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मिस्टर फॉक्स के छक्के छुड़ा दिये वल्लभभाई ने

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अहमदाबाद का एक कुख्यात अंग्रेज मजिस्ट्रेट मिस्टर फॉक्स अपने सामने किसी को कुछ नहीं गिनता था। वह दिन में कोर्ट लगाने के स्थान पर रात्रि में 9 बजे से 12 बजे तक कोर्ट लगाता था। सरदार पटेल ने उसका दिमाग ठीक करने के लिए एक उपाय सोचा।

वल्लभभाई अब भी फौजदारी के मुकदमे लड़ते थे और मुकदमा लेने से पहले यह देख लेते थे कि उनका मुवक्किल वास्तव में तो अपराधी नहीं है ! ऐसे निर्दोष व्यक्ति जो झूठे मुकदमों में फंसा दिये गये हों, उन्हें न्याय दिलवाना ही वल्लभभाई के जीवन का प्रमुख उद्देश्य था। झूठ को उधेड़ने में उनका कोई सानी नहीं था। झूठे गवाहों के पैर वल्लभभाई के समक्ष अधिक समय तक नहीं टिक पाते थे।

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झूठे जंजाल बुनने वाले पुलिस अधिकारी तो वल्लभभाई के नाम से कांपते थे। पुलिस अधिकारियों की जालसाजियों के खुलने से पुलिस की बहुत बदनामी होती थी। जो मजिस्ट्रेट अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाते या मनमानी करते, उन्हें भी वल्लभभाई का निशाना बनना पड़ता था। अहमदाबाद का एक कुख्यात अंग्रेज मजिस्ट्रेट मिस्टर फॉक्स दिन में कोर्ट लगाने के स्थान पर रात्रि में 9 बजे से 12 बजे तक कोर्ट लगाता था। बहुत से वकीलों ने उससे प्रार्थना की कि वह दिन में कोर्ट लगाये किंतु मक्कार फॉक्स हिन्दुस्तानी वकीलों का मजाक उड़ाता और उनके अनुरोध को ठुकरा देता।

एक बार वल्लभभाई का एक मुकदमा उसकी कोर्ट में पहुंचा। वल्लभभाई भी रात्रि में 9 बजे उसकी कोर्ट में पहुंचे। उन्होंने मजिस्ट्रेट से इतनी लम्बी बहस की कि सुबह हो गई। दूसरे और तीसरे दिन भी यही हुआ। जब चौथे दिन भी यही हुआ तो मक्कार मजिस्ट्रेट के होश गुम हो गये। वह प्रभावशाली अंग्रेजी गणवेश में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले उस बैरिस्टर से कुछ कहने की स्थिति में नहीं था जिसकी चर्चा दुनिया भर के अखबारों में होती थी। हार-थककर फॉक्स ने अपनी कोर्ट का समय अन्य मजिस्ट्रेटों की तरह प्रातः 9 बजे कर दिया। तब जाकर वल्लभभाई ने उस मजिस्ट्रेट का पीछा छोड़ा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

आत्मविश्वास से परिपूर्ण वल्लभभाई

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सरदार वल्लभभाई पटेल ने लंदन में रहकर कानून की पढ़ाई की और बैरिस्ट्री की परीक्षा में विश्व भर में प्रथम रैंक हासिल की थी। इस दौरान उन्होंने केवल कानून की ही पढ़ाई नहीं की थी, उन्होंने अंग्रेजी संस्कृति, रहन-सहन, अंग्रेजी मनोविज्ञान तथा उनके व्यवहार करने के ढंग का भी अच्छा अध्ययन किया था। अंग्रेजी जीवन शैली को निकट से देख-समझ कर आत्मविश्वास से परिपूर्ण वल्लभभाई ने जीवन में हर कदम पर सफलता प्राप्त की।

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अंग्रेजी दम्भ की अच्छी समझ आ जाने के कारण सरदार वल्लभभाई पटेल अच्छी तरह समझ गए थे कि अंग्रेजों के समक्ष कमर झुकाकर मुलायम शब्दों में अनुनय-विनय करने से बात नहीं बनेगी। अंग्रेजों के सामने तनकर खड़े होने, उनकी आंखों में आंख डालकर बोलने, उन्हीं की तरफ फर्राटेदार लम्बे-लम्बे वाक्य बोलने तथा हर वाक्य में कानून की धारा का उल्लेख करने से ही वे अंग्रेजी मजिस्ट्रटों और जजों से अपने मुकदमों का निर्णय अपने पक्ष में करवा सकते हैं।

वल्लभभाई ने अंग्रेज मजिस्ट्रेटों और अंग्रेज अधिकारियों के हौंसले पस्त करने और उनसे बराबरी के स्तर पर बात करने के अनोखे फार्मूले का आविष्कार कर लिया था। वे महंगे अंग्रेजी ढंग के कपडे़ पहनते, उन्हीं की तरह हैट लगाते, उन्हीं की तरह सिगार पीते और उन्हीं की तरह फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते। कानून जितना वल्लभभाई को याद था, उतना किसी अन्य व्यक्ति या मजिस्ट्रेट को नहीं। इसलिये वे कोर्ट में अजेय हो गये थे। जी. वी. मावलंकर जो आगे चलकर भारत की प्रथम लोकसभा के अध्यक्ष बने, उन्होंने उन दिनों के पटेल के व्यक्तित्व के बारे में लिखा है जब वे अहमदाबाद की कोर्ट में बैरिस्ट्री करने पहुंचे थे।

मावलंकर ने लिखा है- ‘एक चुस्त युवक। शानदार सूट में सजा-धजा। एक खास कोण का फेनेट पहने। वह स्वभाव से थोड़ा कठोर एवं अल्पभाषी है। आंखें चमकीली व पैनी, मानो अंदर तक भेद जाएंगी। अभिवादन का उत्तर देता है, पर बातचीत उससे आगे नहीं बढ़ाता। सारी दुनिया को जैसे अपनी उत्कृष्टता की ऊँचाई से नीचे देखता है। इसी श्रेष्ठता की भावना से जब कभी कुछ बोलता है तो उसके हर शब्द में आत्मविश्वास की झलक मिलती है। ऐसा है वह अहमदाबाद में आया नया बैरिस्टर।’

आत्मविश्वास से परिपूर्ण वल्लभभाई का यह व्यक्तित्व स्वतंत्रता संग्राम के समय पूरी तरह तो नहीं बदला, हाँ उन्होंने अंग्रेजी हैट-टाई और सूट-बूट छोड़कर देशी झब्बा और धोती धारण कर ली।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुवक्किल की जमानत

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वल्लभभाई के दो प्रश्नों पर ही मजिस्ट्रेट ने उनके मुवक्किल की जमानत स्वीकार कर ली

जब सरदार पटेल वकालात किया करते थे, तब किसी मुवक्किल का मुकदमा लेने से पहले स्वयं आश्वस्त होते थे कि मुवक्किल निर्दोष है तथा उसने अपराध नहीं किया है। इस कारण आदलतों में सरदार पटेल की बड़ी प्रतिष्ठा थी। इस कारण कोई मजिस्ट्रेट सरदार पटेल के मुकदमे को खारिज नहीं कर पाता था। फिर भी कई बार ऐसी घटनाएं हो जाती थीं जिनमें अंग्रेज मजिस्ट्रेट बिना किसी ठोस कारण के गलत निर्णय करता था। ऐसी स्थिति में मजिस्ट्रेट को सरदार पटेल के कोप का सामना करना पड़ता था।

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एक बार वल्लभभाई पटेल ने एक कोर्ट में अपने एक मुवक्किल की जमानत के लिये अर्जी लगाई। वह मुवक्किल खेड़ा जिले का था। चूंकि खेड़ा जिले के किसान भूराजस्व में कमी करवाने को लेकर अंग्रेज सरकारी की नीतियों के विरुद्ध आंदोलन करते रहते थे, इसलिए इस जिले के लोगों को अंग्रेज सरकार अपराधी किस्म का मानती थी। इस कारण मजिस्ट्रेट ने सरदार पटेल को सुने बिना ही मुवक्किल की जमानत अस्वीकार कर दी। सरदार ने मजिस्ट्रेट से जमानत नहीं देने का कारण पूछा।

मजिस्ट्रेट ने कहा कि यह आदमी खेड़ा जिले का है, इसलिए मैं इसे जमानत नहीं दूंगा। इस पर वल्लभभाई ने मजिस्ट्रेट से पूछा कि खेड़ा जिले के आदमी को जमानत क्यों नहीं मिलेगी? जज ने कहा कि खेड़ा जिले के लोग अपराधी किस्म के होते हैं। इस पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने मजिस्ट्रेट से पूछा कि क्या खेड़ा जिले के हर आदमी को कोर्ट मुजरिम मानती है ?

मजिस्ट्रेट ने जब ऐसा मानने से मना किया तो वल्लभभाई ने दूसरा प्रश्न पूछा कि यदि ऐसा नहीं है तो उनके मुवक्किल को जमानत क्यों नहीं मिली जबकि उसके विरुद्ध कोई ठोस प्रमाण भी नहीं है ?

इस पर मजिस्ट्रेट ने कोर्ट स्थगित कर दी और वल्लभभाई के मुवक्किल की जमानत स्वीकार कर ली। इस प्रकार, दो प्रश्नों में ही वल्लभभाई के मुवक्किल को जमानत मिल गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्रिज के खिलाड़ी सरदार पटेल

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ब्रिज के खिलाड़ी सरदार पटेल – श्रीमती वाडिया के कहने पर पटेल ने उनके पति को खेल की शर्त से मुक्त कर दिया!

जिन दिनों भारत पर अंग्रेजों का शासन था, उन दिनों उच्चवर्गीय अंग्रेज अधिकारियों, जजों, वकीलों एवं व्यापारियों में ब्रिज खेलना हैसियत एवं शान का प्रतीक माना जाता था। अंग्रेज समझते थे कि इस खेल में बुद्धि लगती है। इसलिए हिन्दुस्तानी अंग्रेजों जैसा अच्छा ब्रिज नहीं खेल सकते किंतु सरदार पटेल ने लंदन में रहकर बैरिस्ट्री की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इसी दौरान उन्होंने ब्रिज खेलना सीखा था। यही कारण था कि सदार पटेल उच्च स्तर के ब्रिज के खिलाड़ी थे।

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भारत लौटने के बाद भी वल्लभभाई को ब्रिज खेलने का शौक बना रहा। दिन पर दिन इस खेल में उनकी दक्षता बढ़ती चली गई। उन दिनों अहमदाबाद में वकीलों का एक क्लब हुआ करता था जिसमें सरदार पटेल ब्रिज खेलने जाया करते थे। क्लब के एक अन्य सदस्य मिस्टर वाडिया को अपने ब्रिज खेलने पर बड़ा घमण्ड था। मिस्टर वाडिया पारसी समुदाय के वकील थे। एक बार उन्होंने वल्लभभाई को ब्रिज खेलने की चुनौती दी। मिस्टर वाडिया को सबक सिखाने के लिये वल्लभभाई ने कहा कि मुझे पैनी-पैनी का खेल पसंद नहीं।

100 पॉइंट के लिये पांच पाउण्ड की शर्त हो तो चुनौती स्वीकार है। पांच पाउण्ड उन दिनों बड़ी राशि थी। वाडिया ने यह शर्त स्वीकार कर ली और दोनों के बीच ब्रिज का खेल आरम्भ हुआ। वाडिया ने पहले दिन 20 पाउण्ड तथा दूसरे दिन 30 पाउण्ड हारे।

जब तीसरे दिन का खेल चल रहा था तब वाडिया की पत्नी क्लब में आईं और उन्होंने वल्लभभाई से अनुरोध किया कि वे खेल को बंद कर दें। वल्लभभाई ने हंसकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और खेल बंद हो गया। वल्लभभाई ने वाडिया को खेल की शर्त से भी मुक्त कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

किसान की गुदड़ी के लाल थे वल्लभभाई!

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कोई इस बात पर आसानी से विश्वास नहीं कर सकता था कि जिस सरदार पटेल ने लंदन जाकर बैरिस्ट्री की परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए थे, वे अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से थे। एक गुजराती किसान की गुदड़ी के लाल थे वल्लभभाई!

भारत के इतिहास में सरदार पटेल का नाम प्रायः जवाहरलाल नेहरू और मोहनदास कर्मचंद गांधी के साथ लिया जाता है जो इस बात का द्योतक है कि किसान की गुदड़ी के लाल वल्लभभाई पटेल का न केवल इतिहास में अपितु भारत की तत्कालीन राजनीति में कितना ऊंचा स्थान था!

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जब वल्लभभाई अहमदाबाद में जम गये तो विट्ठलभाई ने बम्बई में वकालात का काम बंद करके समाज सेवा का काम आरम्भ कर दिया। इससे दोनों परिवारों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी वल्लभभाई पर आ गई। इस जिम्मेदारी को वल्लभभाई ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। जनवरी 1915 में मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। वह भी वल्लभभाई की तरह गुजराती थे।

वह भी वल्लभभाई की तरह वकील थे। उन्होंने भी वल्लभभाई की तरह लंदन से बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। अंतर इतना था कि गांधी एक रियासत के दीवान के बेटे थे और पटेल एक किसान की गुदड़ी में पले थे। अंतर यह भी था कि गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में वकालात करते थे किंतु वल्लभभाई भारत में।

अंतर यह भी था कि जहाँ दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेज जाति ने गांधी का इतना अपमान किया था कि वे तिलमिलाकर भारत लौट आये थे, वहीं भारत के गोरे मजिस्ट्रेट, वल्लभभाई का सामना करने से घबराते थे इन सब कारणों से गांधी भारत में लौटकर वकालात की जगह राजनीति में सक्रिय हो गये।

उन दिनों पटेल के मन में गांधी के प्रति कोई विशेष स्थान नहीं था। एक बार जब पटेल के मित्र मावलंकर, गांधी का भाषण सुनने के लिये जा रहे थे तो पटेल ने उनसे कहा कि क्या करोगे गांधीजी का भाषण सुनकर ? वे तो अंग्रेजों को ब्रह्मचर्य का उपदेश देते हैं। भला भैंस को भागवत सुनाने का कोई लाभ हो सकता है ?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

प्लेग रोगियों की सेवा करते-करते स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गये पटेल

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ब्रिटिश शासन काल में भारत में प्लेग रोग इतने बड़े स्तर पर फैलता था कि हजारों लोगों के प्राण निगल लेता था। इस रोग की चपेट में आकर गांव के गांव स्वाहा हो जाते थे। इसलिए प्लेग रोगियों की सेवा करना बहुत बड़े जिगर का काम हुआ करता था।

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ब्रिटिश शासन काल में प्लेग की बीमारी का विस्फोट अकाल की विभीषिका के कारण हुआ करता था। अंग्रेज सरकार भारत के खेतों में उगने वाले अनाज को विश्वयुद्ध के मोर्चों पर लड़ रही अंग्रेजी सेना को भिजवा देती थी जिसके कारण भारत में भुखमरी फैल आती थी। इस भुखमरी के कारण हजारों लोग मर जाते थे। इन मृतकों के शव महीनों तक खेतों में सड़ा करते थे जिनमें प्लेग के कीटाणु पनपते थे। जब चूहे आदि छोटे जीव इन शवों को कुतरते थे तो उनके शरीर में प्लेग के कीटाणुओं का प्रवेश हो जाता था। चूहों के द्वारा यह प्लेग मानव बस्तियों तक पहुंच जाता था।

ई. 1914 से 1919 तक यूरोप में प्रथम विश्व युद्ध लड़ा गया। इसके बाद ई.1917 में भारत में प्लेग फैला। अहमदाबाद में प्लेग की महामारी का प्रकोप अत्यंत भयानक था। गंदे इलाकों में तो इसका प्रकोप था ही, कुछ पॉश कॉलोनियों में भी लोग मर गये। इससे सरदार वल्लभ भाई पटेल पटेल को अनुमान हुआ कि लोगों को पता नहीं है कि प्लेग का सामना किस प्रकार किया जाना चाहिये।

वल्लभ भाई ने कुछ लोगों को अपने साथ लेकर एक समिति बनाई जो लोगों को इस महामारी से छुटकारा दिलाने की दिशा में काम करने लगी। इस कार्य में जान जाने का खतरा था किंतु पटेल और उनके साथियों ने अपने प्राणों की परवाह किये बिना, लोगों की बहुत सेवा की। इससे उनकी आत्मा को बहुत संतोष मिला।

यह पहला अवसर था जब वल्लभभाई ने समाज सेवा से उत्पन्न संतोष का स्वाद चखा था। प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए पटेल स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गये। पटेल ने अपने परिवार को तत्काल अन्यत्र भेज दिया और स्वयं एक भग्न मंदिर में जाकर रहने लगे जहाँ बहुत धीरे-धीरे वे स्वस्थ्य हो सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चम्पारन आंदोलन में गांधीजी की ओर ध्यान गया पटेल का!

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गांधी और नेहरू भारतीय राजनीति में लगभग एक साथ सक्रिय हुए। यही कारण था कि चम्पारन आंदोलन से पहले सरदार पटेल गांधीजी को नहीं जानते थे।

जब गांधीजी को अंग्रेजों ने दक्षिण अफ्रीका से निकाल दिया तो जनवरी 1915 में वे भारत लौट आये तथा उन्होंने अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की जिसे बाद में साबरमती आश्रम कहा गया। गांधीजी ने ई.1917 में भारतीयों को बलपूर्वक ब्रिटिश उपनिवेशों में मजदूरी करने के लिए ले जाने के विरुद्ध सत्याग्रह किया तथा उसी वर्ष बिहार के चम्पारन जिले में नील की खेती में काम करने वाले मजदूरों और किसानों के हितों के लिए आंदोलन चलाया जिसे चम्पारन आंदोलन कहते हैं।

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ई.1918 में गांधीजी ने खेड़ा में किसानों को लगान से छूट दिलवाने के लिये ’कर नहीं’ आन्दोलन चलाया। इसी वर्ष अहमदाबाद में मिल-मजूदरों की मांगों के समर्थन में आमरण अनशन किया। सरदार पटेल व्यावहारिक मनुष्य थे। उन्हें अति आदर्शवाद और अति काल्पनिकता की बातें अच्छी नहीं लगती थीं। इस कारण उन्हें मोहनदास कर्मचंद गांधी के भाषणों से अरुचि थी। वल्लभभाई को लगता था कि अंग्रेजों से अंग्रेजों की भाषा में ही बात की जानी चाहिये। ई.1917 में बिहार प्रांत के चम्पारन के किसानों के आह्वान पर गांधीजी चम्पारन पहुंचे। वहाँ के गोरे व्यापारी जिन्हें नीले साहब कहा जाता था, नील की खेती करने वाले किसानों पर भयानक अत्याचार करते थे।

वे व्यापारियों से बलपूर्वक नील की खेती करवाते तथा उन्हें बहुत कम राशि देकर उनकी फसल छीन लेते थे। इन किसानों पर विगत लगभग तीन सौ सालों से इस प्रकार का भयानक अत्याचार हो रहा था। गांधीजी ने किसानों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में सत्याग्रह किया।

जब इस सत्याग्रह की खबरें, समाचार पत्रों में छपीं तो वल्लभभाई का ध्यान गांधी की ओर गया। वल्लभभाई को गांधी का यह कार्यक्रम अच्छा लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मोहनदास गांधी से भेंट

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सरदार पटेल की मोहनदास गांधी से भेंट वर्ष 1917 में खेड़ा में हुई। इस समय तक पटेल न तो गांधी को पसंद करते थे और न उनके भाषणों को।

ई.1917 में चम्पारन आंदोलन आरम्भ करके मोहनदास कर्मचंद गांधी समाचार पत्रों में सुर्खियां बटोरने लगे थे। उस समय सरदार पटेल अहमदाबाद में वकालात कर रहे थे किंतु समाज सेवा में भी सक्रिय हो चुके थे। अहमदाबाद में फैली प्लेग की महामारी में पटेल ने समाज को स्तुत्य सेवा दी थी। इस समय तक सरदार पटेल और गांधीजी एक-दूसरे को जानते नहीं थे!

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ई.1917 में गोधरा में गुजरात सभा की राजनैतिक परिषद् हुई। इस परिषद में बाल गंगाधर तिलक, उनके परम सहयोगी शापर्डे, विट्ठलभाई पटेल, मोहनदास गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रीय नेता आये। गुजरात सभा का उद्देश्य गुजरात की जनता में अपने अधिकारों के प्रति जागृति उत्पन्न करने का था। इसी परिषद में सरदार पटेल की मोहनदास गांधी से भेंट हुई। गांधी को इस परिषद का अध्यक्ष और वल्लभभाई को महामंत्री चुना गया।

परिषद में निर्णय लिया गया कि प्रत्येक व्यक्ति गुजराती में ही भाषण देगा, अंग्रेजी में कोई नहीं बोलेगा। उस समय तक देश में गांधी, नेहरू और पटेल को बहुत कम लोग जानते थे जबकि बाल गंगाधर तिलक के भाषणों की धूम मची हुई थी। लोकमान्य तिलक को गुजराती नहीं आती थी इसलिये वे हिन्दी में बोले और शापर्डे ने दुभाषिया बनकर उनके भाषण का गुजराती में अनुवाद सुनाया।

गुजरात सभा का वार्षिक राजनैतिक अधिवेशन ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादारी की शपथ के साथ आरम्भ होता था किंतु इस अधिवेशन के प्रारम्भ में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादारी की शपथ नहीं ली गई क्योंकि गांधीजी का तर्क था कि स्वयं अंग्रेज भी, किसी कार्यक्रम या सभा के आरम्भ में इस प्रकार की शपथ नहीं लेते। गोधरा अधिवेशन में यह भी निर्णय लिया गया कि परिषद की गतिविधियां वर्ष भर चलेंगी, इससे पहले परिषद द्वारा वर्ष में केवल एक अधिवेशन का ही आयोजन किया जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गुजरात में बेगार

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वल्लभभाई के प्रयासों से गुजरात में बेगार बंद हो गई

बेगार प्रथा अनादि काल से मानव सभ्यता का अंग रही है। इस प्रथा में शासक एवं शक्तिशाली वर्ग समाज के आर्थिक रूप से असक्षम वर्ग से बलपूर्वक कार्य करता है तथा उसके बदले में कोई पारिश्रमिक नहीं देता। मुगलों एवं ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में जागीदारी एवं जमींदारी नामक शासन व्यवस्थाओं का विकास हुआ। इस कारण गांव-गांव में बेगार प्रथा फैल गई। अंग्रेजों के काल में गुजरात में बेगार प्रथा अपने चरम पर थी।

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गुजरात में यह प्रचलन था कि जब कोई सरकारी अधिकारी किसी गांव के दौरे पर आता था तो उसके रहने-खाने का सारा प्रबंध गांव वालों की ओर से किया जाता था तथा लोगों को निःशुल्क सेवा देनी पड़ती थी, जिसे बेगार कहते थे। गोधरा अधिवेशन में बेगार बंद करने का प्रस्ताव पारित किया गया। अधिवेशन में पारित प्रस्तावों को सरदार पटेल ने बम्बई के कमिश्नर मि. प्रेट को भेज दिया तथा लिखा कि सरकार इन प्रस्तावों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करे। प्रेट इस मसौदे को पढ़कर आग-बबूला हो गया तथा उसने मसौदे को फाड़कर फैंक दिया। जब कई दिनों तक प्रेट का जवाब नहीं आया तो वल्लभभाई ने दूसरा पत्र लिखा।

जब उसका भी जवाब नहीं आया तो वल्लभभाई ने तीसरा पत्र लिखा तथा चेतावनी दी कि यदि दस दिन में इस पत्र का जवाब नहीं दिया तो वे संघर्ष का रास्ता अपनायेंगे तथा बेगारी के विरुद्ध पम्फलेट छपवाकर जनता में बांटेंगे। प्रेट ने इस बार जवाब भिजवाया कि आप किसी दिन मुझसे आकर मिलें। इस पर वल्लभभाई ने लिखा कि मिलने की क्या आवश्यकता है, यदि बेगारी लेने का कोई कानून हो तो उसकी प्रति भेज दें या फिर मि. प्रेट मेरे कार्यालय में आकर बात करें। प्रेट ने इसका कोई जवाब नहीं दिया।

इस पर वल्लभभाई ने अपनी पूर्व चेतावनी के अनुसार, बेगारी न देने के आह्वान के पर्चे छपवाकर गांवों में बंटवा दिये। इसके बाद जब सरकारी अधिकारी गांवों में दौरे पर गये तो लोगों ने बेगार देने से मना कर दिया तथा अधिकारियों द्वारा ग्रामीणों से बेगार लेने का चलन बंद हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खेड़ा आंदोलन में अंग्रेजी वेशभूषा त्याग दी वल्लभभाई ने

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गुजरात के खेड़ा गांव में किसानों की समस्या को लेकर एक आंदोलन हुआ। इसे खेड़ा आंदोलन कहा जाता है। यह गुजरात सभा का कार्यक्रम था, कांग्रेस का कार्यक्रम नहीं था।

ई.1917 तक मोहनदास कर्मचंद गांधी की कांग्रेस में कोई विशेष भूमिका तय नहीं हुई थी। इस समय तक कांग्रेस बाल गंगाधर तिलक के हाथों में थी। ई.1917 में गुजरात के गोधरा कस्बे में गुजरात सभा की राजनैतिक परिषद् हुई जिसमें गांधी और पटेल पहली बार एक-दूसरे से मिले। खेड़ा आंदोलन में वल्लभभाई ने अंग्रेजी वेशभूषा त्याग दी!

ई.1917 में खेड़ा क्षेत्र में अतिवृष्टि से अधिकांश किसानों की फसलें नष्ट हो गईं तथा एक-चौथाई पैदावार भी नहीं हुई। इस पर अंग्रेजों ने पैदावार के झूठे आंकड़े तैयार किये तथा किसानों से बलपूर्वक मालगुजारी वसूलने लगे। किसानों ने वल्लभभाई से प्रार्थना की कि वे अंग्रेज सरकार को लगान में छूट देने के लिये कहें।

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वल्लभभाई ने स्वयं खेड़ा जिले का दौरा करके सच्चाई का पता लगाया तथा बम्बई सरकार को लिखा कि फसलें पच्चीस प्रतिशत भी नहीं हुई हैं इसलिये किसानों का लगान माफ किया जाये। अंग्रेजों ने लगान माफ करने से मना कर दिया। इस पर वल्लभभाई ने गांधीजी को लिखा। गांधीजी ने खेड़ा के किसानों के लिये सत्याग्रह करना स्वीकार कर लिया तथा वल्लभभाई को लिखा कि मुझे कोई ऐसा व्यक्ति चाहिये जो सत्याग्रह के दौरान हर समय मेरे साथ रहे। इस पर वल्लभभाई ने अपना विदेशी पहनावा त्यागकर धोती कुर्ता पहन लिया और स्वयं भी सत्याग्रह में सम्मिलित हो गये। इस प्रकार चम्पारण के बाद देश में दूसरा महत्त्वपूर्ण सत्याग्रह गुजरात प्रांत के खेड़ा क्षेत्र में आरम्भ हुआ।

स्वतंत्रता आंदोलन में यह पटेल का सबसे पहला संघर्ष था। सरदार पटेल तथा मोहनदास गांधी ने खेड़ा क्षेत्र के किसानों का आह्वान किया कि वे सरकार को लगान न दें। इस पर सरकार ने किसानों पर अत्याचार किये तथा उनकी जमीनें जब्त कर लीं। बहुत से किसानों के पशुओं की नीलामी करके भूराजस्व वसूल किया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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