Home Blog Page 103

शहजादा बुगरा खाँ सल्तनत छोड़कर भाग गया (78)

0
शहजादा बुगरा खाँ - www.bharatkaitihas.com
शहजादा बुगरा खाँ सल्तनत छोड़कर भाग गया

बलबन ने शहजादा बुगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा किंतु शहजादा बुगरा खाँ अपने पिता के कठोर स्वभाव से डरकर लखनौती भाग गया। इस पर बलबन ने अपने बड़े पुत्र मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

शरीर से कुरूप किंतु भाग्यवान बलबन ने लड़खड़ाती हुई दिल्ली सल्तनत को अपनी बुद्धि, परिश्रम एवं लगन के बल पर मजबूत आधार प्रदान किया। बलबन ने जो नीतियां बनाईं, उसके भाग्य से उसके पक्ष में परिणाम देने वाली सिद्ध हुईं किंतु उसके जीवन के अंतिम दो वर्ष भयानक दुःखों से भर गए जिन्होंने उसे असीम कष्ट दिया। 

ई.1285 में मंगोलों ने तिमूर खाँ के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। शहजादे मुहम्मद ने मंगोलों का रास्ता रोका। मंगोल तो पराजित होकर भाग गए किंतु शहजादा मुहम्मद युद्ध में मारा गया। शहजादे की मृत्यु से बलबन को करारा आघात लगा। बलबन उसे सल्तनत के भावी और योग्य सुल्तान के रूप में देखता था किंतु जब शहजादा अचानक ही मृत्यु को प्राप्त हुआ तो बलबन ने रोगशैय्या पकड़ ली और दो साल के भीतर ई.1287 के मध्य में बलबन इस असार संसार से चला गया।

बलबन की शासन व्यवस्था स्वेच्छाचारी एवं अत्यधिक केन्द्रीभूत थी जिसमें शासन की सारी शक्तियाँ सुल्तान में केन्द्रित थीं। सुल्तान कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य अपने राज्याधिकारियों अथवा पुत्रों पर पूर्ण रूप से नहीं छोड़ता था। इससे शासन के समस्त कार्यों में सुल्तान का परामर्श एवं आज्ञा प्राप्त करना आवश्यक हो गया।

ऐसा शासन सुल्तान के कठोर एवं दृढ़निश्चयी स्वभाव पर ही निर्भर करता है तथा योग्य सुल्तान के समय ही ढंग से चल पाता है किंतु जैसे ही अयोग्य सुल्तान का शासन होता है, ऐसी शासन व्यवस्था बिखरने लगती है तथा मंत्रियों एवं प्रांतीय गवर्नरों का नेतृत्व करने वालों का अभाव हो जाता है।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

बलबन के लिये सुल्तान तथा सल्तनत का हित सर्वोपरि था। इसलिये वह अपने सगे-सम्बन्धियों को दण्डित करने में भी संकोच नहीं करता था। वह किसी की भी मनमानी सहन नहीं करता था। बलबन ने बदायूं के सूबेदार मलिक बकबक और अवध के इक्तादार हैबात खाँ को उनके गुलामों के साथ दुर्व्यवहार करने के अपराध में कठोर दण्ड दिए। इससे लोगों में सुल्तान का भय बैठ गया। वे अपने गुलामों के साथ दुर्व्यवहार करने का साहस नहीं करते थे।

सल्तनत में अपराधों तथा अत्याचारों का पता लगाने के लिये बलबन ने एक मजबूत गुप्तचर विभाग का गठन किया। ये गुप्तचर सुल्तान को समस्त प्रकार के अत्याचारों तथा अन्यायों की सूचना देते थे। अपराध के सिद्ध हो जाने पर सुल्तान द्वारा अपराधी को बिना किसी पक्षपात के दण्ड दिया जाता था।

बलबन ने समस्त प्रान्तों तथा जिलों में गुप्तचर रखे जिनके माध्यम से बलबन को राजधानी तथा अन्य प्रान्तों की महत्त्वपूर्ण घटनाओं, अमीरों के कुचक्रों, षड़यंत्रों एवं विद्राहों की सूचनाएँ मिलती थीं। गुप्तचरों को अच्छा वेतन मिलता था और उनकी निष्ठा का परीक्षण होता रहता था। कर्त्तव्य-भ्रष्ट गुप्तचर को कठोर दण्ड दिया जाता था।

बलबन का उत्कर्ष दिल्ली सल्तनत के लिए एक युगांतरकारी घटना थी जिसने न केवल भारत अपितु मध्यएशिया तक के राजनीतिक घटनाक्रम को प्रभावित किया था। उसने दिल्ली सल्तनत को स्थायित्व प्रदान किया। विद्रोहियों का दमन किया तथा सल्तनत में शांति व्यवस्था स्थापित की।

To purchase this book, please click on photo.

जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि जब बलबन सुल्तान बना तब लोगों के हृदय से राज का भय निकल चुका था और देश की बड़ी दुर्दशा हो रही थी। बलबन ने बड़ी दृढ़़ता से अंशाति तथा कलह को दबाकर विद्रोहियोें का दमन किया और सुल्तान की सत्ता तथा धाक को फिर से स्थापित किया। उसने अपराधियों, विरोधियों एवं षड़यंत्रकारियों को कठोर दण्ड देकर सल्तनत के प्रत्येक व्यक्ति को शाही-आज्ञाओं का पालन करने के लिए बाध्य किया। बलबन ने भविष्य में आने वाले संकटों का सामना करने के लिए दूरदृष्टि से काम लिया। उसने सीमांत प्रदेशों की सुरक्षा के लिये नए दुर्ग बनवाये एवं पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाकर वहाँ सेनाएं नियुक्त कीं। उसने अयोग्य लोगों को सेवा से हटा दिया। बूढ़े अमीरों के स्थान पर उनके युवा-पुत्रों को सेवा में रखा। बलबन ने अपने जीवन-काल में ही अपने योग्य पुत्र मुहम्मद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया परन्तु दुर्भाग्यवश बलबन के जीवन काल में ही शहजादे मुहम्मद की युद्धक्षेत्र में मृत्यु हो गई। इसके बाद बलबन ने अपने छोटे पुत्र शहजादा बुगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा किंतु वह अपने पिता के कठोर स्वभाव से डरकर लखनौती भाग गया। इस पर बलबन ने अपने बड़े पुत्र मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

बलबन के चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘बलबन का चालीस वर्षों का क्रियाशील जीवन मध्यकालीन भारत के इतिहास में अनूठा है। उसने राजपद के गौरव को बढ़ाया और लौह तथा रक्त की नीति का अनुसरण करके शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित की। बलबन ने अपनी वीरता तथा दूरदर्शिता से मुस्लिम राज्य को विपत्ति काल में नष्ट होने से बचाया, मध्ययुगीन भारतीय इतिहास में वह सदैव एक महान् व्यक्तित्व रहेगा।’

प्रो. हबीबुल्ला का मत है- ‘बलबन ने बड़ी सीमा तक खिलजी राज्य-व्यवस्था की पृष्ठभूमि का निर्माण किया।’

अवध बिहारी पाण्डेय के अनुसार- ‘यदि हम बलबन के कार्य को एक शब्द में व्यक्त करना चाहें तो वह है-सुदृढ़ीकरण। यही उसकी नीति का मूल मंत्र था।’

डॉ. आर्शीवादी लाल श्रीवास्तव में लिखा है- ‘बलबन ने तुर्की सल्तनत की रक्षा का सुचारु प्रबन्ध किया और उसे नया जीवन प्रदान किया। यही उसका सबसे महान् कार्य था। उसने सुल्तान की प्रतिष्ठा का पुनरुत्थान किया। यह उसकी दूसरी सफलता थी। राज्य में सर्वत्र पूर्ण शांति और व्यवस्था की स्थापना करना उसका महत्त्वपूर्ण कार्य था। उस युग में तुर्की सल्तनत को जिन कठिनाइयों और संकटों का सामना करना पड़ा, उनको देखते हुए यह मानना पड़ेगा कि बलबन की सफलताएं साधारण कोटि की नहीं थीं।’

वस्तुतः इतिहासकारों ने बलबन का मूल्यांकन मुस्लिम प्रजा एवं मुस्लिम शासन की दृष्टि से किया है। यदि भारत की हिन्दू जनंसख्या की दृष्टि से देखा जाए जो कि उस काल में 95 प्रतिशत थी, बलबन का शासन क्रूरताओं, मक्कारियों, हिंसक युद्धों और रक्तपात से परिपूर्ण था।

उसके काल में हिन्दुओं को बुरी तरह से लूटा गया, मेवों को कुचला गया, गंगा-यमुना के दो-आब में हिन्दू परिवारों को बुरी तरह से सताया गया तथा अवध में हिन्दुओं की बड़ी संख्या में हत्याएं की गईं। जब हम बलबन के शासन का मूल्यांकन करते हैं तो हमें ये बातें भी निःसंकोच, निर्भय तथा पक्षपात रहित होकर लिखनी चाहिए किंतु दुर्भाग्य से साम्यवादी चिंतन से ग्रस्त भारतीय इतिहासकार ऐसा नहीं कर सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैकुबाद ने पिता को पैरों में गिराकर सलाम करवाया (79)

0
कैकुबाद - www.bharatkaitihas.com
कैकुबाद ने पिता को पैरों में गिराकर सलाम करवाया

जब बुगरा खाँ अपने पुत्र सुल्तान कैकुबाद के समक्ष उपस्थित हुआ तो बुगरा खाँ ने अन्य अमीरों की तरह धरती पर माथा रगड़कर सुल्तान की जमींपोशी की तथा सुल्तान के पैर पकड़कर उसकी पैबोशी की।

दिल्ली के सुल्तान गियासुद्दीन बलबन ने अपने बड़े शहजादे मुहम्मद की मृत्यु हो जाने के कारण अपने द्वितीय पुत्र बुगरा खाँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करना चाहा किंतु बुगरा खाँ अपने पिता के कठोर स्वभाव से डरकर चुपचाप दिल्ली छोड़कर लखनौती चला गया। इस पर बलबन ने शहजादे मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

ई.1287 में बलबन की मृत्यु के बाद दिल्ली के कोतवाल मलिक फखरूद्दीन ने कैखुसरो को सुल्तान नहीं बनने दिया तथा कैखुसरो के विरुद्ध षड्यन्त्र रचकर बुगरा खाँ के पुत्र कैकुबाद को तख्त पर बैठा दिया ताकि सुल्तान कैकुबाद उसके हाथों की कठपुतली बनकर रह सके। जिस समय कैकुबाद तख्त पर बैठा, उस समय उसकी अवस्था केवल सत्रह वर्ष थी। वह रूपवान तथा सरल प्रकृति का युवक था। उसका पालन-पोषण तथा शिक्षा-दीक्षा बलबन ने अपने निरीक्षण में करवाए थे।

तत्कालीन इतिहासकारों ने लिखा है- ‘कैकुबाद ने कभी मद्य का सेवन नहीं किया था और न कभी रूपवती युवती पर उसकी दृष्टि पड़ी थी। उसका अध्ययन अत्यन्त विस्तृत था और उसे साहित्य से अनुराग था। उसे योग्य शिक्षकों द्वारा विभिन्न विषयों एवं कलाओं की शिक्षा दी गई थी। इस शिक्षा के प्रभाव से कैकुबाद कभी अनुचित कार्य नहीं करता था। उसके मुँह से कभी अपशब्द नहीं निकलते थे।’

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

कैकुबाद के रूप में दिल्ली सल्तनत को अच्छा शासक मिलने की आशा थी किंतु तख्त पर बैठते ही उसे दुष्ट लोगों ने घेर लिया जिससे वह समस्त शिक्षाओं को भूलकर भोग-विलास में लिप्त हो गया। उसके दरबारियों ने उसका अनुसरण करना आरम्भ किया। भोग-विलास में संलग्न रहने के कारण सुल्तान ने शासन की बागडोर कोतवाल फखरूद्दीन के भतीजे मलिक निजामुद्दीन के हाथों में सौंप दी जो फखरूद्दीन का दामाद भी था। मलिक निजामुद्दीन ने सुल्तान को हर तरह से कमजोर कर दिया।

मलिक निजामुद्दीन अत्यंत दुष्ट प्रकृति का स्वामी था, उसने सत्ता हाथों में आते ही, कैखुसरो को जहर देकर मार डाला जिसे बलबन ने दिल्ली सल्तनत का भावी सुल्तान नियुक्त किया था। जब सल्तनत के प्रमुख वजीर खतीर ने निजामुद्दीन का विरोध किया तो निजामुद्दीन ने वजीर को भी जहर देकर मरवा दिया।

जब बंगाल में रह रहे बुगरा खाँ को अपने पुत्र कैकुबाद के दुराचरण के समाचार मिले तो वह अपने पुत्र को दुष्ट निजामुद्दीन से बचाने के लिये एक सेना लेकर दिल्ली के लिये रवाना हुआ। इस पर मलिक निजामुद्दीन ने सुल्तान कैकुबाद को उकसाया कि वह भी सेना लेकर अपने पिता का मार्ग रोके क्योंकि उसकी नीयत ठीक नहीं है।

कैकुबाद दुष्ट निजामुद्दीन की बातों में आ गया तथा सेना लेकर आगे बढ़ा। जब बुगरा खाँ को पता लगा कि कैकूबाद युद्ध करने की नीयत से आ रहा है तो बुगरा खाँ ने अपने पुत्र सुल्तान कैकुबाद को संदेश भिजवाया कि वह युद्ध नहीं करना चाहता है, वह तो अपने सुल्तान से मिलना चाहता है। इस समय तक कैकुबाद अयोध्या तक पहुंच चुका था। उसने मलिक निजामुद्दीन से सलाह मांगी कि क्या करना चाहिए!

To purchase this book, please click on photo.

इस पर निजामुद्दीन ने कैकुबाद को सलाह दी कि वह बुगरा खाँ को संदेश भिजवाए कि यदि बुगरा खाँ, सुल्तान से मिलने के लिए आना चाहता है तो उसे भी सुल्तान के समक्ष वैसे ही जमींपोशी करनी होगी, जैसे अन्य अमीर करते हैं। मलिक निजामुद्दीन की योजना थी कि बुगरा खाँ इस शर्त को मानने से इन्कार कर देगा किंतु बुगरा खाँ अनुभवी व्यक्ति था। उसने अपने पुत्र की इस शर्त को स्वीकार कर लिया। इस पर कैकुबाद के समक्ष और कोई उपाय नहीं रहा कि वह अपने पिता बुगरा खाँ से मिले। जब बुगरा खाँ सुल्तान के समक्ष उपस्थित हुआ तो बुगरा खाँ ने अन्य अमीरों की तरह धरती पर माथा रगड़कर सुल्तान की जमींपोशी की तथा सुल्तान के पैर पकड़कर उसकी पैबोशी की। यह देखकर कैकुबाद ग्लानि से भर गया। वह तख्त से उतरकर अपने पिता के चरणों में गिर गया और रोने लगा। बुगरा खाँ ने उसे भोग-विलास से दूर रहने के लिये कहा तथा भोग-विलास के दुष्परिणामों के बारे में समझाया। बुगरा खाँ ने उसे यह सलाह भी दी कि वह मलिक निजामुद्दीन को उसके पद से हटा दे। कैकुबाद ने पिता की इन सारी सलाहों को मान लिया। बुगरा खाँ ने मलिक निजामुद्दीन की हत्या करवाकर उससे मुक्ति पा ली। इसके बाद बुगरा खाँ बंगाल चला गया।

पिता के चले जाने के बाद कैकुबाद दिल्ली आ गया और फिर से भोग-विलास में डूब गया। इसके बाद मलिक कच्छन और मलिक सुर्खा नामक तुर्की अमीरों ने शासन पर वर्चस्व स्थापित कर लिया।

इस पर सुल्तान कैकुबाद ने मंगोलों के विरुद्ध लगातार युद्ध जीत रहे अपने सेनापति जलालुद्दीन खिलजी को दिल्ली बुलवाकर उसे आरिज-ए-मुमालिक अर्थात् सेना का निरीक्षक नियुक्त किया तथा उसे शाइस्ता खाँ की उपाधि दी।

तुर्की अमीरों को सुल्तान का यह निर्णय अच्छा नहीं लगा क्योंकि वे खिलजियों को तुर्क नहीं मानते थे। इस नियुक्ति के कुछ दिनों बाद अत्यधिक शराब के सेवन से कैकुबाद को लकवा मार गया। इस पर तुर्की अमीरों ने उसके अल्पवयस्क पुत्र क्यूमर्स को गद्दी पर बैठा दिया। इस प्रकार कैकुबाद ई.1287 से 1290 तक ही शासन कर सका।  

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गुलाम वंश का अंत (80)

0
गुलाम वंश का अंत - www.bharatkaitihas.com
गुलाम वंश का अंत

खिलजियों ने सुल्तान कैकुबाद को लातों से मारकर यमुनाजी में फैंक दिया! इसी के साथ दिल्ली सल्तनत से गुलाम वंश का अंत हो गया। अमीरों ने कैकुबाद के अल्पवयस्क पुत्र क्यूमर्स को सुल्तान बना दिया।

बलबन के पोते कैकुबाद को दिल्ली पर शासन करते हुए तीन साल ही हुए थे कि अत्यधिक शराब पीने के कारण उसे लकवा मार गया तथा अमीरों ने कैकुबाद के अल्पवयस्क पुत्र क्यूमर्स को सुल्तान बना दिया।

पाठकों को स्मरण होगा कि लकुआ मारने से कुछ समय पहले ही पूर्व सुल्तान कैकुबाद ने मंगोलों के विरुद्ध लगातार युद्ध जीत रहे सेनापति जलालुद्दीन खिलजी को दिल्ली बुलाकर उसे आरिज-ए-मुमालिक अर्थात् सेना का निरीक्षक नियुक्त किया था और उसे शाइस्ता खाँ की उपाधि दी थी।

कैकुबाद खिलजियों के माध्यम से तुर्की अमीरों पर नियंत्रण रखता था। इस कारण कैकुबाद के शासनकाल में दिल्ली सल्तनत की राजनीति में खिलजियों का बोलबाला हो गया था जबकि दिल्ली के अमीर उन्हें तुर्क नहीं मानते थे।

कैकुबाद को लकवा होने के बाद तुर्की अमीरों ने गैर-तुर्की सरदारों को जान से मार डालने की योजना बनाई। इस सूची में जलालुद्दीन खिलजी का नाम सबसे ऊपर था। जलालुद्दीन खिलजी को तुर्की अमीरों के षड़यंत्र का पता चल गया। वह तुरंत दिल्ली से बाहर, बहारपुर नामक स्थान पर चला गया जो कि दिल्ली से अधिक दूर नहीं था।

तुर्की अमीरों ने जलालुद्दीन खिलजी को फिर से दिल्ली में लाने का षड़यंत्र किया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

तुर्की अमीरों की तरफ से मलिक कच्छन, जलालुद्दीन खिलजी को बुलाने उसके शिविर में गया। जलालुद्दीन खिलजी मलिक कच्छन की मीठी बातों में नहीं आया तथा खिलजियों ने मलिक कच्छन की हत्या कर दी। इसके बाद जलालुद्दीन खिलजी के पुत्र दिल्ली में घुस गए और महल में घुसकर शिशु सुल्तान क्यूमर्स को उठा लाए। इस पर मलिक सुर्खा तथा अन्य तुर्की अमीरों ने खिलजियों का पीछा किया किंतु वे भी मार दिए गए।

इस घटना के कुछ दिन बाद खिलजी पुनः दिल्ली में घुसे। खिलजी मलिक ने कीलूगढ़ी के महल में घुसकर लकवे से पीड़ित सुल्तान कैकूबाद को लातों से पीट-पीट कर मार डाला तथा उसका शव एक चादर में लपेटकर यमुनाजी में फैंक दिया। इसके बाद जलालुद्दीन खिलजी शिशु सुल्तान क्यूमर्स का संरक्षक तथा वजीर बनकर शासन करने लगा।

जलालुद्दीन खिलजी ने कुछ दिनों तक परिस्थितियों का आकलन किया तथा परिस्थितियाँ अपने अनुकूल जानकर कुछ ही दिनों बाद क्यूमर्स को कारागार में पटक दिया और 13 जून 1290 को दिल्ली के तख्त पर बैठ गया।

इस प्रकार भारत पर लगभग 90 वर्ष के दीर्घकालीन शासन के बाद अपमानपूर्ण ढंग से इल्बरी तुर्कों के शासन का अंत हुआ। जलालुद्दीन खिलजी ने कुछ समय पश्चात् शिशु सुल्तान क्यूमर्स की भी हत्या कर दी। इसी के साथ दिल्ली सल्तनत से गुलाम वंश का भी अंत हो गया।

दिल्ली के तख्त से गुलाम वंश की विदाई एक स्वाभाविक घटना थी। आश्चर्य इस बात पर नहीं होना चाहिए कि बलबन के मरते ही केवल तीन साल में उसके वंश का अंत हो गया, आश्चर्य इस बात पर होना चाहिए कि बलबन के अयोग्य वंशज तीन साल तक उसके तख्त पर टिके कैसे रहे!

To purchase this book, please click on photo.

तुर्की शासकों में न तो उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम था और न कोई भी अमीर सुल्तान के प्रति निष्ठा रखता था। अतः प्रत्येक सुल्तान की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के लिए संघर्ष आरम्भ हो जाता था। इस संघर्ष का राज्य की शक्ति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता था। इस संघर्ष से सुल्तान का पद कमजोर हो जाता था और अमीर तथा मलिक अधिक ताकतवर बन जाते थे। तुर्की वंश के सुल्तानों के शासन का आधार स्वेच्छाचारी सैनिक शासन था जिसकी नींव सदैव निर्बल होती है। यह सैनिक-अंशाति का युग था। किसी रचनात्मक सुल्तान के स्थान पर कोई युद्धप्रिय सेनापति ही दिल्ली सल्तनत पर शासन कर सकता था। अब तक के तुर्की शासकों ने भारत के बहुसंख्यक हिन्दुओं से कोई तारतम्य स्थापित नहीं किया था। वे हिन्दुओं की तो कौन कहे उन मुसलमानों को भी अपने से नीचा समझते थे जो हिन्दू से मुसलमान बन गए थे। दूसरी ओर हिन्दू राजवंश अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता को भूले नहीं थे और उसे प्राप्त करने के लिए सदैव सचेष्ट रहते थे। वे प्रायः विद्रोह कर देते थे। फलतः हिन्दुओं की सहायता तथा सहयोग गुलाम वंश के सुल्तानों को नहीं मिल सका।

गुलाम सुल्तानों के शासन काल में भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के आक्रमणों की झड़ी लगी हुई थी जिसके कारण सुल्तान का ध्यान उसी ओर लगा रहता था और वह सल्तनत में ऐसी संस्थाओं का निर्माण करने में सफल नहीं हो पाता था जो सल्तनत के साथ-साथ सुल्तान एवं उसके वंश को भी स्थायित्व दे सके। विद्रोहों को दबाने के लिए प्रान्तीय शासकों के नेतृत्व में विशाल सेनाएं रखनी पड़ती थीं। विद्रोही हाकिम इन सेनाओं का उपयोग प्रायः सुल्तान के विरुद्ध करने लगते थे।

बलबन के दुर्भाग्य से उसके उत्तराधिकारी निर्बल तथा अयोग्य थे। उन्होंने तुर्की अमीरों का प्रभाव कम करने के लिए खिलजियों को दिल्ली में बुलाकर बहुत बड़ी भूल की। जब तुर्की सरदारों ने खिलजियों को नष्ट करने का षड़यंत्र रचा तो खिलजियों ने न केवल प्रभावशाली तुर्की अमीरों को मार डाला अपितु सुल्तान से भी छुटकारा पाकर उसकी सल्तनत हड़प ली।

बहुत से इतिहासकारों ने यह प्रश्न उठाया है कि गुलाम वंश के शासकों में सबसे सफल सुल्तान कौन था? इस प्रश्न के उत्तर में कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, रजिया, नासिरुद्दीन एवं बलबन के नाम लिए जाते हैं। वस्तुतः इन सभी सुल्तानों ने दिल्ली सल्तनत को सीमित स्थायित्व दिया था।

सुल्तान के रूप में कुतुबुद्दीन ऐबक तथा रजिया के शासन काल लगभग चार-चार साल से भी कम रहे फिर भी उनकी सैनिक उपलब्धियां उल्लेखनीय थीं। इल्तुतमिश ने 25 साल, उसके पुत्र नासिरुद्दीन ने 19 साल तथा बलबन ने 21 साल शासन किया था। इनमें से नासिरुद्दीन एक कमजोर शासक था तथा शासन की वास्तविक शक्ति बलबन के हाथों में थी।

सुल्तान के रूप में इल्तुतमिश एवं बलबन ने सल्तनत को न केवल सुरक्षित रखा अपितु उसे मजबूती भी प्रदान की। अतः कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, रजिया सुल्तान एवं बलबन में से किसी एक को सफल बताना, अन्य तीन सुल्तानों के प्रति अन्याय होगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जलालुद्दीन खिलजी हिन्दुओं के ढोल नगाड़े सुनकर खून के आंसू रोता था (81)

0
जलालुद्दीन खिलजी - www.bharatkaitihas.com
जलालुद्दीन खिलजी हिन्दुओं के ढोल नगाड़े सुनकर खून के आंसू रोता था

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी अफगानिस्तान के खिलजी कबीले का तुर्क था। वह कट्टर मुसलमान था जो हिन्दुओं के ढोल-नगाड़े सहन करने को तैयार नहीं था। वह भारत के समस्त हिन्दुओं को मुसलमान बनाना चाहता था।

दिल्ली सल्तनत के तुर्की अमीरों ने जलालुद्दीन खिलजी को मारने का षड़यंत्र इसलिए रचा था क्योंकि तुर्की अमीरों की दृष्टि में जलालुद्दीन खिलजी ‘तुर्क’ नहीं था। मुस्लिम इतिहासकारों निजामुद्दीन अहमद, बदायूंनी तथा फरिश्ता ने खिलजियों के वंश की उत्पत्ति के बारे में अलग-अलग बातें लिखी हैं।

‘तारीखे फखरुद्दीन मुबारकशाही’ के लेखक फखरुद्दीन ने 64 तुर्की कबीलों की एक सूची दी है जिसमें खिलजी कबीला भी सम्मिलित है। विन्सेट स्मिथ के विचार में खिलजी लोग अफगान अथवा पठान थे परन्तु यह धारणा सर्वथा अमान्य हो गई है। सर हेग के विचार में खिलजी मूलतः तुर्क थे परन्तु बहुत दिनों से अफगानिस्तान के गर्मसीर प्रदेश में रहने के कारण उन्होंने अफगानी रीति-रिवाज ग्रहण कर लिए थे। इस कारण दिल्ली के तुर्क खिलजियों को तुर्क नहीं मानते थे।

‘हिस्ट्री ऑफ खिलजीज’ के लेखक डॉ. किशोरी शरण लाल ने इस्लामी इतिहासकारों की बातों का निष्कर्ष निकालते हुए यह मत प्रस्तुत किया है कि खिलजी भी तुर्की थे जो 10वीं शताब्दी ईस्वी के पहले, तुर्किस्तान से आकर अफगानिस्तान के खल्ज प्रदेश में बस गए थे। उन्होंने अफगानी रीति रिवाजों को अपना लिया था।

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए यही मानना उचित प्रतीत होता है कि खिलजी मूलतः तुर्क थे जो कालान्तर में तुर्किस्तान से चलकर अफगानिस्तान की हेलमन्द घाटी तथा लमगाम प्रदेश के गर्मसीर क्षेत्र में आकर बस गए थे। दो सौ साल तक अफगानिस्तान में रहने के कारण उनका रहन-सहन पठानों जैसा हो गया था। अफगानिस्तान में खल्ज नामक गाँव से वे खिलजी कहलाये। अधिकांश भारतीय इतिहासकारों की भांति लगभग समस्त विदेशी इतिहासकारों ने भी खिलजियों को तुर्क माना है।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

भारत में आने वाले अधिकांश खिलजी या तो तुर्क आक्रांताओं के साथ उनके सैनिकों के रूप में भारत आए थे या फिर मंगोलों के आक्रमण से त्रस्त होकर उन्हें अफगानिस्तान छोड़कर भारत आना पड़ा था और उन्होंने तुर्की अमीरों तथा सुल्तानों की सेवा करना स्वीकार कर लिया था।

भारत में खिलजी राजवंश का संस्थापक जलालुद्दीन खिलजी 70 वर्ष की आयु में ई.1290 में दिल्ली के तख्त पर बैठा। इससे पहले वह अनेक वर्षों तक बलबन तथा कैकुबाद के लिए भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोलों के विरुद्ध युद्ध करता रहा था।

जलालुद्दीन खिलजी का राजगद्दी संभालना मामलुक राजवंश अर्थात् गुलाम वंश के अंत और अभिजात्य वर्ग के वर्चस्व का द्योतक था। जलालुद्दीन खिलजी कट्टर मुसलमान था जो मुजाहिद-ए-सबीलिल्लाह अर्थात् अल्लाह की राह में संघर्षरत योद्धा के रूप में स्वीकारा जाना चाहता था। जलालुद्दीन खिलजी भारत में इस्लामिक नियम एवं कानून लागू करने में अपनी असमर्थता को लेकर दुःखी रहता था।

अपने इस दुःख को व्यक्त करते हुए एक दिन उसने अपने दराबर में कहा था- ‘हम सुल्तान महमूद से अपनी तुलना नहीं कर सकते…… हिन्दू…… हर दिन मेरे महल के नीचे से गुजरते हैं, अपने ढोल और तुरही बजाते हुए और यमुना नदी में जाकर मूर्ति पूजा करते हैं।’

To purchase this book, please click on photo.

जलालुद्दीन खिलजी का वास्तविक नाम मलिक फीरोज खिलजी था। वह ‘खिलजी’ कबीले का तुर्क था। अपनी युवावस्था में जलालुद्दीन अपने कुटुम्ब सहित भारत चला आया और दिल्ली के सुल्तानों के यहाँ नौकरी करने लगा। जलालुद्दीन ने सर्वप्रथम नासिरूद्दीन महमूदशाह अथवा बलबन के शासन काल में सेना में प्रवेश किया था। बलबन के जिन सेनापतियों को सीमा प्रदेश की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया था उनमें से जलालुद्दीन खिलजी भी एक था। कैकुबाद के शासनकाल में जलालुद्दीन शाही अंगरक्षकों के अध्यक्ष के उच्च पद पर पहुँच गया। बाद में वह समाना का गवर्नर नियुक्त कर दिया गया। वह योग्य सेनापति था। सीमान्त प्रदेश में कई बार उसने मंगोलों के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की। इस प्रकार उसने सैनिक तथा शासक दोनों रूपों में ख्याति प्राप्त कर ली थी। इसलिए सुल्तान कैकुबाद ने उसे शाइस्ता खाँ की उपाधि दी। जब सेना के अमीर मलिक तुजाकी की मृत्यु हो गई तो कैकुबाद ने जलालुद्दीन खिलजी को सेना-मंत्री के उच्च पद पर नियुक्त कर दिया। दिल्ली दरबार में मंत्री होने के साथ-साथ वह समस्त भारत में बिखरे हुए विशाल खिलजी कबीले का प्रमुख भी था। इस कबीले के लोग इख्तियारुद्दीन-बिन-बख्तियार खिलजी के समय बंगाल में शासन कर चुके थे।

जब सुल्तान कैकुबाद को लकवा हो गया तब तुर्की अमीरों ने जलालुद्दीन खिलजी की हत्या करने का षड़यंत्र रचा। इस पर जलालुद्दीन खिजली दिल्ली में घुसकर शिशु सुल्तान क्यूमर्स को उठा ले गया। जब तुर्की अमीरों ने उसका पीछा किया तो खिलजियों ने तुर्की अमीरों को मार डाला।

कुछ दिनों बाद जब खिलजियों ने कैकुबाद के महल में घुसकर उसे लातों से मार डाला तब जलालुद्दीन खिजली, शिशु सुल्तान क्यूमर्स को पुनः दिल्ली ले आया तथा उसका संरक्षक बनकर शासन करने लगा। कुछ ही दिनों बाद जलालुद्दीन ने शिशु सुल्तान क्यूमर्स को कारागार में डाल दिया तथा स्वयं दिल्ली का स्वतंत्र सुल्तान बन गया।

जलालुद्दीन का यह कार्य ठीक वैसा ही था जैसा बगदाद के तुर्की गुलामों ने अपने स्वामियों अर्थात् बगदाद के खलीफाओं के साथ किया था, जैसा गजनी की तुर्की अमीरों ने अपने स्वामियों अर्थात् मुहम्मद गौरी के पुत्रों के साथ किया था, जैसा दिल्ली के तुर्की अमीरों ने अपने स्वामियों अर्थात् रजिया सुल्तान और बहरामशाह के साथ किया था। तुर्की कबीलों में सत्ता प्राप्त करने का कोई भी तरीका उचित माना जाता था। नैतिकता और अनैतिकता के प्रश्न उन्हें परेशान नहीं करते थे।

इस तथ्य से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सत्ता प्राप्त करने के लिए तुर्की अमीर कितने भूखे थे और वे किसी भी शरणदाता, स्वामी एवं संरक्षक से गद्दारी करने में संकोच नहीं करते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मलिक छज्जू के साथ हो गए बागी हिन्दू (82)

0
मलिक छज्जू - www.bharatkaitihas.com
मलिक छज्जू के साथ हो गए बागी हिन्दू

बलबन के भतीजे मलिक छज्जू ने बगावत का झण्डा उठाया जो कि कड़ा-मानिकपुर का गवर्नर बनाया गया था। मलिक छज्जू ने भरे दरबार में सुल्तान की अधीनता स्वीकार की थी और तभी से राजभक्ति प्रदर्शित कर रहा था किंतु असन्तुष्ट तुर्क सरदारों ने उसे विद्रोह करने के लिए उकसाया।

तुर्की सरदार सत्ता के इतने भूखे थे कि वे सत्ता प्राप्त करने के लिए अपने किसी भी स्वामी के साथ गद्दारी कर सकते थे! लकुवाग्रस्त सुल्तान कैकूबाद तथा शिशु सुल्तान क्यूमर्स की निर्मम हत्याएं करके 13 जून 1290 को मलिक फीरोज खिलजी ‘जलालुद्दीन फीरोजशाह खिलजी’ के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। उस समय उसकी आयु 70 वर्ष थी।

तुर्की अमीरों के उत्पात से बचने के लिए उसने दिल्ली के लालकोट में अपनी ताजपोशी नहीं करवाई जिसमें बलबन रहा करता था। जलालुद्दीन खिलजी दिल्ली के बाहर कीलूगढ़ी अथवा किलोखरी नामक दुर्ग में तख्त पर बैठा और उसी को अपनी राजधानी बना लिया। यहाँ उसने कैकुबाद के समय से निर्माणाधीन चल रहे महल को पूर्ण करवाया और उसी में रहने लगा।

सुल्तान बनने के बाद जलालुद्दीन ने दिल्ली के उन अमीरों का विश्वास जीतने का प्रयास किया जिन्होंने खिलजियों का विरोध नहीं किया था। उसने शासकीय पदों पर खिलजियों के साथ-साथ अन्य मुसलमानों को भी नियुक्त किया। उसने फखरुद्दीन को उसके पद पर अर्थात् दिल्ली का कोतवाल बने रहने दिया। सुल्तान जलालुद्दीन खिजली ने बलबन के भतीजे मलिक छज्जू को कड़ा-मानिकपुर का हाकिम बना दिया जो अपने कुल में अकेला ही जीवित बचा था। इससे सुल्तान जलालुद्दीन बहुत से तुर्की अमीरों का विश्वासपात्र बन गया।

सुल्तान जलालुद्दीन ने अपने पुत्रों एवं भाइयों को उच्च पदों पर नियुक्त किया। उसने सबसे बड़े पुत्र महमूद को खानखाना, दूसरे पुत्र को अर्कली खाँ की तथा तीसरे पुत्र को कद्र खाँ की उपाधियाँ दीं तथा अपने छोटे भाई को यग्रास खाँ की उपाधि देकर ‘आरिजे मुमालिक’ अर्थात् सैनिक मंत्री बना दिया। सुल्तान जलालुद्दीन ने अपने भतीजों अल्लाउद्दीन तथा असलम बेग को भी उच्च पद दिए तथा अपने एक निकट सम्बन्धी मलिक अहमद चप को ‘अमीरे हाजिब’ के पद नियुक्त किया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

जब जलालुद्दीन खिलजी को सुल्तान बने हुए एक साल हो गया तो दिल्ली के कोतवाल फखरूद्दीन ने दिल्ली के सैंकड़ों नागरिकों के साथ सुल्तान के समक्ष उपस्थित होकर उसे किलोखरी से दिल्ली आने के लिए आमन्त्रित किया। सुल्तान ने उन लोगों के निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया और वह अपने परिवार तथा मंत्रियों सहित दिल्ली आ गया।

जब जलालुद्दीन खिलजी दिल्ली में लालकोट के सामने पहुंचा तो पूर्ववर्ती सुल्तानों के सम्मान में अपने घोड़े से उतर पड़ा तथा उसने उस तख्त पर बैठने से मना कर दिया जिस पर कभी कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश तथा बलबन जैसे महान सुल्तान बैठा करते थे। जलालुद्दीन खिलजी ने रोते हुए कहा कि वह इस सिंहासन पर नहीं बैठेगा जिसके सामने वह कई बार साधारण अमीर की हैसियत से खड़ा हुआ था।

To purchase this book, please click on photo.

जलालुद्दीन खिलजी के सुल्तान बनने के बाद उन तुर्की अमीरों में विद्रोह की सुगबुगाहट आरम्भ हुई जो उच्च पदों पर पहुंचने के आकांक्षी थे। सबसे पहले बलबन के भतीजे मलिक छज्जू ने बगावत का झण्डा उठाया जो कि कड़ा-मानिकपुर का गवर्नर बनाया गया था। मलिक छज्जू ने भरे दरबार में सुल्तान की अधीनता स्वीकार की थी और तभी से राजभक्ति प्रदर्शित कर रहा था किंतु असन्तुष्ट तुर्क सरदारों ने उसे विद्रोह करने के लिए उकसाया। दूसरी ओर अनेक युवा खिलजी भी सुल्तान की इस नीति से अंसतुष्ट थे कि सुल्तान अन्य मुसलमानों को भी शासन में ऊँचे पद दे रहा था। इसलिए वे भी सुल्तान के प्रति विद्रोह की भावना रखते थे। इन परिस्थितियों में मलिक छज्जू ने विद्रोह का झंडा खड़ा करके स्वयं को स्वतन्त्र सुल्तान घोषित कर दिया। उसने कड़ा-मानिकपुर में अपना राज्याभिषेक करवाया तथा अपने नाम की मुद्राएं अंकित करवाईं। उसने ‘मुगीसुद्दीन’ की उपाधि धारण करके अपने नाम में खुतबा पढ़वाया। इसके बाद अपने पूर्वज बलबन का सिहांसन प्राप्त करने के लिए एक विशाल सेना के साथ दिल्ली की ओर कूच कर दिया। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि इस अवसर पर आसपास के हिन्दू रावत एवं जमींदार चींटियों और टिड्डियों की तरह मलिक छज्जू के साथ एकत्रित हो गए।

प्रसिद्ध रावतों एवं पायकों ने पान का बीड़ा लेकर संकल्प लिया कि वे सुल्तान जलालुद्दीन के छत्र पर अधिकार जमा लेंगे। पीरमदेव कोतला नामक एक प्रसिद्ध हिन्दू रावत इनमें प्रमुख था। इतिहास की पुस्तकों में उसे भीमदेव भी लिखा गया है।

जब जलालुद्दीन खिलजी को मलिक छज्जू के विद्रोह की सूचना मिली तब उसने अपने बड़े पुत्र खानाखाना को दिल्ली की सुरक्षा पर नियुक्त करके स्वयं एक विशाल सेना लेकर मलिक छज्जू का सामना करने के लिए रवाना हुआ।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने अपने दूसरे पुत्र अर्कली खाँ को अपनी सेना के हरावल में नियुक्त किया तथा स्वयं मुख्य सेना के साथ रहा। जब तक अर्कली खाँ अपने हरावल के साथ काली नदी पार करता, तब तक मलिक छज्जू काली नदी के उस पार आकर अपना डेरा जमा चुका था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जलालुद्दीन खिलजी की नीति (83)

0
जलालुद्दीन खिलजी की नीति - www.bharatkaitihas.com
जलालुद्दीन खिलजी की नीति

हालांकि जलालुद्दीन खिलजी दो मुसलमान बादशाहों की हत्या करके दिल्ली सल्तनत के तख्त पर बैठा था किंतु सुल्तान बन जाने के बाद जलालुद्दीन खिलजी की नीति हिन्दुओं के साथ कठोरतम व्यवहार करने की और मुसलमानों के साथ उदारता बरतने की बन गई।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने तुर्की अमीरों को अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें बड़े-बड़े पद दिए। इस कारण कुछ तुर्की अमीर तो सुल्तान को पसंद करने लगे किंतु कई तुर्की अमीरों तथा युवा खिलजियों ने 70 साल के बूढ़े जलालुद्दीन को पसंद नहीं किया और वे बगावत की योजना बनाने लगे।

सबसे पहले बलबन के भतीजे मलिक छज्जू ने बगावत का झण्डा बुलंद किया जिसे कड़ा-मानिकपुर का गवर्नर बनाया गया था। हजारों हिन्दू सैनिक, रावत एवं पायक भी छज्जू के साथ एकत्रित हो गए। इस पर सुल्तान जलालुद्दीन ने अपनी राजधानी दिल्ली को बड़े पुत्र खानखाना महमूद की सुरक्षा में छोड़ा तथा अपने छोटे पुत्र अर्कली खाँ को साथ लेकर मलिक छज्जू का दमन करने के लिए चला।

जब तक सुल्तान के पुत्र अर्कली खाँ ने सेना के अग्रिम भाग सहित काली नदी पार की तब तक मलिक छज्जू एवं विद्रोही हिन्दुओं की सेना काली नदी के उस पार आकर अपने डेरे गाढ़ चुकी थी। इसलिए मलिक छज्जू ने तुरंत ही विद्रोहियों की सेना पर हमला बोल दिया।

जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि काली नदी पार करते ही अर्कली खाँ मलिक छज्जू की सेना पर टूट पड़ा तथा एक ही प्रयास में उसने छज्जू को परास्त करके दूर भाग जाने पर विवश कर दिया। जबकि अमीर खुसरो ने लिखा है कि दोनों पक्षों में कई दिनों तक सुबह से शाम तक संघर्ष होता रहा। अंत में मलिक छज्जू की सेना के कई सरदार थककर समर्पण करने को तैयार हो गए। जब मलिक छज्जू को अपने साथियों के इस विचार की जानकारी हुई तो वह रात के अंधेरे में अपना शिविर छोड़कर भाग गया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

यहिया नामक एक मुस्लिम लेखक ने लिखा है कि रहब नदी के किनारे दोनों पक्षों में कई दिन और कई रात युद्ध हुआ। इसी बीच पीरमदेव कोतला के कुछ साथियों ने मलिक छज्जू के समक्ष उपस्थित होकर उसे बताया कि वह केवल अर्कली खाँ की सेना को ही वास्तविक शत्रु न समझे, सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी स्वयं भी अपनी विशाल सेना लेकर काली नदी के उस पार आ गया है तथा नदी पार करने की तैयारी कर रहा है। यह समाचार सुनकर मलिक छज्जू रात्रि में ही शिविर छोड़कर भाग गया। अगले दिन पीरमदेव कोतला तथा उसके साथी हिन्दू रावतों एवं पायकों ने मोर्चा संभाला।

इस समय तक अर्कली खाँ की सेना काफी बड़ी हो चुकी थी और उसने पीरमदेव कोतला को युद्ध के मैदान में ही मार डाला। इसके बाद अर्कली खाँ ने अपनी सेना को आदेश दिया कि वह भगोड़े छज्जू का पीछा करे। मलिक छज्जू ने पास के एक ‘मवास’ में शरण लेने का विचार किया किंतु वहाँ के मुकद्दम ने मलिक छज्जू को पकड़कर सुल्तान जलालुद्दीन के पास भेज दिया। इस पर भी अर्कली खाँ अपने काम में लगा रहा तथा उसकी सेना ने मलिक छज्जू के सैंकड़ों साथियों को आसपास के जंगलों से पकड़ लिया।

To purchase this book, please click on photo.

मलिक छज्जू तथा उसके साथियों को रस्सियों से बांधकर सुल्तान जलालुद्दीन के समक्ष उपस्थित किया गया। एक उच्च वंशी तुर्क को रस्सियों में बंधे हुए देखकर सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की आँखों में दुःख के आंसू उमड़ आए। सुल्तान ने विद्रोही मलिक छज्जू तथा उसके साथियों को बन्धन-मुक्त करके उनके वस्त्र बदलवाए तथा उन्हें मदिरा-पान करवाया और उनके स्वागत-सम्मान में सुंदर स्त्रियों के नृत्य का आयोजन करवाया। सुल्तान ने मलिक छज्जू के साथियों की इस बात के लिए प्रशंसा की वे अपने पुराने स्वामियों के वंशजों के प्रति निष्ठावान थे। सुल्तान ने छज्जू एवं उसके साथियों को भविष्य में विद्रोह न करने का उपदेश देकर उन्हें क्षमा कर दिया तथा उन्हें कोई सजा नहीं दी। सुल्तान के इस व्यवहार से मलिक छज्जू तथा उसके साथी तो बहुत प्रसन्न हुए किंतु तुर्की एवं अफगानी अमीरों के क्रोध का पार न रहा। उन्होंने अपने प्राणों पर खेलकर विद्रोहियों को पकड़ा था। सुल्तान का रिश्तेदार मलिक अहमद चप एक नौजवान अमीर था जिसे सुल्तान ने अमीरे हाजिब के पद नियुक्त किया था। वह सुल्तान की इस मूर्खता को सहन नहीं कर सका और उसने भरे दरबार में सुल्तान की भर्त्सना करते हुए कहा कि ऐसे कामों से विद्रोहियों को प्रोत्साहन मिलता है। इस पर सुल्तान ने कहा कि मैं क्षण-भंगुर राज्य के लिए एक भी मुसलमान का कत्ल करना पसंद नहीं करता।

एक ओर तो सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने मलिक छज्जू के साथ अतिथियों जैसा व्यवहार किया किंतु दूसरी ओर उसके हिन्दू साथियों को हाथियों के पैरों तले कुचलवा कर मरवा दिया। जलालुद्दीन खिलजी ने आसपास के मैदानों को कटवाकर साफ कर दिया ताकि विद्रोही हिन्दुओं को पकड़कर मारा जा सके। जिन हिन्दू राजाओं ने अब तक कर नहीं दिया था, उन्हें भी पकड़कर बुलाया गया तथा कठोर दण्ड दिया गया।

सुल्तान ने अपने पुत्र अर्कली खाँ को मुल्तान का गवर्नर नियुक्त किया तथा अपने भतीजे अल्लाउद्दीन खिलजी को कड़ा-मानिकपुर का गवर्नर बना दिया जो कि सुल्तान का दामाद भी था। सुल्तान के निर्देश पर मलिक छज्जू को नजरबन्द करके शाही सुख-सुविधाओं के बीच दिल्ली में ही रखा गया और उस पर कड़ा पहरा बैठा दिया गया जबकि अन्य प्रमुख मुस्लिम विद्रोहियों को दिल्ली से बाहर स्थानांतरित कर दिया गया।

बलबन अपने विरोधियों को एक जैसी सजा देता था चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान जबकि सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने सल्तनत की नीति में बड़ा परिवर्तन करते हुए मुसलमानों के साथ उदारता एवं हिन्दुओं के साथ कठोरता की नीति अपनाई। संभवतः इस नीति के पीछे जलालुद्दीन खिलजी का यह चिंतन काम कर रहा था कि भविष्य में हिन्दू तथा मुसलमान मिलकर बगावत नहीं कर सकें।

एक ओर तो जलालुद्दीन खिलजी इस नीति पर चल रहा था कि वह हिन्दुओं और मुसलमानों को एकत्रित हाने से रोक सके तथा दूसरी ओर वह इस नीति को अपना रहा था कि किसी भी हालत में सुल्तान का तुर्की अमीरों से सीधा टकराव न हो जाए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सीदी मौला भारत का खलीफा बनना चाहता था (84)

0
सीदी मौला - www.bharatkaitihas.com
सीदी मौला भारत का खलीफा बनना चाहता था

सीदी मौला अजुद्धान अर्थात् पाकपटन के ‘शेख फरीदुद्दीन गजेशंकर’ का शिष्य था। सीदी मौला के गुरु ने उसे राजनीति से दूर रहने का उपदेश दिया था परन्तु दिल्ली आने पर सीदी मौला की रुचि राजनीति में हो गई।

दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने पूर्व सुल्तान बलबन के भतीजे मलिक छज्जू का सफलता पूर्वक दमन करके उसे क्षमा कर दिया तथा उसके हिन्दू साथियों को हाथियों के पैरों के नीचे कुचलवाकर मरवा दिया।

उन दिनों दिल्ली में सीदी मौला नामक एक दरवेश का बड़ा बोलबाला था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार वह मूलतः फारस से आया हुआ एक दरवेश था जो ई.1291 में अर्थात् जलालुद्दीन खिलजी के सुल्तान बनने के कुछ समय बाद दिल्ली चला आया और दिल्ली में ही स्थायी रूप से निवास कर रहा था।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि सीदी मौला अजुद्धान अर्थात् पाकपटन के ‘शेख फरीदुद्दीन गजेशंकर’ का शिष्य था। सीदी मौला के गुरु ने उसे राजनीति से दूर रहने का उपदेश दिया था परन्तु दिल्ली आने पर उसकी रुचि राजनीति में हो गई। इस रुचि का एक विशेष कारण था।

सीदी ने दिल्ली की गलियों में लोगों को यह कहते हुए सुना कि भारत में सुल्तान बनना इतना आसान है कि गजनी का कोई भी गुलाम भारत आकर सुल्तान बन जाता है। मौला को बताया गया कि जो कोई भी व्यक्ति सुल्तान का कत्ल कर देता है, वही दिल्ली का अगला सुल्तान बन जाता है। स्वयं जलालुद्दीन खिलजी भी पुराने सुल्तानों का कत्ल करके सुल्तान बना है और अगला सुल्तान भी ऐसे ही बनेगा।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

सीदी मौला ने भारत को अपने लिए अवसरों के खजाने के रूप में देखा तथा उसने न केवल भारत का सुल्तान बनने अपितु खलीफा बनने का स्वप्न भी देख डाला। उसने दिल्ली की मुस्लिम जनता को इस्लाम के उपदेशों के साथ-साथ जन्नत की हूरों से लेकर बगदाद और फारस की हसीनाओं की ऐसी-ऐसी रोचक कथाएं सुनाईं कि दिल्ली के हजारों युवक उसके शिष्य बन गए।

जब सीदी मौला की प्रसिद्धि बढ़ने लगी तो दिल्ली सल्तनत के बड़े-बड़े अमीर भी उसके यहाँ आकर उपस्थिति देने लगे। यहाँ तक कि कुछ अमीरों ने मरहूम सुल्तान नासिरुद्दीन की एक पुत्री का विवाह सीदी मौला से करवा दिया।

To purchase this book, please click on photo.

कहा जाता है कि सीदी मौला ने दिल्ली में अजोद पर एक खानकाह बनवाई थी जिसमें चारों दिशाओं से लोग आते थे तथा हजारों व्यक्तियों को प्रतिदिन निःशुल्क भोजन मिलता था। डॉ. बरनी ने लिखा है कि वह स्वयं बहुत कम भोजन करता था किंतु उसकी रसोई में प्रतिदिन दो हजार मन आटा, दो हजार किलो मांस, और दो हजार किलो घी खर्च होता था। दिल्ली की जनता में सीदी मौला के आय के साधनों के बारे में तरह-तरह की बातें होती थीं। वह लोगों को विचित्र रूप से धन देता था। बरनी का कहना है कि वह धन अधिक चमकीला होता था। कुछ लोग उसे रहस्यमय शक्तियों का स्वामी समझते थे तो कुछ लोग उसे डाकुओं तथा लुटेरों का सरदार मानते थे। जब दिल्ली में मौला के चाहने वालों की संख्या बढ़ गई तो सीदी ने राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए षड्यन्त्र रचना आरम्भ किया। उसने अपने अनुयाइयों के साथ मिलकर यह तय किया कि शुक्रवार की नमाज के बाद सुल्तान को खत्म कर दिया जाए तथा सीदी को खलीफा घोषित कर दिया जाये। सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी को सीदी द्वारा रचे जा रहे षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने सीदी को पकड़वा कर दरबार में बुलवाया।

जब सीदी को सुल्तान के सामने लाया गया तब सीदी ने किसी भी षड़यंत्र में शामिल होने की बात से इन्कार कर दिया तथा सुल्तान से विवाद करना आरम्भ कर दिया। इस पर जलालुद्दीन को क्रोध आ गया और वह चिल्लाकर बोला- ‘यहाँ कोई नहीं है जो इस दुष्ट को ठीक कर दे।’

इतना सुनते ही दरबार में खड़े एक व्यक्ति ने उसकी छाती में छुरा भोंक दिया। छुरा लगने पर भी उसके प्राण नहीं निकले।

इस पर शहजादे अर्कली खाँ ने सीदी मौला को हाथी के पैर के नीचे कुचलवा दिया। आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि एक धर्मान्ध मुसलमान ने मौला पर छुरे से कई बार काटा ओर एक सूजा उसके शरीर में भौंक दिया। अंत में उसके शरीर को हाथी के पैरों तले कुचलवाया गया।

यह व्यक्ति सीदी मौला के सम्प्रदाय का विरोधी था। कहा जाता है कि जिस दिन सीदी मौला को मारा गया, उस दिन दिल्ली में ऐसा भयानक तूफान आया कि दिन में ही रात हो गई। उसके बाद आगामी ऋतु में वर्षा न होने से भयानक अकाल पड़ गया। कुछ समय उपरान्त सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की भी नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी गई।

आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि सीदी मौला की मृत्यु के बाद एक भयंकर आंधी आई तथा अनावृष्टि के कारण दुर्भिक्ष पड़ गया। लोगों ने समझा कि स्वर्गीय फकीर ने सुल्तान को शाप दिया है इसलिए ये सब दुर्घटनाएं हुईं। दुर्भिक्ष इतना भयंकर था कि अन्न का भाव एक जीतल प्रति सेर तक पहुंच गया और बड़ी संख्या में लोगों ने यमुनाजी में डूबकर प्राण त्याग दिए।

कहा नहीं जा सकता कि इन सब घटनाओं के पीछे किसी रहस्यमय शक्ति का हाथ था अथवा ये सब घटनाएं स्वतंत्र रूप से घटित हुई थीं और सीदी मौला के चेलों ने बड़ी चालाकी से इन घटनाओं का सम्बन्ध सीदी मौला की हत्या से जोड़ दिया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रणथम्भौर दुर्ग नहीं जीत सका जलालुद्दीन खिलजी (85)

0
रणथंभौर दुर्ग - www.bharatkaitihas.com
रणथंभौर दुर्ग नहीं जीत सका जलालुद्दीन खिलजी

सुल्तान ने रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण करने का निश्चय किया। रणथंभौर के शासक वीर हम्मीरदेव चौहान के सैनिक अपने दुर्ग की रक्षा के लिए दृढ़़-सकंल्प थे। राजपूतों की दृढ़़ता तथा दुर्ग की अभेद्यता से हताश होकर सुल्तान ने रणथम्भौर विजय का विचार त्याग दिया और घेरा उठाने के आदेश दिए।

जलालुद्दीन खिलजी ने बलबन के भतीजे मलिक छज्जू के विद्रोह का दमन करके उसे तथा उसके साथी मुस्लिम सैनिकों को तो क्षमा कर दिया था किंतु उसके साथ के हिंदू सैनिकों को जंगलों से पकड़कर उनकी निर्मम हत्या करवाई थी।

जलालुद्दीन खिलजी ने यह नीति आगे भी जारी रखी। कुछ समय बाद जलालुद्दीन की सेना ने उन डाकुओं को पकड़ा जो किसी समय हिन्दू थे तथा दिल्ली सल्तनत की सेना के सताए जाने के कारण मुसलमान हो गए थे। इन लोगों को न तो सेना में भर्ती किया गया था और न उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार आया था। इसलिए उनके कुछ समूह स्वयं संगठित होकर डकैती किया करते थे।

जब दिल्ली के निकटवर्ती जंगलों से इन समूहों के एक हजार डाकुओं को पकड़कर सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के समक्ष लाया गया तब सुल्तान ने उनके साथ भी उदारता का वैसा ही प्रदर्शन किया जो उसने मलिक छज्जू तथा उसके मुस्लिम विद्रोही साथियों के साथ किया था। सुल्तान ने उन्हें कठोर दण्ड देने के स्थान पर उन्हें चोरी की बुराइयों पर उपदेश दिया। सुल्तान ने उन्हें चेतावनी दी कि फिर कभी ऐसा निकृष्ट कार्य न करें और उन्हें नावों में बैठाकर बंगाल भेज दिया जहाँ उन्हें मुक्त कर दिया गया।

विद्रोहियों एवं अपराधियों के प्रति सुल्तान की इस उदार नीति की सर्वत्र आलोचना होने लगी तथा उसकी उदारता को उसकी दुुर्बलता समझा गया। तुर्की अमीर तो पहले से ही सुल्तान से असंतुष्ट थे, अब खिलजी अमीर भी उससे अप्रसन्न हो गए।

जलालुद्दीन खिलजी एक भी मुस्लिम सैनिक को मरते हुए नहीं देखना चाहता था। फिर भी उसने राजपूत राजाओं पर कुछ आक्रमण किए जिनमें उसे विशेष सफलता नहीं मिली। तत्कालीन मुस्लिम लेखकों द्वारा इस पराजय का कारण यह बताया जाता है कि सुल्तान अपने मुस्लिम सैनिकों के शव गिरते हुए नहीं देखना चाहता था।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

सुल्तान जलालुद्दीन का पहला आक्रमण ई.1291 में रणथम्भौर दुर्ग पर हुआ। सुल्तान ने स्वयं इस युद्ध का संचालन किया। उसने अपने पुत्र अर्कली खाँ को किलोखरी में रहने की आज्ञा दी तथा स्वयं एक सेना लेकर रणथम्भौर की ओर चल दिया। इस समय वीर हम्मीर रणथम्भौर का शासक था। उसके चौहान सैनिक अपने दुर्ग की रक्षा के लिए दृढ़़-सकंल्प थे।

सुल्तान ने सबसे पहले झाइन के दुर्ग पर आक्रमण किया। कुछ इतिहासकारों ने इसे छान का किला भी कहा है। रणथम्भौर दुर्ग के शासक हम्मीर ने सेनापति भीमसिंह के नेतृत्व में 10,000 सैनिक झाइन के दुर्ग की रक्षा करने के लिए भेजे किंतु दिल्ली की सेना ने रणथंभौर की इस सेना को परास्त करके झाइन के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अमीर खुसरो ने लिखा है कि एक ही धावे में हजारों रावत मार डाले गए। हिन्दू सेनानायक साहिनी भाग गया जबकि पराजित हिन्दू सेना रणथंभौर की ओर भाग आई।

To purchase this book, please click on photo.

इस पर सुल्तान जलालुद्दीन स्वयं झाइन पहुंचा तथा हम्मीरदेव के महल में रुका। वहाँ सुल्तान ने अनेक भवनों, मंदिरों एवं मूर्तियों का विध्वंस किया। इसके बाद सुल्तान ने मलिक खुर्रम के साथ आगे बढ़कर रणथम्भौर दुर्ग पर घेरा डाल दिया तथा उसने अपनी सेना के एक हिस्से को मालवा की ओर भेज दिया जिसने मालवा के समृद्ध क्षेत्र में लूटमार करके पर्याप्त धन प्राप्त किया। जब मालवा से शाही सेना का वह हिस्सा वापस लौट आया तब सुल्तान ने रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण करने का निश्चय किया। रणथम्भौर दुर्ग के शासक वीर हम्मीरदेव चौहान के सैनिक अपने दुर्ग की रक्षा के लिए दृढ़़-सकंल्प थे। उन्होंने बड़ी वीरता से तुर्कों का सामना किया। राजपूतों की दृढ़़ता तथा दुर्ग की अभेद्यता से हताश होकर सुल्तान ने रणथम्भौर दुर्ग पर विजय का विचार त्याग दिया और घेरा उठाने के आदेश दिए। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि जब सुल्तान ने रणथंभौर के दुर्ग को देखा तो आश्चर्यचकित रह गया तथा उसने घेरा उठाने के आदेश दिए। एक अन्य इतिहासकार ने लिखा है कि एक दिन राजपूतों ने शाही सेना के बहुत से मुस्लिम सैनिकों को काट डाला। उनके शवों को देखकर जलालुद्दीन के शोक का पार नहीं रहा और उसने तुरंत घेरा उठाने के आदेश दिए।

मलिक अहमद चप ने सुल्तान से कहा कि बिना जीत हासिल किए घेरा उठाने से सुल्तान की प्रतिष्ठा गिर जाएगी। इस पर सुल्तान ने जवाब दिया कि रणथम्भौर दुर्ग को जीतने के लिए असंख्य मुसलमानों की बलि देनी पड़ेगी। और मैं इस प्रकार के दस किलों को भी मुसलमानों के एक बाल को भी हानि पहुंचाकर लेने के पक्ष में नहीं। आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि सुल्तान ने कहा कि उसके मुसलमान सैनिकों के सिर का प्रत्येक बाल,रणथम्भौर दुर्ग जैसे सौ दुर्गों से अधिक मूल्यवान था।

शाही सेना के रणथंभौर से जाते ही हम्मीर चौहान ने झाइन के दुर्ग पर भी फिर से अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद पुनः शाही सेना ने झाइन पर आक्रमण करके उसे तहस-नहस कर दिया।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का दूसरा आक्रमण रेगिस्तान के मण्डोर राज्य पर हुआ। पाठकों को स्मरण होगा कि मण्डोर का राज्य शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के समय में दिल्ली सल्तनत के अधीन हो चुका था परन्तु बाद में जालौर के चौहान राजपूतों ने उस पर फिर से अपना अधिकार कर लिया था। ई.1292 में जलालुद्दीन खिलजी ने मण्डोर को पुनः अपने अधिकार में कर लिया।

जलालुद्दीन खिलजी के काल में शाही सेनाओं द्वारा दो और हिन्दू राजाओं पर आक्रमण किए गए जिनमें सुल्तान की सेनाओं को बड़ी विजय मिली किंतु ये दोनों आक्रमण जलालुद्दीन के भतीजे अल्लाउद्दीन खिलजी के नेतृत्व में किए थे जो कि सुल्तान का दामाद भी था।

इनमें से पहला आक्रमण ई.1292 में मालवा पर तथा दूसरा आक्रमण भिलसा पर किया गया और वहाँ के मन्दिरों तथा सेठ-साहूकारों को लूटकर अपार धन एकत्रित किया गया। अल्लाउद्दीन इस धन को लेकर दिल्ली लौट आया और उसने यह समस्त धन सुल्तान को भेंट कर दिया। सुल्तान ने अल्लाउद्दीन की सफलता से प्रसन्न होकर कड़ा-मानिकपुर के साथ-साथ अवध की जागीर भी उसे दे दी और उसे आरिज-ए-मुमालिक के पद पर नियुक्त कर दिया।

अल्लाउद्दीन द्वारा मालवा में स्थित देवगिरि के यादव राज्य पर किए गए आक्रमण की  विस्तृत चर्चा हम आगे करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जलालुद्दीन खिलजी की बेटी मंगोलों को दे दी गई (86)

0
जलालुद्दीन खिलजी की बेटी - www.bharatkaitihas.com
जलालुद्दीन खिलजी की बेटी मंगोलों को दे दी गई

जलालुद्दीन खिलजी संसार में किसी भी कीमत पर इस्लाम का प्रसार करना चाहता था। उसने मंगोलों को भी मुसलमान बनने का प्रस्ताव दिया। इसके बदले में जलालुद्दीन खिलजी की बेटी मंगोलों को दे दी गई तथा मंगोलों को दिल्ली में लाकर बसाया गया।

ई.1292 में सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की आज्ञा से उसके भतीजे एवं दामाद अल्लाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर आक्रमण करके भिलसा पर अधिकार कर लिया और वहाँ के मन्दिरों तथा सेठ-साहूकारों को लूटकर अपार धन एकत्रित कर लिया। इस धन को लेकर वह दिल्ली लौट आया और समस्त धन सुल्तान को भेंट कर दिया। सुल्तान ने प्रसन्न होकर कड़ा-मानिकपुर के साथ-साथ अवध की भी जागीर उसे दे दी और उसे आरिज-ए-मुमालिक के पद पर नियुक्त कर दिया।

कुछ खिलजी एवं अन्य तुर्की सरदारों ने सुल्तान को सावधान किया कि अल्लाउद्दीन युवा और महत्त्वाकांक्षी है, इसलिए उसे इतना बढ़ावा देना ठीक नहीं है किंतु सुल्तान ने उनसे कहा कि मैं उसे अपने पुत्र की भांति समझता हूँ तथा उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हूँ। जलालुद्दीन को अपने अमीरों की इस नेक सलाह की उपेक्षा करने का दुष्परिणाम आने वाले चार वर्षों के भीतर ही झेलना पड़ा।

जिस वर्ष अल्लाउद्दीन खिलजी भिलसा पर सफलता प्राप्त करके लौटा, उसी वर्ष ई.1292 में डेढ़ लाख मंगोलों ने हुलागू खाँ के पौत्र अब्दुल्ला के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। जलालुद्दीन खिलजी ने भी एक विशाल सेना के साथ पश्चिमोत्तर सीमा की ओर प्रस्थान किया। मंगोल-सेना ने सिन्धु नदी के पश्चिमी तट पर पड़ाव डाल रखा था। सुल्तान की सेना नदी के पूर्वी तट पर आ डटी।

जलालुद्दीन खिलजी ने बलबन के समय में मंगोलों के विरुद्ध कई युद्ध जीते थे तथा इन युद्धों में मिली सफलताओं के कारण ही जलालुद्दीन खिलजी का भाग्योत्कर्ष हुआ था और वह सुल्तान के पद तक पहुंचा था किंतु इस समय जलालुद्दीन खिलजी की आयु 72 वर्ष से अधिक हो चुकी थी और वह अपने जीवन में शांति चाहता था। इसलिए वह मंगोलों से युद्ध नहीं करना चाहता था अपितु सुलह-सफाई करके मंगोलों एवं दिल्ली सल्तनत की सीमा का निर्धारण करना चाहता था।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

इससे पहले कि सुल्तान कुछ कर पाता मंगोलों की सेना ने सिंधु नदी पार करके दिल्ली की सेना पर आक्रमण करने का प्रयास किया परन्तु सुल्तान जलालुद्दीन ने अत्यन्त दु्रतगति से मंगोलों पर आक्रमण करके उन्हें परास्त कर दिया। शाही सेना द्वारा हजारों मंगोलों को बन्दी बना लिया गया। दिल्ली की सेना चाहती थी कि पकड़े गए मंगोलों का संहार कर दिया जाए किंतु सुल्तान ने मंगालों के सम्बन्ध में कुछ और सोच रखा था।

अब तक मंगोल किसी भी धर्म को नहीं मानते थे, सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी चाहता था कि मंगोलों को मुसलमान बनाकर दिल्ली सल्तनत का मित्र बना लिया जाए। इसलिए जलालुद्दीन खिलजी ने मंगोलों के नेता अब्दुल्ला के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह मुसलमान बन जाए तथा जलालुद्दीन के साथ दिल्ली चलकर वहाँ आराम से रहे।

To purchase this book, please click on photo.

मंगोल सरदार अब्दुल्ला ने जलालुद्दीन खिलजी का यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया तथा जलालुद्दीन से अनुमति लेकर अपने अधिकांश मंगोल सैनिकों के साथ अपने देश को लौट गया परन्तु चंगेज खाँ के एक पौत्र उलूग खाँ तथा कई अन्य मंगोल सरदारों ने जलालुद्दीन की नौकरी करना स्वीकार करके इस्लाम स्वीकार कर लिया तथा बहुत से मंगोल सैनिकों के साथ दिल्ली के निकट बस गए। यह स्थान मंगोलपुरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दिल्ली में बसाए गए मंगोल नव-मुस्लिम कहलाने लगे। जलालुद्दीन खिलजी की बेटी का विवाह उलूग खाँ के साथ कर दिया गया। इससे तुर्की सरदारों को बड़ी निराशा हुई। उनकी दृष्टि में जलालुद्दीन खिलजी की बेटी मंगोल नेता के साथ किए जाने से तुर्कों के साथ-साथ दिल्ली सल्तनत की प्रतिष्ठा को भी बहुत ठेस पहुँची थी। मंगोलों को राजधानी के निकट बसाना सल्तनत के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध हुआ क्योंकि मंगोलपुरा दिल्ली के सुल्तान के विरुद्ध षड्यन्त्रों तथा कुचक्रों का केन्द्र बन गया। मंगोलों को परास्त करने के बाद जलालुद्दीन खिलजी ने किसी भी सैनिक अभियान का नेतृत्व नहीं किया। इसके बाद के सारे सैनिक अभियान उसके भतीजे एवं दामाद अल्लाउद्दीन के नेतृत्व में हुए जिसे जलालुद्दीन ने अपने बेटे की तरह पालपोस कर बड़ा किया था।

सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की यह नीति भी उसके विरुद्ध सिद्ध हुई। जलालुद्दीन खिलजी अपने मुसलमान सैनिकों, अमीरों तथा अपने परिवार के सदस्यों के प्रति जिस भावुकता का अनुभव करता था, वैसी भावुकता और सद्भावना न तो मुसलमान सैनिक, न तुर्की अमीर और न परिवार के सदस्य, जलालुद्दीन के प्रति अनुभव करते थे। उनकी दृष्टि में सुल्तान बूढ़ा, सनकी और दिमाग से कमजोर था जो अपराधियों, बागियों और मंगोलों के प्रति उदारता दिखाकर अपनी कमजोरी का प्रदर्शन करता था।

जलालुद्दीन खिलजी ने मलिक छज्जू को दण्ड देने की बजाय सम्मानित किया था, रणथंभौर को जीतने की बजाय बीच में से ही घेरा उठा लिया था, मंगोलों को मौत के घाट उतारने की बजाय दिल्ली में लाकर बसा लिया था और जलालुद्दीन खिलजी की बेटी का ब्याह उनके नेता के साथ कर दिया था।

इन सब कारणों से युवा खिलजी एवं अन्य तुर्की अमीर सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी से जितनी जल्दी हो सके, छुटकारा पा लेना चाहते थे। सबसे अधिक छटपटाहट सुल्तान के भतीजे और दामाद अल्लाउद्दीन खिलजी में थी जो स्वयं सुल्तान के तख्त पर बैठकर भारत के काफिरों पर नियंत्रण प्राप्त करना चाहता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देवगिरि के यादव अल्लाउद्दीन से परास्त हो गए (87)

0
देवगिरि के यादव - www.bharatkaitihas.com
देवगिरि के यादव अल्लाउद्दीन से परास्त हो गए

देवगिरि के यादव अल्लाउद्दीन से परास्त हो गए! उन्होंने अल्लाउद्दीन को 50 मन सोनाए 5 मन मोतीए 2 मन हीरे और 1 हजार मन चाँदी दी। अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना ने देवगिरि राज्य को जमकर लूटा।

मंगोलों पर की गई सैनिक कार्यवाही के बाद सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने कभी कोई सैनिक अभियान नहीं किया तथा सैनिक अभियानों की जिम्मेदारी अपने युवा भतीजे एवं दामाद अल्लाउद्दीन खिलजी पर डाल दी।

अल्लाउद्दीन खिलजी को मालवा क्षेत्र में स्थित भिलसा राज्य में जो सफलता प्राप्त हुई थी, उससे उसका उत्साह बहुत बढ़ गया था। भिलसा में ही उसने देवगिरि के यादव राज्य की अपार सम्पत्ति के विषय में सुना था। उसने इस राज्य की विशाल सम्पत्ति को लूटने का निश्चय किया परन्तु अपने ध्येय को किसी पर प्रकट नहीं होने दिया।

जब सुल्तान जलालुद्दीन मंगोल अभियान के बाद दिल्ली लौट आया तो अल्लाउद्दीन खिलजी ने उससे चन्देरी पर आक्रमण करने की आज्ञा प्राप्त की तथा इस अभियान के लिए नए सैनिकों की भर्ती करने लगा। कुछ अमीरों ने अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा की जा रही सैनिक भर्ती पर आपत्ति की किंतु सुल्तान ने इस आपत्ति को अस्वीकार कर दिया।

सुल्तान इस बात को समझ ही नहीं सका था कि जो भी सेनापति सैनिकों की भर्ती करेगा तथा उन्हें वेतन देगा, सैनिक उसी के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन करेंगे। अतः सेना की भर्ती का काम किसी और अमीर को सौंपा जाना चाहिए था।

जब अल्लाउद्दीन खिलजी ने शाही-व्यय पर आठ हजार सैनिकों की सेना खड़ी कर ली तब ई.1294 में वह एक विशाल सेना के साथ मालवा की ओर चल दिया। वह अत्यन्त दु्रतगति से चलता हुआ एलिचपुर पहुँचा तथा उस पर आक्रमण कर दिया। ऐलिचपुर की सफलता के बाद उसे चंदेरी पर आक्रमण करना था किंतु अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपनी सेना को देवगिरी पर आक्रमण करने का निर्देश दिया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

देवगिरि के यादव राजा रामचन्द्र को अल्लाउद्दीन खिलजी के उद्देश्यों की कुछ भी जानकारी नहीं थी। इसलिए उसने अपने राज्य की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की। अल्लाउद्दीन तेजी से चलता हुआ लाजौरा की घाटी पहुंचा जहाँ से देवगिरि केवल 12 मील दूर थी। अल्लाउद्दीन ने जब देवगिरि पर आक्रमण किया तब यह भी झूठी खबर चारों ओर फैला दी कि सुल्तान भी 20,000 सैनिकों की सेना के साथ देवगिरि आ रहा है।

इस सूचना से देवगिरि का राजा रामचन्द्र और अधिक आतंकित हो उठा। उसने अपनी राजधानी से 12 मील दूर लसूरा नामक स्थान पर अल्लाउद्दीन का सामना किया किंतु जब परास्त होने लगा तो राजा रामचंद्र ने स्वयं को लाजौरा के दुर्ग में बन्द कर लिया।

To purchase this book, please click on photo.

एक इतिहासकार ने लिखा है कि अल्लाउद्दीन ने देवगिरि के यादव राजा रामचंद्र के पास संदेश भिजवाया कि मैं अपने ताऊ सुल्तान जलालुद्दीन से नाराज होकर राजमुंदरी के राजा के यहाँ नौकरी करने जा रहा हूँ। इस पर रामचंद्र निश्चिंत हो गया तथा उसने अल्लाउद्दीन का अपने महल में स्वागत किया। धोखेबाज अल्लाउद्दीन ने महल में घुसते ही महल पर अधिकार कर लिया। राजा रामचंद्र ने अपने पुत्र शंकरदेव के पास इस छल की सूचना भेजी तथा उसे कहलवाया कि वह शीघ्रातिशीघ्र देवगिरि लौट आए। राजकुमार शंकरदेव इस समय दक्षिण भारत में तीर्थयात्रा पर गया हुआ था तथा राज्य की अधिकांश सेना उसके साथ गई थी। जब तक शंकरदेव लौट कर आता, तब तक का समय व्यतीत करने के लिए राजा रामचंद्र ने अल्लाउद्दीन खिलजी से सन्धि की बातचीत आरम्भ कर दी। इस बीच अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना ने देवगिरि राज्य को जमकर लूटा। कई दिनों तक वार्त्ता चलती रही। अन्त में यह निश्चित हुआ कि राजा रामचन्द्र एक निश्चित धनराशि अल्लाउद्दीन खिलजी को देगा और अल्लाउद्दीन खिलजी देवगिरि के कैदियों को मुक्त करके दिल्ली लौट जायेगा। जब शंकरदेव लौटकर नहीं आया तो राजा रामचंद्र ने विशाल सम्पत्ति अल्लाउद्दीन खिलजी को समर्पित कर दी।

एक इतिहासकार ने लिखा है कि देवगिरि के यादव राजा रामचंद्र ने 50 मन सोना, 7 मन मोती तथा 40 घोड़े और बहुमूल्य द्रव्य देकर अपनी जान बचाई। जिस समय आलाउद्दीन लूट का धन लेकर दिल्ली के लिए प्रस्थान कर ही रहा था कि राजकुमार शंकरदेव अपनी सेना के साथ दक्षिण से आ गया।

राजकुमार शंकर देव ने अल्लाउद्दीन के पास कहला भेजा कि वह देवगिरि राज्य से लूटी गई सम्पत्ति वापस लौटा दे और चुपचाप दिल्ली लौट जाये। इस पर अल्लाउद्दीन ने नसरत खाँ को लूसरा के दुर्ग पर घेरा डालने का आदेश दिया और स्वयं एक सेना लेकर शंकरदेव पर आक्रमण करने चल दिया।

दोनों पक्षों में हुए भीषण युद्ध के बाद यादव राजकुमार शंकरदेव परास्त हो गया। अब दुर्ग का घेरा जोरों के साथ आरम्भ हुआ। एक दिन रामचन्द्र के सैनिकों ने रामचंद्र को सूचित किया कि दुर्ग के जिन बोरों में अब तक अन्न भरा हुआ समझा जा रहा था उनमें तो नमक भरा है। इस सूचना से देवगिरि के यादव रामचंद्र का साहस भंग हो गया और उसने पुनः अल्लाउद्दीन से सन्धि कर ली। इस बार उसे पहले से अधिक कठोर शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं।

फरिश्ता के अनुसार, अल्लाउद्दीन को छः सौ मन सोना, सात मन मोती, दो मन हीरा, पन्ना, लाल, पुखराज, एक हजार मन चाँदी, चार हजार रेशम के थान तथा अन्य असंख्य बहुमूल्य वस्तुऐं दी गईं। बरार क्षेत्र में स्थित एलिचपुर का प्रान्त भी अल्लाउद्दीन को मिल गया। राजा ने वार्षिक कर भी अल्लाउद्दीन के पास भेजने का वचन दिया। हरिशंकर शर्मा ने लिखा है कि यादव राजा ने अल्लाउद्दीन खिलजी को पचास मन सोना, 5 मन मोती, 40 हाथी तथा कई हजार घोड़े उपहार में दिए।

यह एक विशाल एवं अकल्पनीय सम्पत्ति थी जो थोड़े से प्रयास से ही अल्लाउद्दीन खिलजी के हाथ लग गई थी। हो सकता है कि फरिश्ता ने सम्पत्ति की सूची काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताई हो किंतु इतना निश्चित है कि यह एक विशाल सम्पत्ति थी जिसे देखकर अल्लाउद्दीन की आँखें चौड़ गईं।

इस सम्पत्ति के बल पर तो वह नई सल्तनत खड़ी कर सकता था। अब उसे किसी भी सुल्तान का ताबेदार रहने की आवश्यकता नहीं थी। अल्लाउद्दीन खिलजी ने मन ही मन एक निर्णय लिया और उसे कार्यान्वित करने के लिए वह देवगिरि से दिल्ली की ओर चल दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

मोहन भागवत के नाम खुला पत्र - bharatkaitihas.com

मोहन भागवत के नाम खुला पत्र

0
मोहन भागवत के नाम खुला पत्र मोहन भागवत के नाम खुला पत्र राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति समर्पित भाव से लिखा गया है। आज...
सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

0
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

0
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

0
तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...