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अल्लाउद्दीन खिलजी की समस्याएँ (92)

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अल्लाउद्दीन खिलजी की समस्याएँ

दिल्ली का सुल्तान बनने के बाद अल्लाउद्दीन खिलजी की समस्याएँ बढ़ गईं किंतु अशिक्षित होने के कारण अल्लाउद्दीन खिलजी उन समस्याओं को समझने की बजाय एक नया मजहब चलाना चाहता था और मुसलमानों का नबी बनना चाहता था।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने देवगिरि के यादवों से लूटी गई सोने की अशर्फियों के बल पर न केवल दिल्ली की सेना और अमीरों को खरीद लिया अपितु मरहूम सुल्तान के परिवार तथा उसके विश्वस्त जलाली अमीरों को नष्ट करके निश्चिंत होकर दिल्ली पर शासन करने लगा।

अब अल्लाउद्दीन खिलजी के पास अपार धन था, विशाल सेना थी, धरती तक झुककर सलाम करने वाले अमीरों की फौज थी, दिल्ली जैसी विशाल सल्तनत थी, यहाँ तक कि अब उसके और उसकी प्रेमिका महरू के बीच भी कोई नहीं आ सकता था किंतु इन सब सुखों का आनंद लेने से पहले उसे दिल्ली सल्तनत की कुछ स्थायी समस्याओं से निबटना आवश्यक था।

दिल्ली का केन्द्रीय शासन लम्बे समय से तुर्की अमीरों के आंतरिक संघर्षों में फंसा हुआ था। इस कारण सल्तनत के दूरस्थ हिस्सों में नियुक्त स्थानीय अधिकारी स्वेच्छाचारी हो गए थे। केन्द्र सरकार के प्रति उत्तरदाई अधिकारियों के अभाव में, स्थानीय तथा केन्द्रीय शासन में सम्पर्क बहुत कम रह गया था। तुर्की अमीरों पर जितनी जल्दी नियंत्रण पाया जाता, अल्लाउद्दीन खिलजी की समस्याएँ उतनी जल्दी ही कम हो सकती थीं।

जिस समय अल्लाउद्दीन ने दिल्ली सल्तनत पर अधिकार किया उस समय स्थानीय अधिकारियों की निष्ठा केन्द्र के प्रति बहुत ही कम थीं। उन्हें केन्द्रीय सत्ता के प्रति विश्वस्त बनाकर अल्लाउद्दीन खिलजी की समस्याएँ सुलझ सकती थीं।

अल्लाउद्दीन खिलजी की समस्याएँ जितनी आंतरिक थीं, उतनी ही बाह्य भी थीं। मंगोल आक्रमणकारी प्रायः भारत के पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रदेशों पर आक्रमण करते थे। एक से अधिक अवसरों पर वे दिल्ली तक आ पहुँचे थे। उनकी गिद्ध-दृष्टि सदैव भारत पर ही लगी रहती थी। उनसे अपने राज्य को सुरक्षित करना, एक बड़ी समस्या थी।

दिल्ली के निकट मंगोलपुरी बस जाने से मंगोलों को दिल्ली में आधार भी प्राप्त हो गया था। अल्लाउद्दीन को मंगोलों के आक्रमणों को रोकने एवं उनका सामना करने के लिए सीमान्त प्रदेश में मजबूत सैनिक व्यवस्था करनी आवश्यक थी। उसके काल में मंगोलों ने भारत पर पांच बड़े आक्रमण किए।

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बलबन के कमजोर उत्तराधिकारियों एवं जलालुद्दीन खिलजी की उदार नीति के कारण अनेक हिन्दू-सामन्तों तथा राजाओं ने अपने राज्य वापस अपने अधिकार में कर लिए थे। अल्लाउद्दीन के तख्त पर बैठने के समय उत्तरी भारत का बहुत बड़ा भाग तथा सम्पूर्ण दक्षिणी भारत दिल्ली सल्तनत के बाहर था। इन खोये हुए प्रदेशों को अपने अधिकार में करना बड़ी चुनौती थी।

इस प्रकार अल्लाउद्दीन के सामने समस्याओं का अम्बार था जिनसे पार पाना अत्यंत कठिन था किंतु अल्लाउद्दीन के लिए ये समस्याएं कुछ भी नहीं थीं। यहाँ हम अंग्रेज कवि टेनिसन के कथन को उद्धृत करना चाहेंगे। उन्होंने लिखा है- ‘ओन्ली इललिट्रेट्स कैन रूल।’

सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी पर यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती थी। वह नितांत निरक्षर था किंतु उसने दिल्ली सल्तनत के सुल्तान, शाही परिवार तथा तमाम तुर्की अमीरों को धूल में मिलाकर तख्त पर अधिकार कर लिया था। वह निरक्षर था किंतु यह निरक्षरता उसे कठोर बनाती थी जो किसी भी समाज पर शासन के करने के लिए आधारभूत गुण होती है।

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जब दिल्ली का तख्त अल्लाउद्दीन खिलजी के अधिकार में आ गया तो उसके सपनों ने नई उड़ान भरनी आरम्भ की। उसने अपने जीवन के दो लक्ष्य बनाए जिनमें से पहला था- एक नये धर्म की स्थापना करके उसका नबी बनना और दूसरा था- विश्व-विजय करना। उसके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि जिस प्रकार हजरत मुहम्मद के चार साथी पहले चार खलीफा बने, उसी प्रकार उलूग खाँ, जफर खाँ, नसरत खाँ तथा अल्प खाँ उसके भी चार साथी हैं जो बड़े ही वीर तथा साहसी हैं। अतः पैगम्बर की भाँति वह भी नये धर्म की स्थापना करके और सिकन्दर महान् की भाँति विश्व-विजय करके अपना नाम अमर कर सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सुल्तान अल्लाउद्दीन नितांत निरक्षर तथा हठधर्मी था परन्तु भाग्य उसके साथ था, इसलिए उसे काजी अलाउल्मुल्क नामक एक बुद्धिमान व्यक्ति का सानिध्य प्राप्त हो गया। काजी अलाउल्मुल्क ने अपने परामर्श से सुल्तान अल्लाउद्दीन की बड़ी सेवा की और उसे कई बार अनुचित कार्य करने से रोका। अल्लाउद्दीन अपनी बौद्धिक सीमाओं को जानता था इसलिए अपने बुद्धिमान शुभचिन्तकों के परामर्श को मान लेता था। इस कारण वह अपनी समस्याओं पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपनी योजनाओं के सम्बन्ध में काजी अलाउल्मुल्क से परामर्श किया। काजी ने उसे परामर्श दिया कि नबी बनना अथवा नया धर्म चलाना सुल्तानों का काम नहीं है। यह काम पैगम्बरों का होता है जो अल्लाह द्वारा भेजे जाते हैं।

सुल्तान की विश्व-विजय की आकांक्षा के सम्बन्ध में काजी ने सुल्तान से कहा कि यद्यपि विश्व-विजय की कामना करना सुल्तान का कर्त्तव्य है किंतु न तो विश्व में सिकन्दर कालीन परिस्थितियाँ विद्यमान हैं और न अल्लाउद्दीन के पास अरस्तू के समान बुद्धिमान तथा दूरदर्शी गुरु उपलब्ध है। इसलिए सुल्तान इस विचार को छोड़ दे। अन्यथा अल्लाउद्दीन खिलजी की समस्याएँ बढ़ सकती हैं।

काजी अलाउल्मुल्क ने सुल्तान अल्लाउद्दीन को परामर्श दिया कि अल्लाउद्दीन खिलजी की समस्याएँ राजनीतिक हैं। दिल्ली सल्तनत की सीमाओं पर रणथम्भौर, चितौड़, मालवा, धार, उज्जैन आदि स्वतन्त्र हिन्दू राज्य मौजूद हैं जिनके कारण सल्तनत पर चारों ओर से आक्रमणों के बादल मँडराते रहते हैं। अतः परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुल्तान के दो उद्देश्य होने चाहिये-

(1.) सम्पूर्ण भारत पर विजय प्राप्त करना तथा

(2.) मंगोलों के आक्रमणों को रोकना।

इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सल्तनत के भीतर शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित रखना नितान्त आवश्यक था। काजी ने सुल्तान को यह परामर्श भी दिया कि जब तक वह मदिरा पीना तथा आमोद-प्रमोद करना नहीं छोड़ेगा, तब तक उसके उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो सकेगी। अल्लाउद्दीन को काजी का यह परामर्श बहुत पसन्द आया और उसने काजी के परामर्श को स्वीकार कर लिया।

लक्ष्य निश्चित कर लेने के उपरान्त अल्लाउद्दीन ने साम्राज्य विस्तार का कार्य आरम्भ किया। सर्वप्रथम उसने उत्तरी भारत को जीतने की योजना बनाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मंगोल आक्रांता अल्लाउद्दीन खिलजी को दिल्ली की गलियों में ढूंढने लगे (93)

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मंगोल आक्रांता
मंगोल आक्रांता अल्लाउद्दीन खिलजी को दिल्ली की गलियों में ढूंढने लगे

मंगोलों ने दिल्ली की गलियों में धावे मारे। वे सुल्तान अल्लाउद्दीन को दिल्ली में ढूंढते रहे किंतु अल्लाउद्दीन उनके हाथ नहीं लगा। अंत में निजामुद्दीन औलिया ने मंगोल सरदार से बात की और मंगोल दिल्ली छोड़कर चले गए। इस प्रकार लगभग तीन महीने तक दिल्ली मंगोलों के अधिकार में रही।

काजी अलाउलमुल्क के परामर्श से सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने जीवन के दो लक्ष्य निर्धारित किए जिनमें से पहला था पूरे भारत पर अधिकार करना तथा दूसरा था मंगोलों से अपने राज्य की रक्षा करना। अल्लाउद्दीन खिलजी ने सबसे पहले उत्तरी भारत में विजय अभियान चलाने का निर्णय लिया। अभी वह अभियान की तैयारी कर रहा था कि भारत पर मंगोलों के आक्रमणों की झड़ी लग गई।

मंगोल जाति अत्यंत प्राचीन काल में चीन में अर्गुन नदी के पूर्व के इलाकों में रहा करती थी, बाद में वह बाह्य खंगिन पर्वत शृंखला और अल्ताई पर्वत शृंखला के बीच स्थित मंगोलिया पठार के आर-पार फैल गई। युद्धप्रिय मंगोल जाति खानाबदोशों का जीवन व्यतीत करती थी और शिकार, तीरंदाजी एवं घुड़सवारी करने में बहुत कुशल थी।

बारहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में, मध्य-एशिया में मंगोलों की आंधी उठी। हिंसक मंगोल लुटेरे टिड्डी दलों की तरह मध्य-एशिया से निकल कर चारों दिशाओं में स्थित दुनिया को बर्बाद कर देने के लिए बेताब हो रहे थे। यही कारण था कि सम्पूर्ण मुस्लिम जगत् एवं सम्पूर्ण ईसाई जगत् इस आंधी की भयावहता को देखकर थर्रा उठे। मंगोल सेनाएं जिस दिशा में मुड़ जाती थीं, उस दिशा में बर्बादी की निशानियों के अलावा और कुछ नहीं बचता था।

इस काल में भारत तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के बहुत से हिन्दू राज्य, मध्यएशिया से आए मुस्लिम तुर्कों के अधीन थे जबकि मंगोल इस्लाम के शत्रु थे। 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मंगोलों के मुखिया ‘तेमूचीन’ ने बड़ी संख्या में बिखरे हुए मंगोल-कबीलों को एकत्र किया और स्वयं उनका नेता बन गया।

वह इतिहास में चंगेज खान के नाम से जाना गया। ई.1221 में चंगेज खाँ ने भारत पर पहला आक्रमण किया। दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने उसे उपहार आदि भेजकर संतुष्ट किया। ई.1227 में जब चंगेज खाँ मरा तब वह संसार के सबसे बड़े साम्राज्य का स्वामी था।

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तब से लेकर अल्लाउद्दीन के सुल्तान बनने तक मंगोल भारत पर कई आक्रमण कर चुके थे किंतु दिल्ली के तुर्क सुल्तान उन्हें भारत में पांव नहीं जमाने देते थे। ई.1296 में अल्लाउद्दीन खिलजी को सुल्तान बने हुए कुछ ही महीने हुए थे कि मंगोलों ने कादर खाँ के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। वे पंजाब तक घुस आए। अल्लाउद्दीन खिलजी को मंगोलों से लड़ने का कोई अनुभव नहीं था। इसलिए उसने स्वयं युद्ध के मैदान में जाने की बजाय अपने मित्र तथा मंत्री जफर खाँ को मंगोलों से लड़ने भेजा। जफर खाँ ने मंगेालों को जालंधर के निकट परास्त किया तथा उनका भीषण संहार किया।

कादर खाँ को गए कुछ ही महीने हुए थे कि ई.1297 में अल्लाउद्दीन को समाचार मिला कि ट्रांसआक्सियाना का मंगोल शासक दाऊद खाँ एक लाख मंगोल सैनिकों को लेकर मुल्तान, पंजाब और सिंध जीतने के निश्चय से भारत आ रहा है। इस बार अल्लाउद्दीन ने अपने भाई उलूग खाँ को दाऊद पर आक्रमण करने के लिए भेजा। उलूग खाँ ने दाऊद खाँ को बुरी तरह पराजित किया तथा उसे सिंधु नदी के दूसरी ओर धकेल दिया। इस युद्ध में अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना को भी बहुत नुक्सान उठाना पड़ा।

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दाऊद खाँ को भारत से गए कुछ ही महीने हुए थे कि ई.1297 में मंगोलों ने देवा तथा साल्दी के नेतृत्व में पुनः भारत पर आक्रमण किया। उनका ध्येय पंजाब, मुल्तान तथा सिन्ध को जीत कर अपने राज्य में मिलाना था। इस बार मंगोल दिल्ली तक चले आए। उन्होंने नवनिर्मित सीरी के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अल्लाउद्दीन ने अपने दो सेनापतियों उलूग खाँ तथा जफर खाँ को मंगोलों का सामना करने के लिए भेजा। उन्होंने सीरी का दुर्ग मंगालों से पुनः छीन लिया तथा साल्दी को 2000 मंगोलों सहित बंदी बना लिया। इस विजय के बाद अल्लाउद्दीन तथा उसके भाई उलूग खाँ को जफर खाँ से ईर्ष्या उत्पन्न हो गई क्योंकि मंगोलों पर लगातार दो विजयों से सेना में जफर खाँ की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई थी। मंगोलों का सबसे अधिक भयानक आक्रमण ई.1299 में दाऊद के पुत्र कुतुलुग ख्वाजा के नेतृत्व में हुआ। उसने दो लाख मंगोलों के साथ बड़े वेग से आक्रमण किया। उसकी सेना तेजी से बढ़ती हुई दिल्ली के निकट पहुँच गई। उसका निश्चय दिल्ली पर अधिकार करने का था। इस बीच मंगोलों के भय से हजारों लोग दिल्ली में आकर शरण ले चुके थे। इससे दिल्ली में अव्यवस्था फैल गई। मंगोलों द्वारा दिल्ली की घेराबंदी कर लिए जाने के बाद तो स्थिति और भी खराब हो गई।

इस पर भी अल्लाउद्दीन ने साहस नहीं छोड़ा। जफर खाँ को मंगोलों से लड़ने का अनुभव था इसलिए उसे अग्रिम पंक्ति में रखकर शाही सेना ने मंगोलों का सामना किया। जफर खाँ तथा उसकी सेना ने हजारों मंगोलों का वध किया तथा वे लोग मंगोलों को काटते हुए काफी आगे निकल गए। मंगोलों ने घात लगाकर जफर खाँ को मार डाला। उस समय अल्लाउद्दीन तथा उसका भाई उलूग खाँ पास में ही युद्ध कर रहे थे किंतु उन्होंने जफर खाँ को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। रात होने पर मंगोल अंधेरे का लाभ उठाकर भाग गए।

सुप्रसिद्ध इतिहासकार किशोरी शरण लाल के अनुसार इस युद्ध से अल्लाउद्दीन को दोहरा लाभ हुआ। पहला लाभ मंगोलों पर विजय के उपलक्ष्य में और दूसरा लाभ जफर खाँ की मृत्यु के रूप में। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है- ‘मंगोल सैनिकों पर जफर खाँ की वीरता का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि जब उनके घोड़े पानी नहीं पीते थे तो वे घोड़ों से कहते थे कि क्या तुमने जफर खाँ को देख लिया है जो तुम पानी नहीं पीते?’

ई.1302 में मंगोल सरदार तुर्गी खाँ ने एक लाख बीस हजार सैनिकों के साथ भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली के पास यमुना के तट पर आ डटा। कुछ पुस्तकों में उसे तारगी खाँ भी लिखा गया है। इस बार अल्लाउद्दीन के पास जफर खाँ जैसा अनुभवी सेनापति नहीं था। इसलिए अल्लाउद्दीन मंगोलों के भय से दिल्ली छोड़कर भाग गया और राजधानी दिल्ली असुरक्षित हो गई।

मंगोलों ने दिल्ली की गलियों में धावे मारे। वे सुल्तान अल्लाउद्दीन को दिल्ली में ढूंढते रहे किंतु अल्लाउद्दीन उनके हाथ नहीं लगा। अंत में निजामुद्दीन औलिया ने मंगोल सरदार से बात की और मंगोल दिल्ली छोड़कर चले गए। इस प्रकार लगभग तीन महीने तक दिल्ली मंगोलों के अधिकार में रही। इस दौरान शाही रुतबा और इकबाल कहीं भी दिखाई नहीं दिया। दिल्ली सल्तनत के सैनिक मंगोलों के भय से दिल्ली से जा चुके थे और दिल्ली की निरीह जनता मंगोलों की दया पर जीवत थी।

कहा नहीं जा सकता कि इस अभियान में मंगोलों ने दिल्ली से कितना क्या लूटा क्योंकि किसी भी पुस्तक में इसका वर्णन नहीं मिलता किंतु इतना अवश्य है कि मंगोल खाली हाथ नहीं गए होंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मंगोलों के सिर कटवाकर मीनारें बनवाईं अल्लाउद्दीन खिलजी ने (94)

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मंगोलों के सिर - www.bharatkaitihas.com
मंगोलों के सिर कटवाकर मीनारें बनवाईं अल्लाउद्दीन खिलजी ने

मलिक काफूर ने रावी नदी के तट पर कबक खाँ नामक मंगोल सरदार को बीस हजार मंगोलों सहित कैद कर लिया। इन्हें दिल्ली लाकर हाथियों के पैरों तले कुचलवाया गया। इन मंगोलों के सिर कटवार बदायूं दरवाजे पर मंगोलों के सिरों की एक मीनार बनाई गई।

ई.1302 में मंगोल दिल्ली पर अधिकार करने में सफल हो गए थे तथा अल्लाउद्दीन खिलजी तथा उसकी सेना दिल्ली छोड़कर भाग गए थे किंतु कुछ दिन बाद मंगोल स्वतः ही दिल्ली खाली करके चले गए और अल्लाउद्दीन खिलजी तथा उसके सैनिक फिर से दिल्ली में लौट आए। इसके लगभग तीन साल बाद ई.1305 में 50 हजार मंगोलों ने अलीबेग के नेतृत्व में दिल्ली सल्तनत पर पुनः आक्रमण किया। मंगोलों की सेना अमरोहा तक पहुँच गई।

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उन दिनों गाजी तुगलक नामक एक अमीर अपनी सेना के साथ दिपालपुर में था। उसने मंगोलों से भीषण युद्ध किया और उन्हें बड़ी क्षति पहुँचाई। असंख्य मंगोलों का संहार हुआ और वे भारत की सीमा के बाहर खदेड़ दिए गए। अलीबेग तथा तार्तक नामक मंगोल सरदारों को कैद करके दिल्ली लाया गया जहाँ उनका कत्ल करके मंगोलों के सिर सीरी के दुर्ग की दीवार में चिनवा दिए गए। ई.1307 में मंगोल सरदार इकबाल मन्दा ने विशाल सेना के साथ भारत पर आक्रमण किया। अल्लाउद्दीन खिलजी ने इस विपत्ति का सामना करने के लिए मलिक काफूर तथा गाजी मलिक तुगलक के नेतृत्व में विशाल सेना भेजी। मलिक काफूर ने रावी नदी के तट पर इकबाल खाँ मंदा को मार डाला तथा कबक खाँ नामक मंगोल सरदार को बीस हजार मंगोलों सहित कैद कर लिया। इन्हें दिल्ली लाकर हाथियों के पैरों तले कुचलवाया गया। मंगोलों के सिर काटकर बदायूं दरवाजे पर सिरों की एक मीनार बनाई गई। इस पराजय से मंगोल इतने आतंकित हो गए कि अल्लाउद्दीन खिलजी के शासन काल में उन्हें फिर कभी भारत पर आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ। मध्यएशिया के मंगोलों में दिल्ली के तुर्कों का भय व्याप्त हो चुका था और यह संदेश भलीभांति फैल गया था कि जब तक वर्तमान तुर्क सुल्तान दिल्ली के तख्त पर बैठा है, तब तक दिल्ली पर अभियान करना निरर्थक है।

इस प्रकार ई.1296 में अल्लाउद्दीन खिलजी के दिल्ली तख्त पर बैठने से लेकर ई.1307 तक दिल्ली सल्तनत पर मंगोलों के आक्रमण लगातार होते रहे। अल्लाउद्दीन खिलजी ने बड़ी हिम्मत से उनका दमन किया तथा अपनी सल्तनत को बचाए रखने में सफल रहा। अल्लाउद्दीन खिलजी ने ई.1316 तक शासन किया था। अतः उसके शासन के अंतिम नौ वर्ष मंगोलों के आक्रमण से मुक्त रहे।

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इस विवरण से स्पष्ट है कि अल्लाउद्दीन खिलजी के शासन काल में मंगोलों को केवल एक ही अभियान में सफलता मिली थी और शेष सभी आक्रमणों में असफल होना पड़ा। मंगोलों की पराजय के कई कारण थे-

(1.) इस समय मंगोल कई शाखाओं में विभक्त होकर पारस्परिक संघर्षों में व्यस्त थे। इस कारण वे संगठित होकर पूरी शक्ति के साथ भारत पर आक्रमण नहीं कर सके।

(2.) मंगोल अपने साथ स्त्रियों, बच्चों तथा वृद्धों को भी लाते थे जो युद्धक्षेत्र में सेना के लिए भार बन जाते थे।

(3.) ट्रांसआक्सियाना के शासक दाऊद खाँ की मृत्यु के बाद मंगोल अस्त-व्यस्त हो गए थे तथा दिल्ली सल्तनत पर लगातार आक्रमण करते रहने के कारण उनकी सैन्यशक्ति काफी छीजती जा रही थी।

(4.) जफर खाँ, उलूग खाँ तथा मलिक काफूर जैसे सेनापतियों का साथ मिल जाने के कारण अल्लाउद्दीन की सेना ने मंगोलों को जीतने नहीं दिया।

इतना होने पर भी मंगोल-आक्रमणों के भारत पर गहरे प्रभाव पड़े जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

(1.) मंगोलों के आक्रमणों में लाखों निरीह व्यक्तियों एवं सैनिकों के प्राण गए और उनकी सम्पत्ति लूटी गई।

(2.) मंगोलों से भयभीत रहने के कारण जनता राज्य के संरक्षक तथा अवलम्ब की ओर झुक गई और उसमें राज-भक्ति की भावना प्रबल हो गई। इससे सुल्तान की शक्ति में बड़ी वृद्धि हो गई।

(3.) मंगोलों के आक्रमण की निरन्तर सम्भावना बनी रहने के कारण सुल्तान को अत्यन्त विशाल सेना की व्यवस्था करनी पड़ी। इसका प्रभाव शासन व्यवस्था पर भी पड़ा। शासन का स्वरूप सैनिक हो गया और सेना की स्वेच्छाचरिता तथा निरंकुशता में वृद्धि हो गई।

(4.) मंगोलों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए सुल्तान को बड़े सैनिक-सुधार तथा प्रशासकीय सुधार करने पड़े।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने राज्य को मंगोलों के आक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए बलबन की सीमा नीति का अनुसरण किया। उसके द्वारा किए गए सुधार इस प्रकार थे-

(1.) अल्लाउद्दीन खिलजी ने पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाई तथा पंजाब, मुल्तान एवं सिंध में नये दुर्गों का निर्माण करवाया।

(2.) सीमा प्रदेश के दुर्गों में योग्य तथा अनुभवी सेनापतियों के नेतृत्व में विशाल सेनायें रक्खी गईं।

(3.) पंजाब के समाना तथा दिपालपुर नामक नगरों की किलेबन्दी की गई।

(4.) दिल्ली सल्तनत की सेना में वृद्धि की गई और हथियार बनाने के कारखाने खोले गए।

(5.) राजधानी की सुरक्षा की पूर्ण व्यवस्था की गई और दिल्ली के दुर्ग का जीर्णोद्धार कराया गया।

(6.) सीरी में एक नये दुर्ग का निर्माण करवाया गया। संभवतः अल्लाउद्दीन के सुल्तान बनने से पहले ही यह दुर्ग बनना आरम्भ हो गया था और अल्लाउद्दीन ने उसका बाहरी परकोटा बनवाया था।

(7.) सेना की रणनीति में परिवर्तन किया गया। सेना की सुरक्षा के लिए दिल्ली के चारों ओर खाइयाँ खुदवाई गईं, लकड़ी की दीवारें बनवाई गईं तथा हाथियों के दस्तों की व्यवस्था की गई।

(8.) आक्रमणकारियों की वास्तविक शक्ति से अवगत होने के लिए गुप्तचर विभाग की व्यवस्था की गई।

यदि अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपनी सल्तनत की सुरक्षा के लिए मंगोलों के सिर नहीं काटे होते तथा इतने व्यापक सुरक्षा प्रबंध नहीं किए होते तो मंगोलों के हाथों उसी काल में दिल्ली सल्तनत का सदा के लिए अंत हो गया होता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सीरी दुर्ग की नींव में डलवाए अल्लाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों के कटे हुए सिर (95)

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सीरी दुर्ग की नींव में डलवाए अल्लाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों के कटे हुए सिर

अल्लाउद्दीन खिलजी ने सीरी दुर्ग की नींव में उन आठ हजार मंगोलों के कटे हुए सिर डलवा दिए जो बदायूं दरवाजे के पास पड़े सड़ रहे थे। इस घटना के बाद जब तक अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली के तख्त पर बैठा रहा, तब तक मंगोलों का भारत पर आक्रमण नहीं हुआ।

अल्लाउद्दीन खिलजी के समय में मंगोलों का अंतिम भारत-आक्रमण ई.1307 में हुआ था जिसमें अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापतियों मलिक काफूर तथा गाजी मलिक तुगलक ने मंगोलों का भयानक संहार किया। वे हजारों मंगोलों को पकड़कर दिल्ली में ले आए और उनके सिर काटकर, बदायूं दरवाजे पर कटे हुए सिरों की मीनारें बनवाईं।

जब ये कटे हुए सिर सड़कर बदबू देने लगे तो सुल्तान ने इन सिरों का एक विचित्र उपयोग ढूंढा। दिल्ली में तीन किले पहले से ही विद्यमान थे। इनमें से पहला था लालकोट, दूसरा था किलोखरी अथवा कीलूगढ़ी का किला और तीसरा था रायपिथौरा का किला। दिल्ली के लालकोट का निर्माण तोमरों ने करवाया था जबकि रायपिथौरा के किले का निर्माण पृथ्वीराज चौहान के समय में करवाया गया था।

जब दिल्ली पर तुर्कों का अधिकार हुआ तो कुतुबुद्दीन ऐबक लालकोट में रहने लगा। बाद में इल्तुतमिश, रजिया एवं बलबन आदि सुल्तान भी लालकोट में ही रहते रहे। इस कारण रायपिथौरा का किला खाली पड़ा रहता था।

लालकोट तथा रायपिथौरा का किला एक दूसरे के इतने निकट थे इन्हें अलग करना कठिन होता था जबकि कीलूगढ़ी का किला इन किलों से लगभग 5 मील दूर स्थित था। कीलूगढ़ी का वास्तविक नाम कैलूगढ़ी था, इसके निर्माण के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता किंतु अनुमान होता है कि यहाँ एक छोटा किला था जो तुर्कों के भारत में आने से पहले किसी हिन्दू सरदार द्वारा बनवाया गया था।

बलबन के पौत्र कैकूबाद ने किलोखरी दुर्ग के भीतर कुछ महल बनवाए थे। जब जलालुद्दीन खिलजी सुल्तान हुआ तो उसने किलोखरी को अपनी राजधानी बनाया था। जलालुद्दीन ने पूरे एक साल तक किलोखरी अथवा कीलूगढ़ी के दुर्ग में अपनी राजधानी एवं निवास रखा था।

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बलबन के शासन काल में दिल्ली के निकट रहने वाली मेव जाति दिल्ली में घुसकर लूटपाट किया करती थी। उस काल में मेव जाति हिन्दू धर्म के अंतर्गत थी। बलबन ने उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही की थी जिससे कुछ समय के लिए उनकी गतिविधियों पर रोक लग गई थी किंतु जलालुद्दीन खिलजी के समय में मेव फिर से सिर उठाने लगे थे।

अल्लाउद्दीन खिलजी के तख्त पर बैठने के समय मेव इतने प्रबल हो गए थे कि वे पहले की ही तरह दिल्ली में घुस आते और घरों में लूटपाट किया करते। घर के माल-असबाब के साथ औरतों को भी उठा ले जाते। मेवों के भय से सूर्यास्त होने से पहले ही दिल्ली के दरवाजे बंद कर लिए जाते थे।

मेवातियों की लूटमार के कारण रायपिथौरा का किला बरबाद हो चला था। अतः अल्लाउद्दीन ने रायपिथौरा के किले से ढाई मील उत्तर-पूर्व में सीरा अथवा सीरी नामक स्थान पर एक नया किला बनवाने का निर्णय लिया। इसे सीरी दुर्ग कहा गया। आजकल सीरी दुर्ग वाले स्थान के पास शाहपुर जाट नामक गांव बसा हुआ है।

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अल्लाउद्दीन ने सीरी दुर्ग की नींव में उन आठ हजार मंगोलों के कटे हुए सिर डलवा दिए जो बदायूं दरवाजे के पास पड़े सड़ रहे थे। इस घटना के बाद जब तक अल्लाउद्दीन दिल्ली के तख्त पर बैठा रहा, मंगोलों का भारत पर आक्रमण नहीं हुआ। मंगोलों के आक्रमणों से बचने के लिए अल्लाउद्दीन ने सीरी दुर्ग के चारों ओर 17 फुट ऊँची दीवारों का एक मजबूत परकोटा बनवाया। इस परकोटे में सात दरवाजे बनवाए गए जिनसे होकर हाथियों की सेना निकल सकती थी। अल्लाउद्दीन के पास धन की कोई कमी नहीं थी, इसलिए उसने सात हजार राज एवं बेलदारों को भवन-निर्माण के कार्यों पर लगा रखा था। अल्लाउद्दीन ने सीरी में एक हजार खम्भों वाला ‘कस्रे हजार स्तून’ बनवाया था जिसका अर्थ होता है हजार खम्भों वाला महल। आजकल इसे ‘हजार सितून’ कहते हैं। इस महल का निर्माण पूरा होने पर उस पर मंगोलों के खून के छींटे छिड़के गए। अल्लाउद्दीन ने कुतुबमीनार के पास एक भव्य गुम्बद युक्त अलाई-दरवाजा बनवाया था। यह दरवाजा पठानों की निर्माण कला का सुंदर नमूना माना जाता है। इसकी दीवारों पर कुरान की आयतें खुदवाई गई थीं। अल्लाउद्दीन ने सीरी के निकट ‘हौज-ए-अलाई’ नामक एक तालाब का भी निर्माण करवाया जिसे आजकल ‘हौज खास’ कहा जाता है।

अल्लाउद्दीन ने दिल्ली में एक और तालाब बनवाया जिसे ‘शम्शी तालाब’ कहा जाता था। अलाई-दरवाजे से थोड़ी दूरी पर अल्लाउद्दीन ने कुतुबमीनार जैसी एक अन्य मीनार बनवानी आरम्भ की थी। इसका घेरा कुतुबमीनार से दोगुना रखा गया था तथा इसकी ऊँचाई भी अधिक रखी जानी थी किंतु यह मीनार कभी पूरी नहीं हो सकी। आज भी इस अधूरी मीनार के अवशेष देखे जा सकते हैं।

एक ओर तो सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी मंगोलों द्वारा किए जा रहे अभियानों से त्रस्त था तो दूसरी ओर वह भारत में अपने विजय अभियान को भी चलाए हुए था। उसने यह अभियान ई.1299 में आरम्भ किया जो ई.1305 तक निरंतर चलता रहा। अल्लाउद्दीन खिलजी ने सबसे पहले गुजरात पर अपनी आँख गढ़ाई।

उस काल में गुजरात अत्यन्त धन-सम्पन्न राज्य था तथा उन दिनों बघेला राजा कर्ण गुजरात में शासन कर रहा था। उसकी राजधानी अन्हिलवाड़ा थी। अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा गुजरात को अपने प्रथम अभियान के लिए चुने जाने का विशेष कारण जान पड़ता है।

कहा जाता है कि गुजरात का एक मंत्री माधव, राजा कर्ण बघेला से नाराज होकर उससे बदला लेने के लिए अल्लाउद्दीन खिलजी की शरण में आया और उसने अल्लाउद्दीन को अन्हिलवाड़ा पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया।

रासमाला नामक एक ग्रंथ के अनुसार कर्ण बघेला के दो मंत्री थे- माधव तथा केशव। माधव की स्त्री पद्मिनी जाति   की थी। इसलिए राजा ने उसे छीन लिया तथा माधव के भाई केशव को मार डाला। अपनी स्त्री के हरण तथा अपने भाई की मृत्यु का बदला लेने के लिए माधव अल्लाउद्दीन के पास दिल्ली आया और उसे गुजरात पर चढ़ा लाया।

समकालीन लेखक मेरुतुंग द्वारा लिखित पुस्तक ‘विचारसेनी’ एवं पद्मनाभ द्वारा लिखित ‘कान्हड़दे प्रबंध’ सहित अन्य हिन्दू ग्रंथों में भी इस घटना का उल्लेख हुआ है।

ई.1299 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने भाई उलूग खाँ तथा अपने भांजे नुसरत खाँ को राजा कर्ण बघेला पर आक्रमण करने भेजा। पाठकों को स्मरण होगा कि अल्लाउद्दीन से पहले के सुल्तानों ने मेवाड़ से होकर गुजरात जाने की चेष्टा की थी किंतु मेवाड़ के शासकों ने दिल्ली की सेना को मेवाड़ से ही मारकर खदेड़ दिया था। इसलिए इस बार अल्लाउद्दीन की सेना ने रेगिस्तान के जालोर राज्य से होकर गुजरात जाने का निश्चय किया।

अल्लाउद्दीन के सेनापतियों ने जालोर के चौहान शासक कान्हड़देव से गुजरात जाने का मार्ग मांगा किंतु कान्हड़देव ने अल्लाउद्दीन की सेना को अपने राज्य में से होकर जाने की अनुमति नहीं दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

उलूग खाँ कर्ण बघेला की रानी को उठा लाया (96)

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उलूग खाँ - www.bharatkaitihas.com
उलूग खाँ कर्ण बघेला की रानी को उठा लाया

राजा कर्ण बघेला की रानी कमलावती अप्रतिम सौंदर्य की स्वामिनी थी। उलूग खाँ ने अपने सनिकों से कहा कि वे रानी पर वार नहीं करें अपितु उसे जीवित ही पकड़ लें। खिलजी सैनिकों के थोड़े से परिश्रम से रानी पकड़ ली गई।

ई.1299 में अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना ने गुजरात-अभियान पर जाने के लिए थार मरुस्थल में स्थित जालोर राज्य से होकर जाने की अनुमति मांगी किंतु जालोर के राजा कान्हड़देव चौहान ने अल्लाउद्दीन की सेना को अपने राज्य से होकर निकलने से मना कर दिया।

इसका कारण यह था कि पहले भी महमूद गजनवी ने सोमनाथ पहुंचकर देवविग्रह को नष्ट किया था अतः कान्हड़देव को भय था कि इस बार भी दिल्ली के सुल्तान की सेना सोमनाथ को भंग करेगी।

राजा कान्हड़देव अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति का राजा था। वह अपने पूर्ववर्ती राजाओं उयसिंह चौहान, चाचिग देव चौहान तथा सामन्तसिंह की अपेक्षा अधिक प्रबल था। उसकी प्रजा उससे इतना अधिक प्रेम करती थी कि उसे भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता था। जब जालोर के प्रबल राज्य ने अल्लाउद्दीन की सेना को रास्ता नहीं दिया तो अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना सिंध के रास्ते जैसलमेर के भाटी राज्य में घुसी। यह वही रास्ता था जिस पर चलकर महमूद गजनवी गुजरात पहुंचा था।

भाटियों ने अल्लाउद्दीन की सेना का मार्ग रोका किंतु भाटी अधिक समय तक प्रतिरोध नहीं कर सके। अल्लाउद्दीन की कुछ सैनिक टुकड़ियां मेवाड़ होकर तथा कुछ टुकड़ियां जालोर राज्य के भीतर होकर भी गुजरीं थीं क्योंकि कुछ ग्रंथों में आए उल्लेखों के अनुसार मेवाड़ तथा जालोर दोनों ही राज्यों की सेनाओं ने अल्लाउद्दीन की सेना से युद्ध करके उन्हें भारी हानि पहुंचाई थी।

अल्लाउद्दीन के अमीर उलूग खाँ तथा नुसरत खाँ ने गुजरात की राजधानी अन्हिलवाड़ा को घेर लिया। ‘तारीखे मुबारकशाही’ के अनुसार गुजरात के शासक कर्ण बघेला के पास उस समय 30,000 घुड़सवार, 80,000 पैदल सेना तथा 30 हाथी थे किंतु राजा कर्ण बघेला ने स्वयं को तुर्क सेना से मुकाबला करने में असमर्थ जानकर अपनी राजधानी अन्हिलवाड़ा छोड़ दी तथा अपनी पुत्री देवल देवी के साथ देवगिरी के राजा रामचन्द्र की शरण में भाग गया।

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कुछ अन्य स्रोतों के अनुसार राजा कर्ण बघेला की रानी कमलावती ने अन्हिलवाड़ा छोड़ने से मना कर दिया तथा वह कुछ साहसी सैनिकों के साथ शत्रु-सेना का सामना करने को तैयार हो गई। कहा जाता है कि राजकुमारी देवलदेवी भी अपनी माँ के साथ रहकर शत्रु-सेना से युद्ध करना चाहती थी किंतु राजा कर्ण उसकी सुरक्षा के लिए इतना अधिक चिंतित था कि वह अपनी पुत्री का हाथ पकड़कर उसे घसीटता हुआ महल से बाहर ले गया तथा देवगिरि के लिए रवाना हो गया।

यहाँ इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि 30 हजार घुड़सवार तथा 80 हजार पैदल सेना के होते हुए भी राजा कर्ण अपनी राजधानी छोड़कर भाग क्यों गया जबकि अन्हिलवाड़ा के राजा अपने शत्रुओं से युद्ध करने के भलीभांति अभ्यस्त थे। पाठकों को स्मरण होगा कि अन्हिलवाड़ा के चौलुक्यों ने ई.1178 में मुहम्मद गौरी को परास्त किया था। यहाँ तक कि अन्हिलवाड़ा के चौलुक्यों ने मालवा के परमारों एवं चित्तौड़ के गुहिलों को भी एक से अधिक बार परास्त किया था।

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बघेल राजा भी कम पराक्रमी नहीं थे। फिर भी यदि बघेल राजा कर्ण को इस तरह भाग जाना पड़ा तो इसके दो मुख्य कारण थे। पहला यह कि राजा कर्ण का अपने ही मंत्रियों से झगड़ा चल रहा था और मंत्रीगण कर्ण को सबक सिखाना चाहते थे। दूसरा यह कि अन्हिलवाड़ा का दुर्ग एक स्थल दुर्ग था जिसमें रहकर शत्रु का सामना नहीं किया जा सकता था। यही कारण था कि जब ई.1025 में महमूद गजनवी ने अन्हिलवाड़ा पर आक्रमण किया था तो राजा भीम सोलंकी भी अन्हिलवाड़ा को छोड़कर कंठकोट के दुर्ग में चला गया था और उसने सोमनाथ के मंदिर में महमूद से युद्ध किया था। तीसरा यह कि मुस्लिम लेखकों ने बघेल राजा की सेना में घुड़सवारों एवं पैदल सैनिकों की संख्या बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताई है। बघेल राजा के पास इतने सैनिक रहे होते तो वह अवश्य ही मरने-मारने को तैयार हो जाता। अल्लाउद्दीन के भाई उलूग खाँ तथा अल्लाउद्दीन के भांजे अमीर नुसरत खाँ ने अन्हिलवाड़ा नगर में प्रवेश करते ही कत्लेआम मचा दिया। देखते ही देखते हजारों मनुष्यों के शव धरती पर बिछ गए। जब अलाउद्दीन की सेना ने राजा कर्ण बघेला के महल में प्रवेश किया तो उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि रानी कमलावती ने मुट्ठी भर सिपाहियों के साथ मोर्चा संभाल रखा था।

राजा कर्ण बघेला की रानी कमलावती अप्रतिम सौंदर्य की स्वामिनी थी। उलूग खाँ ने अपने सनिकों से कहा कि वे रानी पर वार नहीं करें अपितु उसे जीवित ही पकड़ लें। खिलजी सैनिकों के थोड़े से परिश्रम से रानी पकड़ ली गई। तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने रानी कमलावती द्वारा किए गए प्रतिरोध का उल्लेख नहीं करके केवल इतना ही लिखा है कि राजा कर्ण इतनी शीघ्रता से भागा कि रानी कमलावती वहीं छूट गई और मुसलमानों के हाथ लग गई किंतु यह तर्क गले नहीं उतर सकता।

यदि रानी उस समय छूट गई थी तो बाद में भी जा सकती थी। अतः वास्तविकता यही लगती है कि रानी छूटी नहीं थी अपितु उसने पलायन करने से इन्कार किया था और वह शत्रु सेना से युद्ध करना चाहती थी।

उलूग खाँ ने अन्हिलवाड़ा को जमकर लूटा तथा उसके बाद सोमनाथ के लिए रवाना हुआ। उलूग खाँ ने सोमनाथ के उस मंदिर को भी लूटा और तोड़ा जिसे गुजरात के हिन्दुओं ने महमूद गजनवी द्वारा किए गए विध्वंस के बाद फिर से बना लिया था। सोमनाथ शिवलिंग के कुछ टुकड़े एक हाथी के पैर में बांध दिए गए ताकि उसे घसीटते हुए दिल्ली ले जाया जा सके।

सोमनाथ को लूटने के बाद उलूग खाँ खम्भात गया। यहाँ एक आदमी उलूग खाँ के पास कुछ गुलामों को पकड़कर बेचने के लिए लाया। उलूग खाँ ने एक सुदंर गुलाम लड़के को एक हजार दीनार में खरीदा।

उलूग खाँ की सेना गुजरात से मिली लूट की अपार सम्पत्ति एवं बहुमूल्य देवप्रतिमाएं ऊंटों, खच्चरों एवं बैलगाड़ियों में लादकर दिल्ली ले गई। जब उलूग खाँ दिल्ली पहुंचा तो उसने सुल्तान के सामने सोने-चांदी तथा हीरे-मोतियों के ढेर लगा दिए और रानी कमलावती एवं एक हजार दीनार में खरीदे गए गुलाम को सुल्तान के सामने प्रस्तुत किया।

अल्लाउद्दीन ने कमलावती को अपने हरम में शामिल कर लिया तथा गुलाम को अपना अंगरक्षक बना लिया। हजार दीनार में खरीदे जाने के कारण इस गुलाम को हजार दीनारी कहा जाता था। कुछ समय बाद अल्लाउद्दीन ने इस गुलाम को मलिक बना दिया तथा उसका नाम काफूर रखा। इस प्रकार वह मलिक काफूर कहलाने लगा।

कुछ इतिहासकारों ने मलिक काफूर को हिंजड़ा बताया है जबकि इब्नबतूता ने लिखा है कि मलिक काफूर गुजरात के खंभात में रहने वाले धनी हिंजड़े ख्वाजा का हिन्दू गुलाम था जिसे इस्लाम में परिवर्तित करके अल्लाउद्दीन खिलजी को प्रस्तुत किया गया था। उस काल में ख्वाजाओं को खोजा भी कहा जाता था। इब्नबतूता के अनुसार इस गुलाम को 1000 दीनार में खरीदा गया था।

आचार्य चतुरसेन ने लिखा है कि मलिक काफूर सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी की पुरुष-रखैल था। वह कुछ ही दिनों में सुल्तान के इतने निकट पहुंचा गया कि मलिक काफूर उलूग खाँ की आँख की किरकिरी बन गया किंतु मलिक काफूर सल्तनत का प्रधानमंत्री बन गया और सुल्तान का भाई उलूग खाँ कुछ भी नहीं कर सका।

जब उलूग खाँ और नुसरत खाँ गुजरात को लूटकर वापस दिल्ली चले गए तब राजा कर्ण बघेला ने देवगिरि के राजा रामचंद्र की सहायता से गुजरात के कुछ क्षेत्रों पर फिर से अधिकार कर लिया। वह ई.1304 तक पर शासन करता रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जालोर के चौहान सोमनाथ शिवलिंग के खण्ड छीनने में सफल रहे (97)

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जालोर के चौहान - www.bharatkaitihas.com
जालोर के चौहान सोमनाथ शिवलिंग के खण्ड छीनने में सफल रहे

जब अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़े लेकर दिल्ली लौटी तथा मार्ग में जालोर राज्य से होकर गुजरी तो जालोर के चौहान अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना से सोमनाथ शिवलिंग के खण्ड छीनकर ले जाने में सफल रहे।

अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापति उलूग खाँ तथा नुसरत खाँ ने गुजरात की राजधानी अन्हिलवाड़ा पर आक्रमण करने जाते समय जालोर के राजा कान्हड़देव से जालोर राज्य में से होकर जाने की अनुमति मांगी थी किंतु जालोर के चौहान राजा कान्हड़देव ने अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना को अपने राज्य से निकलने देने से मना कर दिया था। इस पर अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना सिंध एवं जैसलमेर होकर गुजरात पहुंची थी।

जब उलूग खाँ को अन्हिलवाड़ा, सोमनाथ तथा खंभात की लूट से अपार सम्पत्ति प्राप्त हुई तो उसका उत्साह बढ़ गया। उसने गुजरात से दिल्ली लौटते हुए जालोर के चौहान राजा कान्हड़देव को दण्डित करने का निर्णय लिया। हर स्थान पर प्राप्त हुई विजयों के बाद उलूग खाँ का सिर घमण्ड से इतना घूम गया था कि उसने कान्हड़देव की कुछ भी चिंता किए बिना अपनी सेना को जालोर राज्य में घुसने का निर्देश दिया।

जब जालोर के चौहान राजा कान्हड़देव को उलूग खाँ के इस दुस्साहस की जानकारी हुई तो उसने उलूग खाँ को दण्डित करने का निर्णय लिया। राजा कान्हड़देव के भाग्य से इस समय मुस्लिम सेना लूट के हिस्से को लेकर असंतोष से उबल रही थी और लगभग विद्रोह पर उतरी हुई थी।

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पाठकों को स्मरण होगा कि पूर्ववर्ती सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने कई हजार मंगोलों को मुसलमान बनाकर दिल्ली के निकट बसाया था, इन्हें नव-मुस्लिम कहा जाता था। गुजरात के अभियान पर नव-मुस्लिमों को भी भेजा गया था। गुजरात की लूट से मिला धन इन मंगोल सैनिकों के सरंक्षण में था और तुर्की सैनिक इस धन को अपने संरक्षण में लेने के लिए नव-मुस्लिमों पर दबाव बना रहे थे।

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नव-मुस्लिमों अर्थात् मंगोल सैनिकों ने लूट का धन तुर्की सेनापतियों को देने से मना कर दिया। इस पर तुर्की सैनिकों द्वारा लूट के माल की पूछताछ के लिये मंगोल सैनिकों के मुखिया को लातों, घूसों और अन्य अपमानजनक तरीकों से पीटा गया। इस कारण मंगोल सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। मंगोल सैनिक वंश-परम्परा तथा धार्मिक परम्परा दोनों से ही दिल्ली सल्तनत से बंधे हुए नहीं थे। एक ओर तो वे अपनी इच्छा के मालिक थे तो दूसरी ओर दिल्ली सल्तनत के सेनापति भी उन्हें वह सम्मान भी नहीं देते थे जो तुर्की मुसलमानों एवं पठानों को प्राप्त था। जियाउद्दीन बरनी द्वारा लिखित ‘तारीखे फीरोजशाही’ में नव-मुस्लिमों द्वारा किए गए विद्रोह का विस्तार से वर्णन किया गया है किन्तु समकालीन लेखक अमीर खुसरो इस विद्रोह के बारे में कुछ भी नहीं लिखता क्योंकि यह विद्रोह न तो सुल्तान के लिये और न उलूग खाँ तथा नुसरत खाँ के लिये कोई गर्व की बात थी। मूथा नैणसी ने लिखा है कि जब मुस्लिम सेना जालोर से नौ कोस दूर संकराना गांव में पहुंची तो जालोर के चौहान राजा कान्हड़देव ने कांधल आलेचा सहित चार राजपूतों को उलूग खाँ के शिविर में भेजा। पद्मनाभ ने अपने ग्रंथ ‘कान्हड़दे प्रबंध’ में मुस्लिम शिविर में जाने वाले प्रमुख दूत का नाम जैता देवड़ा तथा शिविर स्थल का नाम सराणा लिखा है।

वस्तुतः यह घटना सराणा गांव की है न कि संकराणा की। राजा के दूतों को सेनापति के तम्बू में ले जाया गया। राजा के दूतों ने उलूग खाँ से कहा- ‘हमारे राजा ने तुम्हारे सुल्तान से कहलवाया है कि तुमने गुजरात में अनेक हिन्दुओं को मार दिया है और सोमैया महादेव (सेामनाथ) को बांध लिया है। इस पर भी तुम मेरे किले के निकट आकर ठहरे हो, यह तुमने अच्छा नहीं किया। क्या तुमने मुझे राजपूत ही नहीं समझा?’

इस पर सेनापति ने जवाब दिया- ‘सुल्तान ने तेरे राजा का बिगाड़ा तो कुछ भी नहीं है, सुल्तान अत्यंत श्रेष्ठ हैं तथा कुछ भी कर सकते हैं। फिर तेरा राजा क्यों बादशाह से ऐसी बात कहलवाता है?’

इस पर दूतों ने कहा- ‘यह तो कान्हड़देवजी ही जानें। तुम तो अपने सुल्तान से जाकर वही कहो जो हमारे राजा ने कहा है।’

इस वार्त्तालाप से स्पष्ट है कि मूथा नैणसी के अनुसार अल्लाउद्दीन खिलजी भी इस शिविर में उपस्थित था। जबकि यह बात इतिहास सम्मत नहीं है। अल्लाउद्दीन खिलजी इस अभियान में साथ नहीं था, अल्लाउद्दीन का भाई उलूग खाँ और अल्लाउद्दीन का भांजा नुसरत खाँ ही इस अभियान का नेतृत्व कर रहे थे।

मूथा नैणसी ने यह भी लिखा है कि कांधल को इस दौरान मुस्लिम सेना के शिविर का अध्ययन करने का अवसर मिल गया। उसने एक गाड़ी में लदे हुए सोमनाथ के शिवलिंग के भी दर्शन किए। जब कांधल शिविर से बाहर निकला तो नव-मुस्लिमों के असंतुष्ट नेता उमराव मुहम्मद तथा मीर कामरू ने कांधल तथा उसके साथियों से भेंट की तथा उन्हें बताया कि शाही सेना में उनके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया जा रहा है। अतः यदि राजा कान्हड़देव की सेना शाही सेना पर आक्रमण करेगी तो नव-मुस्लिम भी राजपूतों का साथ देंगे।

इस पर दोनों पक्षों में समझौता हो गया तथा अगली रात को मध्यरात्रि में शाही शिविर पर हमला करने का निर्णय हुआ। इस समझौते के अनुसार राजपूतों की सेना ने मध्यरात्रि में शाही शिविर पर हमला किया तथा मंगोलों ने भी उमराव मुहम्मद तथा मीर कामरू के नेतृत्व में दूसरी तरफ से शाही शिविर पर हमला किया।

‘कान्हड़दे प्रबंध’ में लिखा है कि दो दिन बाद ही जैता देवड़ा के नेतृत्व में राजपूतों ने मुस्लिम सेना पर आक्रमण किया। नुसरत खाँ का भाई मलिक अजिउद्दीन तथा अल्लाउद्दीन का भतीजा इस युद्ध में मारे गये। उलूग खाँ किसी तरह से बचकर दिल्ली भाग गया।

जालोर के चौहान राजा कान्हड़देव के सैनिकों को भागती हुई मुस्लिम सेना से संभवतः गुजरात की लूट से प्राप्त धन भी हाथ किन्तु उनकी दृष्टि में इस धन का कोई महत्त्व नहीं था। उनकी दृष्टि में गुजरात से बंधक बनाकर दिल्ली ले जाये जा रहे हजारों हिन्दू स्त्री-पुरूषों तथा सोमनाथ शिवलिंग को शत्रु के हाथों में मुक्त करा पाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

‘कान्हड़दे प्रबंध’, ‘रणमल छन्द’ तथा ‘मूथा नैणसी री ख्यात’ में सोमनाथ शिवलिंग को राजा कान्हड़देव द्वारा पुनः प्राप्त किया जाना बताया गया है। अमीर खुसरो की ‘खजायनुल फुतूह’, जियाउद्दीन बरनी की ‘तारीखे फीरोजशाही’ तथा जिनप्रभ सूरी की ‘विविध तीर्थ कल्प’ में लिखा है कि मुस्लिम सेना द्वारा शिवलिंग दिल्ली ले जाया गया।

मूथा नैणसी लिखता है कि बादशाही सेना का नाश करके कान्हड़देव सोमनाथ के निकट पहुंचा। उसने महादेव की पिंडी को हाथ डालकर उठाया तो वह तुरन्त उठ गया। अतः शिवलिंग को संकराणा गांव में स्थापित कर दिया तथा वहाँ एक मंदिर बनवाया।

संकरणा गांव में यह मान्यता है कि दिल्ली के सैनिक सोमनाथ के शिवलिंग का एक टुकड़ा हाथी के पांव में बांधकर उसे घसीटते हुए दिल्ली ले जा रहे थे किंतु संकराणा गांव में राजपूतों ने शिवलिंग के टुकड़े को खोलकर एक कुएं में डाल दिया तथा जब शाही सेना वहाँ से चली गई तब शिवलिंग के उस टुकड़े को गांव के ही एक मंदिर में स्थापित कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन की माँ को लूट लिया जैसलमेर के राजकुमारों ने (98)

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अल्लाउद्दीन की माँ को लूट लिया जैसलमेर के राजकुमारों ने

ई.1304 में दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन की माँ लगभग साढ़े पांच सौ खच्चरों पर सोने-चांदी की अशर्फियां, कीमती रेशमी कपड़े तथा खाने-पीने की बहुमूल्य वस्तुएँ लेकर मुल्तान एवं सिंध होते हुए जैसलमेर राज्य के रास्ते हज करने मक्का जा रही थी, तब भाटियों ने दिल्ली की सेना को अपनी तलवार का पानी पिलाने का निश्चय किया।

जब जालोर के राजा कान्हड़देव ने अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना को गुजरात जाने के लिए जालोर राज्य से होकर नहीं निकलने दिया तो अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना सिंध एवं जैसलमेर के रेगिस्तान में होती हुई गुजरात पहुंची थी। जैसलमेर के भाटियों ने अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना पर आक्रमण किया था किंतु दिल्ली सल्तनत की सेना काफी विशाल थी इसलिए भाटी उन्हें गुजरात की तरफ जाने से नहीं रोक पाए थे।

उस समय जैतसिंह (प्रथम) जैसलमेर का शासक था। हालांकि जैतसिंह से पहले भी जैसलमेर राज्य दो बार मुस्लिम सेना से भयानक संघर्ष कर चुका था। पहला संघर्ष ई.1025 में उस समय हआ था जब महमूद गजनवी गजनी से सोमनाथ गया था और दूसरा संघर्ष बलबन के समय में हुआ था।

उन दोनों संघर्षों में ही भाटियों ने गजनी और दिल्ली की सेनाओं को थार की तलवार का पानी पिलाया था किंतु जब ई.1299 में जैसलमेर की सेना दिल्ली की सेना को सोमनाथ की तरफ जाने से नहीं रोक सकी तो जैसलमेर के भाटियों को इस बात का बड़ा दुःख हुआ और वे किसी उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।

ई.1304 में दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन की माँ लगभग साढ़े पांच सौ खच्चरों पर सोने-चांदी की अशर्फियां, कीमती रेशमी कपड़े तथा खाने-पीने की बहुमूल्य वस्तुएँ लेकर मुल्तान एवं सिंध होते हुए जैसलमेर राज्य के रास्ते हज करने मक्का जा रही थी, तब भाटियों ने दिल्ली की सेना को अपनी तलवार का पानी पिलाने का निश्चय किया।

‘जैसलमेर री ख्यात’ में लिखा है कि- ‘बादशाह गोरीया पीरां की मोहरां की खचरां साढ़े पाँच सौ नगर थट्टा सूं मुल्तान जाती थीं।’ अर्थात् 550 खच्चरों पर केवल सोने की मोहरें बताई गई हैं। यह तथ्य सही प्रतीत नहीं होता किंतु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अल्लाउद्दीन की माँ के पास बहुत बड़ी मात्रा में सोने-चांदी की मोहरें थीं। इस ख्यात के अनुसार नवाब मेहबू खाँ दिल्ली की तरफ से फौज लेकर आया तथा नवाब फरीद खाँ मुल्तान की तरफ से फौज लेकर आया ताकि सुल्तान की माँ को मार्ग में सुरक्षा दी जा सके।

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उस समय जैसलमेर पर जैतसिंह (द्वितीय) का शासन था। उसके अत्यंत वृद्ध होने के कारण उसके पुत्र मूलराज तथा रतनसिंह राज्यकार्य देखा करते थे। उन्होंने थट्टा से मुल्तान जाते हुए दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन की माँ के काफिले को रोका तथा खच्चरों को पकड़कर जैसलमेर दुर्ग में ले आए। जब यह सूचना दिल्ली पहुंची तो अल्लाउद्दीन खिलजी बहुत कुपित हुआ। उसने करीम खाँ एवं अली खाँ नामक अमीरों के नेतृत्व में एक विशाल सेना जैसलमेर भेजी।

‘जैसलमेर री ख्यात’ तथा ‘जैसलमेर की तवारीख’ का वर्णन मिलता-जुलता है जबकि मूथा नैणसी ने इस घटना का वर्णन अलग ढंग से किया है। उसके अनुसार शाह का पीरजादा रूम (कुस्तुंतुनिया) गया था। रूम के सुल्तान ने पीरजादा को एक करोड़ रुपए का माल दिया था। जब वह रूम से जैसलमेर होता हुआ दिल्ली जा रहा था, तब 200 बादशाही सवार उसके पास थे। मूलराज भाटी ने उन्हें मारकर उनका धन और घोड़े ले लिए। जब सुल्तान को अपने शहजादे के मारे जाने की सूचना मिली तो उसने कमालुद्दीन को 7,000 सवार देकर जैसलमेर भेजा जिसने जैसलमेर का दुर्ग घेर लिया।

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कर्नल टॉड ने इस घटना का वर्णन तीसरे ढंग से किया है। टॉड ने लिखा है कि मुल्तान तथा थट्टा दोनों ही अल्लाउद्दीन खिलजी के अधिकार में थे। जब वहाँ से लूटा गया धन 1,500 घोड़ों एवं 1,500 खच्चरों पर लादकर भक्कर के मार्ग से दिल्ली के शाही खजाने में जमा कराने हेतु ले जाया जा रहा था, तब जैसलमेर के शासक जैतसिंह भाटी के पुत्रों ने शाही खजाने को लूटने के प्रयोजन से 700 घुड़सवार एवं 1,200 ऊँटों का काफिला बनाकर अनाज के व्यापारियों के रूप में शाही काफिले का पीछा करते हुए पंचनद (अब पचपदरा) के मुकाम पर शाही खेमों के निकट पहुंचकर अपना डेरा डाल दिया। रात्रि में भाटियों ने शाही खजाने पर आक्रमण किया तथा 400 मंगोल एवं इतने ही पठान सैनिकों की हत्या करके खजाना लूट लिया। जब बचे हुए सैनिकों ने दिल्ली पहुंचकर इसकी सूचना अल्लाउद्दीन खिलजी को दी तो उसने जैसलमेर के विरुद्ध सेना भेजी। सुल्तान का सेनापति कमालुद्दीन गुर्ग 7,000 अश्वारोहियों सहित जैसलमेर पहुंचा एवं उसने दुर्ग घेर लिया। जब जैसलमेर दुर्ग के घेरे को तीन वर्ष का समय होने आया तब सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी को कमालुद्दीन गुर्ग पर संदेह हुआ कि वह जानबूझ कर जैसलमेर में पड़ा हुआ है तथा दिल्ली नहीं आना चाहता है।

इस पर अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने निजी गुप्तचरों को जैसलमेर भेजा। इन गुप्तचरों ने जैसलमेर जाकर पूरी बात का पता लगाया तथा दिल्ली लौटकर सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी को सूचना दी कि कमालुद्दीन गुर्ग तथा जैसलमेर के राजकुमार मूलराज को चौसर खेलने का बड़ा शौक है, इसलिए दोनों में दोस्ती हो गई है तथा वे मिलकर चौसर खेल रहे हैं। इस घेरे का कोई अर्थ नहीं है।

इस पर अल्लाउद्दीन खिलजी ने ‘हजार दीनारी’ अर्थात् मलिक काफूर को एक विशाल सेना के साथ जैसलमेर रवाना किया। मलिक केसर को भी उसके साथ भेजा गया। मलिक काफूर तथा मलिक केसर ने जैसलमेर पहुंचकर मोर्चा संभाला। मलिक काफूर चाहता था कि वह दुर्ग पर सीधा हमला करे किंतु कमालुद्दीन गुर्ग इस पक्ष में था कि परम्परागत नीति से लड़ते हुए दुर्ग को जीता जाए ताकि कम से कम सैनिकों की हानि हो। इस नीति के अनुसार मुस्लिम सेना तब तक हिन्दू दुर्ग को घेरकर रखती थी जब तक कि दुर्ग के भीतर रसद सामग्री कम न हो जाए तथा हिन्दू सेना स्वयं ही दुर्ग का दरवाजा खोलकर बाहर न आ जाए।

मलिक काफूर ने कमालुद्दीन गुर्ग की एक न सुनी और अपनी सेना लेकर सीधे ही दुर्ग पर हमला कर दिया तथा पहाड़ी चढ़कर सीधे ही मुख्य द्वार तक पहुंच गया। मलिक काफूर ने अपने हाथियों को मुख्य द्वार पर धकेला ताकि लकड़ी के दरवाजे को तोड़ा जा सके किंतु हाथी मुख्य दरवाजे को नहीं तोड़ सके। इस पर मलिक काफूर ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे रस्सी बांधकर दुर्ग की दीवारों एवं कंगूरों पर चढ़ जाएं।

मलिक काफूर को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि राजपूतों ने अब तक कोई प्रतिरोध नहीं किया। इसलिए उसका उत्साह बढ़ता चला गया। सैंकड़ों सैनिक रस्सियां बांधकर दुर्ग की दीवार पर चढ़ने लगे तथा जैसे ही वे दीवार के आधे से अधिक हिस्से को पार कर गए तब राजपूतों ने पहली बार रणभेरी बजाई तथा एक साथ सैंकड़ों राजपूत सैनिक दुर्ग की प्राचीर के ऊपर प्रकट हुए। उन्होंने दीवारों पर चढ़ रहे मुस्लिम सैनिकों पर तीर, पत्थर और जलते हुए कपड़े फैंकने आरम्भ कर दिए।

राजपूतों की इस अप्रत्याशित कार्यवाही से शत्रु सेना घबरा गई। सैंकड़ों सैनिक दीवार से नीचे गिरकर मर गए। उसी समय दुर्ग का द्वार खुला तथा राजपूतों ने मलिक काफूर के सैंकड़ों सैनिकों को काट डाला। राजपूतों का ऐसा प्रचण्ड रूप देखकर दिल्ली सल्तनत के सैंकड़ों सैनिकों ने पहाड़ी के ऊपर से ही घाटी में छलांग लगा दी और प्राण गंवा बैठे। इस प्रकार एक दिन की कार्यवाही में ही दिल्ली की सेना सिर पर पैर रखकर दिल्ली की ओर भाग छूटी।

सुल्तान का भांजा एवं जवांई मलिक केसर वहीं पर मारा गया किंतु मलिक काफूर के प्राण बच गए और वह अपने बचे हुए सैनिकों के साथ दिल्ली की ओर रवाना हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जैसलमेर दुर्ग छोड़कर भाग गए भूख से व्याकुल तुर्की सैनिक (99)

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जैसलमेर दुर्ग छोड़कर भाग गए भूख से व्याकुल तुर्की सैनिक

जैसलमेर दुर्ग ऐसे विकट रेगिस्तान में स्थित था जहाँ सैंकड़ों मील दूर तक रेत के टीलों के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं देता था। तुर्की सैनिक इन परिस्थितियों में रहने के अभ्यस्त नहीं थे। अतः एक दिन उन्होंने जैसलमेर दुर्ग के टूटे हुए दरवाजों को कांटों की बाड़ से बंद किया तथा चुपचाप दुर्ग खाली करके दिल्ली चले गए।

जैसलमेर की सेना ने मलिक काफूर को मार भगाया। दिल्ली की सेना के भाग जाने के बाद राजपूतों ने उन पत्थरों को नीचे से उठाकर फिर से दुर्ग की प्राचीर पर रख लिया जिन्हें दुर्ग की प्राचीर से गिराया गया था। वे पत्थर आज भी विजय-चिह्न के रूप में दुर्ग की प्राचीर पर रखे हुए हैं। जैसलमेर की सेना ने दुर्ग की मरम्मत कर ली तथा रसद आदि का भी अच्छा प्रबंध कर लिया क्योंकि उन्हें आशा थी कि दिल्ली की सेना लौटकर अवश्य आएगी तथा इस बार पहले से भी अधिक बड़ी सेना आएगी।

मलिक काफूर की शर्मनाक पराजय के बाद अमीर कमालुद्दीन गुर्ग को सुल्तान के सामने स्वयं को सही सिद्ध करने का अवसर प्राप्त हो गया। सुल्तान ने मलिक काफूर को जैसलमेर अभियान से हटा दिया तथा कमालुद्दीन गुर्ग को ही फिर से जैसलमेर अभियान का प्रमुख बना दिया।

शाही सेना के वापस आने से पहले, दुर्ग में कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटीं जिनका दुर्ग की सुरक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ा। हुआ यह कि कुछ वर्ष पहले जैसलमेर के एक मंत्री विक्रमसिंह पर गबन का आरोप लगाया गया था जिसके कारण रावल जैतसिंह ने मंत्री विक्रमसिंह को अपने राज्य से निकाल दिया था। जब विक्रमसिंह को ज्ञात हुआ कि दिल्ली की सेना दोबारा जैसलमेर आ रही है तो विक्रमसिंह ने रावल जैतसिंह के पास अनुरोध भिजवाया कि मातृभूमि पर आए इस संकट के समय वह मातृभूमि की सेवा करना चाहता है।

इस पर रावल जैतसिंह ने विक्रमसिंह को फिर से सेवा में रख लिया। विक्रमसिंह के अनुरोध पर रावल ने गबन के पुराने आरोपों की जांच करवाई तो उसमें विक्रमसिंह को निर्दोष पाया गया। इस कारण झूठा आरोप लगाने वाले मंत्रियों को जैसलमेर छोड़कर जाना पड़ा। इसके कुछ दिन बाद ही रावल जैतसिंह की मृत्यु हो गई तथा उसका बड़ा पुत्र मूलराज भाटी जैसलमेर का रावल बन गया।

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कमालुद्दीन गुर्ग एक बार फिर से एक बड़ी सेना लेकर जैसलमेर पहुंचा और दुर्ग को घेर कर बैठ गया। इस बार भी घेरा बहुत लम्बा चला। जैसलमेर की ख्यातों में लिखा है कि बारह साल तक शाही सेना दुर्ग को घेर कर बैठी रही किंतु दुर्ग में नहीं घुस सकी। इस अवधि को ज्यों का त्यों नहीं स्वीकारा जा सकता किंतु इतना अवश्य है कि इस बार का घेरा पहले से भी अधिक लम्बी अवधि तक चला।

धीरे-धीरे दुर्ग में रसद-पानी समाप्त होने लगा। यहाँ तक कि केवल पशुओं के खाने के लिए ग्वार ही बचा रहा। इस पर रावल मूलराज एवं रतनसिंह ने साका करने का निर्णय लिया। एक रात दुर्ग के भीतर की समस्त औरतों ने जौहर किया। रावल मूलराज ने अपने वंश को बचाए रखने के लिए अपने पुत्रों घड़सी एवं लक्ष्मण को भाटी चानण एवं उनड़ के संरक्षण में दुर्ग से बाहर भेज दिया।

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दूसरे दिन प्रातः होते ही रावल मूलराज तथा उसके भाई रतनसिंह ने दुर्ग के फाटक खुलवाए। हिन्दू वीर सिर पर केसरिया बांधकर एवं मुंह में तुलसीदल रखकर दुर्ग से बाहर निकले तथा मुस्लिम सेना पर टूट पड़े। मुस्लिम सेना भी इस आक्रमण के लिए पहले से ही तैयार थी। अंत में राजपूतों की ओर से लड़ रहा प्रत्येक पुरुष युद्धक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुआ। ‘जैसलमेर री ख्यात’, ‘जैसलमेर की तवारीख’ एवं कर्नल टॉड की ‘एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज’ में इस युद्ध का वर्णन हुआ है किंतु किसी भी मुस्लिम तवारीख में इस युद्ध का उल्लेख नहीं हुआ है। जैसलमेर दुर्ग के संभवनाथ जैन मंदिर में वि.सं.1497 अर्थात् ई.1440 का एक शिलालेख मिला है जिसमें इस युद्ध का उल्लेख किया गया है। जैसलमेर दुर्ग में स्थित पार्श्वनाथ जैन मंदिर में वि.सं.1473 अर्थात् ई.1416 का एक और शिलालेख मिला है जिसमें कहा गया है कि रावल घड़सी ने म्लेच्छों को मारकर इस दुर्ग को अपने अधिकार में लिया। ये शिलालेख इस ओर संकेत करते हैं कि भाटियों ने किसी युद्ध में जैसलमेर दुर्ग को गंवा दिया था जिस पर बाद में रावल घड़सी ने पुनः अधिकार किया।

कुछ अन्य स्रोतों से पुष्टि होती है कि अल्लाउद्दीन की सेना ने ई.1314 में जैसलमर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह घेरा 6 साल तक चला था क्योंकि घेरा आरम्भ होने की तिथि ई.1308 से पहले नहीं हो सकती। यह देखकर हैरानी होती है कि इतने साल तक चले इस अभियान के सम्बन्ध में किसी भी फारसी पुस्तक में एक पंक्ति तक नहीं लिखी गई है जबकि हिन्दू पुस्तकें इस अभियान पर पर्याप्त सामग्री उपलब्ध करवाती हैं।

जैसलमेर के निर्जन दुर्ग पर अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना का अधिकार हो गया। कमालुद्दीन गुर्ग ने दुर्ग पर एक चौकी स्थापित की तथा अपने कुछ सैनिक वहाँ नियुक्त कर दिए। इसके बाद दिल्ली सल्तनत की सेना फिर से दिल्ली लौट गई। जब इन सैनिकों के उपयोग के लिए दिल्ली से रसद एवं कोष आता था तब भाटी राजपरिवार की शाखा के वंशज दूदा तथा तिलोकसी उस रसद एवं कोष को लूट लेते थे। इस कारण दुर्ग में नियुक्त मुस्लिम सैनिक भूखों मरने लगे।

जैसलमेर दुर्ग ऐसे विकट रेगिस्तान में स्थित था जहाँ सैंकड़ों मील दूर तक रेत के टीलों के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं देता था। दुर्ग के चारों ओर रेत के गुबार उड़ते थे जिनके कारण दिन में भी एक दूसरे की शक्ल तक दिखाई नहीं देती थी।

दुर्ग में रहने वाले राजपूत सैनिकों के परिवार खेती करके अपने खाने लायक बाजरा, मोठ और ग्वार उगा लेते थे और भेड़-बकरी आदि पशुओं को पाल लेते थे किंतु उनके चले जाने के कारण न तो कोई खेती करने वाला बचा था और न दुधारू पशुओं को पालने वाला। यह दुर्ग जिस पहाड़ी पर स्थित था, उस पहाड़ी पर कुछ प्राकृतिक तालाब बने हुए थे जिनमें भरे हुए पानी से मनुष्यों एवं ऊँटों का काम चल जाता था, अन्यथा कोसों दूर तक पानी की कोई उपलब्धता नहीं थी।

तुर्की सैनिक इन परिस्थितियों में रहने के अभ्यस्त नहीं थे। अतः एक दिन उन्होंने दुर्ग के टूटे हुए दरवाजों को कांटों की बाड़ से बंद किया तथा चुपचाप दुर्ग खाली करके दिल्ली चले गए।

इन तुर्की सैनिकों के साथ एक फकीर भी दुर्ग में रहने लगा था। उसे भी दुर्ग खाली करना पड़ा। एक दिन वह निकटवर्ती महेबा राज्य के शासक जगमाल राठौड़ से मिलने गया। जब उसने जगमाल राठौड़ को बताया कि तुर्की सैनिक जैसलमेर दुर्ग खाली करके भाग गए हैं तो जगमाल ने अपने सनिकों को तीन सौ ऊंटगाड़ियों पर बैठाकर दुर्ग पर अधिकार करने के लिए भेजा।

इसी बीच रावल घड़सी के वंशज दूदा को भी मुसलमानों द्वारा किला खाली करने की सूचना मिल गई। वह भी अपने सिपाहियों सहित दुर्ग में लौट आया। जब महेबा के सैनिक जैसलमेर दुर्ग पर अधिकार पहुंचे तो दूदा ने उन्हें भगा दिया तथा उनके 300 ऊँटगाड़ों को भी छीन लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बागी मंगोल वेश्याओं को लेकर जालोर से भाग गए (100)

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बागी मंगोल वेश्याओं को लेकर जालोर से भाग गए

बागी मंगोल सैनिकों ने कहा कि वे राजा कान्हड़देव के मित्र हैं, उसके अधीन नहीं हैं। हम उसका आदेश स्वीकार नहीं कर सकते। राजा कान्हड़देव ने उन्हें चेतावनी दी कि वे हमारी शरण में हैं और हमारे राज्य में रह रहे हैं अतः उन्हें राजा का आदेश मानना होगा।

सोमथनाथ से लौट रही अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना के नव-मुस्लिम मंगोल सैनिकों एवं तुर्की सैनिकों के बीच गुजरात से मिले लूट के धन को लेकर संघर्ष हुआ था और बागी मंगोल सैनिकों ने दिल्ली की सेना के विरुद्ध जालोर के चौहानों द्वारा की गई कार्यवाही में चौहानों का साथ दिया था।

इस कारण अल्लाउद्दीन खिलजी के भाई उलूग खाँ एवं अल्लाउद्दीन के भांजे नुसरत खाँ को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा था। बागी मंगोलों ने सुल्तान अल्लाउद्दीन के भतीजे की हत्या कर दी जो संभवतः उलूग खाँ का पुत्र था। मंगोलों ने नुसरत खाँ के भाई को भी मार डाला।

जब दिल्ली में बैठे सुल्तान अल्लाउद्दीन को बागी मंगोल सैनिकों के विद्रोह के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने दिल्ली के निकट मंगोलपुरी में रह रहे मंगोल-परिवारों को नृशंसता पूर्वक मरवा दिया। तुर्की सैनिकों द्वारा विद्रोही मंगोलों की स्त्रियों का सतीत्व लूट लिया गया तथा बच्चों को उनकी माताओं के सामने ही टुकड़े करके फैंक दिया गया। नव-मुस्लिमों की जागीरें छीन ली गईं तथा उन्हें भविष्य के लिए सल्तनत की नौकरियों से वंचित कर दिया गया। इससे नव-मुसलमानों का असन्तोष और बढ़ गया और उन्होंने सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी की हत्या करने का षड्यन्त्र रचा।

अल्लाउद्दीन खिलजी को इस षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने अपनी सेना को आज्ञा दी कि वे नव-मुसलमानों को समूल नष्ट कर दें। जियाउद्दीन बरनी का कहना है कि सुल्तान की इस आज्ञा के जारी होते ही लगभग तीन हजार नव-मुस्लिम तलवार के घाट उतार दिए गए और उनकी सम्पत्ति छीन ली गई। जियाउद्दीन बरनी ने अल्लाउद्दीन की इस क्रूरता की निंदा की है।

जालोर में किए गए विद्रोह के बाद बागी मंगोलों के सरदार मुहम्मद शाह और मीर कामरू अपने सैनिकों के साथ जालोर में ही रुक गए थे। वे राजा कान्हड़देव के संरक्षण में रहने लगे। एक दिन इन बागी मंगोल सैनिकों ने जालोर में एक गाय मारकर खाई। यह बात हिन्दू सैनिकों को ज्ञात हो गई। उन्होंने इस घटना के बारे में राजा कान्हड़देव को सूचित किया। इस पर राजा कान्हड़देव ने उनसे कहा कि हमारे राज्य में तुम लोग गाय मार कर नहीं खा सकते।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

इस पर बागी मंगोल सैनिकों ने कहा कि वे राजा कान्हड़देव के मित्र हैं, उसके अधीन नहीं हैं। हम उसका आदेश स्वीकार नहीं कर सकते। राजा कान्हड़देव ने उन्हें चेतावनी दी कि वे हमारी शरण में हैं और हमारे राज्य में रह रहे हैं अतः उन्हें राजा का आदेश मानना होगा।

बागी मंगोल सैनिक कुछ दिन तो शांत रहे किंतु जब फिर से वही होने लगा तो जालोर के चौहान राजा कान्हड़देव के सैनिकों ने एक योजना बनाई। उन्होंने मंगोलों से कहा कि वे अपनी वेश्याएं कुछ दिनों के लिए हमें दे दें। मंगोल समझ गए कि अब उनका जालोर राज्य में रहना कठिन है, अतः वे चुपचाप अपनी वेश्याओं को लेकर रातों-रात जालोर छोड़कर भाग गए। कान्हड़देव के सैनिक यही चाहते थे, अतः उन्होंने मंगोलों को जाने से नहीं रोका।

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बागी मंगोल सैनिक जालोर से तो भाग आए किंतु उनके लिए भारत में रहना आसान नहीं था। वे दिल्ली लौटकर जाते तो उलूग खाँ और नुसरत खाँ उन्हें मार डालते। उन्होंने सुना था कि रणथम्भौर का चौहान शासक हम्मीरदेव अपने वचन का बड़ा पक्का है तथा शरण में आए हुओं की रक्षा अपने प्राण देकर भी करता है। अतः वे जालोर से सीधे रणथम्भौर की तरफ भागे। जालोर और रणथम्भौर के शासक शाकंभरी के चौहानों की ही दो शाखाएं थीं। फिर भी मंगोल सैनिकों के पास अपनी रक्षा के लिए हिन्दू राजाओं की शरण प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। रणथम्भौर के राजा हम्मीरदेव ने उन्हें शरणागत जानकर अपने दुर्ग में शरण दे दी। जब अल्लाउद्दीन खिलजी को ज्ञात हुआ कि विद्रोही मंगोल सैनिक जालोर से रणथंभौर भाग आए हैं तो ई.1299 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने उलूग खाँ तथा नुसरत खाँ को एक सेना देकर रणथंभौर पर आक्रमण करने भेजा। रणथम्भौर के राजा हम्मीरदेव ने दुर्ग के अन्दर रहकर रक्षात्मक युद्ध करने का निश्चय किया। इस कारण अल्लाउद्दीन के सेनापति बिना किसी व्यवधान के रणथम्भौर दुर्ग के निकट पहुंच गए तथा दुर्ग के चारों ओर घेरा डाल दिया। रणथम्भौर का दुर्ग चित्तौड़ तथा जालोर की तरह ही अजेय एवं दुर्गम माना जाता था।

यद्यपि यह दुर्ग इल्तुतमिश के समय में कुछ समय के लिए दिल्ली सल्तनत के अधीन रह चुका था किंतु इल्तुतमिश के जीवनकाल में ही यह फिर से चौहानों के अधीन आ गया था।

एक दिन जब नुसरत खाँ दुर्ग के चारों ओर घेरा डालकर पड़ी हुई अपनी सेना का निरीक्षण कर रहा था तब अचानक दुर्ग से पत्थरों की बरसात होने लगी। एक पत्थर नुसरत खाँ के सिर में आकर लगा और नुसरत खाँ मर गया। दिल्ली की सेना के लिए यह एक बड़ा धक्का था। अभी दिल्ली की सेना संभल भी नहीं पाई थी कि राजपूतों की एक सेना ने दुर्ग से बाहर निकलकर दिल्ली की सेना पर आक्रमण कर दिया। इस पर तुर्कों को घेरा उठाकर भागना पड़ा।

जब सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी को इस घटना की सूचना मिली तो उसका माथा ठनका। उसकी सेनाएं जालोर, जैसलमेर तथा रणथम्भौर से पिटकर भाग रही थीं। इसलिए अल्लाउद्दीन खिलजी ने स्वयं रणथम्भौर पर आक्रमण करने का निश्चय किया। उसने बड़ी भारी तैयारी के साथ एक और विशाल सेना के साथ दिल्ली से रणथम्भौर के लिए प्रस्थान किया।

जब अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली से रणथंभौर जा रहा था तब वह मार्ग में तिलपत नामक स्थान पर रुका और उसने कुछ दिन वहीं रहकर शिकार खेलने का निश्चय किया। एक दिन जब अल्लाउद्दीन खिलजी जंगल में शिकार खेल रहा था और उसके सैनिक उससे कुछ दूर हो गए तब अवसर देखकर अल्लाउद्दीन खिलजी के भतीजे अकत खाँ ने अपने सैनिकों के साथ मिलकर सुल्तान पर प्राणघातक हमला किया।

इस हमले में सुल्तान बुरी तरह से घायल हो गया परन्तु उसके प्राण बच गए। इतने में ही अल्लाउद्दीन खिलजी के सैनिक वहाँ आ गए और उन्होंने अकत खाँ तथा उसके साथियों को पकड़ कर उन्हें मार डाला।

अल्लाउद्दीन खिलजी के आदेश से अकत खाँ के समस्त भाइयों की सम्पत्ति जब्त करके उन्हें बंदी बना लिया गया जबकि इन भाइयों का इस षड़यंत्र एवं हमले से कोई सम्बन्ध नहीं था। इस दुर्घटना के बाद अल्लाउद्दीन खिलजी अपने घावों का उपचार करवाकर फिर से रणथंभौर के लिए रवाना हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रणथंभौर का जौहर (101)

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रणथंभौर का जौहर

अल्लाउद्दीन खिलजी के आक्रमणों के कारण राजपूताने के कई किलों में जौहर हुए। इनमें चित्तौड़ का जौहर, जालौर का जौहर, सिवाना का जौहर, जैसलमेर का जौहर तथा रणथंभौर का जौहर बहुत चर्चित हैं। अन्य किलों में भी जौैहर हुए। हिन्दू रानियों से लेकर दासियां, छोटी बच्चियां यहाँ तक कि अवयस्क लड़के भी जौहर की भीषण ज्वाला में कूद कर अपने प्राण त्याग देते थे ताकि उन्हें मुसलमान सैनिकों की वासना का शिकार न होना पड़े।

घायल अल्लाउद्दीन खिलजी अपने घावों का उपचार करने के बाद रणथंभौर पहुंचा। उसने रणथंभौर के शासक हम्मीरदेव चौहान को संदेश भिजवाया कि वह नव-मुस्लिमों अर्थात् मंगोलों के सरदार मुहम्मदशाह को मेरे पास भेज दे। इतिहास की कुछ पुस्तकों में मुहम्मदशाह को महमांशाह भी कहा गया है। अल्लाउद्दीन खिलजी ने हम्मीर से कहलवाया कि या तो मुहम्मदशाह को लौटाए या चार लाख अशर्फियां, हाथी, घोड़े और अपनी पुत्री सुल्तान को भेंट करे अन्यथा उसका सर्वनाश कर दिया जायेगा।

हम्मीरदेव ने उत्तर भिजवाया कि मुहम्मदशाह मेरी शरण में है। इसलिए मैं उसे नहीं लौटा सकता किंतु मैं सुल्तान को तलवार के उतने ही झटके देने के लिये उद्यत हूँ, जितनी मोहरें, हाथी और घोड़े मुझसे मांगे गए हैं।

हम्मीर की सेना ने दुर्ग के भीतर से मंजनीक एवं ढेंकुली की सहायता से पत्थर के गोले बरसाये तथा अग्निबाण चलाये। दुर्ग के भीतर स्थित तालाबों से अचानक तेज जलधारा छोड़ी गई जिससे खिलजी की सेना की भारी क्षति हुई।

अमीर खुसरो ने ‘तारीखे अलाई’ में लिखा है कि सुल्तान के आदेश से खाइयों में रेत के बोरों के ढेर लगा दिये गए और उन पर किले के भीतर तक मार करने के लिये ‘पाशेब’ अर्थात् विशेष प्रकार के चबूतरे बनवाये गए। किले के भीतर ज्वलनशील पदार्थ फैंकने के लिए ‘मगरबी’ और पत्थर फैंकने के लिए ‘अर्रादा’ नामक यंत्र लगाए गए। दीवारों को सुरंगों के जरिये तोड़ा जाने लगा।

‘तारीखे फरिश्ता’ में लिखा है कि जालोर से भाग कर आये मंगोल सरदार मुहम्मदशाह तथा मीर कामरू आदि को सुल्तान अल्लाउद्दीन ने रणथम्भौर के राणा हम्मीरदेव से वापस मांगा तो राणा हम्मीर ने उन्हें लौटाने से मना कर दिया।

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‘हम्मीर महाकाव्य’ के लेखक नयनचंद्र सूरि ने लिखा है कि राजपूतों ने किले की मोर्चोबंदी की और हम्मीर के सेनापतियों- वीरम, रतिपाल, जयदेव, भीमसिंह, धर्मसिंह तथा मंगोल मुहम्मदशाह ने हिंदुवाटी की घाटी में अल्लाउद्दीन की सेना से युद्ध किया। इस कारण अल्लाउद्दीन एक साल तक रणथंभौर दुर्ग के सामने पड़ा रहा किंतु दुर्ग में नहीं घुस सका।

‘हम्मीरायण’ नामक ग्रंथ में लिखा है कि रणथंभौर की जनता को हम्मीर की वीरता पर इतना विश्वास था कि जब खिलजी ने रणथंभौर पर घेरा डाला तो बनिये हाट में बैठकर हँसते रहे। जिस समय अल्लाउद्दीन खिलजी रणथम्भौर का घेरा डाले हुए था, उन्हीं दिनों अल्लाउद्दीन खिलजी के भांजों अमीर उमर तथा मंगू खाँ ने बदायूँ तथा अवध में विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। अल्लाउद्दीन के आदेश से ये विद्रोह शीघ्र ही दबा दिए गए और अमीर उमर तथा मंगू खाँ को बंदी बनाकर उनकी आँखें निकलवा ली गईं।

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जब अल्लाउद्दीन खिलजी पूरे एक साल के प्रयास के बाद भी रणथंभौर के दुर्ग में नहीं घुस सका तो अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने सेनापतियों एवं गुप्तचरों से कहा कि वे राजा हम्मीरदेव चौहान की कमजोरियों का पता लगाएं। गुप्तचरों ने सुल्तान को बताया कि राजा हम्मीरदेव का मंत्री रतिपाल अपने स्वामी से नाराज है। इस पर अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने गुप्तचरों से कहा कि वे रतिपाल को धन एवं राज्य का लालच देकर अपनी ओर मिला लें। रतिपाल खिलजी के गुप्तचरों के हाथों बिक गया। रतिपाल ने रणमल्ल को भी अपनी ओर कर लिया। रतिपाल ने कुछ प्राचीरों और बुर्जों से मोर्चाबंदी हटा ली जहाँ से तुर्क सैनिक रस्सियों और सीढ़ियों से दुर्ग में घुस गये। उन्होंने दुर्ग के दरवाजे भीतर से खोल दिए। जैसे ही हम्मीर के सैनिकों को इस छल की जानकारी मिली, उन्होंने आनन-फानन में मोर्चा संभाला। दुर्ग के भीतर हाहाकार मच गया। राजपूतों ने सर्वोच्च बलिदान की तैयारी की। दुर्ग में स्थित समस्त महिलाओं ने जौहर की चिता सजाई और धधकती हुई आग में कूद पड़ीं। ‘तारीख़-ए-अलाई’ एवं ‘हम्मीर महाकाव्य’ में हम्मीरदेव के परिवार द्वारा जौहर किए जाने का वर्णन है। ‘हम्मीर रासो’ के अनुसार हम्मीर की रानी रंगदे के नेतृत्व में राजपूत महिलाओं ने अग्नि में कूदकर जौहर किया।

राजकुमारी देवल देवी ने दुर्ग परिसर में स्थित पद्मला तालाब में कूदकर जल-जौहर किया था। रणथंभौर का जौहर इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया। रणथंभौर का जौहर अन्य किलों में हुए जौहर से कई अर्थों में अलग था। बहुत सी रानियों, दासियों, राजकुमारियों एवं अन्य हिन्दू सुकुमारियों को इतना समय भी नहीं मिल पाया कि वे जौहर की चिता जला सकें। इसलिए वे अपने परिवार की छोटी लड़कियों एवं बच्चों को लेकर दुर्ग में स्थित कुओं एवं तालाबों में कूद गईं।

रणथंभौर का जौहर देखकर दैत्यों की भी आत्मा कांप जाती किंतु अल्लाउद्दीन के मुसलमान सैनिकों को इन बातों से कोई अंतर नहीं पड़ता था। दुर्ग में रहने वाले बूढ़े, बीमार और युद्ध कर सकने योग्य बच्चे भी तलवारें लेकर लड़ने को तैयार हो गए। देखते ही देखते दुर्ग की दीवारों, महलों एवं छतों पर घमासान होने लगा।

यह युद्ध नहीं था, प्राणोत्सर्ग था। शत्रु के समक्ष घुटने नहीं टेकने का प्रण था। इन लोगों के लिए हाथ में तलवार लेकर मरना गर्व का कार्य था और शत्रु के हाथों पड़कर अपमानित होना अत्यंत लज्जास्पद था। इसलिए वे शत्रु के समक्ष तलवारें लेकर खड़े हो गए तथा शरीर में प्राणों के रहते लड़ते रहे। यह लड़ाई अधिक समय तक नहीं चल सकी।

जिन मंगोलों ने जालोर से आकर रणथंभौर दुर्ग में शरण ली थी, वे भी संकट की इस घड़ी में चौहानों की तरफ से लड़ने लगे। इस युद्ध में राजा हम्मीरदेव भी वीरगति को प्राप्त हुआ। हम्मीर महाकाव्य, खजायंनुलफुतूह, तबकात-ए-अकबरी तथा तारीखे फरिश्ता में लिखा है कि जब सुल्तान ने रणथंभौर का किला फतह कर लिया और राणा हम्मीर मारा गया, तब सुल्तान की दृष्टि धरती पर पडे़ मुहम्मदशाह पर पड़ी। सुल्तान ने उससे पूछा कि यदि तेरे घावों का उपचार करके तुझे ठीक कर दिया जाये तो हमारे साथ तेरा व्यवहार कैसा रहेगा?

इस पर मंगोल सरदार मुहम्मदशाह ने जवाब दिया कि मैं तुरन्त दो काम करूंगा, एक तो यह कि स्वर्गीय राणा हम्मीरदेव के पुत्र को रणथंभौर की राजगद्दी पर बैठाउंगा और दूसरा यह कि मैं तुझे कत्ल करूंगा। इस उत्तर से रुष्ट होकर सुल्तान ने उसे हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया। सुल्तान ने मुहम्मदशाह की प्रशंसा की और उसे दुर्ग परिसर में दफन करवा दिया।

इसके बाद अल्लाउद्दीन ने हम्मीर के धोखेबाज मंत्रियों रतिपाल तथा रणमल को बुलवाया और उन्हें यह कहकर हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया कि जो अपने स्वामी हम्मीरदेव के नहीं हुए वे मेरे क्या होंगे! अल्लाउद्दीन खिलजी ने दुर्ग में एक मस्जिद भी बनवाई।

इस प्रकार 10 जुलाई 1301 को रणथंभौर दुर्ग पर अल्लाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया। उसने अपने भाई उलूग खाँ को रणथम्भौर दुर्ग का अधिपति बनाया तथा स्वयं दिल्ली लौट गया। थोड़े ही दिनों बाद उलूग खाँ बीमार पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार रणथंभौर ने अल्लाउद्दीन खिलजी के दो विश्वस्त सेनापतियों नुसरत खाँ और उलूग खाँ की बलि ले ली।

राणा हम्मीर देव चौहान तो अपनी भूमि एवं प्रण की रक्षा के लिए शौर्य का प्रदर्शन करता हुआ वीरगति को प्राप्त हो गया किंतु उसके किस्से भारत के इतिहास में छा गए। अनेक ग्रंथों में हम्मीर की वीरता का भरपूर गुणगान किया गया है। हम्मीरायण, हम्मीर रासो, हम्मीर हठ आदि ग्रंथ उसकी प्रशंसा से भरे पड़े हैं। हम्मीर के सम्बन्ध में यह दोहा कहा जाता है-

सिंह सुवन सुपुरुष वचन, कदली फले एक बार।

तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार।।

अर्थात्- सिंहनी एक बार शावक को जन्म देती है, सत्पुरुष एक बार जो कह देते हैं, उससे टलते नहीं। केले में एक बार फल आता है। स्त्री की मांग में एक बार सिंदूर भरा जाता है। इसी तरह हम्मीरदेव ने एक बार जो तय कर लिया, वह टल नहीं सकता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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