जैसलमेर दुर्ग छोड़कर भाग गए भूख से व्याकुल तुर्की सैनिक
जैसलमेर दुर्ग ऐसे विकट रेगिस्तान में स्थित था जहाँ सैंकड़ों मील दूर तक रेत के टीलों के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं देता था। तुर्की सैनिक इन परिस्थितियों में रहने के अभ्यस्त नहीं थे। अतः एक दिन उन्होंने जैसलमेर दुर्ग के टूटे हुए दरवाजों को कांटों की बाड़ से बंद किया तथा चुपचाप दुर्ग खाली करके दिल्ली चले गए।
जैसलमेर की सेना ने मलिक काफूर को मार भगाया। दिल्ली की सेना के भाग जाने के बाद राजपूतों ने उन पत्थरों को नीचे से उठाकर फिर से दुर्ग की प्राचीर पर रख लिया जिन्हें दुर्ग की प्राचीर से गिराया गया था। वे पत्थर आज भी विजय-चिह्न के रूप में दुर्ग की प्राचीर पर रखे हुए हैं। जैसलमेर की सेना ने दुर्ग की मरम्मत कर ली तथा रसद आदि का भी अच्छा प्रबंध कर लिया क्योंकि उन्हें आशा थी कि दिल्ली की सेना लौटकर अवश्य आएगी तथा इस बार पहले से भी अधिक बड़ी सेना आएगी।
मलिक काफूर की शर्मनाक पराजय के बाद अमीर कमालुद्दीन गुर्ग को सुल्तान के सामने स्वयं को सही सिद्ध करने का अवसर प्राप्त हो गया। सुल्तान ने मलिक काफूर को जैसलमेर अभियान से हटा दिया तथा कमालुद्दीन गुर्ग को ही फिर से जैसलमेर अभियान का प्रमुख बना दिया।
शाही सेना के वापस आने से पहले, दुर्ग में कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटीं जिनका दुर्ग की सुरक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ा। हुआ यह कि कुछ वर्ष पहले जैसलमेर के एक मंत्री विक्रमसिंह पर गबन का आरोप लगाया गया था जिसके कारण रावल जैतसिंह ने मंत्री विक्रमसिंह को अपने राज्य से निकाल दिया था। जब विक्रमसिंह को ज्ञात हुआ कि दिल्ली की सेना दोबारा जैसलमेर आ रही है तो विक्रमसिंह ने रावल जैतसिंह के पास अनुरोध भिजवाया कि मातृभूमि पर आए इस संकट के समय वह मातृभूमि की सेवा करना चाहता है।
इस पर रावल जैतसिंह ने विक्रमसिंह को फिर से सेवा में रख लिया। विक्रमसिंह के अनुरोध पर रावल ने गबन के पुराने आरोपों की जांच करवाई तो उसमें विक्रमसिंह को निर्दोष पाया गया। इस कारण झूठा आरोप लगाने वाले मंत्रियों को जैसलमेर छोड़कर जाना पड़ा। इसके कुछ दिन बाद ही रावल जैतसिंह की मृत्यु हो गई तथा उसका बड़ा पुत्र मूलराज भाटी जैसलमेर का रावल बन गया।
इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-
कमालुद्दीन गुर्ग एक बार फिर से एक बड़ी सेना लेकर जैसलमेर पहुंचा और दुर्ग को घेर कर बैठ गया। इस बार भी घेरा बहुत लम्बा चला। जैसलमेर की ख्यातों में लिखा है कि बारह साल तक शाही सेना दुर्ग को घेर कर बैठी रही किंतु दुर्ग में नहीं घुस सकी। इस अवधि को ज्यों का त्यों नहीं स्वीकारा जा सकता किंतु इतना अवश्य है कि इस बार का घेरा पहले से भी अधिक लम्बी अवधि तक चला।
धीरे-धीरे दुर्ग में रसद-पानी समाप्त होने लगा। यहाँ तक कि केवल पशुओं के खाने के लिए ग्वार ही बचा रहा। इस पर रावल मूलराज एवं रतनसिंह ने साका करने का निर्णय लिया। एक रात दुर्ग के भीतर की समस्त औरतों ने जौहर किया। रावल मूलराज ने अपने वंश को बचाए रखने के लिए अपने पुत्रों घड़सी एवं लक्ष्मण को भाटी चानण एवं उनड़ के संरक्षण में दुर्ग से बाहर भेज दिया।
To purchase this book, please click on photo.
दूसरे दिन प्रातः होते ही रावल मूलराज तथा उसके भाई रतनसिंह ने दुर्ग के फाटक खुलवाए। हिन्दू वीर सिर पर केसरिया बांधकर एवं मुंह में तुलसीदल रखकर दुर्ग से बाहर निकले तथा मुस्लिम सेना पर टूट पड़े। मुस्लिम सेना भी इस आक्रमण के लिए पहले से ही तैयार थी। अंत में राजपूतों की ओर से लड़ रहा प्रत्येक पुरुष युद्धक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुआ। ‘जैसलमेर री ख्यात’, ‘जैसलमेर की तवारीख’ एवं कर्नल टॉड की ‘एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज’ में इस युद्ध का वर्णन हुआ है किंतु किसी भी मुस्लिम तवारीख में इस युद्ध का उल्लेख नहीं हुआ है। जैसलमेर दुर्ग के संभवनाथ जैन मंदिर में वि.सं.1497 अर्थात् ई.1440 का एक शिलालेख मिला है जिसमें इस युद्ध का उल्लेख किया गया है। जैसलमेर दुर्ग में स्थित पार्श्वनाथ जैन मंदिर में वि.सं.1473 अर्थात् ई.1416 का एक और शिलालेख मिला है जिसमें कहा गया है कि रावल घड़सी ने म्लेच्छों को मारकर इस दुर्ग को अपने अधिकार में लिया। ये शिलालेख इस ओर संकेत करते हैं कि भाटियों ने किसी युद्ध में जैसलमेर दुर्ग को गंवा दिया था जिस पर बाद में रावल घड़सी ने पुनः अधिकार किया।
कुछ अन्य स्रोतों से पुष्टि होती है कि अल्लाउद्दीन की सेना ने ई.1314 में जैसलमर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह घेरा 6 साल तक चला था क्योंकि घेरा आरम्भ होने की तिथि ई.1308 से पहले नहीं हो सकती। यह देखकर हैरानी होती है कि इतने साल तक चले इस अभियान के सम्बन्ध में किसी भी फारसी पुस्तक में एक पंक्ति तक नहीं लिखी गई है जबकि हिन्दू पुस्तकें इस अभियान पर पर्याप्त सामग्री उपलब्ध करवाती हैं।
जैसलमेर के निर्जन दुर्ग पर अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना का अधिकार हो गया। कमालुद्दीन गुर्ग ने दुर्ग पर एक चौकी स्थापित की तथा अपने कुछ सैनिक वहाँ नियुक्त कर दिए। इसके बाद दिल्ली सल्तनत की सेना फिर से दिल्ली लौट गई। जब इन सैनिकों के उपयोग के लिए दिल्ली से रसद एवं कोष आता था तब भाटी राजपरिवार की शाखा के वंशज दूदा तथा तिलोकसी उस रसद एवं कोष को लूट लेते थे। इस कारण दुर्ग में नियुक्त मुस्लिम सैनिक भूखों मरने लगे।
जैसलमेर दुर्ग ऐसे विकट रेगिस्तान में स्थित था जहाँ सैंकड़ों मील दूर तक रेत के टीलों के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं देता था। दुर्ग के चारों ओर रेत के गुबार उड़ते थे जिनके कारण दिन में भी एक दूसरे की शक्ल तक दिखाई नहीं देती थी।
दुर्ग में रहने वाले राजपूत सैनिकों के परिवार खेती करके अपने खाने लायक बाजरा, मोठ और ग्वार उगा लेते थे और भेड़-बकरी आदि पशुओं को पाल लेते थे किंतु उनके चले जाने के कारण न तो कोई खेती करने वाला बचा था और न दुधारू पशुओं को पालने वाला। यह दुर्ग जिस पहाड़ी पर स्थित था, उस पहाड़ी पर कुछ प्राकृतिक तालाब बने हुए थे जिनमें भरे हुए पानी से मनुष्यों एवं ऊँटों का काम चल जाता था, अन्यथा कोसों दूर तक पानी की कोई उपलब्धता नहीं थी।
तुर्की सैनिक इन परिस्थितियों में रहने के अभ्यस्त नहीं थे। अतः एक दिन उन्होंने दुर्ग के टूटे हुए दरवाजों को कांटों की बाड़ से बंद किया तथा चुपचाप दुर्ग खाली करके दिल्ली चले गए।
इन तुर्की सैनिकों के साथ एक फकीर भी दुर्ग में रहने लगा था। उसे भी दुर्ग खाली करना पड़ा। एक दिन वह निकटवर्ती महेबा राज्य के शासक जगमाल राठौड़ से मिलने गया। जब उसने जगमाल राठौड़ को बताया कि तुर्की सैनिक जैसलमेर दुर्ग खाली करके भाग गए हैं तो जगमाल ने अपने सनिकों को तीन सौ ऊंटगाड़ियों पर बैठाकर दुर्ग पर अधिकार करने के लिए भेजा।
इसी बीच रावल घड़सी के वंशज दूदा को भी मुसलमानों द्वारा किला खाली करने की सूचना मिल गई। वह भी अपने सिपाहियों सहित दुर्ग में लौट आया। जब महेबा के सैनिक जैसलमेर दुर्ग पर अधिकार पहुंचे तो दूदा ने उन्हें भगा दिया तथा उनके 300 ऊँटगाड़ों को भी छीन लिया।
बागी मंगोल सैनिकों ने कहा कि वे राजा कान्हड़देव के मित्र हैं, उसके अधीन नहीं हैं। हम उसका आदेश स्वीकार नहीं कर सकते। राजा कान्हड़देव ने उन्हें चेतावनी दी कि वे हमारी शरण में हैं और हमारे राज्य में रह रहे हैं अतः उन्हें राजा का आदेश मानना होगा।
सोमथनाथ से लौट रही अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना के नव-मुस्लिम मंगोल सैनिकों एवं तुर्की सैनिकों के बीच गुजरात से मिले लूट के धन को लेकर संघर्ष हुआ था और बागी मंगोल सैनिकों ने दिल्ली की सेना के विरुद्ध जालोर के चौहानों द्वारा की गई कार्यवाही में चौहानों का साथ दिया था।
इस कारण अल्लाउद्दीन खिलजी के भाई उलूग खाँ एवं अल्लाउद्दीन के भांजे नुसरत खाँ को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा था। बागी मंगोलों ने सुल्तान अल्लाउद्दीन के भतीजे की हत्या कर दी जो संभवतः उलूग खाँ का पुत्र था। मंगोलों ने नुसरत खाँ के भाई को भी मार डाला।
जब दिल्ली में बैठे सुल्तान अल्लाउद्दीन को बागी मंगोल सैनिकों के विद्रोह के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने दिल्ली के निकट मंगोलपुरी में रह रहे मंगोल-परिवारों को नृशंसता पूर्वक मरवा दिया। तुर्की सैनिकों द्वारा विद्रोही मंगोलों की स्त्रियों का सतीत्व लूट लिया गया तथा बच्चों को उनकी माताओं के सामने ही टुकड़े करके फैंक दिया गया। नव-मुस्लिमों की जागीरें छीन ली गईं तथा उन्हें भविष्य के लिए सल्तनत की नौकरियों से वंचित कर दिया गया। इससे नव-मुसलमानों का असन्तोष और बढ़ गया और उन्होंने सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी की हत्या करने का षड्यन्त्र रचा।
अल्लाउद्दीन खिलजी को इस षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने अपनी सेना को आज्ञा दी कि वे नव-मुसलमानों को समूल नष्ट कर दें। जियाउद्दीन बरनी का कहना है कि सुल्तान की इस आज्ञा के जारी होते ही लगभग तीन हजार नव-मुस्लिम तलवार के घाट उतार दिए गए और उनकी सम्पत्ति छीन ली गई। जियाउद्दीन बरनी ने अल्लाउद्दीन की इस क्रूरता की निंदा की है।
जालोर में किए गए विद्रोह के बाद बागी मंगोलों के सरदार मुहम्मद शाह और मीर कामरू अपने सैनिकों के साथ जालोर में ही रुक गए थे। वे राजा कान्हड़देव के संरक्षण में रहने लगे। एक दिन इन बागी मंगोल सैनिकों ने जालोर में एक गाय मारकर खाई। यह बात हिन्दू सैनिकों को ज्ञात हो गई। उन्होंने इस घटना के बारे में राजा कान्हड़देव को सूचित किया। इस पर राजा कान्हड़देव ने उनसे कहा कि हमारे राज्य में तुम लोग गाय मार कर नहीं खा सकते।
इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-
इस पर बागी मंगोल सैनिकों ने कहा कि वे राजा कान्हड़देव के मित्र हैं, उसके अधीन नहीं हैं। हम उसका आदेश स्वीकार नहीं कर सकते। राजा कान्हड़देव ने उन्हें चेतावनी दी कि वे हमारी शरण में हैं और हमारे राज्य में रह रहे हैं अतः उन्हें राजा का आदेश मानना होगा।
बागी मंगोल सैनिक कुछ दिन तो शांत रहे किंतु जब फिर से वही होने लगा तो जालोर के चौहान राजा कान्हड़देव के सैनिकों ने एक योजना बनाई। उन्होंने मंगोलों से कहा कि वे अपनी वेश्याएं कुछ दिनों के लिए हमें दे दें। मंगोल समझ गए कि अब उनका जालोर राज्य में रहना कठिन है, अतः वे चुपचाप अपनी वेश्याओं को लेकर रातों-रात जालोर छोड़कर भाग गए। कान्हड़देव के सैनिक यही चाहते थे, अतः उन्होंने मंगोलों को जाने से नहीं रोका।
To purchase this book, please click on photo.
बागी मंगोल सैनिक जालोर से तो भाग आए किंतु उनके लिए भारत में रहना आसान नहीं था। वे दिल्ली लौटकर जाते तो उलूग खाँ और नुसरत खाँ उन्हें मार डालते। उन्होंने सुना था कि रणथम्भौर का चौहान शासक हम्मीरदेव अपने वचन का बड़ा पक्का है तथा शरण में आए हुओं की रक्षा अपने प्राण देकर भी करता है। अतः वे जालोर से सीधे रणथम्भौर की तरफ भागे। जालोर और रणथम्भौर के शासक शाकंभरी के चौहानों की ही दो शाखाएं थीं। फिर भी मंगोल सैनिकों के पास अपनी रक्षा के लिए हिन्दू राजाओं की शरण प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। रणथम्भौर के राजा हम्मीरदेव ने उन्हें शरणागत जानकर अपने दुर्ग में शरण दे दी। जब अल्लाउद्दीन खिलजी को ज्ञात हुआ कि विद्रोही मंगोल सैनिक जालोर से रणथंभौर भाग आए हैं तो ई.1299 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने उलूग खाँ तथा नुसरत खाँ को एक सेना देकर रणथंभौर पर आक्रमण करने भेजा। रणथम्भौर के राजा हम्मीरदेव ने दुर्ग के अन्दर रहकर रक्षात्मक युद्ध करने का निश्चय किया। इस कारण अल्लाउद्दीन के सेनापति बिना किसी व्यवधान के रणथम्भौर दुर्ग के निकट पहुंच गए तथा दुर्ग के चारों ओर घेरा डाल दिया। रणथम्भौर का दुर्ग चित्तौड़ तथा जालोर की तरह ही अजेय एवं दुर्गम माना जाता था।
यद्यपि यह दुर्ग इल्तुतमिश के समय में कुछ समय के लिए दिल्ली सल्तनत के अधीन रह चुका था किंतु इल्तुतमिश के जीवनकाल में ही यह फिर से चौहानों के अधीन आ गया था।
एक दिन जब नुसरत खाँ दुर्ग के चारों ओर घेरा डालकर पड़ी हुई अपनी सेना का निरीक्षण कर रहा था तब अचानक दुर्ग से पत्थरों की बरसात होने लगी। एक पत्थर नुसरत खाँ के सिर में आकर लगा और नुसरत खाँ मर गया। दिल्ली की सेना के लिए यह एक बड़ा धक्का था। अभी दिल्ली की सेना संभल भी नहीं पाई थी कि राजपूतों की एक सेना ने दुर्ग से बाहर निकलकर दिल्ली की सेना पर आक्रमण कर दिया। इस पर तुर्कों को घेरा उठाकर भागना पड़ा।
जब सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी को इस घटना की सूचना मिली तो उसका माथा ठनका। उसकी सेनाएं जालोर, जैसलमेर तथा रणथम्भौर से पिटकर भाग रही थीं। इसलिए अल्लाउद्दीन खिलजी ने स्वयं रणथम्भौर पर आक्रमण करने का निश्चय किया। उसने बड़ी भारी तैयारी के साथ एक और विशाल सेना के साथ दिल्ली से रणथम्भौर के लिए प्रस्थान किया।
जब अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली से रणथंभौर जा रहा था तब वह मार्ग में तिलपत नामक स्थान पर रुका और उसने कुछ दिन वहीं रहकर शिकार खेलने का निश्चय किया। एक दिन जब अल्लाउद्दीन खिलजी जंगल में शिकार खेल रहा था और उसके सैनिक उससे कुछ दूर हो गए तब अवसर देखकर अल्लाउद्दीन खिलजी के भतीजे अकत खाँ ने अपने सैनिकों के साथ मिलकर सुल्तान पर प्राणघातक हमला किया।
इस हमले में सुल्तान बुरी तरह से घायल हो गया परन्तु उसके प्राण बच गए। इतने में ही अल्लाउद्दीन खिलजी के सैनिक वहाँ आ गए और उन्होंने अकत खाँ तथा उसके साथियों को पकड़ कर उन्हें मार डाला।
अल्लाउद्दीन खिलजी के आदेश से अकत खाँ के समस्त भाइयों की सम्पत्ति जब्त करके उन्हें बंदी बना लिया गया जबकि इन भाइयों का इस षड़यंत्र एवं हमले से कोई सम्बन्ध नहीं था। इस दुर्घटना के बाद अल्लाउद्दीन खिलजी अपने घावों का उपचार करवाकर फिर से रणथंभौर के लिए रवाना हो गया।
अल्लाउद्दीन खिलजी के आक्रमणों के कारण राजपूताने के कई किलों में जौहर हुए। इनमें चित्तौड़ का जौहर, जालौर का जौहर, सिवाना का जौहर, जैसलमेर का जौहर तथा रणथंभौर का जौहर बहुत चर्चित हैं। अन्य किलों में भी जौैहर हुए। हिन्दू रानियों से लेकर दासियां, छोटी बच्चियां यहाँ तक कि अवयस्क लड़के भी जौहर की भीषण ज्वाला में कूद कर अपने प्राण त्याग देते थे ताकि उन्हें मुसलमान सैनिकों की वासना का शिकार न होना पड़े।
घायल अल्लाउद्दीन खिलजी अपने घावों का उपचार करने के बाद रणथंभौर पहुंचा। उसने रणथंभौर के शासक हम्मीरदेव चौहान को संदेश भिजवाया कि वह नव-मुस्लिमों अर्थात् मंगोलों के सरदार मुहम्मदशाह को मेरे पास भेज दे। इतिहास की कुछ पुस्तकों में मुहम्मदशाह को महमांशाह भी कहा गया है। अल्लाउद्दीन खिलजी ने हम्मीर से कहलवाया कि या तो मुहम्मदशाह को लौटाए या चार लाख अशर्फियां, हाथी, घोड़े और अपनी पुत्री सुल्तान को भेंट करे अन्यथा उसका सर्वनाश कर दिया जायेगा।
हम्मीरदेव ने उत्तर भिजवाया कि मुहम्मदशाह मेरी शरण में है। इसलिए मैं उसे नहीं लौटा सकता किंतु मैं सुल्तान को तलवार के उतने ही झटके देने के लिये उद्यत हूँ, जितनी मोहरें, हाथी और घोड़े मुझसे मांगे गए हैं।
हम्मीर की सेना ने दुर्ग के भीतर से मंजनीक एवं ढेंकुली की सहायता से पत्थर के गोले बरसाये तथा अग्निबाण चलाये। दुर्ग के भीतर स्थित तालाबों से अचानक तेज जलधारा छोड़ी गई जिससे खिलजी की सेना की भारी क्षति हुई।
अमीर खुसरो ने ‘तारीखे अलाई’ में लिखा है कि सुल्तान के आदेश से खाइयों में रेत के बोरों के ढेर लगा दिये गए और उन पर किले के भीतर तक मार करने के लिये ‘पाशेब’ अर्थात् विशेष प्रकार के चबूतरे बनवाये गए। किले के भीतर ज्वलनशील पदार्थ फैंकने के लिए ‘मगरबी’ और पत्थर फैंकने के लिए ‘अर्रादा’ नामक यंत्र लगाए गए। दीवारों को सुरंगों के जरिये तोड़ा जाने लगा।
‘तारीखे फरिश्ता’ में लिखा है कि जालोर से भाग कर आये मंगोल सरदार मुहम्मदशाह तथा मीर कामरू आदि को सुल्तान अल्लाउद्दीन ने रणथम्भौर के राणा हम्मीरदेव से वापस मांगा तो राणा हम्मीर ने उन्हें लौटाने से मना कर दिया।
इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-
‘हम्मीर महाकाव्य’ के लेखक नयनचंद्र सूरि ने लिखा है कि राजपूतों ने किले की मोर्चोबंदी की और हम्मीर के सेनापतियों- वीरम, रतिपाल, जयदेव, भीमसिंह, धर्मसिंह तथा मंगोल मुहम्मदशाह ने हिंदुवाटी की घाटी में अल्लाउद्दीन की सेना से युद्ध किया। इस कारण अल्लाउद्दीन एक साल तक रणथंभौर दुर्ग के सामने पड़ा रहा किंतु दुर्ग में नहीं घुस सका।
‘हम्मीरायण’ नामक ग्रंथ में लिखा है कि रणथंभौर की जनता को हम्मीर की वीरता पर इतना विश्वास था कि जब खिलजी ने रणथंभौर पर घेरा डाला तो बनिये हाट में बैठकर हँसते रहे। जिस समय अल्लाउद्दीन खिलजी रणथम्भौर का घेरा डाले हुए था, उन्हीं दिनों अल्लाउद्दीन खिलजी के भांजों अमीर उमर तथा मंगू खाँ ने बदायूँ तथा अवध में विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। अल्लाउद्दीन के आदेश से ये विद्रोह शीघ्र ही दबा दिए गए और अमीर उमर तथा मंगू खाँ को बंदी बनाकर उनकी आँखें निकलवा ली गईं।
To purchase this book, please click on photo.
जब अल्लाउद्दीन खिलजी पूरे एक साल के प्रयास के बाद भी रणथंभौर के दुर्ग में नहीं घुस सका तो अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने सेनापतियों एवं गुप्तचरों से कहा कि वे राजा हम्मीरदेव चौहान की कमजोरियों का पता लगाएं। गुप्तचरों ने सुल्तान को बताया कि राजा हम्मीरदेव का मंत्री रतिपाल अपने स्वामी से नाराज है। इस पर अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने गुप्तचरों से कहा कि वे रतिपाल को धन एवं राज्य का लालच देकर अपनी ओर मिला लें। रतिपाल खिलजी के गुप्तचरों के हाथों बिक गया। रतिपाल ने रणमल्ल को भी अपनी ओर कर लिया। रतिपाल ने कुछ प्राचीरों और बुर्जों से मोर्चाबंदी हटा ली जहाँ से तुर्क सैनिक रस्सियों और सीढ़ियों से दुर्ग में घुस गये। उन्होंने दुर्ग के दरवाजे भीतर से खोल दिए। जैसे ही हम्मीर के सैनिकों को इस छल की जानकारी मिली, उन्होंने आनन-फानन में मोर्चा संभाला। दुर्ग के भीतर हाहाकार मच गया। राजपूतों ने सर्वोच्च बलिदान की तैयारी की। दुर्ग में स्थित समस्त महिलाओं ने जौहर की चिता सजाई और धधकती हुई आग में कूद पड़ीं। ‘तारीख़-ए-अलाई’ एवं ‘हम्मीर महाकाव्य’ में हम्मीरदेव के परिवार द्वारा जौहर किए जाने का वर्णन है। ‘हम्मीर रासो’ के अनुसार हम्मीर की रानी रंगदे के नेतृत्व में राजपूत महिलाओं ने अग्नि में कूदकर जौहर किया।
राजकुमारी देवल देवी ने दुर्ग परिसर में स्थित पद्मला तालाब में कूदकर जल-जौहर किया था। रणथंभौर का जौहर इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया। रणथंभौर का जौहर अन्य किलों में हुए जौहर से कई अर्थों में अलग था। बहुत सी रानियों, दासियों, राजकुमारियों एवं अन्य हिन्दू सुकुमारियों को इतना समय भी नहीं मिल पाया कि वे जौहर की चिता जला सकें। इसलिए वे अपने परिवार की छोटी लड़कियों एवं बच्चों को लेकर दुर्ग में स्थित कुओं एवं तालाबों में कूद गईं।
रणथंभौर का जौहर देखकर दैत्यों की भी आत्मा कांप जाती किंतु अल्लाउद्दीन के मुसलमान सैनिकों को इन बातों से कोई अंतर नहीं पड़ता था। दुर्ग में रहने वाले बूढ़े, बीमार और युद्ध कर सकने योग्य बच्चे भी तलवारें लेकर लड़ने को तैयार हो गए। देखते ही देखते दुर्ग की दीवारों, महलों एवं छतों पर घमासान होने लगा।
यह युद्ध नहीं था, प्राणोत्सर्ग था। शत्रु के समक्ष घुटने नहीं टेकने का प्रण था। इन लोगों के लिए हाथ में तलवार लेकर मरना गर्व का कार्य था और शत्रु के हाथों पड़कर अपमानित होना अत्यंत लज्जास्पद था। इसलिए वे शत्रु के समक्ष तलवारें लेकर खड़े हो गए तथा शरीर में प्राणों के रहते लड़ते रहे। यह लड़ाई अधिक समय तक नहीं चल सकी।
जिन मंगोलों ने जालोर से आकर रणथंभौर दुर्ग में शरण ली थी, वे भी संकट की इस घड़ी में चौहानों की तरफ से लड़ने लगे। इस युद्ध में राजा हम्मीरदेव भी वीरगति को प्राप्त हुआ। हम्मीर महाकाव्य, खजायंनुलफुतूह, तबकात-ए-अकबरी तथा तारीखे फरिश्ता में लिखा है कि जब सुल्तान ने रणथंभौर का किला फतह कर लिया और राणा हम्मीर मारा गया, तब सुल्तान की दृष्टि धरती पर पडे़ मुहम्मदशाह पर पड़ी। सुल्तान ने उससे पूछा कि यदि तेरे घावों का उपचार करके तुझे ठीक कर दिया जाये तो हमारे साथ तेरा व्यवहार कैसा रहेगा?
इस पर मंगोल सरदार मुहम्मदशाह ने जवाब दिया कि मैं तुरन्त दो काम करूंगा, एक तो यह कि स्वर्गीय राणा हम्मीरदेव के पुत्र को रणथंभौर की राजगद्दी पर बैठाउंगा और दूसरा यह कि मैं तुझे कत्ल करूंगा। इस उत्तर से रुष्ट होकर सुल्तान ने उसे हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया। सुल्तान ने मुहम्मदशाह की प्रशंसा की और उसे दुर्ग परिसर में दफन करवा दिया।
इसके बाद अल्लाउद्दीन ने हम्मीर के धोखेबाज मंत्रियों रतिपाल तथा रणमल को बुलवाया और उन्हें यह कहकर हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया कि जो अपने स्वामी हम्मीरदेव के नहीं हुए वे मेरे क्या होंगे! अल्लाउद्दीन खिलजी ने दुर्ग में एक मस्जिद भी बनवाई।
इस प्रकार 10 जुलाई 1301 को रणथंभौर दुर्ग पर अल्लाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया। उसने अपने भाई उलूग खाँ को रणथम्भौर दुर्ग का अधिपति बनाया तथा स्वयं दिल्ली लौट गया। थोड़े ही दिनों बाद उलूग खाँ बीमार पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार रणथंभौर ने अल्लाउद्दीन खिलजी के दो विश्वस्त सेनापतियों नुसरत खाँ और उलूग खाँ की बलि ले ली।
राणा हम्मीर देव चौहान तो अपनी भूमि एवं प्रण की रक्षा के लिए शौर्य का प्रदर्शन करता हुआ वीरगति को प्राप्त हो गया किंतु उसके किस्से भारत के इतिहास में छा गए। अनेक ग्रंथों में हम्मीर की वीरता का भरपूर गुणगान किया गया है। हम्मीरायण, हम्मीर रासो, हम्मीर हठ आदि ग्रंथ उसकी प्रशंसा से भरे पड़े हैं। हम्मीर के सम्बन्ध में यह दोहा कहा जाता है-
सिंह सुवन सुपुरुष वचन, कदली फले एक बार।
तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार।।
अर्थात्- सिंहनी एक बार शावक को जन्म देती है, सत्पुरुष एक बार जो कह देते हैं, उससे टलते नहीं। केले में एक बार फल आता है। स्त्री की मांग में एक बार सिंदूर भरा जाता है। इसी तरह हम्मीरदेव ने एक बार जो तय कर लिया, वह टल नहीं सकता।
चित्तौड़ दुर्ग को मिट्टी में मिलाने निकल पड़ा अल्लाउद्दीन खिलजी
अल्लाउद्दीन खिलजी अब तक जैसलमेर तथा रणथंभौर के दुर्गों को जीत कर अधीन कर चुका था और अब उसकी आँख चित्तौड़ दुर्ग पर लगी हुई थी। ई.1303 में अल्लाउद्दीन खिलजी एक विशाल सेना लेकर चित्तौड़ अभियान पर चल दिया। आगे बढ़ने से पहले हमें चित्तौड़ दुर्ग के इतिहास पर दृष्टि डालनी चाहिए।
यह तो नहीं कहा जा सकता कि चित्तौड़ दुर्ग की स्थापना कब हुई किंतु आज से 5100 साल साल पहले अर्थात् महाभारत काल में भी इस स्थान पर एक दुर्ग था। अतः कहा जा सकता है किचित्तौड़ दुर्ग भारत के प्राचीनतम दुर्गों में से एक है। लोक-किंवदंती के अनुसार पाण्डु-पुत्र भीमसेन ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया था। यद्यपि महाभारत-कालीन चित्तौड़ दुर्ग अब अस्तित्व में नहीं है तथापि यह कहा जा सकता है कि महाभारत-कालीन दुर्ग जीर्णोद्धार एवं पुनर्निर्माण होता हुआ वर्तमान चित्तौड़ दुर्ग के रूप में हमारे सामने है।
अंग्रेज पुरातत्त्वविद हेनरी कजेन्स ने इस दुर्ग से कुछ दूर स्थित ‘नगरी’ (माध्यमिका) में, कंकाली माता की मूर्ति के पास अशोक कालीन सिंह-मस्तक पड़ा देखा था। इस प्रकार के सिंह-मस्तक अशोक कालीन स्तम्भों के ऊपरी शीर्ष पर लगा करते थे। इससे सिद्ध होता है कि ईसा के जन्म से लगभग 300 साल पहले यह दुर्ग मगध के मौर्यों के अधीन था।
अंग्रेज पुरातत्वविद् हेनरी कजेन्स ने चित्तौड़ दुर्ग में 10 बौद्धस्तूप पहचाने थे जिन पर भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं बनी हुई थीं। ये बौद्धस्तूप अशोककालीन होने अनुमानित हैं। यहाँ से प्राप्त एक शिलालेख में लिखा है- ‘स वा भूतानाम् दयाथम् कारिता।’ अर्थात् वह जो सब जीवों पर दया करता है। संभवतः यह शिलालेख भगवान बुद्ध की स्तुति में लिखा गया था।
इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-
मगध के मौर्यों का राज्य यद्यपि 184 ईस्वी पूर्व में नष्ट हो गया तथापि उनके उत्तराधिकारी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे-बड़े राजा के रूप में आठवीं शताब्दी ईस्वी तक शासन करते रहे। सातवीं शताब्दी ईस्वी में चित्रांगद मोरी अथवा भीम मोरी ने चित्तौड़ के पुराने दुर्ग के स्थान पर चित्रकूट नामक नया दुर्ग बनवाया जो कालांतर में चित्तौड़ दुर्ग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पर्याप्त सम्भव है कि यह दुर्ग पूरी तरह नया नहीं हो तथा पुराने दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया गया हो।
आठवीं शताब्दी ईस्वी में मान मोरी चित्तौड़ का राजा था जिसका ई.713 का एक शिलालेख चित्तौड़ दुर्ग के निकट मिला है। राजा मान मोरी की एक पुत्री गुहिल वंश में ब्याही गई थी जिसकी कोख से गुहिलवंशी राजकुमार बप्पा रावल का जन्म हुआ। जब मान मोरी बूढ़ा हो गया तो एक बार चित्तौड़ दुर्ग पर शत्रुओं ने हमला कर दिया। तब बप्पा रावल ने न केवल चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा की अपितु अपने नाना मान मोरी के भी प्राण बचाए।
To purchase this book, please click on photo.
बप्पा रावल की वीरता से प्रसन्न होकर राजा मान मोरी ने ई.734 में यह दुर्ग अपने दौहित्र बप्पा रावल को दे दिया। तभी से यह दुर्ग गुहिलों के अधिकार में चला आ रहा था। राजा मान मोरी की मृत्यु के बाद बप्पा रावल अपनी राजधानी नागदा से चित्तौड़ ले आया। गुहिलों तथा मुसलमानों के बीच प्राचीनतम लड़ाई का उल्लेख ‘खुमांण रासो’ में मिलता है जिसके अनुसार ई.813 से 833 के बीच अब्बासिया खानदान के खलीफा अलमामूं ने खुमांण के समय में चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण किया। चित्तौड़ की सहायता के लिये काश्मीर से सेतुबंध तक के हिन्दू राजा आये तथा खुमांण ने शत्रु को परास्त करके चित्तौड़ की रक्षा की। इस युद्ध के परिणाम के सम्बन्ध में खुमांण रासो के अतिरिक्त अन्य किसी स्रोत से जानकारी प्राप्त नहीं होती किंतु अवश्य ही इस युद्ध में गुहिलों की विजय हुई होगी क्योंकि खुमांण को गुहिलों के इतिहास में इतनी प्रसिद्धि मिली कि मेवाड़ के गुहिलों को ‘खुमांण’ भी कहा जाने लगा। संभवतः इस युद्ध के बाद किसी समय चित्तौड़ दुर्ग गुहिलों के हाथ से निकल गया और गुहिल दक्षिण-पश्चिमी मेवाड़ तक सीमित होकर रह गये। इस काल में नागदा फिर से गुहिलों की राजधानी हो गई। नौवीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध में खुमांण (तृतीय) ने गुहिलों की क्षीण हो चुकी राज्यलक्ष्मी का फिर से उद्धार किया।
दसवीं शताब्दी में आलूराव अर्थात् अल्लट गुहिलों की राजधानी को नागदा से आहड़ ले गया। कहा नहीं जा सकता कि चित्तौड़ दुर्ग फिर से किस राजा के द्वारा अथवा किस समय पुनः गुहिलों के अधिकार में आया तथा कब पुनः गुहिलों की राजधानी बना।
जब ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद गजनवी और बारहवीं शताब्दी में मुहम्मद गौरी, भारत पर ताबड़-तोड़ हमले कर रहे थे, तब इन दो शताब्दियों में, मेवाड़ के गुहिलों को अपने पड़ौसी राज्यों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा। मालवा के परमार राजा मुंज ने आहड़ नगर को तोड़ा तथा चित्तौड़ का दुर्ग एवं उसके आसपास का प्रदेश परमार राज्य में मिला लिया।
मुंज के उत्तराधिकारी सिंधुराज का पुत्र भोजराज, चित्तौड़ के दुर्ग में रहा करता था। गुहिल इस काल में अत्यंत कमजोर पड़ गए थे किंतु वे आहड़ को अपनी राजधानी बनाए रखने में सफल रहे।
ग्यारहवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच किसी काल में चित्तौड़ का दुर्ग परमारों के हाथ से निकलकर गुजरात के चौलुक्यों के हाथों में चला गया। बारहवीं शताब्दी ईस्वी में मेवाड़ के गुहिल वंश में ‘रणसिंह’ अथवा ‘कर्णसिंह’ नामक राजा हुआ। उससे गुहिलोतों की दो शाखाएं निकलीं जिन्हें रावल तथा राणा कहा जाता था। रावल शाखा में सामंतसिंह नामक राजा हुआ जिसने ई.1174 में चौलुक्यराज अजयपाल को युद्ध में परास्त करके बुरी तरह घायल किया तथा चित्तौड़ दुर्ग पुनः गुहिलों के अधिकार में किया।
गुहिलों की मुसलमानों से लड़ाई का दूसरा उल्लेख ई.1192 में तराइन के द्वितीय युद्ध के समय मिलता है जब चितौड़ का राजा सामंतसिंह, पृथ्वीराज चौहान की तरफ से लड़ते हुए युद्धक्षेत्र में काम आया। इससे चित्तौड़ की राज्यशक्ति को हानि हुई किंतु चित्तौड़ अजेय बना रहा।
ई.1195 में मुहम्मद गौरी के सूबेदार कुतुबुद्दीन ऐबक ने चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण किया जिसे गुहिलों ने परास्त करके भगा दिया। ई.1213 से ई.1252 तक रावल जैत्रसिंह गुहिलों का राजा हुआ। वह अपनी राजधानी आहड़ से चित्तौड़ ले आया। उसने दिल्ली के बादशाह इल्तुतमिश की सेना में कसकर मार लगाई तथा उसे युद्ध क्षेत्र से भाग जाने को विवश कर दिया। उसने चित्तौड़ दुर्ग को सुदृढ़ प्राचीर से आवृत्त करवाया।
ई.1252 में रावल जैत्रसिंह का पुत्र रावल तेजसिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। उसके काल में गयासुद्दीन बलबन ने रणथम्भौर, बूंदी तथा चित्तौड़ पर आक्रमण किये किंतु रावल तेजसिंह ने उसे पीछे धकेल दिया। तेजसिंह के बाद भी मेवाड़ के रावल तुर्कों से निरंतर युद्ध करते रहे।
तेजसिंह के पुत्र समरसिंह के समय में गयासुद्दीन बलबन की सेना ने गुजरात पर आक्रमण किया। समरसिंह ने उस सेना को परास्त करके भगा दिया। आबू शिलालेख में कहा गया है कि समरसिंह ने तुरुष्क रूपी समुद्र में गहरे डूबे हुए गुजरात देश का उद्धार किया। अर्थात् मुसलमानों से गुजरात की रक्षा की।
रावल समरसिंह के समकालीन लेखक जिनप्रभ सूरि ने तीर्थकल्प में लिखा है कि अल्लाउद्दीन खिलजी का सबसे छोटा भाई उलूग खाँ ई.1299 में गुजरात विजय के लिये निकला। चित्तकूड़ अर्थात् चित्तौड़ दुर्ग के स्वामी रावल समरसिंह ने उलूग खाँ को दण्ड देकर मेवाड़ देश की रक्षा की।
इस प्रकार तेरहवीं शताब्दी के समाप्त होने तक तक चित्तौड़ के गुहिल, तुर्कों को पूरी तरह अपने राज्य से दूर रखने में सफल हुए किंतु अब चौदहवीं शताब्दी का आगमन होते ही ई.1303 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग के गर्व को धूल में मिलाने के लिए दिल्ली से विशाल सैन्य लेकर प्रस्थान किया।
चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी को छीनना चाहता था अल्लाउद्दीन
अल्लाउद्दीन खिलजी ने ई.1301 में रणथंभौर दुर्ग पर विजय प्राप्त करने के बाद ई.1303 में भारत के सबसे दुर्गम माने जाने वाले दुर्गों में से एक चित्तौड़ पर आक्रमण के लिए प्रस्थान किया। अल्लाउद्दीन चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी को छीनना चाहता था।
चित्तौड़ दुर्ग गंभीरी और बेढ़च नदियों के संगम पर मेसा के पठार पर स्थित है तथा लगभग 8 किलोमीटर लम्बा और 2 किलोमीटर चौड़ा है। यह दुर्ग 152 मीटर ऊंची पहाड़ी पर 279 हैक्टेयर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह भारत का सबसे विशाल दुर्ग है। चित्तौड़ दुर्ग में पहुंचने के लिये एक-एक करके सात दरवाजे पार करने होते हैं।
दुर्ग परिसर में जैमलजी का तालाब, सूरज कुण्ड, चित्रांग मोरी तालाब, रत्नेश्वर तालाब, कुम्भ सागर तालाब, भीमलत तालाब, हाथी कुण्ड, झाली बाव, कातण बावड़ी, जेठा महाजन की बावड़ी और गोमुख झरना सहित कई जलस्रोत स्थित थे जो दुर्ग में निवास करने वाले सैनिकों, किसानों एवं पशुओं के लिए पर्याप्त थे।
इस दुर्ग में अनेक प्राचीन एवं ऐतिहासिक महल, हवेली, मंदिर, शस्त्रागार, अन्नभण्डार, सुरंगें एवं तहखाने स्थित थे। इनके कारण कई हजार किसान, श्रमिक एवं सैनिक दीर्घकाल तक दुर्ग में निवास कर सकते थे।
अल्लाउद्दीन का चित्तौड़-अभियान विश्व के उन युद्ध-अभियानों में सम्मिलित है जिनकी चर्चा मानव इतिहास में सर्वाधिक होती है। इस युद्ध के इतिहास को संसार भर में थर्मोपिली के युद्ध, हल्दीघाटी के युद्ध, कर्बला के युद्ध, मैराथॉन के युद्ध, प्लासी के युद्ध और वाटर लू के युद्ध के बराबर ही लोकप्रियता प्राप्त है।
भारत के इतिहास में जो लोकप्रियता हल्दीघाटी के युद्ध, प्लासी के युद्ध, पानीपत के तीन युद्धों, तराईन के दो युद्धों तथा खानुआ के युद्ध को प्राप्त है, वही लोकप्रियता अल्लाद्दीन खिलजी के चित्तौड़ अभियान को प्राप्त है। इसका कारण चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी की कथा का इस युद्ध से जुड़ जाना है।
चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी रावल रत्नसिंह की रानी थी जो ई.1302 में मेवाड़ का राजा हुआ था। यद्यपि रत्नसिंह को रावल बने हुए कुछ ही महीने हुए थे तथापि उसके वंशज विगत 550 सालों से मेवाड़ पर शासन कर रहे थे और लगभग तब से ही अरब एवं अफगानिस्तान से आए आक्रांताओं को धूल चटाते आ रहे थे।
इस कारण चित्तौड़ दुर्ग दिल्ली के मुस्लिम शासकों की आँख की किरकिरी बना हुआ था। गजनी एवं दिल्ली के जिन तुर्की आक्रांताओं ने पृथ्वीराज चौहान सहित अनेक बडे़-बड़े हिन्दू राजाओं को नष्ट कर दिया था, उन सुल्तानों के सामने चित्तौड़ का गर्व, समुद्र के समान गरजता-लरजता हिलोरें लेता था।
उस समय चित्तौड़ राज्य अपने पूर्ववर्ती राजाओं द्वारा दिल्ली के सुल्तानों, चौहानों, चौलुक्यों एवं परमारों पर विजय प्राप्त कर लेने से उत्साहित था। अतः चित्तौड़ ने पूरी शक्ति से अल्लाउद्दीन खिलजी का प्रतिरोध किया।
इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-
बहुत से लेखकों ने इस युद्ध के बारे में अलग-अलग बातें लिखी हैं। इनमें से कुछ बातें एक जैसी हैं तो कुछ बातों में बहुत अंतर है। मलिक मुहम्मद जायसी के ग्रंथ ‘पद्मावत’ में इस आक्रमण का काव्यात्मक विवरण दिया गया है। इस विवरण के अनुसार रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपने सौन्दर्य के लिये दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी।
अल्लाउद्दीन ने पद्मिनी का अपहरण करने और मेवाड़ पर विजय प्राप्त करने का निश्चय किया। अल्लाउद्दीन ने चित्तौड़ के रावल रत्नसिंह के समक्ष शर्त रखी कि यदि वह दर्पण में चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी की छवि दिखा दे तो मैं दिल्ली लौट जाउंगा।
मलिक मुहम्मद जायसी के अनुसार रावल रत्नसिंह अल्लाउद्दीन खिलजी को रानी पद्मिनी की छवि शीशे में दिखाने के लिये तैयार हो गया। जब सुल्तान चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी को देखकर लौटने लगा तब राजा रत्नसिंह उसे पहुँचाने के लिये दुर्ग से बाहर आया। पहले से ही तैयार अल्लाउद्दीन खिलजी के सैनिकों ने राजा को कैद कर लिया।
सुल्तान ने चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी के पास सूचना भेजी कि जब तक वह सुल्तान के शिविर में नहीं आएगी, तब तक राजा रत्नसिंह को मुक्त नहीं किया जाएगा। रानी पद्मिनी ने सुल्तान के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। रानी की जगह उसके दो सम्बन्धी बालक गोरा एवं बादल रानी की डोली में बैठ गए। उसके साथ दासियों की सात सौ डोलियों में वीर राजपूत सैनिक औरतों के वेश में बैठ गए।
To purchase this book, please click on photo.
जब ये डोलियां दिल्ली में स्थित सुल्तान के महल में पहुंचीं तो राजपूत सैनिकों ने डोलियों से बाहर निकलकर रावल रत्नसिंह को मुक्त करा लिया। इस अवसर पर हुए युद्ध में गोरा मारा गया। राजपूत सैनिक अपने राजा रत्नसिंह को लेकर चित्तौड़ आ गये। इसके बाद अल्लाउद्दीन के पुत्र खिज्र खाँ के नेतृत्व में चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण हुआ। जब राजपूतों को अपनी पराजय निश्चित लगने लगी तो राजपूत स्त्रियों ने जौहर और पुरुषों ने केसरिया करने का निश्चय किया।चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी हिन्दू स्त्रियों के साथ चिता में बैठकर भस्म हो गई। राजपूतों ने केसरिया बाना धारण किया, माथे पर तिलक लगाया और मुंह में तुलसीदल लेकर दुर्ग के द्वार खोल दिए। वे शत्रुसेना पर काल बनकर टूट पड़े किंतु किले का पतन हो गया। यह चित्तौड़ दुर्ग का पहला साका था। इस घेरे में चित्तौड़ की रावल शाखा के समस्त वीरों के काम आ जाने से चित्तौड़ की रावल शाखा का अंत हो गया। सुप्रसिद्ध गौरीशंकर हीराचंद ओझा तथा किशारी शरण लाल आदि कई इतिहासकार पद्मावत के विवरण को सही नहीं मानते। वे पद्मिनी की कथा को काल्पनिक मानते हैं। तत्कालीन इतिहासकारों इसामी, अमीर खुसरो, इब्नबतूता आदि ने इन घटनाओं का उल्लेख नहीं किया है जबकि परवर्ती फारसी इतिहासकारों अबुल फजल, हाजीउद्वीर तथा फरिश्ता ने इसे सत्य माना है।
अल्लाउद्दीन खिलजी के दरबारी लेखक अमीर खुसरो ने अपने ग्रंथ ‘तारीखे अलाई’ में लिखा है-
‘सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने गंभीरी और बेड़च नदी के मध्य अपने शिविर की स्थापना की। उसके पश्चात् सेना ने दायें और बायें पार्श्व से किले को घेर लिया। ऐसा करने से तलहटी की बस्ती भी घिर गई।
स्वयं सुल्तान ने अपना ध्वज चित्तौड़ नामक छोटी पहाड़ी पर गाढ़ दिया। सुल्तान वहीं पर दरबार लगाता था तथा घेरे के सम्बन्ध में दैनिक निर्देश देता था। जब घेरा लम्बी अवधि तक चला तो राजपूतों ने भी किले के फाटक बंद कर लिये और परकोटों पर मोर्चा बनाकर शत्रुदल का मुकाबला करते रहे।
सुल्तान की सेना ने लगभग 8 महीने तक किले की चट्टानों को मजनिकों से तोड़ने का अथक प्रयास किया पर इस काम में सफलता नहीं मिली। सीसोदे के सामंत लक्ष्मणसिंह ने किले की रक्षा में अपने सात पुत्रों सहित प्राण गंवाये। ….. 26 अगस्त 1303 को किला फतह हुआ।’
अमीर खुसरो लिखता है- ‘राय पहले तो भाग गया परन्तु पीछे से स्वयं शरण में आया और तलवार की बिजली से बच गया। अल्लाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग में 30 हजार मनुष्यों का कत्ल करने की आज्ञा दी तथा चित्तौड़ का राज्य अपने पुत्र खिज्र खाँ को देकर चित्तौड़ का नाम खिजराबाद रख दिया।’
‘छिताई चरित’ में अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा चित्तौड़ के शासक को बंदी बनाकर जगह-जगह पर घुमाये जाने का उल्लेख है। ई.1336 में जैन साधु कक्कड़ सूरि ने ‘नाभिनन्दनो जिनोद्धार प्रबन्ध’ नामक ग्रंथ लिखा जिसमें कहा गया है कि चित्रकूट के स्वामी को बन्दी बनाया गया और नगर-नगर बन्दर की तरह घुमाया गया।
बहुत से लोग जायसी की पद्मावती को केन्द्रबिंदु बनाकर चित्तौड़ का इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं किंतु इस ग्रंथ की नायिका जायसी की मौलिक रचना नहीं है, न ही वह चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी अथवा पद्मावती है। जायसी की पद्मिनी अथवा पद्मावती तो ‘पृथ्वीराज रासो’ नामक ग्रंथ से उधार ली हुई है।
ई.1303 में दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग को विशाल सेना लेकर घेर लिया तथा रावल रत्नसिंह से उसकी रानी पद्मावती अथवा पद्मिनी के समर्पण की मांग की। जब रावल रत्नसिंह ने सुल्तान की मांग अस्वीकार कर दी तो दिल्ली की सेना ने छल से चित्तौड़ का किला भंग कर दिया।
ऐतिहासिक दृष्टि से इस युद्ध के केन्द्र में रावल रत्नसिंह एवं अल्लाउद्दीन खिलजी को होना चाहिए था किंतु दुर्भाग्य से विगत सात सौ सालों में चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी को इस युद्ध का केन्द्रबिंदु बना दिया गया है और यह काम इतिहास ने नहीं, साहित्य ने किया है।
इस ऐतिहासिक विरूपण की शुरुआत ई.1540 में मलिक मुहम्मद जायसी के ग्रंथ ‘पद्मावत’ से हुई। यह ग्रंथ इतिहास की दृष्टि से नितांत अनुपयोगी और झूठा है। इस ग्रंथ का साहित्यिक मूल्य भी अधिक नहीं है किंतु सोलहवीं शताब्दी में लिखा हुआ होने के कारण, हिन्दी भाषा के प्रारम्भिक काल की रचना के रूप में इस ग्रंथ का महत्त्व है।
वास्तव में इसका कथानक, उपन्यास की भांति कपोल-कल्पित है जिसके पात्रों एवं स्थानों के नाम इतिहास से ग्रहण किए गए हैं। महारानी पद्मिनी की कथा पर आधारित होने के कारण इस ग्रंथ को राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हुई। मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित पद्मावत को हिन्दी साहित्य में सूफी परम्परा के महाकाव्य के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है।
बहुत से लोग इसमें इतिहास ढूंढने की चेष्टा करते हैं तथा जायसी की पद्मावती को केन्द्रबिंदु बनाकर चित्तौड़ का इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं किंतु इस ग्रंथ की नायिका जायसी की मौलिक रचना नहीं है, न ही वह चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी अथवा पद्मावती है।
जायसी की पद्मिनी अथवा पद्मावती पृथ्वीराज रासो नामक ग्रंथ से उधार ली हुई है। हालांकि पृथ्वीराज रासो भी इतिहास लेखन की दृष्टि से विश्वसनीय नहीं है।
इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-
जायसी ने पद्मावत की रचना हिजरी 947 अर्थात् ई.1540 में शेरशाह सूरी के शासनकाल में की थी। इस ग्रंथ के आरम्भ में शेरशाह सूरी की प्रशंसा की गई है। जायसी की पद्मावत में राजा रतनसेन और नायिका पद्मिनी की प्रेमकथा के माध्यम से सूफियों की प्रेम-साधना का आधार तैयार किया गया है।
इस ग्रंथ में रतनसेन को चित्तौड़ का राजा बताया गया है और पद्मावती सिंहल द्वीप की राजकुमारी तथा रतनसेन की रानी है जिसके सौंदर्य की प्रशंसा सुनकर दिल्ली का सुल्तान अल्लाउद्दीन उसे प्राप्त करने के लिये चित्तौड़ पर आक्रमण करता है।
To purchase this book, please click on photo.
बहुत से लोग मानते हैं कि अवधी क्षेत्र में प्रचलित ‘हीरामन सुग्गे’ की लोककथा जायसी की पद्मावत का आधार बनी थी। इस कथा के अनुसार सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन की कन्या पद्मावती ने हीरामन नामक सुग्गा पाल रखा था। एक दिन वह सुग्गा पदमावती की अनुपस्थिति में भाग निकला और एक बहेलिए द्वारा पकड़ लिया गया। बहेलिए से एक ब्राह्मण के हाथों में होता हुआ वह सुग्गा चित्तौड़ के राजा रतनसिंह के पास पहुंचा। सुग्गे ने राजा रतनसिंह को सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन सुनाया और राजा रतनसिंह राजकुमारी पद्मावती को प्राप्त करने के लिये योगी बनकर निकल पड़ा। राजा रतनसिंह ने सुग्गे के माध्यम से पद्मावती के पास प्रेमसंदेश भेजा। पद्मावती उससे मिलने के लिये एक देवालय में आई जहाँ से राजा रतनसेन राजकुमारी को घोड़े पर बैठाकर चित्तौड़ ले आया। इस प्रकार यह कथा चलती रहती है। पृथ्वीराज रासो में ‘पद्मावती समय’ नामक एक आख्यान दिया गया है। इसके अनुसार पूर्व दिशा में समुद्रशिखर नामक प्रदेश पर विजयपाल यादव नाम का राजा राज्य करता था। उसकी पत्नी का नाम पद्मसेना तथा पुत्री का नाम पद्मावती था। एक दिन राजकुमार पद्मावती राजभवन के उद्यान में विचरण कर रही थी।
उस समय एक शुक अर्थात् तोता पद्मावती के लाल होठों को बिम्बाफल समझकर उसे खाने के लिए आगे बढ़ा। उसी समय पद्मावती ने शुक को पकड़ लिया। वह शुक मनुष्यों की भाषा बोलता था।
उसने पद्मावती का मनोरंजन करने के लिए एक कथा सुनाई। राजकुमारी पद्मावती ने पूछा- ‘हे शुकराज! आप कहाँ निवास करते हैं? आपके राज्य का राजा कौन है?’ इस पर शुक ने राजकुमारी पद्मावती को दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान के बारे में बताया। राजकुमारी पृथ्वीराज के गुणों पर रीझ गई तथा शुक से कहने लगी- ‘तू मेरा प्रेम-संदेश लेकर दिल्ली जा और राजा पृथ्वीराज से कह कि वह आकर मुझे ले जाए क्योंकि मैं उससे प्रेम करती हूँ जबकि मेरे पिता ने मेरा विवाह राजा कुमुदमणि से तय कर दिया है।’
शुक ने दिल्ली पहुंचकर राजा पृथ्वीराज को राजकुमारी पद्मावती का संदेश दिया। राजा पृथ्वीराज समुद्रशिखर राज्य में पहुंचकर पद्मावती से मिला तथा उसे अपने घोड़े पर बैठाकर ले गया।
हीरामन सुग्गे की लोककथा के तथ्यों को काम में लेते हुए रानी पद्मावती की प्रेमगाथा को पृथ्वीराज रासो में जोड़ दिया गया। संभवतः वही प्राचीन लोककथा सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित पद्मावत का भी आधार बनी होगी।
ई.1586 में जैनकवि हेमरत्न ने अपने ग्रंथ ‘गोरा-बादल चरित चउपई’ में तथा कवि लब्धोदय ने ई.1649 में रचित ग्रंथ ‘पद्मिनी चरित चउपई’ में रानी पद्मावती के ऐतिहासिक सत्य एवं लोककथा के तथ्यों को मिलाकर इस समस्या को और बढ़ा दिया। इन तीनों ग्रंथों अर्थात् जायसी की ‘पद्मावत’, हेमरत्न की ‘गोरा-बादल चरित चउपई’ तथा कवि लब्धोदय की ‘पद्मिनी चरित चउपई’ में महारानी पद्मिनी की कथा को स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में लिखा गया।
उसके बाद फरिश्ता एवं अबुल फजल ने इन तथ्यों को और अधिक तोड़-मरोड़कर इस कथा को विस्तार दे दिया। कवि जटमल नाहर ने ‘पद्मिनी चरित’, कवि मल्ल ने ‘गोरा-बादल कवित’, कवि पत्ता ने ‘छप्पय चरित’, कवि भट्ट रणछोड़ ने ‘राजप्रशस्ति काव्य’, दलपत विजय ने ‘खुंमाण रासौ’, दयालदास ने ‘राणौ रासौ’, कविराज श्यामलदास ने ‘वीर विनोद’ तथा मुंहता नैणसी ने मुंहता नैणसी री ख्यात में इस कथा के अलग-अलग रूप गढ़ दिए।
कर्नल टॉड ने लिखा है- ‘अल्लाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग को तो अधीन कर लिया परन्तु जिस पद्मिनी के लिये उसने इतना कष्ट उठाया था, उसकी तो चिता की अग्नि ही उसे दिखाई दी।’
आजादी के बाद कुछ टूरिस्ट गाइड्स ने चित्तौड़ दुर्ग में एक महल के सामने की दीवार पर एक दर्पण लटका दिया जिसे वे दुर्ग में आने वाले पर्यटकों को दिखाकर कहते थे कि रानी पद्मिनी अपने महल में खड़ी हो गई और इस दर्पण में अल्लाउद्दीन खिलजी ने रानी का चेहरा देखा।
इस प्रकार रानी पद्मिनी की कथा के विरूपित संस्करण को जनमानस में गहराई से बैठा दिया गया। कुछ फिल्मकारों ने इस कथा को विस्तार देते हुए रानी पद्मिनी और अल्लाउद्दीन खिलजी की एक मिथ्या प्रेमकहानी गढ़ने का प्रयास किया जिसके प्रतिकार स्वरूप भारत में एक लम्बा आंदोलन हुआ।
वास्तविकता यह है कि महारानी पद्मिनी अपने अदम्य साहस एवं पातिव्रत्य धर्म के कारण भारतीय नारियों के लिये सीता और सती सावित्री की तरह आदर्श बन गई। इसी प्रकार गोरा एवं बादल भी मिथकीय कथाओं के नायक बन गये।
राणा हमीर ने शत्रुओं को पत्थरों से बांधकर चित्तौड़ दुर्ग से नीचे गिरा दिया
एक दिन राणा हमीर ने चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण किया। उसके सैनिक चुपचाप दुर्ग में प्रवेश करके दुर्ग की प्राचीरों तक जा पहुंचे और उन्होंने, मुस्लिम तथा चौहान सैनिकों को पत्थरों से बांध-बांधकर दुर्ग की दीवारों से नीचे गिरा दिया और दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
ई.1303 में अल्लाउद्दीन खिजली ने चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण किया। उसे चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करने में लगभग आठ माह लगे तथा अगस्त 1303 में अल्लाउद्दीन खिलजी का दुर्ग पर अधिकार हो गया।
इसके बाद अल्लाउद्दीन ने दुर्ग में कत्लेआम का आदेश दिया जिसमें लगभग 30 हजार लोग मारे गए। अल्लाउद्दीन ने चित्तौड़ दुर्ग का नाम बदल कर खिज्राबाद कर दिया तथा उसे अपने पुत्र खिज्र खाँ को देकर स्वयं पुनः दिल्ली चला गया। खिज्र खाँ ने चित्तौड़ दुर्ग के सैंकड़ों साल पुराने अनेक मंदिरों को नष्ट कर दिया और उनमें लगे देव-विग्रहों, शिलालेखों तथा पत्थरों को वहाँ से उठवाकर गंभीरी नदी के तट पर डलवा दिया तथा उस सामग्री से नदी पर एक पुल बनवाया गया। इस पुल में लगे एक शिलालेख में महाराणा जयतल्लदेवी का भी उल्लेख है जिसका इतिहास में अब केवल यही एक उल्लेख बचा है।
इस पुल में लगा एक अन्य शिलालेख वि.सं. 1254 का महारावल तेजसिंह के समय का है। पुल से कुछ दूर दक्षिण में शंकरघट्टा नामक स्थान है जहाँ से वि.सं.770 अर्थात् ई.713 का मान मोरी का एक शिलालेख एवं कई मूर्तियां मिली हैं। स्वाभाविक ही है कि बहुत से शिलालेख पूरी तरह नष्ट हो गए होंगे।
यदि खिज्र खाँ द्वारा चित्तौड़ दुर्ग के मंदिर एवं शिलालेख नहीं तोड़े गए होते तो भारत के इतिहास की कई टूटी हुई कड़ियों को जोड़ने के लिए विश्वसनीय सामग्री उपलब्ध हुई होती। इस प्रकार अल्लाउद्दीन खिलजी तथा उसके पुत्र खिज्र खाँ ने चित्तौड़ के उस वैभव को भारी क्षति पहुंचाई जो चित्तौड़ दुर्ग ने शताब्दियों एवं सहस्राब्दियों में अर्जित किया था।
अल्लाउद्दीन खिलजी के विजय अभियानों को आगे बढ़ाने से पहले हम चित्तौड़ दुर्ग के इतिहास को बीस साल आगे ले जाकर छोड़ना चाहते हैं जब वह दिल्ली सल्तनत के हाथों से फिसलकर पुनः गुहिलों के हाथों में जा पहुंचा था। जब ई.1303 में अल्लाउद्दीन खिलजी अपने पुत्र खिज्र खाँ को चित्तौड़ दुर्ग का दायित्व सौंपकर दिल्ली चला गया तो खिज्र खाँ चित्तौड़ दुर्ग में रहने लगा। वह लगभग 10-12 वर्ष चित्तौड़ दुर्ग में ही रहता रहा किंतु जैसे-जैसे समय बीतने लगा, खिज्र खाँ की बेचैनी बढ़ने लगी।
इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-
खिज्र खाँ समझ रहा था कि अपने पिता अल्लाउद्दीन खिलजी और सल्तनत की राजधानी दिल्ली दोनों से इतनी लम्बी अवधि तक दूर रहना खिज्र खाँ के भविष्य के लिए ठीक नहीं था। उसे निरंतर समाचार मिल रहे थे कि गुलाम मलिक काफूर दिल्ली की राजनीति पर शिकंजा कस रहा है। इसलिए ई.1313 से 1315 के बीच किसी समय, शहजादा खिज्र खाँ किसी बहाने से चित्तौड़ छोड़कर पुनः दिल्ली लौट गया।
इस पर सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने जालोर के मृत राजा कान्हड़देव चौहान के भाई मालदेव सोनगरा को चित्तौड़ दुर्ग का दुर्गपति नियुक्त कर दिया। मालदेव सात साल तक चित्तौड़ पर शासन करता रहा। ई.1322 के लगभग चित्तौड़ दुर्ग में ही उसका निधन हुआ।
To purchase this book, please click on photo.
मालदेव के निधन के बाद उसका पुत्र जैसा अर्थात् जयसिंह सोनगरा चित्तौड़ का दुर्गपति हुआ। इस बीच ई.1316 में अल्लाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई तथा ई.1320 में खिलजी सल्तनत ही समाप्त हो गई। इस कारण चित्तौड़ दुर्ग पर दिल्ली सल्तनत की पकड़ ढीली हो गई। गुहिलों की रावल शाखा तो ई.1301 में समाप्त हो चुकी थी किंतु गुहिलों का राज्य-दीपक अब भी सीसोदा की छोटी सी जागीर में जगमगा रहा था। इस दिनों राणा हम्मीर सिसोदे का जागीरदार था। उसने अपने पैतृक राज्य का उद्धार करने का निर्णय लिया। एक दिन राणा हमीर ने चित्तौड़ दुर्ग पर आक्रमण किया। उसके सैनिक चुपचाप दुर्ग में प्रवेश करके दुर्ग की प्राचीरों तक जा पहुंचे और उन्होंने, मुस्लिम तथा चौहान सैनिकों को पत्थरों से बांध-बांधकर दुर्ग की दीवारों से नीचे गिरा दिया और दुर्ग पर अधिकार कर लिया। चित्तौड़ से निकाल दिये जाने के बाद जैसा चौहान दिल्ली पहुंचा। उस समय दिल्ली सल्तनत पर मुहम्मद बिन तुगलक का शासन था। मुहम्मद बिन तुगलक ने जैसा को अपनी सेना देकर पुनः चित्तौड़ के लिये रवाना किया। इस बीच राणा हमीर ने अपने मित्रों से सम्पर्क किया तथा युद्ध की तैयारी करके बैठ गया। उसने दिल्ली से आई सेना को नष्ट कर दिया।
चित्तौड़ दुर्ग में स्थित महावीर स्वामी के मंदिर में महाराणा कुम्भा का एक शिलालेख लगा है जिसमें राणा हमीर को असंख्य मुसलमानों को रणखेत में मारकर कीर्ति संपादित करने वाला कहा गया है। इस विजय से राणा हमीर को चित्तौड़ के साथ-साथ अजमेर, मण्डोर और रणथंभौर के किले तथा पचास लाख रुपये की मुद्राएं प्राप्त हुईं। इस कारण सिसोदे की छोटी सी जागीर अचानक ही एक महत्त्वपूर्ण राज्य में बदल गई।
कुछ तो चित्तौड़ दुर्ग की यशोभूमि का महत्त्व था और कुछ गुहिल राजाओं के धर्मनिष्ठ आचरण का प्रभाव था जिनके कारण सीसोदे के सामान्य जागीरदार चित्तौड़ का दुर्ग पाकर राणा से महाराणा हो गए और भारत भर के राजाओं के लिए सर्वपूज्य हो गए। उन्होंने आने वाली छः शताब्दियों तक असंख्य भारतवासियों के मन में स्वतंत्रता की आग प्रज्जवलित की। महाराणाओं के पुण्यप्रताप से आज भी चित्तौड़ का दुर्ग भारतीयों की आन-बान और शान का प्रतीक बनकर खड़ा है।
अल्लाउद्दीन की चितौड़-विजय के साथ ही दिल्ली के लिए न केवल मालवा और गुजरात के मार्ग खुल गए अपितु अब वे दक्षिण भारत तक अपनी सेनाओं के साथ आसानी से पहुंच सकते थे। इसलिए अल्लाउद्दीन ने सबसे पहले मालवा पर सेना भेजी।
ई.1305 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने ऐनुल्मुल्क मुल्तानी को मालवा अभियान का दायित्व सौंपा। इन दिनों मालवा में मलहक देव नामक राजा शासन कर रहा था। उसकी सेना ने बड़ी वीरता से शत्रु का सामना किया परन्तु अन्त में मलहक देव परास्त हुआ तथा युद्ध क्षेत्र में ही काम आया। अंततः मालवा पर दिल्ली के तुर्कों का अधिकार हो गया।
अल्लाउद्दीन खिलजी ने मांडू, उज्जैन, धारानगरी तथा चन्देरी आदि नगरों को भी जीत लिया। इस प्रकार ई.1305 तक राजपूताना तथा मालवा के कई राज्य अल्लाउद्दीन के अधीन हो गए किंतु थार रेगिस्तान का जालोर राज्य अब तक अल्लाउद्दीन की पहुंच से बाहर था। इसलिए ई.1306 में अल्लाउद्दीन ने जालोर के चौहान राज्य पर अभियान किया जहाँ से ई.1301 में उसकी सेनाएं बुरी तरह पिटकर लौटी थीं।
बंगाल में मुस्लिम नवाब का शासन था। नवाब के परिवार में सत्ता की प्राप्ति के लिए षड़यंत्र चलते रहते थे। इस कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार तेजी से किया जाना संभव हुआ।
ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना तथा भारत में प्रवेश
1600 ई. में ब्रिटेन के कुछ व्यापारियों ने पूर्वी देशों में व्यापार करने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी स्थापित की। ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ (1558-1603 ई.) इस कम्पनी की हिस्सेदार थी। इस कम्पनी को अपने जहाजों तथा माल की सुरक्षा के लिए सैन्य बल रखना पड़ता था। कम्पनी को भारत में प्रवेश करते ही पुर्तगालियों से टक्कर लेनी पड़ी।
पुर्तगालियों को परास्त करने के बाद उन्हें भारत के पश्चिमी क्षेत्रों में अपनी बस्तियाँ स्थापित करने की अनुमति मिली। इन बस्तियों की रक्षा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को स्वयं करनी पड़ती थी। इस कार्य के लिए कम्पनी को सैनिकों की संख्या में निरंतर वृद्धि करनी पड़ती थी। इस प्रकार, कम्पनी की सेना का विस्तार होता चला गया।
यद्यपि कम्पनी ने सर्वप्रथम सूरत को केन्द्र बनाकर व्यापार आरम्भ किया किन्तु उसे प्रादेशिक लाभ सर्वप्रथम दक्षिण भारत में प्राप्त हुआ, जब 1639 ई. में वाण्डिवाश के हिन्दू राजा ने कम्पनी को मद्रास का क्षेत्र प्रदान किया तथा कम्पनी को एक दुर्ग बनवाने की अनुमति दी। कम्पनी ने यहाँ सेण्ट जॉर्ज फोर्ट नामक प्रसिद्ध दुर्ग बनवाया। 1669 ई. में कम्पनी को बम्बई का क्षेत्र भी मिल गया।
बंगाल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की गतिविधियाँ
ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल में अपनी पहली व्यापारिक बस्ती हुगली में 1651 ई. में स्थापित की। उन दिनों मुगल बादशाह शाहजहाँ का पुत्र शाहशुजा बंगाल का सूबेदार था। उसने एक फरमान जारी करके कम्पनी को बंगाल सूबे में व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया और कम्पनी द्वारा निर्यात किये जाने वाले माल को चुँगी-कर से मुक्त रखने की सुविधा भी प्रदान की।
अँग्रेजों ने हुगली के साथ ही कासिम बाजार तथा पटना में भी अपनी व्यापारिक कोठियां स्थापित कीं। 1691 ई. में प्रति वर्ष 3000 रुपये देने की शर्त पर कम्पनी को बंगाल में सीमा शुल्क देने से मुक्त कर दिया गया। 1693 ई. में कम्पनी को मद्रास के पास तीन गाँवों की जमींदारी मिली।
1698 ई. में कम्पनी को 12,000 रुपये वार्षिक भुगतान के बदले, बंगाल में तीन गाँवों- सूतानुती, गोविन्दपुर और कौलिकत्ता की जमींदारी मिल गई। इनकी सुरक्षा के लिए कम्पनी ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम नामक दुर्ग बनवाया। द्वितीय कर्नाटक युद्ध के समय कम्पनी को तंजौर के राजा से देवीकोटाई और उसके निकट का भूभाग प्राप्त हुआ जिसकी वार्षिक आय 30,000 रुपये थी। इस प्रकार कम्पनी बड़े भू-भाग की जमींदार बन गई।
अठारहवीं शताब्दी में बंगाल की स्थिति
औरंगजेब के शासनकाल में बंगाल, बिहार और उड़ीसा मुगल सल्तनत के तीन पृथक् सूबे थे। 1705 ई. में औरंगजेब ने मुर्शीदकुली जफरखाँ को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया। कुछ समय बाद उड़ीसा का सूबा भी उसे दे दिया गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद राजनैतिक अस्थिरता के काल में मुर्शीदकुली जफरखाँ एक स्वतन्त्र शासक की भाँति शासन करने लगा।
1727 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसका दामाद शुजाउद्दौला खाँ बंगाल का सूबेदार बना। उसने बिहार के सूबे को भी बलपूर्वक अपने नियंत्रण में ले लिया। इस प्रकार पूर्वी भारत के तीनों समृद्ध सूबे उसके अधीन हो गये। 1739 ई. में शुजाउद्दौला की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सरफराज खाँ उसका उत्तराधिकारी बना।
वह निर्बल, अयोग्य और विलासी था। उस समय अलीवर्दी खाँ बिहार का नायब सूबेदार था। अपै्रल 1740 में अलीवर्दीखाँ ने अपने स्वामी सरफराजखाँ पर आक्रमण कर दिया। सरफराजखाँ युद्ध में परास्त हुआ तथा मारा गया। मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला (1719-48 ई.) अलीवर्दीखाँ के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही करने में असमर्थ था इसलिये उसने अलीवर्दीखाँ को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का सूबेदार मान लिया।
चुंगी को लेकर बंगाल के सूबेदारों से विवाद
1717 ई. में मुगल बादशाह फर्रूखसियर ने एक फरमान द्वारा कम्पनी के सामान पर लगने वाली चुँगी-कर या सीमा-शुल्क माफ कर दिया। इससे कम्पनी को बहुत मुनाफा हुआ। ज्यों-ज्यों मुगलों की सत्ता कमजोर होती गई, बंगाल के सूबेदार, शासन के सम्बन्ध में स्वतंत्र होते गये।
वे चाहते थे कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी, बंगाल सूबे में व्यापार करने के लिये बंगाल के सूबेदार से अनुमति प्राप्त करे। इस प्रकार बंगाल के सूबेदार और ईस्ट इण्डिया कम्पनी में मतभेद उत्पन्न हो गये जो समय के साथ बढ़ते ही गये। आगे चलकर दोनों के मध्य जो युद्ध लड़े गये, उनका मूल कारण व्यापार पर चुंगी का विषय ही था।
कलकत्ता के आस-पास का क्षेत्र जो कम्पनी को जमींदारी के रूप में मिला था, उस पर भी दोनों पक्षों में विवाद था। बंगाल के सूबेदार का मानना था कि उसके सूबे के समस्त जमींदारी क्षेत्रों पर उसका नियन्त्रण है परन्तु कम्पनी का मानना था कि जमींदारी क्षेत्र में उसे स्वायत्तता प्राप्त है तथा बंगाल के सूबेदार को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
अलीवर्दी खाँ का शासन
अलीवर्दीखाँ, सैद्धांतिक रूप से मुगल बादशाह की ओर से बंगाल का सूबेदार था किंतु व्यावहारिक रूप में वह एक स्वतंत्र शासक था। उसने 1740 ई. से 1756 ई. तक बंगाल पर शासन किया। उसके समय में मराठों ने निरन्तर आक्रमण करके बंगाल के आर्थिक जीवन को बुरी तरह से बर्बाद कर दिया।
अतः 1751 ई. में उसे मराठों से समझौता करके उन्हें उड़ीसा का अधिकांश भाग तथा प्रतिवर्ष 12 लाख रुपया चौथ के रूप में देना स्वीकार करना पड़ा। मराठों की तरफ से निश्चिंत होने के बाद अलीवर्दीखाँ ने शासन व्यवस्था की तरफ ध्यान दिया। उसे बंगाल का सूबेदार बनने में बंगाल के हिन्दू व्यापारियों से महत्त्वपूर्ण सहयोग मिला था।
अतः उसने हिन्दुओं को महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया। राय दुर्लभ, जगत सेठ बन्धु मेहताब राय और स्वरूपचन्द्र, राजा रामनारायण, राजा माणिकचन्द्र आदि हिन्दू व्यापारियों का उसके शासन में भारी सम्मान बना रहा।
उस समय बंगाल का अधिकांश व्यापार हिन्दू व्यापारियों के हाथों में था। यूरोपीय व्यापारियों से सम्पर्क होने के बाद हिन्दू व्यापारियों का कारोबार और अधिक बढ़ गया और वे बहुत समृद्ध हो गये। बंगाल से कृषि उपज, सूती वस्त्र तथा रेशम का भारी मात्रा में निर्यात होता था।
बढ़ते हुए व्यापार तथा लाभ ने बंगाल के हिन्दू व्यापारियों को अँग्रेज व्यापारियों का मित्र बना दिया। यही कारण है कि जब बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मध्य संघर्ष हुआ तो बंगाल के हिन्दू व्यापारियों ने कम्पनी के साथ सहानुभूति रखी तथा उसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अलीवर्दी खाँ और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सम्बन्ध कभी मैत्रीपूर्ण नहीं रहे। कम्पनी की शिकायत थी कि उसे 1717 ई. के शाही फरमान के अनुसार व्यापारिक सुविधायें नहीं दी जा रही हैं। इसके विपरीत नवाब का मत था कि कम्पनी को जो सुविधाएँ दी गई हैं, वह उनका दुरुपयोग कर रही है। इस कारण बंगाल के सरकारी कोष को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है।
अतः कम्पनी को चाहिए कि वह अपने मुनाफे का कुछ अंश सीमा शुल्क के रूप में सरकार को दे। कम्पनी इसके लिए तैयार नहीं थी। विवाद का दूसरा कारण कम्पनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षायें भी थीं। कर्नाटक के युद्धों में मिली सफलता से कम्पनी का आत्मविश्वास बढ़ गया था। इस कारण कम्पनी, बंगाल में भी अपनी स्थिति सुदृढ़ करने में जुट गई।
दूसरी तरफ अलीवर्दी खाँ को आभास हो गया कि दोनों यूरोपीय कम्पनियों (अंग्रेजों और फ्रांसीसियों) में कभी भी संघर्ष छिड़ सकता है जिससे बंगाल की शान्ति भंग हो सकती है। अतः नवाब ने आरम्भ से ही दोनों कम्पनियों को अपनी बस्तियों की किलेबन्दी करने तथा अस्त्र-शस्त्रों को जमा करने की अनुमति नहीं दी। उसका कहना था कि व्यापारी को सामरिक तैयारी में समय नष्ट नहीं करना चाहिए।
अलीवर्दीखाँ के सुझाव के उपरान्त भी ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने एक सेना गठित कर ली। इसका मुख्य ध्येय मराठों की लूटमार से अपनी बस्ती की रक्षा करना था। अपनी बस्ती के अलावा अँग्रेजों ने आसपास के कुछ अन्य क्षेत्रों को भी मराठों की लूटमार से बचाया तथा मराठों द्वारा लूटे गये क्षेत्रों के लोगों को थोड़ी-बहुत आर्थिक सहायता भी दी।
इसका परिणाम बहुत अच्छा निकला। अँग्रेजों ने स्थानीय लोगों की सहानुभूति प्राप्त कर ली, जो आगे चलकर उनके काम आई। 1756 ई. में यूरोप में आरम्भ हुए सप्तवर्षीय युद्ध के कारण दक्षिण भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा फ्रैंच इण्डिया कम्पनी में संघर्ष आरम्भ हो गया परन्तु अलीवर्दीखाँ ने दोनों कम्पनियों पर कठोर नियंत्रण रखा और उन्हें आपस में लड़ने नहीं दिया।
कम्पनी के व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि
यद्यपि अलीवर्दी खाँ के शासन में कम्पनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं हो सकी किंतु कम्पनी का कारोबार अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा। भारत से इंग्लैण्ड में कम्पनी का आयात 1708 ई. में 5 लाख पौण्ड मूल्य का था जो 1740 ई. में बढ़कर 17.95 लाख पौण्ड मूल्य का हो गया।
यह वृद्धि तो तब हुई जबकि इंग्लैण्ड की संसद ने अँग्रेजी कपड़ा उद्योग के संरक्षण करने तथा इंग्लैण्ड से भारत को चांदी का निर्यात रोकने के लिये, 29 सितम्बर 1701 को एक विशेष कानून बनाकर भारतीय मलमल, छींटदार कपड़े एवं रंगदार लट्ठे को ब्रिटेन में पहनने एवं प्रयोग में लाने पर रोक लगा रखी थी।
सिराजुद्दौला का अँग्रेजों से संघर्ष
अलीवर्दी खाँ के कोई पुत्र नहीं था। केवल तीन पुत्रियाँ थीं जिन्हें उसने अपने तीन भतीजों से ब्याह दिया था। अलीवर्दी खाँ ने अपने दामादों को पूर्णिमा, ढाका तथा पटना का सूबेदार नियुक्त किया। इन तीनों दामादों का निधन अलीवर्दी खाँ के जीवनकाल में ही हो गया। इसलिये अलीवर्दी खाँ ने अपनी सबसे छोटी पुत्री के लड़के सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया परन्तु इस निर्णय से सिराजुद्दौला के प्रतिद्वंद्वी भड़क गये।
अलीवर्दी खाँ की सबसे बड़ी पुत्री घसीटी बेगम सिराजुद्दौला के मृत बड़े भाई के अल्पवयस्क पुत्र मुराउद्दौला को गोद लेकर उसे बंगाल का नवाब बनाने का प्रयत्न करने लगी। घसीटी बेगम का दीवान राजवल्लभ चतुर राजनीतिज्ञ था, वह घसीटी बेगम का मार्गदर्शन कर रहा था।
अलीवर्दी खाँ की दूसरी पुत्री का पुत्र शौकतजंग जो पूर्णिया का गवर्नर था, स्वयं को बंगाल की नवाबी का सही उत्तराधिकारी समझता था। अलीवर्दी खाँ का बहनोई और प्रधान सेनापति मीर जाफर भी नवाब बनने का इच्छुक था। ये सब लोग एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे।
10 अपै्रल 1756 को 82 वर्ष की अवस्था में अलीवर्दी खाँ की मृत्यु हो गई। इसके बाद सिराजुद्दौला बिना किसी बाधा के तख्त पर बैठ गया। उसने अपनी बड़ी मौसी घसीटी बेगम को छल से बन्दी बना लिया तथा शौकतजंग के विरुद्ध भी सैनिक कार्यवाही करके उसे अपने अधीन कर लिया।
सिराजुद्दौला गुस्सैल स्वभाव का युवक था। उसने तख्त पर बैठते ही कम्पनी को आदेश दिया कि वे उसी प्रकार व्यापार करें जिस तरह वे मुर्शीदकुली खाँ के समय में करते थे। कम्पनी के अधिकारियों ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया। इस समय तक वे फ्रांसीसियों पर निर्णायक विजय प्राप्त कर चुके थे और नवाब को सबक सिखाने की युक्ति कर रहे थे। इन सब कारणों से दो माह से भी कम समय में सिराजुद्दौला और अँग्रेजों के बीच झगड़ा हो गया।
सिराजुद्दौला तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच झगड़े के कारण
(1.) प्रतिद्वंद्वियों की महत्त्वाकांक्षाएं
अँग्रेजों और सिराजुद्दौला के मध्य संघर्ष होने के कई कारण थे। एक ओर सिराजुद्दौला अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिये सख्त कदम उठा रहा था तो दूसरी ओर उसकी मौसी घसीटी बेगम का दत्तक पुत्र मुराउद्दौला, अलीवर्दी खाँ की दूसरी पुत्री का पुत्र शौकतजंग तथा अलीवर्दी खाँ का बहनोई मीर जाफर भी नवाब बनने के लिये षड्यंत्र कर रहे थे।
(2.) अँग्रेजों का षड्यंत्र
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी इस नीति पर चल रहे थे कि जब किसी राज्य में उत्तराधिकार का झगड़ा हो तो किसी न किसी दावेदार की सहायता करके अपने पक्ष के व्यक्ति को तख्त पर बैठाया जाये तथा राज्य में अपना प्रभाव बढ़ाया जाये ताकि व्यापार के लिये अधिक से अधिक सुविधायें प्राप्त करके अधिकतम लाभ अर्जित किया जा सके। इसलिये वे सिराजुद्दौला के विरोधियों की सहायता तथा नवाब के आदेशों की अवज्ञा करने लगे। जब सिराजुद्दौला को इस बात का अनुभव हुआ तो उसने अँग्रेजों के प्रभाव को कम करने का निर्णय लिया।
(3.) अँग्रेजों के प्रति संदेह
अँग्रेजों का मानना था कि सिराजुद्दौैला आरम्भ से ही अँग्रेजों को सन्देह की दृष्टि से देखता था किंतु अँग्रेज इतिहासकारों का यह दावा सही नहीं है। तत्कालीन साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि आरम्भ में सिराजुद्दौला अंग्रेजों से सहानुभूति रखता था। 1752 ई. में जब कम्पनी का अध्यक्ष हुगली आया था, तब सिराजुद्दौला ने उसका स्वागत किया था।
हॉलवेल के अनुसार अलीवर्दीखाँ ने मरने से पूर्व सिराजुद्दौला को अँग्रेजों पर कड़ी दृष्टि रखने की चेतावनी दी थी, क्योंकि उसे आशंका थी कि कर्नाटक जैसा षड्यंत्र बंगाल में भी दोहराया जा सकता है। अतः नवाब बनने के बाद शिराजुद्दौला के रुख में अंतर आ गया और वह अँग्रेजों की कार्यवाहियों को नियन्त्रित करने का प्रयास करने लगा।
(4.) नवाब के प्रति अँग्रेजों की अशिष्टता
जब सिराजुद्दौला तख्त पर बैठा तब अँग्रेज अधिकारी जान-बूझकर उसके दरबार से अनुपस्थित रहे और उन्होंने सिराजुद्दौला को भेंट भी नहीं दी। इस प्रकार उन्होंने नवाब की अवहेलना कर उसके प्रति अशिष्टता का प्रदर्शन किया। इस घटना के कुछ दिनों बाद ही जब सिराजुद्दौला ने अँग्रेजों की कासिम बाजार फैक्ट्री देखने की इच्छा व्यक्त की तो अँग्रेजों ने उसे फैक्ट्री दिखाने से मना कर दिया। जब नवाब ने उनके व्यापार के बारे में जानकारी चाही तो अँग्रेजों ने उसे जानकारी देने से भी मना कर दिया। इस प्रकार अँग्रेजों द्वारा जानबूझ कर बार-बार अवज्ञा किये जाने से सिराजुद्दौला उनसे नाराज हो गया।
(5.) व्यापारिक झगड़ा
मुगल बादशाह फर्रूखसियर ने 1717 ई. में शाही फरमान द्वारा अँग्रेजों को बंगाल में चुँगी दिये बिना व्यापार करने की सुविधा दी थी। इसके आधार पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी अपना व्यापार तो फैला रही थी किंतु बंगाल के नवाब को चुंगी नहीं देती थी। कम्पनी इस सुविधा का दुरुपयोग करने लगी।
वह भारतीय व्यापारियों से कुछ-ले-देकर उनके माल को भी अपना बताकर चुँगी बचा लेती थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी का अध्यक्ष अपने हस्ताक्षरों से बंगाल में कम्पनी के माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने ले जाने का अनुज्ञा पत्र जारी करता था। इसे दस्तक कहा जाता था। दस्तक वाले सामान पर चुँगी-कर वसूल नहीं किया जाता था।
कम्पनी के कई कर्मचारी निजी व्यापार करते थे और अपने व्यापारिक सामान को भी कम्पनी का बताकर चुँगी बचाते थे। इससे नवाब को आर्थिक हानि होती थी। इस स्थिति से उबरने के लिये सिराजुद्दौला कम्पनी के साथ कोई नया समझौता करना चाहता था। अँग्रेज इस विशेषाधिकार को छोड़ने को तैयार नहीं थे। अतः दोनों पक्षों में युद्ध होना अनिवार्य हो गया। वस्तुतः दोनों के मध्य संघर्ष का मूल कारण यही था।
(6.) कलकत्ता में आने वाले माल पर अँग्रेजों द्वारा चुंगी लगाना
कलकत्ता अँग्रेजों के अधिकार में था। अँग्रेज एक ओर तो नवाब को किसी प्रकार का कर नहीं चुका रहे थे तथा दूसरी ओर उन्होंने कलकत्ता के बाजार में स्थानीय व्यापारियों द्वारा लाये जाने वाले माल पर भारी कर एवं चुंगी लगा दिये।
(7.) नवाब के शत्रुओं को संरक्षण देना
अँग्रेजों की बस्ती कलकत्ता के नाम से विख्यात थी। कलकत्ता, नवाब के शत्रुओं तथा विद्रोहियों के लिए आश्रय स्थल बनी हुई थी। जब नवाब ने घसीटी बेगम को बन्दी बनाया तो दीवान राजवल्लभ ने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति अपने लड़के कृष्णवल्लभ के साथ कलकत्ता भिजवा दी।
उसने घसीटी बेगम की सम्पत्ति को भी छिपाने का प्रयास किया। इस पर नवाब ने उसे दीवान पद से हटा दिया और कलकत्ता के अँग्रेज अधिकारियों से कहा कि वे कृष्णवल्लभ, नवाब को सौंप दें। कम्पनी के अधिकारियों ने नवाब की इस मांग को ठुकरा दिया। इससे सिराजुद्दौला और भी अधिक नाराज हो गया।
(8.) कलकत्ता की किलेबन्दी
सिराजुद्दौला के नवाब बनते ही यूरोप में इंग्लैण्ड और फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ने से भारत में स्थित दोनों कम्पनियों में भी युद्ध होने की आशंका उत्पन्न हो गई। इसलिये दोनों कम्पनियों ने बंगाल में अपने-अपने स्थानों की किलेबन्दी करना और सैनिकों की संख्या बढ़ाना आरम्भ कर दिया। नवाब ने दोनों कम्पनियों को आदेश दिये कि वे अपने स्थानों की किलेबन्दी का काम बन्द कर दें। फ्रांसीसियों ने नवाब के आदेश को मान लिया परन्तु अँग्रेजों ने आदेश की पालना नहीं की। वे उस समय कलकत्ता के चारों तरफ एक खाई खुदवा रहे थे।
जब नवाब के अधिकारियों ने उन्हें खाई को भर देने के लिए कहा तो एक अँग्रेज अधिकारी ने उन्हें जवाब दिया- ‘यह खाई अवश्य भर दी जायेगी परन्तु मुसलमानों के सिरों से।’
जब सिराजुद्दौला को यह सूचना दी गई तो उसने अँग्रेजों को सबक सिखाने का निर्णय किया।
(9.) जमींदारी की गलत व्याख्या
कम्पनी को कलकत्ता बस्ती के आसपास के क्षेत्र की जमींदारी दी गई थी। नवाब का मानना था कि जमींदार उसका प्रतिनिधि मात्र है और उसका काम नवाब की तरफ से जमींदारी क्षेत्र से राजस्व वसूल करना तथा शान्ति बनाये रखना है। उस क्षेत्र पर नवाब का राजनीतिक प्रभुत्व सर्वोपरि है तथा कम्पनी नवाब के आदेशों का पालन करने के लिये बाध्य है परन्तु कम्पनी का मानना था कि उसे अपने क्षेत्र में पूर्ण राजनीतिक स्वायत्तता प्राप्त है, नवाब को उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
नवाब अँग्रेज अधिकारियों की दलीलों को मानने के लिये तैयार नहीं था। उसने अपने अधिकारियों को कम्पनी के अधिकारियों से वार्त्ता करने भेजा परन्तु अँग्रेज अधिकारियों ने नवाब के शान्ति-प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। ऐसी स्थिति में सिराजुद्दौला के समक्ष, कम्पनी के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं बचा।
इतिहासकार हिल ने लिखा है- ‘जिन कारणों से नवाब ने अँग्रेजों पर आक्रमण किया उनमें तर्क अवश्य था।’
नवाब द्वारा कम्पनी के विरुद्ध कार्यवाही
कासिम बाजार फैक्ट्री पर अधिकार
4 जून 1756 को सिराजुद्दौला ने मुर्शिदाबाद के निकट अँग्रेजों की कासिम बाजार फैक्ट्री पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। फैक्ट्री के अँग्रेज अधिकारी वाट्सन ने आत्मसमर्पण कर दिया।
फोर्ट विलियम पर अधिकार
5 जून 1756 को नवाब ने 50,000 सैनिकों के साथ कलकत्ता पर धावा बोला। उस समय कलकत्ता में अँग्रेजों के पास केवल 500 सैनिक थे। 15 जून को नवाब की सेना ने फोर्ट विलियम को घेर लिया। पराजय निश्चित जानकर गवर्नर ड्रेक और अँग्रेज अधिकारी अपने परिवारों को लेकर जहाज पर सवार होकर हुगली नदी में स्थित फुल्टा टापू पर चले गये। किले की रक्षा का भार हॉलवेल के नेतृत्व में थोड़े से सैनिकों को सौंप दिया गया। दो दिन बाद हॉलवेल ने समर्पण कर दिया। 20 जून को फोर्ट विलियम तथा कलकत्ता पर नवाब का अधिकार हो गया।
बाद में वाट्सन ने स्वीकार किया कि- ‘नवाब के शान्ति प्रस्ताव पर्याप्त थे। उन्हें ठुकराकर तथा कासिम बाजार की घटना से कोई सबक न लेकर गवर्नर ड्रेक ने स्वयं खतरा मोल लिया था।’
कालकोठरी (ब्लैक होल) की घटना
20 जून को फोर्ट विलियम का पतन हो गया। दुर्ग में उपस्थित अँग्रेजों को बन्दी बना लिया गया। कहा जाता है कि नवाब के किसी अधिकारी ने अँग्रेजों को रात्रि में 18 फुट लम्बी और 15 फुट चौड़ी एक कोठरी में बंद कर दिया। जब प्रातःकाल में कोठरी का दरवाजा खोला गया तो कई बन्दी मर चुके थे।
इतिहास में यह दुर्घटना काल कोठरी अथवा ब्लैक होल के नाम से विख्यात है। इस दुर्घटना का विवरण हॉलवेल द्वारा लिखे गये एक पत्र से मिला है। हॉलवेल के अनुसार जून मास की भयंकर गर्मी में नवाब के आदेश से 146 अँग्रेज बन्दियों को काल कोठरी में बंद किया गया। सुबह तक 123 व्यक्ति मर गये, केवल 23 व्यक्ति ही जीवित रह पाये जिनमें से हॉलवेल भी एक था।
ब्लैक होल की घटना पर इतिहासकारों में गम्भीर विवाद है। कुछ फ्रांसीसी एवं आर्मीनियन दस्तावेजों में भी इस घटना का उल्लेख मिलता है परन्तु मरने वालों की संख्या एक जैसी नहीं मिलती। ऐसा लगता है कि अँग्रेजों ने इस घटना को काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताया है। उनका एकमात्र उद्देश्य सिराजुद्दौला को क्रूर शासक सिद्ध करना था ताकि भारत में स्थित अँग्रेजों की सहानुभूति प्राप्त की जा सके और उन्हें नवाब के विरुद्ध उकसाया जा सके। हॉलवेल ने अवश्य ही इस कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर लिखा होगा।
डॉ. भोलानाथ और डॉ. ब्रिजेन गुप्ता ने इस दुर्घटना को सही माना है। अधिकांश इतिहाकारों की मान्यता है कि यदि यह स्वीकार कर लें कि इस प्रकार की घटना हुई थी तो भी इसके लिए सिराजुद्दौला को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जो लोग ब्लैकहोल की घटना की सत्यता में विश्वास नहीं करते उनके तर्क इस प्रकार से हैं-
(1.) तत्कालीन ऐतिहासिक ग्रन्थों, शेर-ए-मुतेखरीन और रायस-उस-सलातीन आदि में इस घटना का उल्लेख नहीं मिलता।
(2.) तत्कालीन अँग्रेजी पुस्तकों, मद्रास कौंसिल के दस्तावेजों, कम्पनी के डायरेक्टरों को क्लाइव तथा वाट्सन द्वारा लिखे गये पत्रों आदि में भी इसका उल्लेख नहीं मिलता।
(3.) फुल्टा टापू पर जाने वाले अँग्रेजों द्वारा लिखी गई प्रोसीडिंग्स में भी इस घटना का उल्लेख नहीं है।
(4.) इतिहासकार जे. एच. लिटल के अनुसार जिन अँग्रेजों का कालकोठरी की घटना में मारा जाना बताया गया है, वे तूफान में मरे थे।
(5.) 18 फुट लम्बी और 15 फुट चौड़ी कोठरी में 146 व्यक्तियों को किसी भी प्रकार से नहीं ठूँसा जा सकता।
(6.) हॉलवेल ने जो सूची दी है, उतने आदमी फोर्ट विलियम में मौजूद ही नहीं थे। हॉलवेल अत्यन्त ही झूठा व्यक्ति था। इसकी पुष्टि स्वयं क्लाइव एवं वाट्सन के कथनों से होती है।
(7.) हॉलवेल ने बाद में इसी प्रकार का आरोप मीर जाफर पर भी लगाया था कि उसने एक रात में असंख्य अँग्रेजों को मरवा डाला। हॉलवेल ने मृत व्यक्तियों की सूची भी दी परन्तु बाद में क्लाइव और वाट्सन ने लिखा है कि हॉलवेल का आरोप असत्य था और उसकी सूची के अधिकांश व्यक्ति अभी तक जीवित हैं।
(8.) 1757 ई. में अँग्रेजों ने जब नवाब सिराजुद्दौला के साथ सन्धि की तो उन्होंने कई बातों की क्षतिपूर्ति के लिए नवाब से धन की माँग की थी। यदि कालकोठरी की घटना घटित हुई होती तो अँग्रेज मृत लोगों का मुआवजा अवश्य माँगते। चूंकि इस प्रकार का मुआवजा नहीं माँगा गया। अतः इस बात की संभावना अधिक है कि इस प्रकार की कोई दुर्घटना घटित नहीं हुई।
कम्पनी द्वारा क्लाइव की नियुक्ति (1757-1760 ई.)
कासिम बाजार तथा कलकत्ता की पराजयों के समाचार जब मद्रास पहुँचे तो वहाँ के अँग्रेज अधिकारी अत्यधिक उत्तेजित हो उठे। मद्रास कौंसिल की बैठक में निर्णय लिया गया कि क्लाइव के नेतृत्व में कासिम बाजार और कलकत्ता पर फिर से अधिकार करने के लिए एक शक्तिशाली सेना बंगाल भेजी जाए।
क्लाइव की सहायता के लिए नौसेना अध्यक्ष वाट्सन को भी नियुक्त किया गया। इस प्रकार क्लाइव फोर्ट विलियम्स अर्थात बंगाल का पहला गवर्नर नियुक्त हुआ। मद्रास कौंसिल ने क्लाइव को आदेश दिया कि बंगाल के मौजूदा नवाब को हटाकर किसी और को नवाब बनाया जाये। अँग्रेजों की सेना मद्रास से कलकत्ता के लिये रवाना हो गई। सिराजुद्दौला इन तैयारियों से अनभिज्ञ था। इसलिए उसने न तो कलकत्ता की सुरक्षा की व्यवस्था की और न समुद्री तटों की चौकसी पर ध्यान दिया। लॉर्ड क्लाइव के शासन काल में बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार बड़ी तेजी से हुआ।
कलकत्ता की पराजय
दिसम्बर 1756 के अन्त में अँग्रेजों की सेना बंगाल पहुंच गई और फुल्टा टापू के आश्रितों को छुटकारा मिला। क्लाइव और वाट्सन ने अपने विश्वस्त लोगों की सहायता से सिराजुद्दौला के प्रमुख अधिकारियों तथा सेठ-साहूकारों को अपनी ओर मिलाने तथा नवाब को पद-च्युत करने के लिए षड्यन्त्र रचना आरम्भ कर दिया। ऐसे लोगों में राजा माणिकचन्द्र, व्यापारी अमीचन्द, जगत सेठ बन्धु, मीर जाफर आदि मुख्य थे।
राजा माणिकचन्द्र को भारी रिश्वत दी गई और 2 जनवरी 1757 को अँग्रेजों ने कलकत्ता पर पुनः अधिकार कर लिया। अँग्रेजों की सेना ने हुगली और उसके आसपास के क्षेत्रों पर आक्रमण करके अनेक लोगों की निर्मम हत्या की तथा उनकी समस्त वस्तुओं को लूट लिया। नवाब सिराजुद्दौला को जब इसकी सूचना मिली तो वह 40,000 सैनिकों के साथ कलकत्ता की तरफ बढ़ा। 30 जनवरी को क्लाइव ने नवाब की सेना पर अचानक आक्रमण करके उसे काफी क्षति पहँुचाई। इससे नवाब का मनोबल गिर गया।
अलीनगर की सन्धि (1757 ई.)
नवाब के सलाहकारों ने उस पर अँग्रेजों से सन्धि करने का दबाव डाला। इस पर नवाब सन्धि करने को तैयार हो गया। माना जाता है कि नवाब को अपने दरबारियों तथा अधिकारियों पर सन्देह हो गया था कि वे अँग्रेजों से मिले हुए हैं। दूसरी मान्यता यह है कि इन दिनों अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली ने मुगल बादशाह को परास्त करके दिल्ले में डेरा डाल रखा था और यह अफवाह जोरों पर थी कि रूहेलों और अफगानों की सहायता से वह बंगाल पर आक्रमण करेगा।
ऐसी स्थिति में नवाब ने अंग्रेजों से सन्धि कर लेना उचित समझा। उधर, क्लाइव की स्थिति भी अधिक मजबूत नहीं थी। वाट्सन के साथ उसके सम्बन्ध तनावपूर्ण हो गये थे और कलकत्ता कौंसिल से उसे अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा था। इसलिए जब नवाब की तरफ से सन्धि का प्रस्ताव आया तो क्लाइव ने उसे स्वीकार कर लिया। 9 फरवरी 1757 को दोनों पक्षों में सन्धि हुई जो अलीनगर की सन्धि कहलाती है।
इस संधि की मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं-
(1.) मुगल बादशाह फर्रूखसियर ने अँग्रेजों को जो व्यापारिक सुविधाएँ तथा विशेषाधिकार दिए थे, नवाब ने उनको मान्यता प्र्रदान कर दी।
(2.) बंगाल, बिहार और उड़ीसा में पहले की भाँति कम्पनी द्वारा दस्तक जारी किये जाने का अधिकार नवाब द्वारा स्वीकार कर लिया गया।
(3.) जिन फैक्ट्रियों पर नवाब ने अधिकार कर लिया था, वे पुनः कम्पनी को लौटा दी गईं।
(4.) नवाब ने कम्पनी की सम्पत्ति तथा अँग्रेजों को हुई हानि की क्षतिपूर्ति करने का वचन दिया।
(5.) कम्पनी को कलकत्ता में अपनी इच्छानुसार किलेबन्दी करने की छूट मिल गई।
(6.) कम्पनी को अपने निजी सिक्के ढालने का अधिकार भी दे दिया गया।
(7.) उपर्युक्त सुविधाओं के बदले में कम्पनी ने नवाब को उसकी सुरक्षा का आश्वासन दिया।
अलीनगर की सन्धि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए अत्यंत लाभदायक और नवाब सिराजुद्दौला के लिए अत्यंत अपमानजनक थी। क्लाइव ने सन्धि के द्वारा कम्पनी के लिए बहुत सारे अधिकार प्राप्त कर लिये। इस सन्धि के द्वारा उसने फ्रांसीसियों और नवाब के सम्भावित गठबन्धन को रोक दिया, जिससे बंगाल में कम्पनी की स्थिति अत्यधिक सुदृढ़ हो गई।
इतना होने पर भी अँग्रेज अधिकारी इस संधि से संतुष्ट नहीं थे क्योंकि वे सिराजुद्दौला को नवाब के पद से हटाना ही इस कार्यवाही का प्रमुख उद्देश्य समझते थे। सिराजुद्दौला भी इस संधि से संतुष्ट नहीं था। इसलिये दोनों पक्षों में निकट भविष्य में पुनः संघर्ष होना अवश्यम्भावी था।
शहजादी फीरोजा ने वीरमदेव से विवाह करने का प्रण लिया
शहजादी फीरोजा की माता और महल की अन्य बेगमों ने शहजादी को समझाया कि वह हिन्दू है और तुम मुसलमान। दोनों का विवाह कैसे हो सकता है? परन्तु शहजादी फीरोजा ने बहुत हठ किया और मरने को तैयार हो गई। अतः बेगमों ने बादशाह को सूचित किया।
ई.1303 में दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया तथा अब अपना ध्यान जालोर राज्य पर केन्द्रित किया। इस समय राजा कान्हड़देव सोनगरा जालोर का शासक था। सोनगरा चौहानों की शाखा सांभर के चौहानों में से निकली थी जो अजमेर तथा नाडौल होते हुए जालौर में अपना अलग राज्य स्थापित करने में सफल रही थी।
जालोर के चौहान शासक कान्हड़देव ने अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना को सोमनाथ आक्रमण के समय अपने राज्य से होकर गुजरने की अनुमति नहीं दी थी। इसलिए अल्लाउद्दीन खिलजी ने जालौर को अपने अधीन करने का निश्चय किया। अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने सेनापति ऐनुलमुल्क मुल्तानी को आदेश दिया कि वह राजा कान्हड़देव को दिल्ली लेकर आए।
फरिश्ता के हवाले से प्रोफेसर एम. हबीब ने लिखा है कि राजा कान्हड़देव को कोई भी निर्णय लेने से पहले दो बार सोचना आवश्यक था कि वह अल्लाउद्दीन खिलजी की प्रबल शक्ति को देखते हुए उससे युद्ध करे अथवा नहीं किन्तु युद्ध का निर्णय खिलजी सेनापति ऐनुलमुल्क मुल्तानी ने स्वतः कर दिया जो कि बड़ा लड़ाकू, चतुर और चालबाज सेनापति था। वह राजा कान्हड़देव को समझा-बुझा कर दिल्ली ले गया ताकि राजा कान्हड़देव स्वयं को सुल्तान का मित्र सिद्ध कर सके।
डॉ. दशरथ शर्मा ने लिखा है कि ठीक छत्रपति शिवाजी की परिस्थितियों में सम्मानपूर्वक शान्ति स्थापित करने के लिये राजा कान्हड़देव दिल्ली गया किन्तु छत्रपति शिवाजी की ही भांति राजा कान्हड़देव ने शीघ्र ही अनुभव कर लिया कि सम्मानपूर्वक सुलह स्थापित करना असंभव था। लगातार मिली सफलताओं ने अल्लाउद्दीन का दिमाग फेर दिया था। उसने अपने सिक्कों पर स्वयं को दूसरा अलेक्जेण्डर बताया।
इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-
फरिश्ता के हवाले से प्रोफेसर एम. हबीब ने लिखा है कि अल्लाउद्दीन का दरबार चाटुकारों से भरा पड़ा था। वह स्वयं भी अपनी बड़ाई किया करता कि भारत का कोई भी हिन्दू राजा अल्लाउद्दीन के समक्ष नहीं टिक सकता किन्तु यह दंभयुक्त चुनौती कान्हड़देव के आत्मसम्मान को सहन नहीं हुई और वह जालोर लौट आया तथा युद्ध की तैयारी करने लगा।
पद्मनाभ द्वारा लिखित ग्रंथ ‘कान्हड़दे प्रबंध’ राजा कान्हड़देव द्वारा अल्लाउद्दीन खिलजी की अधीनता स्वीकार करने की बात नहीं कहता। मूथा नैणसी की ख्यात में कान्हड़देव के दिल्ली जाने का उल्लेख नहीं है अपितु यह लिखा है कि अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा तलब किये जाने पर राजा कान्हड़देव ने अपने पुत्र वीरमदेव को दिल्ली भेजा।
फरिश्ता ने राजा कान्हड़देव के अल्लाउद्दीन के दरबार में उपस्थित होने की बात लिखी है जबकि पद्मनाभ ने उनमें से किसी के भी दिल्ली दरबार में जाने का वर्णन नहीं किया है। अधिकांश इतिहासकारों ने कान्हड़देव तथा वीरमदेव की दिल्ली दरबार में उपस्थिति को स्वीकार कर लिया है जिनमें डा. दशरथ शर्मा, डॉ. गोपीनाथ शर्मा, सुखवीरसिंह गहलोत आदि सम्मिलित हैं।
To purchase this book, please click on photo.
मुंहता नैणसी ने बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा वीरमदेव को दिल्ली बुलाए जाने का कारण पंजू नामक पायक को बताया है। मुंहता नैणसी ने अपनी पुस्तक में अल्लाउद्दीन को सुल्तान की जगह बादशाह लिखा है। उस काल में मल्लयुद्ध लड़ने वालों को पायक कहा जाता था। नैणसी खिलता है कि बादशाह अल्लाउद्दीन की सेवा में पंजू नामक एक पायक रहता था। पंजू किसी कारण बादशाह की सेवा छोड़कर रावल कान्हड़देव की सेना में चला गया। वहाँ उसने रावल कान्हड़देव के पुत्र वीरमदेव को बिन्नोट की विद्या अर्थात् मल्लयुद्ध की कला सिखाई थी। कुछ समय बाद पंजू पुनः बादशाह की सेवा में चला गया। वहाँ कोई ऐसा पायक अर्थात् मल्ल नहीं था जो पंजू पायक को पराजित कर सके। बादशाह के अन्य सभी पायकों को पंजू ने परास्त कर दिया। एक दिन बादशाह ने पंजू से पूछा कि क्या कोई ऐसा पायक है, जो तुम्हारा मुकाबला कर सके! इस पर पंजू ने निवेदन किया कि ईश्वर द्वारा निर्मित सृष्टि बहुत विशाल है उसमें किसी बात की कमी नहीं है। इस पृथ्वी पर ऐसे कई होंगे, मैंने देखे नहीं हैं परन्तु जालोर के रावल कान्हड़देव को पुत्र वीरमदेव ने मुझसे ही यह विद्या सीखी है, मेरी बराबरी कर सकता है।
इस पर बादशाह ने बडे़ वचन देकर कान्हड़देव को लिखा कि एक बार वीरमदेव को मेरे पास भेज दो। कान्हड़देव ने अपने भाई-बंधुओं से परामर्श किया और वीरमदेव को दिल्ली भेज दिया। बादशाह वीरमदेव को देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। पांच-दस दिन व्यतीत हो जाने पर बादशाह ने वीरमदेव से कहा कि एक बार तुम और पंजू खेलो, हम देखना चाहते हैं। वीरमदेव ने कहा कि यह राजकुमारों का काम नहीं है फिर भी आपकी इच्छा है तो हम एकांत में खेल दिखायेंगे, जहाँ बादशाह चाहें।
इस पर बादशाह ने अपने महल में एक स्थान तैयार करवाया। अन्तःपुर की औरतें भी चिकों की ओट में दोनों पहलवानों का मल्लयुद्ध देखने आईं। दोनों ही बराबर के खिलाड़ी थे। बादशाह उनके खेल को देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। पंजू से मल्लविद्या सीखने के बाद वीरमदेव ने कर्नाटक के पायकों से भी इस विद्या का एक दांव सीखा था जिसमें पैर के अंगूठे से उस्तरा बांधकर उल्टी गुलांच खाते थे जिससे उस्तरे की चोट प्रतिद्वन्द्वी के ललाट पर पहुंचती थी।
जब दो-तीन बार की लड़ाई में वीरमदेव और पंजू पायक बराबर रहे तो वीरमदेव ने दक्षिण के पायकों से सीखा हुआ दांव खेला और पंजू के ललाट पर उस्तरे की हल्की सी चोट मारी। वीरमदेव इस दांव के कारण जीत गया जिसे देखकर बादशाह और उसकी बेगमें बडे़ खुश हुए। बादशाह की युवा शहजादी फीरोजा इतनी प्रसन्न हुई कि वह राजकुमार वीरमदेव पर आसक्त हो गई। कुछ ग्रंथों में शहजादी फीरोजा को सिताई भी कहा गया है।
खेल की समाप्ति पर वीरमदेव और पंजू अपने-अपने डेरों को चले गये। तब शहजादी फीरोजा किसी एकान्त स्थान में प्रतिज्ञा लेकर सो गई। उसने अन्न-जल छोड़ दिया। हरम की स्त्रियों द्वारा कारण पूछे जाने पर शहजादी फीरोजा ने उत्तर दिया कि ‘या तो कुंअर वीरमदेव के साथ विवाह करूं, नहीं तो अन्न-जल नये दांत आने पर ग्रहण करूं।‘
शहजादी फीरोजा की माता और महल की अन्य बेगमों ने शहजादी को समझाया कि वह हिन्दू है और तुम मुसलमान। दोनों का विवाह कैसे हो सकता है? परन्तु शहजादी फीरोजा ने बहुत हठ किया और मरने को तैयार हो गई। अतः बेगमों ने बादशाह को सूचित किया।
बादशाह ने इस विवाह से इन्कार कर दिया। शहजादी फीरोजा ने तीन दिन तक अन्न-जल ग्रहण नहीं किया तो पुत्री की प्राण-रक्षा के लिये बादशाह ने उसकी बात मान ली और वीरमदेव के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा। वीरमदेव ने अनेक आपत्तियां प्रकट कीं किन्तु बादशाह नहीं माना।
तब वीरमदेव ने समझ लिया कि या तो मरना पडे़गा या फिर बात स्वीकार करनी पडे़गी। वीरमदेव ने एक योजना बनाई और बादशाह से निवेदन किया कि बहुत अच्छी बात है। लग्न दिखाकर मुझे विदा कर दो। मैं जालोर जाकर पूरी तैयारी करूंगा और लग्न पर बारात लेकर आऊंगा।
बादशाह को वीरम की बात पर संदेह हुआ और वीरमदेव की जमानत के तौर पर बनवीर के पुत्र राण को अपने पास रोक लिया। राजकुमार वीरमदेव ने जालोर आकर अपने पिता कान्हड़देव को समस्त विवरण बताया।
राजकुमार वीरमदेव के कटे सिर ने शहजादी से मुंह फेर लिया
मुंहता नैणसी री ख्यात में आए विवरण के अनुसार राजकुमार वीरमदेव ने जालोर आकर अपने पिता रावल कान्हड़देव को बताया कि दिल्ली के बादशाह ने मुझे अपनी शहजादी फीरोजा से विवाह करने का लगन दिया है तो राजा कान्हड़देव ने सोचा कि बात बिगड़ गई। उसने कामदारों को बुलाकर शीघ्र ही किलेबन्दी करवाई तथा युद्ध का सारा सामान तैयार करवाया।
जब लगन की अवधि समाप्त हो गई और राजकुमार वीरमदेव दिल्ली नहीं पहुंचा तो बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी हर पांच-सात दिन बाद राजकुमार वीरमदेव के मित्र राण को बुलाकर पूछने लगा कि राजकुमार वीरमदेव क्यों नहीं आया? इस पर राण बादशाह से कहता कि वह अवश्य ही बारात की तैयारी कर रहा होगा और शीघ्र ही आयेगा।
इस प्रकार दो-चार महीने आगे निकल गये। अब बादशाह और अधिक प्रतीक्षा नहीं कर सका। उसने अपने दूत जालोर भेजे। वे दूत रावल कान्हड़देव और राजकुमार वीरमदेव से मिले और सारी स्थिति देख-समझ कर दिल्ली लौटे। दूतों ने बादशाह को बताया कि अब राजकुमार वीरमदेव नहीं आने वाला, राजा कान्हड़देव तो युद्ध की तैयारी करके बैठा है।
दूतों की बात सुनकर बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी अत्यधिक क्रोधित हुआ और कोतवाल तोगा को बुलाकर उसे आदेश दिया कि वीरमदेव के मित्र राण को बेड़ी पहना दो जो कि जमानत के रूप में दिल्ली में रखा गया था। जब कोतवाल अपने स्वामी के आदेश की पालना करने हेतु राण के पास पहुंचा तो राण ने उसका काम तमाम कर दिया और दिल्ली से निकलकर कुशलतापूर्वक जालोर पहुंच गया। मूथा नैणसी ने इस संबंध में साक्ष्य स्वरूप तीन दोहे भी दिये हैं। मार्ग में झांतड़ा गांव के पास राण का घोड़ा मर गया।
जब अल्लाउद्दीन को ज्ञात हुआ कि राण भी भाग गया तो उसने मुजफ्फर खाँ और दाउद खाँ के नेतृत्व में पांच लाख सैनिक जालोर भेजे। उन्होंने वहाँ पहुंचकर दुर्ग घेर लिया। प्रतिदिन धावे होने लगे और उसके समाचार बादशाह के पास त्वरित गति से पहुंचाये जाते। कहते हैं कि बारह वर्ष तक झगड़ा रहा। मूथा नैणसी ने पांच लाख सैनिकों की संख्या लिखी है, यह सही प्रतीत नहीं होती।
इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-
नैणसी के अनुसार दो दहिया राजपूतों को रावल कान्हड़देव ने किसी अपराध में सूली पर चढ़वा दिया था। हवा से उनकी लाशों का रूख बदल गया सो सन्मुख हो गये। कान्हड़देव उनको देखकर हंसा और कहने लगा- ऐसा जान पड़ता है कि दहिये संगठित हो रहे हैं और गढ़ ले लेंगे।
उस वक्त उन वीका दहिया रावल कान्हड़देव के पास खड़ा था। उसे यह बात चुभ गई। अतः उसने दुर्ग का सारा भेद तुर्कों को दे दिया।
गढ़ में सुरंग लगा दी गई जिससे दीवार गिर गई और किले पर शत्रुओं का अधिकार हो गया परंतु बिना युद्ध किए राजपूत दुर्ग शत्रु को सौंपने को तैयार नहीं थे। युद्ध में कांधल ने शत्रु के सामने बड़ा पराक्रम दिखाया। रावल कान्हड़देव अलोप हो गया। राजकुमार वीरमदेव बहुत से साथियों सहित काम आया। तुर्कों ने उसका सिर काटकर दिल्ली भेज दिया। इस प्रकार 12 अप्रेल 1312 को जालोर दुर्ग खिलजियों के अधीन हो गया। जब वीका दहिया की पत्नी हीरा देवी को ज्ञात हुआ तो उसने अपने पति को मार डाला।
शहजादी फीरोजा राजकुमार वीरमदेव का कटा हुआ सिर थाली में रखकर उससे फेरे लेेने लगी। तभी वह मस्तक उल्टा हो गया। शहजादी ने पूर्व जन्म की बात कही तब मस्तक पुनः सन्मुख हुआ। शहजादी उस कटे हुए सिर के साथ फेरे लेकर मस्तक के साथ सती हो गई।
To purchase this book, please click on photo.
पद्मनाभ ने शहजादी सिताई अर्थात् शहजादी फीरोजा के वीरमदेव से प्रेमप्रसंग को शहजादी द्वारा पूर्वजन्म की स्मृति के आधार पर माना है। अनेक विद्वानों ने कान्हड़देव प्रबंध का विवरण देते समय ग्रंथ में उन घटनाओं एवं तथ्यों को भी शामिल कर लिया है जो कि कान्हड़देव में नहीं दिये गये हैं। डॉ. सुखवीर सिंह गहलोत ने ‘राजस्थान इतिहास रत्नाकर’ के परिशिष्ट में ‘कान्हड़दे प्रबंध’ के कथानक का संक्षिप्त वर्णन किया है। उसमें नाहर मलिक द्वारा कान्हड़देव को चालाकी से सुल्तान के दरबार में उपस्थित होने के लिये राजी कर लेना बताया गया है। फरिश्ता ने कान्हड़देव तथा राजकुमार वीरमदेव को दिल्ली दरबार में ले जाने वाले सेनानायक का नाम ऐनालुमुल्क बताया है न कि नाहर मलिक। इसी प्रकार सुखवीर सिंह गहलोत ने कान्हड़देव प्रबंध के हवाले से राजा कान्हड़देव के मरने की बाद 8 दिन तक राजकुमार वीरमदेव का जीवित रहना बताया है जबकि कान्हड़देव प्रबंध में यह अवधि साढे़ तीन दिन दी गई है। पद्मनाभ द्वारा लिखित ‘कान्हड़दे प्रबंध’ में उल्लेख है कि जब सुल्तान को जालोर अभियान में सफलता नहीं मिली तो शहजादी फिरोजा स्वयं गढ़ में गई जहाँ राजा कान्हड़देव ने शहजादी का स्वागत किया परन्तु अपने पुत्र के साथ उसका विवाह करने से मना कर दिया।
इस पर शहजादी फीरोजा हताश होकर दिल्ली लौट गई। कुछ वर्षों के बाद अल्लाउद्दीन ने फिरोजा की धाय गुलबहिश्त को आक्रमण के लिये भेजा। उसे यह कहा गया कि यदि वीरमदेव बंदी हो जाय तो उसे जीवित ही लाया जाए और यदि धराशायी हो जाये तो उसका सिर काट कर लाया जाए।
जब राजपूत सेना मुस्लिम सेना से परास्त हो गई और राजकुमार वीरमदेव युद्ध में खेत रहा तो उसका सिर काट कर दिल्ली ले जाया गया और शहजादी को दिया गया। शहजादी को देखते ही राजकुमार वीरम के कटे हुए सिर ने घृणा से अपना मुंह दूसरी ओर फेर लिया। शहजादी राजकुमार वीरम के सिर का अंतिम संस्कार करने के बाद यमुनाजी में कूद कर मर गई।
इस प्रकार मूथा नैणसी और पद्मनाभ के वर्णन में पर्याप्त अंतर है। डॉ. के. एस. लाल ने अपनी पुस्तक ‘खिलजी वंश का इतिहास’ में इस पूरे घटनाक्रम को अविश्वसनीय ठहराया है। उन्होंने लिखा है-
‘वास्तव में यह आश्चर्य पूर्ण है कि एक बार तो कान्हड़देव सुल्तान के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिये दिल्ली भागता है और वर्षों तक अटूट आज्ञाकारिता का पालन करता है और फिर अचानक ऐसा उद्धत रुख अपना लेता है कि वह स्वयं को और अपनी प्रजा को बहुत बड़ी विपत्ति में डाल देता है।
तुर्की सेना का नेतृत्व एक स्त्री को सौंपना और उसे सेना द्वारा सहर्ष स्वीकार करना ठीक प्रतीत नहीं होता। कोई भी समकालीन इतिहासकार ऐसा नहीं लिखता। यह तो फरिश्ता की कल्पना की उपज है जिसे पूर्णतः अस्वीकृत कर दिया जाना चाहिये।’
डॉ. रामेश्वर दयाल श्रीमाली ने भी किशोरी शरण लाल के मत को स्वीकार किया है।
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं—
काशी...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...