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नासिरुद्दीन ने हिन्दू राजाओं दमन किया (69)

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नासिरुद्दीन ने हिन्दू राजाओं दमन किया

नासिरुद्दीन ने अपने गुलाम बलबन की सहायता से चालीसा मण्डल पर नियंत्रण कस लिया तथा अपनी सल्तनत को मजबूती से जमा लिया किंतु सुल्तान तथा सल्तनत दोनों के संकटों का कोई अंत नहीं था। जब तक तुर्की अमीर जीवित थे, जब तक मंगोल जीवित थे और जब तक हिन्दू सरदार जीवित थे, दिल्ली सल्तनत शांति की सांस नहीं ले सकती थी। यह एक अलग बात है कि भारत में अशांति का सबसे बड़ा कारण तो दिल्ली सल्तनत स्वयं थी!

सुल्तान नासिरुद्दीन की समस्याएँ अपने पूर्ववर्ती सुल्तानों की ही तरह अत्यन्त विकराल थीं जिनके कारण सुल्तान के मारे जाने तथा सल्तनत के नष्ट हो जाने का पूरा भय था परन्तु नासिरुद्दीन में उन समस्याओं को सुलझाने की क्षमता अपने पूर्ववर्ती सुल्तानों की अपेक्षा अधिक थी। इसलिए सुल्तान ने अपने शत्रुओं से लड़ने का कार्य दृढ़़तापूर्वक सम्पन्न किया।

जिस प्रकार याकूत हब्शी ने रजिया की छाया बनकर उसके प्राणों तथा उसके राज्य की रक्षा करने के प्रयास किए थे, उसी प्रकार बलबन ने भी नासिरुद्दीन की छाया बनकर उसके प्राणों एवं उसके राज्य की रक्षा की। ई.1249 में बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद से कर दिया। इससे सुल्तान नासिरुद्दीन तथा तथा प्रधानमंत्री बलबन के बीच विश्वास का रिश्ता और भी गहरा हो गया।

इन दिनों दिल्ली सल्तनत के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश पर मंगोलों के आक्रमण बढ़ गए थे। सल्तनत की रक्षा के लिए इन आक्रमणों का रोकना नितान्त आवश्यक था। जब सुल्तान नासिरुद्दीन ने सल्तनत पर मजबूती से अधिकार कर लिया तब अनेक तुर्क सरदार सुल्तान नासिरुद्दीन का दरबार छोड़कर मंगोलों की शरण में चले गए जिससे सुल्तान की चिन्ता बढ़ती ही चली गई।

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मंगोलों ने भारतीय सीमा के निकट अपने राज्य को अत्यन्त सुदृढ़़ बना लिया था। अतः अब मंगोलों का ध्यान दिल्ली सल्तनत की ओर अधिक आकृष्ट होने लगा था। ई.1246-47 में नासिरुद्दीन ने खोखरों के विद्रोह को शान्त करने के लिए बलबन को पंजाब भेजा। इन दिनों एक मंगोल सेना सिन्ध के पार पड़ी हुई थी।

जब मंगोलों ने सुना कि बलबन एक विशाल सेना लेकर पंजाब की ओर आ रहा है तो मंगोलों की सेना भयभीत होकर खुरासान की तरफ चली गई। इस काल में मंगोलों को दिल्ली के सुल्तान से उतना भय नहीं लगता था, जितना भय उसके गुलाम बलबन के नाम से लगता था!

नासिरुद्दीन के सम्पूर्ण शासन काल में बंगाल की राजधानी लखनौती में गड़बड़ी व्याप्त रही। उसके बीस वर्षीय शासन में लखनौती में एक के बाद एक करके सात-आठ गर्वनर हुए। ये गवर्नर दिल्ली से दूर होने के कारण बंगाल में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करना चाहते थे। इस कारण हर बार दिल्ली से सेना भेजकर विद्रोही गवर्नरों को मरवाना पड़ता था।

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इस प्रकार लखनौती में दिल्ली का प्रभुत्व कुछ ही समय रह पाता था और अगला गवर्नर विद्रोह कर देता था। बंगाल पर हिन्दुओं का भी निरन्तर आक्रमण होता रहता था। सुल्तान नासिरुद्दीन दिल्ली के तुर्की सरदारों, पंजाब के खोखरों तथा मंगोलों की समस्याओं में उलझे रहने से बंगाल में स्थायी शासन स्थापित नहीं कर सका। जैसे ही केन्द्रीय शक्ति क्षीण होती दिखाई देती थी, राजपूत शासक विद्रोह का झण्डा खड़ा करके दिल्ली की सल्तनत को कर देना बन्द कर देते थे। इस काल में विद्रोही राजपूतों की शक्ति इतनी प्रबल हो गई थी कि वे प्रायः राजधानी दिल्ली में प्रवेश करके लूट-मार किया करते थे। सल्तनत की सुरक्षा के लिए राजपूतों को दबाना आवश्यक था। नासिरुद्दीन ने हिन्दुओं के विद्रोहों का भी धैर्यपूर्वक सामना किया। इन्हीं दिनों बुन्देलखण्ड तथा बघेलखण्ड पर चन्देल राजपूतों ने अधिकार कर लिया। ई.1248 में बलबन ने चंदेलों का दमन करके बुन्देलखण्ड पर अधिकार कर लिया। इस काल में बघेला राजपूतों तथा अवध के मुस्लिम गवर्नरों के बीच भी लम्बे समय तक लड़ाई चलती रही फिर भी बघेलों को दबाया नहीं जा सका। मालवा के राजपूतों ने भी अपनी शक्ति में वृद्धि कर ली। ई.1251-52 में बलबन ने मालवा पर आक्रमण कर दिया और लूट का माल लेकर दिल्ली लौट आया। मालवा पूर्ववत् स्वतन्त्र बना रहा।

राजपूताना के चौहान तथा अन्य राजा भी अपनी शक्ति बढ़ाते रहे। सुल्तान के आदेश से बलबन ने कई बार रणथम्भौर पर आक्रमण किया और बूँदी तथा चितौड़ तक धावा मारा परन्तु इन आक्रमणों से कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ा और राजपूत राजा पूर्ववत् स्वतन्त्र बने रहे। सुल्तान नासिरुद्दीन को मेवातियों के उपद्रवों का भी सामना करना पड़ा।

सुल्तान के आदेश से बलबन ने कई बार मेवातियों पर आक्रमण किए। बलबन ने उनके गांवों तथा नगरों को भस्म करवा दिया और उन जंगलों को कटवा दिया जिनमें मेवाती लोग भाग कर शरण लेते थे परन्तु मेवातियों का प्रकोप कम नहीं हुआ। दो-आब तथा कटेहर में भी विद्रोह फैल गया। यद्यपि बलबन ने इन विद्रोहों की बड़ी क्रूरता से दमन किया परन्तु वह स्थायी शांति स्थापित नहीं कर सका और हिन्दू राजाओं एवं सरदारों के विद्रोह अनवरत जारी रहे।

बलबन की सेवाएं मिल जाने से सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ने बीस वर्ष तक दिल्ली पर शासन किया परन्तुु इस अवधि में वास्तविक सत्ता किसके हाथ में रही, इस बात पर इतिहासकारों में मतभेद है। अधिकांश इतिहासकार उसके प्रधानमंत्री बलबन को ही वास्तविक शासक मानते हैं।

इसामी के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद, तुर्क अमीरों की आज्ञा लिए बिना, कोई राय व्यक्त नहीं करता था और उनके आदेश के बिना हाथ-पैर तक नहीं हिलाता था। डॉ. निजामी के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद ने पूर्ण रूप से अमीरों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। चालीसा मण्डल का प्रधान बलबन, सुल्तान को कठपुतली बनाकर उसके समस्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए शासन करता रहा।

डॉ. अवध बिहारी पाण्डेय इस मत को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार ई.1255 तक नासिरुद्दीन महमूद शासनतंत्र पर प्रभावी रहा। सुल्तान बनने के बाद उसने पुराने अमीरों को उनके पदों पर बने रहने दिया तथा नये अमीरों की नियुक्ति नहीं की। तीन वर्ष तक वह अपने अमीरों के कार्यों का निरीक्षण करता रहा।

बाद में बलबन को चालीसा मण्डल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया किंतु जब बलबन के विरुद्ध शिकायतें मिलीं तो उसने बलबन को प्रधानमंत्री के पद से हटाकर दिल्ली से बाहर भेज दिया। जब नया प्रधानमंत्री अयोग्य निकला तो सुल्तान ने बलबन को पुनः उसके पद पर बहाल कर दिया। इन घटनाओं से सिद्ध होता है कि नासिरुद्दीन कठपुतली शासक नहीं था। फिर भी यह सत्य है कि वास्तविक सत्ता बलबन के हाथों में रही।

ई.1265 में नासिरुद्दीन बीमार पड़ा और 18 फरवरी 1266 को उसकी मृत्यु हो गई। कुछ लोगों की मान्यता है कि बलबन ने उसे विष दिलवा दिया था परन्तु यह कल्पना निराधार प्रतीत होती है। नासिरुद्दीन के कोई औलाद नहीं थी। इस कारण नासिरुद्दीन ने अपने जीवन काल में ही बलबन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। अतः सुल्तान की मृत्यु के उपरांत बलबन दिल्ली के तख्त पर बैठा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गयासुद्दीन बलबन दिल्ली का सुल्तान बन गया (70)

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गयासुद्दीन बलबन दिल्ली का सुल्तान बन गया

बीस वर्ष तक दिल्ली सल्तनत पर शासन करने के बाद सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ई.1266 में मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसने अपनी मृत्यु से पहले ही अपने तुर्की गुलाम गयासुद्दीन बलबन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया जो कि सुल्तान का श्वसुर भी था। दिल्ली सल्तनत के इतिहास में आगे बढ़ने से पहले हमें दिल्ली के नए सुल्तान गयासुद्दीन बलबन की पिछली जिंदगी में झांकना होगा।

गयासुद्दीन बलबन का जन्म इल्तुतमिश की भांति तुर्कों के इल्बरी कबीले में हुआ था। बलबन के बचपन का नाम बहाउद्दीन था। बलबन का पिता दस हजार कुटुम्बों का खान था। जब बलबन किशोर अवस्था में था, उसे मंगोलों ने पकड़ लिया तथा उसे ख्वाजा जमालुद्दीन बसरी नामक एक तुर्क के हाथों बेच दिया। ख्वाजा जमालुद्दीन बसरी, गयासुद्दीन बलबन की प्रतिभा से अत्यन्त प्रभावित हुआ और उसे शिक्षा दिलवाकर सुयोग्य तथा सभ्य व्यक्ति बना दिया। ख्वाजा उसे दिल्ली ले आया। ई.1232 में सुल्तान इल्तुतमिश ने बलबन को खरीद लिया।

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इल्तुतमिश ने गयासुद्दीन बलबन की प्रतिभा से प्रभावित होकर उसे ‘खास सरदार’ बना दिया जिससे वह चालीस गुलामों के दल का सदस्य हो गया। सुल्तान रुकुनुद्दीन फीरोजशाह के काल में सुल्तान का विरोध करने के कारण बलबन को कारागार में डाल दिया गया परन्तु रजिया सुल्तान के काल में गयासुद्दीन बलबन फिर से अपने पुराने पद पर बहाल हो गया।

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थोड़े ही दिन बाद रजिया ने गयासुद्दीन बलबन को ‘अमीरे शिकार’ बना दिया। यदि बलबन ने निष्ठापूर्वक रजिया सुल्तान की सेवा की होती तो इस बात की प्रबल संभावना थी कि अबीनीसियाई हब्शी गुलाम याकूत के स्थान पर बलबन को ही अमीरे आखूर नियुक्त किया जाता तथा बलबन ने रजिया सुल्तान का विश्वास जीत लिया होता किंतु बलबन भी अन्य तुर्की अमीरों की तरह इस बात में विश्वास करता था कि एक औरत को सुल्तान नहीं बनना चाहिए। इसलिए बलबन ने रजिया को पदच्युत करने में विद्रोहियों का साथ दिया था। जब रजिया का भाई अल्लाउद्दीन मसूदशाह दिल्ली का सुल्तान हुआ तो उसने बलबन को ‘अमीरे आखूर’ के पद पर नियुक्त किया और उसे हांसी तथा रेवाड़ी की जागीरें भी प्रदान कर दीं। ई.1245 में मंगोलों ने सिंध क्षेत्र पर आक्रमण किया। इस पर सुल्तान मसूदशाह ने बलबन को एक विशाल सेना देकर मंगोलों के विरुद्ध सैनिक अभियान पर भेजा। बलबन ने मंगोलों को न केवल सिंध से बाहर कर दिया अपितु मंगोलों की भागती हुई सेना का पीछा करके बड़ी क्रूरता से उनका संहार किया। इस कारण मंगोल बलबन के नाम से ही कांपने लगे। इससे प्रसन्न होकर सुल्तान मसूदशाह ने बलबन को ‘अमीरे हाजिब’ के पद पर नियुक्त कर दिया।

ई.1246 में गयासुद्दीन बलबन ने मसूदशाह के स्थान पर उसके चाचा नासिरुद्दीन को सुल्तान बनाने के अभियान में प्रमुखता से भाग लिया। जब नासिरुद्दीन दिल्ली का सुल्तान बन गया तो नासिरुद्दीन ने बलबन को अपना प्रधान परामर्शदाता तथा ‘नायब-ए-मुमालिक’ अर्थात् सल्तनत का प्रधानमंत्री बनाया। एक गुलाम के लिए इतनी बड़ी सल्तनत के प्रधानमंत्री पद पर पहुँच जाना बड़ी उपलब्धि थी।

कहा जाता है कि जब नासिरुद्दीन ने गयासुद्दीन बलबन को प्रधानमंत्री बनाया तो उसने बलबन से कहा- ‘मैंने शासन तंत्र तुम्हारे हाथ में सौंप दिया है इसलिये कभी ऐसा काम मत करना जिससे तुम्हें और मुझे अल्लाह के सामने लज्जित होना पड़े।’

नासिरुद्दीन शांत स्वभाव का सुल्तान था इसलिये गयासुद्दीन बलबन सदैव उसके प्रति स्वामिभक्त रहा। ई.1249 में बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान नासिरुद्दीन के साथ कर दिया। इससे सल्तनत में बलबन का रुतबा बढ़ गया तथा वह सुल्तान का अत्यंत विश्वासपात्र बन गया।

ई.1249 में सुल्तान नासिरुद्दीन ने गयासुद्दीन बलबन को ‘उलूग खान’ की उपाधि दी। इस प्रकार वह ‘मलिक’ से ‘खान’ बन गया। सल्तनत के समस्त अमीरों अर्थात् चालीसा मण्डल का ‘प्रधान’ और सुल्तान का ‘नायब’ अर्थात् प्रधानमंत्री तो वह था ही। इस प्रकार नासिरुद्दीन की धार्मिकता तथा उदारता के कारण बलबन को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने और आगे बढ़ने का पूर्ण अवसर प्राप्त हुआ। बलबन ने अपने समस्त दायित्वों एवं कर्त्तव्यों को बड़ी योग्यता के साथ पूरा किया।

गयासुद्दीन बलबन की बढ़ती हुई शक्ति के कारण बहुत से अमीर उससे ईर्ष्या करने लगे। प्रतिभावान लोग प्रायः निरंकुश तथा मनमौजी हुआ करते हैं। बलबन के काम करने का तरीका भी मनमौजी था। यहाँ तक कि कई बार सुल्तान नासिरुद्दीन भी उसके कामों से असंतुष्ट हो जाता था। ई.1252-53 में जब बलबन दिल्ली से बाहर था तब कुछ अमीरों ने सुल्तान के कान भरकर बलबन को अपदस्थ करवा दिया। सुल्तान के आदेश से बलबन हांसी की जागीर पर चला गया।

गयासुद्दीन बलबन के साथ ही सुल्तान नासिरुद्दीन ने बहुत से पुराने अमीरों को उनके पदों से हटा दिया। काजी मिनहाज उस् सिराज को भी उसके पद से हटा दिया गया। शीघ्र ही बलबन को पदच्युत करने के दुष्परिणाम सामने आने लगे और सल्तनत का काम बिगड़ने लगा। अतः विवश होकर ई.1254 में सुल्तान ने बलबन को फिर से दिल्ली बुला लिया।

अब गयासुद्दीन बलबन राज्य का सर्वेसर्वा हो गया और सुल्तान की मृत्यु तक राज्य का वास्तविक शासक बना रहा। वास्तव में इल्तुतमिश के बाद सुल्तान नासिरुद्दीन ही इतनी दीर्घ अवधि तक शासन कर सका था। इसका सम्पूर्ण श्रेय बलबन को जाता है। प्रधानमंत्री के रूप में बलबन ने इस्लाम के प्रसार के लिये कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने दिया।

18 फरवरी 1266 को सुल्तान नासिरुद्दीन की मृत्यु हो गई। उसके कोई पुत्र नहीं था। इसलिये उसने अपने जीवन काल में अपने श्वसुर गयासुद्दीन बलबन को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। सुल्तान की मृत्यु के बाद बलबन बिना किसी विरोध के दिल्ली का सुल्तान हो गया। इब्नबतूता तथा इसामी आदि परवर्ती लेखकों ने उसे राज्य हड़पने वाला बताया है किंतु आधुनिक इतिहासकारों ने इस धारणा को निराधार बताया है।

ई.1266 में सुल्तान नासिरुद्दीन की मृत्यु के बाद बलबन दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बन गया। इसी कारण बलबन के लिए कहा जाता है कि- ‘वह गुलाम से बना मलिक, मलिक से बना खान और और खान से बन गया सुल्तान।’

गयासुद्दीन बलबन ने भारत में एक नवीन राजवंश की स्थापना की जिसे इतिहासकारों ने बलबनी वंश तथा द्वितीय इल्बरी वंश कहा है। गियासुद्दीन बलबन ने सुल्तान बनने के बाद ‘जिल्ले इलाही’ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है- ‘अल्लाह का प्रतिबिंब।’

कुछ समय बाद गयासुद्दीन बलबन ने ‘नियामत-ए-खुदाई’ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है- ‘खुदा का वैभव।’ अर्थात् बलबन स्वयं को इस धरती पर अल्लाह के प्रतिबिम्ब एवं खुदा के वैभव के रूप में देखता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बलबन को पैगम्बर मान लिया मुस्लिम इतिहासकारों ने (71)

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बलबन को पैगम्बर मान लिया मुस्लिम इतिहासकारों ने

बलबन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उस काल के मुस्लिम इतिहासकार बलबन को पैगम्बर मानते थे जिसे अल्लाह ने भारत में इस्लाम के प्रसार हेतु भेजा था। अतः स्वाभाविक ही था कि बलबन विद्रोही हिन्दू राजाओं का कठोरता से दमन करता।

दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बनकर गियासुद्दीन बलबन ने ‘जिल्ले इलाही’ तथा ‘नियामत ए खुदाई’ जैसी भारी भरकम उपाधियां धारण कीं और बड़ी शानो-शौकत के साथ दिल्ली पर राज करने लगा। उससे पहले किसी भी सुल्तान ने ऐसे ऐश्वर्य का प्रदर्शन नहीं किया था।

बलबन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उस काल के मुस्लिम इतिहासकार बलबन को पैगम्बर मानते थे जिसे अल्लाह ने भारत में इस्लाम के प्रसार हेतु भेजा था। अतः स्वाभाविक ही था कि बलबन विद्रोही हिन्दू राजाओं का कठोरता से दमन करता।

बलबन ने रणथंभौर, ग्वालियर तथा चंदेरी के राजाओं का दमन करके उन्हें फिर से दिल्ली के अधीन बनाया। दो-आब के हिन्दू विद्रोहियों का भी दृढ़़ता से दमन किया। उस काल के इतिहासकारों ने लिखा है कि बलबन ने दो-आब के अधिकतर हिन्दू-पुरुषों का वध कर दिया तथा उनकी स्त्रियों और बच्चों को पकड़कर गुलाम बना लिया।

यद्यपि भारत में तुर्की साम्राज्य को स्थापित हुए लगभग 60 वर्ष हो चुके थे तथापि चारों दिशाओं से दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण होते रहे थे। इस कारण सल्तनत में तुर्की संस्थाएं गठित नहीं हो पाई थीं। केन्द्रीय तथा प्रांतीय सरकारों के संगठन में कोई उन्नति नहीं की गई थी और न विजेता तथा विजित में सम्पर्क बनाने का प्रयत्न किया गया था।

विजेता अब भी विदेशी समझे जाते थे। भारत की जनता उन्हें घृणा से देखती थी और उनका आधिपत्य स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। जनसाधारण की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। सल्तनत के अमीरों की निष्ठा संदिग्ध रहती थी और वे षड़यंत्र तथा कुचक्र रचने में संलग्न रहते थे।

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चालीस गुलामों का मण्डल षड़यंत्रकारी एवं विघटनकारी शक्तियों का नेतृत्व करते थे। वे बलबन के सुल्तान बन जाने से असंतुष्ट थे। इसलिए उनका दमन करना आवश्यक था। बलबन ने न केवल अन्य तुर्की अमीरों का अपितु शम्सी अमीरों का भी दमन किया जो स्वयं को दूसरों से अधिक अभिजात्य मानते थे। बलबन ने कई अमीरों से उनकी जागीरें छीन लीं।

जब बलबन की कार्यवाहियां आगे भी जारी रहीं तो दिल्ली के कोतवाल फखरुद्दीन ने बलबन के समक्ष उपस्थित होकर उससे अनुरोध किया कि वह अमीरों के विरुद्ध और अधिक कठोर कार्यवाही नहीं करे। इस पर बलबन ने अमीरों तथा सूबेदारों का पीछा छोड़ा।

खोखरों का दमन तो बलबन उसी समय कर चुका था, जब वह नासिरुद्दीन का प्रधानमंत्री था। उस काल में खोखरों एवं मंगोलों का एक गठजोड़ बन गया था। बलबन ने न केवल उस गठजोड़ को बिखेर दिया था अपितु भारत पर आक्रमण करने वाले मंगोलों का बड़ी क्रूरता से दमन किया था।

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इस समय तक मंगोल गजनी तथा ट्रांसऑक्सियाना पर अधिकार कर चुके थे तथा बगदाद के खलीफा को मौत के घाट उतार चुके थे। मंगोल सेनाएं भारत के सिंध और पंजाब प्रांतों पर बार-बार आक्रमण करके निरंतर लूटमार मचा रहे थे। उनके आक्रमणों को रोकने के लिये बलबन ने पश्चिमोत्तर सीमा के लिये अलग सेना का गठन किया तथा उस सेना को स्थाई रूप से पश्चिमोत्तर सीमा पर तैनात कर दिया। बलबन ने वहाँ कई दुर्ग भी बनवाये जिनमें सेना को रखा जा सके। जब बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ ने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद करके अवध पर आक्रमण किया तो जाजनगर के हिन्दू राजा ने तुगरिल खाँ का सामना किया तथा तुगरिल खाँ को परास्त कर दिया। इस पर तुगरिल खाँ ने बलबन से सहायता मांगी। इस पर बलबन को बंगाल में कार्यवाही करने का अवसर मिल गया। बलबन ने तुगरिल खाँ पर आक्रमण करके उससे युद्ध का हरजाना मांगा। इस पर तुगरिल खाँ ने अवध की जागीर बलबन को दे दी तथा स्वयं दिल्ली के अधीन हो गया। सल्तनत के विभिन्न भागों में विद्रोह होते रहने के कारण राजकोष का बहुत बड़ा अंश सेना के रख-रखाव पर व्यय करना पड़ता था। मंगोलों के आक्रमणों को रोकने तथा विद्रोहियों का दमन करने में काफी धन व्यय करना पड़ता था।

अनेक सरदार समय-समय पर कर देना बन्द करके उपद्रव करने लगते थे। इसका राज्य की आय पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता था। राज्य की आर्थिक दशा को सुधारे बिना अन्य समस्याओं को सुलझना असम्भव था।

बलबन ऐसे समय में तख्त पर बैठा था जब तुर्कों की सत्ता स्थायी रूप से भारत में स्थापित हो गई थी। अब राजनीतिक व्यवस्था एक निश्चित स्वरूप प्राप्त कर रही थी और उसका कार्य उसे निश्चित स्वरूप देने और उसे स्थायी बनाने का था।

दिल्ली सल्तनत में अब तक राजत्व के आदर्शों तथा उनके क्रियात्मक रूप में विभेद नहीं हो सका था। इल्तुतमिश के निर्बल उत्तराधिकारी जिनको सदैव अपनी जान के लाले पड़े रहते थे, इस कार्य को नहीं कर सके। न तो उन्हें इसका कोई अनुभव था और न उनमें इस कार्य को करने की योग्यता थी।

बलबन अनुभवी, दूरदर्शी, विचारशील तथा दृढ़़-संकल्प का व्यक्ति था। अतः उसमें राजत्व के आदर्शों तथा उनके क्रियात्मक रूप में विभेद करने की क्षमता थी किंतु इन्हें लागू करने के लिये धैर्य, लगन, समय एवं योग्य कर्मचारियों की आवश्यकता थी।

इससे स्पष्ट है कि बलबन के लिये दिल्ली का ताज काँटों से भरा हुआ था परन्तु वह लम्बे समय से दिल्ली सल्तनत में विभिन्न प्रशासकीय कार्य कर चुका था तथा विगत 20 वर्षों से वह राज्य के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य कर रहा था इसलिये उसे इन समस्याओं से निबटने में विशेष कठिनाई नहीं होने वाली थी। उसने अपने शासन को मजबूत करने के लिये कई कदम उठाए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मेवों के सिर के बदले बलबन ने चांदी के सिक्के दिए (72)

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मेवों के सिर के बदले बलबन ने चांदी के सिक्के दिए

प्रत्येक अफगान सैनिक सौ-सौ मेवों के सिर काटकर लाया। मल्का को भी उसके परिवार के 250 सदस्यों के साथ बंदी बनाया गया। बलबन ने मल्का से 142 घोड़े तथा 30 हजार टंके छीन लिए।

बलबन ने सल्तनत को मजबूती देने के लिए विद्रोहियों एवं अपने विरोधियों को दण्ड देने में कोई संकोच नहीं किया। एक ओर तो उसने मुस्लिम अमीरों पर कड़ाई से शिकंजा कसा तो दूसरी ओर विद्रोही हिन्दू जनता का क्रूरता से दमन किया।

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यद्यपि ई.1175 में मुहम्मद गौरी के भारत पर प्रथम आक्रमण से लेकर ई.1266 में बलबन के सुल्तान बनने तक गजनी के मुसलमानों द्वारा उत्तरी भारत के हिन्दू राजाओं का दमन करते हुए लगभग 100 साल का समय हो चुका था तथापि हिन्दू राजाओं, सरदारों तथा भूमिपतियों को नियन्त्रित रखना किसी समस्या से कम नहीं था। रजिया से लेकर नासिरुद्दीन के काल तक दो-आब, राजपूताना, बुन्देलखंड, बघेलखंड और मालवा में राजपूतों के कई स्वतन्त्र राज्य स्थापित हो गए थे। जियाउद्दीन बरनी ने इस काल की दिल्ली सल्ततन की दुर्दशा का वर्णन करते हुए लिखा है कि- ‘सुल्तान शम्सुद्दीन की मृत्यु के पश्चात् 30 वर्ष की संक्षिप्त अवधि में शम्सुद्दीन के पुत्रों की अनुभवशून्यता के कारण तथा शम्सी गुलामों द्वारा सुल्तान से प्रभुत्व छीन लिए जाने के कारण, सल्तनत में रहने वाले हिन्दू अभिमानी, अवज्ञाकारी एवं उद्दण्ड हो गए थे। जबकि सुल्तान शम्सुद्दीन के पुत्र इधर-उधर लोगों का सहारा ढूंढते, प्रत्येक सहायक का आश्रय लेते और अपने स्वार्थ के अनुसार जीवन व्यतीत करते थे। उलिल अम्री का भय जिसके आधार पर संसार तथा राज्य की शोभा निर्भर करती है, हिन्दुओं के हृदय से निकल चुका था।’

सल्तनत की सुरक्षा के लिए इन विद्रोही हिन्दू सरदारों एवं हिन्दू जनता का दमन करना नितान्त आवश्यक था। अतहर अब्बास रिजवी ने अपनी पु़स्तक ‘तुर्ककालीन भारत’ में जियाउद्दीन बरनी के हवाले से लिखा है- ‘बलबन ने राजपूताने तथा अन्य क्षेत्रों के शक्तिशाली हिन्दुओं से व्यर्थ में छेड़छाड़ न करने और उनके प्रति आक्रमण नीति की अपेक्षा अपने राज्य को मंगेालों से बचाने के प्रयत्न को ही श्रेयस्कर समझा।’

बलबन ने दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्रों में निवास करने वाले मेवों, दो-आब के हिन्दू विद्रोहियों, कटेहर के हिन्दुओं तथा अवध क्षेत्र के हिन्दुओं का बड़ी क्रूरता से दमन किया। बलबन की इस नीति के सबसे पहले शिकार मेव हुए। उस काल में भरतपुर, अलवर, मथुरा एवं गुड़गांव के क्षेत्र में हिन्दुओं की मेव जाति निवास करती थी। माना जाता है कि वे मीणों में से ही निकले थे किंतु विद्रोही प्रवृत्ति के होने के कारण उन्होंने दिल्ली के चारों ओर लूटमार मचा रखी थी। इस कारण व्यापारियों का दिल्ली से बाहर निकलना असंभव सा हो गया था।

जियाउद्दीन बरनी (ई1285-1357) ने मेवों के विषय पर दिल्ली के सुल्तानों से नाराजगी व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘सुल्तान शम्सुद्दीन के बड़े पुत्रों की युवा-अवस्था, असावधानी, मदिरापान और भोग विलासिता एवं सुल्तान शम्सुद्दीन के छोटे पुत्र नासिरुद्दीन की अयोग्यता के कारण दिल्ली के निकट के मेव बड़े शक्तिशाली बन बैठे थे। वे प्रायः रात्रि में नगर पर धावा बोल देते और घरों को तहस-नहस कर डालते। वे जन साधारण को बहुत कष्ट पहुंचाते।’

गियासुद्दीन बलबन (ई.1266-86) के शासनकाल में मेव हिन्दू थे और आगे चलकर फीरोजशाह तुगलक (ई.1351-88) के शासन काल में अर्थात् चौदहवीं सदी के उत्तरार्ध में मुसलमान बने। बलबन कालीन मुस्लिम लेखकों ने मेव लोगों के क्षेत्र को ‘मेव-कोहपाया’ लिखा है।

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उस काल में दिल्ली के नागरिकों को मेवों के उत्पात के भय से रात में नींद नहीं आती थी। दिल्ली के आसपास के मेवों की लूटमार के भय से पश्चिमी दिशा के द्वार शाम की नमाज के पश्चात् बंद कर लिए जाते था। किसी को इस बात का साहस नहीं होता था कि शाम की नमाज के बाद घर से बाहर निकल सके।

बहुत से मेव शाम की नमाज के पश्चात् ही ‘हौजेरानी’ अर्थात् सुल्तान के महल के निकट पहुंच जाते। भिश्तियों, पानी भरने वाली दासियों को परेशान करते और उन्हें नंगा कर देते। उनके कपड़े छीन लेते। आस-पास के मेवों के कारण दिल्ली में हलचल मच गई थी।

जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है- ‘मल्का नामक मेव के नेतृत्व में मेवों ने हांसी की तरफ से सेना के लिए ले जाए जाने वाले शाही गल्ले को भूतों के समान झपट कर ऊंटों एवं गुलामों को छीन लिया और उन्हें कोहपाया से लेकर रणथंभौर तक के हिन्दुओं में बांट दिया। उस काल में रसद सामग्री को गल्ला कहा जाता था।’

बलबन उस समय तो मेवों के विरुद्ध कुछ नहीं कर सका क्योंकि वह मंगोलों से उलझा हुआ था किंतु जब मंगोल सिंध छोड़कर भाग गए तो बलबन ने 10 हजार सैनिकों के साथ कोहपाया के मेवों के विरुद्ध भयानक अभियान किया। बलबन की सेना में 3 हजार अफगान लड़ाके थे जिन्होंने तेजी से आगे बढ़कर मेवों को सफाया करना आरम्भ किया।

बलबन ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे मेवों के सिर काटकर लाएं, प्रत्येक सिर के बदले चांदी के दो टंके दिए जाएंगे। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है- ‘प्रत्येक अफगान सैनिक सौ-सौ मेवों के सिर काटकर लाया। मल्का को भी उसके परिवार के 250 सदस्यों के साथ बंदी बनाया गया। बलबन ने मल्का से 142 घोड़े तथा 30 हजार टंके छीन लिए।’

हौजेरानी के निकट बहुत से मेवातियों को हाथी के पैरों तले कुचला गया, कुछ को काट डाला गया तथा कुछ की खाल खिंचवा कर भूसा भरवा दिया गया। बलबन की सेना ने मेवों के नगरों तथा गाँवों को जलाकर उन जंगलों को साफ कर दिया जिनमें वे शरण लिया करते थे। इस प्रकार बलबन ने दिल्ली के चारों ओर के मार्ग निरापद कर दिए।

बलबन के अत्याचारों से भी मेवों का हौंसला नहीं टूटा तथा कुछ ही वर्षों में वे दिल्ली तक धावे मारने लगे। उस समय तक बलबन बहुत बूढ़ा हो चुका था और मेवों के विरुद्ध पहले जैसी कार्यवाही करने में सक्षम नहीं रहा था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बलबन की क्रूरता (73)

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बलबन की क्रूरता

बलबन की क्रूरता के आगे तैमूरलंग और नादिरशाह की तलवारों की चमक फीकी पड़ गई। बलबन ने नागरिक बस्तियों में आग लगवा कर उन्हें नष्ट कर दिया।

गंगा-यमुना के दो-आब क्षेत्र के लोग युगों से स्वातंत्र्यप्रिय थे। इस क्षेत्र के राजा भले ही  गजनी के आक्रांताओं से युद्धों में हार गए थे किंतु इस क्षेत्र की हिन्दू प्रजा अपेक्षाकृत सम्पन्न होने के कारण मुस्लिम सैनिकों का विरोध करती थी और कर चुकाने से मना करती थी। दिल्ली के सुल्तानों ने दो-आब के विद्रोहों को दबाने के कई प्रयास किए थे किंतु ये लोग अवसर पाते ही सिर उठा लेते थे।

बलबन ने दो-आब के विद्रोहियों को दण्ड देने के लिए मेवात में की गई कार्यवाही से भिन्न प्रकार की नीति अपनाई। इसका कारण यह था कि मेवात के लोग लुटेरी प्रवृत्ति के थे जबकि गंगा-यमुना के लोग सम्पन्न थे। इस कारण गंगा-यमुना के लोगों को दबाना आसान नहीं था।

इसलिए बलबन उनके स्त्री-बच्चों को पकड़कर दिल्ली ले आया। सुल्तान द्वारा की गई इस कार्यवाही के कारण दो-आब के अधिकांश लोग स्वतः ही शांत होकर बैठ गए। बलबन ने दो-आब को कई खण्डों में विभक्त करके इन खण्डों में अफगान सैनिकों की छावनियाँ स्थापित कर दीं। बलबन की क्रूरता किसी अन्य क्रूर सुल्तान या बादशाह की क्रूरता से कम नहीं थी।

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जिस समय बलबन दो-आब में विद्रोहियों का दमन कर रहा था, उन्हीं दिनों कटेहर (रूहेलखण्ड) में उत्पात आरम्भ हो गया। बदायूं तथा अमरोहा के मुस्लिम गवर्नर कटेहर के हिन्दुओं का दमन करने में विफल रहे। इस पर बलबन स्वयं एक विशाल सेना लेकर कटेहर गया। उसने दिल्ली से रवाना होते समय सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया कि वह शिकार खेलने के लिए जा रहा है। इसके बाद वह दो रात और तीन दिन में तेजी से चलता हुआ गंगा नदी पार करके अचानक ही कटेहर में प्रविष्ट हुआ।

बलबन ने पांच हजार धनुर्धारी अश्वारोहियों को आगे करके कटेहर को घेर लिया। इन धनुर्धारियों ने कटेहर-वासियों पर अंधाधुंध तीरों की बरसात कर दी जिससे बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए। बलबन की क्रूरता का कोई हिसाब नहीं था।

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बलबन ने नागरिक बस्तियों में आग लगवा कर उन्हें नष्ट कर दिया। उनकी स्त्रियों तथा बच्चों को बन्दी बना लिया और 7 वर्ष से अधिक आयु वाले लड़कों एवं पुरुषों की नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी। डॉ. अशोकुमार सिंह ने लिखा है कि- ‘इस भीषण नरसंहार के आगे तैमूर एवं नादिरशाह की रक्तपिपासु तलवार की चमक भी फीकी पड़ जाए।’ इस भीषण नरमेध से कटेहर का विद्रोह शान्त हो गया तथा जब तक दिल्ली सल्तनत अस्तित्व में रही, कटेहर (रूहेलखण्ड) में विद्रोह नहीं हुआ। अब बलबन अवध के हिन्दू विद्रोहियों के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए रवाना हुआ। बलबन ने अपनी सेना के साथ कम्पिल तथा पटियाली में छः-छः महीने तक अपना शिविर लगाया। उसने कम्पिल, पटियाली, भोजपुर तथा जलाली में नए किले एवं मस्जिदें बनवाईं। इन किलों में अफगानी सैनिकों को नियुक्त कर दिया और उन्हें उन्हीं क्षेत्रों में बड़े भूखण्ड दे दिए ताकि इन अफगानी सैनिकों के परिवार वहीं पर रहकर हिन्दू विद्रोहियों का मुकाबला कर सकें। इस कार्यवाही के बाद इस क्षेत्र में कुछ समय के लिए शांति हो गई। बलबन की इस कार्यवाही की प्रशंसा करते हुए जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान के मार्ग खुले हैं तथा लुटेरे डाकुओं का अंत हो चुका है।’

बरनी के विपरीत बरनी के ही समकालीन विदेशी यात्री इब्नबतूता ने इन प्रदेशों में की गई यात्राओं के संस्मरणों में जलाली के खतरनाक मार्ग और वहाँ के हिन्दू लुटेरों के बारे में भयाक्रांत वर्णन किया है। इससे स्पष्ट होता है कि बलबन द्वारा अवध के क्षेत्र में जो शांति स्थापित की गई थी, वह अल्पकालिक सिद्ध हुई।

जिन दिनों बलबन भारत के हिन्दुओं को कुचलने में लगा हुआ था, उस काल में मंगोलों ने अवसर पाकर सिन्धु नदी के पूर्वी प्रदेश पर अधिकार कर लिया। पंजाब का अधिकांश भाग भी उन्हीं के अधीन चला गया।

जियाउद्दीन बरनी लिखता है कि व्यास नदी ही अब दिल्ली सल्तनत की पश्चिमी सीमा थी और नदी के उस-पार का सम्पूर्ण प्रदेश मंगोलों के अधिकार में था। बलबन के लिये यह संभव नहीं था कि वह पंजाब से मंगोलों को निष्कासित कर सके। इसलिये उसने मंगोलों को व्यास-रावी के दो-आब में रोके रखने की व्यवस्था की।

बलबन ने लाहौर के दुर्ग की मरम्मत करवा कर उसमें एक बड़ी सेना रख दी। ई.1271 में बलबन स्वयं लाहौर गया और उसने उन किलों की मरम्मत करवाई जिन्हें मंगोलों ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था।

बलबन ने सीमान्त प्रदेश को तीन भागों में विभक्त कर दिया और प्रत्येक भाग में एक अधिकारी नियुक्त किया। एक क्षेत्र में तातार खाँ को, दूसरे में शहजादे मुहम्मद को और तीसरे में शहजादे बुगरा खाँ को नियुक्त किया। इन समस्त क्षेत्रों में चुने हुए सैनिक रखे गए। राजधानी दिल्ली में भी एक विशाल सेना सदैव विद्यमान रहती थी।

मंगोलों ने कई बार व्यास को पार करके आगे बढ़ने का प्रयत्न किया किंतु बलबन के सेनापतियों ने उनके समस्त प्रयत्न निष्फल कर दिए। मुसलमान लेखकों ने बलबन की क्रूरता का कोई उल्लेख नहीं किया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बलबन का चित्तौड़ अभियान (74)

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बलबन का चित्तौड़ अभियान

बलबन ने रजिया सुल्ताना की तरह राजस्थान के बड़े हिन्दू राजाओं से दूर ही रहने की नीति अपनाई किंतु बलबन का चित्तौड़ अभियान इसका अपवाद था। बलबन का चित्तौड़ अभियान गुजरात तक पहुंचने के लिए हुआ था।

गियासुद्दीन बलबन द्वारा दिल्ली के निकट रहने वाले मेवों, गंगा-यमुना दो-आब के किसानों और अवध तथा कटेहर के हिन्दुओं के विरुद्ध क्रूरता पूर्वक कार्यवाही करके राज्य में शांति स्थापित करने का प्रयास किया गया किंतु शीघ्र ही उसने अनुभव किया कि चालीसा मण्डल के अमीरों तथा मुस्लिम प्रांतपतियों के विरुद्ध भी कठोर कार्यवाही किए जाने की आवश्यकता है।

बलबन ने अनुभव किया कि सुल्तान की निरंकुशता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा तुर्की अमीर थे जिनका नेतृत्व चालीसा मण्डल के हाथों में था। प्रमुख तुर्की अमीरों के इस मण्डल ने पूर्ववर्ती सुल्तानों को अपने हाथों की कठपुतली बना लिया था। बलबन ने सुल्तान तथा उसके उत्तराधिकारियों का भविष्य सुरक्षित करने के लिये चालीस सरदारों के इस मण्डल को नष्ट करने का निश्चय किया।

बलबन ने अपने व्यक्तिगत सेवकों का नया दल बनाया और उन्हें ऊँचे पदों पर नियुक्त किया। उसने रक्त की शुद्धता तथा तुर्कों की श्रेष्ठता को आधार बनाकर उन लोगों को दरबार से निकाल बाहर किया जिन्होंने हिन्दू-धर्म का परित्याग करके और इस्लाम ग्रहण करके राज्य में ऊँचे पद प्राप्त कर लिये थे।

बलबन ने ऐसे लोगों को भी हटा दिया जिनके वंश के विषय में किसी प्रकार का सन्देह था। उसने चालीसा मण्डल के अमीरों में से जो दुर्बल तथा अयोग्य हो गए थे, उन्हें गुजारा-भत्ता देकर घर बैठा दिया। अमीरों की विधवाओं तथा उनके बच्चों के लिए भी गुजारा-भत्ता निश्चित कर दिया।

बलबन ने केवल युवकों को ही राज्य की सेवा में रखा और कार्य तथा योग्यता के अनुसार उनका वेतन निश्चित किया। चालीसा मण्डल की समाप्ति बलबन की सबसे बड़ी सफलता कही जा सकती है जिसके कारण वह लगभग 21 साल तक दिल्ली पर निर्विघ्न शासन कर सका।

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दिल्ली के चालीसा मण्डल के अमीरों पर नियन्त्रण करने के उपरान्त बलबन ने सल्तनत के मुस्लिम प्रान्तपतियों की ओर ध्यान दिया। उसने विद्रोही प्रांतपतियों को नष्ट कर दिया। शम्सी सरदारों में उन दिनों सबसे अधिक प्रबल शेर खाँ सुंकर था जो सीमान्त प्रदेश का शासक था। बलबन की ‘शम्सी विरोधी नीति’ से वह अत्यन्त शंकित तथा आतंकित हो गया और सुल्तान से मिलने के लिए दिल्ली नहीं आया।

बलबन ने शेर खाँ सुंकर को दरबार में उपस्थित होने के लिये आदेश भेजा। शेर खाँ चार वर्ष तक आनाकानी करता रहा। अन्त में बलबन ने उसे विष दिलवाकर उसकी हत्या करवा दी। बलबन ने शेर खाँ के स्थान पर बंगाल के हाकिम तातार खाँ को और तातार खाँ के स्थान पर तुगरिल बेग को बंगाल का सूबेदार नियुक्त कर दिया।

सीमान्त प्रदेश के दुर्गों के शासकों में परस्पर विद्वेष था। बलबन ने उन्हें यह आरोप लगाकर बंदीगृह में डाल दिया कि उन्होंने अपने कार्य में असावधानी बरती है। अवध का इक्तादार अमीन खाँ बंगाल के आक्रमण में विफल होकर लौटा तो बलबन ने उसे मृत्युदण्ड देकर उसका शव अयोध्या के फाटक पर लटकवा दिया।

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इसी प्रकार अवध के इक्तादार हैबात खाँ को अपने एक गुलाम की हत्या कर देने के अपराध में बलबन ने उसे 500 कोड़े लगावाये। सुल्तान के आदेश से बदायूं के सूबेदार मलिक बकबक को जनसाधारण के सम्मुख कोड़ों से पीटा गया क्योंकि उसने एक गुलाम को कोड़ों से पीट-पीटकर मार डाला था। बलबन ने रजिया सुल्तान की ही भांति प्रबल हिन्दू राजाओं से दूर रहने की नीति अपनाई ताकि वह अपने अमीरों पर कड़ाई से नियंत्रण रख सके, मंगोलों के विरुद्ध पूरी शक्ति झौंक सके और मेवों, गंगा-यमुना के दो-आब के विद्रोही किसानों, कटेहर के हिन्दू विद्रोहियों, अवध के विद्रोही हिन्दू सामंतों तथा बंगाल के विद्रोही मुस्लिम शासकों के विरुद्ध कार्यवाही कर सके। बलबन जानता था कि यदि उसने इतने सारे शत्रुओं के रहते बड़े राजपूत राजाओं से भी छेड़खानी की तो वह अपने किसी भी शत्रु का दमन नहीं कर पाएगा तथा उसका राज्य लड़खड़ा जाएगा। बलबन पूरी जिंदगी इसी नीति पर चलता रहा किंतु उसका चित्तौड़ अभियान इसका अपवाद था। उसने ई.1267-68 में चित्तौड़ के विरुद्ध अभियान किया। तत्कालीन लेखक  ऐसामी ने इस अभियान का उल्लेख तो किया है किंतु इसके परिणामों का उल्लेख नहीं किया है।

इससे प्रतीत होता है कि बलबन का चित्तौड़ अभियान विफल रहा तथा चित्तौड़ के गुहिलों ने एक बार फिर दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में कसकर मार लगाई थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि चित्तौड़ का शासक रावल जैत्रसिंह भी इल्तुतमिश में तगड़ी मार लगा चुका था जिसके कारण इल्तुतमिश ने राजस्थान और गुजरात की तरफ देखना बंद कर दिया था।

बलबन के चित्तौड़ अभियान का वास्तविक कारण यह था कि बलबन वस्तुतः गुजरात पर अभियान करना चाहता था ताकि वहाँ की सम्पदा लूटकर सल्तनत की आर्थिक स्थिति सुधार सके। दिल्ली से गुजरात जाने के लिए चित्तौड़ होकर जाना सुगम था, इसलिए बलबन को चित्तौड़ पर अभियान करना पड़ा किंतु चित्तौड़ के रावल समरसिंह ने बलबन की सेना में कसकर मार लगाई और उसे दिल्ली की तरफ भाग जाने पर विवश कर दिया।

संभवतः इसी अभियान को इसामी ने बलबन का चित्तौड़ अभियान लिखा जबकि रावल समरसिंह के आबू शिलालेख में इसे म्लेच्छ सेना का गुजरात अभियान लिखा गया है। संभवतः इसी पराजय के बाद बलबन ने यह नीति अपनाई कि वह राजपूताने के राजपूत राजाओं से उलझने की बजाय अपनी सल्तनत के उन हिस्सों पर मजबूती पर शिकंजा कसे, जो कुतुबुद्दीन ऐबक एवं इल्तुतमिश के समय में दिल्ली सल्तनत के अधीन हो चुके थे।

इस काल में चंदेल इतने शक्तिशाली नहीं थे फिर भी बलबन ने कई बार अपनी सेना कालिंजर के दुर्ग पर भेजी किंतु बलबन की सेना चंदेलों पर विजय प्राप्त नहीं कर सकी तथा कालिंजर दुर्ग हिन्दुओं के पास बना रहा। नरवर के जज्वपेल शासक भी बलबन से लड़ते रहे तथा बलबन की सेना नरवर के राजपूतों पर भी निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सकी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुगरिल खाँ को फांसी पर चढ़ा दिया बलबन ने (75)

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तुगरिल खाँ - www.bharatkaitihas.com
तुगरिल खाँ को फांसी पर चढ़ा दिया बलबन ने

तुगरिल खाँ अपने कुछ साथियों के साथ जाजनगर के जंगलों में भाग गया। बड़ी खोज के बाद तुगरिल खाँ को पकड़ा जा सका। उसे लखनौती के बाजार में सरेआम सूली पर लटकाया गया तथा उसका सिर काटकर नदी में फेंक दिया गया। उसकी स्त्रियों तथा बच्चों को कैद कर लिया गया।

बलबन ने चालीसा मण्डल भंग कर दिया, सीमांत दुर्गों के शासकों को पकड़कर जेल में बंद कर दिया तथा दरबार में उपस्थित नहीं होने वाले सीमांत प्रदेश के शासक शेर खाँ सुंकर को जहर देकर मरवा दिया। इन सब उपायों से बलबन ने मुस्लिम अमीरों पर मजबूती से नियंत्रण स्थापित कर लिया।

बलबन ने विगत सुल्तान नासिरुद्दीन के प्रधानमंत्री रहते हुए नमक की पहाड़ियों में रहने वाले खोखर हिन्दुओं के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की थी, तब से वहाँ पर शांति व्याप्त थी किंतु बलबन के सुल्तान बनने के बाद इस क्षेत्र के हिन्दू फिर से सिर उठाने लगे।

इन दिनों नमक की पहाड़ी को ‘जूद का पहाड़’ कहते थे। बरनी ने बलबन के इस अभियान का कारण तो नहीं बताया है किंतु लिखा है कि बलबन ने उन विद्रोहियों पर आक्रमण किया तथा उनके असंख्य घोड़े लूटकर दिल्ली लौट आया।

बलबन के शासन काल के अंतिम वर्षों में एक बार फिर से नमक की पहाड़ी के क्षेत्र में हिन्दुओं ने सिर उठाया इसलिए बलबन के बड़े पुत्र मुहम्मद को इस क्षेत्र में सैनिक अभियान करना पड़ा। उसने दमरोला के शासक को जजिया देने का आदेश दिया किंतु दमरोला के शासक ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया।

बलबन का पुत्र मुहम्मद मुल्तान से सेना लेकर दमरौला पहुंचा। मुहम्मद ने दमरौला राज्य में स्थित कई पहाड़ी किलों को नष्ट कर दिया तथा सांबह नामक कस्बा पूरी तरह उजाड़ दिया। अंत में दमरौला के पहाड़ी राजा ने मुहम्मद की अधीनता स्वीकार कर ली तथा जजिया देना स्वीकार कर लिया।

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ई.1279 में बलबन बीमार पड़ा। इस समय तक वह काफी वृद्ध हो गया था। इन दिनों पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण भी बढ़ गए थे। बलबन के दोनों पुत्र मुहम्मद तथा बुगरा खाँ इन आक्रमणों को रोकने में व्यस्त थे। इस स्थिति का लाभ उठाकर बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ ने स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और सुल्तान मुगसुद्दीन की उपाधि धारण की। उसने अपने नाम की मुद्राएं भी चलाईं और अपने नाम से खुतबा भी पढ़वाया।

बलबन ने तुगरिल खाँ के विरुद्ध कई बार सेनाएँ भेजीं परन्तु सफलता प्राप्त नहीं हुई। अन्त में बलबन दिल्ली का प्रबन्ध कोतवाल फखरूद्दीन को सौंपकर, अपने पुत्र बुगरा खाँ तथा एक विशाल सेना के साथ बंगाल के लिए चल दिया। लगभग छः वर्ष के लगातार प्रयासों के बाद बलबन का लखनौती पर अधिकार हो सका।

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तुगरिल खाँ अपने कुछ साथियों के साथ जाजनगर के जंगलों में भाग गया। बड़ी खोज के बाद तुगरिल खाँ को पकड़ा जा सका। उसे लखनौती के बाजार में सरेआम सूली पर लटकाया गया तथा उसका सिर काटकर नदी में फेंक दिया गया। उसकी स्त्रियों तथा बच्चों को कैद कर लिया गया। सुल्तान ने तुगरिल के साथियों तथा सम्बन्धियों को बड़ा कठोर दण्ड दिया। लखनौती में तीन दिन तक निरन्तर हत्याकाण्ड चलता रहा। विद्रोहियों का दमन करने के उपरान्त बलबन ने बंगाल का शासन प्रबन्ध अपने पुत्र बुगरा खाँ को सौंप दिया। उसने शहजादे को चेतावनी दी कि यदि वह दुष्टों के कहने में आकर विद्रोह करेगा तो उसकी वही दशा होगी जो तुगरिल की हुई थी। बलबन के शासन काल की घटनाओं को देखते हुए यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि यद्यपि बलबन ने राज्य-विस्तार नहीं किया तथापि सल्तनत को शत्रुओं एवं विद्रोहियों से सुरक्षित रखने के लिये जो कुछ किया जाना चाहिए था, वह भलीभांति किया गया। बलबन ने सल्तनत की सुरक्षा के लिए सुसंगठित सेना की व्यवस्था की तथा सेना को अनुभवी एवं राज-भक्त मलिकों के हाथों में सौंपा। सेना में हाथियों और घोड़ों की संख्या में वृद्धि की गई और सैनिकों को जागीर के स्थान पर नकद वेतन देने पर जोर दिया गया।

बलबन के काल में प्रान्तीय गवर्नर तथा स्थानीय हाकिम अपने सैनिकों को नकद वेतन न देकर भूमि ही दिया करते थे। बलबन ने सेना को इमादुलमुल्क के नियन्त्रण में रख दिया जो योग्य तथा कर्त्तव्य-परायण अमीर था। उसे ‘दीवाने आरिज’ अर्थात् सैन्य सचिव बनाया गया।

इमादुल्मुल्क ने सेना का अच्छा प्रबन्ध किया और उसमें अनुशासन स्थापित किया। बलबन ने घोड़ों को दाग लगवाने की प्रथा आरम्भ की और सैनिकों को अनुशासित बनाने के लिये उनका वेतन बढ़ा दिया। उसने अश्वसेना तथा पैदलसेना का समुचित संगठन किया। यद्यपि बलबन तथा इमादुल्मुल्क ने सेना में बड़े परिवर्तन नहीं किए परन्तु अच्छे वेतन एवं कठोर अनुशासन से सेना में नई स्फूर्ति का संचार हुआ।

बलबन के शासन काल में विद्रोहों के फूट पड़ने तथा मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था। इसलिये बलबन ने पुराने दुर्गों का जीर्णोद्धार करवाया। उसने सीमावर्ती प्रदेश में उन मार्गों पर नये दुर्गों का निर्माण करवाया जिन मार्गों से होकर मंगोल भारत पर आक्रमण किया करते थे।

इन दुर्गों में योग्य तथा अनुभवी सेनापतियों के नेतृत्व में सशस्त्र सेनाएँ रखी गईं। सेनाओं को अच्छे शस्त्र उपलब्ध करवाए गए। इस प्रकार बाह्य आक्रमणों को रोकने एवं आंतरिक विद्रोहों का दमन करने के लिये बलबन ने समुचित व्यवस्था की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बलबन का राजत्व सिद्धान्त (76)

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बलबन का राजत्व सिद्धान्त

दिल्ली सल्तनत के इतिहास में बलबन का राजत्व सिद्धान्त बहुत प्रसिद्ध है। यह देखकर आश्चर्य होता है कि एक अनपढ़, क्रूर तुर्की गुलाम राजत्व के ऐसे ऊचे आदर्श एवं सिद्धांत गढ़ पाया जैसे बड़े-बड़े बादशाह नहीं गढ़ पाते हैं।

गियासुद्दीन बलबन ने सल्तनत को स्थाई, सुल्तान को प्रभावशाली तथा सरकार को मजबूत बनाने के लिये कुछ आदर्शों का का निर्माण किया। इन आदर्शों को ही भारत के इतिहास में बलबन का राजत्व सिद्धान्त कहते हैं। यद्यपि बलबन एक खान के घर पैदा हुआ तथा उसका बचपन गुलाम के रूप में बीता तथापि बलबन का यौवन सुल्तानों के सान्निध्य में बीता था।

इस कारण बलबन सुल्तान एवं सल्तनत की कमजोरियों एवं शक्तियों दोनों के बारे में अच्छी तरह जानता था। इसी कारण वह राजत्व के सिद्धांतों का निर्माण कर सका। बलबन ने राजत्व के सिद्धांतों की जानकारी अपने बड़े शहजादे मुहम्मद को एक आदेश के रूप में दी।

बलबन का राजत्व सिद्धान्त इस मूलमंत्र पर आधारित था कि सुल्तान इस पृथ्वी पर अल्लाह का प्रतनिधि है और उसके कार्यों से सर्वशक्तिमान अल्लाह की मर्यादा दिखाई देनी चाहिये। उसका मानना था कि सुल्तान को रसूल की विशेष कृपा प्राप्त रहती है जिससे अन्य लोग वंचित रहते हैं। अल्लाह शासन का भार उच्च-वंशीय लोगों को ही प्रदान करता है।

बलबन का राजत्व सिद्धान्त राजपद को अत्यन्त पवित्र समझता था। बलबन ने सुल्तान के पद को प्रतिष्ठित तथा गौरवान्वित करने के लिये कई कदम उठाए। उसका कहना था कि रसूल के अतिरिक्त अन्य कोई पद इतना गौरवपूर्ण तथा प्रतिष्ठित नहीं होता जितना सुल्तान का।

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बलबन में उच्च-वंशीय भावना इतनी प्रबल थी कि वह निम्न-वंश के व्यक्तियों को राज्य में कोई उच्च पद प्रदान नहीं करता था और न उनकी भेंट अथवा उपहार स्वीकार करता था। दिल्ली का जखरू नामक अत्यन्त समृद्धशाली व्यापारी लाखों टंक की भेंट के साथ सुल्तान के दर्शन करना चाहता था परन्तु सुल्तान उसे दर्शन देना अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझता था। फलतः सुल्तान ने उसकी प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया। सुल्तान तथा उसके पद की मर्यादा को बढ़ाने के लिए बलबन ने अपने दरबार को ईरानी ढंग पर संगठित किया।

बलबन सुल्तान के स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासन में विश्वास करता था। उसकी दृढ़़ धारणा थी कि स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासक ही राज्य को सुसंगठित एवं सुरक्षित करके अपनी रियाया को अनुशासन में रख सकता है। बलबन ने अपने सम्पूर्ण शासनकाल में इस सिद्धान्त का अनुसरण किया और अमीरों तथा उलेमाओं की शक्ति एवं प्रभाव को नष्ट करके स्वयं असीमित सत्ता का केन्द्र बन गया।

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बलबन का राजत्व सिद्धान्त इस आदर्श पर टिका हुआ था कि प्रत्येक सुल्तान को अपना गौरव उन्नत बनाए रखना चाहिए। बलबन ने अपने जीवनकाल में इस सिद्धान्त का अनुसरण किया और स्वयं को गौरवान्वित बनाए रखा। उसने दरबार में मद्यपान करके आने तथा हँसी-मजाक करने पर रोक लगा दी। वह स्वयं भी अत्यन्त गम्भीर रहा करता था और साधारण लोगों से बात नहीं किया करता था। बलबन की धारणा थी कि सुल्तान को कर्त्तव्य-परायण होना चाहिए और सदैव प्रजा-पालन का चिन्तन करना चाहिए। उस काल में प्रजा अर्थात् रियाया से आशय केवल मुस्लिम प्रजा से होता था, शेष लोग काफिर थे जिन्हें रियाया बनाए जाने की आवश्यकता थी! बलबन का मानना था कि सुल्तान को आलसी अथवा अकर्मण्य नहीं होना चाहिए। उसे सदैव सतर्क तथा चैतन्य रहना चाहिए। बलबन अपने विरोधियों तथा विद्रोहियों का क्रूरता से दमन करने में विश्वास करता था। चालीसा मण्डल के अमीरों, विद्रोही हिन्दू सामन्तों, मेवातियों, बंगाल के शासक परिवार के सदस्यों, चोरों-डकैतों तथा षड़यंत्रकारियों के कुचक्रों को उसने कठोरता से कुचला। बलबन उच्च नैतिक स्तर में विश्वास रखता था। उसे दुष्ट तथा अशिष्ट लोगों से घृणा थी। वह ऐसे लोगों की संगति कभी नहीं करता था। सुल्तान बनने क बाद उसने मद्यपान करना बंद कर दिया था और राज्य में मदिरा के क्रय-विक्रय पर रोक लगा दी।

बलबन का राजत्व सिद्धान्त इस आदर्श पर भी टिका हुआ था कि सुल्तान को प्रजा के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाना चाहिए और अपराधी का दमन बड़ी कठोरता से करना चाहिए। इस सिद्धान्त की पालना में प्रायः क्रूरता भी हो जाती थी।

बलबन का दरबार सम्पूर्ण एशिया में अपने ऐश्वर्य एवं गौरव के लिए प्रसिद्ध था। बलबन के दरबार को विविध प्रकार से सजाया गया। सुल्तान महंगे एवं सुन्दर वस्त्र पहन कर दरबार में आता था। अमीर, मलिक एवं अन्य दरबारी भी करीने से वस्त्र पहनकर ही दरबार में आ सकते थे।

सुल्तान के अंगरक्षक प्रज्वलित अस्त्रों तथा आकर्षक वस्त्रों से अंलकृत होकर, पंक्तियाँ बनाकर सुल्तान के पीछे खड़े रहते थे। प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, दरबार में पूर्ण अनुशासन रखना पड़ता था। दरबार में हँसना, बातें करना तथा बिना अदब के खड़े होना मना था। सुल्तान स्वयं भी दरबार में नहीं हँसता था। इस कारण दूसरों को हँसने का साहस नहीं होता था।

दिल्ली में उन दिनों उलेमाओं का बोलबाला था। शक्तिशाली होने के कारण उनका चारित्रिक पतन हो गया था। जियाउद्दीन बरनी के अनुसार उलेमा न तो ईमानदार थे और न उनमें धार्मिकता रह गई थी। फिर भी बलबन इन उलेमाओं का आदर-सत्कार करता था और तब तक भोजन नहीं करता था जब तक कि कम से कम एक दर्जन उलेमा उसके पास नहीं बैठे हों परन्तु उसने उलेमाओं के दुर्गुणों के कारण उन्हें सल्तनत की राजनीति से अलग कर दिया।

प्रोफेसर हबीबुल्लाह ने इसे बलबन की सबसे बड़ी भूल माना है। उन्होंने लिखा है- ‘बलबन का सबसे बड़ा दोष यह था कि उसने मुसलमानों के प्रभाव को राजनीति और शासन में स्वीकार नहीं किया।’

बलबन को फारसी कला तथा फारसी साहित्य से प्रेम था। वह फारसी साहित्य एवं फारसी साहित्यकारों का आश्रयदाता था। कवि अमीर खुसरो को बलबन की विशेष कृपा प्राप्त थी। मंगोलों के अत्याचारों से आतंकित होकर दिल्ली आने वाले फारसी कवियों को बलबन का आश्रय प्राप्त होता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन ने दिल्ली सल्तनत को मजबूती प्रदान की (77)

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कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन - www.bharatkaitihas.com
कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन ने दिल्ली सल्तनत को मजबूती दी

कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन दिल्ली का सुल्तान था। उसने दिल्ली सल्तनत को मजबूती प्रदान की। वह अपने समस्त पूर्ववर्ती सुल्तानों से अधिक प्रतिभावान था। वह जितना अधिक कुरूप था, उतना ही अधिक क्रूर भी था।

गियासुद्दीन बलबन का एक गुलाम पृष्ठभूमि से ऊपर उठकर एक विशाल सल्तनत का स्वामी बन जाना एक अलग बात थी और सल्तनत में राजत्व के सिद्धांत रूपी प्राण फूंक देना बिल्कुल अलग बात थी किंतु बलबन ने ये दोनों कार्य सफलता-पूर्वक कर दिखाए थे।

कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन का जन्म ई.1200 में तुर्किस्तान के उस क्षेत्र में हुआ था जो अब कजाकिस्तान कहलाता है। सैंकड़ों साल तक यह क्षेत्र चीन के अधीन था, उसके बाद रूस के अधीन हुआ तथा अब एक अलग स्वतंत्र मुस्लिम देश है। उस काल में एक योद्धा के लिए 87 वर्ष की आयु प्राप्त करना बहुत ही कठिन बात थी किंतु बलबन ने 87 वर्ष की आयु पाई। उसने अपनी इच्छा के अनुसार अपना जीवन जिया किंतु उसके उसके जीवन के कुछ हिस्से अच्छे नहीं निकले।

जब हम बलबन के जीवन का विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन एक ऐसा मनुष्य था जिसने परिस्थितियों के क्रूर हाथों से स्वयं को बचाकर परिस्थितियों को अपनी गुलाम बना लिया था। बलबन का शरीर मजबूत था किंतु उसकी कद काठी सुंदर नहीं थी। उसका कद छोटा और रंग काला था।

उसके चेहरे पर चेचक के दाग थे। उसकी भद्दी सूरत के कारण इल्तुतमिश ने उसे खरीदने से मना कर दिया था। तब बलबन ने विनम्र भाव से कहा था- ‘जहाँपनाह जहाँ आपने इतने गुलाम अपने लिये खरीदे हैं, तो अल्लाह के लिये मुझे खरीद लीजिये।’ बलबन के शब्दों से प्रभावित होकर इल्तुतमिश ने बलबन को खरीदा था किंतु उसकी कुरूपता के कारण उसे भिश्ती का काम सौंपा गया।

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बलबन का पिता खान था किंतु बलबन का बचपन गुलाम के रूप में बीता। उसे बुखारा, गजनी तथा दिल्ली जैसे शहरों में बेचा गया जहाँ भाग्य के उत्कर्ष के लिये अनेक मार्ग खुले हुए थे। यह बलबन के भाग्य का ही प्राबल्य था कि उसे ख्वाजा जमालुद्दीन तथा इल्तुतमिश जैसे योग्य मालिकों ने खरीदा। इससे बलबन के उत्कर्ष के मार्ग खुल गए। उसे शिक्षित होने तथा राजकृपा प्राप्त करने का अवसर मिला। भाग्य के बल पर वह निरंतर आगे बढ़ता चला गया।

सुल्तान इल्तुतमिश की कृपा से बलबन मलिक बना किंतु सुल्तान रुकुनुद्दीन फीरोजशाह का विरोध करने के कारण बलबन को जेल में बंद कर दिया गया। रजिया ने बलबन पर कृपा की किंतु बलबन ने रजिया के साथ विश्वासघात करके उसे मरवा दिया क्योंकि बलबन एक औरत का सुल्तान बनना अल्लाह के आदेश के खिलाफ मानता था।

सुल्तान मसूदशाह के काल में बलबन पर पुनः शाही-कृपा हुई और उसे ‘अमीरे हाजिब’ के पद पर नियुक्त किया गया। बलबन ने मसूदशाह से भी विद्रोह किया तथा उसके स्थान पर नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बनाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस प्रकार नैतिकता के स्तर पर बलबन भी उतना ही गिरा हुआ था जितना कि उस काल के अन्य तुर्की अमीर गिरे हुए थे।

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बलबन में कूटनीति से काम लेने की क्षमता थी। जब सुल्तान नासिरुद्दीन ने बलबन को प्रधानमंत्री के पद से हटाकर हांसी भेज दिया तो बलबन ने विद्रोह का मार्ग न अपनाकर सुल्तान का आदेश स्वीकार कर लिया तथा भाग्य को अपने पक्ष में होने की प्रतीक्षा करने लगा। जब भाग्यवश बलबन को पुनः दिल्ली में बुलाकर पुराने पद पर बहाल किया गया तो बलबन सुल्तान को पूरी तरह से अपने पक्ष में करने के लिये अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान से कर दिया। इससे दरबार में अन्य कोई अमीर उसे चुनौती देने योग्य नहीं रहा। इस प्रकार सुल्तानों को बनाते-बिगाड़ते वह स्वयं भी सुल्तान बन गया। जीवन के इन अनुभवों ने उसे परिपक्व बना दिया। जब हम बलबन के शासनकाल की समग्र समीक्षा करते हैं तो हम पाते हैं कि दिल्ली सल्तनत के समक्ष कुतुबुद्दीन ऐबक के समय से जो समस्याएँ चली आ रही थीं, वे समस्त समस्याएं बलबन के समय भी विद्यमान थीं। पश्चिमोत्तर सीमांत क्षेत्र में खोखरों का उपद्रव, पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमण, दिल्ली के निकट मेवातियों के उत्पात, गंगा-यमुना के दो-आब में हिन्दुओं के विद्रोह, राजपूताना, रूहेलखंड, बुंदेलखंड तथा बघेलखंड में हिन्दू सरदारों के विद्रोह, बंगाल के गवर्नरों के विद्रोह, तुर्की अमीरों के षड़यंत्र आदि बहुत सी ऐसी समस्याएँ थीं जो पूरे गुलामवंश के शासन के दौरान बनी रहीं।

बलबन इनमें से केवल षड़यंत्रकारी अमीरों की समस्या का स्थायी समाधान ढूंढ सका था, शेष समस्याएं कुछ समय के लिए दब अवश्य गईं किंतु बलबन के मरते ही फिर से उठ खड़ी हुईं।

बलबन ने राजपूत शासकों की तरफ से आँखें मूंदने की ठीक वैसी ही विचित्र नीति अपनाई थी जैसी कि इल्तुतमिश तथा रजिया ने मंगोलों के प्रति अपनाई थी। रजिया ने यही नीति राजपूतों के सम्बन्ध में भी अपनाई थी। संभवतः इसी कारण इल्तुतमिश और रजिया सल्तनत के भीतर की समस्याओं पर ध्यान दे पाए थे। बलबन ने मंगोलों पर तो कड़ी कार्यवाही की किंतु राजपूतों के सम्बन्ध में उसने रजिया की नीति का अनुसरण किया।

कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन ने केवल एक बार चित्तौड़ पर आक्रमण करके पराजय का स्वाद चखा और समझ गया कि अभी दिल्ली सल्तनत ने इतनी शक्ति प्राप्त नहीं की है कि वह राजपूताना के राजपूतों से सीधे भिड़ सके। संभवतः बलबन इस बात को भी जानता था कि चौहान सम्राट पृथ्वीराज को मुहम्मद गौरी ने जिस धोखे से मारा था, वह धोखा हिन्दू राजाओं के साथ बार-बार नहीं दोहराया जा सकता। इस काल के हिन्दू राजा अधिक सतर्क थे।

इसीलिए यह कहा जाता है कि कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन की सैनिक उपलब्धियाँ उतनी बड़ी नहीं थीं जितनी कि शासकीय उपलब्धियाँ हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शहजादा बुगरा खाँ सल्तनत छोड़कर भाग गया (78)

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शहजादा बुगरा खाँ सल्तनत छोड़कर भाग गया

बलबन ने शहजादा बुगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा किंतु शहजादा बुगरा खाँ अपने पिता के कठोर स्वभाव से डरकर लखनौती भाग गया। इस पर बलबन ने अपने बड़े पुत्र मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

शरीर से कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन ने लड़खड़ाती हुई दिल्ली सल्तनत को अपनी बुद्धि, परिश्रम एवं लगन के बल पर मजबूत आधार प्रदान किया। बलबन ने जो नीतियां बनाईं, उसके भाग्य से उसके पक्ष में परिणाम देने वाली सिद्ध हुईं किंतु उसके जीवन के अंतिम दो वर्ष भयानक दुःखों से भर गए जिन्होंने उसे असीम कष्ट दिया। 

ई.1285 में मंगोलों ने तिमूर खाँ के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। शहजादे मुहम्मद ने मंगोलों का रास्ता रोका। मंगोल तो पराजित होकर भाग गए किंतु शहजादा मुहम्मद युद्ध में मारा गया। शहजादे की मृत्यु से बलबन को करारा आघात लगा। बलबन उसे सल्तनत के भावी और योग्य सुल्तान के रूप में देखता था किंतु जब शहजादा अचानक ही मृत्यु को प्राप्त हुआ तो बलबन ने रोगशैय्या पकड़ ली और दो साल के भीतर ई.1287 के मध्य में बलबन इस असार संसार से चला गया।

बलबन की शासन व्यवस्था स्वेच्छाचारी एवं अत्यधिक केन्द्रीभूत थी जिसमें शासन की सारी शक्तियाँ सुल्तान में केन्द्रित थीं। सुल्तान कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य अपने राज्याधिकारियों अथवा पुत्रों पर पूर्ण रूप से नहीं छोड़ता था। इससे शासन के समस्त कार्यों में सुल्तान का परामर्श एवं आज्ञा प्राप्त करना आवश्यक हो गया।

ऐसा शासन सुल्तान के कठोर एवं दृढ़निश्चयी स्वभाव पर ही निर्भर करता है तथा योग्य सुल्तान के समय ही ढंग से चल पाता है किंतु जैसे ही अयोग्य सुल्तान का शासन होता है, ऐसी शासन व्यवस्था बिखरने लगती है तथा मंत्रियों एवं प्रांतीय गवर्नरों का नेतृत्व करने वालों का अभाव हो जाता है।

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बलबन के लिये सुल्तान तथा सल्तनत का हित सर्वोपरि था। इसलिये वह अपने सगे-सम्बन्धियों को दण्डित करने में भी संकोच नहीं करता था। वह किसी की भी मनमानी सहन नहीं करता था। बलबन ने बदायूं के सूबेदार मलिक बकबक और अवध के इक्तादार हैबात खाँ को उनके गुलामों के साथ दुर्व्यवहार करने के अपराध में कठोर दण्ड दिए। इससे लोगों में सुल्तान का भय बैठ गया। वे अपने गुलामों के साथ दुर्व्यवहार करने का साहस नहीं करते थे।

सल्तनत में अपराधों तथा अत्याचारों का पता लगाने के लिये बलबन ने एक मजबूत गुप्तचर विभाग का गठन किया। ये गुप्तचर सुल्तान को समस्त प्रकार के अत्याचारों तथा अन्यायों की सूचना देते थे। अपराध के सिद्ध हो जाने पर सुल्तान द्वारा अपराधी को बिना किसी पक्षपात के दण्ड दिया जाता था।

बलबन ने समस्त प्रान्तों तथा जिलों में गुप्तचर रखे जिनके माध्यम से बलबन को राजधानी तथा अन्य प्रान्तों की महत्त्वपूर्ण घटनाओं, अमीरों के कुचक्रों, षड़यंत्रों एवं विद्राहों की सूचनाएँ मिलती थीं। गुप्तचरों को अच्छा वेतन मिलता था और उनकी निष्ठा का परीक्षण होता रहता था। कर्त्तव्य-भ्रष्ट गुप्तचर को कठोर दण्ड दिया जाता था।

बलबन का उत्कर्ष दिल्ली सल्तनत के लिए एक युगांतरकारी घटना थी जिसने न केवल भारत अपितु मध्यएशिया तक के राजनीतिक घटनाक्रम को प्रभावित किया था। उसने दिल्ली सल्तनत को स्थायित्व प्रदान किया। विद्रोहियों का दमन किया तथा सल्तनत में शांति व्यवस्था स्थापित की।

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जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि जब बलबन सुल्तान बना तब लोगों के हृदय से राज का भय निकल चुका था और देश की बड़ी दुर्दशा हो रही थी। बलबन ने बड़ी दृढ़़ता से अंशाति तथा कलह को दबाकर विद्रोहियोें का दमन किया और सुल्तान की सत्ता तथा धाक को फिर से स्थापित किया। उसने अपराधियों, विरोधियों एवं षड़यंत्रकारियों को कठोर दण्ड देकर सल्तनत के प्रत्येक व्यक्ति को शाही-आज्ञाओं का पालन करने के लिए बाध्य किया। बलबन ने भविष्य में आने वाले संकटों का सामना करने के लिए दूरदृष्टि से काम लिया। उसने सीमांत प्रदेशों की सुरक्षा के लिये नए दुर्ग बनवाये एवं पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाकर वहाँ सेनाएं नियुक्त कीं। उसने अयोग्य लोगों को सेवा से हटा दिया। बूढ़े अमीरों के स्थान पर उनके युवा-पुत्रों को सेवा में रखा। बलबन ने अपने जीवन-काल में ही अपने योग्य पुत्र मुहम्मद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया परन्तु दुर्भाग्यवश बलबन के जीवन काल में ही शहजादे मुहम्मद की युद्धक्षेत्र में मृत्यु हो गई। इसके बाद बलबन ने अपने छोटे पुत्र शहजादा बुगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा किंतु वह अपने पिता के कठोर स्वभाव से डरकर लखनौती भाग गया। इस पर बलबन ने अपने बड़े पुत्र मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

बलबन के चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘बलबन का चालीस वर्षों का क्रियाशील जीवन मध्यकालीन भारत के इतिहास में अनूठा है। उसने राजपद के गौरव को बढ़ाया और लौह तथा रक्त की नीति का अनुसरण करके शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित की। बलबन ने अपनी वीरता तथा दूरदर्शिता से मुस्लिम राज्य को विपत्ति काल में नष्ट होने से बचाया, मध्ययुगीन भारतीय इतिहास में वह सदैव एक महान् व्यक्तित्व रहेगा।’

प्रो. हबीबुल्ला का मत है- ‘बलबन ने बड़ी सीमा तक खिलजी राज्य-व्यवस्था की पृष्ठभूमि का निर्माण किया।’

अवध बिहारी पाण्डेय के अनुसार- ‘यदि हम बलबन के कार्य को एक शब्द में व्यक्त करना चाहें तो वह है-सुदृढ़ीकरण। यही उसकी नीति का मूल मंत्र था।’

डॉ. आर्शीवादी लाल श्रीवास्तव में लिखा है- ‘बलबन ने तुर्की सल्तनत की रक्षा का सुचारु प्रबन्ध किया और उसे नया जीवन प्रदान किया। यही उसका सबसे महान् कार्य था। उसने सुल्तान की प्रतिष्ठा का पुनरुत्थान किया। यह उसकी दूसरी सफलता थी। राज्य में सर्वत्र पूर्ण शांति और व्यवस्था की स्थापना करना उसका महत्त्वपूर्ण कार्य था। उस युग में तुर्की सल्तनत को जिन कठिनाइयों और संकटों का सामना करना पड़ा, उनको देखते हुए यह मानना पड़ेगा कि बलबन की सफलताएं साधारण कोटि की नहीं थीं।’

वस्तुतः इतिहासकारों ने बलबन का मूल्यांकन मुस्लिम प्रजा एवं मुस्लिम शासन की दृष्टि से किया है। यदि भारत की हिन्दू जनंसख्या की दृष्टि से देखा जाए जो कि उस काल में 95 प्रतिशत थी, बलबन का शासन क्रूरताओं, मक्कारियों, हिंसक युद्धों और रक्तपात से परिपूर्ण था।

उसके काल में हिन्दुओं को बुरी तरह से लूटा गया, मेवों को कुचला गया, गंगा-यमुना के दो-आब में हिन्दू परिवारों को बुरी तरह से सताया गया तथा अवध में हिन्दुओं की बड़ी संख्या में हत्याएं की गईं। जब हम बलबन के शासन का मूल्यांकन करते हैं तो हमें ये बातें भी निःसंकोच, निर्भय तथा पक्षपात रहित होकर लिखनी चाहिए किंतु दुर्भाग्य से साम्यवादी चिंतन से ग्रस्त भारतीय इतिहासकार ऐसा नहीं कर सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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