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ब्रिज के खिलाड़ी सरदार पटेल

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ब्रिज के खिलाड़ी सरदार पटेल – श्रीमती वाडिया के कहने पर पटेल ने उनके पति को खेल की शर्त से मुक्त कर दिया!

जिन दिनों भारत पर अंग्रेजों का शासन था, उन दिनों उच्चवर्गीय अंग्रेज अधिकारियों, जजों, वकीलों एवं व्यापारियों में ब्रिज खेलना हैसियत एवं शान का प्रतीक माना जाता था। अंग्रेज समझते थे कि इस खेल में बुद्धि लगती है। इसलिए हिन्दुस्तानी अंग्रेजों जैसा अच्छा ब्रिज नहीं खेल सकते किंतु सरदार पटेल ने लंदन में रहकर बैरिस्ट्री की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इसी दौरान उन्होंने ब्रिज खेलना सीखा था। यही कारण था कि सदार पटेल उच्च स्तर के ब्रिज के खिलाड़ी थे।

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भारत लौटने के बाद भी वल्लभभाई को ब्रिज खेलने का शौक बना रहा। दिन पर दिन इस खेल में उनकी दक्षता बढ़ती चली गई। उन दिनों अहमदाबाद में वकीलों का एक क्लब हुआ करता था जिसमें सरदार पटेल ब्रिज खेलने जाया करते थे। क्लब के एक अन्य सदस्य मिस्टर वाडिया को अपने ब्रिज खेलने पर बड़ा घमण्ड था। मिस्टर वाडिया पारसी समुदाय के वकील थे। एक बार उन्होंने वल्लभभाई को ब्रिज खेलने की चुनौती दी। मिस्टर वाडिया को सबक सिखाने के लिये वल्लभभाई ने कहा कि मुझे पैनी-पैनी का खेल पसंद नहीं।

100 पॉइंट के लिये पांच पाउण्ड की शर्त हो तो चुनौती स्वीकार है। पांच पाउण्ड उन दिनों बड़ी राशि थी। वाडिया ने यह शर्त स्वीकार कर ली और दोनों के बीच ब्रिज का खेल आरम्भ हुआ। वाडिया ने पहले दिन 20 पाउण्ड तथा दूसरे दिन 30 पाउण्ड हारे।

जब तीसरे दिन का खेल चल रहा था तब वाडिया की पत्नी क्लब में आईं और उन्होंने वल्लभभाई से अनुरोध किया कि वे खेल को बंद कर दें। वल्लभभाई ने हंसकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और खेल बंद हो गया। वल्लभभाई ने वाडिया को खेल की शर्त से भी मुक्त कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

किसान की गुदड़ी के लाल थे वल्लभभाई!

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कोई इस बात पर आसानी से विश्वास नहीं कर सकता था कि जिस सरदार पटेल ने लंदन जाकर बैरिस्ट्री की परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए थे, वे अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से थे। एक गुजराती किसान की गुदड़ी के लाल थे वल्लभभाई!

भारत के इतिहास में सरदार पटेल का नाम प्रायः जवाहरलाल नेहरू और मोहनदास कर्मचंद गांधी के साथ लिया जाता है जो इस बात का द्योतक है कि किसान की गुदड़ी के लाल वल्लभभाई पटेल का न केवल इतिहास में अपितु भारत की तत्कालीन राजनीति में कितना ऊंचा स्थान था!

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जब वल्लभभाई अहमदाबाद में जम गये तो विट्ठलभाई ने बम्बई में वकालात का काम बंद करके समाज सेवा का काम आरम्भ कर दिया। इससे दोनों परिवारों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी वल्लभभाई पर आ गई। इस जिम्मेदारी को वल्लभभाई ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। जनवरी 1915 में मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। वह भी वल्लभभाई की तरह गुजराती थे।

वह भी वल्लभभाई की तरह वकील थे। उन्होंने भी वल्लभभाई की तरह लंदन से बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। अंतर इतना था कि गांधी एक रियासत के दीवान के बेटे थे और पटेल एक किसान की गुदड़ी में पले थे। अंतर यह भी था कि गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में वकालात करते थे किंतु वल्लभभाई भारत में।

अंतर यह भी था कि जहाँ दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेज जाति ने गांधी का इतना अपमान किया था कि वे तिलमिलाकर भारत लौट आये थे, वहीं भारत के गोरे मजिस्ट्रेट, वल्लभभाई का सामना करने से घबराते थे इन सब कारणों से गांधी भारत में लौटकर वकालात की जगह राजनीति में सक्रिय हो गये।

उन दिनों पटेल के मन में गांधी के प्रति कोई विशेष स्थान नहीं था। एक बार जब पटेल के मित्र मावलंकर, गांधी का भाषण सुनने के लिये जा रहे थे तो पटेल ने उनसे कहा कि क्या करोगे गांधीजी का भाषण सुनकर ? वे तो अंग्रेजों को ब्रह्मचर्य का उपदेश देते हैं। भला भैंस को भागवत सुनाने का कोई लाभ हो सकता है ?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

प्लेग रोगियों की सेवा करते-करते स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गये पटेल

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ब्रिटिश शासन काल में भारत में प्लेग रोग इतने बड़े स्तर पर फैलता था कि हजारों लोगों के प्राण निगल लेता था। इस रोग की चपेट में आकर गांव के गांव स्वाहा हो जाते थे। इसलिए प्लेग रोगियों की सेवा करना बहुत बड़े जिगर का काम हुआ करता था।

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ब्रिटिश शासन काल में प्लेग की बीमारी का विस्फोट अकाल की विभीषिका के कारण हुआ करता था। अंग्रेज सरकार भारत के खेतों में उगने वाले अनाज को विश्वयुद्ध के मोर्चों पर लड़ रही अंग्रेजी सेना को भिजवा देती थी जिसके कारण भारत में भुखमरी फैल आती थी। इस भुखमरी के कारण हजारों लोग मर जाते थे। इन मृतकों के शव महीनों तक खेतों में सड़ा करते थे जिनमें प्लेग के कीटाणु पनपते थे। जब चूहे आदि छोटे जीव इन शवों को कुतरते थे तो उनके शरीर में प्लेग के कीटाणुओं का प्रवेश हो जाता था। चूहों के द्वारा यह प्लेग मानव बस्तियों तक पहुंच जाता था।

ई. 1914 से 1919 तक यूरोप में प्रथम विश्व युद्ध लड़ा गया। इसके बाद ई.1917 में भारत में प्लेग फैला। अहमदाबाद में प्लेग की महामारी का प्रकोप अत्यंत भयानक था। गंदे इलाकों में तो इसका प्रकोप था ही, कुछ पॉश कॉलोनियों में भी लोग मर गये। इससे सरदार वल्लभ भाई पटेल पटेल को अनुमान हुआ कि लोगों को पता नहीं है कि प्लेग का सामना किस प्रकार किया जाना चाहिये।

वल्लभ भाई ने कुछ लोगों को अपने साथ लेकर एक समिति बनाई जो लोगों को इस महामारी से छुटकारा दिलाने की दिशा में काम करने लगी। इस कार्य में जान जाने का खतरा था किंतु पटेल और उनके साथियों ने अपने प्राणों की परवाह किये बिना, लोगों की बहुत सेवा की। इससे उनकी आत्मा को बहुत संतोष मिला।

यह पहला अवसर था जब वल्लभभाई ने समाज सेवा से उत्पन्न संतोष का स्वाद चखा था। प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए पटेल स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गये। पटेल ने अपने परिवार को तत्काल अन्यत्र भेज दिया और स्वयं एक भग्न मंदिर में जाकर रहने लगे जहाँ बहुत धीरे-धीरे वे स्वस्थ्य हो सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चम्पारन आंदोलन में गांधीजी की ओर ध्यान गया पटेल का!

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गांधी और नेहरू भारतीय राजनीति में लगभग एक साथ सक्रिय हुए। यही कारण था कि चम्पारन आंदोलन से पहले सरदार पटेल गांधीजी को नहीं जानते थे।

जब गांधीजी को अंग्रेजों ने दक्षिण अफ्रीका से निकाल दिया तो जनवरी 1915 में वे भारत लौट आये तथा उन्होंने अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की जिसे बाद में साबरमती आश्रम कहा गया। गांधीजी ने ई.1917 में भारतीयों को बलपूर्वक ब्रिटिश उपनिवेशों में मजदूरी करने के लिए ले जाने के विरुद्ध सत्याग्रह किया तथा उसी वर्ष बिहार के चम्पारन जिले में नील की खेती में काम करने वाले मजदूरों और किसानों के हितों के लिए आंदोलन चलाया जिसे चम्पारन आंदोलन कहते हैं।

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ई.1918 में गांधीजी ने खेड़ा में किसानों को लगान से छूट दिलवाने के लिये ’कर नहीं’ आन्दोलन चलाया। इसी वर्ष अहमदाबाद में मिल-मजूदरों की मांगों के समर्थन में आमरण अनशन किया। सरदार पटेल व्यावहारिक मनुष्य थे। उन्हें अति आदर्शवाद और अति काल्पनिकता की बातें अच्छी नहीं लगती थीं। इस कारण उन्हें मोहनदास कर्मचंद गांधी के भाषणों से अरुचि थी। वल्लभभाई को लगता था कि अंग्रेजों से अंग्रेजों की भाषा में ही बात की जानी चाहिये। ई.1917 में बिहार प्रांत के चम्पारन के किसानों के आह्वान पर गांधीजी चम्पारन पहुंचे। वहाँ के गोरे व्यापारी जिन्हें नीले साहब कहा जाता था, नील की खेती करने वाले किसानों पर भयानक अत्याचार करते थे।

वे व्यापारियों से बलपूर्वक नील की खेती करवाते तथा उन्हें बहुत कम राशि देकर उनकी फसल छीन लेते थे। इन किसानों पर विगत लगभग तीन सौ सालों से इस प्रकार का भयानक अत्याचार हो रहा था। गांधीजी ने किसानों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में सत्याग्रह किया।

जब इस सत्याग्रह की खबरें, समाचार पत्रों में छपीं तो वल्लभभाई का ध्यान गांधी की ओर गया। वल्लभभाई को गांधी का यह कार्यक्रम अच्छा लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मोहनदास गांधी से भेंट

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सरदार पटेल की मोहनदास गांधी से भेंट वर्ष 1917 में खेड़ा में हुई। इस समय तक पटेल न तो गांधी को पसंद करते थे और न उनके भाषणों को।

ई.1917 में चम्पारन आंदोलन आरम्भ करके मोहनदास कर्मचंद गांधी समाचार पत्रों में सुर्खियां बटोरने लगे थे। उस समय सरदार पटेल अहमदाबाद में वकालात कर रहे थे किंतु समाज सेवा में भी सक्रिय हो चुके थे। अहमदाबाद में फैली प्लेग की महामारी में पटेल ने समाज को स्तुत्य सेवा दी थी। इस समय तक सरदार पटेल और गांधीजी एक-दूसरे को जानते नहीं थे!

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ई.1917 में गोधरा में गुजरात सभा की राजनैतिक परिषद् हुई। इस परिषद में बाल गंगाधर तिलक, उनके परम सहयोगी शापर्डे, विट्ठलभाई पटेल, मोहनदास गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रीय नेता आये। गुजरात सभा का उद्देश्य गुजरात की जनता में अपने अधिकारों के प्रति जागृति उत्पन्न करने का था। इसी परिषद में सरदार पटेल की मोहनदास गांधी से भेंट हुई। गांधी को इस परिषद का अध्यक्ष और वल्लभभाई को महामंत्री चुना गया।

परिषद में निर्णय लिया गया कि प्रत्येक व्यक्ति गुजराती में ही भाषण देगा, अंग्रेजी में कोई नहीं बोलेगा। उस समय तक देश में गांधी, नेहरू और पटेल को बहुत कम लोग जानते थे जबकि बाल गंगाधर तिलक के भाषणों की धूम मची हुई थी। लोकमान्य तिलक को गुजराती नहीं आती थी इसलिये वे हिन्दी में बोले और शापर्डे ने दुभाषिया बनकर उनके भाषण का गुजराती में अनुवाद सुनाया।

गुजरात सभा का वार्षिक राजनैतिक अधिवेशन ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादारी की शपथ के साथ आरम्भ होता था किंतु इस अधिवेशन के प्रारम्भ में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादारी की शपथ नहीं ली गई क्योंकि गांधीजी का तर्क था कि स्वयं अंग्रेज भी, किसी कार्यक्रम या सभा के आरम्भ में इस प्रकार की शपथ नहीं लेते। गोधरा अधिवेशन में यह भी निर्णय लिया गया कि परिषद की गतिविधियां वर्ष भर चलेंगी, इससे पहले परिषद द्वारा वर्ष में केवल एक अधिवेशन का ही आयोजन किया जाता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गुजरात में बेगार

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वल्लभभाई के प्रयासों से गुजरात में बेगार बंद हो गई

बेगार प्रथा अनादि काल से मानव सभ्यता का अंग रही है। इस प्रथा में शासक एवं शक्तिशाली वर्ग समाज के आर्थिक रूप से असक्षम वर्ग से बलपूर्वक कार्य करता है तथा उसके बदले में कोई पारिश्रमिक नहीं देता। मुगलों एवं ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में जागीदारी एवं जमींदारी नामक शासन व्यवस्थाओं का विकास हुआ। इस कारण गांव-गांव में बेगार प्रथा फैल गई। अंग्रेजों के काल में गुजरात में बेगार प्रथा अपने चरम पर थी।

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गुजरात में यह प्रचलन था कि जब कोई सरकारी अधिकारी किसी गांव के दौरे पर आता था तो उसके रहने-खाने का सारा प्रबंध गांव वालों की ओर से किया जाता था तथा लोगों को निःशुल्क सेवा देनी पड़ती थी, जिसे बेगार कहते थे। गोधरा अधिवेशन में बेगार बंद करने का प्रस्ताव पारित किया गया। अधिवेशन में पारित प्रस्तावों को सरदार पटेल ने बम्बई के कमिश्नर मि. प्रेट को भेज दिया तथा लिखा कि सरकार इन प्रस्तावों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करे। प्रेट इस मसौदे को पढ़कर आग-बबूला हो गया तथा उसने मसौदे को फाड़कर फैंक दिया। जब कई दिनों तक प्रेट का जवाब नहीं आया तो वल्लभभाई ने दूसरा पत्र लिखा।

जब उसका भी जवाब नहीं आया तो वल्लभभाई ने तीसरा पत्र लिखा तथा चेतावनी दी कि यदि दस दिन में इस पत्र का जवाब नहीं दिया तो वे संघर्ष का रास्ता अपनायेंगे तथा बेगारी के विरुद्ध पम्फलेट छपवाकर जनता में बांटेंगे। प्रेट ने इस बार जवाब भिजवाया कि आप किसी दिन मुझसे आकर मिलें। इस पर वल्लभभाई ने लिखा कि मिलने की क्या आवश्यकता है, यदि बेगारी लेने का कोई कानून हो तो उसकी प्रति भेज दें या फिर मि. प्रेट मेरे कार्यालय में आकर बात करें। प्रेट ने इसका कोई जवाब नहीं दिया।

इस पर वल्लभभाई ने अपनी पूर्व चेतावनी के अनुसार, बेगारी न देने के आह्वान के पर्चे छपवाकर गांवों में बंटवा दिये। इसके बाद जब सरकारी अधिकारी गांवों में दौरे पर गये तो लोगों ने बेगार देने से मना कर दिया तथा अधिकारियों द्वारा ग्रामीणों से बेगार लेने का चलन बंद हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खेड़ा आंदोलन में अंग्रेजी वेशभूषा त्याग दी वल्लभभाई ने

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गुजरात के खेड़ा गांव में किसानों की समस्या को लेकर एक आंदोलन हुआ। इसे खेड़ा आंदोलन कहा जाता है। यह गुजरात सभा का कार्यक्रम था, कांग्रेस का कार्यक्रम नहीं था।

ई.1917 तक मोहनदास कर्मचंद गांधी की कांग्रेस में कोई विशेष भूमिका तय नहीं हुई थी। इस समय तक कांग्रेस बाल गंगाधर तिलक के हाथों में थी। ई.1917 में गुजरात के गोधरा कस्बे में गुजरात सभा की राजनैतिक परिषद् हुई जिसमें गांधी और पटेल पहली बार एक-दूसरे से मिले। खेड़ा आंदोलन में वल्लभभाई ने अंग्रेजी वेशभूषा त्याग दी!

ई.1917 में खेड़ा क्षेत्र में अतिवृष्टि से अधिकांश किसानों की फसलें नष्ट हो गईं तथा एक-चौथाई पैदावार भी नहीं हुई। इस पर अंग्रेजों ने पैदावार के झूठे आंकड़े तैयार किये तथा किसानों से बलपूर्वक मालगुजारी वसूलने लगे। किसानों ने वल्लभभाई से प्रार्थना की कि वे अंग्रेज सरकार को लगान में छूट देने के लिये कहें।

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वल्लभभाई ने स्वयं खेड़ा जिले का दौरा करके सच्चाई का पता लगाया तथा बम्बई सरकार को लिखा कि फसलें पच्चीस प्रतिशत भी नहीं हुई हैं इसलिये किसानों का लगान माफ किया जाये। अंग्रेजों ने लगान माफ करने से मना कर दिया। इस पर वल्लभभाई ने गांधीजी को लिखा। गांधीजी ने खेड़ा के किसानों के लिये सत्याग्रह करना स्वीकार कर लिया तथा वल्लभभाई को लिखा कि मुझे कोई ऐसा व्यक्ति चाहिये जो सत्याग्रह के दौरान हर समय मेरे साथ रहे। इस पर वल्लभभाई ने अपना विदेशी पहनावा त्यागकर धोती कुर्ता पहन लिया और स्वयं भी सत्याग्रह में सम्मिलित हो गये। इस प्रकार चम्पारण के बाद देश में दूसरा महत्त्वपूर्ण सत्याग्रह गुजरात प्रांत के खेड़ा क्षेत्र में आरम्भ हुआ।

स्वतंत्रता आंदोलन में यह पटेल का सबसे पहला संघर्ष था। सरदार पटेल तथा मोहनदास गांधी ने खेड़ा क्षेत्र के किसानों का आह्वान किया कि वे सरकार को लगान न दें। इस पर सरकार ने किसानों पर अत्याचार किये तथा उनकी जमीनें जब्त कर लीं। बहुत से किसानों के पशुओं की नीलामी करके भूराजस्व वसूल किया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सत्याग्रह का मार्ग

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सरदार पटेल ने सिद्ध कर दिया कि सत्याग्रह का मार्ग प्रभावशाली है!

मोहनदास कर्मचंद गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में प्रिटोरिया सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह आंदोलन किया था जो बुरी तरह विफल रहा था। सत्याग्रह आंदोलन को गांधीजी सत्याग्रह का मार्ग कहते थे।

गांधीजी ने भारत में भी सत्याग्रह आंदोलन का प्रयोग दोहराना चाहा। कांग्रेसी नेता सत्याग्रह आंदोलन का पिलपिला और लिजलिजा आंदोलन मानती थी। उनका मानना था कि सत्याग्रह जैसी बातें तो नरमपंथी कांग्रेस के दौर में अंग्रेजों के समक्ष प्रस्तुत की जानी वाली अर्जियों एवं प्रार्थनाओं से भी अधिक खोखली थीं किंतु गांधीजी सत्याग्रह का प्रयोग करने की जिद ठाने हुए थे। गांधीजी के आग्रह पर सरदार पटेल ने गुजरात के खेड़ा आंदोलन में सत्याग्रह का प्रयोग किया।

खेड़ा आंदोलन चल ही रहा था कि गांधीजी को फिर से चम्पारन जाना पड़ गया। इस कारण नेतृत्व का सम्पूर्ण दायित्व वल्लभभाई पर आ गया। वल्लभभाई ने इस दायित्व को जी-जान से निभाया। वे गांव-गांव जाकर किसानों का मनोबल बढ़ाते कि वे सरकार के अत्याचारों से न घबरायें तथा उसे लगान न दें। आंदोलन लम्बा खिंचा किंतु वल्लभभाई ने उसे बीच में टूटने नहीं दिया।

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जब अंग्रेजों की सरकार ने देखा कि गांव-गांव उसके विरुद्ध वातावरण बन रहा है तो उसने घोषणा की कि जो किसान लगान देने की स्थिति में नहीं हैं, उनका लगान माफ किया जायेगा किंतु जो किसान लगान दे सकते हैं, उनसे लगान लिया जायेगा। इस घोषणा को स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं थी इसलिये आंदोलन बंद कर दिया गया। खेड़ा सत्याग्रह दो कारणों से महत्त्वपूर्ण माना जाता है। एक तो यह सिद्ध हो गया कि सत्याग्रह का मार्ग प्रभावशाली है जिससे सरकार को झुकाया जा सकता है। दूसरा महत्त्व इस बात में था कि इस आंदोलन ने वल्लभभाई को राष्ट्रीय नेता बना दिया, यद्यपि यह सरदार पटेल की पहली ही सफलता थी। खेड़ा सत्याग्रह का समापन समारोह नाडियाद में 29 जून 1918 को आयोजित किया गया जिसमें गांधीजी भी आये।

इस अवसर पर एक विशाल जुलूस निकाला गया तथा एक जनसभा आयोजित की गई। जुलूस पर पूरे रास्ते में नाडियाद के नागरिकों ने भारी पुष्प वर्षा की तथा जुलूस निकालने वालों का स्वागत किया। जनसभा में गांधीजी को एक सम्मान पत्र भेंट किया गया।

गांधीजी ने इस अवसर पर एक भाषण दिया जिसमें उन्होंने इस आंदोलन की सफलता का समस्त श्रेय वल्लभभाई को प्रदान किया। इस आंदोलन की सफलता के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल गांधीजी के पक्के चेले बन गए। एक धीर-गंभीर पुरुष जो सब तरह के ढोंग, पाखण्ड में दिखावे को नकारता था, आंखें मूंदकर गांधीजी का भक्त बन गया। आगे चलकर पटेल को और पूरे देश को इस अंधभक्ति का खामियाजा भुगतना पड़ा जब गुरु ने चेले को प्रधानमंत्री की कुर्सी से वंचित कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विश्वयुद्ध के मोर्चे पर भारतीय युवक

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अंग्रेज चाहते थे कि प्रथम विश्वयुद्ध के मोर्चे पर भारतीय युवक लड़ने के लिए भेजे जाएं किंतु भारतीय युवक अंग्रेजों से मुक्ति चाहते थे इसलिए वे अंग्रेजों की तरफ से लड़ने के लिए जाने को तैयार नहीं थे।

अंग्रेजों की साम्राज्य लिप्सा ने संसार को दो भागों में बांट दिया। एक भाग में संसार के वे देश थे जो अंग्रेजों के अधीन थे और दूसरे भाग में वे देश थे जो अंग्रेजों के शत्रु हो गये थे। अंग्रेजों की साम्राज्य लिप्सा के चलते ई.1914 में पहला विश्वयुद्ध आरम्भ हुआ। इस युद्ध में एक तरफ इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस, इटली, जापान तथा अमरीका आदि देश थे तथा दूसरी तरफ जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी, ऑटोमन एम्पायर तथा बुल्गारिया आदि देश थे।

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वर्ष 1918 आरम्भ होते-होते अंग्रेजों ने विश्वयुद्ध के मोर्चे पर इतनी बड़ी संख्या में सैनिक गंवा दिये कि अब उसे अपने गुलाम देशों के नौजवानों को बल पूर्वक सेना में भरती करके युद्ध के मोर्चों पर भेजना पड़ा। अप्रेल 1918 में वायसराय ने दिल्ली में युद्ध परिषद का आयोजन किया जिसमें गांधीजी को भी बुलाया गया। इस युद्ध परिषद में वायसराय ने गांधीजी के समक्ष प्रस्ताव रखा कि कांग्रेस, भारतीय नौजवानों को ब्रिटिश सेना में भरती होने के लिये प्रेरित करे। इसके बदले में युद्ध की समाप्ति के बाद भारत को स्वतंत्रता प्रदान की जायेगी।

गांधीजी ने अंग्रेजों के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। कांग्रेस के राजनीतिक मंच से देश के नौजवानों का आह्वान किया कि वे प्रथम विश्वयुद्ध के मोर्चे पर जाएं किंतु नौजवानों ने गांधीजी की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। गांधीजी ने वल्लभभाई को अपना रिक्रूटिंग सार्जेण्ट नियुक्त किया तथा उन्हें गांव-गांव जाकर नौजवानों को सेना में भरती होने के लिये प्रेरित करने की जिम्मेदारी दी। भारत में आम आदमी गांधीजी की इस राय से सहमत नहीं था कि भारतीय नौजवानों को सेना में भरती होकर विश्व युद्ध के मोर्चे पर जाना चाहिये।

आम भारतीय का मानना था कि यदि अंग्रेज प्रथम विश्वयुद्ध के मोर्चे पर हार जायेंगे तो स्वतः ही भारत छोड़कर भाग जायेंगे। इसलिये कांग्रेस को इस अभियान में अधिक सफलता नहीं मिली।

वल्लभभाई ने गांधीजी के कहने पर, गुजरात के गांवों में जाकर नौजवानों का आह्वान किया कि वे भारतीय सेना में भर्ती होकर विश्वयुद्ध के मोर्चे पर जायें। इससे उन्हें संसार को जानने का तथा संसार में भारत की स्थिति को समझने का अवसर मिलेगा।

नौजवानों ने सरदार पटेल का सहज ही विश्वास कर लिया और वे बड़ी संख्या में भारतीय सेना में भर्ती हो गये। नवम्बर 1918 में जर्मनी परास्त हो गया तथा विश्वयुद्ध समाप्त हो गया। इस कारण भारतीय नौजवानों की भरती बंद कर दी गई।

सरदार पटेल का अनुमान सही निकला। जो भारतीय नौजवान प्रथम विश्वयुद्ध के मोर्चे पर गए थे, वे जब लौट कर आये, उन्होंने भारत की स्थिति की तुलना संसार के अन्य देशों से की। उन सैनिकों को भरोसा हो गया कि भारत में भी संसार के समक्ष पूरी तरह तन कर खड़े होने की क्षमता है।

इन सिपाहियों ने अपने गांवों में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार किया। इन नौजवानों को पूरा भरोसा था कि यदि समस्त भारतीय एकजुट होकर अंग्रेजों को खदेड़ दें तो भारत को आसानी से स्वतंत्र कराया जा सकता है। इस कारण कांग्रेस का आंदोलन और व्यापक हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

असहयोग आंदोलन की बागडोर

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असहयोग आंदोलन मोहनदास कर्मचंद गांधी द्वारा एवं कांग्रेस द्वारा चलाए गए आंदोलना में सर्वप्रमुख माना जाता है तथा इसे सत्याग्रह आंदोलन भी कहा जाता है। इस आंदोलन का नेतृत्व सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया था। जिस समय असहयोग आंदोलन चलाया गया, उस समय गांधीजी बीमार थे इस कारण कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन की बागडोर सरदार पटेल को सौंप दी!

भारतीयों को विश्वास था कि प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद अंग्रेज सरकार, भारतीयों द्वारा लम्बे समय से की जा रही होमरूल की मांग को स्वीकार करके भारतीयों को राहत देगी किंतु अंग्रेज सरकार ने होमरूल की मांग को अस्वीकार कर दिया तथा ई.1919 में रोलट कमेटी के गठन की घोषणा की। इससे कांग्रेस की बड़ी किरकिरी हुई तथा अंग्रेजों का घिनौना साम्रज्यवादी चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया।

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रौलट कमेटी ने दो एक्ट लागू करने की सिफारिश की- पहले एक्ट में यह प्रावधान था कि कुछ विशेष मामलों में भारतीयों को अपील का अधिकार न दिया जाये तथा उन मुकदमों की सुनवाई विशेष अदालतों में एकांत में हो। इस एक्ट में यह भी प्रावधान था कि किसी भी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर बंदी बना लिया जाये। कमेटी द्वारा सुझाये गये दूसरे एक्ट में यह प्रावधान था कि यदि किसी व्यक्ति के पास आपत्तिजनक दस्तावेज बरामद हों तो उसे दो साल का कारावास दिया जाये।

इसमें यह भी प्रावधान था कि यदि किसी व्यक्ति पर संदेह हो कि वह आपराधिक वारदात कर सकता है तो उससे जमानत मांगी जाये। स्पष्ट था कि रौलट कमेटी ने भारतीयों के नागरिक अधिकारों का निर्लज्ज हनन करने की सिफारिश की थी। इस कारण पूरे भारत में उत्तेजना फैल गई। रौलट एक्ट के विरोध में गुजरात में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। अहमदाबाद में उग्र भीड़ ने पुलिस स्टेशन, तारघर एवं अन्य सरकारी भवनों में आग लगा दी और स्थान-स्थान पर उग्र प्रदर्शन करके इस काले कानून का विरोध किया। 13 अप्रेल 1919 को पंजाब प्रांत के अमृतसर में बैसाखी वाले दिन एक आम सभा का आयोजन किया गया। जनरल डायर ने निहत्थे एवं निर्दोष लोगों की सभा पर अंधाधुंध गोलियां चलवाईं जिससे 379 लोगों की मृत्यु हो गई तथा 1137 व्यक्ति घायल हो गये।

कांग्रेस ने जनरल डायर के कुकृत्य की जांच की मांग की। कांग्रेस को अपेक्षा थी कि रौलट एक्ट के विरोध में गांधीजी कुछ करेंगे किंतु गांधीजी बीमार थे इसलिये वे कुछ निर्णय नहीं ले सके और दिसम्बर 1919 तक कुछ नहीं किया जा सका। दिसम्बर 1919 के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्र्रेस ने प्रस्ताव पारित किया कि रोलट एक्ट तथा जलियावालां नरसंहार के विरोध में सत्याग्रह और नागरिक अवज्ञा का आंदोलन चलाया जाये।

प्रस्ताव पारित होने के बाद पुनः एक साल तक कुछ नहीं किया गया। दिसम्बर 1920 में नागपुर में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता विजय राघवाचार्य ने की। इस अधिवेशन में पुनः सत्याग्रह आंदोलन वाला प्रस्ताव दोहराया गया। कांग्रेस, गांधीजी के कहने से प्रस्ताव तो पारित कर रही थी किंतु गांधीजी स्वयं उसका नेतृत्व करने में स्वयं को सक्षम नहीं पा रहे थे। इसलिये गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को गुजरात से प्रारम्भ करने का निर्णय लिया तथा असहयोग आंदोलन की बागडोर सरदार पटेल को सौंप दी!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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पुराणों में कालगणना: भारतीय परम्परा में समय का विशाल स्वरूप पुराणों में कालगणना की मूल अवधारणा कालगणना भारतीय परम्परा में समय को समझने की एक विशिष्ट...
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Ebook The Quantum Universe and Vedanta

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The Ebook The Quantum Universe and Vedanta by Dr. Mohanlal Gupta explores the fascinating relationship between quantum physics, consciousness, cosmic origins, and the philosophical insights of ancient Indian Vedanta.
पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण - bharatkaitihas.com

पुराणों का सामान्य सर्वेक्षण

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पुराणों की पौराणिकता - bharatkaitihas.com

पुराणों की पौराणिकता

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1. भारतीय वाङ्मय में पुराणों का महत्त्व भारतीय वाङ्मय में पुराणों का स्थान अतुलनीय है। पुराण धार्मिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ज्ञान के महत्त्वपूर्ण स्रोत...
पुराण का वास्तविक स्वरूप - bharatkaitihas.com

पुराणों का वास्तविक स्वरूप

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