गांधीजी ने असहयोग आंदोलन का नेतृत्व सरदार पटेल को सौंपा था। असहयोग आंदोलन को सफल बनाने के लिये सरदार पटेल ने वकालात छोड़ दी। उनके साथ उनके बड़े भाई विठ्ठल भाई पटेल भी वकालात छोड़कर पूरी तरह से असहयोग आंदोलन में कूद पड़े।
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नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस द्वारा पुनः असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिये जाने के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को आरम्भ करने के लिये गुजरात के बारदोली नामक स्थान को चुना तथा वल्लभभाई को उसका नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी। वल्लभभाई ने गांधीजी का आदेश मानकर आंदोलन का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया। वल्लभभाई ने इस आंदोलन को व्यापक और प्रभावी रूप में चलाया।
देखते ही देखते आंदोलन चारों तरफ फैल गया। वस्तुतः नाडियाद में हुए सम्मेलन में ही वल्लभभाई ने बारदोली आंदोलन की रूपरेखा तैयार कर ली थी इसलिये इस आंदोलन को बहुत तेजी से आरम्भ किया जा सका। वल्लभभाई के नेतृत्व में अहमदाबाद में एक विशाल जुलूस निकाला गया और एक आमसभा का आयोजन किया गया। इस आमसभा में उन किताबों को बेचा गया जिन पर सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा था। बारदोली आंदोलन के दौरान वल्लभभाई ने सत्याग्रह नामक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया
तथा इसे आरम्भ करने के लिये सरकार से कोई अनुमति प्राप्त नहीं की। क्योंकि वल्लभभाई जानते थे कि सरकार इस पत्रिका को निकालने की अनुमति कभी नहीं देगी। सत्याग्रह एवं असहयोग आंदोलन को सफल बनाने के लिये रवीन्द्रनाथ ठाकुर आदि ख्याति प्राप्त लोगों ने तथा जन साधारण ने सरकारी उपाधियाँ लौटा दीं। गांधीजी ने कैसरे-हिन्द स्वर्ण पदक तथा युद्ध पदक लौटा दिये।
वल्लभभाई पटेल, उनके भाई विट्ठलभाई, देशबंधु चितरंजनदास, मोतीलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एवं जवाहरलाल नेहरू आदि नेताओं ने वकालत छोड़ दी। सेठ जमनालाल बजाज ने उन वकीलों को जीवन निर्वाह के लिए एक लाख रुपया दिया जो वकालत छोड़कर असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े थे। सरकारी स्कूलों व न्यायलायों का बहिष्कार होने लगा।
कांग्रेस के आह्वान पर काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, राष्ट्रीय कॉलेज लाहौर, जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ली आदि शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई। जब ड्यूक ऑफ कनॉट 1919 के सुधारों का उद्घाटन करने भारत आया तो देश-व्यापी हड़तालों से उसका स्वागत किया गया। स्थान-स्थान पर विदेशी कपड़ों की होलियां जलाई गईं और सार्वजनिक रूप से हजारों चरखे काते गये।
2 अक्टूबर 1921 को गांधीजी का 53वां जन्मदिन मनाया गया। उस समय गांधीजी बम्बई में थे किंतु वल्लभभाई ने अहमदाबाद में एक विशाल जुलूस का आयोजन किया जिसका समापन खानपुर नदी के तट पर आयोजित एक विशाल जनसभा में हुआ। इस जनसभा के बाद विदेशी कपड़ों की होली जलाने का आयोजन किया गया।
वल्लभभाई के आह्वान पर अहमदाबाद के लोग बड़ी भारी संख्या में विदेशी कपड़े अपने साथ लेकर आये थे। इन कपड़ों से 16-17 फुट ऊँचा ढेर बन गया। सरदार पटेल ने इस ढेर पर खड़े होकर लोगों को सम्बोधित किया तथा उसके बाद विदेशी कपड़ों में आग लगा दी। जब कपड़ों की राख ठण्डी हो गई तो उसकी नीलामी की गई जिससे 626 रुपये एकत्रित हुए। यह राशि स्वदेशी फण्ड में जमा कर दी गई।
कांग्रेस के आह्वान पर देश की जनता ने बड़ी संख्या में सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया। इसे असहयोग आंदोलन भी कहा जाता है। जनता समझ रही थी कि इस आंदोलन से भारत को आजादी मिल जाएगी किंतु जब चौरीचौरा की घटना हुई तो गांधीजी ने सत्याग्रह आंदोलन बंद करने की घोषणा कर दी। अचानक हुई इस घोषणा से देशवासियों को धक्का लगा।
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पूरे देश में सत्याग्रह आंदोलन जोरों से चल रहा था। इस कारण अंग्रेज सरकार की हालत पतली हो गई। लोग लाठियां खा रहे थे और आंदोलन, धरने, जुलूस तथा प्रदर्शन कर रहे थे। देश की जनता ने अहिंसा के सिद्धांत में पूर्ण विश्वास रखते हुए कहीं भी पुलिस पर हाथ नहीं उठाया। 5 फरवरी 1922 को संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) के चौरीचौरा नामक स्थान पर जनता ने सरकार की नीतियों के विरोध में शांतिपूर्ण विधि से जुलूस निकाला।
पुलिस ने आंदोलनकारियों को सबक सिखाने के लिये निर्दोष लोगों पर गोलियां चलाईं। लोगों को गलियों में दौड़ा-दौड़ाकर बेरहमी से पीटा गया। इस पर जनता भी उग्र हो गई तथा सैंकड़ों लोगों ने उग्र होकर पुलिस थाने को घेर लिया। पुलिस वाले जान बचाने के लिये थाने में घुस गये। इस पर जनता ने थाने में आग लगा दी। इस अग्निकाण्ड में 21 पुलिसकर्मी जलकर मर गये। जब यह समाचार गांधीजी को मिला तो उन्होंने यह कहकर सत्याग्रह आंदोलन बंद बंद करने की घोषणा कर दी कि वे ऐसे आंदोलन को नहीं चलायेंगे जिसमें हिंसा हुई हो।
गांधीजी के इस निर्णय से देश की जनता कांग्रेस के विरुद्ध भड़क गई। जनता की दृष्टि में चौरीचौरा की घटना इतनी बड़ी नहीं थी, जिसके कारण राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रश्न को भी छोड़ दिया जाये। कांग्रेस के भीतर भी गांधीजी के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं।
मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपतराय, सुभाषचंद्र बोस, चितरंजनदास तथा जवाहरलाल नेहरू आदि नेताओं ने गांधीजी की प्रकट रूप से आलोचना की और गांधीजी के निर्णय को बहुत बड़ी भूल बताया। गांधजी अकेले पड़ गये। न कांग्रेस के भीतर तथा न कांग्रेस के बाहर, कहीं से भी गांधीजी को समर्थन नहीं मिला। गांधीजी ने 1920 में मुसमलानों द्वारा आरम्भ किये गये खिलाफत आंदोलन को भी अपने असहयोग आंदोलन में जोड़ लिया था।
अतः असहयोग आंदोलन के बंद हो जाने से खिलाफत आंदोलन भी बंद हो गया। इसलिये मुसलमानों ने भी गांधीजी के विरुद्ध आवाज उठाई। ऐसे कठिन समय में वल्लभभाई ने गांधीजी का बचाव करते हुए कहा कि सच्चा सिपाही वह होता है जो अपने सेनापति की आज्ञा का पालन करे, जब सेनापति आगे बढ़ने को कहे तो सिपाही अपनी जान की परवाह किये बिना आगे बढ़े और जब सेनापति पीछे हटने को कहे तो सिपाही बिना किसी संकोच के पीछे हटे। वल्लभभाई के समर्थन के बाद कांग्रेसी नेता चुप हो गये।
जब सत्याग्रह आंदोलन स्थगित हो गया तो सरदार पटेल रचनात्मक कार्य में लग गये। उन्होंने गुजरात विद्यापीठ के लिये राशि एकत्रित करने का काम आरम्भ किया। उन्होंने बहुत भाग-दौड़ करके दस लाख रुपये जमा किये जो उस युग में एक बहुत बड़ी राशि थी।
जब ई.1920 में आरम्भ हुआ असहयोग आंदोलन अथवा सत्याग्रह आंदोलन ई.1922 में बिना किसी सफलता के बंद हो गया तब अंग्रेज अधिकारियों के हौंसले बढ़ गए। उन्होंने जनता को और अधिक प्रताड़ित करना आरम्भ कर दिया। इसके चलते नागपुर के कलक्टर ने झण्डा जुलूस पर पाबंदी लगा दी।
असहयोग आंदोलन की असफलता के कारण जनता के मन में बड़ी खीझ थी। इसलिए अब बात-बात पर जनता सरकारी मशीनरी से झगड़ा करने पर उतारू हो जाती थी। अंग्रेजों के लिए अब जनता को नियंत्रण में रख पाना कठिन होता जा रहा था।
उस काल में बहुत कम आयु के अंग्रेज लड़के बिना कोई समुचित प्रशिक्षण दिए ब्रिटिश भारत के जिलों में कलक्टर लगा दिए जाते थे। ये अनुभवहीन एवं प्रशिक्षणहीन अंग्रेज लड़के जनता पर मनमर्जी का कानून थोप देते थे जिसे उन दिनों व्यंग्य से पॉकेट रूल कहा जाता था।
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मई 1923 में नागपुर के अंग्रेज जिलाधीश ने तिरंगा झण्डा लेकर चलने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस पर स्वराजियों के जत्थे झण्डे लेकर निकलने लगे और गिरफ्तारियां देने लगे। एक दिन जमनालाल बजाज ने स्वराजियों का नेतृत्व करते हुए झण्डा जुलूस निकाला। उन्हें भी बंदी बना लिया गया।
जब यह समाचार, सरदार पटेल को मिला तो वे भी आंदोलन का नेतृत्व करने नागपुर पहुंचे। उन्होंने जिलाधीश के आदेश को अमान्य ठहराते हुए झण्डा आंदोलन जारी रखने की घोषणा की। इस पर जिलाधीश ने सरदार पटेल को वार्त्ता के लिये बुलाया। सरदार पटेल जिलाधीश के कार्यालय पहुंचे और उसे समझाया कि इस प्रकार के आंदोलनों पर रोक लगाने का न कोई औचित्य है और न कोई कानूनी आधार।
जिलाधीश समझ चुका था कि जब सरदार पटेल आंदोलन में कूद पड़े हैं तो उसका परिणाम ब्रिटिश शासन के लिये अच्छा नहीं होगा इसलिये जिलाधीश ने पटेल की बात मान ली और तिरंगा झण्डा लेकर चलने पर रोक हटा ली। उसने बंदी बनाये गये समस्त सत्याग्रहियों को भी रिहा कर दिया। इसके बाद नागपुर में जनता ने बड़ी शान से झण्डा जुलूस निकाला।
सरदार पटेल ने सरकारी मनमानी के विरुद्ध बोरसद आंदोलन चलाया
बोरसद आंदोलन कांग्रेस का अथवा गुजरात सभा का आंदोलन नहीं था। इसे सरदार पटेल ने बोरसद के स्थानीय लोगों के सहयोग से चलाया था। बोरसद आंदोलन के माध्यम से सरदार पटेल ने अंग्रेज सरकार की पुलिस के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करके जनता को अनावश्यक कर से मुक्ति दिलवाई।
बोरसद सरदार पटेल की पुरानी कर्मभूमि थी। वहाँ अचानक चोरियों का सिलसिला आरम्भ हो गया। डकैतियां होने लगीं तथा अन्य अपराधों में भी वृद्धि हो गई। जब जनता ने सरकार से कहा कि वह अपराधियों पर लगाम लगाये तो सरकार ने जनता पर ही आरोप लगा दिया कि बोरसद के लोग बेहद डरपोक एव दब्बू हैं इसलिये वहाँ अपराध अधिक हो रहे हैं।
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सरकार ने अतिरिक्त पुलिस व्यवस्था के नाम पर बोरसद के लोगों पर 2.40 लाख रुपये का अतिरिक्त वार्षिक कर लगा दिया। लोगों ने वल्लभभाई से सरकार की इस कार्यवाही की शिकायत की। सरदार ने स्वयं मामले की जांच की तो पता लगा कि अली नामक एक डकैत ने एक ऐसे अपराधी को पकड़वाने में पुलिस अधीक्षक की सहायता करने का वचन दिया था जिसे सरकार तत्काल पकड़ना चाहती थी। इसलिये अली और उसके आदमी जमकर लूटपाट मचा रहे थे और पुलिस अधीक्षक सहित पूरा विभाग चुप था।
वल्लभभाई को ज्ञात हुआ कि बोरसद की पुलिस, डकैत अली की गेंग को हथियार उपलब्ध करा रही है। यह एक विचित्र स्थिति थी। एक ओर पुलिस डकैतों से मिली हुई थी और दूसरी ओर सरकार, अतिरिक्त पुलिस व्यवस्था के नाम पर 16 साल से बड़े प्रत्येक व्यक्ति पर 2 रुपये 7 आने का टैक्स लगाकर खर्चे की भरपाई कर रही थी। जिन लोगों ने टैक्स नहीं दिया, उनके मवेशी तथा जमीनें जब्त कर ली गईं।
बहुत से लोगों को पकड़कर जेलों में ठूंस दिया गया। जब बोरसद में डाकुओं तथा पुलिस का कहर जारी था, दुर्भाग्य से उन्हीं दिनों बोरसद और उसके आसपास के क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ गया। यह कोढ़ में खाज हो जाने जैसा था। एक ओर से चोर-डाकू लूट रहे थे, दूसरी ओर से सरकार और पुलिस लूट रही थी, तीसरी ओर से प्रकृति भी अकाल लेकर आ धमकी। पूरे क्षेत्र में हाहाकार मच गया। सरदार पटेल ने लोगों से अपील की कि वे समस्याओं का सामना धैर्य से करें तथा सरकार को अतिरिक्त कर न दें।
जब गोरी सरकार बोरसद के लोगों का बलपूर्वक दमन करने पर उतर आई तो वल्लभभाई ने 9 दिसम्बर 1923 को नवजीवन नामक समाचार पत्र में एक वक्तव्य प्रकाशित करवाया तथा समस्त गुजरात को बोरसद ताल्लुके की समस्या से अवगत कराते हुए सहायता करने की अपील की- ‘बोरसद और आनंद तहसील की निर्दोष जनता पर सरकार ने 2.50 लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया है। इसके साथ ही 500 गांवों में पुलिस बल तैनात कर दिया है। इसका प्रतिरोध करते हुए जनता ने सत्याग्रह करने का निर्णय लिया है।
प्रत्येक ग्राम में बाहर से बुलाई गई पुलिस तैनात की गई है। उनमें से कुछ पुलिसवालों ने लोगों पर तरह-तरह के अत्याचार करने आरम्भ कर दिये हैं। लुटेरों के आतंक से त्रस्त जनता अब पुलिस के आतंक में फंसी है। स्त्रियों की इज्जत पर भी हाथ डाला जा रहा है। पटवारियों को आदेश दिये गये हैं कि वे तुरंत जब्ती करें। जल्दी वसूली करने वालों को पगड़ी का लालच दिया जा रहा है। ऐसी कष्टप्रद स्थिति में लोगों को आश्वस्त करने और उनके दुःख में सहभागी बनने की आवश्यकता है।
गुजरात के नवयुवकों के लिये जनता की सेवा करने का यह सुनहरा अवसर हाथ आया है। जो बोरसद में सेवा करने के इच्छुक हों, वे प्रांतीय समिति के मंत्री के नाम अपना आवेदन तुरंत भेजें। इस लड़ाई में धन की जरूरत पड़ेगी। मुझे आशा है कि गुजरात स्वयं बोरसद के आंदोलन के लिये पर्याप्त धन दे सकता है। सहायता करने के इच्छुक, गुजरात प्रांतीय समिति को चंदा भेज सकते हैं।’ -वल्लभभाई झबेरभाई पटेल।
इस अपील का गुजरात की जनता पर जादू जैसा असर हुआ। लोग दूर-दूर से आकर सत्याग्रह के लिये एकत्रित होने लगे। व्यापारियों ने अपना कारोबार बंद करके बोरसद के लोगों के साथ सहानुभूति जताई। जब्ती से बचने के लिये किसान अपने मवेशियों को लेकर जंगलों में चले गये। औरतों ने ताम्बे और पीतल के बरतन छिपा दिये तथा मिट्टी के बरतनों से काम चलाने लगीं। बोरसद आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया।
वल्लभभाई बिना किसी संगठन का सहारा लिये, बोरसद का आंदोलन चला रहे थे। एक तरफ शक्तिशाली अंग्रेज शासन तंत्र था जो अत्याचार करने का अभ्यस्त था। तो दूसरी ओर सरदार का असरदार व्यक्तित्व किसी भी आंदोलन को नेतृत्व देने में सक्षम था। वल्लभभाई को भय था कि लोग सरकारी अत्याचारों से टूट जायेंगे। इसलिये वे गांव-गांव जाकर जोशीले भाषण देते और लोगों को अन्याय के समक्ष मजबूती से डटे रहने के लिये प्रेरित करते। उनके भाषणों से जनता में नई आशा का संचार होता था तथा सरकार के विरुद्ध संघर्ष करने की हिम्मत पैदा होती थी।
जब बोरसद आंदोलन लम्बा खिंच गया और उसका कोई परिणाम नहीं निकला तो ईश्वर ने सरदार पटेल की सहायता करने का निश्चय किया। उन्हीं दिनों बम्बई का गवर्नर बदल गया तथा सर लेजली विल्सन बम्बई का गवर्नर बनकर आया। एक दिन उसने समाचार पत्रों में सरदार पटेल का वह भाषण पढ़ा जिसमें उन्होंने अपराधों में पुलिस की मिली-भगत का भण्डाफोड़ करते हुए बोरसद के पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी किये गये गुप्त सर्कुलर का राज खोला था जिसमें पुलिस कर्मियों को निर्देश दिये गये थे
कि वे चोरी-डकैती की घटनाओं पर ध्यान न दें। सर लेजली ने वास्तविकता जानने के लिये होम मेम्बर सर मौरिस हेवर्ड को बोरसद भेजा। सर हेवर्ड ने पूरे क्षेत्र का दौरा किया तथा स्थान-स्थान पर लोगों से बात करके तथ्यों का पता लगाया। इस जांच के दौरान वह गुप्त सर्कूलर भी हेवर्ड के हाथ लग गया।
सर हेवर्ड ने बम्बई लौटकर गवर्नर को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि सरदार पटेल द्वारा लगाये गये समस्त आरोप सही थे। गवर्नर ने तुरंत कार्यवाही करते हुए 8 जनवरी 1924 को अनुचित टैक्स निरस्त कर दिया। सरदार पटेल ने इस न्यायसंगत कार्यवाही के लिये गवर्नर को धन्यवाद दिया।
यह एक शानदार सफलता थी जिसे सरदार ने अपने व्यक्तित्व और सत्यनिष्ठा के बल पर कर दिखाया था। जनता ने इस आंदोलन में सरदार का ऐसा अभूतपूर्व साथ दिया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। गांधीजी ने सरदार की इस सफलता की प्रशंसा करते हुए उन्हें बोरसद के राजा की उपाधि दी।
अब तक सरदार पटेल गुजरात के विभिन्न भागों में आंदोलन करते रहे थे तथा उनके द्वारा किया गया हर आंदोलन निर्णायक बिंदु पर पहुंचा था। जबकि गांधीजी द्वारा चलाया गया कोई भी आंदोलन अब तक सफल नहीं हुआ था। चम्पारन के किसानों को पूरी तरह राहत नहीं मिली थी तथा असहयोग आंदोलन भी बीच में बंद कर दिया गया था।
चूंकि मुसलमानों द्वारा चलाये जा रहे खिलाफत आंदोलन को भी असहयोग आंदोलन से जोड़ लिया गया था, इस कारण खिलाफत आंदोलन भी विफल हो गया था। मुसलमानों को लगता था कि खिलाफत आंदोलन को विफल करने के लिये ही गांधीजी ने असहयोग आंदोलन बंद किया था। इस कारण गांधीजी की चौतरफा आलोचना हो रही थी और सरदार पटेल की सफलताओं के किस्से पूरे देश के समाचार पत्रों में छप रहे थे। वे देश की धड़कन बनते जा रहे थे।
अंग्रेज सरकार द्वारा अहमदाबाद नगरपालिका को भंग किए जाने के बार सरदार पटेल ने अहमदाबाद में स्कूल खोलकर सरकार की मनमानी का करारा जवाब दिया।
ई.1917 में सरदार पटेल ने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया था तथा केवल सात वर्ष की अवधि में सरदार पटेल लोगों के दिलों की धड़कन बन चुके थे। उन्होंने अपनी मोटी कमाई त्यागकर बारदोली, नागपुर तथा बोरसद के आंदोलनों का सफल नेतृत्व किया था। इसलिये ई.1924 में अहमदाबाद की जनता ने सरदार पटेल को अहमदाबाद नगर पालिका का अध्यक्ष चुन लिया। अहमदाबाद उन दिनों गंदा शहर हुआ करता था। पटेल ने लोगों को सफाई के लिये प्रेरित करने हेतु स्वयं हाथ में झाड़ू लेकर शहर की सफाई की।
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उन्होंने शहर में पार्क, खेल के मैदान एवं मनोरंजन केन्द्र विकसित किये। पटेल ने नगर पालिका में प्रस्ताव पारति करवाया कि नगर पालिका द्वारा संचालित समस्त स्कूलों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया जाये, क्योंकि सरकारी नियंत्रण के कारण स्कूलों में सरकारी दृष्टिकोण से शिक्षा दी जाती थी। पटेल ने इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स को लिखा कि अब वह नगर पालिका के स्कूलों को न तो अनुदान भेजे और न निरीक्षण करने के लिये आये। नगर पालिका में पारित प्रस्ताव पर कमिश्नर ने नाराजगी व्यक्त की तथा उस प्रस्ताव को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि नगर पालिका अपने समस्त स्कूल सरकार को सौंप दे।
इस पर नगर पालिका ने अपने समस्त स्कूल एक माह के लिये बंद कर दिये तथा सरकार को लिखा कि वह अपने 300 अध्यापकों को वापस बुला ले। सरकार के लिये बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो गई कि वह इन्हें कहां खपाये? सरकार ने इन स्कूलों के हिसाब की जांच करने के लिये एक इंस्पेक्टर नियुक्त किया। इस पर सरदार पटेल ने जवाब भिजवाया कि जब हम सरकार से अनुदान ही नहीं ले रहे तो जांच किस बात की ? यह सीधा टकराव था जिसके कारण गोरी सरकार बुरी तरह से तिलमिला गई।
कमिश्नर ने नगर पालिका को नोटिस भेजा कि वह अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं कर रही इसलिये सरकार समस्त स्कूलों को सरकारी नियंत्रण में ले रही है। कमिश्नर ने सरकार को लिखा कि अहमदाबाद की नगर पालिका को भंग कर दिया जाये। कमिश्नर की अनुशंसा पर सरकार ने नगर पालिका बोर्ड को निलम्बित करके उसके संचालन के लिये एक समिति का गठन कर दिया। वल्लभभाई ने सरकार की समस्त कार्यवाही का तीव्र विरोध किया।
यह सारा विवाद स्कूलों को लेकर आरम्भ हुआ था इसलिये सरदार पटेल ने समानान्तर शिक्षा के लिये राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों की स्थापना का निर्णय लिया। उन्होंने अहमदाबाद की जनता से इन स्कूलों की स्थापना के लिये चंदा देने की अपील की। जनता ने शीघ्र ही 1.25 लाख रुपये चंदा जमा करवा दिया।
सरदार पटेल ने!
सरदार पटेल ने इस राशि से अहमदाबाद में स्कूल खोलकर सरकार को करारा जवाब दिया! इन स्कूलों को सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्कूल नाम दिया। दो वर्ष तक चले व्यापक संघर्ष के बाद सरकार ने हार मान ली तथा नगर पालिका बोर्ड को फिर से बहाल कर दिया। ई.1928 तक सरदार पटेल उसके अध्यक्ष बने रहे।
सरदार पटेल गुजरात की जनता की सेवा करने के लिए सरकारी सहायता, किसी संस्था या किसी धनी व्यक्ति का मुंह नहीं ताकते थे। वे अपने दम पर बड़े से बड़ा काम हाथ में लेते तथा उस कार्य को पूरा कर लेते। इस कारण गुजरात की जनता उन्हें गरीब नवाज तथा अपना मसीहा कहती थी।
ई.1927 में गुजरात में भयानक वर्षा हुई। अहमदाबाद नगर में वर्ष भर में औसतन 30 इंच वर्षा होती थी किंतु उस वर्ष 23 जुलाई से 28 जुलाई की अवधि में ही 68 इंच वर्षा हो गई। इससे अहमदाबाद में भयानक बाढ़ आ गई तथा 5093 मकान ढह गये। इस कारण बहुत से लोग मर गये, बहुत से बेघर हो गये तथा हजारों लोगों को खाने के लाले पड़ गये। वल्लभभाई उस समय अहमदाबाद नगर पालिका के अध्यक्ष थे।
उन्होंने संकट की इस घड़ी में लोगों की बहुत सेवा की। स्थान-स्थान पर पानी भर गया था जिसे निकालना बहुत बड़ी समस्या थी। इसलिये सरदार ने उन नालों को तुड़वा दिया जिनमें मिट्टी भर जाने से वे अवरुद्ध हो गये थे। सरदार ने नगर पालिका के समस्त संसाधनों को झौंक दिया किंतु लोगों की समस्याओं का पार न था। इस पर सरदार पटेल ने अपनी सहायता के लिये बम्बई से अपने अग्रज विट्ठलभाई को भी बुला लिया।
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वे भी दिन-रात काम में लगे रहकर गुजरात की जनता की सेवा करने लगे। वल्लभभाई ने गुजरात गुजरात की जनता से अपील की कि वे अहमदाबाद के लोगों की मदद के लिये चंदा दें। इस पर डेढ़ लाख रुपये की राशि एकत्रित हुई। यह एक बहुत बड़ी राशि थी फिर भी त्रासदी इतनी बड़ी थी कि उसमें यह राशि ऊँट के मुँह में जीरे से अधिक नहीं थी। यदि तेजी से निर्णय नहीं लिये जाते और शीघ्र ही कुछ और न किया जाता तो अहमदाबाद में महामारी फैल जाने का भय था। इसलिये विट्ठलभाई ने अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए वायसराय को अहमदाबाद का दौरा करने का निमंत्रण दिया। बम्बई के जो नेता विट्ठलभाई के सम्पर्क में थे, उन्होंने भी वायसराय से अपील की कि वे अहमदाबाद का दौरा करें। इस पर 9 दिसम्बर 1927 को वायसराय लॉर्ड इरविन स्वयं अहमदाबाद आया। उसने बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का व्यापक दौरा किया तथा नगर पालिका तथा वल्लभभाई द्वारा किये गये कार्यों की सराहना की। वल्लभभाई ने वायसराय को गुजरात की जनता की समस्याओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। सरदार पटेल ने मांग की कि सरकार अपने खर्चे से उन लोगों के मकान बनवाये जो फिर से मकान बनावाने की स्थिति में नहीं हैं।
वायसराय इर्विन, सरदार पटेल की समस्त बातों से सहमत था, इसलिये वह इस विपत्ति में केन्द्र सरकार की ओर से पर्याप्त सहायता भिजवाने का वचन देकर लौट गया। उसने दिल्ली पहुंचकर अहमदाबाद में गिरे हुए मकानों के पुनर्निर्माण के लिये 1 करोड़ रुपये भिजवाये। सरदार पटेल ने इस सहायता के लिये केन्द्र सरकार का उदार हृदय से धन्यवाद ज्ञापित किया।
गोरी सरकार ने सरदार पटेल को मानवता का सच्चा सेवक कहकर उनका सम्मान किया। समस्त गुजरात की जनता ने वल्लभभाई को गरीब नवाज तथा मसीहा कहकर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की। जवाब में सरदार पटेल ने कहा कि मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ जो इतना भी न समझूं कि इतना बड़ा कार्य मेरे अकेले के बस का नहीं था।
बारदोली आंदोलन सरदार पटेल द्वारा गुजरात में किए गए जनआंदोलनों के क्रम की महत्वपूर्ण कड़ी था। इस आंदोलन को कांग्रेस अथवा गुजरात सभा का आंदोलन नहीं कहा जा सकता। जब अंग्रेजों ने सरदार पटेल को बाहरी आदमी बताया तो सरदार पटेल ने गोरी सरकार से कहा, बारदोली में बाहरी मैं नहीं, आप हैं!
ई.1927 में अहमदाबाद अतिवृष्टि का शिकार होकर सिसक रहा था किंतु काठियावाड़ क्षेत्र के बारदोली ताल्लुके में उस वर्ष फसलें बहुत अच्छी हुईं। सरकार ने बारदोली पर 30 प्रतिशत भू-राजस्व बढ़ा दिया। यह सरासर अन्याय था। ऐसा कोई कानून नहीं था। इसलिये जनता ने सरदार पटेल से सम्पर्क किया।
सरदार ने बम्बई के गर्वनर से इस अन्यायपूर्ण आदेश को वापस लेने के लिये पत्र लिखा किंतु सरकार ने उन्हें जवाब नहीं दिया। जनता चाहती थी कि शीघ्र ही कुछ हो किंतु सरकार अपने निर्णय को लागू करने पर उतारू थी। वे सरदार से तुरंत आंदोलन आरम्भ करने के लिये कहने लगे।
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इस पर 8 फरवरी 1928 को बारदोली तहसील परिषद् की बैठक आयोजित की गई। इसकी अध्यक्षता सरदार पटेल ने की। इस बैठक में अहमदाबाद और आनंद से भी नेतागण भाग लेने आये। इनमें महादेव देसाई तथा आनंद स्वामी प्रमुख थे। इस परिषद में सरदार पटेल ने किसानों से पूछा कि यदि वे सरकार के विरुद्ध आंदोलन करेंगे तो सरकार उनकी जमीनें, मवेशी और घरबार छीन लेगी। उन्हें जेलों में ठूंस देगी। उनके गांवों में आग लगायेगी और औरतों तथा बच्चों पर डण्डे बरसायेगी। क्या वे इतनी तकलीफें सहन करने को तैयार हैं ?
किसानों ने उन्हें कहा कि यदि सरदार पटेल उनका नेतृत्व करते हैं तो वे ये तकलीफें सहन करने के लिये तैयार हैं। परिषद में निर्णय लिया गया कि सरकारी अन्याय का विरोध करने के लिये व्यापक आंदोलन चलाया जाये किंतु उससे पहले बम्बई के गवर्नर को एक पत्र लिखकर इस आदेश को निरस्त करने का आग्रह किया जाये। पटेल ने बम्बई के गवर्नर को पत्र लिखकर कर वापस लेने का निवेदन किया किंतु गवर्नर ने पटेल को संक्षिप्त पत्र लिखकर सूचित किया कि उनका पत्र कानूनी परीक्षण के लिये भूमिकर विभाग को भेज दिया गया है।
जब सरकार ने कोई सकारात्मक उत्तर नहीं दिया तो बारदोली में सत्याग्रह का आयोजन किया गया। 12 फरवरी 1928 को बारदोली में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया जिसमें वंदे मातरम् के उद्घोष के साथ किसानों ने आंदोलन आरम्भ कर दिया। इस पर सरकारी अधिकारियों ने अखबारों में वक्तव्य छपवाये कि सरदार पटेल बाहरी आदमी हैं, उनका बारदोली से क्या सम्बन्ध है ?
सरदार पटेल ने अखबारों में उग्र प्रतिक्रिया देते हुए गरजकर कहा कि यह मेरा देश है, मैं जहाँ भी जाऊँ, इस देश का ही कहलाउंगा। बाहरी तो अंग्रेज हैं जो इस देश में आकर अन्यायपूर्ण तरीके से अधिकार करके बैठ गये हैं इसलिये अंग्रेजों को यहाँ से बाहर जाना चाहिये, न कि मुझे।
15 फरवरी 1928 को सरकार ने बारदोली क्षेत्र के 60 महाजनों को बढ़ा हुआ भूमिकर तत्काल जमा करवाने के आदेश दिये। उनमें से से दो महाजनों ने बढ़ा हुआ कर जमा करवा दिया। बारदोली के किसानों ने उन महाजनों का सामाजिक बहिष्कार करने की घोषणा की। इस पर सरदार ने लोगों को समझाया कि वे केवल सरकार से लड़ें, आपस में लड़ना ठीक नहीं है।
बारदोली में अंग्रेज सरकार द्वारा की जा रही मनमानियों के विरोध में सरदार पटेल ने जनता से कहा कि यह हाथी और मच्छर की लड़ाई है। गोरी सरकार पागल हाथी है, इम इसके कान में मच्छर बनकर घुसेंगे!
बारदोली आंदोलन को सुचारू रूप से चलाने के लिये वल्लभभाई ने सूक्ष्मता से तैयारी की। उन्होंने बारदोली तहसील को पांच भागों में विभक्त किया तथा हर भाग में एक छावनी स्थापित की। इन छावनियों में किसानों के आवास हेतु आधारभूत सुविधायें जुटाई गईं ताकि जब सरकार अन्यायपूर्वक कार्यवाहियां करके किसानों को उनके घरों से निकाल दे तब वे इन छावनियों में आकर रह सकें।
प्रत्येक गांव तक सत्याग्रह का संदेश पहुंचाने की व्यवस्था की गई। इसी प्रकार पूरे क्षेत्र में घटने वाली घटनाओं की सूचना केन्द्रीय कार्यालय तक पहुंचाने के लिये भी व्यापक प्रबंध किये गये। आंदोलन के समाचार जनसाधारण तक पहुंचाने के लिये सत्याग्रह खबर समाचार पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया गया। इस आंदोलन को चलाने के लिये सरदार ने गुजरात की जनता से अपील की कि वे मुक्त हस्त से दान दें ताकि अंग्रेज सरकार से लोहा लिया जा सके।
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इस प्रकार हाथी और मच्छर की लड़ाई आरम्भ हो गई। गुजरात की जनता को सरदार पटेल पर पूरा भरोसा था इसलिये जनता ने जी खोलकर दान दिया। इसके बाद सरदार ने बारदोली क्षेत्र के गांवों का दौरा आरम्भ किया। वे गांव-गांव जाकर लोगों को एकत्रित करते और उनके समक्ष जोशीले भाषण देते। सरदार ने किसानों से कहा कि उनसे उनके पुरखों की जमीनें नहीं छीनी जा सकतीं। यदि सरकार जमीनें छीनने का काम करती है तो समझना चाहिये कि देश में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है अपितु लुटेरे राज्य कर रहे हैं।
लुटेरों से हम अच्छी तरह निबटना जानते हैं। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि आंदोलन के नेता और किसान आपस में ऐसे मिल जायें जैसे दूध और पानी मिल जाते हैं। जब तक दूध में मिला पानी नहीं खौलता, तब तक दूध बरतन से बाहर नहीं निकल सकता और जब पानी खौलने लगता है तो दूध, बरतन से बाहर निकलकर आग को बुझाने की चेष्टा करता है। इस प्रकार दोनों एक दूसरे की रक्षा करने का प्रयास करते हैं।
सरदार ने किसानों से कहा कि गोरी सरकार पागल हाथी के समान व्यवहार कर रही है। अपनी ताकत के सामने किसानों को मच्छर समझती है। इसलिये हमें मच्छर बनकर ही इस पागल हाथी के कानों में घुसना होगा। यदि हम ऐसा कर सके तो यह विशाल हाथी तड़पकर जमीन पर गिर पड़ेगा।
सरदार की बातें किसानों के हृदय और मस्तिष्क को छूती थीं। वे इस दृढ़ संकल्प नेता के पीछे आंखें मूंदकर चल पड़े। किसानों को विश्वास था कि उनका नेता समस्या का अंत लेकर ही दम लेगा और यदि इस बार उन्होंने अपने नेता का साथ न देकर कमजोरी दिखाई तो सरकार भविष्य में भी किसानों पर बेखौफ होकर अत्याचार करेगी।
इसलिये इस आंदोलन को पहले के समस्त आंदोलनों से भी अधिक समर्थन मिला। 12 जून 1928 को गांधीजी की अपील पर पूरे देश में बारदौली दिवस मनाया गया। बारदोली दिवस मनाने से हाथी और मच्छर की लड़ाई पूरे देश के सामने प्रकट हो गई।
बात-बात पर गोले-गोलियां चलाने वाली अंग्रेज सरकार की जिद किसानों के ढोल नगाड़ों के सामने फीकी पड़ गई जिससे बारदोली आंदोलन की सफलता सुनिश्चित हो गई।
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जब बारदोली के किसानों ने कर नहीं चुकाया तो सरकार ने अपनी उग्र कार्यवाहियां आरम्भ कर दीं। सरकार ने एक किसान पर 700 रुपये का कर लगाया तथा कर न चुकाने पर उसकी 40 हजार रुपये मूल्य की जमीन जब्त कर ली। एक अन्य किसान के पास 33 एकड़ उपजाऊ भूमि थी जिसका मूल्य लगभग 15 हजार रुपये था। सरकार ने उस भूमि को जब्त करके एक अन्य व्यक्ति को केवल 161 रुपये में बेच दिया।
30 हजार रुपये मूल्य वाली एक अन्य भूमि को केवल 151 रुपये में बेचा गया। इसी प्रकार किसानों के दुधारू पशुओं को जब्त करके कौड़ियों के भाव बेचा जाने लगा। इसके बाद सरकारी कारिंदों ने घरों में घुसकर किसानों के हल-बैल खोल लिये। इस पर किसानों ने सामूहिक रूप से सरकारी कारिंदों का सामना करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने पशुओं को घरों में बंद कर दिया। जब सरकारी कारिंदे गांव की तरफ आते हुए दिखाई पड़ते तो लोग ढोल, नगाड़े एवं शंख बजाने लगते।
इन आवाजों को सुनकर गांव के स्त्री-पुरुष लट्ठ लेकर एकत्रित हो जाते। सरकारी कारिंदों का गांवों में घुसना असम्भव हो गया। इस पर सरकार ने आदेश जारी किया कि कोई भी व्यक्ति ढोल, नगाड़े तथा शंख नहीं बजायेगा। जब सरदार पटेल को सरकार के इस आदेश की जानकारी हुई तो उन्होंने अखबारों में वक्तव्य प्रकाशित करवाया कि गोले-गोलियों वाली सरकार ढोल-नगाड़ों की आवाज से डर गई है। सरदार पटेल ने लोगों से अपील की कि ढोल-नगाड़े बजाते रहो तथा लगान मत दो।
कुछ ही दिनों में बारदोली आंदोलन की सफलता सामने दिखाई देने लगी और बारदोली आंदोलन राष्ट्रीय अखबारों में सुर्खियां पाने लगा। पूरे देश की दृष्टि बारदोली आंदोलन पर आ टिकी। गोरी सरकार के विरुद्ध यह एक अद्भुत प्रयोग था जो पहली बार देश में होने जा रहा था। इस आंदोलन के आगे, देश के अब तक के समस्त आंदोलन फीके पड़ गये।
बम्बई के गवर्नर ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका एक छोटा सा आदेश, सम्पूर्ण गोरी सरकार की प्रतिष्ठा को खतरे में डाल देगा किंतु अब तो तीर, तरकष से निकल चुका था। इसका कुछ न कुछ दुष्परिणाम तो होना ही था। इसलिये सरकार ने कुछ लोगों को प्रलोभन देने आरम्भ किये। इन प्रलोभनों में आकर कुछ किसानों ने आंदोलनकारियों का साथ छोड़कर सरकार की आवाज में आवाज मिलाना आरम्भ कर दिया।
आंदेलनकारी किसान चाहते थे कि इन गद्दारों को सबक सिखाया जाये किंतु सरदार पटेल ने इस बार भी पुरानी बात दोहराई कि आपस में मत लड़ो। सारी शक्ति सरकार से लड़ने में लगाओ।इस पर किसानों ने निर्णय लिया कि जो लोग सरकार के साथ होते हैं, उनका बहिष्कार किया जाये ताकि गद्दारी करने की बीमारी दूसरे लोगों में न फैले।
इस पर पटेल ने लोगों से कहा कि गलत आदमी का बहिष्कार करना समाज का अधिकार है किंतु उसके विरुद्ध हिंसा न की जाये। यदि वह व्यक्ति पारिवारिक समारोह में किसी को भोजन के लिये बुलाये तो बेशक उसके घर कोई न जाये किंतु यदि वह बीमार पड़ जाये तो उसकी सेवा करने के लिये गांव का प्रत्येक व्यक्ति उसके घर जाये।
जब बारदोली के किसानों ने सरकार की बात नहीं मानी तथा बढ़ा हुआ कर नहीं चुकाता तो सरकार ने किसानों पर अत्याचार बढ़ा दिए। इस पर सरदार पटेल ने गांवों का दौरा बढ़ा दिया। लोग सरदार पटेल का सम्मान करने के लिए आतुर रहते। फटे चीथड़ों वाली ग्रामीण महिलाएं पटेल के भाल पर तिलक लगाती थीं!
किसानों पर की गई ज्यादतियों के उपरांत भी जब बारदोली का आंदोलन शिथिल नहीं हुआ तो अंग्रेजों की सरकार ने दो नये उपाय किये। उन्होंने गांवों में गुण्डों की टोलियां भेजना आरम्भ किया जो गांवों में जाकर लोगों के साथ मारपीट करती तथा औरतों के साथ बदतमीजी करती।
साथ ही सरकार ने किसानों के पशुओं को खूंटों से बांधकर उन्हें चारे-पानी से वंचित कर दिया। सरकार का विश्वास था कि जब किसान अपने पशुओं को खूंटों से भूखा-प्यासा बंधा देखेंगे तो टूट जायेंगे। सरदार पटेल को इस अत्याचार का तोड़ ढूंढना था।
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उन्होंने लगान वसूल करने वाले पटेलों और तलातियों से अपील की कि वे अपने भाइयों पर हो रहे अत्याचारों में भागीदार न बनें तथा अपने पदों का त्याग कर दें। सरदार पटेल की इस अपील ने सूखे जंगल में आग की भूमिका निभाई। बारदोली तहसील के 90 में 69 पटेलों तथा 35 तलातियों ने तत्काल अपने पद त्याग दिये और किसानों के साथ हो गये। नगरों में रहने वाली जनता की सहानुभूति भी पूरी तरह किसानों के साथ हो गई। जब सरकारी कारिंदे कुर्की के लिये गांव जाना चाहते तो कोई उन्हें अपनी सवारी नहीं देता था।
नाइयों ने सरकारी कारिंदो के बाल काटने और दाढ़ी छीलनी बंद कर दी। जिन लोगों ने किसानों के मवेशी तथा जमीनें खरीदी थीं, उनके घरों में काम करने वाले नौकरों ने काम करना बंद कर दिया। भले ही वह कितने ही रुपये देने का लालच क्यों न दे! जब दोनों ही पक्ष अपने-अपने मंतव्य पर अड़े रहे तो बम्बई धारासभा के सदस्य कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने बम्बई के गवर्नर को पत्र लिखकर आग्रह किया कि वह बारदोली के किसानों की समस्या सुलझाये किंतु गवर्नर पर इस पत्र का कोई प्रभाव नहीं हुआ।
इसके बाद मुंशी स्वयं बारदोली आये और उन्होंने सरकार द्वारा किये जा रहे अत्याचारों को स्वयं अपनी आंखों से देखा। वे सरदार पटेल के काम करने के तरीके को देखकर हैरान रह गये। मुंशी ने गवर्नर को तीखी भाषा में एक पत्र लिखा-
‘आपको भले ही यह रिपोर्ट मिली हो कि किसान आंदोलन बाहर से थोपा गया है किंतु वास्तविकता यह है कि आंदोलन वास्तविक है और रिपोर्ट झूठी।
अपने दुधारू पशुओं को बचाने के लिये विगत तीन महीनों से यहाँ स्त्री-पुरुष और बच्चे, अपने पशुओं के साथ अंधेरे, गोबर तथा बदबू से भरी कोठरियों में पड़े हैं। इस तरह की बुरी स्थिति का उदाहरण मध्यकाल में भी नहीं मिल सकता है। सारे जोर-जुल्म सहकर भी किसान, सरकारी दमन का मजाक ही उड़ा रहे हैं।
सरदार पटेल उनके एकछत्र नेता हैं, वे जहाँ भी जाते हैं, लोग सरदार पटेल का सम्मान करते हैं तथा उनके स्वागत को उमड़ पड़ते हैं। फटे चीथड़ों में लिपटी गांव की बेहाल स्त्रियां पटेल के माथे पर तिलक लगाकर उनका अभिनंदन करती हैं। वल्लभभाई के आदेश के बिना बारदोली में कोई काम नहीं होता। मैं आपको यह सब इसलिये लिख रहा हूँ कि आपको वास्तविकता का ज्ञान हो सके।’
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