Home Blog Page 101

याकूत हब्शी से प्रेम करने लगी रजिया सुल्ताना (62)

0
याकूत हब्शी - www.bharatkaitihas.com
याकूत हब्शी से प्रेम करने लगी रजिया सुल्ताना

कहा नहीं जा सकता कि इसमें कितना सच और कितना झूठ है किंतु रजिया सुल्ताना के बारे में पूरी दिल्ली सल्तनत में यह अपवाद व्याप्त हो गया कि रजिया सुल्ताना अपने गुलाम याकूत हब्शी से प्रेम करने लगी है।

तेरहवीं सदी के बेरहम तुर्की भारत में रजिया सुल्ताना किसी आश्चर्य से कम नहीं थी। उस युग में कोई स्त्री शायद ही सुल्तान होने जैसा दुस्साहस भरा जोखिम उठा सकती थी। उस काल में किसी मुस्लिम स्त्री के लिए बुरके से बाहर आना ही संभव नहीं था, मर्दों के कपड़े पहनकर तलवार घुमाना तो बहुत दूर की बात थी। स्त्रियोचित स्वभाव के विपरीत, रजिया युद्ध-प्रिय थी तथा उसे अपने पिता के समय से ही शासन चलाने का अच्छा अनुभव था। सम्भवतः पिता की अंतिम इच्छा के कारण ही वह सुल्तान बने रहने की भावना से परिपूर्ण थी।

रजिया ने अपने नाना तथा पिता के राजदरबार में उपस्थित रहने के दौरान यह अच्छी तरह समझ लिया था कि सुल्तान को किस तरह दिखना चाहिये, किस तरह उठना-बैठना और चलना चाहिये तथा किस तरह अमीरों, वजीरों और जनसामान्य के साथ व्यवहार करना चाहिये। वह राजत्व के इस सिद्धांत को भी समझती थी कि सुल्तान को धीर-गंभीर एवं आदेशात्मक जीवन शैली का निर्वहन करते हुए भी प्रसन्नचित्त, उदार तथा दयालु होना चाहिये।

रजिया में यह भावना भी कूट-कूट कर भरी हुई थी कि आदेश की अवहेलना करने वालों से इतनी सख्ती से निबटना चाहिये कि वह दूसरों के लिए एक मिसाल बन जाए। वह अपने अमीरों को यह अनुभव कराने में विश्वास करती थी कि सुल्तान का ओहदा, सल्तनत के दूसरे अमीरों से कितना अधिक ऊपर और कितना अधिक दिव्य है। इस कारण सल्तनत के अमीर सुल्तान के समक्ष जन-सामान्य की ही तरह तुच्छ हैं।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

इन सब कारणों से रजिया ने सुल्तान बनते ही पर्दे का परित्याग कर दिया। वह स्त्रियों के वस्त्र त्यागकर पुरुषों के समान कुबा और कुलाह धारण करके जनता के सामने आने लगी। ‘कुबा’ एक तरह का कोट होता था जिसे सुल्तान धारण किया करते थे तथा ‘कुलाह’ शंकु की तरह दिखने वाली एक टोपी को कहते थे जिसे तुर्की अमीर धारण किया करते थे। रजिया सुल्तानों एवं अमीरों की तरह शिकार खेलने भी जाने लगी।

वह योग्य तथा प्रतिभा-सम्पन्न सुल्तान थी। उसमें अपने विरोधियों का सामना करने तथा अपने साम्राज्य को सुदृढ़़ बनाने की इच्छाशक्ति भी मौजूद थी। मिनहाज उस् सिराज ने रजिया के गुणों की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। उसने लिखा है- ‘वह महान शासक, बुद्धिमान, ईमानदार, उदार, शिक्षा की पोषक, न्याय करने वाली, प्रजापालक तथा युद्धप्रिय थी…… उसमें वे सभी गुण थे जो एक राजा में होने चाहिये …… किंतु स्त्री होने के कारण ये सब गुण किस काम के थे?’

मिनहाज ने रजिया के जिन गुणों का उल्लेख किया है, उन गुणों का उल्लेख उस काल के मुल्ला मौलवियों ने किंचित् भी नहीं किया है। यदि यह मान भी लिया जाए कि रजिया में वे सब गुण थे जिनका उल्लेख मिनहाज ने किया है किंतु यह भी देखना होगा कि रजिया को इन गुणों के प्रदर्शन के लिए पर्याप्त समय ही नहीं मिला था। उसका शासन केवल साढ़े तीन साल का रहा था।

To purchase this book, please click on photo.

चूंकि तुर्की उलेमा और मुल्ला-मौलवी औरत के अधीन रहना मर्दों के लिए अपमान जनक समझते थे, इसलिए दिल्ली के अमीरों एवं प्रांतीय गवर्नरों ने रजिया के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा कभी नीचे नहीं किया। ऐसी स्थिति में रजिया को सल्तनत के कार्यों में अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर ही नहीं मिल सका। रजिया के सुल्तान बनने तक दिल्ली में बहुत से इस्माइलिया मुसलमान बस गये थे जिन्होंने शक्ति प्राप्त करने के लिये रजिया सुल्तान के विरुद्ध षड्यंत्र किया। उनके विद्रोह का दमन कर दिया गया और उनके समस्त प्रयत्न निष्फल कर दिये गये। ये इस्माइलिया मुसलमान शिया सम्प्रदाय को मानने वाले थे तथा एक बार उन्होंने इल्तुतमिश की भी हत्या करने का षड़यंत्र रचा था। मुस्लिम अमीरों एवं प्रांतीय गवर्नरों द्वारा अपने ही सुल्तान के विरुद्ध किए जा रहे संघर्ष को देखते हुए कुछ हिन्दू राजाओं ने अपने खोए हुए राज्यों को फिर से प्राप्त करने के प्रयत्न आरम्भ कर दिए। इनमें सम्राट पृथ्वीराज चौहान के वंशज सर्वाग्रणी थे जो इस समय रणथंभौर के आसपास बिखरे हुए थे। दिल्ली के पुराने वजीर कमालुद्दीन जुनैदी का भाई जियाउद्दीन जुनैदी, ग्वालियर का हाकिम था। उसके द्वारा विद्रोह किये जाने की तैयारियां करने की आशंका से ई.1238 में रजिया ने उसे दिल्ली बुलाया।

दिल्ली में आने के बाद जुनैदी लापता हो गया। लोगों को यह आशंका होने लगी कि सुल्तान ने विश्वासघात करके उसकी हत्या करवाई है। इससे तुर्की अमीरों में रजिया के विरुद्ध घृणा तथा संदेह का वातावरण बढ़ने लगा। वे रजिया की ओर से शंकित होकर गुप्त रूप से विद्रोह की तैयारियां करने लगे।

ऐसी स्थिति में रजिया को अपने महल के भीतर भी सतर्क होकर रहना पड़ा। रजिया की सेवा में एक अबीसीनियाई हब्शी गुलाम रहता था, जिसका नाम जमालुद्दीन याकूत हब्शी था। उसने अत्यंत निष्ठा से रजिया की सेवा की थी। इसलिए सुल्तान बनते ही रजिया ने उसे अमीर-ए-आखूर अर्थात् घुड़साल का अध्यक्ष बना दिया।

रजिया को अपने गुलाम याकूत हब्शी के ऊपर इतना अधिक विश्वास था कि वह हर समय उसे अपने साथ रखती। जब वह घुड़सवारी करती तो याकूत हब्शी का घोड़ा, रजिया के ठीक पीछे रहता था। रजिया तथा याकूत के बीच में कोई भी अमीर, सेनापति या मंत्री नहीं चल सकता था। ऐसा लगता था जैसे याकूत रजिया की छाया बन गया था किंतु वास्तविकता यह थी कि याकूत रजिया की छाया का ही नहीं अपितु तलवार और ढाल का भी का काम करता था। वह अपने आप में अकेला होते हुए भी किसी छोटी सेना से कम नहीं था।

गुलाम होते हुए भी याकूत हब्शी को किसी भी समय सुल्तान के समक्ष उपस्थित होने का अधिकार दिया गया। इस कारण लोगों में रजिया सुल्तान और याकूत हब्शी के प्रेम का अपवाद प्रचलित हो गया। कहा नहीं जा सकता कि इस बात में कितनी सच्चाई थी किंतु यह बात स्वयं को उच्च रक्तवंशी मानने वाले तुर्की अमीरों को पसन्द नहीं आयी। इस कारण राजधानी दिल्ली में रजिया का विरोध तेजी से बढ़ने लगा।

दिल्ली की जनता चटखारे ले-लेकर याकूत हब्शी और रजिया के किस्सों को प्रचारित करने लगी। इस कारण वे मनचले जिन्होंने रजिया को प्रेम की देवी मानकर सुल्तान के तख्त पर बैठाया था, वे भी रजिया से चिढ़ गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग रजिया ने हिन्दुओं को सौंप दिए (63)

0
रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग - www.bharatkaitihas.com
रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग रजिया ने हिन्दुओं को सौंप दिए

रजिया सुल्ताना समझ गई कि वह एक साथ कई मोर्चों पर नहीं लड़ सकती थी। इस समय उसे दिल्ली के तुर्की अमीरों से निबटना था, इसलिए उसने रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग हिन्दुओं को सौंप दिए!

रजिया सुल्ताना ने अपनी रक्षा के लिए अबीसीनियाई हब्शी गुलाम जमालुद्दीन याकूत को अपनी सेवा में नियुक्त किया जो हर समय रजिया का सुरक्षा कवच बनकर उसके साथ लगा रहता। इस कारण राज्य के अमीरों एवं गवर्नरों में रजिया के विरुद्ध असंतोष बढ़ गया तथा वे याकूत को मार्ग से हटाने का उपाय ढूंढने लगे।

इसके बाद रजिया सुल्ताना ने तुर्की अमीरों के प्रभाव को कम करने के लिए तेजी से काम करना आरम्भ किया। पाठकों को स्मरण होगा कि रजिया के सुल्तान बनने पर सल्तनत का मुख्य वजीर कमालुद्दीन जुनैदी पंजाब, सिंध एवं बंगाल के गवर्नरों से जा मिला था जो सैनिक कार्यवाही के माध्यम से रजिया को दिल्ली से अपदस्थ करने का प्रयास कर रहे थे।

जब रजिया सुल्ताना ने इन विद्रोही गवर्नरों का दमन कर दिया तो वजीर कमालुद्दीन जुनैदी, मलिक सैफुद्दीन कूची और उसके भाई फखर्रूद्दीन के साथ जंगलों में भाग गया। रजिया ने अपनी एक सेना इन विद्रोहियों के पीछे भेजी। मलिक सैफुद्दीन कूची और उसका भाई फखर्रूद्दीन इस सेना के द्वारा पकड़ लिए गए। रजिया ने उन्हें प्राणदण्ड दिया। कमालुद्दीन जुनैदी रजिया के कोप से बचने के लिये सिरमूर की पहाड़ियों में भाग गया जहाँ उसकी भी मृत्यु हो गई।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

रजिया सुल्ताना ने अपने पिता के समय से शासन में अपनाई जा रही नीति में चुपचाप एक गुप्त परिवर्तन किया तथा उसकी सूचना किसी भी मुस्लिम अमीर को नहीं दी। रजिया ने हिन्दू राजाओं के राज्य पूर्णतः नष्ट करने की बजाय उनमें से कुछ राजाओं को फिर से उनके राज्यों में स्थापित होने का अवसर दिया ताकि हिन्दू राजाओं से मित्रता करके तुर्की अमीरों पर नियंत्रण किया जा सके। शीघ्र ही रजिया को दो ऐसे अवसर प्राप्त हो गए।

जब रजिया सुल्ताना के पिता सुल्तान इल्तुतमिश की मृत्यु हुई थी तथा रुकनुद्दीन फीरोजशाह को नया सुल्तान बनाया गया था, तब स्वर्गीय चौहान सम्राट पृथ्वीराज के वंशजों ने रणथम्भौर के दुर्ग को घेर लिया जो कि रणथंभौर दुर्ग के पुराने शासक थे। सुल्तान रुकनुद्दीन फीरोजशाह एवं उसकी माता शाहतुर्कान, रणथंभौर दुर्ग में फंसी हुई तुर्की सेना को कोई सहायता नहीं भेज सके। इस कारण दिल्ली की तुर्की सेना रणथंभौर दुर्ग में फंस गई।

जब रजिया सुल्तान बनी तो उसने रणथंभौर दुर्ग पर घेरा डाले बैठी चौहान सेना के विरुद्ध सेना भेजने का विचार किया किंतु अचानक ही रजिया ने अपनी नीति बदल दी तथा उसने रणंभौर जाने वाली सेना को निर्देश दिया कि उसका काम राजपूतों से समझौता करके अपने सैनिकों को रणथंभौर दुर्ग से सुरक्षित बाहर निकालने का है।

To purchase this book, please click on photo.

दिल्ली से गई नई सेना ने सुल्तान के आदेशों का पालन किया तथा उसने राजपूतों से समझौता करके रणथंभौर दुर्ग उन्हें सौंप दिया और दुर्ग में फंसी हुई तुर्की सेना को दुर्ग से बाहर सुरक्षित निकाल लिया। रजिया की इस कार्यवाही को अधिकांश तुर्की अमीरों ने पसंद नहीं किया। इसी बीच नरवर के शासक यजवपाल ने ग्वालियर पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। यहाँ भी तुर्क सेना दुर्ग में फंस गई। इस पर रजिया ने और सेना भेजकर तुर्क सैनिकों को ग्वालियर के दुर्ग से निकलवाया और दुर्ग हिन्दुओं को सौंप दिया। इस प्रकार रजिया ने रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग हिन्दुओं को सौंप दिए। तुर्की अमीरों ने रजिया की यह कार्यवाही भी पसंद नहीं की। जहाँ रजिया हिन्दुओं के प्रति मुलायम नीति अपना रही थी, वहीं मुस्लिम अमीरों के प्रति उसका रवैया बहुत कठोर था। इस कारण नूरुद्दीन नामक एक तुर्क रजिया का घोर विरोधी हो गया। उसने दिल्ली के निकट गंगा-यमुना के दो-आब में निवास करने वाले करमत तथा इस्माइलिया मुसलमानों को सुल्तान के विरुद्ध भड़काया जिससे उन्होंने बगावत का झण्डा बुलंद कर दिया। वे हजारों की संख्या में दिल्ली के निकट इकट्ठे होने लगे। उनका निश्चय रजिया से उसका तख्त छीनकर किसी इस्माइलिया मुसलमान को दिल्ली के तख्त पर बैठाने का था।

मार्च 1237 में इस्माइलिया मुसलमानों ने एक साथ दो दिशाओं से जामा मस्जिद पर आक्रमण किया। उन्हें विश्वास था कि रजिया अवश्य ही इस समय मस्जिद में नमाज पढ़ रही होगी। इन लोगों ने मस्जिद में उपस्थित सुन्नी मुसलमानों को मौत के घाट उतारना आरम्भ कर दिया। रजिया उस समय मस्जिद में नहीं थी किंतु जैसे ही उसे इस हमले की जानकारी हुई, उसने अपने सैनिकों के साथ मस्जिद पहुंचकर करमत तथा इस्माइलिया मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया।

दिल्ली की जनता के लिये एक औरत सुल्तान का इस तेजी से कार्य करना किसी चमत्कार से कम नहीं था। बहुत से लोग फिर से रजिया के प्रशंसक बन गये। बाद में करमत एवं इस्माइलिया मुसलमानों के इलाकों में सेना भेजकर उनके ठिकाने नष्ट करवाये गए।

उन्हीं दिनों रजिया ने एक भारतीय मुसलमान को अपने दरबार में महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया। यह व्यक्ति कुछ दिन पहले ही हिन्दू से मुसलमान बना था। यह नियुक्ति तुर्की अमीरों को पसंद नहीं आई और वे रजिया को गहरी शंका की दृष्टि से देखने लगे किंतु रजिया ने उनकी परवाह नहीं की तथा तुर्की अमीरों को कड़ी आँखों से देखती रही।

रजिया के औरत होने के कारण इस बात का खतरा बहुत अधिक था कि पुरुष-प्रधान मुस्लिम सल्तनत में स्त्री सुल्तान का पद कम महत्त्वपूर्ण हो जाए तथा इल्तुतमिश द्वारा गठित चालीस गुलामों का मण्डल अथवा अन्य तुर्की अमीर सुल्तान एवं सल्तनत पर हावी हो जाएं किंतु रजिया ने सुल्तान के पद को हर हालत में सबसे ऊपर तथा महत्त्वपूर्ण बनाए रखा।

रजिया पहली सुल्तान थी जिसने पूरे आत्मविश्वास के साथ स्वयं को सुल्तान की तरह प्रस्तुत किया। एक बार शुक्रवार की नमाज पढ़ने के बाद रजिया ने कहा था- ‘यदि मैंने पुरुषों से अच्छा कार्य नहीं किया हो तो भी इतना तो है कि मैंने सुल्तान के पद को महत्त्वपूर्ण बनाए रखा।’

इस्लाम के बारे में रजिया का मानना था कि इस्लाम व्यक्तिगत आस्था का विषय है। सुल्तान अथवा सल्तनत के लिये यह आवश्यक नहीं है कि वह गैर-इस्लामी रियाया को इस्लाम कबूलने के लिये विवश करे अथवा उसे तंग करे।

एक अवसर पर रजिया ने अपने दरबार में उपस्थित अमीरों और वजीरों को निर्देश दिया कि वे हिन्दू रियाया को तंग न करें। रजिया ने कहा कि स्वयं पैगम्बर मुहम्मद का कथन है कि इस्लाम न मानने वाले मनुष्यों पर ज्यादती न की जाये। रजिया की ये बातें तुर्की मुल्ला-मौलवियों को बिल्कुल भी नहीं सुहाती थीं। वे जानते थे कि यदि मुस्लिम प्रजा को रजिया की ये बातें समझ में आ जाएं तो राज्य में मुल्ला-मौलवियों की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए।

रजिया ने रणथंभौर तथा ग्वालियर दुर्ग हिन्दुओं को सौंपकर राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं अपितु कूटनीतिक दृष्टि से भी बहुत हिम्मत वाला कार्य किया था किंतु तुर्की अमीर रजिया की इस नीति को समझ नहीं पाए

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्तूनिया से विवाह कर लिया रजिया ने (64)

0
अल्तूनिया - www.bharatkaitihas.com
अल्तूनिया से विवाह कर लिया रजिया ने

अप्रेल 1240 में रजिया बंदी बना ली गई। अपनी शक्ति और बुद्धि का अहंकार रखने वाले तुर्की अमीरों ने एक लड़की को छल से बंदी बनाया। वे युद्ध के मैदान में रजिया का सामना करने की स्थिति में नहीं थे। सूबेदारों की संयुक्त सेनाओं द्वारा रजिया बंदी बनाई जाकर अल्तूनिया को समर्पित कर दी गई।

रजिया सुल्तान ने मुस्लिम अमीरों को अपने लिए खतरा मानकर उनके विरुद्ध कठोर दृष्टिकोण अपनाया था जबकि उसने कुछ प्रबल हिन्दू राज्यों की पुनर्स्थापना के उद्देश्य से रणथंभौर तथा ग्वालियर के दुर्ग फिर से चौहानों एवं प्रतिहारों को लौटा दिए थे।

रजिया ने हिन्दुओं के प्रति जो मुलायम रवैया अपनाया था, ठीक वही रवैया उसने मंगोलों के मामले में भी अपनाया। पाठकों को स्मरण होगा कि जब चंगेज खाँ भारत पर चढ़कर आया था, तब दिल्ली सल्तनत पर इल्तुतमिश का अधिकार था। उसने चंगेज खाँ से उलझने की बजाय उसे उपहार आदि भेजकर संतुष्ट करने का प्रयास किया था। इस कारण चंगेज खाँ बहुत सीमित क्षेत्र में लूटपाट मचाकर भारत से वापस लौट गया था।

रजिया के समय दिल्ली सल्तनत की पश्चिमी सीमा पर जलालुद्दीन मंगबरनी के प्रतिनिधि हसन करलुग का अधिकार था। जब मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया तब उसने मंगोलों के विरुद्ध रजिया से सहायता की अपील की किंतु रजिया ने भी अपने पिता इल्तुतमिश की नीति पर चलने का निर्णय लिया तथा मंगोलों के विरुद्ध कार्यवाही करने से इन्कार कर दिया। इस पर कुछ अमीरों ने रजिया के विरुद्ध विष-वमन करना आरम्भ कर दिया।

मंगोलों के प्रति रजिया की इस नीति का एक कारण और भी था, जब पंजाब के गर्वनर कबीर खाँ अयाज ने रजिया सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा किया था, तब वह रजिया की सेना से परास्त होकर पीछे की ओर अर्थात् चिनाब नदी की ओर भागा था।

उस समय चिनाब नदी पर मंगोलों का सैन्य शिविर लगा हुआ था जो पंजाब में लूट-मार मचाते घूम रहे थे। मंगोलों से डरकर कबीर खाँ को रजिया की तरफ आना पड़ा था तथा बिना शर्त रजिया के पैरों में गिरकर माफी मांगनी पड़ी थी। इसलिए रजिया समझ गई थी कि तुर्की अमीरों की शक्ति का सामना करने के लिए यह आवश्यक है कि देश के भीतर हिन्दू शक्ति तथा देश की सीमा पर मंगोल शक्ति बनी रहे किंतु तुर्की अमीर रजिया की इस चाल को समझ नहीं पा रहे थे और वे इसे रजिया की स्वतंत्र मनोवृत्ति मात्र मान रहे थे।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

इन घमण्डी तुर्की अमीरों की दृष्टि में रजिया अब भी एक औरत मात्र थी जिसे भोगा ही जा सकता था, उसका शासन किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता था। रजिया दिल्ली की जनता के सहयोग से सुल्तान बनी थी जिसमें अमीरों की भूमिका बहुत कम थी। इसलिये वे रजिया के स्थान पर ऐसे व्यक्ति को सुल्तान बनाना चाहते थे जो तुर्की अमीरों विशेषकर चालीसा मण्डल के अमीरों के प्रति कृतज्ञ रहे तथा उनके हाथों की कठपुतली बनकर रहे।

जब रजिया ने एक भारतीय मुसलमान को अपने दरबार में उच्च पद दिया तो तुर्की अमीर रजिया के दुश्मन हो गए। वे भारतीय मुसलमानों को अपने से बहुत नीचा समझते थे और एक भारतीय मुसलमान के नीचे तुर्की अमीरों को रखा जाए, यह किसी भी स्थिति में सह्य नहीं था। इसलिए फिर से दिल्ली एवं दिल्ली के बाहर विद्रोह के झण्डे बुलंद हो गए।

एक नासमझ लड़की की ऐसी हरकतें देखकर तुर्की अमीरों एवं गवर्नरों में रजिया के प्रति घृणा अपने चरम पर पहुंच गई। इसी भावना के वशीभूत होकर भटिण्डा के गर्वनर मलिक इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। रजिया विद्रोहियों को दबाने के लिए एक विशाल सेना लेकर दिल्ली से भटिण्डा की ओर बढ़ी। जब वह भटिण्डा पहुंची तब उसे तुर्की अमीरों ने अपने जाल में फांस लिया।

To purchase this book, please click on photo.

भटिण्डा के गर्वनर मलिक इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया और रजिया की परवरिश, सुल्तान कुतुबुद्दीन के महलों में साथ-साथ हुई थी और दोनों बचपन के मित्र थे। जब अल्तूनिया ने युवावस्था में प्रवेश किया तो वह रजिया के प्रति अनुरक्त हो गया। उसने कई बार रजिया के समक्ष अपने प्रेम का प्रदर्शन किया किंतु रजिया ने हर बार हँसकर टाल दिया था। जब रजिया सुल्तान बन गई तो अल्तूनिया की चाहत और अधिक बढ़ गई। वह रजिया से निकाह करके न केवल अपने पुराने प्रेम को पाना चाहता था, अपितु इस वैवाहिक सम्बन्ध के माध्यम से सल्तनत पर कब्जा करने का स्वप्न भी देखा करता था। तत्कालीन इतिहासकारों ने ऐसे संकेत दिए हैं कि रजिया सुल्तान, भले ही अल्तूनिया के प्रस्तावों को टाल रही थी किंतु उसने अल्तूनिया के विरुद्ध कोई सख्ती नहीं दिखाई थी। इस कारण अल्तूनिया की उम्मीदें जीवित बनी रहीं किंतु जब उसने सुना कि रजिया अपने हब्शी गुलाम याकूत के प्रेम में खोई हुई है तो अल्तूनिया का हृदय भंग हो गया। थोड़े ही दिनों में उसकी निराशा बदले की आग में बदल गई और उसने विद्रोह का झण्डा बुलंद कर दिया।

इस समय उत्तर भारत भयानक गर्मी से उबल रहा था तथा इसके साथ ही रमजान का महीना होने से मुस्लिम सैनिकों के रोजे चल रहे थे किंतु रजिया ने अल्तूनिया तथा विद्रोही अमीरों के विरुद्ध तुरंत कार्यवाही करने का निर्णय लिया और वह विशाल सेना लेकर भटिण्डा की ओर बढ़ गई। जब वह भटिण्डा पहुंची, तब दूसरे सूबों के प्रांतपति भी अपनी सेनाएं लेकर अल्तूनिया की सहायता के लिये आ गये।

अल्तूनिया ने बड़ी चतुराई से अपने कुछ लोगों को रजिया सुल्तान के दल में शामिल कर दिया और जब रजिया भटिण्डा पहुंची, तब पूर्व में निर्धारित योजना के अनुसार उन लोगों ने याकूत से गाली-गलौच करके उसे झगड़ा करने के लिये उकसाया। जब याकूत ने इन लोगों का विरोध किया तो उन लोगों ने याकूत को घेर कर वहीं मार डाला।

याकूत हब्शी की मृत्यु से अपने ही सैन्य शिविर में रजिया की स्थिति कमजोर हो गई। अब उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि कौन उसका अपना था और कौन भेड़ की खाल में छिपा हुआ भेड़िया था किंतु रजिया ने हिम्मत से काम लिया तथा स्वयं तलवार लेकर शत्रुओं का सामना करने को उद्धत हुई किंतु धोखे, फरेब और जालसाजी के उस युग में रजिया का कोई सच्चा सहायक नहीं था। याकूत हब्शी मारा जा चुका था तथा पुराना प्रेमी मलिक इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया बागी हो गया था। इसलिये अप्रेल 1240 में रजिया बंदी बना ली गई।

इस प्रकार अपनी शक्ति और बुद्धि का अहंकार रखने वाले तुर्की अमीरों ने एक लड़की को छल से बंदी बनाया। वे युद्ध के मैदान में रजिया का सामना करने की स्थिति में नहीं थे। सूबेदारों की संयुक्त सेनाओं द्वारा रजिया बंदी बनाई जाकर अल्तूनिया को समर्पित कर दी गई।

विद्रोहियों ने इल्तुतमिश के छोटे पुत्र बहरामशाह को तख्त पर बैठा दिया। मिनहाज उस् सिराज के अनुसार रजिया ने 3 वर्ष, 6 माह, 6 दिन राज्य किया। जब रजिया बंदियों की तरह अल्तूनिया के समक्ष लाई गई तो अल्तूनिया ने उससे कहा कि यदि रजिया अल्तूतिनया से विवाह कर ले तो रजिया को कैद में नहीं रहना पड़ेगा। रजिया ने अब भी अपना साहस नहीं खोया था, इसलिए उसने अल्तूनिया का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।

अल्तूनिया ने रजिया को भटिण्डा के किला मुबारक में बंद कर दिया। रजिया को अपना भविष्य अंधकार में दिखाई देने लगा किंतु कुछ समय बाद उसने एक बार फिर भाग्य आजमाने का फैसला किया। अल्तूनिया अब भी रजिया के साथ कठोर व्यवहार नहीं कर रहा था। रजिया हर शुक्रवार को राजसी ठाठ-बाट के साथ हाजी रतन मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ती तथा अल्तूनिया प्रतिदिन रजिया से मिलने आता। रजिया ने उसकी आँखों में अपने लिये वही पहले जैसा प्यार देखा।

रजिया ने अल्तूनिया पर अपने रूप के जादू का प्रयोग करने का निश्चय किया। रजिया ने अल्तूनिया के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। अल्तूनिया इस प्रस्ताव से सहमत हो गया और अगस्त 1240 में उसने रजिया को कारागार से मुक्त करके उसके साथ निकाह कर लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रजिया की हत्या कर दी लुटेरों ने (65)

0
रजिया की हत्या - www.bharatkaitihas.com
रजिया की हत्या कर दी लुटेरों ने

कैथल के निकट जाटों ने अल्तूनिया तथा रजिया को पकड़ लिया और उनका माल-असबाब लूटकर उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार रजिया सुल्तान का सदा के लिये अंत हो गया। एक अन्य मत के अनुसार रजिया तथा अल्तूनिया को पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा बहरामशाह के आदेश से अल्तूनिया तथा रजिया की हत्या की गई।

विवाह करने के बाद रजिया और अल्तूनिया एक सेना लेकर दिल्ली के तख्त पर अधिकार करने के लिए दिल्ली की ओर चल दिए। रजिया के विश्वस्त अमीर मलिक इज्जुद्दीन सालारी तथा मलिक कराकश आदि कुछ अमीर भी रजिया एवं अल्तूनिया से आ मिले। अक्टूबर 1240 में दिल्ली के बाहर रजिया तथा नए सुल्तान बहरामशाह की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ किंतु बहरामशाह की सेना ने रजिया तथा अल्तूनिया को परास्त कर दिया।

रजिया और अल्तूनिया युद्ध में परास्त होने के बाद युद्ध के मैदान से भाग निकले किंतु कैथल (अब हरियाणा में) के निकट कुछ स्थानीय लुटेरों ने अल्तूनिया तथा रजिया को पकड़ लिया तथा धन प्राप्ति के लालच में उनकी हत्या कर दी।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि 14 अक्टूबर 1240 को कैथल के निकट जाटों ने अल्तूनिया तथा रजिया को पकड़ लिया और उनका माल-असबाब लूटकर उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार रजिया सुल्तान का सदा के लिये अंत हो गया। एक अन्य मत के अनुसार रजिया तथा अल्तूनिया को पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा बहरामशाह के आदेश से उन्हें दिल्ली में मार डाला गया।

दिल्ली में तुर्कमान गेट पर रजिया का मकबरा बताया जाता है। इस मकबरे को राजी एवं साजी का मकबरा कहा जाता है। लोकमान्यता है कि साजी, रजिया की बहिन थी किंतु इतिहास की किसी भी पुस्तक में साजी का उल्लेख नहीं मिलता।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

रजिया की हत्या कैथल में हुई किंतु उसकी कब्रगाह तीन भिन्न स्थानों- कैथल, दिल्ली तथा टोंक में स्थित होने का दावा किया जाता है। उसकी वास्तविक कब्रगाह के बारे में कोई पुरातात्विक अथवा ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलते हैं। दिल्ली की कब्रगाह तुर्कमान गेट के पास शाहजहांबाद में बुलबुलेखाना में स्थित है।

कैथल में एक मस्जिद के निकट रजिया तथा अल्तूनिया की कब्रगाहें बताई जाती हैं। ई.1938 में भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो कैथल आये। उन्होंने कैथल में रजिया की कब्रगाह का जीर्णोद्धार करने के लिये कुछ आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई। उनके निर्देश पर भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक भी कैथल आये किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने के कारण इस कब्र का जीर्णोद्धार नहीं करवाया जा सका।

यद्यपि रजिया इल्तुतमिश के उत्तराधिकारियों में सर्वाधिक योग्य तथा राजपद के सर्वाधिक उपयुक्त थी परन्तु तेरहवीं शताब्दी ईस्वी के तुर्की-भारत के दूषित राजनीतिक वातावरण में वह पद पर बने रहने में असफल रही तथा लगभग साढ़े तीन साल बाद ही उसका राज्य समाप्त हो गया।

To purchase this book, please click on photo.

मध्यकालीन इतिहासकारों ने रजिया की विफलता का प्रधान कारण उसका स्त्री होना बताया है। इन इतिहासकारों के अनुसार इस्लाम में मान्यता है कि पैगम्बर मुहम्मद ने कहा था कि स्त्री संसार में सबसे अमूल्य एवं पवित्र वस्तु है किंतु जो लोग स्त्री को अपना शासक बनायेंगे, उन्हें कभी मानसिक शांति प्राप्त नहीं होगी। इस मान्यता ने रजिया को मुसलमान-प्रजा का आदर का पात्र नहीं बनने दिया। तुर्की अमीर किसी भी कीमत पर रजिया को सुल्तान के पद पर बने नहीं रहने देना चाहते थे। इसलिए जब तक रजिया जीवित रहती, उसके विरुद्ध यही सब होते रहना था और एक दिन रजिया को इसी तरह मार दिया जाना था। रजिया द्वारा पर्दे तथा औरतों के कपड़ों का परित्याग करके पुरुषों के कपड़े धारण कर लेने से न केवल तुर्की अमीरों के अपितु मुल्ला-मौलवियों और उलेमाओं के अहंकार को भी गहरी चोट पहुँची थी। यदि रजिया पुरुष रही होती तो इस बात की संभावना अधिक थी कि छल, फरेब और हिंसा के उस युग में वह भी अपने पिता की तरह अपने विरोधियों का दमन करने में अधिक सफल हुई होती तथा दीर्घकाल तक राज्य भोगती। क्योंकि तब न तो याकूत के प्रेम का अपवाद फैला होता, न अल्तूनिया ने उससे विवाह के लालच में उसका सर्वनाश किया होता और न जुनैदी आदि तुर्की अमीरों ने रजिया का विरोध करने का दुस्साहस किया होता!

रजिया की असफलता का दूसरा कारण चालीसा मण्डल के तुर्की अमीरों का स्वार्थी तथा शक्तिशाली होना बताया जाता है जिन्हें इल्तुतमिश ने शासन कार्य चलाने के लिए नियुक्त किया था। दिल्ली सल्तनत में इन तुर्की अमीरों का प्रभाव इतना अधिक था कि वे सुल्तान को अपने हाथों की कठपुतली बनाकर रखना चाहते थे जबकि रजिया ने उनका अंकुश स्वीकार नहीं किया तथा स्वयं अपने विवेक से काम किया।

रजिया ने इन तुर्की अमीरों की शक्ति को एक सीमा तक घटा दिया तथा बड़ी सतर्कता के साथ अमीरों के प्रतिद्वन्द्वी दलों को संगठित करने का प्रयास किया परन्तु इस कार्य में सफल होने के लिए समय की आवश्यकता थी जो दुर्भाग्यवश रजिया को नहीं मिल सका। इससे पहले कि रजिया तुर्की अमीरों पर पूरी तरह शिकंजा कस पाती, तुर्की अमीरों ने रजिया को मार दिया।

रजिया की विफलता का एक कारण यह भी था कि जिस मुस्लिम प्रजा के सहयोग से वह सुल्तान बनी थी, जब उलेमाओं ने मुस्लिम प्रजा को यह समझाया कि इस्लाम में औरत को सुल्तान बनाना वर्जित है तो वही प्रजा रजिया की विरोधी हो गई। हिन्दू प्रजा का सहयोग तथा समर्थन प्राप्त करना वैसे भी असम्भव था क्योंकि तुर्की शासक, विधर्मी तथा विदेशी थे।

इल्तुतमिश के अन्य पुत्रों का जीवित रहना भी रजिया के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ। इल्तुतमिश के इन पुत्रों से षड्यन्त्रकारी अमीरों को समर्थन तथा प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। षड्यन्त्रकारी अमीर इन शहजादों की आड़ में रजिया पर प्रहार करने लगे। अंत में इन्हीं शहजादों में से एक बहरामशाह ने सल्तनत पर अधिकार कर लिया।

इतिहासकारों द्वारा रजिया की विफलता का एक कारण यह भी बताया जाता है कि अभी तक भारत में तुर्की साम्राज्य का शैशव काल था। इस कारण केन्द्रीय सरकार स्थानीय हाकिमों को अपने पूर्ण नियंत्रण में नहीं कर पाई थी। स्थानीय हिन्दू सरदारों के निरन्तर विद्रोह होते रहने के कारण सुल्तानों को अपने स्थानीय हाकिमों को पर्याप्त मात्रा में सैनिक एवं प्रशासकीय अधिकार देने पड़ते थे। प्रांतीय गवर्नरों द्वारा इन स्थानीय हिन्दू हाकिमों से सांठ-गांठ कर लेने पर केन्द्रीय सरकार उन्हें ध्वस्त नहीं कर पाती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुल्तान बहरामशाह की बहिन से विवाह कर लिया एतिगीन ने (66)

0
सुल्तान बहरामशाह www.bharatkaitihas.com
सुल्तान बहरामशाह की बहिन से विवाह कर लिया एतिगीन ने

एतिगीन ने सुल्तान बहरामशाह की एक बहिन से जबर्दस्ती विवाह कर लिया। इस प्रकार वह सुल्तान से भी अधिक महत्त्वपूर्ण तथा शक्तिशाली हो गया तथा निरंकुश व्यवहार करने लगा।

रजिया भारत की प्रथम तथा अन्तिम स्त्री सुल्तान थी। यद्यपि विदेशों में रजिया के पूर्व भी स्त्रियां तख्त पर बैठ चुकी थीं तथा बाद में कुछ स्त्रियां उन देशों में शासक बनीं परन्तु भारत में सुल्तान के तख्त पर बैठने का अवसर केवल रजिया को ही प्राप्त हुआ।

रजिया की मृत्यु के लगभग साढ़े तीन सौ साल बाद चांद बीबी दक्षिण भारत में बीजापुर एवं अहमदनगर के मुस्लिम राज्यों में अल्पवय सुल्तानों की संरक्षक बनी तथा उसने इन राज्यों का शासन चलाया किंतु वह अकबर की राज्यलिप्सा की भेंट चढ़ गई।

रजिया का पतन उसकी दुर्बलताओं के कारण नहीं वरन् उस युग के कट्टर मुसलमानों की असहिष्णुता के कारण हुआ था। फिर भी कुछ इतिहासकारों ने रजिया पर यह आरोप लगाया है कि उसमें स्त्री-सुलभ दुर्बलताएं थीं। इन इतिहासकारों की दृष्टि में याकूत से उसका अनुराग उत्पन्न होना या अल्तूनिया से विवाह कर लेना उसकी दुर्बलताओं के प्रमाण हैं।

जबकि किसी कुंआरी स्त्री का किसी पुरुष के प्रति अनुरक्त होना या किसी से विवाह कर लेना, किसी भी तरह उसकी दुर्बलता नहीं माना जा सकता। वास्तविकता तो यह थी कि रजिया की विफलता इस तथ्य को सिद्ध करती है कि उस युग की राजनीति में स्त्रियों के लिए कोई स्थान नहीं था, वे चाहे कितनी ही योग्य क्यों न हों!

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

भारत के मध्यकाल का इतिहास रजिया के बिना पूरा नहीं होता। जहाँ इतिहास बहुत से दीर्घकालिक सुल्तानों के बारे में बहुत कम जानता है, वहीं रजिया के केवल साढ़े तीन साल के अल्पकालीन शासन के उपरांत भी इतिहास में रजिया के बारे में बहुत अच्छी जानकारी मिलती है। जनमानस में भी रजिया के सम्बन्ध में बहुत सी बातें व्याप्त हैं। ई.1983 में रजिया पर हिन्दी भाषा में सिनेमा का निर्माण किया गया। ई.2015 में रजिया पर टीवी सीरियल का निर्माण हुआ।

तेरहवीं सदी आज बहुत पीछे छूट चुकी है। उसके बाद भारत में कुछ स्त्री-शासक हुई हैं जिन्होंने निरंकुश राजतंत्रीय व्यवस्था से लेकर लोकशासित प्रजातंत्रीय व्यवस्था में सफलता पूर्वक शासन किया है तथा इस बात को सिद्ध करके दिखाया है कि स्त्रियों में शासन करने की प्रतिभा नैसर्गिक रूप से वैसी ही है जैसी कि पुरुषों में हुआ करती है।

यहाँ तक कि भारत से बाहर पाकिस्तान, बांगलादेश तथा श्रीलंका आदि दक्षिण एशियाई देशों में भी स्त्रियों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। इन उदाहरणों को देखकर पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि रजिया की विफलता से केवल इतना ही सिद्ध होता है कि तेरहवीं सदी की मध्यकालीन मानसिकता वाले उस युग की बर्बर राजनीति में स्त्रियों के लिए कोई स्थान नहीं था, वे चाहे कितनी ही योग्य क्यों न हों!

To purchase this book, please click on photo.

कुछ इतिहासकारों के अनुसार रजिया ने दिल्ली में मदरसे, पुस्तकालय तथा इस्लामी शोध केन्द्र की स्थापना की जिनमें हजरत मुहम्मद की शिक्षाओं तथा कुरान का अध्ययन किया जाता था किंतु इन संस्थाओं के बारे में अब कोई जानकारी नहीं मिलती। रजिया के बाद इल्तुतमिश का तीसरा पुत्र मुइजुद्दीन बहरामशाह दिल्ली का सुल्तान हुआ। वह दुस्साहसी तथा क्रूर व्यक्ति था। उसे इस शर्त पर सुल्तान बनाया गया था कि शासन का पूरा अधिकार विद्रोहियों के नेता एतिगीन के हाथों में रहेगा। एतिगीन ने सुल्तान के कई विशेषाधिकार हड़प लिये। वह अपनी हवेली के फाटक पर नौबत बजवाता था और अपने यहाँ हाथी रखता था। एतिगीन ने सुल्तान बहरामशाह की एक बहिन से जबर्दस्ती विवाह कर लिया। इस प्रकार वह सुल्तान से भी अधिक महत्त्वपूर्ण तथा शक्तिशाली हो गया तथा निरंकुश व्यवहार करने लगा। एतिगीन के इस आचरण के कारण कुछ ही दिनों में बहरामशाह तथा एतिगीन में ठन गई और बहरामशाह ने एतिगीन की उसके कार्यालय में ही हत्या करवा दी। बहरामशाह ने वजीर निजामुलमुल्क की भी हत्या करवाने का प्रयास किया जो एतिगीन के साथ मिलकर बदमाशी करता था किंतु दुष्ट वजीर बच गया। सुल्तान प्रकट रूप से उसके साथ मित्रता का प्रदर्शन करता रहा।

एतिगीन की हत्या के बाद मलिक बदरुद्दीन सुंकर को अमीर ए हाजिब नियुक्त किया गया। सुंकर भी अति महत्वाकांक्षी निकला। उसने वजीर तथा सुल्तान, दोनों की उपेक्षा करके शासन पर कब्जा जमाने का प्रयास किया। उसने सुल्तान बहरामशाह के विरुद्ध षड़यंत्र रचा। इस पर बहरामशाह ने सुंकर को बदायूं का सूबेदार नियुक्त करके बदायूं भेज दिया। चार माह बाद सुंकर सुल्तान की अनुमति लिये बिना दिल्ली लौट आया। इस पर सुल्तान बहरामशाह ने सुंकर तथा उसके सहयोगी ताजुद्दीन अली को मरवा दिया।

सुल्तान ने एतिगीन के साथ मिलकर षड़यंत्र करने वाले काजी जलालुद्दीन की भी हत्या करवा दी। इन अमीरों की हत्याओं से चारों ओर सुल्तान के विरुद्ध षड़यंत्र रचे जाने लगे। आन्तरिक कलह तथा षड्यन्त्र के साथ-साथ सुल्तान बहरामशाह को मंगोलों के आक्रमण का भी सामना करना पड़ा। ई.1241 में मंगोलों ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। ई.1242 में बहरामशाह ने वजीर मुहाजबुद्दीन को एक सेना देकर लाहौर के लिये रवाना किया।

वजीर मुहाजबुद्दीन सेना को लाहौर ले जाने के स्थान पर उसे भड़काकर मार्ग में से ही पुनः दिल्ली ले आया। जब विद्रोहियों ने दिल्ली पर आक्रमण किया तो दिल्ली के नागरिकों ने सुल्तान को बचाने के लिये अपने प्राणों की बाजी लगा दी किंतु अंततः विद्रोहियों ने बहरामशाह को बंदी बना लिया तथा दिल्ली पर अधिकार कर लिया। बहरामशाह बन्दी बना लिया गया और कुछ दिन बाद उसकी हत्या कर दी गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुल्तान नासिरुद्दीन औरतों के कपड़े पहनकर दिल्ली में घुसा (67)

0
सुल्तान नासिरुद्दीन www.bharatkaitihas.com
सुल्तान नासिरुद्दीन औरतों के कपड़े पहनकर दिल्ली में घुसा

सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद इल्तुतमिश का पुत्र था। उसका बचपन कारागार में व्यतीत हुआ था। दिल्ली की जनता जानती थी कि नासिरुद्दीन महमूद ने अपने भतीजे एवं पूर्ववर्ती सुल्तान मसूदशाह की धोखे से हत्या करके दिल्ली का तख्त हथियाया है फिर भी प्रजा ने उसे सार्वजनिक दरबार में अपना सुल्तान स्वीकार कर लिया।

बहरामशाह की हत्या के बाद दिल्ली का तख्त रिक्त हो गया। इसके पहले कि चालीसा मण्डल के अमीर नये सुल्तान का निर्वाचन करते, इज्जूद्दीन किशलू खाँ नामक एक तुर्की अमीर ने स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया। इज्जूद्दीन किशलू खाँ किसी राजवंश में उत्पन्न नहीं हुआ था परन्तु चूंकि उसने इल्तुतमिश की एक पुत्री से विवाह कर लिया था, इसलिये वह स्वयं को तख्त का अधिकारी समझता था।

अन्य तुर्की अमीरों ने इज्जूद्दीन किशलू खाँ को सुल्तान स्वीकार नहीं किया और इल्तुतमिश के पौत्र अल्लाउद्दीन मसूद को तख्त पर बैठा दिया जो कि मरहूम सुल्तान रुकुनुद्दीन फीरोज का पुत्र था। अल्लाउद्दीन मसूद को इस शर्त पर सुल्तान बनाया गया कि वह केवल सुल्तान की उपाधि का उपयोग करेगा, सल्तनत के सारे अधिकार चालीसा मण्डल के अमीरों के पास रहेंगे। इन अमीरों ने अपनी स्थिति को सुदृढ़़ बनाने के लिए समस्त उच्च-पद आपस में बांट लिये। ताकि सुल्तान को स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश होने का अवसर प्राप्त न हो।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

अल्लाउद्दीन मसूद के भाग्य से कुछ समय बाद ही इन स्वार्थी अमीरों में फूट पड़ गई। सुल्तान अल्लाउद्दीन मसूदशाह ने इस परिस्थिति से लाभ उठाया। उसने वर्षों से जेल में सड़ रहे अपने दो चाचाओं नासिरुद्दीन तथा जलालुद्दीन को कारागार से बाहर निकाल दिया। इल्तुतमिश के ये दोनों पुत्र नासिरुद्दीन तथा जलालुद्दीन रुकनुद्दीन फीरोजशाह के समय से ही जेल में बंद थे।

रजिया तथा बहरामशाह ने अपने इन भाइयों को जेल से बाहर निकालने का खतरा मोल नहीं लिया था किंतु अल्लाउद्दीन मसूदशाह ने न केवल उन दोनों को जेल से मुक्त कर दिया अपितु अपने चाचा जलालुद्दीन को कन्नौज की और दूसरे चाचा नासिरुद्दीन को बहराइच की जागीर देकर सुल्तान में निहित शक्ति का प्रदर्शन किया तथा जनता का विश्वास जीतने का प्रयास किया परन्तु ऐसा करके अल्लाउद्दीन मसूदशाह ने अपनी ही कब्र खोद दी।

दूरस्थ प्रांतों के हाकिमों ने इसे मसूदशाह की कमजोरी समझा तथा स्वयं को स्वतंत्र करना आरम्भ कर दिया। पंजाब में रहने वाले खोखर भी सल्तनत के विरुद्ध सक्रिय हो गए। कटेहर  तथा बिहार में राजपूतों ने विद्रोह के झण्डे खड़े कर दिए। ई.1243 में जाजनगर के राय ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया तथा सुल्तान उसके विरुद्ध कोई सेना नहीं भेज सका।

ई.1245 में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण कर दिया। अल्लाउद्दीन मसूदशाह इस मुसीबत की ओर से आँख नहीं मूंद सकता था। इसलिए उसे सेना लेकर मंगोलों से युद्ध करने के लिए जाना पड़ा। इस सेना ने मंगोलों को भारत से मार भगाया।

To purchase this book, please click on photo.

इस विजय के बाद मसूदशाह के आत्मविश्वास में अचानक ही बहुत वृद्धि हो गई। उसके स्वभाव में भी बड़ा परिवर्तन आ गया। अब वह विजयी, विलासी तथा क्रूर हो गया। उसने षड़यंत्रकारी अमीरों की हत्या करानी आरम्भ कर दी। इससे अमीरों तथा मल्लिकों में बड़ा असंतोष फैला और उन्होंने सुल्तान के चाचा नासिरुद्दीन को सुल्तान बनने के लिये आमन्त्रित किया। नासिरुद्दीन चूंकि इल्तुतमिश का पुत्र था, इसलिए वह सल्तनत पर अपना अधिकार अपने भतीजे अल्लाउद्दीन मसूदशाह की अपेक्षा अधिक समझता था। इसलिए नासिरुद्दीन ने अमीरों का निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। वह बहराइच से दिल्ली आया तथा औरत का वेश धरकर चोरी से दिल्ली में प्रविष्ट हुआ। कृतघ्न नासिरुद्दीन ने 10 जून 1246 को अपने भतीजे मसूदशाह की हत्या कर दी। सुल्तान की हत्या करते समय नासिरुद्दीन ने मसूदशाह द्वारा अपने ऊपर किए गए उपकारों का भी ध्यान नहीं रखा। मसूदशाह ने ही अमीरों के विरोध के बावजूद नासिरुद्दीन को जेल से निकालकर बहराइच का गवर्नर बनाया था। यदि मसूदशाह चाहता तो सुल्तान बनते ही नासिरुद्दीन की हत्या करके अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकता था किंतु मसूदशाह ने नासिरुद्दीन को अपने परिवार का सदस्य जानकर उसके प्राण नहीं लिए थे अपितु उसे मुक्त करके बहराइच की जागीर प्रदान की थी।

इल्तुतमिश के बेटों ने अपने उपकार का बदला कृतघ्नता से ही देना सीखा था। स्वयं इल्तुतमिश भी इस बात को अच्छी तरह जानता था, इसलिए तो इल्तुतमिश ने अपने बहुत सारे बेटों में से किसी को भी सुल्तान न बनाकर अपनी बेटी रजिया को अपनी उत्तराधिकारी नियुक्त किया था किंतु रजिया को मारकर इल्तुतमिश के पुत्र बारी-बारी से सुल्तान के तख्त की ओर उसी प्रकार खिंचे चले आ रहे थे जिस प्रकार पतंगे चिराग की रौशनी की तरफ आकर्षित होकर आते हैं और उसी की लौ में जलकर भस्म हो जाते हैं।

नए सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद का जन्म ई.1228 में हुआ था। वह इल्तुतमिश का पुत्र था। उसका बचपन कारागार में व्यतीत हुआ था। दिल्ली की जनता जानती थी कि नासिरुद्दीन महमूद ने अपने भतीजे एवं पूर्ववर्ती सुल्तान मसूदशाह की धोखे से हत्या करके दिल्ली का तख्त हथियाया है फिर भी जनवरी 1247 में प्रजा ने भी उसे सार्वजनिक दरबार में अपना सुल्तान स्वीकार कर लिया।

मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने नासिरुद्दीन के चरित्र की मुक्त-कण्ठ से प्रशंसा की है। उनके अनुसार नासिरुद्दीन बड़ा ही उदार तथा सरल स्वभाव का सुल्तान था। वह अत्यन्त सादा जीवन व्यतीत करता था और कुरान की आयतें लिखकर अपनी जीविका चलाता था। उसके एक ही बेगम थी और कोई दासी नहीं थी।

मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकार नासिरुद्दीन की कितनी भी प्रशंसा क्यों न करें किंतु यह बात सत्य प्रतीत नहीं होती कि वह एक अच्छा इंसान था। उसने तो औरतों का बुरका पहनकर छल से दिल्ली में प्रवेश किया था तथा अपने ऊपर उपकार करने वाले अपने ही भतीजे की हत्या की थी। ऐसा आदमी अच्छा कैसे हो सकता है!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इल्बरी कबीले का गुलाम था बलबन (68)

0
इल्बरी कबीले का गुलाम - www.bharatkaitihas.com
इल्बरी कबीले का गुलाम था बलबन

सुल्तान नासिरुद्दीन ने बलबन को अपना प्रधानमंत्री बना लिया। वह इल्बरी कबीले का तुर्क गुलाम था। बलबन में अपने समय के समस्त तुर्की अमीरों की अपेक्षा साहस, शक्ति एवं योग्यता की मात्रा बहुत अधिक थी।

दिल्ली का सुल्तान बनने के बाद नासिरुद्दीन को भी अपने पूर्ववर्ती सुल्तानों की तरह अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद से ही सल्तनत में तुर्की अमीरों का प्रभाव बहुत बढ़ गया था जो तुर्कान ए चिहालगानी अर्थात् चालीसा मण्डल के सदस्य थे।

ये अमीर अपने व्यक्तिगत स्वार्थों एवं पारस्परिक ईर्ष्या से ग्रस्त रहने के कारण कई गुटों में विभक्त हो गए थे। प्रत्येक गुट दरबार में अपना प्राबल्य स्थापित करके सल्तनत के महत्त्वपूर्ण पदों पर अपने गुट के अमीरों को नियुक्त करवाना चाहता था। इन्हीं अमीरों तथा सरदारों के षड्यन्त्रों एवं कुचक्रों के कारण एक के बाद एक करके सुल्तान मारे जा रहे थे।

अतः नासिरुद्दीन के लिये यह आवश्यक था कि वह तुर्कान ए चिहालगानी के सदस्यों पर कड़ा नियन्त्रण रखे और उनमें सुल्तान के प्रति स्वामिभक्ति एवं भय उत्पन्न करे, अन्यथा सुल्तान का अपना जीवन भी संकट में था। नासिरुद्दीन ने सुल्तान बनने के बाद पुराने अमीरों को तो उनके पद पर बने रहने दिया किंतु नये अमीरों की नियुक्ति नहीं की। तीन वर्ष तक वह अमीरों के कार्यों का निरीक्षण करता रहा। चूंकि वह नए अमीरों की नियुक्ति नहीं कर रहा था और पुराने अमीर मरते जा रहे थे, इसलिए नासिरुद्दीन थोड़ी-बहुत राहत की सांस ले सकता था।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

नासिरुद्दीन के सौभाग्य से उसे एक योग्य एवं बुद्धिमान तुर्क मिल गया जो इल्बरी कबीले का गुलाम था। इस गुलाम का नाम बलबन था। वह भी नासिरुद्दीन के पिता इल्तुतमिश की भांति इल्बरी कबीले का तुर्क था और वह भी बचपन में बदमाशों द्वारा पकड़ कर गुलामों के व्यापारियों के हाथों बेच दिया गया था और वह भी बिकता हुआ भारत आ पहुंचा था क्योंकि उन दिनों भारत में ही तुर्की गुलाम अच्छी कीमत पर बिक रहे थे। पहले उसे एक ख्वाजा ने खरीदा और बाद में स्वयं सुल्तान इल्तुतमिश ने खरीद लिया।

बलबन ने अपने मालिक सुल्तान इल्तुतमिश की जी-जान से सेवा की थी इसलिए इल्तुतमिश ने बलबन को चालीसा मण्डल का सदस्य बनाया था। बलबन ने सुल्तान नासिरुद्दीन के प्रति भी निष्ठा का प्रदर्शन किया था। इसलिए नासिरुद्दीन ने बलबन को अपना नायब अर्थात् प्रधानमंत्री बना दिया तथा कुछ दिनों बाद उसे अमीरों के कामकाज पर दृष्टि रखने के लिए चालीसा मण्डल का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

बलबन की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर बहुत से अमीर उससे ईर्ष्या करने लगे। इन लोगों ने बलबन के विरुद्ध सुल्तान के कान भरने आरम्भ किये। जब सुल्तान को बलबन के विरुद्ध शिकायतें मिलने लगीं तो सुल्तान ने बलबन को राजधानी दिल्ली से निष्कासित कर दिया। बलबन ने सुल्तान की आज्ञा को शिरोधार्य कर लिया तथा वह दिल्ली से बाहर चला गया।

To purchase this book, please click on photo.

सुल्तान द्वारा बलबन के स्थान पर जो नया नायब अर्थात् प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया वह अयोग्य निकला तथा शासन के कार्यों में सुल्तान का हाथ नहीं बंटा सका। जब बलबन की अनुपस्थिति में सल्तनत का काम बिगड़ने लगा तो कुछ दिनों बाद सुल्तान ने बलबन को पुनः उसके पद पर बहाल करके उसे फिर से दिल्ली बुला लिया। इससे बलबन के विरोधियों को बड़ी निराशा हुई और वे फिर से बलबन के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे। इन विद्रोहियों में रहैन, कुतुलुग खाँ, किशलू खाँ तथा जलालुद्दीन आदि अमीर प्रमुख थे। सुल्तान नासिरुद्दीन ने बलबन की सहायता से इन समस्त विद्रोहियों का दमन कर दिया। पाठकों को स्मरण होगा कि पूर्ववर्ती सुल्तान अल्लाउद्दीन मसूदशाह ने अपने एक चाचा जलालुद्दीन को कन्नौज का गवर्नर नियुक्त किया था। जब नासिरुद्दीन सुल्तान बना तो उसने जलालुद्दीन को सम्भल तथा बदायूँ का गवर्नर बना दिया। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि जलालुद्दीन, बलबन की बढ़ती हुई शक्ति से सशंकित होकर बदायूँ से मुल्तान की ओर भाग गया और मंगोलों से जा मिला तथा दिल्ली की गद्दी पाने की चेष्टा करने लगा। जलालुद्दीन नहीं जानता था कि वह भारत से भाग सकता था किंतु अपनी किस्मत से दूर नहीं भाग सकता था।

उसकी किस्मत में लिखा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब जलालुद्दीन को इसी बलबन के अधीन सामंत बनकर रहना पड़ेगा! प्रकृति ने इल्तुतमिश के बेटों के भाग्य में ऐसी ही कयामत लिखी थी।

कुछ समय तक जलालुद्दीन मंगोलों के पास रहा किंतु ई.1255 में पुनः भारत लौट आया और अपने भाई नासिरुद्दीन के समक्ष उपस्थित हुआ। सुल्तान नासिरुद्दीन ने जलालुद्दीन को लाहौर का शासक बनाकर अपनी उदारता का परिचय दिया। इस घटना के बाद जलालुद्दीन ने कभी भी अपने भाई के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया।

पाठकों को स्मरण होगा कि इल्तुतमिश के एक जंवाई का नाम इज्जूद्दीन किशलू खाँ था। जब इल्तुतमिश के पुत्र बहरामशाह की हत्या हुई थी तब किशलू खाँ ने स्वयं को सुल्तान घोषित किया था किंतु अमीरों ने उसे सुल्तान स्वीकार नहीं किया था।

जब नासिरुद्दीन सुल्तान बना तो उसने अपने बहनोई किशलू खाँ को नागौर का गवर्नर नियुक्त किया। उस समय तो किशलू खाँ चुपचाप नागौर चला गया किंतु कुछ समय बाद किशलू खाँ ने बागी होकर मुल्तान तथा उच्च पर अधिकार कर लिया। इस पर सुल्तान नासिरुद्दीन स्वयं सेना लेकर वहाँ गया और उसने किशलू खाँ का बुरी तरह से दमन किया।

12 नवम्बर 1246 को सुल्तान नासिरुद्दीन ने पंजाब पर अपनी सत्ता की पुर्नस्थापना करने के उद्देश्य से बलबन के साथ पंजाब की ओर प्रस्थान किया। मार्च 1247 में उसने रावी नदी को पार किया। इसके बाद उसने बलबन को नमक की पहाड़ियों में भेज दिया जहाँ बलबन ने खोखरों तथा कबाइलियों से दण्ड वसूल किया।

इसके बाद सुल्तान नासिरुद्दीन सिन्ध के किनारे पहुँचा जहाँ उसने नमक की पहाड़ी के राजा जयपाल को परास्त किया। 9 नवम्बर 1247 को सुल्तान नासिरुद्दीन, बलबन के साथ दिल्ली लौट आया। इल्बरी कबीले का गुलाम बलबन अब नया इतिहास लिखने को तैयार था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नासिरुद्दीन ने हिन्दू राजाओं दमन किया (69)

0
नासिरुद्दीन - www.bharatkaitihas.com
नासिरुद्दीन ने हिन्दू राजाओं दमन किया

नासिरुद्दीन ने अपने गुलाम बलबन की सहायता से चालीसा मण्डल पर नियंत्रण कस लिया तथा अपनी सल्तनत को मजबूती से जमा लिया किंतु सुल्तान तथा सल्तनत दोनों के संकटों का कोई अंत नहीं था। जब तक तुर्की अमीर जीवित थे, जब तक मंगोल जीवित थे और जब तक हिन्दू सरदार जीवित थे, दिल्ली सल्तनत शांति की सांस नहीं ले सकती थी। यह एक अलग बात है कि भारत में अशांति का सबसे बड़ा कारण तो दिल्ली सल्तनत स्वयं थी!

सुल्तान नासिरुद्दीन की समस्याएँ अपने पूर्ववर्ती सुल्तानों की ही तरह अत्यन्त विकराल थीं जिनके कारण सुल्तान के मारे जाने तथा सल्तनत के नष्ट हो जाने का पूरा भय था परन्तु नासिरुद्दीन में उन समस्याओं को सुलझाने की क्षमता अपने पूर्ववर्ती सुल्तानों की अपेक्षा अधिक थी। इसलिए सुल्तान ने अपने शत्रुओं से लड़ने का कार्य दृढ़़तापूर्वक सम्पन्न किया।

जिस प्रकार याकूत हब्शी ने रजिया की छाया बनकर उसके प्राणों तथा उसके राज्य की रक्षा करने के प्रयास किए थे, उसी प्रकार बलबन ने भी नासिरुद्दीन की छाया बनकर उसके प्राणों एवं उसके राज्य की रक्षा की। ई.1249 में बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद से कर दिया। इससे सुल्तान नासिरुद्दीन तथा तथा प्रधानमंत्री बलबन के बीच विश्वास का रिश्ता और भी गहरा हो गया।

इन दिनों दिल्ली सल्तनत के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश पर मंगोलों के आक्रमण बढ़ गए थे। सल्तनत की रक्षा के लिए इन आक्रमणों का रोकना नितान्त आवश्यक था। जब सुल्तान नासिरुद्दीन ने सल्तनत पर मजबूती से अधिकार कर लिया तब अनेक तुर्क सरदार सुल्तान नासिरुद्दीन का दरबार छोड़कर मंगोलों की शरण में चले गए जिससे सुल्तान की चिन्ता बढ़ती ही चली गई।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

मंगोलों ने भारतीय सीमा के निकट अपने राज्य को अत्यन्त सुदृढ़़ बना लिया था। अतः अब मंगोलों का ध्यान दिल्ली सल्तनत की ओर अधिक आकृष्ट होने लगा था। ई.1246-47 में नासिरुद्दीन ने खोखरों के विद्रोह को शान्त करने के लिए बलबन को पंजाब भेजा। इन दिनों एक मंगोल सेना सिन्ध के पार पड़ी हुई थी।

जब मंगोलों ने सुना कि बलबन एक विशाल सेना लेकर पंजाब की ओर आ रहा है तो मंगोलों की सेना भयभीत होकर खुरासान की तरफ चली गई। इस काल में मंगोलों को दिल्ली के सुल्तान से उतना भय नहीं लगता था, जितना भय उसके गुलाम बलबन के नाम से लगता था!

नासिरुद्दीन के सम्पूर्ण शासन काल में बंगाल की राजधानी लखनौती में गड़बड़ी व्याप्त रही। उसके बीस वर्षीय शासन में लखनौती में एक के बाद एक करके सात-आठ गर्वनर हुए। ये गवर्नर दिल्ली से दूर होने के कारण बंगाल में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करना चाहते थे। इस कारण हर बार दिल्ली से सेना भेजकर विद्रोही गवर्नरों को मरवाना पड़ता था।

To purchase this book, please click on photo.

इस प्रकार लखनौती में दिल्ली का प्रभुत्व कुछ ही समय रह पाता था और अगला गवर्नर विद्रोह कर देता था। बंगाल पर हिन्दुओं का भी निरन्तर आक्रमण होता रहता था। सुल्तान नासिरुद्दीन दिल्ली के तुर्की सरदारों, पंजाब के खोखरों तथा मंगोलों की समस्याओं में उलझे रहने से बंगाल में स्थायी शासन स्थापित नहीं कर सका। जैसे ही केन्द्रीय शक्ति क्षीण होती दिखाई देती थी, राजपूत शासक विद्रोह का झण्डा खड़ा करके दिल्ली की सल्तनत को कर देना बन्द कर देते थे। इस काल में विद्रोही राजपूतों की शक्ति इतनी प्रबल हो गई थी कि वे प्रायः राजधानी दिल्ली में प्रवेश करके लूट-मार किया करते थे। सल्तनत की सुरक्षा के लिए राजपूतों को दबाना आवश्यक था। नासिरुद्दीन ने हिन्दुओं के विद्रोहों का भी धैर्यपूर्वक सामना किया। इन्हीं दिनों बुन्देलखण्ड तथा बघेलखण्ड पर चन्देल राजपूतों ने अधिकार कर लिया। ई.1248 में बलबन ने चंदेलों का दमन करके बुन्देलखण्ड पर अधिकार कर लिया। इस काल में बघेला राजपूतों तथा अवध के मुस्लिम गवर्नरों के बीच भी लम्बे समय तक लड़ाई चलती रही फिर भी बघेलों को दबाया नहीं जा सका। मालवा के राजपूतों ने भी अपनी शक्ति में वृद्धि कर ली। ई.1251-52 में बलबन ने मालवा पर आक्रमण कर दिया और लूट का माल लेकर दिल्ली लौट आया। मालवा पूर्ववत् स्वतन्त्र बना रहा।

राजपूताना के चौहान तथा अन्य राजा भी अपनी शक्ति बढ़ाते रहे। सुल्तान के आदेश से बलबन ने कई बार रणथम्भौर पर आक्रमण किया और बूँदी तथा चितौड़ तक धावा मारा परन्तु इन आक्रमणों से कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ा और राजपूत राजा पूर्ववत् स्वतन्त्र बने रहे। सुल्तान नासिरुद्दीन को मेवातियों के उपद्रवों का भी सामना करना पड़ा।

सुल्तान के आदेश से बलबन ने कई बार मेवातियों पर आक्रमण किए। बलबन ने उनके गांवों तथा नगरों को भस्म करवा दिया और उन जंगलों को कटवा दिया जिनमें मेवाती लोग भाग कर शरण लेते थे परन्तु मेवातियों का प्रकोप कम नहीं हुआ। दो-आब तथा कटेहर में भी विद्रोह फैल गया। यद्यपि बलबन ने इन विद्रोहों की बड़ी क्रूरता से दमन किया परन्तु वह स्थायी शांति स्थापित नहीं कर सका और हिन्दू राजाओं एवं सरदारों के विद्रोह अनवरत जारी रहे।

बलबन की सेवाएं मिल जाने से सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ने बीस वर्ष तक दिल्ली पर शासन किया परन्तुु इस अवधि में वास्तविक सत्ता किसके हाथ में रही, इस बात पर इतिहासकारों में मतभेद है। अधिकांश इतिहासकार उसके प्रधानमंत्री बलबन को ही वास्तविक शासक मानते हैं।

इसामी के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद, तुर्क अमीरों की आज्ञा लिए बिना, कोई राय व्यक्त नहीं करता था और उनके आदेश के बिना हाथ-पैर तक नहीं हिलाता था। डॉ. निजामी के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद ने पूर्ण रूप से अमीरों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। चालीसा मण्डल का प्रधान बलबन, सुल्तान को कठपुतली बनाकर उसके समस्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए शासन करता रहा।

डॉ. अवध बिहारी पाण्डेय इस मत को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार ई.1255 तक नासिरुद्दीन महमूद शासनतंत्र पर प्रभावी रहा। सुल्तान बनने के बाद उसने पुराने अमीरों को उनके पदों पर बने रहने दिया तथा नये अमीरों की नियुक्ति नहीं की। तीन वर्ष तक वह अपने अमीरों के कार्यों का निरीक्षण करता रहा।

बाद में बलबन को चालीसा मण्डल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया किंतु जब बलबन के विरुद्ध शिकायतें मिलीं तो उसने बलबन को प्रधानमंत्री के पद से हटाकर दिल्ली से बाहर भेज दिया। जब नया प्रधानमंत्री अयोग्य निकला तो सुल्तान ने बलबन को पुनः उसके पद पर बहाल कर दिया। इन घटनाओं से सिद्ध होता है कि नासिरुद्दीन कठपुतली शासक नहीं था। फिर भी यह सत्य है कि वास्तविक सत्ता बलबन के हाथों में रही।

ई.1265 में नासिरुद्दीन बीमार पड़ा और 18 फरवरी 1266 को उसकी मृत्यु हो गई। कुछ लोगों की मान्यता है कि बलबन ने उसे विष दिलवा दिया था परन्तु यह कल्पना निराधार प्रतीत होती है। नासिरुद्दीन के कोई औलाद नहीं थी। इस कारण नासिरुद्दीन ने अपने जीवन काल में ही बलबन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। अतः सुल्तान की मृत्यु के उपरांत बलबन दिल्ली के तख्त पर बैठा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गयासुद्दीन बलबन दिल्ली का सुल्तान बन गया (70)

0
गयासुद्दीन बलबन - www.bharatkaitihas.com
गयासुद्दीन बलबन दिल्ली का सुल्तान बन गया

बीस वर्ष तक दिल्ली सल्तनत पर शासन करने के बाद सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ई.1266 में मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसने अपनी मृत्यु से पहले ही अपने तुर्की गुलाम गयासुद्दीन बलबन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया जो कि सुल्तान का श्वसुर भी था। दिल्ली सल्तनत के इतिहास में आगे बढ़ने से पहले हमें दिल्ली के नए सुल्तान गयासुद्दीन बलबन की पिछली जिंदगी में झांकना होगा।

गयासुद्दीन बलबन का जन्म इल्तुतमिश की भांति तुर्कों के इल्बरी कबीले में हुआ था। बलबन के बचपन का नाम बहाउद्दीन था। बलबन का पिता दस हजार कुटुम्बों का खान था। जब बलबन किशोर अवस्था में था, उसे मंगोलों ने पकड़ लिया तथा उसे ख्वाजा जमालुद्दीन बसरी नामक एक तुर्क के हाथों बेच दिया। ख्वाजा जमालुद्दीन बसरी, गयासुद्दीन बलबन की प्रतिभा से अत्यन्त प्रभावित हुआ और उसे शिक्षा दिलवाकर सुयोग्य तथा सभ्य व्यक्ति बना दिया। ख्वाजा उसे दिल्ली ले आया। ई.1232 में सुल्तान इल्तुतमिश ने बलबन को खरीद लिया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

इल्तुतमिश ने गयासुद्दीन बलबन की प्रतिभा से प्रभावित होकर उसे ‘खास सरदार’ बना दिया जिससे वह चालीस गुलामों के दल का सदस्य हो गया। सुल्तान रुकुनुद्दीन फीरोजशाह के काल में सुल्तान का विरोध करने के कारण बलबन को कारागार में डाल दिया गया परन्तु रजिया सुल्तान के काल में गयासुद्दीन बलबन फिर से अपने पुराने पद पर बहाल हो गया।

To purchase this book, please click on photo.

थोड़े ही दिन बाद रजिया ने गयासुद्दीन बलबन को ‘अमीरे शिकार’ बना दिया। यदि बलबन ने निष्ठापूर्वक रजिया सुल्तान की सेवा की होती तो इस बात की प्रबल संभावना थी कि अबीनीसियाई हब्शी गुलाम याकूत के स्थान पर बलबन को ही अमीरे आखूर नियुक्त किया जाता तथा बलबन ने रजिया सुल्तान का विश्वास जीत लिया होता किंतु बलबन भी अन्य तुर्की अमीरों की तरह इस बात में विश्वास करता था कि एक औरत को सुल्तान नहीं बनना चाहिए। इसलिए बलबन ने रजिया को पदच्युत करने में विद्रोहियों का साथ दिया था। जब रजिया का भाई अल्लाउद्दीन मसूदशाह दिल्ली का सुल्तान हुआ तो उसने बलबन को ‘अमीरे आखूर’ के पद पर नियुक्त किया और उसे हांसी तथा रेवाड़ी की जागीरें भी प्रदान कर दीं। ई.1245 में मंगोलों ने सिंध क्षेत्र पर आक्रमण किया। इस पर सुल्तान मसूदशाह ने बलबन को एक विशाल सेना देकर मंगोलों के विरुद्ध सैनिक अभियान पर भेजा। बलबन ने मंगोलों को न केवल सिंध से बाहर कर दिया अपितु मंगोलों की भागती हुई सेना का पीछा करके बड़ी क्रूरता से उनका संहार किया। इस कारण मंगोल बलबन के नाम से ही कांपने लगे। इससे प्रसन्न होकर सुल्तान मसूदशाह ने बलबन को ‘अमीरे हाजिब’ के पद पर नियुक्त कर दिया।

ई.1246 में गयासुद्दीन बलबन ने मसूदशाह के स्थान पर उसके चाचा नासिरुद्दीन को सुल्तान बनाने के अभियान में प्रमुखता से भाग लिया। जब नासिरुद्दीन दिल्ली का सुल्तान बन गया तो नासिरुद्दीन ने बलबन को अपना प्रधान परामर्शदाता तथा ‘नायब-ए-मुमालिक’ अर्थात् सल्तनत का प्रधानमंत्री बनाया। एक गुलाम के लिए इतनी बड़ी सल्तनत के प्रधानमंत्री पद पर पहुँच जाना बड़ी उपलब्धि थी।

कहा जाता है कि जब नासिरुद्दीन ने गयासुद्दीन बलबन को प्रधानमंत्री बनाया तो उसने बलबन से कहा- ‘मैंने शासन तंत्र तुम्हारे हाथ में सौंप दिया है इसलिये कभी ऐसा काम मत करना जिससे तुम्हें और मुझे अल्लाह के सामने लज्जित होना पड़े।’

नासिरुद्दीन शांत स्वभाव का सुल्तान था इसलिये गयासुद्दीन बलबन सदैव उसके प्रति स्वामिभक्त रहा। ई.1249 में बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान नासिरुद्दीन के साथ कर दिया। इससे सल्तनत में बलबन का रुतबा बढ़ गया तथा वह सुल्तान का अत्यंत विश्वासपात्र बन गया।

ई.1249 में सुल्तान नासिरुद्दीन ने गयासुद्दीन बलबन को ‘उलूग खान’ की उपाधि दी। इस प्रकार वह ‘मलिक’ से ‘खान’ बन गया। सल्तनत के समस्त अमीरों अर्थात् चालीसा मण्डल का ‘प्रधान’ और सुल्तान का ‘नायब’ अर्थात् प्रधानमंत्री तो वह था ही। इस प्रकार नासिरुद्दीन की धार्मिकता तथा उदारता के कारण बलबन को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने और आगे बढ़ने का पूर्ण अवसर प्राप्त हुआ। बलबन ने अपने समस्त दायित्वों एवं कर्त्तव्यों को बड़ी योग्यता के साथ पूरा किया।

गयासुद्दीन बलबन की बढ़ती हुई शक्ति के कारण बहुत से अमीर उससे ईर्ष्या करने लगे। प्रतिभावान लोग प्रायः निरंकुश तथा मनमौजी हुआ करते हैं। बलबन के काम करने का तरीका भी मनमौजी था। यहाँ तक कि कई बार सुल्तान नासिरुद्दीन भी उसके कामों से असंतुष्ट हो जाता था। ई.1252-53 में जब बलबन दिल्ली से बाहर था तब कुछ अमीरों ने सुल्तान के कान भरकर बलबन को अपदस्थ करवा दिया। सुल्तान के आदेश से बलबन हांसी की जागीर पर चला गया।

गयासुद्दीन बलबन के साथ ही सुल्तान नासिरुद्दीन ने बहुत से पुराने अमीरों को उनके पदों से हटा दिया। काजी मिनहाज उस् सिराज को भी उसके पद से हटा दिया गया। शीघ्र ही बलबन को पदच्युत करने के दुष्परिणाम सामने आने लगे और सल्तनत का काम बिगड़ने लगा। अतः विवश होकर ई.1254 में सुल्तान ने बलबन को फिर से दिल्ली बुला लिया।

अब गयासुद्दीन बलबन राज्य का सर्वेसर्वा हो गया और सुल्तान की मृत्यु तक राज्य का वास्तविक शासक बना रहा। वास्तव में इल्तुतमिश के बाद सुल्तान नासिरुद्दीन ही इतनी दीर्घ अवधि तक शासन कर सका था। इसका सम्पूर्ण श्रेय बलबन को जाता है। प्रधानमंत्री के रूप में बलबन ने इस्लाम के प्रसार के लिये कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने दिया।

18 फरवरी 1266 को सुल्तान नासिरुद्दीन की मृत्यु हो गई। उसके कोई पुत्र नहीं था। इसलिये उसने अपने जीवन काल में अपने श्वसुर गयासुद्दीन बलबन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। सुल्तान की मृत्यु के बाद बलबन बिना किसी विरोध के दिल्ली का सुल्तान हो गया। इब्नबतूता तथा इसामी आदि परवर्ती लेखकों ने उसे राज्य हड़पने वाला बताया है किंतु आधुनिक इतिहासकारों ने इस धारणा को निराधार बताया है।

ई.1266 में सुल्तान नासिरुद्दीन की मृत्यु के बाद बलबन दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बन गया। इसी कारण बलबन के लिए कहा जाता है कि- ‘वह गुलाम से बना मलिक, मलिक से बना खान और और खान से बन गया सुल्तान।’

गयासुद्दीन बलबन ने भारत में एक नवीन राजवंश की स्थापना की जिसे इतिहासकारों ने बलबनी वंश तथा द्वितीय इल्बरी वंश कहा है। गियासुद्दीन बलबन ने सुल्तान बनने के बाद ‘जिल्ले इलाही’ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है- ‘अल्लाह का प्रतिबिंब।’

कुछ समय बाद गयासुद्दीन बलबन ने ‘नियामत-ए-खुदाई’ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है- ‘खुदा का वैभव।’ अर्थात् बलबन स्वयं को इस धरती पर अल्लाह के प्रतिबिम्ब एवं खुदा के वैभव के रूप में देखता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बलबन को पैगम्बर मान लिया मुस्लिम इतिहासकारों ने (71)

0
बलबन - www.bharatkaitihas.com
बलबन को पैगम्बर मान लिया मुस्लिम इतिहासकारों ने

बलबन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उस काल के मुस्लिम इतिहासकार बलबन को पैगम्बर मानते थे जिसे अल्लाह ने भारत में इस्लाम के प्रसार हेतु भेजा था। अतः स्वाभाविक ही था कि बलबन विद्रोही हिन्दू राजाओं का कठोरता से दमन करता।

दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बनकर गियासुद्दीन बलबन ने ‘जिल्ले इलाही’ तथा ‘नियामत ए खुदाई’ जैसी भारी भरकम उपाधियां धारण कीं और बड़ी शानो-शौकत के साथ दिल्ली पर राज करने लगा। उससे पहले किसी भी सुल्तान ने ऐसे ऐश्वर्य का प्रदर्शन नहीं किया था।

बलबन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उस काल के मुस्लिम इतिहासकार बलबन को पैगम्बर मानते थे जिसे अल्लाह ने भारत में इस्लाम के प्रसार हेतु भेजा था। अतः स्वाभाविक ही था कि बलबन विद्रोही हिन्दू राजाओं का कठोरता से दमन करता।

बलबन ने रणथंभौर, ग्वालियर तथा चंदेरी के राजाओं का दमन करके उन्हें फिर से दिल्ली के अधीन बनाया। दो-आब के हिन्दू विद्रोहियों का भी दृढ़़ता से दमन किया। उस काल के इतिहासकारों ने लिखा है कि बलबन ने दो-आब के अधिकतर हिन्दू-पुरुषों का वध कर दिया तथा उनकी स्त्रियों और बच्चों को पकड़कर गुलाम बना लिया।

यद्यपि भारत में तुर्की साम्राज्य को स्थापित हुए लगभग 60 वर्ष हो चुके थे तथापि चारों दिशाओं से दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण होते रहे थे। इस कारण सल्तनत में तुर्की संस्थाएं गठित नहीं हो पाई थीं। केन्द्रीय तथा प्रांतीय सरकारों के संगठन में कोई उन्नति नहीं की गई थी और न विजेता तथा विजित में सम्पर्क बनाने का प्रयत्न किया गया था।

विजेता अब भी विदेशी समझे जाते थे। भारत की जनता उन्हें घृणा से देखती थी और उनका आधिपत्य स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। जनसाधारण की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। सल्तनत के अमीरों की निष्ठा संदिग्ध रहती थी और वे षड़यंत्र तथा कुचक्र रचने में संलग्न रहते थे।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

चालीस गुलामों का मण्डल षड़यंत्रकारी एवं विघटनकारी शक्तियों का नेतृत्व करते थे। वे बलबन के सुल्तान बन जाने से असंतुष्ट थे। इसलिए उनका दमन करना आवश्यक था। बलबन ने न केवल अन्य तुर्की अमीरों का अपितु शम्सी अमीरों का भी दमन किया जो स्वयं को दूसरों से अधिक अभिजात्य मानते थे। बलबन ने कई अमीरों से उनकी जागीरें छीन लीं।

जब बलबन की कार्यवाहियां आगे भी जारी रहीं तो दिल्ली के कोतवाल फखरुद्दीन ने बलबन के समक्ष उपस्थित होकर उससे अनुरोध किया कि वह अमीरों के विरुद्ध और अधिक कठोर कार्यवाही नहीं करे। इस पर बलबन ने अमीरों तथा सूबेदारों का पीछा छोड़ा।

खोखरों का दमन तो बलबन उसी समय कर चुका था, जब वह नासिरुद्दीन का प्रधानमंत्री था। उस काल में खोखरों एवं मंगोलों का एक गठजोड़ बन गया था। बलबन ने न केवल उस गठजोड़ को बिखेर दिया था अपितु भारत पर आक्रमण करने वाले मंगोलों का बड़ी क्रूरता से दमन किया था।

To purchase this book, please click on photo.

इस समय तक मंगोल गजनी तथा ट्रांसऑक्सियाना पर अधिकार कर चुके थे तथा बगदाद के खलीफा को मौत के घाट उतार चुके थे। मंगोल सेनाएं भारत के सिंध और पंजाब प्रांतों पर बार-बार आक्रमण करके निरंतर लूटमार मचा रहे थे। उनके आक्रमणों को रोकने के लिये बलबन ने पश्चिमोत्तर सीमा के लिये अलग सेना का गठन किया तथा उस सेना को स्थाई रूप से पश्चिमोत्तर सीमा पर तैनात कर दिया। बलबन ने वहाँ कई दुर्ग भी बनवाये जिनमें सेना को रखा जा सके। जब बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ ने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद करके अवध पर आक्रमण किया तो जाजनगर के हिन्दू राजा ने तुगरिल खाँ का सामना किया तथा तुगरिल खाँ को परास्त कर दिया। इस पर तुगरिल खाँ ने बलबन से सहायता मांगी। इस पर बलबन को बंगाल में कार्यवाही करने का अवसर मिल गया। बलबन ने तुगरिल खाँ पर आक्रमण करके उससे युद्ध का हरजाना मांगा। इस पर तुगरिल खाँ ने अवध की जागीर बलबन को दे दी तथा स्वयं दिल्ली के अधीन हो गया। सल्तनत के विभिन्न भागों में विद्रोह होते रहने के कारण राजकोष का बहुत बड़ा अंश सेना के रख-रखाव पर व्यय करना पड़ता था। मंगोलों के आक्रमणों को रोकने तथा विद्रोहियों का दमन करने में काफी धन व्यय करना पड़ता था।

अनेक सरदार समय-समय पर कर देना बन्द करके उपद्रव करने लगते थे। इसका राज्य की आय पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता था। राज्य की आर्थिक दशा को सुधारे बिना अन्य समस्याओं को सुलझना असम्भव था।

बलबन ऐसे समय में तख्त पर बैठा था जब तुर्कों की सत्ता स्थायी रूप से भारत में स्थापित हो गई थी। अब राजनीतिक व्यवस्था एक निश्चित स्वरूप प्राप्त कर रही थी और उसका कार्य उसे निश्चित स्वरूप देने और उसे स्थायी बनाने का था।

दिल्ली सल्तनत में अब तक राजत्व के आदर्शों तथा उनके क्रियात्मक रूप में विभेद नहीं हो सका था। इल्तुतमिश के निर्बल उत्तराधिकारी जिनको सदैव अपनी जान के लाले पड़े रहते थे, इस कार्य को नहीं कर सके। न तो उन्हें इसका कोई अनुभव था और न उनमें इस कार्य को करने की योग्यता थी।

बलबन अनुभवी, दूरदर्शी, विचारशील तथा दृढ़़-संकल्प का व्यक्ति था। अतः उसमें राजत्व के आदर्शों तथा उनके क्रियात्मक रूप में विभेद करने की क्षमता थी किंतु इन्हें लागू करने के लिये धैर्य, लगन, समय एवं योग्य कर्मचारियों की आवश्यकता थी।

इससे स्पष्ट है कि बलबन के लिये दिल्ली का ताज काँटों से भरा हुआ था परन्तु वह लम्बे समय से दिल्ली सल्तनत में विभिन्न प्रशासकीय कार्य कर चुका था तथा विगत 20 वर्षों से वह राज्य के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य कर रहा था इसलिये उसे इन समस्याओं से निबटने में विशेष कठिनाई नहीं होने वाली थी। उसने अपने शासन को मजबूत करने के लिये कई कदम उठाए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...