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सरदार का आत्मिक बल

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सरदार का आत्मिक बल – जलती हुई सलाख से अपना शरीर दाग लिया वल्लभभाई ने

सरदार पटेल के व्यक्तित्व में शारीरिक बल, मानसिक बल एवं आत्मिक बल तीनों का बहुत सुंदर मिश्रण हुआ था। उनका आत्मिक बल उनके साथियों को आश्चर्यचकित कर देता था।

विट्ठलभाई और वल्लभभाई को पढ़ाई के साथ-साथ खेत पर अपने पिता के काम में भी हाथ बंटवाना पड़ता था। वहीं से वल्लभभाई को मानसिक कार्य करने के साथ-साथ शारीरिक परिश्रम करने का अभ्यास पड़ गया। स्वाध्याय एवं शारीरिक श्रम के कारण वल्लभभाई का मन और शरीर दोनों ही सुदृढ़ और सुंदर हो गये थे।

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सरदार वल्लभभाई महीने में दो दिन बिना भोजन और बिना जल लिये, व्रत करते थे ताकि उनमें शारीरिक एवं आत्मिक बल आ सके। सरदार पटेल का आत्मिक बल आजादी की लड़ाई के दौरान किए गये संघर्ष में उनके बहुत काम आया। वे कभी न तो अपने संकल्प से डिगे, न कर्म से डिगे और न उन्होंने किसी के समक्ष समर्पण किया।

एक बार वल्लभभाई के शरीर पर फोड़ा हो गया। उन दिनों में ऐसे फोड़े का उपचार, फोड़े को लोहे की गर्म सलाख से जलाकर किया जाता था। जब नाई को सलाख लगाने के लिये कहा गया तो वह बच्चे की आयु देखकर सहम गया और उसने सलाख लगाने से मना कर दिया, उस समय वल्लभभाई ने नाई के हाथ से वह सलाख लेकर स्वयं ही फोड़े को दाग दिया। वल्लभभाई की ऐसी दृढ़ संकल्प शक्ति देखकर वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति स्तम्भित रह गया। ऐसा कर पाने की हिम्मत कोई विरला ही दिखा पाता है। सरदार के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। मनुष्य में शारीरिक पीड़ा सहने की शक्ति आत्मिक बल से ही आती है।

इसी आत्मिक बल से वल्लभभाई न केवल अंग्रेज अधिकारियों का सामना कर पाते थे अपितु काश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला जैसे घाघ एवं अलगाववादी नेताओं की बोलती बंद करने में भी सक्षम थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल की हास्यप्रियता

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सरदार पटेल की हास्यप्रियता ने उनके व्यक्तित्व को निखार कर एक अलग ही ऊँचाई पर पहुंचा दिया था। कठिन परिस्थितियों से घिरे हुए एवं सफलता के शिखर पर विराजमान, दोनों ही प्रकार के व्यक्तियों के लिए हास्यप्रियता को बचाए रखना कठिन होता है।

व्यक्तित्व की गंभीरता में भी हास्यप्रियता के अंकुर जीवित रख पाना अत्यंत कठिन होता है किंतु सरदार पटेल के व्यक्तित्व में हास्यप्रियता सहज स्वाभाविक रूप से उपलब्ध थी। उनके निकटवर्ती लोगों को पता ही नहीं लग पाता था कि कठिन परिस्थितियों के बीच में भी वे कब हास्य की फुहार छोड़कर पूरे वातावरण को हल्का कर देंगे!

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हँसने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे वल्लभभाई! उन्हें बचपन से ही हंसने और विनोद करने की आदत पड़ गई। यह एक आश्चर्य ही था कि उन्हें अपने समय का सबसे सख्त व्यक्ति माना जाता था किंतु यह सख्त मिजाज का व्यक्ति मनोविनोद का कोई भी अवसर अपने हाथ से नहीं जाने देता था। उनके इस विरोधाभासी स्वभाव को उनके ही दो वक्तव्यों में देखा जा सकता है। एक स्थान पर उन्होंने कहा- ‘आपकी अच्छाई आपके मार्ग में बाधक है, इसलिये अपनी आंखों को क्रोध से लाल होने दीजिये और अन्याय का मजबूत हाथों से सामना कीजिये।

‘ एक अन्य स्थान पर वल्लभभाई कहते हैं- ‘यदि हम हजारों की दौलत भी गंवा दें और हमारा जीवन बलिदान हो जाए, तो भी हमें मुस्कुराते रहना चाहिये और ईश्वर तथा सत्य में विश्वास रखकर प्रसन्न रहना चाहिये।’ सरदार अक्सर कहते थे कि बेशक कर्म पूजा है किंतु हास्य जीवन है जो कोई भी अपना जीवन बहुत गंभीरता से लेता है, उसे एक तुच्छ जीवन के लिये तैयार रहना चाहिये। जो कोई सुख और दुःख का समान रूप से स्वागत करता है, वास्तव में वही सबसे अच्छी तरह से जीता है।

अपने व्यक्तित्व में गंभीरता एवं हास्यप्रियता के समुचित मिश्रण के बल पर ही सरदार पटेल ने न केवल कोनार्ड कोरफील्ड जैसे षड़यंत्रकारी अंग्रेज अधिकारियों को हवाई जहाज में बैठाकर इंग्लैण्ड भेजा दिया अपितु भारत के 565 राजाओं के राज्य भारत में सम्मिलित करवा लिए।

अपने व्यक्तित्व की विराटता के बल पर ही उन्होंने इंग्लैण्ड की संसद में विपक्ष के नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल तक को फटकार लगाकर उसकी बोलती बंद कर दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल का स्वाभिमान

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सरदार पटेल का स्वाभिमान – किसी से भी विरोध हो जाने की चिंता नहीं करते थे वल्लभभाई

सरदार पटेल का स्वाभिमान बचपन से ही उच्च स्तर पर था। वे न तो बाल्यकाल में किसी से डरे, न अपने कैरियर में किसी से दबे और न आजादी की लड़ाई के दौरान किसी पुलिस अधिकारी अथवा जेलर से भयभीत हुए।

सरदार वल्लभभाई पटेल की स्कूली शिक्षा अपने गांव की पाठशाला में हुई। स्कूल की शिक्षा से संतुष्ट नहीं होने के कारण पटेल अपने घर पर पुस्तकें लाकर स्वाध्याय करने लगे। उनका स्वाध्याय इस उच्च कोटि का था कि उनके द्वारा किये जाने वाले प्रश्नों को सुनकर अध्यापक विस्मित रह जाते थे। शीघ्र ही वल्लभभाई गांव के सबसे प्रतिभाशाली छात्र कहलाने लगे।

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स्कूली जीवन में भी सरदार पटेल का स्वाभिमान पूर्ण रूप से विकसित था। इस कारण अपने से बड़े विद्यार्थियों अथवा अपने शिक्षकों से भयभीत नहीं होते थे और किसी से भी विरोध हो जाने की चिंता नहीं करते थे। एक बार स्कूल में यह अनिवार्य कर दिया गया कि छात्रों को स्कूल से ही पुस्तकें खरीदनी पड़ेंगी। सरदार ने इस नियम का विरोध किया तथा छात्रों को एकत्रित करके उन्हें इस बात के लिये सहमत कर लिया कि कोई भी छात्र, स्कूल से पुस्तक नहीं खरीदेगा। इस विरोध के कारण 5-6 दिन तक स्कूल बंद रहा। अंत में स्कूल प्रबंधन ने हार मान ली और स्कूल से पुस्तकें खरीदने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई।

जब वल्लभभाई छठी कक्षा में थे तो एक अध्यापक ने एक छात्र को इतनी जोर से पीटा कि छात्र दर्द से बिलबिला गया। वल्लभभाई ने उस अध्यापक का विरोध किया। अध्यापक भी अड़ गया तो वल्लभभाई ने सारे छात्रों को एकत्रित करके हड़ताल करवा दी। इस पर प्रिंसिपल ने घटना की जांच की और अध्यापक को इस बात के लिये प्रतिबंधित किया कि वे भविष्य में किसी छात्र को इतनी जोर से नहीं पीटेंगे। इसके बाद ही स्कूल में कक्षाएं आरम्भ हो सकीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गुजराती भाषा से प्रेम

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गुजराती भाषा से प्रेम – दो दंगाई पाड़ों ने सबको भगा दिया

सरदार पटेल को बाल्यकाल में गुजराती भाषा से प्रेम था। चूंकि वे मेधावी क्षात्र थे, इसलिए अध्यापक चाहते थे कि वल्लभ भाई संस्कृत भाषा पढ़ें किंतु वल्लभ भाई ने संस्कृत के स्थान पर गुजाराती भाषा को चुना।

मैट्रिक में विद्यार्थियों को अन्य विषयों के साथ संस्कृत अथवा गुजराती में से कोई एक भाषा एच्छिक विषय के रूप में चुननी होती थी। वल्लभभाई ने गुजराती भाषा चुन ली। गुजराती भाषा के अध्यापक पढ़ाते तो गुजराती थे किंतु संस्कृत भाषा से बड़ा लगाव रखते थे। उन्हें अच्छा नहीं लगा कि वल्लभभाई जैसा मेधावी छात्र संस्कृत न पढ़े।

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इसलिये उन्होंने नाराज होकर वल्लभभाई से पूछा कि तुमने संस्कृत क्यों नहीं ली ? वल्लभभाई ने उनकी नाराजगी को भांपकर उत्तर दिया कि यदि सारे छात्र संस्कृत लेंगे तो आप क्या पढ़ायेंगे ? इस पर शिक्षक नाराज हो गये और उन्होंने वल्लभभाई को आदेश दिया कि अपने घर से 200 तक के पाड़े (सही उच्चारण पहाड़े) लिखकर लाना। सरदार समझ गये कि उन्हें सजा मिली है। अतः वे घर से पहाड़े लिखकर नहीं लाये। अध्यापक ने पूछा कि 200 पाड़े क्यों नहीं लाये तो वल्लभभाई ने उत्तर दिया, गुरुजी घर से तो पूरे 200 पाड़े (भैंस के बच्चे) लेकर चला था किंतु दो बड़े बदमाश थे, इसलिये उन्होंने रास्ते में इतना दंगा किया कि सारे पाडे़ भाग गये, उसके बाद वो खुद भी भाग गये।

वल्लभभाई का उत्तर सुनकर अध्यापक ने प्रिंसीपल से वल्लभभाई की शिकायत की। जब प्रिंसीपल ने पूछा तो वल्लभभाई ने जवाब दिया कि ये गुजराती के अध्यापक हैं, इनका पहाड़ों से क्या सम्बन्ध है ! इस पर प्रिंसीपल को समझ में आ गया कि छात्र की गलती नहीं है, वह अध्यापक की जिद का शिकार हो गया है और उन्होंने वल्लभभाई को क्षमा कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

झबेर बा से विवाह

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अभी वल्लभभाई गांव की स्कूल में ही पढ़ रहे थे कि ई.1893 में 18 साल की आयु में उनका विवाह 13 साल की झबेर बा से हो गया। अल्पवय होने के कारण झबेर बा अपने पीहर में ही रहीं और वल्लभभाई अध्ययन में लगे रहे।

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जैसे-जैसे वल्लभभाई स्वाध्याय करते जा रहे थे, वह इस बात को समझते जा रहे थे कि यदि उन्हें जीवन में ज्ञान प्राप्त करना है तो अंग्रेजी भाषा का अध्ययन करना आवश्यक है। वे यह जानकर आश्चर्य चकित थे कि अंग्रेजी बोलने वाले अंग्रेजों का इंग्लैण्ड, बहुत छोटा सा देश है किंतु उन्होंने दुनिया में अपना राज्य इतना फैला लिया है कि उसमें कभी सूरज नहीं डूबता। इसलिये वे लंदन जाकर देखना चाहते थे कि आखिर उस देश में ऐसी क्या विशेष बात है ? करमसद के स्कूल में अंग्रेजी की पढ़ाई नहीं होती थी जबकि करमसद से 11 किलोमीटर दूर पेटलाड गांव में अंग्रेजी भाषा का अच्छा स्कूल था। सरदार ने निर्णय लिया कि अब वे करमसद में नहीं अपितु पेटलाड में पढ़ेंगे।

उन्हीं दिनों में वल्लभाई का अपने स्कूल के एक शिक्षक से विवाद इतना अधिक बढ़ गया था कि बात-बात पर झिकझिक होने लगी। इस कारण पढ़ाई में विघ्न उत्पन्न होता था। इस स्थिति से उबरने के लिये भी यह आवश्यक था कि पटेल दूसरे स्कूल में चले जायें। इसलिये वल्लभभाई ने अपने छः मित्रों को पेटलाड की स्कूल में प्रवेश लेने के लिये सहमत कर लिया।  सातों मित्रों ने मिलकर पेटलाड में एक कमरा किराये पर लिया और पढ़ाई में जुट गये।

वे रविवार को अपने घर जाकर वहाँ से राशन लेकर आते और बारी-बारी से खाना बनाते, बरतन साफ करते और अन्य घरेलू कार्य करते। इस प्रकार ई.1897 में वल्लभभाई ने 22 वर्ष की आयु में मैट्रिक उत्तीर्ण की। झबेर बा इस समय भी अपने पीहर में रह रही थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गोधरा में वकालात

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वल्लभभाई पटेल ने नाडियाद के एक वकील के पास वकालात का पेशा सीखा और उसके बाद मुख्तारी की परीक्षा पास करके गोधरा में वकालात करने लगे।

मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वल्लभभाई ने नाडियाद के एक वकील के सहायक के रूप में काम करना आरम्भ कर दिया। इस दौरान वल्लभभाई जब भी कोर्ट में जाते, मुकदमे की बारीकी को समझने का प्रयास करते तथा उस वकील से पुस्तकें लेकर स्वयं भी अध्ययन करते। तीन साल के परिश्रम और स्वाध्याय के बाद वल्लभभाई ने ई.1900 में मुख्तारी की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।

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उन दिनों देश में दो तरह के वकील होते थे, स्थानीय मजिस्ट्रेटों के न्यायालय में वकालात करने के लिए मुख्तारी की परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती थी। सरदार वल्लभभाई पटेल मेधावी छात्र थे, इसलिए वे कोई परीक्षा उत्तीर्ण करके सरकार कार्यालयों में नौकरी पा सकते थे किंतु सरदार पटेल को अंग्रेजों की नौकरी करनी पसंद नहीं थी। इसलिए वे मुख्तारी की परीक्षा उत्तीर्ण करके स्वतंत्र वकील बन गये।

इसके बाद कई वकीलों ने उन्हें अपने साथ काम करने का प्रस्ताव दिया किंतु वल्लभभाई, नाडियाद छोड़कर गोधरा चले आये जहाँ उनके बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल भी वकालात किया करते थे। वल्लभभाई ने अपनी स्वयं की स्वतंत्र प्रैक्टिस जमाने का प्रयास किया। वे मेधावी थे तथा बहुत परिश्रम करते थे किंतु विपुल परिश्रम करने के उपरांत भी वल्लभभाई की आय बहुत कम रही जिससे गृहस्थी का व्यय उठाना सम्भव नहीं था। बर्ड़ भाई विट्ठलभाई की भी यही हालत थी। इसलिये विट्ठलभाई ने गोधरा छोड़कर बोरसद चले जाने का निर्णय लिया तथा वल्लभभाई से कहा कि वे भी बोरसद चलें।

इस पर वल्लभभाई ने गोधरा में ही रहने का निर्णय लिया। उन्हें किसी शहर से विफल होकर चले जाना अच्छा नहीं लगा। इस प्रकार विट्ठलभाई बोरसद चले गये तथा वल्लभभाई गोधरा में वकालात करते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बोरसद में वकालात

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बड़े भाई की सहायता के लिये गोधरा छोड़कर बोरसद में वकालात करने चले आए वल्लभभाई

गोधरा में वकालात करते हुए सरदार पटेल का काम अच्छी तरह जम गया किंतु कुछ समय बाद बड़े भाई की सहायता के लिये गोधरा छोड़कर बोरसद में वकालात करने चले आए वल्लभभाई!

वल्लभभाई को गोधरा में वकालात करते हुए लगभग दो साल हो गये। इस अवधि में उनकी प्रैक्टिस अच्छी जम गई और आय भी बढ़ गई। इसी बीच विट्ठलभाई बोरसद में एक मामले में उलझ गये। हुआ यह कि विट्ठलभाई ने एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट के विरुद्ध गोरी सरकार से शिकायत की।

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इस पर जांच आरम्भ हो गई और ऐसा लगने लगा कि अंग्रेज मजिस्ट्रेट को सजा होगी। अतः उन दिनों के चलन के अनुसार यह भय उत्पन्न हो गया कि सारे अंग्रेज अधिकारी मिलकर विट्ठलभाई को किसी झूठे प्रकरण में उलझायेंगे। जब यह बात वल्लभभाई को ज्ञात हुई तो वल्लभभाई ने सोचा कि बड़े भाई को उनकी सहायता की आवश्यकता है इसलिये वे गोधरा छोड़कर बोरसद चले आये।

बोरसद में वल्लभभाई ने अपना स्वतंत्र कार्यालय स्थापित किया। उनकी ख्याति गोधरा से ही हो गई थी इसलिये बोरसद में भी उन्हें अच्छे मुवक्किल मिलने लगे।

अंग्रेजों के शासनकाल में किसानों के बहुत से मामले न्यायालयों तक पहुंचते थे। विशेषकर पारिवारिक विवाद के कारण भूमि बंटवारे के मामले। सरदार पटेल केवल उन्हीं मुवक्किलों का प्रकरण लेते थे जिनके पक्ष में सत्य होता था। वे झूठे मुकदमे करने वालों तथा अपने परिजनों को झूठे मुकदमों में फंसाने वालों से बहुत चिढ़ते थे। वल्लभभाई के इस गुण के कारण शीघ्र ही उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। अंग्रेजी न्यायालयों के मजिस्ट्रेट भी उनके इस गुण को पसंद करते थे।

बोरसद में वकालात के दौरान वल्लभभाई की ख्याति और आय दोनों में ही कई गुना वृद्धि हुई। वल्लभभाई के सम्पर्कों में भी विस्तार हुआ। इस अवधि में उन्होंने अपने भाई विट्ठलभाई की भी जमकर सहायता की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुकदमेबाजों के हथकण्डे

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अंग्रेजों ने भारत में ब्रिटिश न्याय प्रणाली पर आधारित न्यायालयों की स्थापना की थी। इस व्यवस्था में पीड़ित को न्याय मिलने की प्राथममिकता नहीं थी, अपति विभिन्न आधारों पर अपराध कारित नहीं होने की स्थापना की जाती थी। इस कारण अपराधी अपराध करने के बाद विभिन्न प्रकार के हथकण्डे अपनाते थे। सरदार पटेल ने निर्दोष एवं पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलवाने के लिए मुकदमेबाजों के हथकण्डे समझे।

उन दिनों की वकालात अपने आप में एक अलग तरह के कौशल की मांग करती थी। अंग्रेज अधिकारी हर समय उन भारतीयों को किसी झूठे मुकदमे में फंसाने का प्रयास करते थे जिनसे ब्रिटिश राज को खतरा हो। सरकारी कारकुन उस हर व्यक्ति पर झूठा मुकदमा लाद देते थे जो उनके स्वार्थ की पूर्ति में बाधक हो। लोगों में एक दूसरे से बदला लेने के लिये भी झूठे सच्चे मुकदमे स्थापित करने की प्रवृत्ति थी।

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ब्रिटिश राज में पुलिस के भ्रष्टाचार का कोई अंत नहीं था। इसलिये पुलिस के हथकण्डों का पार न था। वह दोनों तरफ के पक्षों से पैसा खाकर नट की तरह कलाबाजियां खाती रहती थी जिससे मुकदमे लम्बे खिंचते थे और लोग उनमें फंसे रहते थे। वकीलों में भी इस बात की प्रवृत्ति थी कि जितना हो सके, मुकदमा लम्बा खिंचे ताकि आय का स्थाई स्रोत बना रहे। इस प्रकार लोगों पर हो रहे अन्याय, अत्याचार और उत्पीड़न का पार नहीं था।

वे विभिन्न न्यायालयो में चल रहे मुकदमों में फंसे रहकर अपनी कमाई, स्थाई सम्पत्ति और जीवन का सुख-चैन गंवा रहे थे। वल्लभभाई ने उन सब लोगों की मनोवृत्ति तथा उनके द्वारा अपनाये जाने वाले हथकण्डों का सूक्ष्मता से अध्ययन किया तथा अपने मुकदमों में उस ज्ञान को काम में लेने का अभ्यास किया।

वल्लभभाई किताबी ज्ञान में असाधारण थे किंतु व्यावहारिक ज्ञान में सब वकीलों से बढ़कर थे। मुकदमेबाजों के हथकण्डे अच्छी तरह से समझ लेने के कारण वे अपने मुवक्किलों को अधिकतर मामलों में राहत दिलवाने में सक्षम सिद्ध होते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अंग्रेजी न्याय – को जेल जाने से बचा लिया वल्लभभाई ने !

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अंग्रेजी न्याय व्यवस्था में किसी निर्दोष व्यक्ति को निर्दोष सिद्ध कर पाना तथा दोषी को दोषी सिद्ध कर पाना अच्छे-अच्छे वकीलों के लिए बड़ी चुनौती होती थी! निर्दोष व्यक्ति को भी मुकदमा जीतने के लिए कोई हथकण्डा अपनाना पड़ता था।

वल्लभभाई पटेल बोरसद के न्यायालय में प्रैक्टिस कर रहे थे जहाँ उनका सामना नित्य ही झूठे मुकदमों से होता था। रेलवे के एक इंस्पेक्टर की, किसी मामले में एक अंग्रेज अधिकारी से झड़प हो गई। रेलवे अधिकारी ने उस इंस्पेक्टर को चोरी के झूठे मामले में फंसा दिया। अधिकारी ने अपने पक्ष में झूठे गवाह भी तैयार कर लिये।

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इंस्पेक्टर ने वल्लभभाई को अपना वकील बनाया। वल्लभभाई ने मुकदमे का अध्ययन किया तो समझ गये कि दुष्ट अंग्रेज अधिकारी ने इतना मजबूत जाल रचा है कि वल्लभभाई अपने मुवक्किल को कोर्ट में सजा होने से नहीं बचा पायेंगे। इसलिये वल्लभभाई ने झूठ के जाल को काटने के लिये एक नये झूठ का हथियार तैयार किया। वे जानते थे कि अंग्रेजी न्याय की नस ऐसे ही दबाई जा सकती है। वल्लभभाई ने अपने मुवक्किल से कहा कि जिस दिन न्यायालय में पेशी हो, उस दिन कोर्ट से बाहर वह अपने अंग्रेज अधिकारी के समक्ष स्वीकार करे कि मुझसे गलती हो गई है, क्षमा कर दें। पहले भी मुझे चोरी के एक मुकदमे में सजा हो चुकी है। देखिये कोर्ट का यह निर्णय। रेलवे इंस्पेक्टर ने वैसा ही किया।

इस पर अंग्रेज अधिकारी ने कहा कि ठीक है, मैं तुम्हें माफ कर दूंगा किंतु क्या तुम यह कागज मुझे दे सकते हो ? इस पर इंस्पेक्टर ने कहा कि यदि यह कागज लेकर आप मुझे क्षमा कर सकते हैं तो इसे आप रख लीजिये किंतु मुझे क्षमा अवश्य कर दीजिये। अंग्रेज अधिकारी बड़ा खुश हुआ कि मूर्ख इंस्पेक्टर ने अपनी मौत का सामान स्वयं ही अपने शत्रु को सौंप दिया है।

जब कोर्ट में सुनवाई हुई तो अंग्रेज अधिकारी के वकील ने वही कागज मजिस्ट्रेट के समक्ष रख दिया और कहा- ‘यह आदमी तो आदतन चोर है, इसे पहले भी सजा हो चुकी है, यह देखिये प्रमाण।’

जब मजिस्ट्रेट ने इंस्पेक्टर से इस कागज के बारे में पूछा तो इंस्पेक्टर ने कहा कि इसका जवाब मेरे वकील देंगे। वल्लभभाई ने वह कागज अपने हाथ में लेकर पढ़ा और बोले- ‘इस दस्तावेज में आज से तीस साल पहले मेरे मुवक्किल को चोरी के अपराध में सजा होने की बात लिखी है किंतु मेरे मुवक्किल की आयु भी कुल तीस साल ही है।

तो क्या उसे पैदा होते ही चोरी के अपराध की सजा दे दी गई थी ? स्पष्ट है कि जिस प्रकार वादी पक्ष ने, तीस साल पहले की चोरी के कूटरचित दस्तावेज को गढ़ा है, उसी प्रकार इस नई चोरी के आरोप को भी पूरी तरह झूठा गढ़ा गया है।’ मजिस्ट्रेट ने झल्लाकर, अंग्रेज अधिकारी का मुकदमा निरस्त कर दिया और निर्दोष इंस्पेक्टर को आरोप से मुक्त कर दिया।

अंग्रेजों के शासन में वकीलों में इस तरह की प्रैक्टिस होना आम बात तो नहीं थी किंतु आवश्यकता होने पर वकील समुदाय, न्यायालयों में इस तरह के चमत्कार दिखाता रहता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नशेड़ी अंग्रेज मजिस्ट्रेट से निर्दोष सुनार के पक्ष में फैसला लिखवाया वल्लभभाई ने

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अंग्रेजी राज्य में छोटे-छोटे झगड़ों पर लोग बड़े-बड़े मुकदमे खड़े कर देते थे। चूंकि मुकदमों का निर्णय गवाहों एवं साक्ष्यों के आधार पर होता था, इसलिए झूठे मुकदमे खड़े करने वाले लोग झूठे गवाहों एवं साक्ष्यों को बहुत अच्छी तरह से तैयार करते थे। बहुत से नशेड़ी अंग्रेज मजिस्ट्रेट तो प्रकरण को समझे बिना ही निर्णय करते थे। इन कारणों से निर्दोष व्यक्ति के लिए न्याय पाना बहुत कठिन हो जाता था।

एक बार एक सुनार पर आरोप लगा कि वह व्यभिचार की नीयत से एक औरत के घर में घुसा था। झूठे गवाहों के बल पर सुनार को सजा होना निश्चित था। आरोप लगाने वाले ने अपने पक्ष में मजबूत गवाह भी खड़े कर लिए। ये गवाह अलग-अलग कारणों से सुनार से नाराज थे।

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सुनार ने वल्लभभाई को अपना वकील बनाया। वादी पक्ष के झूठे गवाह इतने मजबूत थे कि उनकी बात काट पाना संभव नहीं था। इसलिये वल्लभभाई ने सुनार को बचाने का दूसरा रास्ता अपनाया। जिस कोर्ट में यह मुकदमा लगा हुआ था, उस कोर्ट का अंग्रेज मजिस्ट्रेट शराब पीकर कोर्ट आता था और चैम्बर में बैठकर ऊंघता रहता था। मुकदमों की सुनवाई उसका सहायक करता था। जब सुनार के मुकदमे की सुनवाई हुई तो भी, मुकदमे की जिरह, मजिस्ट्रेट का सहायक सुनने लगा। इस पर पटेल ने कहा कि मुकदमा सुनने का अधिकार केवल मजिस्ट्रेट को है।

इस पर नशेड़ी अंग्रेज मजिस्ट्रेट अपने चैम्बर से निकलकर कोर्ट में आ गया। मजिस्ट्रेट नशे में था और उसे आधे ही शब्द समझ में आ रहे थे। वल्लभभाई यही चाहते थे, उन्होंने मजिस्ट्रेट से कहा कि हमारे पिछड़े और रूढ़िवादी समाज में जब इस प्रकार की बातें होती हैं तो उन्हें बुरी बात माना जाता है किंतु आपके उन्नत और आधुनिक समाज में यह कोई अपराध नहीं। अपने समाज की प्रशंसा सुनकर अंग्रेज मजिस्ट्रेट खुश हो गया।

उसे यह बात आसानी से समझ आ गई कि प्रतिवादी का वकील अंग्रेजों की प्रशंसा कर रहा है। उसे यह भी समझ में आ गया कि जो बात अंग्रेजों में बुरी नहीं है, वह बात भारतीयों में क्यों बुरी होनी चाहिये। उसने सुनार को छोड़ दिया। मजिस्ट्रेट के सहायक और वादी के वकील ने पूरा जोर लगाया किंतु नशे में धुत्त मजिस्ट्रेट यही कहता रहा कि जो बात अंग्रेजों के लिये अपराध नहीं है, वह भारतीयों के लिये अपराध कैसे है!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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