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प्रताप रुद्रदेव ने मलिक काफूर को कोहीनूर हीरा दिया (111)

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प्रताप रुद्रदेव - www.bharatkaitihas.com
प्रताप रुद्रदेव ने मलिक काफूर को कोहीनूर हीरा दिया

ई.1310 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को वारांगल पर आक्रमण करने भेजा। अल्लाउद्दीन ने मलिक काफूर को आदेश दिया कि यदि प्रताप रुद्रदेव सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ले और अपना कोष, घोड़े तथा हाथी समर्पित करे तो उससे सन्धि कर ली जाये और उसका राज्य न छीना जाये। मलिक काफूर ने एक विशाल सेना के साथ दक्षिण के लिए प्रस्थान किया।

सबसे पहले वह देवगिरि गया। देवगिरि के यादव राजा रामचन्द्र ने मलिक काफूर की बड़ी सहायता की। देवगिरि से काफूर ने वारगंल के लिए प्रस्थान किया और वारगंल के दुर्ग पर घेरा डाल दिया। यह घेरा कई महीने चला। वारांगल नगर के चारों ओर दोहरा प्राकार अर्थात् परकोटा बना हुआ था।

इसमें से बाहर की दीवार मिट्टी की और भीतर की दीवार पत्थर की बनी हुई थी। वारांगल के सैनिक नगर की प्राचीर पर खड़े होकर मलिक काफूर की सेना पर तीर एवं पत्थर बरसाते थे। इस कारण मलिक काफूर नगर में प्रवेश नहीं कर सका।

इस पर मलिक काफूर ने वारांगल राज्य के अन्य नगरों की प्रजा को नष्ट करना आरम्भ किया। मलिक काफूर के सैनिक हजारों स्त्री-पुरुषों को पकड़कर वारांगल नगर के बाहर ले आए तथा उनका सिर काटने लगे। तुर्की सेना ने बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मार डाला तथा उनके घरों में आग लगाकर उनकी सम्पत्ति का विनाश किया।

जब वारांगल के राजा प्रताप रुद्रदेव को यह ज्ञात हुआ कि तुर्क केवल धन प्राप्त करने के लिए ऐसा विध्वंस मचा रहे हैं तब वह मलिक काफूर को धन देकर राज्य में शांति स्थापित करने के लिए तैयार हो गया।

जियाउद्दीन बरनी के कथनानुसार प्रताप रुद्रदेव ने तुर्कों को 300 हाथी, 7000 घोड़े, बहुत सा सोना-चाँदी तथा अनेक अमूल्य रत्न दिए। कुछ इतिहासकारों के अनुसार कोहीनूर हीरा भी मलिक काफूर को यहीं से मिला था। राजा प्रताप रुद्रदेव ने सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी को वार्षिक कर देना भी स्वीकार कर लिया। ई.1310 में मलिक काफूर पुनः देवगिरि तथा धारा होते हुए दिल्ली लौट गया। वारांगल विजय के बाद अल्लाउद्दीन ने द्वारसमुद्र पर आक्रमण की योजना बनाई।

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इन दिनों द्वारसमुद्र में होयसल राजा वीर वल्लभ (तृतीय) शासन कर रहा था उसे बल्लाल (तृतीय) भी कहते हैं। वह योग्य तथा प्रतापी शासक था। दुर्भाग्य से इन दिनों होयसल तथा यादव राजाओं में घातक प्रतिद्वन्द्विता चल रही थी और दोनों एक दूसरे को उन्मूलित करने का प्रयत्न कर रहे थे।

अल्लाउद्दीन ने इस स्थिति से लाभ उठाने के लिए ई.1311 में मलिक काफूर को द्वारसमुद्र पर आक्रमण करने भेजा। मलिक काफूर एक बार फिर से दिल्ली से रवाना होकर देवगिरि पहुंचा। इस समय तक राजा रामचंद्र का निधन हो चुका था और उसका पुत्र शंकरदेव देवगिरि का राजा था। मलिक काफूर ने शंकरदेव से कहा कि वह द्वारसमुद्र के अभियान में दिल्ली की सेना की सहायता करे। शंकरदेव ने ऐसा करने से मना कर दिया।

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इसलिए मलिक काफूर को शंकरदेव पर विश्वास नहीं रहा। अब वह आगे बढ़ने से घबराने लगा। न तो वह द्वारसमुद्र का अभियान किए बिना दिल्ली लौटकर जा सकता था और न शंकरदेव की ओर से निश्चिंत हुए बिना द्वारसमुद्र जा सकता था। इसलिए मलिक काफूर ने एक योजना बनाई। उसने गोदावरी के तट पर एक रक्षक-सेना स्थापित की ताकि जब मलिक काफूर द्वारसमुद्र में लड़ रहा हो तब शंकरदेव पीछे से आकर उस पर हमला न कर दे। मलिक काफूर ने गोदावरी नदी पर काफी समय व्यय किया ताकि आसपास के राजा निश्चिंत हो जाएं फिर अचानक ही तेजी से चलता हुआ द्वारसमुद्र पहुंच गया। द्वारसमुद्र के राजा बल्लाल होयसल को यह अनुमान नहीं था कि मलिक काफूर की विशाल सेना इतनी शीघ्रता से उसके राज्य में आ धमकेगी। इसलिए वह अचानक ही घेर लिया गया और तुर्की सेना के समक्ष नहीं टिक सका। उसने विवश होकर तुर्कों की अधीनता स्वीकार कर ली। मलिक काफूर ने द्वारसमुद्र के मन्दिरों की अपार सम्पत्ति को जी भर कर लूटा और इस अपार सम्पत्ति के साथ दिल्ली लौट गया। द्वारसमुद्र विजय के उपरान्त अल्लाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत में स्थित मदुरा राज्य पर आक्रमण की योजना बनाई जो दक्षिण प्रायद्वीप के अंतिम छोर पर स्थित था।

इन दिनों मदुरा में पांड्य-वंश शासन कर रहा था। दुर्भाग्यवश इन दिनों सुन्दर पांड्य तथा वीर पांड्य नामक दो राजकुमारों में घोर संघर्ष चल रहा था। इस संघर्ष में वीर पांड्य ने सुन्दर पांड्य को मार भगाया और स्वयं मदुरा का शासक बन गया।

निराश होकर सुन्दर पांड्य ने दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी से सहायता मांगी। अल्लाउद्दीन खिलजी ऐसे ही अवसर की खोज में था। उसने मलिक काफूर को विशाल सेना देकर मदुरा पर आक्रमण करने के लिए भेजा। मलिक काफूर ई.1311 में मदुरा पहुँच गया। काफूर के आने की सूचना पाकर वीर पांड्य राजधानी छोड़कर भाग गया। काफूर ने मदुरा के मन्दिरों को खूब लूटा और मूर्तियों को तोड़ डाला। ई.1311 में वह अपार सम्पत्ति लेकर दिल्ली लौट गया।

ई.1311 के बाद देवगिरि के राजा शंकरदेव ने दिल्ली के सुल्तान को कर देना बन्द कर दिया। शंकरदेव ने होयसल राजा के विरुद्ध भी मुसलमानों की सहायता करने से इन्कार कर दिया था। इसलिए अल्लाउद्दीन ने मलिक काफूर की अध्यक्षता में एक सेना शंकरदेव के विरुद्ध भेजी। दोनों पक्षों में रक्तरंजित युद्ध हुआ जिसमें राजा शंकरदेव पराजित हो गया और वीरगति को प्राप्त हुआ। ई.1315 में हरपालदेव को देवगिरि का शासन सौंपकर मलिक काफूर दिल्ली लौट गया।

इस प्रकार अल्लाउद्दीन ने केवल पांच साल की अवधि में दक्षिण भारत की सम्पूर्ण शक्तियों को अपने अधीन कर लिया। उसका यह कार्य किसी आश्चर्य से कम नहीं था। इस सफलता के कई कारण थे। हालांकि आधुनिक काल के अधिकांश इतिहासकारों ने अल्लाउद्दीन के दक्षिण भारत के अभियानों को पूर्णतः असफल घोषित किया है। इसके कारणों की चर्चा हम आगे करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति (112)

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अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति - www.bharatkaitihas.com
अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति

अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति ने सिद्ध कर दिया कि केवल अनपढ़ ही शासन कर सकते हैं। उससे पहले दिल्ली का कोई भी सुल्तान इतना सफल सिद्ध नहीं हुआ था।

अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने देवगिरि, वारांगल, द्वारसमुद्र तथा मदुरा को जीतकर उन्हें खिलजी सल्तनत के अधीन कर लिया तथा खिलजी का साम्राज्य उत्तर में मुल्तान, लाहौर तथा दिल्ली से लेकर दक्षिण में द्वारसमुद्र तथा मदुरा तक, पूर्व में लखनौती तथा सौनार गाँव से लेकर पश्चिम में थट्टा तथा गुजरात तक विस्तृत हो गया था।

अल्लाउद्दीन की सफलता के कई कारण थे। उत्तर भारत, पश्चिमी भारत एवं दक्षिण भारत के अभियान में अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति अलग-अलग थी। उत्तर भारत के अभियानों में वह स्वयं युद्ध लड़ने गया जबकि दक्षिण भारत के अभियानों में उसने अपने सेनापतियों को भेजा।

वह जानता था कि भारतीय राजाओं में राष्ट्रीय गौरव एवं धार्मिक गौरव की बजाय निजी गौरव, कुलीय गौरव एवं जातीय गौरव की भावनाएं अधिक हैं। भारतीय राजा परस्पर संगठित होकर शत्रु का सामना करने के स्थान पर, अपने पड़ोसियों के विरुद्ध विदेशी शत्रु की सहायता करते थे।

अल्लाउद्दीन ने उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में भिन्न नीति का अनुसरण किया। उत्तर भारत के विजित राज्यों में अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति यह रही कि उसने मुस्लिम गवर्नरों की नियुक्तियां कीं जबकि विन्ध्य-पर्वत के उस पार के राज्यों को उसने अपने राज्य में नहीं मिलाया अपितु वहाँ के राजाओं की औरतों और धन को लूटकर राज्य उन्हीं के पास बने रहने दिए। दक्षिण भारत में अल्लाउद्दीन का एकमात्र लक्ष्य दक्षिण की विपुल सम्पत्ति को लूटना था। ताकि वह अपनी विशाल सेना का व्यय चला सके और अपने शासन को सुव्यवस्थित रख सके।

अल्लाउद्दीन जानता था कि सुदूर दक्षिण पर दिल्ली से शासन करना असंभव था। अतः उसने देवगिरि, तेलंगाना, द्वारसमुद्र तथा मदुरा पर विजय तो प्राप्त की परन्तु उन्हें अपने साम्राज्य में मिलाने का प्रयत्न नहीं किया। यह उल्लाउद्दीन खिलजी की नीति की बहुत बड़ी विशेषता रही।

अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली से अनुपस्थित रहने के दुष्परिणामों से परिचित था। उसे तुर्की अमीरों के विद्रोहों तथा मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था। इसलिए उसने राजधानी को कभी असुरक्षित नहीं छोड़ा तथा दक्षिण-विजय का कार्य अपने सेनापतियों को दिया। अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति अपनी राजधानी से दूर नहीं जाने की रही।

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यद्यपि सुल्तान अल्लाउद्दीन, मलिक काफूर पर विश्वास करता था और उसी को प्रत्येक बार प्रधान सेनापति बना कर भेजा करता था तथापि वह मलिक काफूर पर अपना पूरा नियन्त्रण रखने का प्रयास करता था। इसलिए मलिक काफूर के सम्बन्ध में अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति बिल्कुल अलग प्रकार की थी।

अल्लाउद्दीन खिलजी मलिक काफूर के साथ जूना खाँ एवं अल्प खाँ आदि अन्य अमीरों को भी भेजता था जिससे काफूर को विश्वासघात करने का अवसर न मिल सके। सुल्तान जब काफूर को दक्षिण भारत के अभियान पर भेजता था, तब वह उसे विस्तृत आदेश देता था। काफूर के लिए उन आदेशों की पालना करना अनिवार्य था।

दक्षिण में मिली अपार सफलताओं के उपरांत भी कुछ इतिहासकारों ने अल्लाउद्दीन के दक्षिण अभियानों को विफल माना है। उनके अनुसार वह दक्षिण भारत को अपने अधीन बनाए रखने में विफल रहा। केवल होयसल राज्य ने पराजय स्वीकार करके अल्लाउद्दीन से सहयोग किया किंतु देवगिरि तथा तेलंगाना ने कभी सहयोग तो कभी विरोध किया। पाण्ड्य राज्य ने तो अधीनता ही स्वीकार नहीं की। देवगिरि के राजा रामचंद्र देव के पुत्र शंकर देव ने दिल्ली को अनेक बार कर देने से मना किया। इस कारण मलिक काफूर को पुनः दक्षिण राज्यों के विरुद्ध अभियान पर भेजना पड़ा।

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कुछ इतिहासकारों के अनुसार दक्षिण भारत के सम्बन्ध में अल्लाउद्दीन की नीति सफल रही क्योंकि वह दक्षिण भारत को अपने प्रत्यक्ष शासन में नहीं रखना चाहता था, वह उन राज्यों से धन लूटने तथा उन्हें करद राज्य बनाकर उनसे कर वसूलना चाहता था। अपने इस उद्देश्य में वह पूरी तरह सफल रहा। अल्लाउद्दीन ने अपने राज्य की सुरक्षा एवं शासन दोनों की मजबूती के लिए सेना को प्रमुख आधार बनाया। उसने सेना को पूर्ववर्ती सुल्तानों की तुलना में अधिक वेतन दिया। सेना के सम्बन्ध में प्रत्येक निर्णय वह स्वयं लेता था तथा इस कार्य में सहायता के लिए उसने ‘आरिज-ए-मुमालिक’ नामक नवीन पद का सृजन किया। सेना में वही लोग भर्ती किये जाते थे जो घोड़े पर चढ़ना, अस्त्र-शस्त्र चलाना तथा युद्ध करना जानते थे। अल्लाउद्दीन ने सेना को व्यस्त एवं सक्रिय रखने के लिए हर समय किसी न किसी युद्ध में नियोजित करे रखा। शांतिकाल में वह सैनिकों को उनके शिविरों में नहीं रहने देता था अपितु उन्हें शिकार खेलने के लिए जंगलों में भेज देता था। अल्लाउद्दीन खिलजी की सेना में घुड़सवार सैनिकों की प्रधानता थी। अतः सुल्तान ने अश्व-विभाग के सुधार पर विशेष रूप से ध्यान दिया। उसने बाहर से अच्छी नस्ल के घोड़ों को मंगवाया।

मंगोलों के परास्त होने पर सुल्तान को लूट में अच्छे घोड़े प्राप्त हो जाते थे। दक्षिण भारत के राजाओं को परास्त करके भी कुछ अच्छे घोड़े प्राप्त किये गए। राज्य ने अच्छी नस्ल के घोड़े उत्पन्न करने की भी व्यवस्था की।

सुल्तान ने घुड़सवार सैनिकों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया और प्रत्येक श्रेणी के सैनिकों का वेतन निश्चित कर दिया। पहली श्रेणी का सैनिक दो से अधिक घोड़े रखता था, दूसरी श्रेणी का सैनिक केवल दो घोड़े और तीसरी श्रेणी का सैनिक केवल एक घोड़ा रखता था। सैनिकों को जागीर देने की प्रथा हटा दी गई और उन्हें नकद वेतन दिया जाने लगा।

प्रायः लोग सैन्य-प्रदर्शन के समय अथवा रणक्षेत्र में घोड़े तथा सवार लाकर दिखा देते थे जबकि वे घोड़े तथा सवार वास्तव में युद्ध में भाग नहीं लेते थे। इस बेईमानी को रोकने के लिए सुल्तान ने सैनिकों का हुलिया लिखवाने की प्रथा चलाई। फलतः प्रत्येक सैनिक को एक रजिस्टर में अपना हुलिया लिखवाना पड़ता था। सैनिक सदैव अच्छे घोड़े नहीं रखते थे। सुल्तान ने घोड़ों को दागने की प्रथा चलाई जिससे सैनिक झूठे घोड़े दिखाकर सुल्तान को धोखा न दें।

सेना के सम्बन्ध में अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति अपने पूर्ववर्ती सुल्तानों से बिल्कुल अलग प्रकार की थी। अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली का पहला सुल्तान था जिसने स्थायी सेना की व्यवस्था की। यह सेना राज्य की सेवा के लिए सदैव राजधानी में उपस्थित रहती थी।

इस स्थायी सेना में चार लाख पचहत्तर हजार सैनिक होते थे। सुल्तान ने उन समस्त किलों की मरम्मत कराई जो मंगोलों के मार्गों में पड़ते थे। उसने बहुत से नये दुर्ग भी बनवाये। इन किलों में उसने योग्य तथा अनुभवी सेनापतियों की अध्यक्षता में सुसज्जित सेनायें रखीं।

इस प्रकार अल्लाउद्दीन खिलजी ने परम्परागत सैनिक शासन की अनेक पुरानी व्यवस्थाएं छोड़कर नई व्यवस्थाएं अपनाईं। सेना को अत्यंत विशाल बना दिया तथा उसे हर समय व्यस्त रखा। अल्लाउद्दीन ने इस विशाल सेना को उच्च वेतन दिया तथा उसके लिए धन की नियमित आवक सुनिश्चित की। सेना में पैदलों की बजाय घुड़सवारों तथा अनियमित सैनिकों की बजाय नियमित सैनिकों की व्यवस्था की।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने तुर्की अमीरों पर अपनी निर्भरता कम कर दी तथा उसके स्थान पर भारतीय मूल के ख्वाजासरा को राज्य का नायब एवं सेनापति बनाकर उसे विजय प्राप्त करने का अवसर दिया ताकि तुर्की अमीरों का घमण्ड तोड़ा जा सके।

इस प्रकार अल्लाउद्दीन खिलजी ने यह सिद्ध कर दिया कि उच्च वंशीय पढ़े-लिखे तुर्की अमीरों की बजाय अनपढ़ लोग बेहतर शासन कर सकते हैं। अल्लाउद्दीन खिलजी की नीति ही उसकी सफलताओं एवं विफलताओं की मुख्य कारक रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खिलजी का बाजार प्रबन्धन (113)

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खिलजी का बाजार प्रबन्धन

दिल्ली के सुल्तानों के लिए बाजार प्रबन्धन शासन का कोई आधार ही नहीं था किंतु खिलजी का बाजार प्रबन्धन दिल्ली सल्तनत शासन में एक नवीन घटना थी। इसका अध्ययन दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों एवं इतिहासकारों के लिए कौतूहल का विषय है।

नितांत अनपढ़ होने के उपरांत भी सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन के आधार को मजबूत बनाया तथा एक विशाल सेना को नियंत्रण में रखने के लिए समुचित उपाय किए। अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा आंतरिक प्रशासन में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। खिलजी का बाजार प्रबन्धन भी उन्हीं में से एक था।

अल्लाउद्दीन ने सल्तनत में घूसखोरी तथा अनैतिक तरीके से धन-संग्रहण की प्रवृत्ति को रोकने के लिए बाजारों में मूल्य नियंत्रण के कठोर उपाय किये। खिलजी का बाजार प्रबन्धन उन वस्तुओं की विस्तृत सूचि पर आधारित था जो बाजार में बिकने आती थीं और जिन वस्तुओं की उसके सैनिकों को प्रतिदिन आवश्यकता पड़ती थी। इन सब वस्तुओं के मूल्य निश्चित कर दिए गए। इन वस्तुओं को कोई भी दुकानदार निर्धारित मूल्य से अधिक मूल्य पर नहीं बेच सकता था। 

सुल्तान ने बाजार में वस्तुओं की माँग तथा पूर्ति में संतुलन बनाने के लिए मुक्त-बाजार के साथ-साथ राज्य की ओर से भी व्यवस्था की। आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति का उत्तरदायित्व सरकार ने अपने ऊपर ले लिया। जो वस्तुएँ शासन स्वयं उत्पन्न कर सकता था, उनके उत्पादन की व्यवस्था की गई। जो वस्तुएं दूरस्थ प्रान्तों से मँगवाई जाती थीं, वे वहाँ से मँगवाई जाने लगीं और जो वस्तुएँ देश में नहीं मिल सकती थीं, वे विदेशों से मँगवाई जाने लगीं।

वस्तुओं की आपूर्ति व्यवस्था के साथ-साथ उनके बाजारों में वितरण की भी समुचित व्यवस्था की गई। यह व्यवस्था खिलजी का बाजार प्रबन्धन की प्रमुख विशेषता थी। दिल्ली में तीन बाजारों की व्यवस्था की गई। एक बाजार सराय अदल कहलाता था, दूसरा शहना-ए-मण्डी कहलाता था और तीसरे बाजार का नाम अब उपलब्ध नहीं है। तीनों बाजारों में भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुएँ प्राप्त होती थीं। प्रत्येक नियन्त्रित दुकान को उतनी ही मात्रा में वस्तुएँ दी जाती थीं जितनी उस दुकान के उपभोक्ताओं की मांग होती थी।

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अल्लाउद्दीन खिलजी ने बाजार में कई श्रेणियों के अधिकारी नियुक्त किये और उन्हें आदेश दिए कि वे बाजारों पर कड़ा नियंत्रण रखें। इस व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी दीवाने रियासत कहलाता था। उसे तीनों बाजारों पर नियन्त्रण रखना पड़ता था। दीवाने रियासत के नीचे प्रत्येक बाजार में तीन पदाधिकारी नियुक्त किये गए थे।

पहला पदाधिकारी शाहनाह अर्थात् निरीक्षक, दूसरा बरीद-ए-मण्डी अर्थात् लेखक और तीसरा मुन्हीयान अर्थात् गुप्तचर कहलाता था। इस प्रकार खिलजी का बाजार प्रबन्धन गुप्तचरों की रिपोर्टों के आधार पर होता था।

शाहनाह भी खिलजी का बाजार प्रबन्धन करता था। वह बाजार के सामान्य कार्यों को देखता था, बरीद घूम-घूम कर बाजार का नियन्त्रण करता था और मुन्हीयान गुप्त एजेन्ट अथवा कारदार होता था। बरीद बाजार की पूरी सूचना शाहनाह के पास, शाहनाह इस सूचना को दीवाने रियासत के पास और दीवाने रियासत सुल्तान के पास भेज देता था।

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मुन्हीयान को सुल्तान स्वयम् नियुक्त करता था। वह बाजार की अपनी अलग रिपोर्ट तैयार करके सीधे ही सदर दफ्तर में भेजता था। यदि उसकी तथा अन्य पदाधिकारियों की रिपोर्ट में कुछ अन्तर पड़ता था तो गलत रिपोर्ट देने वाले को कठोर दण्ड दिया जाता था। सुल्तान उन लोगों को बड़े कठोर दण्ड देता था जो बईमानी करते थे और त्रुटियुक्त बाट रखते थे। कहा जाता है कि जो व्यापारी जितना कम तोलता था, उतना ही मांस उसके शरीर से काटने के निर्देश दिए गए थे परन्तु कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिलता जब इस नियम को कार्यान्वित किया गया हो। सुल्तान की ओर से कपड़ों का भी मूल्य निर्धारित किया गया परन्तु इस मूल्य पर कपड़ा बेचने में व्यापारियों को हानि होने की सम्भावना थी। इसलिए व्यापारियों में कपड़े की दूकानों का अनुज्ञापत्र लेने का साहस नहीं होता था। इसलिए सुल्तान ने कपड़े का व्यापार मुल्तानी व्यापारियों को सौंप दिया। इन व्यापारियों को कपड़ा खरीदने के लिए राजकोष से धन मिलता था और कपड़ा बिक जाने पर इन्हें निर्धारित कमीशन दिया जाता था। सुल्तान ने पशुओं के क्रय-विक्रय पर भी राज्य का पूरा नियन्त्रण रखा और उनका मूल्य निर्धारित कर दिया। प्रथम श्रेणी के घोड़ों का मूल्य 100 से 120 टंक, दूसरी श्रेणी के घोड़ों का 80 टंक और तीसरी श्रेणी के घोड़ों का 65 से 70 टंक निश्चित किया गया।

टट्टुओं का मूल्य 10 से 25 टंक निश्चित किया गया। दूध देने वाली गाय का मूल्य तीन-चार टंक और बकरियों का मूल्य 10 से 14 जीतल निश्चित किया गया।

बाजार की अन्य वस्तुओं की तरह गुलामों तथा वेश्याओं का भी मूल्य निश्चित किया गया। गुलामों का मूल्य 5 से 12 टंक तथा वेश्या का मूल्य 20 से 40 टंक निश्चित किया गया। कुछ उत्तम गुलामों के दाम 100 से 200 टंक हुआ करते थे। बड़े सुन्दर गुलाम लड़के 20 से 30 टंक में खरीदे जा सकते थे। गुलाम नौकरानियों का मूल्य 10 से 15 टंक हुआ करता था। घर में कामों के लिए गुलाम 7 से 8 टंक में खरीदे जा सकते थे।

तत्कालीन मुस्लिम लेखकों द्वारा दी गई इस मूल्य सूचि के आधार पर कहा जा सकता है कि अधिकतर वस्तुओं के भाव मन-माने तरीके से निर्धारित किए गए थे। इंसानों की बजाय पशु महंगे थे। एक घोड़े के मूल्य में पांच से छः वेश्याएं मिल सकती थीं जबकि एक घोड़े के मूल्य में 20-22 गुलाम मिल सकते थे। मर्द-वेश्या के रूप में प्रयुक्त होने वाले एक गुलाम लड़के के मूल्य में चार-पांच गुलाम खरीदे जा सकते थे। एक घोड़े के मूल्य में 30-40 दुधारू गायें मिल सकती थीं।

घोड़ों का इतना अधिक मूल्य उनके सैन्य उपयोग के कारण था। वास्तव में देखा जाए तो ये घोड़े ही अल्लाउद्दीन खिलजी की सल्तनत की वास्तविक शक्ति थे, यही शासन का आधार थे और यही घोड़े अल्लाउद्दीन की सम्पूर्ण सेना का निर्माण करते थे।

बाजार के इन सुधारों का परिणाम यह हुआ कि आवश्यक वस्तुएं कम मूूल्य पर मिलने लगीं। सैनिकों के लिए यह संभव हो गया कि वे कम वेतन में भी सुखमय जीवन व्यतीत कर सकें और अपने परिवार का ठीक से पालन कर सकें।

सुल्तान ने बाजार से दलालों को निकाल दिया तथा उनके नेताओं को कठोर दण्ड दिया। दलालों को बाजार से हटा देने से समस्त चीजों के मूल्य राज्य द्वारा निर्धारित स्तर पर बने रहे तथा बाजार से कालाबाजारी जैसी हरकतें समाप्त हो गईं।

डॉ. के. एस. लाल ने सिद्ध किया है कि भी खिलजी का बाजार प्रबन्धन केवल राजधानी तथा उसके आसपास तक ही सीमित था। डॉ. लाल के अनुसार उसकी सफलता भावों को कम करने में उतनी नहीं है जितनी कि एक लम्बे समय तक भावों को नियंत्रण में रखने में है। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि सुल्तान की मृत्युपर्यंत वस्तुओं के भाव एक जैसे बने रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू प्रजा पर अत्याचार किया अल्लाउद्दीन खिलजी ने (114)

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हिन्दू प्रजा पर अत्याचार किया अल्लाउद्दीन खिलजी ने

अल्लाउद्दीन खिलजी ने मुल्लाओं की सलाह पर हिन्दू प्रजा पर अत्याचार किया तथा हिन्दुओं की सम्पत्ति छीनकर उन्हें गरीब बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपनी सम्पत्ति की रक्षा करने के लिए हिन्दुओं के सामने केवल यही एक रास्ता बचा था कि वे मुसलमान बन जाएं।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली सल्तनत के शासन में बड़े परिवर्तन करते हुए बाजारों में मूल्य-नियंत्रण का अनोखा उपाय अपनाया। उसने बाजार में सामान की आपूर्ति तथा मूल्य का निर्धारण करके दलालों की भूमिका को पूरी तरह समाप्त कर दिया। हालांकि उसकी यह बाजार व्यवस्था सम्पूर्ण दिल्ली सल्तनत में लागू नहीं हुई थी, यह व्यवस्था केवल दिल्ली एवं उसके आसपास के बड़े नगरों के बाजारों में लागू की गई थी।

अल्लाउद्दीन खिलजी अमीरों एवं जनता की व्यक्तिगत सम्पत्ति को आन्तरिक उपद्रवों का कारण समझता था। इसलिए उसने बहुत से अमीरों एवं बहुत सी जनता की व्यक्तिगत सम्पत्ति को उन्मूलित करके उस सम्पत्ति को राजकीय कोष में जमा कर लिया। इस कार्य के लिए उसने साधारण जनता से लेकर अमीरों तक पर अत्याचार किये तथा उनकी हत्याएं करवाईं।

मुसलमानों को मिल्क, इनाम, इशरत (पेंशन) तथा वक्फ (दान) के रूप में जो भूमि प्राप्त थी, उसका सुल्तान ने अपहरण कर लिया। इस प्रकार की कुछ भूमि फिर भी बची रह गई थी परन्तु अधिकांश भूमि छीन ली गई थी।

सुल्तान ने सैनिकों को जागीर देने की प्रथा बन्द करके नकद वेतन देने की व्यवस्था की। इससे सैनिक परिवार की स्थाई आय समाप्त हो गई किंतु राज्य की आय में वृद्धि हो गई। सरकार ने सम्पूर्ण भूमि का खालसा भूमि में परिवर्तन कर दिया। खालसा भूमि उसे कहते थे जो सीधे केन्द्र सरकार के अधिकार में होती थी। चूंकि अल्लाउद्दीन ने जागीरदारी प्रथा हटा दी, इसलिए अब समस्त भूमि सीधे सरकार के नियन्त्रण में आ गई और खालसा भूमि बन गई।

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सुल्तान ने सम्पूर्ण भूमि की नाप करवा कर सरकारी लगान निश्चित कर दिया। जितनी उपजाऊ भूमि होती थी, उसी के हिसाब से लगान देना पड़ता था। वह दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जिसने भूमि की पैमाइश करवाकर लगान वसूल करना आरम्भ किया। इसके लिए एक बिस्वा को इकाई माना गया। अल्लाउद्दीन खिलजी लगान को गल्ले के रूप में लेना पसंद करता था। लगान का निर्धारण तीन प्रकार से किया जाता था।

लगान की गणना के पहले प्रकार को कनकूत कहा जाता था जिसका अर्थ यह था कि जब फसल खड़ी हो तभी लगान का अनुमान लगा लिया जाए। लगान की गणना का दूसरा आधार बटाई था। इसका तात्पर्य यह था कि अनाज तैयार हो जाने पर सरकार का हिस्सा निश्चित करके ले लिया जाए।

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लगान निर्धारण के तीसरे प्रकार को लंकबटाई कहा जाता था जिसका तात्पर्य यह था कि फसल तैयार हो जाने पर बिना पीटे ही सरकारी हिस्सा ले लिया जाए। अल्लाउद्दीन खिलजी ने हिन्दू प्रजा पर अत्याचार करने के लिए किसानों पर कर बढ़ा दिए। खिलजी के शासनकाल में किसान की फसल में से 50 प्रतिशत हिस्सा राज्य का होता था। किसानों को चारागाह तथा मकान का भी कर देना पड़ता था। कुछ विद्वानों की यह धारणा है कि इतना अधिक कर केवल दो-आब में लिया जाता था जहाँ की भूमि अधिक उपजाऊ थी और लोग अधिक विद्रोह करते थे। यद्यपि सुल्तान ने लगान वसूली के लिए सैनिक अधिकारी नियुक्त कर दिए थे तथापि वह पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह नष्ट नहीं कर सका था। अधिकांश क्षेत्रों में लगान वसूली का कार्य अब भी हिन्दू मुकद्दम, खुत तथा चौधरी करते थे जिन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे। हिन्दू प्रजा पर अत्याचार करने के लिए सुल्तान ने उनके समस्त विशेषाधिकारों को समाप्त करके उनका वेतन निश्चित कर दिया। खुत तथा बलहर अर्थात् हिन्दू जमींदारों को नष्ट नहीं किया गया परन्तु उन पर इतना अधिक कर लगाया गया कि वे निर्धन हो गए और कभी भी राज्य के विरुद्ध सिर नहीं उठा सके।

हिन्दू प्रजा पर अत्याचार करने के लिए दो-आब के किसानों से लगान के रूप में अनाज लिया जाता था। उस अनाज को जमा करने के लिए सरकारी बखार होते थे। इन बखारों में इतना अधिक अनाज जमा होता था कि अकाल के समय सेना के लिए पर्याप्त होता था।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने बकाया कर वसूलने के लिए दीवान-ए-मुस्तखराज नामक विभाग की स्थापना की। उसने सम्पूर्ण साम्राज्य को कई भागों में विभक्त करके प्रत्येक भाग को एक सैन्य-अधिकारी के अनुशासन में रख दिया। यह सैन्य-अधिकारी जनता से मालगुजारी वसूल करता था और जितनी सेना उसके सुपुर्द की जाती थी, उसका व्यय निकालने के उपरान्त शेष धन राजकोष में भेज देता था।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने हिन्दू प्रजा पर अत्याचार करने के लिए उन्हें निर्धन बनाने का प्रयत्न किया जिससे वे विद्रोह की कल्पना तक नहीं कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सुल्तान ने कई कदम उठाये। गंगा-यमुना के दो-आब का क्षेत्र बड़ा ही उपजाऊ प्रदेश था और वहाँ के हिन्दू प्रायः विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देते थे।

अतः सुल्तान ने दो-आब के क्षेत्र में उपज का 50 प्रतिशत मालगुजारी के रूप में वसूल करने की आज्ञा दी। हिन्दुओं को जजिया, चुंगी तथा अन्य कर भी पूर्ववत् देने पड़ते थे। चौधरी और मुकद्दम लोगों को घोड़ों पर चढ़ने, हथियार रखने, अच्छे वस्त्र पहनने, पान खाने से मनाही कर दी गई। इस प्रकार हिन्दुओं की समस्त सुविधाएँ छीन ली गईं और उनके साथ बड़ी क्रूरता का व्यवहार किया गया।

इन उपायों से राजकीय आय में भारी वृद्धि हो गई किंतु जनता पर करों का बोझ बढ़ गया। करों का अधिकांश बोझ हिन्दुओं पर ही पड़ा जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि था और जिन्हें भूमि-लगान के अतिरिक्त कई प्रकार के कर देने पड़ते थे।

आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि राज्य में हिन्दुओं की स्थिति क्या होनी चाहिए, इस विषय में अल्लाउद्दीन खिलजी ने बयाना के काजी मुगीसुद्दीन की सलाह ली। काजी ने सुल्तान को सलाह दी कि-

‘शरा में हिन्दुओं को खराज-गुजर अर्थात् कर देने वाला कहा गया है और जब कोई माल का अफसर अर्थात् कर-अधिकारी किसी हिन्दू से चांदी मांगे तो उसका कर्तव्य है कि बिना किसी पूछताछ के और बड़ी नम्रता के साथ कर अधिकारी को सोना दे दे।

यदि अफसर उसके मुंह में धूल फैंके तो उसे लेने के लिए बिना हिचकिचाहट उसे अपना मुंह खोल देना चाहिए। इस प्रकार अपमानजनक कार्यों में ‘जिम्मी’ इस्लाम के प्रति अपनी आज्ञापालन की भावना का प्रदर्शन करता है। ईश्वर ने स्वयं उन्हें अपमानित करने की आज्ञा दी है

….. अल्लाह के दूत ने हमें काफिरों का वध करने, उन्हें लूटने तथा बंदी बनाने का आदेश दिया है …… महान इमाम अबू हनीफा ने जिसके धर्म का हम अनुसरण करते हें, हिन्दुओं पर जजिया लगाने की अनुमति दी है। अन्य इस्लामी धर्माधीशों के अनुसार हिन्दुओं के लिए नियम है कि वे मृत्यु अथवा इस्लाम में से एक का वरण करें।’

अल्लाउद्दीन ने काजी की सलाह का हृदय से स्वागत किया। वह अपने राज्य की बहुसंख्यक हिन्दू जनता के प्रति इसी नीति का अनुसरण करता आया था। इसलिए काजी की राय सुनकर उसे प्रसन्नता हुई। हिन्दू प्रजा पर अत्याचार करने के लिए वह नए-नए उपाय खोजने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुर्की अमीरों का दमन (115)

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तुर्की अमीरों का दमन

अल्लाउद्दीन खिलजी ने तुर्की अमीरों का दमन करने के लिए उनकी शराब और वेश्याएं छीन लीं। तुर्की अमीर न तो शराब के बिना रह सकते थे और न वेश्याओं के बिना। इसलिए वे सुल्तान के विरुद्ध हो गए किंतु सुल्तान की शक्ति के कारण खुलकर बगावत नहीं कर सके।

सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने एक ओर तो मुस्लिम अमीरों एवं जनता की निजी सम्पत्ति छीन ली तथा दूसरी ओर हिन्दू जमींदारों की भूमि को खालसा घोषित करके उन्हें निर्धनता के गर्त में धकेल दिया। अल्लाउद्दीन खिलजी ने किसानों पर पचास प्रतिशत मालगुजारी लगाकर, व्यापारियों पर चुंगी लगाकर एवं समस्त हिंदुओं पर जजिया तथा तीर्थकर आदि लगाकर उनका धन छीन लिया।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने उन सैनिकों का भी भला नहीं किया जिनके बल पर वह अपने राज्य का विस्तार कर रहा था और भारत भर के हिन्दू राजाओं को लूटकर अपना खजाना भर रहा था। उसने सैनिकों को राज्य की ओर से दी गई समस्त प्रकार की भूमि छीनकर उन्हें विशुद्ध वेतन पर नौकरी प्रदान की।

अल्लाउद्दीन खिलजी जानता था कि तुर्की अमीर तो विद्रोही प्रकृति के थे ही किंतु गैर-तुर्की अमीर भी कुछ कम बदमाश नहीं थे। वे सब अपने-अपने गुट बनाकर सुल्तान को वश में करने के लिए षड़यंत्र एवं विद्रोह रचते रहते थे। अल्लाउद्दीन खिलजी की स्वेच्छाचारिता तथा निरंकुशता की नीति से बहुत से तुर्की एवं गैर-तुर्की अमीरों में उसके विरुद्ध अत्यधिक असन्तोष पनप गया।

उस काल में दिल्ली में हाजी मौला नामक एक असन्तुष्ट अधिकारी रहता था। वह काजी अलाउलमुल्क की मृत्यु के उपरान्त दिल्ली का कोतवाल बनना चाहता था। उसने अल्लाउद्दीन खिलजी के समक्ष अपनी इच्छा व्यक्त की परन्तु अल्लाउद्दीन खिलजी ने तमर्दी नामक एक अन्य अधिकारी को दिल्ली का कोतवाल बना दिया।

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सुल्तान के इस निर्णय से हाजी मौला को बड़ी निराशा हुई और वह सुल्तान के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगा। जब सुल्तान रणथम्भौर के घेरे के दौरान सकंटापन्न स्थिति में था, तब हाजी मौला ने दिल्ली के कोतवाल तमर्दी की हत्या करके राजकोष पर अधिकार कर लिया।

इस पर अल्लाउद्दीन ने उलूग खाँ को उसका दमन करने के लिए भेजा परन्तु उसके दिल्ली पहुँचने के पहले ही हमीदुद्दीन नामक एक सैनिक ने हाजी मौला की हत्या कर दी। अल्लाउद्दीन खिलजी के आदेश से हाजी मौला के समस्त सम्बन्धियों तथा समर्थकों की भी निर्दयता पूर्वक हत्या कर दी गई ताकि भविष्य में फिर कभी कोई व्यक्ति सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह करने की न सोचे।

पाठकों को स्मरण होगा कि अल्लाउद्दीन ने जलाली अमीरों को तो पहले ही नष्ट कर दिया था जिन्होंने धन अथवा पद के प्रलोभन से विरोधियों का साथ दिया था। उनकी सम्पत्ति छीनकर उनकी आँखें निकलवा ली थीं और उन्हें जेल में बंद कर दिया था। अब सुल्तान ने अन्य विरोधी अमीरों को उन्मूलित करने के लिए अनेक उच्च पदाधिकारियों तथा उनके सम्बन्धियों को विष दिलवा कर मरवा दिया।

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अल्लाउद्दीन ने अनुभव किया कि सल्तनत का गुप्तचर विभाग ढंग से कार्य नहीं कर रहा है। इस कारण सुल्तान को समय रहते षड़यंत्रों तथा साम्राज्य के विभिन्न भागों में घटने वाली घटनाओं की जानकारी नहीं मिल पाती। इसलिए सुल्तान ने गुप्तचर-विभाग का नए सिरे से संगठन किया। गुप्तचरों को अमीरों तथा राज्याधिकारियों के घरों, कार्यालयों, नगरों तथा गाँवों में नियुक्त किया गया। इससे अमीरों के बारे में छोटी से छोटी सूचना सुल्तान तक पहुँचने लगी। इसका परिणाम यह हुआ कि अमीरों, राज्याधिकारियों तथा साधारण लोगों की गुप्त बैठकें समाप्त हो गईं। अल्लाउद्दीन ने यह भी अनुभव किया कि सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह का एक बड़ा कारण अमीरों की मद्यपान गोष्ठियों में होने वाली चर्चाएं हैं। इन गोष्ठियों में सुल्तान तथा अन्य अमीरों के विरुद्ध षड्यन्त्र रचे जाते थे। अतः अमीरों द्वारा किए जाने वाले मद्यपान को रोकना आवश्यक समझा गया। अल्लाउद्दीन ने स्वयं मद्यपान त्याग दिया और अन्य लोगों को भी शराब पीने से रोक दिया। अल्लाउद्दीन ने शराब पीने के अपने बहुमूल्य बर्तन तुड़वा दिए और आज्ञा दी कि दिल्ली में जितनी शराब है वह सड़कों पर फैंक दी जाये। सुल्तान की आज्ञा का पालन किया गया और दिल्ली की सड़क शराब से भर गयी।

सुल्तान ने यह भी आज्ञा दी कि यदि कोई व्यक्ति मद्यपान किये हुए मिले तो उसे दिल्ली के बाहर एक गड्ढे में फिंकवा दिया जाय। सुल्तान की आज्ञा का उल्लंघन करने वालों को कठोर दण्ड देने की व्यवस्था की गई।

अमीरों के परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध एवं दावतें भी विद्रोहों का कारण समझी गईं। इनके माध्यमों से अमीरों को धड़ेबंदी करने एवं सुल्तान के विरुद्ध संगठित होने का अवसर मिलता था। इस कारण जब कभी किसी एक अमीर के विरुद्ध कार्यवाही की जाती थी, तब उस गुट के अन्य अमीर भी विद्रोह पर उतर आते थे।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने तुर्की अमीरों का दमन करने के लिए अमीरों की दावतें बन्द करवा दीं और उन्हें एक-दूसरे के यहाँ आने-जाने तथा दावत करने से मना कर दिया। बिना सुल्तान की आज्ञा के अमीर लोग परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध भी नहीं स्थापित कर सकते थे। इससे अमीरों के गुट धीरे-धीरे समाप्त होने लगे।

अल्लाउद्दीन के पूर्ववर्ती सुल्तानों की कमजोरी एवं उनकी हत्याओं के सिलसिले का लाभ उठाकर कुछ अमीरों ने अत्यधिक धन एकत्रित कर लिया था। इस धन का उपयोग सुल्तान के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने में होता था। धन कमाने की चिंता नहीं होने के कारण अमीरों को विद्रोहों के बारे में सोचने का अवकाश प्राप्त हो जाता था।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने तुर्की अमीरों का दमन करने के लिए उन पर तरह-तरह के आरोप लगाकर धनी अमीरों की सम्पत्ति को छीनना आरम्भ किया जो उन लोगों को जागीर, इनाम अथवा दान के रूप में प्राप्त हुई थी। बहुत से लोगों की पेन्शनें छीन ली गईं। जिन्हें कर-मुक्त भूमि मिली थी, उनकी भूमि पर फिर से कर लगा दिया गया। इससे सुल्तान को पर्याप्त धन मिल गया और अमीरों की समृद्धि पर अंकुश लग गया। इस कारण वेश्याओं के अड्डे उजड़ गए। नाच-गाने और मुजरे बंद हो गए।

अल्लाउद्दीन ने अनुभव किया कि दिल्ली से दूर स्थित प्रांतीय एवं स्थानीय शासकों पर सुल्तान का प्रत्यक्ष नियन्त्रण नहीं होने से, उन्हें भी दिल्ली के अमीरों की भांति धन एकत्रित करने तथा उसकी सहायता से विद्रोह करने का अवसर प्राप्त हो जाता था। इसलिए अल्लाउद्दीन खिलजी ने प्रांतीय सेनाओं पर अपना सीधा नियन्त्रण स्थापित करके प्रांतपतियों की शक्ति को कम करने का प्रयत्न किया।

अल्लाउद्दीन ने प्रान्तों में रहने वाली सेना की नियुक्ति तथा सैनिकों का नियन्त्रण, स्थानान्तरण, पद-वृद्धि आदि सारे कार्य अपने हाथ में ले लिये। उसने इस बात पर जोर दिया कि प्रान्तपति निर्धारित संख्या में सैनिक रखें तथा उन्हें पूरा वेतन दें। इस प्रकार तुर्की अमीरों का दमन करने के पश्चात् किए गए इन उपायों से प्रांतपतियों पर भी सुल्तान का नियंत्रण स्थापित हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी का दण्डविधान (116)

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अल्लाउद्दीन खिलजी का दण्डविधान

अल्लाउद्दीन खिलजी का दण्डविधान बहुत कठोर था। वह मामूली अपराध के संदेह में हाथ-पैर कटवा देता था। अपराधी को सरेआम कोड़े लगवाने से लेकर फांसी पर चढ़ाना उसके दण्डविधान के अनिवार्य अंग थे।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने तुर्की एवं गैर-तुर्की अमीरों की सम्पत्तियां छीनकर उन्हें इतना कमजोर कर दिया कि अब वे सुल्तान के विरुद्ध न तो कोई गुट बना सकते थे और न विद्रोह कर सकते थे। इस उपाय से चालीसा मण्डल का बचा-खुचा प्रभाव भी नष्ट हो गया तथा सल्तनत में सुल्तान अकेला ही सर्वोच्च अधिकारी के रूप में प्रतिष्ठिति हो गया। हालांकि दिल्ली सल्तनत ई.1293 से ही अस्तित्व में आ गई थी किंतु सुल्तान की अबाध निरंकुशता अल्लाउद्दीन खिलजी के शासन काल में आकर स्थापित हुई।

दिल्ली सल्तनत में अपनाई गई अब तक की शासन पद्धति में सुल्तान का जनता से प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं था। इसके कारण जनता, विशेषकर हिन्दू जनता, सुल्तान की ओर से उदासीन बनी रहती थी और स्थानीय लोगों के भड़कावे में आकर सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देती थी। इस कारण अल्लाउद्दीन खिलजी ने न्याय व्यवस्था एवं दण्ड विधान में भी आमूलचूल परिवर्तन किए।

अल्लाउद्दीन खिलजी का दण्डविधान अत्यन्त कठोर था। उसके राज्य में अपराधी तथा उसके साथियों और सम्बन्धियों को बिना किसी प्रमाण के केवल सन्देह के कारण मृत्यु-दण्ड दिया जाता था। अपराधियों को प्रायः अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था। कठोर दण्ड विधान से जनता में शासन के प्रति भय बैठ गया। लोग अपराध करने, बगावत करने तथा विवाद में पड़ने से डरने लगे।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपनी मुस्लिम प्रजा के लिए न्याय की समुचित व्यवस्था की। हिन्दुओं के झगड़ों का न्याय भी मुस्लिम काजियों द्वारा किया जाता था किंतु हिन्दुओं के झगड़ों का निबटारा अलग प्रकर से किया जाता था। मुसलमान प्रजा की बजाय हिन्दुओं पर अधिक कड़े दण्ड लगाये जाते थे तथा अधिक कड़ी शारीरिक यातानाएं दी जाती थीं। इस प्रकार अल्लाउद्दीन खिलजी का दण्डविधान हिन्दुओं एवं मुसलमानों के लिए अलग-अलग था।

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सरे आम कोड़े मारना, भूखे-प्यास इंसानों को खम्भे से बांधकर कई दिनों तक धूप में पटके रखना, जूतों से पिटवाना, स्त्री एवं पुत्री को छीन लेना, सम्पत्ति जब्त कर लेना, घर में आग लगवा देना उस काल के दण्ड विधान के अनिवार्य अंग थे। अल्लाउद्दीन से पहले, दिल्ली सल्तनत की न्याय व्यवस्था, मुस्लिम धर्मग्रन्थों पर आधारित थी परन्तु अल्लाउद्दीन ने उसे लौकिक स्वरूप प्रदान किया। उसने इस्लाम की उपेक्षा नहीं की परन्तु उसने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया कि परिस्थिति तथा लोक कल्याण के विचार से जो नियम उपयुक्त हों, वही राजनियम अपनाए जाने चाहिए।

अल्लाउद्दीन ने न्याय करने वाले काजियों की संख्या में वृद्धि कर दी ताकि लोगों को न्याय प्राप्त करने एवं अपने झगड़ों का निबटारा करवाने के लिए अधिक दिनों तक नहीं भटकना पड़े तथा अपराधियों को जल्दी से जल्दी सजा दी जा सके। अल्लाउद्दीन खिलजी ने काजी की सहायता के लिए पुलिसकर्मियों एवं गुप्तचरों की समुचित व्यवस्था की। ये लोग अपराधों एवं अपराधियों के अन्वेषण में काजी की सहायता किया करते थे।

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जिस प्रकार काजी न्याय-व्यवस्था का अधिकारी था, उसी प्रकार नगर-कोतवाल प्रत्येक नगर में पुलिस-व्यवस्था का प्रधान होता था। उसका प्रधान कर्त्तव्य अपराधों का अन्वेषण करना एवं अपराधी को पकड़कर काजी के समक्ष प्रस्तुत करना होता था। मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि राज्य के समस्त पदाधिकारी बड़ी सतर्कता तथा ईमानदारी के साथ काम करते थे क्योंकि नियमानुसार कार्य न करने वालों को कठोर दण्ड दिए जाते थे। तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि यद्यपि अल्लाउद्दीन खिलजी को अपनी आय का अधिकांश भाग युद्धों में ही व्यय करना पड़ता था तथापि उसने सार्वजनिक हित के भी बहुत से कार्य किए। उसने दिल्ली के पास एक सुन्दर महल बनवाया। इस्लामी विद्वानों तथा फकीरों को सुल्तान का आश्रय प्राप्त था। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि अल्लाउद्दीन खिलजी निरा अशिक्षित व्यक्ति था। निरक्षर होने के उपरांत भी उसमें नैसर्गिक बौद्धिक प्रतिभा विद्यमान थी। उसे योग्य व्यक्तियों की अद्भुत परख थी जिससे वह योग्य व्यक्तियों की सेवाएँ प्राप्त कर सका था। अल्लाउद्दीन खिलजी ने कवि टेनिसन के कथन को सिद्ध कर दिया कि ‘केवल वही शासन कर सकता है जो पढ़-लिख नहीं सकते।’

तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकार अल्लाउद्दीन खिलजी की शासन व्यवस्था की भले ही कितनी ही प्रशंसा क्यों न करें, वास्तविकता यह है कि उसकी राज्य व्यवस्था सैनिक शक्ति पर आधारित थी। उसके समस्त सुधार सुल्तान की सैनिक शक्ति को बढ़ाने के लिए किये गए थे। ऐसा शासन दीर्घकालीन नहीं हो सकता था।

जैसे-जैसे सुल्तान की शारीरिक एवं मानसिक शक्तियाँ क्षीण होने लगीं, वैसे-वैसे उसकी नीतियों के प्रति असन्तोष भी बढ़ने लगा। बहुत से लोग सुल्तान की योजनाओं से असन्तुष्ट थे। मुस्लिम अमीर अपनी जागीरें एवं अधिकार फिर से प्राप्त करने की ताक में थे। राजपूत जागीरदार एवं पुराने राजवंश अपने खोये हुए राज्यों को फिर से प्राप्त करने के लिए प्रयासरत थे। जनता करों के बोझ से कराह रही थी।

व्यापारी वर्ग भी सुल्तान की नीतियों से असंतुष्ट था। वस्तुओं के भाव निश्चित कर देने से व्यापारी वर्ग लाभ से वंचित हो गया था। जो व्यापारी दिल्ली से बाहर जाते थे, उनके कुटुम्ब पर शासन द्वारा पूरा नियंत्रण रखा जाता था। इससे उनके परिवारों की सुरक्षा पर हर समय खतरा बना रहता था।

किसान और हिन्दू जनता, करों के अत्यधिक बोझ से दब गई थी। गुप्तचर विभाग की मनमानी से लोगों में असंतोष बढ़ गया था। सुल्तान के अतिरिक्त किसी और व्यक्ति को शासन के सम्बन्ध में निर्णय लेने और उसे लागू करने का अधिकार नहीं था। ऐसी व्यवस्था तब तक ही चल सकती थी जब तक कि सुल्तान में उसे चलाने की योग्यता रहे। इन सब कारणों से उसकी व्यवस्था स्थायी नहीं हो सकी और उसके आँखें बन्द करने से पहले ही यह व्यवस्था चरमराने लगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता ने मिस्र के फैरोह को पीछे छोड़ दिया (117)

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अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता ने मिस्र के फैरोह को पीछे छोड़ दिया

भारत के इतिहास की पुस्तकें अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता के किस्सों से भरी पड़ी हैं। कहा जाता है कि उसने मनुष्यों का रक्तपात करने के मामले में मिस्र के फैरोह को भी पीछे छोड़ दिया।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपनी सल्तनत को सैनिक शासन के आधार पर खड़ा किया जो उसके क्षमतावान रहने तक ही खड़ी रह सकती थी। वस्तुतः उसकी शासन व्यवस्था की सफलता इस बात पर अधिक निर्भर करती थी कि उसे संचालित करने वाले लोग कितने शुष्क, हृदय-हीन, निर्मोही एवं क्रूर हैं।

अल्लाउद्दीन खिलजी अत्यंत शुष्क स्वभाव का व्यक्ति था। इस कारण वह पारिवारिक प्रेम से सदैव वंचित रहा। यद्यपि उसके हरम में अनेक स्त्रियाँ थीं परन्तु उसकी एक भी स्त्री उसके हृदय पर अधिकार नहीं जमा सकी। वह क्रूरता तथा निर्दयता का साक्षात् स्वरूप था। पूर्ववर्ती सुल्तान जलालुद्दीन की हत्या, अपने सगे-सम्बन्धियों की हत्याएं, नव-मुसलमानों तथा उनके निर्दोष स्त्री-बच्चों की निर्मम हत्याएं सुल्तान की क्रूरता के प्रमाण हैं।

अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता के सम्बन्ध में जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है- ‘अल्लाउद्दीन ने मिस्र के फैरोह से भी अधिक संख्या में निर्दोष मनुष्यों का रक्तपात किया।’

इतिहासकार वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘अल्लाउद्दीन वास्तव में बर्बर अत्याचारी था। उसके हृदय में न्याय के लिए तनिक भी स्थान नहीं था …… उसका शासन लज्जापूर्ण था।’

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अल्लाउद्दीन खिलजी परले दरजे का शंकालु व्यक्ति था। उसमें प्रतिशोध की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। यदि उसे किसी की विश्वसनीयता पर सन्देह हो जाता तो उसके प्राण लिए बिना उसका पीछा नहीं छोड़ता था। वह इतना कृतघ्न था कि उसने उन्हीं अमीरों का दमन किया जिनके सहयोग से उसने तख्त प्राप्त किया था। मलिक काफूर के परामर्श पर उसने अपने पुत्रों को बंदी बना लिया।

नैतिकता का प्रश्न अल्लाउद्दीन को कभी भी तंग नहीं करता था। अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता का आलम यह था कि उसने कर्ण बघेला की रानी कमलावती को अपनी बेगम बना लिया तथा कमलावती की पुत्री देवलदेवी को अपने पुत्र खिज्र खाँ की बेगम बना दिया। अल्लाउद्दीन को कबूतरबाजी, लौण्डेबाजी तथा बाज उड़ाने का बड़ा शौक था। इन कार्यों के लिए उसने उसने अपनी सेवा में कई बालकों को नियुक्त कर रखा था।

निरक्षर होने के कारण अल्लाउद्दीन खिलजी कुरान का अध्ययन नहीं कर सकता था, न वह रमजान में रोजे रखता था, न नमाज पढ़ता था और न राज्य के शासन में उलेमाओं एवं मौलवियों का हस्तक्षेप होेने देता था परन्तु उसका इस्लाम में दृढ़ विश्वास था। वह अपने सामने कभी भी किसी मनुष्य को गैर-इस्लामिक बात नहीं करने देता था। उसकी कठोर नीतियों के कारण बहुसंख्यक हिन्दुओं पर भारी कुठाराघात हुआ।

अल्लाउद्दीन कट्टर सुन्नी मुसलमान होने पर भी सूफी दरवेश निजामुद्दीन औलिया में बड़ी आस्था रखता था। राजवंश के लगभग समस्त सदस्य निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि अनपढ़ होने एवं इस्लाम में दृढ़ आस्था होने पर भी अल्लाउद्दीन एक नया धर्म चलाना चाहता था। काजी अलाउल्मुल्क के समझाने पर उसने ऐसा करने का विचार छोड़ दिया।

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यद्यपि अल्लाउद्दीन हठधर्मी एवं अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था तथापि वह अपने विश्वसनीय लोगों का परामर्श स्वीकार कर लेता था। वह किसी भी योजना को कार्यान्वित करने से पूर्व उसकी अच्छी तरह तैयारी करता था। यद्यपि वह साम्राज्य विस्तार का इच्छुक था किंतु उसने दक्षिण भारत के राजाओें पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त उनके राज्य मुस्लिम गवर्नरों को न सौंपकर उन्हीं राजाओं को करद बनाकर सौंप दिए थे। इससे उसकी व्यावहारिक बुद्धि का परिचय मिलता है। कुछ इतिहासकार अल्लाउद्दीन की सामरिक विजयों का श्रेय उसके सेनापतियों को देते हैं परन्तु यह निष्कर्ष उचित नहीं है। जलालुद्दीन खिलजी के शासन काल में अल्लाउद्दीन ने कई बड़ी विजयें प्राप्त कीं जिनसे वह सेना में लोकप्रिय हो गया। उसने मलिक छज्जू के विद्रोह का दमन किया और भिलसा तथा देवगिरि को जीतकर अपने सैनिक गुणों का परिचय दिया। अल्लाउद्दीन ने तख्त पर बैठने के उपरान्त रणथंभौर, चित्तौड़, सिवाना एवं जालौर के युद्धों में स्वयं भाग लिया। उसने दक्षिण विजय का दायित्व मलिक काफूर को इसलिए सौंपा क्योंकि अल्लाउद्दीन मंगोलों के आक्रमणों एवं अमीरों की षड़यंत्रकारी प्रवृत्ति के कारण राजधानी से दूर नहीं जाना चाहता था। वह अपने लक्ष्य को सदैव सर्वोपरि रखता था और उसकी पूर्ति के लिए नैतिक-अनैतिक समस्त प्रकार के साधनों का प्रयोग करने के लिए उद्यत रहता था।

अल्लाउद्दीन में अपने अमीरों, सेनापतियों एवं राज्याधिकारियों का पथ-प्रदर्शन करने एवं उन्हें नई दिशा देने की अद्भुत प्रतिभा थी। उसके द्वारा किये गए अधिकांश सेना सम्बन्धी सुधारों तथा भूमि-सम्बन्धी सुधारों का अनुसरण आगे चलकर शेरशाह सूरी तथा अकबर आदि शासकों ने किया।

यद्यपि अल्लाउद्दीन स्वयं शिक्षित नहीं था परन्तु वह इस्लामिक विद्वानों का आदर करता था और उन्हें प्रश्रय देता था। अमीर खुसरो तथा हसन उसके समय के बहुत बड़े विद्वान थे। अल्लाउद्दीन उन्हें बहुत आदर देता था। बहुसंख्य हिन्दू विद्वानों के प्रति उसे कोई लगाव नहीं था।

आलाउद्दीन को स्थापत्य कला से प्रेम था। उसने बहुत से दुर्गों का निर्माण करवाया। दिल्ली में उसने अलाई दरवाजा, सीरी दुर्ग तथा हौज खास बनवाए। उसने बहुत सी भग्न मस्जिदों का जीर्णोद्धार करवाया। ई.1311 में उसने कुतुब मस्जिद को विस्तृत करने और उसके सहन में एक नयी मीनार बनवाने का कार्य आरम्भ करवाया।

दिल्ली के सुल्तानों में अल्लाउद्दीन का नाम महत्त्वपूर्ण है। जिस समय वह तख्त पर बैठा था, उस समय दिल्ली सल्तनत की स्थिति बड़ी डावांडोल थी। मंगोलों के आक्रमण का सदैव भय लगा रहता था, आन्तरिक विद्रोह की सदैव सम्भावना बनी रहती थी, अमीर सदैव अवज्ञा करने को उद्यत रहते थे और अधिकांश जनता असन्तुष्ट थी।

इस प्रकार तख्त पर बैठने के समय अल्लाउद्दीन की स्थिति संकटापन्न थी परन्तु उसने धैर्य तथा साहस से संकटों का सामना किया और ई.1296 से लेकर ई.1316 तक, पूरे 20 वर्ष सफलतापूर्वक शासन किया।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता, शुष्कता एवं हृदयहीनता ने दिल्ली सल्तनत को उसके विस्तार के चरम पर पहुंचा दिया किंतु उसके काल में प्रजा का जो संहार हुआ, उसकी तुलना विश्व के किसी अन्य शासक से नहीं की जा सकती!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन सर्वथा गौरवहीन था (118)

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अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन सर्वथा गौरवहीन था

कई इतिहासकारों की दृष्टि में अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली के सुल्तानों में सर्वश्रेष्ठ था किंतु कई अन्य इतिहासकार इस बात से सहमत नहीं हैं। वी. ए. स्मिथ ने उसके शासन को सर्वथा गौरवहीन बताते हुए लिखा है कि वह वास्तव में बड़ा ही बर्बर तथा क्रूर शासक था और न्याय का बहुत कम ध्यान रखता था। इसके विपरीत एल्फिन्स्टन के विचार में अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन बड़ा ही गौरवपूर्ण था।

जो विद्वान अल्लाउद्दीन को दिल्ली सल्तनत का सर्वश्रेष्ठ सुल्तान मानते हैं उनका मानना है कि अल्लाउद्दीन एक वीर सैनिक तथा कुशल सेनानायक था। वह महत्त्वाकांक्षी, साहसी, दृढ़प्रतिज्ञ तथा प्रतिभावान शासक था। दिल्ली के सुल्तानों में कोई भी ऐसा नहीं है जौ सैनिक दृष्टिकोण से उसकी समता कर सके। सुल्तान में ऐसे गुण थे कि जो भी लोग उसकी अधीनता में कार्य करते थे, वे उसके अनुगामी हो जाते थे और सदैव सुल्तान के हित-साधन में संलग्न रहते थे।

यद्यपि अल्लाउद्दीन के पूर्ववर्ती तुर्क सुल्तानों ने भी भारत विजय का कार्य किया था परन्तु लगभग सम्पूर्ण भारत में तुर्क साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक अल्लाउद्दीन खिलजी ही था। उसने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं से प्रेरित होकर साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया और एक अत्यन्त विशाल साम्राज्य की स्थापना की।

साम्राज्य संस्थापक के रूप में अल्लाउद्दीन ने तीन बड़े कार्य किए-

1. उत्तर भारत के राजपूत राज्यों पर विजय, जिससे अब तक के सुल्तान बचते रहे थे।

2. दक्षिण भारत की विजय जिसे करने की हिम्मत किसी अन्य सुल्तान ने नहीं की थी।

3. पश्चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था।

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अल्लाउद्दीन के केवल ये तीन कार्य ही उसे दिल्ली के सुल्तानों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान करने के लिए पर्याप्त हैं। अल्लाउद्दीन ने लगभग बीस वर्ष तक अत्यन्त सफलतापूर्वक शासन किया। उसके सम्पूर्ण शासन काल में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित रही। राज्य में चोरी, डकैती तथा लूटमार नहीं होती थी। उसका दण्ड विधान इतना कठोर था कि लोगों को अपराध करने तथा झगड़ा करने का साहस नहीं होता था।

अल्लाउद्दीन में उच्चकोटि की मौलिकता थी। उसके पूर्ववर्ती सुल्तानों ने जो संस्थाएं स्थापित की थीं, अल्लाउद्दीन उनसे संन्तुष्ट नहीं रहा और उसने उन संस्थाओं में कई बड़े परिवर्तन किये। उसने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्थायी सेना की व्यवस्था, भूमि सम्बधी नियमों का निर्माण, बाजारों का प्रबंधन आदि ऐसे कार्य किए जो उससे पहले किसी ने नहीं किए थे।

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इन इतिहासकारों की दृष्टि में अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली का प्रथम सुल्तान था जिसने सम्पूर्ण उत्तरी भारत तथा दक्षिण पर सत्ता स्थापित करके राजनीतिक एकता स्थापित की। उसने प्रान्तीय शासन को केन्द्रीय शासन के अनुशासन तथा नियंत्रण में लाकर शासन में एकरूपता स्थापित की। इल्तुतमिश ने मुल्ला-मौलवियों को राज्यकार्य में हस्तक्षेप करने की पूरी छूट दी थी जबकि रजिया ने मुल्ला-मौलवियों को मुंह नहीं लगाया। बलबन ने मुल्ला-मौलवियों को सिर पर तो बैठाया किंतु उन्हें राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करने दिया। मुल्ला-मौलवियों के मामले में अल्लाउद्दीन ने बलबन की नीति का अनुसरण किया। अल्लाउद्दीन की शासन-व्यवस्था का महत्त्व इस बात से प्रकट होता है कि शेरशाह सूरी तथा अकबर ने भी अपनी शासन व्यवस्था में उसके सिद्धांतों का समावेश किया। अल्लाउद्दीन स्वयं शिक्षित नहीं था परन्तु उसके दरबार में अमीर खुसरो, जियाउद्दीन बरनी तथा अमीर हसन आदि विद्वान रहते थे। अल्लाउद्दीन ने कई दुर्ग, मस्जिद एवं महल बनवाए। अल्लाउद्दीन को श्रेष्ठ मानने वाले इतिहासकारों के अनुसार उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर उसे दिल्ली के सुल्तानों में सर्वोत्कृष्ट स्थान मिलना चाहिए किंतु जो इतिहासकार अल्लाउद्दीन खिलजी को दिल्ली के सुल्तानों में सर्वश्रेष्ठ नहीं मानते, उनके अनुसार अल्लाउद्दीन ने कोई ऐसा कार्य नहीं किया जो स्थायी हो सका।

अल्लाउद्दीन के समकालीन शेख वशीर दीवाना ने लिखा है- ‘अल्लाउद्दीन के राज्य की कोई स्थायी नींव नहीं थी और खिलजी वंश के विनाश का कारण अल्लाउद्दीन के शासन की स्वाभाविक दुर्बलता थी।’

जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘स्वेच्छाचारी शासन स्वभावतः अनिश्चित तथा अस्थायी होता है।’

अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन भी स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था। राज्य की सारी शक्तियां केवल सुल्तान में केन्द्रीभूत थीं। इसलिए अल्लाउद्दीन का शासन अच्छा नहीं माना जा सकता और न ही उसे दिल्ली सल्तनत का सबसे महान सुल्तान माना जा सकता है। अल्लाउद्दीन ने अपनी सेना के बल पर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी और सेना के बल पर ही बीस साल तक उस पर शासन किया था। जिस सुल्तान का शासन जनता की इच्छा पर आधारित नहीं होकर सैनिक शक्ति द्वारा चलाया जाये, वह महान् नहीं माना जा सकता।

यदि हम इतिहासकारों की राय से निरपेक्ष होकर आकलन करें तो हम जान लेते हैं कि अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन बड़ा ही क्रूर, निर्दयी तथा गौरवहीन था। वह बर्बरता तथा नृशंसता के साथ लोगों को दण्ड देता था। साधारण अपराधों के लिए भी अंग-भंग तथा मृत्यु दण्ड दिया करता था। वह बड़ा ही स्वार्थी था और अपने हित के लिए अपने निकटतम सम्बन्धियों एवं राज्याधिकारियों की हत्या करने में संकोच नहीं करता था।

सुल्तान का व्यक्तिगत जीवन बड़ा ही घृणित था। वह अस्वाभाविक संसर्ग का व्यसनी था। उसने दूसरे राजा की पत्नी छीनकर उसे अपनी बेगम बनाया। उसने अपने उन पुत्रों को जेल में डाला जिन्हें आगे चलकर सुल्तान बनना था!

सुल्तान अपनी हिन्दू प्रजा को घृणा तथा सन्देह की दृष्टि से देखता था तथा उसे सब प्रकार से अपमानित एवं पददलित करने का प्रयत्न करता था। हिन्दुओं को दरिद्र तथा विपन्न बनाना उसकी नीति का एक अंग था ताकि वे कभी भी सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह न कर सकें।

अल्लाउद्दीन की समस्त सुधार योजनाएं सुल्तान तथा सल्तनत की स्वार्थपूर्ति के उद्देश्य से आरम्भ की गई थीं न कि लोक-कल्याण के लिये। उसकी योजनाओं से केवल उसके सैनिकों को लाभ हुआ, जनसाधारण को नहीं। उसकी सारी योजनाएं युद्धकालीन थीं जो शान्ति कालीन शासन के लिए अनुपयुक्त थीं।

अल्लाउद्दीन ने ऐसे युग में शासन किया था जब केन्द्रीभूत शासन की आवश्यकता थी परन्तु केन्द्रीभूत शासन की भी कुछ सीमाएं होती हैं। अल्लाउद्दीन इन सीमाओं का उल्लंघन कर गया। उसने केवल थोड़े से व्यक्तियों की सहायता से शासन किया, इसलिए उसका शासन लोकप्रिय नहीं बन सका और जब इन सहायकों की मृत्यु हो गई, तब उसके साम्राज्य का पतन हो गया।

अल्लाउद्दीन में साहित्य तथा कला के संवर्द्धन की प्रवृत्ति नहीं थी। उसका सारा ध्यान सेना को प्रबल बनाने तथा राज्य जीतने की ओर रहा। इसलिए सांस्कृतिक दृष्टि से उसका शासन गौरवहीन था। अल्लाउद्दीन अपने अमीरों को नीचा दिखाने के लिए प्रायः निम्न वर्ग के अयोग्य लोगों को प्रोत्साहन देकर उन्हें उच्च पद दिया करता था जो साम्राज्य के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ।

अल्लाउद्दीन ने अपने पुत्रों को उचित शिक्षा नहीं दिलवाई और अपने उत्तराधिकारियों की रक्षा करने की बजाय उन्हें कारागृह में बंद कर दिया। उपर्युक्त तर्कों आधार पर कहा जा सकता है कि अल्लाउद्दीन का शासन सर्वथा गौरवहीन था और दिल्ली के सुल्तानों में उसे सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान नहीं किया जा सकता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिन (119)

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अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिन

अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिन अच्छे नहीं बीते। वह हर समय शराब के नशे में धुत्त रहता था और अपने महल में अकेला पड़ा हुआ पागलों की तरह दहाड़ें मार कर रोता था!

अल्लाउद्दीन खिलजी का जन्म ई.1266 में हुआ था। तीस साल की आयु में अर्थात् ई.1296 में वह सुल्तान बना था और ई.1316 तक वह शासन करता रहा किंतु उसके शासनकाल में ई.1312 से लेकर ई.1316 तक का समय प्रतिक्रिया का काल माना जाता है।

ई.1312 तक अल्लाउद्दीन खिलजी के समस्त उद्देश्य पूरे हो चुके थे। साम्राज्य विस्तार का कार्य पूरा हो चुका था। मंगोलों को बुरी तरह परास्त किया जा चुका था। उत्तर भारत में स्थानीय शासन पर भी कब्जा कसा जा चुका था तथा दक्षिण भारत में राजाओं से वार्षिक कर देना स्वीकार करवाकर उन्हें दिल्ली के अधीन लाया जा चुका था।

ई.1312 के आते-आते अल्लाउद्दीन खिलजी थकने लगा। मात्र 46 वर्ष की आयु में उसे बुढ़ापे ने घेर लिया जिसके कारण सुल्तान की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रह गयी। उसके कई विश्वस्त अमीर एवं सेनापति भी मर गए।

राज्य की सैनिक शक्ति ई.1306 से ही धीरे-धीरे मलिक काफूर के हाथों में जाने लगी थी तथा ई.1312 के बाद मलिक काफूर का सेना पर पूरा नियंत्रण स्थापित हो गया। यद्यपि शहजादा खिज्र खाँ सुल्तान का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया था परन्तु उसमें इतने विशाल साम्राज्य को संभालने की योग्यता नहीं थी।

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दरबार में दो दल बन गए थे। एक दल शहजादे खिज्र खाँ का था जिसे शहजादे की माँ मलिका-ए-जहाँ संभाल रही थी। शहजादे का मामा अल्प खाँ उसका सहयोग कर रहा था। दूसरा दल मलिक काफूर का था जिसका सेना के ऊपर प्रभाव था। मलिक काफूर की दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी। अतः वह ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने लगा जिनसे सम्पूर्ण राजनैतिक शक्ति भी काफूर के हाथों में आ जाये।

मलिक काफूर सुल्तान की वृद्धावस्था जानकर अब उससे उन सब अपमानों एवं कष्टों का बदला लेना चाहता था जो मलिक काफूर ने जीवन भर सहे थे। मलिक काफूर का जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ था किंतु सुल्तान के सुखभोग के लिए उसे बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया। सुल्तान के सुख भोग के लिए ही मलिक काफूर को हिंजड़ा बनाकर सुल्तान की पुरुष रखैल के रूप में रखा गया।

अब वह समय आ गया था जब मलिक काफूर अल्लाउद्दीन खिलजी का सर्वनाश कर दे। उसने राजपरिवार में फूट पैदा करने के लिए सुल्तान अल्लाउद्दीन को समझाया कि मलिका-ए-जहाँ, शहजादा खिज्र खाँ, अमीर अल्प खाँ और मुबारक खाँ सुल्तान की हत्या करवाने का प्रयत्न कर रहे हैं ताकि खिज्र खाँ को सुल्तान बनाया जा सके।

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अल्लाउद्दीन खिलजी, मलिक काफूर की बातों में आ गया और उसने अपने पुत्र खिज्र खाँ तथा मुबारक खाँ को ग्वालियर के कारागार में डलवा दिया। सुल्तान ने मलिका-ए-जहाँ को पुरानी दिल्ली में कैद कर लिया और अल्प खाँ की हत्या करवा दी। इससे अमीरों एवं राजघराने में अल्लाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध अंसतोष की अग्नि और अधिक भड़क गई। इस असंतोष की चिन्गारियां अल्लाउद्दीन तक पहुंचने लगीं और उसे लगने लगा कि राजमहल का प्रत्येक व्यक्ति सुल्तान के प्राण लेना चाहता है। हत्या के भय से अल्लाउद्दीन खिलजी उन्मादी हो गया और वह जरा-जरा सी बात पर चिढ़कर लोगों के सिर तराशने (सिर काटने) के आदेश देने लगा। इससे स्थिति और अधिक बिगड़ने लगी। अब कोई भी व्यक्ति सुल्तान के निकट जाने एवं उसके सामने पड़ने को तैयार नहीं था। अल्लाउद्दीन के सेवक जब भोजन लाकर उसके समक्ष रखते तो सुल्तान को लगता था कि उसमें जहर मिला हुआ है। इसलिए वह भोजन की थालियां उठाकर फैंक देता और भोजन परोसने वालों को लात-घूंसों से पीटने लगता। जब अल्लाउद्दीन के अमीर उसे दूरस्थ राज्यों के समाचार लाकर देते कि अमुक गवर्नर अथवा राजा ने बगावत करके स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया तो अल्लाउद्दीन पागलों की तरह दहाड़ें मारकर रोने लगता।

जो तिलिस्म उसने तलवार के बल पर खड़ा किया था, वह तलवार पर पकड़ ढीली पड़ते ही विलुप्त होने लगा था।

अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिन उतने ही बुरे थे जितना उसके जीवन का आरम्भिक भाग। वह बहुत छोटा बच्चा ही था जब उसके पिता का निधन हो गया था। जब वह जवान हुआ तो उसने अपने पालनकर्ता ताऊ (एवं श्वसुर) की हत्या कर दी और अब जबकि वह बूढ़ा हो रहा था, उसने अपनी पत्नी एवं जवान पुत्रों को जेल में डाल दिया था। इन्हीं परिस्थितियों में अल्लाउद्दीन खिलजी घातक रूप से बीमार पड़ा और 4 जनवरी 1316 को उसकी मृत्यु हो गयी। कुछ इतिहासकारों का मत है कि मलिक काफूर ने अल्लाउद्दीन खिलजी को विष देकर मार डाला।

अल्लाउद्दीन खिलजी के अंतिम दिन इतने बुरे थे कि उसकी बेगम मलिका-ए-जहाँ, बड़ा शहजादा खिज्र खाँ तथा उससे छोटा शहजादा शादी खाँ कारागृह में बन्द थे। मरहूम अल्लाउद्दीन के और भी कई पुत्र थे जिनमें से किसी एक को सुल्तान बनाया जाना था। चूंकि सेना पर मलिक काफूर का नियंत्रण था। इसलिए वही उत्तराधिकार का निर्णय कर सकता था।

मलिक काफूर ने तुर्की अमीरों को एकत्रित किया और उन्हें मरहूम सुल्तान द्वारा लिखी गई एक वसीयत दिखाई जिसमें सुल्तान ने अपने सबसे छोटे पुत्र शिहाबुद्दीन उमर को अपना उत्तराधिकारी और मलिक काफूर को उसका संरक्षक नियुक्त किया गया था।

उस समय शहजादा शिहाबुद्दीन उमर केवल पांच साल का था। स्वार्थी अमीरों ने इस वसीयत को स्वीकार कर लिया तथा शिहाबुद्दीन उमर को सुल्तान घोषित कर दिया। मलिक काफूर उसका संरक्षक बन गया। इस प्रकार राज्य की सारी शक्ति मलिक काफूर के हाथों में चली गई और वह सल्तनत का वास्तविक शासक बन गया। राज्य की बागडोर हाथ में आते ही मलिक काफूर ने खिलजी वंश के समर्थकों पर अत्याचार करने आरम्भ किये। उसने खिलजी वंश के समस्त समर्थकों को उनके पदों से हटा दिया।

इतना होने पर भी मरहूम सुल्तान का बड़ा शहजादा खिज्र खाँ तथा सुल्तान का दूसरा शहजादा शादी खाँ मलिक काफूर के लिए कोई बड़ा खतरा पैदा कर सकते थे। जब तक शहजादे जीवित थे, तब तक मलिक काफूर के लिए खतरे भी जीवित थे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्लाउद्दीन खिलजी की बेगम से एक किन्नर ने विवाह कर लिया (120)

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अल्लाउद्दीन खिलजी की बेगम - www.bharatkaitihas.com
अल्लाउद्दीन खिलजी की बेगम से एक किन्नर ने विवाह कर लिया

मलिक काफूर ने अल्लाउद्दीन खिलजी की बेगम मलिका-ए-जहाँ की सारी सम्पत्ति छीन ली तथा मलिका को उसके पुत्र मुबारक खाँ के साथ ग्वालियर के जेल में बन्द कर दिया।

यद्यपि मरहूम सुल्तान अल्लाउद्दीन के दोनों बड़े पुत्र अल्लाउद्दीन के समय से ही कारागार में बंद थे तथापि वे किसी भी समय मलिक काफूर के लिए संकट उत्पन्न कर सकते थे। इसलिए मलिक काफूर ने अल्लाउद्दीन खिलजी के दोनों बड़े शहजादों की आँखें निकलवा लीं।

मलिक काफूर ने मरहूम सुल्तान के तीसरे पुत्र मुबारक खाँ की भी आँखें निकलवाने का प्रयास किया परन्तु उसे इस कार्य में सफलता नहीं मिली क्योंकि तभी मलिका ए जहाँ ने मलिक काफूर के समक्ष प्रस्ताव भिजवाया कि मैं तुझसे विवाह करना चाहती हूँ।

मलिक काफूर ने बेगम मलिका-ए-जहाँ का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा मलिका से विवाह कर लिया। पाठकों को स्मरण होगा कि मलिक काफूर गुजरात से खरीदा गया एक हिन्दू गुलाम था जिसे किन्नर बनाकर तथा इस्लाम में परिवर्तित करके सुल्तान अल्लाउद्दीन की सेवा में पुरुष रखैल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इस प्रकार एक किन्नर जो जीवन भर अल्लाउद्दीन की पुरुष रखैल बनकर रहा था, उसने उसी की बेगम से विवाह कर लिया।

कुछ दिनों बाद मलिक काफूर ने मलिका की सारी सम्पत्ति छीन ली तथा मलिका को उसके पुत्र मुबारक खाँ के साथ ग्वालियर के जेल में बन्द कर दिया। इस प्रकार दुष्ट मलिक काफूर ने सल्तनत पर अपनी पकड़ को मजबूत बनाया परन्तु उसके ये समस्त प्रयत्न उस समय निष्फल सिद्ध हुए जब ग्वालियर के किले में बन्द शहजादा मुबारक खाँ कर्मचारियों को घूस देकर दुर्ग से निकल भागा और दिल्ली आ पहुँचा।

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शहजादे मुबारक खाँ ने कुछ अमीरों को अपनी ओर मिलाकर मलिक काफूर के विरुद्ध संगठन खड़ा किया तथा मलिक काफूर की हत्या कर दी। इस प्रकार दुष्ट मलिक काफूर के शासन का अंत हो गया।

आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि मलिक काफूर ने कुछ पेशेवर हत्यारों को धन देकर मुबारक खाँ की हत्या करने के लिए नियुक्त किया। जब ये हत्यारे मुबारक खाँ के पास पहुंचे तो मुबारक खाँ ने उन हत्यारों को अधिक धन देकर खरीद लिया तथा उन्हीं से मलिक काफूर की हत्या करवा दी। अब मुबारक खाँ, अपने छोटे भाई सुल्तान शिहाबुद्दीन उमर का संरक्षक बन गया।

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छः दिन बाद मुबारक खाँ ने पांच वर्षीय सुल्तान शिहाबुद्दीन उमर की आँखें निकलवा लीं और स्वयं कुतुबुद्दीन मुबारकशाह के नाम से तख्त पर बैठ गया। कुतुबुद्दीन मुबारकशाह ने तख्त पर बैठते ही मलिक काफूर के हत्यारों को पकड़ मंगवाया क्योंकि अब वे अपने लिए अधिक धन और सम्मान की मांग कर रहे थे। कुतुबुद्दीन ने उन हत्यारों पर मलिक काफूर की हत्या करने का आरोप लगाकर उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया। मुबारक खाँ अनुभव-शून्य नवयुवक था। तख्त पर बैठने के समय उसकी आयु 17-18 वर्ष थी तथा उसने शासन में किसी भी पद का दायित्व नहीं संभाला था। दिल्ली के तख्त पर बैठने के उपरान्त उसने अपनी स्थिति को मजबूत बनाने के लिए सेना को सन्तुष्ट करने का प्रयत्न किया। उसने सैनिकों को छः महीने का वेतन पेशगी दे दिया। मुबारकशाह ने अपने पिता अल्लाउद्दीन के समय के बनाए हुए समस्त कठोर नियमों को हटा दिया। इससे लोगों ने राहत की सांस ली तथा चारों ओर अच्छा वातावरण बना किंतु मुबारक खिलजी पुराने नियमों एवं व्यवस्थाओं के स्थान पर नये नियम अथवा नई व्यवस्थाएँ नहीं बना सका। इससे लोगों में उच्छृखंलता आ गई और उनका नैतिक स्तर बहुत गिर गया। साम्राज्य के विभिन्न भागों में उपद्रव तथा विद्रोह होने लगे।

मुबारक खाँ को सबसे पहले गुजरात में हुए विद्रोह का सामना करना पड़ा। अल्प खाँ की हत्या के बाद गुजरात में विद्रोह की अग्नि भड़क उठी थी। गुजरात ने दिल्ली से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था। मुबारक खिलजी ने एक विशाल सेना भेजकर इस विद्रोह को शान्त किया और गुजरात में फिर से दिल्ली सल्तनत की सत्ता स्थापित की।

इन दिनों देवगिरि में यादव राजा हरपाल देव शासन कर रहा था। दिल्ली की गड़बड़ी से लाभ उठा कर उसने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। इस पर मुबारक खाँ ने एक सेना लेकर देवगिरि पर अभियान किया। इस युद्ध में हरपाल देव परास्त हो गया। उसकी जिन्दा खाल खिंचवा ली गई और देवगिरि में एक मुसलमान शासक नियुक्त कर दिया गया।

जब सुल्तान मुबारक खाँ देवगिरि से दिल्ली लौट रहा था तब उसे असदुद्दीन के षड़यंत्र का सामना करना पड़ा जो अल्लाउद्दीन का भतीजा और मुबारक खाँ का चचेरा भाई था। असदुद्दीन ने मुबारक खाँ की हत्या करके तख्त हासिल करने का षड्यन्त्र रचा। मुबारक खाँ को इस षड्यन्त्र का पता लग गया। उसने असदुद्दीन तथा उसके साथियों की उनके सम्बन्धियों सहित हत्या करवा दी।

अब मुबारक खाँ ने खिज्र खाँ की ओर ध्यान दिया। खिज्र खाँ जिसे पहले ही अन्धा कर दिया गया था, इन दिनों अपनी स्त्री देवल देवी के साथ ग्वालियर के किले में बंद था। मुबारक खाँ ने खिज्र खाँ को आदेश भिजवाया कि वह देवल देवी को दिल्ली भेज दे। खिज्र खाँ ने इस आज्ञा का पालन नहीं किया। इसलिए उसकी भी हत्या करवा दी गई।

इसके बाद देवल देवी को दिल्ली लाया गया। मुबारक खाँ ने उसे अपने हरम में डाल लिया। पाठकों को स्मरण होगा कि अल्लाउद्दीन खिलजी ने अन्हिलवाड़ा के राजा कर्ण बघेला की रानी कमलावती को अपने हरम में डाल लिया था और उसकी पुत्री देवल देवी को खिज्र खाँ की बेगम बना दिया था। यह वही देवलदेवी थी जो मुबारक खाँ की बड़ी भाभी लगती थी किंतु अब मुबारक खाँ की बेगम बना दी गई। खिलजी राजवंश में नैतिकता का प्रश्न तो अल्लाउद्दीन खिलजी के समय से ही अप्रासंगिक हो चुका था।

आगे बढ़ने से पहले हमें इस बात पर अवश्य विचार करना चाहिए कि यह कैसा राजपरिवार था जिसने राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी को स्वयं ही बर्बाद करके अपने भविष्य को जलाकर राख कर दिया था!

होना तो यह चाहिए था कि अल्लाउद्दीन खिलजी अपने बड़े पुत्र खिज्र खाँ के जीवन की रक्षा करता तथा खिज्र खाँ के छोटे भाई, खिज्र खाँ को सुल्तान बनाकर राजपरिवार एवं सल्तनत को सुरक्षित बनाते किंतु खिज्र खाँ अपने ही बाप और भाइयों द्वारा छला गया और पूरी तरह बर्बाद किया गया। उसे पिता ने जेल में डाला, एक भाई ने आँखें फोड़ीं तथा दूसरे भाई ने उसकी हत्या करके उसकी पत्नी छीन ली।

ऐसी स्थिति में यह कहा जा सकता है कि अल्लाउद्दीन खिलजी तथा उसके परिवार को शत्रुओं की आवश्यकता नहीं थी, वे स्वयं ही अपने शत्रु सिद्ध हुए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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