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जालोर पर आक्रमण किया शहजादी फीरोजा की धाय गुलबहिश्त ने (108)

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जालोर पर आक्रमण किया शहजादी फीरोजा की धाय गुलबहिश्त ने

पद्मनाभ तथा मुंहता नैणसी द्वारा दिए गए विवरणों के अनुसार जब जालोर के राजा कान्हड़देव ने अपने राजकुमार वीरमदेव का विवाह शहजादी फीरोजा से करने से मना कर दिया तो शहजादी दिल्ली लौट गई तथा अल्लाउद्दीन खिलजी ने शहजादी की धाय गुलबहिश्त के नेतृत्व में दिल्ली की सेना जालोर जालोर पर आक्रमण करने भेजी।

पद्मनाभ तथा नैणसी द्वारा उल्लिखित इन घटनाओं का तत्कालीन फारसी तवारीखों में उल्लेख नहीं है। इसलिए डॉ. के. एस. लाल ने इन घटनओं को कपोल-कल्पित माना है किंतु डा. दशरथ शर्मा, डॉ. गोपीनाथ शर्मा तथा सुखवीरसिंह गहलोत आदि कतिपय आधुनिक इतिहासकारों ने इन तथ्यों को सत्य-घटना के रूप में स्वीकार किया है।

आधुनिक काल के इन लेखकों का कहना है कि चूंकि पद्मनाभ ने फिरोजा को वीरमदेव से प्रेम होने तथा सुल्तान द्वारा शहजादी की धाय गुलबहिश्त को सेना के साथ जालोर भेजे जाने की बात लिखी है, इसलिए इन तथ्यों को सत्य माना जाना चाहिए। इन लेखकों के अनुसार पद्मनाभ का कान्हड़दे प्रबंध इसलिए अधिक विश्वसनीय है चूंकि वह फरिश्ता तथा हाजी उद्दबीर आदि के ग्रंथों से पहले लिखा गया है।

आधुनिक काल के इन लेखकों के अनुसार शहजादी फिरोजा का वीरम से प्रेम होना तथा सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा शहजादी की धाय गुलबहिश्त को सेना के साथ जालोर भेजना आदि घटनायें अस्वाभाविक नहीं है। सम-सामयिक फारसी तवारीखों में इन घटनाओं का वर्णन नहीं होने से ये घटना असत्य सिद्ध नहीं हो जातीं।

आधुनिक काल के इन लेखकों के अनुसार डॉ. के. एस. लाल का एक महिला द्वारा तुर्की सेना के नेतृत्व में संदेह किया जाना उचित नहीं है क्योंकि अल्लाउद्दीन से पहले रजिया सुल्तान दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठ चुकी थी जिसने 4 वर्ष तक शासन और सैनिक नेतृत्व किया था।

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पद्मनाभ, मूथा नैणसी, डॉ. दशरथ शर्मा, डॉ. गोपीनाथ शर्मा तथा सुखवीरसिंह गहलोत भले ही फिरोजा की एक-तरफा प्रेमकथा की सत्यता से सहमति व्यक्त करें किंतु अन्य ऐतिहासिक घटनाक्रमों के आधार पर यह पूरी प्रेमकथा असत्य जान पड़ती है। यहाँ तक कि मूथा नैणसी की ख्यात के सम्पादक डॉ. मनोहरसिंह राणावत ने भी इस प्रेमकथा को असत्य माना है।

मेरे अपने विचार में भी फिरोजा अथवा सिताई की प्रेमकथा का वर्णन उतना ही असत्य है जितना कि अल्लाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ दुर्ग के भीतर जाकर दर्पण में महारानी पद्मिनी का चेहरा देखना और महारानी पद्मिनी का अल्लाउद्दीन के शिविर में जाकर रावल रतनसिंह को छुड़ाना।

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अब हम अल्लाउद्दीन खिलजी के जालोर अभियान के सम्बन्ध में मिलने वाले अन्य घटनाक्रम की चर्चा करेंगे। हमने उस घटनाक्रम की चर्चा की थी जब ई.1299 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने अन्हिलवाड़ा के राजा कर्ण बघेला पर अभियान किया था। तब जालोर के चौहान शासक ने खिलजी की सेना को जालोर से होकर नहीं जाने दिया था। तभी से अल्लाउद्दीन खिलजी के सम्बन्ध जालोर के चौहानों से तनाव-पूर्ण चल रहे थे। जब ई.1301 में गुजरात से लौटते समय अल्लाउद्दीन की सेना बिना पूर्व अनुमति के जालोर राज्य में घुस गई तब जालोर की सेना ने अल्लाउद्दीन की सेना को जालोर राज्य से निकाल दिया था, तब ये सम्बन्ध और अधिक बिगड़ गए थे। इतना ही नहीं चौहानों ने उन नव-मुस्लिमों अर्थात् महमांशाह आदि मंगोलों को जालोर राज्य में शरण दी थी जिन्होंने अल्लाउद्दीन की सेना से वह धन छीन लिया था जो अल्लाउद्दीन की सेना ने गुजरात से लूटा था। इन्हीं कारणों से अल्लाउद्दीन खिलजी ने ई.1305 में जालोर पर आक्रमण किया। यदि जालोर और अल्लाउद्दीन खिलजी के बीच युद्ध के ये कारण उत्पन्न नहीं हुए होते तो भी अल्लाउद्दीन खिलजी रणथंभौर, चित्तौड़ एवं मालवा के राजपूत राज्यों को नष्ट करने के बाद जालोर राज्य पर अवश्य ही आक्रमण करता क्योंकि अल्लाउद्दीन खिलजी का लक्ष्य तो सम्पूर्ण भारत पर अधिकार करने का था।

अभी अन्हिलवाड़ा को नष्ट किया जाना बाकी था क्योंकि कर्ण बघेला ने फिर से अन्हिलवाड़ा पर अधिकार कर लिया था। दिल्ली से अन्हिलवाड़ा जाने के लिये जालोर होकर जाने वाला मार्ग सबसे छोटा, सुगम एवं सीधा था। इस मार्ग को अपने अधिकार में करना अल्लाउद्दीन खिलजी के लिये आवश्यक था।

डॉ. गोपीनाथ शर्मा लिखते हैं कि पहले की पराजय को विजय में बदलने की महत्त्वाकांक्षा अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा जालोर के अन्तिम आक्रमण का एक कारण हो सकती है, क्योंकि जब तक जालोर का पतन नहीं होता, तब तक जालोर के चौहान खिलजी सेना के दक्षिण अभियानों में बाधक सिद्ध हो सकते थे जबकि भारत के दक्षिणी प्रदेशों पर राजनीतिक प्रभाव बनाये रखने के लिये जालोर का दुर्ग सैनिक दृष्टि से उपयोगी हो सकता था।

डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार उत्तरी भारत के अन्य दुर्गों को जिनमें चित्तौड़ तथा रणथंभौर आदि प्रमुख थे, तुर्की सत्ता के सैनिक अड्डे बनाये रखने के लिये जालोर की स्वतंत्रता को समाप्त करने की सुल्तान की दृढ़ता भी अंतिम आक्रमण का कारण माना जाना चाहिये। इसी विचार को उन्होंने ‘कॉम्प्रिहेंसिव हिस्ट्री’ में भी लिखा है कि अल्लाउद्दीन खिलजी जालोर के राय की बढ़ती हुई शक्ति को सहन नहीं कर सकता था।

कुछ इतिहासकार ई.1305 में जालोर पर आक्रमण किया जाना मानते हैं जबकि कुछ इतिहासकार ई.1311 में अल्लाउद्दीन खिलजी का जालोर पर अधिकार होना मानते हैं। मूथा नैणसी की ख्यात के सम्पादक मनोहरसिंह राणावत ने 12 अप्रेल 1312 को खिलजी द्वारा जालोर दुर्ग पर अधिकार किया जाना माना है।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार अल्लाउद्दीन खिलजी ने ई.1314 में कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में जालोर पर आक्रमण करने के लिए सेना भेजी जिसमें कान्हड़देव परास्त हो गया और जालौर पर अल्लाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अल्लाउद्दीन का जालोर अभियान ई.1305 में आरम्भ हुआ एवं ई.1314 में जाकर पूरा हुआ। इस प्रकार अल्लाउद्दीन का जालोर अभियान आरम्भ होने एवं जालोर दुर्ग पर अल्लाउद्दीन का अधिकार होने के बारे में अलग-अलग तिथियां मिलती हैं जिनमें 6 साल से लेकर 9 साल तक का लम्बा अंतराल है।

ई.1305 से ई.1314 की अवधि के बीच ई.1308 में अल्लाउद्दीन खिलजी का सिवाना अभियान भी हुआ जो इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अवश्य ही यह अभियान जालोर अभियान से पहले हुआ था तथा दो साल तक अर्थात् ई.1310 तक चला था।

सिवाना अभियान के पूर्ण होने पर ही जालोर दुर्ग पर अभियान किया गया था। अतः तथ्यों के आधार पर यह माना जा सकता है कि अल्लाउद्दीन खिलजी का जालोर अभियान ई.1308 में आरम्भ होकर ई.1311 में पूरा हुआ। सिवाना अभियान की चर्चा हम अगली कड़ी में विस्तार से करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सिवाना पर आक्रमण किया अल्लाउद्दीन खिलजी ने (109)

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सिवाना पर आक्रमण किया अल्लाउद्दीन खिलजी ने

अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा अब तक गुजरात के अन्हिलवाड़ा, मालवा के मांडू, उज्जैन, धारा नगरी तथा चन्देरी एवं राजपूताने के जैसलमेर, रणथंभौर एवं चित्तौड़ जैसे राज्यों को जीतने के उपरांत भी जालोर का राज्य उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर था इसलिए उसने जालोर पर अभियान करने का निश्चय किया किंतु जालोर पर अभियान करने से पहले उसे सिवाना पर आक्रमण करना पड़ा।

पद्मानाभ के ग्रंथ ‘कान्हड़दे प्रबंध’ के अनुसार ई.1308 में अल्लाउद्दीन खिलजी का सिवाना पर आक्रमण हुआ। उन दिनों सिवाना दुर्ग जालोर के सोनगरा चौहान शासक कान्हड़देव के भतीजे सातलदेव के अधिकार में था।

ई.1308 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने मलिक कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में सिवाना पर आक्रमण किया। सिवाना पर उन दिनों सातलदेव का शासन था जो जालोर के चौहान शासक कान्हड़देव का भतीजा था तथा उसी की ओर से सिवाना दुर्ग पर नियुक्त था। अल्लाउद्दीन की सेना ने दो साल तक सिवाना दुर्ग पर घेरा डाले रखा किंतु जब दिल्ली की सेना सिवाना पर अधिकार नहीं कर सकी तो ई.1310 में अल्लाउद्दीन स्वयं सिवाना पर आक्रमण करने आया।

अमीर खुसरो के ग्रंथ ‘तारीखे अलाई’ में लिखा है कि सिवाना दुर्ग एक दुर्गम जंगल के बीच स्थित था। यह जंगल भयानक जंगली आदमियों से भरा हुआ था जो राहगीरों को लूट लेते थे। इस जंगल के बीच पहाड़ी दुर्ग पर काफिर सातलदेव, सिमुर्ग की भांति रहता था और उसके कई हजार काफिर सरदार पहाड़ी गिद्धों की भांति उसकी रक्षा करते थे। सिमुर्ग फारसी पुराणों में वर्णित एक भयानक एवं विशाल पक्षी है। संभवतः जुरासिक काल के विशालाकाय पक्षियों को अरबी साहित्य में सिमुर्ग कहा गया है।

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ई.1308 में जब कमालुद्दीन गुर्ग जालोर पर आक्रमण करने के लिये रवाना हुआ तो सिवाना के दुर्गपति सातलदेव ने कमालुद्दीन का मार्ग रोका और उससे कहलवाया कि जालोर पर आक्रमण बाद में करना, पहले सिवाना सिवाना पर आक्रमण करे।

कमालुद्दीन गुर्ग का लक्ष्य जालोर था न कि सिवाना। इसलिए वह सिवाना से उलझना नहीं चाहता था क्योंकि जैसलमेर के अभियान से वह अच्छी तरह समझ चुका था कि थार के रेगिस्तान में स्थित पहाड़ियों पर बने किसी भी दुर्ग को जीतना कितना कठिन होता है!

जब कमालुद्दीन गुर्ग ने सिवाना के दुर्गपति सातलदेव चौहान की चुनौती स्वीकार नहीं की और वह सीधा ही जालोर की तरफ बढ़ने लगा तो सातलदेव की सैनिक टुकड़ियों ने कमालुद्दीन की सेना को तंग करना आरम्भ किया। इस कारण विवश होकर कमालुद्दीन गुर्ग ने सिवाना पर आक्रमण किया। सिवाना का दुर्ग जालोर से 50 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित है तथा इसका निर्माण परमार शासकों क काल में होना बताया जाता है। 

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सिवाना का दुर्ग एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित था तथा इसके चारों ओर कंटीली झाड़ियों का विशाल जंगल हुआ करता था। इस जंगल के चारों ओर थार का रेगिस्तान था। इस स्थान के चारों ओर जल का कोई स्थाई स्रोत नहीं था। न नदी, न नाला, न कुआं, न तालाब। वर्षा भी बहुत कम होती थी। इस कारण कमालुद्दीन के आदमियों को अपने ऊंटों पर बहुत दूर से पानी ढोकर लाना पड़ता था। जबकि दूसरी ओर सिवाना दुर्ग में पानी के कई झालरे एवं तालाब बने हुए थे। सातलदेव की सेना पहाड़ी पर स्थित थी जबकि कमालुद्दीन की सेना नीचे तलहटी में थी। इस कारण सातलदेव के सैनिक पहाड़ी के ऊपर से ही तुर्की सेना पर तीर और पत्थर बरसाते थे और तुर्की सेना को उनकी मार से बचने के लिए पहाड़ी से दूर भाग जाना पड़ता था। इस प्रकार सातलदेव की सेना ने गुरिल्ला युद्ध करके दिल्ली की सेना को बहुत छकाया। जब दो साल बीत गए और कमालुद्दीन कुछ भी प्रगति नहीं कर सका तो अल्लाउद्दीन खिलजी ने स्वयं एक विशाल सेना लेकर सिवाना का रुख किया। अल्लाउद्दीन ने सिवाना दुर्ग के निकट ऊँचे पाशेब बनवाये तथा अपने सैनिकों को उस पर चढ़ा दिया। सातलदेव की सेना ने दुर्ग की प्राचीर से ढेंकुलियों की सहायता से शत्रु-सेना पर पत्थर बरसाये और ये पाशेब काम नहीं आ सके। इस प्रकार अल्लाउद्दीन खिलजी के समस्त दांव विफल हो गये।

पद्मनाभ ने लिखा है कि अंत में अल्लाउद्दीन खिलजी ने भायला पंवार नामक एक व्यक्ति को अपनी ओर फोड़ लिया तथा उसकी सहायता से दुर्ग में स्थित प्रमुख पेयजल स्रोत में गाय का रक्त एवं मांस मिलवा दिया। इससे दुर्ग में पेयजल की कमी हो गई। जब हिन्दू सैनिकों ने दुर्ग के तालाबों एवं झालरों में गाय के कटे हुए सिर पड़े देखे तो उन्होंने इन तालाबों एवं झालरों का पानी पीने से मना कर दिया। दुर्ग में पानी लाने का और कोई साधन नहीं था।

इस कारण राजा सातलदेव ने साका करने का निर्णय लिया। दुर्ग में स्थित स्त्रियों ने जौहर किया तथा हिन्दू सैनिक केसरिया बाना धारण करके, मुंह में तुलसीदल एवं गंगाजल लेकर, पगड़ी में भगवान कृष्ण का चित्र रखकर और हाथ में तलवार लेकर दुर्ग से बाहर आ गए। दोनों पक्षों के बीच हुए भयानक संघर्ष के बाद समस्त हिन्दू वीर रणक्षेत्र में ही कट मरे और दुर्ग पर अल्लाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया। स्वयं सातलदेव भी सम्मुख युद्ध में काम आया।

अमीर खुसरो ने लिखा है कि अंत में पाशेब पहाड़ी की चोटी तक पहुंच गया। तत्पश्चात् सुल्तान के आदेश से मुस्लिम सैनिक पाशेब से निकलकर किले के पशुओं पर टूट पड़े किंतु किले वाले किले से न भागे। यद्यपि उनके सिर टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। जो लोग भागे उनका पीछा किया गया और उन्हें पकड़ लिया गया। कुछ हिन्दुओं ने जालौर की तरफ भाग जाने का प्रयत्न किया किंतु वे भी बंदी बना लिए गए। 10 सितम्बर 1308 को प्रातःकाल सातलदेव का मृत शरीर शाही चौखट के सिंहों के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया गया।

इस विवरण से स्पष्ट है कि अमीर खुसरो ने हिन्दू सैनिकों के लिए घृणापूर्ण शब्दों का प्रयोग करते हुए उन्हें पशु लिखा है। यह वही अमीर खुसरो है जिसे भारत में हिन्दी भाषा के जनक एवं साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

कान्हड़दे प्रबंध में लिखा है कि जब सातलदेव का विशाल शरीर धरती पर गिर गया तब अल्लाउद्दीन खिलजी स्वयं उसके शव को देखने आया। उसे सातलदेव के शरीर के विशाल आकार को देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। अल्लाउद्दीन खिलजी ने दुर्ग को एक मुस्लिम गवर्नर के सुपुर्द कर दिया तथा दुर्ग का नाम खैराबाद रखा।

सिवाना दुर्ग को जीत लेने के बाद दिल्ली की सेना जालोर अभियान के लिए गई। यहाँ भी दुर्ग को जीतने में कई साल का समय लगा किंतु अंत में जालोर दुर्ग तुर्कों के अधीन हो गया जिसका वर्णन हम पहले ही कर चुके हैं।

उत्तर भारत पर अधिकार स्थापित कर लेने के उपरान्त अल्लाउद्दीन ने दक्षिण भारत पर अभियान आरम्भ किया परन्तु उत्तरी भारत की विजय स्थायी सिद्ध नहीं हुई। अल्लाउद्दीन के जीवन के अन्तिम भाग में राजपूताना में विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हो उठी और अनेक स्थानों में राजपूतों ने अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त कर लिया परन्तु राजपूत पूर्ववत् असंगठित ही बने रहे। वे तुर्की सल्तनत को उन्मूलित नहीं कर सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मलिक काफूर कर्ण बाघेला की पुत्री देवलदेवी को उठा लाया (110)

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मलिक काफूर कर्ण बाघेला की पुत्री देवलदेवी को उठा लाया

अल्लाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत के अभियानों की जिम्मेदारी अपने गुलाम मलिक काफूर को सौंपी जो खम्भात से खरीद कर लाया गया एक हिन्दू लड़का था और उसे खवासरा अर्थात् नपुंसक बनाकर एवं इस्लाम में परिवर्तित करके सुल्तान की सेवा में रखा गया था।

अल्लाउद्दीन खिलजी का सपना पूरे भारत पर अधिकार करने का था। दक्षिण भारत के राज्यों की विपुल सम्पत्ति अल्लाउद्दीन को आकृष्ट करती थी। उत्तर भारत के अभियानों के कारण सेना तथा शासन का व्यय बहुत बढ़ गया था। इसलिए अब उसने दक्षिण भारत के लिए अभियान की योजना बनाई।

अल्लाउद्दीन खिलजी यह देखकर हैरान था कि उत्तर भारत को जीतने में हुए व्यय की तुलना में इन राज्यों से धन की प्राप्ति बहुत कम हुई थी। इसकी पूर्ति दक्षिण के धन से हो सकती थी। इस समय तक अल्लाउद्दीन की सेना अत्यंत विशाल हो चुकी थी। इस कारण अल्लाउद्दीन चाहता था कि उसकी सेना किसी न किसी अभियान में संलग्न रहे ताकि सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह न कर सके। इन सब कारणों से उसने दक्षिण भारत के विरुद्ध अभियान आरम्भ किया।

दक्षिण भारत की भौगोलिक असुविधाओं तथा उत्तर भारत से दूरी के कारण अब तक कोई अन्य तुर्की सुल्तान दक्षिण भारत पर अभियान करने का साहस नहीं कर सका था। ई.1305 तक मारवाड़ के जालोर एवं सिवाना आदि छोटे राज्यों को छोड़कर लगभग शेष उत्तरी भारत के राज्यों को जीत लिया गया था। इसलिए ई.1306 में दक्षिण विजय का अभियान आरम्भ किया गया जो ई.1312 तक चलता रहा।

इस समय दक्षिण भारत में चार प्रमुख हिन्दू राज्य थे-

(1.) देवगिरी राज्य, इस पर यादवों का शासन था, इसकी राजधानी देवगिरि थी।

(2.) तेलंगाना राज्य जहाँ काकतीय वंश का शासन था, इसकी राजधानी वारांगल थी।

(3.) होयसल राज्य जहाँ होयसल वंश का शासन था, इसकी राजधानी द्वारसमुद्र थी।

(4.) मदुरा का राज्य जहाँ पांड्य वंश का शासन था, इसकी राजधानी मदुरा थी।

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हालांकि अल्लाउद्दीन खिलजी के दक्षिण अभियान की अवधि ई.1306 से 1312 मानी जाती है किंतु वारांगल का एक अभियान ई.1302 में ही कर लिया गया था। इस अभियान का नेतृत्व मरहूम नुसरत खाँ के भतीजे तथा वारिस छज्जू खाँ और गाजी मलिक के पुत्र जूना खाँ को दिया गया था।

यही जूना खाँ आगे चलकर मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से सुल्तान बना था। छज्जू खाँ और जूना खाँ बंगाल से उड़ीसा होते हुए तेलंगाना पहुंचे। उन दिनों तेलंगाना की राजधानी वारांगल थी जहाँ काकतीय वंश का राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) शासन करता था। मुसलमान इतिहासकारों ने उसे लदरदेव के नाम से पुकारा है। इस युद्ध में राजा प्रताप रुद्रदेव ने तुर्की सेना को परास्त कर दिया। इसलिए अनेक मुस्लिम इतिहासकारों ने इस युद्ध का उल्लेख नहीं किया है।

कुछ इतिहासकारों ने अल्लाउद्दीन को पराजय के कलंक से बचाने के लिए लिखा है कि इस अभियान के माध्यम से अल्लाउद्दीन खिलजी वारांगल को अपने राज्य में सम्मिलित नहीं करना चाहता था अपितु उसका लक्ष्य केवल धन प्राप्त करना था। इस प्रकार अल्लाउद्दीन खिलजी का दक्षिण भारत का प्रथम अभियान विफल हो गया।

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ई.1306 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने नए सिरे से दक्षिण भारत के लिए अभियान आरम्भ किए। अल्लाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत के अभियानों की जिम्मेदारी अपने गुलाम मलिक काफूर को सौंपी जो खम्भात से खरीद कर लाया गया एक हिन्दू लड़का था और उसे खवासरा अर्थात् नपुंसक बनाकर एवं इस्लाम में परिवर्तित करके सुल्तान की सेवा में रखा गया था। अल्लाउद्दीन ने मलिक काफूर को दक्षिण अभियान के लिए एक विशाल सेना प्रदान की। एक ही सेनापति को समस्त सैनिक अभियानों की जिम्मेदारी देना सुल्तान तथा सल्तनत दोनों के लिए खतरे की घण्टी थी। इतिहास स्वयं को दोहरा सकता था और जैसा छल अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने पूर्ववर्ती सुल्तान अपने ताऊ और श्वसुर जलालुद्दीन खिलजी के साथ किया था, ठीक वैसा ही व्यवहार स्वयं अल्लाउद्दीन के साथ मलिक काफूर द्वारा किया जा सकता था। कड़ा का गवर्नर रहते हुए अल्लाउद्दीन देवगिरि को जीतकर लूट चुका था। सुल्तान बनने के बाद अल्लाउद्दीन ने मलिक काफूर को फिर से देवगिरि के विरुद्ध अभियान पर भेजा। इसके दो प्रमुख कारण थे। पहला तो यह कि देवगिरि के राजा रामचन्द्र ने पूर्व में दिए गए अपने वचन के अनुसार दिल्ली को कर नहीं भेजा था और दूसरा यह कि रामचन्द्र ने गुजरात के राजा राय कर्ण बघेला तथा उसकी पुत्री देवल देवी को अपने यहाँ शरण दी थी।

अल्लाउद्दीन खिलजी देवलदेवी को प्राप्त करना चाहता था और देवगिरि पर फिर से अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता था। मलिक काफूर तथा अल्प खाँ की संयुक्त सेनाओं ने एलिचपुर पर अधिकार करके वहाँ तुर्की गवर्नर नियुक्त कर दिया। इसके बाद मलिक काफूर ने देवगिरि पर आक्रमण किया। राजा रामचंद्र यादव दो महीने तक बड़ी वीरता के साथ तुर्की सेना का सामना करता रहा परन्तु विशाल तुर्की सेना के समक्ष उसके पैर उखड़ गए। उसने आत्मसमर्पण कर दिया।

राजा कर्ण बघेला ने अपनी पुत्री देवलदेवी का विवाह राजा रामचंद्र के पुत्र शंकरदेव के साथ करना निश्चित किया था किंतु कर्ण बघेला और रामचंद्र, दोनों ही राजकुमारी देवलदेवी की रक्षा नहीं कर सके। राजकुमारी को विवाह मण्डप से उठा लिया गया।

मलिक काफूर ने राजकुमारी को बंदी बना लिया तथा सुल्तान के हरम में शामिल करने के उद्देश्य से दिल्ली ले गया। कुछ दिन बाद अल्लाउद्दीन खिलजी के शहजादे खिज्र खाँ से देवल देवी का विवाह कर दिया गया। इस प्रकार माता कमलावती अल्लाउद्दीन की बेगम बन गई तथा पुत्री देवल देवी शहजादे की बेगम बन गई।

मलिक काफूर ने सम्पूर्ण देवगिरि राज्य को उजाड़ दिया तथा राजमहलों से अपार धन एकत्रित किया। मलिक काफूर ने उस धन को यादव राजा रामचन्द्र के साथ अपने सैनिकों के संरक्षण में दिल्ली भेज दिया। राजा रामचंद्र ने इस बार भी सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी को अपार धन भेंट किया।

इससे प्रसन्न होकर अल्लाउद्दीन ने राजा रामचन्द्र के साथ अच्छा व्यवहार किया तथा उसे ‘राय रय्यन’ की उपाधि दी। इस कारण रामचन्द्र ने फिर कभी अल्लाउद्दीन के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया और न कभी अल्लाउद्दीन की सेनाओं ने देवगिरि पर पुनः अभियान किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

प्रताप रुद्रदेव ने मलिक काफूर को कोहीनूर हीरा दिया (111)

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प्रताप रुद्रदेव - www.bharatkaitihas.com
प्रताप रुद्रदेव ने मलिक काफूर को कोहीनूर हीरा दिया

ई.1310 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को वारांगल पर आक्रमण करने भेजा। अल्लाउद्दीन ने मलिक काफूर को आदेश दिया कि यदि प्रताप रुद्रदेव सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ले और अपना कोष, घोड़े तथा हाथी समर्पित करे तो उससे सन्धि कर ली जाये और उसका राज्य न छीना जाये। मलिक काफूर ने एक विशाल सेना के साथ दक्षिण के लिए प्रस्थान किया।

सबसे पहले वह देवगिरि गया। देवगिरि के यादव राजा रामचन्द्र ने मलिक काफूर की बड़ी सहायता की। देवगिरि से काफूर ने वारगंल के लिए प्रस्थान किया और वारगंल के दुर्ग पर घेरा डाल दिया। यह घेरा कई महीने चला। वारांगल नगर के चारों ओर दोहरा प्राकार अर्थात् परकोटा बना हुआ था।

इसमें से बाहर की दीवार मिट्टी की और भीतर की दीवार पत्थर की बनी हुई थी। वारांगल के सैनिक नगर की प्राचीर पर खड़े होकर मलिक काफूर की सेना पर तीर एवं पत्थर बरसाते थे। इस कारण मलिक काफूर नगर में प्रवेश नहीं कर सका।

इस पर मलिक काफूर ने वारांगल राज्य के अन्य नगरों की प्रजा को नष्ट करना आरम्भ किया। मलिक काफूर के सैनिक हजारों स्त्री-पुरुषों को पकड़कर वारांगल नगर के बाहर ले आए तथा उनका सिर काटने लगे। तुर्की सेना ने बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मार डाला तथा उनके घरों में आग लगाकर उनकी सम्पत्ति का विनाश किया।

जब वारांगल के राजा प्रताप रुद्रदेव को यह ज्ञात हुआ कि तुर्क केवल धन प्राप्त करने के लिए ऐसा विध्वंस मचा रहे हैं तब वह मलिक काफूर को धन देकर राज्य में शांति स्थापित करने के लिए तैयार हो गया।

जियाउद्दीन बरनी के कथनानुसार प्रताप रुद्रदेव ने तुर्कों को 300 हाथी, 7000 घोड़े, बहुत सा सोना-चाँदी तथा अनेक अमूल्य रत्न दिए। कुछ इतिहासकारों के अनुसार कोहीनूर हीरा भी मलिक काफूर को यहीं से मिला था। राजा प्रताप रुद्रदेव ने सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी को वार्षिक कर देना भी स्वीकार कर लिया। ई.1310 में मलिक काफूर पुनः देवगिरि तथा धारा होते हुए दिल्ली लौट गया। वारांगल विजय के बाद अल्लाउद्दीन ने द्वारसमुद्र पर आक्रमण की योजना बनाई।

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इन दिनों द्वारसमुद्र में होयसल राजा वीर वल्लभ (तृतीय) शासन कर रहा था उसे बल्लाल (तृतीय) भी कहते हैं। वह योग्य तथा प्रतापी शासक था। दुर्भाग्य से इन दिनों होयसल तथा यादव राजाओं में घातक प्रतिद्वन्द्विता चल रही थी और दोनों एक दूसरे को उन्मूलित करने का प्रयत्न कर रहे थे।

अल्लाउद्दीन ने इस स्थिति से लाभ उठाने के लिए ई.1311 में मलिक काफूर को द्वारसमुद्र पर आक्रमण करने भेजा। मलिक काफूर एक बार फिर से दिल्ली से रवाना होकर देवगिरि पहुंचा। इस समय तक राजा रामचंद्र का निधन हो चुका था और उसका पुत्र शंकरदेव देवगिरि का राजा था। मलिक काफूर ने शंकरदेव से कहा कि वह द्वारसमुद्र के अभियान में दिल्ली की सेना की सहायता करे। शंकरदेव ने ऐसा करने से मना कर दिया।

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इसलिए मलिक काफूर को शंकरदेव पर विश्वास नहीं रहा। अब वह आगे बढ़ने से घबराने लगा। न तो वह द्वारसमुद्र का अभियान किए बिना दिल्ली लौटकर जा सकता था और न शंकरदेव की ओर से निश्चिंत हुए बिना द्वारसमुद्र जा सकता था। इसलिए मलिक काफूर ने एक योजना बनाई। उसने गोदावरी के तट पर एक रक्षक-सेना स्थापित की ताकि जब मलिक काफूर द्वारसमुद्र में लड़ रहा हो तब शंकरदेव पीछे से आकर उस पर हमला न कर दे। मलिक काफूर ने गोदावरी नदी पर काफी समय व्यय किया ताकि आसपास के राजा निश्चिंत हो जाएं फिर अचानक ही तेजी से चलता हुआ द्वारसमुद्र पहुंच गया। द्वारसमुद्र के राजा बल्लाल होयसल को यह अनुमान नहीं था कि मलिक काफूर की विशाल सेना इतनी शीघ्रता से उसके राज्य में आ धमकेगी। इसलिए वह अचानक ही घेर लिया गया और तुर्की सेना के समक्ष नहीं टिक सका। उसने विवश होकर तुर्कों की अधीनता स्वीकार कर ली। मलिक काफूर ने द्वारसमुद्र के मन्दिरों की अपार सम्पत्ति को जी भर कर लूटा और इस अपार सम्पत्ति के साथ दिल्ली लौट गया। द्वारसमुद्र विजय के उपरान्त अल्लाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत में स्थित मदुरा राज्य पर आक्रमण की योजना बनाई जो दक्षिण प्रायद्वीप के अंतिम छोर पर स्थित था।

इन दिनों मदुरा में पांड्य-वंश शासन कर रहा था। दुर्भाग्यवश इन दिनों सुन्दर पांड्य तथा वीर पांड्य नामक दो राजकुमारों में घोर संघर्ष चल रहा था। इस संघर्ष में वीर पांड्य ने सुन्दर पांड्य को मार भगाया और स्वयं मदुरा का शासक बन गया।

निराश होकर सुन्दर पांड्य ने दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी से सहायता मांगी। अल्लाउद्दीन खिलजी ऐसे ही अवसर की खोज में था। उसने मलिक काफूर को विशाल सेना देकर मदुरा पर आक्रमण करने के लिए भेजा। मलिक काफूर ई.1311 में मदुरा पहुँच गया। काफूर के आने की सूचना पाकर वीर पांड्य राजधानी छोड़कर भाग गया। काफूर ने मदुरा के मन्दिरों को खूब लूटा और मूर्तियों को तोड़ डाला। ई.1311 में वह अपार सम्पत्ति लेकर दिल्ली लौट गया।

ई.1311 के बाद देवगिरि के राजा शंकरदेव ने दिल्ली के सुल्तान को कर देना बन्द कर दिया। शंकरदेव ने होयसल राजा के विरुद्ध भी मुसलमानों की सहायता करने से इन्कार कर दिया था। इसलिए अल्लाउद्दीन ने मलिक काफूर की अध्यक्षता में एक सेना शंकरदेव के विरुद्ध भेजी। दोनों पक्षों में रक्तरंजित युद्ध हुआ जिसमें राजा शंकरदेव पराजित हो गया और वीरगति को प्राप्त हुआ। ई.1315 में हरपालदेव को देवगिरि का शासन सौंपकर मलिक काफूर दिल्ली लौट गया।

इस प्रकार अल्लाउद्दीन ने केवल पांच साल की अवधि में दक्षिण भारत की सम्पूर्ण शक्तियों को अपने अधीन कर लिया। उसका यह कार्य किसी आश्चर्य से कम नहीं था। इस सफलता के कई कारण थे। हालांकि आधुनिक काल के अधिकांश इतिहासकारों ने अल्लाउद्दीन के दक्षिण भारत के अभियानों को पूर्णतः असफल घोषित किया है। इसके कारणों की चर्चा हम आगे करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति (112)

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अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति

अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति ने सिद्ध कर दिया कि केवल अनपढ़ ही शासन कर सकते हैं। उससे पहले दिल्ली का कोई भी सुल्तान इतना सफल सिद्ध नहीं हुआ था।

अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने देवगिरि, वारांगल, द्वारसमुद्र तथा मदुरा को जीतकर उन्हें खिलजी सल्तनत के अधीन कर लिया तथा खिलजी का साम्राज्य उत्तर में मुल्तान, लाहौर तथा दिल्ली से लेकर दक्षिण में द्वारसमुद्र तथा मदुरा तक, पूर्व में लखनौती तथा सौनार गाँव से लेकर पश्चिम में थट्टा तथा गुजरात तक विस्तृत हो गया था।

अल्लाउद्दीन की सफलता के कई कारण थे। उत्तर भारत, पश्चिमी भारत एवं दक्षिण भारत के अभियान में अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति अलग-अलग थी। उत्तर भारत के अभियानों में वह स्वयं युद्ध लड़ने गया जबकि दक्षिण भारत के अभियानों में उसने अपने सेनापतियों को भेजा।

वह जानता था कि भारतीय राजाओं में राष्ट्रीय गौरव एवं धार्मिक गौरव की बजाय निजी गौरव, कुलीय गौरव एवं जातीय गौरव की भावनाएं अधिक हैं। भारतीय राजा परस्पर संगठित होकर शत्रु का सामना करने के स्थान पर, अपने पड़ोसियों के विरुद्ध विदेशी शत्रु की सहायता करते थे।

अल्लाउद्दीन ने उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में भिन्न नीति का अनुसरण किया। उत्तर भारत के विजित राज्यों में अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति यह रही कि उसने मुस्लिम गवर्नरों की नियुक्तियां कीं जबकि विन्ध्य-पर्वत के उस पार के राज्यों को उसने अपने राज्य में नहीं मिलाया अपितु वहाँ के राजाओं की औरतों और धन को लूटकर राज्य उन्हीं के पास बने रहने दिए। दक्षिण भारत में अल्लाउद्दीन का एकमात्र लक्ष्य दक्षिण की विपुल सम्पत्ति को लूटना था। ताकि वह अपनी विशाल सेना का व्यय चला सके और अपने शासन को सुव्यवस्थित रख सके।

अल्लाउद्दीन जानता था कि सुदूर दक्षिण पर दिल्ली से शासन करना असंभव था। अतः उसने देवगिरि, तेलंगाना, द्वारसमुद्र तथा मदुरा पर विजय तो प्राप्त की परन्तु उन्हें अपने साम्राज्य में मिलाने का प्रयत्न नहीं किया। यह उल्लाउद्दीन खिलजी की नीति की बहुत बड़ी विशेषता रही।

अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली से अनुपस्थित रहने के दुष्परिणामों से परिचित था। उसे तुर्की अमीरों के विद्रोहों तथा मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था। इसलिए उसने राजधानी को कभी असुरक्षित नहीं छोड़ा तथा दक्षिण-विजय का कार्य अपने सेनापतियों को दिया। अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति अपनी राजधानी से दूर नहीं जाने की रही।

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यद्यपि सुल्तान अल्लाउद्दीन, मलिक काफूर पर विश्वास करता था और उसी को प्रत्येक बार प्रधान सेनापति बना कर भेजा करता था तथापि वह मलिक काफूर पर अपना पूरा नियन्त्रण रखने का प्रयास करता था। इसलिए मलिक काफूर के सम्बन्ध में अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति बिल्कुल अलग प्रकार की थी।

अल्लाउद्दीन खिलजी मलिक काफूर के साथ जूना खाँ एवं अल्प खाँ आदि अन्य अमीरों को भी भेजता था जिससे काफूर को विश्वासघात करने का अवसर न मिल सके। सुल्तान जब काफूर को दक्षिण भारत के अभियान पर भेजता था, तब वह उसे विस्तृत आदेश देता था। काफूर के लिए उन आदेशों की पालना करना अनिवार्य था।

दक्षिण में मिली अपार सफलताओं के उपरांत भी कुछ इतिहासकारों ने अल्लाउद्दीन के दक्षिण अभियानों को विफल माना है। उनके अनुसार वह दक्षिण भारत को अपने अधीन बनाए रखने में विफल रहा। केवल होयसल राज्य ने पराजय स्वीकार करके अल्लाउद्दीन से सहयोग किया किंतु देवगिरि तथा तेलंगाना ने कभी सहयोग तो कभी विरोध किया। पाण्ड्य राज्य ने तो अधीनता ही स्वीकार नहीं की। देवगिरि के राजा रामचंद्र देव के पुत्र शंकर देव ने दिल्ली को अनेक बार कर देने से मना किया। इस कारण मलिक काफूर को पुनः दक्षिण राज्यों के विरुद्ध अभियान पर भेजना पड़ा।

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कुछ इतिहासकारों के अनुसार दक्षिण भारत के सम्बन्ध में अल्लाउद्दीन की नीति सफल रही क्योंकि वह दक्षिण भारत को अपने प्रत्यक्ष शासन में नहीं रखना चाहता था, वह उन राज्यों से धन लूटने तथा उन्हें करद राज्य बनाकर उनसे कर वसूलना चाहता था। अपने इस उद्देश्य में वह पूरी तरह सफल रहा। अल्लाउद्दीन ने अपने राज्य की सुरक्षा एवं शासन दोनों की मजबूती के लिए सेना को प्रमुख आधार बनाया। उसने सेना को पूर्ववर्ती सुल्तानों की तुलना में अधिक वेतन दिया। सेना के सम्बन्ध में प्रत्येक निर्णय वह स्वयं लेता था तथा इस कार्य में सहायता के लिए उसने ‘आरिज-ए-मुमालिक’ नामक नवीन पद का सृजन किया। सेना में वही लोग भर्ती किये जाते थे जो घोड़े पर चढ़ना, अस्त्र-शस्त्र चलाना तथा युद्ध करना जानते थे। अल्लाउद्दीन ने सेना को व्यस्त एवं सक्रिय रखने के लिए हर समय किसी न किसी युद्ध में नियोजित करे रखा। शांतिकाल में वह सैनिकों को उनके शिविरों में नहीं रहने देता था अपितु उन्हें शिकार खेलने के लिए जंगलों में भेज देता था। अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना में घुड़सवार सैनिकों की प्रधानता थी। अतः सुल्तान ने अश्व-विभाग के सुधार पर विशेष रूप से ध्यान दिया। उसने बाहर से अच्छी नस्ल के घोड़ों को मंगवाया।

मंगोलों के परास्त होने पर सुल्तान को लूट में अच्छे घोड़े प्राप्त हो जाते थे। दक्षिण भारत के राजाओं को परास्त करके भी कुछ अच्छे घोड़े प्राप्त किये गए। राज्य ने अच्छी नस्ल के घोड़े उत्पन्न करने की भी व्यवस्था की।

सुल्तान ने घुड़सवार सैनिकों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया और प्रत्येक श्रेणी के सैनिकों का वेतन निश्चित कर दिया। पहली श्रेणी का सैनिक दो से अधिक घोड़े रखता था, दूसरी श्रेणी का सैनिक केवल दो घोड़े और तीसरी श्रेणी का सैनिक केवल एक घोड़ा रखता था। सैनिकों को जागीर देने की प्रथा हटा दी गई और उन्हें नकद वेतन दिया जाने लगा।

प्रायः लोग सैन्य-प्रदर्शन के समय अथवा रणक्षेत्र में घोड़े तथा सवार लाकर दिखा देते थे जबकि वे घोड़े तथा सवार वास्तव में युद्ध में भाग नहीं लेते थे। इस बेईमानी को रोकने के लिए सुल्तान ने सैनिकों का हुलिया लिखवाने की प्रथा चलाई। फलतः प्रत्येक सैनिक को एक रजिस्टर में अपना हुलिया लिखवाना पड़ता था। सैनिक सदैव अच्छे घोड़े नहीं रखते थे। सुल्तान ने घोड़ों को दागने की प्रथा चलाई जिससे सैनिक झूठे घोड़े दिखाकर सुल्तान को धोखा न दें।

सेना के सम्बन्ध में अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति अपने पूर्ववर्ती सुल्तानों से बिल्कुल अलग प्रकार की थी। अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली का पहला सुल्तान था जिसने स्थायी सेना की व्यवस्था की। यह सेना राज्य की सेवा के लिए सदैव राजधानी में उपस्थित रहती थी।

इस स्थायी सेना में चार लाख पचहत्तर हजार सैनिक होते थे। सुल्तान ने उन समस्त किलों की मरम्मत कराई जो मंगोलों के मार्गों में पड़ते थे। उसने बहुत से नये दुर्ग भी बनवाये। इन किलों में उसने योग्य तथा अनुभवी सेनापतियों की अध्यक्षता में सुसज्जित सेनायें रखीं।

इस प्रकार अल्लाउद्दीन खिलजी ने परम्परागत सैनिक शासन की अनेक पुरानी व्यवस्थाएं छोड़कर नई व्यवस्थाएं अपनाईं। सेना को अत्यंत विशाल बना दिया तथा उसे हर समय व्यस्त रखा। अल्लाउद्दीन ने इस विशाल सेना को उच्च वेतन दिया तथा उसके लिए धन की नियमित आवक सुनिश्चित की। सेना में पैदलों की बजाय घुड़सवारों तथा अनियमित सैनिकों की बजाय नियमित सैनिकों की व्यवस्था की।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने तुर्की अमीरों पर अपनी निर्भरता कम कर दी तथा उसके स्थान पर भारतीय मूल के ख्वाजासरा को राज्य का नायब एवं सेनापति बनाकर उसे विजय प्राप्त करने का अवसर दिया ताकि तुर्की अमीरों का घमण्ड तोड़ा जा सके।

इस प्रकार अल्लाउद्दीन खिलजी ने यह सिद्ध कर दिया कि उच्च वंशीय पढ़े-लिखे तुर्की अमीरों की बजाय अनपढ़ लोग बेहतर शासन कर सकते हैं। अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति ही उसकी सफलताओं एवं विफलताओं की मुख्य कारक रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खिलजी का बाजार प्रबन्धन (113)

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खिलजी का बाजार प्रबन्धन

दिल्ली के सुल्तानों के लिए बाजार प्रबन्धन शासन का कोई आधार ही नहीं था किंतु खिलजी का बाजार प्रबन्धन दिल्ली सल्तनत शासन में एक नवीन घटना थी। इसका अध्ययन दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों एवं इतिहासकारों के लिए कौतूहल का विषय है।

नितांत अनपढ़ होने के उपरांत भी सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन के आधार को मजबूत बनाया तथा एक विशाल सेना को नियंत्रण में रखने के लिए समुचित उपाय किए। अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा आंतरिक प्रशासन में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। खिलजी का बाजार प्रबन्धन भी उन्हीं में से एक था।

अल्लाउद्दीन ने सल्तनत में घूसखोरी तथा अनैतिक तरीके से धन-संग्रहण की प्रवृत्ति को रोकने के लिए बाजारों में मूल्य नियंत्रण के कठोर उपाय किये। खिलजी का बाजार प्रबन्धन उन वस्तुओं की विस्तृत सूचि पर आधारित था जो बाजार में बिकने आती थीं और जिन वस्तुओं की उसके सैनिकों को प्रतिदिन आवश्यकता पड़ती थी। इन सब वस्तुओं के मूल्य निश्चित कर दिए गए। इन वस्तुओं को कोई भी दुकानदार निर्धारित मूल्य से अधिक मूल्य पर नहीं बेच सकता था। 

सुल्तान ने बाजार में वस्तुओं की माँग तथा पूर्ति में संतुलन बनाने के लिए मुक्त-बाजार के साथ-साथ राज्य की ओर से भी व्यवस्था की। आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति का उत्तरदायित्व सरकार ने अपने ऊपर ले लिया। जो वस्तुएँ शासन स्वयं उत्पन्न कर सकता था, उनके उत्पादन की व्यवस्था की गई। जो वस्तुएं दूरस्थ प्रान्तों से मँगवाई जाती थीं, वे वहाँ से मँगवाई जाने लगीं और जो वस्तुएँ देश में नहीं मिल सकती थीं, वे विदेशों से मँगवाई जाने लगीं।

वस्तुओं की आपूर्ति व्यवस्था के साथ-साथ उनके बाजारों में वितरण की भी समुचित व्यवस्था की गई। यह व्यवस्था खिलजी का बाजार प्रबन्धन की प्रमुख विशेषता थी। दिल्ली में तीन बाजारों की व्यवस्था की गई। एक बाजार सराय अदल कहलाता था, दूसरा शहना-ए-मण्डी कहलाता था और तीसरे बाजार का नाम अब उपलब्ध नहीं है। तीनों बाजारों में भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुएँ प्राप्त होती थीं। प्रत्येक नियन्त्रित दुकान को उतनी ही मात्रा में वस्तुएँ दी जाती थीं जितनी उस दुकान के उपभोक्ताओं की मांग होती थी।

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अल्लाउद्दीन खिलजी ने बाजार में कई श्रेणियों के अधिकारी नियुक्त किये और उन्हें आदेश दिए कि वे बाजारों पर कड़ा नियंत्रण रखें। इस व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी दीवाने रियासत कहलाता था। उसे तीनों बाजारों पर नियन्त्रण रखना पड़ता था। दीवाने रियासत के नीचे प्रत्येक बाजार में तीन पदाधिकारी नियुक्त किये गए थे।

पहला पदाधिकारी शाहनाह अर्थात् निरीक्षक, दूसरा बरीद-ए-मण्डी अर्थात् लेखक और तीसरा मुन्हीयान अर्थात् गुप्तचर कहलाता था। इस प्रकार खिलजी का बाजार प्रबन्धन गुप्तचरों की रिपोर्टों के आधार पर होता था।

शाहनाह भी खिलजी का बाजार प्रबन्धन करता था। वह बाजार के सामान्य कार्यों को देखता था, बरीद घूम-घूम कर बाजार का नियन्त्रण करता था और मुन्हीयान गुप्त एजेन्ट अथवा कारदार होता था। बरीद बाजार की पूरी सूचना शाहनाह के पास, शाहनाह इस सूचना को दीवाने रियासत के पास और दीवाने रियासत सुल्तान के पास भेज देता था।

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मुन्हीयान को सुल्तान स्वयम् नियुक्त करता था। वह बाजार की अपनी अलग रिपोर्ट तैयार करके सीधे ही सदर दफ्तर में भेजता था। यदि उसकी तथा अन्य पदाधिकारियों की रिपोर्ट में कुछ अन्तर पड़ता था तो गलत रिपोर्ट देने वाले को कठोर दण्ड दिया जाता था। सुल्तान उन लोगों को बड़े कठोर दण्ड देता था जो बईमानी करते थे और त्रुटियुक्त बाट रखते थे। कहा जाता है कि जो व्यापारी जितना कम तोलता था, उतना ही मांस उसके शरीर से काटने के निर्देश दिए गए थे परन्तु कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिलता जब इस नियम को कार्यान्वित किया गया हो। सुल्तान की ओर से कपड़ों का भी मूल्य निर्धारित किया गया परन्तु इस मूल्य पर कपड़ा बेचने में व्यापारियों को हानि होने की सम्भावना थी। इसलिए व्यापारियों में कपड़े की दूकानों का अनुज्ञापत्र लेने का साहस नहीं होता था। इसलिए सुल्तान ने कपड़े का व्यापार मुल्तानी व्यापारियों को सौंप दिया। इन व्यापारियों को कपड़ा खरीदने के लिए राजकोष से धन मिलता था और कपड़ा बिक जाने पर इन्हें निर्धारित कमीशन दिया जाता था। सुल्तान ने पशुओं के क्रय-विक्रय पर भी राज्य का पूरा नियन्त्रण रखा और उनका मूल्य निर्धारित कर दिया। प्रथम श्रेणी के घोड़ों का मूल्य 100 से 120 टंक, दूसरी श्रेणी के घोड़ों का 80 टंक और तीसरी श्रेणी के घोड़ों का 65 से 70 टंक निश्चित किया गया।

टट्टुओं का मूल्य 10 से 25 टंक निश्चित किया गया। दूध देने वाली गाय का मूल्य तीन-चार टंक और बकरियों का मूल्य 10 से 14 जीतल निश्चित किया गया।

बाजार की अन्य वस्तुओं की तरह गुलामों तथा वेश्याओं का भी मूल्य निश्चित किया गया। गुलामों का मूल्य 5 से 12 टंक तथा वेश्या का मूल्य 20 से 40 टंक निश्चित किया गया। कुछ उत्तम गुलामों के दाम 100 से 200 टंक हुआ करते थे। बड़े सुन्दर गुलाम लड़के 20 से 30 टंक में खरीदे जा सकते थे। गुलाम नौकरानियों का मूल्य 10 से 15 टंक हुआ करता था। घर में कामों के लिए गुलाम 7 से 8 टंक में खरीदे जा सकते थे।

तत्कालीन मुस्लिम लेखकों द्वारा दी गई इस मूल्य सूचि के आधार पर कहा जा सकता है कि अधिकतर वस्तुओं के भाव मन-माने तरीके से निर्धारित किए गए थे। इंसानों की बजाय पशु महंगे थे। एक घोड़े के मूल्य में पांच से छः वेश्याएं मिल सकती थीं जबकि एक घोड़े के मूल्य में 20-22 गुलाम मिल सकते थे। मर्द-वेश्या के रूप में प्रयुक्त होने वाले एक गुलाम लड़के के मूल्य में चार-पांच गुलाम खरीदे जा सकते थे। एक घोड़े के मूल्य में 30-40 दुधारू गायें मिल सकती थीं।

घोड़ों का इतना अधिक मूल्य उनके सैन्य उपयोग के कारण था। वास्तव में देखा जाए तो ये घोड़े ही अल्लाउद्दीन खिलजी की सल्तनत की वास्तविक शक्ति थे, यही शासन का आधार थे और यही घोड़े अल्लाउद्दीन की सम्पूर्ण सेना का निर्माण करते थे।

बाजार के इन सुधारों का परिणाम यह हुआ कि आवश्यक वस्तुएं कम मूूल्य पर मिलने लगीं। सैनिकों के लिए यह संभव हो गया कि वे कम वेतन में भी सुखमय जीवन व्यतीत कर सकें और अपने परिवार का ठीक से पालन कर सकें।

सुल्तान ने बाजार से दलालों को निकाल दिया तथा उनके नेताओं को कठोर दण्ड दिया। दलालों को बाजार से हटा देने से समस्त चीजों के मूल्य राज्य द्वारा निर्धारित स्तर पर बने रहे तथा बाजार से कालाबाजारी जैसी हरकतें समाप्त हो गईं।

डॉ. के. एस. लाल ने सिद्ध किया है कि भी खिलजी का बाजार प्रबन्धन केवल राजधानी तथा उसके आसपास तक ही सीमित था। डॉ. लाल के अनुसार उसकी सफलता भावों को कम करने में उतनी नहीं है जितनी कि एक लम्बे समय तक भावों को नियंत्रण में रखने में है। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि सुल्तान की मृत्युपर्यंत वस्तुओं के भाव एक जैसे बने रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू प्रजा पर अत्याचार किया अल्लाउद्दीन खिलजी ने (114)

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हिन्दू प्रजा पर अत्याचार किया अल्लाउद्दीन खिलजी ने

अल्लाउद्दीन खिलजी ने मुल्लाओं की सलाह पर हिन्दू प्रजा पर अत्याचार किया तथा हिन्दुओं की सम्पत्ति छीनकर उन्हें गरीब बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपनी सम्पत्ति की रक्षा करने के लिए हिन्दुओं के सामने केवल यही एक रास्ता बचा था कि वे मुसलमान बन जाएं।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली सल्तनत के शासन में बड़े परिवर्तन करते हुए बाजारों में मूल्य-नियंत्रण का अनोखा उपाय अपनाया। उसने बाजार में सामान की आपूर्ति तथा मूल्य का निर्धारण करके दलालों की भूमिका को पूरी तरह समाप्त कर दिया। हालांकि उसकी यह बाजार व्यवस्था सम्पूर्ण दिल्ली सल्तनत में लागू नहीं हुई थी, यह व्यवस्था केवल दिल्ली एवं उसके आसपास के बड़े नगरों के बाजारों में लागू की गई थी।

अल्लाउद्दीन खिलजी अमीरों एवं जनता की व्यक्तिगत सम्पत्ति को आन्तरिक उपद्रवों का कारण समझता था। इसलिए उसने बहुत से अमीरों एवं बहुत सी जनता की व्यक्तिगत सम्पत्ति को उन्मूलित करके उस सम्पत्ति को राजकीय कोष में जमा कर लिया। इस कार्य के लिए उसने साधारण जनता से लेकर अमीरों तक पर अत्याचार किये तथा उनकी हत्याएं करवाईं।

मुसलमानों को मिल्क, इनाम, इशरत (पेंशन) तथा वक्फ (दान) के रूप में जो भूमि प्राप्त थी, उसका सुल्तान ने अपहरण कर लिया। इस प्रकार की कुछ भूमि फिर भी बची रह गई थी परन्तु अधिकांश भूमि छीन ली गई थी।

सुल्तान ने सैनिकों को जागीर देने की प्रथा बन्द करके नकद वेतन देने की व्यवस्था की। इससे सैनिक परिवार की स्थाई आय समाप्त हो गई किंतु राज्य की आय में वृद्धि हो गई। सरकार ने सम्पूर्ण भूमि का खालसा भूमि में परिवर्तन कर दिया। खालसा भूमि उसे कहते थे जो सीधे केन्द्र सरकार के अधिकार में होती थी। चूंकि अल्लाउद्दीन ने जागीरदारी प्रथा हटा दी, इसलिए अब समस्त भूमि सीधे सरकार के नियन्त्रण में आ गई और खालसा भूमि बन गई।

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सुल्तान ने सम्पूर्ण भूमि की नाप करवा कर सरकारी लगान निश्चित कर दिया। जितनी उपजाऊ भूमि होती थी, उसी के हिसाब से लगान देना पड़ता था। वह दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जिसने भूमि की पैमाइश करवाकर लगान वसूल करना आरम्भ किया। इसके लिए एक बिस्वा को इकाई माना गया। अल्लाउद्दीन खिलजी लगान को गल्ले के रूप में लेना पसंद करता था। लगान का निर्धारण तीन प्रकार से किया जाता था।

लगान की गणना के पहले प्रकार को कनकूत कहा जाता था जिसका अर्थ यह था कि जब फसल खड़ी हो तभी लगान का अनुमान लगा लिया जाए। लगान की गणना का दूसरा आधार बटाई था। इसका तात्पर्य यह था कि अनाज तैयार हो जाने पर सरकार का हिस्सा निश्चित करके ले लिया जाए।

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लगान निर्धारण के तीसरे प्रकार को लंकबटाई कहा जाता था जिसका तात्पर्य यह था कि फसल तैयार हो जाने पर बिना पीटे ही सरकारी हिस्सा ले लिया जाए। अल्लाउद्दीन खिलजी ने हिन्दू प्रजा पर अत्याचार करने के लिए किसानों पर कर बढ़ा दिए। खिलजी के शासनकाल में किसान की फसल में से 50 प्रतिशत हिस्सा राज्य का होता था। किसानों को चारागाह तथा मकान का भी कर देना पड़ता था। कुछ विद्वानों की यह धारणा है कि इतना अधिक कर केवल दो-आब में लिया जाता था जहाँ की भूमि अधिक उपजाऊ थी और लोग अधिक विद्रोह करते थे। यद्यपि सुल्तान ने लगान वसूली के लिए सैनिक अधिकारी नियुक्त कर दिए थे तथापि वह पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह नष्ट नहीं कर सका था। अधिकांश क्षेत्रों में लगान वसूली का कार्य अब भी हिन्दू मुकद्दम, खुत तथा चौधरी करते थे जिन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे। हिन्दू प्रजा पर अत्याचार करने के लिए सुल्तान ने उनके समस्त विशेषाधिकारों को समाप्त करके उनका वेतन निश्चित कर दिया। खुत तथा बलहर अर्थात् हिन्दू जमींदारों को नष्ट नहीं किया गया परन्तु उन पर इतना अधिक कर लगाया गया कि वे निर्धन हो गए और कभी भी राज्य के विरुद्ध सिर नहीं उठा सके।

हिन्दू प्रजा पर अत्याचार करने के लिए दो-आब के किसानों से लगान के रूप में अनाज लिया जाता था। उस अनाज को जमा करने के लिए सरकारी बखार होते थे। इन बखारों में इतना अधिक अनाज जमा होता था कि अकाल के समय सेना के लिए पर्याप्त होता था।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने बकाया कर वसूलने के लिए दीवान-ए-मुस्तखराज नामक विभाग की स्थापना की। उसने सम्पूर्ण साम्राज्य को कई भागों में विभक्त करके प्रत्येक भाग को एक सैन्य-अधिकारी के अनुशासन में रख दिया। यह सैन्य-अधिकारी जनता से मालगुजारी वसूल करता था और जितनी सेना उसके सुपुर्द की जाती थी, उसका व्यय निकालने के उपरान्त शेष धन राजकोष में भेज देता था।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने हिन्दू प्रजा पर अत्याचार करने के लिए उन्हें निर्धन बनाने का प्रयत्न किया जिससे वे विद्रोह की कल्पना तक नहीं कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सुल्तान ने कई कदम उठाये। गंगा-यमुना के दो-आब का क्षेत्र बड़ा ही उपजाऊ प्रदेश था और वहाँ के हिन्दू प्रायः विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देते थे।

अतः सुल्तान ने दो-आब के क्षेत्र में उपज का 50 प्रतिशत मालगुजारी के रूप में वसूल करने की आज्ञा दी। हिन्दुओं को जजिया, चुंगी तथा अन्य कर भी पूर्ववत् देने पड़ते थे। चौधरी और मुकद्दम लोगों को घोड़ों पर चढ़ने, हथियार रखने, अच्छे वस्त्र पहनने, पान खाने से मनाही कर दी गई। इस प्रकार हिन्दुओं की समस्त सुविधाएँ छीन ली गईं और उनके साथ बड़ी क्रूरता का व्यवहार किया गया।

इन उपायों से राजकीय आय में भारी वृद्धि हो गई किंतु जनता पर करों का बोझ बढ़ गया। करों का अधिकांश बोझ हिन्दुओं पर ही पड़ा जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि था और जिन्हें भूमि-लगान के अतिरिक्त कई प्रकार के कर देने पड़ते थे।

आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि राज्य में हिन्दुओं की स्थिति क्या होनी चाहिए, इस विषय में अल्लाउद्दीन खिलजी ने बयाना के काजी मुगीसुद्दीन की सलाह ली। काजी ने सुल्तान को सलाह दी कि-

‘शरा में हिन्दुओं को खराज-गुजर अर्थात् कर देने वाला कहा गया है और जब कोई माल का अफसर अर्थात् कर-अधिकारी किसी हिन्दू से चांदी मांगे तो उसका कर्तव्य है कि बिना किसी पूछताछ के और बड़ी नम्रता के साथ कर अधिकारी को सोना दे दे।

यदि अफसर उसके मुंह में धूल फैंके तो उसे लेने के लिए बिना हिचकिचाहट उसे अपना मुंह खोल देना चाहिए। इस प्रकार अपमानजनक कार्यों में ‘जिम्मी’ इस्लाम के प्रति अपनी आज्ञापालन की भावना का प्रदर्शन करता है। ईश्वर ने स्वयं उन्हें अपमानित करने की आज्ञा दी है

….. अल्लाह के दूत ने हमें काफिरों का वध करने, उन्हें लूटने तथा बंदी बनाने का आदेश दिया है …… महान इमाम अबू हनीफा ने जिसके धर्म का हम अनुसरण करते हें, हिन्दुओं पर जजिया लगाने की अनुमति दी है। अन्य इस्लामी धर्माधीशों के अनुसार हिन्दुओं के लिए नियम है कि वे मृत्यु अथवा इस्लाम में से एक का वरण करें।’

अल्लाउद्दीन ने काजी की सलाह का हृदय से स्वागत किया। वह अपने राज्य की बहुसंख्यक हिन्दू जनता के प्रति इसी नीति का अनुसरण करता आया था। इसलिए काजी की राय सुनकर उसे प्रसन्नता हुई। हिन्दू प्रजा पर अत्याचार करने के लिए वह नए-नए उपाय खोजने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुर्की अमीरों का दमन (115)

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तुर्की अमीरों का दमन

अल्लाउद्दीन खिलजी ने तुर्की अमीरों का दमन करने के लिए उनकी शराब और वेश्याएं छीन लीं। तुर्की अमीर न तो शराब के बिना रह सकते थे और न वेश्याओं के बिना। इसलिए वे सुल्तान के विरुद्ध हो गए किंतु सुल्तान की शक्ति के कारण खुलकर बगावत नहीं कर सके।

सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने एक ओर तो मुस्लिम अमीरों एवं जनता की निजी सम्पत्ति छीन ली तथा दूसरी ओर हिन्दू जमींदारों की भूमि को खालसा घोषित करके उन्हें निर्धनता के गर्त में धकेल दिया। अल्लाउद्दीन खिलजी ने किसानों पर पचास प्रतिशत मालगुजारी लगाकर, व्यापारियों पर चुंगी लगाकर एवं समस्त हिंदुओं पर जजिया तथा तीर्थकर आदि लगाकर उनका धन छीन लिया।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने उन सैनिकों का भी भला नहीं किया जिनके बल पर वह अपने राज्य का विस्तार कर रहा था और भारत भर के हिन्दू राजाओं को लूटकर अपना खजाना भर रहा था। उसने सैनिकों को राज्य की ओर से दी गई समस्त प्रकार की भूमि छीनकर उन्हें विशुद्ध वेतन पर नौकरी प्रदान की।

अल्लाउद्दीन खिलजी जानता था कि तुर्की अमीर तो विद्रोही प्रकृति के थे ही किंतु गैर-तुर्की अमीर भी कुछ कम बदमाश नहीं थे। वे सब अपने-अपने गुट बनाकर सुल्तान को वश में करने के लिए षड़यंत्र एवं विद्रोह रचते रहते थे। अल्लाउद्दीन खिलजी की स्वेच्छाचारिता तथा निरंकुशता की नीति से बहुत से तुर्की एवं गैर-तुर्की अमीरों में उसके विरुद्ध अत्यधिक असन्तोष पनप गया।

उस काल में दिल्ली में हाजी मौला नामक एक असन्तुष्ट अधिकारी रहता था। वह काजी अलाउलमुल्क की मृत्यु के उपरान्त दिल्ली का कोतवाल बनना चाहता था। उसने अल्लाउद्दीन खिलजी के समक्ष अपनी इच्छा व्यक्त की परन्तु अल्लाउद्दीन खिलजी ने तमर्दी नामक एक अन्य अधिकारी को दिल्ली का कोतवाल बना दिया।

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सुल्तान के इस निर्णय से हाजी मौला को बड़ी निराशा हुई और वह सुल्तान के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगा। जब सुल्तान रणथम्भौर के घेरे के दौरान सकंटापन्न स्थिति में था, तब हाजी मौला ने दिल्ली के कोतवाल तमर्दी की हत्या करके राजकोष पर अधिकार कर लिया।

इस पर अल्लाउद्दीन ने उलूग खाँ को उसका दमन करने के लिए भेजा परन्तु उसके दिल्ली पहुँचने के पहले ही हमीदुद्दीन नामक एक सैनिक ने हाजी मौला की हत्या कर दी। अल्लाउद्दीन खिलजी के आदेश से हाजी मौला के समस्त सम्बन्धियों तथा समर्थकों की भी निर्दयता पूर्वक हत्या कर दी गई ताकि भविष्य में फिर कभी कोई व्यक्ति सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह करने की न सोचे।

पाठकों को स्मरण होगा कि अल्लाउद्दीन ने जलाली अमीरों को तो पहले ही नष्ट कर दिया था जिन्होंने धन अथवा पद के प्रलोभन से विरोधियों का साथ दिया था। उनकी सम्पत्ति छीनकर उनकी आँखें निकलवा ली थीं और उन्हें जेल में बंद कर दिया था। अब सुल्तान ने अन्य विरोधी अमीरों को उन्मूलित करने के लिए अनेक उच्च पदाधिकारियों तथा उनके सम्बन्धियों को विष दिलवा कर मरवा दिया।

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अल्लाउद्दीन ने अनुभव किया कि सल्तनत का गुप्तचर विभाग ढंग से कार्य नहीं कर रहा है। इस कारण सुल्तान को समय रहते षड़यंत्रों तथा साम्राज्य के विभिन्न भागों में घटने वाली घटनाओं की जानकारी नहीं मिल पाती। इसलिए सुल्तान ने गुप्तचर-विभाग का नए सिरे से संगठन किया। गुप्तचरों को अमीरों तथा राज्याधिकारियों के घरों, कार्यालयों, नगरों तथा गाँवों में नियुक्त किया गया। इससे अमीरों के बारे में छोटी से छोटी सूचना सुल्तान तक पहुँचने लगी। इसका परिणाम यह हुआ कि अमीरों, राज्याधिकारियों तथा साधारण लोगों की गुप्त बैठकें समाप्त हो गईं। अल्लाउद्दीन ने यह भी अनुभव किया कि सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह का एक बड़ा कारण अमीरों की मद्यपान गोष्ठियों में होने वाली चर्चाएं हैं। इन गोष्ठियों में सुल्तान तथा अन्य अमीरों के विरुद्ध षड्यन्त्र रचे जाते थे। अतः अमीरों द्वारा किए जाने वाले मद्यपान को रोकना आवश्यक समझा गया। अल्लाउद्दीन ने स्वयं मद्यपान त्याग दिया और अन्य लोगों को भी शराब पीने से रोक दिया। अल्लाउद्दीन ने शराब पीने के अपने बहुमूल्य बर्तन तुड़वा दिए और आज्ञा दी कि दिल्ली में जितनी शराब है वह सड़कों पर फैंक दी जाये। सुल्तान की आज्ञा का पालन किया गया और दिल्ली की सड़क शराब से भर गयी।

सुल्तान ने यह भी आज्ञा दी कि यदि कोई व्यक्ति मद्यपान किये हुए मिले तो उसे दिल्ली के बाहर एक गड्ढे में फिंकवा दिया जाय। सुल्तान की आज्ञा का उल्लंघन करने वालों को कठोर दण्ड देने की व्यवस्था की गई।

अमीरों के परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध एवं दावतें भी विद्रोहों का कारण समझी गईं। इनके माध्यमों से अमीरों को धड़ेबंदी करने एवं सुल्तान के विरुद्ध संगठित होने का अवसर मिलता था। इस कारण जब कभी किसी एक अमीर के विरुद्ध कार्यवाही की जाती थी, तब उस गुट के अन्य अमीर भी विद्रोह पर उतर आते थे।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने तुर्की अमीरों का दमन करने के लिए अमीरों की दावतें बन्द करवा दीं और उन्हें एक-दूसरे के यहाँ आने-जाने तथा दावत करने से मना कर दिया। बिना सुल्तान की आज्ञा के अमीर लोग परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध भी नहीं स्थापित कर सकते थे। इससे अमीरों के गुट धीरे-धीरे समाप्त होने लगे।

अल्लाउद्दीन के पूर्ववर्ती सुल्तानों की कमजोरी एवं उनकी हत्याओं के सिलसिले का लाभ उठाकर कुछ अमीरों ने अत्यधिक धन एकत्रित कर लिया था। इस धन का उपयोग सुल्तान के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने में होता था। धन कमाने की चिंता नहीं होने के कारण अमीरों को विद्रोहों के बारे में सोचने का अवकाश प्राप्त हो जाता था।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने तुर्की अमीरों का दमन करने के लिए उन पर तरह-तरह के आरोप लगाकर धनी अमीरों की सम्पत्ति को छीनना आरम्भ किया जो उन लोगों को जागीर, इनाम अथवा दान के रूप में प्राप्त हुई थी। बहुत से लोगों की पेन्शनें छीन ली गईं। जिन्हें कर-मुक्त भूमि मिली थी, उनकी भूमि पर फिर से कर लगा दिया गया। इससे सुल्तान को पर्याप्त धन मिल गया और अमीरों की समृद्धि पर अंकुश लग गया। इस कारण वेश्याओं के अड्डे उजड़ गए। नाच-गाने और मुजरे बंद हो गए।

अल्लाउद्दीन ने अनुभव किया कि दिल्ली से दूर स्थित प्रांतीय एवं स्थानीय शासकों पर सुल्तान का प्रत्यक्ष नियन्त्रण नहीं होने से, उन्हें भी दिल्ली के अमीरों की भांति धन एकत्रित करने तथा उसकी सहायता से विद्रोह करने का अवसर प्राप्त हो जाता था। इसलिए अल्लाउद्दीन खिलजी ने प्रांतीय सेनाओं पर अपना सीधा नियन्त्रण स्थापित करके प्रांतपतियों की शक्ति को कम करने का प्रयत्न किया।

अल्लाउद्दीन ने प्रान्तों में रहने वाली सेना की नियुक्ति तथा सैनिकों का नियन्त्रण, स्थानान्तरण, पद-वृद्धि आदि सारे कार्य अपने हाथ में ले लिये। उसने इस बात पर जोर दिया कि प्रान्तपति निर्धारित संख्या में सैनिक रखें तथा उन्हें पूरा वेतन दें। इस प्रकार तुर्की अमीरों का दमन करने के पश्चात् किए गए इन उपायों से प्रांतपतियों पर भी सुल्तान का नियंत्रण स्थापित हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी का दण्डविधान (116)

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अल्लाउद्दीन खिलजी का दण्डविधान

अल्लाउद्दीन खिलजी का दण्डविधान बहुत कठोर था। वह मामूली अपराध के संदेह में हाथ-पैर कटवा देता था। अपराधी को सरेआम कोड़े लगवाने से लेकर फांसी पर चढ़ाना उसके दण्डविधान के अनिवार्य अंग थे।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने तुर्की एवं गैर-तुर्की अमीरों की सम्पत्तियां छीनकर उन्हें इतना कमजोर कर दिया कि अब वे सुल्तान के विरुद्ध न तो कोई गुट बना सकते थे और न विद्रोह कर सकते थे। इस उपाय से चालीसा मण्डल का बचा-खुचा प्रभाव भी नष्ट हो गया तथा सल्तनत में सुल्तान अकेला ही सर्वोच्च अधिकारी के रूप में प्रतिष्ठिति हो गया। हालांकि दिल्ली सल्तनत ई.1293 से ही अस्तित्व में आ गई थी किंतु सुल्तान की अबाध निरंकुशता अल्लाउद्दीन खिलजी के शासन काल में आकर स्थापित हुई।

दिल्ली सल्तनत में अपनाई गई अब तक की शासन पद्धति में सुल्तान का जनता से प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं था। इसके कारण जनता, विशेषकर हिन्दू जनता, सुल्तान की ओर से उदासीन बनी रहती थी और स्थानीय लोगों के भड़कावे में आकर सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देती थी। इस कारण अल्लाउद्दीन खिलजी ने न्याय व्यवस्था एवं दण्ड विधान में भी आमूलचूल परिवर्तन किए।

अल्लाउद्दीन खिलजी का दण्डविधान अत्यन्त कठोर था। उसके राज्य में अपराधी तथा उसके साथियों और सम्बन्धियों को बिना किसी प्रमाण के केवल सन्देह के कारण मृत्यु-दण्ड दिया जाता था। अपराधियों को प्रायः अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था। कठोर दण्ड विधान से जनता में शासन के प्रति भय बैठ गया। लोग अपराध करने, बगावत करने तथा विवाद में पड़ने से डरने लगे।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपनी मुस्लिम प्रजा के लिए न्याय की समुचित व्यवस्था की। हिन्दुओं के झगड़ों का न्याय भी मुस्लिम काजियों द्वारा किया जाता था किंतु हिन्दुओं के झगड़ों का निबटारा अलग प्रकर से किया जाता था। मुसलमान प्रजा की बजाय हिन्दुओं पर अधिक कड़े दण्ड लगाये जाते थे तथा अधिक कड़ी शारीरिक यातानाएं दी जाती थीं। इस प्रकार अल्लाउद्दीन खिलजी का दण्डविधान हिन्दुओं एवं मुसलमानों के लिए अलग-अलग था।

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सरे आम कोड़े मारना, भूखे-प्यास इंसानों को खम्भे से बांधकर कई दिनों तक धूप में पटके रखना, जूतों से पिटवाना, स्त्री एवं पुत्री को छीन लेना, सम्पत्ति जब्त कर लेना, घर में आग लगवा देना उस काल के दण्ड विधान के अनिवार्य अंग थे। अल्लाउद्दीन से पहले, दिल्ली सल्तनत की न्याय व्यवस्था, मुस्लिम धर्मग्रन्थों पर आधारित थी परन्तु अल्लाउद्दीन ने उसे लौकिक स्वरूप प्रदान किया। उसने इस्लाम की उपेक्षा नहीं की परन्तु उसने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया कि परिस्थिति तथा लोक कल्याण के विचार से जो नियम उपयुक्त हों, वही राजनियम अपनाए जाने चाहिए।

अल्लाउद्दीन ने न्याय करने वाले काजियों की संख्या में वृद्धि कर दी ताकि लोगों को न्याय प्राप्त करने एवं अपने झगड़ों का निबटारा करवाने के लिए अधिक दिनों तक नहीं भटकना पड़े तथा अपराधियों को जल्दी से जल्दी सजा दी जा सके। अल्लाउद्दीन खिलजी ने काजी की सहायता के लिए पुलिसकर्मियों एवं गुप्तचरों की समुचित व्यवस्था की। ये लोग अपराधों एवं अपराधियों के अन्वेषण में काजी की सहायता किया करते थे।

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जिस प्रकार काजी न्याय-व्यवस्था का अधिकारी था, उसी प्रकार नगर-कोतवाल प्रत्येक नगर में पुलिस-व्यवस्था का प्रधान होता था। उसका प्रधान कर्त्तव्य अपराधों का अन्वेषण करना एवं अपराधी को पकड़कर काजी के समक्ष प्रस्तुत करना होता था। मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि राज्य के समस्त पदाधिकारी बड़ी सतर्कता तथा ईमानदारी के साथ काम करते थे क्योंकि नियमानुसार कार्य न करने वालों को कठोर दण्ड दिए जाते थे। तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि यद्यपि अल्लाउद्दीन खिलजी को अपनी आय का अधिकांश भाग युद्धों में ही व्यय करना पड़ता था तथापि उसने सार्वजनिक हित के भी बहुत से कार्य किए। उसने दिल्ली के पास एक सुन्दर महल बनवाया। इस्लामी विद्वानों तथा फकीरों को सुल्तान का आश्रय प्राप्त था। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि अल्लाउद्दीन खिलजी निरा अशिक्षित व्यक्ति था। निरक्षर होने के उपरांत भी उसमें नैसर्गिक बौद्धिक प्रतिभा विद्यमान थी। उसे योग्य व्यक्तियों की अद्भुत परख थी जिससे वह योग्य व्यक्तियों की सेवाएँ प्राप्त कर सका था। अल्लाउद्दीन खिलजी ने कवि टेनिसन के कथन को सिद्ध कर दिया कि ‘केवल वही शासन कर सकता है जो पढ़-लिख नहीं सकते।’

तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकार अल्लाउद्दीन खिलजी की शासन व्यवस्था की भले ही कितनी ही प्रशंसा क्यों न करें, वास्तविकता यह है कि उसकी राज्य व्यवस्था सैनिक शक्ति पर आधारित थी। उसके समस्त सुधार सुल्तान की सैनिक शक्ति को बढ़ाने के लिए किये गए थे। ऐसा शासन दीर्घकालीन नहीं हो सकता था।

जैसे-जैसे सुल्तान की शारीरिक एवं मानसिक शक्तियाँ क्षीण होने लगीं, वैसे-वैसे उसकी नीतियों के प्रति असन्तोष भी बढ़ने लगा। बहुत से लोग सुल्तान की योजनाओं से असन्तुष्ट थे। मुस्लिम अमीर अपनी जागीरें एवं अधिकार फिर से प्राप्त करने की ताक में थे। राजपूत जागीरदार एवं पुराने राजवंश अपने खोये हुए राज्यों को फिर से प्राप्त करने के लिए प्रयासरत थे। जनता करों के बोझ से कराह रही थी।

व्यापारी वर्ग भी सुल्तान की नीतियों से असंतुष्ट था। वस्तुओं के भाव निश्चित कर देने से व्यापारी वर्ग लाभ से वंचित हो गया था। जो व्यापारी दिल्ली से बाहर जाते थे, उनके कुटुम्ब पर शासन द्वारा पूरा नियंत्रण रखा जाता था। इससे उनके परिवारों की सुरक्षा पर हर समय खतरा बना रहता था।

किसान और हिन्दू जनता, करों के अत्यधिक बोझ से दब गई थी। गुप्तचर विभाग की मनमानी से लोगों में असंतोष बढ़ गया था। सुल्तान के अतिरिक्त किसी और व्यक्ति को शासन के सम्बन्ध में निर्णय लेने और उसे लागू करने का अधिकार नहीं था। ऐसी व्यवस्था तब तक ही चल सकती थी जब तक कि सुल्तान में उसे चलाने की योग्यता रहे। इन सब कारणों से उसकी व्यवस्था स्थायी नहीं हो सकी और उसके आँखें बन्द करने से पहले ही यह व्यवस्था चरमराने लगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता ने मिस्र के फैरोह को पीछे छोड़ दिया (117)

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अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता ने मिस्र के फैरोह को पीछे छोड़ दिया

भारत के इतिहास की पुस्तकें अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता के किस्सों से भरी पड़ी हैं। कहा जाता है कि उसने मनुष्यों का रक्तपात करने के मामले में मिस्र के फैरोह को भी पीछे छोड़ दिया।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपनी सल्तनत को सैनिक शासन के आधार पर खड़ा किया जो उसके क्षमतावान रहने तक ही खड़ी रह सकती थी। वस्तुतः उसकी शासन व्यवस्था की सफलता इस बात पर अधिक निर्भर करती थी कि उसे संचालित करने वाले लोग कितने शुष्क, हृदय-हीन, निर्मोही एवं क्रूर हैं।

अल्लाउद्दीन खिलजी अत्यंत शुष्क स्वभाव का व्यक्ति था। इस कारण वह पारिवारिक प्रेम से सदैव वंचित रहा। यद्यपि उसके हरम में अनेक स्त्रियाँ थीं परन्तु उसकी एक भी स्त्री उसके हृदय पर अधिकार नहीं जमा सकी। वह क्रूरता तथा निर्दयता का साक्षात् स्वरूप था। पूर्ववर्ती सुल्तान जलालुद्दीन की हत्या, अपने सगे-सम्बन्धियों की हत्याएं, नव-मुसलमानों तथा उनके निर्दोष स्त्री-बच्चों की निर्मम हत्याएं सुल्तान की क्रूरता के प्रमाण हैं।

अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता के सम्बन्ध में जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है- ‘अल्लाउद्दीन ने मिस्र के फैरोह से भी अधिक संख्या में निर्दोष मनुष्यों का रक्तपात किया।’

इतिहासकार वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘अल्लाउद्दीन वास्तव में बर्बर अत्याचारी था। उसके हृदय में न्याय के लिए तनिक भी स्थान नहीं था …… उसका शासन लज्जापूर्ण था।’

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अल्लाउद्दीन खिलजी परले दरजे का शंकालु व्यक्ति था। उसमें प्रतिशोध की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। यदि उसे किसी की विश्वसनीयता पर सन्देह हो जाता तो उसके प्राण लिए बिना उसका पीछा नहीं छोड़ता था। वह इतना कृतघ्न था कि उसने उन्हीं अमीरों का दमन किया जिनके सहयोग से उसने तख्त प्राप्त किया था। मलिक काफूर के परामर्श पर उसने अपने पुत्रों को बंदी बना लिया।

नैतिकता का प्रश्न अल्लाउद्दीन को कभी भी तंग नहीं करता था। अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता का आलम यह था कि उसने कर्ण बघेला की रानी कमलावती को अपनी बेगम बना लिया तथा कमलावती की पुत्री देवलदेवी को अपने पुत्र खिज्र खाँ की बेगम बना दिया। अल्लाउद्दीन को कबूतरबाजी, लौण्डेबाजी तथा बाज उड़ाने का बड़ा शौक था। इन कार्यों के लिए उसने उसने अपनी सेवा में कई बालकों को नियुक्त कर रखा था।

निरक्षर होने के कारण अल्लाउद्दीन खिलजी कुरान का अध्ययन नहीं कर सकता था, न वह रमजान में रोजे रखता था, न नमाज पढ़ता था और न राज्य के शासन में उलेमाओं एवं मौलवियों का हस्तक्षेप होेने देता था परन्तु उसका इस्लाम में दृढ़ विश्वास था। वह अपने सामने कभी भी किसी मनुष्य को गैर-इस्लामिक बात नहीं करने देता था। उसकी कठोर नीतियों के कारण बहुसंख्यक हिन्दुओं पर भारी कुठाराघात हुआ।

अल्लाउद्दीन कट्टर सुन्नी मुसलमान होने पर भी सूफी दरवेश निजामुद्दीन औलिया में बड़ी आस्था रखता था। राजवंश के लगभग समस्त सदस्य निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि अनपढ़ होने एवं इस्लाम में दृढ़ आस्था होने पर भी अल्लाउद्दीन एक नया धर्म चलाना चाहता था। काजी अलाउल्मुल्क के समझाने पर उसने ऐसा करने का विचार छोड़ दिया।

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यद्यपि अल्लाउद्दीन हठधर्मी एवं अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था तथापि वह अपने विश्वसनीय लोगों का परामर्श स्वीकार कर लेता था। वह किसी भी योजना को कार्यान्वित करने से पूर्व उसकी अच्छी तरह तैयारी करता था। यद्यपि वह साम्राज्य विस्तार का इच्छुक था किंतु उसने दक्षिण भारत के राजाओें पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त उनके राज्य मुस्लिम गवर्नरों को न सौंपकर उन्हीं राजाओं को करद बनाकर सौंप दिए थे। इससे उसकी व्यावहारिक बुद्धि का परिचय मिलता है। कुछ इतिहासकार अल्लाउद्दीन की सामरिक विजयों का श्रेय उसके सेनापतियों को देते हैं परन्तु यह निष्कर्ष उचित नहीं है। जलालुद्दीन खिलजी के शासन काल में अल्लाउद्दीन ने कई बड़ी विजयें प्राप्त कीं जिनसे वह सेना में लोकप्रिय हो गया। उसने मलिक छज्जू के विद्रोह का दमन किया और भिलसा तथा देवगिरि को जीतकर अपने सैनिक गुणों का परिचय दिया। अल्लाउद्दीन ने तख्त पर बैठने के उपरान्त रणथंभौर, चित्तौड़, सिवाना एवं जालौर के युद्धों में स्वयं भाग लिया। उसने दक्षिण विजय का दायित्व मलिक काफूर को इसलिए सौंपा क्योंकि अल्लाउद्दीन मंगोलों के आक्रमणों एवं अमीरों की षड़यंत्रकारी प्रवृत्ति के कारण राजधानी से दूर नहीं जाना चाहता था। वह अपने लक्ष्य को सदैव सर्वोपरि रखता था और उसकी पूर्ति के लिए नैतिक-अनैतिक समस्त प्रकार के साधनों का प्रयोग करने के लिए उद्यत रहता था।

अल्लाउद्दीन में अपने अमीरों, सेनापतियों एवं राज्याधिकारियों का पथ-प्रदर्शन करने एवं उन्हें नई दिशा देने की अद्भुत प्रतिभा थी। उसके द्वारा किये गए अधिकांश सेना सम्बन्धी सुधारों तथा भूमि-सम्बन्धी सुधारों का अनुसरण आगे चलकर शेरशाह सूरी तथा अकबर आदि शासकों ने किया।

यद्यपि अल्लाउद्दीन स्वयं शिक्षित नहीं था परन्तु वह इस्लामिक विद्वानों का आदर करता था और उन्हें प्रश्रय देता था। अमीर खुसरो तथा हसन उसके समय के बहुत बड़े विद्वान थे। अल्लाउद्दीन उन्हें बहुत आदर देता था। बहुसंख्य हिन्दू विद्वानों के प्रति उसे कोई लगाव नहीं था।

आलाउद्दीन को स्थापत्य कला से प्रेम था। उसने बहुत से दुर्गों का निर्माण करवाया। दिल्ली में उसने अलाई दरवाजा, सीरी दुर्ग तथा हौज खास बनवाए। उसने बहुत सी भग्न मस्जिदों का जीर्णोद्धार करवाया। ई.1311 में उसने कुतुब मस्जिद को विस्तृत करने और उसके सहन में एक नयी मीनार बनवाने का कार्य आरम्भ करवाया।

दिल्ली के सुल्तानों में अल्लाउद्दीन का नाम महत्त्वपूर्ण है। जिस समय वह तख्त पर बैठा था, उस समय दिल्ली सल्तनत की स्थिति बड़ी डावांडोल थी। मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था, आन्तरिक विद्रोह की सदैव सम्भावना बनी रहती थी, अमीर सदैव अवज्ञा करने को उद्यत रहते थे और अधिकांश जनता असन्तुष्ट थी।

इस प्रकार तख्त पर बैठने के समय अल्लाउद्दीन की स्थिति संकटापन्न थी परन्तु उसने धैर्य तथा साहस से संकटों का सामना किया और ई.1296 से लेकर ई.1316 तक, पूरे 20 वर्ष सफलतापूर्वक शासन किया।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता, शुष्कता एवं हृदयहीनता ने दिल्ली सल्तनत को उसके विस्तार के चरम पर पहुंचा दिया किंतु उसके काल में प्रजा का जो संहार हुआ, उसकी तुलना विश्व के किसी अन्य शासक से नहीं की जा सकती!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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