। उस युग के मुस्लिम उलेमाओं और मौलवियों को रजिया सुल्तान की यह बात उचित नहीं लगती थी, वे शासन द्वारा विधर्मियों के साथ नरमी का नहीं अपितु सख्ती का व्यवहार चाहते थे।

इसलिए ये उलेमा और मुल्ला-मौलवी रजिया सुल्तान के इस कार्य से चिढ़ गए और उन्होंने सुल्तान का विरोध करना आरम्भ कर दिया। इन मुल्ला-मौलवियों की शक्ति इस्लाम की व्याख्या करने के अधिकार में निहित थी और वे इस निर्बाध शक्ति का उपयोग अपनी इच्छा से करना चाहते थे। विधर्मी काफिरों के सम्बन्ध में वे ऐसे-ऐसे सिद्धांत प्रस्तुत करते थे जो इस्लाम की किसी भी पुस्तक में नहीं लिखे हुए थे।

उस काल के सुल्तान मुल्ला-मौलवियों की इस शक्ति को पहचानते थे तथा उनकी इस शक्ति का उपयोग अपने शासन को मजबूती देने में किया करते थे इसलिए वे मुल्ला-मौलवियों की बातों को चुपचाप स्वीकार कर लिया करते थे। रजिया के समक्ष भी यही एक रास्ता था कि वह मुल्ला-मौलवियों द्वारा प्रस्तुत की जा रही दार्शनिक व्याख्याओं को चुपचाप स्वीकार कर ले, संभवतः वह ऐसा कर भी लेती किंतु मुल्ला-मौलवी तो स्वयं रजिया के अस्तित्व का ही विरोध कर रहे थे, ऐसी स्थिति में रजिया उन्हें सहन कैसे कर सकती थी!

रजिया में एक शासक के गुण विद्यमान थे किंतु दगा, फरेब, जालसाजी और खुदगर्जी से भरे उस युग में रजिया के समर्थक कम और विरोधी अधिक थे। इस कारण वह केवल सवा तीन साल ही शासन कर सकी। रजिया को लेकर प्रायः उसके सौन्दर्य और प्रेम के किस्से ही इतिहास में हावी हो गये हैं जबकि सुल्तान के रूप में उसके संघर्ष और उपलब्धियां कम दिलचस्प नहीं हैं। रजिया के प्रेम के किस्सों की सच्चाई पर हम आगे चर्चा करेंगे।

विरोधी गवर्नरों को अपने अधीन करने के बाद रजिया ने दिल्ली में अपनी स्थिति सुदृढ़ बनाने के लिये उच्च पदों का पुनः वितरण किया। उसने ख्वाजा मुहाजबुद्दीन को अपना वजीर बनाया तथा प्रांतीय सूबेदारों के पदों पर भी नये अधिकारी नियुक्त कर दिए। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है- ‘लखनौती से लेकर देवल तथा दमरीला तक के मल्लिकों एवं अमीरों ने रजिया की अधीनता स्वीकार कर ली।’

रजिया ने सुल्तान की प्रतिष्ठा का उन्नयन करने के लिए तुर्कों के स्थान पर अन्य मुसलमानों को ऊँचे पद देने आरम्भ किये जिससे तुर्की अमीरों का अहंकार तथा एकाधिकार नष्ट हो जाए और वे राज्य पर अपना प्रभुत्व न जता सकें। उसने जमालुद्दीन याकूत नामक एक हब्शी को ‘अमीर आखूर’ के पद पर नियुक्त किया और मलिक हसन गौरी को प्रधान सेनापति बनाया।

इन नियुक्तियों से प्रान्तीय शासकों के मन में यह संदेह उत्पन्न होने लगा कि रजिया शम्सी तुर्क सरदारों की शक्ति का उन्मूलन करना चाहती है। अतः वे अपने बचाव के लिए फिर से रजिया के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे और विद्रोह की तैयारियां करने लगे। इन विद्रोहियों पर रजिया का सौंदर्य कोई जादू नहीं कर सका।

सबसे पहले पंजाब के गर्वनर कबीर खाँ अयाज ने रजिया सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा किया। रजिया भी एक सेना लेकर आगे बढ़ी। अयाज ने उसका सामना किया किंतु अधिक देर तक नहीं टिक सका और परास्त होकर पीछे की ओर अर्थात् चिनाव नदी की ओर भागा। कबीर खाँ के दुर्भाग्य से चिनाब नदी पर मंगोलों का सैन्य शिविर लगा हुआ था जो पंजाब में लूट-मार मचाते घूम रहे थे। मंगोलों से डरकर कबीर खाँ को रजिया की तरफ आना पड़ा तथा बिना शर्त रजिया के पैरों में गिरकर माफी मांगनी पड़ी।

रजिया ने उसे माफ कर दिया तथा उससे लाहौर छीनकर केवल मुल्तान उसके अधिकार में रहने दिया। कबीर खाँ की इस भयावह पराजय के बाद भी सल्तनत में षड्यंत्र तथा विद्रोह की अग्नि शांत नहीं हुई।

अब तुर्क प्रांतपतियों ने दिल्ली के अमीरों की सहायता से सल्तनत पर अधिकार करने की योजना बनाई। इन विद्रोही तुर्क अमीरों का नेता इख्तियारूद्दीन एतिगीन था। विद्रोहियों ने बड़ी सावधानी तथा सतर्कता के साथ कार्य करना आरम्भ किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

याकूत हब्शी से प्रेम करने लगी रजिया सुल्ताना (62)

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याकूत हब्शी - www.bharatkaitihas.com
याकूत हब्शी से प्रेम करने लगी रजिया सुल्ताना

कहा नहीं जा सकता कि इसमें कितना सच और कितना झूठ है किंतु रजिया सुल्ताना के बारे में पूरी दिल्ली सल्तनत में यह अपवाद व्याप्त हो गया कि रजिया सुल्ताना अपने गुलाम याकूत हब्शी से प्रेम करने लगी है।

तेरहवीं सदी के बेरहम तुर्की भारत में रजिया सुल्ताना किसी आश्चर्य से कम नहीं थी। उस युग में कोई स्त्री शायद ही सुल्तान होने जैसा दुस्साहस भरा जोखिम उठा सकती थी। उस काल में किसी मुस्लिम स्त्री के लिए बुरके से बाहर आना ही संभव नहीं था, मर्दों के कपड़े पहनकर तलवार घुमाना तो बहुत दूर की बात थी। स्त्रियोचित स्वभाव के विपरीत, रजिया युद्ध-प्रिय थी तथा उसे अपने पिता के समय से ही शासन चलाने का अच्छा अनुभव था। सम्भवतः पिता की अंतिम इच्छा के कारण ही वह सुल्तान बने रहने की भावना से परिपूर्ण थी।

रजिया ने अपने नाना तथा पिता के राजदरबार में उपस्थित रहने के दौरान यह अच्छी तरह समझ लिया था कि सुल्तान को किस तरह दिखना चाहिये, किस तरह उठना-बैठना और चलना चाहिये तथा किस तरह अमीरों, वजीरों और जनसामान्य के साथ व्यवहार करना चाहिये। वह राजत्व के इस सिद्धांत को भी समझती थी कि सुल्तान को धीर-गंभीर एवं आदेशात्मक जीवन शैली का निर्वहन करते हुए भी प्रसन्नचित्त, उदार तथा दयालु होना चाहिये।

रजिया में यह भावना भी कूट-कूट कर भरी हुई थी कि आदेश की अवहेलना करने वालों से इतनी सख्ती से निबटना चाहिये कि वह दूसरों के लिए एक मिसाल बन जाए। वह अपने अमीरों को यह अनुभव कराने में विश्वास करती थी कि सुल्तान का ओहदा, सल्तनत के दूसरे अमीरों से कितना अधिक ऊपर और कितना अधिक दिव्य है। इस कारण सल्तनत के अमीर सुल्तान के समक्ष जन-सामान्य की ही तरह तुच्छ हैं।

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इन सब कारणों से रजिया ने सुल्तान बनते ही पर्दे का परित्याग कर दिया। वह स्त्रियों के वस्त्र त्यागकर पुरुषों के समान कुबा और कुलाह धारण करके जनता के सामने आने लगी। ‘कुबा’ एक तरह का कोट होता था जिसे सुल्तान धारण किया करते थे तथा ‘कुलाह’ शंकु की तरह दिखने वाली एक टोपी को कहते थे जिसे तुर्की अमीर धारण किया करते थे। रजिया सुल्तानों एवं अमीरों की तरह शिकार खेलने भी जाने लगी।

वह योग्य तथा प्रतिभा-सम्पन्न सुल्तान थी। उसमें अपने विरोधियों का सामना करने तथा अपने साम्राज्य को सुदृढ़़ बनाने की इच्छाशक्ति भी मौजूद थी। मिनहाज उस् सिराज ने रजिया के गुणों की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। उसने लिखा है- ‘वह महान शासक, बुद्धिमान, ईमानदार, उदार, शिक्षा की पोषक, न्याय करने वाली, प्रजापालक तथा युद्धप्रिय थी…… उसमें वे सभी गुण थे जो एक राजा में होने चाहिये …… किंतु स्त्री होने के कारण ये सब गुण किस काम के थे?’

मिनहाज ने रजिया के जिन गुणों का उल्लेख किया है, उन गुणों का उल्लेख उस काल के मुल्ला मौलवियों ने किंचित् भी नहीं किया है। यदि यह मान भी लिया जाए कि रजिया में वे सब गुण थे जिनका उल्लेख मिनहाज ने किया है किंतु यह भी देखना होगा कि रजिया को इन गुणों के प्रदर्शन के लिए पर्याप्त समय ही नहीं मिला था। उसका शासन केवल साढ़े तीन साल का रहा था।

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चूंकि तुर्की उलेमा और मुल्ला-मौलवी औरत के अधीन रहना मर्दों के लिए अपमान जनक समझते थे, इसलिए दिल्ली के अमीरों एवं प्रांतीय गवर्नरों ने रजिया के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा कभी नीचे नहीं किया। ऐसी स्थिति में रजिया को सल्तनत के कार्यों में अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर ही नहीं मिल सका। रजिया के सुल्तान बनने तक दिल्ली में बहुत से इस्माइलिया मुसलमान बस गये थे जिन्होंने शक्ति प्राप्त करने के लिये रजिया सुल्तान के विरुद्ध षड्यंत्र किया। उनके विद्रोह का दमन कर दिया गया और उनके समस्त प्रयत्न निष्फल कर दिये गये। ये इस्माइलिया मुसलमान शिया सम्प्रदाय को मानने वाले थे तथा एक बार उन्होंने इल्तुतमिश की भी हत्या करने का षड़यंत्र रचा था। मुस्लिम अमीरों एवं प्रांतीय गवर्नरों द्वारा अपने ही सुल्तान के विरुद्ध किए जा रहे संघर्ष को देखते हुए कुछ हिन्दू राजाओं ने अपने खोए हुए राज्यों को फिर से प्राप्त करने के प्रयत्न आरम्भ कर दिए। इनमें सम्राट पृथ्वीराज चौहान के वंशज सर्वाग्रणी थे जो इस समय रणथंभौर के आसपास बिखरे हुए थे। दिल्ली के पुराने वजीर कमालुद्दीन जुनैदी का भाई जियाउद्दीन जुनैदी, ग्वालियर का हाकिम था। उसके द्वारा विद्रोह किये जाने की तैयारियां करने की आशंका से ई.1238 में रजिया ने उसे दिल्ली बुलाया।

दिल्ली में आने के बाद जुनैदी लापता हो गया। लोगों को यह आशंका होने लगी कि सुल्तान ने विश्वासघात करके उसकी हत्या करवाई है। इससे तुर्की अमीरों में रजिया के विरुद्ध घृणा तथा संदेह का वातावरण बढ़ने लगा। वे रजिया की ओर से शंकित होकर गुप्त रूप से विद्रोह की तैयारियां करने लगे।

ऐसी स्थिति में रजिया को अपने महल के भीतर भी सतर्क होकर रहना पड़ा। रजिया की सेवा में एक अबीसीनियाई हब्शी गुलाम रहता था, जिसका नाम जमालुद्दीन याकूत हब्शी था। उसने अत्यंत निष्ठा से रजिया की सेवा की थी। इसलिए सुल्तान बनते ही रजिया ने उसे अमीर-ए-आखूर अर्थात् घुड़साल का अध्यक्ष बना दिया।

रजिया को अपने गुलाम याकूत हब्शी के ऊपर इतना अधिक विश्वास था कि वह हर समय उसे अपने साथ रखती। जब वह घुड़सवारी करती तो याकूत हब्शी का घोड़ा, रजिया के ठीक पीछे रहता था। रजिया तथा याकूत के बीच में कोई भी अमीर, सेनापति या मंत्री नहीं चल सकता था। ऐसा लगता था जैसे याकूत रजिया की छाया बन गया था किंतु वास्तविकता यह थी कि याकूत रजिया की छाया का ही नहीं अपितु तलवार और ढाल का भी का काम करता था। वह अपने आप में अकेला होते हुए भी किसी छोटी सेना से कम नहीं था।

गुलाम होते हुए भी याकूत हब्शी को किसी भी समय सुल्तान के समक्ष उपस्थित होने का अधिकार दिया गया। इस कारण लोगों में रजिया सुल्तान और याकूत हब्शी के प्रेम का अपवाद प्रचलित हो गया। कहा नहीं जा सकता कि इस बात में कितनी सच्चाई थी किंतु यह बात स्वयं को उच्च रक्तवंशी मानने वाले तुर्की अमीरों को पसन्द नहीं आयी। इस कारण राजधानी दिल्ली में रजिया का विरोध तेजी से बढ़ने लगा।

दिल्ली की जनता चटखारे ले-लेकर याकूत हब्शी और रजिया के किस्सों को प्रचारित करने लगी। इस कारण वे मनचले जिन्होंने रजिया को प्रेम की देवी मानकर सुल्तान के तख्त पर बैठाया था, वे भी रजिया से चिढ़ गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग रजिया ने हिन्दुओं को सौंप दिए (63)

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रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग - www.bharatkaitihas.com
रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग रजिया ने हिन्दुओं को सौंप दिए

रजिया सुल्ताना समझ गई कि वह एक साथ कई मोर्चों पर नहीं लड़ सकती थी। इस समय उसे दिल्ली के तुर्की अमीरों से निबटना था, इसलिए उसने रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग हिन्दुओं को सौंप दिए!

रजिया सुल्ताना ने अपनी रक्षा के लिए अबीसीनियाई हब्शी गुलाम जमालुद्दीन याकूत को अपनी सेवा में नियुक्त किया जो हर समय रजिया का सुरक्षा कवच बनकर उसके साथ लगा रहता। इस कारण राज्य के अमीरों एवं गवर्नरों में रजिया के विरुद्ध असंतोष बढ़ गया तथा वे याकूत को मार्ग से हटाने का उपाय ढूंढने लगे।

इसके बाद रजिया सुल्ताना ने तुर्की अमीरों के प्रभाव को कम करने के लिए तेजी से काम करना आरम्भ किया। पाठकों को स्मरण होगा कि रजिया के सुल्तान बनने पर सल्तनत का मुख्य वजीर कमालुद्दीन जुनैदी पंजाब, सिंध एवं बंगाल के गवर्नरों से जा मिला था जो सैनिक कार्यवाही के माध्यम से रजिया को दिल्ली से अपदस्थ करने का प्रयास कर रहे थे।

जब रजिया सुल्ताना ने इन विद्रोही गवर्नरों का दमन कर दिया तो वजीर कमालुद्दीन जुनैदी, मलिक सैफुद्दीन कूची और उसके भाई फखर्रूद्दीन के साथ जंगलों में भाग गया। रजिया ने अपनी एक सेना इन विद्रोहियों के पीछे भेजी। मलिक सैफुद्दीन कूची और उसका भाई फखर्रूद्दीन इस सेना के द्वारा पकड़ लिए गए। रजिया ने उन्हें प्राणदण्ड दिया। कमालुद्दीन जुनैदी रजिया के कोप से बचने के लिये सिरमूर की पहाड़ियों में भाग गया जहाँ उसकी भी मृत्यु हो गई।

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रजिया सुल्ताना ने अपने पिता के समय से शासन में अपनाई जा रही नीति में चुपचाप एक गुप्त परिवर्तन किया तथा उसकी सूचना किसी भी मुस्लिम अमीर को नहीं दी। रजिया ने हिन्दू राजाओं के राज्य पूर्णतः नष्ट करने की बजाय उनमें से कुछ राजाओं को फिर से उनके राज्यों में स्थापित होने का अवसर दिया ताकि हिन्दू राजाओं से मित्रता करके तुर्की अमीरों पर नियंत्रण किया जा सके। शीघ्र ही रजिया को दो ऐसे अवसर प्राप्त हो गए।

जब रजिया सुल्ताना के पिता सुल्तान इल्तुतमिश की मृत्यु हुई थी तथा रुकनुद्दीन फीरोजशाह को नया सुल्तान बनाया गया था, तब स्वर्गीय चौहान सम्राट पृथ्वीराज के वंशजों ने रणथम्भौर के दुर्ग को घेर लिया जो कि रणथंभौर दुर्ग के पुराने शासक थे। सुल्तान रुकनुद्दीन फीरोजशाह एवं उसकी माता शाहतुर्कान, रणथंभौर दुर्ग में फंसी हुई तुर्की सेना को कोई सहायता नहीं भेज सके। इस कारण दिल्ली की तुर्की सेना रणथंभौर दुर्ग में फंस गई।

जब रजिया सुल्तान बनी तो उसने रणथंभौर दुर्ग पर घेरा डाले बैठी चौहान सेना के विरुद्ध सेना भेजने का विचार किया किंतु अचानक ही रजिया ने अपनी नीति बदल दी तथा उसने रणंभौर जाने वाली सेना को निर्देश दिया कि उसका काम राजपूतों से समझौता करके अपने सैनिकों को रणथंभौर दुर्ग से सुरक्षित बाहर निकालने का है।

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दिल्ली से गई नई सेना ने सुल्तान के आदेशों का पालन किया तथा उसने राजपूतों से समझौता करके रणथंभौर दुर्ग उन्हें सौंप दिया और दुर्ग में फंसी हुई तुर्की सेना को दुर्ग से बाहर सुरक्षित निकाल लिया। रजिया की इस कार्यवाही को अधिकांश तुर्की अमीरों ने पसंद नहीं किया। इसी बीच नरवर के शासक यजवपाल ने ग्वालियर पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। यहाँ भी तुर्क सेना दुर्ग में फंस गई। इस पर रजिया ने और सेना भेजकर तुर्क सैनिकों को ग्वालियर के दुर्ग से निकलवाया और दुर्ग हिन्दुओं को सौंप दिया। इस प्रकार रजिया ने रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग हिन्दुओं को सौंप दिए। तुर्की अमीरों ने रजिया की यह कार्यवाही भी पसंद नहीं की। जहाँ रजिया हिन्दुओं के प्रति मुलायम नीति अपना रही थी, वहीं मुस्लिम अमीरों के प्रति उसका रवैया बहुत कठोर था। इस कारण नूरुद्दीन नामक एक तुर्क रजिया का घोर विरोधी हो गया। उसने दिल्ली के निकट गंगा-यमुना के दो-आब में निवास करने वाले करमत तथा इस्माइलिया मुसलमानों को सुल्तान के विरुद्ध भड़काया जिससे उन्होंने बगावत का झण्डा बुलंद कर दिया। वे हजारों की संख्या में दिल्ली के निकट इकट्ठे होने लगे। उनका निश्चय रजिया से उसका तख्त छीनकर किसी इस्माइलिया मुसलमान को दिल्ली के तख्त पर बैठाने का था।

मार्च 1237 में इस्माइलिया मुसलमानों ने एक साथ दो दिशाओं से जामा मस्जिद पर आक्रमण किया। उन्हें विश्वास था कि रजिया अवश्य ही इस समय मस्जिद में नमाज पढ़ रही होगी। इन लोगों ने मस्जिद में उपस्थित सुन्नी मुसलमानों को मौत के घाट उतारना आरम्भ कर दिया। रजिया उस समय मस्जिद में नहीं थी किंतु जैसे ही उसे इस हमले की जानकारी हुई, उसने अपने सैनिकों के साथ मस्जिद पहुंचकर करमत तथा इस्माइलिया मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया।

दिल्ली की जनता के लिये एक औरत सुल्तान का इस तेजी से कार्य करना किसी चमत्कार से कम नहीं था। बहुत से लोग फिर से रजिया के प्रशंसक बन गये। बाद में करमत एवं इस्माइलिया मुसलमानों के इलाकों में सेना भेजकर उनके ठिकाने नष्ट करवाये गए।

उन्हीं दिनों रजिया ने एक भारतीय मुसलमान को अपने दरबार में महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया। यह व्यक्ति कुछ दिन पहले ही हिन्दू से मुसलमान बना था। यह नियुक्ति तुर्की अमीरों को पसंद नहीं आई और वे रजिया को गहरी शंका की दृष्टि से देखने लगे किंतु रजिया ने उनकी परवाह नहीं की तथा तुर्की अमीरों को कड़ी आँखों से देखती रही।

रजिया के औरत होने के कारण इस बात का खतरा बहुत अधिक था कि पुरुष-प्रधान मुस्लिम सल्तनत में स्त्री सुल्तान का पद कम महत्त्वपूर्ण हो जाए तथा इल्तुतमिश द्वारा गठित चालीस गुलामों का मण्डल अथवा अन्य तुर्की अमीर सुल्तान एवं सल्तनत पर हावी हो जाएं किंतु रजिया ने सुल्तान के पद को हर हालत में सबसे ऊपर तथा महत्त्वपूर्ण बनाए रखा।

रजिया पहली सुल्तान थी जिसने पूरे आत्मविश्वास के साथ स्वयं को सुल्तान की तरह प्रस्तुत किया। एक बार शुक्रवार की नमाज पढ़ने के बाद रजिया ने कहा था- ‘यदि मैंने पुरुषों से अच्छा कार्य नहीं किया हो तो भी इतना तो है कि मैंने सुल्तान के पद को महत्त्वपूर्ण बनाए रखा।’

इस्लाम के बारे में रजिया का मानना था कि इस्लाम व्यक्तिगत आस्था का विषय है। सुल्तान अथवा सल्तनत के लिये यह आवश्यक नहीं है कि वह गैर-इस्लामी रियाया को इस्लाम कबूलने के लिये विवश करे अथवा उसे तंग करे।

एक अवसर पर रजिया ने अपने दरबार में उपस्थित अमीरों और वजीरों को निर्देश दिया कि वे हिन्दू रियाया को तंग न करें। रजिया ने कहा कि स्वयं पैगम्बर मुहम्मद का कथन है कि इस्लाम न मानने वाले मनुष्यों पर ज्यादती न की जाये। रजिया की ये बातें तुर्की मुल्ला-मौलवियों को बिल्कुल भी नहीं सुहाती थीं। वे जानते थे कि यदि मुस्लिम प्रजा को रजिया की ये बातें समझ में आ जाएं तो राज्य में मुल्ला-मौलवियों की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए।

रजिया ने रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग हिन्दुओं को सौंपकर राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं अपितु कूटनीतिक दृष्टि से भी बहुत हिम्मत वाला कार्य किया था किंतु तुर्की अमीर रजिया की इस नीति को समझ नहीं पाए

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्तूनिया से विवाह कर लिया रजिया ने (64)

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अल्तूनिया - www.bharatkaitihas.com
अल्तूनिया से विवाह कर लिया रजिया ने

अप्रेल 1240 में रजिया बंदी बना ली गई। अपनी शक्ति और बुद्धि का अहंकार रखने वाले तुर्की अमीरों ने एक लड़की को छल से बंदी बनाया। वे युद्ध के मैदान में रजिया का सामना करने की स्थिति में नहीं थे। सूबेदारों की संयुक्त सेनाओं द्वारा रजिया बंदी बनाई जाकर अल्तूनिया को समर्पित कर दी गई।

रजिया सुल्तान ने मुस्लिम अमीरों को अपने लिए खतरा मानकर उनके विरुद्ध कठोर दृष्टिकोण अपनाया था जबकि उसने कुछ प्रबल हिन्दू राज्यों की पुनर्स्थापना के उद्देश्य से रणथंभौर तथा ग्वालियर के दुर्ग फिर से चौहानों एवं प्रतिहारों को लौटा दिए थे।

रजिया ने हिन्दुओं के प्रति जो मुलायम रवैया अपनाया था, ठीक वही रवैया उसने मंगोलों के मामले में भी अपनाया। पाठकों को स्मरण होगा कि जब चंगेज खाँ भारत पर चढ़कर आया था, तब दिल्ली सल्तनत पर इल्तुतमिश का अधिकार था। उसने चंगेज खाँ से उलझने की बजाय उसे उपहार आदि भेजकर संतुष्ट करने का प्रयास किया था। इस कारण चंगेज खाँ बहुत सीमित क्षेत्र में लूटपाट मचाकर भारत से वापस लौट गया था।

रजिया के समय दिल्ली सल्तनत की पश्चिमी सीमा पर जलालुद्दीन मंगबरनी के प्रतिनिधि हसन करलुग का अधिकार था। जब मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया तब उसने मंगोलों के विरुद्ध रजिया से सहायता की अपील की किंतु रजिया ने भी अपने पिता इल्तुतमिश की नीति पर चलने का निर्णय लिया तथा मंगोलों के विरुद्ध कार्यवाही करने से इन्कार कर दिया। इस पर कुछ अमीरों ने रजिया के विरुद्ध विष-वमन करना आरम्भ कर दिया।

मंगोलों के प्रति रजिया की इस नीति का एक कारण और भी था, जब पंजाब के गर्वनर कबीर खाँ अयाज ने रजिया सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा किया था, तब वह रजिया की सेना से परास्त होकर पीछे की ओर अर्थात् चिनाब नदी की ओर भागा था।

उस समय चिनाब नदी पर मंगोलों का सैन्य शिविर लगा हुआ था जो पंजाब में लूट-मार मचाते घूम रहे थे। मंगोलों से डरकर कबीर खाँ को रजिया की तरफ आना पड़ा था तथा बिना शर्त रजिया के पैरों में गिरकर माफी मांगनी पड़ी थी। इसलिए रजिया समझ गई थी कि तुर्की अमीरों की शक्ति का सामना करने के लिए यह आवश्यक है कि देश के भीतर हिन्दू शक्ति तथा देश की सीमा पर मंगोल शक्ति बनी रहे किंतु तुर्की अमीर रजिया की इस चाल को समझ नहीं पा रहे थे और वे इसे रजिया की स्वतंत्र मनोवृत्ति मात्र मान रहे थे।

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इन घमण्डी तुर्की अमीरों की दृष्टि में रजिया अब भी एक औरत मात्र थी जिसे भोगा ही जा सकता था, उसका शासन किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता था। रजिया दिल्ली की जनता के सहयोग से सुल्तान बनी थी जिसमें अमीरों की भूमिका बहुत कम थी। इसलिये वे रजिया के स्थान पर ऐसे व्यक्ति को सुल्तान बनाना चाहते थे जो तुर्की अमीरों विशेषकर चालीसा मण्डल के अमीरों के प्रति कृतज्ञ रहे तथा उनके हाथों की कठपुतली बनकर रहे।

जब रजिया ने एक भारतीय मुसलमान को अपने दरबार में उच्च पद दिया तो तुर्की अमीर रजिया के दुश्मन हो गए। वे भारतीय मुसलमानों को अपने से बहुत नीचा समझते थे और एक भारतीय मुसलमान के नीचे तुर्की अमीरों को रखा जाए, यह किसी भी स्थिति में सह्य नहीं था। इसलिए फिर से दिल्ली एवं दिल्ली के बाहर विद्रोह के झण्डे बुलंद हो गए।

एक नासमझ लड़की की ऐसी हरकतें देखकर तुर्की अमीरों एवं गवर्नरों में रजिया के प्रति घृणा अपने चरम पर पहुंच गई। इसी भावना के वशीभूत होकर भटिण्डा के गर्वनर मलिक इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। रजिया विद्रोहियों को दबाने के लिए एक विशाल सेना लेकर दिल्ली से भटिण्डा की ओर बढ़ी। जब वह भटिण्डा पहुंची तब उसे तुर्की अमीरों ने अपने जाल में फांस लिया।

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भटिण्डा के गर्वनर मलिक इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया और रजिया की परवरिश, सुल्तान कुतुबुद्दीन के महलों में साथ-साथ हुई थी और दोनों बचपन के मित्र थे। जब अल्तूनिया ने युवावस्था में प्रवेश किया तो वह रजिया के प्रति अनुरक्त हो गया। उसने कई बार रजिया के समक्ष अपने प्रेम का प्रदर्शन किया किंतु रजिया ने हर बार हँसकर टाल दिया था। जब रजिया सुल्तान बन गई तो अल्तूनिया की चाहत और अधिक बढ़ गई। वह रजिया से निकाह करके न केवल अपने पुराने प्रेम को पाना चाहता था, अपितु इस वैवाहिक सम्बन्ध के माध्यम से सल्तनत पर कब्जा करने का स्वप्न भी देखा करता था। तत्कालीन इतिहासकारों ने ऐसे संकेत दिए हैं कि रजिया सुल्तान, भले ही अल्तूनिया के प्रस्तावों को टाल रही थी किंतु उसने अल्तूनिया के विरुद्ध कोई सख्ती नहीं दिखाई थी। इस कारण अल्तूनिया की उम्मीदें जीवित बनी रहीं किंतु जब उसने सुना कि रजिया अपने हब्शी गुलाम याकूत के प्रेम में खोई हुई है तो अल्तूनिया का हृदय भंग हो गया। थोड़े ही दिनों में उसकी निराशा बदले की आग में बदल गई और उसने विद्रोह का झण्डा बुलंद कर दिया।

इस समय उत्तर भारत भयानक गर्मी से उबल रहा था तथा इसके साथ ही रमजान का महीना होने से मुस्लिम सैनिकों के रोजे चल रहे थे किंतु रजिया ने अल्तूनिया तथा विद्रोही अमीरों के विरुद्ध तुरंत कार्यवाही करने का निर्णय लिया और वह विशाल सेना लेकर भटिण्डा की ओर बढ़ गई। जब वह भटिण्डा पहुंची, तब दूसरे सूबों के प्रांतपति भी अपनी सेनाएं लेकर अल्तूनिया की सहायता के लिये आ गये।

अल्तूनिया ने बड़ी चतुराई से अपने कुछ लोगों को रजिया सुल्तान के दल में शामिल कर दिया और जब रजिया भटिण्डा पहुंची, तब पूर्व में निर्धारित योजना के अनुसार उन लोगों ने याकूत से गाली-गलौच करके उसे झगड़ा करने के लिये उकसाया। जब याकूत ने इन लोगों का विरोध किया तो उन लोगों ने याकूत को घेर कर वहीं मार डाला।

याकूत हब्शी की मृत्यु से अपने ही सैन्य शिविर में रजिया की स्थिति कमजोर हो गई। अब उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि कौन उसका अपना था और कौन भेड़ की खाल में छिपा हुआ भेड़िया था किंतु रजिया ने हिम्मत से काम लिया तथा स्वयं तलवार लेकर शत्रुओं का सामना करने को उद्धत हुई किंतु धोखे, फरेब और जालसाजी के उस युग में रजिया का कोई सच्चा सहायक नहीं था। याकूत हब्शी मारा जा चुका था तथा पुराना प्रेमी मलिक इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया बागी हो गया था। इसलिये अप्रेल 1240 में रजिया बंदी बना ली गई।

इस प्रकार अपनी शक्ति और बुद्धि का अहंकार रखने वाले तुर्की अमीरों ने एक लड़की को छल से बंदी बनाया। वे युद्ध के मैदान में रजिया का सामना करने की स्थिति में नहीं थे। सूबेदारों की संयुक्त सेनाओं द्वारा रजिया बंदी बनाई जाकर अल्तूनिया को समर्पित कर दी गई।

विद्रोहियों ने इल्तुतमिश के छोटे पुत्र बहरामशाह को तख्त पर बैठा दिया। मिनहाज उस् सिराज के अनुसार रजिया ने 3 वर्ष, 6 माह, 6 दिन राज्य किया। जब रजिया बंदियों की तरह अल्तूनिया के समक्ष लाई गई तो अल्तूनिया ने उससे कहा कि यदि रजिया अल्तूतिनया से विवाह कर ले तो रजिया को कैद में नहीं रहना पड़ेगा। रजिया ने अब भी अपना साहस नहीं खोया था, इसलिए उसने अल्तूनिया का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।

अल्तूनिया ने रजिया को भटिण्डा के किला मुबारक में बंद कर दिया। रजिया को अपना भविष्य अंधकार में दिखाई देने लगा किंतु कुछ समय बाद उसने एक बार फिर भाग्य आजमाने का फैसला किया। अल्तूनिया अब भी रजिया के साथ कठोर व्यवहार नहीं कर रहा था। रजिया हर शुक्रवार को राजसी ठाठ-बाट के साथ हाजी रतन मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ती तथा अल्तूनिया प्रतिदिन रजिया से मिलने आता। रजिया ने उसकी आँखों में अपने लिये वही पहले जैसा प्यार देखा।

रजिया ने अल्तूनिया पर अपने रूप के जादू का प्रयोग करने का निश्चय किया। रजिया ने अल्तूनिया के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। अल्तूनिया इस प्रस्ताव से सहमत हो गया और अगस्त 1240 में उसने रजिया को कारागार से मुक्त करके उसके साथ निकाह कर लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रजिया की हत्या कर दी लुटेरों ने (65)

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रजिया की हत्या कर दी लुटेरों ने

कैथल के निकट जाटों ने अल्तूनिया तथा रजिया को पकड़ लिया और उनका माल-असबाब लूटकर उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार रजिया सुल्तान का सदा के लिये अंत हो गया। एक अन्य मत के अनुसार रजिया तथा अल्तूनिया को पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा बहरामशाह के आदेश से अल्तूनिया तथा रजिया की हत्या की गई।

विवाह करने के बाद रजिया और अल्तूनिया एक सेना लेकर दिल्ली के तख्त पर अधिकार करने के लिए दिल्ली की ओर चल दिए। रजिया के विश्वस्त अमीर मलिक इज्जुद्दीन सालारी तथा मलिक कराकश आदि कुछ अमीर भी रजिया एवं अल्तूनिया से आ मिले। अक्टूबर 1240 में दिल्ली के बाहर रजिया तथा नए सुल्तान बहरामशाह की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ किंतु बहरामशाह की सेना ने रजिया तथा अल्तूनिया को परास्त कर दिया।

रजिया और अल्तूनिया युद्ध में परास्त होने के बाद युद्ध के मैदान से भाग निकले किंतु कैथल (अब हरियाणा में) के निकट कुछ स्थानीय लुटेरों ने अल्तूनिया तथा रजिया को पकड़ लिया तथा धन प्राप्ति के लालच में उनकी हत्या कर दी।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि 14 अक्टूबर 1240 को कैथल के निकट जाटों ने अल्तूनिया तथा रजिया को पकड़ लिया और उनका माल-असबाब लूटकर उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार रजिया सुल्तान का सदा के लिये अंत हो गया। एक अन्य मत के अनुसार रजिया तथा अल्तूनिया को पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा बहरामशाह के आदेश से उन्हें दिल्ली में मार डाला गया।

दिल्ली में तुर्कमान गेट पर रजिया का मकबरा बताया जाता है। इस मकबरे को राजी एवं साजी का मकबरा कहा जाता है। लोकमान्यता है कि साजी, रजिया की बहिन थी किंतु इतिहास की किसी भी पुस्तक में साजी का उल्लेख नहीं मिलता।

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रजिया की हत्या कैथल में हुई किंतु उसकी कब्रगाह तीन भिन्न स्थानों- कैथल, दिल्ली तथा टोंक में स्थित होने का दावा किया जाता है। उसकी वास्तविक कब्रगाह के बारे में कोई पुरातात्विक अथवा ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलते हैं। दिल्ली की कब्रगाह तुर्कमान गेट के पास शाहजहांबाद में बुलबुलेखाना में स्थित है।

कैथल में एक मस्जिद के निकट रजिया तथा अल्तूनिया की कब्रगाहें बताई जाती हैं। ई.1938 में भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो कैथल आये। उन्होंने कैथल में रजिया की कब्रगाह का जीर्णोद्धार करने के लिये कुछ आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई। उनके निर्देश पर भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक भी कैथल आये किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने के कारण इस कब्र का जीर्णोद्धार नहीं करवाया जा सका।

यद्यपि रजिया इल्तुतमिश के उत्तराधिकारियों में सर्वाधिक योग्य तथा राजपद के सर्वाधिक उपयुक्त थी परन्तु तेरहवीं शताब्दी ईस्वी के तुर्की-भारत के दूषित राजनीतिक वातावरण में वह पद पर बने रहने में असफल रही तथा लगभग साढ़े तीन साल बाद ही उसका राज्य समाप्त हो गया।

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मध्यकालीन इतिहासकारों ने रजिया की विफलता का प्रधान कारण उसका स्त्री होना बताया है। इन इतिहासकारों के अनुसार इस्लाम में मान्यता है कि पैगम्बर मुहम्मद ने कहा था कि स्त्री संसार में सबसे अमूल्य एवं पवित्र वस्तु है किंतु जो लोग स्त्री को अपना शासक बनायेंगे, उन्हें कभी मानसिक शांति प्राप्त नहीं होगी। इस मान्यता ने रजिया को मुसलमान-प्रजा का आदर का पात्र नहीं बनने दिया। तुर्की अमीर किसी भी कीमत पर रजिया को सुल्तान के पद पर बने नहीं रहने देना चाहते थे। इसलिए जब तक रजिया जीवित रहती, उसके विरुद्ध यही सब होते रहना था और एक दिन रजिया को इसी तरह मार दिया जाना था। रजिया द्वारा पर्दे तथा औरतों के कपड़ों का परित्याग करके पुरुषों के कपड़े धारण कर लेने से न केवल तुर्की अमीरों के अपितु मुल्ला-मौलवियों और उलेमाओं के अहंकार को भी गहरी चोट पहुँची थी। यदि रजिया पुरुष रही होती तो इस बात की संभावना अधिक थी कि छल, फरेब और हिंसा के उस युग में वह भी अपने पिता की तरह अपने विरोधियों का दमन करने में अधिक सफल हुई होती तथा दीर्घकाल तक राज्य भोगती। क्योंकि तब न तो याकूत के प्रेम का अपवाद फैला होता, न अल्तूनिया ने उससे विवाह के लालच में उसका सर्वनाश किया होता और न जुनैदी आदि तुर्की अमीरों ने रजिया का विरोध करने का दुस्साहस किया होता!

रजिया की असफलता का दूसरा कारण चालीसा मण्डल के तुर्की अमीरों का स्वार्थी तथा शक्तिशाली होना बताया जाता है जिन्हें इल्तुतमिश ने शासन कार्य चलाने के लिए नियुक्त किया था। दिल्ली सल्तनत में इन तुर्की अमीरों का प्रभाव इतना अधिक था कि वे सुल्तान को अपने हाथों की कठपुतली बनाकर रखना चाहते थे जबकि रजिया ने उनका अंकुश स्वीकार नहीं किया तथा स्वयं अपने विवेक से काम किया।

रजिया ने इन तुर्की अमीरों की शक्ति को एक सीमा तक घटा दिया तथा बड़ी सतर्कता के साथ अमीरों के प्रतिद्वन्द्वी दलों को संगठित करने का प्रयास किया परन्तु इस कार्य में सफल होने के लिए समय की आवश्यकता थी जो दुर्भाग्यवश रजिया को नहीं मिल सका। इससे पहले कि रजिया तुर्की अमीरों पर पूरी तरह शिकंजा कस पाती, तुर्की अमीरों ने रजिया को मार दिया।

रजिया की विफलता का एक कारण यह भी था कि जिस मुस्लिम प्रजा के सहयोग से वह सुल्तान बनी थी, जब उलेमाओं ने मुस्लिम प्रजा को यह समझाया कि इस्लाम में औरत को सुल्तान बनाना वर्जित है तो वही प्रजा रजिया की विरोधी हो गई। हिन्दू प्रजा का सहयोग तथा समर्थन प्राप्त करना वैसे भी असम्भव था क्योंकि तुर्की शासक, विधर्मी तथा विदेशी थे।

इल्तुतमिश के अन्य पुत्रों का जीवित रहना भी रजिया के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ। इल्तुतमिश के इन पुत्रों से षड्यन्त्रकारी अमीरों को समर्थन तथा प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। षड्यन्त्रकारी अमीर इन शहजादों की आड़ में रजिया पर प्रहार करने लगे। अंत में इन्हीं शहजादों में से एक बहरामशाह ने सल्तनत पर अधिकार कर लिया।

इतिहासकारों द्वारा रजिया की विफलता का एक कारण यह भी बताया जाता है कि अभी तक भारत में तुर्की साम्राज्य का शैशव काल था। इस कारण केन्द्रीय सरकार स्थानीय हाकिमों को अपने पूर्ण नियंत्रण में नहीं कर पाई थी। स्थानीय हिन्दू सरदारों के निरन्तर विद्रोह होते रहने के कारण सुल्तानों को अपने स्थानीय हाकिमों को पर्याप्त मात्रा में सैनिक एवं प्रशासकीय अधिकार देने पड़ते थे। प्रांतीय गवर्नरों द्वारा इन स्थानीय हिन्दू हाकिमों से सांठ-गांठ कर लेने पर केन्द्रीय सरकार उन्हें ध्वस्त नहीं कर पाती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुल्तान बहरामशाह की बहिन से विवाह कर लिया एतिगीन ने (66)

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सुल्तान बहरामशाह की बहिन से विवाह कर लिया एतिगीन ने

एतिगीन ने सुल्तान बहरामशाह की एक बहिन से जबर्दस्ती विवाह कर लिया। इस प्रकार वह सुल्तान से भी अधिक महत्त्वपूर्ण तथा शक्तिशाली हो गया तथा निरंकुश व्यवहार करने लगा।

रजिया भारत की प्रथम तथा अन्तिम स्त्री सुल्तान थी। यद्यपि विदेशों में रजिया के पूर्व भी स्त्रियां तख्त पर बैठ चुकी थीं तथा बाद में कुछ स्त्रियां उन देशों में शासक बनीं परन्तु भारत में सुल्तान के तख्त पर बैठने का अवसर केवल रजिया को ही प्राप्त हुआ।

रजिया की मृत्यु के लगभग साढ़े तीन सौ साल बाद चांद बीबी दक्षिण भारत में बीजापुर एवं अहमदनगर के मुस्लिम राज्यों में अल्पवय सुल्तानों की संरक्षक बनी तथा उसने इन राज्यों का शासन चलाया किंतु वह अकबर की राज्यलिप्सा की भेंट चढ़ गई।

रजिया का पतन उसकी दुर्बलताओं के कारण नहीं वरन् उस युग के कट्टर मुसलमानों की असहिष्णुता के कारण हुआ था। फिर भी कुछ इतिहासकारों ने रजिया पर यह आरोप लगाया है कि उसमें स्त्री-सुलभ दुर्बलताएं थीं। इन इतिहासकारों की दृष्टि में याकूत से उसका अनुराग उत्पन्न होना या अल्तूनिया से विवाह कर लेना उसकी दुर्बलताओं के प्रमाण हैं।

जबकि किसी कुंआरी स्त्री का किसी पुरुष के प्रति अनुरक्त होना या किसी से विवाह कर लेना, किसी भी तरह उसकी दुर्बलता नहीं माना जा सकता। वास्तविकता तो यह थी कि रजिया की विफलता इस तथ्य को सिद्ध करती है कि उस युग की राजनीति में स्त्रियों के लिए कोई स्थान नहीं था, वे चाहे कितनी ही योग्य क्यों न हों!

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भारत के मध्यकाल का इतिहास रजिया के बिना पूरा नहीं होता। जहाँ इतिहास बहुत से दीर्घकालिक सुल्तानों के बारे में बहुत कम जानता है, वहीं रजिया के केवल साढ़े तीन साल के अल्पकालीन शासन के उपरांत भी इतिहास में रजिया के बारे में बहुत अच्छी जानकारी मिलती है। जनमानस में भी रजिया के सम्बन्ध में बहुत सी बातें व्याप्त हैं। ई.1983 में रजिया पर हिन्दी भाषा में सिनेमा का निर्माण किया गया। ई.2015 में रजिया पर टीवी सीरियल का निर्माण हुआ।

तेरहवीं सदी आज बहुत पीछे छूट चुकी है। उसके बाद भारत में कुछ स्त्री-शासक हुई हैं जिन्होंने निरंकुश राजतंत्रीय व्यवस्था से लेकर लोकशासित प्रजातंत्रीय व्यवस्था में सफलता पूर्वक शासन किया है तथा इस बात को सिद्ध करके दिखाया है कि स्त्रियों में शासन करने की प्रतिभा नैसर्गिक रूप से वैसी ही है जैसी कि पुरुषों में हुआ करती है।

यहाँ तक कि भारत से बाहर पाकिस्तान, बांगलादेश तथा श्रीलंका आदि दक्षिण एशियाई देशों में भी स्त्रियों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। इन उदाहरणों को देखकर पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि रजिया की विफलता से केवल इतना ही सिद्ध होता है कि तेरहवीं सदी की मध्यकालीन मानसिकता वाले उस युग की बर्बर राजनीति में स्त्रियों के लिए कोई स्थान नहीं था, वे चाहे कितनी ही योग्य क्यों न हों!

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कुछ इतिहासकारों के अनुसार रजिया ने दिल्ली में मदरसे, पुस्तकालय तथा इस्लामी शोध केन्द्र की स्थापना की जिनमें हजरत मुहम्मद की शिक्षाओं तथा कुरान का अध्ययन किया जाता था किंतु इन संस्थाओं के बारे में अब कोई जानकारी नहीं मिलती। रजिया के बाद इल्तुतमिश का तीसरा पुत्र मुइजुद्दीन बहरामशाह दिल्ली का सुल्तान हुआ। वह दुस्साहसी तथा क्रूर व्यक्ति था। उसे इस शर्त पर सुल्तान बनाया गया था कि शासन का पूरा अधिकार विद्रोहियों के नेता एतिगीन के हाथों में रहेगा। एतिगीन ने सुल्तान के कई विशेषाधिकार हड़प लिये। वह अपनी हवेली के फाटक पर नौबत बजवाता था और अपने यहाँ हाथी रखता था। एतिगीन ने सुल्तान बहरामशाह की एक बहिन से जबर्दस्ती विवाह कर लिया। इस प्रकार वह सुल्तान से भी अधिक महत्त्वपूर्ण तथा शक्तिशाली हो गया तथा निरंकुश व्यवहार करने लगा। एतिगीन के इस आचरण के कारण कुछ ही दिनों में बहरामशाह तथा एतिगीन में ठन गई और बहरामशाह ने एतिगीन की उसके कार्यालय में ही हत्या करवा दी। बहरामशाह ने वजीर निजामुलमुल्क की भी हत्या करवाने का प्रयास किया जो एतिगीन के साथ मिलकर बदमाशी करता था किंतु दुष्ट वजीर बच गया। सुल्तान प्रकट रूप से उसके साथ मित्रता का प्रदर्शन करता रहा।

एतिगीन की हत्या के बाद मलिक बदरुद्दीन सुंकर को अमीर ए हाजिब नियुक्त किया गया। सुंकर भी अति महत्वाकांक्षी निकला। उसने वजीर तथा सुल्तान, दोनों की उपेक्षा करके शासन पर कब्जा जमाने का प्रयास किया। उसने सुल्तान बहरामशाह के विरुद्ध षड़यंत्र रचा। इस पर बहरामशाह ने सुंकर को बदायूं का सूबेदार नियुक्त करके बदायूं भेज दिया। चार माह बाद सुंकर सुल्तान की अनुमति लिये बिना दिल्ली लौट आया। इस पर सुल्तान बहरामशाह ने सुंकर तथा उसके सहयोगी ताजुद्दीन अली को मरवा दिया।

सुल्तान ने एतिगीन के साथ मिलकर षड़यंत्र करने वाले काजी जलालुद्दीन की भी हत्या करवा दी। इन अमीरों की हत्याओं से चारों ओर सुल्तान के विरुद्ध षड़यंत्र रचे जाने लगे। आन्तरिक कलह तथा षड्यन्त्र के साथ-साथ सुल्तान बहरामशाह को मंगोलों के आक्रमण का भी सामना करना पड़ा। ई.1241 में मंगोलों ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। ई.1242 में बहरामशाह ने वजीर मुहाजबुद्दीन को एक सेना देकर लाहौर के लिये रवाना किया।

वजीर मुहाजबुद्दीन सेना को लाहौर ले जाने के स्थान पर उसे भड़काकर मार्ग में से ही पुनः दिल्ली ले आया। जब विद्रोहियों ने दिल्ली पर आक्रमण किया तो दिल्ली के नागरिकों ने सुल्तान को बचाने के लिये अपने प्राणों की बाजी लगा दी किंतु अंततः विद्रोहियों ने बहरामशाह को बंदी बना लिया तथा दिल्ली पर अधिकार कर लिया। बहरामशाह बन्दी बना लिया गया और कुछ दिन बाद उसकी हत्या कर दी गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुल्तान नासिरुद्दीन औरतों के कपड़े पहनकर दिल्ली में घुसा (67)

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सुल्तान नासिरुद्दीन www.bharatkaitihas.com
सुल्तान नासिरुद्दीन औरतों के कपड़े पहनकर दिल्ली में घुसा

सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद इल्तुतमिश का पुत्र था। उसका बचपन कारागार में व्यतीत हुआ था। दिल्ली की जनता जानती थी कि नासिरुद्दीन महमूद ने अपने भतीजे एवं पूर्ववर्ती सुल्तान मसूदशाह की धोखे से हत्या करके दिल्ली का तख्त हथियाया है फिर भी प्रजा ने उसे सार्वजनिक दरबार में अपना सुल्तान स्वीकार कर लिया।

बहरामशाह की हत्या के बाद दिल्ली का तख्त रिक्त हो गया। इसके पहले कि चालीसा मण्डल के अमीर नये सुल्तान का निर्वाचन करते, इज्जूद्दीन किशलू खाँ नामक एक तुर्की अमीर ने स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया। इज्जूद्दीन किशलू खाँ किसी राजवंश में उत्पन्न नहीं हुआ था परन्तु चूंकि उसने इल्तुतमिश की एक पुत्री से विवाह कर लिया था, इसलिये वह स्वयं को तख्त का अधिकारी समझता था।

अन्य तुर्की अमीरों ने इज्जूद्दीन किशलू खाँ को सुल्तान स्वीकार नहीं किया और इल्तुतमिश के पौत्र अल्लाउद्दीन मसूद को तख्त पर बैठा दिया जो कि मरहूम सुल्तान रुकुनुद्दीन फीरोज का पुत्र था। अल्लाउद्दीन मसूद को इस शर्त पर सुल्तान बनाया गया कि वह केवल सुल्तान की उपाधि का उपयोग करेगा, सल्तनत के सारे अधिकार चालीसा मण्डल के अमीरों के पास रहेंगे। इन अमीरों ने अपनी स्थिति को सुदृढ़़ बनाने के लिए समस्त उच्च-पद आपस में बांट लिये। ताकि सुल्तान को स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश होने का अवसर प्राप्त न हो।

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अल्लाउद्दीन मसूद के भाग्य से कुछ समय बाद ही इन स्वार्थी अमीरों में फूट पड़ गई। सुल्तान अल्लाउद्दीन मसूदशाह ने इस परिस्थिति से लाभ उठाया। उसने वर्षों से जेल में सड़ रहे अपने दो चाचाओं नासिरुद्दीन तथा जलालुद्दीन को कारागार से बाहर निकाल दिया। इल्तुतमिश के ये दोनों पुत्र नासिरुद्दीन तथा जलालुद्दीन रुकनुद्दीन फीरोजशाह के समय से ही जेल में बंद थे।

रजिया तथा बहरामशाह ने अपने इन भाइयों को जेल से बाहर निकालने का खतरा मोल नहीं लिया था किंतु अल्लाउद्दीन मसूदशाह ने न केवल उन दोनों को जेल से मुक्त कर दिया अपितु अपने चाचा जलालुद्दीन को कन्नौज की और दूसरे चाचा नासिरुद्दीन को बहराइच की जागीर देकर सुल्तान में निहित शक्ति का प्रदर्शन किया तथा जनता का विश्वास जीतने का प्रयास किया परन्तु ऐसा करके अल्लाउद्दीन मसूदशाह ने अपनी ही कब्र खोद दी।

दूरस्थ प्रांतों के हाकिमों ने इसे मसूदशाह की कमजोरी समझा तथा स्वयं को स्वतंत्र करना आरम्भ कर दिया। पंजाब में रहने वाले खोखर भी सल्तनत के विरुद्ध सक्रिय हो गए। कटेहर  तथा बिहार में राजपूतों ने विद्रोह के झण्डे खड़े कर दिए। ई.1243 में जाजनगर के राय ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया तथा सुल्तान उसके विरुद्ध कोई सेना नहीं भेज सका।

ई.1245 में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण कर दिया। अल्लाउद्दीन मसूदशाह इस मुसीबत की ओर से आँख नहीं मूंद सकता था। इसलिए उसे सेना लेकर मंगोलों से युद्ध करने के लिए जाना पड़ा। इस सेना ने मंगोलों को भारत से मार भगाया।

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इस विजय के बाद मसूदशाह के आत्मविश्वास में अचानक ही बहुत वृद्धि हो गई। उसके स्वभाव में भी बड़ा परिवर्तन आ गया। अब वह विजयी, विलासी तथा क्रूर हो गया। उसने षड़यंत्रकारी अमीरों की हत्या करानी आरम्भ कर दी। इससे अमीरों तथा मल्लिकों में बड़ा असंतोष फैला और उन्होंने सुल्तान के चाचा नासिरुद्दीन को सुल्तान बनने के लिये आमन्त्रित किया। नासिरुद्दीन चूंकि इल्तुतमिश का पुत्र था, इसलिए वह सल्तनत पर अपना अधिकार अपने भतीजे अल्लाउद्दीन मसूदशाह की अपेक्षा अधिक समझता था। इसलिए नासिरुद्दीन ने अमीरों का निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। वह बहराइच से दिल्ली आया तथा औरत का वेश धरकर चोरी से दिल्ली में प्रविष्ट हुआ। कृतघ्न नासिरुद्दीन ने 10 जून 1246 को अपने भतीजे मसूदशाह की हत्या कर दी। सुल्तान की हत्या करते समय नासिरुद्दीन ने मसूदशाह द्वारा अपने ऊपर किए गए उपकारों का भी ध्यान नहीं रखा। मसूदशाह ने ही अमीरों के विरोध के बावजूद नासिरुद्दीन को जेल से निकालकर बहराइच का गवर्नर बनाया था। यदि मसूदशाह चाहता तो सुल्तान बनते ही नासिरुद्दीन की हत्या करके अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकता था किंतु मसूदशाह ने नासिरुद्दीन को अपने परिवार का सदस्य जानकर उसके प्राण नहीं लिए थे अपितु उसे मुक्त करके बहराइच की जागीर प्रदान की थी।

इल्तुतमिश के बेटों ने अपने उपकार का बदला कृतघ्नता से ही देना सीखा था। स्वयं इल्तुतमिश भी इस बात को अच्छी तरह जानता था, इसलिए तो इल्तुतमिश ने अपने बहुत सारे बेटों में से किसी को भी सुल्तान न बनाकर अपनी बेटी रजिया को अपनी उत्तराधिकारी नियुक्त किया था किंतु रजिया को मारकर इल्तुतमिश के पुत्र बारी-बारी से सुल्तान के तख्त की ओर उसी प्रकार खिंचे चले आ रहे थे जिस प्रकार पतंगे चिराग की रौशनी की तरफ आकर्षित होकर आते हैं और उसी की लौ में जलकर भस्म हो जाते हैं।

नए सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद का जन्म ई.1228 में हुआ था। वह इल्तुतमिश का पुत्र था। उसका बचपन कारागार में व्यतीत हुआ था। दिल्ली की जनता जानती थी कि नासिरुद्दीन महमूद ने अपने भतीजे एवं पूर्ववर्ती सुल्तान मसूदशाह की धोखे से हत्या करके दिल्ली का तख्त हथियाया है फिर भी जनवरी 1247 में प्रजा ने भी उसे सार्वजनिक दरबार में अपना सुल्तान स्वीकार कर लिया।

मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने नासिरुद्दीन के चरित्र की मुक्त-कण्ठ से प्रशंसा की है। उनके अनुसार नासिरुद्दीन बड़ा ही उदार तथा सरल स्वभाव का सुल्तान था। वह अत्यन्त सादा जीवन व्यतीत करता था और कुरान की आयतें लिखकर अपनी जीविका चलाता था। उसके एक ही बेगम थी और कोई दासी नहीं थी।

मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकार नासिरुद्दीन की कितनी भी प्रशंसा क्यों न करें किंतु यह बात सत्य प्रतीत नहीं होती कि वह एक अच्छा इंसान था। उसने तो औरतों का बुरका पहनकर छल से दिल्ली में प्रवेश किया था तथा अपने ऊपर उपकार करने वाले अपने ही भतीजे की हत्या की थी। ऐसा आदमी अच्छा कैसे हो सकता है!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इल्बरी कबीले का गुलाम था बलबन (68)

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इल्बरी कबीले का गुलाम था बलबन

सुल्तान नासिरुद्दीन ने बलबन को अपना प्रधानमंत्री बना लिया। वह इल्बरी कबीले का तुर्क गुलाम था। बलबन में अपने समय के समस्त तुर्की अमीरों की अपेक्षा साहस, शक्ति एवं योग्यता की मात्रा बहुत अधिक थी।

दिल्ली का सुल्तान बनने के बाद नासिरुद्दीन को भी अपने पूर्ववर्ती सुल्तानों की तरह अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद से ही सल्तनत में तुर्की अमीरों का प्रभाव बहुत बढ़ गया था जो तुर्कान ए चिहालगानी अर्थात् चालीसा मण्डल के सदस्य थे।

ये अमीर अपने व्यक्तिगत स्वार्थों एवं पारस्परिक ईर्ष्या से ग्रस्त रहने के कारण कई गुटों में विभक्त हो गए थे। प्रत्येक गुट दरबार में अपना प्राबल्य स्थापित करके सल्तनत के महत्त्वपूर्ण पदों पर अपने गुट के अमीरों को नियुक्त करवाना चाहता था। इन्हीं अमीरों तथा सरदारों के षड्यन्त्रों एवं कुचक्रों के कारण एक के बाद एक करके सुल्तान मारे जा रहे थे।

अतः नासिरुद्दीन के लिये यह आवश्यक था कि वह तुर्कान ए चिहालगानी के सदस्यों पर कड़ा नियन्त्रण रखे और उनमें सुल्तान के प्रति स्वामिभक्ति एवं भय उत्पन्न करे, अन्यथा सुल्तान का अपना जीवन भी संकट में था। नासिरुद्दीन ने सुल्तान बनने के बाद पुराने अमीरों को तो उनके पद पर बने रहने दिया किंतु नये अमीरों की नियुक्ति नहीं की। तीन वर्ष तक वह अमीरों के कार्यों का निरीक्षण करता रहा। चूंकि वह नए अमीरों की नियुक्ति नहीं कर रहा था और पुराने अमीर मरते जा रहे थे, इसलिए नासिरुद्दीन थोड़ी-बहुत राहत की सांस ले सकता था।

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नासिरुद्दीन के सौभाग्य से उसे एक योग्य एवं बुद्धिमान तुर्क मिल गया जो इल्बरी कबीले का गुलाम था। इस गुलाम का नाम बलबन था। वह भी नासिरुद्दीन के पिता इल्तुतमिश की भांति इल्बरी कबीले का तुर्क था और वह भी बचपन में बदमाशों द्वारा पकड़ कर गुलामों के व्यापारियों के हाथों बेच दिया गया था और वह भी बिकता हुआ भारत आ पहुंचा था क्योंकि उन दिनों भारत में ही तुर्की गुलाम अच्छी कीमत पर बिक रहे थे। पहले उसे एक ख्वाजा ने खरीदा और बाद में स्वयं सुल्तान इल्तुतमिश ने खरीद लिया।

बलबन ने अपने मालिक सुल्तान इल्तुतमिश की जी-जान से सेवा की थी इसलिए इल्तुतमिश ने बलबन को चालीसा मण्डल का सदस्य बनाया था। बलबन ने सुल्तान नासिरुद्दीन के प्रति भी निष्ठा का प्रदर्शन किया था। इसलिए नासिरुद्दीन ने बलबन को अपना नायब अर्थात् प्रधानमंत्री बना दिया तथा कुछ दिनों बाद उसे अमीरों के कामकाज पर दृष्टि रखने के लिए चालीसा मण्डल का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

बलबन की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर बहुत से अमीर उससे ईर्ष्या करने लगे। इन लोगों ने बलबन के विरुद्ध सुल्तान के कान भरने आरम्भ किये। जब सुल्तान को बलबन के विरुद्ध शिकायतें मिलने लगीं तो सुल्तान ने बलबन को राजधानी दिल्ली से निष्कासित कर दिया। बलबन ने सुल्तान की आज्ञा को शिरोधार्य कर लिया तथा वह दिल्ली से बाहर चला गया।

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सुल्तान द्वारा बलबन के स्थान पर जो नया नायब अर्थात् प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया वह अयोग्य निकला तथा शासन के कार्यों में सुल्तान का हाथ नहीं बंटा सका। जब बलबन की अनुपस्थिति में सल्तनत का काम बिगड़ने लगा तो कुछ दिनों बाद सुल्तान ने बलबन को पुनः उसके पद पर बहाल करके उसे फिर से दिल्ली बुला लिया। इससे बलबन के विरोधियों को बड़ी निराशा हुई और वे फिर से बलबन के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे। इन विद्रोहियों में रहैन, कुतुलुग खाँ, किशलू खाँ तथा जलालुद्दीन आदि अमीर प्रमुख थे। सुल्तान नासिरुद्दीन ने बलबन की सहायता से इन समस्त विद्रोहियों का दमन कर दिया। पाठकों को स्मरण होगा कि पूर्ववर्ती सुल्तान अल्लाउद्दीन मसूदशाह ने अपने एक चाचा जलालुद्दीन को कन्नौज का गवर्नर नियुक्त किया था। जब नासिरुद्दीन सुल्तान बना तो उसने जलालुद्दीन को सम्भल तथा बदायूँ का गवर्नर बना दिया। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि जलालुद्दीन, बलबन की बढ़ती हुई शक्ति से सशंकित होकर बदायूँ से मुल्तान की ओर भाग गया और मंगोलों से जा मिला तथा दिल्ली की गद्दी पाने की चेष्टा करने लगा। जलालुद्दीन नहीं जानता था कि वह भारत से भाग सकता था किंतु अपनी किस्मत से दूर नहीं भाग सकता था।

उसकी किस्मत में लिखा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब जलालुद्दीन को इसी बलबन के अधीन सामंत बनकर रहना पड़ेगा! प्रकृति ने इल्तुतमिश के बेटों के भाग्य में ऐसी ही कयामत लिखी थी।

कुछ समय तक जलालुद्दीन मंगोलों के पास रहा किंतु ई.1255 में पुनः भारत लौट आया और अपने भाई नासिरुद्दीन के समक्ष उपस्थित हुआ। सुल्तान नासिरुद्दीन ने जलालुद्दीन को लाहौर का शासक बनाकर अपनी उदारता का परिचय दिया। इस घटना के बाद जलालुद्दीन ने कभी भी अपने भाई के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया।

पाठकों को स्मरण होगा कि इल्तुतमिश के एक जंवाई का नाम इज्जूद्दीन किशलू खाँ था। जब इल्तुतमिश के पुत्र बहरामशाह की हत्या हुई थी तब किशलू खाँ ने स्वयं को सुल्तान घोषित किया था किंतु अमीरों ने उसे सुल्तान स्वीकार नहीं किया था।

जब नासिरुद्दीन सुल्तान बना तो उसने अपने बहनोई किशलू खाँ को नागौर का गवर्नर नियुक्त किया। उस समय तो किशलू खाँ चुपचाप नागौर चला गया किंतु कुछ समय बाद किशलू खाँ ने बागी होकर मुल्तान तथा उच्च पर अधिकार कर लिया। इस पर सुल्तान नासिरुद्दीन स्वयं सेना लेकर वहाँ गया और उसने किशलू खाँ का बुरी तरह से दमन किया।

12 नवम्बर 1246 को सुल्तान नासिरुद्दीन ने पंजाब पर अपनी सत्ता की पुर्नस्थापना करने के उद्देश्य से बलबन के साथ पंजाब की ओर प्रस्थान किया। मार्च 1247 में उसने रावी नदी को पार किया। इसके बाद उसने बलबन को नमक की पहाड़ियों में भेज दिया जहाँ बलबन ने खोखरों तथा कबाइलियों से दण्ड वसूल किया।

इसके बाद सुल्तान नासिरुद्दीन सिन्ध के किनारे पहुँचा जहाँ उसने नमक की पहाड़ी के राजा जयपाल को परास्त किया। 9 नवम्बर 1247 को सुल्तान नासिरुद्दीन, बलबन के साथ दिल्ली लौट आया। इल्बरी कबीले का गुलाम बलबन अब नया इतिहास लिखने को तैयार था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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