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नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

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नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र मध्यकालीन इतिहास में किसी पहेली से कम नहीं है। उस युग में इस बात पर विश्वास नहीं किया जाता था कि किसी औरत में शासकीय प्रतिभा हो सकती है किंतु जहाँगीर ने अपने राज्य का पूरा शासन नूरजहाँ पर छोड़ दिया था।

नूरजहाँ का चरित्र

नूरजहाँ के गुणों के कारण जहाँगीर ने 1622 ई. में उसे बादशाह बेगम की उपाधि से अलंकृत किया था और अपनी मुद्राओं पर उसके नाम को अंकित कराकर उसे अभूतपूर्व प्रतिष्ठा प्रदान की थी। नूरजहाँ की सबसे बड़ी सेवा उसकी सांस्कृतिक देन है। वह बड़ी ही प्रतिभावान्, सुशिक्षित तथा व्यावहारिक बुद्धि की महिला थी।

कला में उसकी विशेष अनुरक्ति थी। उसे सौन्दर्य तथा अलंकरण से बड़ा प्रेम था। वह जो काम करती थी उसमें सौन्दर्य उत्पन्न करने का प्रयत्न करती थी। इस कारण उसमें प्रबल सांस्कृतिक प्रभाव डालने की क्षमता उत्पन्न हो गई थी। वह पारसीक सभ्यता तथा संस्कृति की पोषक थी। अतः समस्त क्षेत्रों में पारसीक सभ्यता का प्रभाव डालने का प्रयत्न किया।

उसने नये फैशन चलाये, नये वस्त्रों, नये आभूषणों, नई वेश-भूषाओं, नये प्रलेपों एवं आलंकारिक पदार्थों का आविष्कार तथा प्रचलन किया। उसने दरबार के आचार-व्यवहार में सौन्दर्य तथा सौष्ठव उत्पन्न किया। तत्कालीन वास्तुकला पर उसके व्यक्तित्व की छाप स्पष्ट है। इस प्रकार उसने अपने समय के सांस्कृतिक जीवन को अत्यधिक प्रभावित किया।

नूरजहाँ का मस्तिष्क उन्नत तथा हृदय विशाल था। वह उदार तथा दयालु महिला थी। उसका बहिरंग यथा अन्तरंग दोनों ही समान रूप से कोमल था। उसके प्रत्येक कार्य में उदारता तथा दया का समावेश रहता था। उसमें उच्च कोटि की दानशीलता थी। वह दीन-दुखियों, असहायों, अनाथों, विधवाओं तथा पीड़ितों की सहायक थी।

परोपकार के कार्यों से उसने जहाँगीर के शासन में उदारता तथा दानशीलता का ऐसा वातावरण उत्पन्न कर दिया जिसका सामाजिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है। नूरजहाँ में उच्च-कोटि का पति-प्रेम था। अपने प्रथम पति शेर अफगन के प्रति उसकी अनुपम अनुरक्ति थी। जब जहाँगीर ने उसे अपनी प्रेयसी तथा पत्नी बनाया तब उसने प्रेम और सेवा से जहाँगीर को ऐसा मुग्ध कर लिया कि बादशाह उस पर अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए उद्यत हो गया।

नूरजहाँ के राजनीतिक प्रभाव के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। नूरजहाँ का जहाँगीर पर बहुत प्रभाव था। कुछ विद्वानों की धारणा है कि राजनीतिक क्षेत्र में भी उसका उतना ही बड़ा प्रभाव था। इन विद्वानों के विचार में तत्कालीन राजनीति उसी के द्वारा संचालित होती थी।

इसलिये इतिहासकार दरबारी षड्यन्त्रों तथा कुचक्रों के लिए प्रधानतः उसी को उत्तरदायी मानते हैं और तत्कालीन राजनीति पर उसके दूषित प्रभाव की कटु आलोचना करते हैं। नूरजहाँ का व्यक्तित्व इतना ऊँचा था कि अपने काल की राजनीति को प्रभावित करना उसके लिए असम्भव नहीं था, इसयिले उसने ऐसा किया भी।

वह पहले खुर्रम को जहाँगीर का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी किंतु बाद में अपने जामाता शहरियार को बादशाह बनते हुए देखने के लिये कार्य करने लगी। उसने परवेज को भी बादशाह बनने से रोकने के लिये कार्य किया। जब महाबतखाँ ने बादशाह को नजरबंद कर लिया तब उसने स्वयं को भी नजरबंद करवाकर चतुर राजनीतिज्ञ होने का परिचय दिया।

उसने बड़ी चतुराई से जहाँगीर को महाबतखाँ के चंगुल से मुक्त करवाकर शाही परिवार की प्रतिष्ठा तथा मर्यादा की पुनर्स्थापना की। शाहजादा खुर्रम तथा महाबतखाँ के विद्रोह और उत्तराधिकार के लिए जो षड्यन्त्र तथा कुचक्रों को काटने के लिये भी उसने हरसंभव कार्य किया।

नूरजहाँ का अपने भाइयों में और विशेषकर अपने बड़े भाई आसफ खाँ में बहुत विश्वास था। आसफ खाँ बड़ा षड्यंत्रकारी व्यक्ति था और अपने तथा अपने दामाद खुर्रम के स्वार्थ सिद्ध करने के लिए वह नूरजहाँ को अस्त्र बना लेता था। नूरजहाँ उसके षड्यंत्रों को को समझ नहीं पाती थी और उसका अस्त्र बन जाती थी।

वास्तव में नूरजहाँ तत्कालीन कुचक्री राजनीति के योग्य नहीं थी। दुर्भाग्य से शहरियार जैसा अयोग्य शहजादा उसका दामाद बन गया जिसे वह बादशाह बनते हुए देखना चाहती थी। जब खुर्रम बादशाह बन गया तब नूरजहाँ राजनीति से बिल्कुल अलग हो गई और उसने अपने जीवन के शेष दिन एकान्तवास में व्यतीत किये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

शाहजहाँ

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शाहजहाँ - www.bharatkaitihas.com
शाहजहाँ एवं मुमताज महल

शाहजहाँ ने ईस्वी 1628 से 1658 तक शासन किया। वह अपने पिता जहाँगीर की तुलना में अधिक कट्टर शासक था। उसने अपने पितामह की सुलहकुल नीति को तो नहीं छोड़ा किंतु उसने कई मंदिरों को तुड़वाया जिनमें पुष्कर का प्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर भी शामिल है।

शाहजहाँ का प्रारम्भिक जीवन

शाहजहाँ का वास्तविक नाम खुर्रम था। उसका जन्म 5 जनवरी 1592 को लाहौर में हुआ। उसकी माता का नाम जोधाबाई था जिसे जगत गोसाइन भी कहते थे। वह मारवाड़ के राजा उदयसिंह की पुत्री थी। खुर्रम का पालन-पोषण उसकी दादी सुल्ताना बेगम ने बड़े लाड़ से किया था। वह अपने बाबा अकबर का प्रिय था।

जब खुर्रम ने दक्षिण में उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कीं तब जहाँगीर ने उसे शाहजहाँ की उपाधि दी। शाहजहाँ अपने पिता का तीसरा पुत्र था। वह अपने भाइयों में सबसे योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी था। उसे बौद्धिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार की शिक्षा मिली। इस कारण उसने कम आयु से ही योग्यता का परिचय देना आरम्भ किया।

शहजादे खुसरो के विद्रोह कर देने से शाहजहाँ को उन्नति करने का अवसर प्राप्त हो गया। वह जहाँगीर तथा नूरजहाँ दोनों का प्रिय बन गया जिसके फलस्वरूप उसे महत्त्वपूर्ण युद्धों में भेजा जाने लगा। शाहजहाँ को इन युद्धों में विजय प्राप्त हुई और सम्पूर्ण मुगल सल्तनत में उसकी प्रसिद्धि हो गई।

1618 ई. में शाहजहाँ का विवाह नूरजहाँ के बड़े भाई आसफ खाँ की पुत्री अर्जुमन्द बानू बेगम से हुआ। इस कारण शाहजहाँ को अपने पिता जहाँगीर की चहेती बेगम नूरजहाँ, नूरजहाँ के पिता एतिमादुद्दौला जो प्रधानमन्त्री के पद पर आसीन था और नूरजहाँ के भाई आसफ खाँ, जो साम्राज्य का दीवान था, का समर्थन प्राप्त हो गया।

उत्तराधिकार के लिए संघर्ष

जिस समय जहाँगीर का निधन हुआ उस समय खुर्रम दक्षिण में और शहरियार लाहौर में था। जहाँगीर की मृत्यु होते ही आसफखाँ ने अपनी बहिन नूरजहाँ के निवास पर कड़ा पहरा लगा दिया और खुर्रम के पुत्रों को शाही नियन्त्रण से मुक्त कर दिया। आसफ खाँ ने खुसरो के पुत्र दावरबख्श को मीरबख्शी इदारत खाँ के नियन्त्रण में रख दिया, जो आसफ खाँ का विश्वस्त आदमी था। इसके बाद आसफ खाँ ने बनारसीदास नामक व्यक्ति के हाथों खुर्रम के पास सन्देश भिजवाया कि वह अविलम्ब लाहौर चला आये। उसने महाबतखाँ के पास भी यह सूचना भेज दी कि वह अपनी पूरी शक्ति के साथ खुर्रम की सहायता करे।

इतने प्रबंधों के बाद भी आसफ खाँ संतुष्ट नहीं हुआ। वह जानता था कि तख्त को खाली जानकर शहरियार तथा नूरजहाँ षड़यंत्र रच सकते थे, इसलिये आसफ खाँ ने खुसरो के पुत्र दावरबख्श को तख्त पर बिठा दिया जिससे खुर्रम के पहुँचने तक तख्त खाली न रहे। दावरबख्श अपने अन्तिम परिणाम को जानता था इसलिये तख्त पर बैठने के लिए तैयार नहीं हुआ किंतु उसे जबरदस्ती तख्त पर बैठाया गया।

उधर शहरियार ने लाहौर में स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया और शाहेशाहान की उपाधि धारण की। उसने अमीरों तथा सैनिकों का समर्थन प्राप्त करने के लिए खूब धन बाँटा और एक सेना आसफखाँ तथा दावरबख्श के विरुद्ध भेज दी। यह सेना परास्त हो गई और उसके अधिकांश सैनिक आसफखाँ की तरफ जा मिले।

आसफ खाँ ने लाहौर पर आक्रमण करने के लिये सेना भेजी। इस पर शहरियार ने स्वयं को लाहौर दुर्ग में बंद कर लिया परन्तु अंत में उसे समर्पण करना पड़ा। उसे दावरबख्श के समक्ष उपस्थित किया गया और दावरबख्श से यह आदेश दिलवाया गया कि शहरियार को अन्धा करके कारागार में डाल दिया जाय। दानियाल के पुत्रों के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार का आदेश दिया गया।

बनारसीदास चौबीस दिन की यात्रा करके दक्षिण पहुँचा और महाबतखाँ को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। उस समय खुर्रम जुन्नर में था। महाबतखाँ ने उसके पास सूचना भेज दी। सूचना मिलते ही खुर्रम ने उत्तर के लिए प्रस्थान किया। वह मार्ग में ही था कि उसे शहरियार की पराजय तथा उसके बंदी बनाये जाने की सूचना मिली।

शाहजहाँ ने आसफ खाँ को आदेश भिजवाया कि वह शहरियार तथा दानियाल के पुत्रों की हत्या कर दे। आसफ खाँ ने इस आज्ञा का पालन किया और उन सबकी हत्या करवा दी। इसके बाद खुर्रम आगरा पहुँचा और 6 फरवरी 1628 को शाहजहाँ के नाम से आगरा में तख्त पर आरूढ़ हो गया। उसने नूरजहाँ को दो लाख रुपये की वार्षिक पेन्शन दे दी। इसके बाद नूरजहाँ राजनीति से पूरी तरह अलग हो गई। उसने अपने जीवन के शेष अट्ठारह वर्ष अपनी विधवा पुत्री के साथ एकान्तवास में व्यतीत किये। 1645 ई. में नूरजहाँ की मृत्यु हुई।

शाहजहाँ को तख्त की प्राप्ति

बाबर के बाद से ही मुगल शहजादों में तख्त के उत्तराधिकार के लिये युद्ध होते आये थे। शाहजहाँ में भी अन्य शहजादों की भांति बादशाह बनने की इच्छा प्रबल थी। ज्यों-ज्यों जहाँगीर का स्वास्थ्य गिरता गया त्यों-त्यों शाहजहाँ में तख्त प्राप्त करने की इच्छा तीव्र होती गई। उसका पहला प्रतिद्वन्द्वी शाहजादा खुसरो था।

शाहजहाँ ने बुरहानपुर के दुर्ग में खुसरो की हत्या करवा दी। शाहजहाँ का दूसरा प्रतिद्वन्द्वी परवेज था जिसे महाबत खाँ का समर्थन प्राप्त था किंतु वह अत्यधिक मदिरापान करने से मर गया। शाहजहाँ का तीसरा प्रतिद्वन्द्वी शहरियार था, जो नूरजहाँ का दामाद होने के कारण काफी शक्तिशाली था परन्तु शाहजहाँ की तुलना में अयोग्य था। परवेज की मृत्यु तथा महाबत खाँ के विद्रोह के बाद महाबत खाँ को शाही समर्थन समाप्त हो गया और वह शाहजहाँ से मिल गया। इससे शाहजहाँ का पक्ष प्रबल हो गया।

शाहजहाँ का ससुर आसफखाँ चालाक राजनीतिज्ञ था। वह शाहजहाँ को मुगलों के तख्त पर बैठाने के लिये निरंतर प्रयास करता रहा। जहाँगीर के आँख बंद करते ही आसफखाँ ने शाहजहाँ के प्रतिद्वन्द्वियों को उन्मूलित करना आरम्भ कर दिया और शाहजहाँ के आगरा पहुँचने के पहले ही वह उसके लिये तख्त का समस्त प्रबंध कर दिया।

इस प्रकार शाहजहाँ अपने भाइयों तथा भतीजों का नृशंसतापूर्वक वध करके 6 फरवरी 1628 को आगरा में तख्त पर बैठा। उसने अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और अपने नाम की मुद्राएँ चलवाईं। इस अवसर पर उसने अपने सम्बन्धियों तथा अमीरों को उपहार दिये तथा अपने समर्थकों को पदों एवं उपाधियों से पुरस्कृत किया।

आसफखाँ का मनसब बढ़ाकर उसे प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त किया। महाबतखाँ का भी मनसब बढ़ाया गया और उसे खानखाना की उपाधि दी गई। यह उपाधि मुगल सल्तनत के प्रधान सेनापति को दी जाती थी। महाबत खाँ के पुत्र खान-ए-जहाँ को मालवा का शासक बना दिया गया। अन्य समर्थकों को भी इसी प्रकार पुरस्कृत किया गया।

शाहजहाँ द्वारा विद्रोहों का दमन

जुझारसिंह बुन्देला का विद्रोह

शाहजहाँ के शासन काल में पहला विद्रोह जुझारसिंह बुन्देला ने किया। वह ओरछा के राजा वीरसिंह का पुत्र था, जिसने जहाँगीर के कहने से अबुल फजल की हत्या की थी। इस कारण जुझारसिंह, जहाँगीर का विशेष कृपा पात्र था। 1628 ई. में वीरसिंह की मृत्यु हो गई और उसके स्थान पर उसका ज्येष्ठ पुत्र जुझारसिंह ओरछा का राजा बना।

शाहजहाँ के राज्याभिषेक के समय जुझारसिंह बादशाह का अभिनन्दन करने के लिए आगरा आया। अपनी अनुपस्थिति में वह अपने राज्य का प्रबन्ध अपने पुत्र विक्रमादित्य को सौंप गया था। विक्रमादित्य ने प्रजा पर अत्याचार किये। जब इन अत्याचारों की सूचना शाहजहाँ के पास पहुँची तो उसने इन शिकायतों की जांच करने का आदेश दिया।

इस आदेश से जुझारसिंह घबरा गया और चुपके से आगरा से भाग कर ओरछा राज्य के पर्वतीय प्रदेश में चला गया। इससे कुपित होकर बादशाह ने जुझारसिंह को दण्डित करने का निश्चय किया। उसने महाबतखाँ, खान-ए-जहाँ लोदी तथा अब्दुल्ला खाँ को यह कार्य सौंपा।

महाबतखाँ ने ग्वालियर से, खान-ए-जहाँ लोदी ने मालवा से और अब्दुल्ला खाँ ने कालपी से अपनी सेनाओं के साथ ओरछा के लिये प्रस्थान किया। बादशाह ने स्वयं भी सेना लेकर ग्वालियर में अपना पड़ाव डाला। मुगलों की विपुल तैयारी से जुझारसिंह घबरा गया। उसने लड़ना व्यर्थ समझकर बादशाह से क्षमा याचना कर ली। बादशाह ने उसे क्षमा कर दिया और उसे दक्षिण के मोर्चे पर भेज दिया।

खान-ए-जहाँ लोदी का विद्रोह

दूसरा विद्रोह खान-ए-जहाँ लोदी का था, जो दक्षिण में नियुक्त था। वह जहाँगीर का बड़ा कृपा पात्र था। जहाँगीर ने उसे मुगल सल्तनत के प्रधान सेनापति के पद पर नियुक्त करके खानखाना की उपाधि दी। महाबतखाँ तथा शाहजादा खुर्रम पर कड़ी दृष्टि रखने के लिए उसे दक्षिण का गवर्नर बनाया गया।

शाहजहाँ ने तख्त प्राप्त करने के जो प्रयत्न किये उनमें खान-ए-जहाँ ने न तो किसी प्रकार का प्रोत्साहन दिया और न किसी प्रकार की बाधा पहुँचाई। वह तटस्थ बना रहा। शाहजहाँ ने बादशाह बनने पर, महाबत खाँ को खानखाना की उपाधि दी। कुछ समय बाद शाहजहाँ ने महाबत खाँ को मालवा का प्रान्त भी दे दिया।

इससे खान-ए-जहाँ को अपनी वास्तविक स्थिति का पता लग गया। बुन्देला युद्ध के समाप्त होने पर खान-ए-जहाँ को दरबार में बुलाया गया। उसे वहाँ का वातावरण अपने अनुकूल दिखाई नहीं दिया तथा अपमान का अनुभव किया। बादशाह तथा आसफ खाँ के आशवासन देने पर भी उसका सन्देह दूर नहीं हुआ। फलतः अक्टूबर 1629 में वह आगरा से भाग खड़ा हुआ और दक्षिण भारत चला गया।

बादशाह ने तुरन्त एक सेना उसका पीछा करने के लिए भेजी। खान-ए-जहाँ ने दक्षिण में जाकर अहमदनगर के शासक के साथ गठबन्धन कर लिया परन्तु वह गठबन्धन अधिक दिनों तक नहीं चला। इसलिये खान-ए-जहाँ दक्षिण छोड़कर बुन्देलखण्ड चला आया। राजा विक्रमादित्य तथा शाही सेना ने उसका पीछा किया। अन्त में खान-ए-जहाँ लोदी परास्त हो गया और मार डाला गया।

गुरु हरगोविंद से संघर्ष

शाहजहाँ के शासन काल के आरम्भ में 1628 ई. में सिक्खों के छठे गुरु हरगोविंद के साथ शाहजहाँ का संघर्ष आरम्भ हुआ। इस संघर्ष का कारण एक बाज था। एक बार बादशाह अमृतसर के निकट आखेट खेल रहा था। उसका एक बाज गुरु के डेरे में चला गया।

जब बादशाह के सिपाहियों ने सिक्खों से बाज लौटाने की मांग की तो सिक्खों ने शरण में आये हुए बाज को लौटाने से मना कर दिया। इस पर बादशाह की सेना ने सिक्खों पर आक्रमण कर दिया परन्तु गुरु के नेतृत्व में सिक्खों ने मुगल सेना को मार भगाया। इस पर वजीरखाँ तथा गुरु के अन्य शुभचिंतकों ने किसी तरह बादशाह के क्रोध को शान्त किया।

कुछ समय बाद गुरु हरगोविंद ने पंजाब में व्यास नदी के किनारे एक नये नगर का निर्माण आरम्भ किया जो आगे चल कर श्री हरगोविन्दपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पंजाब के मध्य में इस नगर का निर्माण मुगल सल्तनत के लिये हितकर नहीं समझा गया। इसलिये बादशाह ने गुरु को आदेश दिया कि वे नगर का निर्माण नहीं करें किंतु सिक्खों ने इस आदेश की उपेक्षा करके नगर का निर्माण पूर्ववत् जारी रखा। सिक्खों के विरुद्ध पुनः एक सेना भेजी गई जिसे गुरु हरगोविंद के सिक्खों ने मार भगाया। इस बार पुनः मामला किसी तरह शांत किया गया।

गुरु का मुगलों के साथ तीसरा संघर्ष एक चोरी के कारण हुआ। बिधीचन्द्र नामक एक कुख्यात डाकू गुरु का परम भक्त था। उसने शाही अस्तबल से दो घोड़े चुराकर गुरु को भेंट कर दिये। गुरु ने अनजाने में वे घोड़े स्वीकार कर लिये। इसलिये 1631 ई. में एक प्रबल मुगल सेना गुरु के विरुद्ध भेजी गई परन्तु गुरु की सेना ने उसे भी खदेड़ दिया।

मुगलों से निरन्तर संघर्ष के कारण सिक्ख गुरु द्वारा किये जाने वाले धर्म-प्रचार के कार्य में बाधा उत्पन्न होने लगी तथा सिक्खों को बड़ा कष्ट उठाना पड़ा। गुरु हरगोविंद जानते थे कि सिक्खों की शक्ति एवं साधन अत्यंत सीमित हैं जबकि मुगल सल्तनत की शक्ति एवं साधन असीमित हैं। इसलिये सिक्ख बहुत दिनों तक इस संघर्ष में नहीं टिक सकेंगे।

इसलिये गुरु हरगोविंद आध्यात्मिक चिन्तन के लिए काश्मीर की पहाड़ियों में चले गए और कीरतपुर नामक स्थान पर निवास करने लगे। वहीं पर उन्होंने धर्म प्रचार करते हुए शान्तिपूर्वक शेष जीवन व्यतीत किया। माना जाता है कि गुरु हरगोविन्द ने ही सिक्खों को मांस खाने की अनुमति प्रदान की। 1645 ई. में गुरु हरगोविंद का निधन हो गया।

द्वितीय बुन्देला युद्ध

प्रथम बुन्देला युद्ध के बाद ओरछा के राजा जुझारसिंह को उसके पुत्र जगराज (विक्रमादित्य) के साथ दक्षिण भेज दिया गया था। उसने महाबतखाँ की अधीनता में पाँच वर्ष तक मुगल सल्तनत की सेवा की। महाबतखाँ के मरने के बाद राजा जुझारसिंह अपने पुत्र को दक्षिण में छोड़कर ओरछा चला आया।

थोड़े ही दिन बाद उसने गोंडवाना के राजा प्रेम नारायण पर, जो मुगल बादशाह का मनसबदार था, आक्रमण किया और उसकी राजधानी चौरागढ़ पर घेरा डाला। प्रेम नारायण युद्ध में मारा गया। जुझारसिंह के सैनिकों ने उसकी राजधानी को खूब लूटा। जब शाहजहाँ को इसकी सूचना मिली तो उसके क्रोध की सीमा नहीं रही।

उसने आदेश दिया कि जुझारसिंह ने गोंडवाना का जितना भाग जीता है उतना ही भूभाग अपने राज्य में से और लूटे हुए माल में से दस लाख रुपये उसके हवाले कर दे। जुझारसिंह ने इस आदेश की उपेक्षा की और अपने पुत्र जगराज को भी दक्षिण से बुला लिया। इस पर शाहजहाँ ने जुझारसिंह के विरुद्ध सेना भेजी।

22 नवम्बर 1634 को मुगल सेना ने ओरछा पर अधिकार कर लिया। जुझारसिंह के प्रतिद्वन्द्वी देवीसिंह को ओरछा का राजा बनाया गया। इसके बाद मुगल सेना ने जुझारसिंह का बुरी तरह पीछा किया। जुझारसिंह के तीन पुत्र, एक पौत्र और जुझारसिंह की रानी मुगलों के हाथ लगे।

जुझारसिंह और जगराज जंगलों में चले गए, जहाँ पर गौंड लोगों ने उनकी हत्या कर दी और उनके सिर काटकर मुगल बादशाह के पास भेज दिये। शाहजहाँ ने जुझारसिंह के परिवार के साथ अत्यंत बुरा व्यवहार किया। जीवित पकड़ी गई राजपूत महिलाओं को शाही हरम तथा अमीरों के घरों में सेवा करने के लिए बाध्य किया गया।

जुझारसिंह के दो पुत्रों और एक पौत्र को मुसलमान बनाया गया। जब जुझारसिंह के एक पुत्र उदयभान तथा जुझारसिंह के मंत्री श्याम ने मुसलमान बनने से मना किया तो उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद शाहजहाँ ने ओरछा में प्रवेश किया। इस अवसर पर वीरसिंह के विशाल मन्दिर को ध्वस्त करके उसके स्थान पर एक मस्जिद बनवाई गई।

शाहजहाँ की दक्षिण नीति

शाहजहाँ कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसे दक्षिण के शिया राज्यों से बड़ी घृणा थी। ये राज्य मुगल सल्तनत के विद्रोहियों की शरणस्थली बन जाते थे। शाहजहाँ ने स्वयं अपने पिता के विरुद्ध जब विद्रोह किया था तब दक्षिण में ही शरण पाने का प्रयत्न किया था। मरहठों को भी, जो मुगल साम्राज्य पर छापा मारा करते थे, इन राज्यों से बड़ी सहायता मिलती थी।

शाहजहाँ को दक्षिण के राज्यों की सैनिक स्थिति का पूरा ज्ञान प्राप्त था। इन दिनों दक्षिण में तीन प्रधान राज्य थे- अहमदनगर, बीजापुर तथा गोलकुण्डा। इन राज्यों की दशा बड़ी शोचनीय थी। योग्य शासकों के अभाव में इन राज्यों में अस्थिरता व्याप्त थी। उनके साथ किये गये किसी समझौते पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता था।

इस कारण शाहजहाँ ने इन राज्यों को नष्ट करने का निर्णय लिया। 1629 ई. में शाहजहाँ ने शाही सेना का संचालन करने के लिए अबुल हसन तथा आजम खाँ आदि अधिकारियों को नियुक्त किया। प्रधानमंत्री आसफखाँ की भी दक्षिण में नियुक्ति कर दी गई और बादशाह ने स्वयं बुरहानपुर में जाकर अपना पड़ाव डाला।

अहमदनगर अभियान

मुगल सेनाओं ने सबसे पहले अहमदनगर पर आक्रमण किया क्योंकि विद्रोही खान-ए-जहाँ अहमदनगर में शरण लिये हुए था। जब शाही सेना ने अहमदनगर पर आक्रमण किया तो खान-ए-जहाँ पंजाब की ओर चला गया किंतु मुगल सेना ने अहमदनगर के विरुद्ध युद्ध जारी रखा। इन दिनों अहमदनगर की दशा अत्यंत शोचनीय थी।

अहमदनगर का शासक मुर्तजाखाँ एक निर्बल शासक था। उसके राज्य में दलबन्दी चरम पर थी। उसने अपने प्रभावशाली मराठा जागीरदार जादो रास की हत्या करवा दी थी। इस कारण जगदेव, शाहजी भोंसले तथा मालोजी जैसे प्रभावशाली मराठा सरदार मुर्तजाखाँ को छोड़कर मुगलों से जा मिले।

मुर्तजा खाँ के बहुत से मुसलमान अमीर भी अप्रसन्न होकर अहमदनगर से चले गये और उन्होंने शाही सेना में नौकरी कर ली। इन्हीं दिनों दक्षिण में भयंकर अकाल पड़ा जिससे राज्य में भोजन तथा चारे की कमी हो गई।

इन्हीं विषम परिस्थितियों में मुगल सेना ने कई दिशाओं से अहमदनगर पर आक्रमण किया। 1630 ई. में अबुल हसन ने अहमदनगर की सेना को परास्त करके नगर को लूट लिया। आजम खाँ ने धरवर पर अधिकार कर लिया। वह दौलताबाद के सुदृढ़ दुर्ग पर भी घेरा डालने की योजना बना रहा था किंतु अकाल पड़ जाने के कारण वह ऐसा न कर सका। बीजापुर प्रकटतः अहमदनगर की सहायता कर रहा था। इस कारण आजम खाँ ने परेन्दा के दुर्ग पर आक्रमण किया किंतु असफल होकर अपनी छावनी को लौट गया।

इन्ही दिनों अहमदनगर में अबीसीनिया वालों की सहायता प्राप्त करने के लिये मलिक अम्बर के पुत्र फतेह खाँ को कैदखाने से मुक्त करके उसे प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त कर दिया गया परन्तु इसके परिणाम अच्छे नहीं हुए। मुकर्रबखाँ, जो मुगलों का घोर विरोधी था, अहमदनगर के शासक से नाराज होकर मुगलों से जा मिला। मुगलों ने उसका स्वागत किया और उसे रूस्तमखाँ की उपाधि से पुरस्कृत किया।

फतेह खाँ की स्वामिभक्ति भी संदिग्ध ही रही। वह भी मुगलों से मिल गया। उसने मुर्तजाखाँ को विष दिलवाकर उनकी हत्या करवा दी और उसके दस वर्षीय पुत्र को अहमदनगर के तख्त पर बैठा दिया। फतेहखाँ ने शाहजहाँ को विपुल धन तथा हाथी भेंट के रूप में भिजवाये तथा शाहजहाँ के नाम से खुतबा पढ़वाकर उसके नाम की मुद्राएँ चलवाईं।

इससे शाहजहाँ संतुष्ट हो गया। 7 जून 1631 को शाहजहाँ की बेगम मुमताज की मृत्यु हो गई। इस कारण कुछ समय के लिये शाहजहाँ की दक्षिण में रुचि समाप्त हो गई। उसने अनुभव किया कि अहमदनगर की विजय का काम पूरा हो गया था। अतः मार्च 1632 में उसने बुरहानपुर से आगरा के लिए प्रस्थान कर दिया।

शाहजहाँ और फतेह खाँ का समझौता बहुत दिनों तक नहीं टिका। शाहजहाँ ने उन मराठा सरदारों को अपनी सेवा में रख लिया था, जिनसे फतेह खाँ की शत्रुता थी। इसलिये फतेहखाँ ने मुगलों से अंसतुष्ट होकर मुगलों के विरुद्ध बीजापुर के सुल्तान से गठबन्धन कर लिया।

इस कारण दक्षिण के गवर्नर महाबत खाँ ने मार्च 1633 में अहमदनगर पर आक्रमण कर दिया तथा अम्बरकोट, महाकोट, दौलताबाद आदि दुर्गों पर अधिकार जमा लिया। फतेहखाँ को आत्मसमर्पण करना पड़ा। सितम्बर 1633 में फतेह खाँ तथा अहमदनगर के अन्तिम सुल्तान हुसैनशाह को शाहजहाँ के पास आगरा भेज दिया गया।

शाहजहाँ ने फतेह खाँ को दो लाख रुपये सालाना की पेन्शन देकर उसकी सारी जायदाद लौटा दी। हुसैनशाह को ग्वालियर भेज दिया गया और अहमदनगर को मुगल सल्तनत में मिला लिया गया।

बीजापुर अभियान

बीजापुर का सुल्तान मुहम्मद आदिलशाह कभी मुगलों के पक्ष में हो जाता था और कभी उनका विरोध करने लगता था। 1631 ई. में शाहजहाँ ने आसफखाँ को बीजापुर पर आक्रमण करने की आज्ञा दी किंतु आसफ खाँ बीजापुर के विरुद्ध सफल नहीं हुआ।

इस पर शाहजहाँ ने आसफ खाँ को दक्षिण से वापस बुला लिया और उसके स्थान पर महाबतखाँ को भेज दिया। महाबतखाँ ने पहले अहमदनगर को पराजित किया और उसके बाद बीजापुर पर आक्रमण किया। परेन्दा के दुर्ग का घेरा डाल दिया गया परन्तु मुगल अफसरों के आपसी झगड़ों के कारण तथा रसद की कमी होने के कारण घेरा उठा लेना पड़ा। 1634 ई. में महाबतखाँ की मृत्यु हो गई और शाहजहाँ को दक्षिण में नई व्यवस्था करनी पड़ी।

इन दिनों दक्षिण में मुगलों का सबसे घोर विरोधी शाहजी भोंसले नामक मराठा सरदार था। यद्यपि उसने शाहजहाँ द्वारा दिया गया मनसब स्वीकार कर लिया था परन्तु जब शाहजहाँ ने उसकी जागीर का कुछ हिस्सा फतेहखाँ को दे दिया तब उसने शाहजहाँ का मनसब त्यागकर बीजापुर के सुल्तान के यहाँ नौकरी कर ली।

शाहजहाँ ने शाहजी भौंसले तथा बीजापुर के सुल्तान दोनों को दण्डित करने का निश्चय किया। मुगल सेना ने तीन ओर से बीजापुर पर आक्रमण किया। बीजापुर के लिए इस भयंकर आक्रमण का सामना करना सम्भव नहीं था। इसलिये शाहजी भौंसले बीजापुर से भाग खड़ा हुआ और बीजापुर के सुल्तान ने मुगलों की अधीनता स्वीकर कर ली।

उसने मुगल बादशाह को बीस लाख रुपये की पेशकश दी तथा यह वचन दिया कि गोलकुण्डा के विरुद्ध किसी प्रकार की सैनिक कार्यवाही नहीं करेगा और न अहमदनगर में किसी के उत्तराधिकार का समर्थन करेगा। उसने यह भी जिम्मेदारी ली कि यदि शाहजी भौंसले जुन्नर तथा त्रिम्बक के दुर्गों को समर्पित नहीं करेगा तो वह उसका दमन करेगा।

इस सन्धि के बाद बीजापुर के सुल्तान ने अपनी शक्ति को बढ़ाना आरम्भ किया तथा कर्नाटक में अपने राज्य का विस्तार किया। 1656 ई. में बीजापुर केे सुल्तान मोहम्मद आदिलशाह की मृत्यु हो गई और उसके स्थान पर उसका कथित पुत्र अली आदिलशाह सुल्तान बना।

मुहम्मद आदिलशाह के कोई पुत्र नहीं था। जब शाहजहाँ को इसकी सूचना मिली तब उसने बीजापुर की शक्ति को नष्ट करने के लिये बीजापुर पर तीन आरोप लगाये- (1.) कर के बकाया होने का, (2.) गोलकुण्डा को सैनिक सहायता देने का और

(3.) कर्नाटक के मीर जुमला की जायदाद में हस्तक्षेप करने का। इसके बाद बादशाह ने शहजादे औरंगजेब को बीजापुर पर आक्रमण करने भेजा और मीर जुमला तथा शाइस्ताखाँ को उसकी सहायता के लिए भेजा।

1657 ई. में मुगल सेना ने दक्षिण के लिये अभियान किया। सबसे पहले उसने बीदर के दुर्ग पर अधिकार किया। इसके बाद कल्याणी के दुर्ग पर भी उसका अधिकार हो गया। मुगल सेना ने आगे बढ़कर बीजापुर का घेरा डाला। युद्ध चलता रहा परन्तु साथ ही साथ सन्धि की वार्ता भी आरम्भ की गई।

अन्त में दोनों पक्षों में समझौता हो गया जिसके अनुसार बीजापुर का सुल्तान एक लाख वार्षिक कर देने को तैयार हो गया। बीदर, कल्याणी तथा परेन्दा के दुर्ग तथा कुछ अन्य भू-भाग भी बादशाह को मिल गये। इस पर बादशाह ने औरंगजेब को युद्ध बन्द करके बीजापुर से मुगल सेना को हटा लेने और मीर जुमला को दिल्ली भेज देने का आदेश दिया। औरंगजेब ने इन आदेशों का पालन किया।

गोलकुण्डा अभियान

जहाँगीर के समय से ही गोलकुण्डा तथा मुगलों के बीच मनोमालिन्य चल रहा था क्योंकि गोलकुण्डा के सुल्तान ने सदैव मुगल साम्राज्य के विरुद्ध मलिक अम्बर की सहायता की थी। जिस समय शाहजहाँ ने अपने पिता के शासन काल में विद्रोह किया था उस समय उसे भी गोलकुण्डा में शरण दी गई थी।

जब बीजापुर तथा अहमदनगर ने मुगलों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाया तब गोलकुण्डा इस गुट से अलग रहा इसलिये मुगलों ने उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की परन्तु गोलकुण्डा का सुल्तान मुगल बादशाह को पेशकश या कर देने को तैयार नहीं था और न उसकी अधीनता स्वीकार करने को तैयार था।

शाहजहाँ ने गोलकुण्डा के सुल्तान को आदेश दिये कि वह शाहजहाँ के नाम से खुतबा पढ़वाये तथा शाहजहाँ के नाम की मुद्राएँ चलवाये। शाहजहाँ ने उससे बहुत बड़ी पेशकश की भी माँग की और अपनी सेना को गोलकुण्डा की सीमा पर नियुक्त कर दिया। इस पर गोलकुण्डा के सुल्तान अब्दुल्ला कुतुबशाह ने भयभीत होकर शाहजहाँ की समस्त मांगों को स्वीकार कर लिया। इसके बदले में शाहजहाँ ने बीजापुर तथा मराठों के आक्रमणों से गोलकुण्डा की रक्षा करने का वचन दिया।

जब औरंगजेब दक्षिण का गवर्नर नियुक्त हुआ तब गोलकुण्डा तथा मुगलों में फिर से युद्ध प्रारम्भ हो गया। गोलकुण्डा ने बहुत दिनों से कर नहीं दिया था। औरंगजेब ने उससे कर माँगा। इसके अतिरिक्त गोलकुण्डा के सुल्तान ने कर्नाटक के हिन्दू राजा पर आक्रमण कर दिया था।

कर्नाटक के राजा ने मुगल बादशाह से रक्षा करने की याचना की और बदले में बड़ी धन राशि देने और इस्लाम स्वीकार करने का वचन दिया परन्तु समय पर राजा की सहायता नहीं हो सकी और उसका राज्य समाप्त हो गया। इससे शाहजहाँ को बड़ी चिन्ता हुई। इसी समय गोलकुण्डा का प्रधानमंत्री मीर जुमला शाहजहाँ की शरण में आ गया। मीर जुुमला मूलतः फारस का रहने वाला था। वह योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था।

अपनी प्रतिभा के बल पर वह गोलकुण्डा राज्य का प्रधानमंत्री बन गया। उसने कर्नाटक के कुछ भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और उसे अपनी निजी सम्पत्ति बना लिया। इससे गोलकुण्डा का सुल्तान अप्रसन्न हो गया तो मीर जुमला मुगलों से मिल गया और शाहजहाँ ने उसे अपना संरक्षण दे दिया।

इन सब कारणों से शाहजहाँ ने औरंगजेब को गोलकुण्डा पर आक्रमण करने का आदेश दिया। औरंगजेब ने अपने पुत्र मुहम्मद की अध्यक्षता में एक सेना गोलकुण्डा पर आक्रमण करने भेजी। औरंगजेब स्वयं भी एक सेना के साथ गोलकुण्डा पहुँचा और उसका घेरा डाल दिया।

गोलकुण्डा का सुल्तान घबरा गया परन्तु शाहजादी जहाँआरा के कहने से शाहजहाँ द्वारा यह युद्ध रोक दिया गया। फिर भी शाहजहाँ के उद्देश्य की पूर्ति हो गई। उसे गोलकुण्डा के सुल्तान से बकाया कर मिल गया। मीर जुमला की कर्नाटक की जागीर भी बादशाह को मिल गई। औरंगजेब के पुत्र मुहम्मद का विवाह गोलकुण्डा के सुल्तान की कन्या से हो गया। इस प्रकार गोलकुण्डा राज्य की रक्षा हो गई।

शाहजहाँ की मध्य एशिया नीति

तैमूर लंग ने मध्य एशिया के काफी बड़े हिस्से पर अधिकार किया था। इसलिये उसके वंशज मध्य एशिया को अपना पैतृक राज्य समझते थे और उस पर अधिकार जमाने के लिये लालायित रहते थे। शाहजहाँ से पहले के मुगल बादशाह भारत के भीतर ही समस्याओं में उलझे रहे इस कारण उन्हें मध्य एशिया की ओर ध्यान देने का अवसर नहीं मिला।

शाहजहाँ ने उत्तर तथा दक्षिण भारत में जो अभूतपूर्व सफलताएँ प्राप्त कीं उनसे उसका उत्साह बढ़ गया और वह मध्य एशिया पर अधिकार स्थापित करने के लिए लालायित हो उठा। उधर उजबेग भी काबुल तथा कन्दहार पर दृष्टि लगाये रहते थे। बल्ख तथा बदख्शाँ काबुल तथा मध्य एशिया के बीच में पड़ते थे। काबुल, मुगल सल्तनत का एक अंग था। अतः मध्य एशिया में पहुँचने के लिए बल्ख तथा बदख्शाँ पर अधिकार करना आवश्यक था।

मध्य एशिया अभियान की विफलता

1641 ई. में शाहजहाँ को मध्य एशिया पर आक्रमण करने का अवसर प्राप्त हो गया। इस वर्ष बल्ख के गवर्नर नजर मुहम्मद ने अपने बड़े भाई इमामकुली खाँ को हटाकर समरकन्द के तख्त पर अधिकार कर लिया। इससे मध्य एशिया में हलचल मच गई। शाहजहाँ ने इस अवसर से लाभ उठाने के लिये शहजादे मुराद तथा अली मर्दान खाँ की अध्यक्षता में एक सेना भेजी।

इस सेना ने बल्ख तथा बदख्शाँ पर अधिकार कर लिया किंतु शाहजादा मुराद इससे आगे बढ़ने को तैयार नहीं हुआ इसलिये मुगल सेना वहाँ से हिन्दुस्तान लौट आई। इसके बाद शाहजहाँ ने शाहजादा औरंगजेब को एक विशाल सेना के साथ मध्य एशिया अभियान पर भेजा।

औरंगजेब को प्रारम्भ में कुछ सफलता मिली परन्तु मध्य एशिया में अकाल पड़ जाने से रसद की कमी पड़ने लगी। उजबेगों ने छापामार रणनीति का प्रयोग करके मुगलों को छकाना आरम्भ कर दिया। औरंगजेब उजबेगों के विरुद्ध कुछ नहीं कर सका और वह बल्ख का प्रभार कासिम खाँ को सौंपकर अक्टूबर 1647 में काबुल के लिए रवाना हो गया। इस प्रकार शाहजहाँ की मध्य एशिया योजना असफल रही। दोनों पक्षों की धन तथा जन की भारी क्षति हुई तथा किसी भी पक्ष को लाभ नहीं हुआ।

कन्दहार अभियान की विफलता

कन्दहार जहाँगीर के शासन काल में मुगलों के हाथ से निकलकर फारस के अधिकार में चला गया था। इन दिनों अली मर्दान खाँ फारस के शाह अब्बास (द्वितीय) की ओर से कन्दहार पर शासन कर रहा था। कुछ कारणों से शाह अब्बास, अली मर्दान खाँ से अप्रसन्न हो गया और उसने अली मर्दान खाँ को हटाकर नया सूबेदार नियुक्त कर दिया।

इससे पहले कि नया गवर्नर कन्दहार पहुँचे, अली मर्दान खाँ ने कन्दहार का अधिकार फरवरी 1638 में मुगलों को सौंप दिया। शाहजहाँ ने अली मर्दानखाँ को 6,000 का मनसब प्रदान करके काश्मीर का गवर्नर बना दिया। कन्दहार की सुरक्षा के लिये एक विशाल सेना भेजी गई।

फारस का शाह कन्दहार को छोड़ने के लिये तैयार नहीं था। इसलिये कन्दहार को फिर से जीतने का प्रयास आरम्भ हो गया। शाह अब्बास (द्वितीय) ने एक विशाल सेना कन्दहार पर आक्रमण करने के लिए भेजी। 16 सितम्बर 1648 को फारस की सेना ने कन्दहार का घेरा डाल दिया।

मुगल सूबेदार दौलत खाँ दुर्ग की रक्षा नहीं कर सका। उसने 11 फरवरी 1649 को दुर्ग शाह अब्बास को समर्पित कर दिया। शाहजहाँ ने पहले औरंगजेब को और बाद में दारा को कन्दहार पर पुनः विजय प्राप्त करने के लिये भेजा परन्तु मुगल सेनाओं को सफलता नहीं मिल सकी और कन्दहार सदैव के लिए मुगलों के हाथ से निकल गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – शाहजहाँ

शाहजहाँ

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

उत्तराधिकार का युद्ध

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

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शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध मुस्लिम इतिहासकारों की दृष्टि में शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध मध्यकालीन इतिहास का स्वर्णयुग था जबकि हिन्दू इतिहासकार उसके शासन प्रबन्ध को मजहबी कट्टरता से परिपूर्ण मानते हैं।

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

शाहजहाँ ने बादशाह बनने के पहले से ही अपनी योग्यता का परिचय देकर ख्याति अर्जित कर ली थी। वह अपने आचरण तथा व्यवहार में अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान रखता था। वह सोच-समझकर बोलता था तथा कर्त्तव्य को नहीं भूलता था। जब तक उसका स्वास्थय अच्छा रहा, तब तक वह राज्य के समस्त कार्यों को स्वयं देखता रहा।

किसी भी अधिकारी या शाहजादे का साहस नहीं था कि वह बादशाह की आज्ञा की अवहेलना करे। जब उसका स्वास्थ्य बिगड़ गया तब उसने शासन का कार्य अपने योग्यतम पुत्र दारा के हाथों में सौंप दिया। इस प्रकार उसके शासन काल को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है- (1) जब तक शाहजहाँ का स्वास्थ्य अच्छा था, तब तक वह स्वयं शासन करता रहा, (2) जब शाहजहाँ बीमार पड़ गया, केन्द्रीय शासन पूर्णतः दारा के हाथों में चला गया।

शासन का मूल ढांचा

शाहजहाँ की शासन व्यवस्था का ढाँचा मूलतः वही था जो अकबर के शासन काल में स्थापित हुआ था। मनसबदारी प्रथा पूर्ववत् बनी रही परन्तु अकबर द्वारा हटाई गई जागीर प्रथा को शाहजहाँ ने फिर से लागू कर दिया था। शाहजहाँ का दण्ड विधान बड़ा कठोर था। अपराधियों को प्रायः अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था।

शाहजहाँ के शासन प्रबन्ध के सम्बन्ध में खाफीखाँ ने लिखा है- ‘तैमूर के वंशजों में कोई भी ऐसा शासक नहीं हुआ जो संगठन के कार्य में, कोष की वृद्धि करने में, देश की व्यवस्था करने में, अफसरों तथा सैनिकों की योग्यता को मान्यता देने में शाहजहाँ की बराबरी कर सके।’

उसके शासन काल में सल्तनत में शान्ति बनी रही। किसानों की भलाई का ध्यान रखा जाता था। अत्याचारी सूबेदारों को जनता द्वारा शिकायत करने पर हटा दिया जाता था। यदि कर वसूल करने वाले प्रजा के साथ क्रूरता का व्यवहार करते थे तो उन्हें कठोर दण्ड दिया जाता था।

जन साधारण की दशा

शाहजहाँ के शासन काल में बनवाई गई इमारतों से अनुमान होता है कि सल्तनत की प्रजा धन-सम्पन्न तथा सुखी रही होगी परन्तु प्रजा की स्थिति सन्तोषजनक नहीं थी। विदेशी यात्रियों के विवरण के अनुसार प्रान्तीय गवर्नर प्रजा के साथ बड़ी क्रूरता का व्यवहार करते थे।

किसानों की दशा

अकबर के शासन काल में उपज का केवल एक तिहाई भाग लगान के रूप में वसूल किया जाता था किंतु शाहजहाँ के काल में उपज का आधा हिस्सा सरकारी लगान के रूप में लिया जाने लगा। इसके साथ ही कृषि की उन्नति तथा उपज बढ़ाने का प्रयत्न किया गया।

कृषि कार्य से विमुख रहने वाले तथा काम से बचने वाले किसानों को कोड़े लगाये जाते थे। यदि अकाल पड़ने से कृषि नष्ट हो जाती थी तो सरकार की ओर से किसानों की सहायता की जाती थी। शाहजहाँ के शासन काल में किसानों की दशा उतनी अच्छी नहीं थी जितनी अकबर के शासन काल में थी।

शासन कार्य का बंटवारा

सैद्धांतिक रूप से शाहजहाँ का शासन स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था तथा शासन की समस्त शक्तियाँ बादशाह के नियंत्रण में थी परन्तु व्यावहारिक रूप में अधिकारियों की एक लम्बी चौड़ी फौज सल्तनत के विभिन्न भागों का शासन चलाती थी। शाहजहाँ ने सल्तनत के विभिन्न भागों का प्रबन्ध अपने पुत्रों को सौंप दिया था, ताकि वहाँ शान्ति एवं व्यवस्था बनी रहे।

उसने शुजा को बंगाल तथा बिहार का, औरंगजेब को दक्षिण का और मुराद को मालवा तथा गुजरात का गवर्नर बनाया। दारा को वह अपने पास रखता था जो केन्द्रीय शासन चलाने में बादशाह की सहायता करता था। तख्त की कामना रखने वाले शहजादों को दूरस्थ प्रान्तों का सूबेदार बनाना शाहजहाँ की बहुत बड़ी भूल थी।

राजधानी से दूर तथा बादशाह के नियंत्रण से परे रहकर शहजादों को अपनी शक्ति तथा महत्वाकांक्षाएं विस्तारित करने का अवसर मिल गया। अन्त में इन शहजादों ने शाहजहाँ के जीते जी ही उसकी सल्तनत पर कब्जा कर लिया।

धार्मिक असहिष्णुता की नीति

शाहजहाँ ने अपने पितामह अकबर की उदार तथा धार्मिक सहिष्णुता की नीति को त्याग दिया। जहाँगीर के शासन काल में जो धार्मिक कट्टरता आरम्भ हुई थी वह शाहजहाँ के काल में और आगे बढ़ी। उसने कई ऐसे कार्य किये जो धर्मान्धता की श्रेणी में आते थे।

1614 ई. में उसने आदेश दिया कि जहाँगीर के शासन काल में जिन मन्दिरों का निर्माण आरम्भ किया गया था, उन्हें गिरा दिया जाये। इस आदेश पर केवल बनारस में ही 76 मन्दिरों को तोड़ा गया। शाहजहाँ की आज्ञा से बुन्देलखण्ड के हिन्दू मन्दिर तुड़वाये गये और जुझारसिंह के पुत्रों को मुसलमान बनाया गया।

शाहजहाँ की धार्मिक कट्टरता के और भी बहुत से उदारहण हैं किंतु बाद में शाहजहाँ के धार्मिक विचार बदल गये और उसमें उदारता आ गई। उसने मन्दिरों को तोड़ने और हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की नीति का त्याग कर दिया। शाहजहाँ के राज्य में कई हिन्दू बड़े पदों पर आसीन थे और उन्हें दरबार में सम्मान प्राप्त था।

यदि शाहजहाँ इस नीति का अनुसरण नहीं करता तो उसे हिन्दू राजाओं का समर्थन प्राप्त नहीं हुआ होता। अनेक हिन्दू राजाओं ने सल्तनत की सुरक्षा में विपुल योग दिया और अपने प्राणों की बाजी लगा दी। शाहजहाँ के पुत्र दारा में धार्मिक सहिष्णुता का जो भाव था उससे भी अनुमान लगाया जा सकता है कि शाहजहाँ ने अपने शासन काल की धार्मिक कट्टरता को बाद में त्याग दिया था।

यही कारण है कि शाहजहाँ के शासन में संस्कृत साहित्य की उन्नति हुई। आसफखाँ तथा दारा, संस्कृत साहित्य एवं ग्रन्थों के आश्रयदाता थे। राजदरबार में हिन्दी तथा संस्कृत के कवियों का भी आदर होता था। ग्वालियर के रहने वाले एवं ब्रजभाषा के कवि सुन्दरदास, शाहजहाँ के दरबार में रहते थे।

हिन्दी के कवि चिन्तामणि को भी शाहजहाँ का संरक्षण प्राप्त था। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शाहजहाँ में धार्मिक सहिष्णुता एवं धार्मिक कट्टरता दोनों के बीज विद्यमान थे जिनमें से धार्मिक सहिष्णुता का गुण दारा ने अपना लिया और धार्मिक कट्टरता का गुण औरंगजेब ने अपना लिया।

भवन निर्माण

शाहजहाँ के काल में बने भवनों में अलंकरण की प्रचुरता है। इनमें मूल्यवान् रत्नों और पत्थरों का प्रचुर उपयोग हुआ है। आगरा के दुर्ग में बलुवा पत्थर के जो राजभवन बने हुए थे उन्हें शाहजहाँ ने गिरवाकर पुनः संगमरमर से बनवाया। शाहजहाँ की सबसे अधिक शानदार इमारत ताजमहल है जो वास्तव में एक मकबरा है।

इसमें शाहजहाँ तथा मुमताज महल की कब्रें स्थित हैं। ताजमहल आगरा में यमुना नदी के तट पर स्थित है। इसका निर्माण शाहजहाँ ने मुमताज महल की स्मृति में, उसके मरने के बाद 1632 ई. में आरम्भ किया था। ताजमहल 1654 ई. में बनकर पूरा हुआ। इसे बनवाने में बाईस वर्ष का समय और तीस करोड़ रुपये लगे। यह श्वेत संगमरमर से निर्मित है। इसकी गणना विश्व के सुंदरतम भवनों में होती है।

ताज महल की प्रशंसा करते हुए एल्फिन्स्टन ने लिखा है- ‘सामग्री की सम्पन्नता, चित्र के वैचित्र्य तथा प्रभाव में इसकी समता करने वाला यूरोप अथवा एशिया में दूसरा मकबरा नहीं है। आगरा में शाहजहाँ की बनवाई इमारतों में दीवाने-आम, दीवाने-खास, समन-बुर्ज, मोती मस्जिद आदि मुख्य हैं।

मोती मस्जिद की प्रशंसा करते हुए सन्त निहालसिंह ने लिखा है- ‘इसकी डिजाइन ऐसी कारीगरी द्वारा बनाई गई थी जिसमें यह कौशल था कि यह आत्मा के भौतिक बन्धनों से निकल जाने के संघर्ष को प्रस्तर में प्रदर्शित कर दे।’

दिल्ली की इमारतों में दीवाने-खास सर्वाधिक अलंकृत है। शाहजहाँ की बनवाई हुई दिल्ली की इमारतों में जामा-मस्जिद सबसे विशाल है।

दिल्ली के दुर्ग के भीतर की इमारतें की प्रशंसा करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘दिल्ली दुर्ग के भीतर की इमारतें अत्यधिक अलंकृत थीं और चीन की कला के लिए स्पर्धा की चीज बन गई थीं।’

शाहजहानाबाद की अली मस्जिद तथा शाहजहानाबाद का दुर्ग भी शाहजहाँ की श्रेष्ठ कृतियों में से है। शाहजहाँ का तख्ते ताऊस अर्थात् मयूर सिंहासन अपने समय की अद्भुत रचना है। यह सिंहासन सात वर्षों में लगभग चार करोड़ रुपयों से बना था। यह सिंहासन मयूरों के ऊपर खड़़ा था और रत्नों से जगमगाता रहता था।

शाहजहाँ की इस अमूल्य कृति को नादिरशाह फारस उठा ले गया था। शाहजहाँ के दलबादल नामक शिविर से भी उसकी शान का पता लगता है। उसे खड़ा करने में कई हजार आदमी और हाथियों की आवश्यकता पड़ती थी और लगभग दो महिने का समय लगता था। शाहजहाँ ने दिल्ली, लाहौर तथा कश्मीर में उपवन बनवाये थे जो उसके काल के मुगलिया वैभव को प्रदर्शित करते थे।

अनेक इतिहासकारों ने शाहजहाँ के शासन काल को स्वर्णयुग की संज्ञा दी है परन्तु अन्य कई विद्वान शाहजहाँ के शासन काल को स्वर्णयुग नहीं मानते। उनके अनुसार शाहजहाँ के काल का न तो आरम्भ अच्छा था, न मध्य अच्छा था और न अन्त ही अच्छा था।

क्या शाहजहाँ का शासन स्वर्णकाल था?

जो विद्वान शाहजहाँ के शासन काल को स्वर्ण युग मानते हैं वे अपने मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क देते हैं-

(1.) शाहजहाँ का शासन काल मुगल साम्राज्य के चूड़ान्त विकास का काल था जिसके अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों में उन्नति हुई।

(2.) शाहजहाँ ने अपने पूर्वजों से प्राप्त सल्तनत को न केवल सुरक्षित रखा अपितु उसमें वृद्धि भी की।

(3.) शाहजहाँ का शासन काल पूर्ण शान्ति तथा सुव्यवस्था का काल था। उसके शासन काल में दो-चार विद्रोह हुए परन्तु ये विद्रोह बादशाह के अत्याचार अथवा कुशासन के विरुद्ध नहीं होकर महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों की स्वार्थ सिद्धि के उद्देश्य से किये गये थे। बादशाह इन विद्रोहों के दमन करने में रूप से सफल रहा।

(4.) शाहजहाँ अपने शासन को सुचारू रूप से चलाने में इतना सक्रिय तथा संलग्न रहता था कि उत्तराधिकार के युद्ध के पूर्व किसी को भी उसकी शक्ति को चुनौती देने का साहस नहीं हुआ। उसकी रुग्णावस्था के कारण ही उसके शासन काल के अन्तिम भाग में विशृंखलता आरम्भ हुई।

(5.) शाहजहाँ का दण्ड विधान कठोर था परन्तु उस काल में अमीरों, सरकारी कर्मचारियों तथा प्रांतपतियों के षड्यन्त्रों, विद्रोहों तथा अत्याचारों को रोकने के लिए कठोर दण्ड विधान की ही आवश्यकता थी।

(6.) शाहजहाँ न्यायप्रिय बादशाह था। अपराधियों को दण्ड देने में संकोच नहीं करता था। कर्त्तव्य भ्रष्ट तथा अत्याचारी अधिकारियों को वह दण्ड दिया करता था, ताकि प्रजा के साथ किसी प्रकार का अन्याय न हो।

(7.) शाहजहाँ का शासन काल समृद्धि का काल था। यही कारण है कि इस अवधि में अनेक भव्य भवनों का निर्माण हो सका। उसके द्वारा निर्मित ताजमहल विश्व के सात आश्चर्यों में गिना जाता है। मोती मस्जिद, अली मस्जिद तथा शाजहानाबाद का दुर्ग आज भी शाहजहाँ के काल की गौरव गाथा कह रहे हैं। ये रचनाएं शाहजहाँ के शासन काल को स्वर्ण युग सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।

(8.) दिल्ली, लाहौर तथा काश्मीर में इस काल में जो मनोरम उपवन बनाये गये वे भी उस काल के गौरव के द्योतक हैं।

(9.) शाहजहाँ का दरबार शानो-शौकत का जीता जागता नमूना था। वह अपने दरबार की भव्यता को बनाये रखने के लिये सदैव प्रयत्न करता रहता था। शाहजहाँ के काल में निर्मित तख्ते-ताऊस अद्भुत सिंहासन था जिसमें जड़े हुए रत्नों की ज्योति से विदेशी यात्रियों की आँखे चौंधिया जाती थीं।

(10.) उसके काल में कृषि तथा व्यापार की उन्नति से देश धन-धान्य से पूर्ण हो गया था। उसकी प्रजा ने सल्तनत की प्रतिष्ठा तथा गौरव को बढ़ाने में पूरा सहयोग दिया। भव्य-भवनों के निर्माण से हजारों श्रमिकों एवं कारीगरों को रोजगार मिल सका।

(11.) शाहजहाँ के शासन काल में साहित्य तथा कला की विशेष उन्नति हुई। डॉ. बनारसी प्रसाद सक्सेना ने लिखा है- ‘देश में शान्ति स्थापित हो जाने और बादशाह की व्यक्तिगत दिलचस्पी के फलस्वरूप साहित्य तथा कला के विकास को प्रोत्साहन मिला। दूर-दूर से कवि, दार्शनिक, विद्वान तथा कलाकार उसके दरबार में आश्रय पाने आते थे और प्रतिभा को बहुत कम निराश होना पड़ा था।’

(12.) शाहजहाँ के शासनकाल में फारसी, संस्कृत तथा हिन्दी आदि भाषाओं में उच्च कोटि के गद्य तथा पद्य ग्रन्थों की रचना हुई। डॉ. सक्सेना के अनुसार शाहजहाँ के शासनकाल में ही वह काल आता है जो हिन्दी साहित्य तथा भाषा का सबसे अधिक गौरवपूर्ण काल माना जाता है।

(13.) इस काल में संगीत तथा नृत्यकला की बड़ी उन्नति हुई। शाहजहाँ स्वयं अच्छा गवैया था। जे. एन. सरकार ने उसके संगीत की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘बहुत से शुद्ध आत्मा की सूफी और सन्त, जो संध्याकाल की गोष्ठियों में आते थे, अपने हृदयों को सांसारिकता से हटाकर शाहजहाँ के संगीत को सुनकर आनन्द विभोर हो जाते थे और अपने को भूल जाते थे।’

(14.) इस काल में चित्रकला की बड़ी उन्नति हुई। स्मिथ ने लिखा है- ‘शाहजहाँ के शासन काल में चित्रकला चरमोन्नति को प्राप्त हो गई।’

उपर्युक्त विवरण से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि शाहजहाँ का काल शान्ति तथा सुव्यवस्था और मुगल सल्तनत की चरमोन्नति का काल था। अतः शाहजहाँ के काल को स्वर्णयुग मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये।

क्या शाहजहाँ का शासन स्वर्ण काल नहीं था?

जो इतिहासकार शाहजहाँ के शासन काल को स्वर्ण युग नहीं मानते हैं वे अपने मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क देते हैं-

(1.) शाहजहाँ ने अपने पिता से विद्रोह करके तथा अपने भाई-भतीजों एवं अन्य निकट सम्बन्धियों की हत्या करके तख्त प्राप्त किया था। उसके इस घृणित कार्य से मुगलों की प्रतिष्ठा को भारी आघात लगा तथा मुगल राजनीति में ऐसी घृणित तथा विनाशकारी परम्परा का सूत्रपात हुआ जो आगे चलकर मुगल सल्तनत के लिए प्राण घातक सिद्ध हुई।

(2.) शाहजहाँ ने अपने शासन के प्रारम्भ में जिस अनुदारता तथा असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया, उसके परिणाम मुगल सल्तनत के लिए बड़े घातक सिद्ध हुए। अकबर की उदार नीति को त्याग देने से हिन्दू जनता, राज्य एवं बादशाह से उदासीन होने लगी। औरंगजेब के शासन काल में जब धार्मिक असहिष्णुता, चरम पर पहुँच गई तब मुगल सल्तनत पतनोन्मुख हो गई।

(3.) शाहजहाँ के शासन काल का मध्य भी अच्छा नहीं था। उसके शासन काल में मुगल सल्तनत अपने चूड़ान्त विकास को पहुँच गई। इस चरमोन्नति में ही उसके विनाश का बीजारोपण हो गया था।

(4.) आरम्भ में शाहजहाँ ने बड़ी सतर्कता तथा सावधानी से शासन किया परन्तु शासन काल के मध्य भाग में उसमें विलासिता तथा अकर्मण्यता आ गई। मुमताज महल के मरने के बाद उसकी विलासिता और वासनाएँ अनियंत्रित हो गईं। इस कारण सल्तनत को भारी आघात लगा। प्रान्तीय गवर्नरों को अपनी शक्ति बढ़ाने और षड्यन्त्र रचने का अवसर मिल गया और मुगल सल्तनत का बिखराव होने लगा।

(5.) शाहजहाँ की सीमा नीति के परिणाम अच्छे नहीं हुए। उसकी मध्य एशिया विजय की नीति पूरी तरह अव्यावहारिक तथा असफल सिद्ध हुई। इस कारण मुगल राज्य को जन तथा धन की बड़ी क्षति हुई।

(6.) शाहजहाँ कन्दहार को मुगल सल्तनत के अधीन नहीं रख सका। इस कारण मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा को धक्का लगा।

(7.) यद्यपि शाहजहाँ दक्षिण भारत में अपनी सल्तनत का विस्तार करने में सफल हुआ परन्तु दक्षिण नीति के अन्तिम परिणाम घातक सिद्ध हुए। विद्वानों की राय है कि मुगल सल्तनत की समाधि दक्षिण भारत के युद्धों में तैयार हुई।

(8.) शाहजहाँ के शासन काल का सम्पूर्ण गौरव उसके द्वारा निर्माण कराये गये भव्य भवनों पर आधारित है। इन भव्य भवनों के निर्माण में अपार सम्पत्ति व्यय की गई थी। यह सम्पत्ति अमीरों के धन को छीनकर, लूटमार करके, प्रजा पर अत्यधिक कर लगाकर संग्रहीत की गई थी। मजदूरों से प्रायः जबरदस्ती काम लिया जाता था।

(9.) बादशाह का राजसी वैभव चरम पर था किंतु प्रजा की दशा खराब थी। शाहजहाँ के शासन में दण्ड विधान कठोर था। विदेशी यात्रियों के विवरण से पता लगता है कि सड़कें सुरक्षित नहीं थीं। किसानों से उनकी उपज का आधा भाग ले लिया जाता था। लगान बड़ी कठोरता से वसूल किया जाता था। 

(10.) शाहजहाँ के शासन काल का अन्त भी अच्छा नहीं था। उसकी बीमारी के कारण सल्तनत में बिखराव आने लगा था। बादशाह की शक्ति के क्षय के साथ-साथ उसका नियंत्रण तथा अनुशासन भी ढीला पड़ने लगा। वह स्वयं शासन कार्य की उपेक्षा करने लगा जिससे शासन की वास्तविक शक्तियाँ दूसरे व्यक्तियों के हाथों में खिसकने लगी। जहाँआरा

(11.) शाहजहाँ अपने परिवार को संगठित तथा नियंत्रित नहीं रख सका। दारा तथा जहाँआरा पर उसका विशेष स्नेह होनेे से उसके अन्य पुत्र तथा पुत्रियाँ उससे अप्रसन्न थे। जहाँआरा दारा का और अन्य शहजादियाँ अपने अन्य भाइयों का समर्थन करने लगीं जिससे शाहजहाँ के परिवार में नित्य नये षड्यन्त्र तथा कुचक्र रचे जाने लगे। अंत में ये षड्यंत्र बादशाह तथा सल्तनत के लिएघातक सिद्ध हुए। शाहजहाँ के जीवन काल में ही शहजादों में उत्तराधिकार के लिए युद्ध आरम्भ हो गया इसका उत्तरदायित्व शाहजहाँ पर ही था। शाहजहाँ को अपने जीवन के अंतिम चार वर्ष बंदी के रूप में बिताने पड़े। उसे अनेक यातनाएँ तथा अपमान सहन करने पड़े।

(12.) उत्तराधिकार के युद्ध के कारण शाहजहाँ के जीवनकाल में ही उसके पुत्रों तथा पौत्रों की नृशंसतापूर्वक हत्याएँ हुईं। इस युद्ध के कारण औरंगजेब जैसा धर्मान्ध व्यक्ति मुगल सल्तनत का बादशाह बन गया, जिसकी दुर्नीति के फलस्वरूप जनता त्राहि-त्राहि करने लगी और मुगल सल्तनत पतनोन्मुख हो गई।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि शाहजहाँ के शासन काल का आदि, मध्य तथा अन्त कोई भी भाग सराहना के योग्य नहीं हैं। अतः उसके काल को स्वर्ण युग की संज्ञा देना ठीक नहीं हैं। शाहजहाँ के शासन काल के आलोचकों के कुछ विचार निम्नांकित हैं-

शाहजहाँ पर लगने वाले आरोपों का खण्डन

शाहजहाँ पर लगने वाले विभिन्न आरोपों का खण्डन करने के लिये विभिन्न विद्वान शाहजहाँ के समर्थन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं-

(1.) यह सत्य है कि शाहजहाँ ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह करके और अपने भाई-भतीजों की हत्या करके तख्त प्राप्त किया था परन्तु उन दिनों की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं थी। जहाँगीर पहले ही इस परम्परा की नींव रख चुका था।

(2.) शाहजहाँ अपने भाइयों में सर्वाधिक योग्य तथा महात्वाकंाक्षी था। उसके विरुद्ध निरंतर षड्यन्त्र चल रहे थे और उसके विरुद्ध बादशाह के कान भरे जा रहे थे इसलिये शाहजहाँ का विद्रोह करना स्वाभाविक था।

(3.) अपने समस्त प्रतिद्वन्द्वियों को सदैव के लिए अपने मार्ग से हटा देना शाहजहाँ की व्यावहारिक बुद्धि का परिचायक है। नैतिक दृष्टि से उसका यह कार्य भले ही निन्दनीय था परन्तु राजनीतिक दृष्टि से ठीक था।

(4.) शाहजहाँ स्वभाव से क्रूर अथवा रक्त पिपासु नहीं था। उसने केवल अपने मार्ग की बाधाएं हटाने तथा तख्त को निरापद बनाने के लिए ऐसा किया। नूरजहाँ के साथ उसने जो अच्छा व्यवहार किया वह सराहनीय है। उसने कभी भी निरर्थक हत्याकाण्ड नहीं कराया।

(5.) शाहजहाँ को अपने परिवार के सदस्यों से बड़ा स्नेह था। उसने अपने समस्त पुत्रों को समान रूप से योग्यता प्रदर्शित करने का अवसर दिया।

(6.) मुस्लिम राजनीति में उत्तराधिकार के नियम के अभाव के कारण शाहजहाँ के समस्त पुत्रों का तख्त प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना स्वाभाविक तथा अनिवार्य था। इसका उत्तरदायित्व शाहजहाँ पर नहीं डाला जा सकता।

(7.) शाहजहाँ ने उत्तराधिकार के युद्ध को रोकने के लिये हर संभव प्रयत्न किया। दारा तथा जहाँआरा पर शाहजहाँ का विशेष स्नेह हो जाना स्वाभाविक था क्योंकि वे दोनों उसकी सेवा करते थे और उसकी आज्ञा का पालन करते थे।

(8.) शाहजहाँ की मध्य एशिया नीति सफल नहीं रही परन्तु इस अभियान से मध्य एशिया में मुगलों का आतंक छा गया।

(9.) यद्यपि कन्दहार शाहजहाँ के हाथ से निकल गया परन्तु इससे मुगल साम्राज्य को विशेष क्षति नहीं हुई। इसकी पूर्ति दक्षिण विजय से हो गई थी।

(10.) शाहजहाँ पर धर्मान्धता का आरोप लगाना गलत है क्योंकि समस्त हिन्दू राजा अंत तक शाहजहाँ के पक्ष में बने रहे और सल्तनत की सुरक्षा करते रहे। शाहजहाँ का सबसे प्रिय शहजादा दारा, अत्यंत उदार तथा धर्म सहिष्णु था। ऐसी स्थिति में शाहजहाँ धर्मान्ध कैसे हो सकता था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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शाहजहाँ

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

उत्तराधिकार का युद्ध

उत्तराधिकार युद्ध

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उत्तराधिकार युद्ध

शाहजहाँ के जीवित रहते हुए ही शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार युद्ध हुआ जिसमें औरंगजेब विजयी रहा और उसने शाहजहाँ को पकड़कर ताजमहल में कैद कर लिया।

सितम्बर 1657 में शाहजहाँ बीमार पड़ गया। वह 65 वर्ष का हो चुका था। वृद्धावस्था के कारण उसकी बीमारी में सुधार नहीं हुआ और उसकी दशा बिगड़ती चली गई। बीमारी के कारण शाहजहाँ ने दरबार में आना बंद कर दिया। इस कारण उसके बारे में तरह-तरह की अफवाहें फैलने लगीं और शाहजादों में तख्त प्राप्त करने की बेचैनी बढ़ गई। और उनमें उत्तराधिकार का युद्ध आरम्भ हो गया।

अमीरों का दल अपने-अपने उम्मीदवार को आगे बढ़ाने की जुगत करने लगा। हिन्दू चाहते थे कि कोई उदार एवं सहिष्णु प्रवृत्ति का शहजादा तख्त पर बैठे जबकि कट्टर पन्थी मुसलमान अमीर, कट्टर प्रवृत्ति के शहजादे को तख्त पर देखना चाहते थे।

जनता की बेचैनी दूर करने के लिये बादशाह दिन में कई बार ‘झरोखा दर्शन’ देने लगा और दरबार का आयोजन करके दारा को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। शाहजहाँ ने समस्त अमीरों को आज्ञा दी कि वे शहजादे दारा की आज्ञा का पालन करें। शाहजहाँ के इस कदम से शहजादों की बेचैनी और बढ़ गई।

शाहजहाँ के चार पुत्र थे- दारा, शुजा, औरंगजेब तथा मुराद। इनमें दारा सबसे बड़ा था। वह योग्य, उदार, विनम्र तथा दयालु स्वभाव का स्वामी था। शाहजहाँ उसे सर्वाधिक चाहता था तथा उसे अपने पास ही रखता था। राजधानी में रहने के कारण दारा, साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्र की समस्याओं से भी परिचित था।

उसे जितना अधिक प्रशासकीय अनुभव था, और किसी शहजादे को नहीं था। दारा प्रजा में भी लोकप्रिय था। हिन्दु प्रजा को दारा पर पूरा विश्वास था। दारा की कमजोरी यह थी कि उसे दूसरे शहजादों की भांति युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव नहीं था।

शाहजहाँ का दूसरा पुत्र शाहशुजा बंगाल का शासक था। वह बुद्धिमान, साहसी तथा कुशल सैनिक था परन्तु विलासी तथा अयोग्य था। उसमें इतने विशाल मुगल साम्राज्य को सँभालने की योग्यता नहीं थी। शाहजहाँ का तीसरा पुत्र औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। वह अत्यंत असहिष्णु तथा संकीर्ण विचारों का स्वामी था इस कारण उसे कट्टर मुसलमानों का समर्थन प्राप्त हो सकता था।

औरंगजेब को प्रान्तीय शासन तथा युद्धों का अच्छा अनुभव था। धूर्त तथा कुटिल होने के कारण वह अपनी पराजय को विजय में बदलना जानता था। इस समय वह दक्षिण का सूबेदार था। शाहजहाँ का चौथा तथा सबसे छोटा पुत्र मुराद गुजरात तथा मालवा का शासक था।

वह भावुक तथा जल्दबाज था। विलासी प्रवृत्ति का होने से उसमें दूरदृष्टि का अभाव था। वह जिद्दी तथा झगड़ालू प्रवृति का व्यक्ति था। उसमें प्रशासकीय प्रतिभा और सैनिक प्रतिभा की कमी होने पर भी बादशाह बनने की अत्यधिक इच्छा थी।

शाहजहाँ की लड़कियाँ भी उत्तराधिकार के इस युद्ध में भाग लेने लगीं। जहाँआरा दारा का, रोशनआरा औरंगजेब का और गौहरआरा मुराद का पक्ष ले रही थी। इस कारण राजधानी की समस्त खबरें गुप्त रूप से इन शहजादों के पास पहुँचती थीं। इनमें से कई खबरें अतिरंजित होती थीं।

शाहजहाँ तथा दारा ने निराधार खबरों को रोकने का प्रयत्न किया परन्तु इस कार्य में सफलता नहीं मिली। तब बादशाह ने अपनी मुहर तथा अपने हस्ताक्षर से शाहजादों के पास पत्र भेजना आरम्भ किया और उन्हें विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया कि वह जीवित तथा स्वस्थ है परन्तु कोई भी शाहजादा इन पत्रों पर विश्वास करने के लिये तैयार नहीं था।

हर शहजादा बादशाह को अपनी आँखों से देखना चाहता था परन्तु कोई भी शाहजादा अकेले अथवा थोड़े से अनुचरों के साथ राजधानी आने को तैयार नहीं था, क्योंकि उन्हें दारा से भय था। किसी भी शहजादे को अपनी समस्त सेना के साथ राजधानी में आने की अनुमति नहीं थी।

इस लिये विभिन्न पक्षों में संदेह और वैमनस्य बढ़ने लगा और और उनमें उत्तराधिकार का युद्ध की भूमिका तैयार हो गई। सद्भावना, विश्वास तथा धैर्य से ही  उत्तराधिकार के संभावित युद्ध को रोका जा सकता था परन्तु दुर्भाग्यवश शाहजादों में इन गुणों का नितांत अभाव था। शुजा, औरंगजेब तथा मुराद पत्र-व्यवहार द्वारा एक दूसरे के सम्पर्क में थे। उनमें सल्तनत के विभाजन के लिये समझौता हो गया। इन तीनों शाहजादों ने दारा की शक्ति को छिन्न-भिन्न करने का निश्चय किया।

उत्तराधिकार युद्ध

शुजा पर विजय

सबसे पहले शुजा ने स्वयं को बादशाह घोषित किया और दिल्ली की ओर कूच कर दिया। मार्ग में उसे किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। जनवरी 1658 में वह बनारस पहुँच गया। शुजा का मार्ग रोकने के लिये दारा ने अपने पुत्र सुलेमान शिकोह की अध्यक्षता में एक सेना भेजी।

राजा जयसिंह तथा दिलेरखाँ रूहेला को उसकी सहायता के लिए भेजा गया। बनारस के निकट बहादुरपुर नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में भीषण संग्राम हुआ जिसमें शुजा ने परास्त होकर सन्धि कर ली। इस सन्धि के अनुसार शुजा को उड़ीसा, बंगाल तथा मंगेर के पूर्व का बिहार प्रान्त दे दिये गये। शुजा ने राजमहल को अपनी राजधानी बनाने का वचन दिया।

धरमत की पराजय

मुराद ने गुजरात से और औरंगजेब ने दक्षिण से कूच किया। दिपालपुर में दोनों सेनाएँ एक दूसरे से मिल गईं। यहाँ से दोनों शाहजादों की संयुक्त सेनाएँ आगे बढ़ीं। दारा ने मारवाड़ के राजा जसवन्तसिंह तथा कासिमखाँ की अध्यक्षता में इस संयुक्त सेना का सामना करने के लिए शाही सेना भेजी।

उज्जैन के उत्तर-पश्चिम में लगभग चौदह मील की दूरी पर धरमत नामक स्थान पर भीषण संग्राम हुआ। जसवन्तसिंह बड़ी वीरता के साथ लड़े परन्तु कासिम खाँ तथा कुछ राजपूत राजाओं के धोखा देने के कारण उन्हें घायल होकर मैदान छोड़ना पड़ा। वे अपनी राजधानी जोधपुर लौट गये।

जसवंतसिंह द्वारा दारा का पक्ष लिये जाने के कारण औरंगजेब राठौड़ों से नाराज हो गया। वह जीवन भर राठौड़ों से बदला लेने की सोचता रहा किंतु जसवंतसिंह के जीतेजी वह राठौड़ों का बाल भी बांका नहीं कर सका।

सामूगढ़ की पराजय

मुराद और औरंगजेब की विजयी सेनाएँ आगे बढ़ीं। धरमत की पराजय होने पर शाही दरबार में खलबली मच गई। जहाँआरा ने शाही प्रतिष्ठा बचाने के लिये मुराद तथा औरंगजेब से समझौता करने का प्रयास किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। इसलिये दारा एक विशाल सेना लेकर आगे बढ़ा।

29 मई 1658 को आगरा से आठ मील पूर्व में स्थित सामूगढ़ नामक स्थान पर दारा तथा उसके भाइयों की सेनाओं में निर्णयात्मक युद्ध हुआ जिसमें दारा परास्त हो गया। दारा भागकर आगरा पहुँचा। पराजय की शर्म के कारण वह बादशाह से मिले बिना अपनी स्त्री तथा बच्चों के साथ दिल्ली भाग गया।

शाहजहाँ का पतन

औरंगजेब की विजयी सेना ने आगे बढ़कर आगरा का किला घेर लिया तथा किले में यमुना नदी से होने वाली जलापूर्ति बंद कर दी। विवश होकर किले का द्वार खोल देना पड़ा। शाहजहाँ को कैद कर लिया गया और उसे जनाना महल में रखा गया। औरंगजेब ने शासन अपने हाथ में ले लिया। इस प्रकार मुगलिया तख्त पर औरंगजेब का अधिकार हो गया।

मुराद का पतन

अब औरंगजेब ने उन समस्त प्रतिद्वन्द्वियों को समाप्त करने का निश्चय किया जो तख्त के दावेदार हो सकते थे। उसने मुराद को साथ लेकर आगरा से दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में मथुरा के पास एक दिन मुराद आखेट में थककर औरंगजेब के खेेमे में आ गया। औरंगजेब ने उसे दावत दी जिसमें उसे खूब शराब पिलाई गई। जब मुराद को नींद आई तो उसे वहीं सुलाया गया तथा नींद में ही बंदी बना लिया गया। औरंगजेब ने उसे दिल्ली भेज दिया और सलीमगढ़ के दुर्ग में बन्द कर दिया।

दारा का पतन

जब औरंगजेब मुराद को बंदी बनाकर दिल्ली की ओर बढ़ा तो दारा दिल्ली से लाहौर की तरफ भाग खड़ा हुआ। इस प्रकार बिना किसी विरोध के दिल्ली पर भी औरंगजेब का अधिकार हो गया। दिल्ली के शालीमार बाग में औरंगजेब ने अपना राज्याभिषेक कराया तथा दारा का पीछा करने के लिये अपनी सेना भेजी।

दारा लाहौर से गुजरात आ गया। वहां के शासक ने दारा की सहायता की। जोधपुर नरेश जसवंतसिंह भी फिर से दारा की सहायता करने के लिये तैयार हो गये। दारा और उसके सहायकों की सेना अजमेर के निकट दौराई पहुंच गईं। इसी बीच औरंगजेब के दबाव में आकर महाराजा जसवंतसिंह औरंगजेब से मिल गया।

जयपुर नरेश जयसिंह पहले से ही औरंगजेब की सहायता कर रहा था। दारा बहुत वीरता से लड़ा किंतु रणक्षेत्र का अधिक अनुभव न होने के कारण दारा की पराजय हो गई। दारा भागकर मुल्तान की ओर चला गया। औरंगजेब ने लाहौर पर अधिकार करके मुल्तान की ओर कूच किया। वहाँ उसे ज्ञात हुआ कि दारा भक्कर की ओर चला गया।

औरंगजेब ने दारा का पीछा करने का काम अपने अनुभवी सेनापतियों शेख मीर तथा दिलेरखाँ को सौंप दिया और स्वयं दिल्ली लौट आया, जिससे वह शुजा का सामना कर सके, जो इलाहाबाद की ओर बढ़ रहा था।

शुजा का पतन

शुजा अपनी सेना लेकर बिहार से आगरा की ओर बढ़ा। दिसम्बर 1658 में वह इलाहाबाद होता हुआ खनवा नामक स्थान पर पहॅँुचा। औरंगजेब के बड़े पुत्र सुल्तान मुहम्मद ने खनवा में शुजा का मार्ग रोका। औरंगजेब तथा मीर जुमला भी, जो दक्षिण में थे, अपनी-अपनी सेनाएँ लेकर आ पहुँचे। शुजा, औरंगजेब की सेना पर टूट पड़ा परन्तु वह परास्त होकर मैदान से भाग खड़ा हुआ।

औरंगजेब ने अपने पुत्र मुहम्मद तथा मीर जुमला को शुजा का पीछा करने के लिए भेजा। शुजा की सेना कई स्थानों पर परास्त हुई। अन्त में वह ढाका होता हुआ अराकान पहुँचा। शुजा ने अराकान के राजा की हत्या का षड्यन्त्र रचा परन्तु षड्यन्त्र खुल जाने पर शुजा वहीं मार डाला गया। यह भी कहा जाता है कि शुजा अराकान से बचकर मक्का भाग गया।

दारा शिकोह की हत्या

मुल्तान से कूच करने के बाद दारा शिकोह मारा-मारा फिर रहा था। शेख मीर तथा दिलेरखाँ उसका पीछा करते रहे। धीर-धीरे दारा के साथियों की संख्या घटने लगी और उसकी निराशा बढ़ने लगी। दादर नामक स्थान पर मलिक जीवन नामक बलूची सरदार ने गद्दारी करके दारा को औरंगजेब के आदमियों के हाथों सौंप दिया।

1659 ई. में दारा शिकोह कैद करके दिल्ली लाया गया। उसे अनेक प्रकार से अपमानित किया गया और दिल्ली की सड़कों पर घुमाया गया। दारा ने औरंगजेब से क्षमा याचना की परन्तु औरंगजेब ने दारा की हत्या करने की आज्ञा दी। 30 अगस्त 1659 को दारा का सिर धड़ से अलग कर दिया गया।

दारा शिकोह का सिर शाहजहाँ के पास भेजा गया किंतु शाहजहाँ ने दारा का सिर देखने से मना कर दिया। दारा के धड़ को दिल्ली की सड़कों तथा गलियों में घुमाया गया और अन्त में हुमायूँ के मकबरे में दफना दिया गया।

मुराद की हत्या

मुराद अब तक ग्वालियर के दुर्ग में बन्द था। दिसम्बर 1661 में उस पर आरोप लगाकर उसकी भी हत्या कर दी गई।

सुलेमान की हत्या

दारा का पुत्र सुलेमान भी ग्वालियर के दुर्ग में बंद था। उस पर भी आरोप लगाकर मई 1662 में ग्वालियर के दुर्ग में ही उसे विष देकर मार दिया गया। इस प्रकार चार वर्ष की अवधि में औरंगजेब ने अपने समस्त भाइयों तथा भतीजों की नृशंसतापूर्वक हत्या करवा दी। उसका यह काम ठीक वैसा ही था जैसा शाहजहाँ ने अपने भाइयों तथा भतीजों के साथ किया था। इसी के साथ उत्तराधिकार युद्ध समाप्त हुआ।

शाहजहाँ की मृत्यु

शाहजहाँ के जीवन के अन्तिम दिन कारागार में व्यतीत हुए। उसके निवास पर कड़ा पहरा लगा दिया गया। वह केवल औरंगजेब के पुत्र मुहम्मद की उपस्थिति में किसी से बात कर सकता था। वह जो कुछ करता था अथवा कहता था उसकी सूचना तुरन्त औरंगजेब के पास पहुँचाई जाती थी।

शाहजहाँ किसी के साथ पत्र व्यवहार नहीं कर सकता था तथा सूनी आँखों से ताजमहल की ओर ताकता रहता था। उसके प्रिय आभूषण तथा रत्न भी उससे छीन लिये गये। इस बुरे समय में शहजादी जहाँआरा, शाहजहाँ के साथ रही। 22 जनवरी 1666 को प्रातःकाल में ताजमहल पर दृष्टि लगाये, शाहजहाँ ने अंतिम श्वांस ली। उसे मुमताज महल बेगम की बगल में दफना दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

उत्तराधिकार युद्ध

औरंगजेब (आलमगीर)

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औरंगजेब तथा उसकी बेगम

औरंगजेब का पूरा नाम मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब था। उसे आलमगीर भी कहा जाता था। उसने ईस्वी 1658 से 1707 तक भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया। वह एक क्रूर एवं धर्मान्ध कट्टर सुन्नी मुसलमान शासक था। उसकी कट्टर नीतियों ने मुगल सल्तनत को पतन के मार्ग पर धकेल दिया।

औरंगजेब का प्रारम्भिक जीवन

मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब का जन्म 3 नवम्बर 1618 को उज्जैन के निकट दोहद में हुआ था। उस समय उसका बाबा जहाँगीर दक्षिण से आगरा लौट रहा था। कुछ इतिहासकारों ने उसका जन्म 1619 ई. में अहमदाबाद तथा मालवा की सीमा पर स्थित दोसीमा नामक स्थान पर होना बताया है, जब शाहजहाँ दक्षिण का सूबेदार था।

दोहद और दोसीमा का एक ही अर्थ होता है। आज यह स्थान दोहद के नाम से ही प्रसिद्ध है। सर जदुनाथ सरकार ने औरंगजेब का जन्म 24 अक्टूबर 1618 को होना माना है। शाहजहाँ तथा मुमताज महल की चौदह संतानें थीं। इनमें औरंगजेब छठा था।

जब शाहजहाँ ने जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह किया तब औरंगजेब आठ साल का था। उस समय औरंगजेब तथा उसके भाई दारा को बड़े कष्ट झेलने पड़े। इन दोनों भाइयों को नूरजहाँ के पास बंधक के रूप में रखा गया। जब शाहजहाँ ने जहाँगीर के समक्ष समर्पण किया, तब दोनों भाईयों को मुक्त किया गया।

इस कारण जब औरंगजेब 10 साल का हुआ, तब उसकी शिक्षा आरम्भ हो सकी। मीर मुहम्मद हाशिम को उसका शिक्षक बनाया गया। औरंगजेब कुशाग्र बुद्धि तथा विलक्षण प्रतिभा का धनी था। उसने फारसी तथा अरबी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया और हिन्दी का भी थोड़ा-बहुत ज्ञान ले लिया।

औरंगजेब ने कुरान तथा हदीस का पूरा ज्ञान प्राप्त कर लिया। वह चित्रकला तथा संगीत आदि ललित कलाओं से दूर रहता था। औरंगजेब जबर्दस्त लड़ाका एवं दुःसाहसी शहजादा था। उसके स्वभाव में उत्साह, धैर्य तथा दृढ़ता कूट-कूट कर भरी हुई थी।

जब औरंगजेब की अवस्था केवल पन्द्रह वर्ष थी तब एक उन्मत्त हाथी उस पर टूट पड़ा। औरंगजेब ने बड़ी निर्भीकता से अपने भाले से उस हाथी पर प्रहार करके उसे अपने नियंत्रण में कर लिया। उसकी इस बहादुरी से प्रसन्न होकर शाहजहाँ ने उसे ‘बहादुर’ की उपाधि दी।

औरंगजेब को सूबेदार के पद पर नियुक्ति

1634 ई. में शाहजहाँ ने औरंगजेब को दस हजार जात और चार हजार सवार का मनसबदार नियुक्त किया गया। 1635 ई. में उसे बुन्देला विद्रोह के दमन का कार्य सौंपा। इस प्रकार व्यावहारिक जीवन में औरंगजेब का प्रवेश हुआ। वह बुन्देला विद्रोह का दमन करने में सफल रहा।

औरंगजेब ने सैन्य-संचालन तथा संगठन क्षमता का अच्छा परिचय दिया। उसकी सैनिक प्रतिभा से प्रसन्न होकर शाहजहाँ ने उसे 14 जुलाई 1636 को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया। 18 मई 1637 को फारस के राजपरिवार के शाहनवाज की पुत्री दिलरास बानो बेगम से औरंगजेब का विवाह हुआ।

औरंगजेब की प्रतिष्ठा तथा प्रभाव को बढ़ता हुआ देखकर उसके बड़े भाई दारा के मन में द्वेष की भावना जागृत होने लगी और वह उसे अपना प्रतिद्वन्द्वी मानने लगा। 1644 ई. में दारा के कहने पर औरंगजेब को दक्षिण से वापस बुला लिया गया और 1645 ई. में गुजरात का सूबेदार बनाकर भेज दिया गया।

यहाँ पर भी औरंगजेब ने अपनी सैनिक तथा प्रशासकीय प्रतिभा का अच्छा परिचय दिया। दो वर्ष बाद 1647 ई. में उसे बल्ख तथा बदख्शाँ का गवर्नर तथा प्रधान सेनापति बनाकर भेजा गया किंतु ट्रांस ऑक्सियाना क्षेत्र में औरंगजेब को सफलता नहीं मिल सकी।

1648 ई. से 1652 ई. तक औरंगजेब मुल्तान तथा सिन्ध का सूबेदार रहा। उसने बड़ी योग्यता के साथ शासन किया। वह इस क्षेत्र में शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित करने तथा प्रान्त की व्यापारिक उन्नति करने में सफल रहा। इस बीच 1649 ई. एवं 1652 ई. में उसे दो बार कन्दहार पर आक्रमण करने भेजा गया। दोनों ही बार औरंगजेब कन्दहार को जीतने में सफल नहीं हुआ परन्तु इन युद्धों में उसे बहुत बड़ा सैनिक अनुभव प्राप्त हो गया।

कन्दहार में मिली असफलता के कारण उसे 1652 ई. में दूसरी बार दक्षिण का गवर्नर नियुक्त किया गया। इस पद पर वह 1658 ई. तक रहा। इन 6 वर्षों में उसने कई प्रशंसनीय कार्य किये। उसने अपनी मन्त्री मुर्शिदकुली खाँ की सहायता से भूमि का प्रबन्घ किया जिससे इस प्रान्त में समृद्धि आई।

औरंगजेब ने अपनी सेना में कई सुधार किये और उसे रण-कौशल बना दिया। इस सेना की सहायता से उसने बीजापुर तथा गोलकुण्डा के राज्यों पर विजय प्राप्त की। औरंगजेब इन राज्यों को मुगल सल्तनत में सम्मिलित करके उनका अस्तित्त्व समाप्त करना चाहता था किन्तु शाहजहाँ के हस्तक्षेप के कारण वह ऐसा नहीं कर सका।

औरंगजेब को तख्त की प्राप्ति

1657 ई. में शाहजहाँ बीमार पड़ा। 1658 ई. में उसकी मृत्यु की अफवाह फैल गई। औरंगजेब अपने भाइयों में सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी था। उसने स्थिति का आकलन करके आगरा के लिए प्रस्थान कर दिया। उसने अपने समस्त प्रतिद्वन्द्वियों को परास्त करके अपने बूढ़े पिता शाहजहाँ को बन्दी बना लिया और उसके तख्त पर बैठ गया।

16 जुलाई 1658 को औरंगजेब ने स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। उसने अबुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब बहादुर आलमगीर बादशाह गाजी की उपाधि धारण की। औरंगजेब का औपचारिक राज्याभिषेक 5 जून 1659 को दिल्ली में बड़े समारोह के साथ हुआ। उसने वृद्ध शाहजहाँ को कारागार में डाल दिया।

लोगों का विश्वास जीतने के लिये औरंगजेब ने अपने राज्याभिषेक के अवसर पर लोगों को खूब धन बाँटा और पुरस्कार दिये। सिंहासन पर बैठने के बाद उसने ‘अब्दुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन’ और ‘औरंगजेब बहादुर आलमगीर बादशाह गाजी’ की उपाधि धारण की। उसने लगभग पचास वर्ष तक शासन किया।

आलमगीर के शासन के प्रथम पच्चीस वर्ष, उत्तरी भारत में सीमा की सुरक्षा करने तथा विद्रोहों का दमन करने में व्यतीत हुए जबकि शासन के अन्तिम पच्चीस वर्ष दक्षिण के राज्यों को विध्वंस करने में व्यतीत हुए। उसने अपने शासन काल में जिस नीति का अनुसरण किया वह मुगल सल्तनत के लिए बड़ी घातक सिद्ध हुई और अन्त में उसके विनाश का कारण बन गई।

औरंगजेब द्वारा किये गये सुधार कार्य

बादशाह बनते ही औरंगजेब ने अपनी नीति को कार्यान्वित करना आरम्भ कर दिया। उसके द्वारा किये गये मुख्य सुधार इस प्रकार से थे-

(1.) मुहतासिबों की नियुक्ति

प्रत्येक बड़े नगर में मुहतासिब अर्थात् आचरण के निरीक्षक निुयक्त किये गए। इन अधिकारियों का कर्त्तव्य था कि वे यह देखें कि प्रजा, इस्लाम के सिद्धान्तों के अनुसार जीवन व्यतीत करती है या नहीं! अर्थात् प्रजा मद्यपान तो नहीं करती! कोई जुआ तो नहीं खेलता! लोग चरित्र-भ्रष्ट तो नहीं हो रहे! लोग नियमित रूप से दिन में पाँच बार नमाज पढ़ते हैं और मोहर्रम में रोजा रखते हैं या नहीं!

(2.) कलमा लिखने पर रोक

आलमगीर ने मुद्राओं पर कलमा लिखवाना बन्द कर दिया क्योंकि वह गैर-मुसलमानों के हाथों में जाने से अपवित्र हो जाता था।

(3.) नौरोजे की समाप्ति

आलमगीर ने नौरोज के त्यौहार को बन्द कर दिया, जिसे उसके पूर्वज मनाया करते थे।

(4.) संगीतकारों का दरबार से निष्कासन

आलमगीर की धारणा थी कि संगीत इस्लाम के विरुद्ध है। अतः उसके पूर्वजों के काल के जितने प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे और जिन्हें मुगल सल्तनत का आश्रय प्राप्त था, उन सबको उसने मार भगाया।

(5.) झरोखा दर्शन पर रोक

अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ, प्रतिदिन प्रातःकाल में अपनी प्रजा को झरोखा दर्शन, दिया करते थे। इस प्रथा को आलमगीर ने बन्द करवा दिया क्योंकि यह हिन्दुओं की प्रथा के अनुरूप थी।

(6.) इस्लाम का विरोध करने वालों को दण्ड

आलमगीर ने इस्लाम के विद्धान्तों का विरोध करने वालों तथा सूफी मत को मानने वाले को दण्डित किया। सरमद को, जो सूफी मत का अनुयाई और दारा का पक्षपाती था, मरवा दिया गया।

(7.) सती प्रथा का निषेध

आलमगीर ने 1664 ई. में सती प्रथा पर रोक लगा दी।

(8.) बादशाह को उपहारों पर रोक

बादशाह की वर्षगाँठ तथा अन्य अवसरों पर राज्याधिकारी तथा प्रजा द्वारा उपहार तथा भेंट दिये जाते थे। आलमगीर ने इस प्रथा पर रोक लगा दी। इससे राजकोष को बहुत नुकसान हुआ।

(9.) अनुचित चुंगियों तथा करों की समाप्ति

आलमगीर ने मुगल सल्तनत में प्रचलित बहुत-सी अनुचित चुंगियों तथा करों को हटा दिया। आंतरिक चुंगी को समाप्त कर दिया क्योंकि इससे व्यापार में बाधा पड़ती थी। जो माल नगरीय बाजारों में बिकने आता था उस पर विक्रय-कर लगता था। इसे भी औरंगजेब ने हटा दिया।

(10.) मालगुजारी वसूलने वालों पर निगरानी

आलमगीर ने मालगुजारी वसूल करने वालों पर निगरानी की व्यवस्था की। जो लोग इस कार्य में अत्याचार करते थे, उन्हें कठोर दण्ड दिये गये। अधिकारी घूस या नजराना नहीं ले सकते थे। बादशाह स्वयं भी समस्त कागजों को ध्यान से देखता था।

(11.) मुस्लिम प्रजा के हितों की चिंता

आलमगीर स्वयं को अपनी प्रजा का सेवक कहता था और उसके जीवन को सुखी बनाने के लिये प्रयत्नशील रहता था। प्रजा का तात्पर्य मुस्लिम-प्रजा से था, हिन्दू-प्रजा से नहीं। हिन्दुओं को वह काफिर समझता था और उनके प्रति बड़ा अनुदार था।

औरंगजेब की नीतियाँ तथा उनके परिणाम

आलमगीर कट्टर सुन्नी बादशाह था। वह भारत से काफिरों को समाप्त करके दारूल-इस्लाम अर्थात् मुस्लिम राज्य की स्थापना करना चाहता था। उसकी नीतियों को तीन भागों- (1.) धार्मिक नीति, (2.) राजपूत नीति तथा (3.) साम्राज्यवादी नीति में विभक्त किया जा सकता है।

आलमगीर की इन तीनों नीतियों के मूल में उसकी धार्मिक कट्टरता काम कर रही थी। वह जीवन भर हिन्दू प्रजा को बलपूर्वक मुसलमान बनाकर, जाटों, राजपूतों, सिक्खों तथा अन्यान्य हिन्दू शासकों का नाश कर, मंदिरों तथा तीर्थों को नष्ट कर तथा मुगल साम्राज्य से बाहर के राज्यों को अपनी सल्तनत में मिलाकर, दारूल-इस्लाम की स्थापना में लगा रहा।

आलमगीर की इन नीतियों के बारे में हम अगले अध्यायों में विस्तार से पढ़ेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – औरंगजेब (आलमगीर )

औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

औरंगजेब की धार्मिक नीति

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औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की धार्मिक नीति इस्लामिक मजहबी कट्टरता पर आधारित थी। वह सुन्नी मुसलमान था और भारत की सम्पूर्ण प्रजा को सुन्नी मुसलमान बनाना चाहता था।

औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। इस्लाम में उसकी बड़ी अनुरक्ति थी। वह स्वयं को इस्लाम का रक्षक तथा पोषक समझता था। इसलिये राज्य के समस्त साधनों को इस्लाम की सेवा में लगा देना अपना कर्त्तव्य समझता था। इस्लाम के लिए वह अपना राज्य, वैभव, सुख तथा जीवन तक न्यौछावर कर सकता था। अतः उसके जीवन में न तो जहाँगीर की विलासिता के लिए कोई स्थान था और न शाहजहाँ की शान-शौकत के लिए। यही औरंगजेब की धार्मिक नीति थी।

उसने इस्लाम के आदेशों के अनुसार फकीर का जीवन व्यतीत करने का मार्ग चुना। राजकोष को वह प्रजा की सम्पत्ति समझता था और उस धन को अपने ऊपर व्यय करना महापाप समझता था। राज-काज से जब उसे अवकाश मिलता था तब वह कुरान की आयतों की नकल करता था और टोपियाँ सिला करता था जिन्हें उसके दरबारी और अमीर खरीदते थे। इसी धन से वह अपना व्यय चलाता था।

उसका जीवन पैगम्बर मुहम्मद के आदेशों के अनुकूल था। उसकी दृष्टि में राज्य का तात्पर्य मुस्लिम राज्य और प्रजा का तात्पर्य मुस्लिम प्रजा से था। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘राज्य की नीति धार्मिक विचारों से रंजित थी और बादशाह ने एक कट्टरपंथी की भाँति शासन करने का प्रयत्न किया। प्रत्येक बात में वह शरीयत का अनुसरण करता था।’

औरंगजेब की धार्मिक नीति

सूफियों से घृणा

औरंगजेब की धार्मिक नीति में सूफियो के लिए कोई स्थान नहीं था। औरंगजेब सूफी धर्म मानने वालों को घृणा की दृष्टि से देखता था और उनका क्रूरता से दमन करता था। अपने भाई दारा को भी वह दारा की धार्मिक सहिष्णुता के कारण घृणा से देखता था।

शियाओं का दमन

औरंगजेब शिया मुसलमानों से अत्यंत घृणा करता था। उसकी धार्मिक नीति में हिन्दुओं और सूफियों की तरह शियाओं के लिए भी कोई स्थान नहीं था। उसने दक्षिण के शिया राज्यों को उन्मूलित कर दिया जिन्हें वह दारूल-हार्श अर्थात् काफिर राज्य कहता था। जो शिया मुसलमान तबर्रा बोलते थे, औरंगजेब उनकी हत्या करवा देता था।

सुलह-कुल की नीति का त्याग

औरंगजेब ने अकबर द्वारा स्थापित सहिष्णुता तथा सुलह-कुल की नीति को छोड़ दिया और हिन्दू प्रजा पर तरह-तरह के अत्याचार किये जिनके माध्यम से उसने हिन्दू धर्म, हिन्दू सभ्यता, हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दू जाति को समाप्त करने का प्रयास किया।

औरंगजेब के हिन्दू विरोधी कार्य

औरंगजेब ने निम्नलिखित हिन्दू विरोधी कार्य किये-

(1.) हिन्दू पूजा स्थलों तथा देव मूर्तियों का विध्वंस

बादशाह बनने से पहले ही औरंगजेब ने हिन्दू पूजा स्थलों को गिरवाना तथा देव मूर्तियों को भंग करना आरम्भ कर दिया था। जब वह गुजरात का सूबेदार था तब अहमदाबाद में चिन्तामणि का मन्दिर बनकर तैयार ही हुआ था। औरंगजेब ने उसे ध्वस्त करवाकर उसके स्थान पर एक मस्जिद बनवा दी।

तख्त पर बैठते ही उसने बिहार के अधिकारियों को निर्देश दिये कि कटक तथा मेदिनीपुर के बीच में जितने हिन्दू मन्दिर हैं उन सबको गिरवा दिया जाये। औरंगजेब के आदेश से सोमनाथ का दूसरा मन्दिर भी ध्वस्त करवा दिया गया। बनारस में विश्वनाथ के मन्दिर को गिरवाकर वहाँ विशाल मस्जिद का निर्माण करवाया गया, जो आज भी विद्यमान है। मथुरा में केशवराय मन्दिर की भी यही दशा की गई। मथुरा का नाम बदलकर इस्लामाबाद रख दिया।

1680 ई. में औरंगजेब की आज्ञा से आम्बेर के समस्त हिन्दू मन्दिरों को गिरवा दिया गया। आम्बेर के राजपूतों ने अकबर के शासन काल से ही मुगलों की बड़ी सेवा की थी। इस कारण आम्बेर के कच्छवाहों को औरंगजेब के इस कुकृत्य से बहुत ठेस लगी। यह औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता की पराकाष्ठा थी।

औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि हिन्दू अपने पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार नहीं करें तथा नये मंदिर नहीं बनवायें। उसने हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाकर दिल्ली तथा आगरा में मस्जिदों की सीढ़ियों तथा मार्गों में डलवा दिया जिससे वे मुसलमानों के पैरों से कुचली तथा ठुकराई जायें और उनका घोर अपमान हो। इस प्रकार औरंगजेब ने हर प्र्रकार से हिन्दुओं की भावनाओं को कुचलने का काम किया।

(2.) हिन्दू पाठशालाओं का विध्वंस

औरंगजेब ने हिन्दुओं के धर्म के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी उन्मूलित करने का प्रयत्न किया। उसके आदेश से थट्टा, मुल्तान तथा बनारस में स्थित समस्त हिन्दू शिक्षण संस्थाओं को नष्ट कर दिया गया। मुसलमान विद्यार्थियों को हिन्दू पाठशालाओं में पढ़ने की अनुमति नहीं थी। हिन्दू पाठशालाओं में न तो हिन्दू धर्म की कोई शिक्षा दी जा सकती थी और न इस्लाम विरोधी बात कही जा सकती थी।

(3.) हिन्दुओं पर जजिया कर

अकबर ने हिन्दुओं पर से जजिया समाप्त कर दिया था। औरंगजेब ने फिर से हिन्दुओं पर जजिया कर लगा दिया। इस्लाम का नियम था कि जो लोग इस्लाम को स्वीकार न करें उनके विरुद्ध जेहाद या धर्मयुद्ध किया जाये परन्तु यदि वे जजिया देने को तैयार हों तो उनकी जान बख्श दी जाये। यहूदियों तथा ईसाइयों के साथ भी यही व्यवहार किया जाता था। हिन्दुओं को जजिया से बहुत घृणा थी। इस कर को फिर से लगाकर औरंगजेब ने हिन्दुओं, विशेषकर राजपूतों की भावना को बड़ा आघात पहुँचाया।

(4) हिन्दुओं पर अधिक चुंगी का आरोपण

औरंगजेब के शासन में हिन्दू व्यापारियों को अपने माल पर पाँच प्रतिशत चुंगी देनी पड़ती थी परन्तु मुसलमान व्यापारियों को इसकी आधी चुंगी देनी पड़ती थी। बाद में उसने मुसलमान व्यापारियों पर चुंगी बिल्कुल हटा दी। इस पक्षपात पूर्ण नीति से हिन्दुओं को व्यापार में कम लाभ होता था। इससे एक ओर तो हिन्दुओं की आर्थिक स्थिति गिर गई तथा दूसरी ओर मुसलमानों से चुंगी नहीं लेने से राजकोष को बड़ी क्षति हुई।

(5) सरकारी नौकरियों से हिन्दुओं का निष्कासन

जब से मुसलमानों ने हिन्दुस्तान में अपनी राजसत्ता स्थापित की थी तभी से माल-विभाग के अधिकांश कर्मचारी हिन्दू हुआ करते थे। अकबर ने तो समस्त सरकारी नौकरियों के द्वार हिन्दुओं के लिये खोल दिये थे। 1670 ई. में औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि माल-विभाग से समस्त हिन्दुओं को निकाल दिया जाये। हिन्दू इस कार्य में बड़े कुशल थे। उनके रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए मुसलमान कर्मचारी नहीं मिल सके। इसलिये औरंगजेब ने दूसरा आदेश निकाला कि एक हिन्दू के साथ मुसलमान कर्मचारी भी रखा जाये।

(6.) मंदिरों में शंख एवं घण्टों पर रोक

औरंगजेब जिस मार्ग से गुजरता था तथा जहाँ उसका पड़ाव होता था, वहाँ दूर-दूर तक के मंदिरों में शंखध्वनि करने तथा घण्टे बजाने पर रोक होती थी।

(7.) बलात् धर्म परिवर्तन

हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए औरंगजेब ने अनेक हथकण्डों का प्रयोग किया। उसने विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देकर हिन्दुओं को मुसलमान बनने के लिए प्रोत्साहित किया। जो हिन्दू मुसलमान बन जाते थे वे जजिया से मुक्त कर दिये जाते थे। उन्हें राज्य में उच्च पद दिये जाते थे और उन्हें सम्मान सूचक वस्त्रों से पुरस्कृत किया जाता था।

हिन्दू बंदियों द्वारा इस्लाम स्वीकार कर लेने पर उन्हें कारावास से मुक्त कर दिया जाता था। जो हिन्दू इन प्रलोभनों में नहीं पड़ते थे उन्हें बलपूर्वक मुसलमान बनाने का प्रयत्न किया जाता था। मथुरा के गोकुल जाट के समस्त परिवार को इसी प्रकार मुसलमान बनाया गया था। जो हिन्दू, इस्लाम की निन्दा तथा हिन्दू धर्म की प्रशंसा करते थे उन्हें कठोर दण्ड दिये जाते थे। ऊधव बैरागी को हिन्दू धर्म का प्रचार करने के कारण मरवाया गया।

(8.) हिन्दुओं पर सामाजिक प्रतिबन्ध

1665 ई. में औरंगजेब ने आदेश दिया कि राजपूतों के अतिरिक्त अन्य कोई हिन्दू हाथी, घोड़े अथवा पालकी की सवारी नहीं करेगा और न अस्त्र-शस्त्र धारण करेगा। हिन्दुओं को मेले लगाने तथा त्यौहार मनाने की भी स्वतंत्रता नहीं थी। 1668 ई. में आदेश निकाला गया कि हिन्दू अपने तीर्थ स्थानों के निकट मेले न लगायें। होली तथा दीपावली जैसे प्रमुख हिन्दू त्यौहारों को भी हिन्दू, बाजार के बाहर और कुछ प्रतिबन्धों के साथ मना सकते थे।

औरंगजेब की धार्मिक नीति के परिणाम

औरंगजेब ने देश की बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा पर भयानक अत्याचार किये। इस कारण देश के विभिन्न भागों में औरंगजेब के विरुद्ध कड़ी प्रतिक्रिया हुई और देश के विभिन्न भागों में विद्रोह की चिन्गारी भड़क उठी। औरंगजेब को अपने जीवन का बहुत बड़ा समय इन विद्रोहों से निबटने में लगाना पड़ा। औरंगजेब के काल में हुए मुख्य विद्रोह इस प्रकार से हैं-

(1.) जाटों का विद्रोह

सबसे पहले आगरा के निकट निवास करने वाले जाटों ने गोकुल की अध्यक्षता में विद्रोह का झण्डा खड़ा किया। इस विद्रोह का प्रधान कारण औरंगजेब द्वारा केशवराय मन्दिर को तुड़वाना था। जाट इस अपमान को सहन नहीं कर सके और उन्होंने मुगल सूबेदार अब्दुल नबी की हत्या कर दी।

औरंगजेब अपनी नाक के नीचे जाटों द्वारा की गई इतनी बड़ी कार्यवाही से तिलमिला गया। उसने बड़ी क्रूरता से इस विद्रोह का दमन किया। गोकुल तथा उसके परिवार के लोग कैद कर लिये गये। गोकुल के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये और उसके परिवार को जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया।

गोकुल की हत्या से जाटों का विद्रोह और भी भयानक हो गया। 1686 ई. में राजाराम के नेतृत्व में फिर विद्रोह का झण्डा खड़ा किया गया। इस बार फिर जाट परास्त हो गये और उनका नेता राजाराम मारा गया परन्तु जाटों का आंदोलन शान्त नहीं हुआ। राजाराम का भतीजा चूड़ामणि औरंगजेब के अन्त तक मुगलों से लड़ता रहा और मुगलों को क्षति पहुँचाता रहा।

(2.) सतनामियों का विद्रोह

सतनामी, दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम में स्थित नारनौल में निवास करते थे। सतनाम इनका धार्मिक उद्घोष था। ये लोग कृषि तथा व्यापार में संलग्न थे और सरल जीवन जीते थे। एक दिन एक मुगल सैनिक ने एक निरपराध सतनामी की हत्या कर दी। इससे क्षुब्ध होकर, शान्ति-प्रिय सतनामियों ने विद्रोह कर दिया। उन्होंने भी मुसलमानों की हत्या करना तथा मस्जिदों का विध्वंस करना आरम्भ कर दिया।

सतनामियों ने नारनौल के हाकिम का वध कर दिया और लूटमार करने लगे। औरंगजेब ने सतनामियों के दमन का कार्य स्वयं अपने हाथ में लिया। पर्याप्त अस्त्र-शस्त्रों के न होते हुए भी सतनामी लोग वीरता तथा साहस के साथ लड़े परन्तु विशाल मुगल सेना के समक्ष अधिक दिनों तक नहीं ठहर सके। हजारों सतनामी मार डाले गये और उनसे नारनोल खाली करा लिया गया। इस प्रकार सतनामियों का आंदोलन क्रूरता के साथ कुचला गया।

(3.) सिक्खों का विद्रोह

सिक्खों तथा मुगलों के संघर्ष का आरम्भ, जहाँगीर समय में हुआ। जहाँगीर ने शहजादा खुसरो की सहायता करने के आरोप में 1606 ई. में गुरु अर्जुनदेव की हत्या कर दी। शाहजहाँ का गुरु हरगोविंद से संघर्ष हुआ। जब गुरु तेगबहादुर सिक्खों के गुरु बने तब औरंगजेब ने हिन्दुओं के मन्दिरों की भाँति सिक्खों के गुरुद्वारों को भी तुड़वाना आरम्भ किया।

गुरु तेगबहादुर ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। तेग बहादुर पकड़कर दिल्ली लाये गये तथा उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा गया। गुरु ने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया। इस पर 1675 ई. में उनकी हत्या कर दी गयी। इससे सिक्खों की क्रोधाग्नि और भड़क उठी। गुरु तेग बहादुर के बाद उनके पुत्र गोविन्दसिंह गुरु हुए।

उन्होंने सिक्खों को सैनिक जाति में परिवर्तित कर दिया।  गुरु गोविन्दसिंह ने मुगलों का सामना किया और उन्हें कई बार परास्त किया। अन्त में औरंगजेब ने एक विशाल सेना गुरु के विरुद्ध भेजी। गुरु परास्त हो गये। उनके दो पुत्र बंदी बना लिये गये। उन बालकों से इस्लाम स्वीकार करने के लिये कहा गया परन्तु उन बालकों ने भी अपने दादा की भांति, इस घृणित प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

इस पर उन्हें जीवित ही दीवार में चुनवा दिया गया। औरंगजेब के इन अत्याचारों से सिक्खों का विद्रोह और भड़क गया जिससे विवश होकर औरंगजेब ने गुरु से सन्धि करने का निश्चय किया और उन्हें दिल्ली बुला भेजा। गुरु गोविंदसिंह के दिल्ली पहुँचने से पहले ही औरंगजेब का निधन हो गया।

(4.) राजपूतों का विरोध

औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीति के कारण राजपूत जाति भी उससे नाराज हो गई। राजपूतों के विरोध का वर्णन इस पुस्तक में  औरंगजेब की राजपूत नीति का वर्णन करते समय किया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – औरंगजेब

औरंगजेब

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

औरंगजेब की राजपूत नीति

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औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति मजहबी संकीर्णता पर आधारित थी। वह राजपूत राजाओं से अपने साम्राज्य का विस्तार तो करवाना चाहता था किंतु साथ ही उन्हें मुसलमान भी बनाना चाहता था। औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीति के कारण राजपूत राज्यों के साथ उसका संघर्ष अनिवार्य हो गया।

औरंगजेब की राजपूत नीति

बुंदेलों से युद्ध

सबसे पहले बुन्देलों ने विद्रोह का झण्डा खड़ा किया। इन लोगों ने अपने राजा चम्पतराय के नेतृत्व में औरंगजेब के शासन काल के प्रारम्भ में ही मुगल सल्तनत के साथ युद्ध छेड़ दिया। चम्पतराय को अपने सीमित साधनों के कारण औरंगजेब के विरुद्ध सफलता प्राप्त नहीं हुई। उसने आत्मघात कर लिया और स्वयं को मुगलों के हाथों में पड़ने से बचाया।

चम्पतराय के बाद उसके पुत्र छत्रसाल ने मुगलों के विरुद्ध युद्ध जारी रखा। वह वीर तथा साहसी युवक था। उसने बुन्देलों के विद्रोह को बुंदेलों की स्वतंत्रता के लिये लड़े जा रहे संग्राम का रूप दे दिया। उसने कई बार शाही सेना को युद्धों में परास्त किया जिससे मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा।

छत्रसाल ने पूर्वी मालवा को जीतकर अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया और पन्ना को अपनी राजधानी बनाकर स्वतन्त्रतापूर्वक शासन करने लगा। वह मुगल सल्तनत को आतंकित करने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देता था।

राठौड़ों से युद्ध

मारवाड़ रियासत के राठौड़ राजा जसवंतसिंह, औरंगजेब की सेवा में थे। 1678 ई. में जमरूद के मोर्चे पर मुगलों की तरफ से लड़ते हुए उनकी मृत्यु हुई। जसवन्तसिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अजीतसिंह का जन्म हुआ। औरंगजेब ने मारवाड़ को खालसा घोषित करके मुगल सल्तनत में मिला लिया तथा शिशु राजा अजीतसिंह और उसकी माँ को दिल्ली बुलवाकर उन्हें बंदी बना लिया।

औरंगजेब ने शिशु अजीतसिंह का मुसलमानी तरीके से पालन-पोषण करने की आज्ञा दी। राठौड़ सरदार, अजीतसिंह को दिल्ली से निकालकर राजपूताने में ले आये और उसे सिरोही राज्य के कालंद्री गांव में छिपा दिया। अजीतसिंह के बड़े होने तक राठौड़ सरदारों ने वीर दुर्गादास के नेतृत्व में मुगलों के विरुद्ध युद्ध किया जो तीस वर्ष तक चला।

दुर्गादास को दण्डित करने के लिए औरंगजेब ने शाहजादा मुहम्मद अकबर की अध्यक्षता में एक सेना भेजी और स्वयं भी दिल्ली से अजमेर पहुँचा। दुर्गादास के लिए मुगल सेना का सामना करना अत्यंत दुष्कर कार्य था। मुगल सेना ने मारवाड़ के नगरों को बुरी तरह लूटा, मन्दिरों को तोड़ा और सारे प्रदेश को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

राठौड़ों का धैर्य भंग नहीं हुआ। वे छापामार पद्धति से युद्ध करने लगे और अपनी रियासत प्राप्त करने का प्रयास करते रहे। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु होने पर अजीतसिंह ने मारवाड़ रियासत पर अधिकार कर लिया। मुगल बादशाह बहादुरशाह ने अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा स्वीकार कर लिया। इस प्रकार मुगलों तथा राठौड़ों के बीच तीस वर्ष से चल रहा युद्ध समाप्त हो गया।

सिसोदियों के विरुद्ध संघर्ष

औरंगजेब ने किशनगढ़ की राठौड़ राजकुमारी चारुमति से विवाह करने के लिये डोला भेजा। किशनगढ़ का राजा मानसिंह अल्पवयस्क था तथा किशनगढ़ राज्य इतना छोटा था कि वह मुगल सेना का सामना नहीं कर सकता था। चारुमति भगवान कृष्ण की परमभक्त थी। वह किसी भी कीमत पर मुसलमान बादशाह से विवाह नहीं करना चाहती थी।

इसलिये चारुमति ने उदयुपर के महाराणा राजसिंह को संदेश भिजवाया कि उसने महाराणा को अपना पति स्वीकार कर लिया है, इसलिये वे उसे आकर ले जायें। शरण में आई हुई हिन्दू कन्या की प्रार्थना स्वीकर करके राजसिंह ने सेना लेकर किशनगढ़ को घेर लिया तथा राजकुमारी को अपने साथ मेवाड़ ले जाकर उससे विवाह कर लिया।

इससे औरंगजेब महाराणा राजसिंह से अप्रसन्न हो गया। जब औरंगजेब ने हिन्दुओं पर जजिया लगाया तब भी राजसिंह ने औरंगजेब को फटकार लगाते हुए पत्र लिखा कि हिम्मत है तो मुझसे या अपने गुलाम आम्बेर के राजा मानसिंह से जजिया लेकर दिखाये।

महाराणा राजसिंह ने मारवाड़ के शिशु राजा अजीतसिंह तथा उसके सरदारों को मेवाड़ में संरक्षण प्रदान किया था। इन समस्त कारणों से औरंगजेब ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। औरंगजेब ने स्वयं मुगल सेना का नेतृत्व किया। राणा राजसिंह अपने परिवार और सरदारों को लेकर अरावली की पहाड़ियों में चला गया।

इस कारण मुगल सेना ने बिना अधिक कठिनाई के उदयपुर तथा चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। इसके बाद औरंगजेब ने मेवाड़ अभियान की कमान शाहजादे अकबर को सौंप दी और स्वयं अजमेर लौट गया। महाराणा राजसिंह पहाड़ियों में छिपे रहकर, छापामार युद्ध करके मुगलों को तंग करता रहा।

महाराणा राजसिंह तथा वीर दुर्गादास राठौड़ ने कूटनीति से काम लेते हुए मुगलों को खूब छकाया। इन लोगों ने शाहजादे अकबर को औरंगजेब के स्थान पर बादशाह बनाने का प्रलोभन देकर तहव्वरखाँ के माध्यम से उसे अपनी ओर मिला लिया।

शहजादे को तीन बातें समझाई गईं- (1.) बादशाह औरंगजेब की कट्टर नीतियां ठीक नहीं हैं, जबकि अकबर से लेकर शाहजहाँ तक की नीतियां ठीक थीं। (2.) इसलिये अकबर को चाहिये कि वह अपने पिता औरंगजेब से राज्य छीनकर स्वयं बादशाह बन जाये। (3.) इस कार्य में उसे मेवाड़ तथा मारवाड़ राज्यों के साथ-साथ अन्य हिन्दू राज्यों तथा छत्रपति शिवाजी की भी पूरी सहायता मिलेगी।

अकबर को विश्वास हो गया कि उसके पिता औरंगजेब की नीतियां ठीक नहीं हैं, इसलिये उसे तख्त से हटाकर स्वयं बादशाह बन जाना चाहिये। राजपूतों ने अकबर को अपने साथ लेकर, औरंगजेब पर आक्रमण करने की योजना बनाई जो इस समय अजमेर में था।

दुर्भाग्यवश अचानक महाराणा राजसिंह की मृत्यु हो गई जिससे इस योजना को कार्यान्वित करने में विलम्ब हो गया। राजसिंह के पुत्र राणा जयसिंह ने इस योजना को आगे बढ़ाया। राजपूत सरदार लगातार शाहजादे अकबर को प्रोत्साहन तथा आश्वासन देते रहे। 1681 ई. में अकबर ने स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया तथा वह राजपूतों के साथ सेना लेकर अजमेर के निकट दौराई आ गया।

औरंगजेब को अकबर के विद्रोह की सूचना मिली तो उसने कूटनीति से काम लेते हुए तहव्वरखाँ को संदेश भेजा कि यदि वह विद्रोहियों का साथ छोड़ दे तो उसे क्षमा मिल जायगी अन्यथा उसके पूरे परिवार को समाप्त कर दिया जायगा। तहव्वरखाँ ने तुरन्त शाही कैम्प के लिए प्रस्थान कर दिया परन्तु जब वह औरंगजेब के शिविर के पास पहुँचा तो बादशाह के सरंक्षकों ने उसकी हत्या कर दी।

औरंगजेब ने एक और चाल चली। उसने एक झूठी चिट्ठी लिखवाकर राठौड़ों के शिविर में डलवाई कि शाहजादे अकबर ने राजपूतों को धोखा देकर ठीक फँसाया है। यह पत्र दुर्गादास के हाथ में पड़ गया जिससे उसके मन में सन्देह पैदा हो गया। इस कारण राठौड़ रात्रि में ही युद्ध शिविर छोड़कर पीछे हट गये।

इस तरह औरंगजेब पर आक्रमण करने की योजना समाप्त हो गई और अकबर अकेला रह गया। उसने भी घबराकर युद्ध का मैदान छोड़ दिया और राजपूतों की तरफ चला। इस पर राजपूतों को उसकी ईमानदारी के बारे में विश्वास हो गया। उन्होंने अकबर की रक्षा करना अपना धर्म समझा तथा उसे सुरक्षित रूप से दक्षिण भारत में मरहठों के पास भेज दिया।

मेवाड़ के विरुद्ध औरंगजेब का संघर्ष बहुत दिनों तक चलता रहा। अंत में 1684 ई. में मेवाड़ के साथ सन्धि हो गई। राणा जयसिंह को मेवाड़ का राजा स्वीकार कर लिया गया। उसे पाँच हजार का मनसब दिया गया। मेवाड़ ने अपने तीन परगने मुगलों को दे दिये। मुगल सेनाएँ मेवाड़ से हटा ली गईं।

औरंगजेब की राजपूत नीति के परिणाम

राजपूत युद्धों का मुगल सल्तनत के भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ा। अकबर ने इस बात को अनुभव किया था कि उसके चगताई, मुगल, ईरानी, अफगानी तथा तुर्की उमराव किसी भी तरह विश्वसनीय नहीं थे। वे हर समय बगावत का झण्डा बुलंद करने के लिये तैयार रहते थे ताकि अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर सकें जबकि राजपूत लड़ाके यदि एक बार वचन दे देते थे तो फिर गद्दारी नहीं करते थे। इसलिये उसने राजपूतों की लड़कियों से विवाह स्थापित कर सुलह-कुल की नीति अपनाई तथा उन्हें शासन में कनिष्ठ भागीदार बनाया।

इस कारण राजपूत लड़ाके और जागीरदार, अकबर से लेकर जहाँगीर तथा शाहजहाँ के समय तक मुगलों की अनन्य भक्ति भाव से सेवा करते रहे तथा राजपूत लड़ाकों ने मुगलों का राज्य लगभग पूरे भारत में विस्तारित कर दिया किंतु औरंगजेब ने धर्मान्धता के कारण राजपूतों को नष्ट करने   के बड़े प्रयास किये। इससे राजपूत, मुगलों से विरक्त हो गये। बहुत से राजपूत मुगलों की सेवा छोड़कर अपने राज्यों के विस्तार में लग गये।

लेनपूल के अनुसार- ‘जब तक वह कट्टरपंथी औरंगजेब, अकबर के सिंहासन पर बैठा रहा, एक भी राजपूत उसे बचाने के लिए अपनी उँगली भी हिलाने को तैयार नहीं था। औरंगजेब को अपनी दाहिनी भुजा खोकर दक्षिण के शत्रुओं के साथ युद्ध करना पड़ा।’

मुगल सल्तनत रणप्रिय राजपूत जाति की सेवाओं से वंचित हो गई। राजपूतों की सहायता के बिना मुगल सल्तनत पतनोन्मुख हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

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औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति
औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति न केवल मुगल सल्तनत के लिए, न केवल भारत की जनता के लिए अपितु स्वयं उसके लिए भी विनाशकारी सिद्ध हुई।

औरंगजेब अपनी सल्तनत का विस्तार भारत के बचे हुए भू-भाग तथा उत्तर पूर्व में उन क्षेत्रों तक करना चाहता था जिन पर किसी समय तैमूर लंग का शासन था। उसने अपनी सेनाओं को जीवन भर युद्ध के मैदानों में लड़ते रहने के लिये बाध्य किया।

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1.) उत्तरी-पूर्वी सीमांत नीति, (2.) उत्तर-पश्चिमी सीमांत नीति तथा (3.) दक्षिण भारत नीति।

उत्तरी-पूर्वी सीमांत नीति

आसाम के अहोम राजा ने कूच बिहार के राजा के साथ गठबन्धन करके कामरूप पर आक्रमण कर दिया, जो उन दिनों मुगल सल्तनत के अधीन था। इस पर औरंगजेब ने 1661 ई. में बंगाल के सूबेदार मीर जुमला को उनके विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने के आदेश दिये। मीर जुमला ने पहले कूचबिहार पर आक्रमण करके वहाँ के राजा को परास्त किया तथा उसके बाद आसाम पर आक्रमण किया। उन दिनों आसाम पर अहोम वंश का शासन था।

1662 ई. में मीर जुमला ने आसाम पर विजय प्राप्त कर ली तथा वहाँ की राजधानी पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में मीर जुमला को अपार धन की प्राप्ति हुई किंतु उन्हीं दिनों भयानक वर्षा होने से आवागमन के सारे मार्ग अवरुद्ध हो गये और रसद की कमी हो गई। इस कारण मुगल सेना के बहुत से सिपाही मर गये।

अवसर देखकर अहोम सेनाओं ने फिर से आक्रमण किया तथा मुगलों को काफी क्षति पहुँचाई। वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर मीर जुमला ने फिर से युद्ध आरम्भ किया किंतु इसी समय वह रोग से ग्रस्त हो गया। इस कारण दिसम्बर 1662 में दोनों पक्षों में संधि हो गई। अहोम राजा ने अपने राज्य का पश्चिमी प्रदेश मुगलों को दे दिया।

अहोम राजा ने अपनी एक लड़की, कुछ हाथी और सोना-चांदी भी मुगल-बादशाह के लिये दिये। इस संधि के कुछ माह बाद मीर जुमला की मृत्यु हो गई। उस समय वह बिहार की सीमा पर था। इस पर कूच बिहार के राजा ने अपना खोया हुआ राज्य फिर से छीन लिया। मीर जुमला के बाद शाइस्ताखाँ को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया गया। उसने कूचबिहार के राजा को मुगल सल्तनत की अधीनता स्वीकार करने के लिये बाध्य किया और उसके राज्य का कुछ भाग मुगल सल्तनत में मिला लिया।

अराकान राज्य भी मुगल साम्राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमा पर स्थित था। वहाँ माघ वंश का शासन था। उनकी राजधानी चटगांव थी। लगभग एक सौ वर्ष से पुर्तगालियों ने चटगाँव में अपनी बस्ती बना रखी थी जिन्हें फिरंगी कहते थे। पुर्तगालियों ने माघ राजाओं से गठबन्धन कर रखा था। अनेक पुर्तगालियों ने अराकानी स्त्रियों के साथ विवाह कर लिया था। ये पुर्तगाली, बंगाल के निचले भाग में समुद्र तट तथा नदियों के तट पर लूट-खसोट किया करते थे।

औरंगजेब ने बंगाल के गवर्नर शाइस्ताखाँ को आदेश दिया कि वह इन फिरंगियों तथा अराकानियों को दण्डित करे। अराकानियों पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने शहशुजा तथा उसके परिवार की हत्या कर दी थी। शाइस्ताखाँ ने एक नौ-सेना तैयार की और ब्रह्मपुत्र नदी के मुहाने पर स्थित सन्द्वीप नामक द्वीप पर अधिकार कर लिया। उन्हीं दिनों माघ राजा तथा फिरंगियों में झगड़ा हो गया।

शाइस्ताखाँ ने इस स्थिति से लाभ उठाते हुए फिरंगियों को अपनी ओर मिला लिया। अब चटगाँव पर आक्रमण करना सरल हो गया। पुर्तगालियों के ही एक जहाजी बेड़े ने अराकानियों के जहाजी बेड़े को नष्ट कर दिया। मुगल सेना ने चटगाँव पर अधिकार जमा लिया। चटगांव का नाम इस्लामाबाद रख दिया और उसे बंगाल प्रांत में सम्मिलित कर लिया। इस प्रकार 1666 ई. में अराकानियों की शक्ति समाप्त हो गई।

इस बीच आसाम के अहोम शासक अपने खोये हुए प्रदेश को फिर से प्राप्त करने का प्रयत्न करते रहे। 1667 ई. में उन्होंने गौहाटी पर अधिकार कर लिया। मुगलों ने आसाम पर आक्रमण किया किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। अगले ग्यारह वर्ष तक आसाम में गृहयुद्ध चलता रहा।

इस अवधि में आसाम की गद्दी पर सात शासक बैठे। इससे अहोम वंश कमजोर पड़ गया। अवसर पाकर 1679 ई. में मुगलों ने फिर से आसाम पर अधिकार कर लिया। यह अधिकार दो वर्ष तक ही रह सका। इस प्रकार आसाम अधिक समय तक मुगलों के अधीन नहीं रहा किंतु कूचबिहार के शासकों ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली।

उत्तर-पश्चिमी सीमांत नीति

अफगानिस्तान के पहाड़ी प्रदेशों में कृषि योग्य भूमि का अभाव होने से वहाँ के कबाइली, बड़े लड़ाकू एवं असभ्य होते थे। वे प्रायः मैदानों पर धावा बोल देते थे और लूटमार कर चले जाते थे। जब भारत के व्यापारी अपना माल लेकर पहाड़ी दर्रों से जाने का प्रयास करते थे तब कबाइली, भारतीय व्यापारियों पर धावा करके उनका माल लूट लेते थे।

कबाइली लोग इतने अविश्वसनीय, उद्दण्ड तथा अनुशासनहीन थे कि उन्हें सेना में भर्ती नहीं किया जा सकता था। भारत के शासक प्रायः इनके मुखिया को रिश्वत देकर शांत करते थे। मुगलों ने कई बार अफगान लुटेरों पर रोक लगाने के प्रयास किये किंतु सफलता नहीं मिली।

1667 ई. में कई हजार युसुफजई लुटेरों ने भागू नामक मुखिया के नेतृत्व में एकत्रित होकर सिंधु नदी पार की तथा अटक एवं पेशावर के क्षेत्रों में लूटमार करने लगे। औरंगजेब ने उन्हें खदेड़ने के लिये तीन सेनाएँ भेजीं। इन सेनाओं ने अफगान लुटेरों का दमन करके शांति स्थापित की।

इस घटना के पांच साल बाद 1672 ई. में अफरीदियों ने मुगलों के राज्य पर आक्रमण करके सीमांत प्रदेशों पर कब्जा कर लिया तथा उनके नेता अकमलखाँ ने स्वयं को बादशाह घोषित करके अपने नाम के सिक्के ढलवाये। उसने मुगलों के विरुद्ध व्यापक युद्ध की घोषणा की तथा पठानों से सहयोग मांगा।

उसने खैबर घाटी को बंद कर दिया। काबुल का सूबेदार मुहम्मद अमीन खाँ उन दिनों पेशावर में था। वह मीर जुमला का पुत्र था। उसी ने पांच साल पहले यूसुफजाइयों के विरुद्ध सफल कार्यवाही की थी। वह खैबरे दर्रे के मार्ग से काबुल की ओर बढ़ा। अली मस्जिद नामक स्थान पर उसकी सेना को कबाइलियों ने घेर लिया और दस हजार मुगल सैनिकों को तलवार के घाट उतार दिया।

अकमल खाँ, बीस हजार स्त्री पुरुषों को बंदी बनाकर मध्य एशिया के बाजारों में बेचने के लिये ले गया। मुगल सेना को इससे पहले इतना बड़ा नुक्सान नहीं हुआ था। मुगलों की कमजोरी का लाभ उठाने के लिये खटक कबीले ने भी अफरीदियों के साथ गठबन्धन कर लिया और सम्पूर्ण पश्चिमोत्तर प्रदेश इनकी चपेट में आ गया।

इस पर महाबतखाँ को अफगानिस्तान का सूबेदार नियुक्त किया गया। महाबतखाँ भीतर ही भीतर अकमलखाँ से मिल गया। अतः उसके स्थान पर शुजातखाँ को भेजा गया। वह भी परास्त हो गया तथा 1674 ई. में मार डाला गया। इसके बाद औरंगजेब ने शाइस्ताखाँ और राजा जसवन्तसिंह को सीमांत प्रदेश की स्थिति संभालने के लिये भेजा।

1674 ई. में राजा जसवन्तसिंह कुर्रम दर्रे के निकट परास्त हो गये और मार डाले गये। इस कारण औरंगजेब ने स्वयं पश्चिमोत्तर प्रदेश के लिये प्रस्थान किया। औरंगजेब ने सैनिक शक्ति के साथ-साथ कूटनीति से भी काम लिया। उसने बहुत से कबाइलियों को धन तथा पद देकर उनमें फूट पैदा कर दी। इस प्रकार बड़ी कठिनाई से औरंगजेब पश्चिमोत्तर प्रदेश में शान्ति स्थापित कर सका।

औरंगजेब की दक्षिण भारत नीति

औरंगजेब ने अपने शासन काल के अन्तिम पच्चीस वर्ष दक्षिण की समस्याओं को सुलझाने में व्यतीत किये। वह शाहजहाँ के जीवन काल में दो बार दक्षिण का सूबेदार रह चुका था। इस कारण वह दक्षिण के राज्यों की दुर्बलताओं को भलीभांति जानता था और उन पर विजय प्राप्त करना सरल कार्य समझता था।

शाहजहाँ के समय वह गोलकुण्डा और बीजापुर राज्यों पर विजय प्राप्त कर चुका था परन्तु शाहजहाँ के हस्तक्षेप के कारण उन्हें मुगल सल्तनत में सम्मिलित नहीं कर सका था। दक्षिण के मुसलमान राज्यों के राजा, शिया मत को मानने वाले थे। चूँकि औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था, इसलिये उसे शिया राज्यों से घनघोर घृणा थी।

वह उन्हें दारूल-हर्श अर्थात् ‘काफिरों के राज्य’ कहता था और उनको नष्ट करना अपना परम कर्त्तव्य समझता था। डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार ने लिखा है- ‘शाहजहाँ की ही भाँति औरंगजेब का भी दक्षिण के शिया सुल्तानों के साथ व्यवहार कुछ अंश में साम्राज्यवादी और कुछ अंश में धार्मिक विचारों से प्रभावित था।’

(1.) बीजापुर पर विजय

बीजापुर का शिया राज्य मुगल सल्तनत की सीमा पर स्थित था। 1672 ई. में बीजापुर के सुल्तान अली आदिलशाह की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र सिकन्दर, पाँच वर्ष की आयु में बीजापुर के सिंहासन पर बैठा। औरंगजेब के लिए बीजापुर को मुगल सल्तनत में सम्मिलित कर लेने का यह स्वर्णिम अवसर था। इसलिये मुगल गवर्नर दिलेरखाँ ने बीजापुर का घेरा डाल दिया।

बीजापुर के सुल्तान ने मरहठा सरदार शिवाजी से सहायता की याचना की। शिवाजी ने बीजापुर राज्य का अनुरोध स्वीकार कर लिया। इस कारण दिलेरखाँ को बीजापुर से घेरा उठाना पड़ा। 1685 ई. में शाहजादा आजम तथा खान-ए-जहाँ बहादुरखाँ की अध्यक्षता में एक सेना बीजापुर का घेरा डालने के लिए पुनः भेजी गई।

बीजापुर को मरहठों तथा गोलकुण्डा दोनों से सहायता मिल गई। इस कारण यह घेरा बहुत दिनों तक चलता रहा। घेरा आरम्भ होने के पन्द्रह महीने बाद जुलाई 1686 में औरंगजेब स्वयं दक्षिण में पहुँचा। बीजापुर को चारों ओर से घेरकर उसकी रसद आपूर्ति काट दी गई। इससे बीजापुर के सैनिक भूखों मरने लगे। बीजापुर के सुल्तान सिकन्दर को समर्पण करना पड़ा। औरंगजेब ने उसे एक लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर दौलताबाद के दुर्ग में बंद कर दिया और बीजापुर के राज्य को मुगल सल्तनत में मिला लिया।

(2.) गोलकुण्डा पर विजय

दक्षिण का दूसरा प्रधान राज्य गोलकुण्डा था। इन दिनों गोलकुण्डा में विलासी तथा अकर्मण्य बादशाह अबुल हसन शासन कर रहा था। राज्य की वास्तविक शक्ति उसके ब्राह्मण मन्त्री मदन्ना तथा उसके भाई अदन्ना के हाथों में थी। मदन्ना ने मरहठों के साथ गठबन्धन कर लिया था।

गोलकुण्डा ने मुगलों के विरुद्ध बीजापुर की भी सहायता की थी और बहुत दिनों से मुगल बादशाह को खिराज नहीं भेजा था। यह सब औरंगजेब के लिए असह्य था। उसने शाहजादा मुअज्जम की अध्यक्षता में एक सेना गोलकुण्डा पर आक्रमण करने के लिए भेजी।

मुअज्जम ने 1685 ई. में गोलकुण्डा की राजधानी हैदराबाद पर अधिकार जमा लिया। अबुल हसन ने भागकर गोलकुण्डा के दुर्ग में शरण ली। 1686 ई. में शाहजादा मुअज्जम वापस बुला लिया गया और 1687 ई. के प्रारम्भ में औरंगजेब स्वयं दक्षिण पहुँचा। गोलकुण्डा के दुर्ग की रक्षा का भार अब्दुर्रज्जाक नामक एक वीर सैनिक को सौंपा गया था।

उसने बड़ी वीरता के साथ दुर्ग की रक्षा की किंतु आठ महीने के घेरे के बाद दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया अब्दुर्रज्जाक साथियों सहित मारा गया। उसके शरीर पर सत्तर घाव थे। अबुल हसन को भी दौलताबाद के दुर्ग में भेज दिया गया और उसके राज्य को मुगल सल्तनत में मिला गया।

(3.) मरहठों के विरुद्ध संघर्ष

गोलकुण्डा तथा बीजापुर के राज्य महाराष्ट्र तथा मुगल सल्तनत के मध्य में स्थित थे। इन दोनों राज्यों के समाप्त हो जाने से मरहठों तथा मुगलों की सीमाएं आ मिलीं। महाराष्ट्र औरंगजेब के विरोधियों का शरण-स्थल बना हुआ था। विद्रोही शाहजादा अकबर, वीर दुर्गादास राठौड़ तथा महाराजा अजीतसिंह आदि को महाराष्ट्र में शरण मिली थी।

इसलिये औरंगजेब के लिये इस शरणस्थली का विनाश करना आवश्यक था। मरहठे बड़े ही निर्भीक थे। वे मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण करके लूटमार करते थे। अतः मरहठों के विरुद्ध औरंगजेब का संघर्ष अनिवार्य हो गया। इन दिनों मरहठों का नेतृत्व छत्रपति शिवाजी कर रहे थे। औरंगजेब ने शिवाजी को दबाने के लिए शाइस्ताखाँ को दक्षिण में भेज दिया।

शाइस्ताखाँ ने पूना में अपना पड़ाव डाला। शिवाजी ने एक रात्रि में अचानक उस पर धावा बोलकर उसे घायल कर दिया। शाइस्ताखाँ वहाँ से जान बचा कर भाग गया। यह सूचना मिलने पर औरंगजेब के क्रोध की सीमा नहीं रही। उसने 1663 ई. में महाराजा जसवन्तसिंह को शिवाजी को दबाने के लिए भेजा। इस सेना को भी विशेष सफलता नहीं मिली।

1664 ई. में शिवाजी ने राजा की उपाधि धारण की और सूरत को लूट लिया। जब औरंगजेब को इसकी सूचना मिली तब उसने आम्बेर के महाराजा जयसिंह तथा दिलेरखाँ को शिवाजी के विरुद्ध भेजा। इन सेनापतियों ने शिवाजी के अधिकांश दुर्गों पर अधिकार कर लिया और सारे महाराष्ट्र को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

विवश होकर शिवाजी को जयसिंह के साथ संधि करनी पड़ी। शिवाजी अपने समस्त दुर्ग मुगलों को समर्पित करने तथा मुगल सल्तनत की सेवा स्वीकार करने के लिए तैयार हो गए। फलतः शिवाजी तथा उसके पुत्र शम्भाजी ने राजा जयसिंह के साथ दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। औरंगजेब के दरबार में शिवाजी का आदर नहीं हुआ। उन्हें पांच-हजारी मनसबदारों के बीच खड़ा कर दिया गया।

शिवाजी ने इसे अपना अपमान समझा तथा मुगल अधिकारियों का विरोध किया। औरंगजेब ने उन्हें नजरबन्द करके उनके निवास पर कड़ा पहरा लगा दिया। शिवाजी ने बीमारी का बहाना किया और प्रतिदिन टोकरे भरकर फल तथा मिठाइयाँ भरकर गरीबों को बाँटने लगे। एक दिन शिवाजी अपने पुत्र के साथ इन्हीं फलों के टोकरों में लेटकर कारागार से निकल भागे और नौ महीने की अनुपस्थिति के बाद फिर से अपने पुत्र के साथ महाराष्ट्र पहुँच गये।

उन्होंने मुगलों के विरुद्ध फिर से छापामार युद्ध छेड़ दिया और कोंकण तथा अन्य स्थानों पर अधिकार कर लिया। विवश होकर 1666 ई. में औरंगजेब को उनसे सन्धि करनी पड़ी और उन्हें स्वतन्त्र शासक मान लेना पड़ा। इससे पाँच वर्ष तक दक्षिण में शान्ति बनी रही।

1671 ई. में जब शिवाजी को यह सूचना मिली कि औरंगजेब शिवाजी को कैद करवाने का प्रयत्न कर रहा है तब शांति फिर भंग हो गई। शिवाजी ने दूसरी बार फिर सूरत और खानदेश को लूटा और बहुत से शाही दुर्गों पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार शिवाजी सम्पूर्ण महाराष्ट्र को स्वतन्त्र कराने में सफल हो गए। यह शिवाजी का चूड़ान्त विकास था। दुर्भाग्यवश 1680 ई. में शिवाजी का निधन हो गया।

शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र शम्भाजी ने मुगलों के विरुद्ध युद्ध जारी रखा। औरंगजेब का पुत्र अकबर जिसने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया था, शम्भाजी की शरण में आ गया जहाँ से वह फारस के शाह की शरण में चला गया। दुर्गादास तथा अजीतसिंह भी शम्भाजी के पास चले गये थे।

यह सब औरंगजेब के लिए असह्य था। उसने महाराष्ट्र पर आक्रमण कर दिया। शम्भाजी को साथियों सहित बंदी बनाकर दिल्ली लाया गया। उन्हें भाँड़ों के वस्त्र पहनाकर दिल्ली की सड़कों पर घुमाया गया और बुरी तरह अपमानित करके कारागार में डाल दिया गया। पन्द्रह दिनों की भयानक यातनाओं के बाद शम्भाजी के शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों को खिला दिये गये।

शम्भाजी के बाद शिवाजी के दूसरे पुत्र राजाराम ने मुगलों के विरुद्ध संग्राम जारी रखा। औरंगजेब ने एक सेना महाराष्ट्र के रायगढ़ दुर्ग पर आक्रमण करने भेजी। राजाराम सपरिवार दुर्ग से निकल भागा और उसने कर्नाटक के जिन्जी दुर्ग में शरण ली। शम्भाजी की स्त्री तथा उसका पुत्र शाहूजी मुगलों के हाथ पड़ गये।

वे दिल्ली लाये गये। शाहूजी का पालन-पोषण मुसलमानी ढंग पर किया जाने लगा। मरहठों ने राजाराम के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम जारी रखा। औरंगजेब ने जिन्जी के दुर्ग का घेरा डाल दिया। यह घेरा नौ वर्षों तक चलता रहा। 1795 ई. में दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया परन्तु राजाराम वहाँ से भी निकल भागा और सतारा पहुँचकर मरहठों को संगठित करने लगा। दुर्भाग्यवश 1700 ई. में राजाराम का निधन हो गया।

राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी ताराबाई ने मरहठों का नेतृत्व किया। उसने अपने पुत्र शिवाजी (तृतीय) को सिंहासन पर बिठा कर स्वतंत्रता संग्राम जारी रखा। अब मरहठों की शक्ति बहुत बढ़ गई। वे अहमदाबाद तथा मालवा पर धावा बोलने लगे। वे गुजरात में भी घुस गये और उसे लूटा। उन्होंने बरार को भी लूटा परन्तु औरंगजेब कुछ न कर सका। मरहठे औरंगजेब के जीवनकाल के अन्त तक मुगलों से युद्ध करते रहे।

औरंगजेब के विरुद्ध मरहठों की सफलता के कारण

औरंगजेब विशाल सल्तनत का बादशाह था। उसके पास युद्ध करने के साधन मरहठों की अपेक्षा कहीं अधिक थे परन्तु इस युद्ध में औरंगजेब की अपेक्षा मराठों को अधिक सफलता मिली। मराठों की सफलता के कारण निम्नलिखित थे-

(1.) महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति

महाराष्ट्र की भौगोलिक परिस्थितियाँ मरहठों के लिए सहायक सिद्ध हुईं। महाराष्ट्र भारत के सुदूर दक्षिण में स्थित है। यातायात के साधनों का अभाव होने के कारण उत्तरी भारत से सेनाओं का महाराष्ट्र तक पहुंचना सरल नहीं था। महाराष्ट्र की भूमि बड़ी ऊबड़-खाबड़ थी। मुगल सेना समतल मैदानों में युद्ध करने की अभ्यस्त थी। इस कारण वह इस प्रदेश में सफलतापूर्वक युद्ध नहीं लड़ सकी।

(2.) मरहठों की छापामार रणनीति

मरहठों की सफलता का एक बहुत बड़ा कारण उनकी छापामार रणनीति थी, जो उस प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल थी। मरहठे मैदानों में नहीं लड़ते थे, क्योंकि वे विशाल मुगल सेना के सामने नहीं ठहर सकते थे। अतः वे पहाड़ी क्षेत्र में अचानक मुगलों पर टूट पड़ते थे। वे मुगल सैनिकों को जितना नुक्सान पहुँचा सकते थे, पहुँचा कर भाग खड़े होते थे। संकट आने पर मरहठा सैनिक पहाड़ों में छिप जाते थे। मुगल सैनिक इस युद्ध पद्धति से अपरिचित थे, अतः वे मरहठों का सामना नहीं कर सके।

(3.) मरहठों का राष्ट्रीय संग्राम

औरंगजेब, मरहठों के विरुद्ध साम्राज्यवादी तथा साम्प्रदायिकता की भावना से प्रेरित होकर लड़ रहा था। वह दक्षिण में अपने राज्य का विस्तार करना तथा हिन्दू सत्ता को समाप्त करना चाहता था। अतः उसके पास केवल सैनिक बल था। उसमें नैतिक बल का अभाव था।

इसके विपरीत मरहठे अपना स्वतंत्रता संग्राम लड़ रहे थे। वे अपने देश, धर्म, जाति, सभ्यता, संस्कृति तथा स्वाभिमान की रक्षा के लिए लड़ रहे थे। इस कारण उनके युद्ध ने राष्ट्रीय संग्राम का रूप ले लिया था तथा उनमें अदम्य उत्साह तथा साहस उत्पन्न हो गया था। वे युद्ध में सर्वस्व निछावर करने के लिए उद्यत थे। जबकि औरंगजेब के सैनिकों में ऐसा उत्साह तथा साहस नहीं था।

(4.) मरहठों का कुशल नेतृत्व

मरहठों को कुशल नेताओं की सेवाएँ प्राप्त होती गईं। शिवाजी अत्यंत योग्य सेनानायक तथा संगठनकर्त्ता थे। उनके नेतृत्व में मरहठों ने मुगल सल्तनत के विरुद्ध सफलता पूर्वक युद्ध किया। शिवाजी के बाद उनके पुत्र शम्भाजी में वैसी योग्यता नहीं थी परन्तु शम्भाजी के बाद उसके भाई राजाराम और राजाराम के बाद उसकी पत्नी ताराबाई ने मरहठों को उचित नेतृत्व प्रदान किया।

(5.) औरंगजेब की वृद्धावस्था

औरंगजेब वृद्ध हो चला था और उसमें पहले जैसी शक्ति तथा उत्साह नहीं बचा था। वह अत्यंत शंकालु प्रवृत्ति का व्यक्ति था और किसी पर विश्वास नहीं करता था। अतः वह किसी एक सेनापति को दक्षिण विजय का कार्य नहीं सौंप सका। उसके सेनापति तेजी से बदले जाते रहे। इसके विपरीत मरहठे एक निश्चित योजना बनाकर लड़ते थे जिससे उन्हें सफलता प्राप्त हो जाती थी।

(6.) दक्षिण के शिया राज्यों का विनाश

अनेक इतिहासकारों का मानना है कि दक्षिण के शिया राज्यों को उन्मूलित कर औरंगजेब ने बहुत बड़ी भूल की। इससे दक्षिण में मरहठों की बढ़ती हुई शक्ति को रोकने के लिए कोई दूसरी शक्ति नहीं रह गई। यदि औरंगजेब ने बीजापुर तथा गोलकुण्डा के राज्य नष्ट नहीं किये होते तो उनकी सहायता से वह मरहठों की शक्ति को नष्ट कर सकता था।

(7.) मुगलों का नैतिक पतन

औरंगजेब के सैनिकों का नैतिक पतन हो गया था। अब उनमें पुराना उत्साह तथा कौशल नहीं रह गया था। उन्हें प्रोत्साहित रखने के लिए उनके समक्ष कोई उच्च आदर्श भी नहीं था। इसके विपरीत मरहठा सैनिकों का नैतिक बल उच्च कोटि का था। वे हिन्दू-स्वराज्य के लिए लड़ रहे थे। जिस पर वे सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार थे। मरहठा सैनिकों में कष्ट सहन करने की क्षमता मुगल सैनिकों की अपेक्षा अधिक थी।

(8.) राजपूतों की विमुखता

यद्यपि आम्बेर तथा मारवाड़ के राजा औरंगजेब की ओर से मरहठों से युद्ध कर रहे थे किंतु उनमें अब मुगलों के प्रति पहले जैसी भक्ति नहीं रह गई थी। औरंगजेब ने अपनी कट्टर नीतियों के कारण हिन्दू राजाओं को नाराज कर दिया था।

औरंगजेब की दक्षिण नीति के परिणाम

औरंगजेब की दक्षिण नीति के कई गंभीर परिणाम निकले-

(1.) बीजापुर और गोलकुण्डा राज्यों का अंत

औरंगजेब ने दक्षिण के दो प्रधान राज्यों- बीजापुर तथा गोलकुण्डा का अन्त कर दिया और उन्हें मुगल सल्तनत में सम्मिलित कर लिया।

(2.) मुगल सल्तनत में बिखराव की शुरुआत

दक्षिण के राज्यों को मुगल सल्तनत में मिला लेने से मुगल सल्तनत की सीमा का दक्षिण भारत में विस्तार हो गया तथा सल्तनत इतनी विशाल हो गई कि उसे यातायात तथा संचार के साधनों के अभाव के कारण दिल्ली अथवा आगरा से संचालित करना लगभग असंभव हो गया। इन राज्यों को परास्त करते-करते औरंगजेब बूढ़ा और शंकालु हो गया था। इस कारण भी सल्तनत को एक बनाये रखना कठिन हो गया और सल्तनत में बिखराव की शुरुआत हो गई।

(3.) डाकुओं की संख्या में वृद्धि

बीजापुर तथा गोलकुण्डा राज्य की सेनाओं से भागे हुए अधिकांश सैनिक उदर पूर्ति के लिये डाकू बन गये और निरीह प्रजा को लूटने लगे।

(4.) मरहठों को शक्ति विस्तार का अवसर

दक्षिण भारत से प्रबल मुस्लिम राज्यों की समाप्ति के कारण मराहठों की शक्ति को रोकने वाला कोई नहीं रह गया और उन्हें अपनी शक्ति विस्तारित करने का अवसर मिल गया। इस कारण मुगल सल्तनत तेजी से पतन की ओर बढ़ने लगी। दक्षिण के युद्धों और औरंगजेब के अत्याचारों के कारण ही मरहठों का इतना बड़ा संगठन बन सका और उनके युद्ध ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का रूप धारण कर लिया।

(5.) मुगलों की प्रतिष्ठा को आघात

मरहठों के विरुद्ध सफल न होने के कारण मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा को बड़ा आघात लगा।

(6.) राज्यकोष को आघात

दक्षिण भारत के राज्यों को जीतने के लिये किये गये युद्धों के संचालन में बहुत धन व्यय करना पड़ा, जिससे मुगल राजकोष को बड़ा आघात लगा। इसकी पूर्ति दक्षिण के राज्यों से मिले धन से नहीं हो सकी।

(7.) कृषि एवं व्यापार को आघात

दक्षिण भारत में लगभग पच्चीस साल तक निरन्तर युद्ध चलते रहने से प्रदेश की कृषि तथा व्यापार को बड़ा आघात लगा। दक्षिण की आर्थिक व्यवस्था चौपट हो गई और प्रायः अकाल पड़ने से प्रजा को बड़ा कष्ट भोगना पड़ा।

(8.) सैनिक शक्ति को आघात

दक्षिण के युद्धों से देश की सैनिक शक्ति को बहुत बड़ा आघात लगा। इन युद्धों में असंख्य सैनिक मारे गये। गोलकुण्डा तथा बीजापुर के राज्य अत्यंत वीरता से लड़े। इससे दोनों पक्षों को भारी सैनिक क्षति हुई। युद्धों के बाद बड़े पैमाने पर उभरने वाली महामारियों में भी असंख्य सैनिकों, श्रमिकों तथा प्रजा के प्राण गये।

(9.) सैनिकों में युद्धों के प्रति उदासीनता

पच्चीस वर्ष लम्बे युद्ध के कारण मुगल सैनिक युद्धों से ऊब गये। वे अपने परिवारों से दूर रहते थे और वहीं मर जाते थे। उन्हें समय पर वेतन नहीं मिलता था। इस कारण वे ऊब गये तथा उनमें मुगलों की सेवा के प्रति असन्तोष फैलने लगा।

(10.) उत्तरी भारत में विशृंखलता

औरंगजेब ने अपने शासन काल के अन्तिम पच्चीस वर्ष दक्षिण के युद्धों में व्यतीत किये। बादशाह की उत्तरी भारत से अनुपस्थिति के कारण उत्तरी भारत में अराजकता तथा अनुशासनहीनता फैल गई। राजपूतों को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल गया। उत्तर की आर्थिक स्थिति पर भी दक्षिण के युद्धों का बहुत बड़ा प्रभाव था।

(11.) सांस्कृतिक जीवन पर दुष्प्रभाव

दक्षिण के युद्धों का देश के सांस्कृतिक जीवन पर बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा। देश की युद्धकालीन परिस्थिति के कारण साहित्य तथा कला की उन्नति नहीं हो सकी। कवियों, साहित्यकारों तथा कलाकारों को राज्य का संरक्षण नहीं मिला। इस कारण देश के उत्तर तथा दक्षिण दोनों ही भागों में सांस्कृतिक शून्यता उत्पन्न हो गई।

निष्कर्ष

दक्षिण के पच्चीस वर्षीय युद्धों से मुगल सल्तनत की दृढ़ता, राजकोष, सैनिक शक्ति एवं गौरव पर भीषण आघात हुआ जिससे वह पतनोन्मुख हो गया। मुगल सल्तनत की कब्र दक्षिण के इन युद्धों में ही खुदकर तैयार हुई। स्मिथ ने लिखा है- ‘दक्षिण भारत, मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा तथा उसके शरीर की समाधि सिद्ध हुआ।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

औरंगजेब के अंतिम दिन

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औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के अंतिम दिन कष्ट से भरे हुए थे। वह भारत की समस्त प्रजा को सुन्नी मुसलमान बनाना चाहता था किंतु लाखों हिन्दुओं का रक्त बहाकर भी वह इस लक्ष्य को अर्जित नहीं कर पाया। उसके सामने ही चारों ओर विद्रोहों की ज्वालाएँ फूट पड़ी थीं।

1682 ई. से औरंगजेब (आलमगीर) दक्षिण में लड़ रहा था। बीजापुर, गोलकुण्डा तथा मराठों से लड़ते हुए उसे 24 साल हो गये। इस बीच वह 88 वर्ष का बूढ़ा और अशक्त हो गया। उसके अंतिम दिन कष्ट से भरे हुए थे।

परिवार के सदस्यों की मृत्यु

1702 ई. में उसकी पुत्री जेबुन्निसा की मृत्यु हो गई। 1704 ई. में उसके निष्कासित पुत्र अकबर की फारस में मृत्यु हो गई। 1705 ई. में उसकी पुत्र-वधू जहाँजेब की मृत्यु हो गई। 1706 ई. में उसकी अकेली जीवित बहन गौहनआरा की मृत्यु हो गई। उसी वर्ष उसकी पुत्री मेहरुन्निसा और उसके पति इजिदबक्स की भी मृत्यु हो गई।

उसकी मृत्यु के एक माह बौद औरंगजेब के पौत्र (शहजादा अकबर के पुत्र) बुलन्द बख्तर की मृत्यु हो गई। 1707 ई. के आरंभ में औरंगजेब की मृत्यु से कुछ दिन पहले औरंगजेब के दो नातियों की मृत्यु हो गई।

इस प्रकार उसकी आंखों के सामने उसका लगभग पूरा परिवार मर गया। केवल तीन शहजादे आजम, मुअज्जम और कामबक्श जीवित बचे थे जो औरंगजेब के तख्त पर कब्जा करने के लिये एक दूसरे के रक्त के प्यासे थे।

औरंगजेब की मृत्यु

जनवरी 1706 में औरंगजेब बीमार पड़ गया। उसने उत्तर भारत जाने के लिये अहमदनगर के लिये प्रस्थान किया। मराठे उसके पीछे लग गये और लगातार उसके डेरांे को लूटने लगे। 31 जनवरी 1706 को औरंगजेब अहमदनगर पहुँच गया। मराठों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। चार माह की भयानक लड़ाई के बाद मई 1706 में उन्हें खदेड़ा जा सका।

औरंगजेब जीवित ही उत्तर भारत पहुंचना चाहता था किंतु मराठों के कारण वह दक्षिण से बाहर नहीं निकल सका। मार्च 1707 के आरंभ में वह दौलताबाद पहुंच गया। 3 मार्च 1707 को वहीं उसका निधन हो गया। दौलताबाद से चार मील पश्चिम में शेख जेन-उल-हक के माजर के निकट उसके शरीर को दफना दिया गया।

औरंगजेब के शहजादे

जिस समय औरंगजेब की मृत्यु हुई उस समय उसके तीन पुत्र जीवित थे। शहजादा मुअज्जम (जिसे शाहआलम की उपाधि दी गई थी) जमरूद में, शहजादा आजम अहमदनगर के निकट तथा कामबख्श बीजापुर में था। मराठे खानदेश, गुजरात तथा मालवा को लूट रहे थे। जाट, सिक्ख, सतनामी, बुंदेले, रुहेले तथा राजपूत, मुगलों के शत्रु होकर उन्हें बर्बाद करने पर तुले थे।

ऐसी विकट परिस्थितियों में एकजुट होकर शत्रुओं का सामना करने के स्थान पर आजम, मुअज्जम तथा कामबख्श, मुगलिया सल्तनत पर अधिकार करने के लिये एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे। शहजादों को अपने बाप से कोई लगाव नहीं था। औरंगजेब ने अपने समस्त भाइयों को धोखा देकर मारा था तथा अपने पिता को बंदी बनाकर उसका तख्त हड़प लिया था।

उसने अपने तीनों पुत्रों एवं एक पुत्री को यातना देने के लिये जेल में डाल दिया था जिनमें से एक पुत्र तथा एक पुत्री की जेल में ही मौत हुई। शहजादे मुअज्जम को अपने बाप की जेल में आठ साल बिताने पड़े थे। शहजादा अकबर औरंगजेब से भयभीत होकर भारत छोड़कर फारस जा बसा था।

ऐसे बाप से भला कौन बेटा प्यार कर सकता था! संसार में कोई भी स्त्री और कोई भी पुरुष ऐसा न था जिससे वह प्रेम करता हो। वह 24 घण्टे में कठिनाई से 3 से 4 घण्टे सो पाता था। शेष समय भारत को दार-उल हर्ब (काफिरों का देश) से दार-उल-इस्लाम (इस्लाम का देश) बनाने में लगाता था। लगभग पचास वर्षों के अपने शासन में औरंगजेब ने देश को शमशान भूमि में नहीं तो बंदीगृह में अवश्य बदल दिया। ऐसे आदमी के मरने पर किसी को दुःख नहीं हुआ।

मुगल सल्तनत की स्थिति

औरंगजेब की मृत्यु के समय मुगल सल्तनत में 21 सूबे थे। इनमें से 14 उत्तर भारत में, 6 दक्षिण भारत में तथा एक सूबा भारत के बाहर अफगानिस्तान में था। इन सूबों के नाम इस प्रकार थे- (1.) आगरा, (2.) अजमेर, (3.) इलाहाबाद, (4.) अवध, (5.) बंगाल, (6.) बिहार, (7.) दिल्ली, (8.) गुजरात, (9.) काश्मीर, (10.) लाहौर, (11.) मालवा, (12.) मुल्तान, (13.) उड़ीसा, (14.) थट्टा (सिन्ध), (15.) काबुल, (16.) औरंगाबाद, (17.) बरार, (18.) बीदर (तेलंग), (19.) बीजापुर, (20.) हैदराबाद और (21.) खानदेश।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

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मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला

औरंगजेब के उत्तराधिकारी न तो औरंगजेब द्वारा छोड़ी गई विशाल मुगलिया सल्तनत को संभाल सके और न औरंगजेब द्वारा उत्पन्न की गई अव्यवस्था को संभाल सके।

1707 ई. में दक्खिन के मोर्चे पर जब औरंगजेब की मृत्यु हुई, तब तक मुगल सल्तनत राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक दृष्टि से काफी कमजोर हो गई थी किंतु उसकी मृत्यु के समय भी मुगल सल्तनत भारत की सबसे शक्तिशाली और विशाल सल्तनत थी। अपने अंतिम दिनों में औरंगजेब इस बात को लेकर चिंतित था कि उसके शहजादों में उत्तराधिकार के लिए खूनी संघर्ष होगा।

इसलिये उसने शहजादा मुअज्जम को राज्यधर्म की शिक्षा दी तथा एक वसीयतनामा तैयार करवाया जिसमें उसने अपनी सल्तनत को अपने तीनों जीवित पुत्रों में विभाजित कर दिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुअज्जम ने तेजी से आगे बढ़कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया और बहादुरशाह के नाम से तख्त पर बैठ गया।

उसके पुत्र अजीम-उस-शान ने अपने पिता की आज्ञा से आगरा पर अधिकार कर लिया। जून 1707 में बहादुरशाह भी आगरा पहंुच गया। इस प्रकार राजधानी, खजाना तथा उत्तर भारत के प्रमुख शहर बहादुरशाह के अधिकार में आ गये। उधर दक्षिण भारत में आजम ने स्वयं को मुगल बादशाह घोषित कर दिया तथा आगरा की ओर बढ़ना आरंभ किया।

औरंगजेब के उत्तराधिकारी बहादुरशाह ने आजम के समक्ष सल्तनत विभाजन का प्रस्ताव रखा किंतु आजम ने सल्तनत का विभाजन स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। आगरा के निकट जाजऊ के मैदान में दोनो भाइयों के मध्य युद्ध हुआ जिसमें आजम परास्त हुआ और मारा गया।

बहादुरशाह प्रथम (1707-12 ई.)

औरंगजेब का सबसे बड़ा पुत्र मुअज्जम, बहादुरशाह की उपाधि धारण करके मुगलों के तख्त पर बैठा। उसे बहादुरशाह (प्रथम) तथा शाहआलम (प्रथम) के नाम से जाना जाता है। आजम मारा जा चुका था किंतु कामबख्श अभी जीवित था। उसने स्वयं को बीजापुर में बादशाह घोषित कर दिया।

1708 ई. में बहादुरशाह ने कामबख्श के विरुद्ध दक्षिण की तरफ कूच किया। जनवरी 1709 में हैदराबाद के निकट दोनों भाइयों में युद्ध लड़ा गया जिसमें कामबख्श परास्त हुआ और घायल अवस्था में बन्दी बनाया गया। तीन-चार दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। अब बहादुरशाह सम्पूर्ण मुगल सल्तनत का एकमात्र स्वामी बन गया।

वह 63 वर्ष की आयु में बादशाह बना था। वह जानता था कि मुगल अमीर एवं सैनिक पच्चीस साल के दीर्घकालीन युद्धों से थक गये हैं, उन्हें और अधिक समय तक युद्ध के मैदानों में रखना संभव नहीं था। सल्तनत आर्थिक एवं प्रशासनिक संकटों से ग्रस्त थी। ऐसी स्थिति में युद्धों को और अधिक समय तक नहीं चलाया जा सकता था। बहादुरशाह में अपने पिता औरंगजेब की तरह  धार्मिक कट्टरता भी नहीं थी।

इन कारणों से उसने औरंगजेब से उलट, शासन में उदार नीति का अवलम्बन किया। मुस्लिम इतिहासकार कफीखां ने लिखा है- ‘बहादुरशाह उदार, दयालु एवं क्षमाशील था।’ अंग्रेजी इतिहासकार इरविन ने लिखा है- ‘वह विनम्र, शांत-स्वभाव, आदरणीय एवं क्षमाशील व्यक्ति था। बहादुरशाह को शाहे बेखबर कहा जाता है। बहादुरशाह के द्वारा उस शासन में निम्नलिखित प्रकार से नीति अपनाई गई-

(1) राजपूतों के प्रति नीति

औरंगजेब के उत्तराधिकारी बहादुरशाह ने राजपूत शासकों पर अंकुश लगाकर उन पर नियंत्रण पाने का प्रयास किया। इनमें आमेर का राजा सवाई जयसिंह तथा जोधपुर का राजा अजीतसिंह प्रमुख थे। 20 जनवरी 1708 को बहादुरशाह आमेर पहुँचा। उसने आमेर का राज्य सवाई जयसिंह से छीनकर उसके भाई विजयसिंह को दे दिया और सैयद अहमद खाँ को आमेर का फौजदार नियुक्त किया।

जोधपुर के राजा अजीतसिंह से भी उसका राज्य छीन लिया गया। इसके बाद बहादुरशाह दक्षिण की तरफ बढ़ा। जयसिंह और अजीतसिंह अपने राज्य एवं राजधानियों को प्राप्त करने की आशा में कुछ दिनों तक बहादुरशाह के साथ-साथ चले परन्तु 30 अप्रैल 1708 को नर्मदा तट से वापस लौट पड़े।

वापसी में दोनों ने मेवाड़ के महाराणा से भेंट कर उनसे सैनिक सहायता की याचना की। महाराणा ने उन्हें पर्याप्त सैनिक सहायता का वचन दिया और मैत्री दृढ़ करने के लिये अपनी पुत्री का विवाह जयसिंह के साथ कर दिया। जुलाई 1708 में राजपूतों की संयुक्त सेना ने जोधपुर पर आक्रमण कर मेहरानगढ़ दुर्ग मुक्त करा लिया।

मुगल फौजदार को सामान सहित चले जाने दिया गया। इसके बाद राजपूतों ने आमेर पर आक्रमण कर वहाँ के मुगल फौजदार को खदेड़कर आमेर के दुर्ग को भी मुक्त करवा लिया। इसके बाद हिण्डौन, बयाना, साँभर, डीडवाना एवं आमेर के समीपवर्ती प्रदेश भी जीत लिये गये।

साँभर के पास मुगलों और राजपूतों में भीषण संघर्ष हुआ जिसमें मुगल बुरी तरह परास्त हुए। उनका प्रमुख सेनापति सैयद हुसैन बारहा मारा गया। इससे मुगलों की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा। वजीर असद खाँ और मीरबख्शी जुल्फिकार खाँ ने समझौता करने का प्रयास किया। बहादुरशाह ने जयसिंह और अजीतसिंह को मनसब प्रदान करके उनके राज्य तो वापस लौटा दिये परन्तु आमेर और जोधपुर को खालसा में ही रखने का निश्चय किया।

इस पर राजपूतों ने पुनः आक्रमण आरम्भ कर दिये। कामबख्श के विद्रोह का दमन करने के पश्चात् बहादुरशाह नर्मदा पार करके राजस्थान की तरफ बढ़ा। उसका विचार राजपूत राजाओं को सख्त दण्ड देना था परन्तु उन्हीं दिनों पंजाब में बन्दा बहादुर के नेतृत्व में सिक्खों का विद्रोह जोर पकड़ने लगा। मई 1710 में सिक्खों ने सरहिन्द के फौजदार को मारकर नगर पर अधिकार कर लिया था।

बहादुरशाह सिक्खों के विद्रोह को राजपूतों के विरोध से भी अधिक खतरनाक समझता था। अतः उसने राजपूतों से समझौता करके, सवाई जयसिंह और राठौड़ अजीतसिंह को उनके राज्य वापस लौटा दिये। इस प्रकार वह राजपूतों के विरुद्ध कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं कर सका तथा उसकी राजपूत नीति असफल रही।

(2) सिक्खों के प्रति नीति

गुरु गोविन्दसिंह ने उत्तराधिकार के युद्ध में बहादुरशाह के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित की थी और उसके साथ दक्षिण की तरफ गये थे परन्तु मार्ग मेंएक अफगान ने गुरु की हत्या कर दी। गुरु की मृत्यु के डेढ़ वर्ष बाद, पूर्वी पंजाब में बन्दा बैरागी के नेतृत्व में सिक्खों का विद्रोह भड़क उठा।

बन्दा बैरागी के तीन मुख्य ध्येय थे- (1.) गुरु गोविन्द सिंह के पुत्रों के हत्यारे सरहिन्द के फौजदार वजीर खाँ से बदला लेना, (2.) सरहिन्द शहर को ध्वस्त करना तथा (3.) पहाड़ी राजाओं का नाश करना।

24 मई 1710 को लाहौर के निकट से लेकर दिल्ली के दो-तीन पड़ाव तक का सरहिंद का प्रायः समस्त क्षेत्र सिक्खों के अधीन हो गया। बहादुरशाह ने अपने प्रमुख अमीरों को सिक्खों का दमन करने का उत्तरदायित्त्व सौंपा। उसने स्वयं भी पंजाब की तरफ प्रस्थान किया।

दिसम्बर 1710 में मुगलों ने बन्दा के केन्द्र लौहगढ़ पर अधिकार कर लिया परन्तु बन्दा भाग निकला। इससे पहले कि सिक्ख विद्रोह पूर्ण रूप से कुचल दिया जाता, फरवरी 1712 में बहादुरशाह की मृत्यु हो गई। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सिक्खों के प्रति बहादुरशाह की नीति आंशिक रूप से सफल रही।

(3) मराठों के प्रति नीति

शाहूजी का मुगलों की कैद से मुक्त हो जाना बहादुरशाह (प्रथम) के शासन काल की प्रमुख घटनाओं में से एक था। इस समय शम्भाजी के दूसरे पुत्र राजाराम की रानी ताराबाई मराठों का नेतृत्व कर रही थी तथा अपने अल्पवयस्क पुत्र शिवाजी (द्वितीय) के नाम पर शासन कर रही थी। जब शाहूजी भागकर महाराष्ट्र पहुंचा तो  उसने मराठा राज्य पर अपना दावा किया।

इस प्रकार मराठों में नेतृत्व के लिये संघर्ष छिड़ गया। इस संघर्ष में राजाराम की दूसरी विधवा रानी राजसबाई भी तीसरे मोर्चे के रूप में सम्मिलित हो गई जो अपने पुत्र शंभाजी (द्वितीय) को राजा बनाना चाहती थी। जब बहादुरशाह दक्षिण में था तो शाहूजी एवं ताराबाई दोनों ने दक्षिण के 6 सूबों से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार मांगा।

बहादुरशाह ने शाहूजी और ताराबाई दोनों को सरदेशमुखी का अधिकार समान रूप से दे दिया और चौथ के बारे में निर्णय स्थगित रखा। उसकी इस नीति का परिणाम यह निकला कि बहादुरशाह के दक्षिण से लौटते ही शाहूजी और ताराबाई की सेनाओं ने मुगल सूबों में लूटमार मचा दी। इस प्रकार बहादुरशाह की मराठों के प्रति नीति भी लगभग असफल रही।

(4.) विधर्मियों के प्रति नीति

बहादुरशाह जीवन भर अपने पिता औरंगजेब के साथ युद्ध के मोर्चे पर रहा था और उसकी कट्टरता का परिणाम अपनी आंखों से देख चुका था। इसलिये उसमें औरंगजेब की भाँति संकीर्ण रूढ़िवादी विचार नहीं थे। उसे सूफी संतों के साथ चर्चा करने में आनन्द मिलता था। वह कट्टर सुन्नी धर्माचार्यों से दूर रहा। उसने हिन्दुओं के प्रति नरम नीति अपनाई। उसके शासनकाल में मंदिरों के विध्वंस तथा बलात् मुसलमान बनाये जाने का कोई उल्लेख नहीं मिलता परन्तु जजिया की वसूली जारी रही।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्याों के आलोक में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यद्यपि बहादुरशाह को ने विशाल मुगल सल्तनत को अपने शासन काल में काफी सीमा तक एक बनाये रखा और उसके समय में जोधपुर के राठौड़ राजा अजीतसिंह, आम्बेर के कच्छवाहा राजा सवाई जयसिंह तथा सिक्खों के नेता बंदा बैरागी के अतिरिक्त और किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वह बादशाह के विरुद्ध विद्रोह कर सके।

इन विद्रोाहें को आंशिक रूप से दबा दिया गया। उसके शासन काल में किसी भी प्रान्तीय सूबेदार ने स्वतंत्र राज्य की स्थापना करने का साहस नहीं किया। उसने औरंगजेब से उलट नरम नीति का अवलम्बन किया तथा सूफियों एवं हिन्दुओं के प्रति कट्टरता का प्रदर्शन नहीं किया। 27 फरवरी 1712 को वृद्धावस्था के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

जहाँदारशाह (1712-13 ई.)

बहादुरशाह के चार पुत्र थे- जहाँदारशाह, अजीम-उस-शान, जहानशाह एवं रफी-उस-शान। बहादुरशाह के मरते ही इन चारों में तख्त के लिये संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में जहाँदारशाह, मुगल सेनापति जुल्फिकार खाँ की सहायता से 29 मार्च 1712 को दिल्ली के तख्त पर अधिकार जमाने में सफल रहा।

शेष तीनों शहजादे मार डाले गये। तख्त पर बैठते समय जहाँदारशाह 51 वर्ष का था। वह विलासी प्रवृत्ति का था तथा लालकुंवर नामक वेश्या पर बुरी तरह आसक्त था। उसने लालकुंवर के रिश्तेदारों को शासन में उच्च पद प्रदान किये और राजदरबार को नाचने-गाने वालों का केन्द्र बना दिया।

ऐसी स्थिति में शक्तिशाली एवं स्वार्थी अमीरों को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल गया। फिर भी सौभाग्य से जहाँदारशाह को असद खाँ और जुल्फिकार खाँ जैसे अनुभवी व्यक्तियों की सेवाएँ उपलब्ध हो गईं। इस कारण जहाँदारशाह ने शासन में औरंगजेब द्वारा अपनाई गई नीतियों को त्यागकर कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये-

(1.) राज्य से जजिया कर हटा दिया गया।

(2.) राजपूत राजाओं को संतुष्ट किया गया।

(3.) सवाई जयसिंह को मालवा का सूबेदार बनाया गया।

(4.) अजीतसिंह को गुजरात का सूबेदार बनाया गया।

(5.) मराठों के सम्बन्ध में पुरानी व्यवस्था को ही लागू रखा गया। अर्थात् सतारा और कोल्हापुर, दोनों राज्यों को मान्यता दी गई ताकि मराठे गृहयुद्ध में उलझे रहें।

(6.) सिक्खों के विद्रोह का दमन किया गया और बन्दा बैरागी को मौत की सजा दे दी गई।

(7.) गुरु गोविन्दसिंह के दत्तक पुत्र अजीतसिंह को मान्यता देकर सिक्खों में फूट का बीज बोया गया।

फर्रूखसीयर का विद्रोह

तख्त पर बैठने के दस माह बाद ही जहाँदारशाह को उसके मृत भाई अजीम-उश-शान के लड़के और बंगाल के नायब सूबेदार फर्रूखसियार की चुनौती का सामना करना पड़ा। जिस समय जहाँदारशाह ने अजीम-उस-शान को मार डाला था, उस समय फर्रूखसियर ने आत्महत्या करने का प्रयास किया किंतु उसे बचा लिया गया। फर्रूखसियर को सैयद बन्धुओं- पटना के नायब सूबेदार सैयद अली और उसके बड़े भाई इलाहाबाद के नायब सूबेदार हसन अली (जो आगे चलकर अब्दुला कहलाया) की सहायता प्राप्त हो गई।

उनके समर्थन से फर्रूखसियर ने स्वयं को पटना में मुगलों का बादशाह घोषित कर दिया तथा अपने नाम के सिक्के चलाये। इसके बाद वह सेना लेकर आगरा की तरफ बढ़ा। 10 जनवरी 1713 को आगरा के निकट जहाँदारशाह तथा फर्रूखसियर की सेनाओं में युद्ध हुआ।

यद्यपि जहाँदारशाह की सेना 70-80 हजार घुड़सवार तथा बड़ी संख्या में पैदल सैनिक थे और फर्रूखसियर के पास इससे एक-तिहाई फौज भी नहीं थी, फिर भी जहाँदारशाह की सेना परास्त हो गई। इस पराजय का प्रमुख कारण जुल्फिकारखाँ एवं कोकतलाशखाँ का एक-दूसरे के साथ असहयोग करना तथा चिनकुलीचखाँ (जो आगे चलकर निजाम-उल-मुल्क कहलाया) व अमीनखाँ का युद्ध में तटस्थ रहना था। जहाँदरशाह युद्ध से भागकर लालकुंवर के पास पहुँच गया। फर्रूखसियर के आदेश से उसे प्रेयसी के हाथों से छीनकर 11 फरवरी 1713 को मार डाला गया। 

फर्रूखसियर (1713-19 ई.)

सैयद बन्धुओं की सहायता से फर्रूखसियर बादशाह बना। उसने सैयद अब्दुल्ला को अपना वजीर नियुक्त किया तथा अब्दुल्ला के छोटे भाई सैयद हुसैन अली को मुगल सेना का प्रधान नियुक्त किया। तख्त पर बैठते समय फर्रूखसियर की आयु केवल तीस वर्ष थी किंतु उसमें निर्णय लेने की क्षमता का अभाव था तथा शासन करने का अनुभव भी नहीं था।

इस कारण सल्तनत की सम्पूर्ण शक्ति सैयद बन्धुओं के हाथों में चली गई। इस कारण उसके शासन काल के आरंभ 1713 से लेकर 1721 ई. के काल को भारत इतिहास में सैयद बन्धुओं का युग कहा जाता है।

फर्रूखसियर ने सैयदों का प्रभाव कम करने के लिये बहुत प्रयास किये तथा मीरजुमला, निजाम-उल-मुल्क, जयसिंह, मुहम्मद अमीन खाँ आदि कई लोगों से सहायता माँगी, सैयद अब्दुल्ला की हत्या करवाने का प्रयास किया परन्तु फर्रूखसीयर के समस्त प्रयास विफल रहे।

एलफिंस्टन ने लिखा है- ‘फर्रूखसियर बड़ी योजनाओं को समझ नहीं सकता था और छोटी योजनाओं को अपनी आलसी प्रकृति के कारण दूसरों की सहायता के बिना पूरी नहीं कर सकता था।’

अजीतसिंह के विरुद्ध कार्यवाही

फर्रूखसीयर के काल में अजीतसिंह के विरुद्ध सैनिक अभियान किया गया। अजीतसिंह परास्त हो गया तथा उसे विवश होकर अपनी पुत्री इंद्र कुंवरी का विवाह फर्रूखसियर से कर देना पड़ा।

बंदा बैरागी के विरुद्ध कार्यवाही

बंदा बैरागी इन दिनों फिर से शक्तिशाली होकर मुगलों के विरुद्ध युद्ध कर रहा था। फर्रूखसियर ने उसके विरुद्ध सेना भेजी। बंदा बैरागी ने स्वयं को गुरदासपुर के किले में बंद कर लिया गया किंतु अंत में 1716 ई. उसे आत्म समर्पण करना पड़ा। बंदा बैरागी को उसके साथियों के साथ बड़ी निर्दयता के साथ मार डाला गया।

जाटों के विरुद्ध कार्यवाही

जाट अपने नेता गोकुल की हत्या से नाराज थे। इन दिनों चूड़ामन जाटों का नेतृत्व कर रहा था। उसने दिल्ली एवं आगरा के बीच के प्रदेशों में लूट मचा रखी थी। फर्रूखसियर ने आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह को निर्देश दिया कि वह जाटों के विरुद्ध कार्यवाही करे। जयसिंह चूड़ामन को नहीं दबा सका। चूड़मन के विरुद्ध अभियान जारी रखा गया। इस अभियान पर मुगलों के 2 करोड़ रुपये व्यय हुए। अंत में  1718 ई. में फर्रूखसियर ने चूड़ामन से समझौता कर लिया।

सैयद बंधुओं के विरुद्ध कार्यवाही

सैयद बंधुओं के उत्थान में फर्रूखसियर के पिता अजीम-उस-शान की बड़ी भूमिका रही थी। इसलिये सैयद बंधुओं ने जहाँदारशाह के विरुद्ध विद्रोह करके फर्रूखसियर को तख्त पर बैठाने में सहायता की थी। अब वे शासन के समस्त सूत्र अपने हाथों में लेकर बादशाह को कठपुतली बनाये रखना चाहते थे किंतु बादशाह उनके हाथों से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से शासन करना चाहता था इसलिये उसने सैयद बंधुओं के विरुद्ध षड़यंत्र रचने आरंभ किये।

उसने मीर जुमला तथा चिनकुलीचखाँ को बढ़ावा देना आरंभ किया। मीर जुमला बादशाह के संवाद वाहकों का ही अध्यक्ष था किंतु उसे ही समस्त बड़े निर्णय करने के अधिकार दे दिये गये। इस पर सैयद बंधुओं के कान खड़े हुए। इसके बाद फर्रूखसियर ने हुसैन अलीखाँ को राजपूतों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने के आदेश दिये तथा साथ ही सवाई जयसिंह को गुप्त रूप से लिखा गया कि यदि वह सैयद हुसैन अली को खत्म कर दे तो अजीतसिंह को पुरस्कृत किया जायेगा।

हुसैन अली को इस षड़यंत्र की जानकारी मिल गई और उसने अजीतसिंह को अपनी तरफ मिल लिया तथा यह षड़यंत्र असफल हो गया। इस पर फर्रुखसियर ने सैयद हुसैन अली को दक्षिण का सूबेदार बनाकर दक्षिण जाने के आदेश दिये। साथ ही दक्षिण के कार्यवाहक सूबेदार दाऊदखाँ को गुप्त रूप से लिखा कि वह सैयद को रास्ते में ही खत्म कर दे। इस प्रयास में दाऊदखाँ स्वयं मारा गया। दिल्ली से प्रेषित गोपनीय कागज सैयद हुसैन के हाथ लग गये। उधर दिल्ली में बड़े सैयद अब्दुल्ला को कत्ल करने की योजना बनाई गई परन्तु अन्य षड्यन्त्रों की भाँति वह भी विफल रही।

फर्रूखसियर की हत्या

अब सैयद बंधुओं ने फर्रूखसियर को तख्त से हटाने का निर्णय किया। दक्षिण में नियुक्त सैयद हुसैन अली ने 1719 ई. में मराठों से समझौता कर लिया और 15,000 मराठा सैनिकों तथा स्वयं अपनी सेना के साथ दिल्ली आ पहुँचा। जाट नेता चूड़ामन ने भी सैयद बंधुओं का साथ दिया।

17 फरवरी 1719 को जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह ने सैय्यद बंधुओं की सहायता से दिल्ली के लाल किले पर अधिकार कर लिया। महाराजा ने लाल किले के दीवाने आम में अपना आवास बनाया तथा वहीं पर घण्टों और शंख-ध्वनियों के बीच हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा की तथा तीन दिन तक लाल किले को अपने अधिकार में रखा।

फर्रूखसीयर भागकर जनाने में छिप गया और तीन दिन तक वहाँ से नहीं निकला। रफीउद्दरजात को दिल्ली का बादशाह घोषित कर दिया गया महाराजा अजीतसिंह के आदेश पर रफीउद्दरजात ने हिन्दुओं पर से जजिया उठा लिया तथा हिन्दू तीर्थों को सब प्रकार की बाधाओं से मुक्त कर दिया।

फर्रूखसियर को तीन बाद हरम से नंगे सिर तथा नंगे पैरों घसीटते हुए, गालियां देते हुए एवं पीटते हुए निकाला गया तथा अन्धा करके कैद में डाल दिया गया। कुछ दिनों बाद उसे गला घोंटकर मार डाला गया।

रफी-उद्-दरजात तथा रफीउद्दौला

सैयद बन्धुओं ने फर्रूखसियार को तख्त से उतार कर रफी-उद्-दरजात को बादशाह बनाया परन्तु वह इतना अधिक बीमार रहता था कि तीन महीने बाद उसे हटाकर उसके बड़े भाई रफीउद्दौला को तख्त पर बैठाया गया। साढ़े तीन माह बाद उसकी भी मृत्यु हो गई। कामवरखाँ ने आरोप लगाया है कि इन दोनों बादशाहों को सैयद बंधुओं ने विष देकर मरवाया था।

मुहम्मदशाह (रंगीला) (1719-48 ई.)

रफीउद्दौला की मृत्यु के बाद सैयदों ने बहादुरशाह के बड़े लड़के जहानशाह के लड़के मुहम्मदशाह को सिंहासन पर बैठाया। उस समय उसकी आयु 18 वर्ष थी। इतिहास में वह मुहम्मदशाह रंगीला के नाम से प्रसिद्ध हैं। उसका शासनकाल में अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटित हुईं।

सैयद बंधुओं ने बादशाह के चारों ओर अपने आदमी नियुक्त किये। बादशाह को केवल शुक्रवार की नमाज पढ़ने के लिये बाहर निकलने की अनुमति थी। उस समय भी वह सैयद बंधुओं के आदमियों से घिरा रहता। बादशाह को घुड़सवारी एवं आखेट की अनुमति भी बड़ी कठिनाई से मिलती थी।

बादशाह ने सैयद बंधुओं के चंगुल से नियंत्रण पाने के लिये चिनकुलीचखाँ का सहयोग मांगा। सैयद बन्धुओं के विरोधियों में चिनकुलीचखाँ (निजाम-उल-मुल्क) सर्वाधिक योग्य एवं शक्तिशाली अमीर था।

सैयद बन्धुओं का अंत

जब सैयदों को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने चिनक्लिचखां से मालवा की सूबेदारी वापस लेकर दिल्ली आने का आदेश भिजवाया। इस पर चिनकुलीचखाँ चौकन्ना हो गया और दिल्ली आने की बजाय दक्षिण की तरफ चल पड़ा। उसने असीरगढ़ और बुरहानपुर पर अधिकार कर लिया। सैयद बन्धुओं ने उसका दमन करने के लिये जो सेना भेजी, उसे निजाम ने खण्डवा और बालापुर के युद्धों में परास्त करके खदेड़ दिया।

अब छोटे सैयद हुसैन अली ने बादशाह को साथ लेकर दक्षिण की तरफ कूच किया। बादशाह चिनकुलीचखाँ के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करना चाहता था किंतु उसे सैयद हुसैन अली के साथ जाना पड़ा। बादशाह अपनी इस स्थिति से मुक्ति चाहता था इसलिये उसने शाही शिविर के साथ चलने वाले अमीरों के साथ मिलकर मार्ग में ही हुसैन अली को समाप्त करने का षड्यन्त्र रचा।

यह षड्यन्त्र सफल रहा और 8 अक्टूबर 1720 को हुसैन अली की हत्या कर दी गई। इसके बाद बादशाह राजधानी दिल्ली के लिये रवाना हो गया। जब दिल्ली में सैयद अब्दुल्ला को इसकी सूचना मिली तो उसने शाही परिवार के एक शाहजादे इब्राहीम को दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया।

अब्दुल्ला ने मुहम्मदशाह का मार्ग रोकने के लिये एक सेना भी दिल्ली से आगरा की ओर रवाना की। आगरा के निकट बिल्लोचपुर नामक स्थान पर हुए युद्ध में मुहम्मदशाह की सेना ने में अब्दुल्ला को परास्त कर दिया। अब्दुल्ला और इब्राहीम दोनों को कैदखाने में डाल दिया गया। इस प्रकार मुहम्मदशाह रंगीला के तख्त पर बैठने के लगभग एक वर्ष की अवधि में सैयद बंधुओं का अंत हो गया।

बादशाह की अय्याशी

सैयदों से पीछा छूट जाने पर भी मुहम्मदशाह की स्थिति अच्छी नहीं हो सकी। इस समय वह 20 वर्ष का था, उसके कई बच्चे थे तथा वह बीमार रहता था। वह कोकी नामक एक मुसलमान औरत के चक्कर में फंसा हुआ था और अपना अधिक समय शाही महल में नपुंसकों की संगति में व्यतीत करता था।

वह शासन में उन लोगों को बड़े से बड़ा पद देता था जो बादशाह को अधिक से अधिक घूस देते थे। शहजादों और शहजादियों को बड़ी-बड़ी जागीरें बांट दी गई थीं जिससे शासन में दुर्बलता और अव्यवस्था आ गई। मुहम्मदशाह ने चिनकुलीचखाँ को अपना वजीर बनाया और स्वयं औरतों से घिरा रहता था।

जब चिनकुलीचखाँ शासन में सुधार करने का प्रयत्न करता था तो मुहम्मदशाह उसका मखौल उड़ाते हुए कहता था कि देखो दक्षिण का गधा किस प्रकार नाचता है! 1722 ई. में चिनकुलीचखाँ दिल्ली छोड़कर दक्षिण में चला गया। इस कारण शासन की स्थिति दिन पर दिन बिगड़ने लगी।

दिल्ली की दुर्दशा

मुहम्मदशाह की निर्बलता देखकर मारवाड़ नरेश अजीतसिंह ने शाही फरमानों की अवहेलना आरम्भ कर दी तथा दिल्ली के निकट तक धावे मारने आरम्भ कर दिये। उसने नारनोल, अलवर, तिजारा और शाहजहाँपुर को लूट लिया तथा अजमेर पर अधिकार कर लिया।

वह दिल्ली के आठ मील दूर सराय अलीवर्दीखाँ तक धावे मारने लगा जिससे दिल्ली में कोहराम मच गया। मुहम्मदशाह के समय में दिल्ली की यह हालत थी कि एक बार कोटा नरेश दुर्जनशाल बादशाह से मिलने के लिये आया। वहाँ उसने कुछ कसाईयों को देखा जो गायों को काटने के लिये शाही बाबर्चीखाने ले जा रहे थे।

दुर्जनशाल ने अपने आदमियों से उन कसाइयों को मार डालने का आदेश दिया। हो हल्ला सुनकर दिल्ली का कोतवाल भी कसाइयों की रक्षा के लिये आ गया। इस पर उसे भी मार डाला गया तथा दुर्जनशाल उन गायों को लेकर कोटा आ गया।

नादिरशाह का आक्रमण

1737 ई. में फारस के शाह नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया। वह कांधार तथा लाहौर को जीतता हुआ 1739 की गर्मियों में करनाल तक आ गया। मुहम्मदशाह की सेनाओं ने करनाल में उसका मार्ग रोकने का प्रयास किया किंतु वह आसानी से परास्त हो गया। नादिरशाह ने दिल्ली में प्रवेश किया।

उसे दिल्ली के लाल किले में दीवाने खास के पास ठहराया गया। दिल्ली में नादिरशाह के सैनिकों तथा दुकानदारों में सामान खरीदने के ऊपर झगड़ा हो गया जिसमें कुछ ईरानी सैनिक मारे गये। इस पर नादिरशाह ने दिल्ली में कत्लेआम करने का आदेश दिया। तीस हजार आदमी मार डाले गये।

उसके सिपाहियों ने दिल्ली के लाल किले में रहने वाली बेगमों, शहजादियों और बड़े-बड़े अमीरों की स्त्रियों का शील हरण किया। अंत में मुहम्मदशाह ने नादिरशाह को 70 करोड़ रुपये देकर उसके सैनिकों द्वारा किया जा रहा विनाश रुकवाया। नादिरशाह मुगलों के कोष से 70 करोड़ रुपये नगद, 50 करोड़ रुपये का माल, 100 हाथी, 7 हजार घोड़े, दस हजार ऊँट, कोहिनूर हीरा, हजारों स्त्री-पुरुष (गुलाम बनाने के लिये) तथा मुगलों के रत्न जटित तख्त ताऊस को लेकर फारस चला गया।

मुहम्मदशाह ने उसे काश्मीर से लेकर सिन्ध तक का क्षेत्र भी समर्पित कर दिया। नादिरशाह, मुहम्मदशाह की एक शहजादी को भी अपने पुत्र से जबर्दस्ती विवाह करके अपने साथ ले गया। नादिरशाह अपने साथ भारत से हर प्रकार के सैंकड़ों कारीगरों को भी ले गया।

उसके जाने के बाद आठ दिन बाद मुहम्मदशाह ने दरबार आयोजित किया तथा अपने नाम के सिक्के जारी किये। यह सब केवल दिखावा था। करनाल के युद्ध में प्रधान सेनापति, लगभग समस्त प्रमुख अमीर तथा बारह हजार सैनिक मारे जा चुके थे। खजाना खाली था। थानेश्वर, पानीपत और सोनीपत आदि समृद्ध नगर लुट चुके थे।

दिल्ली की जनता, बादशाह के खानसामों एवं वजीरों को जूतों से पीटती थी। ऐसी स्थिति में बादशाह कैसे शासन कर सकता था। अप्रेल 1748 में इन्हीं परिस्थितियों में मुहम्मदशाह की मृत्यु हो गई।

अहमदशाह (1748-1754 ई.)

मुहम्मदशाह के बाद उसका पुत्र अहमदशाह दिल्ली के तख्त पर बैठा। वह नितांत चरित्रहीन व्यक्ति था। इस समय तक दिल्ली सल्तनत नाम मात्र की रह गई थी किंतु बादशाह को इसकी चिंता नहीं थी। वह दो कोस लम्बे-चौड़े एक क्षेत्र में रहता था जिसमें अगणित सुंदर स्त्रियां भरी पड़ी थीं।

उसने अपने ढाई वर्ष के एक पुत्र को पंजाब का सूबेदार तथा एक वर्ष के पुत्र को उसका नायब सूबेदार नियत किया। इसी प्रकार एक साल के एक और पुत्र को काश्मीर का सूबेदार नियत किया। अदमदशाह की माँ ऊधमबाई एक सुंदर वेश्या थी। अपने पुत्र को रंगरेलियों में व्यस्त देखकर ऊधमबाई दिल्ली का शासन चलाने लगी।

एक साधारण अफसर जाबिदखाँ, ऊधमबाई का प्रेमी था। वह भी शासन चलाने में ऊधमबाई की सहायता करने लगा। वह ऊधमबाई के महल में ही रात गुजारा करता था। इन दोनों के अत्याचारों से जनता और शासन के अधिकारी और भी दुखी हो गये। शासन की इतनी दुर्गति हो गई कि किसानों और प्रजा से राजस्व वसूली की तो कोई कल्पना ही नहीं की जा सकती थी।

एक बार महल के नौकरों को एक वर्ष तक वेतन नहीं मिला। इस पर उन्होंने बादशाह के महल के दरवाजे पर एक गधा और एक कुतिया बांध दी। जब अमीर लोग महल में आते थे तो उनसे कहा जाता था कि पहले इन्हें सलाम कीजिये। यह नवाब बहादुर हैं तथा ये हजरत ऊधमबाई हैं।

जब सैनिकों को तीन साल तक वेतन नहीं मिला तो भूखे सिपाही दिल्ली के बाजारों में ऊधम मचाने लगे। इस पर दिल्ली के लोगों ने लाल किले के दरवाजे बारह से बंद कर दिये ताकि किले के भीतर के लोग शहर में न आ सकें। जब अमीरखाँ फौजबख्शी का निधन हो गया तब सिपाहियों ने उसका घर घेर लिया तथा तब तक लाश नहीं उठने दी जब तक कि उनका बकाया वेतन नहीं चुका दिया गया।

इस वेतन को जुटाने के लिये बख्शी के महल के गलीचे, हथियार, रसोई के बर्तन, कपड़े, पुस्तकें, बाजे बेचे गये। कुछ सिपाहियों को इस पर भी वेतन नहीं मिला तो वे बख्शी के घर का बचा-खुचा सामान ही लेकर भाग गये।

आलमशाह के समय में अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर तीन आक्रमण किये। अपने दूसरे और तीसरे आक्रमण में उसने मुल्तान तथा पंजाब को जीत लिया।

बादशाह और वजीर में लड़ाई

अहमदशाह ने सआदतखां बुरहान-उल-मुल्क के भतीजे सफदरजंग को अपना वजीर बनाया परंतु हिंजड़ों के सरदार जावेदखां ने जो बादशाह को अत्यंत प्रिय था और जिसे नवाब बहादुर की उपाधि मिली हुई थी, एक विरोधी गुट बना लिया। उसके गुट को इतिहास में दरबारी पार्टी कहते हैं।

यह पार्टी वस्तुतः स्त्रियों और हिंजड़ों की महफिल थी। इस पार्टी का बादशाह पर अच्छा खासा प्रभाव था। यह पार्टी सफदरजंग तथा अन्य अमीरों के विरुद्ध जाल रचती थी। सफदरजंग किसी तरह दिल्ली की शासन व्यवस्था चलाता था किंतु बादशाह दरबारी पार्टी के बहकावे में आकर वजीर को मरवाने का षड़यंत्र रचने लगा।

इस पर नाराज होकर सफदरजंग ने हिंजड़ों के सरदार नवाब बहादुर को मरवा दिया। इससे अहमदशाह और सफदरजंग के बीच ठन गई और सल्तनत में गृहयुद्ध आरंभ हो गया। बादहशाह ने सफदरजंग को हटाकर अवध भेज दिया तथा उसके स्थान पर इन्तिजमुद्दौला को वजीर बना दिया।

कुछ ही दिनों में इन्तिजमुद्दौला को हटाकर मीर बख्शी इमाद-उल-मुल्क को वजीर बनाया गया। वजीर बनने के कुछ समय बाद इमाद-उल-मुल्क ने बादशाह आलमशाह को तख्त से उतार कर अंधा कर दिया। उसके स्थान पर आलमगीर द्वितीय को तख्त पर बैठाया। अब वजीर ने  खुलकर खेला आरंभ किया तथा शाही परिवार को भूखों मारने लगा।

आलमगीर (द्वितीय) से बहादुरशाह जफर तक (1754-1857 ई.)

अहमदशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र आलमगीर (द्वितीय) दिल्ली के तख्त पर बैठा। उसके समय में अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर चौथा आक्रमण किया तथा दिल्ली में प्रवेश किया तथा भारी लूटमार मचाई। आलमगीर (द्वितीय) के वजीर इमाद-उल-मुल्क ने 1758 ई. में बादशाह की हत्या करवा दी और शाहजहाँ (तृतीय) को बादशाह बनाया।

आलमगीर (द्वितीय) ने केवल एक वर्ष तक शासन किया। 1759 ई. में आलमगीर के पुत्र अलीगौहर ने बिहार में स्वयं को शाहआलम (द्वितीय) के नाम से बादशाह घोषित कर दिया। उसने 1759 से 1806 ई. तक स्वयं को बादशाह घोषित करे रखा। यद्यपि वह वर्षों तक दिल्ली नहीं आ सका। 1772 ई. में वह मराठों के संरक्षण में दिल्ली पहुंचा। उ

आलमगीर (द्वितीय) के समय में पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ। शाहआलम (द्वितीय) के पश्चात् क्रमशः अकबर (द्वितीय) 1806-1837 ई. तक और बहादुरशाह (द्वितीय) 1838 से 1858 ई. तक मुगलों के तख्त पर बैठे। अंतिम बादशाह बहादुरशाह (द्वितीय) को इतिहास में बहादुरशाह जफर के नाम से भी जाना जाता है।

आलमगीर (द्वितीय) को ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1857 ई. के विद्रोह के पश्चात् अपदस्थ करके रंगून भेज दिया जहां उसे कैद में रखा गया। कैद में ही उसकी मृत्यु हुई तथा भारत से मुगलों का शासन समाप्त हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – औरंगजेब (आलमगीर )

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