Home Blog Page 198

मुगल सल्तनत का विघटन

0
मुगल सल्तनत का विघटन - www.bharatkaitihas.com
मुगल सल्तनत का विघटन

औरंगजेब के आँखें बन्द करते ही चारों तरफ से मुगल सल्तनत का विघटन आरम्भ हो गया। सल्तनत के प्रभावशाली अमीरों और मनसबदारों ने अपने-अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने आरम्भ कर दिये। आरम्भ में यह कार्य केन्दीय राजधानी दिल्ली से दूर के क्षेत्रों में हुआ, बाद में उत्तर भारत में भी कई छोटे-छोटे राज्य बन गये। मुगल सल्तनत के बिखराव के कारण निम्नलिखित प्रमुख राज्य अस्तित्व में आये।

हैदराबाद

हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना चिनकुलीचखां ने की थी, जिसे बाद में मुगल बादशाह ने निजाम-उल-मुल्फ आसफजां की उपाधि प्रदान की थी। औरंगजेब की मृत्यु के समय चिनकुलीचखाँ बीजापुर में था। उसने उत्तराधिकार के संघर्ष में कोई भूमिका नहीं निभाई।

उत्तराधिकार के संघर्ष में विजयी शहजादा मुहम्मद मुअज्जम, बहादुरशाह के नाम से मुगल बादशाह बना। उसने चिनकुलीचखाँ को दक्षिण-भारत से हटाकर अवध का सूबेदार नियुक्त किया। बहादुरशाह की मृत्यु के बाद पुनः मुगल शहजादों में उत्तराधिकार के लिये संघर्ष हुआ।

इसमें चिनकुलीचखाँ ने जहांदारशाह के विरुद्ध फरूखसियर को सहायता दी। जहांदारशाह (1712-13 ई.) अपने भाइयों को परास्त करके तख्त पर बैठने में सफल रहा। जहांदरशाह की अयोग्यता के कारण दरबारी अमीरों के षड्यन्त्र बढ़ गये। इससे बहादुरशाह के पुत्र अजीम-उश-शान के लड़के फरूखसियर ने सैयद भाइयों की सहायता से गद्दी हथिया ली।

फरूखसियर (1713-19 ई.) मुगल बादशाह बनने पर चिनकुलीचखाँ को दक्षिण भारत के छः सूबों की सूबेदारी तथा खानखाना और निजाम-उल-मुल्क बहादुर फतहजंग की उपाधि प्रदान की। उसी समय से चिनकुलीचखाँ के मन में दक्षिण भारत में स्वतंत्र राज्य की स्थापना जागृत हुई। 1715 ई. में उसे दिल्ली बुलाया गया।

पहले उसे मुरादाबाद का सूबेदार बनाया गया और बाद में मालवा की सूबेदारी दी गई। चिनकुलीचखाँ ने मालवा में अपनी शक्ति का विस्तार किया। इससे सैयद बंधु उससे ईर्ष्या करने लगे और उन्होंने उसे मालवा की सूबेदारी से वंचित कर दिलावरखाँ को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया। चिनकुलीचखाँ ने उसका विरोध किया और दिलावरखाँ को मार डाला। उसने बुरहानपुर व असीरगढ़ के किलों पर भी अधिकार कर लिया और दक्षिण-पथ का शासक बन गया।

सैयद बंधुओं ने फरूखसियार का कत्ल करवाकर बहादुरशाह के पुत्र रफी-उश-शान के लड़के रफीउद्दरजात को दिल्ली के तख्त पर बैठाया किन्तु तीन माह बाद ही उसे तख्त से हटाकर उसके भाई रफीउद्दौला को गद्दी पर बैठाया। वह साढ़े तीन माह में ही पेचिश की बीमारी से मर गया। अतः बहादुरशाह के पुत्र जहांदारशाह के लड़के मुहम्मदशाह (1719-48 ई.) को बादशाह बनाया गया।

मुहम्मदशाह ने सैयद भाइयों को मरवा दिया तथा निजाम-उल-मुल्क को वजीर का पद देकर दिल्ली बुलाया। निजाम-उल-मुल्क दिल्ली गया परन्तु वहाँ पर अधिक समय नहीं रुका। वह पुनः दक्षिण भारत चला गया। दक्षिण के नये सूबेदार मुबारिजखाँ ने उसका विरोध किया।

निजाम-उल-मुल्क ने मराठों से सहायता से 1724 ई. में मुबारिजखाँ को भी मार डाला। 1725 ई. में उसने हैदराबाद पर अधिकार कर लिया। उसी समय से दक्षिण भारत में हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की नींव पड़ी। हैदराबाद उसकी राजधानी बना। चिनकुलीचखाँ को निजामउलमुल्क की उपाधि प्राप्त थी इसलिये वह हैदराबाद के निजाम के नाम से शासन करने लगा। उसने पूर्ण स्वतंत्र शासक की भाँति शासन किया।                            

बंगाल

औरंगजेब के शासनकाल में बंगाल, बिहार और उड़ीसा मुगल सल्तनत के तीन अलग-अलग सूबे थे। 1705 ई. में औरंगजेब ने मुर्शीद कुली जफरखाँ को बंगाल का नायब-निजाम और उड़ीसा का सूबेदार नियुक्त किया था। 1717 ई. में बादशाह फरूखसियर ने उसके नियंत्रण में बंगाल का सूबा भी दे दिया और उसे मुत्मात-उल-मुल्क अलाउद्दीन जफरखांँ बहादुर नासिरी नासिरजंग की उपाधि से विभूषित किया।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद वह स्वतंत्र शासक की भाँति शासन करने लगा। वह नाममात्र के लिए मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार करता था। मुर्शीदकुली जफर खाँ एक प्रतिभावान शासक सिद्ध हुआ। उसने अपने राज्य को समृद्ध बनाने के प्रयास किये। जून 1727 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

मुर्शीदकुली खाँ के कोई पुत्र नहीं था, अतः उसकी मृत्यु के बाद उसका दामाद शुजाउद्दीन मुहम्मदखाँ बंगाल का शासक हुआ। उसने बिहार के सूबे को भी जबर्दस्ती अपने अधीन कर लिया। इस प्रकार पूर्वी भारत के तीनों समृद्ध सूबे शुजाउद्दीन के शासन के अन्तर्गत चले गये।

मार्च 1739 ई. में शुजाउद्दीन मुहम्मद खाँ की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र सरफराज खाँ गद्दी पर बैठा। वह अत्यन्त विलासी था। इसलिये उसने शासन की तरफ ध्यान नहीं दिया। इस कारण शासन की वास्तविक शक्ति स्वार्थीं अमीरों के हाथों में चली गई। सरफराज खाँ के समय में अलीवर्दीखाँ बिहार का नायब सूबेदार था। उसका भाई हाजी अहमद भी सरफराज खां के दरबार में एक प्रभावशाली गुट का प्रमुख सदस्य था।

सरफराज खाँ की असावधानी का लाभ उठाकर, अलवर्दी खाँ ने अपने भाई हाजी अहमद के समर्थन से मुर्शिदाबाद पर आक्रमण कर दिया। 10 अप्रैल 1740 को एक युद्ध में सरफराज खाँ मारा गया और बंगाल  की गद्दी पर अलीवर्दी खाँ का अधिकार हो गया। मुगल बादशाह ने भी उसके अधिकार को स्वीकार कर लिया। इससे मुगल बादशाह की कमजोरी खुलकर सामने आ गई तथा बंगाल पूरी तरह स्वतंत्र हो गया।

अवध

अवध के स्वतंत्र राज्य का संस्थापक मीर मोहम्मद अमीन सआदतखाँ (सादतखाँ) बुरहानुलमुल्क था। वह मुगल दरबार में ईरानी अमीरों का नेता था, जो वजीर निजाम-उल-मुल्क का प्रतिद्वंद्वी था। सैयद बन्धुओं के पतन में उसने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

अतः बादशाह मुहम्मदशाह ने प्रसन्न होकर उसे सआदतखाँ बहादुर की उपाधि तथा आगरा की फौजदारी प्रदान की। इसी समय भरतपुर, आगरा और मथुरा के जाटों ने विद्रोह कर दिया। सआदतखाँ इस विद्रोह को कुचलने में असफल रहा। अतः सितम्बर 1722 में सवाई जयसिंह को आगरा की सूबेदारी दे दी गई।

इस अपमान से सआदतखाँ को धक्का पहुँचा परन्तु बादशाह ने उसे अवध का सूबेदार नियुक्त करके उसे शान्त करने का प्रयास किया। वास्तव में इस समय से ही अवध के स्वतंत्र राज्य का इतिहास आरम्भ होता है। अवध राज्य में अवध की सीमाओं के अतिरिक्त पूर्व में कानपुर, इलाहाबाद और बनारस तक के जिले तथा पश्चिम में वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिले सम्मिलित थे। सआदतखाँ  प्रतिभावान शासक सिद्ध हुआ। वह नाममात्र के लिए मुगल बादशाह के आधिपत्य को स्वीकार करता था। वस्तुतः वह स्वतंत्र शासक था।

पंजाब

सिक्खों के दसवें और अन्तिम गुरु गोविन्दसिंह के दो पुत्र मुगलों से युद्ध करते हुए मारे गये और दो पुत्र मुगलों द्वारा दीवार में जिन्दा चुनवा दिये गये। गुरु गोविन्दसिंह ने अपनी मृत्यु से पहले गुरु बनाने की प्रथा को समाप्त कर दिया और कहा कि जहाँ भी पाँच सिक्ख एकत्रित होंगे वहाँ मैं उपस्थित रहूँगा। इस प्रकार, उन्होंने सिक्ख सम्प्रदाय के हितों के बारे में निर्णय करने का अधिकार सिक्ख पंचायत को सौंप दिया।

गुरु गोविन्दसिंह ने सिक्खों को पूर्णतः सैनिक बनाया और खालसा सेना की स्थापना की। उन्होंने जीवनभर मुगलों से संघर्ष किया। औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् हुए उत्तराधिकार युद्ध में विजयी होकर बहादुरशाह मुगल बादशाह् बना। बहादुरशाह अपने भाई कामबख्श के विद्रोह को दबाने दक्षिण की तरफ गया, तब गुरु गोविन्दसिंह उसके साथ दक्षिण की ओर गये।

रास्ते में गोदावरी के किनारे नानदेड़ नामक स्थान पर दो अफगान पठानों ने छुरे से वार करके गुरु को घायल कर दिया। जब वे घायल अवस्था में मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए थे तभी गुरु माधवदास नामक वैरागी उनसे भेंट करने आया। वह गुरु से इतना प्रभावित हुआ कि उसने स्वयं को गुरु का बन्दा (दास) कहा। गुरु ने उसे बन्दा बहादुर के नाम से पुकारा।

गुरु ने बन्दा बहादुर को सिक्खों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा तथा अपने पाँच मुख्य अनुयायी तथा कुछ अन्य सिक्ख अनुयायी उसके साथ करके उसे पंजाब जाने का आदेश दिया। बन्दा जब दिल्ली पहुँचा तभी उसे गुरु की मृत्यु का समाचार मिला। उसने गुरु के आदेश को मानकर सिक्खों को नेतृत्व प्रदान किया। वह इतिहास में बंदा बैरागी के नाम से भी प्रसिद्ध है।

बन्दा बहादुर ने सिक्खों को गुरु का संदेश पहुँचाया और मुगलों के अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने का आह्नान किया। उसने सोनीपत से मुगल अधिकारियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष आरम्भ किया तथा वहाँ के मुगल फौजदार को युद्ध में परास्त किया। उसने शाहबाद, मुस्तफाबाद आदि स्थानों को जीतते हुए सरहिन्द पर आक्रमण किया जहाँ के फौजदार वजीर खाँ ने गुरु के दो पुत्रों को दीवार में जिन्दा चुनवाया था। वजीर खाँ युद्ध में मारा गया। उसकी अपार सम्पत्ति बन्दा के हाथ लगी।

बन्दा ने सरहिन्द के 28 परगने अपने अधीन कर लिये। बन्दा की इन सफलताओं ने उसे अत्यन्त लोकप्रिय बना दिया। बन्दा का उद्देश्य पंजाब में एक स्वतंत्र सिक्ख राज्य की स्थापना करना था। इसके लिए उसने लौहगढ़ को राजधानी बनाया, गुरु नानक और गुरु गोविन्दसिंह के नाम के सिक्के चलाये और सिक्ख राज्य की एक सील या मुहर भी बनवायी।

बन्दा ने सरहिन्द क्षेत्र में मुगल अधिकारियों को हटाकर सिक्ख अधिकारियों को नियुक्त किया। इस प्रकार उसने सबसे पहले सिक्ख राज्य की स्थापना की किंतु बन्दा बहादुर ने स्वयं न तो कोई पदवी धारण की और न कभी दरबार लगाया। उसने सभी कार्य गुरु के नाम से किये।

मुगल बादशाह पहले तो दक्षिण भारत के राज्यों के विरोध तथा उसके बाद राजपूत शासकों के विरोध को दबाने में व्यस्त रहा। इसका लाभ उठाते हुए बन्दा बहाुदर ने पंजाब से बाहर निकलकर गंगा-यमुना दोआब में सहारपुर और उसके निकट के क्षेत्रों तक आक्रमण किये। इस पर मुगल बादशाह ने फीरोजखाँ के नेतृत्व में एक सेना बन्दा के विरुद्ध भेजी।

बन्दा भागकर पहाड़ों में छिप गया। उसकी राजधानी लौहगढ़ पर मुगलों का अधिकार हो गया। बन्दा बहादुर ने साहस नहीं छोड़ा। वह निरन्तर मुगलों से संघर्ष करता रहा। पहले जहाँदरशाह और उसके बाद फरूखसियर ने सिक्खों के विद्रोह को दबाने का भरसक प्रयत्न किया।

अन्त में 1716 ई. में गुरूदास-नांगल नामक स्थान पर बन्दा बहादुर को मुगल सेना ने घेर लिया। आठ महिने तक मुगल सेना से घिरे रहने के बाद विवश होकर बन्दा बहादुर आत्म-समर्पण कर दिया। उसे तथा उसके साथियों को दिल्ली ले जाया गया, जहाँ उसे इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया। उसकी अस्वीकृति के बाद उसे तथा उसके साथियों का निर्ममता से वध कर दिया गया।

बन्दा की मृत्यु के बाद सिक्ख नेतृत्व-विहीन हो गये । जब सिक्खों के सामने न गुरु रहा, न गुरु का बन्दा, तब सिक्खों ने सरबत खालसा और गुरुमत्ता की प्रथाएँ आरम्भ कीं। वर्ष में दो बार- बैशाखी और दीवाली पर, सिक्खों ने विशाल सभाएँ करनी आरम्भ कीं जिन्हें सरबत खालसा कहा जाता था। सरबत खालसा में लिये गये निर्णयों को गुरूमत्ता कहा जाता था। बन्दा बहादुर के पश्चात् भी सिक्खों और मुगलों के बीच संघर्ष चलते रहे।

नादिरशाह के आक्रमण के बाद मुगल सत्ता का बिखराव चरम पर पहुंच गया था। इस कारण चारों तरफ अव्यवस्था का वातावरण था। पंजाब में सिक्खों का संघर्ष जारी था। नादिरशाह के आक्रमण से उत्पन्न अव्यवस्था का अंत भी नहीं हुआ था कि अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण आरम्भ हो गये।

नादिरशाह के आक्रमण के बाद सिक्खों ने स्वयं को 100-100 व्यक्तियों के छोटे दलों में संगठित कर लिया। प्रत्येक दल का एक नेता होता था। दल के सभी सदस्य अपने नेता के आदेश का पालन करते थे। 1748 ई. में सभी दलों ने मिलकर दल खालसा का गठन किया।

दल खालसा में सम्मिलित सभी दलों को पुनः 11 जत्थों में विभाजित किया, जो बाद में मिसलों के नाम से विख्यात हुए। इन मिसलों के पराक्रमी और योग्य सिक्ख नेताओं ने पंजाब के भिन्न-भिन्न भागों में अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिये। धीरे-धीरे सम्पूर्ण पंजाब में 12 छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गये। आगे चलकर रणजीतसिंह ने इन मिसलों को जीतकर पंजाब में एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया। इस प्रकार पंजाब मुगल सल्तनत से बाहर हो गया।

मैसूर

भारत के पूर्वी और दक्षिणी घाट के सुदूर भाग में मैसूर नामक छोटा राज्य था। किसी समय में यह क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य का अंग था। 1565 ई. में तालीकोटा के युद्ध के बाद विजयनगर साम्राज्य पतनोन्मुख हो गया।  इस महान् साम्राज्य के पतन के बाद 1570 ई. में रामराय के भाई तिरूमाल ने वेनुगोंडा को राजधानी बनाया और अरविंदु वंश की नींव रखी।

तिरूमाल के बाद रंग (द्वितीय) और उसके बाद वेंकट (द्वितीय) ने शासन किया। वेंकट (द्वितीय) के शासन काल में विजयनगर राज्य का तेजी से विघटन आरम्भ हो गया। 1612 ई. में विजयनगर के शासक वेंकट (द्वितीय) ने मैसूर के एक सरदार वाडियार को ‘राजा’ की उपाधि से विभूषित किया।

तब से मैसूर के स्वतंत्र राज्य की स्थापना हो गई। वाडियार वंश के हिन्दू राजाओं ने मैसूर राज्य पर लम्बे समय तक शासन किया। 1704 ई. में उन्हें औरंगजेब की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी किन्तु व्यवहार में वे स्वतंत्र शासक बने रहे। यहाँ के शासकों ने स्वतंत्र शासकों की भाँति राज्य विस्तार की नीति अपनायी।

1732 ई. में अल्पवयस्क राजकुमार चिकाकृष्णराज मैसूर राज्य का शासक बना। कृष्णराज नाममात्र का शासक था। शासन की वास्तविक शक्ति देवराज तथा नन्दराज नामक दो भाइयों के हाथों में थी। बाद में नन्दराज राज्य का सर्वेसर्वा बन गया। नन्दराज के समय में ही मैसूर राज्य की सेना के एक अधिकारी हैदरअली ने 1761 ई. में सेना की सहायता से मैसूर राज्य हड़प लिया। 18वीं शताब्दी के अन्त तक मैसूर राज्य ने भारत के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मराठा राज्य

मराठों के स्वतंत्र राज्य की स्थापना छत्रपति शिवाजी ने की थी। शिवाजी की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने शिवाजी के पुत्र और उत्तराधिकारी शम्भाजी को समाप्त करके महाराष्ट्र पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की किन्तु यह सफलता स्थायी न रह सकी। शम्भाजी की मृत्यु के बाद महाराष्ट्र को स्वतंत्र करवाने के लिए मराठों का स्वतंत्रता संग्राम आरम्भ हुआ जो औरंगजेब की मृत्यु तक चला।

औरंगजेब अपने जीवनकाल में मराठों का दमन नहीं कर सका। शम्भाजी के बाद शिवाजी के दूसरे पुत्र राजाराम ने और तत्पश्चात् राजाराम की पत्नी ताराबाई ने संघर्ष जारी रखा। मराठों ने न केवल महाराष्ट्र को ही स्वतंत्र करा लिया, अपितु मुगल-छावनी पर भी धावे मारने आरम्भ कर दिये।

1707 ई. में शम्भाजी का पुत्र शाहूजी छत्रपति बना। उसके शासनकाल में पेशवा की शक्ति का उत्कर्ष हुआ, जो बाद में छत्रपति से भी ऊपर उठ गया। पेशवाओं के नेतृत्व में मराठों ने उत्तर भारत तक अपना प्रभाव स्थापित किया किन्तु अंग्रेजों ने कूटनीति एवं सैनिक शक्ति के बल पर मराठा शक्ति को समाप्त कर दिया। भारतीय इतिहास में लगभग डेढ़ सौ वर्षों तक मराठों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उपर्युक्त राज्यों के अतिरिक्त मुगल सत्ता के पतनोन्मुख काल में राजपूताने के कई शासक मुगल सत्ता से मुक्त होकर स्वतंत्र हो गये। इसी काल में भारत में यूरोपीय शक्तियाँ भी प्रबल हो उठीं। यूरोपीय शक्तियों ने पहले दक्षिण में और बाद में पूर्वी भारत में अपनी बस्तियाँ स्थापित कीं। इनके अतिरिक्त भी भारत में अनेक छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गये और मुगल सल्तनत का पूरी तरह विघटन हो गया।

मुगल सल्तनत के पतन के प्रमुख कारण

औरंगजेब की कट्टर नीतियों के कारण भारत में मुगलों के मित्रों एवं निष्ठावान सेनापतियों की संख्या में तेजी से कमी आई तथा चारों ओर शत्रुओं और विरोधियों का बोलबाला हो गया। इस कारण मुगलों के राज्य का वैभव और ऐश्वर्य मंद पड़ने लगा। यद्यपि औरंगजेब के जीवन काल में मुगल सत्ता का विघटन नहीं हुआ किंतु उसकी मृत्यु के बाद चारों तरफ नित्य नये राज्य स्थापित होने लगे जिससे मुगल राज्य बहुत कम समय में ही पतन के गर्त में लुढ़क गया। अधिकांश इतिहासकार औरंगजेब को मुगल सल्तनत के पतन के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं। इस मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं।

(1.) औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता

औरंगजेब कट्टर सुन्नी और धर्मान्ध शासक था। वह स्वयं को केवल सुन्नी मुसलमानों का बादशाह मानता था। उसने शासन के लिये कुरान द्वारा निर्देशित नियम बनाये और लोगों को इन नियमों का पालन करने के लिए बाध्य किया। भारत को इस्लामी राज्य में परिवर्तित करने के उद्देश्य से उसने गैर-मुसलमानों को इस्लाम स्वीकार कराने के लिये सुनियोजित ढंग से काम किया। देश की अधिकांश प्रजा गैर-मुस्लिम थी जो अपने धर्म और संस्कृति को बनाये रखने के लिये दृढ़ संकल्प थी।

तः प्रजा में औरंगजेब की नीति का विरोध होना स्वाभाविक था। औरंगजेब को इस बात की परवाह नहीं थी कि उसकी धर्मान्ध नीति के क्या परिणाम होंगे? उसकी धर्मान्धता के कारण जाटों, सतनामियों, सिक्खों, मराठों, राजपूतों के विद्रोह फूट पड़े और सम्पूर्ण देश विद्रोहों की आग से झुलसने लगा।

राजपूत जाति अकबर के समय से मुगलों की सेवा कर रही थी किंतु औरंगजेब ने राजपूतों को बुरी तरह नाराज कर दिया जिन्होंने सल्तनत से मुख मोड़ लिया। औरंगजेब का विनाश तो उसी समय आरम्भ हो गया था जब उसने मारवाड़ के राठौड़ों का राज्य खालसा कर लिया।

सम्पूर्ण उत्तर भारत के हिन्दू मन्दिरों को ध्वस्त करके वहाँ की दैव मूर्तियों को अपमानित करने, तोड़ने तथा नष्ट करने की कार्यवाही से समस्त हिन्दू प्रजा मुगलों के खिलाफ हो गई। औरंगजेब ने हिन्दुओं पर जजिया कर लगाकर यह सिद्ध कर दिया कि वह विधर्मी प्रजा को सुख से नहीं जीने देगा। उसने शिया मुसलमानों को भी नष्ट करने का प्रयास किया। इससे शिया मुसलमान भी उसके शत्रु बन गये।

(2.) औरंगजेब की शंकालु प्रवृत्ति

औरंगजेब ने अपने पिता को बंदी बनाकर और भाइयों तथा भतीजों को तख्त प्राप्त किया था इसलिये वह हर किसी के प्रति शंकित रहता था। वह अपने पुत्रों को शासन व्यवस्था का दायित्व सौंपने में भी डरता इस शंकालु प्रवृति के कारण वह अपने पुत्रों को न केवल प्रशासन से दूर रखता था, अपितु उनके पीछे गुप्तचर भी लगाये रखता था।

इसका परिणाम यह निकला कि उसके पुत्र आदेशों व नीतियों का विरोध करने को तत्पर रहते थे। इतना ही नहीं, उसके पुत्र उसके विरुद्ध षड्यन्त्र और विद्रोह करने को भी इच्छुक रहते थे। शाहजादा अकबर इस प्रवृत्ति से नाराज होकर राजपूतों से जा मिला और अपने पिता औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया।

इस कारण वह अपना कोई योग्य उत्तराधिकारी नहीं तैयार कर सका। औरंगजेब अपने मन्त्रियों, अधिकारियों व सेनापतियों को भी संदेह की दृष्टि से देखता था। इसलिए  वह राज्य के छोटे-से-छोटे काम को स्वयं करने का प्रयत्न करता था। फलतः उसके मंत्री और अधिकारी निर्णय लेने में असमर्थ हो गये। उसके सेनापति घोर संकट में भी असहाय होकर बादशाह के आदेशों के लिए मुँह ताकते थे। जब तक बादशाह में शारीरिक योग्यता रही, उसने सल्तनत को नियंत्रित रखा किन्तु उसकी वृद्धावस्था और मृत्यु के बाद सल्तनत छिन्न-भिन्न होने लगा।

(3.) औरंगजेब के प्रशासन में दोष

औरंगजेब ने अत्यन्त ही केन्द्रीभूत एक-तंत्रीय शासन व्यवस्था स्थापित की थी। ऐसी शासन व्यवस्था की सफलता शासक की शक्ति एवं योग्यता पर निर्भर करती है। जब तक औरंगजेब में शारीरिक योग्यता बनी रही, तब तक शासन का काम ठीक तरह से चलता रहा। वृद्धावस्था में भी वह दरबार में रहकर प्रशासन का कार्य करने का प्रयत्न करता रहा।

उसके विचारों में धार्मिक कट्टरता का अतिरेक होने के कारण उसके अधिकांश निर्णय गलत होते थे। मआसिर-ए-आलमगिरी में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं कि औरंगजेब के शासन में छोटे-बड़े अधिकारी भ्रष्ट आचरण से धन कमाते थे। इतना ही नहीं, स्वंय बादशाह भी बड़ी-बड़ी रकमें तथा भेंटे लेकर, अधिकारियों के इच्छित स्थानों पर तबादले करता था। ऐसे प्रशासन का विनाश अवश्यम्भावी था।

(4.) औरंगजेब की दोषपूर्ण दक्षिण नीति

औरंगजेब की दक्षिण नीति मुगल सल्तनत के लिए विनाशकारी सिद्ध हुई। उसके समय में दक्षिण भारत में तीन मुख्य शक्तियाँ थीं- बीजापुर, गोलकुण्डा और मराठा। ये तीनों शक्तियाँ आपस में लड़ती रहती थीं जिससे दक्षिण में शक्ति-सन्तुलन बना हुआ था किन्तु औरंगजेब ने बीजापुर और गोलकुण्डा को मात्र इसलिए नष्ट कर दिया क्योंकि वे शिया राज्य थे।

इस कारण मुगलों की सीधी टक्कर मराठों से होने लगी। औरंगजेब ने नवोदित मराठा शक्ति को नष्ट करने हेतु मुगल सामा्रज्य के समस्त संसाधन झौंक दिये किन्तु वह मराठा शक्तियों को दबा नही सका। औरंगजेब ने अन्तिम 25 वर्ष दक्षिण के युद्धों में ही व्यतीत किये, फलस्वरूप राज्य के समस्त बड़े सेनापति एवं अधिकारी दक्षिण पहुँच गये और केन्द्रीय शासन दूसरी श्रेणी के लोगों के हाथ में आ गया, जिनमें प्रशासनिक क्षमता की कमी थी।

इससे उत्तर भारत के प्रशासन में अराजकता फैल गई एवं चारों तरफ छोटे-बड़े विद्रोह उठ खड़े हुए। दक्षिण के लम्बे युद्धों के कारण सल्तनत का राजकोष रिक्त हो गया। वस्तुतः दक्षिण भारत, औरंगजेब के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। लम्बे समय तक उत्तर भारत में उसकी अनुपस्थिति से केन्द्रीय सत्ता कमजोर हो गई तथा सल्तनत की शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गयी।

(5.) औरंगजेब द्वारा भू-राजस्व की वसूली के तरीके में परिवर्तन

अकबर के समय लगान (भू-राजस्व) के निर्धारण का जो तरीका था, औरंगजेब ने उसे बन्द कर दिया। औरंगजेब से पहले, सरकारी अधिकारी लगान वसूल करते थे किन्तु औरंगजेब ने किसानों से लगान वसूलने के लिये ठेकेदारी प्रथा आरम्भ कर दी। इस कारण किसनांे से मनमाना लगान वसूल करते थे। इससे लाखों किसानों की दशा बिगड़ गई।

निरन्तर युद्धों के चलने से देश में कृषि और व्यापार नष्ट प्रायः हो गये। अकाल तथा महामारी के कारण स्थिति ने विकराल रूप धारण कर लिया। दक्षिण के युद्धों में अत्यधिक जन-धन की हानि हुई थी इस कारण औरंगजेब ने किसानों एवं जनसाधारण पर कर बढ़ा दिये। इससे सल्तनत में असन्तोष बढ़ गया और विद्रोह की ज्वाला प्रज्वलित हो उठी। स्वयं औरंगजेब ऐसी स्थिति देखकर कहा करता था कि  उसकी मृत्यु के बाद कैसा प्रलय आयेगा?

(6.) औरंगजेब की अन्य त्रुटियाँ

औरंगजेब में चालाकी और मक्कारी कूट-कूटकर भरी हुई थी। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वह निम्नतम साधन अपनाने में संकोच नहीं करता था। षड्यन्त्र और चालाकी से शत्रु को जीतना उसका स्वभाव था। इस स्वभाव के कारण उसने बहुत से लोगों को शत्रु बना लिया।

उसने शियाओं और दाऊदी बोहरों पर भीषण अत्याचार किये। शाही नौकरियाँ देने में पक्षपात किया। राजपूतों के राज्य हड़प लिये। उसने देश की सांस्कृतिक थाती को विकसित करने का कोई प्रयास नहीं किया। ललित कलाओं की ओर ध्यान न देने से भारत की सभ्यता ही खतरे में पड़ गई। ऐसी शासन व्यवस्था का अन्त होना निश्चित ही था।

मुगल सल्तनत के पतन के अन्य कारण

उपर्युक्त कारणों से औरंगजेब को मुगल सल्तनत के पतन के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता है किन्तु मुगल सल्तनत के पतन के कुछ बड़े कारण औरंगजेब के पूर्व भी विद्यमान थे और कुछ नये कारण उसकी मृत्यु के बाद उत्पन्न हो गये थे। इसलिये केवल औरंगजेब को मुगल सल्तनत के पतन के लिए उत्तरदायी नहीं माना जा सकता। मुगल सल्तनत के पतन के लिए अन्य निम्नलिखित कारण इस प्रकार थे-

(1.) परवर्ती मुगल बादशाहों की चारित्रिक दुर्बलताएँ

मध्ययुगीन राज्य, शासक की योग्यता पर टिके हुए होते थे। यदि शासक योग्य और चरित्रवान होता था तो ही राज्य को स्थायित्व प्राप्त होता था किन्तु औरंगजेब के उत्तराधिकारी न तो योग्य थे और न चरित्रवान। वे सुरा, सुंदरी और आखेट से अत्यधिक प्रेम करते थे। औरंगजेब के उत्तराधिकारी बहादुरशाह (प्रथम) को तो लोग मस्त राजा ही कहा करते थे।

वह अपनी प्रेयसी लालकंुवर के प्रेम में डूबा रहता था। फरूखसियर जैसा डरपोक बादशाह, मुगल वंश में कोई हुआ ही नहीं था। अहमदशाह और उसके उत्तराधिकारी सर्वथा अयोग्य थे। इस कारण मुगलिया सल्तनत का काम स्वार्थी और षड्यन्त्री लोगों के हाथों में चला गया जिन्होंने सल्तनत का नाश कर दिया।

मुगल बादशाहों ने अपने जीवन के आदर्श और यहाँ तक कि दीवानी व फौजदारी कानून भी अरब, बगदाद और काहिरा से लेकर भारत में लागू करने के प्रयास किये जो भारतीय परिस्थितियों में अत्यंत अव्यवहारिक थे। इस कारण औरंगजेब तथा उसके बाद के मुगल बादशाहों को बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा का समर्थन नहीं मिला।

औरंगजेब तथा उसके बाद के मुगल बादशाहों ने इसकी परवाह भी नहीं की कि उन्हें हिन्दुओं का समर्थन और सहयोग मिले। शासकों की धार्मिक कट्टरता के कारण सल्तनत के समस्त गैर-मुसलमान, शासन के शत्रु बन गये। उन्होंने मुगलों से लोहा लिया जिससे सल्तनत का पतन हो गया।

(2.) मुगल अमीरों एवं सामंतों का नैतिक पतन

जिस प्रकार मुगल बादशाहों का नैतिक पतन हो गया, उसी प्रकार मुगल सल्तनत के अमीरों तथा सामंतों में राजभक्ति और कर्त्तव्यपरायणता का लोप हो गया। वे भी बादशाहों और शहजादों की भांति स्वार्थी एवं विलासी हो गये। सैयद बन्धु, अवध का सूबेदार सफदरजंग और दक्षिण का सूबेदार निजामउलमुल्क यद्यपि योग्य अमीर थे किन्तु उन्होंने मुगल बादशाहों को अपनी स्वार्थसिद्धि का साधन बना लिया।

अमीरों के हरम में सुन्दर स्त्रियों की भीड़ रहने लगी। वे युद्ध-क्षेत्र में भी अपना हरम साथ रखने लगे और अत्यधिक शराब सेवन के अभ्यस्त हो गये। ऐसे अमीरों के युवा पुत्रों का दुश्चरित्र होना स्वाभाविक ही था। इस प्रकार समस्त सामन्तीय व्यवस्था का ही नैतिक पतन हो गया।

सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘कोई भी मुगल सामन्त एक या दो पीढ़ियों से अधिक समय तक अपना महत्त्व बनाये नहीं रख सका था। यदि किसी सामन्त की वीरता के विषय में इतिहासकार ने तीन पृष्ठ लिखे तो उसके पुत्र के कार्यों का वर्णन केवल एक ही पृष्ठ में हुआ और उसके पौत्र का वर्णन कुछ इस प्रकार के शब्दों में- ‘उसने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया’ समाप्त हो जाता।’

मुगल सामन्त सल्तनत की शक्ति के वास्तविक आधार थे, जब उनकी निष्ठायें समाप्त हो गईं तो सल्तनत का आधार भी समाप्त हो गया।

(3.) दरबार एवं हरम की गुटबंदी

अकबर के समय से ही मुगल दरबार एवं हरम की गुटबंदी शासन में दखल करती आई थी। जहाँगीर के समय में यह गुटबंदी और बढ़ गई। इस कारण मुगल दरबार एवं हरम गुटबन्दियों एवं षड्यन्त्रों के अखाड़े बने रहते थे। सत्ता और शक्ति की लूट खसोट के कारण बादशाह के अतिरिक्त और किसी को सल्तनत की दुर्दशा के प्रति चिंता नहीं रहती थी।

अधिकांश लोग स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे। अमीर, शहजादे एवं बेगमें अपने गुट को शक्तिशाली बनाने के लिये एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र करते थे तथा एक दूसरे के विरुद्ध बादशाह के कान भरते थे। यहाँ तक कि विरोधी गुट पर सशस्त्र आक्रमण कर देते थे। इस अव्यवस्था ने राज्य परिवार की शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया। इससे सल्तनत की शक्ति भी छिन्न-भिन्न हो गई।

(4.) उत्तराधिकार के नियम का अभाव

मुगलों में उत्तराधिकार का कोई सर्वमान्य नियम नहीं था। उत्तराधिकार का निर्णय सदैव युद्ध से ही होता था। इस कारण तख्त प्राप्ति के लिये शहजादों में, बादशाह के जीवन काल में ही युद्ध चलते रहते थे जो बाद में भी जारी रहते थे। हुमायूँ का जीवन भर अपने तीनों भाइयों से झगड़ा रहा।

हुमायूँ के भाइयों को जब भी अवसर मिला उन्होंने स्वयं को हुमायूँ से विद्रोह करके स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। भाइयों के कारण ही हुमायूँ का राज्य पूरी तरह नष्ट हो गया। भाइयों को नष्ट करके ही हुमायूँ दुबारा राज्य का निर्माण कर सका। अकबर के भाई मिर्जा हकीम ने वयस्क होते ही स्वयं को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर दिया।

अकबर को उसके विरुद्ध सेना भेजनी पड़ी। अकबर के पुत्र सलीम ने भी वयस्क होने पर तख्त प्राप्त करने के लिए विद्रोह किया और उसके विरुद्ध शाही सेना भेजनी पड़ी। जहाँगीर के पुत्र खुसरो ने भी विद्रोह किया। जहाँगीर की मृत्यु के बाद नूरजहाँ ने शहरयार को बादशाह घोषित कर दिया किन्तु शाहजहाँ ने अपने श्वसुर आसफ खाँ की सहायता से शहरयार व अन्य शहजादों की हत्या करवाकर मुगलों के तख्त पर अधिकार किया।

शाहजहाँ के उत्तराधिकार के लिये उसके जीवनकाल में ही उसके पुत्रों में इतना भीषण युद्ध हुआ कि सारा उत्तर भारत अस्त-व्यस्त हो गया। शाहजहाँ के जीवित रहते ही औरंगजेब उसे कैद करके बादशाह बन गया। औरंगजेब के जीवन काल में शहजादा अकबर ने विद्रोह किया और अंत में उसे भारत से ही चले जाना पड़ा। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के लिये संघर्ष की परम्परा और तेज हो गई। इस कारण सल्तनत की शक्ति इतनी कमजोर पड़ गई कि उसे हल्के प्रहार से भी ध्वस्त किया जा सकता था।

(5.) सैन्य प्रणाली की कमजोरी

मुगल सेना में विभिन्न मनसबदारों द्वारा सैनिकों की भरती की जाती थी। वे सैनिक मनसबदार के नियंत्रण में कार्य करते थे। सैनिकों को वेतन शाही खजाने से न दिया जाकर मनसबदारों द्वारा चुकाया जाता था। अतः सैनिक मनसबदार को ही अपना मालिक मानते थे। बादशाह से उन्हें कोई लेना-देना नहीं था।

इस कारण वे मनसबदार के निर्देश पर शाही सेना से भी लड़ने में संकोच नहीं करते थे। मनसबदार शत्रु से घूस लेकर बादशाह से विश्वासघात करता था तथा सेना उस मनसबदार के नेतृत्व में बनी रहती थी। मनसबदारों की पारस्परिक ईर्ष्या इतनी बढ़ गई थी कि एक मनसबदार यह नहीं चाहता था कि दूसरे मनसबदार को किसी भी जीत का श्रेय मिले।

इस कारण कई बार शाही सेना जीती हुई लड़ाई हार जाती थी। परवर्ती मुगल बादशाहों ने बदलती हुई नवीन सैनिक प्रणाली के प्रति उदासीनता दिखाई। अकबर के काल में ही भारतीय तोपों की अपेक्षा पाश्चात्य तोपों का महत्त्व स्पष्ट हो गया था, क्योंकि पाश्चात्य तोपें हल्की होने से बड़ी सरलता से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जायी जा सकती थीं किन्तु मुगल शासक ऐसी तोपों का महत्त्व नहीं समझ सके।

मुगलों ने सामुद्रिक शक्ति की भी अवहेलना की, इसलिए जहाजी बेड़ों की लड़ाई से वे सर्वथा अनभिज्ञ रहे। आगे चलकर यूरोपीय शक्तियों ने सामुद्रिक युद्धों में मुगलों को करारी मात दी। पाश्चात्य हथियारों और नवीन युद्ध प्रणाली के प्रति दिखाई गई उपेक्षा मुगलों के लिए घातक सिद्ध हुई।

(6.) बादशाहों द्वारा धन का अपव्यय

अकबर ने शासन में जिस संतुलित नीति का अवलम्बन किया था, उससे मुगल सल्तनत का चहुंमुखिी विकास हुआ। इस कारण प्रजा में समृद्धि आई और सरकार की आय में भारी वृद्धि हुई किन्तु उसके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में आर्थिक ढाँचा बिगड़ने लग गया। कोष की पूर्ति करने के लिये सरकार ने किसानों, व्यपारियों एवं जिन्स-उत्पादकों पर करों का इतना बोझ लाद दिया कि प्रजा की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी।

अकबर के काल में भू-लगान सीधा किसानों से लिया जाता था किन्तु औरंगजेब तथा उसके उत्तराधिकारियों के काल में यह पद्धति  लगभग समाप्त कर इसके स्थान पर ठेकेदारी प्रथा आरम्भ की गई, जिससे किसानों का अधिक शोषण होने पर भी राज्य की आय घट गई। मुगल बादशाहों की फिजूलखर्ची ने देश को बर्बाद कर दिया।

शाहजहाँ ने कन्धार और मध्य एशिया के युद्धों में विपुल धन का अपव्यय किया। औरंगजेब के काल में विद्रोहों को दबाने और दक्षिण भारत के मोर्च पर पच्चीस वर्ष तक युद्ध लड़ने के कारण राज्य का कोष रिक्त हो गया। बहादुरशाह (प्रथम) न तो अच्छी सेना रख सकता था और न ठीक प्रकार से शासन ही चला सकता था।

आलमगीर (द्वितीय) के शासनकाल में तो स्वयं बादशाह भूखा मरने लगा और शाही परिवार के जेब खर्च को वजीर हड़पने लगा। सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘एक बार तो तीन दिन तक जनानखाने के रसोई घर में चूल्हा तक नहीं जला।’ आश्चर्य की बात यह है कि ऐसी दिवालिया मुगल सरकार भी पचास वर्ष तक चलती रही।

(7.) हिन्दुओं की उपेक्षा

अकबर के अतिरिक्त समस्त मुगल बादशाह अपने चार प्रमुख कर्त्तव्य मानते थे- (1.) सल्तनत के भीतर शान्ति और व्यवस्था कायम रखना, (2.) बाह्य आक्रमणों से सल्तनत की रक्षा करना, (3.) अधिक से अधिक लगान वसूल करना तथा (4.) भारत से कुफ्र समाप्त करके इस्लाम का प्रचार करना। इनमें से अंतिम दो उद्देश्य भारत जैसे हिन्दु बहुल एवं विशाल देश के लिये उपयुक्त नहीं थे। साधारण जनता मुगलों को विदेशी समझकर उनसे असहयोग करती थी।

(8.) शियाओं की उपेक्षा

बैरमखाँ तथा अब्दुर्रहीम खानखाना जैसे प्रबल शिया सेनापतियों की सहायता मिल जाने पर भी मुगल बादशाहों एवं सुन्नी अमीरों में शियाओं के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं पनप सका। शिया बादशाह तहमास्प द्वारा दी गई सहायता से भी सुन्नी मुसलमान, शियाओं के प्रति अपना दृष्टिकोण नहीं बदल सके।

वे सुन्नियों को प्रोत्साहन देने एवं शियाआंे की उपेक्षा करने में कभी भी संकोच नहीं करते थे। इस कारण सल्तनत तथा समाज में शासक वर्ग से भिन्न, शिया मुसलमानों का नया विघटन खड़ा हो गया। इससे शिया-सुन्नियों के झगड़े बहुत बढ़ गये।

(9.) देश की आर्थिक व सामाजिक स्थिति

कुछ इतिहासकारों का मत है कि भारत की मध्यकालीन आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति मुगलों के पतन का मूल कारण थी। मुगलों की शासन प्रणाली ने समाज में खराब परिस्थितियों का निर्माण किया। मुगलों की जागीरदार प्रथा ने सल्तनत के पतन में बड़ा योगदान दिया। जागीरदारों की लूटमार के कारण शासन में न्याय मिलना असंभव हो गया। सरकार लोगों के जान-माल की सुरक्षा नहीं कर सकी। महत्त्वाकांक्षी सामन्तों एवं प्रान्तीय सूबेदारों ने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये और मुगल सल्तनत का विघटन हो गया।

(10.) शासन में भ्रष्टाचार

इस कारण देश में चारों ओर अशांति, अविश्वास एवं अव्यवस्था का माहौल बना रहता था तथा देश में उद्योग-धन्धों एवं व्यापार के विकास की गति अत्यन्त धीमी बनी रहती थी। दक्षिण के दीर्घकालीन युद्धों के कारण देश के वाणिज्य, व्यापार तथा उद्योग नष्ट प्रायः हो गये। देश की निर्धन प्रजा और भी निर्धन हो गई।

शासन में घूसखोरी का बोलबाला हो गया। उच्च पदाधिकारी से लेकर छोटे-से-छोटा कर्मचारी रिश्वत लेने का अभ्यस्त हो गया। बादशाह स्वयं भी घूसखोरी से अछूते न रहे। समाज का प्रत्येक वर्ग अपने से निम्न वर्ग को दबाकर धन ऐंठने का प्रयास करता था।

(11.) नादिरशाह तथा अहमशाह अब्दाली के आक्रमण

लड़खड़ाती हुई मुगल सल्तनत पर 1739 ई. में नादिरशाह और 1760 ई. में अहमदशाह अब्दाली ने घातक प्रहार किये, जिससे मुगलों की रही-सही शक्ति भी नष्ट हो गयी।

(12.) अंग्रेज शक्ति का उदय

सत्रहवीं शताब्दी में अंग्रेज भारत में व्यापार करने आये और फिर अठारवीं शताब्दी में जब उन्होंने अपने लिए अनुकूल परिस्थितियाँ देखी तो भारत में अपना राज्य स्थापित करने की सोचने लगे। शक्तिहीन मुगल सत्ता अंग्रेजों का सामना नहीं कर सकी, अतः मुगल सल्तनत का विघटन सदा के लिये अस्त हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – औरंगजेब (आलमगीर )

औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

मुगल सल्तनत का अंत

0
मुगल सल्तनत का अंत - www.bharatkaitihas.com
मुगल बादशाह फर्रूखसीयर

मुगल सल्तनत का अंत कोई आकस्मिक राजनीतिक घटना नहीं थी। मुगल सल्तनत का विघटन तो औरंगजेब के जीवनकाल में ही आरम्भ हो गया था।

मुगल सल्तनत का अंत होने के कारण

मुगल दरबार में दलबन्दी

अमीरों, मनसबदारों, शहजादों तथा बेगमों के निजी स्वार्थों और आपसी स्पर्द्धा के कारण हुमायूँ के समय से ही मुगल दरबार में दलबन्दी चली आ रही थी। इसी दलबंदी के कारण शहजादों में प्रायः शीत युद्ध आरम्भ होते थे जो बादशाह के बूढ़े होने पर खूनी संघर्ष में बदल जाते थे। औरंगजेब की मृत्यु के समय उसके दरबार में कई दल थे।

बहादुरशाह के शासनकाल में मुगल दरबार ईरानी तथा तूरानी, दो दलों में विभक्त हो गया। प्रथम दल का नेतृत्व सैयद बन्धु कर रहे थे। चूंकि फर्रूखसियर सैयद बन्धुओं के सहयोग से बादशाह बना था। इसलिये उसने सैयद अब्दुल्ला को अपना वजीर तथा सैयद हुसैन अली को बख्शी नियुक्त किया।

1720 ई. तक मुगल सल्तनत पर सैयद बन्धुओं का पूर्ण प्रभाव रहा। राजनैतिक सत्ता उनके हाथों में केन्द्रित रही। फर्रूखसियर उनके हाथों की कठपुतली बनकर रहा। इस स्थिति से तंग आकर फर्रूखसियार ने सैयद बन्धुओं के प्रभाव को समाप्त करने हेतु षड्यन्त्र रचने आरम्भ  किये।

बादशाह को मीर जुमला, निजाम-उल-मुल्क तथा इनायतउल्ला कश्मीरी का सहयोग प्राप्त हो गया। फर्रूखसियार ने सैयद हुसैन अली को राजपूतों के विरुद्ध भेजकर उसे मरवाना चाहा किन्तु इस काम में सफलता नहीं मिली। तत्पश्चात् उसे दक्षिण का सूबेदार बनाकर भेज दिया तथा पीछे से दारदखाँ को गुप्त रूप से उसकी हत्या करने के लिए रवाना कर दिया किन्तु यह प्रयत्न भी असफल रहा।

फर्रूखसियर ने सैयद अब्दुल्ला को मरवाने के भी षड्यन्त्र किये, जिससे सैयद बन्धुओं को फर्रूखसियर के षड्यन्त्रों का पता चल गया। सैयद अब्दुल्ला ने सैयद हुसैन अली को मराठों से सहायता लेकर दिल्ली पर आक्रमण करने हेतु लिखा। सैयद हुसैन अली मराठों को लेकर दिल्ली आ धमका। सैयद बन्धुओं ने फर्रूखसियर को बन्दी बनाकर उसकी हत्या कर दी।

फर्रूखसियर को अपदस्थ करने तथा उसकी हत्या करने से सैयद बन्धुओं के हौंसले बढ़ गये। उन्होंने अगले दस माह में एक-एक करके तीन मुगल शहजादे मुगलों के तख्त पर बैठाये। तीनों शहजादों में से कोई भी तख्त पर नहीं बैठना चाहता था। जब रफी-उद्-दरजात को तख्त पर बैठाने के लिए ले जाया गया, तब उसकी माता फूट-फूटकर रो रही थी।

तूरानी दल के नेता मीर जुमला ने सैयद बन्धुओं के प्रभाव को रोकने का अथक् प्रयास किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। धीरे-धीरे सैयद बन्धुओं की निरंकुश शक्ति के विरुद्ध मुगल दरबार में अन्य अमीर भी उठ खड़े हुए। मुहम्मदशाह ने स्वयं को सैयद बन्धुओं के चंगुल से मुक्त कराने का संकल्प लिया।

उसने एक षड्यन्त्र रचकर अक्टूबर 1720 में फतेहपुर सीकरी से 45 मील दूर हुसैन अली का वध कर दिया। सैयद अब्दुल्ला ने अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए विद्रोह किया किन्तु मुहम्मदशाह ने उसे बन्दी बना लिया। 1722 ई. में सैयद अब्दुल्ला को विष देकर उसकी हत्या की गई।

सैयद बन्धुओं के पतन के बाद मुहम्मदशाह ने अमीनखाँ को अपना वजीर बनाया, जिसने एतमामुद्दौला की उपाधि धारण की। जनवरी 1721 में उसकी मुत्यु हो गयी। इस पर मुहम्मदशाह ने निजाम-उल-मुल्क को दक्षिण से बुलाकर अपना वजीर नियुक्त किया। निजाम अत्यन्त ही योग्य प्रशासक था और उसने सैयद बन्धुओं का दमन करने में पूर्ण सहयोग दिया था।

इसी कारण उसे वजीर का पद प्राप्त हुआ था। कुछ समय बाद बादशाह से उसके मतभेद उत्पन्न हो गये। इसलिए वह दक्षिण में जाकर हैदराबाद में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के प्रयास में लग गया किन्तु सिद्धान्त रूप में वह मुगल बादशाह के प्रभुत्व को मानता रहा। निजाम के दक्षिण जाते ही दरबार में पुनः दलबन्दी आरम्भ हो गयी।

एक तरफ तुर्की एवं मंगोल अमीर थे तो दूसरी ओर हिन्दुस्तानी अमीर। तुर्की व मंगोल अमीरों का नेता कमरूद्दीनखाँ था जबकि हिन्दुस्तानी मुसलमानों का नेता खानेदौरां था। खानेदौरां, निजाम और मराठों की बढ़ती हुई शक्ति को रोकना चाहता था किन्तु उसे सफलता नहीं मिली। फिर भी वह मुगल दरबार पर अपना प्रभाव बनाये रहा।

नादिरशाह के आक्रमण के समय निजामउलमुल्क दिल्ली में था तथा सल्तनत का शासन उसके हाथों में था। खानेदौरां मीर बख्शी के पद पर था। खानेदौरां, नादिरशाह की सेना का मुकाबला नहीं कर सका। वह युद्ध में घायल हो गया और कुछ ही दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गयी। अब मीर बख्शी के पद के लिए निजाम और सआदतखाँ के बीच प्रतिद्वन्द्विता आरम्भ हो गयी।

सआदत खाँ ने नादिरशाह को प्रलोभन दिया कि यदि वह दिल्ली पर आक्रमण करता है तो उसे 20 करोड़ रुपये दे दिये जायेंगे। मार्च 1739 में नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया किन्तु सआदत खाँ 20 करोड़ रुपयों का प्रबन्ध न कर सका। अतः उसने नादिरशाह के भय से आत्महत्या कर ली। 1740 ई. में निजाम पुनः दक्षिण लौट गया। कमरूद्दीन वजीर के पद पर बना रहा।

नादिरशाह के हाथों करारी पराजय के बाद भी मुगल दरबार की दलबन्दी समाप्त नहीं हुई। 1740 ई. में तीसरा गुट बन गया, जिसमें मुहम्मद अमीरखाँ, मुहम्मद इसहाक और असदयारखाँ प्रमुख थे। इस गुट के सदस्यों ने वजीर और उसके दल को समाप्त करने का प्रयास किया किन्तु भेद खुल जाने पर अमीरखाँ को नीचा देखना पड़ा।

1745 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। 1748 ई. में अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण के समय भी मुगल दरबार में दलबन्दी व्याप्त थी। 1748 ई. में मुहम्मदशाह की मृत्यु के बाद अहमदशाह ने सफदरजंग को अपना वजीर बनाया। वह तूरानी अमीरों का कट्टर विरोधी था। अतः उसने तूरानी गुट को समाप्त करने का प्रयास किया परन्तु बादशाह अहमदशाह और वजीर सफदरजंग में मतभेद आरम्भ हो गये।

बादशाह पर उसकी माता ऊधमबाई तथा उसके प्रेमी जाविदखाँ का प्रभाव था। जाविदखाँ ने तूरानी अमीरों का सहयोग प्राप्त कर सफदरजंग की सारी सम्पत्ति जब्त कर ली किन्तु सफदरगंज ने उसे 70 लाख रुपया देकर वजीर पद पुनः प्राप्त कर लिया। यह सफदरगंज की एक चाल थी, क्योंकि कुछ ही दिनों बाद उसने धोखे से जाविदखाँ की हत्या करवा दी। इसके बाद सफदरगंज पुनः शक्तिशाली बन गया।

ऊधमबाई ने इन्तजामुद्दौला, इमादुलमुल्क, संसामुद्दौला और अकवितखाँ के सहयोग से एक नया दल बना लिया। इमादुलमुल्क बड़ी चतुराई से सफदरजंग के प्रभाव को समाप्त कर स्वयं सर्वेसर्वा बन गया। सफदरगंज को दिल्ली छोड़कर अपने सूबे अवध की ओर लौटना पड़ा। कुछ समय बाद इमादुलमुल्क के निरंकुश शासन ने बादशाह को भी नाराज कर दिया।

इमादुलमुल्क ने 1754 ई. में बादशाह अहमदशाह को मरवा दिया तथा 55 वर्षीय अजीजुद्दीन को आलमगीर (द्वितीय) के नाम से बादशाह बनाया। वह भी इमादुलमुल्क के हाथों की कठपुतली बना रहा। इमादुलमुल्क का दुर्व्यवहार केवल बादशाह तक ही सीमित नहीं रहा, अपितु उसके दुर्व्यवहार से तंग आकर शाहजादा अलीगौहार भारत के पूर्वी प्रान्तों की ओर चला गया और इधर-उधर भटकने लगा।

इमादुलमुल्क के दुर्व्यवहार से तंग आकर ही शाही परिवार की बेगमों ने तथा नजीबखाँ ने अहमदशाह अब्दाली को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया। अब्दाली सेना लेकर दिल्ली पर आ धमका। कुछ समय बाद इमादुलमुल्क ने बादशाह आलमगीर (द्वितीय) की हत्या करवा दी और स्वयं जाट राजा सूरजमल की शरण में भाग गया। 

आलमगीर (द्वितीय) की मृत्यु के बाद अलीगौहर, शाहआलम (द्वितीय) के नाम से मुगल बादशाह बना। 1765 ई. में अंग्रेजों के साथ हुई इलाहाबाद की सन्धि के अन्तर्गत ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने उसे 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देना स्वीकार कर लिया। मुगल सल्तनत का अंत होने एवं अँग्रेजों का प्रभाव स्थापित होने पर ही मुगल दरबार की दलबन्दी समाप्त हो सकी।

विभिन्न शक्तियों का प्रबल होना

मुगल सल्तनत के पतनोन्मुख काल में अनेक प्रान्तीय राज्यों का उदय हुआ। इसके साथ ही सल्तनत में फैली अव्यवस्था का लाभ उठाकर विभिन्न शक्तियाँ भी प्रबल हो उठीं। राजपूत शासकों ने मुगल सत्ता की अवहेलना आरम्भ कर दी। आगरा के पास जाटों ने थूण में एक सुदृढ़ दुर्ग बनाकर अपने नेता चूड़ामन के नेतृत्व में मुगलों का विरोध करना आरम्भ कर दिया। पंजाब में सिक्ख भी शक्तिशाली हो गये। मराठे भी शक्तिशाली होकर उत्तर भारत में अपना प्रभाव जमाने का प्रयास करने लगे। इससे मुगल सल्तनत का अंत हो गया।

राजपूत शासकों उत्थान

अकबर ने राजपूतों के सहयोग से अपनी सल्तनत का विस्तार किया था और सल्तनत को मजबूती प्रदान की थी। यह नीति जहांगीर और शाहजहां के समय भी चलती रही। औरंगजेब की धर्मान्धता के कारण राजपूत शासक मुगल सत्ता से नाराज हो गये। अतः औरंगजेब की मृत्यु के बाद राजपूत शासकों ने धीरे-धीरे मुगल सल्तनत से सम्बन्ध विच्छेद कर लिये।

बहादुरशाह, जहाँदारशाह और फर्रूखसियर के समय में राजपूत शासकों को फिर से जागीरें, मनसब तथा उच्च पद दिये गये जिससे राजपूतों की शक्ति का विकास हुआ। फर्रूखसियर के शासनकाल में आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह और जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह एक ओर तो अपनी शक्ति बढ़ा रहे थे तथा दूसरी ओर वे मुगल दरबार में महत्त्वपूर्ण स्थान बनाये हुए थे तथा मालवा एवं गुजरात जैसे महत्त्वपूर्ण सूबों के सूबेदार बने हुए थे।

इन दोनों राजाओं ने सैयद बन्धुओं के पतन में तटस्थता की नीति अपनाई, क्योंकि उन्होंने अनुभव कर लिया था कि सैयदों की शक्ति कमजोर हो रही है। उत्तर भारत में मराठों के बढ़ते हुए प्रभाव को न रोके सकने के कारण सवाई जयसिंह की प्रतिष्ठा को भारी धक्का लगा। 1743 ई. में सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद उसके दो पुत्रों- ईश्वरीसिंह और माधोसिंह के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष हुआ।

उधर जोधपुर में महाराजा अजीतसिंह की हत्या उसी के पुत्र बख्तसिंह ने कर दी। अजीतसिंह का ज्येष्ठ पुत्र अभयसिंह गद्दी पर बैठा किन्तु उसकी मृत्यु के बाद अभयसिंह के पुत्र रामसिंह और उसके चाचा बख्तसिंह के बीच जोधपुर की गद्दी के लिए संघर्ष आरम्भ हो गया।

सवाई जयसिंह ने राव बुद्धसिंह को बून्दी की गद्दी से उतरवाकर बून्दी में उत्तराधिकार का संघर्ष आरम्भ करवा दिया। उत्तराधिकार के इन संघर्षों के कारण राजपूताने की राजनीति में मराठों का हस्तक्षेप बढ़ गया और उन्होंने राजपूताने पर वर्चस्व स्थापित कर लिया। इससे मुगल सल्तनत का अंत हो गया। अन्त में मराठों की लूटमार से तंग आकर 19वीं शताब्दी के आरम्भ में राजपूत शासकों ने ईस्ट इण्डिया कंपनी का संरक्षण स्वीकार कर लिया।

जाट शक्ति का उत्थान

औरंगजेब की गलत नीतियों के कारण उसके शासनकाल में जाटों ने एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में उभरना आरम्भ किआ। औरंगजेब ने जाटों की शक्ति को कुचलने का भरसक प्रयत्न किया किन्तु उसे सफलता नहीं मिली। औरंगजेब की मृत्यु के बाद जाटों ने चूड़ामन के नेतृत्व में थूण का किला बनवाया और मुगलों को आतंकित करने लगे। 1721 ई. में चूड़ामन की मृत्यु के बाद उसके भतीजे बदनसिंह ने जाटों का नेतृत्व ग्रहण किया।

जाटों की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने बदनसिंह को आगरा से जयपुर के मार्ग की रक्षा का दायित्व सौंप दिया। अब बदनसिंह ने मुगलों के भय से मुक्त होकर अपनी शक्ति में वृद्धि करना आरम्भ कर दिया। उसने कुम्हेर, वैर, डीग व भरतपुर में सुदृढ़ दुर्गों का निर्माण करवाया।

बदनसिंह भरतपुर का प्रथम शासक स्वतंत्र शासक था, जिसे सवाई जयसिंह द्वारा मान्यता प्रदान की गई। 1756 ई. में बदनसिंह की मृत्यु के बाद सूरजमल जाटों का राजा हुआ। उसमें हिन्दू धर्म के प्रति अत्यधिक लगाव था इसलिए वह मराठों का समर्थक तथा मुगलों का विरोधी रहा। उसने लड़खड़ाते हुई मुगल सल्तनत पर भीषण  प्रहार किये।

उसने पानीपत के तृतीय युद्ध में तटस्थता की नीति का अवलम्बन किया जिसके कारण मुगलों और मराठों को भारी क्षति हुई और जाटों की शक्ति में परोक्ष रूप से वृद्धि हुई। इस युद्ध के बाद दिल्ली और उसके आस-पास फैली अव्यवस्था का लाभ उठाते हुए राजा सूरजमल ने दिल्ली पर अधिकार करने का प्रयास किया किन्तु 1763 ई. में रूहेला सरदार नजीबुद्दौला ने उसे छल से मार दिया।

राजा सूरजमल की मृत्यु के बाद जवाहरसिंह गद्दी पर बैठा किन्तु भरतपुर राज्य में गृह-युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। इसमें मराठों ने भी हस्तक्षेप किया। इस गृह-युद्ध के कारण 1768 ई. में जवाहरसिंह की हत्या कर दी गई। उसके बाद राजा रणजीतसिंह जाटों की गद्दी पर बैठा। रणजीतसिंह के शासनकाल में जाटों की शक्ति का हृास आरम्भ हो गया।

आगरा और मथुरा जाटों के हाथ से निकल गये। 1784 ई. में सिन्धिया ने डीग पर अधिकार कर लिया। रानी किशोरी के प्रयासों से डीग पुनः रणजीतसिंह को मिल गया। रणजीतसिंह ने मराठों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किये किन्तु लासवाड़ी युद्ध में मराठों के पराजित होते ही रणजीतसिंह ने अँग्रेजों से मैत्री कर ली तथा 1803-1804 ई. में उसने अँग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली।

सिक्ख शक्ति का उत्थान

औरंगजेब की धर्मान्धता के कारण सिक्खों के नौवें गुरु तेग बहादुर (1664-75) को अपनी प्राणों से हाथ धोना पड़ा। गुरु गोविन्दसिंह सिक्खों के दसवें और अन्तिम गुरु हुए, जिन्होंने सिक्खों को सैनिक शक्ति के रूप में संगठित किया और औरंगजेब के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। औरंगजेब की मृत्यु के बाद बहादुरशाह ने गुरु से अनुरोध किया कि वे उत्तराधिकार के संघर्ष में बहादुरशाह की सहायता करें।

इस पर गुरु गोविंदसिंह, बहादुरशाह के साथ दक्षिण भारत की ओर गये। दक्षिण में गोदावरी के तट पर एक पठान ने गुरु की हत्या कर दी। गुरु गोविन्दसिंह की मृत्यु के बाद उनके एक सेवक बन्दा बहादुर ने देश के विभिन्न भागों से सिक्खों को बुलाकर अपने झण्डे के नीचे एकत्र कर लिया।

1710 ई. में सिक्खों व मुगलों के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें सिक्खों की जीत हुई और सिक्खों ने सरहिन्द को जीत लिया। सहारनपुर और जलालाबाद में भी सिक्खों ने विद्रोह कर दिया और अमृतसर, कसूर, बटाला, कलानौर, पठानकोट आदि पर अधिकार जमा लिया। अंत में बहादुरशाह को सिक्खों की ओर ध्यान देना पड़ा।

उसने बन्दा बहादुर को बन्दी बना लिया और 1716 ई. में उसे मौत के घाट उतार दिया। बन्दा बहादुर की मृत्यु के बाद सिक्ख बन्दई एवं सतखालसा नामक दो दलों में विभक्त हो गये जिससे उनकी शक्ति कमजोर पड़ गई। 1721 ई. में इन दोनों दलों में पुनः एकता स्थापित की गई।

1726 ई. में बादशाह मुहम्मदशाह ने जकरियाखाँ को पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया जिसने सिक्खों पर भीषण अत्याचार किये परन्तु इससे सिक्खों की शक्ति का पतन नहीं हुआ और वे छोटे-छोटे दलों में संगठित होेकर मुगल अधिकारियों को परेशान करते रहे। जब नादिरशाह, भारत से अतुल सम्पत्ति लूटकर वापस जा रहा था, तब सिक्खों ने उसकी सेना पर पीछे से आक्रमण करके लूट का बहुत सा माल छीन लिया। नादिरशाह के आक्रमण से मुगल सत्ता का पंजाब पर नियंत्रण समाप्त हो गया।

नादिरशाह के आक्रमण से पंजाब में फैली अव्यवस्था का लाभ उठाते हुए सिक्खों ने अपनी शक्ति संगठित कर ली। 1748 ई. में सिक्खों ने दल-खालसा का गठन किया। इसमें में सम्मिलित सिक्ख दलों को जत्थों में विभाजित किया गया जो बाद में मिसलों के नाम से विख्यात हुए। सिक्ख मिसलों के नेताओं ने अपनी सैनिक शक्ति में और अधिक विस्तार किया।

जब भारत पर अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण होने लगे तब इन सिक्ख मिसलों ने अब्दाली का दृढ़ता से मुकाबला किया। अब्दाली की मृत्यु के बाद सिक्खों ने पंजाब के भिन्न-भिन्न भागों में छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए। आगे चलकर इन सिक्ख राज्यों में आपसी झगड़े उठ खड़े हुए अतः वे एक शक्तिशाली सिक्ख राज्य की स्थापना नहीं कर सके। आगे चलकर महाराजा रणजीतसिंह ने एक शक्तिशाली सिक्ख राज्य की स्थापना की।

मराठा शक्ति का अभ्युदय

17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में शिवाजी के नेतृत्व में मराठा शक्ति का उदय हुआ। शिवाजी ने स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना की तथा अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जीवन भर मुगलों से संघर्ष किया। उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र शम्भाजी ने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा परन्तु 1689 ई. में शम्भाजी पकड़ा गया और औरंगजेब ने उसकी हत्या करवा दी।

शम्भाजी की पत्नी और अल्पवयस्क पुत्र भी मुगलों के हाथों में पड़ गये। इस पर मराठों ने शम्भाजी के छोटे सौतेले भाई राजाराम के नेतृत्व में स्वतंत्रता संघर्ष छेड़ दिया। 1700 ई. में राजाराम की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी ताराबाई ने अपने अल्पवयस्क पुत्र शिवाजी (द्वितीय) को राजा घोषित कर मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।

ताराबाई के नेतृत्व में मराठों ने शानदार सफलताएँ प्राप्त कीं। औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगलों ने शाहूजी (शम्भाजी का पुत्र) को मुक्त कर दिया। शाहूजी ने ताराबाई को परास्त करके शिवाजी के राजसिंहासन को प्राप्त कर लिया। 1707 ई. से 1749 ई. तक मराठा राज्य का स्वामित्व शाहू के हाथ में रहा।

पेशवा का उत्कर्ष

शाहू मुगल शिविर में बड़ा हुआ था। इसलिये वह आरामपसन्द एवं विलासी प्रवृत्ति का व्यक्ति था। उसके लिए महाराष्ट की उलझी हुई व्यवस्था को सुलझाना सम्भव नहीं था। अतः शाहू को ऐसे सहायक की आवश्यकता थी जो राज्य की कठिनाइयों को हल करके, शासन व्यवस्था को संचालित कर सके। पेशवा ने शाहू की इच्छाओं को पूरा कर दिखाया।

इस कारण शाहू के शासनकाल में पेशवा की शक्ति का उत्कर्ष हुआ। धीरे-धीेरे पेशवा ने छत्रपति के समस्त अधिकार अपने हाथ में ले लिये। पेशवाओं का उत्कर्ष मुख्यतः बालाजी विश्वनाथ के समय में हुआ। उसे 16 नवम्बर 1713 को पेशवा के पद पर नियुक्त किया गया था।

बालाजी विश्वनाथ ने ताराबाई की सत्ता को समाप्त किया तथा विद्रोही मराठा सरदारों की शक्ति का दमन कर उन पर शाहू के प्रभुत्व की पुनः स्थापना की। बालाजी विश्वनाथ की सबसे महत्त्वपूर्ण सेवा शाहू के लिए दक्षिण के छः मुगल सूबों से चौथ और सरदेशमुखी वसूल करने का शाही फरमान प्राप्त करना था।

दिल्ली में सैयद बन्धुओं के सहयोग से फर्रूखसियर मुगल तख्त पर आसीन हुआ था किन्तु कुछ समय बाद उसकी सैयद बंधुओं से अनबन हो गई और दोनों पक्ष-एक दूसरे को समाप्त करने पर उतारू हो गये। 1719 ई. में सैयद हुसैनखाँ ने मराठों से एक सन्धि की, जिसमें शाहू को दक्षिण के छः सूबों से चौथ और सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार देने तथा शाहू के परिवार को मुगलों की कैद से छोड़ देने का वचन दिया।

बालाजी विश्वनाथ मराठा सेना लेकर सैयद हुसैनखाँ की सहायता के लिये दिल्ली गया। फर्रूखसियर को गद्दी से उतारकर मार डाला गया और रफी-उद्-दराजात को बादशाह बनाया गया। नये बादशाह ने 1719 ई. की मुगल-मराठा सन्धि को स्वीकार करके तदनुसार शाही फरमान जारी कर दिये।

मराठों की यह दिल्ली यात्रा अत्यधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई। इससे मराठों के समक्ष मुगल सत्ता का खोखलापन स्पष्ट हो गया। दिल्ली से वापस आने के बाद बालाजी विश्वनाथ ने उत्तर भारत में मराठा शक्ति के प्रसार की योजना बनायी परन्तु योजना कार्यान्वित करने से पूर्व ही 1720 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी।

बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उसका बीस वर्षीय पुत्र बाजीराव (1720-1740 ई.) पेशवा बना, जिसने मराठों के प्रभाव को और अधिक बढ़ाया। उसने निजाम-उल-मुल्क को दो बार पराजित किया, पुर्तगालियों से बसीन व सालसेट छीन लिये तथा मराठों के प्रभाव को गुजरात, मालवा और बुन्देलखण्ड तक पहुँचा दिया।

वस्तुतः बाजीराव ने सम्पूर्ण उत्तर भारत में मराठा शक्ति के विस्तार का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। मुगलों के पतन से उत्तर भारत में जो राजनीतिक शून्यता उत्पन्न हो गई थी, मराठों ने उसे भरने का प्रयत्न किया। 28 अप्रैल 1740 को बाजीराव की मृत्यु हो गयी। इस पर शाहू ने बाजीराव के 19 वर्षीय पुत्र बालाजी बाजीराव को पेशवा नियुक्त किया।

बालाजी बाजीराव का काल (1740-1761 ई.) मराठा राज्य के प्रसार, आन्तरिक व्यवस्था और भौतिक समृद्धि की दृष्टि से चरम पर पहुँच गया। छत्रपति की समस्त शक्तियाँ पेशवा के हाथ में आ गई और सतारा के स्थान पर पूना मराठा राज्य का प्रमुख केन्द्र बन गया। 25 दिसम्बर 1749 को शाहू की मृत्यु हो गई। उसके बाद इतिहास में छत्रपति का नाम लुप्त-प्रायः हो गया तथा पेशवा मराठा सल्तनत का सर्वोच्च व्यक्ति बन गया।

बालाजी बाजीराव योग्य सेनानायक और कुशल कूटनीतिज्ञ नहीं था। उसकी अयोग्यता का लाभ उठाकर सिन्धियाँ एवं भोंसले जैसे मराठा सरदार स्वतंत्र शासकों की भाँति व्यवहार करने लगे। उसने अपनी स्वार्थपूर्ण नीतियों के कारण भारत की समस्त महत्त्वपूर्ण शक्तियों को नाराज कर दिया। उसके उत्तरी अभियानों का ध्येय अधिक-से-अधिक धन बटोरना था। उसने राजपूत शासकों पर तो इतने जुल्म ढाये कि वे मराठों के शत्रु बन गये।

यही कारण था कि पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों को कहीं से भी सहायता प्राप्त नहीं हो सकी। इस युद्ध में मराठे बुरी तरह से परास्त हुए और अहमदशाह अब्दाली विजयी हुआ। अब्दाली ने मराठों की पराजित सेना को बुरी तरह काटा। कहा जाता है कि लगभग एक लाख मराठे काट डाले गये। जब यह समाचार बालाजी बाजीराव के पास पहुंचा तो हृदयाघात से जून 1761 में उसकी मृत्यु हो गयी।

पेशवा बालाजी बाजीराव की मृत्यु के बाद उसका 17 वर्षीय पुत्र माधवराव (प्रथम) नया पेशवा बना। बालाजी बाजीराव अपने छोटे भाई रघुनाथराव को अपने पुत्र माधवराव का संरक्षक नियुक्त कर गया। रघुनाथ (राघोबा) सम्पूर्ण सत्ता अपने हाथ में रखना चाहता था। अवसर देखकर हैदराबाद के निजाम ने महाराष्ट्र पर आक्रमण कर दिया किन्तु उसे मराठों से सन्धि करनी पड़ी। राघोबा ने भविष्य में निजाम से सहयोग प्राप्त करने की दृष्टि से बहुत ही उदार शर्तो पर सन्धि की।

पेशवा माधवराव को उसकी यह कार्यवाही पसन्द नहीं आई। माधवराव एवं राघोबा के बीच मतभेद बढ़ते चले गये। माधवराव ने राघोबा से माँग की कि सम्पूर्ण सत्ता उसे सौंप दी जाये। इस पर राघोबा और उसके समर्थकों ने त्याग-पत्र दे दिये। माधवराव ने उनके स्थान पर नई नियुक्तियाँ कर दीं। राघोबा ने क्रुद्ध होकर माधवराव के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। युद्ध में पेशवा माधवराव परास्त हुआ। राघोबा ने उसे नजरबन्द करके शासनाधिकार अपने हाथ में ले लिये।

मराठों की आपसी लड़ाई देखकर निजाम ने पुनः आक्रमण कर दिया। राक्षक भुवन के इस युद्ध में पेशवा माधवराव ने अपूर्व पराक्रम एवं नेतृत्व का परिचय दिया। निजाम परास्त होकर लौट गया। राघोबा में उसे पुनः नजरबन्द करने की हिम्मत नहीं हुई। माधवराव ने पुनः सत्ता ग्रहण कर ली। राघोबा ने उसे सत्ताच्युत करने का प्रयत्न किया किन्तु वह असफल रहा।

जून 1767 में राघोबा ने माधवराव से राज्य के बँटवारे की माँग की; जो माधवराव ने ठुकरा दी। माधवराव ने राघोबा को बन्दी बना लिया। इसी समय हैदर अली ने मराठा राज्य पर आक्रमण कर दिया। माधवराज ने उसे परास्त कर खदेड़ दिया। दक्षिण में अपने प्रतिद्वन्द्वियों को पराभूत करने के बाद माधवराव ने उत्तर भारत में भी मराठों की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की।

माधवराव में सैनिक प्रतिभा के साथ-साथ शासकीय योग्यता भी थी। पानीपत के पराजय के बाद उसने मराठों को सृदृढ़ नेतृत्व प्रदान किया और आन्तरिक एवं बाह्य संकटों का सामना करते हुए मराठों की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने में सफल रहा। उसने सेना का पुनर्गठन किया तथा मराठों के शत्रुओं को परास्त किया।

उसने मुगल बादशाह को अपने संरक्षण मे लेकर उसे पुनः दिल्ली के तख्त पर बैठाया। राजपूतों व जाटों पर उसने पुनः अपना वर्चस्व स्थापित किया। नवम्बर 1772 में पेशवा माधवराव की मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु मराठा राज्य के लिए पानीपत की पराजय से भी अधिक घातक सिद्ध हुई क्योंकि उसके बाद आंग्ल-मराठा संघर्षों का सूत्रपात हुआ जिनमें मराठे लगातार अंग्रेजों से हारते चले गये।

यूरोपीय जातियों का आगमन

1498 ई. में पुर्तगाली नाविक वास्को-डी-गामा पुर्तगाल से चलकर भारत के मलाबार तट पर पहुँचने में सफल रहा। इस प्रकार उसने यूरोप से भारत का सामुद्रिक मार्ग खोज निकाला। इस खोज ने भारत और यूरोप के सम्बन्धों में एक नये अध्याय का सूत्रपात किया। कालीकट के राजा जमोरिन ने पुर्तगालिों को अपने राज्य में व्यापार करने की अनुमति दे दी। इसके बाद पुर्तगालियों का भारत में आना-जाना बढ़ता चला गया।

पुर्तगालियों ने गोआ, दमन, दीव, हुगली आदि स्थानों पर व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कीं तथा एक सुदृढ़ नौ-सेना भी खड़ी कर ली। कुछ ही वर्षों में पुर्तगालियों ने भारतीय व्यापार से इतना विपुल धन कमाया कि उसे देखकर यूरोप की अन्य जातियों में भी धन लिप्सा जागृत हो उठी। अतः उन्होंने भी भारत के साथ व्यापार करने के लिए अपनी-अपनी व्यापारिक कम्पनियाँ स्थापित कीं।

1595 ई. में हॉलैण्ड के डच व्यापारियों ने पूर्वी देशों से व्यापार करने हेतु एक कम्पनी स्थापित की। इसके बाद भारतीय व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए पुर्तगालियों और डचों में संघर्ष आरम्भ हो गया। पुर्तगाली, डचों के समक्ष टिक नहीं सके। इधर मराठों ने भी पुर्तगालियों से बसीन तथा सालसेट छीन लिये।

उन्हीं दिनों में लन्दन के अँग्रेज व्यापारियों ने भी भातर से व्यापार करने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की। 1608 ई. में इस कम्पनी का पहला जहाज सूरत के बन्दरगाह पर पहुँचा। इस जहाज का कप्तान जॉन हॉकिन्स था, जो अपने साथ ब्रिटेन के राजा का पत्र लाया था। हॉकिन्स ने यह पत्र मुगल बादशाह जहाँगीर को दिया।

6 फरवरी 1613 को एक शाही फरमान द्वारा अंग्रेजों को व्यापार के लिए एक कोठी बनाने तथा मुगल दरबार में एलची रखने की अनुमति दे दी गई। कम्पनी की ओर से सर टॉमस रो को इस पद पर नियुक्त किया गया, जिसने मुगल बादशाह को प्रभावित कर भारत में अँग्रेजी कोठियाँ स्थापित करने की आज्ञा प्राप्त कर ली। अब भारतीय व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने हेतु पुर्तगालिों, डचों और अँग्रेजों के बीच संघर्ष आरम्भ हो गया। अँग्रेजों ने धीरे-धीरे पुर्तगालियों और डचों को परास्त करके अपनी स्थिति को सुदृढ़ बना लिया।

अन्य यूरोपीय जातियों की भाँति, फ्रांसीसियोंने भी 1664 ई. में एक व्यापारिक कम्पनी स्थापित की। उन्होंने सूरत, मछलीपट्टम, पाण्डिचेरी और चन्दरनगर में व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कीं। जब मुगल सत्ता कमजोर पड़ने लगी तब फ्रांसीसियों ने अपनी शक्ति को काफी सुदृढ़ बना लिया। इस समय तक पुर्तगालियों और डचों की शक्ति काफी कमजोर पड़ गई थी और अब अँग्रेज तथा फ्रांसीसी व्यापारी ही भारत में व्यापार के लिए मुख्य प्रतिद्वन्द्वी रह गये थे।

अतः दोनों में संघर्ष अवश्यम्भावी हो गया। दोनों शक्तियों के पास पर्याप्त सेना थी। दोनों शक्तियों ने भारत के देशी राजाओं के पारस्परिक झगड़ों में तथा राज्यों के उत्तराधिकार के मामलें में हस्तक्षेप कर उन्हें सैनिक सहायता देना आरम्भ किया। इस सहायता के बदले में उन्होंने भारतीय शासकों से भूमि, धन और अन्य व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त कीं।

धीरे-धीरे ये व्यापारी राजनैतिक शक्ति बन गये। इस कारण अंग्रेजों तथा फ्रांसिसियों के बीच भारत में राजनीतिक प्रभुत्व के लिए संघर्ष आरम्भ हो गया। 1744 ई. से 1763 ई. के मध्य दोनों के बीच तीन युद्ध हुए जिन्हंे कर्नाटक के युद्ध कहा जाता है। अन्त में अँग्रेजों ने फ्रांसिसियों को परास्त कर दिया जिससे अंग्रेजों को भारत में अपना राज्य स्थापित करने का अवसर मिल गया।

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि औरंगजेब की मृत्यु के बाद भारत में राजनैतिक अस्थिरता उत्पन्न हो गयी थी। परवर्ती मुगल बादशाहों की अयोग्यता एवं विलासिता के कारण सत्ता, स्वार्थी अमीरों के हाथों में चली गई। मुगल दरबारों में दलबन्दी इतनी बढ़ गई थी कि बादशाहों एवं अमीरों के प्राण भी संकट में रहते थे। बादशाह की कमजोरी तथा अमीरों की दलबंदी के कारण शक्तिशाली मुगल अमीरों ने स्वतंत्र राज्यों की स्थापना करनी आरम्भ कर दी।

अवध, बंगाल, बिहार और उड़ीसा के सूबे सल्तनत से पृथक हो गये और दक्षिण भारत में निजाम-उल-मुल्क ने हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली। जाटों, सिक्खों, राजपूतों एवं मराठों ने भी अपनी-अपनी शक्ति का विस्तार किया। मराठे दक्षिण में पहले से ही प्रबल हो रहे थे। अतः मराठों और निजाम के बीच संघर्ष आरम्भ हो गया।

मराठों से परास्त होकर निजाम ने शाहू को मराठा राज्य का एकमात्र शासक स्वीकार कर लिया तथा मराठों को मालवा और नर्मदा तथा चम्बल नदियों के मध्य का प्रदेश मिल गया। दक्षिण में अपनी धाक जमाने के बाद पेशवा बाजीराव के नेतृत्व में मराठों ने उत्तर भारत में अपना प्रभाव बढ़ाया।

गुजरात, मालवा, बुन्देलखण्ड और राजपूत शासकों पर मराठों ने  वर्चस्व स्थापित कर लिया। इस प्रकार राजपूत शासक, जो मुगल सल्तनत के आधार स्तम्भ थे, केन्द्रीय नियंत्रण से मुक्त हो गये। मराठों ने उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। इससे अफगानों ने उस ओर के सूबों पर अधिकार जमा लिया। इससे मुगल सल्तनत का अंत हो गया।

पानीपत के मैदान में मराठों की करारी पराजय हुई, जिससे मराठा शक्ति को भारी आघात लगा किन्तु पेशवा माधवराव (प्रथम) के नेतृत्व में मराठे पुनः संगठित हो गये और उत्तर भारत में वर्चस्व स्थापित करने में वे सफल रहे। मराठों ने मुगल बादशाह पर वर्चस्व स्थापित कर दिल्ली तक अपनी धाक जमा ली किन्तु मराठों की पारस्परिक कलह ने मराठों के पतन का मार्ग प्रशस्त कर दिया। उधर अँग्रेज, दक्षिण में फ्रांसीसियों को पराजित कर बंगाल, बिहार व उड़ीसा में शक्तिशाली हो गये थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – औरंगजेब (आलमगीर )

औरंगजेब (आलमगीर)

औरंगजेब की धार्मिक नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की साम्राज्यवादी नीति

औरंगजेब के अंतिम दिन

औरंगजेब के उत्तराधिकारी

मुगल सल्तनत का विघटन

मुगल सल्तनत का अंत

मुगल शासन व्यवस्था

0
मुगल शासन व्यवस्था एवं संस्थाएँ - www.bharatkaitihas.com
मुगल शासन व्यवस्था एवं संस्थाएँ

मुगल शासन व्यवस्था को भारतीय इतिहास में कुलीनों का शासन कहा जाता है। मुगलकालीन शासन व्यवस्था के मूल ढाँचे को खड़ा करने का श्रेय अकबर को है। उसने जिस शासन पद्धति को लागू किया, वह थोड़े-से परिवर्तनों के साथ औरंगजेब के समय तक तथा उसके भी बाद तक जारी रही।

मंगोलों की शासन व्यवस्था में अरब तथा फारस की व्यवस्था के चिन्ह विद्यमान थे। इन विदेशी तत्त्वों के साथ भारतीय शासन व्यवस्था और भारतीय आदर्श भी घुलमिल गये थे।

जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘मुगल शासन प्रणाली भारतीय और अभारतीय प्रणाली का एक मिला-जुला सम्मिश्रण था अथवा वास्तविक रूप में फारस और अरब की प्रणाली भारतीय परिस्थितियों में प्रयोग की गयी थी।’

मुगलों ने भारत के बाहर के किसी भी मुस्लिम शासक अथवा खलीफा की सत्ता के प्रति नाममात्र की अधीनता भी स्वीकार नहीं की थी। इस दृष्टि से उनका युग, सल्तनत काल से काफी भिन्न था। सल्तनत काल की ही तरह मुगलों की शासन व्यवस्था का मूलाधार सैनिक शासन ही था। दिल्ली सुल्तानों के विपरीत मुगल शासकों ने प्रजा के लिए अच्छी जीवन परिस्थितियों का निर्माण करना अपना कर्त्तव्य समझा।

मुगल शासन व्यवस्था में बादशाह

दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने इस्लामी कानूनों का पालन करने का प्रयास किया था परन्तु मुगल बादशाहों ने कुछ मामलों में इस्लामी परम्परा का पालन नहीं किया। मुगलों ने स्वयं को केवल मुसलमान प्रजा का शासक नहीं माना। अकबर और जहाँगीर ने स्वयं को अपनी समस्त प्रजा का बादशाह माना और समस्त प्रजा के साथ लगभग एक जैसा व्यवहार किया। मुगल बादशाहों ने इस्लामी परम्परा के विरुद्ध जाकर, हिन्दू राजाओं की भांति स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित किया। यह बात हिन्दू शासकों के राजत्व सिद्धान्त के अधिक निकट थी।

मुगलकाल में समस्त शक्तियाँ बादशाह में केन्द्रीभूत थीं। बादशाह शासन की धुरी था। इस दृष्टि से वे पूर्णतः निरंकुश शासक थे परन्तु उन्हें स्वेच्छाचारी अथवा अत्याचारी कहना उचित नहीं होगा। वे जन-कल्याण में रुचि रखते थे और इसके लिये प्रयास भी करते थे। अकबर से शाहजहाँ तक के मुगल बादशाहों में प्रजा हित की भावना सर्वोपरि रही।

अतः यह कहना अधिक उचित होगा कि वे स्वेच्छाचारी उदार शासक थे। उनके अधिकारों पर किसी प्रकार की रुकावट नहीं थी। वे कुछ विशेषाधिकारों का उपभोग भी करते थे। मुगलिया सल्तनत में प्रचलित समस्त उपाधियों एवं राजकीय सम्मान का दाता केवल बादशाह ही होता था।

प्रजा को ‘झरोखा दर्शन’ देने का अधिकार भी उसी का था। इसी प्रकार तस्लीम और कोर्निश भी केवल उसी का अधिकार था। केवल बादशाह ही नक्कारों का प्रयोग कर सकता था। उसके अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति हाथियों के दंगल का आयोजन नहीं कर सकता था।

अधिकांश मुगल बादशाह अपने मन्त्रियों तथा अमीरों से सलाह लिया करते थे और उनके प्रभाव को ध्यान में रखकर कार्यवाही करते थे। दिल्ली सल्तनत के तुर्की एवं अफगानी सुल्तानों ने अपने अमीरों की शक्ति को कुचलकर अपनी शक्ति को बढ़ाने का प्रयास किया था परन्तु मुगल बादशाहों ने अमीरों का विश्वास तथा सहयोग प्राप्त कर अपनी सत्ता को सुदृढ़ बनाया। जब कोई अमीर विद्रोह करता था तब मुगल बादशाह उसे दृढ़ता से कुचलते थे। यह परम्परा बैरमखाँ के दमन के साथ आरम्भ हुई थी जो अंत तक चलती रही।

मुगल शासन व्यवस्था में शासन के विभाग

बाबर से अकबर तक के समय में शासन व्यवस्था के चार प्रमुख विभाग थे। अकबर के काल में दो वर्षो के लिए यह संख्या पाँच हो गई थी जब टोडरमल को मशरफे-दीवान अर्थात् अर्थमन्त्री बना दिया गया था किन्तु यह विशेष परिस्थिति में किया गया था। औरंगजेब के शासनकाल में इन मन्त्रियों की संख्या बढ़कर 6 हो गयी। इन मन्त्रिमण्डल विभागों के अतिरिक्त एक परामर्शदाता समिति का उल्लेख भी मिलता है। इसके सदस्यों की संख्या लगभग 20 थी। अकबर महत्त्वपूर्ण एवं जटिल विषयों पर इस समिति से परामर्श लेता था। समिति की बैठक रात्रि में होती थी।

मुगल शासन व्यवस्था में शासन के मुख्य अधिकारी

मुगल बादशाह राजतन्त्रीय सिद्धान्तों के अनुसार मंत्री अथवा सलाहकार रखते थे। इस संस्था को प्रचलित भाषा में वजारत कहते थे। मंत्री बादशाह को केवल परामर्श दे सकते थे। उसे स्वीकार करना या न करना बादशाह की इच्छा पर निर्भर था। वास्तव में सब कुछ बादशाह तथा उसके मन्त्रियों के व्यक्तित्त्व पर निर्भर करता था।

जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘वजीर और दीवान बादशाह से दूसरी श्रेणी के धनवान पुरुष होते थे किन्तु अन्य पदाधिकारी उनके किसी भी रूप में सहकारी नहीं थे। वे यथार्थ में उनसे कहीं नीचे थे। यदि उन्हें मन्त्री की अपेक्षा सचिव कहा जाय तो अधिक उपयुक्त होगा।’

वकील-ए-मुतलक अथवा वजीर

सैद्धान्तिक रूप से वजीर शासन का प्रधान था। वह समस्त राजकीय कार्यवाहियों के प्रति उत्तरदायी थी। उसे प्रधानमंत्री, वकील-ए-मुतलक और दीवान भी कहते थे। शासन का सारा दायित्व उसी पर था। दीवान होने के नाते वह राजस्व विभाग का सर्वोच्च अधिकारी था और राज्य की सम्पूर्ण आय-व्यय की देखभाल करता था।

आइने अकबरी के अनुसार- ‘दीवान अर्थ सम्बन्धी बातों में बादशाह का नायब होता था, शाही राजकोषों की देखरेख करता था और हिसाब-किताब की जाँच करता था। उसी के पास मालगुजारी की रकम जमा रहती थी। वह अराजकता की स्थिति में व्यवस्था स्थापित करने वाला था। उसे बादशाह और जनता दोनों से ही सम्पर्क बनाये रखना होता था।

सरकारी नौकरियों में नियुक्ति दीवान की सिफारिश पर होती थी। राजकार्यों से सम्बन्धित कई आदेशपत्रों पर दीवान के हस्ताक्षर होने आवश्यक थे, बख्शी के कार्यालय से सम्बन्धित प्रपत्र दीवान के हस्ताक्षरों के बिना मान्य नहीं थे। मनसबदारों की तनख्वाह, जागीरों के खर्च, प्रान्तों में भेजी जाने वाली रकम, मदद-ए-माश आदि पर उसके हस्ताक्षर होते थे।

दीवान नवीन पद ग्रहण करने वालों को प्रमाण-पत्र जारी करता था। जनता की राजस्व सम्बन्धी शिकायतें दीवान के समक्ष प्रस्तुत की जाती थीं। उसके विभाग में लगभग समस्त आवश्यक दस्तावेज रहते थे। इस प्रकार दीवान का कार्यालय राज्य का प्रमुख अभिलेखागार था।

उसके सहायक अधिकारियों में दीवान-ए-खालसा, दीवान-ए-तन, मुस्तौफी एवं दीवान-ए-बयूतात प्रमुख थे। इस प्रकार मुगल सल्तनत में दीवान का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। औरंगजेब के बाद हुए अयोग्य मुगल बादशाहों के शासनकाल में सल्तनत की वास्तविक शक्ति दीवान अथवा वजीर के हाथों में चली गई।

मीर बख्शी

सैन्य विभाग का सर्वोच्च अधिकारी मीर बख्शी होता था परन्तु वह सेना का प्रधान सेनापति नहीं होता था। उसकी नियुक्ति बादशाह द्वारा सैनिक प्रबंधन के लिये की जाती थी। इस पद के कार्य समय के साथ बदलते रहे। प्रारम्भ में मीर बख्शी का प्रमुख कार्य सैनिकों की भर्ती करना, घोड़ों को दाग लगाना, सैनिकों का हुलिया लिखना एवं सेना के लिये आवास तथा रसद आदि की व्यवस्था करना था।

बाद में उसे अन्य कई जिम्मेदारियाँ दे दी गईं। जिससे इस पद के अधिकारी के लिए सैन्य योग्यता के साथ-साथ प्रशासनिक योग्यता होनी भी आवश्यक हो गई। अकबर के समय में इस पद का समुचित उत्थान हुआ। बख्शी के कार्यक्षेत्रों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- (1.) कार्यालय सम्बन्धी कार्य और (2.) दरबार सम्बन्धी कार्य।

(1.) कार्यालय सम्बन्धी कार्य

सेना के कार्यालय सम्बन्धी कार्य के अन्तर्गत कई विभाग आते थे। प्रत्येक विभाग का कार्यक्षेत्र निश्चित था। मनसबदारों की नियुक्ति एवं उनके मनसबों के आधार पर उनके सैनिकों की संख्या, वेतन, जागीर आदि की जाँच बख्शी के कार्यालय में होती थी। मीर बख्शी के प्रमाणपत्र के बिना मनसबदारों के वेतन का भुगतान नहीं होता था।

(2.) दरबार सम्बन्धी कार्य

अबुल फजल लिखता है कि मीर बख्शी बाहर से आये समस्त नवीन सैनिकों के वेतन तय करवाकर उन्हें बादशाह के समक्ष उपस्थित करता था। बख्शी बादशाह की यात्राओं, बाहरी दौरों तथा आखेट में साथ रहता था। वह पड़ाव की देखरेख एवं मनसबदारों के ठहरने की व्यवस्था देखता था। वह कभी-कभी महत्त्वूपर्ण अभियानों में सेना के साथ भी भेजा जाता था।

शाही महलों की सुरक्षा के लिए मनसबदारों की ड्यूटी लगाने का काम भी उसी का था। उसके विस्तृत एवं व्यापक काम में सहायता देने के लिये उसके अधीन अनेक अधिकारी एवं कर्मचारी रखे गये थे। जदुनाथ सरकार ने बख्शी को पे-मास्टर एवं ब्लाकमैन ने उसे पे-मास्टर एवं एड्जुटेण्ट कहा है किन्तु डॉ. आर. के. सक्सेना के अनुसार वास्तव में वेतन का भुगतान दीवान-ए-तन ही करता था न कि मीर बख्शी। फिर भी इसमें संदेह नहीं कि यह एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण पद था।

खानेसामां (खान-ए-सामान)

अकबर के शासनकाल तक खान-ए-सामान के पद को मन्त्री पद के समान नहीं माना जाता था परन्तु बाद में यह पद महत्त्वपूर्ण हो गया। वह घरेलू विभाग से सम्बन्धित था और बादशाह की दैनिक भोजन व्यवस्था, कपड़े, हीरे-जवाहरात, गोला-बारूद और शाही महलों के काम आने वाले पशुओं तक की देखरेख करता था।

इस पद पर महत्त्वपूर्ण उमरावों की नियुक्ति की जाती थी। खानेसामां का प्रमुख कार्य राजकीय परिवार से सम्बन्धित सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति एवं देखरेख करना था। वह बादशाह के निजी सेवकों एवं गुलामों का प्रधान था। वह राजमहल में रहकर और यदि बादशाह बाहर दौरे पर हो तो वहाँ भी साथ रहकर दैनिक खर्चे, खान-पान, वस्त्र आदि की व्यवस्था देखता था।

बादशाह के हरम की आवश्यकताओं को भी वहीं देखता था। मनूची ने लिखा है कि खान-ए-सामान बादशाह के समस्त प्रकार के व्यय के प्रति उत्तरदायी था। शाही कारखानों में जहाँ नाना प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन होता था, उनकी सम्पूर्ण देखभाल भी खानेसामां के नियंत्रण मंे थी। इस दृष्टि से खानेसामां का पद राज्य में नवीन वस्तुओं के निर्माण, कारीगरों को प्रोत्साहन देने एवं राजमहल के प्रबंधन से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण पद था।

काजी-उल-कुजात (प्रधान काजी)

बादशाह के बाद न्याय विभाग का दूसरा महत्त्वपूर्ण पद काजी-उल-कुजात अर्थात् प्रधान काजी का होता था। मुगलों की न्याय व्यवस्था का प्रमुख आधार मुस्लिम कानून निर्माताओं द्वारा इस्लाम के आधार पर निर्मित सिद्धान्त एवं दिल्ली सुल्तानों द्वारा स्थापित न्याय व्यवस्था थी। बादशाह की अत्यधिक व्यस्त्ता के कारण यह सम्भव नहीं था कि वह समस्त अपीलों की सुनवाई कर सके, इसलिए काजी-उल-कुजात की नियुक्ति की जाती थी जो अपीलों की सुनवाई करता था।

काजी-उल-कुजात साम्राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश था जो सल्तनत की सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था के लिये उत्तरदायी था। उसका मुख्य काम प्रान्तों, जिलों और नगरों में काजियों को नियुक्त करना तथा उनके निर्णयों के विरुद्ध अपीलें सुनना था। उसकी सहायता के लिए मुफ्ती होते थे जो इस्लामी कानूनों की व्याख्या करते थे।

मुगलकाल के अधिकांश काजी भ्रष्ट तथा घूसखोर थे। जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘मुगलकाल के लगभग समस्त काजी कुछ अपवादों को छोड़कर घूस लेने के लिए बदनाम थे।’

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव और डॉ. इब्नहसन का मत है कि काजी-उल-कुजात (प्रधान काजी) और सद्र-उस-सुदूर (प्रधान सद्र) एक ही व्यक्ति होता था।

सद्र-उस-सुदूर (प्रधान सद्र)

मुस्लिम कानूनों के वे ज्ञाता जिन्हें शरा की पूरी जानकारी होती थी, उलेमा कहलाते थे। बादशाह शासन के कार्यों में उलेमाओं से परामर्श लेता था। एक ही साथ अनेक उलेमाओं से परामर्श लेना सम्भव नहीं था, इसलिये बादशाह किसी एक उलेमा को शेख-उल-इस्लाम के पद पर नियुक्त करता था जिसे काजी-उल-कुजात भी कहा जाता था।

कठिन प्रश्नों पर विचार करने के लिए ‘शरा’ के अन्य ज्ञाताओं को भी बुलाया जाता था जिन्हें सुदूर कहा जाता था। जो सुदूर स्थाई रूप से परामर्श के लिए नियुक्त होता था उसे सद्र-उस-सुदूर कहा जाता था। इसका मुख्य काम धार्मिक मामलों पर बादशाह को सलाह देना होता था।

सद्र-उस-सुदूर का काम राजकीय दान-पुण्य की व्यवस्था करना, धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था करना, विद्वानों और साधु-संतों के लिए राजकीय अनुदान की व्यवस्था करना था। डॉ. इब्नहसन का मत है कि सद्र-उस-सुदूर का काम उलेमाओं को राज्य द्वारा जागीरें बख्शीश करवाने तथा निर्धनों को धन दान दिलवाने तक ही सीमित था। औरंगजेब ने सद्र-उस-सुदूर को पहली बार मंत्री स्तर प्रदान किया।

मुहतसिब

मुहतसिब का कार्य जनसाधारण के नैतिक चरित्र एवं आदर्श को उन्नत बनाना था। व्यावहारिक दृष्टि से इसका कार्यक्षेत्र मुसलमानों तक ही सीमित था। उसका मुख्य काम यह देखना था कि मुसलमान प्रजा, इस्लाम की शिक्षाओं के अनुसार जीवन यापन करती है या नहीं। मुसलमानों को इस्लाम के विरुद्ध आचरण करने से रोकना भी उसका उत्तरदायित्व था।

औरंगजेब के शासनकाल में इस पदाधिकारी का महत्त्व काफी बढ़ गया था क्योंकि उसे सल्तनत में निर्मित होने वालेे हिन्दू मन्दिरों को तोड़ने का काम दे दिया गया था। शराबखानों तथा जुए के अड्डों को समाप्त करना भी उसका काम था। इस कार्य के लिए वह सैनिकों के साथ नगर का दौरा करता था।

अन्य पदाधिकारी

उपर्युक्त प्रमुख पदाधिकारियों के अलावा अन्य कई महत्त्वपूर्ण अधिकारी शासन व्यवस्था से सम्बन्धित थे। इनमें बुयातात, मीर आतिश, दारोगा-ए-डाक-चौकी आदि मुख्य कहे जा सकते हैं। बुयातात का काम मृत पुरुषों की धन-सम्पत्ति का लेखा रखना तथा उस धन में से राजकीय कर को काटकर शेष धन मृत पुरुष के उत्तराधिकारियों को लौटाना था।

मीर आतिश तोपखाने का अध्यक्ष होता था। वह मीर बख्शी के अधीन काम करता था। उसका मुख्य काम शाही महल एवं दुर्ग की सुरक्षा का प्रबन्ध करना था। दरोगा-ए-डाक-चौकी राजकीय-डाक-विभाग का अध्यक्ष होता था। शासकीय पत्रों को भिजवाने के साथ-साथ उसे गुप्तचर विभाग भी सौंपा गया था। इसलिए शासन में उसका प्रभाव काफी बढ़ा हुआ था। निष्कर्षतः कहा जाता सकता है कि मुगलों की केन्द्रीय शासन व्यवस्था काफी सुसंगठित एवं सुव्यवस्थित थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख- मुगल शासन व्यवस्था एवं संस्थाएँ

मुगल शासन व्यवस्था

मुगलों का प्रांतीय शासन

मुगलों की सैनिक व्यवस्था

मुगलों की न्याय व्यवस्था

मुगलों की राजस्व व्यवस्था

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

मुगलों की मनसबदारी प्रथा

0
मुगलों की मनसबदारी प्रथा - www.bharatkaitihas.com
मुगलों की मनसबदारी प्रथा

आधुनिक इतिहासकार अभी तक मुगलों की मनसबदारी प्रथा को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। फिर भी इतना स्पष्ट है कि मनसबदारी प्रथा सैनिक रैंक के साथ-साथ जमींदारी की हैसियत से भी जुड़ी हुई थी।

मुगलों की मनसबदारी प्रथा

मनसब प्रथा की आवश्यकता

अकबर के शासन के आरम्भिक वर्षों में शाही सेना में मंगोल, तुर्क, उजबेग, अफगान तथा ईरानी आदि विदेशी सैनिकों की भरमार थी। सैनिक दलों के मुखिया भी उसी जाति के होते थे। इन अधिकारियों को अपनी तथा अपने सैनिकों की सेवाओं के बदले में जागीरें प्रदान की जाती थीं। हुमायूँ के विलासी स्वभाव के कारण शासन में शिथिलता आ गई।

इस कारण उसके शासनकाल में सैन्य अधिकारी केन्द्रीय सत्ता के पूर्ण नियंत्रण में नहीं रहे। उन्होंने जागीरोें के अनुरूप निर्धारित संख्या में सैनिक रखने भी बन्द कर दिये। इससे मुगलों की सैनिक शक्ति कमजोर पड़ गई। ये सैनिक अधिकारी अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये गैर-कानूनी काम तथा धोखाधड़ी भी करने लगे।

वे सैन्य व्यवस्था में किसी भी प्रकार के सुधार का हमेशा विरोध करते थे। अकबर सैनिक सत्ता का केन्द्रीयकरण करना चाहता था ताकि अनियंत्रित सैन्य अधिकारियों पर अंकुश लगाया जा सके और सैनिक सत्ता सही अर्थों में बादशाह के हाथों में आ जाय। मनसबदारी प्रथा अकबर की इसी विचारधारा का परिणाम था।

मनसब का अर्थ

अकबर द्वारा आरम्भ की गई मनसबदारी प्रथा मुगल व्यवस्था की एक चारित्रिक विशेषता थी। मनसब एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है- ‘निश्चित स्थान’। मनसबदारी प्रथा का उद्देश्य साम्राज्य के अधिकारियों में एक क्रमानुसार पद व्यवस्था स्थापित करना था।

साम्राज्य के समस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भर्ती सैनिक अधिकारी के रूप में की जाती थी, चाहे उनका काम कुछ भी हो। उनका पद एवं वेतन का निश्चय और शासन तथा दरबार में उनकी श्रेणी एवं मर्यादा का निर्धारण उनके मनसब के आधार पर तय होता था।

अबुल फजल के अनुसार अकबर ने मनसबदारों को मनसब दहववाशी (10 के नायक) से दस हजारी (10,000 सैनिकों का अधिकारी) तक निर्धारित कर दिये परन्तु 5,000 से ऊपर के मनसब अपने श्रेष्ठ पुत्रों के लिये आरक्षित कर दिये। 1585 ई. में मनसब की सर्वोच्च सीमा को बढ़ाकर 12,000 कर दिया गया और अमीरों को 7,000 तक के मनसब दिये जाने लगे। 1605 ई. में राजा मानसिंह को 7,000 जात एवं 6,000 सवार का मनसब दिया गया।

मनसबदारों की किस्में

मनसबदार दो किस्म के थे- स्थायी और अस्थायी। स्थायी मनसब को गैर-मश्रूत कहा जाता था। इस किस्म के मनसबदार जीवनपर्यन्त अपने पद का उपभोग करते थे। परन्तु बादशाह इसमें रद्दोबदल कर सकता था। अस्थायी मनसब को मश्रूत कहा जाता था। यह मनसब किसी विशेष कार्य की पूर्ति तक के लिये प्रदान किया जाता था।

कार्य की समाप्ति के साथ ही मनसब भी समाप्त हो जाता था। कई बार स्थायी मनसबदारों को अतिरिक्त कार्य के लिए मश्रूत प्रदान किया जाता था। कार्य समाप्ति के बाद यह समाप्त हो जाता था परन्तु गैर-मश्रूत यथावत् बना रहता था।

मनसबदारों की श्रेणियाँ

मनसबदारों की तीन श्रेणियाँ थीं- (1) मनसबदार, (2) अमीर और (3) उमरा-ए-आजम।

(1.) मनसबदार

एक विशेष पद अथवा कोटि से निम्न अधिकारियों को मनसबदार कहा जाता था।

(2.) अमीर

प्रारंभ में 200 अश्वारोहियों से ऊपर के अधिकारियों को अमीर की श्रेणी में रखा गया। बाद में इस सीमा को बढ़ाकर 500 अश्वारोही कर दिया गया। औरंगजेब ने इस सीमा को बढ़ाकर 1000 कर दिया।

(3.) उमरा-ए-आजम

उमरा-ए-आजम के अन्तर्गत अश्वारोहियों की ठीक संख्या बताना कठिन है क्यांेकि यह सीमा लगातार घटती-बढ़ती रही। इतिहासकारों का मानना है कि 3,000 अथवा उससे ऊपर के जात वाले अमीरों को ‘उमरा-ए-आजम’ (अथवा अमीर-ए-आजम) कहा जाता था।

जहाँगीर और शाहजहाँ के समय में यह सीमा बनी रही परन्तु औरंगजेब ने इसको घटाकर 2,000 जात कर दिया। 1682 ई. में इस सीमा को और कम करके 1,500 कर दिया गया। मनसबदारों के लिए अपने मनसब के हिसाब से सैनिक तथा पशु रखना आवश्यक नहीं था परन्तु उन्हें अपने अधीन अपनी मनसब की संख्या के एक निश्चित भाग तक सैनिक अवश्य रखने पड़ते थे। वस्तुतः ऐसा करके अकबर सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार और घोड़ों सम्बन्धी धोखाधड़ी को समाप्त कर देना चाहता था।

मनसबदारों की नियुक्ति

मनसबदारों की नियुक्ति बादशाह द्वारा की जाती थी। उनकी पदोन्नति अथवा पदावनति बादशाह की प्रसन्नता अथवा अप्रसन्नता पर निर्भर थी। सामान्यतः बादशाह शुभ अवसरों पर या सैनिक अभियान के आरम्भ में अथवा अंत में मनसबदारों के मनसब में वृद्धि करता था परन्तु ऐसा करना बादशाह के लिए अनिवार्य नहीं था।

1505 ई. में जब राजा टोडरमल बंगाल के सफल अभियान से वापस लौटा तब बादशाह ने उपहार आदि देकर उसका सम्मान तो किया परन्तु उसके मनसब में वृद्धि नहीं की। अबुल फजल के अनुसार मनसबदारों की नियुक्ति सामान्यतः प्रतिदिन होती रहती थी और सम्भवतः ही कोई दिन जाता हो जब किसी को मनसब प्रदान न किया जाता हो अथवा किसी के मनसब में वृद्धि न होती हो।

मनसब के उम्मीदवार बख्शी द्वारा बादशाह के सन्मुख प्रस्तुत किये जाते थे और उसकी स्वीकृति के बाद उसकी नियुक्ति का परवाना जारी किया जाता था।

मुगलों की मनसबदारी प्रथा में जात और सवार मनसब

1594 ई. में अकबर ने सवार पद आरम्भ किया। इससे पूर्व मनसब के लिये केवल जात शब्द का प्रयोग किया जाता था। प्रत्येक मनसबदार से यह आशा की जाती थी कि वह अपने मनसब के अनुरूप अश्वारोही सैनिक रखेगा और इसी हिसाब से उसको जागीर भी दी जाती थी परन्तु व्यावहारिक रूप में मनसबदार मनसब के अनुरूप अश्वारोही सैनिक को रखे बिना ही उतने सैनिकों के वेतन तथा जागीर का उपभोग करते रहते थे।

इस भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए मनसबदारों के मनसब में जात और सवार पद का उल्लेख किया जाने लगा। स्पष्ट है कि जात और सवार शब्द दो अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त किये जाते थे। दुर्भाग्यवश जात और सवार शब्दों की सही व्याख्या अभी तक नहीं हो पाई है। विभिन्न विद्वानों ने इन शब्दों के विभिन्न अर्थ निकाले हैं।

ब्लाकमैन के अनुसार जात सैनिकों की उस संख्या का बोधक था जिसके रखने की आशा मनसबदारों से की जाती थी और सवार मनसब उस संख्या को बताता है जो वास्तव में मनसबदार रखते थे। मनसबदार के वेतन का भुगतान जात संख्या के आधार पर किया जाता था।

इरविन के मतानुसार ‘सवार पद’ एक अतिरिक्त सम्मान था और प्राप्तकर्त्ता को जात की संख्या के अतिरिक्त सवार पद से निश्चित सैनिकों को भी रखना पड़ता था। इरविन के मत में सबसे बड़ा दोष तो यह है कि यदि इस मत के आधार पर सैनिकों की गणना करें तो मुगल सेना की संख्या एक अविश्वसनीय अंक तक पहुँच जाती है।

डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी के अनुसार सवार मनसब एक अतिरिक्त सम्मान मात्र था और उसमें जितने सवारों का उल्लेख होता, उन्हें रखने का मनसबदार का कोई बन्धन नहीं होता था। अब्दुल अजीज का मत है कि मनसब के अन्तर्गत मनसबदार एक निश्चित संख्या में हाथी, भारवाहक पशु आदि रखता था जबकि सवार मनसब यह बताता था कि उसके पास कितने सैनिक सवार होने चाहिए।

सी. एम. के. राव का मत है कि जात पैदल और सवार मनसब घुड़सवारोें की संख्या को बताता था। जात और सवार सम्बन्धी इन विरोधी विचारों के आधार पर इनका सही अर्थ निकालना अत्यधिक कठिन है।

वेतन और भत्ता

मनसबदारों के वेतन का भुगतान नकदी अथवा जागीर के रूप में किया जाता था। कोई जागीर अथवा मनसब वंशानुगत नहीं थी। वैसे बादशाह बड़े मनसबदारों के पुत्रों को मनसब देकर उनके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करता था परन्तु उन्हें निम्न मनसब ही दिये जाते थे। यदि उनमें प्रतिभा होती तो वे उन्नति करते-करते बड़े मनसबदार बन जाते थे। मनसबदारों को उनके मनसब के अनुसार वेतन दिया जाता था। कई बार मनसबदारों को वेतन के अलावा पुरस्कार स्वरूप धन भी दिया जाता था।

मनसबदारों को अपने समस्त प्रकार के सैनिकों के बदले में जो वेतन मिलता था उसे तलब कहा जाता था। जात पद के लिए जो वेतन मिलता था उसे खासा अथवा घात कहा जाता था। इस वेतन से मनसबदार अपने परिवार का पोषण करता था। सवार पद के लिए जो वेतन मिलता था उसे ताबीनाल कहा जाता था।

इसका उपयोग मनसब के अनुरूप रखे जाने वाले घोड़ों, घुड़सवारों, बोझा ढोने वाले पशुओं आदि पर किया जाता था। अबुल फजल के अनुसार प्रथम श्रेणी के 5,000 के मनसबदार को 30,000 रुपये मासिक मिलते थे। इसी प्रकार, प्रथम श्रेणी के 500 के मनसबदार को 2,500 रुपये प्रतिमाह मिलते थे।

10 के मनसबदार को 100 रुपये प्रतिमाह मिलते थे परन्तु तृतीय श्रेणी के 5000, 500 एवं 10 के मनसबदार को क्रमशः 28,000; 2100 एवं 75 रुपये प्रतिमाह मिलते थे। शाहजादों को उनके मनसब की तुलना में कहीं अधिक वेतन मिलता था।

मुगलों की मनसबदारी प्रथा में मनसब की श्रेणियाँ

1595 ई. से पूर्व मनसब की अलग-अलग श्रेणियाँ नहीं थी परन्तु 1595 ई. में मनसबदारों को तीन श्रेणियाँ में बाँटा गया। जिस मनसबदार के पास अपनी मनसब की संख्या के बराबर सैनिक होते थे, वह अपने मनसब का प्रथम श्रेणी का मनसबदार कहलाता था।

यदि उसके पास सैनिकों की संख्या उसके मनसब की आधी संख्या से अधिक होती थी तो वह दूसरी श्रेणी का और आधी संख्या से भी कम सैनिक रखने वाला तीसरी श्रेणी का मनसबदार कहलाता था।

इसी वर्गीकरण के आधार पर उन्हें वेतन भी दिया जाता था। यह आवश्यक नहीं था कि किसी उच्च मनसब प्राप्त मनसबदार को शाही दरबार में भी उच्च पद प्राप्त हो। उदाहरणार्थ, राजा मानसिंह को सात हजार मनसब प्राप्त था किन्तु उसको दरबार में कभी भी मंत्री पद प्राप्त नहीं हो सका जबकि उससे कम मनसब वाला अबुल फजल कई वर्षों तक मंत्री पद पर बना रहा।

असैनिक विभागों के अधिकारी सैनिक नहीं रखते थे परन्तु आवश्यकता पड़ने पर उन्हें भी सैनिक सेवा देनी पड़ती थी। कोई भी मनसबदार समस्त मुगल सेना का नायक नहीं था। स्वयं बादशाह ही प्रधान सेनापति था। वह अलग-अलग मनसबदारों को विभिन्न अभियानों का मुख्य सेनापति नियुक्त करता था। उसकी सहायता के लिए उससे भी उच्च मनसब वाले मनसबदारों को नियुक्त कर दिया जाता था।

मनसबदारों द्वारा सैनिकों की भर्ती

मनसबदार अपने सैनिकों की भर्ती करने के लिए स्वतंत्र थे तथा प्रत्येक मनसबदार प्रायः अपनी जाति के लोगों को ही अपनी सेना में भर्ती करता था। उन्हें अपने घोड़े तथा व्यवस्था सम्बन्धी अन्य सामान भी स्वयं जुटाना पड़ता था। मीरबख्शी के विभाग द्वारा मनसबदारों के सैनिकों तथा घोड़ों का निरीक्षण किया जाता था।

प्रथम निरीक्षण के समय मनसबदार के घोड़ों तथा सैनिकों की जाँच कर उनकी एक सूची बनाई जाती थी और उनके घोड़ों को दागा जाता था। दो प्रकार के दाग लगाये जाते थे। घोड़े के सीधे पुट्ठे पर सरकारी निशान और बायें पुट्ठे पर मनसबदार का निशान दागा जाता था। निरीक्षण के समय सही संख्या में घोड़े तथा सैनिक प्रस्तुत करने वाले मनसबदारों को पदोन्नति जल्दी मिलती थी। मनसबदारों को पुरस्कृत तथा दण्डित करने की भी व्यवस्था थी ताकि उन्हें अनुशासन में रखा जा सके।

जब्ती प्रथा

मनसबदारी से सम्बन्धित जब्ती प्रथा के बारे में विद्वान एकमत नहीं हैं। इस प्रथा के अंतर्गत मनसबदार अथवा अमीर की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति को राज्य जब्त कर लेता था। इसका एक कारण तो यह माना जाता है कि मनसबदार हमेशा ही राज्य के ऋणी रहा करते थे और मनसबदार की मृत्यु के बाद राज्य अपने ऋण की वसूली के लिए उसकी सम्पत्ति को कुर्क कर लेता था।

दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि राज्य की सेवा में रहते हुए मनसबदार समस्त धन अर्जित करता था। इसलिए उसकी मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति पर राज्य का अधिकार माना जाता था। इस प्रथा के कारण मुगल काल में कुलीन वर्ग का उत्कर्ष नहीं हो सका। मनसबदार के पुत्रों को नये सिर से अपना जीवन आरम्भ करना पड़ता था।

अबुल फजल ने जब्ती प्रथा के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है परन्तु इतिहासकारों का मानना है कि अकबर के शासनकाल में भी यह प्रथा किसी न किसी रूप में प्रचलित थी तथा यह प्रथा कुछ विशेष परिस्थितियों में ही लागू की जाती थी जैसे कि-

(1) यदि किसी मनसबदार का कोई उत्तराधिकारी नहीं होता था

(2) यदि उस पर राज्य का बकाया, निकलता था और

(3) जागीर का हिसाब साफ किया हुआ नहीं होता था। ऐसी स्थितियों में मनसबदार की सम्पत्ति जब्त कर ली जाती थी परन्तु जिन मनसबदारों के उत्तराधिकारी होते थे, उन्हें मनसबदार की सम्पत्ति में से काफी कुछ दे दिया जाता था। उन्हें कितना हिस्सा दिया जाये, यह बादशाह की इच्छा पर निर्भर करता था। इस सम्बन्ध में कोई निश्चित नियम नहीं थे। बर्नियर ने इस प्रथा को ‘जंगली’ कहा है।

अकबर के बाद मुगलों की मनसबदारी प्रथा

अकबर के बाद मनसब की सीमा में तेजी के साथ वृद्धि होती गई। जहाँगीर के शासनकाल में मनसब की सीमा 40,000 तक पहुँच गई। 1617 ई. में शाहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) को 30,000 जात एवं 20,000 सवार तथा शाहजादा परवेज को 20,000 जात एवं 10,000 सवार का मनसब दिया गया।

इसी प्रकार, नगरयार को 12,000 जात एवं 8,000 सवार का मनसब मिला। जब शाहजहाँ ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया तब परवेज का मनसब बढ़ाकर 40,000 जात एवं 30,000 सवार कर दिया गया। शाहजहाँ के शासनकाल में मनसबों की सीमा और अधिक बढ़ाने का प्रयास किया गया।

दारा शिकोह को 60,000 जात एवं 40,000 सवार का मनसब दिया गया था। शुजा को 20,000 जात एवं 15,000 सवार, औरंगजेब को 20,000 जात एवं 15,000 सवार और मुराद को 15,000 जात एवं 12,000 सवार के मनसब दिये गये। औरंगजेब ने भी अपने पुत्रों को उच्च मनसब दिये।

शाहजादा मुअज्जम को 40,000 जात एवं 40,000 सवार, कामबख्श को 40,000 जात एवं 40,000 सवार, मुहम्मद सुल्तान को 20,000 जात एवं 10,000 सवार, मुहम्मद आजम को 20,000 जात एवं 9,000 सवार के मनसब दिये गये। इसी प्रकार, उसने अपने पौत्रों को भी उच्च मनसब प्रदान किये। मनसब की वृद्धि केवल बादशाह के पुत्र-पौत्रों के मनसबों में ही की गई थी। साम्राज्य के किसी भी अमीर को इतने उच्च मनसब नहीं दिये गये थे।

अकबर के बाद मनसबदारों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती गई। औरंगजेब के समय में तो विशेष वृद्धि हुई। मनसब की सीमा में तो वृद्धि हुई परन्तु मनसबदारों के वेतन में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं हुई। उल्टे उनके वेतन तथा भत्ते कम होते गये। शाहजहाँ के समय से ही यह गिरावट आरम्भ हो गई।

औरंगजेब के समय में अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाने से स्थिति और भी विकट हो गई। समय पर वेतन चुकाना भी सम्भव नहीं रहा। अकबर के समय में एक साधारण अश्वारोही को 9,600 दाम (240 रुपये) प्रतिवर्ष वेतन मिलता था। जहाँगीर के समय में यही वेतन बना रहा परन्तु शाहजहाँ के शासनकाल के अन्तिम वर्षों में तथा औरंगजेब के शासनकाल में 8,000 दाम (200 रुपये) प्रतिवर्ष वेतन दिया जाता था। वेतन में कटौती के साथ रसद-ए-खुराकी में भी कटौती की गई।

मुगलों की मनसबदारी प्रथा की सफलता

जागीरदारी प्रथा के दोषों को दूर करने तथा राजपूतों पर अंकुश रखने के लिए अथवा उनमें प्रतिस्पर्धा की भावना को उत्पन्न कर एक का दूसरे के विरुद्ध उपयोग करने और अपने विद्रोही उमरावों के विरुद्ध कबीला भावना का उपयोग कर उनको दबाने की दृष्टि से अकबर ने जिस मनसबदारी प्रथा का सूत्रपात किया, वह कई दृष्टियों से सफल रही।

इससे मनसबदारों में बादशाह के प्रति स्वामिभक्ति और कर्त्तव्यनिष्ठा की भावना भी बढ़ी क्योंकि उनकी पदोन्नति बादशाह की कृपा पर निर्भर करती थी। इस व्यवस्था से योग्य व्यक्तियों को दायित्वपूर्ण काम सौंपने में सरलता हो गई।

मुगलों की मनसबदारी प्रथा के दोष

उपरोक्त समस्त सफलताओं के उपरान्त भी मनसबदारी प्रथा में कुछ जन्मजात दोष थे, जो इस प्रकार थे-

(1.) मनसबदारों को अपने मनसब के अनुसार जो वेतन मिलता था, वे उसका प्रायः दुरुपयोग करते थे। वे लोग साधारण लोगों को फौजी वर्दी पहनाकर और उनके घोड़ों को अपना बताकर सैनिक निरीक्षण के लिए ले जाते थे और उन्हें मुक्त कर उनके वेतन का स्वयं उपभोग करते रहते थे।

इरविन ने लिखा है- ‘झूठी सेना संग्रह एक ऐसी बुराई थी जो मुगल सेना में सबसे अधिक पाई जाती थी। इन सबके हिस्से को पूरा करने के लिए मनसबदार एक-दूसरे को अपने सैनिक उधार दे देते थे अथवा बाजार से लोगों को पकड़ कर उन्हें किसी टट्टू पर बैठाकर दूसरों के साथ उनकी भी गिनती योग्य सैनिकों में करा देते थे।’

इस प्रकार, राज्य जितना खर्च करता था, उतनी योग्य एवं शिक्षित सेना उसे नहीं मिल पाती थी।

(2.) मनसबदार के सैनिक, बादशाह की तुलना में अपने मनसबदार के प्रति अधिक स्वामिभक्त होते थे। सैनिकों को भुगतान यद्यपि शाही खजाने से दिया जाता था परन्तु मनसबदार और बादशाह में संघर्ष छिड़ जाने की स्थिति में वे प्रायः मनसबदार के पक्ष से लड़ते थे।

(3.) मनसबदारों को अपने सैनिक भर्ती करने की स्वतंत्रता थी। धीर-धीरे मनसबदारों का नैतिक पतन होता चला गया और सैनिक भर्ती में भ्रष्टाचार को रोकना असम्भव हो गया। मनसबदार को अपने सैनिक दस्ते का नेतृत्व करना पड़ता था, अतः उसे विभिन्न प्रकार के सैनिकों का नेतृत्व करने के अनुभव से वंचित रह जाना पड़ता था।

(4.) मनसबदारों के लिए यद्यपि नियम बनाये गये परन्तु उनको लागू करना बादशाह की इच्छा पर निर्भर था जो किसी भी मनसबदार को ऊँचे मनसब दे सकता था अथवा महत्त्वपूर्ण सैनिक अभियान का प्रधान सेनापति नियुक्त कर सकता था। इससे मनसबदारों में एक-दूसरे के प्रति प्रतिद्वंद्विता एवं द्वेष भावना पनप गई। वे प्रायः शत्रु का मिलकर सामना करने की अपेक्षा आपस में ही एक-दूसरे को नाकामयाब बनाने में लग जाते थे। मनसबदारों के बीच में बढ़ता हुआ द्वेष मुगल साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुआ।

(5.) मनसबदार की मृत्यु के पश्चात उसका मनसब समाप्त हो जाता था और सरकार उसकी सम्पत्ति भी जब्त कर लेती थी। इसलिए प्रत्येक मनसबदार अपने जीवनकाल में ही समस्त धन को खर्च करने का प्रयत्न करता था ताकि मरने पर राज्य को कुछ न मिले।

इस मनोवृत्ति ने एक तरफ तो उन्हें अत्यधिक विलासी बना दिया और दूसरी तरफ वे हमेशा कर्ज में डूबे रहने लगे। अनेक मनसबदार तो युद्ध क्षेत्र की ओर कूच करते समय भी अपने साथ अनेक सेवक, नर्तकियाँ और हरम की स्त्रियों को ले जाते थे। इससे सेना की गति बहुत धीमी पड़ जाती थी।

(6.) मनसबदारी व्यवस्था में केन्द्रीयकरण न होने से उसमें एकता की भावना विकसित नहीं हो पाई जो एक राष्ट्रीय सेना के लिए आवश्यक होती है। विभिन्न मनसबदारों के अन्तर्गत विभिन्न सैन्य-दलांे के रख-रखाव और रणकौशल का स्तर भी भिन्न-भिन्न होता था। इसीलिए उनमें अनुशासन एवं योग्यता की समानता नहीं थी।

(7.) मनसबदार अपने सैनिकों को प्रशिक्षण देने की व्यवस्था नहीं करते थे। मुगल बादशाहों ने भी इसके लिए उन पर दबाव नहीं डाला।

मुगल सेना के अन्य दोष

मनसबदारी प्रथा के अलावा मुगलों की सैन्य व्यवस्था में कुछ अन्य दोष भी थे-

(1.) मुगल शासकों ने पैदल सेना की तरफ विशेष ध्यान नहीं दिया। इससे पैदल सेना का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता चला गया।

(2.) मुगलों का तोपखाना समय की रफ्तार से काफी पीछे रह गया। बड़ी-बड़ी तोपों के होते हुए भी अकबर असीरगढ़ जैसे किले पर कोई सक्रिय प्रभाव नहीं डाल सका। शाहजहाँ के समय में कन्धार में मुगल सेना अपनी तोपों के होते हुए भी असफल रही। औरंगजेब के समय में जब मराठों ने छापामार युद्ध पद्धति का सहारा लिया, तब तोपों की रही-सही उपयोगिता भी समाप्त हो गई।

(3.) मुगलों ने नौ-शक्ति की उपेक्षा कर भारतीय समुद्रों का द्वार यूरोपीय राष्ट्रों के लिए खुला छोड़ दिया जिससे यूरोपीय लोग भारत के समुद्र तटों पर ऐसे जम गये कि बाद में उन्हें हटाना असम्भव हो गया।

(4.) मुगल सेना की धीमी गति भी उनका एक मुख्य दोष थी। औरंगजेब के जीवन के अंतिम भाग में मुगल सेना अपनी शक्ति और साख खो बैठी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगलों की जागीरदारी प्रथा

0
मुगलों की जागीरदारी प्रथा - www.bharatkaitihas.com
मुगलों की जागीरदारी प्रथा

मुगलों की जागीरदारी प्रथा का आधार वे हिन्दू एवं मुसलमान सेनापति थे जो अपनी प्रजा पर कड़ाई से नियंत्रण करके प्रजा से राजस्व वसूल करके केन्द्रीय कोषागार में समय पर जमा करवा सके।

मुगलों की जागीरदारी प्रथा में जागीरों के प्रकार

राज्य कर्मचारियों को वेतन के बदले जो भूमि दी जाती थी उसे जागीर कहते थे। मुगलकाल से पहले भी इसी प्रकार से वेतन भुगतान की पद्धति के प्रमाण मिलते हैं परन्तु मुगलकाल में यह व्यवस्था अत्यधिक व्यापक थी।

मुगलकाल में कई प्रकार की जागीरें प्रचलन में थीं। यहाँ तक कि मुगलों के राजस्व अभिलेखों में जोधपुर, जयपुर आदि राज्यों के राजाओं को भी जागीरदार कहकर सम्बोधित किया गया है। प्रमुख जागीरों के प्रकार इस प्रकार से थे-

(1.) तनख्वाह जागीर

जब जागीर वेतन के बदले दी जाती थी तो उसे तनख्वाह जागीर कहा जाता था।

(2.) मशरूत जागीर

जब किसी पद प्राप्ति के कारण जागीर प्रदान की जाती थी तो उसे मशरूत जागीर कहा जाता था।

(3.) इनाम जागीर

1672 ई. में मुहम्मद अमीन खाँ की गुजरात की सूबेदारी के पद पर नियुक्ति के समय पाटन और बैरम गाँव की जागीर उसके पद के साथ मिला दी गई। ऐसी जागीर जिसके लिए कोई अनुबन्ध नहीं होता था, इनाम कही जाती थी।

(4.) वतन जागीर

अकबर ने भारतीय शासकों और जमींदारों को मनसबदार नियुक्त करने की नीति अपनाई थी। उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र के जमा (मालगुजारी) के बराबर मनसब मिलता था। इसके लिए आवश्यक था कि इस वर्ग के पास जितनी भूमि है उसकी आय का अनुमान लगाया जाये। क्योंकि इन क्षेत्रों के सही आँकड़े उपलब्ध नहीं थे, इसलिए केवल अनुमान के आधार पर इनको निश्चित कर दिया गया। यह जागीर वतन जागीर कहलाती थी।

(5.) तनख्वाह जागीर

मनदसबदार को मनसबदार के रूप में जो जागीर प्रदान की जाती थी वह तनख्वाह जागीर के नाम से सम्बोधित की जाती थी। जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह को इसी आधार पर मारवाड़ वतन जागीर के रूप में और हिसार तनख्वाह जागीर के रूप में दिया गया था।

(6.) अल-तमगा जागीर

जहाँगीर ने अल-तमगा नामक नई जागीर व्यवस्था आरम्भ की। इस प्रकार की जागीर की स्वीकृति के फरमान पर बादशाह की मोहर लगाई जाती थी, जो सोने के पानी की होती थी। अल-तमगा जागीर का उद्देश्य तथा स्वरूप जहाँगीर ने स्वयं स्पष्ट किया है- ‘यह मेरी इच्छा थी कि अनेक पदाधिकारी अपनी इच्छाओं को पूर्ण होते देख सकें। मैनें बख्शियों को आदेश दिया कि यदि कोई अपनी मातृभूमि को जागीर के रूप में प्राप्त करना चाहे तो वह इसके लिए निवेदन करे जिससे कि चंगेज के नियमों के अनुसार अल-तमगा के अन्तर्गत उसकी जागीर की सम्पत्ति में परिणत कर दिया जाये जिससे कि वह जागीर तबादले की आशंका से मुक्त हो जाये।’

जहाँगीर की इच्छा थी कि यदि वह किन्हीं अधिकारियों को विशेष रूप से अनुग्रहित करना चाहे तो ऐसा करने में कोई असुविधा न हो। मुगलकाल में अल-तमगा जागीर के छुटपुट प्रमाण ही मिलते हैं।

उत्तराधिकार का नियम

मुगल शासक जागीर के सम्बन्ध में पैतृक उत्तराधिकारी को मानते थे परन्तु उसके बाद भी यह उनका अधिकार था कि वे उत्तराधिकारी को चुनें। 1679 ई. में औरंगजेब ने महाराजा जसवन्तसिंह की मृत्यु होने पर जोधपुर की वतन जागीर को खालसा घोषित कर दिया तो परम्परा के विरुद्ध होने के कारण इसका जबरदस्त विरोध हुआ।

मुगलों की जागीरदारी प्रथा में जागीरों का प्रबंधन

जागीरदारी प्रथा से किसानों के अधिकारों पर किसी प्रकार की आँच नहीं आती थी और न ही जमींदार किसी प्रकार से इससे प्रभावित होता था। जागीर का पट्टा मिलने पर स्वयं जागीरदार का यह उत्तरदायित्व था कि वह अपनी जागीर से राजस्व एकत्रित करने का प्रबन्ध करे। बड़े-बडे़ जागीरदार इस कार्य के लिए आमिल, अमीन, कानूनगो आदि रखते थे और उन्हीं के द्वारा वे अपनी जागीर से राजस्व एकत्रित करवा लिया करते थे।

इजारेदारी

छोेटे-छोटे जागीरदारों के लिए जागीर के प्रबंधन के लिये विभिन्न कर्मचारियों की नियुक्ति करना कठिन था। इसलिये वे अपनी जागीर इजारे पर देते थे और इजारेदारों से एक निश्चित धनराशि लेते थे। जब जागीरदार की नियुक्ति ऐसे स्थान पर हो जाती थी जो उनकी जागीर से दूर होता था तब जागीर की समुचित व्यवस्था करना सम्भव नहीं होता था। तब भी जागीर इजारे पर दी जाती थी।

पायबाकी

जब कभी एक जागीरदार का निधन हो जाता था अथवा उसकी जागीर की बदली होती थी तो जागीर को तब तक के लिये पुरानी जागीर के दीवान के अधिकार में पायबाकी के रूप में रख दिया जाता था जब तक कि वह दूसरे जागीरदार को न दे दी जाती। इस पायबाकी में से राज्य के अधिकारियों को उस समय कुछ जागीर दे दी जाती थी, जब वे किसी विशेष काम के लिए नियुक्त किये गये हों। ऐसी जागीर को मशरूत जागीर के नाम से पुकारा जाता था।

मुगलों की जागीरदारी प्रथा में जागीरदारों पर नियंत्रण

जागीरदार का स्थानांतरण

अकबर के आरम्भिक वर्षों में जागीरदार स्वयं को जागीर का स्थायी स्वामी समझ बैठे थे। अतः अकबर ने उनकी शक्ति कम करने के लिए जागीरदारों को एक जागीर से दूसरी जागीर में स्थानांतरित करने की नीति बनाई किन्तु जागीर के बदलने के कारण जमा (लगान) की राशि में कमी या अधिकता आ जाती थी।

इसलिए उसने जागीर से राजस्व वसूल करने का काम सरकारी कर्मचारियों के हाथों में सौंप दिया। 1581-82 ई. में पुनः नकद वेतन देने की प्रथा भी चलाई परन्तु इसका अत्यधिक विरोध हुआ। अतः जागीर व्यवस्था को पुनः लागू कर दिया गया। इसका लाभ यह हुआ कि अब जागीरदार सतर्क हो गये।

जागीरदारों पर अंकुश

मुगल काल में जागीरदार का अपनी जागीर पर पूर्ण अधिकार नहीं होता था। बादशाह का ही उस पर नियंत्रण रहता था। कानूनगो, चौधरी तथा प्रशासन के दूसरे सहयोगी लगान सम्बन्धी नियमों को लागू करते थे तथा फौजदार जागीर में शान्ति व्यवस्था का कार्य करते थे।

बादशाह से जागीर की दुर्व्यवस्था के सम्बन्ध में शिकायत की जा सकती थी और ऐसी स्थिति में जागीरदार को दण्डित भी किया जा सकता था। जागीरदार अपनी उन्नति तथा आर्थिक अस्तित्त्व के लिए बादशाह पर निर्भर रहते थे।

बादशाह अधिकतर अपने सम्बन्धी या उच्च कुल के लोगों को जागीर देते थे परन्तु नीचे के वंश वालों को जागीर देने पर प्रतिबन्ध नहीं था। इसलिए जागीरदार को यह भय लगा रहता था कि यदि बादशाह ने उनके समक्ष किसी नीचे के वंश वाले को जागीरदार बना दिया तो यह उनके लिए असम्मानजनक होगा।

औरंगजेब के समय जागीर प्रथा में एक नया संकट आ गया। इस समय तक इतनी जागीरें दी गईं कि राज्य में जागीर देने के लिए भूमि शेष नहीं बची। जागीर मिलने में इतनी देर हो जाया करती थी कि यह कहा जाने लगा कि मनसब मिलने तथा उससे सम्बन्धित जागीर प्राप्त करने में एक नौजवान के बाल सफेद हो जाते थे।

ऐसी स्थिति में जागीर का तबादला होना तो और भी अधिक दुःखदायी था। जागीरदार यह नहीं जानते थे कि एक बार जागीर हाथ से निकल जाने पर उन्हें दूसरी जगह जागीर प्राप्त करने में सफलता मिलेगी या नहीं। अतः वे भयभीत रहते थे।

मुगलों की जागीरदारी प्रथा में मदद-ए-माश

इस्लामिक प्रथा के अनुसार मुगल शासक भी धार्मिक लोगों, विद्वानों, शेखों, सैयदों आदि को करमुक्त भूमि का अनुदान देते थे जिसे मदद-ए-माश कहा जाता था। अबुल फजल के अनुसार चार वर्गाें के लोगों को मदद-ए-माश भूमि के अनुदान योग्य माना गया था-

(1.) पहला वर्ग उन लोगों का था जिन्होंने दुनियादारी का परित्याग कर सत्य की खोज में स्वयं को खपा दिया हो।

(2.) दूसरा वर्ग धार्मिक सन्तों का था।

(3.) तीसरे वर्ग में वे लोग आते थे जो किसी कारणवश शारीरिक अथवा भौतिक जीविका चलाने में असमर्थ थे।

(4.) चौथे वर्ग में वे लोग थे जो कुलीन वंश के थे परन्तु किसी व्यापार अथवा व्यवसाय को करना अपनी मर्यादा के खिलाफ समझते थे।

मदद-ए-माश के प्राप्तकर्त्ताओं को यह अधिकार था कि वे अपनी भूमि किसानों को ठेके पर दे दें अथवा बेच दें अथवा दान में दे दें। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के समय में ऐसे अनुदान को बेचने या हस्तांतरण करने का अधिकार प्राप्तकर्त्ता को था या नहीं, निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता परन्तु औरंगजेब और उसके उत्तराधिकारियों के समय में यह प्रथा मौजूद थी।

मदद-ए-माश की संस्था को मुगलकालीन सामाजिक एवं कृषि व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। सामाजिक रूप से इस संस्था ने ग्रामीण जनता में धार्मिक सहिष्णुता की चेतना विकसित करने में सहयोग दिया।

मुगलों की जागीरदारी प्रथा में संस्थाओं को जागीर

व्यक्तियों के साथ-साथ संस्थाओं को भी इस प्रकार का अनुदान दिया जाता था। अनुदान देने तथा उनके पुनर्ग्रहण करने के समस्त अधिकार बादशाह में निहित थे। भू-स्वामित्व का अधिकार वंशानुगत दिया जाता था परन्तु उत्तराधिकारियों को आवधिक सत्यापन कराना आवश्यक था।

ऐसे अनुदान अधिकतर भू-राजस्व तथा अन्य करों से मुक्त रहते थे किन्तु ऐसी भूमि पर कर निर्धारण की सम्भावना को पूरी तरह से अस्वीकार नहीं किया जा सकता। शाहजहाँ ने 1648-49 ई. में बेगम बिरलास के अनुदान पर कर लगाया था। इसी प्रकार शाहजहाँ के काल में ही भूसरा तथा हैबतपुर गाँवों की अयम्मा भूमि पर भी कर का निर्धारण कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगलों का प्रांतीय शासन

0
मुगलों का प्रांतीय शासन - www.bharatkaitihas.com
मुगलों का प्रांतीय शासन

मुगलों का प्रांतीय शासन पूर्ववर्ती तुर्कों द्वारा स्थापित प्रांतीय शासन की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ था। विद्रोह करने वाले प्रांतपतियों का सख्ती से दमन किया जाता था।

बाबर एवं हुमायूँ ने प्रान्तीय व्यवस्था स्थापित करने में कोई विशेष योगदान नहीं दिया। इसलिये सल्तनत कालीन व्यवस्था ही चलती रही। अकबर के शासनकाल मंे मुगल सल्तनत को सूबों (प्रान्तों) में बांटा गया। आइने अकबरी ने इनकी संख्या 12 बताई है। 1599 ई. तक बरार, खानदेश और अहमदनगर की विजय से तीन सूबे और बढ़ गये।

इस प्रकार, अकबर के शासन के अन्त में मुगलों का प्रांतीय शासन 15 सूबों में विभाजित था। जहाँगीर के समय में यही संख्या बनी रही परन्तु शाहजहाँ द्वारा थट्टा, उड़ीसा और काश्मीर को स्वतंत्र सूबे बना देने से सूबों की संख्या बढ़कर 18 हो गई। औरंगजेब द्वारा बीजापुर और गोलकुण्डा की विजय से दो सूबे और बढ़ गये।

सूबों का क्षेत्रफल स्थायी नहीं होता था। केन्द्रीय सरकार की आवश्यकता के अनुसार इसमें परिवर्तन होते रहते थे। प्रान्तों की आय में भी कोई समानता नहीं थी। साधारणतः समस्त सूबे बराबर थे किन्तु सुरक्षा और सामरिक महत्त्व की दृष्टि से कुछ सूबों पर अन्यों की तुलना में अधिक ध्यान दिया जाता था।

मुगलों का प्रांतीय शासन

सूबेदार

मुगलों का प्रांतीय शासन उनकी केन्द्रीय शासन व्यवस्था से मिलता-जुलता था। जदुनाथ सरकार उसे केन्द्रीय व्यवस्था का लघु रूप ही मानते हैं। प्रान्त का सर्वोच्च अधिकारी सिपहसालार तथा सूबा-ए-साहिब कहलाता था। यह पदाधिकारी सूबे में बादशाह का ही प्रतिरूप था। उसकी नियुक्ति बादशाह द्वारा की जाती थी।

सामान्यतः यह पद राजवंश के सदस्यों तथा उच्च मनसबदारों को दिया जाता था। सूबेदार की नियुक्ति और पदोन्नति के सम्बन्ध में निश्चित नियम नहीं थे। सूबेदार की नियुक्ति एक सूबे में कितने समय तक रहेगी, इसके भी स्पष्ट नियम नहीं थे। सामान्यतः तीन वर्ष की अवधि के बाद उनका स्थानान्तरण किया जाता था।

मुगल बादशाह की भाँति सूबेदार का अपना दरबार होता था। वह एक विशाल सेना रखता था। सूबेदार के मुख्य कामों में प्रान्त में शान्ति एवं व्यवस्था को कायम रखना, शाही आदेशों का पालन करवाना, प्रान्त से राजस्व वसूली के कार्य में सहयोग देना, विद्रोहों का दमन करना, न्याय प्रदान करना और जन-सुविधा का ध्यान रखना शामिल था।

सूबेदार के लिये ऐसे कार्य करने की मनाही थी जो बादशाह के विशेषाधिकार में थे, जैसे- चमड़ी उधड़वाना, हाथी के पैरों से कुचलवाना, झरोखा-दर्शन देना आदि। मृत्युदण्ड के मामलों में उसे शाही निर्देशों के अनुसार कार्य करना होता था। बादशाह की पूर्व स्वीकृति के बिना वह पड़ौसी राज्यों से युद्ध अथवा सन्धि नहीं कर सकता था। वह अपने अधीनस्थ अधिकारियों- दीवान और सद्र को नियुक्त अथवा पदच्युत भी नहीं कर सकता था।

दीवान-ए-सूबा

प्रान्तीय शासन व्यवस्था का दूसरा महत्त्वपूर्ण अधिकारी दीवान-ए-सूबा था। प्रान्त में सूबेदार के पश्चात् दीवान का ही पद था। यह प्रान्त में केन्द्रीय राजस्व विभाग का प्रतिनिधि था और किसी भी तरह से सूबेदार के अधीन नहीं था। वह सूबेदार का प्रतिद्वन्द्वी था। दोनों ही एक-दूसरे पर निगरानी रखते थे। प्रान्तीय दीवान का चुनाव केन्द्रीय दीवान करता था और बादशाह उसकी नियुक्ति करता था।

दीवान का मुख्य काम प्रान्त से राजस्व वसूल करना तथा राजस्व वसूली के लिए प्रान्तीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों को नियुक्त करना था। राजस्व सम्बन्धी विवादों को निपटाना तथा कृषि की उन्नति की तरफ ध्यान देना भी उसी का काम था। उसे अपने कामों के लिए सूबेदार की सहायता पर निर्भर रहना पड़ता था। क्योंकि दीवान के अधिकार में अलग से सैनिक नहीं होते थे। वह अपनी रिपोर्ट केन्द्रीय दीवान के पास भेजता था।

सद्र-ए-सूबा

दीवान के पश्चात न्याय और धार्मिक विभाग के अध्यक्ष का पद प्रमुख था। सद्र की नियुक्ति केन्द्र के सद्र-उस-सुदूर की सिफारिश पर बादशाह द्वारा की जाती थी। वह अपने क्षेत्र में इस्लाम के हितों के प्रति उत्तरदायी था।

काजी-ए-सूबा

काजी-ए-सूबा प्रान्तों में प्रमुख न्यायाधीश था जिसकी नियुक्ति बादशाह काजी-उल-कुजात की सिफारिश पर करता था। वह दीवानी और फौजदारी दोनों ही प्रकार के मुकदमों की सुनवाई करता था।

बख्शी-ए-सूबा

बख्शी-ए-सूबा अथवा बख्शी, प्रान्त का प्रमुख अधिकारी था। इसकी नियुक्ति मीर बख्शी की सिफारिश पर बादशाह द्वारा की जाती थी। वह सूबे के सैनिकों की देखभाल करता था। वह प्रान्त में मनसबदारों की सूची भी रखता था। प्रान्तीय बख्शी वाकियानवीस का भी कार्य करता था। उसे माह में दो बार प्रान्त की गतिविधियों की सूचना बादशाह को भेजनी पड़ती थी।

जिला शासन व्यवस्था

मुगल काल में भी प्रान्त जिलों में विभाजित थे, जो सरकार कहलाते थे। सरकार महाल या परगने में विभाजित थी। परगने का निर्माण कई गाँवों के मिलने से होता था। शाहजहाँ के समय में कुछ परगनों को मिलाकर एक अन्य इकाई का निर्माण किया गया जिसे चकला कहा जाता था। कितने परगनों को मिलाकर एक सरकार बनती थी और एक प्रान्त में कितनी सरकार होती थी, यह निश्चित नहीं था।

फौजदार

जिले के सर्वोच्च अधिकारी को फौजदार कहते थे। उसका पद और कार्य आजकल के जिला कलक्टर के समान था। वह प्रान्तीय सूबेदार के प्रति उत्तरदायी होता था। जिले में शान्ति और व्यवस्था बनाये रखने के लिए उसके अधीन एक सैनिक टुकड़ी रहती थी।

जदुनाथ सरकार का मानना है कि फौजदार केवल प्रान्तीय सेना का एक सेनापति होता था और उसका कार्य छोटे-छोटे विद्रोहों का दमन करना, डाकुओं का उन्मूलन करना तथा राजस्व अधिकारियों को सहयोग प्रदान करना था। उसकी नियुक्ति प्रान्तीय सूबेदार की सिफारिश पर बादशाह द्वारा की जाती थी।

अमल गुजार

जिले की शासन व्यवस्था का दूसरा प्रमुख अधिकारी अमल गुजार होता था। यह मालगुजारी एकत्र करने से सम्बन्धित मुख्य अधिकारी था। इसकी नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाती थी किन्तु वह प्रान्तीय दीवान के प्रति उत्तरदायी होता था। अमलदार को बेईमान और उपद्रवी किसानों के साथ कठोर व्यवहार करने के आदेश थे। सरकारी खजाने की देखभाल भी उस के अधीन थी।

बितिक्ची

अमल गुजार के अधीन बितिक्ची होता था जो भूमि और लगान सम्बन्धी कागज तैयार करता था। वह किसानोें को लगान वसूली की रसीद देता था। परगने की शासन व्यवस्था शिकदार, आमिल, पोतदार, कानूनगो और कारकून चलाते थे।

शिकदार

शिकदार परगने का मुख्य सैनिक अधिकारी होता था जो अपने क्षेत्र में शान्ति एवं व्यवस्था के लिए जिम्मेदार था। वह राजस्व वसूली के कार्य में भी सहयोग देता था।

आमिल

आमिल परगने का वित्त अधिकारी था। उसका मुख्य काम किसानों से लगान वसूल करना था।

पोतदार

पोतदार परगने का खजांची था। कानूनगो परगने के पटवारियों का अधिकारी था। उसका मुख्य काम लगान, भूमि और कृषि सम्बन्धी दस्तावेजों की देखभाल करना तथा उन्हें तैयार करना था।

कोतवाल

बड़े नगर की व्यवस्था के लिए एक कोतवाल होता था। उसके पास 100 पैदल सैनिक एवं 50 घुड़सवार सैनिक होते थे। कोतवाल मुख्य रूप से नगर पुलिस का अध्यक्ष होता था किन्तु साथ ही वह नगरपालिका का प्रशासन और फौजदारी के मुकदमों के लिए स्थानीय न्यायाधीश का काम भी करता था। वह नगर में शान्ति व्यवस्था बनाये रखना, मूल्यों, मापतौल के बाटों का निरीक्षण करना, अपराधों को रोकना, लावारिसों की सम्पत्ति की व्यवस्था करना, बूचड़खानों, कब्रगाहों और शमशानों पर निगरानी रखना आदि कार्य भी करता था।

ग्राम शासन

मुगलों के काल में गाँवों की शासन व्यवस्था पहले की भाँति परम्परागत ग्राम पंयाचतों के द्वारा की जाती रही। गाँवों के प्रमुख अधिकारियों में मुकद्दम, पटवारी, चौकीदार आदि मुख्य थे। डॉ. परमात्माशरण के अनुसार मुस्लिम शासकों ने अपनी दूरदृष्टि और राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए ग्राम बिरादरी के स्थानीय शासन के मामले में हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख- मुगल शासन व्यवस्था एवं संस्थाएँ

मुगल शासन व्यवस्था

मुगलों का प्रांतीय शासन

मुगलों की सैनिक व्यवस्था

मुगलों की न्याय व्यवस्था

मुगलों की राजस्व व्यवस्था

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

मुगलों की सैनिक व्यवस्था

0
मुगलों की सैनिक व्यवस्था - www.bharatkaitihas.com
मुगलों की सैनिक व्यवस्था

मुगलों की सैनिक व्यवस्था ही उनकी साम्राज्य शक्ति का मुख्य आधार थी। सेना के बल पर ही इतने विशाल साम्राज्य को स्थिर रखा जा सकता था।

मुगलों की सैनिक व्यवस्था

बाबर ने सैनिक शक्ति के बल पर मुगल साम्राज्य की नींव रखी। उसकी सैन्य व्यवस्था तैमूर और चंगेज खाँ के संगठन पर आधारित थी। बाबर की सेना की शक्ति तोपखाने के कारण अत्यधिक बढ़ गई थी। उसने तुर्कों, मंगोलों और उजबेगों की युद्ध प्रणाली की भी अनेक बातें अपना ली थीं। हुमायूँ ने बाबर की व्यवस्था को कायम रखा परन्तु वह अच्छा सेनापति नहीं था। अकबर ने सैनिक शक्ति को सुदृढ़ बनाकर सल्तनत का विस्तार किया।

उसने सेना में अनेक सुधार किये। उसने मनसबदारी प्रथा के आधार पर सैनिक व्यवस्था को संगठित बनाया। उस समय में सेना के तीन मुख्य अंग थे- घुड़सवार, तोपखाना और पैदल। अकबर ने नाविक बेड़े का भी गठन किया। सेना के इन समस्त अंगों का महत्त्व एक जैसा नहीं था। बाद में हाथियों का महत्त्व भी बढ़ा।

औरंगजेब के शासनकाल तक मुगलों की सेना अपनी धाक को बनाये रख सकी परन्तु पहले मेवाड़ के विरुद्ध असफल रहने पर और बाद में मराठों के विरुद्ध असफल रहने पर उसकी प्रतिष्ठा नष्ट हो गई।

घुड़सवार सेना

मुगल सेना का सबसे प्रमुख अंग घुड़सवार सेना थी। अधिकांश मुगल शासक स्वयं अच्छे घुड़सवार थे। बाबर ने भारत में जिस तुगलमा पद्धति का उपयोग किया और जिसके कारण उसे विजय प्राप्त हुई, वह घुड़सवारों की गति पर आधारित थी। घुड़सवारों की दो श्रेणियाँ थीं- बरगीर और सिलेदार।

बरगीर सैनिक को राज्य की तरफ से घोड़े, अस्त्र-शस्त्र एवं वस्त्र दिये जाते थे। सिलेदार सैनिक घोड़े, अस्त्र-शस्त्र एवं वस्त्र की व्यवस्था स्वयं करता था। घुड़सवारों का एक अन्य वर्गीकरण भी था। जिस सैनिक के पास दो घोड़े होते थे वह दुअस्पा कहलाता था। एक घोड़े वाले सैनिक को एक-अस्पा कहा जाता था। दो सैनिकों के बीच एक घोड़ा होने पर उन्हें निम-अस्पा कहा जाता था। इस वर्गीकरण के आधार पर उनका वेतन भी अलग-अलग होता था।

मुगल घुड़सवार सेना की सर्वाधिक श्रेष्ठ टुकड़ी अहदी सैनिकों की होती थी। इनकी भर्ती सीधे केन्द्र द्वारा की जाती थी और इनका सम्पर्क सीधे बादशाह से होता था। ये लोग बादशाह के निजी सेवक होते थे। इनके प्रशिक्षण की व्यवस्था राज्य की तरफ से की जाती थी। इनके लिए एक अलग दीवान और बख्शी होता था तथा एक अमीर इनका प्रमुख होता था।

विशेष अवसरों पर अहदी सैनिकों को सेना के साथ भेजा जाता था। आरम्भ में एक-एक अहदी के पास आठ-आठ घोड़े रहते थे परन्तु बाद में अकबर के शासन के अन्त में यह संख्या घटाकर पाँच कर दी गई। जहाँगीर ने इस संख्या को और कम करके चार कर दिया। अहदी सैनिकों को 25 रुपये से 500 रुपये प्रतिमाह तक वेतन दिया जा सकता था जबकि अन्य घुड़सवारों को 12 से 15 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था।

पैदल सेना

अकबर के समय में पैदल सेना को प्यादा अथवा पायक कहा जाता था। पैदल सैनिकों की तीन श्रेणियां थीं-

(1.) लड़ाकू: इस श्रेणी में बन्दूकची और तलवारिया (शमशीर बाज) आते थे।

(2.) अर्द्ध-लड़ाकू: इस श्रेणी में संदेशवाहक, दास, चोबदार आदि आते थे।

(3.) गैर लड़ाकू: इस श्रेणी में लुहार, खनिक आदि आते थे। पैदल सेना में बन्दूकचियों की संख्या सबसे अधिक होती थी। उन्हें सेना का महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता था परन्तु उनका वेतन बहुत कम था। बर्नियर ने लिखा है कि पैदलन सैनिकों को बहुत कम वेतन मिलता था और बन्दूकचियों को अच्छे समय में भी कठिनाई से जीवन यापन करना पड़ता था।

तोपखाना

बाबर ने भारत में सर्वप्रथम तोपखाने का उपयोग किया था परन्तु इसका संगठन अकबर के समय में हो पाया। तोपखाने की व्यवस्था के लिए मीर खानसामा और मीर आतिश नामक अधिकारियों की नियुक्ति की गई। तोपों की ढलाई के लिए ढलाई खाने बनाये गये।

ये तोपें इतनी भारी होती थीं कि उन्हें ढोने के लिए कई हाथियों और पशुओं की आवश्यकता पड़ती थी। औरंगजेब ने तोपखाने में सुधार करने का अथक प्रयास किया। फिर भी इतिहासकारों का मानना है कि मुगल तोपखाना निम्न स्तर का था। इसलिये आगे चलकर यूरोपीय राष्ट्रों की तुलना में भारतीयों का तोपखाना काफी कमजोर सिद्ध हुआ।

नौ-सेना

मुगल सैनिक व्यवस्था में मुगल नौ-सेना सबसे उपेक्षित थी। अकबर ने पहली बार नौ-सेना के लिए मीर-ए-बहर की अध्यक्षता में एक अलग विभाग खोला। जहाँगीर और शाहजहाँ ने इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। औरंगजेब ने अवश्य ही इस ओर ध्यान दिया। फिर भी मुगलों की नौ-सेना नावों का छोटा बेड़ा मात्र ही रही, जिसका मुख्य काम शाही परिवार के सदस्यों और सैनिकों को इस किनारे से उस किनारे पहुँचाना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख- मुगल शासन व्यवस्था एवं संस्थाएँ

मुगल शासन व्यवस्था

मुगलों का प्रांतीय शासन

मुगलों की सैनिक व्यवस्था

मुगलों की न्याय व्यवस्था

मुगलों की राजस्व व्यवस्था

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

मुगलों की न्याय व्यवस्था

0
मुगलों की न्याय व्यवस्था - www.bharatkaitihas.com
जहाँगीर के दरबार में सर टॉमस रो

मुगलों की न्याय व्यवस्था के सम्बन्ध में इतिहासकारों के मध्य विवाद रहा है। जदुनाथ सरकार ने इस व्यवस्था को सुगम, सक्रिय एवं अपूर्ण बताया है। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने इसे दोषपूर्ण बताया है जबकि डॉ. हसन ने इसे समयानुकूल माना है। डॉ. जैन का मत है कि मुगलों की न्याय व्यवस्था कम खर्चीली, शीघ्र कार्य करने वाली, सरल तथा तथ्यों पर आधारित थी। वास्तविकता यह है कि मुगलों की न्याय व्यवस्था काफी दुर्बल थी।

मुगलों की न्याय व्यवस्था में बादशाह की भूमिका

बादशाह, सल्तनत का सर्वोच्च न्यायाधीश होता था जो सप्ताह में एक बार खुले दरबार में बैठकर अपीलों एवं अभियोगों का निर्णय करता था। हुमायूँ ने अपनी न्यायप्रियता का ढिंढोरा पीटने के लिए तबल-अदल अर्थात् न्याय के नगाड़े की स्थापना की थी। अकबर धार्मिक मतभेदों तथा प्रभावों से दूर रहकर न्याय करने का प्रयास करता था।

जहाँगीर ने सोने की जंजीर का एक सिरा शाहबुर्ज के कंगूरे में लगाकर और दूसरे सिरे को यमुना नदी के तट तक ले जाकर पत्थरों के खम्भों में बाँधकर अपने न्यायप्रिय होने की घोषणा की। न्याय में देर होने अथवा और किसी प्रकार की कठिनाई के समय इस जंजीर को हिलाकर बादशाह का ध्यान आकर्षित किया जा सकता था।

औरंगजेब के लिये कहा जाता है कि तैमूर के वंशजों में न्याय के लिए इतना अधिक सेवानिष्ठ एवं कठोर शासक कोई दूसरा नहीं था।

मुगलों की न्याय व्यवस्था में अधीनस्थ न्यायिक संस्थाएँ

मुगल बादशाह के साथ-साथ सल्तनत में एक ही समय में कार्य करने वाली एक-दूसरे से स्वतंत्र चार तरह की न्यायिक संस्थाएँ थीं-

(1.) काजी एवं मुफ्ती

राजधानी में प्रथम काजी, प्रान्तीय राजधानियों में प्रान्त का प्रधान काजी तथा बड़े-बड़े नगरों और कस्बों में भी काजी लोग न्याय प्रदान करते थे। काजी की अदालतों में धर्मिक विवाद तथा दीवानी मामले प्रस्तुत किये जाते थे। प्रथम न्यायालय में काजी शरीयत के अनुसार न्याय करता था। उसके सामने कुल विधि, आनुवंशिक सम्बन्धी झगड़े, धार्मिक संस्था के पूँजी सम्बन्धी विवाद आदि प्रस्तुत किये जाते थे। काजियों की सहायता करने एवं इस्लामी कानूनों की व्याख्या करने के लिये मुफ्तियों को नियुक्त किया जाता था।

(2.) राजकीय अधिकारी

दूसरे प्रकार के न्यायालय बादशाह एवं केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त सूबेदार, फौजदार, शिकदार और कोतवाल आदि अधिकारियों द्वारा चलाये जाते थे। ये लोग सामान्यतः फौजदारी मामलों की सुनवाई करते थे। दीवान, अमल गुजार, आमिल आदि अधिकारी लगान सम्बन्धी मामलों की सुनवाई करते थे।

(3.) उर्फ

तीसरे प्रकार के न्यायालय को उर्फ कहा जाता था। वे राजद्रोहों तथा संगीन अपराधों के सम्बन्ध में निर्णय देते थे।

(4.) जातीय पंचायतें

चौथे प्रकार के न्यायालय गांवों में परम्परागत रूप से चलने वाली वे जातीय पंचायतें थीं जो अलिखित प्रथाओं अथवा जातीय परम्पराओं की विधि संहिता के अनुसार न्याय करती थीं।

मुगलों की न्याय व्यवस्था में हिन्दू प्रजा

अकबर ने हिन्दुओं के परस्पर दीवानी झगड़ों की सुनवाई के लिये हिन्दू पण्डितों को भी न्यायाधीश नियुक्त किया। ये पण्डित हिन्दू कानूनों, रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं के आधार पर निर्णय करते थे। गाँवों में न्याय करने का उत्तरदायित्व ग्राम पंचायतों का था। शासक भी उनके निर्णयों को सम्मान देते थे। निम्न अदालतों के निर्णय के विरुद्ध उससे ऊपर की अदालत में अपील की जा सकती थी।

मुगलों की न्याय व्यवस्था के दोष

मुगलों की न्याय व्यवस्था में कई दोष थे-

(1.) एक न्यायालय का दूसरे न्यायालय के साथ पारस्परिक सम्बन्ध और अधिकार क्षेत्र स्पष्ट नहीं था।

(2.) मंगोल न्याय व्यवस्था इस्लामी कानून पर आधारित थी किंतु कानूनों की व्याख्या में काफी अन्तर आ जाता था।

(3.) साम्राज्य में प्रचलित नियमों का संग्रह नहीं था। इससे लोगों को कानूनों की पर्याप्त जानकारी नहीं मिल पाती थी।

औरंगजेब के शासनकाल में इन कानूनों को फतवा-ए-आलमगिरी के रूप में संगृहीत कराने का प्रयास किया गया। इस प्रकार मुगलों की न्याय व्यवस्था में न तो न्यायालयों में कोई नियमित श्रेणी बद्धता थी, न ही समुचित विभाजन था और न न्याय की सुव्यवस्थित प्रणाली ही थी।

दण्ड विधान

मुगलों का दण्ड-विधान काफी कठोर था। चोरी, डकैती, हत्या, राजद्रोह, यौन अपराध तथा घूस आदि लेना-देना प्रमुख अपराध थे। गम्भीर अपराधों तथा राजद्रोह के मामलों में प्राणदण्ड, अंग-विच्छेद, सम्पूर्ण सम्पत्ति का अपहरण आदि दण्ड दिये जाते थे। साधारण अपराधों के लिए कोड़ों से पीटने की सजा, सामाजिक दृष्टि से अपमानित करना, आर्थिक जुर्माना आदि सजाएँ दी जाती थीं।

बंदीगृह

मुगलों के शासन काल में आजकल की भाँति बन्दीगृहों की पृथक् व्यवस्था नहीं थी। ग्वालियर, आगरा, हांसी, इलाहाबाद आदि पुराने दुर्गों को बन्दी गृहों के रूप में काम में लिया जाता था। कैदियों का व्यवहार संतोषजनक पाये जाने पर उनको समय के पूर्व ही रिहा कर दिया जाता था। बादशाहों के राज्यारोहण एवं शहजादों के जन्म आदि अवसरों पर भी कैदियों को रिहा करने की परम्परा थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख- मुगल शासन व्यवस्था एवं संस्थाएँ

मुगल शासन व्यवस्था

मुगलों का प्रांतीय शासन

मुगलों की सैनिक व्यवस्था

मुगलों की न्याय व्यवस्था

मुगलों की राजस्व व्यवस्था

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

मुगलों की राजस्व व्यवस्था

0
मुगलों की राजस्व व्यवस्था - www.bharatkaitihas.com
मुगलों की राजस्व व्यवस्था

मुगलों की राजस्व व्यवस्था पूर्ववर्ती दिल्ली सल्तनत कालीन राजस्व व्यवस्था से अधिक मजबूत थी। प्रजा से कर वसूल करके केन्द्रीय कोषागार तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त प्रबंध किए गए थे।

बाबर और हुमायूँ, दोनों का शासनकाल किसी प्रकार के आर्थिक सुधारों को कार्यान्वित करने के लिए अपर्याप्त रहा। अकबर ने सल्तनत की अर्थव्यवस्था को संगठित करने का प्रयास किया। उसे इस कार्य में सफलता भी मिली। अकबर जनकल्याण को उतना ही महत्त्व देता था जितना कि वह राज्य की सुरक्षा को देता था।

उसकी कर पद्धति का उद्देश्य न केवल राज्य की वित्तीय स्थिति को सुधारना था अपितु मोटे तौर पर किसानों, व्यापारियों और आम आदमी के हितों की रक्षा करना भी था। जहाँगीर और शाहजहाँ ने उसकी नीति का पालन किया परन्तु औरंगजेब के समय अकबर द्वारा स्थापित व्यवस्था लड़खड़ाने लगी।

मुगलों की राजस्व व्यवस्था

आय के स्रोत

आय का मुख्य साधन भूमि कर था। व्यापारिक कर, खानों पर कर, पैतृक सम्पत्ति कर, नमक कर, चुँगी कर, युद्ध में लूटी गई सम्पत्ति का 1/5वाँ भाग, टकसाल, अधीनस्थ राज्यों से प्राप्त होने वाले उपहार तथा वार्षिक कर, राजकीय कारखानों से होने वाली आय आदि मुगल राज्य की आय के मुख्य साधन थे।

स्थानीय शासन को विभिन्न प्रकार के करों से होने वाली आय का उपयोग स्थानीय शासन के लिए किया जाता था। बाबर ने मुसलमानों से जकात नामक धार्मिक कर और गैर मुसलमानों से जजिया तथा तीर्थयात्रा कर लेने की व्यवस्था की। हुमायूूँ ने यह व्यवस्था जारी रखी।

अकबर ने जजिया और तीर्थयात्रा कर समाप्त कर दिया। जहाँगीर और शाहजहाँ ने अकबर की नीति को जारी रखा परन्तु औरंगजेब ने बादशाह बनने के कुछ वर्षों बाद इन करों को पुनः आरम्भ कर दिया। मुगलों को व्यय के मुकाबले अधिक आय होती थी।

चुँगी

मुगल शासन की आय का एक प्रमुख साधन चुँगी थी। देश के आंतरिक भागों और विदेशों से आने वाली वस्तुओं पर चुँगी ली जाती थी। विदेशों से आने वाले और विदेशों को भेजे जाने वाले माल पर बन्दरगाहों और सीमाओं पर चुँगियाँ लगा करती थीं। अकबर के समय में उत्तरी भारत में लगभग 21 बन्दरगााह थे।

इनमें से लहारीबन्दर, सूरत और बालसौर अधिक प्रसिद्ध थे। बन्दरगाहों से प्राप्त चुँगी का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि केवल सूरत के बन्दरगाह से राज्य को तीस लाख रुपये वार्षिक आय होती थी। सामान्यतः जिले के अधिकारी को शाही फरमान के द्वारा उस जिले में स्थित बन्दरगाहों का नियंत्रण सौंप दिया जाता था।

जिन्सों पर राज्य की ओर से कर निर्धारित किये जाते थे। बादशाह के आदेश से समय-समय पर इन दरों में फेरबदल होता रहता था। करों की वसूली का काम जिलाधिकारी अथवा अन्य किसी व्यक्ति को सौंप दिया जाता था। कभी-कभी किसी स्थान से प्राप्त होने वाली चुँगी की आय किसी व्यक्ति विशेष को भी प्रदान कर दी जाती थी।

सामान्यतः चुँगी की दर जिन्स के मूल्य पर ढाई से पाँच प्रतिशत ली जाती थी। औरंगजेब के शासनकाल तक यह दर कायम रही। समकालीन विदेशी यात्री लिखते हैं कि सीमा शुल्क अधिकारी बड़े कठोर थे। भारत आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की तलाशी ली जाती थी।

थेवेनो ले लिखा है- ‘कभी-कभी व्यापारी को माल छुड़ाने में एक महीना तक लग जाता था।’

देश के भीतरी भागों में माल ले जाने पर भी चुँगी वसूल की जाती थी। इसे राहदारी कहा जाता था।

टकसाल

राज्य के आय के साधनों में टकसाल भी महत्त्वपूर्ण थी। 1577 ई. से पहले तक, प्रान्तीय टकसालें चौधरियों के अधीन कार्य करती थीं। अकबर ने इस व्यवस्था को समाप्त करके टकसालों के लिए अलग अधिकारी नियुक्त किये। इन अधिकारियों के ऊपर एक निदेशक नियुक्त किया। सरकारी खजाना एक प्रकार से विनिमय बैंक था।

लोगों को टकसाल में जाकर सिक्के ढलवाने की स्वतंत्रता थी। इससे राज्य को बट्टे के रूप में धन प्राप्त होता था। घिसे हुए सिक्कों को बदलते समय भी राज्य बट्टा वसूल करता था। राज्य को टकसाल से कितनी आय होती थी इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि औरंगजेब के शासनकाल में केवल सूरत की टकसाल से नौ लाख रुपये वार्षिक आय होती थी।

अधिकांश इतिहासकारों ने मुगलकालीन सिक्कों की विशुद्धता तथा बनावट की सुन्दरता की प्रशंसा की है। मुगलों का चाँदी का रुपया 177.4 ग्राम वजन का होता था।

सम्पत्ति जब्ती

यूरोपीय यात्रियों ने सम्पत्ति जब्ती के बारे में विस्तृत जानकारी दी है। उनके अनुसार शाही मनसबदार की मृत्यु हो जाने पर उसकी सम्पत्ति पर बादशाह का स्वामित्व हो जाता था। बड़े व्यापारी की मृत्यु होने पर उसकी सम्पत्ति बादशाह की हो जाती थी।

एक यात्री ने लिखा है- ‘बादशाह अपने सामन्त की सम्पूर्ण सम्पत्ति को अपने अधिकार में ले लेता था। यदि मृतक ने निष्ठापूर्वक सेवा की हो तो उसके बीवी-बच्चों को जीविका निर्वाह योग्य धन दे दिया जाता था, इससे अधिक नहीं।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख- मुगल शासन व्यवस्था एवं संस्थाएँ

मुगल शासन व्यवस्था

मुगलों का प्रांतीय शासन

मुगलों की सैनिक व्यवस्था

मुगलों की न्याय व्यवस्था

मुगलों की राजस्व व्यवस्था

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

0
मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन - www.bharatkaitihas.com
मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन करते समय हमें मध्ययुगीन परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिये। उस युग में धार्मिक कट्टरता की प्रधानता थी और कोई भी संस्था उससे अप्रभावित नहीं रह पाई थी।

उस युग में यातायात, आवागमन तथा संचार के साधनों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया था। केन्द्रीय सरकार के लिए शासन की प्रांतीय एवं जिला इकाइयों से निरन्तर सम्पर्क बनाये रखना सम्भव नहीं था। अनेक इतिहासकारों ने मुगल शासन व्यवस्था को मध्ययुग की श्रेष्ठ शासन व्यवस्था माना है।

दिल्ली सुल्तानों के समय में केन्द्रीय तथा प्रान्तीय स्तर पर शासन के मूलभूत सिद्धान्त व्यवस्थित नहीं हो पाये थे। उन्होंने इस देश में अब्बासिद संस्थाओं को लागू करने का प्रयास किया था परन्तु खलजी और तुगलक शासकों के अलावा अन्य सुल्तानों के समय में इस दिशा में विशेष प्रगति नहीं हो पाई। लोदी शासनकाल में अमीरों में कबीलाई भावना की प्रधानता तथा सुल्तान के साथ उनके समानता के दावे के कारण शासन व्यवस्था शिथिल पड़ गई थी और मुगल बादशाहों को केन्द्रीय शासन को नये सिरे से मजबूत बनाने के लिये नई व्यवस्थाएँ करनी पड़ीं।

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

बाबर एवं हुमायूँ की शासन व्यवस्था

बाबर और हुमायूँ को केन्द्रीय एवं प्रांतीय शासन व्यवस्था को संगठित करने का समय नहीं मिल सका। वे राज्य के विजेता तो थे किंतु उन दोनों की शासकीय प्रतिभा संदिग्ध है।

अकबर की शासन व्यवस्था

मुगल सल्तनत में शासन व्यवस्था स्थापित करने का श्रेय अकबर को जाता है। अकबर ने सुसंगठित एवं सुव्यवस्थित शासन व्यवस्था विकसित करने के लिये निम्नलिखित नवाचार किये-

(1.) अधिकारियों के कार्यों एवं अधिकारों का विभाजन

अकबर ने प्रशासन की विभिन्न इकाइयों के कार्यों तथा अधिकारों का स्पष्ट विभाजन करके उनके उत्तरदायित्व को स्पष्ट कर दिया।

(2.) अधिकारियों पर दृष्टि रखने की व्यवस्था

अकबर ने विभागीय कार्यों के लिए विभिन्न अधिकारियों को नियुक्त किया तथा प्रत्येक अधिकारी पर दूसरे अधिकारी द्वारा दृष्टि रखने की व्यवस्था लागू की। प्रान्तीय शासन व्यवस्था इसका सबसे अच्छा उदारहण है। इस प्रकार की व्यवस्था से कोई भी पदाधिकारी अपनी गतिविधियों को केन्द्रीय सरकार से अधिक दिनों तक गुप्त नहीं रख सकता था तथा सामान्यतः विद्रोह करने के सम्बन्ध में भी नहीं सोच सकता था।

(3.) मनसबदारी प्रथा

अलाउद्दीन खलजी के समय से घोड़ों को दागने, सैनिकों का हुलिया नोट करने, दशमलव पद्धति के आधार पर सैनिकों का विभाजन करने आदि प्रथाएँ चली आ रही थीं। अकबर ने उन प्रथाओं को विकसित रूप देकर मनसबदारी प्रथा प्रारम्भ की।

(4.) दहसाला बंदोबस्त

शेरशाह के समय में भी राजा टोडरमल ने भू एवं राजस्व सम्बन्धी सुधार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अकबर के सौभाग्य से उसे भी राजा टोडरमल की सेवाएं प्राप्त हो गईं। राजा टोडरमल ने मालगुजारी के क्षेत्र में पर्याप्त सुधार करके दहसाला बंदोबस्त को लागू किया।

जहाँगीर की शासन व्यवस्था

अकबर द्वारा स्थापित शासन व्यवस्था को उसके उत्तराधिकारियों ने थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ लागू रखा। जहाँगीर ने शासन व्यवस्था में किसी प्रकार का विशेष सुधार नहीं किया। उसके शासनकाल में अकबर की शासन व्यवस्था अपने मूलरूप में कायम रही।

शाहजहाँ की शासन व्यवस्था

शाहजहाँ के समय में भी अकबर कालीन शासन व्यवस्था चलती रही। शाहजहाँ ने शासन व्यवस्था में परिस्थ्तििवश मामूली सुधार किये।

औरंगजेब की शासन व्यवस्था

औरंगजेब इस्लाम का कट्टर अनुयायी था। अतः उसने इस्लामिक सिद्धान्तों को आधार बनाकर शासन व्यवस्था में कई बदलाव किये। शासन से उदारता लुप्त हो गई। हिन्दुओं को प्रजा का दर्जा नहीं दिया गया। उन पर जजिया एवं तीर्थ कर पुनः आरोपित कर दिये गये। हिन्दुओं के तीर्थस्थलों, देवालयों एवं देवमूर्तियों को भंग करना शासन का कर्त्तव्य हो गया।

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

औरंगजेब की मृत्यु के बाद परवर्ती अयोग्य एवं विलासी मुगल शासकों के समय शासन व्यवस्था में धीरे-धीरे इतने दोष उत्पन्न हो गये कि अन्त में मुगल साम्राज्य और मुगलवंश का ही पतन हो गया। फिर भी, मध्ययुग में लम्बे समय तक मुगल शासन व्यवस्था ने भारत को सुरक्षा तथा शान्ति प्रदान की। बाद में अंग्रेजों ने भी उस शासन व्यवस्था की उपादेयता को ध्यान में रखकर उसकी बहुत सी बातों को अपनाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख- मुगल शासन व्यवस्था एवं संस्थाएँ

मुगल शासन व्यवस्था

मुगलों का प्रांतीय शासन

मुगलों की सैनिक व्यवस्था

मुगलों की न्याय व्यवस्था

मुगलों की राजस्व व्यवस्था

मुगल शासनव्यवस्था का मूल्यांकन

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...