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खुर्रम का विद्रोह

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खुर्रम का विद्रोह

खुर्रम का विद्रोह जहाँगीर की दरबारी गुटबंदी का परिणाम थी। यह गुटबंदी नूरजहाँ ने आरम्भ की थी। जब जहाँगीर के पुत्रों को लगा कि नूरजहाँ अपने पुत्र को अगला बादशाह बनाना चाहती है, तब खुर्रम ने बगावत का झण्डा बुलंद कर दिया।

जब जहाँगीर बीमार पड़ा तो खुर्रम में, तख्त प्राप्त करने की आतुरता बढ़ गई।  नूरजहाँ, शहरियार के पक्ष में अपने प्रभाव का प्रयोग कर रही थी। 1622 ई. में फारस के शाह ने कन्दहार पर अधिकार कर लिया। जब जहाँगीर को इसकी सूचना मिली तो उसने खुर्रम को आज्ञा दी कि वह दक्षिण से सेनाओं के साथ कन्दहार के लिये प्रस्थान करे।

चूँकि राजधानी में खुर्रम के शत्रु षड्यन्त्र रच रहे थे, इसलिये खुर्रम ने राजधानी से बहुत दूर जाना हितकर नहीं समझा। वह माण्डू चला आया और वहीं से बादशाह को, कन्दहार जाने के लिये अपनी शर्तें लिख भेजीं।

शहजादे ने मांग की कि रणथम्भौर का दुर्ग उसे दे दिया जाय, जिसमें वह अपने परिवार को रख दे। पंजाब का प्रान्त उसे दे दिया जाय, जिसे वह अपना आधार बना ले और वर्षा ऋतु माण्डू में ही व्यतीत करने की अनुमति दी जाये। जहाँगीर को खुर्रम की तीनों शर्तें मान्य नहीं हुईं। इसलिये कन्दहार की सुरक्षा का काम शहरियार को सौंप दिया गया।

खुर्रम ने जहाँगीर से प्रार्थना की थी आगरा के निकट स्थित धौलपुर की जागीर उसे दे दी जाये परन्तु बादशाह ने यह जागीर पहले ही शहरियार को दे दी थी। शहरियार ने उस पर अपना अधिकार भी जमा लिया था। जब खुर्रम को इसकी सूचना मिली तो उसने अपने आदमियों को धौलपुर भेजकर वहाँ से शहरियार के आदमियों को मार भगाया और बलपूर्वक धौलपुर तथा नूरजहाँ की जागीर के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया।

खुर्रम का विद्रोह खुर्रम का विद्रोह जहाँगीर के लिए बड़ी चेतावनी था। जब जहाँगीर को इसकी सूचना मिली तो उसने खुर्रम को दण्ड देने की धमकी दी और खुर्रम से दोआब तथा हिसार फिरोजा की जागीर छीनकर शहरियार को दे दी। इस प्रकार खुर्रम के प्रतिद्वन्द्वी शहरियार को प्रोत्साहन मिलने लगा। इससे खुर्रम का धैर्य भंग हो गया और उसने खुल्लमखुल्ला विरोध करने का निश्चय कर लिया।

उधर नूरजहाँ भी चुप नहीं बैठी थी। वह खुर्रम की गतिविधियों पर दृष्टि रख  रही थी। उसने महाबतखाँ को अपनी ओर मिला लिया और शाही सेना का संचालन उसी को सौंप दिया। महाबतखाँ नूरजहाँ का सबसे बड़ा आलोचक था किंतु वही अब उसका सबसे बड़ा समर्थक बन गया। महाबत खाँ का झुकाव शहजादे परवेज की ओर था। इसलिये महाबत खाँ तथा परवेज को खुर्रम का सामना करने का कार्य सौंपा गया।

इस पर खुर्रम विद्रोह पर उतर आया और वह आगरा लूटने के लिये माण्डू से चलकर फतेहपुर सीकरी पहुँच गया परन्तु एतबारखाँ ने खुर्रम की सेना को आगरा में नहीं घुसने दिया। खुर्रम ने निराश होकर दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। महाबतखाँ भी लाहोर से दिल्ली की ओर चल पड़ा।

बिलोचपुर नामक स्थान पर खुर्रम तथा महाबतखाँ की सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें खुर्रम परास्त होकर माण्डू भाग गया। महाबतखाँ ने उसका पीछा किया। शाहजादा परवेज भी उसके साथ था। एक सेना खुसरो के पुत्र दावरबख्श की अध्यक्षता में, जिसे बुलाकी भी कहते हैं, गुजरात की ओर भेजी गई।

जहाँगीर स्वयं भी एक सेना के साथ अजमेर पहुंच गया। खुर्रम घबराकर माण्डू से भाग खड़ा हुआ। उसने नर्मदा नदी को पार कर लिया। खुर्रम ने मलिक अम्बर तथा बीजापुर के सुल्तान से सहायता मांगी परन्तु किसी ने उसे शरण नहीं दी। दक्षिण में अब्दुर्रहीम खानखाना की सहानुभूति खुर्रम के साथ थी, अतः उसी के माध्यम से खुर्रम ने जहाँगीर के पास सन्धि का प्रस्ताव भेजा परन्तु खानखाना शाहजादा परवेज से मिल गया जिससे सन्धि वार्ता समाप्त हो गई। इस कारण खुर्रम का विद्रोह समाप्त नहीं हो सका।

महाबत खाँ तथा परवेज बड़ी तेजी से खुर्रम का पीछा कर रहे थे। गुजरात पर शाही सेना का अधिकार हो गया। वहाँ का हाकिम अब्दुल्ला खाँ भी खुर्रम के साथ शरण खोज रहा था। अब खुर्रम ने गोलकुण्डा के सुल्तान के यहाँ शरण ली। वहाँ से खुर्रम ने उड़ीसा के मार्ग से बंगाल में प्रवेश किया।

अब्दुल्ला खाँ ने बर्दवान जीत लिया परन्तु नूरजहाँ के भाई इब्राहीम खाँ ने, जो उन दिनों बंगाल का सूबेदार था, राजमहल के निकट खुर्रम की सेना का सामना किया। इब्राहीम खाँ युद्ध में परास्त हो गया और मारा गया। ढाका पर खुर्रम का अधिकार हो गया।

मेवाड़ का राणा कर्णसिंह खुर्रम की सहायता कर रहा था। उसने पटना पर अधिकार कर लिया। अब खुर्रम की सेना आगे बढ़ी और उसने रोहतास के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। जौनपुर पर भी खुर्रम का अधिकार हो गया। यहाँ से एक सेना अब्दुल्ला खाँ की अध्यक्षता में इलाहाबाद के किले का घेरा डालने के लिये भेजी गई और दूसरी सेना खुर्रम के साथ बनारस होती हुई आगे बढ़ी।

इसी बीच महाबत खाँ तथा परवेज दक्षिण से आ पहुँचे। उन्होंने शाहजहाँ की प्रगति को रोक दिया। अब्दुल्ला इलाहाबाद के दुर्ग का घेरा उठा लेने के लिये विवश हो गया और राणा भीमसिंह जौनपुर के निकट मारा गया। खुर्रम की सेना भी इलाहाबाद जिले में दमदम नामक स्थान पर बुरी तरह परास्त हुई।

अब खुर्रम का महाबत खाँ तथा परवेज के सामने ठहरना कठिन हो गया। फलतः वह पीछे हटने लगा और अपनी स्त्री तथा लड़कों को रोहतास दुर्ग में छोड़कर दक्षिण की ओर चला गया। दक्षिण में मलिक अम्बर, खुर्रम की सहायता करने के लिए उद्यत हो गया क्योंकि उन दिनों उसका मुगल सल्तनत से संघर्ष चल रहा था।

खुर्रम ने बुरहानपुर का घेरा डाला परन्तु महाबत खाँ तथा परवेज अपनी सेनाओं के साथ पहुँच गये। खुर्रम को विवश होकर घेरा उठा लेना पड़ा। इस विपत्ति में अब्दुल्ला खाँ ने भी खुर्रम का साथ छोड़कर संन्यास ले लिया। अतः खुर्रम के पास जहाँगीर से क्षमा माँगने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचा। वह बादशाह को क्षमादान की अर्जी भेजकर बालाघाट चला गया।

जहाँगीर ने शहजादे की क्षमा याचना स्वीकार कर ली। नूरजहाँ ने भी क्षमादान में कोई बाधा उत्पन्न नहीं की, क्योंकि वह, महाबतखाँ तथा परवेज के बढ़ते हुए प्रभाव से आतंकित हो रही थी। जहाँगीर ने इस शर्त पर खुर्रम को क्षमा किया कि वह रोहतास तथा असीरगढ़ के दुर्ग समर्पित कर दे और अपने दो पुत्रों दारा तथा औरंगजेब को बन्धक स्वरूप में शाही दरबार में भेज दे। खुर्रम ने इन शर्तों को स्वीकार कर लिया। जहाँगीर ने खुर्रम को क्षमा करके उसे बालाघाट की जागीर दे दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

महाबत खाँ का विद्रोह

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महाबत खाँ का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह नूरजहाँ के भाई आसफ खाँ के षड़यंत्रों एवं का परिणाम था। नूरजहाँ ने आसफ खाँ ने महाबत खाँ के लिए ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दीं जिनके कारण महाबत खाँ को बगावत करनी पड़ी।

खुर्रम के विद्रोह के समय खुर्रम का श्वसुर आसफ खाँ चुपचाप विद्रोह की गतिविधियों को देखता रहा। उसने इस विद्रोह में विशेष रुचि नहीं दिखाई ताकि उस पर किसी प्रकार का संदेह नहीं किया जा सके परन्तु जब विद्रोह समाप्त हो गया तब आसफ खाँ, महाबत खाँ की जड़ खोदने में लग गया।

इस कार्य में आसफ खाँ को अपनी बहिन नूरजहाँ का भी सहयोग प्राप्त हो गया। नूरजहाँ अपने भाई आसफ खाँ का बड़ा विश्वास करती थी। वह उसकी कूटनीति को समझ नहीं सकी और सरलता से उसके जाल में फँस गई।

यद्यपि महाबत खाँ ने खुर्रम के विरोध का दमन कर साम्राज्य की बहुत बड़ी सेवा की थी परन्तु इस सेवा में ही उसके विनाश का बीजारोपण हो गया। इस समय उसके पास एक विशाल विजयी सेना थी। साम्राज्य में उसकी प्रतिष्ठा तथा उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया और शाहजादा परवेज के साथ उसका गठबंधन हो गया।

यह स्थिति साम्राज्य के लिए खतरे से खाली नहीं थी। किसी भी शक्तिशाली सेनापति का किसी शहजादे के साथ गठबंधन हो जाना भावी विद्रोह की संभावना प्रकट करता था। इस बात की सम्भावना थी कि आगे चलकर महाबतखाँ के उम्मीदवार परवेज, नूरजहाँ के उम्मीदवार शहरियार तथा आसफखाँ के उम्मीदवार खुर्रम के बीच शाही तख्त के लिये संघर्ष हो।

अतः नूरजहाँ तथा आसफखाँ दोनों ने परवेज को मार्ग से हटाने का निश्चय किया। इस कार्य में सफलता पाने के लिये परवेज को महाबतखाँ से अलग करना आवश्यक था। अब्दुर्रहीम खानखाना ने भी इस योजना में सहयोग देना आरम्भ किया।

1625 ई. में महाबत खाँ को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया गया तथा उसे निर्देश दिये गये कि वह परवेज को गुजरात के गवर्नर खान-ए-जहाँ लोदी के संरक्षण में दे दे। यद्यपि बंगाल की अस्वास्थ्यकर जलवायु के कारण न तो महाबतखाँ बंगाल जाना चाहता था और न शाहजादा परवेज खान-ए-जहाँ लोदी के संरक्षण में जाना चाहता था परन्तु अन्त में दोनों ने शाही आज्ञा का पालन करने का निश्चय किया। इस प्रकार महाबतखाँ तथा परवेज को एक दूसरे से अलग कर दिया गया।

महाबत खाँ ने बादशाह से प्रार्थना की कि उसके पुत्र खानजाद खाँ को, जो काबुल में था, नायब बनाकर बंगाल भेज दिया जाये, बादशाह ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। बंगाल की गवर्नरी महाबतखाँ के हाथ में रही। खुर्रम के विद्रोह के समय महाबतखाँ को लूट का माल मिला था। उसका उसने अभी तक कोई हिसाब नहीं दिया था और न हाथी भेजे थे।

अतः आसफखाँ ने दीवाने-रियासत की हैसियत से महाबत खाँ से लूट के माल का हिसाब तथा युद्ध संचालन के लिये दिये गये धन का हिसाब मांगा और हाथी समर्पित करने के लिये कहा। इसी समय अब्दुर्रहीम खानखाना ने बादशाह से शिकायत की कि महाबतखाँ ने मेरे पुत्र तथा परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी है और मेरी सम्पत्ति छीन ली है।

यद्यपि नूरजहाँ कूटनीति में निपुण थी परन्तु वह अपने भाई आसफखाँ की कूटनीति को नहीं समझ सकी। उसने आसफ खाँ की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। आसफखाँ, महाबतखाँ के विरुद्ध बादशाह के कान भरता गया।

महाबत खाँ ने सारे हाथी लौटा दिये और बुरहानपुर से रणथम्भौर चला गया जो उसकी जागीर थी। अब उसे आदेश मिला कि वह दरबार में उपस्थित हो। महाबत खाँ दरबार में हाजिर होने के लिये पहुँचा तो बादशाह ने कहला भेजा कि जब तक वह दीवान को सारा हिसाब नहीं दे देगा तब तक बादशाह उससे नहीं मिलेगा।

महाबत खाँ को अपमानित करने के लिये उसके दामाद बर्खुरदार खाँ को पीटा गया और जेल में बंद कर दिया गया। जो सम्पत्ति महाबत खाँ ने बर्खुरदार को दहेज में दी थी वह भी छीन ली गई और उस पर आरोप लगाया गया कि यह विवाह बादशाह की स्वीकृति के बिना हुआ था। इसी समय यह भी खबर फैल गई कि आसफ खाँ, महाबत खाँ को कैद करने की योजना बना रहा है।

जिस समय महाबत खाँ, बादशाह के खेमे के पास पहुँचा उस समय बादशाह काबुल के लिये प्रस्थान कर रहा था। नूरजहाँ, आसफखाँ तथा अन्य लोग झेलम नदी के उस पार जा चुके थे परन्तु जहाँगीर अभी इस पार ही था। महाबतखाँ ने इस परिस्थिति से लाभ उठाया।

वह बादशाह के खेमे में घुस गया और उसके सामने गिरकर प्रार्थना की कि आसफखाँ उसे अपमानित कर रहा है, बादशाह महाबतखाँ की रक्षा करे। बादशाह को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि शाही कैम्प महाबतखाँ के आदमियों के हाथ में था। जब नूरजहाँ को इसकी सूचना मिली तो उसके क्रोध की सीमा न रही।

उसने फिर नदी को पार कर वापस लौटने का प्रयत्न किया परन्तु वह बादशाह को मुक्त नहीं करवा सकी। इस पर उसने स्वयं को भी महाबतखाँ को समर्पित कर दिया। आसफखाँ ने भागकर अटक के दुर्ग में शरण ली। महाबतखाँ ने अपने पुत्र विहरोज को अटक भेजकर आसफखाँ को भी हिरासत में ले लिया।

अब महाबत खाँ जहाँगीर, नूरजहाँ तथा अन्य लोगों के साथ काबुल की ओर बढ़ा। शाही कैम्प काबुल पहुँचा। यहाँ बादशाह को पूरी आजादी थी परन्तु नूरजहाँ इसे बड़ा अपमानजनक समझती थी कि बादशाह अपने एक मनसबदार की देख-रेख में रहे। धीरे-धीरे महाबत खाँ अलोकप्रिय होने लगा। नूरजहाँ ने इस स्थिति से लाभ उठाने का प्रयत्न किया। वह लोगों को महाबत खाँ के खिलाफ भड़काने लगी।

इसी समय 1626 ई. में बादशाह को सूचना मिली कि खुर्रम ने दक्षिण से राजधानी के लिए प्रस्थान कर दिया है। इससे शाही कैम्प काबुल से हिन्दुस्तान की ओर चल पड़ा। मार्ग में शाही सैनिकों की संख्या बढ़ती गई और महाबतखाँ की स्थिति खराब होती गई। जब शाही खेमा रोहतास पहुँचा तो बादशाह ने महाबतखाँ को आदेश दिया कि वह आगे बढ़े, शाही खेमा पीछे आयेगा।

महाबत खाँ स्थिति को समझ गया। वह आगे बढ़ा और फिर रुका नहीं। वह मेवाड़ की पहाड़ियों की ओर चला गया और वहीं से खुर्रम के साथ वार्ता आरम्भ की। खुर्रम बहुत प्रसन्न हुआ और उसे सेना में लेने के लिए तैयार हो गया। यद्यपि नूरजहाँ, बादशाह तथा अपने भाई को महाबतखाँ के चंगुल से मुक्त कराने में सफल हो गई परन्तु उसने अपने लिए आपत्ति के बीज बो दिए।

जब खुर्रम गुजरात में था तब उसे सूचना मिली कि अत्यधिक मद्यपान के कारण परवेज की मृत्यु हो गई है। इस प्रकार खुर्रम के मार्ग से उसका एक और प्रतिद्वन्द्वी हट गया। महाबत खाँ, जो परवेज का समर्थक था, बादशाह का कोप भाजन बन चुका था। अतः महाबत खाँ से भी दरबार को कोई सहायता मिलने की संभावना नहीं थी। महाबत खाँ के खुर्रम की सेवा में आ जाने से खुर्रम का पक्ष बड़ा प्रबल हो गया। अब तख्त के लिए खुर्रम तथा शहरियार ही दावेदार रह गये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

जहाँगीर का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

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जहाँगीर का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

इतिहासकारों के लिए जहाँगीर का चरित्र किसी पहेली से कम नहीं है। जब तक अकबर जीवित रहा, जहाँगीर ने कई बार अपने पिता से विद्रोह किया तथा अपनी पत्नी मानबाई और अपने पिता के मित्र अबुल फजल की हत्या जैसे गंभीर अपराध किए किंतु जब वह बादशाह बना तो वह न्यायप्रिय शासक एवं कलाओं का संरक्षक बन गया।

जहाँगीर का चरित्र

व्यक्ति के रूप में

जहाँगीर की चारित्रक दुर्बलताएँ उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर हावी थीं। उसे मदिरापान तथा अफीम के सेवन का दुर्व्यसन था, जिसका उसके स्वास्थ्य तथा उसकी मानसिक क्षमताओं पर बुरा प्रभाव पड़ा। वह चाटुकारों तथा अपने सम्बन्धियों के प्रभाव में सरलता से आ जाता था, जिससे वह अपने विवेक से काम नहीं ले पाता था।

इस कारण जहाँगीर का चरित्र उसे विलासी, अवज्ञाकारी एवं क्रोधी व्यक्ति सिद्ध करती हैं। उसने कभी भी अपने पिता की आज्ञा का पालन नहीं किया तथा शराब के नशे में अपनी बेगम मानबाई को कोड़ों से पीट-पीटकर जान से मार डाला। जहाँगीर ने अपने पुत्र खुसरो के प्रति भी अत्यंत क्रूरता दिखाई।

उसे अंधा बनाकर कारागृह में डाल दिया तथा बाद में उसे निरीह अवस्था में खुर्रम को सौंप दिया जिसने उसकी हत्या करवा दी। जहाँगीर ने शेरखाँ की विधवा नूरजहाँ से विवाह करके अपनी कामांधता का परिचय दिया तथा उसके रूप पाश में बंधकर राज्य का सारा भार उस पर छोड़ दिया।

शासक के रूप में

जहाँगीर को अपने पिता से सुव्यवस्थित, सुसंगठित एवं विशाल सल्तनत मिली थी। इसके निर्माण के लिये उसे जंग के मैदान में नहीं उतरना पड़ा था। न ही नये सिरे से प्रशासनिक व्यवस्थाएँ करनी पड़ी थीं। अकबर ने सल्तनत की सुरक्षा के लिये विशाल सैनिक व्यवस्था कर दी थी जिसके बल पर जहाँगीर अपने पिता से प्राप्त सल्तनत पर मृत्युपर्यंत शासन करता रहा।

जहाँगीर में अकबर जैसी कार्य-कुशलता और नीति-निपुणता नहीं थी इस कारण वह शासन में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं कर पाया। जहाँगीर की विलासिता तथा अकर्मण्यता के कारण शासन का वास्तविक संचालन नूरजहाँ तथा उसके परिवार के हाथ में चला गया जो सल्तनत के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ।

इससे गुटबन्दी का सूत्रपात हुआ जो उसके शासन में अन्त तक चलती रही। सल्तनत में षड्यन्त्र तथा कुचक्र का प्रकोप बढ़ जाने से प्रान्तीय शासक मनमानी करने लगे। इस कारण जन-साधारण की सुरक्षा खेतरे में पड़ गई।

विजेता के रूप में

बादशाह बनने से पहले एवं बादशाह बनने के बाद जहाँगीर ने कोई उल्लेखनीय विजय प्राप्त नहीं की। उसने मेवाड़ को झुकने पर विवश अवश्य किया किंतु मलिक अम्बर के विरुद्ध असफल होने से साम्राज्य की सैनिक प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा। जहाँगीर नये क्षेत्र नहीं जीत सका। कन्दहार उसके हाथ से निकल गया। इस प्रकार एक भी ऐसी विजय नहीं है जो जहाँगीर को विजेता सिद्ध कर सके।

न्यायकर्ता के रूप में

अनेक समकालीन इतिहासकारों ने जहाँगीर को असफल किंतु उच्च कोटि का न्यायप्रिय शासक बताया है। विचारणीय है कि उच्च कोटि का विलासी व्यक्ति जो अपने पिता, पुत्र एवं पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर सका हो, उच्च कोटि का न्यायप्रिय शासक कैसे हो सकता है ?

मद्यपान का व्यसनी, राज्यकार्य से विमुख, युद्ध के मैदान से विमुख बादशाह, न्यायप्रिय कैसे हो सकता है ? फिर भी समकालीन दरबार मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा लिखी गई बातों का अनुकरण करके बहुत से आधुनिक इतिहासकार स्वयं को धर्मनिरपेक्ष सिद्ध करने की लालसा में जहाँगीर को उसकी न्याय-प्रियता के लिये याद करते हैं तथा जहाँगीर का बचाव करते हुए तर्क देते हैं कि अपनी न्याय-शीलता के कारण ही वह कभी-कभी अपराधियों को कठोर दण्ड दे देता था।

इन इतिहासकारों के अनुसार यद्यपि जहाँगीर का स्वभाव बड़ा ही उदार, दयालु तथा क्षमाशील था परन्तु वह कभी-कभी बड़ा क्रूर, निर्दयी तथा हृदयहीन हो जाता था। इसी से कुछ विद्वानों ने उसे कोमलता तथा क्रूरता का सम्मिश्रण कहा है। वस्तुतः जहाँगीर में कोमलता जैसा कोई गुण विद्यमान हो, ऐसा उसके जीवन चरित्र के किसी भी हिस्से में दिखाई नहीं देता।

उसने अपनी पत्नी मानबाई की हत्या की, अबुल फजल की हत्या की, पिता अकबर के प्रति जीवन भर अवज्ञा का प्रदर्शन किया तथा विद्रोह करके राज्य प्राप्त करने का प्रयास किया। उसने अपने पुत्र खुसरो को अंधा बनाकर जेल में डाल दिया, ऐसा व्यक्ति कोमल और न्यायप्रिय कैसे हो सकता है ?

धर्म-सहिष्णु शासक के रूप में

जहाँगीर का झुकाव सूफी धर्म की ओर अधिक था। वह अपने पिता अकबर से कम और अपने पुत्र खुर्रम से अधिक धर्म-सहिष्णु था। यद्यपि वह भी अकबर की भांति दीपावली, शिवरात्रि, रक्षाबन्धन आदि हिन्दू त्यौहार मनाता था तथापि उसके शासन काल में धार्मिक अत्याचारों का फिर से बीजारोपण किया गया।

उसके शासन काल में गुरु अर्जुनदेव की बेरहमी से हत्या की गई जिससे सिक्ख समुदाय सदैव के लिए मुगल सल्तनत का शत्रु बन गया। जहाँगीर के आदेश से और उसकी उपस्थिति में काँगड़ा में एक बैल का वध किया गया, जिससे हिन्दुओं की भावना को बहुत ठेस पहुँची। उसके शासन काल के आठवें वर्ष में उसी की आज्ञा से अजमेर में पुष्कर के हिन्दू मन्दिरों को नष्ट किया गया। आगे चलकर शाहजहाँ के शासन काल में इस धार्मिक अत्याचार ने और अधिक उग्र रूप धारण कर लिया।

साहित्य संरक्षक के रूप में

जहाँगीर साहित्यकारों तथा कलाकारों का आश्रयदाता था। उसे स्वयं भी फारसी का अच्छा ज्ञान था और वह फारसी भाषा में कविताएँ लिखता था। हिन्दी, कविता से उसे बड़ा प्रेम था। वह हिन्दी कवियों को पुरस्कार देता था। उसकी आत्म-कथा तुजके जहाँगीरी उसकी अनुपम कृति मानी जाती है। इस ग्रन्थ से उसकी वैज्ञानिक जिज्ञासा तथा उसके प्रकृति-प्रेम का परिचय मिलता है। जहाँगीर की आत्मकथा में जहाँगीर के गुणों तथा अवगुणों दोनों का परिचय मिलता है।

भवन एवं उपवन निर्माता के रूप में

यद्यपि जहाँगीर के शासन काल में बहुत कम इमारतें बनी थीं परन्तु इस काल में उपवन लगवाने की नई शैली विकसित हुई। काश्मीर में जहाँगीर द्वारा बनवाया हुआ शालीमार बाग और आसफखाँ का बनवाया हुआ निशात बाग आज भी प्रसिद्ध हैं। आगरा में यमुना नदी के तट पर श्वेत संगमरमर का नूरजहाँ द्वारा बनवाया हुआ एतिमादुद्दौला का मकबरा दर्शनीय है।

आगरा के बाहर सिकन्दरा में निर्मित अकबर का मकबरा, अकबर ने बनवाना आरम्भ करवाया था, उसे जहाँगीर ने पूरा करवाया। लाहौर के निकट जहाँगीर का अपना चबूतरा जिसे नूरजहाँ ने बनवाया था और दिल्ली में बना हुआ खानखाना का मकबरा जहाँगीर के काल की अन्य इमारतें हैं।

चित्रकला के संरक्षक के रूप में

जहाँगीर के शासन काल में चित्रकला की बड़ी उन्नति हुई। अबुल हसन तथा मन्सूरी उसके दरबार के प्रसिद्ध चित्रकार थे। जहाँगीर को प्रकृति से बहुत प्रेम था इसलिये उसके काल में चित्रकारों ने पक्षियों, पशुओं तथा फूल-पत्तियों का अच्छा चित्रण किया। उसकी मुद्राओं पर भेड़ों, साँड़ों आदि के सुन्दर चित्र मिलते हैं।

इतिहासकारों की दृष्टि में जहाँगीर का चरित्र

जफर ने जहाँगीर के कार्यों का मूल्यांकन करते हुए लिखा है- ‘जहाँगीर एक महान् शासक था जिसमें बहुत बड़ी कार्य-क्षमता थी। यदि नूरजहाँ के गुट से वह प्रभावित न हुआ होता तो अपने पिता के ही समान कुशल शासक सिद्ध हुआ होता। उसके शासन का गौरव दो महान् बादशाहों- अकबर महान् तथा शाहजहाँ शानदार के बीच में आने से मंद पड़ गया है।’

डॉ. बेनी प्रसाद ने भी जहाँगीर के बारे में इसी तरह की भावना व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘उसकी ख्याति उसके पिता के महान् गौरव और उसके पुत्र की चमत्कार पूर्ण शान के सामने मन्द पड़ गई है।’

निष्कर्ष

इसमें कोई संदेह नहीं कि जहाँगीर की चारित्रिक दुर्बलताएँ उस पर हावी थीं जिनके कारण न वह अपने परिवार वालों के साथ न्याय कर सका, न नये राज्य जीत सका, न शासन में नई व्यवस्थायें आरम्भ कर सका किंतु दूसरी ओर यह भी सत्य है कि उसके शासन काल में अकबर द्वारा स्थापित शासन व्यवस्था बहुत अंशों में उसी प्रकार चलती रही।

कंदहार के अतिरिक्त और कोई क्षेत्र जहाँगीर के हाथ से नहीं निकला। मलिक अम्बर के अतिरिक्त और किसी से उसकी सेनाओं को हार का मुख नहीं देखना पड़ा। जहाँगीर धर्म-सहिष्णु नहीं था किंतु कुछ घटनाओं को छोड़कर उसने हिन्दुओं पर वैसे अत्याचार नहीं किये जैसे उसके पूर्ववर्ती दिल्ली सल्तनत के मुस्लिम शासकों के काल में अथवा पश्चवर्ती औरंगजेब के काल में हुए।

जहाँगीर का चरित्र विभिन्नताओं का मिश्रण था। स्मिथ ने भी जहाँगीर को विभिन्नताओं का सम्मिश्रण बतलाते हुए उचित ही  लिखा है- ‘जहाँगीर में दयालुता तथा क्रूरता, न्याय-प्रियता तथा झक्कीपन, सभ्यता तथा निर्बलता, बुद्धिमत्ता तथा बचपने का अद्भुत मिश्रण था।’

जहाँगीर की मृत्यु    

1627 ई. की ग्रीष्म ऋतु में जहाँगीर का स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया। वह लाहौर की गर्मी सहन नहीं कर सका। अतः वह काश्मीर चला गया परन्तु वहाँ भी उसके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ। जब वह काश्मीर से लाहौर लौट रहा था। तब उसकी दशा शोचनीय हो गई। 29 अक्टूबर 1627 को 60 वर्ष की आयु में उसका निधन हो गया। नूरजहाँ उसके मृत शरीर को लाहौर ले गई और वहीं पर दिलकुशा नामक बगीचे में दफना दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

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नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र मध्यकालीन इतिहास में किसी पहेली से कम नहीं है। उस युग में इस बात पर विश्वास नहीं किया जाता था कि किसी औरत में शासकीय प्रतिभा हो सकती है किंतु जहाँगीर ने अपने राज्य का पूरा शासन नूरजहाँ पर छोड़ दिया था।

नूरजहाँ का चरित्र

नूरजहाँ के गुणों के कारण जहाँगीर ने 1622 ई. में उसे बादशाह बेगम की उपाधि से अलंकृत किया था और अपनी मुद्राओं पर उसके नाम को अंकित कराकर उसे अभूतपूर्व प्रतिष्ठा प्रदान की थी। नूरजहाँ की सबसे बड़ी सेवा उसकी सांस्कृतिक देन है। वह बड़ी ही प्रतिभावान्, सुशिक्षित तथा व्यावहारिक बुद्धि की महिला थी।

कला में उसकी विशेष अनुरक्ति थी। उसे सौन्दर्य तथा अलंकरण से बड़ा प्रेम था। वह जो काम करती थी उसमें सौन्दर्य उत्पन्न करने का प्रयत्न करती थी। इस कारण उसमें प्रबल सांस्कृतिक प्रभाव डालने की क्षमता उत्पन्न हो गई थी। वह पारसीक सभ्यता तथा संस्कृति की पोषक थी। अतः समस्त क्षेत्रों में पारसीक सभ्यता का प्रभाव डालने का प्रयत्न किया।

उसने नये फैशन चलाये, नये वस्त्रों, नये आभूषणों, नई वेश-भूषाओं, नये प्रलेपों एवं आलंकारिक पदार्थों का आविष्कार तथा प्रचलन किया। उसने दरबार के आचार-व्यवहार में सौन्दर्य तथा सौष्ठव उत्पन्न किया। तत्कालीन वास्तुकला पर उसके व्यक्तित्व की छाप स्पष्ट है। इस प्रकार उसने अपने समय के सांस्कृतिक जीवन को अत्यधिक प्रभावित किया।

नूरजहाँ का मस्तिष्क उन्नत तथा हृदय विशाल था। वह उदार तथा दयालु महिला थी। उसका बहिरंग यथा अन्तरंग दोनों ही समान रूप से कोमल था। उसके प्रत्येक कार्य में उदारता तथा दया का समावेश रहता था। उसमें उच्च कोटि की दानशीलता थी। वह दीन-दुखियों, असहायों, अनाथों, विधवाओं तथा पीड़ितों की सहायक थी।

परोपकार के कार्यों से उसने जहाँगीर के शासन में उदारता तथा दानशीलता का ऐसा वातावरण उत्पन्न कर दिया जिसका सामाजिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है। नूरजहाँ में उच्च-कोटि का पति-प्रेम था। अपने प्रथम पति शेर अफगन के प्रति उसकी अनुपम अनुरक्ति थी। जब जहाँगीर ने उसे अपनी प्रेयसी तथा पत्नी बनाया तब उसने प्रेम और सेवा से जहाँगीर को ऐसा मुग्ध कर लिया कि बादशाह उस पर अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए उद्यत हो गया।

नूरजहाँ के राजनीतिक प्रभाव के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। नूरजहाँ का जहाँगीर पर बहुत प्रभाव था। कुछ विद्वानों की धारणा है कि राजनीतिक क्षेत्र में भी उसका उतना ही बड़ा प्रभाव था। इन विद्वानों के विचार में तत्कालीन राजनीति उसी के द्वारा संचालित होती थी।

इसलिये इतिहासकार दरबारी षड्यन्त्रों तथा कुचक्रों के लिए प्रधानतः उसी को उत्तरदायी मानते हैं और तत्कालीन राजनीति पर उसके दूषित प्रभाव की कटु आलोचना करते हैं। नूरजहाँ का व्यक्तित्व इतना ऊँचा था कि अपने काल की राजनीति को प्रभावित करना उसके लिए असम्भव नहीं था, इसयिले उसने ऐसा किया भी।

वह पहले खुर्रम को जहाँगीर का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी किंतु बाद में अपने जामाता शहरियार को बादशाह बनते हुए देखने के लिये कार्य करने लगी। उसने परवेज को भी बादशाह बनने से रोकने के लिये कार्य किया। जब महाबतखाँ ने बादशाह को नजरबंद कर लिया तब उसने स्वयं को भी नजरबंद करवाकर चतुर राजनीतिज्ञ होने का परिचय दिया।

उसने बड़ी चतुराई से जहाँगीर को महाबतखाँ के चंगुल से मुक्त करवाकर शाही परिवार की प्रतिष्ठा तथा मर्यादा की पुनर्स्थापना की। शाहजादा खुर्रम तथा महाबतखाँ के विद्रोह और उत्तराधिकार के लिए जो षड्यन्त्र तथा कुचक्रों को काटने के लिये भी उसने हरसंभव कार्य किया।

नूरजहाँ का अपने भाइयों में और विशेषकर अपने बड़े भाई आसफ खाँ में बहुत विश्वास था। आसफ खाँ बड़ा षड्यंत्रकारी व्यक्ति था और अपने तथा अपने दामाद खुर्रम के स्वार्थ सिद्ध करने के लिए वह नूरजहाँ को अस्त्र बना लेता था। नूरजहाँ उसके षड्यंत्रों को को समझ नहीं पाती थी और उसका अस्त्र बन जाती थी।

वास्तव में नूरजहाँ तत्कालीन कुचक्री राजनीति के योग्य नहीं थी। दुर्भाग्य से शहरियार जैसा अयोग्य शहजादा उसका दामाद बन गया जिसे वह बादशाह बनते हुए देखना चाहती थी। जब खुर्रम बादशाह बन गया तब नूरजहाँ राजनीति से बिल्कुल अलग हो गई और उसने अपने जीवन के शेष दिन एकान्तवास में व्यतीत किये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

शाहजहाँ

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शाहजहाँ एवं मुमताज महल

शाहजहाँ ने ईस्वी 1628 से 1658 तक शासन किया। वह अपने पिता जहाँगीर की तुलना में अधिक कट्टर शासक था। उसने अपने पितामह की सुलहकुल नीति को तो नहीं छोड़ा किंतु उसने कई मंदिरों को तुड़वाया जिनमें पुष्कर का प्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर भी शामिल है।

शाहजहाँ का प्रारम्भिक जीवन

शाहजहाँ का वास्तविक नाम खुर्रम था। उसका जन्म 5 जनवरी 1592 को लाहौर में हुआ। उसकी माता का नाम जोधाबाई था जिसे जगत गोसाइन भी कहते थे। वह मारवाड़ के राजा उदयसिंह की पुत्री थी। खुर्रम का पालन-पोषण उसकी दादी सुल्ताना बेगम ने बड़े लाड़ से किया था। वह अपने बाबा अकबर का प्रिय था।

जब खुर्रम ने दक्षिण में उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कीं तब जहाँगीर ने उसे शाहजहाँ की उपाधि दी। शाहजहाँ अपने पिता का तीसरा पुत्र था। वह अपने भाइयों में सबसे योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी था। उसे बौद्धिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार की शिक्षा मिली। इस कारण उसने कम आयु से ही योग्यता का परिचय देना आरम्भ किया।

शहजादे खुसरो के विद्रोह कर देने से शाहजहाँ को उन्नति करने का अवसर प्राप्त हो गया। वह जहाँगीर तथा नूरजहाँ दोनों का प्रिय बन गया जिसके फलस्वरूप उसे महत्त्वपूर्ण युद्धों में भेजा जाने लगा। शाहजहाँ को इन युद्धों में विजय प्राप्त हुई और सम्पूर्ण मुगल सल्तनत में उसकी प्रसिद्धि हो गई।

1618 ई. में शाहजहाँ का विवाह नूरजहाँ के बड़े भाई आसफ खाँ की पुत्री अर्जुमन्द बानू बेगम से हुआ। इस कारण शाहजहाँ को अपने पिता जहाँगीर की चहेती बेगम नूरजहाँ, नूरजहाँ के पिता एतिमादुद्दौला जो प्रधानमन्त्री के पद पर आसीन था और नूरजहाँ के भाई आसफ खाँ, जो साम्राज्य का दीवान था, का समर्थन प्राप्त हो गया।

उत्तराधिकार के लिए संघर्ष

जिस समय जहाँगीर का निधन हुआ उस समय खुर्रम दक्षिण में और शहरियार लाहौर में था। जहाँगीर की मृत्यु होते ही आसफखाँ ने अपनी बहिन नूरजहाँ के निवास पर कड़ा पहरा लगा दिया और खुर्रम के पुत्रों को शाही नियन्त्रण से मुक्त कर दिया। आसफ खाँ ने खुसरो के पुत्र दावरबख्श को मीरबख्शी इदारत खाँ के नियन्त्रण में रख दिया, जो आसफ खाँ का विश्वस्त आदमी था। इसके बाद आसफ खाँ ने बनारसीदास नामक व्यक्ति के हाथों खुर्रम के पास सन्देश भिजवाया कि वह अविलम्ब लाहौर चला आये। उसने महाबतखाँ के पास भी यह सूचना भेज दी कि वह अपनी पूरी शक्ति के साथ खुर्रम की सहायता करे।

इतने प्रबंधों के बाद भी आसफ खाँ संतुष्ट नहीं हुआ। वह जानता था कि तख्त को खाली जानकर शहरियार तथा नूरजहाँ षड़यंत्र रच सकते थे, इसलिये आसफ खाँ ने खुसरो के पुत्र दावरबख्श को तख्त पर बिठा दिया जिससे खुर्रम के पहुँचने तक तख्त खाली न रहे। दावरबख्श अपने अन्तिम परिणाम को जानता था इसलिये तख्त पर बैठने के लिए तैयार नहीं हुआ किंतु उसे जबरदस्ती तख्त पर बैठाया गया।

उधर शहरियार ने लाहौर में स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया और शाहेशाहान की उपाधि धारण की। उसने अमीरों तथा सैनिकों का समर्थन प्राप्त करने के लिए खूब धन बाँटा और एक सेना आसफखाँ तथा दावरबख्श के विरुद्ध भेज दी। यह सेना परास्त हो गई और उसके अधिकांश सैनिक आसफखाँ की तरफ जा मिले।

आसफ खाँ ने लाहौर पर आक्रमण करने के लिये सेना भेजी। इस पर शहरियार ने स्वयं को लाहौर दुर्ग में बंद कर लिया परन्तु अंत में उसे समर्पण करना पड़ा। उसे दावरबख्श के समक्ष उपस्थित किया गया और दावरबख्श से यह आदेश दिलवाया गया कि शहरियार को अन्धा करके कारागार में डाल दिया जाय। दानियाल के पुत्रों के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार का आदेश दिया गया।

बनारसीदास चौबीस दिन की यात्रा करके दक्षिण पहुँचा और महाबतखाँ को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। उस समय खुर्रम जुन्नर में था। महाबतखाँ ने उसके पास सूचना भेज दी। सूचना मिलते ही खुर्रम ने उत्तर के लिए प्रस्थान किया। वह मार्ग में ही था कि उसे शहरियार की पराजय तथा उसके बंदी बनाये जाने की सूचना मिली।

शाहजहाँ ने आसफ खाँ को आदेश भिजवाया कि वह शहरियार तथा दानियाल के पुत्रों की हत्या कर दे। आसफ खाँ ने इस आज्ञा का पालन किया और उन सबकी हत्या करवा दी। इसके बाद खुर्रम आगरा पहुँचा और 6 फरवरी 1628 को शाहजहाँ के नाम से आगरा में तख्त पर आरूढ़ हो गया। उसने नूरजहाँ को दो लाख रुपये की वार्षिक पेन्शन दे दी। इसके बाद नूरजहाँ राजनीति से पूरी तरह अलग हो गई। उसने अपने जीवन के शेष अट्ठारह वर्ष अपनी विधवा पुत्री के साथ एकान्तवास में व्यतीत किये। 1645 ई. में नूरजहाँ की मृत्यु हुई।

शाहजहाँ को तख्त की प्राप्ति

बाबर के बाद से ही मुगल शहजादों में तख्त के उत्तराधिकार के लिये युद्ध होते आये थे। शाहजहाँ में भी अन्य शहजादों की भांति बादशाह बनने की इच्छा प्रबल थी। ज्यों-ज्यों जहाँगीर का स्वास्थ्य गिरता गया त्यों-त्यों शाहजहाँ में तख्त प्राप्त करने की इच्छा तीव्र होती गई। उसका पहला प्रतिद्वन्द्वी शाहजादा खुसरो था।

शाहजहाँ ने बुरहानपुर के दुर्ग में खुसरो की हत्या करवा दी। शाहजहाँ का दूसरा प्रतिद्वन्द्वी परवेज था जिसे महाबत खाँ का समर्थन प्राप्त था किंतु वह अत्यधिक मदिरापान करने से मर गया। शाहजहाँ का तीसरा प्रतिद्वन्द्वी शहरियार था, जो नूरजहाँ का दामाद होने के कारण काफी शक्तिशाली था परन्तु शाहजहाँ की तुलना में अयोग्य था। परवेज की मृत्यु तथा महाबत खाँ के विद्रोह के बाद महाबत खाँ को शाही समर्थन समाप्त हो गया और वह शाहजहाँ से मिल गया। इससे शाहजहाँ का पक्ष प्रबल हो गया।

शाहजहाँ का ससुर आसफखाँ चालाक राजनीतिज्ञ था। वह शाहजहाँ को मुगलों के तख्त पर बैठाने के लिये निरंतर प्रयास करता रहा। जहाँगीर के आँख बंद करते ही आसफखाँ ने शाहजहाँ के प्रतिद्वन्द्वियों को उन्मूलित करना आरम्भ कर दिया और शाहजहाँ के आगरा पहुँचने के पहले ही वह उसके लिये तख्त का समस्त प्रबंध कर दिया।

इस प्रकार शाहजहाँ अपने भाइयों तथा भतीजों का नृशंसतापूर्वक वध करके 6 फरवरी 1628 को आगरा में तख्त पर बैठा। उसने अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और अपने नाम की मुद्राएँ चलवाईं। इस अवसर पर उसने अपने सम्बन्धियों तथा अमीरों को उपहार दिये तथा अपने समर्थकों को पदों एवं उपाधियों से पुरस्कृत किया।

आसफखाँ का मनसब बढ़ाकर उसे प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त किया। महाबतखाँ का भी मनसब बढ़ाया गया और उसे खानखाना की उपाधि दी गई। यह उपाधि मुगल सल्तनत के प्रधान सेनापति को दी जाती थी। महाबत खाँ के पुत्र खान-ए-जहाँ को मालवा का शासक बना दिया गया। अन्य समर्थकों को भी इसी प्रकार पुरस्कृत किया गया।

शाहजहाँ द्वारा विद्रोहों का दमन

जुझारसिंह बुन्देला का विद्रोह

शाहजहाँ के शासन काल में पहला विद्रोह जुझारसिंह बुन्देला ने किया। वह ओरछा के राजा वीरसिंह का पुत्र था, जिसने जहाँगीर के कहने से अबुल फजल की हत्या की थी। इस कारण जुझारसिंह, जहाँगीर का विशेष कृपा पात्र था। 1628 ई. में वीरसिंह की मृत्यु हो गई और उसके स्थान पर उसका ज्येष्ठ पुत्र जुझारसिंह ओरछा का राजा बना।

शाहजहाँ के राज्याभिषेक के समय जुझारसिंह बादशाह का अभिनन्दन करने के लिए आगरा आया। अपनी अनुपस्थिति में वह अपने राज्य का प्रबन्ध अपने पुत्र विक्रमादित्य को सौंप गया था। विक्रमादित्य ने प्रजा पर अत्याचार किये। जब इन अत्याचारों की सूचना शाहजहाँ के पास पहुँची तो उसने इन शिकायतों की जांच करने का आदेश दिया।

इस आदेश से जुझारसिंह घबरा गया और चुपके से आगरा से भाग कर ओरछा राज्य के पर्वतीय प्रदेश में चला गया। इससे कुपित होकर बादशाह ने जुझारसिंह को दण्डित करने का निश्चय किया। उसने महाबतखाँ, खान-ए-जहाँ लोदी तथा अब्दुल्ला खाँ को यह कार्य सौंपा।

महाबतखाँ ने ग्वालियर से, खान-ए-जहाँ लोदी ने मालवा से और अब्दुल्ला खाँ ने कालपी से अपनी सेनाओं के साथ ओरछा के लिये प्रस्थान किया। बादशाह ने स्वयं भी सेना लेकर ग्वालियर में अपना पड़ाव डाला। मुगलों की विपुल तैयारी से जुझारसिंह घबरा गया। उसने लड़ना व्यर्थ समझकर बादशाह से क्षमा याचना कर ली। बादशाह ने उसे क्षमा कर दिया और उसे दक्षिण के मोर्चे पर भेज दिया।

खान-ए-जहाँ लोदी का विद्रोह

दूसरा विद्रोह खान-ए-जहाँ लोदी का था, जो दक्षिण में नियुक्त था। वह जहाँगीर का बड़ा कृपा पात्र था। जहाँगीर ने उसे मुगल सल्तनत के प्रधान सेनापति के पद पर नियुक्त करके खानखाना की उपाधि दी। महाबतखाँ तथा शाहजादा खुर्रम पर कड़ी दृष्टि रखने के लिए उसे दक्षिण का गवर्नर बनाया गया।

शाहजहाँ ने तख्त प्राप्त करने के जो प्रयत्न किये उनमें खान-ए-जहाँ ने न तो किसी प्रकार का प्रोत्साहन दिया और न किसी प्रकार की बाधा पहुँचाई। वह तटस्थ बना रहा। शाहजहाँ ने बादशाह बनने पर, महाबत खाँ को खानखाना की उपाधि दी। कुछ समय बाद शाहजहाँ ने महाबत खाँ को मालवा का प्रान्त भी दे दिया।

इससे खान-ए-जहाँ को अपनी वास्तविक स्थिति का पता लग गया। बुन्देला युद्ध के समाप्त होने पर खान-ए-जहाँ को दरबार में बुलाया गया। उसे वहाँ का वातावरण अपने अनुकूल दिखाई नहीं दिया तथा अपमान का अनुभव किया। बादशाह तथा आसफ खाँ के आशवासन देने पर भी उसका सन्देह दूर नहीं हुआ। फलतः अक्टूबर 1629 में वह आगरा से भाग खड़ा हुआ और दक्षिण भारत चला गया।

बादशाह ने तुरन्त एक सेना उसका पीछा करने के लिए भेजी। खान-ए-जहाँ ने दक्षिण में जाकर अहमदनगर के शासक के साथ गठबन्धन कर लिया परन्तु वह गठबन्धन अधिक दिनों तक नहीं चला। इसलिये खान-ए-जहाँ दक्षिण छोड़कर बुन्देलखण्ड चला आया। राजा विक्रमादित्य तथा शाही सेना ने उसका पीछा किया। अन्त में खान-ए-जहाँ लोदी परास्त हो गया और मार डाला गया।

गुरु हरगोविंद से संघर्ष

शाहजहाँ के शासन काल के आरम्भ में 1628 ई. में सिक्खों के छठे गुरु हरगोविंद के साथ शाहजहाँ का संघर्ष आरम्भ हुआ। इस संघर्ष का कारण एक बाज था। एक बार बादशाह अमृतसर के निकट आखेट खेल रहा था। उसका एक बाज गुरु के डेरे में चला गया।

जब बादशाह के सिपाहियों ने सिक्खों से बाज लौटाने की मांग की तो सिक्खों ने शरण में आये हुए बाज को लौटाने से मना कर दिया। इस पर बादशाह की सेना ने सिक्खों पर आक्रमण कर दिया परन्तु गुरु के नेतृत्व में सिक्खों ने मुगल सेना को मार भगाया। इस पर वजीरखाँ तथा गुरु के अन्य शुभचिंतकों ने किसी तरह बादशाह के क्रोध को शान्त किया।

कुछ समय बाद गुरु हरगोविंद ने पंजाब में व्यास नदी के किनारे एक नये नगर का निर्माण आरम्भ किया जो आगे चल कर श्री हरगोविन्दपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पंजाब के मध्य में इस नगर का निर्माण मुगल सल्तनत के लिये हितकर नहीं समझा गया। इसलिये बादशाह ने गुरु को आदेश दिया कि वे नगर का निर्माण नहीं करें किंतु सिक्खों ने इस आदेश की उपेक्षा करके नगर का निर्माण पूर्ववत् जारी रखा। सिक्खों के विरुद्ध पुनः एक सेना भेजी गई जिसे गुरु हरगोविंद के सिक्खों ने मार भगाया। इस बार पुनः मामला किसी तरह शांत किया गया।

गुरु का मुगलों के साथ तीसरा संघर्ष एक चोरी के कारण हुआ। बिधीचन्द्र नामक एक कुख्यात डाकू गुरु का परम भक्त था। उसने शाही अस्तबल से दो घोड़े चुराकर गुरु को भेंट कर दिये। गुरु ने अनजाने में वे घोड़े स्वीकार कर लिये। इसलिये 1631 ई. में एक प्रबल मुगल सेना गुरु के विरुद्ध भेजी गई परन्तु गुरु की सेना ने उसे भी खदेड़ दिया।

मुगलों से निरन्तर संघर्ष के कारण सिक्ख गुरु द्वारा किये जाने वाले धर्म-प्रचार के कार्य में बाधा उत्पन्न होने लगी तथा सिक्खों को बड़ा कष्ट उठाना पड़ा। गुरु हरगोविंद जानते थे कि सिक्खों की शक्ति एवं साधन अत्यंत सीमित हैं जबकि मुगल सल्तनत की शक्ति एवं साधन असीमित हैं। इसलिये सिक्ख बहुत दिनों तक इस संघर्ष में नहीं टिक सकेंगे।

इसलिये गुरु हरगोविंद आध्यात्मिक चिन्तन के लिए काश्मीर की पहाड़ियों में चले गए और कीरतपुर नामक स्थान पर निवास करने लगे। वहीं पर उन्होंने धर्म प्रचार करते हुए शान्तिपूर्वक शेष जीवन व्यतीत किया। माना जाता है कि गुरु हरगोविन्द ने ही सिक्खों को मांस खाने की अनुमति प्रदान की। 1645 ई. में गुरु हरगोविंद का निधन हो गया।

द्वितीय बुन्देला युद्ध

प्रथम बुन्देला युद्ध के बाद ओरछा के राजा जुझारसिंह को उसके पुत्र जगराज (विक्रमादित्य) के साथ दक्षिण भेज दिया गया था। उसने महाबतखाँ की अधीनता में पाँच वर्ष तक मुगल सल्तनत की सेवा की। महाबतखाँ के मरने के बाद राजा जुझारसिंह अपने पुत्र को दक्षिण में छोड़कर ओरछा चला आया।

थोड़े ही दिन बाद उसने गोंडवाना के राजा प्रेम नारायण पर, जो मुगल बादशाह का मनसबदार था, आक्रमण किया और उसकी राजधानी चौरागढ़ पर घेरा डाला। प्रेम नारायण युद्ध में मारा गया। जुझारसिंह के सैनिकों ने उसकी राजधानी को खूब लूटा। जब शाहजहाँ को इसकी सूचना मिली तो उसके क्रोध की सीमा नहीं रही।

उसने आदेश दिया कि जुझारसिंह ने गोंडवाना का जितना भाग जीता है उतना ही भूभाग अपने राज्य में से और लूटे हुए माल में से दस लाख रुपये उसके हवाले कर दे। जुझारसिंह ने इस आदेश की उपेक्षा की और अपने पुत्र जगराज को भी दक्षिण से बुला लिया। इस पर शाहजहाँ ने जुझारसिंह के विरुद्ध सेना भेजी।

22 नवम्बर 1634 को मुगल सेना ने ओरछा पर अधिकार कर लिया। जुझारसिंह के प्रतिद्वन्द्वी देवीसिंह को ओरछा का राजा बनाया गया। इसके बाद मुगल सेना ने जुझारसिंह का बुरी तरह पीछा किया। जुझारसिंह के तीन पुत्र, एक पौत्र और जुझारसिंह की रानी मुगलों के हाथ लगे।

जुझारसिंह और जगराज जंगलों में चले गए, जहाँ पर गौंड लोगों ने उनकी हत्या कर दी और उनके सिर काटकर मुगल बादशाह के पास भेज दिये। शाहजहाँ ने जुझारसिंह के परिवार के साथ अत्यंत बुरा व्यवहार किया। जीवित पकड़ी गई राजपूत महिलाओं को शाही हरम तथा अमीरों के घरों में सेवा करने के लिए बाध्य किया गया।

जुझारसिंह के दो पुत्रों और एक पौत्र को मुसलमान बनाया गया। जब जुझारसिंह के एक पुत्र उदयभान तथा जुझारसिंह के मंत्री श्याम ने मुसलमान बनने से मना किया तो उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद शाहजहाँ ने ओरछा में प्रवेश किया। इस अवसर पर वीरसिंह के विशाल मन्दिर को ध्वस्त करके उसके स्थान पर एक मस्जिद बनवाई गई।

शाहजहाँ की दक्षिण नीति

शाहजहाँ कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसे दक्षिण के शिया राज्यों से बड़ी घृणा थी। ये राज्य मुगल सल्तनत के विद्रोहियों की शरणस्थली बन जाते थे। शाहजहाँ ने स्वयं अपने पिता के विरुद्ध जब विद्रोह किया था तब दक्षिण में ही शरण पाने का प्रयत्न किया था। मरहठों को भी, जो मुगल साम्राज्य पर छापा मारा करते थे, इन राज्यों से बड़ी सहायता मिलती थी।

शाहजहाँ को दक्षिण के राज्यों की सैनिक स्थिति का पूरा ज्ञान प्राप्त था। इन दिनों दक्षिण में तीन प्रधान राज्य थे- अहमदनगर, बीजापुर तथा गोलकुण्डा। इन राज्यों की दशा बड़ी शोचनीय थी। योग्य शासकों के अभाव में इन राज्यों में अस्थिरता व्याप्त थी। उनके साथ किये गये किसी समझौते पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता था।

इस कारण शाहजहाँ ने इन राज्यों को नष्ट करने का निर्णय लिया। 1629 ई. में शाहजहाँ ने शाही सेना का संचालन करने के लिए अबुल हसन तथा आजम खाँ आदि अधिकारियों को नियुक्त किया। प्रधानमंत्री आसफखाँ की भी दक्षिण में नियुक्ति कर दी गई और बादशाह ने स्वयं बुरहानपुर में जाकर अपना पड़ाव डाला।

अहमदनगर अभियान

मुगल सेनाओं ने सबसे पहले अहमदनगर पर आक्रमण किया क्योंकि विद्रोही खान-ए-जहाँ अहमदनगर में शरण लिये हुए था। जब शाही सेना ने अहमदनगर पर आक्रमण किया तो खान-ए-जहाँ पंजाब की ओर चला गया किंतु मुगल सेना ने अहमदनगर के विरुद्ध युद्ध जारी रखा। इन दिनों अहमदनगर की दशा अत्यंत शोचनीय थी।

अहमदनगर का शासक मुर्तजाखाँ एक निर्बल शासक था। उसके राज्य में दलबन्दी चरम पर थी। उसने अपने प्रभावशाली मराठा जागीरदार जादो रास की हत्या करवा दी थी। इस कारण जगदेव, शाहजी भोंसले तथा मालोजी जैसे प्रभावशाली मराठा सरदार मुर्तजाखाँ को छोड़कर मुगलों से जा मिले।

मुर्तजा खाँ के बहुत से मुसलमान अमीर भी अप्रसन्न होकर अहमदनगर से चले गये और उन्होंने शाही सेना में नौकरी कर ली। इन्हीं दिनों दक्षिण में भयंकर अकाल पड़ा जिससे राज्य में भोजन तथा चारे की कमी हो गई।

इन्हीं विषम परिस्थितियों में मुगल सेना ने कई दिशाओं से अहमदनगर पर आक्रमण किया। 1630 ई. में अबुल हसन ने अहमदनगर की सेना को परास्त करके नगर को लूट लिया। आजम खाँ ने धरवर पर अधिकार कर लिया। वह दौलताबाद के सुदृढ़ दुर्ग पर भी घेरा डालने की योजना बना रहा था किंतु अकाल पड़ जाने के कारण वह ऐसा न कर सका। बीजापुर प्रकटतः अहमदनगर की सहायता कर रहा था। इस कारण आजम खाँ ने परेन्दा के दुर्ग पर आक्रमण किया किंतु असफल होकर अपनी छावनी को लौट गया।

इन्ही दिनों अहमदनगर में अबीसीनिया वालों की सहायता प्राप्त करने के लिये मलिक अम्बर के पुत्र फतेह खाँ को कैदखाने से मुक्त करके उसे प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त कर दिया गया परन्तु इसके परिणाम अच्छे नहीं हुए। मुकर्रबखाँ, जो मुगलों का घोर विरोधी था, अहमदनगर के शासक से नाराज होकर मुगलों से जा मिला। मुगलों ने उसका स्वागत किया और उसे रूस्तमखाँ की उपाधि से पुरस्कृत किया।

फतेह खाँ की स्वामिभक्ति भी संदिग्ध ही रही। वह भी मुगलों से मिल गया। उसने मुर्तजाखाँ को विष दिलवाकर उनकी हत्या करवा दी और उसके दस वर्षीय पुत्र को अहमदनगर के तख्त पर बैठा दिया। फतेहखाँ ने शाहजहाँ को विपुल धन तथा हाथी भेंट के रूप में भिजवाये तथा शाहजहाँ के नाम से खुतबा पढ़वाकर उसके नाम की मुद्राएँ चलवाईं।

इससे शाहजहाँ संतुष्ट हो गया। 7 जून 1631 को शाहजहाँ की बेगम मुमताज की मृत्यु हो गई। इस कारण कुछ समय के लिये शाहजहाँ की दक्षिण में रुचि समाप्त हो गई। उसने अनुभव किया कि अहमदनगर की विजय का काम पूरा हो गया था। अतः मार्च 1632 में उसने बुरहानपुर से आगरा के लिए प्रस्थान कर दिया।

शाहजहाँ और फतेह खाँ का समझौता बहुत दिनों तक नहीं टिका। शाहजहाँ ने उन मराठा सरदारों को अपनी सेवा में रख लिया था, जिनसे फतेह खाँ की शत्रुता थी। इसलिये फतेहखाँ ने मुगलों से अंसतुष्ट होकर मुगलों के विरुद्ध बीजापुर के सुल्तान से गठबन्धन कर लिया।

इस कारण दक्षिण के गवर्नर महाबत खाँ ने मार्च 1633 में अहमदनगर पर आक्रमण कर दिया तथा अम्बरकोट, महाकोट, दौलताबाद आदि दुर्गों पर अधिकार जमा लिया। फतेहखाँ को आत्मसमर्पण करना पड़ा। सितम्बर 1633 में फतेह खाँ तथा अहमदनगर के अन्तिम सुल्तान हुसैनशाह को शाहजहाँ के पास आगरा भेज दिया गया।

शाहजहाँ ने फतेह खाँ को दो लाख रुपये सालाना की पेन्शन देकर उसकी सारी जायदाद लौटा दी। हुसैनशाह को ग्वालियर भेज दिया गया और अहमदनगर को मुगल सल्तनत में मिला लिया गया।

बीजापुर अभियान

बीजापुर का सुल्तान मुहम्मद आदिलशाह कभी मुगलों के पक्ष में हो जाता था और कभी उनका विरोध करने लगता था। 1631 ई. में शाहजहाँ ने आसफखाँ को बीजापुर पर आक्रमण करने की आज्ञा दी किंतु आसफ खाँ बीजापुर के विरुद्ध सफल नहीं हुआ।

इस पर शाहजहाँ ने आसफ खाँ को दक्षिण से वापस बुला लिया और उसके स्थान पर महाबतखाँ को भेज दिया। महाबतखाँ ने पहले अहमदनगर को पराजित किया और उसके बाद बीजापुर पर आक्रमण किया। परेन्दा के दुर्ग का घेरा डाल दिया गया परन्तु मुगल अफसरों के आपसी झगड़ों के कारण तथा रसद की कमी होने के कारण घेरा उठा लेना पड़ा। 1634 ई. में महाबतखाँ की मृत्यु हो गई और शाहजहाँ को दक्षिण में नई व्यवस्था करनी पड़ी।

इन दिनों दक्षिण में मुगलों का सबसे घोर विरोधी शाहजी भोंसले नामक मराठा सरदार था। यद्यपि उसने शाहजहाँ द्वारा दिया गया मनसब स्वीकार कर लिया था परन्तु जब शाहजहाँ ने उसकी जागीर का कुछ हिस्सा फतेहखाँ को दे दिया तब उसने शाहजहाँ का मनसब त्यागकर बीजापुर के सुल्तान के यहाँ नौकरी कर ली।

शाहजहाँ ने शाहजी भौंसले तथा बीजापुर के सुल्तान दोनों को दण्डित करने का निश्चय किया। मुगल सेना ने तीन ओर से बीजापुर पर आक्रमण किया। बीजापुर के लिए इस भयंकर आक्रमण का सामना करना सम्भव नहीं था। इसलिये शाहजी भौंसले बीजापुर से भाग खड़ा हुआ और बीजापुर के सुल्तान ने मुगलों की अधीनता स्वीकर कर ली।

उसने मुगल बादशाह को बीस लाख रुपये की पेशकश दी तथा यह वचन दिया कि गोलकुण्डा के विरुद्ध किसी प्रकार की सैनिक कार्यवाही नहीं करेगा और न अहमदनगर में किसी के उत्तराधिकार का समर्थन करेगा। उसने यह भी जिम्मेदारी ली कि यदि शाहजी भौंसले जुन्नर तथा त्रिम्बक के दुर्गों को समर्पित नहीं करेगा तो वह उसका दमन करेगा।

इस सन्धि के बाद बीजापुर के सुल्तान ने अपनी शक्ति को बढ़ाना आरम्भ किया तथा कर्नाटक में अपने राज्य का विस्तार किया। 1656 ई. में बीजापुर केे सुल्तान मोहम्मद आदिलशाह की मृत्यु हो गई और उसके स्थान पर उसका कथित पुत्र अली आदिलशाह सुल्तान बना।

मुहम्मद आदिलशाह के कोई पुत्र नहीं था। जब शाहजहाँ को इसकी सूचना मिली तब उसने बीजापुर की शक्ति को नष्ट करने के लिये बीजापुर पर तीन आरोप लगाये- (1.) कर के बकाया होने का, (2.) गोलकुण्डा को सैनिक सहायता देने का और

(3.) कर्नाटक के मीर जुमला की जायदाद में हस्तक्षेप करने का। इसके बाद बादशाह ने शहजादे औरंगजेब को बीजापुर पर आक्रमण करने भेजा और मीर जुमला तथा शाइस्ताखाँ को उसकी सहायता के लिए भेजा।

1657 ई. में मुगल सेना ने दक्षिण के लिये अभियान किया। सबसे पहले उसने बीदर के दुर्ग पर अधिकार किया। इसके बाद कल्याणी के दुर्ग पर भी उसका अधिकार हो गया। मुगल सेना ने आगे बढ़कर बीजापुर का घेरा डाला। युद्ध चलता रहा परन्तु साथ ही साथ सन्धि की वार्ता भी आरम्भ की गई।

अन्त में दोनों पक्षों में समझौता हो गया जिसके अनुसार बीजापुर का सुल्तान एक लाख वार्षिक कर देने को तैयार हो गया। बीदर, कल्याणी तथा परेन्दा के दुर्ग तथा कुछ अन्य भू-भाग भी बादशाह को मिल गये। इस पर बादशाह ने औरंगजेब को युद्ध बन्द करके बीजापुर से मुगल सेना को हटा लेने और मीर जुमला को दिल्ली भेज देने का आदेश दिया। औरंगजेब ने इन आदेशों का पालन किया।

गोलकुण्डा अभियान

जहाँगीर के समय से ही गोलकुण्डा तथा मुगलों के बीच मनोमालिन्य चल रहा था क्योंकि गोलकुण्डा के सुल्तान ने सदैव मुगल साम्राज्य के विरुद्ध मलिक अम्बर की सहायता की थी। जिस समय शाहजहाँ ने अपने पिता के शासन काल में विद्रोह किया था उस समय उसे भी गोलकुण्डा में शरण दी गई थी।

जब बीजापुर तथा अहमदनगर ने मुगलों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाया तब गोलकुण्डा इस गुट से अलग रहा इसलिये मुगलों ने उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की परन्तु गोलकुण्डा का सुल्तान मुगल बादशाह को पेशकश या कर देने को तैयार नहीं था और न उसकी अधीनता स्वीकार करने को तैयार था।

शाहजहाँ ने गोलकुण्डा के सुल्तान को आदेश दिये कि वह शाहजहाँ के नाम से खुतबा पढ़वाये तथा शाहजहाँ के नाम की मुद्राएँ चलवाये। शाहजहाँ ने उससे बहुत बड़ी पेशकश की भी माँग की और अपनी सेना को गोलकुण्डा की सीमा पर नियुक्त कर दिया। इस पर गोलकुण्डा के सुल्तान अब्दुल्ला कुतुबशाह ने भयभीत होकर शाहजहाँ की समस्त मांगों को स्वीकार कर लिया। इसके बदले में शाहजहाँ ने बीजापुर तथा मराठों के आक्रमणों से गोलकुण्डा की रक्षा करने का वचन दिया।

जब औरंगजेब दक्षिण का गवर्नर नियुक्त हुआ तब गोलकुण्डा तथा मुगलों में फिर से युद्ध प्रारम्भ हो गया। गोलकुण्डा ने बहुत दिनों से कर नहीं दिया था। औरंगजेब ने उससे कर माँगा। इसके अतिरिक्त गोलकुण्डा के सुल्तान ने कर्नाटक के हिन्दू राजा पर आक्रमण कर दिया था।

कर्नाटक के राजा ने मुगल बादशाह से रक्षा करने की याचना की और बदले में बड़ी धन राशि देने और इस्लाम स्वीकार करने का वचन दिया परन्तु समय पर राजा की सहायता नहीं हो सकी और उसका राज्य समाप्त हो गया। इससे शाहजहाँ को बड़ी चिन्ता हुई। इसी समय गोलकुण्डा का प्रधानमंत्री मीर जुमला शाहजहाँ की शरण में आ गया। मीर जुुमला मूलतः फारस का रहने वाला था। वह योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था।

अपनी प्रतिभा के बल पर वह गोलकुण्डा राज्य का प्रधानमंत्री बन गया। उसने कर्नाटक के कुछ भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और उसे अपनी निजी सम्पत्ति बना लिया। इससे गोलकुण्डा का सुल्तान अप्रसन्न हो गया तो मीर जुमला मुगलों से मिल गया और शाहजहाँ ने उसे अपना संरक्षण दे दिया।

इन सब कारणों से शाहजहाँ ने औरंगजेब को गोलकुण्डा पर आक्रमण करने का आदेश दिया। औरंगजेब ने अपने पुत्र मुहम्मद की अध्यक्षता में एक सेना गोलकुण्डा पर आक्रमण करने भेजी। औरंगजेब स्वयं भी एक सेना के साथ गोलकुण्डा पहुँचा और उसका घेरा डाल दिया।

गोलकुण्डा का सुल्तान घबरा गया परन्तु शाहजादी जहाँआरा के कहने से शाहजहाँ द्वारा यह युद्ध रोक दिया गया। फिर भी शाहजहाँ के उद्देश्य की पूर्ति हो गई। उसे गोलकुण्डा के सुल्तान से बकाया कर मिल गया। मीर जुमला की कर्नाटक की जागीर भी बादशाह को मिल गई। औरंगजेब के पुत्र मुहम्मद का विवाह गोलकुण्डा के सुल्तान की कन्या से हो गया। इस प्रकार गोलकुण्डा राज्य की रक्षा हो गई।

शाहजहाँ की मध्य एशिया नीति

तैमूर लंग ने मध्य एशिया के काफी बड़े हिस्से पर अधिकार किया था। इसलिये उसके वंशज मध्य एशिया को अपना पैतृक राज्य समझते थे और उस पर अधिकार जमाने के लिये लालायित रहते थे। शाहजहाँ से पहले के मुगल बादशाह भारत के भीतर ही समस्याओं में उलझे रहे इस कारण उन्हें मध्य एशिया की ओर ध्यान देने का अवसर नहीं मिला।

शाहजहाँ ने उत्तर तथा दक्षिण भारत में जो अभूतपूर्व सफलताएँ प्राप्त कीं उनसे उसका उत्साह बढ़ गया और वह मध्य एशिया पर अधिकार स्थापित करने के लिए लालायित हो उठा। उधर उजबेग भी काबुल तथा कन्दहार पर दृष्टि लगाये रहते थे। बल्ख तथा बदख्शाँ काबुल तथा मध्य एशिया के बीच में पड़ते थे। काबुल, मुगल सल्तनत का एक अंग था। अतः मध्य एशिया में पहुँचने के लिए बल्ख तथा बदख्शाँ पर अधिकार करना आवश्यक था।

मध्य एशिया अभियान की विफलता

1641 ई. में शाहजहाँ को मध्य एशिया पर आक्रमण करने का अवसर प्राप्त हो गया। इस वर्ष बल्ख के गवर्नर नजर मुहम्मद ने अपने बड़े भाई इमामकुली खाँ को हटाकर समरकन्द के तख्त पर अधिकार कर लिया। इससे मध्य एशिया में हलचल मच गई। शाहजहाँ ने इस अवसर से लाभ उठाने के लिये शहजादे मुराद तथा अली मर्दान खाँ की अध्यक्षता में एक सेना भेजी।

इस सेना ने बल्ख तथा बदख्शाँ पर अधिकार कर लिया किंतु शाहजादा मुराद इससे आगे बढ़ने को तैयार नहीं हुआ इसलिये मुगल सेना वहाँ से हिन्दुस्तान लौट आई। इसके बाद शाहजहाँ ने शाहजादा औरंगजेब को एक विशाल सेना के साथ मध्य एशिया अभियान पर भेजा।

औरंगजेब को प्रारम्भ में कुछ सफलता मिली परन्तु मध्य एशिया में अकाल पड़ जाने से रसद की कमी पड़ने लगी। उजबेगों ने छापामार रणनीति का प्रयोग करके मुगलों को छकाना आरम्भ कर दिया। औरंगजेब उजबेगों के विरुद्ध कुछ नहीं कर सका और वह बल्ख का प्रभार कासिम खाँ को सौंपकर अक्टूबर 1647 में काबुल के लिए रवाना हो गया। इस प्रकार शाहजहाँ की मध्य एशिया योजना असफल रही। दोनों पक्षों की धन तथा जन की भारी क्षति हुई तथा किसी भी पक्ष को लाभ नहीं हुआ।

कन्दहार अभियान की विफलता

कन्दहार जहाँगीर के शासन काल में मुगलों के हाथ से निकलकर फारस के अधिकार में चला गया था। इन दिनों अली मर्दान खाँ फारस के शाह अब्बास (द्वितीय) की ओर से कन्दहार पर शासन कर रहा था। कुछ कारणों से शाह अब्बास, अली मर्दान खाँ से अप्रसन्न हो गया और उसने अली मर्दान खाँ को हटाकर नया सूबेदार नियुक्त कर दिया।

इससे पहले कि नया गवर्नर कन्दहार पहुँचे, अली मर्दान खाँ ने कन्दहार का अधिकार फरवरी 1638 में मुगलों को सौंप दिया। शाहजहाँ ने अली मर्दानखाँ को 6,000 का मनसब प्रदान करके काश्मीर का गवर्नर बना दिया। कन्दहार की सुरक्षा के लिये एक विशाल सेना भेजी गई।

फारस का शाह कन्दहार को छोड़ने के लिये तैयार नहीं था। इसलिये कन्दहार को फिर से जीतने का प्रयास आरम्भ हो गया। शाह अब्बास (द्वितीय) ने एक विशाल सेना कन्दहार पर आक्रमण करने के लिए भेजी। 16 सितम्बर 1648 को फारस की सेना ने कन्दहार का घेरा डाल दिया।

मुगल सूबेदार दौलत खाँ दुर्ग की रक्षा नहीं कर सका। उसने 11 फरवरी 1649 को दुर्ग शाह अब्बास को समर्पित कर दिया। शाहजहाँ ने पहले औरंगजेब को और बाद में दारा को कन्दहार पर पुनः विजय प्राप्त करने के लिये भेजा परन्तु मुगल सेनाओं को सफलता नहीं मिल सकी और कन्दहार सदैव के लिए मुगलों के हाथ से निकल गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – शाहजहाँ

शाहजहाँ

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

उत्तराधिकार का युद्ध

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

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शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध मुस्लिम इतिहासकारों की दृष्टि में शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध मध्यकालीन इतिहास का स्वर्णयुग था जबकि हिन्दू इतिहासकार उसके शासन प्रबन्ध को मजहबी कट्टरता से परिपूर्ण मानते हैं।

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

शाहजहाँ ने बादशाह बनने के पहले से ही अपनी योग्यता का परिचय देकर ख्याति अर्जित कर ली थी। वह अपने आचरण तथा व्यवहार में अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान रखता था। वह सोच-समझकर बोलता था तथा कर्त्तव्य को नहीं भूलता था। जब तक उसका स्वास्थय अच्छा रहा, तब तक वह राज्य के समस्त कार्यों को स्वयं देखता रहा।

किसी भी अधिकारी या शाहजादे का साहस नहीं था कि वह बादशाह की आज्ञा की अवहेलना करे। जब उसका स्वास्थ्य बिगड़ गया तब उसने शासन का कार्य अपने योग्यतम पुत्र दारा के हाथों में सौंप दिया। इस प्रकार उसके शासन काल को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है- (1) जब तक शाहजहाँ का स्वास्थ्य अच्छा था, तब तक वह स्वयं शासन करता रहा, (2) जब शाहजहाँ बीमार पड़ गया, केन्द्रीय शासन पूर्णतः दारा के हाथों में चला गया।

शासन का मूल ढांचा

शाहजहाँ की शासन व्यवस्था का ढाँचा मूलतः वही था जो अकबर के शासन काल में स्थापित हुआ था। मनसबदारी प्रथा पूर्ववत् बनी रही परन्तु अकबर द्वारा हटाई गई जागीर प्रथा को शाहजहाँ ने फिर से लागू कर दिया था। शाहजहाँ का दण्ड विधान बड़ा कठोर था। अपराधियों को प्रायः अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था।

शाहजहाँ के शासन प्रबन्ध के सम्बन्ध में खाफीखाँ ने लिखा है- ‘तैमूर के वंशजों में कोई भी ऐसा शासक नहीं हुआ जो संगठन के कार्य में, कोष की वृद्धि करने में, देश की व्यवस्था करने में, अफसरों तथा सैनिकों की योग्यता को मान्यता देने में शाहजहाँ की बराबरी कर सके।’

उसके शासन काल में सल्तनत में शान्ति बनी रही। किसानों की भलाई का ध्यान रखा जाता था। अत्याचारी सूबेदारों को जनता द्वारा शिकायत करने पर हटा दिया जाता था। यदि कर वसूल करने वाले प्रजा के साथ क्रूरता का व्यवहार करते थे तो उन्हें कठोर दण्ड दिया जाता था।

जन साधारण की दशा

शाहजहाँ के शासन काल में बनवाई गई इमारतों से अनुमान होता है कि सल्तनत की प्रजा धन-सम्पन्न तथा सुखी रही होगी परन्तु प्रजा की स्थिति सन्तोषजनक नहीं थी। विदेशी यात्रियों के विवरण के अनुसार प्रान्तीय गवर्नर प्रजा के साथ बड़ी क्रूरता का व्यवहार करते थे।

किसानों की दशा

अकबर के शासन काल में उपज का केवल एक तिहाई भाग लगान के रूप में वसूल किया जाता था किंतु शाहजहाँ के काल में उपज का आधा हिस्सा सरकारी लगान के रूप में लिया जाने लगा। इसके साथ ही कृषि की उन्नति तथा उपज बढ़ाने का प्रयत्न किया गया।

कृषि कार्य से विमुख रहने वाले तथा काम से बचने वाले किसानों को कोड़े लगाये जाते थे। यदि अकाल पड़ने से कृषि नष्ट हो जाती थी तो सरकार की ओर से किसानों की सहायता की जाती थी। शाहजहाँ के शासन काल में किसानों की दशा उतनी अच्छी नहीं थी जितनी अकबर के शासन काल में थी।

शासन कार्य का बंटवारा

सैद्धांतिक रूप से शाहजहाँ का शासन स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था तथा शासन की समस्त शक्तियाँ बादशाह के नियंत्रण में थी परन्तु व्यावहारिक रूप में अधिकारियों की एक लम्बी चौड़ी फौज सल्तनत के विभिन्न भागों का शासन चलाती थी। शाहजहाँ ने सल्तनत के विभिन्न भागों का प्रबन्ध अपने पुत्रों को सौंप दिया था, ताकि वहाँ शान्ति एवं व्यवस्था बनी रहे।

उसने शुजा को बंगाल तथा बिहार का, औरंगजेब को दक्षिण का और मुराद को मालवा तथा गुजरात का गवर्नर बनाया। दारा को वह अपने पास रखता था जो केन्द्रीय शासन चलाने में बादशाह की सहायता करता था। तख्त की कामना रखने वाले शहजादों को दूरस्थ प्रान्तों का सूबेदार बनाना शाहजहाँ की बहुत बड़ी भूल थी।

राजधानी से दूर तथा बादशाह के नियंत्रण से परे रहकर शहजादों को अपनी शक्ति तथा महत्वाकांक्षाएं विस्तारित करने का अवसर मिल गया। अन्त में इन शहजादों ने शाहजहाँ के जीते जी ही उसकी सल्तनत पर कब्जा कर लिया।

धार्मिक असहिष्णुता की नीति

शाहजहाँ ने अपने पितामह अकबर की उदार तथा धार्मिक सहिष्णुता की नीति को त्याग दिया। जहाँगीर के शासन काल में जो धार्मिक कट्टरता आरम्भ हुई थी वह शाहजहाँ के काल में और आगे बढ़ी। उसने कई ऐसे कार्य किये जो धर्मान्धता की श्रेणी में आते थे।

1614 ई. में उसने आदेश दिया कि जहाँगीर के शासन काल में जिन मन्दिरों का निर्माण आरम्भ किया गया था, उन्हें गिरा दिया जाये। इस आदेश पर केवल बनारस में ही 76 मन्दिरों को तोड़ा गया। शाहजहाँ की आज्ञा से बुन्देलखण्ड के हिन्दू मन्दिर तुड़वाये गये और जुझारसिंह के पुत्रों को मुसलमान बनाया गया।

शाहजहाँ की धार्मिक कट्टरता के और भी बहुत से उदारहण हैं किंतु बाद में शाहजहाँ के धार्मिक विचार बदल गये और उसमें उदारता आ गई। उसने मन्दिरों को तोड़ने और हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की नीति का त्याग कर दिया। शाहजहाँ के राज्य में कई हिन्दू बड़े पदों पर आसीन थे और उन्हें दरबार में सम्मान प्राप्त था।

यदि शाहजहाँ इस नीति का अनुसरण नहीं करता तो उसे हिन्दू राजाओं का समर्थन प्राप्त नहीं हुआ होता। अनेक हिन्दू राजाओं ने सल्तनत की सुरक्षा में विपुल योग दिया और अपने प्राणों की बाजी लगा दी। शाहजहाँ के पुत्र दारा में धार्मिक सहिष्णुता का जो भाव था उससे भी अनुमान लगाया जा सकता है कि शाहजहाँ ने अपने शासन काल की धार्मिक कट्टरता को बाद में त्याग दिया था।

यही कारण है कि शाहजहाँ के शासन में संस्कृत साहित्य की उन्नति हुई। आसफखाँ तथा दारा, संस्कृत साहित्य एवं ग्रन्थों के आश्रयदाता थे। राजदरबार में हिन्दी तथा संस्कृत के कवियों का भी आदर होता था। ग्वालियर के रहने वाले एवं ब्रजभाषा के कवि सुन्दरदास, शाहजहाँ के दरबार में रहते थे।

हिन्दी के कवि चिन्तामणि को भी शाहजहाँ का संरक्षण प्राप्त था। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शाहजहाँ में धार्मिक सहिष्णुता एवं धार्मिक कट्टरता दोनों के बीज विद्यमान थे जिनमें से धार्मिक सहिष्णुता का गुण दारा ने अपना लिया और धार्मिक कट्टरता का गुण औरंगजेब ने अपना लिया।

भवन निर्माण

शाहजहाँ के काल में बने भवनों में अलंकरण की प्रचुरता है। इनमें मूल्यवान् रत्नों और पत्थरों का प्रचुर उपयोग हुआ है। आगरा के दुर्ग में बलुवा पत्थर के जो राजभवन बने हुए थे उन्हें शाहजहाँ ने गिरवाकर पुनः संगमरमर से बनवाया। शाहजहाँ की सबसे अधिक शानदार इमारत ताजमहल है जो वास्तव में एक मकबरा है।

इसमें शाहजहाँ तथा मुमताज महल की कब्रें स्थित हैं। ताजमहल आगरा में यमुना नदी के तट पर स्थित है। इसका निर्माण शाहजहाँ ने मुमताज महल की स्मृति में, उसके मरने के बाद 1632 ई. में आरम्भ किया था। ताजमहल 1654 ई. में बनकर पूरा हुआ। इसे बनवाने में बाईस वर्ष का समय और तीस करोड़ रुपये लगे। यह श्वेत संगमरमर से निर्मित है। इसकी गणना विश्व के सुंदरतम भवनों में होती है।

ताज महल की प्रशंसा करते हुए एल्फिन्स्टन ने लिखा है- ‘सामग्री की सम्पन्नता, चित्र के वैचित्र्य तथा प्रभाव में इसकी समता करने वाला यूरोप अथवा एशिया में दूसरा मकबरा नहीं है। आगरा में शाहजहाँ की बनवाई इमारतों में दीवाने-आम, दीवाने-खास, समन-बुर्ज, मोती मस्जिद आदि मुख्य हैं।

मोती मस्जिद की प्रशंसा करते हुए सन्त निहालसिंह ने लिखा है- ‘इसकी डिजाइन ऐसी कारीगरी द्वारा बनाई गई थी जिसमें यह कौशल था कि यह आत्मा के भौतिक बन्धनों से निकल जाने के संघर्ष को प्रस्तर में प्रदर्शित कर दे।’

दिल्ली की इमारतों में दीवाने-खास सर्वाधिक अलंकृत है। शाहजहाँ की बनवाई हुई दिल्ली की इमारतों में जामा-मस्जिद सबसे विशाल है।

दिल्ली के दुर्ग के भीतर की इमारतें की प्रशंसा करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘दिल्ली दुर्ग के भीतर की इमारतें अत्यधिक अलंकृत थीं और चीन की कला के लिए स्पर्धा की चीज बन गई थीं।’

शाहजहानाबाद की अली मस्जिद तथा शाहजहानाबाद का दुर्ग भी शाहजहाँ की श्रेष्ठ कृतियों में से है। शाहजहाँ का तख्ते ताऊस अर्थात् मयूर सिंहासन अपने समय की अद्भुत रचना है। यह सिंहासन सात वर्षों में लगभग चार करोड़ रुपयों से बना था। यह सिंहासन मयूरों के ऊपर खड़़ा था और रत्नों से जगमगाता रहता था।

शाहजहाँ की इस अमूल्य कृति को नादिरशाह फारस उठा ले गया था। शाहजहाँ के दलबादल नामक शिविर से भी उसकी शान का पता लगता है। उसे खड़ा करने में कई हजार आदमी और हाथियों की आवश्यकता पड़ती थी और लगभग दो महिने का समय लगता था। शाहजहाँ ने दिल्ली, लाहौर तथा कश्मीर में उपवन बनवाये थे जो उसके काल के मुगलिया वैभव को प्रदर्शित करते थे।

अनेक इतिहासकारों ने शाहजहाँ के शासन काल को स्वर्णयुग की संज्ञा दी है परन्तु अन्य कई विद्वान शाहजहाँ के शासन काल को स्वर्णयुग नहीं मानते। उनके अनुसार शाहजहाँ के काल का न तो आरम्भ अच्छा था, न मध्य अच्छा था और न अन्त ही अच्छा था।

क्या शाहजहाँ का शासन स्वर्णकाल था?

जो विद्वान शाहजहाँ के शासन काल को स्वर्ण युग मानते हैं वे अपने मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क देते हैं-

(1.) शाहजहाँ का शासन काल मुगल साम्राज्य के चूड़ान्त विकास का काल था जिसके अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों में उन्नति हुई।

(2.) शाहजहाँ ने अपने पूर्वजों से प्राप्त सल्तनत को न केवल सुरक्षित रखा अपितु उसमें वृद्धि भी की।

(3.) शाहजहाँ का शासन काल पूर्ण शान्ति तथा सुव्यवस्था का काल था। उसके शासन काल में दो-चार विद्रोह हुए परन्तु ये विद्रोह बादशाह के अत्याचार अथवा कुशासन के विरुद्ध नहीं होकर महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों की स्वार्थ सिद्धि के उद्देश्य से किये गये थे। बादशाह इन विद्रोहों के दमन करने में रूप से सफल रहा।

(4.) शाहजहाँ अपने शासन को सुचारू रूप से चलाने में इतना सक्रिय तथा संलग्न रहता था कि उत्तराधिकार के युद्ध के पूर्व किसी को भी उसकी शक्ति को चुनौती देने का साहस नहीं हुआ। उसकी रुग्णावस्था के कारण ही उसके शासन काल के अन्तिम भाग में विशृंखलता आरम्भ हुई।

(5.) शाहजहाँ का दण्ड विधान कठोर था परन्तु उस काल में अमीरों, सरकारी कर्मचारियों तथा प्रांतपतियों के षड्यन्त्रों, विद्रोहों तथा अत्याचारों को रोकने के लिए कठोर दण्ड विधान की ही आवश्यकता थी।

(6.) शाहजहाँ न्यायप्रिय बादशाह था। अपराधियों को दण्ड देने में संकोच नहीं करता था। कर्त्तव्य भ्रष्ट तथा अत्याचारी अधिकारियों को वह दण्ड दिया करता था, ताकि प्रजा के साथ किसी प्रकार का अन्याय न हो।

(7.) शाहजहाँ का शासन काल समृद्धि का काल था। यही कारण है कि इस अवधि में अनेक भव्य भवनों का निर्माण हो सका। उसके द्वारा निर्मित ताजमहल विश्व के सात आश्चर्यों में गिना जाता है। मोती मस्जिद, अली मस्जिद तथा शाजहानाबाद का दुर्ग आज भी शाहजहाँ के काल की गौरव गाथा कह रहे हैं। ये रचनाएं शाहजहाँ के शासन काल को स्वर्ण युग सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।

(8.) दिल्ली, लाहौर तथा काश्मीर में इस काल में जो मनोरम उपवन बनाये गये वे भी उस काल के गौरव के द्योतक हैं।

(9.) शाहजहाँ का दरबार शानो-शौकत का जीता जागता नमूना था। वह अपने दरबार की भव्यता को बनाये रखने के लिये सदैव प्रयत्न करता रहता था। शाहजहाँ के काल में निर्मित तख्ते-ताऊस अद्भुत सिंहासन था जिसमें जड़े हुए रत्नों की ज्योति से विदेशी यात्रियों की आँखे चौंधिया जाती थीं।

(10.) उसके काल में कृषि तथा व्यापार की उन्नति से देश धन-धान्य से पूर्ण हो गया था। उसकी प्रजा ने सल्तनत की प्रतिष्ठा तथा गौरव को बढ़ाने में पूरा सहयोग दिया। भव्य-भवनों के निर्माण से हजारों श्रमिकों एवं कारीगरों को रोजगार मिल सका।

(11.) शाहजहाँ के शासन काल में साहित्य तथा कला की विशेष उन्नति हुई। डॉ. बनारसी प्रसाद सक्सेना ने लिखा है- ‘देश में शान्ति स्थापित हो जाने और बादशाह की व्यक्तिगत दिलचस्पी के फलस्वरूप साहित्य तथा कला के विकास को प्रोत्साहन मिला। दूर-दूर से कवि, दार्शनिक, विद्वान तथा कलाकार उसके दरबार में आश्रय पाने आते थे और प्रतिभा को बहुत कम निराश होना पड़ा था।’

(12.) शाहजहाँ के शासनकाल में फारसी, संस्कृत तथा हिन्दी आदि भाषाओं में उच्च कोटि के गद्य तथा पद्य ग्रन्थों की रचना हुई। डॉ. सक्सेना के अनुसार शाहजहाँ के शासनकाल में ही वह काल आता है जो हिन्दी साहित्य तथा भाषा का सबसे अधिक गौरवपूर्ण काल माना जाता है।

(13.) इस काल में संगीत तथा नृत्यकला की बड़ी उन्नति हुई। शाहजहाँ स्वयं अच्छा गवैया था। जे. एन. सरकार ने उसके संगीत की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘बहुत से शुद्ध आत्मा की सूफी और सन्त, जो संध्याकाल की गोष्ठियों में आते थे, अपने हृदयों को सांसारिकता से हटाकर शाहजहाँ के संगीत को सुनकर आनन्द विभोर हो जाते थे और अपने को भूल जाते थे।’

(14.) इस काल में चित्रकला की बड़ी उन्नति हुई। स्मिथ ने लिखा है- ‘शाहजहाँ के शासन काल में चित्रकला चरमोन्नति को प्राप्त हो गई।’

उपर्युक्त विवरण से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि शाहजहाँ का काल शान्ति तथा सुव्यवस्था और मुगल सल्तनत की चरमोन्नति का काल था। अतः शाहजहाँ के काल को स्वर्णयुग मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये।

क्या शाहजहाँ का शासन स्वर्ण काल नहीं था?

जो इतिहासकार शाहजहाँ के शासन काल को स्वर्ण युग नहीं मानते हैं वे अपने मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क देते हैं-

(1.) शाहजहाँ ने अपने पिता से विद्रोह करके तथा अपने भाई-भतीजों एवं अन्य निकट सम्बन्धियों की हत्या करके तख्त प्राप्त किया था। उसके इस घृणित कार्य से मुगलों की प्रतिष्ठा को भारी आघात लगा तथा मुगल राजनीति में ऐसी घृणित तथा विनाशकारी परम्परा का सूत्रपात हुआ जो आगे चलकर मुगल सल्तनत के लिए प्राण घातक सिद्ध हुई।

(2.) शाहजहाँ ने अपने शासन के प्रारम्भ में जिस अनुदारता तथा असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया, उसके परिणाम मुगल सल्तनत के लिए बड़े घातक सिद्ध हुए। अकबर की उदार नीति को त्याग देने से हिन्दू जनता, राज्य एवं बादशाह से उदासीन होने लगी। औरंगजेब के शासन काल में जब धार्मिक असहिष्णुता, चरम पर पहुँच गई तब मुगल सल्तनत पतनोन्मुख हो गई।

(3.) शाहजहाँ के शासन काल का मध्य भी अच्छा नहीं था। उसके शासन काल में मुगल सल्तनत अपने चूड़ान्त विकास को पहुँच गई। इस चरमोन्नति में ही उसके विनाश का बीजारोपण हो गया था।

(4.) आरम्भ में शाहजहाँ ने बड़ी सतर्कता तथा सावधानी से शासन किया परन्तु शासन काल के मध्य भाग में उसमें विलासिता तथा अकर्मण्यता आ गई। मुमताज महल के मरने के बाद उसकी विलासिता और वासनाएँ अनियंत्रित हो गईं। इस कारण सल्तनत को भारी आघात लगा। प्रान्तीय गवर्नरों को अपनी शक्ति बढ़ाने और षड्यन्त्र रचने का अवसर मिल गया और मुगल सल्तनत का बिखराव होने लगा।

(5.) शाहजहाँ की सीमा नीति के परिणाम अच्छे नहीं हुए। उसकी मध्य एशिया विजय की नीति पूरी तरह अव्यावहारिक तथा असफल सिद्ध हुई। इस कारण मुगल राज्य को जन तथा धन की बड़ी क्षति हुई।

(6.) शाहजहाँ कन्दहार को मुगल सल्तनत के अधीन नहीं रख सका। इस कारण मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा को धक्का लगा।

(7.) यद्यपि शाहजहाँ दक्षिण भारत में अपनी सल्तनत का विस्तार करने में सफल हुआ परन्तु दक्षिण नीति के अन्तिम परिणाम घातक सिद्ध हुए। विद्वानों की राय है कि मुगल सल्तनत की समाधि दक्षिण भारत के युद्धों में तैयार हुई।

(8.) शाहजहाँ के शासन काल का सम्पूर्ण गौरव उसके द्वारा निर्माण कराये गये भव्य भवनों पर आधारित है। इन भव्य भवनों के निर्माण में अपार सम्पत्ति व्यय की गई थी। यह सम्पत्ति अमीरों के धन को छीनकर, लूटमार करके, प्रजा पर अत्यधिक कर लगाकर संग्रहीत की गई थी। मजदूरों से प्रायः जबरदस्ती काम लिया जाता था।

(9.) बादशाह का राजसी वैभव चरम पर था किंतु प्रजा की दशा खराब थी। शाहजहाँ के शासन में दण्ड विधान कठोर था। विदेशी यात्रियों के विवरण से पता लगता है कि सड़कें सुरक्षित नहीं थीं। किसानों से उनकी उपज का आधा भाग ले लिया जाता था। लगान बड़ी कठोरता से वसूल किया जाता था। 

(10.) शाहजहाँ के शासन काल का अन्त भी अच्छा नहीं था। उसकी बीमारी के कारण सल्तनत में बिखराव आने लगा था। बादशाह की शक्ति के क्षय के साथ-साथ उसका नियंत्रण तथा अनुशासन भी ढीला पड़ने लगा। वह स्वयं शासन कार्य की उपेक्षा करने लगा जिससे शासन की वास्तविक शक्तियाँ दूसरे व्यक्तियों के हाथों में खिसकने लगी। जहाँआरा

(11.) शाहजहाँ अपने परिवार को संगठित तथा नियंत्रित नहीं रख सका। दारा तथा जहाँआरा पर उसका विशेष स्नेह होनेे से उसके अन्य पुत्र तथा पुत्रियाँ उससे अप्रसन्न थे। जहाँआरा दारा का और अन्य शहजादियाँ अपने अन्य भाइयों का समर्थन करने लगीं जिससे शाहजहाँ के परिवार में नित्य नये षड्यन्त्र तथा कुचक्र रचे जाने लगे। अंत में ये षड्यंत्र बादशाह तथा सल्तनत के लिएघातक सिद्ध हुए। शाहजहाँ के जीवन काल में ही शहजादों में उत्तराधिकार के लिए युद्ध आरम्भ हो गया इसका उत्तरदायित्व शाहजहाँ पर ही था। शाहजहाँ को अपने जीवन के अंतिम चार वर्ष बंदी के रूप में बिताने पड़े। उसे अनेक यातनाएँ तथा अपमान सहन करने पड़े।

(12.) उत्तराधिकार के युद्ध के कारण शाहजहाँ के जीवनकाल में ही उसके पुत्रों तथा पौत्रों की नृशंसतापूर्वक हत्याएँ हुईं। इस युद्ध के कारण औरंगजेब जैसा धर्मान्ध व्यक्ति मुगल सल्तनत का बादशाह बन गया, जिसकी दुर्नीति के फलस्वरूप जनता त्राहि-त्राहि करने लगी और मुगल सल्तनत पतनोन्मुख हो गई।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि शाहजहाँ के शासन काल का आदि, मध्य तथा अन्त कोई भी भाग सराहना के योग्य नहीं हैं। अतः उसके काल को स्वर्ण युग की संज्ञा देना ठीक नहीं हैं। शाहजहाँ के शासन काल के आलोचकों के कुछ विचार निम्नांकित हैं-

शाहजहाँ पर लगने वाले आरोपों का खण्डन

शाहजहाँ पर लगने वाले विभिन्न आरोपों का खण्डन करने के लिये विभिन्न विद्वान शाहजहाँ के समर्थन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं-

(1.) यह सत्य है कि शाहजहाँ ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह करके और अपने भाई-भतीजों की हत्या करके तख्त प्राप्त किया था परन्तु उन दिनों की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं थी। जहाँगीर पहले ही इस परम्परा की नींव रख चुका था।

(2.) शाहजहाँ अपने भाइयों में सर्वाधिक योग्य तथा महात्वाकंाक्षी था। उसके विरुद्ध निरंतर षड्यन्त्र चल रहे थे और उसके विरुद्ध बादशाह के कान भरे जा रहे थे इसलिये शाहजहाँ का विद्रोह करना स्वाभाविक था।

(3.) अपने समस्त प्रतिद्वन्द्वियों को सदैव के लिए अपने मार्ग से हटा देना शाहजहाँ की व्यावहारिक बुद्धि का परिचायक है। नैतिक दृष्टि से उसका यह कार्य भले ही निन्दनीय था परन्तु राजनीतिक दृष्टि से ठीक था।

(4.) शाहजहाँ स्वभाव से क्रूर अथवा रक्त पिपासु नहीं था। उसने केवल अपने मार्ग की बाधाएं हटाने तथा तख्त को निरापद बनाने के लिए ऐसा किया। नूरजहाँ के साथ उसने जो अच्छा व्यवहार किया वह सराहनीय है। उसने कभी भी निरर्थक हत्याकाण्ड नहीं कराया।

(5.) शाहजहाँ को अपने परिवार के सदस्यों से बड़ा स्नेह था। उसने अपने समस्त पुत्रों को समान रूप से योग्यता प्रदर्शित करने का अवसर दिया।

(6.) मुस्लिम राजनीति में उत्तराधिकार के नियम के अभाव के कारण शाहजहाँ के समस्त पुत्रों का तख्त प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना स्वाभाविक तथा अनिवार्य था। इसका उत्तरदायित्व शाहजहाँ पर नहीं डाला जा सकता।

(7.) शाहजहाँ ने उत्तराधिकार के युद्ध को रोकने के लिये हर संभव प्रयत्न किया। दारा तथा जहाँआरा पर शाहजहाँ का विशेष स्नेह हो जाना स्वाभाविक था क्योंकि वे दोनों उसकी सेवा करते थे और उसकी आज्ञा का पालन करते थे।

(8.) शाहजहाँ की मध्य एशिया नीति सफल नहीं रही परन्तु इस अभियान से मध्य एशिया में मुगलों का आतंक छा गया।

(9.) यद्यपि कन्दहार शाहजहाँ के हाथ से निकल गया परन्तु इससे मुगल साम्राज्य को विशेष क्षति नहीं हुई। इसकी पूर्ति दक्षिण विजय से हो गई थी।

(10.) शाहजहाँ पर धर्मान्धता का आरोप लगाना गलत है क्योंकि समस्त हिन्दू राजा अंत तक शाहजहाँ के पक्ष में बने रहे और सल्तनत की सुरक्षा करते रहे। शाहजहाँ का सबसे प्रिय शहजादा दारा, अत्यंत उदार तथा धर्म सहिष्णु था। ऐसी स्थिति में शाहजहाँ धर्मान्ध कैसे हो सकता था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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शाहजहाँ

शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

उत्तराधिकार का युद्ध

उत्तराधिकार युद्ध

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उत्तराधिकार युद्ध

शाहजहाँ के जीवित रहते हुए ही शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार युद्ध हुआ जिसमें औरंगजेब विजयी रहा और उसने शाहजहाँ को पकड़कर ताजमहल में कैद कर लिया।

सितम्बर 1657 में शाहजहाँ बीमार पड़ गया। वह 65 वर्ष का हो चुका था। वृद्धावस्था के कारण उसकी बीमारी में सुधार नहीं हुआ और उसकी दशा बिगड़ती चली गई। बीमारी के कारण शाहजहाँ ने दरबार में आना बंद कर दिया। इस कारण उसके बारे में तरह-तरह की अफवाहें फैलने लगीं और शाहजादों में तख्त प्राप्त करने की बेचैनी बढ़ गई। और उनमें उत्तराधिकार का युद्ध आरम्भ हो गया।

अमीरों का दल अपने-अपने उम्मीदवार को आगे बढ़ाने की जुगत करने लगा। हिन्दू चाहते थे कि कोई उदार एवं सहिष्णु प्रवृत्ति का शहजादा तख्त पर बैठे जबकि कट्टर पन्थी मुसलमान अमीर, कट्टर प्रवृत्ति के शहजादे को तख्त पर देखना चाहते थे।

जनता की बेचैनी दूर करने के लिये बादशाह दिन में कई बार ‘झरोखा दर्शन’ देने लगा और दरबार का आयोजन करके दारा को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। शाहजहाँ ने समस्त अमीरों को आज्ञा दी कि वे शहजादे दारा की आज्ञा का पालन करें। शाहजहाँ के इस कदम से शहजादों की बेचैनी और बढ़ गई।

शाहजहाँ के चार पुत्र थे- दारा, शुजा, औरंगजेब तथा मुराद। इनमें दारा सबसे बड़ा था। वह योग्य, उदार, विनम्र तथा दयालु स्वभाव का स्वामी था। शाहजहाँ उसे सर्वाधिक चाहता था तथा उसे अपने पास ही रखता था। राजधानी में रहने के कारण दारा, साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्र की समस्याओं से भी परिचित था।

उसे जितना अधिक प्रशासकीय अनुभव था, और किसी शहजादे को नहीं था। दारा प्रजा में भी लोकप्रिय था। हिन्दु प्रजा को दारा पर पूरा विश्वास था। दारा की कमजोरी यह थी कि उसे दूसरे शहजादों की भांति युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव नहीं था।

शाहजहाँ का दूसरा पुत्र शाहशुजा बंगाल का शासक था। वह बुद्धिमान, साहसी तथा कुशल सैनिक था परन्तु विलासी तथा अयोग्य था। उसमें इतने विशाल मुगल साम्राज्य को सँभालने की योग्यता नहीं थी। शाहजहाँ का तीसरा पुत्र औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। वह अत्यंत असहिष्णु तथा संकीर्ण विचारों का स्वामी था इस कारण उसे कट्टर मुसलमानों का समर्थन प्राप्त हो सकता था।

औरंगजेब को प्रान्तीय शासन तथा युद्धों का अच्छा अनुभव था। धूर्त तथा कुटिल होने के कारण वह अपनी पराजय को विजय में बदलना जानता था। इस समय वह दक्षिण का सूबेदार था। शाहजहाँ का चौथा तथा सबसे छोटा पुत्र मुराद गुजरात तथा मालवा का शासक था।

वह भावुक तथा जल्दबाज था। विलासी प्रवृत्ति का होने से उसमें दूरदृष्टि का अभाव था। वह जिद्दी तथा झगड़ालू प्रवृति का व्यक्ति था। उसमें प्रशासकीय प्रतिभा और सैनिक प्रतिभा की कमी होने पर भी बादशाह बनने की अत्यधिक इच्छा थी।

शाहजहाँ की लड़कियाँ भी उत्तराधिकार के इस युद्ध में भाग लेने लगीं। जहाँआरा दारा का, रोशनआरा औरंगजेब का और गौहरआरा मुराद का पक्ष ले रही थी। इस कारण राजधानी की समस्त खबरें गुप्त रूप से इन शहजादों के पास पहुँचती थीं। इनमें से कई खबरें अतिरंजित होती थीं।

शाहजहाँ तथा दारा ने निराधार खबरों को रोकने का प्रयत्न किया परन्तु इस कार्य में सफलता नहीं मिली। तब बादशाह ने अपनी मुहर तथा अपने हस्ताक्षर से शाहजादों के पास पत्र भेजना आरम्भ किया और उन्हें विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया कि वह जीवित तथा स्वस्थ है परन्तु कोई भी शाहजादा इन पत्रों पर विश्वास करने के लिये तैयार नहीं था।

हर शहजादा बादशाह को अपनी आँखों से देखना चाहता था परन्तु कोई भी शाहजादा अकेले अथवा थोड़े से अनुचरों के साथ राजधानी आने को तैयार नहीं था, क्योंकि उन्हें दारा से भय था। किसी भी शहजादे को अपनी समस्त सेना के साथ राजधानी में आने की अनुमति नहीं थी।

इस लिये विभिन्न पक्षों में संदेह और वैमनस्य बढ़ने लगा और और उनमें उत्तराधिकार का युद्ध की भूमिका तैयार हो गई। सद्भावना, विश्वास तथा धैर्य से ही  उत्तराधिकार के संभावित युद्ध को रोका जा सकता था परन्तु दुर्भाग्यवश शाहजादों में इन गुणों का नितांत अभाव था। शुजा, औरंगजेब तथा मुराद पत्र-व्यवहार द्वारा एक दूसरे के सम्पर्क में थे। उनमें सल्तनत के विभाजन के लिये समझौता हो गया। इन तीनों शाहजादों ने दारा की शक्ति को छिन्न-भिन्न करने का निश्चय किया।

उत्तराधिकार युद्ध

शुजा पर विजय

सबसे पहले शुजा ने स्वयं को बादशाह घोषित किया और दिल्ली की ओर कूच कर दिया। मार्ग में उसे किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। जनवरी 1658 में वह बनारस पहुँच गया। शुजा का मार्ग रोकने के लिये दारा ने अपने पुत्र सुलेमान शिकोह की अध्यक्षता में एक सेना भेजी।

राजा जयसिंह तथा दिलेरखाँ रूहेला को उसकी सहायता के लिए भेजा गया। बनारस के निकट बहादुरपुर नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में भीषण संग्राम हुआ जिसमें शुजा ने परास्त होकर सन्धि कर ली। इस सन्धि के अनुसार शुजा को उड़ीसा, बंगाल तथा मंगेर के पूर्व का बिहार प्रान्त दे दिये गये। शुजा ने राजमहल को अपनी राजधानी बनाने का वचन दिया।

धरमत की पराजय

मुराद ने गुजरात से और औरंगजेब ने दक्षिण से कूच किया। दिपालपुर में दोनों सेनाएँ एक दूसरे से मिल गईं। यहाँ से दोनों शाहजादों की संयुक्त सेनाएँ आगे बढ़ीं। दारा ने मारवाड़ के राजा जसवन्तसिंह तथा कासिमखाँ की अध्यक्षता में इस संयुक्त सेना का सामना करने के लिए शाही सेना भेजी।

उज्जैन के उत्तर-पश्चिम में लगभग चौदह मील की दूरी पर धरमत नामक स्थान पर भीषण संग्राम हुआ। जसवन्तसिंह बड़ी वीरता के साथ लड़े परन्तु कासिम खाँ तथा कुछ राजपूत राजाओं के धोखा देने के कारण उन्हें घायल होकर मैदान छोड़ना पड़ा। वे अपनी राजधानी जोधपुर लौट गये।

जसवंतसिंह द्वारा दारा का पक्ष लिये जाने के कारण औरंगजेब राठौड़ों से नाराज हो गया। वह जीवन भर राठौड़ों से बदला लेने की सोचता रहा किंतु जसवंतसिंह के जीतेजी वह राठौड़ों का बाल भी बांका नहीं कर सका।

सामूगढ़ की पराजय

मुराद और औरंगजेब की विजयी सेनाएँ आगे बढ़ीं। धरमत की पराजय होने पर शाही दरबार में खलबली मच गई। जहाँआरा ने शाही प्रतिष्ठा बचाने के लिये मुराद तथा औरंगजेब से समझौता करने का प्रयास किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। इसलिये दारा एक विशाल सेना लेकर आगे बढ़ा।

29 मई 1658 को आगरा से आठ मील पूर्व में स्थित सामूगढ़ नामक स्थान पर दारा तथा उसके भाइयों की सेनाओं में निर्णयात्मक युद्ध हुआ जिसमें दारा परास्त हो गया। दारा भागकर आगरा पहुँचा। पराजय की शर्म के कारण वह बादशाह से मिले बिना अपनी स्त्री तथा बच्चों के साथ दिल्ली भाग गया।

शाहजहाँ का पतन

औरंगजेब की विजयी सेना ने आगे बढ़कर आगरा का किला घेर लिया तथा किले में यमुना नदी से होने वाली जलापूर्ति बंद कर दी। विवश होकर किले का द्वार खोल देना पड़ा। शाहजहाँ को कैद कर लिया गया और उसे जनाना महल में रखा गया। औरंगजेब ने शासन अपने हाथ में ले लिया। इस प्रकार मुगलिया तख्त पर औरंगजेब का अधिकार हो गया।

मुराद का पतन

अब औरंगजेब ने उन समस्त प्रतिद्वन्द्वियों को समाप्त करने का निश्चय किया जो तख्त के दावेदार हो सकते थे। उसने मुराद को साथ लेकर आगरा से दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में मथुरा के पास एक दिन मुराद आखेट में थककर औरंगजेब के खेेमे में आ गया। औरंगजेब ने उसे दावत दी जिसमें उसे खूब शराब पिलाई गई। जब मुराद को नींद आई तो उसे वहीं सुलाया गया तथा नींद में ही बंदी बना लिया गया। औरंगजेब ने उसे दिल्ली भेज दिया और सलीमगढ़ के दुर्ग में बन्द कर दिया।

दारा का पतन

जब औरंगजेब मुराद को बंदी बनाकर दिल्ली की ओर बढ़ा तो दारा दिल्ली से लाहौर की तरफ भाग खड़ा हुआ। इस प्रकार बिना किसी विरोध के दिल्ली पर भी औरंगजेब का अधिकार हो गया। दिल्ली के शालीमार बाग में औरंगजेब ने अपना राज्याभिषेक कराया तथा दारा का पीछा करने के लिये अपनी सेना भेजी।

दारा लाहौर से गुजरात आ गया। वहां के शासक ने दारा की सहायता की। जोधपुर नरेश जसवंतसिंह भी फिर से दारा की सहायता करने के लिये तैयार हो गये। दारा और उसके सहायकों की सेना अजमेर के निकट दौराई पहुंच गईं। इसी बीच औरंगजेब के दबाव में आकर महाराजा जसवंतसिंह औरंगजेब से मिल गया।

जयपुर नरेश जयसिंह पहले से ही औरंगजेब की सहायता कर रहा था। दारा बहुत वीरता से लड़ा किंतु रणक्षेत्र का अधिक अनुभव न होने के कारण दारा की पराजय हो गई। दारा भागकर मुल्तान की ओर चला गया। औरंगजेब ने लाहौर पर अधिकार करके मुल्तान की ओर कूच किया। वहाँ उसे ज्ञात हुआ कि दारा भक्कर की ओर चला गया।

औरंगजेब ने दारा का पीछा करने का काम अपने अनुभवी सेनापतियों शेख मीर तथा दिलेरखाँ को सौंप दिया और स्वयं दिल्ली लौट आया, जिससे वह शुजा का सामना कर सके, जो इलाहाबाद की ओर बढ़ रहा था।

शुजा का पतन

शुजा अपनी सेना लेकर बिहार से आगरा की ओर बढ़ा। दिसम्बर 1658 में वह इलाहाबाद होता हुआ खनवा नामक स्थान पर पहॅँुचा। औरंगजेब के बड़े पुत्र सुल्तान मुहम्मद ने खनवा में शुजा का मार्ग रोका। औरंगजेब तथा मीर जुमला भी, जो दक्षिण में थे, अपनी-अपनी सेनाएँ लेकर आ पहुँचे। शुजा, औरंगजेब की सेना पर टूट पड़ा परन्तु वह परास्त होकर मैदान से भाग खड़ा हुआ।

औरंगजेब ने अपने पुत्र मुहम्मद तथा मीर जुमला को शुजा का पीछा करने के लिए भेजा। शुजा की सेना कई स्थानों पर परास्त हुई। अन्त में वह ढाका होता हुआ अराकान पहुँचा। शुजा ने अराकान के राजा की हत्या का षड्यन्त्र रचा परन्तु षड्यन्त्र खुल जाने पर शुजा वहीं मार डाला गया। यह भी कहा जाता है कि शुजा अराकान से बचकर मक्का भाग गया।

दारा शिकोह की हत्या

मुल्तान से कूच करने के बाद दारा शिकोह मारा-मारा फिर रहा था। शेख मीर तथा दिलेरखाँ उसका पीछा करते रहे। धीर-धीरे दारा के साथियों की संख्या घटने लगी और उसकी निराशा बढ़ने लगी। दादर नामक स्थान पर मलिक जीवन नामक बलूची सरदार ने गद्दारी करके दारा को औरंगजेब के आदमियों के हाथों सौंप दिया।

1659 ई. में दारा शिकोह कैद करके दिल्ली लाया गया। उसे अनेक प्रकार से अपमानित किया गया और दिल्ली की सड़कों पर घुमाया गया। दारा ने औरंगजेब से क्षमा याचना की परन्तु औरंगजेब ने दारा की हत्या करने की आज्ञा दी। 30 अगस्त 1659 को दारा का सिर धड़ से अलग कर दिया गया।

दारा शिकोह का सिर शाहजहाँ के पास भेजा गया किंतु शाहजहाँ ने दारा का सिर देखने से मना कर दिया। दारा के धड़ को दिल्ली की सड़कों तथा गलियों में घुमाया गया और अन्त में हुमायूँ के मकबरे में दफना दिया गया।

मुराद की हत्या

मुराद अब तक ग्वालियर के दुर्ग में बन्द था। दिसम्बर 1661 में उस पर आरोप लगाकर उसकी भी हत्या कर दी गई।

सुलेमान की हत्या

दारा का पुत्र सुलेमान भी ग्वालियर के दुर्ग में बंद था। उस पर भी आरोप लगाकर मई 1662 में ग्वालियर के दुर्ग में ही उसे विष देकर मार दिया गया। इस प्रकार चार वर्ष की अवधि में औरंगजेब ने अपने समस्त भाइयों तथा भतीजों की नृशंसतापूर्वक हत्या करवा दी। उसका यह काम ठीक वैसा ही था जैसा शाहजहाँ ने अपने भाइयों तथा भतीजों के साथ किया था। इसी के साथ उत्तराधिकार युद्ध समाप्त हुआ।

शाहजहाँ की मृत्यु

शाहजहाँ के जीवन के अन्तिम दिन कारागार में व्यतीत हुए। उसके निवास पर कड़ा पहरा लगा दिया गया। वह केवल औरंगजेब के पुत्र मुहम्मद की उपस्थिति में किसी से बात कर सकता था। वह जो कुछ करता था अथवा कहता था उसकी सूचना तुरन्त औरंगजेब के पास पहुँचाई जाती थी।

शाहजहाँ किसी के साथ पत्र व्यवहार नहीं कर सकता था तथा सूनी आँखों से ताजमहल की ओर ताकता रहता था। उसके प्रिय आभूषण तथा रत्न भी उससे छीन लिये गये। इस बुरे समय में शहजादी जहाँआरा, शाहजहाँ के साथ रही। 22 जनवरी 1666 को प्रातःकाल में ताजमहल पर दृष्टि लगाये, शाहजहाँ ने अंतिम श्वांस ली। उसे मुमताज महल बेगम की बगल में दफना दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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शाहजहाँ का शासन प्रबन्ध

उत्तराधिकार युद्ध

औरंगजेब (आलमगीर)

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औरंगजेब तथा उसकी बेगम

औरंगजेब का पूरा नाम मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब था। उसे आलमगीर भी कहा जाता था। उसने ईस्वी 1658 से 1707 तक भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया। वह एक क्रूर एवं धर्मान्ध कट्टर सुन्नी मुसलमान शासक था। उसकी कट्टर नीतियों ने मुगल सल्तनत को पतन के मार्ग पर धकेल दिया।

औरंगजेब का प्रारम्भिक जीवन

मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब का जन्म 3 नवम्बर 1618 को उज्जैन के निकट दोहद में हुआ था। उस समय उसका बाबा जहाँगीर दक्षिण से आगरा लौट रहा था। कुछ इतिहासकारों ने उसका जन्म 1619 ई. में अहमदाबाद तथा मालवा की सीमा पर स्थित दोसीमा नामक स्थान पर होना बताया है, जब शाहजहाँ दक्षिण का सूबेदार था।

दोहद और दोसीमा का एक ही अर्थ होता है। आज यह स्थान दोहद के नाम से ही प्रसिद्ध है। सर जदुनाथ सरकार ने औरंगजेब का जन्म 24 अक्टूबर 1618 को होना माना है। शाहजहाँ तथा मुमताज महल की चौदह संतानें थीं। इनमें औरंगजेब छठा था।

जब शाहजहाँ ने जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह किया तब औरंगजेब आठ साल का था। उस समय औरंगजेब तथा उसके भाई दारा को बड़े कष्ट झेलने पड़े। इन दोनों भाइयों को नूरजहाँ के पास बंधक के रूप में रखा गया। जब शाहजहाँ ने जहाँगीर के समक्ष समर्पण किया, तब दोनों भाईयों को मुक्त किया गया।

इस कारण जब औरंगजेब 10 साल का हुआ, तब उसकी शिक्षा आरम्भ हो सकी। मीर मुहम्मद हाशिम को उसका शिक्षक बनाया गया। औरंगजेब कुशाग्र बुद्धि तथा विलक्षण प्रतिभा का धनी था। उसने फारसी तथा अरबी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया और हिन्दी का भी थोड़ा-बहुत ज्ञान ले लिया।

औरंगजेब ने कुरान तथा हदीस का पूरा ज्ञान प्राप्त कर लिया। वह चित्रकला तथा संगीत आदि ललित कलाओं से दूर रहता था। औरंगजेब जबर्दस्त लड़ाका एवं दुःसाहसी शहजादा था। उसके स्वभाव में उत्साह, धैर्य तथा दृढ़ता कूट-कूट कर भरी हुई थी।

जब औरंगजेब की अवस्था केवल पन्द्रह वर्ष थी तब एक उन्मत्त हाथी उस पर टूट पड़ा। औरंगजेब ने बड़ी निर्भीकता से अपने भाले से उस हाथी पर प्रहार करके उसे अपने नियंत्रण में कर लिया। उसकी इस बहादुरी से प्रसन्न होकर शाहजहाँ ने उसे ‘बहादुर’ की उपाधि दी।

औरंगजेब को सूबेदार के पद पर नियुक्ति

1634 ई. में शाहजहाँ ने औरंगजेब को दस हजार जात और चार हजार सवार का मनसबदार नियुक्त किया गया। 1635 ई. में उसे बुन्देला विद्रोह के दमन का कार्य सौंपा। इस प्रकार व्यावहारिक जीवन में औरंगजेब का प्रवेश हुआ। वह बुन्देला विद्रोह का दमन करने में सफल रहा।

औरंगजेब ने सैन्य-संचालन तथा संगठन क्षमता का अच्छा परिचय दिया। उसकी सैनिक प्रतिभा से प्रसन्न होकर शाहजहाँ ने उसे 14 जुलाई 1636 को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया। 18 मई 1637 को फारस के राजपरिवार के शाहनवाज की पुत्री दिलरास बानो बेगम से औरंगजेब का विवाह हुआ।

औरंगजेब की प्रतिष्ठा तथा प्रभाव को बढ़ता हुआ देखकर उसके बड़े भाई दारा के मन में द्वेष की भावना जागृत होने लगी और वह उसे अपना प्रतिद्वन्द्वी मानने लगा। 1644 ई. में दारा के कहने पर औरंगजेब को दक्षिण से वापस बुला लिया गया और 1645 ई. में गुजरात का सूबेदार बनाकर भेज दिया गया।

यहाँ पर भी औरंगजेब ने अपनी सैनिक तथा प्रशासकीय प्रतिभा का अच्छा परिचय दिया। दो वर्ष बाद 1647 ई. में उसे बल्ख तथा बदख्शाँ का गवर्नर तथा प्रधान सेनापति बनाकर भेजा गया किंतु ट्रांस ऑक्सियाना क्षेत्र में औरंगजेब को सफलता नहीं मिल सकी।

1648 ई. से 1652 ई. तक औरंगजेब मुल्तान तथा सिन्ध का सूबेदार रहा। उसने बड़ी योग्यता के साथ शासन किया। वह इस क्षेत्र में शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित करने तथा प्रान्त की व्यापारिक उन्नति करने में सफल रहा। इस बीच 1649 ई. एवं 1652 ई. में उसे दो बार कन्दहार पर आक्रमण करने भेजा गया। दोनों ही बार औरंगजेब कन्दहार को जीतने में सफल नहीं हुआ परन्तु इन युद्धों में उसे बहुत बड़ा सैनिक अनुभव प्राप्त हो गया।

कन्दहार में मिली असफलता के कारण उसे 1652 ई. में दूसरी बार दक्षिण का गवर्नर नियुक्त किया गया। इस पद पर वह 1658 ई. तक रहा। इन 6 वर्षों में उसने कई प्रशंसनीय कार्य किये। उसने अपनी मन्त्री मुर्शिदकुली खाँ की सहायता से भूमि का प्रबन्घ किया जिससे इस प्रान्त में समृद्धि आई।

औरंगजेब ने अपनी सेना में कई सुधार किये और उसे रण-कौशल बना दिया। इस सेना की सहायता से उसने बीजापुर तथा गोलकुण्डा के राज्यों पर विजय प्राप्त की। औरंगजेब इन राज्यों को मुगल सल्तनत में सम्मिलित करके उनका अस्तित्त्व समाप्त करना चाहता था किन्तु शाहजहाँ के हस्तक्षेप के कारण वह ऐसा नहीं कर सका।

औरंगजेब को तख्त की प्राप्ति

1657 ई. में शाहजहाँ बीमार पड़ा। 1658 ई. में उसकी मृत्यु की अफवाह फैल गई। औरंगजेब अपने भाइयों में सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी था। उसने स्थिति का आकलन करके आगरा के लिए प्रस्थान कर दिया। उसने अपने समस्त प्रतिद्वन्द्वियों को परास्त करके अपने बूढ़े पिता शाहजहाँ को बन्दी बना लिया और उसके तख्त पर बैठ गया।

16 जुलाई 1658 को औरंगजेब ने स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। उसने अबुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब बहादुर आलमगीर बादशाह गाजी की उपाधि धारण की। औरंगजेब का औपचारिक राज्याभिषेक 5 जून 1659 को दिल्ली में बड़े समारोह के साथ हुआ। उसने वृद्ध शाहजहाँ को कारागार में डाल दिया।

लोगों का विश्वास जीतने के लिये औरंगजेब ने अपने राज्याभिषेक के अवसर पर लोगों को खूब धन बाँटा और पुरस्कार दिये। सिंहासन पर बैठने के बाद उसने ‘अब्दुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन’ और ‘औरंगजेब बहादुर आलमगीर बादशाह गाजी’ की उपाधि धारण की। उसने लगभग पचास वर्ष तक शासन किया।

आलमगीर के शासन के प्रथम पच्चीस वर्ष, उत्तरी भारत में सीमा की सुरक्षा करने तथा विद्रोहों का दमन करने में व्यतीत हुए जबकि शासन के अन्तिम पच्चीस वर्ष दक्षिण के राज्यों को विध्वंस करने में व्यतीत हुए। उसने अपने शासन काल में जिस नीति का अनुसरण किया वह मुगल सल्तनत के लिए बड़ी घातक सिद्ध हुई और अन्त में उसके विनाश का कारण बन गई।

औरंगजेब द्वारा किये गये सुधार कार्य

बादशाह बनते ही औरंगजेब ने अपनी नीति को कार्यान्वित करना आरम्भ कर दिया। उसके द्वारा किये गये मुख्य सुधार इस प्रकार से थे-

(1.) मुहतासिबों की नियुक्ति

प्रत्येक बड़े नगर में मुहतासिब अर्थात् आचरण के निरीक्षक निुयक्त किये गए। इन अधिकारियों का कर्त्तव्य था कि वे यह देखें कि प्रजा, इस्लाम के सिद्धान्तों के अनुसार जीवन व्यतीत करती है या नहीं! अर्थात् प्रजा मद्यपान तो नहीं करती! कोई जुआ तो नहीं खेलता! लोग चरित्र-भ्रष्ट तो नहीं हो रहे! लोग नियमित रूप से दिन में पाँच बार नमाज पढ़ते हैं और मोहर्रम में रोजा रखते हैं या नहीं!

(2.) कलमा लिखने पर रोक

आलमगीर ने मुद्राओं पर कलमा लिखवाना बन्द कर दिया क्योंकि वह गैर-मुसलमानों के हाथों में जाने से अपवित्र हो जाता था।

(3.) नौरोजे की समाप्ति

आलमगीर ने नौरोज के त्यौहार को बन्द कर दिया, जिसे उसके पूर्वज मनाया करते थे।

(4.) संगीतकारों का दरबार से निष्कासन

आलमगीर की धारणा थी कि संगीत इस्लाम के विरुद्ध है। अतः उसके पूर्वजों के काल के जितने प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे और जिन्हें मुगल सल्तनत का आश्रय प्राप्त था, उन सबको उसने मार भगाया।

(5.) झरोखा दर्शन पर रोक

अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ, प्रतिदिन प्रातःकाल में अपनी प्रजा को झरोखा दर्शन, दिया करते थे। इस प्रथा को आलमगीर ने बन्द करवा दिया क्योंकि यह हिन्दुओं की प्रथा के अनुरूप थी।

(6.) इस्लाम का विरोध करने वालों को दण्ड

आलमगीर ने इस्लाम के विद्धान्तों का विरोध करने वालों तथा सूफी मत को मानने वाले को दण्डित किया। सरमद को, जो सूफी मत का अनुयाई और दारा का पक्षपाती था, मरवा दिया गया।

(7.) सती प्रथा का निषेध

आलमगीर ने 1664 ई. में सती प्रथा पर रोक लगा दी।

(8.) बादशाह को उपहारों पर रोक

बादशाह की वर्षगाँठ तथा अन्य अवसरों पर राज्याधिकारी तथा प्रजा द्वारा उपहार तथा भेंट दिये जाते थे। आलमगीर ने इस प्रथा पर रोक लगा दी। इससे राजकोष को बहुत नुकसान हुआ।

(9.) अनुचित चुंगियों तथा करों की समाप्ति

आलमगीर ने मुगल सल्तनत में प्रचलित बहुत-सी अनुचित चुंगियों तथा करों को हटा दिया। आंतरिक चुंगी को समाप्त कर दिया क्योंकि इससे व्यापार में बाधा पड़ती थी। जो माल नगरीय बाजारों में बिकने आता था उस पर विक्रय-कर लगता था। इसे भी औरंगजेब ने हटा दिया।

(10.) मालगुजारी वसूलने वालों पर निगरानी

आलमगीर ने मालगुजारी वसूल करने वालों पर निगरानी की व्यवस्था की। जो लोग इस कार्य में अत्याचार करते थे, उन्हें कठोर दण्ड दिये गये। अधिकारी घूस या नजराना नहीं ले सकते थे। बादशाह स्वयं भी समस्त कागजों को ध्यान से देखता था।

(11.) मुस्लिम प्रजा के हितों की चिंता

आलमगीर स्वयं को अपनी प्रजा का सेवक कहता था और उसके जीवन को सुखी बनाने के लिये प्रयत्नशील रहता था। प्रजा का तात्पर्य मुस्लिम-प्रजा से था, हिन्दू-प्रजा से नहीं। हिन्दुओं को वह काफिर समझता था और उनके प्रति बड़ा अनुदार था।

औरंगजेब की नीतियाँ तथा उनके परिणाम

आलमगीर कट्टर सुन्नी बादशाह था। वह भारत से काफिरों को समाप्त करके दारूल-इस्लाम अर्थात् मुस्लिम राज्य की स्थापना करना चाहता था। उसकी नीतियों को तीन भागों- (1.) धार्मिक नीति, (2.) राजपूत नीति तथा (3.) साम्राज्यवादी नीति में विभक्त किया जा सकता है।

आलमगीर की इन तीनों नीतियों के मूल में उसकी धार्मिक कट्टरता काम कर रही थी। वह जीवन भर हिन्दू प्रजा को बलपूर्वक मुसलमान बनाकर, जाटों, राजपूतों, सिक्खों तथा अन्यान्य हिन्दू शासकों का नाश कर, मंदिरों तथा तीर्थों को नष्ट कर तथा मुगल साम्राज्य से बाहर के राज्यों को अपनी सल्तनत में मिलाकर, दारूल-इस्लाम की स्थापना में लगा रहा।

आलमगीर की इन नीतियों के बारे में हम अगले अध्यायों में विस्तार से पढ़ेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – औरंगजेब (आलमगीर )

औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

औरंगजेब की धार्मिक नीति

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औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की धार्मिक नीति इस्लामिक मजहबी कट्टरता पर आधारित थी। वह सुन्नी मुसलमान था और भारत की सम्पूर्ण प्रजा को सुन्नी मुसलमान बनाना चाहता था।

औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। इस्लाम में उसकी बड़ी अनुरक्ति थी। वह स्वयं को इस्लाम का रक्षक तथा पोषक समझता था। इसलिये राज्य के समस्त साधनों को इस्लाम की सेवा में लगा देना अपना कर्त्तव्य समझता था। इस्लाम के लिए वह अपना राज्य, वैभव, सुख तथा जीवन तक न्यौछावर कर सकता था। अतः उसके जीवन में न तो जहाँगीर की विलासिता के लिए कोई स्थान था और न शाहजहाँ की शान-शौकत के लिए। यही औरंगजेब की धार्मिक नीति थी।

उसने इस्लाम के आदेशों के अनुसार फकीर का जीवन व्यतीत करने का मार्ग चुना। राजकोष को वह प्रजा की सम्पत्ति समझता था और उस धन को अपने ऊपर व्यय करना महापाप समझता था। राज-काज से जब उसे अवकाश मिलता था तब वह कुरान की आयतों की नकल करता था और टोपियाँ सिला करता था जिन्हें उसके दरबारी और अमीर खरीदते थे। इसी धन से वह अपना व्यय चलाता था।

उसका जीवन पैगम्बर मुहम्मद के आदेशों के अनुकूल था। उसकी दृष्टि में राज्य का तात्पर्य मुस्लिम राज्य और प्रजा का तात्पर्य मुस्लिम प्रजा से था। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘राज्य की नीति धार्मिक विचारों से रंजित थी और बादशाह ने एक कट्टरपंथी की भाँति शासन करने का प्रयत्न किया। प्रत्येक बात में वह शरीयत का अनुसरण करता था।’

औरंगजेब की धार्मिक नीति

सूफियों से घृणा

औरंगजेब की धार्मिक नीति में सूफियो के लिए कोई स्थान नहीं था। औरंगजेब सूफी धर्म मानने वालों को घृणा की दृष्टि से देखता था और उनका क्रूरता से दमन करता था। अपने भाई दारा को भी वह दारा की धार्मिक सहिष्णुता के कारण घृणा से देखता था।

शियाओं का दमन

औरंगजेब शिया मुसलमानों से अत्यंत घृणा करता था। उसकी धार्मिक नीति में हिन्दुओं और सूफियों की तरह शियाओं के लिए भी कोई स्थान नहीं था। उसने दक्षिण के शिया राज्यों को उन्मूलित कर दिया जिन्हें वह दारूल-हार्श अर्थात् काफिर राज्य कहता था। जो शिया मुसलमान तबर्रा बोलते थे, औरंगजेब उनकी हत्या करवा देता था।

सुलह-कुल की नीति का त्याग

औरंगजेब ने अकबर द्वारा स्थापित सहिष्णुता तथा सुलह-कुल की नीति को छोड़ दिया और हिन्दू प्रजा पर तरह-तरह के अत्याचार किये जिनके माध्यम से उसने हिन्दू धर्म, हिन्दू सभ्यता, हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दू जाति को समाप्त करने का प्रयास किया।

औरंगजेब के हिन्दू विरोधी कार्य

औरंगजेब ने निम्नलिखित हिन्दू विरोधी कार्य किये-

(1.) हिन्दू पूजा स्थलों तथा देव मूर्तियों का विध्वंस

बादशाह बनने से पहले ही औरंगजेब ने हिन्दू पूजा स्थलों को गिरवाना तथा देव मूर्तियों को भंग करना आरम्भ कर दिया था। जब वह गुजरात का सूबेदार था तब अहमदाबाद में चिन्तामणि का मन्दिर बनकर तैयार ही हुआ था। औरंगजेब ने उसे ध्वस्त करवाकर उसके स्थान पर एक मस्जिद बनवा दी।

तख्त पर बैठते ही उसने बिहार के अधिकारियों को निर्देश दिये कि कटक तथा मेदिनीपुर के बीच में जितने हिन्दू मन्दिर हैं उन सबको गिरवा दिया जाये। औरंगजेब के आदेश से सोमनाथ का दूसरा मन्दिर भी ध्वस्त करवा दिया गया। बनारस में विश्वनाथ के मन्दिर को गिरवाकर वहाँ विशाल मस्जिद का निर्माण करवाया गया, जो आज भी विद्यमान है। मथुरा में केशवराय मन्दिर की भी यही दशा की गई। मथुरा का नाम बदलकर इस्लामाबाद रख दिया।

1680 ई. में औरंगजेब की आज्ञा से आम्बेर के समस्त हिन्दू मन्दिरों को गिरवा दिया गया। आम्बेर के राजपूतों ने अकबर के शासन काल से ही मुगलों की बड़ी सेवा की थी। इस कारण आम्बेर के कच्छवाहों को औरंगजेब के इस कुकृत्य से बहुत ठेस लगी। यह औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता की पराकाष्ठा थी।

औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि हिन्दू अपने पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार नहीं करें तथा नये मंदिर नहीं बनवायें। उसने हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाकर दिल्ली तथा आगरा में मस्जिदों की सीढ़ियों तथा मार्गों में डलवा दिया जिससे वे मुसलमानों के पैरों से कुचली तथा ठुकराई जायें और उनका घोर अपमान हो। इस प्रकार औरंगजेब ने हर प्र्रकार से हिन्दुओं की भावनाओं को कुचलने का काम किया।

(2.) हिन्दू पाठशालाओं का विध्वंस

औरंगजेब ने हिन्दुओं के धर्म के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी उन्मूलित करने का प्रयत्न किया। उसके आदेश से थट्टा, मुल्तान तथा बनारस में स्थित समस्त हिन्दू शिक्षण संस्थाओं को नष्ट कर दिया गया। मुसलमान विद्यार्थियों को हिन्दू पाठशालाओं में पढ़ने की अनुमति नहीं थी। हिन्दू पाठशालाओं में न तो हिन्दू धर्म की कोई शिक्षा दी जा सकती थी और न इस्लाम विरोधी बात कही जा सकती थी।

(3.) हिन्दुओं पर जजिया कर

अकबर ने हिन्दुओं पर से जजिया समाप्त कर दिया था। औरंगजेब ने फिर से हिन्दुओं पर जजिया कर लगा दिया। इस्लाम का नियम था कि जो लोग इस्लाम को स्वीकार न करें उनके विरुद्ध जेहाद या धर्मयुद्ध किया जाये परन्तु यदि वे जजिया देने को तैयार हों तो उनकी जान बख्श दी जाये। यहूदियों तथा ईसाइयों के साथ भी यही व्यवहार किया जाता था। हिन्दुओं को जजिया से बहुत घृणा थी। इस कर को फिर से लगाकर औरंगजेब ने हिन्दुओं, विशेषकर राजपूतों की भावना को बड़ा आघात पहुँचाया।

(4) हिन्दुओं पर अधिक चुंगी का आरोपण

औरंगजेब के शासन में हिन्दू व्यापारियों को अपने माल पर पाँच प्रतिशत चुंगी देनी पड़ती थी परन्तु मुसलमान व्यापारियों को इसकी आधी चुंगी देनी पड़ती थी। बाद में उसने मुसलमान व्यापारियों पर चुंगी बिल्कुल हटा दी। इस पक्षपात पूर्ण नीति से हिन्दुओं को व्यापार में कम लाभ होता था। इससे एक ओर तो हिन्दुओं की आर्थिक स्थिति गिर गई तथा दूसरी ओर मुसलमानों से चुंगी नहीं लेने से राजकोष को बड़ी क्षति हुई।

(5) सरकारी नौकरियों से हिन्दुओं का निष्कासन

जब से मुसलमानों ने हिन्दुस्तान में अपनी राजसत्ता स्थापित की थी तभी से माल-विभाग के अधिकांश कर्मचारी हिन्दू हुआ करते थे। अकबर ने तो समस्त सरकारी नौकरियों के द्वार हिन्दुओं के लिये खोल दिये थे। 1670 ई. में औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि माल-विभाग से समस्त हिन्दुओं को निकाल दिया जाये। हिन्दू इस कार्य में बड़े कुशल थे। उनके रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए मुसलमान कर्मचारी नहीं मिल सके। इसलिये औरंगजेब ने दूसरा आदेश निकाला कि एक हिन्दू के साथ मुसलमान कर्मचारी भी रखा जाये।

(6.) मंदिरों में शंख एवं घण्टों पर रोक

औरंगजेब जिस मार्ग से गुजरता था तथा जहाँ उसका पड़ाव होता था, वहाँ दूर-दूर तक के मंदिरों में शंखध्वनि करने तथा घण्टे बजाने पर रोक होती थी।

(7.) बलात् धर्म परिवर्तन

हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए औरंगजेब ने अनेक हथकण्डों का प्रयोग किया। उसने विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देकर हिन्दुओं को मुसलमान बनने के लिए प्रोत्साहित किया। जो हिन्दू मुसलमान बन जाते थे वे जजिया से मुक्त कर दिये जाते थे। उन्हें राज्य में उच्च पद दिये जाते थे और उन्हें सम्मान सूचक वस्त्रों से पुरस्कृत किया जाता था।

हिन्दू बंदियों द्वारा इस्लाम स्वीकार कर लेने पर उन्हें कारावास से मुक्त कर दिया जाता था। जो हिन्दू इन प्रलोभनों में नहीं पड़ते थे उन्हें बलपूर्वक मुसलमान बनाने का प्रयत्न किया जाता था। मथुरा के गोकुल जाट के समस्त परिवार को इसी प्रकार मुसलमान बनाया गया था। जो हिन्दू, इस्लाम की निन्दा तथा हिन्दू धर्म की प्रशंसा करते थे उन्हें कठोर दण्ड दिये जाते थे। ऊधव बैरागी को हिन्दू धर्म का प्रचार करने के कारण मरवाया गया।

(8.) हिन्दुओं पर सामाजिक प्रतिबन्ध

1665 ई. में औरंगजेब ने आदेश दिया कि राजपूतों के अतिरिक्त अन्य कोई हिन्दू हाथी, घोड़े अथवा पालकी की सवारी नहीं करेगा और न अस्त्र-शस्त्र धारण करेगा। हिन्दुओं को मेले लगाने तथा त्यौहार मनाने की भी स्वतंत्रता नहीं थी। 1668 ई. में आदेश निकाला गया कि हिन्दू अपने तीर्थ स्थानों के निकट मेले न लगायें। होली तथा दीपावली जैसे प्रमुख हिन्दू त्यौहारों को भी हिन्दू, बाजार के बाहर और कुछ प्रतिबन्धों के साथ मना सकते थे।

औरंगजेब की धार्मिक नीति के परिणाम

औरंगजेब ने देश की बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा पर भयानक अत्याचार किये। इस कारण देश के विभिन्न भागों में औरंगजेब के विरुद्ध कड़ी प्रतिक्रिया हुई और देश के विभिन्न भागों में विद्रोह की चिन्गारी भड़क उठी। औरंगजेब को अपने जीवन का बहुत बड़ा समय इन विद्रोहों से निबटने में लगाना पड़ा। औरंगजेब के काल में हुए मुख्य विद्रोह इस प्रकार से हैं-

(1.) जाटों का विद्रोह

सबसे पहले आगरा के निकट निवास करने वाले जाटों ने गोकुल की अध्यक्षता में विद्रोह का झण्डा खड़ा किया। इस विद्रोह का प्रधान कारण औरंगजेब द्वारा केशवराय मन्दिर को तुड़वाना था। जाट इस अपमान को सहन नहीं कर सके और उन्होंने मुगल सूबेदार अब्दुल नबी की हत्या कर दी।

औरंगजेब अपनी नाक के नीचे जाटों द्वारा की गई इतनी बड़ी कार्यवाही से तिलमिला गया। उसने बड़ी क्रूरता से इस विद्रोह का दमन किया। गोकुल तथा उसके परिवार के लोग कैद कर लिये गये। गोकुल के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये और उसके परिवार को जबरदस्ती मुसलमान बनाया गया।

गोकुल की हत्या से जाटों का विद्रोह और भी भयानक हो गया। 1686 ई. में राजाराम के नेतृत्व में फिर विद्रोह का झण्डा खड़ा किया गया। इस बार फिर जाट परास्त हो गये और उनका नेता राजाराम मारा गया परन्तु जाटों का आंदोलन शान्त नहीं हुआ। राजाराम का भतीजा चूड़ामणि औरंगजेब के अन्त तक मुगलों से लड़ता रहा और मुगलों को क्षति पहुँचाता रहा।

(2.) सतनामियों का विद्रोह

सतनामी, दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम में स्थित नारनौल में निवास करते थे। सतनाम इनका धार्मिक उद्घोष था। ये लोग कृषि तथा व्यापार में संलग्न थे और सरल जीवन जीते थे। एक दिन एक मुगल सैनिक ने एक निरपराध सतनामी की हत्या कर दी। इससे क्षुब्ध होकर, शान्ति-प्रिय सतनामियों ने विद्रोह कर दिया। उन्होंने भी मुसलमानों की हत्या करना तथा मस्जिदों का विध्वंस करना आरम्भ कर दिया।

सतनामियों ने नारनौल के हाकिम का वध कर दिया और लूटमार करने लगे। औरंगजेब ने सतनामियों के दमन का कार्य स्वयं अपने हाथ में लिया। पर्याप्त अस्त्र-शस्त्रों के न होते हुए भी सतनामी लोग वीरता तथा साहस के साथ लड़े परन्तु विशाल मुगल सेना के समक्ष अधिक दिनों तक नहीं ठहर सके। हजारों सतनामी मार डाले गये और उनसे नारनोल खाली करा लिया गया। इस प्रकार सतनामियों का आंदोलन क्रूरता के साथ कुचला गया।

(3.) सिक्खों का विद्रोह

सिक्खों तथा मुगलों के संघर्ष का आरम्भ, जहाँगीर समय में हुआ। जहाँगीर ने शहजादा खुसरो की सहायता करने के आरोप में 1606 ई. में गुरु अर्जुनदेव की हत्या कर दी। शाहजहाँ का गुरु हरगोविंद से संघर्ष हुआ। जब गुरु तेगबहादुर सिक्खों के गुरु बने तब औरंगजेब ने हिन्दुओं के मन्दिरों की भाँति सिक्खों के गुरुद्वारों को भी तुड़वाना आरम्भ किया।

गुरु तेगबहादुर ने विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। तेग बहादुर पकड़कर दिल्ली लाये गये तथा उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा गया। गुरु ने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया। इस पर 1675 ई. में उनकी हत्या कर दी गयी। इससे सिक्खों की क्रोधाग्नि और भड़क उठी। गुरु तेग बहादुर के बाद उनके पुत्र गोविन्दसिंह गुरु हुए।

उन्होंने सिक्खों को सैनिक जाति में परिवर्तित कर दिया।  गुरु गोविन्दसिंह ने मुगलों का सामना किया और उन्हें कई बार परास्त किया। अन्त में औरंगजेब ने एक विशाल सेना गुरु के विरुद्ध भेजी। गुरु परास्त हो गये। उनके दो पुत्र बंदी बना लिये गये। उन बालकों से इस्लाम स्वीकार करने के लिये कहा गया परन्तु उन बालकों ने भी अपने दादा की भांति, इस घृणित प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

इस पर उन्हें जीवित ही दीवार में चुनवा दिया गया। औरंगजेब के इन अत्याचारों से सिक्खों का विद्रोह और भड़क गया जिससे विवश होकर औरंगजेब ने गुरु से सन्धि करने का निश्चय किया और उन्हें दिल्ली बुला भेजा। गुरु गोविंदसिंह के दिल्ली पहुँचने से पहले ही औरंगजेब का निधन हो गया।

(4.) राजपूतों का विरोध

औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीति के कारण राजपूत जाति भी उससे नाराज हो गई। राजपूतों के विरोध का वर्णन इस पुस्तक में  औरंगजेब की राजपूत नीति का वर्णन करते समय किया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – औरंगजेब

औरंगजेब

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

औरंगजेब की राजपूत नीति

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औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति मजहबी संकीर्णता पर आधारित थी। वह राजपूत राजाओं से अपने साम्राज्य का विस्तार तो करवाना चाहता था किंतु साथ ही उन्हें मुसलमान भी बनाना चाहता था। औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीति के कारण राजपूत राज्यों के साथ उसका संघर्ष अनिवार्य हो गया।

औरंगजेब की राजपूत नीति

बुंदेलों से युद्ध

सबसे पहले बुन्देलों ने विद्रोह का झण्डा खड़ा किया। इन लोगों ने अपने राजा चम्पतराय के नेतृत्व में औरंगजेब के शासन काल के प्रारम्भ में ही मुगल सल्तनत के साथ युद्ध छेड़ दिया। चम्पतराय को अपने सीमित साधनों के कारण औरंगजेब के विरुद्ध सफलता प्राप्त नहीं हुई। उसने आत्मघात कर लिया और स्वयं को मुगलों के हाथों में पड़ने से बचाया।

चम्पतराय के बाद उसके पुत्र छत्रसाल ने मुगलों के विरुद्ध युद्ध जारी रखा। वह वीर तथा साहसी युवक था। उसने बुन्देलों के विद्रोह को बुंदेलों की स्वतंत्रता के लिये लड़े जा रहे संग्राम का रूप दे दिया। उसने कई बार शाही सेना को युद्धों में परास्त किया जिससे मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा।

छत्रसाल ने पूर्वी मालवा को जीतकर अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया और पन्ना को अपनी राजधानी बनाकर स्वतन्त्रतापूर्वक शासन करने लगा। वह मुगल सल्तनत को आतंकित करने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देता था।

राठौड़ों से युद्ध

मारवाड़ रियासत के राठौड़ राजा जसवंतसिंह, औरंगजेब की सेवा में थे। 1678 ई. में जमरूद के मोर्चे पर मुगलों की तरफ से लड़ते हुए उनकी मृत्यु हुई। जसवन्तसिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अजीतसिंह का जन्म हुआ। औरंगजेब ने मारवाड़ को खालसा घोषित करके मुगल सल्तनत में मिला लिया तथा शिशु राजा अजीतसिंह और उसकी माँ को दिल्ली बुलवाकर उन्हें बंदी बना लिया।

औरंगजेब ने शिशु अजीतसिंह का मुसलमानी तरीके से पालन-पोषण करने की आज्ञा दी। राठौड़ सरदार, अजीतसिंह को दिल्ली से निकालकर राजपूताने में ले आये और उसे सिरोही राज्य के कालंद्री गांव में छिपा दिया। अजीतसिंह के बड़े होने तक राठौड़ सरदारों ने वीर दुर्गादास के नेतृत्व में मुगलों के विरुद्ध युद्ध किया जो तीस वर्ष तक चला।

दुर्गादास को दण्डित करने के लिए औरंगजेब ने शाहजादा मुहम्मद अकबर की अध्यक्षता में एक सेना भेजी और स्वयं भी दिल्ली से अजमेर पहुँचा। दुर्गादास के लिए मुगल सेना का सामना करना अत्यंत दुष्कर कार्य था। मुगल सेना ने मारवाड़ के नगरों को बुरी तरह लूटा, मन्दिरों को तोड़ा और सारे प्रदेश को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

राठौड़ों का धैर्य भंग नहीं हुआ। वे छापामार पद्धति से युद्ध करने लगे और अपनी रियासत प्राप्त करने का प्रयास करते रहे। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु होने पर अजीतसिंह ने मारवाड़ रियासत पर अधिकार कर लिया। मुगल बादशाह बहादुरशाह ने अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा स्वीकार कर लिया। इस प्रकार मुगलों तथा राठौड़ों के बीच तीस वर्ष से चल रहा युद्ध समाप्त हो गया।

सिसोदियों के विरुद्ध संघर्ष

औरंगजेब ने किशनगढ़ की राठौड़ राजकुमारी चारुमति से विवाह करने के लिये डोला भेजा। किशनगढ़ का राजा मानसिंह अल्पवयस्क था तथा किशनगढ़ राज्य इतना छोटा था कि वह मुगल सेना का सामना नहीं कर सकता था। चारुमति भगवान कृष्ण की परमभक्त थी। वह किसी भी कीमत पर मुसलमान बादशाह से विवाह नहीं करना चाहती थी।

इसलिये चारुमति ने उदयुपर के महाराणा राजसिंह को संदेश भिजवाया कि उसने महाराणा को अपना पति स्वीकार कर लिया है, इसलिये वे उसे आकर ले जायें। शरण में आई हुई हिन्दू कन्या की प्रार्थना स्वीकर करके राजसिंह ने सेना लेकर किशनगढ़ को घेर लिया तथा राजकुमारी को अपने साथ मेवाड़ ले जाकर उससे विवाह कर लिया।

इससे औरंगजेब महाराणा राजसिंह से अप्रसन्न हो गया। जब औरंगजेब ने हिन्दुओं पर जजिया लगाया तब भी राजसिंह ने औरंगजेब को फटकार लगाते हुए पत्र लिखा कि हिम्मत है तो मुझसे या अपने गुलाम आम्बेर के राजा मानसिंह से जजिया लेकर दिखाये।

महाराणा राजसिंह ने मारवाड़ के शिशु राजा अजीतसिंह तथा उसके सरदारों को मेवाड़ में संरक्षण प्रदान किया था। इन समस्त कारणों से औरंगजेब ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। औरंगजेब ने स्वयं मुगल सेना का नेतृत्व किया। राणा राजसिंह अपने परिवार और सरदारों को लेकर अरावली की पहाड़ियों में चला गया।

इस कारण मुगल सेना ने बिना अधिक कठिनाई के उदयपुर तथा चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। इसके बाद औरंगजेब ने मेवाड़ अभियान की कमान शाहजादे अकबर को सौंप दी और स्वयं अजमेर लौट गया। महाराणा राजसिंह पहाड़ियों में छिपे रहकर, छापामार युद्ध करके मुगलों को तंग करता रहा।

महाराणा राजसिंह तथा वीर दुर्गादास राठौड़ ने कूटनीति से काम लेते हुए मुगलों को खूब छकाया। इन लोगों ने शाहजादे अकबर को औरंगजेब के स्थान पर बादशाह बनाने का प्रलोभन देकर तहव्वरखाँ के माध्यम से उसे अपनी ओर मिला लिया।

शहजादे को तीन बातें समझाई गईं- (1.) बादशाह औरंगजेब की कट्टर नीतियां ठीक नहीं हैं, जबकि अकबर से लेकर शाहजहाँ तक की नीतियां ठीक थीं। (2.) इसलिये अकबर को चाहिये कि वह अपने पिता औरंगजेब से राज्य छीनकर स्वयं बादशाह बन जाये। (3.) इस कार्य में उसे मेवाड़ तथा मारवाड़ राज्यों के साथ-साथ अन्य हिन्दू राज्यों तथा छत्रपति शिवाजी की भी पूरी सहायता मिलेगी।

अकबर को विश्वास हो गया कि उसके पिता औरंगजेब की नीतियां ठीक नहीं हैं, इसलिये उसे तख्त से हटाकर स्वयं बादशाह बन जाना चाहिये। राजपूतों ने अकबर को अपने साथ लेकर, औरंगजेब पर आक्रमण करने की योजना बनाई जो इस समय अजमेर में था।

दुर्भाग्यवश अचानक महाराणा राजसिंह की मृत्यु हो गई जिससे इस योजना को कार्यान्वित करने में विलम्ब हो गया। राजसिंह के पुत्र राणा जयसिंह ने इस योजना को आगे बढ़ाया। राजपूत सरदार लगातार शाहजादे अकबर को प्रोत्साहन तथा आश्वासन देते रहे। 1681 ई. में अकबर ने स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया तथा वह राजपूतों के साथ सेना लेकर अजमेर के निकट दौराई आ गया।

औरंगजेब को अकबर के विद्रोह की सूचना मिली तो उसने कूटनीति से काम लेते हुए तहव्वरखाँ को संदेश भेजा कि यदि वह विद्रोहियों का साथ छोड़ दे तो उसे क्षमा मिल जायगी अन्यथा उसके पूरे परिवार को समाप्त कर दिया जायगा। तहव्वरखाँ ने तुरन्त शाही कैम्प के लिए प्रस्थान कर दिया परन्तु जब वह औरंगजेब के शिविर के पास पहुँचा तो बादशाह के सरंक्षकों ने उसकी हत्या कर दी।

औरंगजेब ने एक और चाल चली। उसने एक झूठी चिट्ठी लिखवाकर राठौड़ों के शिविर में डलवाई कि शाहजादे अकबर ने राजपूतों को धोखा देकर ठीक फँसाया है। यह पत्र दुर्गादास के हाथ में पड़ गया जिससे उसके मन में सन्देह पैदा हो गया। इस कारण राठौड़ रात्रि में ही युद्ध शिविर छोड़कर पीछे हट गये।

इस तरह औरंगजेब पर आक्रमण करने की योजना समाप्त हो गई और अकबर अकेला रह गया। उसने भी घबराकर युद्ध का मैदान छोड़ दिया और राजपूतों की तरफ चला। इस पर राजपूतों को उसकी ईमानदारी के बारे में विश्वास हो गया। उन्होंने अकबर की रक्षा करना अपना धर्म समझा तथा उसे सुरक्षित रूप से दक्षिण भारत में मरहठों के पास भेज दिया।

मेवाड़ के विरुद्ध औरंगजेब का संघर्ष बहुत दिनों तक चलता रहा। अंत में 1684 ई. में मेवाड़ के साथ सन्धि हो गई। राणा जयसिंह को मेवाड़ का राजा स्वीकार कर लिया गया। उसे पाँच हजार का मनसब दिया गया। मेवाड़ ने अपने तीन परगने मुगलों को दे दिये। मुगल सेनाएँ मेवाड़ से हटा ली गईं।

औरंगजेब की राजपूत नीति के परिणाम

राजपूत युद्धों का मुगल सल्तनत के भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ा। अकबर ने इस बात को अनुभव किया था कि उसके चगताई, मुगल, ईरानी, अफगानी तथा तुर्की उमराव किसी भी तरह विश्वसनीय नहीं थे। वे हर समय बगावत का झण्डा बुलंद करने के लिये तैयार रहते थे ताकि अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर सकें जबकि राजपूत लड़ाके यदि एक बार वचन दे देते थे तो फिर गद्दारी नहीं करते थे। इसलिये उसने राजपूतों की लड़कियों से विवाह स्थापित कर सुलह-कुल की नीति अपनाई तथा उन्हें शासन में कनिष्ठ भागीदार बनाया।

इस कारण राजपूत लड़ाके और जागीरदार, अकबर से लेकर जहाँगीर तथा शाहजहाँ के समय तक मुगलों की अनन्य भक्ति भाव से सेवा करते रहे तथा राजपूत लड़ाकों ने मुगलों का राज्य लगभग पूरे भारत में विस्तारित कर दिया किंतु औरंगजेब ने धर्मान्धता के कारण राजपूतों को नष्ट करने   के बड़े प्रयास किये। इससे राजपूत, मुगलों से विरक्त हो गये। बहुत से राजपूत मुगलों की सेवा छोड़कर अपने राज्यों के विस्तार में लग गये।

लेनपूल के अनुसार- ‘जब तक वह कट्टरपंथी औरंगजेब, अकबर के सिंहासन पर बैठा रहा, एक भी राजपूत उसे बचाने के लिए अपनी उँगली भी हिलाने को तैयार नहीं था। औरंगजेब को अपनी दाहिनी भुजा खोकर दक्षिण के शत्रुओं के साथ युद्ध करना पड़ा।’

मुगल सल्तनत रणप्रिय राजपूत जाति की सेवाओं से वंचित हो गई। राजपूतों की सहायता के बिना मुगल सल्तनत पतनोन्मुख हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

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