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मुगलों की भूराजस्व व्यवस्था

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मुगलों की भूराजस्व व्यवस्था

मुगलों की भूराजस्व व्यवस्था अकबर के समय में स्थापित हुई थी। इस कार्य में राजा टोडरमल की मुख्य भूमिका थी। चूंकि राजा टोडरमल अफगान शासक शेरशाह सूरी का भी मंत्री था। इसलिए मुगलकालीन अर्थव्यवस्था को शेरशाह कालीन अर्थव्यवस्था ही माना जाता है।

भारत पर अधिकार स्थापित करने वाले प्रारम्भिक तुर्क सुल्तानों के समक्ष यह समस्या थी कि वे विजित प्रदेशों में इस्लामी भू-राजस्व व्यवस्था को लागू करें अथवा भारत की प्राचीन भू-राजस्व व्यवस्था को जारी रखें या दोनों का समन्वय कर एक नई व्यवस्था बनायें!

तत्कालीन परिस्थितियों में अन्तिम विकल्प ही उचित प्रतीत हुआ और उन्होंने भारतीय तथा इस्लामिक व्यवस्था को मिलाकर नयी व्यवस्था स्थापित की। इस व्यवस्था में हिन्दू और मुस्लिम कृषकों के लिये अलग-अलग भू-राजस्व की दरें निर्धारित की गईं। हिन्दुओं एवं मुसलमानों के लिए अलग लगान दरों का मूल कारण यह था कि इस्लाम में विधर्मियों को प्रजा नहीं माना गया है।

दिल्ली सुल्तानों की नीति

दिल्ली सल्तनत की आय का सबसे बड़ा साधन भूमि-कर (लगान) था। मुस्लिम उलेमाओं ने भूमि को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा हैं- (1) उशरी, (2) खराजी, और (3) सुल्ही।

उशरी भूमि मोटे तौर पर वह भूमि थी जो मुसलमानों के अधिकार में थी। खराजी वह भूमि थी जिस पर गैर-मुस्लिमों द्वारा काश्त की जाती थी। संधि के अंतर्गत प्राप्त होने वाली भूमि सुल्ही कहलाती थी। दिल्ली के सुल्तानों के पास सुल्ही भूमि नहीं थी। उशरी और खराजी भूमियां उपज के आधार पर पाँच श्रेणियों में विभक्त थीं।

उशरी भूमि से उपज का 1/10वाँ भाग भूमिकर के रूप में लिया जाता था परन्तु यदि कृत्रिम साधनों से भूमि की सिंचाई की गई हो तो केवल 1/20 वाँ भाग ही वसूल किया जाता था। खराजी भूमि पर 1/2 से 1/5वाँ भाग तक लगान के रूप में वसूल किया जाता था। लगान नकद अथवा जिन्स, दोनों रूप में दिया जा सकता था।

मुगलों की भूराजस्व व्यवस्था

बाबर और हुमायूँ की नीति

पानीपत के युद्ध के पश्चात् बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली और एक विशाल क्षेत्र को अपने अधीन किया। उसने राजनीतिक व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन करते हुए अफगानों के स्थान पर मुगल, चगताई एवं मिर्जा अमीरों को प्रांतीय शासक बनाया।

सल्तनत की समस्त बड़ी जागीरें उन्हें सौंप दी गईं किंतु बाबर ने देश की प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव करना उचित नहीं समझा। उसने लोदियों के समय में लागू मालगुजारी व्यवस्था को ज्यों का त्यों जारी रखा। मुगल अमीरों को दी गई जागीरों की आय से बाबर को एक निश्चित रकम वार्षिक कर के रूप में मिलने लगी।

जिन प्रान्तों में खालसा भूमि की घोषणा की गई, वहाँ बाबर ने मालगुजारी वसूलने के लिए शिकदारों की नियुक्ति की। बाबर ने कुछ क्षेत्रों पर स्थानीय जमींदारों की सहायता से भी शासन किया। उसने इन जमींदारों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया। इसलिए ये जमींदार भी वार्षिक कर देते रहे। इस काल में मुगलों की भूराजस्व व्यवस्था का यही स्वरूप था।

हुमायूँ के शासनकाल में भू-राजस्व सम्बन्धी सुधार किये गये। सिकन्दरीगज को 41 से बढ़ाकर 42 कर दिया गया। उसके समय में एक खखार (आठ मन से कुछ अधिक) अनाज पर दो बाबरी तथा चार टंक कर लिया जाता था। कुछ विद्वानों का मत है कि हुमाँयू के समय में अकबर के समय से कम लगान लिया जाता था।

शेरशाह की लगान व्यवस्था

शेरशाह ने सल्तनत की समस्त भूमि की नपाई करवाकर प्रत्येक श्रेणी की भूमि का क्षेत्रफल एक रजिस्टर में दर्ज करवाया। भूमि को तीन श्रेणियों में बाँटा गया- उत्तम, मध्यम, और निम्न। इन तीनों श्रेणियों की भूमि की उपज को जोड़कर, तीन से विभाजित कर प्रति बीघा भूमि की औसत पैदावार निकाली जाती थी।

पैदावार का एक तिहाई हिस्सा लगान के रूप में लिया जाता था। किसानों को स्वतंत्रता थी कि वे लगान अनाज अथवा नकदी के रूप मे दें। प्रत्येक किसान को उसकी भूमि का पट्टा दिया जाता था जिसमें किसान की भूमि के क्षेत्रफल, भूमि की स्थिति और किसान द्वारा अदा किया जाने वाला लगान दर्ज होता था। प्रत्येक किसान को कबूलियत नामक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे, जिसमें किसान लगान के नियमों को स्वीकार करता था। भूमि-कर के अलावा किसानों से अन्य कर भी लिये जाते थे।

अकबर के भू-राजस्व सम्बन्धी प्रयोग

मुगलों की भूराजस्व व्यवस्था का ढाँचा मूल रूप में अकबर द्वारा किये गये प्रयोगों तथा सुधारों पर आधारित था। अकबर ने आरम्भ में शेरशाह द्वारा निर्धारित अनाज की दरें अपनायीं और इनको नकदी में बदल दिया। यह व्यवस्था असन्तोषजनक सिद्ध हुई। इसके निम्नलिखित कारण थे-

(1.) शेरशाह द्वारा स्थापित भूमि प्रबन्ध अस्त-व्यस्त हो चुका था। हुमायूँ ने दुबारा तख्त प्राप्त होते ही अपने विशाल क्षेत्रों को अपने अमीरों और अधिकारियों में बाँट दिया था परन्तु खालसा भूमि और जागीरी भूमि की स्पष्ट हदबन्दी न होने से अव्यवस्था फैली हुई थी।

(2.) लगान व्यवस्था दोषपूर्ण थी। केन्द्रीय सरकार प्रतिवर्ष उपज एवं परगनों में प्रचलित मूल्य के आधार पर लगान वसूल करती थी। उपज और मूल्यों में परिवर्तन के कारण सरकारी माँग की दर भी बदलती रहती थी। जब तक दर का निर्धारण नहीं हो जाता था तब तक लगान की वसूली भी नहीं हो पाती थी। किसान इस अनिश्चयपूर्ण स्थिति से परेशान थे।

(3.) उपर्युक्त प्रक्रिया के कारण लगान वसूली में काफी विलम्ब हो जाता था। इससे बकाया रकम भी चढ़ जाती थी जिसे वसूल करना कठिन कार्य था।

(4.) उपज और मूल्य का प्रतिवर्ष पता लगाने में सरकार का काफी धन अपव्यय हो जाता था।

(5.) जल्दबाजी में एकत्र की गई सूचनाएँ पूर्णतः विश्वसनीय नहीं होती थीं।

(6.) अमीरों और अधिकारियों को प्रसन्न करने रखने की दृष्टि से उन्हें दी जाने वाली जागीरों की आय को वास्तविक आय से काफी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता था।

अकबर द्वारा किये गये सुधार

उपर्युक्त दोषों से खिन्न होकर अकबर ने राज्य की अर्थव्यवस्था और लगान व्यवस्था को सुधारने के लिये अनेक उपाय किये। 1560 ई. में अकबर ने ख्वाजा अब्दुल मजीद को आसफ खाँ की उपाधि देकर भूमि व्यवस्था को संगठित करने के लिए नियुक्त किया परन्तु वह इस काम के लिए सर्वथा अयोग्य सिद्ध हुआ।

आसफ खाँ ने जागीरों से प्राप्त होने वाली आय के काल्पनिक आँकड़े लिख डाले। उसके इस कृत्य से सरकार, जागीरदारों और प्रजा की हानि हुई। इस पर उसने एतमाद खाँ को वित्तमंत्री नियुक्त किया जो बहलोल मलिक के नाम से भी जाना जाता है।

एतमादखाँ (बहलोल मलिक) के सुधार

1563 ई. में एतमादखाँ (बहलोल मलिक) को वित्त मंत्री नियुक्त किया गया। एतमादखाँ ने लगान व्यस्था सुधारने के लिये कई उपाय किये-

(1.) शाही भूमि (खालसा) को जागीरी भूमि से अलग किया।

(2.) सिक्कों को मोहर लगी कीमत के अनुसार मंजूर करने का आदेश दिया।

(3.) वित्तीय विभाग तथा खजाने का पुनर्गठन किया।

(4.) खालसा भूमि को इस प्रकार से बाँटा कि प्रत्येक इकाई से एक करोड़ दाम (2.5 लाख रुपया) वसूल हो।

(5.) प्रत्येक इकाई पर करोड़ी नामक अधिकारी नियुक्त किया और उसकी सहायता के लिए बितक्ची तथा एक खजांची रखा गया। इन समस्त अधिकारियों का काम मालगुजारी वसूल करके सरकारी खजाने में जमा कराने का था।

एतमादखाँ द्वारा किये गये उपाय सफल रहे। अबुल फजल ने लिखा है कि इन सुधारों से गबन करना सम्भव नहीं रहा। बदायूँनी के अनुसार इन सुधारों से सरकारी खर्च में काफी कमी आ गई। फिर भी, अभी तक भूमि की उपज का वास्तविक अनुमान लगाने का कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया।

मुजफ्फरखाँ के सुधार

1564 ई. में मुजफ्फरखाँ को दीवान नियुक्त किया गया और राजा टोडरमल को उसका सहायक नियुक्त किया गया। डॉ. त्रिपाठी ने लिखा है- ‘मुजफ्फरखाँ, आसफखाँ (भूतपूर्व वित्त मंत्री) के फर्जी आँकड़ों से बहुत परेशान हुआ। उसने रजिस्टरों तथा स्थानीय कानूनगो अधिकारियों से वास्तविक उपज के आँकड़े जमा करने के लिए 10 कानूनगो नियुक्त किये। इन आँकड़ों के आधार पर मालगुजारी का जमाय हाल हासिल नामक नया खाता बना। यह खाता भी बहुत विश्वसनीय नहीं था क्योंकि वह स्थानीय कानूनगो द्वारा लोगों की इधर-उधर से सुनी सूचनाओं पर आधारित था जो स्वयं ही विश्वसनीय नहीं थे। इसके अलावा एक मुख्य दोष यह था कि सम्पूर्ण राज्य में लगान भुगतान की दर तो एक समान थी परन्तु विभिन्न सूबों में अनाज के भाव एक समान नहीं थे। इससे उन सूबों के किसानों को काफी हानि उठानी पड़ती थी जहाँ अनाज के भाव सस्ते थे।’

इस दोष को दूर करने के लिए मुजफ्फरखाँ ने आदेश दिये कि फसल तैयार होने पर अनाज के स्थानीय भाव राज्य को भेजे जायें और राज्य की स्वीकृति मिलने के बाद उन्हीं दरों के हिसाब से लगान वसूल किया जाय। इससे थोड़ा-बहुत सुधार हुआ।

अकबर ने अपने शासन के तेरहवें वर्ष (1568-69 ई.) में शहाबुद्दीन अहमदखाँ को दीवान नियुक्त किया। नये दीवान ने अनुभव किया कि प्रतिवर्ष उपज और बाजार भाव के आंकड़े जमा करना खर्चीला और दोषपूर्ण होने के साथ साम्राज्य विस्तार होते रहने के कारण असम्भव भी होने लगा है।

अतः उसने प्रतिवर्ष मालगुजारी की रकम नियत की जानी बन्द कर दी और नस्क प्रणाली चालू की जिससे सरकार और जमींदार या भूमि के स्वामी के मध्य पारस्परिक बन्दोबस्त की व्यवस्था हुई। यह एक प्रकार की ठेकेदारी थी तथा सन्तोषप्रद नहीं थी। 1570-71 ई. में मुजफ्फर खाँ को पुनः वित्त मंत्री नियुक्त किया गया और उसने तुरन्त मालगुजारी को ‘नापें और उर्वरा शक्ति’ के आधार पर नियत करने का निर्णय लिया।

टोडरमल का बन्दोबस्त: 1573 ई. में गुजरात विजय के पश्चात् अकबर ने टोडरमल को वहाँ की राजस्व व्यवस्था में सुधार करने भेजा। टोडरमल ने गुजरात में भूमि की पैमाइश करवाई तथा उसका वर्गीकरण करके लगान निश्चित किया। किसानों को यह विकल्प दिया गया कि वे अनाज के रूप में या नकद रुपयों में लगान अदा करें।

कुल उपज का मूल्य बाजार भाव से लगाकर उस पर लगान वसूल किया जाता था। टोडरमल ने भ्रष्ट कर्मचारियों को कठोर दण्ड दिये। गुजरात के बन्दोबस्त के आधार पर ही फिर टोडरमल ने सम्पूर्ण साम्राज्य का बन्दोबस्त किया। उसने 1579-80 ई. में सम्पूर्ण साम्राज्य को 12 सूबों में विभाजित किया और प्रत्येक सूबे को अनेक सरकारों में बाँट दिया गया। टोडरमल ने जो व्यवस्था स्थापित की उसे टोडरमल का बन्दोबस्त कहा जाता है। इस बन्दोबस्त की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार थीं-

(1.) भूमि की पैमाइश

सर्वप्रथम 1570-71 ई. से 1579-80 ई. तक की औसत वार्षिक आय का ब्यौरा तैयार किया गया। तत्पश्चात् किसी भूमि के क्षेत्रफल पर उत्पादित फसल के आधार पर लगान का निश्चय किया गया। अतः समस्त भूमि की पैमाइश करवाई गयी।

टोडरमल ने शेरशाह के समय से प्रचलित भूमि नापने के लिए रस्सी का प्रयोग त्याग दिया और उसके स्थान पर सात गज लम्बी जरीब (बांसों में लोहे के छल्ले ढलवाकर) द्वारा भूमि की पैमाइश करवाई। इस नाप को पटवारियों के पास लिखवा दिया गया और उसकी एक प्रति माल विभाग में रख ली गयी। 60 गज लम्बी एवं 60 गज चौड़ी भूमि को एक बीघा जमीन माना गया।

(2.) भूमि का वर्गीकरण

भूमि की उर्वरक शक्ति के आधार पर भूमि को चार श्रेणियों में बाँटा गया-

(1) पोलज: यह सबसे अधिक उपजाऊ होती थी तथा इसमें एक ही साल में दो फसलें बोयी जाती थीं।

(2) पड़ौती: यह पोलज से कम उपजाऊ होती थी तथा इसकी उर्वरा शक्ति बनाये रखने के लिए इसे एक या दो वर्ष खाली छोड़ा जाता था।

(3) चाचर: यह बहुत कम उपजाऊ होती थी तथा तीन-चार वर्ष तक खाली छोड़ने के पश्चात् एक बार बोयी जाती थी।

(4) बंजर: यह अनउपजाऊ भूमि थी जिसे पाँच वर्ष या इससे भी अधिक समय तक बिना काश्त के छोड़ दिया जाता था।

(3.) कर निर्धारण

1580 ई. में आइने-दहसाला या दस-साल बन्दोबस्त लागू हुआ जिसमें भूमि की नाप-जोख और वर्गीकरण के अतिरिक्त कर-निर्धारण एवं वसूली के लिए विस्तृत नियमों का उल्लेख किया गया था। कर-निर्धारण के लिए प्रत्येक वर्ग की भूमि (बंजर को छोड़कर) को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया।

तीनों प्रकार की भूमि की औसत पैदावार निकाली जाती थी, जो प्रत्येक प्रकार की भूमि की स्टेण्डर्ड पैदावार समझी जाती थी। पिछले दस वर्षों की पैदावार के आधार पर प्रत्येक फसल की प्रति बीघा पैदावार का औसत निकाला जाता था और औसत पैदावार का एक-तिहाई भाग लगान के रूप में वसूल किया जाता था। कर निर्धारण के लिए फसलों की किस्म को भी ध्यान में रखा जाता था।

अबुल फजल ने लिखा है- ‘प्रत्येक परगने की पिछले दस साल की उपज और प्रचलित कीमतों को इकट्ठा किया गया और उसके दसवें भाग को वार्षिक मालगुजारी के रूप में निश्चित कर दिया गया।’

अनुमान होता है कि मालगुजारी के रूप में उपज का दसवां भाग जमींदार द्वारा केन्द्र सरकार को देने के लिये निश्चित किया गया था क्योंकि किसानों को अपनी उपज का एक तिहाई से आधा हिस्सा तक जमींदार को मालगुजारी के रूप में देना पड़ता था।

(4.) कर वसूली

अकबर भूमि कर नकदी के रूप में वसूल करना पसन्द करता था। इसलिए उसने सूबोें में विभिन्न हलकों के लिए अनाज की नकद दर सूचियाँ तैयार करवायीं। इसके लिए प्रतिवर्ष फसल तैयार होने पर बाजार भाव का पता लगा लिया जाता था। बाजार भाव के आधार पर एक दर स्वीकृत करके इसकी सूचना राजस्व विभाग के कर्मचारियों को दे दी जाती थी।

भविष्य में करों को घटाने-बढ़ाने के लिए सरकार प्रतिवर्ष उपज और फसल के मूल्य का ब्यौरा रखती थी। अकबर की इस व्यवस्था को रैयतवाड़ी प्रथा भी कहते हैं, क्योंकि जो किसान भूमि जोतता था, वही कर देता था। यह व्यवस्था अधिक सफल नहीं हुई। अकबर का कर-निर्धारण भी अत्यन्त सख्त था।

आइने अकबरी में लगान वसूली की तीन विधियाँ बताई गई हैं- (1) गल्लाबख्श अथवा बँटाई, नस्क अथवा कनकूत। (2) जब्ती और (3) नकदी।

गल्लाबख्शी में जब फसल कट जाती थी तब अनाज को देखकर राजय सरकार और किसान का अलग-अलग भाग निश्चित कर बाँट लिया जाता था। नस्क के अन्तर्गत सारे ग्राम की फसल का अनुमान लगा कर उसके लिए एक साथ ही भूमि-कर निर्धारित कर दिया जाता था। गाँव का मुखिया अपनी इच्छानुसार कृषकों से भूमि-कर वसूल कर सकता था।

जब्ती में भूमि का सर्वेक्षण, मालगुजारी निश्चित करने के लिए दस्तूरूल अमल का प्रवर्तन और जब्ती खसरे की तैयारी प्रमुख आधार था। अलग-अलग परगनों में अलग-अलग विधियाँ प्रचलित थीं, किन्तु अधिंकाशतः बँटाई प्रथा प्रचलित थी जिसके अनुसार खलिहान में अनाज का ढेर लगाने के बाद सरकार अपना हिस्सा तुलवाकर ले लेती थी।

कभी-कभी भूमि-कर अधिक होने से किसान लगान नहीं दे पाता था और सख्ती के बाद भी सफलता नहीं मिलती थी। अतः प्रतिवर्ष सरकार को कर में छूट देनी पड़ती थी।

यद्यपि अकबर की राजस्व व्यवस्था पूर्णतः संतोषप्रद नहीं मानी जा सकती, फिर भी उसने भारतीयों को राजस्व की एक ऐसी प्रणाली प्रदान की जो न केवल स्थायी थी, अपितु लोगों की समझ में भी सरलता से आ जाती थी। अबुल फजल ने टोडरमल के इन सुधारों की प्रशंसा की है जबकि बदायूँनी ने इनकी आलोचना की है।

वस्तुतः इसमें कुछ दोष थे। मालगुजारी की दर मध्यम श्रेणी के किसानों के लिए बोझिल थी क्योंकि भूमि के वर्गीकरण तथा उपज की तालिका के आधार पर औसत निकाल कर वसूली की जाती थी। ऐसी स्थिति में जिन किसानों के पास दूसरी और तीसरी श्रेणी की भूमि थी, उन्हें तुलनात्मक आधार पर प्रथम श्रेणी के किसानों से अधिक मालगुजारी देनी पड़ती थी। कुल मिलाकर उसकी व्यवस्था उत्तम थी।

अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था के दोष

स्मिथ और मोरलैण्ड आदि विद्वानों ने अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था की प्रशंसा की है। फिर भी मुगलों की भू-राजस्व व्यवस्था दोषमुक्त नहीं थी। इस व्यवस्था के नियम केवल खालसा भूमि पर ही सख्ती के साथ लागू किये जाते थे और खालसा भूमि का क्षेत्र काफी कम था।

अधिकतर भूमि जमींदारी, जागीरदारी आदि के रूप में थी और वहाँ इन नियमों का अमल नहीं होता था। दूसरा प्रमुख दोष भूमि के वर्गीकरण के आधार पर उपज की तालिका में औसत निकालकर मालगुजारी वसूल करना था। इससे मध्यम एवं निम्न श्रेणी की भूमि वाले किसानों को अधिक लगान देना पड़ता था। राजकीय अधिकारी किसानों से लगान के साथ अनेक गैर-स्वीकृत कर भी वसूल करते थे। उन्हें रोकने के लिये विशेष प्रयत्न नहीं किया गया था।

जहाँगीर के समय में लगान व्यवस्था

जहाँगीर के समय में अकबर की लगान व्यवस्था बिना किसी विशेष परिवर्तन के जारी रही परन्तु उसका प्रबन्धन शिथिल पड़ गया। जागीरदारों के अधिकारों में वृद्धि हो गयी और किसानों की स्थिति खराब होने लगी जिससे राज्य की आय में कमी आने लग गई।

शाहजहाँ के समय में लगान व्यवस्था

शाहजहाँ के शासनकाल में भू-राजस्व व्यवस्था में और गिरावट आई। उसके शासनकाल में राज्य की 70 प्रतिशत भूमि जागीरदारों को दे दी गयी जिससे राज्य का जागीरी किसानों से सम्पर्क टूट गया। लगान की दर में वृद्धि कर दी गई। अब 33 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक लगान लिया जाने लगा। शाहजहाँ के समय में लगान वसूली का काम ठेके पर देने की प्रथा आरम्भ हुई। ठेकेदारी प्रथा से किसानों को काफी क्षति पहुँची क्योंकि ठेकेदार नियम से अधिक लगान वसूल करते थे।

औरंगजेब के समय में लगान व्यवस्था

औरंगजेब के समय उपर्युक्त समस्त दोष तो कायम रहे ही, साथ ही लगान वसूली में कठोरता बरती जाने लगी और किसानों से उनकी सम्पूर्ण भूमि से लगान लिया जाने लगा, चाहे सम्पूर्ण भूमि पर खेती की गयी हो अथवा नहीं। इससे किसानों की स्थिति शोचनीय हो गई।

औरंगजेब के बाद भू-राजस्व व्यवस्था

औरंगजेब के बाद मुगल शासन की भू-राजस्व व्यवस्था बुरी तरह से लड़खड़ा गई। अब भूमि को ठेकेदारों को देने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं किया गया। इससे राज्य की आर्थिक व्यवस्था बुरी तरह बिगड़ गई।

मुगलों की भू-राजस्व व्यवस्था का मूल्यांकन

मुगलों की भू-राजस्व व्यवस्था को ठोस आधार प्रदान करने का श्रेय अकबर को है। उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ उसके उत्तराधिकारियों के काल में भी बनी रही। अकबर के शासनकाल में एक तरफ तो कृषि भूमि के क्षेत्र को बढ़ाने का प्रयास किया गया और दूसरी तरफ किसानों को अच्छी फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस सम्बन्ध में उन्हें उचित सुविधाएँ भी दी गईं।

भूमि की पैमाइश के माप गज, बिस्वा और बीघा में निश्चित किये गये। भूमि की पैमाइश के लिए बाँस के टुकड़ों को लोहे के कड़ों से जोड़कर जरीब बनाई गई। भूमि का वर्गीकरण किया गया। मालगुजारी वसूल करने वाले अधिकारियों को निर्धारित मात्रा से अधिक कर वसूल नहीं करने के आदेश दिये गये। पट्टा तथा कबूलियत के द्वारा किसान के अधिकारों को सुरक्षित किया गया और देय मालगुजारी को निश्चित किया गया।

किसान को जब्ती, बँटाई अथवा नस्क में से किसी एक प्रथा को चुनने का विकल्प दिया गया। अकबर को मालगुजारी नकद में लेना पसन्द था, फिर भी किसानों को उपज के रूप में मालगुजारी चुकाने की छूट थी। प्राकृतिक प्रकोपों के समय किसान को भू-राजस्व में छूट दी जाती थी और तकाबी ऋण भी दिया जाता था।

किसानों की स्थिति

मुगलकाल में किसानों के भूमि सम्बन्धी अधिकार क्या थे और उनकी आर्थिक स्थिति कैसी थी? इन सवालों पर इतिहासकारों में काफी मतभेद हैं। बर्नियर समस्त भूमि का मालिक बादशाह को बताता है। प्रो. इरफान हबीब के अनुसार भूमि का स्वामी न तो बादशाह ही था और न किसान।

कुछ परिस्थितियों में उसका अधिकार मिलकियत का था, पर सामान्य रूप से किसान न तो अपनी भूमि से अलग हो सकता था और न उसे बेच सकता था। किसान यदि भूमि छोड़कर चला जाता तो सरकारी कर्मचारी उसे समझा-बुझाकर वापस ले आते थे।

डॉ. सिद्दीकी का यह भी मानना है कि उस युग में किसान इच्छाहीन किरायेदार नहीं था क्योंकि वह कुछ समझौते और प्रतिबन्धों के अनुसार खेती करता था। किसान जो भूमि-कर चुकाता था उसका विवरण सरकारी लेखों में स्पष्ट था। यद्यपि किसानों को जमीन बेचने अथवा बन्धक रखने का अधिकार नहीं था, किसानों का एक वर्ग मोरूसी कहलाता था जो भूमि को बेचने एवं बंधक रखने के अधिकारों का दावा करता था।

अधिकांश विद्वानों का मत है कि सामान्यतः किसानों को अपनी भूमि से बेदखल नहीं किया जाता था और उनके वंशजों को उनके खेतों पर उत्तराधिकार का हक होता था। किसानों का एक वर्ग ऐसा भी था जो जमींदारों की अनुमति से उनकी भूमि पर खेती करता था। ऐसे किसानों को बेदखल भी किया जा सकता था। जिन किसानों को पट्टा और कबूलियत का लाभ मिला हुआ था, उनको कम शोषण और यंत्रण का सामना करना पड़ता था।

जहाँ तक किसानों की आर्थिक स्थिति का प्रश्न है उन्हें अपनी पैदावार का एक-तिहाई से लेकर आधा हिस्सा तक भू-राजस्व के रूप में देना पड़ता था। भूमि-कर के अलावा उन्हें चुँगियों और अनुलाभों के रूप में भी कुछ चुकाना पड़ता था। उन्हें जमींदारों और जागीरदारों द्वारा सरकार को चुकाये जाने वाले करों का कुछ बोझ भी सहन करना पड़ता था।

फिर भी, डॉ. सिद्दीकी का मत है कि मुगलकाल में किसान खुशहाल थे क्यांेकि आवश्यकता की अन्य वस्तुएँ सस्ती थीं और सरलता से उपलब्ध होती जाती थीं। अन्य इतिहासकार उनके मत से सहमत नहीं हैं क्योंकि अधिक लगान एवं अधिकारियों की लूटखसोट के कारण किसानों की दशा अत्यंत शोचनीय थी।

औरंगजेब के शासनकाल में तो वे जैसे-तैसे अपना जीवन निर्वाह कर रहे थे। पैलसर्ट ने लिखा है कि किसानों की स्थिति बहुत खराब थी। उनके भाग्य में केवल दुःखों और विपत्तियों का स्थान था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख तत्त्व

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मुगलकालीन अर्थव्यवस्था

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख तत्त्वों में कृषि, भूस्वामित्व, भूराजस्व, कृषि, प्रौ़द्योगिकी एवं उद्यो तथा वाणिज्य एवं व्यापार आते हैं।

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख तत्त्वों में कृषि, भूस्वामित्व, भूराजस्व, कृषि, प्रौ़द्योगिकी एवं उद्यो तथा वाणिज्य एवं व्यापार आते हैं। हमने इस अध्याय को तीन भागों में विभक्त किया है-1. मुगलकालीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख तत्त्व, 2. मुगलकालीन प्रौद्योगिकी एवं उद्योग तथा 3. मुगलकालीन व्यापार तथा वाणिज्य।

मध्यकालीन मुस्लिम बादशाह भारत में आक्रांता के रूप में आये थे। उन्होंने सेना के बल पर इस देश का शासन प्राप्त किया था अतः उनका ध्यान अपनी सेनाओं को मजबूत बनाये रखना, उन्हें निरंतर राज्य विस्तार के काम में लगाये रखना तथा शत्रुओं से अपने राज्य को सुरक्षित रखने पर अधिक था।

कृषि, व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योगों का संरक्षण एवं विकास उनकी प्राथमिकता में नहीं थे। यही कारण है कि मध्यकालीन फारसी और अरबी ग्रन्थों में भारत की अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में बहुत कम सूचनाएँ मिलती हैं। मंगोल बादशाह भी आक्रांताओं की तरह इस देश में प्रविष्ट हुए।

1221 ई. में मंगोलों ने चंगेजखाँ के नेतृत्व में भारत पर पहला बड़ा आक्रमण किया तथा 1526 ई. में बाबर के नेतृत्व में उन्हें पहली बार दिल्ली की सल्तनत पर शासन करने का अधिकार मिला। मुस्लिम शासकों की परम्परा के अनुसार मंगोलकालीन फारसी एवं अरबी ग्रंथों ने बादशाहों द्वारा लड़ी गई लड़ाइयों, शहजादों द्वारा किये गये उत्तराधिकार के युद्धों, विप्लवों आदि का विस्तार से वर्णन किया है किंतु देश की कृषि, व्यापार, वाणिज्य एवं अर्थव्यवस्था का बहुत कम उल्लेख किया है।

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था जानने के प्रमुख स्रोत

भारतीय आर्य परम्परा में राजाओं के तिथिक्रम, वंशक्रम तथा युद्धों का वर्णन करने की बजाय धर्म, अध्यात्म एवं पौराणिक आख्यानों के साथ-साथ कृषि, पशुपालन, अकाल, आदि का बहुतायत से उल्लेख होता था। यही कारण है कि मंगोलों के शासन में रचे गये संस्कृत ग्रंथों तथा क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य में भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में सूचनाएँ अंकित की जाती रहीं। मुगलकालीन एवं परवर्ती विदेशी पर्यटकों के विवरणों से भी मुगलकालीन अर्थव्यवस्था का ज्ञान होता है।

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख तत्त्व

मुगलकाल में भी भारत की अर्थव्यवस्था प्राचीन आर्य परम्परा के अनुसार कृषि, पशुपालन एवं घरेलू उद्योगों पर आधारित थी। इस कारण गाय ही ग्रामीण जीवन एवं अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी। अर्थव्यवस्था में जटिलता उत्पन्न नहीं होने से, प्रजा का जीवन सरल एवं मंथर-गति युक्त था। ग्रामीण प्रजा की आवश्यकताएँ गाँवों में ही पूरी हो जाती थीं। पूरा परिवार प्रायः एक ही कार्य करता था। प्रत्येक परिवार का कार्य परम्परा से निर्धारित था। स्त्रियां घर का काम करती थीं तथा अपने परिवार के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों में भी भूमिका निभाती थीं।

श्रम विभाजन

परम्परागत रूप से आर्यों द्वारा किया गया श्रम विभाजन अब भी समूची ग्रामीण एवं नगरीय अर्थव्यवस्था का आधार था। किसान खेती करते थे। बढ़ई तथा लौहार कृषि उपकरण तथा घरेलू उपभोग का सामान बनाते थे। सामान्यतः खेती के साथ-साथ पशुपालन भी किया जाता था किंतु कुछ लोग केवल पशुपालक एवं चरवाहे के रूप में जीवन यापन करते थे।

वे पशुओं को पालने एवं दूध बेचने का काम करते थे। जुलाहे कपड़ा बुनते थे। चर्मकार चमड़े का काम करते थे। पुजारी, ज्योतिषी, वैद्य, महाजन, धोबी, नाई तथा भंगी आदि जातियों के लोग, परम्परागत रूप से अपने लिये निश्चित किये गये कार्य करते थे। कुछ लोग रस्सी और टोकरी बनाने, शक्कर तथा गुड़ बनाने, इत्र तथा तेल आदि बनाने का काम करते थे।

हाट-बाजार

नगरीय जीवन में बाजार दैनंदिनी का अंग थे जहाँ विभिन्न प्रकार की सामग्री का क्रय-विक्रय होता था किंतु गाँवों में बाजार प्रायः नहीं थे। अलग-अलग गांवों में छोटे-छोटे नियतकालिक बाजार लगते थे जिनमें कपड़ा, मिठाइयाँ तथा दैनिक आवश्यकता की विविध सामग्री बिकती थी। फसलों एवं पशुओं का क्रय विक्रय बड़े स्तर पर होता था।

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था में भू-स्वामित्व एवं भू-राजस्व

भू-स्वामित्व

मध्यकालीन भारत में भू-स्वामित्व के सम्बन्ध में विद्वानों ने अलग-अलग मत व्यक्त किये हैं। समकालीन यूरोपियन यात्री बादशाह को भूमि का स्वामी मानते हैं किन्तु डॉ. इरफान हबीब का मत है कि भूमि का स्वामी न तो बादशाह था और न किसान। कुछ परिस्थितियों में उसका अधिकार मिलकियत का था अर्थात् सिद्धान्ततः भूमि का स्वामी बादशाह था परन्तु व्यवहारिक रूप से भूमि पर काश्त करने वाले जब तक भू-लगान देते रहते थे, तब तक वे भूमि के स्वामी बने रहते थे।

सामान्य रूप से किसान न तो भूमि को बेच सकता था और न उससे अलग हो सकता था। डॉ. नोमान अहमद सिद्दीकी का मानना है कि कृषकों को जमीन बेचने और बंधक रखने जैसे अधिकार नहीं थे। फिर भी कृषकों का एक वर्ग जिसे मौरूसी कहा जाता था, इस प्रकार के अधिकारों का दावा करता था, जिन्हें दखलदारी का अधिकार (ओक्यूपेंसी राइट्स) कहा जा सकता है।

सामान्यतः उन्हें बेदखल नहीं किया जा सकता था और उनके वंशजों का उनके खेतों पर उत्तराधिकार होता था। साथ ही ऐसे किसान भी थे जो जमींदारों की अनुमति से खेत जोतते थे और उन्हें जमींदार कभी भी बेदखल कर सकते थे। वस्तुतः कृषकों का वर्गीकरण कई स्तरों एवं श्रेणियों में हो सकता था।

किसान यदि अपनी भूमि को छोड़कर अन्यत्र चला जाता था तो सरकारी कर्मचारियों को आदेश थे कि वे किसान को समझा-बुझाकर वापस ले आयें। औरंगजेब के काल में बहुत से किसान ताल कोंकण से भाग गये थे। उन्हें बलपूर्वक वापस लाकर छः सौ गाँवों में बसाया गया था।

भूमि का वर्गीकरण

मुगलकाल में भूमि को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था- (1.) खालसा भूमि और (2.) गैर-खालसा (जागीर, साराण आदि)। खालसा भूमि सीधी बादशाह के नियंत्रण में थी। मालगुजारी निश्चित करने के लिए भूमि को पोलज, परती, चाचर एवं बंजर में बाँटा गया था। यह वर्गीकरण भूमि को जोतने पर आधारित था।

पोलज वह भूमि थी जिसे प्रत्येक वर्ष जोता जाता था। परती को कुछ समय के लिए बिना जोते ही छोड़ दिया जाता था। चाचर भूमि तीन-चार साल के लिए बिना जुते ही छोड़ दी जाती थी। बंजर भूमि वह थी जिस पर पाँच साल से अधिक समय तक कोई उपज नहीं होती थी। गैर खालसा भूमि जागीरदारों के अधिकार में थी। अकबर के शासनकाल में जागीरदार अर्द्ध-स्वतन्त्र शासक थे। बादशाह का उनके आंतरिक शासन में हस्तक्षेप नहीं था।

भ-ूराजस्व का निर्धारण

प्रथम दो प्रकार की भूमियों (पोलज तथा परती) को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया-

(1.) अच्छी,

(2.) मध्यम और

(3.) खराब।

इन तीन श्रेणियों की प्रति बीघा औसत उपज को पोलज अथवा परती के प्रति बीघा की सामान्य उपज मान लिया गया था। इन दोनों भूमि में विशेष अन्तर नहीं था क्योंकि जिस वर्ष भी परती भूमि पर खेती की जाती थी, उसकी उपज पोलज के समान ही हुआ करती थी।

चाचर भूमि में जब पहले साल खेती होती थी तो निश्चित दर अर्थात् 2/5 भाग मालगुजारी के रूप में ली जाती थी और पाँच साल खेती होने के पश्चात् उस पर सामान्य दर से मालगुजारी वसूल की जाती थी। इसी प्रकार बंजर भूमि पर भी पांॅच साल के बाद पूरी दर से मालगुजारी वसूल की जाती थी।

रैयती जमींदारों के अत्याचार

डॉ. नोमान अहमद सिद्दीकी के अनुसार मुगलकाल में किसानों की स्थिति सन्तोषप्रद नहीं थी। किसान को भूमि की पैदावार के अनुसार एक-तिहाई से लेकर आधा हिस्सा तक भू-राजस्व के रूप में देना पड़ता था। भू-राजस्व के साथ-साथ किसानों को चुंगियों तथा अनुलाभों के रूप में कुछ और भी देना पड़ता था। यह वसूली भू-राजस्व के निर्धारण एवं संग्रह पर हुए व्यय की पूर्ति के लिए विभिन्न मदों में की जाती थी।

ऐसा प्रतीत होता हैं कि तलबाना और शहनामी जैसी चुंगियाँ जमींदारों से ली जाती थी जो आमतौर पर अपना भार किसानों पर डाल देते थे। छोटे ओहदे वाले मनसबदारों को भू-राजस्व संग्रहण हेतु छोटी-मोटी सेना रखने की अनुमति होती थी। यह सेना किसानों, जन-सामान्य तथा रयैती जमींदारों को आतंकित करने के लिए पर्याप्त होती थी।

इस कारण छोटे मनसबदार, भू-राजस्व संग्रहण, रैयती जमींदारों के साधनों की जानकारी कर उन पर अधिक भू-राजस्व-कर आरोपित करके करते थे। रयैती जमींदार भू-राजस्व-कर का सारा भार किसानों पर डाल देते थे। जब किसान पैसा जमा नहीं करवा पाते थे तो उन पर रैयती जमींदार द्वारा अत्याचार किये जाते थे।

जब किसानों पर अत्याचार, सहन करने की सीमा से बाहर हो जाता था तब वे रैयती जमींदारों के क्षेत्रों को छोड़कर जोर टलब जमींदारों के क्षेत्रों में चले जाते थे। जहाँ उन्हें रैयती जमींदारों के क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक सुविधा मिलती थी। इससे किसानों की दयनीय स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था में कृषि

आर्यों द्वारा स्थापित संस्कृति ने वैदिक काल से भारत को कृषि प्रधान देश का स्वरूप प्रदान किया था। मंगोलों के शासन में भी खेती का काम सामान्यतः हिन्दुओं के हाथों में रहा। इस कारण अब भी खेती प्राचीन आर्य पद्धति से, बैलों के द्वारा हल चलाकर की जाती थी। हल, कसी, खुरपी, पटेला तथा हंसिया, इस युग में भी खेती के मुख्य उपकरण थे। प्राचीन आर्य शासकों ने खेतों में सिंचाई के लिए नहरें बनाने की परम्परा आरम्भ की थी किंतु मध्यकालीन मुस्लिम आक्रमणों के बाद शासकों द्वारा नहरों की मरम्मत नहीं करवाने से खेती पूर्णतः वर्षा पर निर्भर हो गई। वर्षा के अभाव में प्रायः अकाल की स्थिति उपत्न्न हो जाती थी।

मुख्य फसलें

मुगलकाल में बोई जाने वाली मुख्य फसलें गेहूँ, बाजरा, मक्का, चावल, मटर, तिलहन, गन्ना, रूई आदि थीं। फलों में आम, अंगूर, केला, खरबूजा, अंजीर, नींबू, खिरनी, जामुन आदि उत्पन्न किये जाते थे। आयुर्वेदिक औषधियाँ, जड़ी-बूटियाँ, मसाले और सुगन्धित काष्ठ भी उत्पन्न किये जाते थे। इन उत्पादों को भारत के विभिन्न भागों एवं भारत से बाहर ले जाकर भी बेचा जाता था। अनाज भण्डारण के लिये गड्ढों या खत्तियों का उपयोग किया जाता था जिनमें लम्बे समय तक अनाज सुरक्षित रखा जा सकता था।

बागवानी

मुगल बादशाहों ने फलों की उपज में वृद्धि और किस्मों में सुधार करने के प्रयास किये तथा बागवानी को प्रोत्साहन दिया। बाबर को बागों में विशेष रुचि थी। उसने ईरानी शैली के अनुसार कुछ बागों का निर्माण करवाया, जिनमें कृत्रिम झरने तथा ढलुआ जमीनों पर चबूतरे आदि बनवाये।

अकबर के शासन काल में किसानों की सहायता

मुगल शासकों में अकबर सबसे पहला बादशाह था जिसने किसानों को प्रोत्साहन देने की नीति अपनाई। उसके शासन काल में किसानों को गन्ना, नील, अफीम, मसाले आदि नगद फसलें उत्पन्न करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। राज्य तकाबी के रूप में किसानों को ऋण देता था और सिंचाई की सुविधाएँ प्रदान करने का प्रयत्न करता था।

अनावृष्टि, अतिवृष्टि अथवा दुर्भिक्ष या अन्य किसी दैवी प्रकोप से फसल नष्ट हो जाने पर राज्य की ओर से उस क्षेत्र का भूमि कर माफ कर किसानों को आर्थिक सहायता दी जाती थी। फसलों को हुई क्षति का विवरण रखा जाता था। जब अधिक वर्षा या बाढ़ के कारण भूमि बिना जुती रह जाती थी, तब किसानों को भीषण कष्ट होता था।

ऐसे समय में भी राज्य किसानों की सहायता करता था। सरकारी कर्मचारियों को आदेश था कि वे किसानों से कोई अतिरिक्त कर वसूल न करें तथा उनके साथ कठोर व्यवहार न करें। यदि सैनिक अभियानों के समय किसानों की फसलों को किसी प्रकार की क्षति उठानी पड़ती थी तो राज्य उस क्षति की पूर्ति करता था।

कुछ मामलों में अकबर ने अपने सैनिक अभियानों के समय खड़ी फसल को क्षति से बचाने के लिए सशस्त्र सैनिकों को नियुक्त किया तथा फसलों को सेना के कारण हुई क्षति के लिये किसानों को नकद राशि का भुगतान किया।

अकबर ने आलू की फसल तैयार करवाने का प्रयत्न किया था तथा जहाँगीर ने अनेक प्रकार के अंगूरों की उपज करवाई। तम्बाकू और तरबूज भी पैदा किये जाने लगे। मुहम्मद रिदा को जिसने पहली बार तरबूज उगाये थे, सम्मानित किया गया। मुगलों के काल में गेहूँ और चावल का निर्यात किया जाता था। इसलिये यह आवश्यक था कि उपज को बढ़ाया दिया जाये ताकि आन्तरिक माँगों की पूर्ति के साथ-साथ निर्यात के लिए भी जिन्स उपलब्ध हो सके।

किसानों का जीवन

कुछ मुस्लिम इतिहासकारों का मानना है कि मुगलों के समय में किसानों की स्थिति अच्छी थी जबकि अधिकांश विदेशी इतिहासकारों के अनुसार मुगल काल में किसानों की स्थिति बहुत खराब थी। पेलसर्ट के अनुसार जहाँगीर के समय में किसानों की स्थिति बहुत ही खराब थी।

उनके घरों में केवल दुःखों और विपत्तियों का स्थान था। कश्मीर के लोग मोटा चावल खाते थे। बिहार के ग्रामीण केसरी दाल खाने को बाध्य थे, जिससे वे रोगग्रस्त रहते थे। मालवा के लोगों को गेहूँ के आटे की व्यवस्था करना बहुत कठिन था, इसलिए वे ज्वार के आटे का प्रयोग करते थे।

मुगलों के शासन काल में इजारेदारी के व्यापक प्रचलन से किसानों पर बुरा प्रभाव पड़ा। क्योंकि इस व्यवस्था के अन्तर्गत किसान इजारा लेने वाले व्यक्ति की दया पर निर्भर होते थे, जिनका उद्देश्य किसानों से अधिक से अधिक कर वसूल करना होता था। अतः साधारण किसान साधन सम्पन्न होे ही नहीं सकते थे। वे बड़ी निर्धनता में अपना जीवन-निर्वाह करते थे।

किसानों द्वारा घोर परिश्रम करने के बाद फसल तैयार होती थी, किन्तु भू-राजस्व एवं अन्य करों तथा चुंगियों को चुकाने के बाद उनके पास इतना अनाज बड़ी कठिनाई से बचता था कि वे अपना तथा अपने परिवार का पेट पाल सकें। किसानों के इस शोषण के विरुद्ध छुटपुट विद्रोह होते थे परन्तु उन्हें निर्ममता से कुचल दिया जाता था।

औरंगजेब के काल में सतनामियों और जाटों के विद्रोह इसकी पुष्टि करते हैं। इन विद्रोहों के लिए जहाँ औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता जिम्मेदार थी वहीं किसानों के असन्तोष ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

किसानों द्वारा अपना पेट भरने के लिये केवल एक ही रास्ता था कि वे अधिक से अधिक भूमि पर खेती करें ताकि भूराजस्व चुकाने के बाद इतना अनाज बच जाये कि वे अपने परिवार का पेट भर सकें। सौभाग्य से उस समय देश की जनसंख्या कम थी तथा खेती योग्य भूमि अधिक मात्रा में उपलब्ध थी, इस कारण पूरा परिवार दिन रात हाड़ तोड़ परिश्रम करके अधिक से अधिक अन्न पैदा करता था। जिसका अधिकांश भाग रैयती जमींदार ले जाते थे।

किसानों को अपनी अन्य न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये जंगल से लकड़ी काटनी पड़ती थी तथा पशुओं के माध्यम से भी कमाई करनी पड़ती थी। बहुत से लोग रस्सी, टोकरी, छाज आदि बनाकर बेचते थे। इसलिए शोषण होने पर भी किसान खेती करता रहता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – मुगलकालीन अर्थव्यवस्था

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख तत्त्व

मुगलकालीन प्रौद्योगिकी एवं उद्योग

मुगलकालीन व्यापार तथा वाणिज्य

मुगलकालीन प्रौद्योगिकी एवं उद्योग

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मुगलकालीन प्रौद्योगिकी एवं उद्योग

प्राचीन काल से ही भारत में प्रौद्योगिकी विकास की गति बहुत धीमी रही थी। मुगलकालीन प्रौद्योगिकी एवं उद्योग भी विशेष उन्नति नहीं कर सका।

मुगलकालीन प्रौद्योगिकी

धातु प्रौद्योगिकी

इस युग में धातु-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कुछ उन्नति हुई। कांसे, पीतल, लोहे, सोना और चाँदी के बर्तन, मूर्तियाँ बनाने की प्रौद्योगिकी पहले की ही तरह चलती रही। धातु को गर्म करके उसे पीट-पीटकर चद्दरें बनाई जाती थीं और उन चद्दरों से तश्तरियाँ, थालियाँ, कटोरियाँ आदि बनाई जाती थीं।

इस काल में पीतल की सुन्दर कलात्मक सुराहियाँ बनाने की तकनीक विकसित हुई। धातु के बर्तनों पर सुन्दर नक्काशी का काम होता था। अच्छी किस्म के शुद्ध लोहे से तलवारें एवं बरछियाँ बनाई जाती थीं। अस्त्र-शस्त्र बनाने की प्रौद्योगिकी तथा आभूषण बनाने की प्रौद्योगिकी में विकास देखा गया।

काष्ठ प्रौद्योगिकी

यद्यपि इस समय तक युद्धों में रथों का प्रयोग कम हो गया था, फिर भी काष्ठ-प्रौद्योगिकी से रथों का निर्माण होता रहा। मुगलों की अपनी कोई नौ-सेना विकसित नहीं हुई थी, फिर भी समुद्र तटीय राज्यों द्वारा अपनी सेनाओं के लिये बड़ी नावों एवं जहाजों का निर्माण किया जाता था। युद्ध के साथ-साथ व्यापारिक आवश्यकताओं के लिये भी बड़ी नौकाओं की आवश्यकता थी। माल ढोने के लिए मालवाहक जहाजों का भी निर्माण किया जाने लगा। इनके अलावा लकड़ी का सुन्दर सजावटी सामान पहले की ही तरह सम्पूर्ण भारत में होता रहा। उसकी तकनीक में कोई विशेष विकास नहीं हुआ।

आभूषण प्रौद्योगिकी

मुगल बादशाह, शहजादे तथा बेगमें आभूषण पहनने एवं रखने के बड़े शौकीन थे इसलिये आभूषण बनाने वाले कारीगर नई-नई डिजाइन के आभूषण तैयार करते थे जिनमें तकनीकी कौशल स्पष्ट दिखाई देता था।

कृषि प्रौद्योगिकी

कृषि प्रौद्योगिकी में सीमित विकास हुआ। अधिकतर खेती पहले की ही तरह वर्षा पर निर्भर थी। बहुत कम संख्या में नदियों पर बांध बनाये गये थे तथा बहुत कम संख्या में नदियों से नहरें निकाली गई थीं। मुगल शासकों ने मध्य एशिया में पैदा होने वाली कुछ फसलों को भारत में उगाने के प्रयास किये।

उन्होंने नये फल-फूलों को पैदा करने की तकनीकी विकसित की। खेती के कुछ नये उपकरणों का भी विकास हुआ जिनकी सहायता से आलू की फसल तैयार की जाने लगी तथा अँगूरों की खेती की जाने लगी। भारत में पहली बार तरबूज पैदा किये गये।

यद्यपि खेत जोतने के लिए हल का ही प्रयोग किया जाता था किन्तु अब हल के नीचे लोहे के तीखे फलक लगाये जाने लगे जिससे भूमि को अधिक गहराई तक खोदा जा सके। फसल काटने के लिए लोहे की दरांती का प्रयोग किया जाता था। तैयार फसल को खलिहान में साफ करने तथा उससे भूसी निकालने की परम्परागत पद्धति ही काम में ली जाती थी। स्पष्ट है कि कुछ नई फसलें पैदा करने और कुछ नये उपकरणों का निर्माण करने के अतिरिक्त कृषि प्रौद्योगिकी में विशेष प्रगति नहीं हुई।

युद्ध प्रौद्योगिकी

इस काल में युद्ध प्रौद्योगिकी का काफी विकास हुआ। मुसलमानों ने युद्धों में तोपों और बन्दूकों का प्रयोग आरम्भ किया। अतः भारत में तोपें और बारूद बनाने की प्रौद्योगिकी का विकास हुआ। बाबर ने भारत में पहली बार युद्ध क्षेत्र में तुलुगमा पद्धति का प्रयोग किया, जो भारतीय सेनाओं के विरुद्ध अधिक सफल रही।

इसलिये अब शत्रु सेना को घेरने की नई रणनीतियों का प्रयोग किया जाने लगा। अब सैनिकों की सुरक्षा के लिए धातु-निर्मित कवचों का प्रयोग अत्यधिक बढ़ गया परन्तु अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण की प्रौद्योगिकी में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ।

वस्त्र प्रौद्योगिकी

मुगल काल में वस्त्र प्रौद्योगिकी, विशेषकर सूती, ऊनी और रेशमी कपड़ा तैयार करने की प्रौद्योगिकी का बहुत विकास हुआ। इस कारण इस काल में वस्त्र उद्योग भारत का सबसे बड़ा उद्योग बन गया। नये प्रकार के कपड़े तैयार होने लगे। ढाका की बनी हुई मलमल पूरे विश्व में अपनी बारीकी के लिए प्रसिद्ध हो गई।

ढाका में ऐसे करघे बनाये गये जिनसे बना हुआ कपड़ा अधिक कीमत का होता था। बादशाहों एवं शासक वर्ग के लोगों के लिये लाहौर और लखनऊ में चीकन का कपड़ा तैयार किया जाता था। कालीकट के सिरोंज का कपड़ा अत्यन्त बारीक होता था। रेशमी वस्त्रों पर सोने-चाँदी के तारों से कसीदाकारी की जाती थी।

कश्मीर में बहुत ही मुलायम ऊनी शाल बनाये जाते थे। इस काल में कपड़ों की रंगाई और छपाई में नये प्रयोग हुए। रसायनों से रंग तैयार किये जाते थे। बांधनू की रंगाई अत्यन्त प्रसिद्ध थी।

कागज प्रौद्योगिकी

मुगल काल में कागज प्रौद्योगिकी का विशेष विकास नहीं हुआ। फिर भी दिल्ली, आगरा तथा लाहौर में कागज बनाये जाने का उल्लेख मिलता है। बहुसंख्यक हस्तलेखों से भी कागज की उपलब्धता प्रमाणित होती है। लाहौर तथा आगरा के शाही कारखानों में कागज तैयार किया जाता था।

विभिन्न प्रयोगों के लिए विभिन्न प्रकार के कागज बनाने की प्रौद्योगिकी विकसित हुई, जैसे शाही फरमानों के लिए शोभायुक्त कागज तथा व्यापारियों और दलालों के लिए टिकाऊ प्रकार का कागज बनाया जाता था। जिल्दसाजी के लिए मजबूत कागज बनाया जाता था।

चर्म प्रौद्योगिकी

मुगल काल में चमड़े से विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनाने की तकनीक का भी विकास हुआ। घोड़ों के लिए काठी, लगाम, तलवार के लिए म्यान, जूते, पानी के मशक आदि वस्तुएं बड़ी मात्रा में बनाई जाती थीं। गुजरात में चमड़े की वस्तुएँ बड़ी मात्रा में बनती थीं जिनका अरब देशों में निर्यात किया जाता था। इस काल में गन्ने से चीनी बनाने की तकनीक विकसित हुई। लाहौर, दिल्ली तथा आगरा चीनी उद्योग के बड़े केन्द्र थे।

स्थापत्य एवं शिल्प प्रौद्योगिकी

मुगल काल में भवन निर्माण, नगर-नियोजन एवं मूर्तियाँ बनाने की प्रौद्योगिकी का अच्छा विकास हुआ। भवन निर्माण प्रौद्योगिकी में मुस्लिम शैली का प्रयोग किया गया। अधिकतर इमारतें लाल पत्थर की बनाई गईं। बड़े-बड़े पत्थरों को काटकर उन्हें उचित आकार देना तथा उन्हें आकर्षक बनाने के लिए उन पर विभिन्न आकृतियों ऊकेरना शिल्पकारों की उच्च तकनीक का प्रमाण हैं।

दिल्ली का लाल किला और फतेहपुर सीकरी की इमारतें इस युग की उच्च स्थापत्य एवं शिल्प प्रौद्योगिकी के श्रेष्ठ उदारहरण हैं। कुछ मुगल शासकों तथा उनकी बेगमों के मकबरे संगमरमर पत्थर से बनाये गये। संगमरमर के पत्थरों पर की गई नक्काशी अत्यंत उच्च कोटि की है।

मुमताज महल का मकबरा ताजमहल, आबू का देलवाड़ा मन्दिर और फतेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती का मकबरा, संगमरमर के भवन-निर्माण प्रौद्योगिकी के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। यद्यपि मूर्तियां बनाना इस्लाम के विरुद्ध था, फिर भी विभिन्न सूबों में देव प्रतिमाओं का निर्माण होता रहा।

संगमरमर के बड़े-बड़े शिलाखण्डों को उचित आकार में काटकर छैनी और हथोड़े से प्रतिमा-निर्माण की प्रौद्योगिकी का भी विकास हुआ। हाथी दाँत के सुन्दर खिलौने और कंगन बनाने की तकनीक मौर्य काल से ही चली आ रही थी। उसमें भी कुछ विकास हुआ।

वनस्पति आधारित प्रौद्योगिकी

सैनिकों को निरंतर लड़ते रहने के लिये अफीम का सेवन करना पड़ता था। मुगल काल में युद्ध निरंतर चलते रहते थे इसलिये अफीम का सेवन भी बहुत बढ़ गया था। इसलिए इस काल में अफीम की खेती भी बढ़ी और उसके पौधे के फूलों से रस निकालकर अफीम तैयार करने की तकनीक भी विकसित हुई।

कश्मीर में तथा कुछ अन्य स्थानों पर तिल तथा अरण्डी के बीज से तेल निकालने की तकनीक विकसित हुई। बंगाल और उड़ीसा में पैदा होने वाली लाख से स्त्रियों के लिए चूड़ियाँ, कंगन-कड़े आदि बनाये जाने लगे। गुजरात में इन कंगनों और कड़ों पर रंगीन कांच के टुकड़े लगाकर उन्हें आकर्षक बनाने की कला विकसित हुई।

बेंत और बांस के वृक्षों से बांस आदि को छीलकर टोकरी, चटाइयाँ आदि बनाई जाती थीं। माना जाता है कि मुसलमानों ने भारत में शतरंज का खेल प्रचलित किया। मुगल काल में भारत के विभिन्न भागों में शतरंज के पट्टे एवं मोहरे बनाये जाने लगे। लकड़ी एवं हाथी दाँत से चौपड़ की गोटियाँ बनाई जाती थीं।

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि मुगल काल में युद्ध, वस्त्र, भवन, नगर नियोजन, धातु उद्योग, काष्ठ उद्योग, हाथी दाँत उद्योग आदि क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी का पर्याप्त विकास हुआ किंतु कृषि क्षेत्र में प्रौद्योगिकी का विशेष विकास नहीं हुआ।

मुगल कालीन उद्योग

मुगल काल में गाँवों तथा नगरीय क्षेत्रों में शिल्पी तथा कारीगर आदि श्रमजीवी जातियां अपने पुराने पारिवारिक एवं परम्परागत कार्यों को करती थीं। उनके औजारों में भी विशेष तकनीकी विकास नहीं हुआ था। इस कारण मुगल काल में किसी भी उद्योग का बड़े पैमाने पर विकास नहीं हुआ।

अधिकांश उद्योग स्थानीय थे जो पिता से पुत्र को हस्तान्तरित होते थे। लगातार एक ही काम करते रहने से देश के कई नगर और क्षेत्र अपने विशिष्ट और श्रेष्ठ उत्पादों के लिए विख्यात हो गये थे। फारस की पद्धति के अनुसार राज्य की ओर से कुछ शाही कारखानों की स्थापना की गई थी। जिनमें शाही तथा दरबारी लोगों की आवश्यकता की चीजें बनाई जाती थीं।

इनमें सुनार, किमखाब या रेशम तैयार करने वाले, कसीदाकारी करने वाले, चित्रकार, दर्जी, मलमल तथा पगड़ी बनाने वाले आदि अनेक प्रकार के कारीगर होते थे, जो साथ मिलकर काम करते थे। प्रान्तों में भी स्थानीय माँग के अनुसार विभिन्न प्रकार की चीजों को बनाने के कारखाने स्थापित किये गये थे।

वस्त्र उद्योग

यह प्राचीन उद्योग था तथा मुगल काल में सबसे बड़ा उद्योग था जिसका विस्तार सम्पूर्ण देश में हुआ। इसके मुख्य केन्द्र बंगाल, गुजरात, बनारस, उड़ीसा और मालवा थे। मुगल काल में सूरत, काम्बे, पटना, बुरहानपुर, दिल्ली, आगरा, लाहौर, मुल्तान, ठट्टा आदि नगर भी विशेष प्रकार के कपड़े तैयार करने के लिए प्रसिद्ध हो गये थे।

नये प्रकार के कपड़ों में बैरामी, शानबफ, शीरीबफ और कत्तने रूमी की शुरूआत हो चुकी थी। ढाका में बनी मलमल पूरे विश्व में अपनी बारीकी के लिए प्रसिद्ध हो चुकी थी। इसकी श्रेष्ठता को देखकर विदेशी यात्री भी चकित हो जाते थे। सोनार गाँव में अति उत्तम प्रकार की मलमल तैयार की जाती थी जिसके एक टुकड़े की कीमत चार हजार रुपये तक होती थी।

उत्तम प्रकार की मलमल को बड़े सुन्दर नाम दिये गये थे, जैसे मलमल खास (बादशाह के लिये मलमल), सरकार-ए-आली (नवाबों के लिए निमित्त), आब-ए-रमान (जल-प्रवाह), शबनम (ओस) आदि। ढाका में करघे पर तैयार किये गये कपड़े सबसे अधिक महंगे होते थे।

समाना और सुल्तानपुर उत्तम वस्त्रों के लिए विख्यात थे। जौनपुर तो आज भी उत्तम प्रकार की दरियों के लिए विख्यात है। कालीकट के सिरोंज के कपड़े तो इतने बारीक होते थे कि उसे पहनने पर भी आदमी नंगा दिखता था।

कासिम बाजार, माल्दा, मुर्शिदाबाद, पटना, काश्मीर और बनारस रेशम उद्योग के मुख्य केन्द्र थे। गुजरात में रेशम का उत्पादन नहीं होता था किन्तु वहाँ रेशम की बुनाई का काम अच्छा होता था। रेशम से तथा रेशमी, सुनहले सोने तथा चाँदी मढ़े सूतों से सूरत में दरियाँ तैयार होती थीं।

गुजरात भी किमखाब, बदला कुर्त्ता, कसीदाकारी के वस्त्र तथा किनारी (चाँदीतार) आदि के लिए प्रसिद्ध था। असम भी रेशमी कपड़ों के लिए प्रसिद्ध था। दक्षिण में कोयंबटूर के निकट रेशम उत्पादन का एक बड़ा केन्द्र था।

ऊन उद्योग

भारत के रेगिस्तानी एवं पहाड़ी क्षेत्रों में भेड़ पालन बड़े पैमाने पर होने के कारण काबुल, काश्मीर तथा पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर, जैसलमेर तथा बीकानेर आदि शहर ऊन तैयार करने के प्रसिद्ध केन्द्र थे। उत्तम प्रकार की ऊन तिब्बत से आती थी।

काश्मीर के शॉल बहुत मुलायम तथा गर्म होते थे। काश्मीर में शॉल के साथ-साथ विविध प्रकार के ऊनी वस्त्र एवं कम्बल भी तैयार होते थे। लाहौर, आगरा, पटना में भी बड़े स्तर पर शॉल बनते थे। बुरहानपुर, जौनपुर तथा अमृतसर में ऊनी वस्त्र उद्योग खूब फल-फूल गया था।

रंगाई उद्योग

इस काल में रंगाई उद्योग भी खूब विकसित था। लाहौर और उसके आसपास पर्याप्त मात्रा में नील का उत्पादन होता था। दिल्ली सूती वस्त्र रंगने में, विशेष रूप से बांधनू की रंगाई के काम के लिए प्रसिद्ध था। बैना तथा समीपवर्ती क्षेत्रों का रंगाई का काम अति उत्तम माना जाता था। दूसरे दर्जे की उत्तम रंगाई गुजरात में सरखेज तथा गोलकुण्डा में की जाती थी। रंगाई के अन्य महत्त्वपूर्ण केन्द्र आगरा, लखनऊ, अहमदाबाद, फरूखाबाद तथा मछलीपट्टम थे। बंगाल में ढाका तथा कासिम बाजार कपड़ा रंगाई के मुख्य केन्द्र थे।

धातु उद्योग

भारतीय वैदिक सभ्यता से ही धातुओं का उपयोग करना सीख गये थे। मौर्य काल में धातु कला का विस्तार हुआ था। भारतवासी लोहे को शुद्ध करने की प्रक्रिया से अच्छी तरह परिचित थे। समकालीन संस्कृत साहित्य में भिन्न प्रकार के लोहे के गुणों का विवरण मिलता है।

मुगल काल में लोहा, ताम्बा, पीतल, सोना, चाँदी, जस्ता आदि विभिन्न धातुओं का बड़े स्तर पर उपयोग होता था। लोहे का उपयोग धारिया, तलवारें, हथियार तथा बरछे बनाने में होता था। सर्वोत्तम इस्पात का उपयोग तलवारों और बरछों के निर्माण में होता था, जिनकी अरब तथा फारस के देशों में बड़ी माँग थी।

श्रीनगर, लाहौर, आगरा, मुल्तान, वजीराबाद, भड़ौंच, ढाका तथा चटगाँव में नावें, रथ तथा लकड़ी की कई प्रकार की सामग्री बनाई जाती थीं। मुगलों के पास नियमित नौ-सेना नहीं थी, अतः जहाजों के निर्माण को अधिक प्रोत्साहन नहीं मिला, फिर भी लाहौर, वजीराबाद, कोरोमण्डल तट पर मडापल्लम तथा नसीपुर में मालवाहक जहाजों का निर्माण और उनकी मरम्मत होती थी।

कागज उद्योग

मुगल काल में कागज के प्रयोग का उल्लेख मिलता है किंतु यह उद्योग अधिक विकसित अवस्था में नहीं था। अमीर खुसरो ने कोरे तथा रेशम की भाँति शमी तथा सीरियन कागज के दिल्ली में बनाये जाने का उल्लेख किया है। चीनी यात्री माहुआन, जिसने सुल्तान गियासुद्दीन आजमशाह के काल में बंगाल का भ्रमण किया था, ने वृक्ष की छाल से श्वेत चमकीले कागज के उत्पादन का उल्लेख किया है।

बहुसंख्यक हस्तलेखों से भी कागज की उपलब्धता का प्रमाण मिलता है। कागज निर्माण के मुख्य केन्द्र पटना, दिल्ली, राजगीर, शहजादपुर, सियालकोट, मानसिंघी तथा खरपुरी में थे। मानसिंघी कागज को उसकी रेशमी बनावट, श्वेत रंग तथा टिकाऊ होने से बहुत पसन्द किया जाता था। लाहौर तथा आगरा में स्थापित शाही कारखाने भी कागज का उत्पादन करते थे।

सर्वोत्तम कागज कश्मीर में बनता था। विभिन्न प्रकार के कागज विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होते थे। शोभायुक्त कागज का उपयोग शाही फरमानों के लिए होता था, टिकाऊ प्रकार के कागज का प्रयोग व्यापारियों तथा दलालों के लेखा के निमित्त तथा बुद्धिजीवियों द्वारा होता था और जिल्दसाजी के लिए मोटे तथा मजबूत कागज का प्रयोग होता था।

सामान्यतः प्रांतों तथा बड़े नगरों के बाहर कागज बनाने का छोटा गाँव होता था, जिसे कागजी मोहल्ला अथवा कागजीपुर कहा जाता था। फरूखाबाद में आज भी कागजी बाजार नाम की एक गली है।

चमड़ा उद्योग

मुगलकाल में चमड़े के विभिन्न प्रकार के सामान का उपयोग होता था। जूते, चमड़े के जैकेट, तम्बू, घोड़ों के लिए काठी तथा लगाम, तलवार के लिए म्यान, ढाल, सामान रखने के थैले, चटाई, पानी की मशक, बैलगाड़ियों के पर्दे आदि के लिये चमड़े की मांग रहती थी। बंगाल में चमड़े का उपयोग विदेशों को निर्यात की जाने वाली चीनी की पैकिंग में किया जाता था।

सिन्ध में बने चमड़े के सामान उत्तम माने जाते थे। दिल्ली में भी सम्पन्न चमड़ा उद्योग स्थापित था। कैंबे, चप्पलों के लिए प्रसिद्ध था। गुजरात सोने और चाँदी से कढ़ी चमड़े की चटाइयों के लिए प्रसिद्ध था। वहाँ चमड़े की वस्तुएँ बड़ी मात्रा में बनती थी जिनका अरब देशों को निर्यात होता था।

असम के जंगलों में सांडों तथा हिरणों की बहुतायत से चमड़ा उद्योग विकसित अवस्था में था। पश्चिमी राजस्थान में भी चमड़े की युद्धोपयोगी एवं घरेलू उपभोग की विविध सामग्री बनती थी।

चीनी उद्योग

चीनी की खपत देशभर में प्रचुर मात्रा में होती थी। चीनी गन्ने से तैयार की जाती थी, जो लाहौर से आगरा तक के समस्त क्षेत्र में तथा बंगाल, अजमेर एवं मालवा तक विस्तृत बहुत बड़े क्षेत्र में पैदा किया जाता था। उत्तम प्रकार की चीनी लाहौर, दिल्ली, बियाना, कालपी, पटना तथा आगरा में बनाई जाती थी। पटना में बनने वाली चीनी बंगाल को निर्यात की जाती थी।

मिट्टी के खिलौने एवं बर्तन उद्योग

मुगल काल में मिट्टी के बर्तन बनाने का काम पूरे देश में होता था। बुरहानपुर, वैलोर, कुम्भाकोनम तथा महरई चमकीले बर्तनों के लिए प्रसिद्ध थे। मिट्टी के बर्तनों पर चमकीले कलात्मक तथा शोभायुक्त डिजाइन बनाते थे। दिल्ली, लखनऊ और काश्मीर इस उद्योग के मुख्य केन्द्र थे।

इस प्रकार मिट्टी के बर्तन बनाने का उद्योग देशभर में व्याप्त था किंतु मिट्टी की मूर्तियाँ एवं खिलौने बनाने का उद्योग मुगल काल में लगभग बंद हो गया। इसका मुख्य कारण इस्लाम का प्रसार था जिसमें आदमी तथा जानवरों के बुत एवं चित्र बनाने का निषेध था। फिर भी केन्द्रीय एवं प्रांतीय राजधानी से दूर स्थित ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों के खिलौने बनाने का काम होता रहा।

कृषि आधारित उद्योग

मुगलकाल में विभिन्न कृषि उत्पादनों- नारियल, गिंगली, तिल तथा अरण्डी के बीज से तेल निकालने के उद्योग विकसित अवस्था में थे। खुशबूदार तेल, इत्र, मसाले, दवायें, शरबत आदि भी बनते थे। नूरजहाँ ने इत्र एवं खुशबूदार तेल बनाने के क्षेत्र में कई नये प्रयोग किये। मूंझ की रस्सी बनाकर उससे चारपाइयां एवं चटाइयां बुनी जाती थीं। सिरकियों से चटाइयां एवं टट्टियां बनाई जाती थीं। खस की टट्टियां भी बड़े पैमाने पर बनती थीं।

विविध उद्योग

मुगल काल में पत्थर पर नक्काशी करने, कांच की बोतलें बनाने तथा जालीदार झरोखे एवं खिड़कियां तैयार करने के काम बड़े स्तर पर होते थे जो बादशाहों एवं अमीरों के मकानों में काम आते थे। काश्मीर लकड़ी के विभिन्न उत्पादों के लिये प्रसिद्ध था। बेंत एवं बाँस से टोकरी, चटाई, छतें तथा झौंपड़ी बनाने तथा सजाने का काम होता था।

बंगाल तथा उड़ीसा में लाख पैदा होता था। इससे स्त्रियों के कंगन, कड़े तथा बच्चों के खिलौने बनाये जाते थे। इसका मुख्य उद्योग गुजरात में था। हाथी दाँत का काम करने वाले जड़ाऊ तथा अन्य प्रकार की वस्तुएँ बनाने में बड़े निपुण थे। इनमें कड़े, कंगन, शतरंज के पट्टे तथा शतरंज के मोहरे मुख्य थे।

दिल्ली तथा पूर्वाेत्तर मुल्तान इस कार्य के लिए प्रसिद्ध थे। देश के विभिन्न भागों में विविध प्रकार के आभूषण बनाने एवं उन पर मीनाकरी तथा पच्चीकारी करने का काम बड़े पैमाने पर होता था। विदेशी यात्री नूनीज ने 1509 ई. से 1529 ई. के बीच विजयनगर का भ्रमण किया था। उसने लिखा है कि भारत में हाथी दाँत के गुटके बनाये जाते थे जिन पर सोने की पच्चीकारी की जाती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – मुगलकालीन अर्थव्यवस्था

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख तत्त्व

मुगलकालीन प्रौद्योगिकी एवं उद्योग

मुगलकालीन व्यापार तथा वाणिज्य

मुगलकालीन व्यापार तथा वाणिज्य

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मुगलकालीन व्यापार तथा वाणिज्य

मुगलकालीन व्यापार तथा वाणिज्य वैदेशिक एवं अन्तर-प्रादेशिक दोनों ही स्तरों पर उन्नत अवस्था में था। व्यापार पर लगने वाले कर से मुगलों को अच्छी आय होती थी, इसलिए व्यापारियों को तंग नहीं किया जाता था।

मुगल काल में आन्तरिक एवं बाह्य, दोनों प्रकार का व्यापार उन्नति पर था। पुरातन समय से ही भारत के बाह्य देशों के साथ वाणिज्यिक सम्बन्ध थे। देश की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के पश्चात् जो सामग्री शेष बचती थी, उसका बाह्य देशों में निर्यात कर दिया जाता था।

यातायात एवं परिवहन की समस्या व्यापारियों तथा सामान ले जाने वाले साधनों से पूर्ण होती थी। देश में व्यापार के लिए अनेक सड़कें तथा रास्ते थे, जो सरकार द्वारा सुरक्षित रखे जाते थे। इन सड़कों से युद्ध के समय विशाल सेनाएँ गुजरती थीं। उस समय भाप के जहाज के अभाव के कारण समुद्री व्यापार खतरनाक था, फिर भी व्यापारी तथा विदेशी सौदागर माल बाहर ले जाते थे।

मुगलकालीन व्यापार तथा वाणिज्य

विदेशी व्यापार

सल्तनतकाल में भारत का व्यापार प्रशान्त महासागर और भू-मध्यसागर के देशों तक फैला हुआ था। अरबी यात्री भारत के माल को इन देशों में ले जाकर बेचते थे और वहाँ से सोना, रत्न, मोती, खजूर, घोड़े आदि विविध सामान भारत में लाते थे। मुल्तान और काश्मीर के रास्ते एशियाई देशों के साथ थल मार्ग से व्यापार होता था। लाहौर, मुल्तान, लाहरीबन्दर (सिन्ध में), कैम्बे, पटना, आगरा आदि में बड़े बाजार थे जहाँ विदेशों से वस्तुएँ आती थीं और देश के विभिन्न भागों में भेजी जाती थीं।

विदेशी व्यापार दो मार्गों से होता था- (1) समुद्री मार्ग तथा (2) स्थल मार्ग द्वारा। विदेशी व्यापारी नील, शोरा तथा बुने हुए वस्त्रों के बदले सौंदर्य एवं प्रसाधन सामग्री भारत लाते थे। इस सामग्री को गुजरात, दिल्ली, आगरा, राजस्थान तथा मालवा के बाजारों में बेचा जाता था।

समुद्री व्यापार

अधिकतर समुद्री व्यापार ‘अफ्रीकी’ व्यापारियों के हाथ में था। कुछ सीमा तक इस व्यापार पर उनका एकाधिकार था। भारत को पश्चिमी देशों के साथ मिलाने वाले दो मुख्य सीधे समुद्री मार्ग थे- एक तो फारस की खाड़ी वाला तथा दूसरा लाल समुद्र वाला।

लाल समुद्री मार्ग खतरनाक चट्टानों, पथरीले मार्गों एवं कोहरा आदि बाधाओं के कारण दुष्कर था। अतः नाविक तथा सौदागर फारस की खाड़ी वाले मार्ग को अधिक पसन्द करते थे। यह मार्ग ईराक में बगदाद से चीन में कैण्टन तक जाता था।

अरब यात्री इब्नबतूता (1333-1346 ई.) को अदन में हिन्दू सौदागरों के बहुत से जहाज मिले। उनमें कैम्बे, किलन तथा कालीकट आदि कई बन्दरगाहों से माल लाया गया था। वहाँ से भारतीय माल अफ्रीका के समुद्री तट दमिश्क और सिकंदरिया तथा यूरोप के विभिन्न देशों को ले जाया जाता था। इन बन्दरगाहों से भारतीय माल चीन, लंका, इण्डोनेशिया तथा भारतीय टापुओं को जाता था।

मुगल काल में भारत में अनेक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह थे जहाँ विश्व के विभिन्न भागों से बड़ी संख्या में व्यापारी आते थे। पश्चिमी सीमा में लहारीबन्दर, गुजरात में कैंबे, गोआ और कोचीन तथा पूर्वी तटीय मछलीपट्टम, पुलीकट तथा नजरकटन एवं बंगाल में हुगली, सतगाँव, श्रीपुरा तथा चटगाँव आदि बंदरगाह उल्लेखनीय थे।

अरब तथा फारस के जहाज खजूर, फल, घोड़ों, समुद्री मोतियों तथा रत्नों को लेकर भारत आते थे और उनके बदले में गुड़, चीनी, मक्खन, जैतून के फल, नारियल तथा कपड़े ले जाते थे। विविध प्रकार की धातुओं से बने बर्तन और विभिन्न प्रकार की विलास की वस्तुएँ भी भारत से निर्यात की जाती थीं।

अफगानिस्तान, फारस तथा मध्य एशिया के साथ मुल्तान, कोटा तथा खैबर दर्रे के रास्ते से स्थल मार्ग व्यापार के अतिरिक्त माल कारोमण्डल, समुद्री तट के रास्ते से फारस ले जाया जाता था।

मुगल काल में भारतीय निर्यात की मुख्य वस्तुएँ, सूती कपड़ा, अनाज, तेल के बीज, ज्वार, चीनी, चावल, नील, सुगंधित पदार्थ, सुगन्धित लकड़ी तथा पौधे, कर्पूर, लवंग, नारियल, विभिन्न जानवरों की खालें, गेंडे तथा चीते की खाल, चंदन की लकड़ी, अफीम, काली मिर्च तथा लहसुन थे।

विदेशों में भारतीय कपास से बने कपड़ों की बड़ी माँग थी। यह माँग जावा, सुमात्रा, बोड़ा, मलाया, बोर्नियो, अकनि, पेगु, स्याम, बेटम आदि पूर्वी देशों तक ही सीमित नहीं थी, अपितु पश्चिमी देशों में भी भारतीय सूती कपड़े की पर्याप्त माँग थी।

वर्थया ने भारत भ्रमण (1503-1508 ई.) के विवरण में लिखा है कि गुजरात की कैम्बे तथा बंगाल की बंगला दो बंदरगाह समस्त फारस, तातार, तुर्की, सीरिया, बर्बरी अर्थात् अफ्रीका, अरब, फेलिक्स, इथोपिया तथा भारत के समुद्रों के अनेक टापुओं को रूई तथा सिल्क के विभिन्न प्रकार के सामान भेजते थे। उसने कैम्बे से हर वर्ष जाने वाले पृथक्-पृथक देशों के तीन जहाजों का उल्लेख किया है।

अनुमान है कि बंगाल से रूई तथा रेशम के 50 जहाज निर्यात होते थे। बिहार तथा मालवा में अफीम की पैदावार होती थी जो राजपूताना, बरार तथा खानदेशों को भेजी जाती थी। यहाँ से वह अफीम पेगु (लोअर बर्मा), जावा, चीन, मलाया, फारस एवं अरब देशों को भेजी जाती थी।

भारत में मुगल काल में सोने तथा चाँदी की खानें नहीं थीं इसलिये ये धातुएं विदेशों से आयात की जाती थीं। इन धातुओं को भारत से बाहर भेजे जाने पर रोक थी। विदेशी व्यापारी सोना तथा चाँदी लेकर आते थे और उसके बदले में बहुत सी वस्तुएँ ले जाते थे। सोना मुख्यतः चीन, जापान, मलक्का, तथा अन्य समीपवर्ती देशों से, मूँगा पेगु से तथा मोती और विभिन्न प्रकार के रत्न फारस तथा अरब से आते थे।

स्थलीय व्यापार

मुगलों के शासन काल में थल मार्ग से सीमांत देशों के साथ होने वाले व्यापार में अभूतपूर्व प्रगति हुई। बाबर के अनुसार भारत और काबुल के बीच सफल व्यापार होता था। भारत, अपने सीमांत देशों, मध्य एशियाई देशों और अफगानिस्तान से सूखे मेवे, ताजे फल, अम्बर हींग, खुरखुरे लाल पत्थर आदि का आयात करता था तथा इसके बदले में कपड़े, कम्बल, चीनी, नील, औषधि सम्बन्धी जड़ी-बूटी आदि का निर्यात करता था।

हिमालय के राज्यों तथा तिब्बत से कस्तूरी, चीनी लकड़ी, खेतचीनी, अमीरा (आँखों की एक मूल औषधि), जेद, बढ़िया ऊन, सोना, ताँबा, सीसा, तिब्बती गाय की दुम, शहद, सोहागा, मोम, ऊनी सामान तथा बाज पक्षी से लदे हुए काफिले भारत आते थे।

नेपाल से भारत को पशु तथा सींग, कस्तूरी, सोहागा, चिरैता (औषधि  की जड़ी-बूटी), मजीह (रंग), इलायची, चौरीस (तिब्बती गाय की दुम), महीन रोयें, बाज पक्षी तथा बालचर (सुगंधित घास) आते थे। इनके बदले में तैयार वस्त्र, नमक, धातु, चीनी, मसाले आदि नेपाल को जाते थे।

भूटान से भारत को कस्तूरी तथा तिब्बती गाय की दुम आते थे। पुर्तगाली डाकुओं के कारण पेगु के साथ भारत का व्यापार बहुत सफल नहीं था। पेगु को भारत में बुने हुए कपड़े के थान, सूत तथा अफीम का निर्यात होता था। इसके बदले में सोने, चाँदी तथा मूल्यवान पत्थर भारत आते थे। 

खुरासानी व्यापारी तुर्की गुलामों और सुस्त्री नामक कपड़े का व्यापार करते थे। बाबर और हुमायूँ के काल में इस व्यापार की काफी उन्नति हुई। तुर्किस्तान में रहने वाले अजाक लोग भारत को निर्यात करने के लिए घोड़े पालते थे। 6,000 अथवा इससे अधिक के झुण्डों में घोड़े भारत भेजे जाते थे। अरब यात्री इब्नबतूता ने वर्णन किया है कि हीरमुज, अदन, क्रीमिया तथा अजाक से अच्छी नस्ल के घोड़े भारत को भेजे जाते थे। इन घोड़ों को सिंध तथा मुल्तान दोनों स्थानों में पाला जाता था।

व्यापार सन्तुलन

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि व्यापार का सन्तुलन भारत के पक्ष में था। विभिन्न देशों के व्यापारी भारतीय बन्दरगाहों पर आते थे तथा उपयोगी वस्तुएँ, जड़ी-बूटियाँ और गोंद के बदले में सोना तथा रेशम देते थे। यह क्रम मौर्यों के समय से चल रहा था जो कि मुगलों के समय में भी चलता रहा। इसीलिए भारत में सोने और चाँदी का विपुल भण्डार हो गया। इसी विपुल सम्पदा के कारण विदेशी आक्रान्ता भारत की ओर आकर्षित होते थे।

विदेशी तथा भारतीय व्यापारी

आन्तरिक व्यापार

भारत के समुद्री व्यापार में अरब तथा तुर्की के व्यापारी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। खुरासानी व्यापारी चीन, फारस, अरब तथा भूमध्य स्थित देशों एवं भारत के साथ थल व्यापार में बड़े सक्रिय थे। उत्तर भारत के मुल्तानी, गुजराती, बनिये, राजपूताना, मध्य भारत तथा गुजरात के बंजारे आदि ऐसे व्यापारी थे जो दूर देशों के साथ व्यापार करते थे।

उनमें से कइयों के पास अपने बड़े जहाज थे। इटली के यात्री निकोलो कोंटी (1419-1444 ई.) का कहना है कि इन व्यापारियों में से एक व्यापारी इतना धनाढ्य था कि उसके पास अपना माल ढोने के 40 जहाज थे। भारतीय व्यापारी अधिकतर व्यापार पूर्वी अफ्रीका, लाल समुद्री बन्दरगाहों, फारस की खाड़ी के देशों तथा दक्षिणी पूर्वी एशिया के भागों, विशेषकर सुमात्रा तक करते थे।

दिल्ली सल्तनत के सुल्तान तथा उनके उत्तरवर्ती मुगल विदेशी व्यापार के हक में नहीं थे। इन मुसलमान शासकों ने भारतीय व्यापारियों के हितों की रक्षा भी नहीं की। 1547 ई. में एक समझौते के द्वारा विजयनगर का समुद्री व्यापार पुर्तगालियों के कारण सुरक्षित नहीं था। भारतीय व्यापारियों को अपनी सुरक्षा की व्यवस्था स्वयं करनी पड़ती थी।

भारत के विदेशी व्यापार में वृद्धि के लिये विदेशी व्यापारी ही मुख्य रूप से उत्तरदायी थे। जब वास्को-डी-गामा ने 1498 ई. में अन्तरीप द्वीपसमूह का मार्ग ज्ञात किया था, उसके बाद लगभग एक शताब्दी तक भारतीय समुद्री व्यापार पर पुर्तगालियों का एकाधिकार रहा।

पुलीकट, कासिम बाजार, पटना, बेलसर, नाजपट्टम तथा कोचीन में उनके मुख्य कारखाने थे। अरब वाले, जो पहले इस व्यापार में बहुत भाग लेते थे, अब भारत के साथ होने वाले समुद्री व्यापार से लगभग पूरी तरह हटा दिये गये।

विदेशी यात्रियों के वर्णनों में तथा समकालीन भारतीय साहित्य में भारत के आन्तरिक व्यापार की जानकारी मिलती है। प्रत्येक नगर में एक बाजार होता था। नियत अंतरालों पर समीपवर्ती गाँवों तथा कस्बों से पर्याप्त लोग तथा व्यापारी इन बाजारों में आते थे और खूब व्यापार होता था।

फेरी लगाकर माल बेचने वाले तथा अन्य प्रकार के व्यापारी बहुत थे जो उपभोक्ताओं की जरूरतें पूरी करते थे। राजपूताने के बनजारे हर प्रकार की चीजें जैसे अनाज, चीनी, मक्खन तथा नमक बैलगाड़ियों पर लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते थे। कई बार ये काफिले 40,000 बैलों के हो जाते थे। अन्य व्यापारी भी समूहों में विचरण करते थे। वे मुल्तान, लाहौर और दिल्ली जैसी बड़ी राजधानियों के बाजारों से व्यापार करते थे।

उत्तर भारत में व्यापार गुजरातियों तथा मारवाड़ी बनियों के द्वारा एवं दक्षिण में चेतियों के द्वारा होता था। कुछ चलती-फिरती दुकानें होती थीं, जो घोड़े की पीठ पर लगाई जाती थीं। महत्त्वपूर्ण वस्तुओं का व्यापार नगर की मंडियों में होता था। बड़े पैमाने का व्यापार कुछ विशेष वर्ग तक सीमित था। भारत के महत्त्वपूर्ण व्यापारी गुजराती और मुल्तानी थे। विदेशों से आने वाले मुसलमान व्यापारियों को खुरासानी कहा जाता था। ये देश के समस्त भागों में व्यापार करते थे। बड़े-बड़े उद्योगों पर दलालों का दबदबा था।

परिवहन के साधन

मुगल काल में परिवहन के दो प्रमुख साधन थे। व्यापारिक माल प्रायः सड़कों से ले जाया जाता था। उस काल की सड़कें कच्चे मार्ग से अधिक नहीं होती थीं जिनके दोनों ओर छायादार पेड़ होते थे। यात्रियों की सुविधा के लिए स्थान-स्थान पर सराय तथा विश्रामगृह बनाये जाते थे तथा पशुओं के लिए पेयजल की व्यवस्था की जाती थी।

यात्रियों को मार्ग दिखाने की सुविधा के लिए छोटी-छोटी अटारी अथवा मीनारें बनी हुई थीं। राजपूताने के भाट भी खतरनाक सड़कों पर काफिलों का मार्गदर्शन तथा सुरक्षा करते थे और उनसे पारिश्रमिक लेते थे। व्यापारिक माल के परिवहन का दूसरा माध्यम नदी थी, जो अपेक्षाकृत सस्ता था।

आगरा से मुल्तान के लिए गाड़ी भाड़ा दो रुपये प्रति मन था, जबकि मुल्तान से सिंध का नाव का भाड़ा डेढ़ रुपये प्रति मन था। काश्मीर, बंगाल, सिंध तथा पंजाब में अधिकांश माल नदी मार्ग से ले जाया जाता था। लगभग समस्त बड़ी नदियों, विशेषकर गंगा, यमुना तथा झेलम से पर्याप्त परिवहन होता था।

राल्फ फिच (1513-31 ई.) ने 180 नावों के बेड़े में आगरा से बंगाल तक की यात्रा की थी। थट्टा से लाहौर तक जाने में 6-7 सप्ताह का समय लगता था, जबकि वापसी यात्रा में केवल 18 दिन लगते थे।

आन्तरिक व्यापार पर अधिकारियों द्वारा स्थान-स्थान पर चुँगी ली जाती थी, उनके विभिन्न नाम- तमगा अथवा जाकट आदि होते थे। चुँगी के अतिरिक्त समस्त बड़े बाजारों तथा बन्दरगाहों पर भी लगभग ढाई प्रतिशत शुल्क देना पड़ता था। व्यापार को प्रभावित करने वाला दूसरा पहलू सड़कों पर सुरक्षा की व्यवस्था थी।

मुगल बादशाहों ने सड़कों को सुरक्षित बनाने के लिये कई उपाय किये और डाकू तथा लुटेरों को कठोर दण्ड देने की व्यवस्था की परन्तु व्यापारियों में फिर भी भय बना रहता था। इस कारण वे काफिलों में शस्त्रों एवं रक्षकों सहित यात्रा करते थे।

अन्तर-प्रादेशिक व्यापार

मौर्य काल से ही भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच अन्तर-प्रादेशिक व्यापार होता आया था। मुगल काल में भी यह व्यापार थोड़ी बहुत बाधाओं के साथ चलता रहा।

बंगाल

मुगल काल में बंगाल से चावल, चीनी तथा मक्खन आदि खाद्य सामग्री, समुद्री मार्ग से कोरोमंडल, केपकामरिन होते हुए कराची तक भेजी जाती थी। बंगाल से गुजरात को चीनी तथा दक्षिण भारत को गेहूँ भेजा जाता था।

बिहार

मुगल काल में पटना एक प्रसिद्ध व्यापारिक नगर था। पटना से देश के विभिन्न भागों को चावल और रेशम भेजा जाता था जिसके बदले में पटना को देश के विभिन्न भागों से गेहॅँू, चीनी तथा अफीम प्राप्त होती थी।

आगरा

आगरा विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के आयात एवं निर्यात के लिए प्रसिद्ध केन्द्र था। यह बंगाल और पटना से कच्ची सिल्क तथा चीनी और पूर्वी सूबों से चावल, गेहूँ तथा मक्खन का आयात करता था। आगरा, देश तथा विदेशों में उत्तम प्रकार के नीले रंग के लिए बहुत प्रसिद्ध था। इसके समीपवर्ती क्षेत्रों, जैसे- हिंदुआन, बयाना, पंचूना, बिसौर तथा खानवा में गेहूँ की उपज होती थी। यहाँ से गेहूँ भारत के समस्त बन्दरगाहों तथा विदेशों को भेजा जाता था।

यूरोपीय यात्री राल्फ फिच ने लिखा है- ‘आगरा एक विशाल नगर है। यह लन्दन से भी बड़ा और घना बसा हुआ है। इसके बाजार व्यापारियों से परिपूर्ण रहते हैं।’

लाहौर तथा मुल्तान

उत्तर-पश्चिमी भारत का सबसे बड़ा नगर लाहौर था। उसके बाद मुलतान का नम्बर आता था। काबुल, कांधार तथा फारस से होने वाला समस्त व्यापार मुल्तान तथा लाहौर से होकर होता था। इस कारण मुल्तान और लाहौर व्यापार के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गये थे। मुल्तान चीनी, अफीम, सूती माल, गंधक तथा ऊँटों के लिए प्रसिद्ध था। लाहौर दरियों के लिए प्रसिद्ध था।

फादर माँन्सेरेट ने लाहौर का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘सम्पन्नता, जनसंख्या और क्षेत्रफल की दृष्टि से लाहौर, एशिया अथवा यूरोप के किसी नगर की तुलना में बड़ा है, जहाँ के बाजारों में सम्पूर्ण एशिया के व्यापारियों की भीड़ रहती है। इसकी आबादी इतनी अधिक है कि इसकी गलियों में लोग एक-दूसरे से भिड़ते हुए चलते हैं।’

एडवर्ड टैरी ने लिखा है- ‘लाहौर पंजाब का मुख्य नगर है। यह बहुत विशाल है जो व्यक्तियों एवं सामग्रियों से परिपूर्ण है। यह भारत में सबसे बड़ा और प्रसिद्ध व्यापारिक नगर है।’

गुजरात

गुजरात मुगल काल में भी वाणिज्य का बड़ा केन्द्र बना रहा। प्राकृतिक संसाधनों तथा वाणिज्य ने इसे भारत का धनी सूबा बना दिया। यह कपड़े की बुनाई का बड़ा केन्द्र था। गुजरात में तैयार किये गये कपड़ों के थान गुजरात के मुख्य बन्दरगाह कैंबे द्वारा दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत के दूसरे भागों, विशेषकर आगरा को भेजे जाते थे।

गुजरात में मालवा और अजमेर से गेहूँ तथा दक्षिणी राज्यों एवं मलाबार से चावल मँगवाया जाता था। गुजरात से आगरा तथा केरल को रूई तथा सूत्री वस्त्र और थट्टा को तम्बाकू भेजा जाता था। गुजरात के प्रमुख नगर कैंबे के बारे में बारबोसा ने लिखा है- ‘यह एक बड़ा और भव्य नगर है जिसमें अधिक व्यापारी और पूँजीपति लोग रहते हैं- दोनों हिन्दू और मुसलमान।यहाँ नाना प्रकार के यन्त्र सम्बन्धी निपुण शिल्पकार हैं।’

कैंबे गुजरात का प्रसिद्ध बन्दरगाह भी था, जहाँ से समुद्री व्यापार होता था। गुजरात में बने हुए कपड़े का निर्यात इसी बन्दरगाह से होता था। अहमदाबाद भी गुजरात का एक अन्य प्रसिद्ध नगर था।

बीदर

बीदर, जो लगभग एक शताब्दी तक बहमनी राज्य की राजधानी था, आंतरिक व्यापार का महत्त्वपूर्ण बाजार था। यह बाजार बूँटेदार कपड़े तथा सोने और रत्न जड़ित आभूषणों के लिए प्रसिद्ध थे। बीदर का बूँटेदार कपड़ा बिदरी वेयर के नाम से प्रसिद्ध था। जो ताँबे, सीस तथा रांगे का सम्मिश्रण होता था तथा सोने तथा आभूषणों से जड़ित होता था।

सिंध

मुगलकाल में सिंध से गेहूँ, जौ, सूती कपड़े तथा घोड़े, भारत के विभिन्न भागों में भेजे जाते थे। इनके बदले में भारत के विभिन्न भागों से सिंध को चावल, चीनी, गन्ना, इमारती लकड़ी तथा मसाले भेजे जाते थे। सिंध में काश्मीर, गुजरात, रावलपिंडी तथा लद्दाख से नमक मंगवाया जाता था तथा भारत के विभिन्न भागों से अच्छे चावल, चौड़े वस्त्र, गेहूँ, दवाएँ, चीनी, आम, लोहा, ताँबा, पीतल के बर्तन, शीशे का सामान, सोना, चाँदी तथा विलास की सामग्रियाँ भी मँगवाये जाते थे। सिंध से आगरा तथा अन्य स्थानों को शॉल, ऊन तथा शोरा निर्यात किया जाता था।

केरल एवं मलाबार

केरल काली मिर्चों का निर्यात करता था तथा उसके बदले में अफीम का आयात करता था। पुलीकट का छपा हुआ कपड़ा बहुत बढ़िया होता था जो गुजरात तथा मलाबार तट को भेजा जाता था। गुजरात तथा मलाबार के बीच काफी व्यापार होता था। विजयनगर मलाबार से नारियल, इलायची तथा अन्य मसाले, कीमती पत्थर, मोम तथा लोहा, खजूर तथा चीनी का आयात करता था।

कोरोमण्डल तथा विजयनगर

दक्षिण में विजयनगर प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र था। कारोमण्डल तथा विजयनगर का तटवर्ती व्यापार मलाबार के व्यापारी चलाते थे। यहाँ आयात की जाने वाली चीजों में रंगीन कपड़े, धातु, गुलाबजल, अफीम, चंदन की लकड़ी, मूंगा , पारा, केसर, कपूर, सिन्दूर, कस्तूरी, सुपारी, नारियल, काली मिर्च, खजूर, चीनी, कैंबे का कपड़ा तथा घोड़े सम्मिलित थे। यहाँ से चावल और कपड़े का निर्यात होता था।

15वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भटकल के दक्षिणी बन्दरगाह तथा विजयनगर में बहुमूल्य पत्थर की बड़ी मांग थी, वह दक्षिणी राज्यों से हीरे, और भुज तथा कायल से मोती, पेगु और लंका से दूसरे महँगे पत्थरों का आयात करता था। विजयनगर के व्यापारी पुलीकट से बर्मी लाल रत्न तथा कस्तूरी लाते थे। विजयनगर में मलाबार से काली मिर्च मँगवाई जाती थी।

वाणिज्य एवं व्यापार के अन्य प्रमुख केन्द्र

मुगल काल में अजमेर, राजपूताने का प्रसिद्ध नगर था। यहाँ से मलाबार तथा अन्य स्थानों को गेहूँ भेजा जाता था। इनके अलावा जौनपुर, बुरहानपुर, लखनऊ, खैराबाद आदि भी प्रसिद्ध व्यापारिक नगरीय केन्द्र थे। दक्षिण भारत में गोलकुण्डा एक महत्त्वपूर्ण वाणिज्यिक नगर था जिसका गोआ, मछलीपट्टम और सूरत के बन्दरगाहों से सीधा सम्पर्क था।

निष्कर्ष

मुगलकालीन भारत में अन्तर्राज्यीय और अन्तर्राष्ट्रीय दोनों प्रकार के व्यापार उन्नत अवस्था में थे। स्थल और जलमार्ग द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक सामान जाता करता था। ह्नेनसांग ने भी अपने यात्रा-वर्णन में लिखा है कि सड़कों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक सामाना आया-जाया करता था। स्वयं ह्नेनसांग ने एक व्यापारिक जहाज से यात्रा की थी।

उज्जैन, कन्नौज, पाटलिपुत्र (पटना), मथुरा, अयोध्या और काशी व्यापारिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण नगर थे। मध्य एशिया, चीन, अरब और तिब्बत से बहुत पहले से व्यापार किया जाता था। बाह्य देशों से व्यापार थलमार्ग और सामुद्रिक मार्ग से होता था। ताम्रलिप्ति भी प्रसिद्ध बंदरगाह था जिसके विषय में ह्नेनसांग ने लिखा है कि इस बंदरगाह में व्यापार की वस्तुएँ एकत्रित रहती थीं।

इस काल में उद्योग काफी विकसित थे। इन उद्योगों द्वारा उत्पादित माल विदेशों को निर्यात होता था। यहाँ से निर्यात होने वाली प्रमुख वस्तुओं में चन्दन की लकड़ी, नारियल, चीनी, कपड़ा, मलमल, हाथी-दाँत, मोती और बहुमूल्य पत्थर आदि थे। यहाँ आयात की जाने वाली वस्तुओं में शराब, घोड़े, खजूर, पोस्तीन, मूँगा और रेशमी कपड़े होते थे। इस प्रकार देश की आर्थिक स्थिति अत्यन्त सुड़ौल एवं विकसित थी।

इस अध्याय में भारत के अन्तर्प्रादेशिक आंतरिक व्यापार का अत्यंत संक्षिप्त वर्णन किया गया है। विस्तृत वर्णन करना सम्भव नहीं है, क्योंकि देश के विभिन्न भागों के बीच विशेषकर प्रांतीय राजधानियों एवं विभिन्न राज्यों की राजधानियों के बीच बहुत बड़े पैमाने पर व्यापार होता था। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – मुगलकालीन अर्थव्यवस्था

मुगलकालीन अर्थव्यवस्था के प्रमुख तत्त्व

मुगलकालीन प्रौद्योगिकी एवं उद्योग

मुगलकालीन व्यापार तथा वाणिज्य

सरदार पटेल : प्रेरक एवं रोचक प्रसंग – प्राक्कथन

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गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी नर्मदा नदी में एक टापू पर सरदार पटेल की 182 मीटर ऊँची तथा भव्य मूर्ति लगाई गई है जिसे स्टैच्यू ऑफ यूनिटी नाम दिया गया है। यह विश्व की सबसे ऊँची मूर्ति है।

यह पांच वर्ष में बनकर तैयार हुई। इस पर लगभग 2500 करोड़ रुपये की लागत आई। इस मूर्ति के लिये देश के हर गांव से किसानों और मजदूरों से लोहा एकत्रित किया गया। पटेल की 137वीं जयंती के अवसर पर 31 अक्टूबर 2013 को इस स्मारक का शिलान्यास किया गया। 31 अक्टूबर 2018 को इस मूर्ति का प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अनावरण किया गया। स्मारक परिसर में एक संग्रहालय भी बनाया गया है।

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इस विशाल राष्ट्रव्यापी आयोजन से देश के 140 करोड़ लोगों तक सरदार पटेल द्वारा राष्ट्र को दिये गये अवदान की जानकारी भी नये सिरे से पहुंचेगी जो देशवासियों में राष्ट्रीयता की भावना को सुदृढ़ करेगी। पटेल का व्यक्तित्व ऐसा ही था जिसका आकर्षण न केवल उस समय के ब्रिटिश शासकों, भारतीय नेताओं और देशवासियों के सिर चढ़कर बोलता था अपितु आज भी देशवासियों के दिलों की धड़कनें बढ़ा देता है। आने वाले अनेक युगों तक पटेल, देशवासियों के लिये श्रद्धा और आदर का पात्र बने रहेंगे।

वे गुजरात के एक छोटे से गांव में जन्मे और उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति से लोहा लेकर देश को आजादी दिलवाने में अग्रणी भूमिका निभाई। देश की आजादी में भूमिका निभाने वाले और भी सैंकड़ों नेता थे किंतु सरदार पटेल ने स्वातंत्र्य समर में प्रखर राष्ट्रवाद का जो अनोखा तत्व घोला, वैसा तत्व बहुत कम नेता घोल पाये। यह सही समय है जब देश के नौजवानों तक सरदार पटेल की पूरी कहानी पहुँचे। कौन थे पटेल?क्या किया था उन्होंने ?क्यों वे ऐसा कुछ कर सके जो दूसरे नेता नहीं कर सके?

कैसे उन्होंने अपने युग के बड़े नेताओं की भीड़ में स्वयं को अलग पहचान दी? कैसे हाड़-मांस से बने लोहे के सरदार ने देश की 562 रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर भारत राष्ट्र का निर्माण किया।

वे राष्ट्र के अनोखे सपूत थे, राष्ट्रहित के लिये किसी से भी टक्कर ले लेते थे और स्वहित के लिये कभी किसी से कुछ नहीं मांगते थे। उन्होंने संघर्ष, जेल और यातनाओं को अपने लिये रखा तथा स्वतंत्रता के श्रेय से लेकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक को दूसरों के लिये अर्पित कर दिया। सोने का दिल और लोहे के हाथों वाले इस अनोखे नेता की पूरी कहानी पढ़िये इस पुस्तक में।

               – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भगवान श्रीराम के वंशज थे सरदार पटेल

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सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म एक गुजराती लेवा पटेल परिवार में हुआ। लेवा स्वयं को भगवान श्रीराम के वंशज मानते हैं।

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उनके अनुसार लेवा भगवान श्रीराम के पुत्र लव के वंशज हैं। लेवा जाति पंजाब में निवास करने वाली क्षत्रिय जाति थी जो किसी समय गुजरात में आकर रहने लगी। लेवा जाति की पाटीदार शाखा से सम्बन्धित होने के कारण वल्लभभाई के पूर्वज लेवा पटेल कहलाने लगे। सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को काठियावाड़ (गुजरात) के नाडियाद कस्बे में हुआ जहाँ उनकी ननिहाल थी। सरदार का पैतृक गांव करमसद, गुजरात के खेड़ा जिले की बोरसद तहसील में था जहाँ उनके पिता झबेरभाई पटेल खेती करते थे।

गुजरात में इस वंश के लोग बड़ी संख्या में निवास करते हैं। इस जाति के लोगों ने बड़ी संख्या में 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। झबेरभाई ने भी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों से लोहा लिया। लक्ष्मीबाई के परास्त हो जाने पर इंदौर के शासक मल्हारराव होलकर के सैनिकों ने झबेरभाई को बंदी बना लिया। जब झबेरभाई को बंदी बनाकर मल्हारराव होलकर के पास ले जाया गया, उस समय मल्हारराव, शतरंज खेलने में व्यस्त था, अतः सैनिक, बंदी के साथ चुपचाप खड़े हो गये।

झबेरभाई भी चुपचाप खड़े होकर महाराजा का खेल देखने लगे। थोड़ी देर में मल्हारराव एक चाल में फंस गया और उसे अपनी हार दिखाई देने लगी।

झबेरभाई शतरंज के कुशल खिलाड़ी थे। उन्होंने मल्हारराव को एक चाल सुझाई, जिससे पासा पलट गया और मल्हारराव, हारी हुई बाजी जीत गया। उसने झबेरभाई को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।

झबेरभाई अपने गांव लौट आये और खेती करने लगे। इस परिवार के पास 10 एकड़ जमीन थी जिस पर खेती करके यह परिवार जीवन यापन करता था। इसी परिवार में वल्लभ भाई का जन्म हुआ। सार्वजनिक जीवन में प्राप्त ऊँचाइयों के कारण उन्हें सरदार की उपाधि दी गई तथा लौह पुरुष कहकर सम्बोधित किया गया।

डाॅ. मोहनलाल गुप्ता

लाड़बाई

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सरदार वल्लभ भाई पटेल के पिता का नाम झबेरभाई और माता का नाम लाड़बाई था। अपने माता-पिता की कई संतानों में से एक होने के कारण मिठाई के लिये सबसे अंत में याद किये जाते थे वल्लभभाई और विट्ठलभाई।

झबेरभाई की पहली पत्नी की मृत्यु होने पर उनका दूसरा विवाह हुआ। दूसरी पत्नी लाड़बाई उनसे आयु में 18 वर्ष छोटी थी। झबेरभाई को पहली पत्नी से कोई संतान नहीं थी किंतु दूसरी पत्नी से पांच पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ। सोमाभाई, नरसीभाई, विट्ठलभाई, वल्लभभाई, काशीभाई तथा डाहीबा।

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इस प्रकार वल्लभभाई पटेल, अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। माता लाड़बाई धार्मिक विचारों की सुघड़ एवं संस्कारवान महिला थीं। पति की कम आय में भी उन्होंने बड़ी समझदारी से गृहस्थी चलाई तथा बच्चों को प्रायः अभाव अनुभव नहीं होने दिया। माता-पिता के इन संस्कारों और वंश-परम्परा ने बच्चों के व्यक्तित्व विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया। जीवन के संघर्षों तथा माता-पिता के संसकरों के कारण, पटेल परिवार के बच्चों में परिश्रम, साहस, निडरता और अडिगता के गुण आ गये।

माता पिता को अपने दो बड़े पुत्रों सोमाभाई और नरसीभाई से बड़ी उम्मीदें थीं तथा छोटी दो संतानों काशीभाई एवं डाहीबा से बहुत स्नेह था। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी इसलिये घर में कपड़े और मिठाई आने के प्रसंग यदाकदा ही उपस्थित होते थे किंतु जब भी ऐसा होता था तो सबसे पहले दोनों छोटे बच्चों को बुलाया जाता। उसके बाद उन दो बड़े बच्चों का नम्बर आता जिनसे माता-पिता को बहुत उम्मीदें थीं।

उस काल में किसी दम्पत्ति की छः संतान होना एक सामान्य बात थी किंतु संसाधनों के अभाव के कारण पारिवारिक जीवन अत्यंत साधारण होता था। झबेर भाई का परिवार भी इसी सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि का था। बीच की संतान होने के कारण विट्ठलभाई और वल्लभभाई प्रायः सबसे बाद में याद किये जाते। काम के समय विट्ठलभाई और वल्लभभाई को सबसे पहले स्मरण किया जाता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार का आत्मिक बल

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सरदार का आत्मिक बल – जलती हुई सलाख से अपना शरीर दाग लिया वल्लभभाई ने

सरदार पटेल के व्यक्तित्व में शारीरिक बल, मानसिक बल एवं आत्मिक बल तीनों का बहुत सुंदर मिश्रण हुआ था। उनका आत्मिक बल उनके साथियों को आश्चर्यचकित कर देता था।

विट्ठलभाई और वल्लभभाई को पढ़ाई के साथ-साथ खेत पर अपने पिता के काम में भी हाथ बंटवाना पड़ता था। वहीं से वल्लभभाई को मानसिक कार्य करने के साथ-साथ शारीरिक परिश्रम करने का अभ्यास पड़ गया। स्वाध्याय एवं शारीरिक श्रम के कारण वल्लभभाई का मन और शरीर दोनों ही सुदृढ़ और सुंदर हो गये थे।

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सरदार वल्लभभाई महीने में दो दिन बिना भोजन और बिना जल लिये, व्रत करते थे ताकि उनमें शारीरिक एवं आत्मिक बल आ सके। सरदार पटेल का आत्मिक बल आजादी की लड़ाई के दौरान किए गये संघर्ष में उनके बहुत काम आया। वे कभी न तो अपने संकल्प से डिगे, न कर्म से डिगे और न उन्होंने किसी के समक्ष समर्पण किया।

एक बार वल्लभभाई के शरीर पर फोड़ा हो गया। उन दिनों में ऐसे फोड़े का उपचार, फोड़े को लोहे की गर्म सलाख से जलाकर किया जाता था। जब नाई को सलाख लगाने के लिये कहा गया तो वह बच्चे की आयु देखकर सहम गया और उसने सलाख लगाने से मना कर दिया, उस समय वल्लभभाई ने नाई के हाथ से वह सलाख लेकर स्वयं ही फोड़े को दाग दिया। वल्लभभाई की ऐसी दृढ़ संकल्प शक्ति देखकर वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति स्तम्भित रह गया। ऐसा कर पाने की हिम्मत कोई विरला ही दिखा पाता है। सरदार के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। मनुष्य में शारीरिक पीड़ा सहने की शक्ति आत्मिक बल से ही आती है।

इसी आत्मिक बल से वल्लभभाई न केवल अंग्रेज अधिकारियों का सामना कर पाते थे अपितु काश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला जैसे घाघ एवं अलगाववादी नेताओं की बोलती बंद करने में भी सक्षम थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल की हास्यप्रियता

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सरदार पटेल की हास्यप्रियता ने उनके व्यक्तित्व को निखार कर एक अलग ही ऊँचाई पर पहुंचा दिया था। कठिन परिस्थितियों से घिरे हुए एवं सफलता के शिखर पर विराजमान, दोनों ही प्रकार के व्यक्तियों के लिए हास्यप्रियता को बचाए रखना कठिन होता है।

व्यक्तित्व की गंभीरता में भी हास्यप्रियता के अंकुर जीवित रख पाना अत्यंत कठिन होता है किंतु सरदार पटेल के व्यक्तित्व में हास्यप्रियता सहज स्वाभाविक रूप से उपलब्ध थी। उनके निकटवर्ती लोगों को पता ही नहीं लग पाता था कि कठिन परिस्थितियों के बीच में भी वे कब हास्य की फुहार छोड़कर पूरे वातावरण को हल्का कर देंगे!

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हँसने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे वल्लभभाई! उन्हें बचपन से ही हंसने और विनोद करने की आदत पड़ गई। यह एक आश्चर्य ही था कि उन्हें अपने समय का सबसे सख्त व्यक्ति माना जाता था किंतु यह सख्त मिजाज का व्यक्ति मनोविनोद का कोई भी अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देता था। उनके इस विरोधाभासी स्वभाव को उनके ही दो वक्तव्यों में देखा जा सकता है। एक स्थान पर उन्होंने कहा- ‘आपकी अच्छाई आपके मार्ग में बाधक है, इसलिये अपनी आंखों को क्रोध से लाल होने दीजिये और अन्याय का मजबूत हाथों से सामना कीजिये।

‘ एक अन्य स्थान पर वल्लभभाई कहते हैं- ‘यदि हम हजारों की दौलत भी गंवा दें और हमारा जीवन बलिदान हो जाए, तो भी हमें मुस्कुराते रहना चाहिये और ईश्वर तथा सत्य में विश्वास रखकर प्रसन्न रहना चाहिये।’ सरदार अक्सर कहते थे कि बेशक कर्म पूजा है किंतु हास्य जीवन है जो कोई भी अपना जीवन बहुत गंभीरता से लेता है, उसे एक तुच्छ जीवन के लिये तैयार रहना चाहिये। जो कोई सुख और दुःख का समान रूप से स्वागत करता है, वास्तव में वही सबसे अच्छी तरह से जीता है।

अपने व्यक्तित्व में गंभीरता एवं हास्यप्रियता के समुचित मिश्रण के बल पर ही सरदार पटेल ने न केवल कोनार्ड कोरफील्ड जैसे षड़यंत्रकारी अंग्रेज अधिकारियों को हवाई जहाज में बैठाकर इंग्लैण्ड भेजा दिया अपितु भारत के 565 राजाओं के राज्य भारत में सम्मिलित करवा लिए।

अपने व्यक्तित्व की विराटता के बल पर ही उन्होंने इंग्लैण्ड की संसद में विपक्ष के नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल तक को फटकार लगाकर उसकी बोलती बंद कर दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल का स्वाभिमान

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सरदार पटेल का स्वाभिमान – किसी से भी विरोध हो जाने की चिंता नहीं करते थे वल्लभभाई

सरदार पटेल का स्वाभिमान बचपन से ही उच्च स्तर पर था। वे न तो बाल्यकाल में किसी से डरे, न अपने कैरियर में किसी से दबे और न आजादी की लड़ाई के दौरान किसी पुलिस अधिकारी अथवा जेलर से भयभीत हुए।

सरदार वल्लभभाई पटेल की स्कूली शिक्षा अपने गांव की पाठशाला में हुई। स्कूल की शिक्षा से संतुष्ट नहीं होने के कारण पटेल अपने घर पर पुस्तकें लाकर स्वाध्याय करने लगे। उनका स्वाध्याय इस उच्च कोटि का था कि उनके द्वारा किये जाने वाले प्रश्नों को सुनकर अध्यापक विस्मित रह जाते थे। शीघ्र ही वल्लभभाई गांव के सबसे प्रतिभाशाली छात्र कहलाने लगे।

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स्कूली जीवन में भी सरदार पटेल का स्वाभिमान पूर्ण रूप से विकसित था। इस कारण अपने से बड़े विद्यार्थियों अथवा अपने शिक्षकों से भयभीत नहीं होते थे और किसी से भी विरोध हो जाने की चिंता नहीं करते थे। एक बार स्कूल में यह अनिवार्य कर दिया गया कि छात्रों को स्कूल से ही पुस्तकें खरीदनी पड़ेंगी। सरदार ने इस नियम का विरोध किया तथा छात्रों को एकत्रित करके उन्हें इस बात के लिये सहमत कर लिया कि कोई भी छात्र, स्कूल से पुस्तक नहीं खरीदेगा। इस विरोध के कारण 5-6 दिन तक स्कूल बंद रहा। अंत में स्कूल प्रबंधन ने हार मान ली और स्कूल से पुस्तकें खरीदने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई।

जब वल्लभभाई छठी कक्षा में थे तो एक अध्यापक ने एक छात्र को इतनी जोर से पीटा कि छात्र दर्द से बिलबिला गया। वल्लभभाई ने उस अध्यापक का विरोध किया। अध्यापक भी अड़ गया तो वल्लभभाई ने सारे छात्रों को एकत्रित करके हड़ताल करवा दी। इस पर प्रिंसिपल ने घटना की जांच की और अध्यापक को इस बात के लिये प्रतिबंधित किया कि वे भविष्य में किसी छात्र को इतनी जोर से नहीं पीटेंगे। इसके बाद ही स्कूल में कक्षाएं आरम्भ हो सकीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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