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सनकी अंग्रेज मजिस्ट्रेट को वल्लभभाई के आगे जिद्द छोड़नी पड़ी

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यद्यपि अंग्रेजी न्याय व्यवस्था साक्ष्यों एवं गवाहों के आधार पर चलती थी किंतु बहुत से सनकी अंग्रेज मजिस्ट्रेट अपनी सनक के कारण साधारण मुकदमों में भी तरह-तरह के निर्णय दिया करते थे।

कुछ सनकी अंग्रेज मजिस्ट्रेट मुकदमों की सुनवाई के लिए भी अजीब-अजीब से तरीके अपनाया करते थे। वे वकीलों, गवाहों, अभियुक्तों एवं वादियों को इस बात के लिए विवश करते थे कि वे उसी तरह अपनी बात रखें जिस तरह से उन्हें निर्देशित किया जा रहा है। चूंकि वल्लभभाई लंदन से बैरिस्ट्री पास करके आए थे और अंग्रेजी कानून की बारीकियों को समझते थे, इसलिए जब वे किसी सनकी अंग्रेज मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत होते तो उसकी सनक तोड़े बिना नहीं रहते थे।

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एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट को सनक थी कि जब कोई गवाह कोर्ट में बयान देता तो मजिस्ट्रेट उसके समक्ष एक दर्पण रखवा देता। गवाह को अपनी बात उस दर्पण को देखते हुए कहनी होती थी। जब एक मुकदमे के सिलसिले में उस मजिस्ट्रेट ने वल्लभभाई के गवाह को भी दर्पण सामने रखकर बयान देने को कहा तो वल्लभभाई ने मजिस्ट्रेट से कहा कि मेरा मुवक्किल इस दर्पण के सामने तभी गवाही देगा जब इस दर्पण को साक्ष्य के रूप में रखा जाये ताकि इसे आगे चलकर सेशन कोर्ट में भी पेश किया जा सके। मजिस्ट्रेट ने दर्पण को साक्ष्य के रूप में रखने से मना कर दिया।

इस पर वल्लभभाई ने कहा कि जब इस दर्पण को गवाह की सारी बातें ज्ञात हो जायेंगी तो इसे साक्ष्य के रूप में मानने से क्या आपत्ति है ? इस पर मजिस्ट्रेट ने कहा कि दर्पण को भले ही गवाह की सारी बातें ज्ञात हो जायेंगी किंतु यह दर्पण इस मुकदमे का महत्त्वपूर्ण भाग नहीं है। वल्लभभाई ने कहा कि जब दर्पण, मुकदमे की कार्यवाही का महत्त्वपूर्ण भाग नहीं है तो इसे न्यायालय में क्यों रखा जाये ? इस पद दोनों के बीच लम्बी बहस हुई। कोर्ट में अच्छा-खासा तमाशा खड़ा हो गया।

अंत में मजिस्ट्रेट को झुकना पड़ा और दर्पण को कोर्ट से बाहर का रास्ता दिखाया गया। इस प्रकार सनकी अंग्रेज मजिस्ट्रेट को वल्लभभाई के आगे जिद्द छोड़नी पड़ी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विट्ठलभाई पटेल को बैरिस्ट्री पढ़ने लंदन भेज दिया वल्लभभाई ने

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यह संसार में अपनी तरह का एक ही प्रकरण है जिसमें सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपने बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल को अपनी जगह बैरिस्ट्री की पढ़ाई करने लंदन भेज दिया।

वल्लभभाई बोरसद के न्यायालय में प्रैक्टिस कर रहे थे किंतु उनकी इच्छा थी कि वे इंग्लैण्ड से बैरिस्ट्री पढ़ कर आयें। उन्होंने इंग्लैण्ड जाने के लिये पैसा जोड़ना आरम्भ किया। उनकी पत्नी झबेरबा भी इस काम में वल्लभभाई का सहयोग करने लगीं।

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ई.1904 में वल्लभभाई ने टॉमस कुक एण्ड कम्पनी से इंग्लैण्ड के लिये एक टिकट बुक करवाया। उन्होंने कम्पनी को किये गये आवेदन पत्र में अपना नाम वी. जे. पटेल (वल्लभभाई झबेर पटेल) लिखा तथा घर के पते की जगह अपने भाई के घर का पता लिख दिया ताकि वल्लभभाई के लंदन में होने की स्थिति में विट्ठलभाई पटेल के घर के पते पर महत्त्वपूर्ण डाक आती रहे। टॉमस कुक एण्ड कम्पनी ने वल्लभभाई का टिकट उनके बड़े भाई वी. जे. पटेल (विट्ठलभाई झबेर पटेल) के पते पर पोस्ट कर दिया। जब विट्ठलभाई ने वह टिकट देखा तो विट्ठलभाई पटेल के मन में भी आस जागी। उन्होंने वल्लभभाई से कहा कि यदि तू यह टिकट मेरे ही पास रहने दे तो मैं लंदन जाकर बैरिस्ट्री की पढ़ाई कर आऊँ! तू मुझसे छोटा है, मेरी आयु अधिक हो जाने के कारण बाद में मैं, यह काम नहीं कर पाऊँगा। इसलिये तू बाद में चले जाना।

वल्लभभाई ने अग्रज की इच्छा को तुरंत स्वीकार कर लिया और न केवल अपना टिकट ही उन्हें दे दिया अपितु पाई-पाई करके यत्नपूर्वक जोड़े गये अपने धन से की गई समस्त व्यवस्थाओं को भी उन्होंने विट्ठलभाई को समर्पित कर दिया।

विट्ठलभाई इंग्लैण्ड चले गये और वल्लभभाई ने उनके परिवार का व्यय भी उठाया। भाई के लिये ऐसा प्रेम और आदर बहुत कम देखने को मिलता है, जैसा वल्लभभाई ने करके दिखाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वल्लभभाई की उदारता

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वल्लभभाई उदारमना व्यक्तित्व के धनी थे। पारिवारिक सम्बन्धों में तो वे उदारता की सभी सीमाएं पार कर जाते थे। ऐसे बहुत से किस्से हैं जिनमें वल्लभभाई की उदारता के उदाहरण देखे जा सकते हैं।

व्यक्तित्व की विराटता और स्वभाव की उदारता यद्यपि एक दूसरे के पूरक हैं किंतु सरदार पटेल में ये दोनों गुण चरम पर मौजूद थे जिनका लाभ न केवल उन्हें या उनके परिवार को अपितु सम्पूर्ण मानवता को भी मिला। स्वतंत्रता आंदोलन में एवं भारत के एकीकरण में सरदार के इन दोनों गुणों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वल्लभभाई ने जिस तरह लंदन यात्रा का टिकट विट्ठलभाई को दे दिया था, उस तरह उन्होंने अपना गोधरा का मकान अपने अनुज काशीभाई को दिया। उन्हें यह अभ्यास बचपन से ही हो गया था जब घर में मिठाई या नये कपड़े आते तो दूसरे भाईयों एवं बहिन में बँट जाते और वल्लभभाई संतोष कर लेते।

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यह अभ्यास उनके जीवन को ऊँचा उठाने में काम आया। वस्तुतः वल्लभभाई के स्वभाव में तीन प्रमुख तत्व थे, एक तो उनसे जो कोई भी मांगता था, वे उसे दे देते थे, दूसरा यह कि वे अपने परिवार से बहुत प्रेम करते थे और तीसरा यह कि वे अपने लिये किसी भी वस्तु या सुविधा की मांग को लेकर कभी किसी से नहीं झगड़ते थे।

यरवदा जेल में भी जब वे गांधीजी के साथ थे, अपनी सुविधा और आवश्यकताओं को त्यागकर उन्होंने केवल गांधीजी की सेवा करने पर ध्यान केन्द्रित किया। यहाँ तक कि वल्लभभाई जब बीमार पड़ गये तो उन्होंने जेल से पैरोल मांगने से मना कर दिया। आगे चलकर तीन बार उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी गांधीजी की इच्छानुसार दूसरों को दे दी यहाँ तक कि हिन्दुस्तान के प्रधामंत्री की कुर्सी भी जवाहरलाल नेहरू के लिये छोड़ दी और स्वयं एकनिष्ठ भाव से राष्ट्र की सेवा करते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल में कर्त्तव्यनिष्ठा – कोर्ट में बहस करते रहे वल्लभभाई

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सरदार पटेल में कर्त्तव्यनिष्ठा – पत्नी की मृत्यु का तार मिलने पर भी कोर्ट में बहस करते रहे वल्लभभाई

सरदार पटेल में कर्त्तव्यनिष्ठा का भाव चरम पर था। वे किसी भी परिस्थिति में अपने कर्त्तव्य से नहीं डिगते थे। उनके जीवन में ऐसे कई क्षण आए जब उन्होंने निजी जिंदगी को तिलांजलि देकर अपने कर्त्तव्य पथ को नहीं छोड़ा।

अब तक जमा की गई पूंजी से विट्ठलभाई को इंग्लैण्ड भेज देने तथा दो परिवारों का व्यय चलाने के लिये वल्लभभाई को दिन-रात परिश्रम करना पड़ता था। सरदार पटेल की पत्नी झबेर बा उनकी हर आवश्यकता का ध्यान रखती थीं किंतु वे बीमार पड़ गईं। संभवतः उनके पेट में कैंसर की गांठ हो गई।

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मुकदमों की तैयारी में उलझे रहने के कारण वल्लभभाई उनके स्वास्थ्य की ओर अधिक ध्यान नहीं दे सके। उन दिनों कैंसर का इलाज भी नहीं था। विट्ठलभाई ई.1908 में बैरिस्ट्री पढ़कर भारत लौटे। इस बार उन्होंने बम्बई में अपना कार्यालय जमाया और वहीं वकालात करने लगे। वल्लभभाई बोरसद में प्रैक्टिस करते रहे। झबेर बा के पेट की गांठ को निकालने के लिये ऑपरेशन करना आवश्यक था किंतु उनका स्वास्थ्य इतना खराब हो चुका था कि शरीर ऑपरेशन को झेल नहीं सकता था। इसलिये झबेर बा को उपचार हेतु बम्बई ले जाना आवश्यक हो गया।

वल्लभभाई ने पत्नी झबेर बा को चार साल की पुत्री मणिबेन तथा तीन साल के पुत्र डाह्याभाई के साथ, विट्ठलभाई के पास बम्बई भेज दिया। बम्बई के डॉक्टरों ने झबेर बा का उपचार करना आरम्भ कर दिया किंतु एक दिन अचानक आपात् स्थिति में उन्हें झबेरबा का ऑपरेशन करना पड़ा। इसलिये वल्लभभाई को बोरसद से बम्बई नहीं बुलाया जा सका। वल्लभभाई किसी मुवक्किल के मुकदमे की तैयारी में उलझे हुए थे, इस कारण ऑपरेशन के बाद भी बम्बई नहीं जा सके।

इस ऑपरेशन के बाद झबेर बा ठीक होने लगीं किंतु कुछ दिन बाद 11 जनवरी 1909 को अचानक झबेर बा का निधन हो गया। वल्लभभाई को तार द्वारा इस दुःखद घटना की सूचना दी गई। जिस समय उन्हें तार दिया गया, वल्लभभाई एक कोर्ट में बहस कर रहे थे। वल्लभभाई ने तार को पढ़ा तो सन्न रह गये।

वे नहीं चाहते थे कि किसी भी कारण से उनके मुवक्किल का नुक्सान हो। इसलिये उन्होंने तार को पढ़कर जेब में रख लिया और बहस को जारी रखा। मुकदमे की कार्यवाही पूरी होने के बाद मजिस्ट्रेट ने पटेल से पूछा कि बहस के दौरान उन्हें जो तार मिला था, उसमें क्या लिखा था। पटेल ने तार अपनी जेब से निकालकर मजिस्ट्रेट की ओर बढ़ा दिया।

पटेल का मानना था व्यक्तिगत संवेदना अपनी जगह थी किंतु जिस मुवक्किल से फीस ले रखी थी, उसके प्रति कर्त्तव्य पूरा करना आवश्यक था। पटेल को इसी निष्ठा के कारण वकालात के काम में इतनी लोकप्रियता मिली थी कि उनके पास मुकदमों का ढेर लगा रहता था।

उनकी यह प्रतिष्ठ तब भी बनी रही जब वे लंदन से बैरिस्ट्री पास करके आ गये। यही कारण था कि पटेल की वकालात इतनी चलती थी कि उनके आगे नेहरू, जिन्ना और गांधी की वकालात फीकी थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बैरिस्टर बनने का संकल्प

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पत्नी की मृत्यु भी बैरिस्टर बनने का संकल्प नहीं छुड़ा सकी

वल्लभभाई मुख्तारी की परीक्षा उत्तीर्ण करके स्वतंत्र वकील बन गए थे किंतु इस परीक्षा को पास करके वे केवल निचले न्यायालयों में ही प्रैक्टिस कर सकते थे। इसलिए वल्लभभाई की इच्छा थी कि वे लंदन जाकर बैरिस्टर बनें। एक बार लंदन जाने का टिकट उनके पास आया तो वह टिकट उनके बड़े भाई विट्ठलभाई ने ले लिया। कुछ समय बाद जब फिर उन्होंने लंदन जाना चाहा तो उनकी पत्नी का निधन हो गया। बच्चों को पालने वाला भी कोई नहीं रहा। इस पर भी वल्लभभाई ने बैरिस्टर बनने का संकल्प नहीं छोड़ा।

सत्रह साल के दाम्पत्य जीवन में से झबेर बा केवल छः साल वल्लभभाई के पास रही थीं। झबेर बा की मृत्यु के समय वल्लभभाई की मृत्यु केवल तेतीस वर्ष थी किंतु वल्लभभाई ने दुबारा विवाह नहीं करने का निर्णय लिया। अभी परिवार इस सदमे से उबरा भी नहीं था कि एक वर्ष के भीतर ही विट्ठलभाई की पत्नी भी अचानक चल बसीं।

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बच्चों को पालने की विकट समस्या आ खड़ी हुई। इस पर भी वल्लभभाई ने लंदन जाकर बैरिस्टरी पढ़ने का संकल्प नहीं छोड़ा। उन्होंने मणिबेन तथा डाह्याभाई को बम्बई के क्वीन मैरी स्कूल की शिक्षिका मिस विल्सन के पास छोड़ा और स्वयं लंदन जाने की तैयारी में जुट गये। वर्ष 1910 में वल्लभभाई के अनुज काशीभाई ने वकालात पास की। सरदार ने उन्हें बोरसद बुलाया तथा अपना मकान और अपनी वकालात का सारा काम उन्हें सौंप दिया ताकि काशीभाई को आरम्भिक दिनों में अधिक संघर्ष न करना पड़े। उसी वर्ष वल्लभभाई लंदन के लिये रवाना हो गये।

लंदन जाने से पहले उन्होंने अपने लिये, अपने जीवन का पहला सूट सिलवाया तथा छुरी-कांटे से भोजन करने का अभ्यास किया। जिस देश में वे जा रहे थे, उस देश में जीने की शैली सीखना आवश्यक था। अंततः उनकी समस्त तैयारियां पूरी हो गईं और एक दिन वे पानी के जहाज से लंदन के लिये रवाना हो गये। मार्ग में समुद्री हवा और नमी से उन्हें सी-सिकनेस की बीमारी हो गई।

काफी उपचार के बाद ही वह ठीक हो सकी। इस दौरान उनकी परिचर्या करने वाला कोई भी नहीं था किंतु पटेल ने दृढ़ता पूर्वक अपनी बीमारी को जीत लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रोमन कानून याद कर लिया वल्लभभाई ने

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जिस समय सरदार वल्लभभाई पटेल बैरिस्टर बनने की पढ़ाई करने एवं उसकी परीक्षा देने के लिए लंदन गए, उस काल में रोमन कानून की पढ़ाई बड़े स्तर पर करनी होती थी। चूंकि समस्त यूरोप की न्याय संहिता का आधार रोमन कानून ही था, इसलिए यूरोपीय न्यायालयों में प्रैक्टिस करने के लिए आवश्यक था कि बैरिस्टर को इस कानून की अच्छी जानकारी हो।

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रोमन कानून का जन्म छठी शताब्दी ईस्वी में हुआ था। रोम के सम्राट जस्टीनियन ने अपने काल में प्रचलित समस्त कानूनों को एक जगह एकत्रित करवाया तथा योग्य वकीलों की सहायता से उन्हें क्रमबद्ध रूप में जमाया। इस पुस्तक को ‘कन्स्टीट्यूटिओनम ऑफ जस्टीनियन’ तथा कोड कन्स्टीट्यूटिओनम कहा जाता है। यह संहिता आधुनिक यूरोपीय विधि का प्रमुख स्रोत बनी। रोमन सीनेटरों द्वारा प्रतिपादित कानूनी और विधायी संरचनाओं की व्याख्या ‘नेपोलियन संहिता’ और ‘जस्टीनियन संहिता’ में देखने को मिलती है। रोमन गणराज्य में स्थापित हुई कई परम्पराओं को आज भी यूरोप तथा विश्व के कई आधुनिक राष्ट्रों एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में देखा जा सकता है।

रोमन कानून बहुत लम्बा और जटिल तो था ही, साथ ही भारतीय नैसर्गिक न्याय चिंतन से बिलकुल उलट था। इस कारण रोमन कानून को समझना और उसे याद रख पाना एक दुष्कर कार्य था। भारत से लंदन तक की यात्रा लम्बी, थकाऊ और उबाऊ थी। इस लम्बी, थकाऊ और उबाऊ यात्रा के लिये वल्लभभाई ने पहले से ही अच्छी तैयारी की।

वे भारत से अपने साथ कानून की ढेर सारी पुस्तकें ले गये। जहाँ दूसरे यात्री, यात्रा की बोरियित को मिटाने के लिये मनोरंजन के विविध उपायों का सहारा लेते वहीं वल्लभभाई ने इस समय का उपयोग रोमन कानून का अध्ययन करने में किया।

वे सुबह से शाम तक इन पुस्तकों में खोये रहते, रोमन कानून की बारीकियां समझते और उन्हें याद करने का प्रयास करते। इस प्रकार सी-सिकनेस की बीमारी में भी वे पुस्तकों का आनंद लेते रहे। यात्रा की थकान उन पर हावी नहीं हुई और उन्होंने बोरियत भी अनुभव नहीं की।

भारत से लंदन पहुंचने तक उन्होंने रोमन कानून की कई पुस्तकें पढ़ लीं तथा महत्त्वपूर्ण अंशों को कण्ठस्थ कर लिया। यह तैयारी आगे चलकर बहुत काम आई।

जिस उपाधि को प्राप्त करने के लिये वे लदंन जा रहे थे, और जो असाधारण सफलता वे अर्जित करने वाले थे, उसकी नींव वस्तुतः इस यात्रा के दौरान ही रख ली गई। वल्लभभाई जैसे मनस्वी और दृढ़संकल्पी व्यक्ति के लिये यह कोई कठिन कार्य नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लंदन में वल्लभभाई

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सरदार पटेल भारत में अपनी जमी-जमाई वकालात छोड़कर बैरिस्ट्री की पढ़ाई करने इंग्लैण्ड गए थे। लंदन में वल्लभभाई अत्यंत साधारण जिंदगी जीते थे। इस समय उनकी आय का कोई भी स्रोत नहीं था। जब उनके अग्रज विठ्ठलभाई बैरिस्ट्री की पढ़ाई करने लंदन गए थे तब सरदार ने उनकी पढ़ाई तथा उनके परिवार का खर्चा उठाया था।

सरदार वल्लभभाई की पत्नी झबेर बा का निधन हो चुका था। इस कारण वल्लभभाई के बच्चे भारत में एक नर्स के पास रह रहे थे। सरदार पटेल अपनी जमापूंजी का बड़ा हिस्सा बच्चों के लालन-पालन के लिए नर्स को देकर आए थे। इतनी सारी विषमताओं एवं आर्थिक तंगहाली के बावजूद गुजरात के छोटे से गांव में पलकर बड़ा हुआ यह नौजवान बहुत कम धन लेकर इंग्लैण्ड पहुंचा था। इसका कारण केवल बैरिस्ट्री की परीक्षा पास करने का जुनून ही था।

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लंदन पहुंचकर वल्लभभाई ने अपना अध्ययन मिडिल टेंपुल में आरम्भ किया। वे एक सस्ते बोर्डिंग हाउस में रहने लगे तथा अपना अधिकांश समय पुस्तकों के अध्ययन में व्यतीत करने लगे। वल्लभभाई के बोर्डिंग हाउस से उनका कॉलेज लगभग 19 किलोमीटर दूर था। वे राशि बचाने के लिये सदैव पैदल चलकर वहाँ पहुंचते। इसके लिये वे बहुत जल्दी बोर्डिंग से निकल जाते ताकि 9 बजे पुस्तकालय खुलने से पहले वहाँ पहुंच जायें। उनके अध्ययन का आधार केन्द्र यही पुस्तकालय था। पुस्तकों का भारी-भरकम मूल्य बचाने के लिये ऐसा किया जाना आवश्यक था। वल्लभभाई घण्टों वहाँ बैठकर पढ़ते रहते तथा पुस्तकालय बंद होने से पहले कभी भी वहाँ से नहीं निकलते थे।

अपने भोजन के लिये वल्लभभाई ने बहुत साधारण व्यवस्था कर रखी थी। तेतीस साल का एक विधुर जिसके बच्चे हजारों किलोमीटर दूर भारत में हों, उसके लिये लंदन में आकर्षणों की कमी नहीं थी किंतु वल्लभभाई को लंदन की चमक-दमक से कोई लेना-देना नहीं था।

उन्होंने अपने संस्कारों को कभी नहीं छोड़ा। अपने संकल्प को कभी नहीं त्यागा। अपने लंदन प्रवास के दौरान वे सारे दिन या तो पैदल चलते या फिर पुस्तकें पढ़ते।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लंदन में धूम

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करमसद गांव के लड़के ने लंदन में धूम मचा दी

वल्लभभाई द्वारा लंदन में किये गये असाधारण परिश्रम का परिणाम पहले ही टर्म में सामने आया। बैरिस्टर बनने के लिये 12 टर्म की परीक्षायें देनी होती थीं। पहली टर्म में ही उन्होंने सबसे अधिक अंक प्राप्त किये जिसके लिये उन्हें पांच पाउण्ड का पुरस्कार मिला तथा दो टर्म की छूट मिल गई। इस प्रकार छः महीने का समय और व्यय बच गया।

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जब उन्होंने प्रथम श्रेणी में सर्वोच्च अंकों से बैरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण की तो उनके नाम की लंदन में धूम मच गई। इंग्लैण्ड में रहने वाले भारतीयों का सिर गर्व से ऊंचा हो गया। लंदन के इतिहास में यह पहली बार हुआ था कि किसी भारतीय ने इस परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया हो। लंदन की जिस महारानी के राज्य में सूरज नहीं डूबता था, उस राज्य के कौने-कौने से युवा आकर इस परीक्षा में बैठते थे, वल्लभभाई ने उन सबको पीछे छोड़ दिया था।

जब लंदन के समाचार पत्रों में वल्लभभाई के चित्र छपे तो गुजरात के उपेक्षित से करमसद गांव का जिद्दी लड़का रातों-रात पूरे यूरोप में नायक बन गया। इन समाचार पत्रों में सरदार की सफलता के समाचारों के शीर्षक कुछ इस प्रकार होते थे- करमसद गांव के लड़के ने लंदन में धूम मचा दी! दूर-दूर से भारतीय परिवार वल्लभभाई को बधाई देने के लिये आने लगे। अंग्रेजों ने भी सदाशयता दिखाने में कसर नहीं छोड़ी।

शेडर्ज नामक एक अंग्रेज किसी समय गुजरात में कमिश्नर रहा था, उसने जब वल्लभभाई के चित्र अखबारों में देखे तो वह स्वयं चलकर वल्लभभाई के पास पहुंचा और बधाई देने के साथ-साथ अपने घर पर भोजन करने का निमंत्रण देकर गया।

इस अपूर्व सफलता से सरदार पटेल के आत्मविश्वास में और अधिक वृद्धि हुई। अब वे संसार के किसी भी शिक्षित मनुष्य की आंखों में आंखें डालकर बात कर सकते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

व्यावसायिक सफलता के गुर सीख लिये वल्लभभाई ने

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सरदार वल्लभ भाई इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि बैरिस्ट्री की परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर लेना अलग बात है तथा उस परीक्षा के बाद अपनाए जाने वाले व्यवसाय में सफलता प्राप्त करना अलग बात है। चूंकि अब उन्हें भारत लौटकर बैरिस्ट्री ही करनी थी इसलिए उसे ध्यान में रखते हुए व्यावसायिक सफलता के गुर सीख लिये वल्लभभाई ने!

बैरिस्ट्री की परीक्षा तो उत्तीर्ण हो गई किंतु उपाधि मिलने में अभी कुछ समय था। इसलिये सरदार ने लंदन में अपने प्रवास को नये ढंग से बिताने का निर्णय लिया। उन्होंने लंदन के न्यायालयों में जाकर उनकी व्यवस्था एवं कार्यप्रणाली का बारीकी से अध्ययन किया। एक पराधीन देश के न्यायालयों में चल रही कार्यप्रणाली और शासक देश के न्यायालयों में चल रही कार्यप्रणाली में दिन-रात का अंतर था।

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वल्लभभाई ने इस अंतर और उसके कारणों को समझा। वल्लभभाई ने लंदन की सामाजिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों का अध्ययन किया। उन्हें यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि जो अंग्रेज दुनिया भर में लोगों के नागरिक अधिकारों का हनन करते फिरते थे, वे अपने देश में नागरिक अधिकारों के लिये कितने अधिक सजग और तत्पर थे!

वल्लभभाई ने अंग्रेजों के रहने, खाने, चलने, बोलने तथा परस्पर व्यवहार करने के तरीकों को भी गहराई से परखा। उन्होंने अंग्रेजों की तरह खाने-पहनने का तरीका सीख लिया और उसे पूरी तरह अपना भी लिया किंतु वे आजीवन शाकाहारी बने रहे। वे व्यावसायिक सफलता के समस्त गुर सीख गये। अब भारत में शायद ही कोई वकील था जो इस दृढ़ निश्चयी, घनघोर परिश्रमी तथा अद्भुत प्रतिभाशली बैरिस्टर का सामना कर सके। जिस युवक की पत्नी मर गई थी, बच्चे एक अंग्रेज महिला के संरक्षण में अपना बचपन व्यतीत कर रहे थे, जिसने जीवन भर निर्धनता से संघर्ष किया था, जिसने अपनी समस्त अर्जित सम्पत्ति अपने भाइयों को अर्पित कर दी थी और जिसने हाड़तोड़ परिश्रम से कभी मुंह नहीं चुराया था, उसका सामना भला कोई कर भी कैसे कर सकता था !

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जज नहीं बने वल्लभभाई

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लंदन से बैरिस्ट्री की परीक्षा में संसार भर में प्रथम स्थान पर रहने के कारण सरदार वल्लभ भाई के लिए ऑफर था कि वे बम्बई हाईकोर्ट में जज बन जाएं किंतु ऐसा करने से उन्हें निर्दोष भारतीयों को अंग्रेजी कानून के अनुसार सजा देनी पड़ती। इसलिए जज नहीं बने वल्लभभाई! उन्होंने हाईकोर्ट में जज बनने की बजाय अहमदाबाद में प्रैक्टिस करने का निर्णय लिया!

13 फरवरी 1913 को वल्लभभाई भारत लौट आये। वे आत्म-विश्वास से भरे हुए थे तथा नये सिरे से कोई काम आरम्भ करने से पहले समस्त सम्भावनाओं को टटोल लेना चाहते थे। इसलिये उन्होंने बम्बई पहुंचकर, बम्बई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सर बेसिल स्कॉट से भेंट की।

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स्कॉट ने उन्हें देखा तो देखता ही रह गया। महंगे लकदक सूट, अत्यंत आकर्षक फैल्ट हैट में एक हिन्दुस्तानी बैरिस्टर बहुत महंगा सिगार पी रहा था। उसकी हर अदा अंग्रेजों को मात देने वाली थी। लंदन रिटर्न वल्लभभाई अच्छी तरह जानते थे कि एक अंग्रेज न्यायाधीश से कैसे बराबरी के स्तर पर मिला जा सकता है। स्कॉट ने उनकी धारा-प्रवाह अंग्रेजी, बैरिस्ट्री में प्रथम स्थान और तेज-तर्रार भाव-भंगिमा को देखते हुए उन्हें बम्बई उच्च न्यायालय में न्यायाधीश का पद स्वीकार करने का अनुरोध किया।

वल्लभभाई ने विनम्रतापूर्वक इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया और कहा कि वे स्वयं अपनी प्रैक्टिस करेंगे। इस काल में अंग्रेजों के सरकारी कार्यालय में लिपिक बन जाना भी बहुत बड़ी बात हुआ करती थी किंतु करमसद जैसे छोटे से गांव के किसान के लड़के ने बम्बई हाईकोर्ट के जज की नौकरी ठुकरा दी, ऐसा कार्य कोई बिरला ही कर सकता था। अंग्रेजों द्वारा सताए जा रहे भारत के निर्दोष लोगों से प्रेम करने के कारण ही जज नहीं बने वल्लभभाई!

लंदन से बैरिस्टर बनकर आने वाले युवक उन दिनों बम्बई में प्रैक्टिस किया करते थे। किंतु वल्लभभाई ने अहमदाबाद को अपनी कर्मभूमि बनाने का निश्चय किया जो उनके पैतृक गांव करमसद से केवल 80 किलोमीटर दूर था। खेड़ा की सेशन कोर्ट भी अहमदाबाद में थी। इस क्षेत्र में वल्लभभाई के बहुत से पुराने परिचित रहते थे, इसलिये वल्लभभाई को काम का कोई अभाव नहीं रहने वाला था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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