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हाथी और मच्छर

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बारदोली में अंग्रेज सरकार द्वारा की जा रही मनमानियों के विरोध में सरदार पटेल ने जनता से कहा कि यह हाथी और मच्छर की लड़ाई है। गोरी सरकार पागल हाथी है, इम इसके कान में मच्छर बनकर घुसेंगे!

बारदोली आंदोलन को सुचारू रूप से चलाने के लिये वल्लभभाई ने सूक्ष्मता से तैयारी की। उन्होंने बारदोली तहसील को पांच भागों में विभक्त किया तथा हर भाग में एक छावनी स्थापित की। इन छावनियों में किसानों के आवास हेतु आधारभूत सुविधायें जुटाई गईं ताकि जब सरकार अन्यायपूर्वक कार्यवाहियां करके किसानों को उनके घरों से निकाल दे तब वे इन छावनियों में आकर रह सकें।

प्रत्येक गांव तक सत्याग्रह का संदेश पहुंचाने की व्यवस्था की गई। इसी प्रकार पूरे क्षेत्र में घटने वाली घटनाओं की सूचना केन्द्रीय कार्यालय तक पहुंचाने के लिये भी व्यापक प्रबंध किये गये। आंदोलन के समाचार जनसाधारण तक पहुंचाने के लिये सत्याग्रह खबर समाचार पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया गया। इस आंदोलन को चलाने के लिये सरदार ने गुजरात की जनता से अपील की कि वे मुक्त हस्त से दान दें ताकि अंग्रेज सरकार से लोहा लिया जा सके।

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इस प्रकार हाथी और मच्छर की लड़ाई आरम्भ हो गई। गुजरात की जनता को सरदार पटेल पर पूरा भरोसा था इसलिये जनता ने जी खोलकर दान दिया। इसके बाद सरदार ने बारदोली क्षेत्र के गांवों का दौरा आरम्भ किया। वे गांव-गांव जाकर लोगों को एकत्रित करते और उनके समक्ष जोशीले भाषण देते। सरदार ने किसानों से कहा कि उनसे उनके पुरखों की जमीनें नहीं छीनी जा सकतीं। यदि सरकार जमीनें छीनने का काम करती है तो समझना चाहिये कि देश में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है अपितु लुटेरे राज्य कर रहे हैं।

लुटेरों से हम अच्छी तरह निबटना जानते हैं। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि आंदोलन के नेता और किसान आपस में ऐसे मिल जायें जैसे दूध और पानी मिल जाते हैं। जब तक दूध में मिला पानी नहीं खौलता, तब तक दूध बरतन से बाहर नहीं निकल सकता और जब पानी खौलने लगता है तो दूध, बरतन से बाहर निकलकर आग को बुझाने की चेष्टा करता है। इस प्रकार दोनों एक दूसरे की रक्षा करने का प्रयास करते हैं।

सरदार ने किसानों से कहा कि गोरी सरकार पागल हाथी के समान व्यवहार कर रही है। अपनी ताकत के सामने किसानों को मच्छर समझती है। इसलिये हमें मच्छर बनकर ही इस पागल हाथी के कानों में घुसना होगा। यदि हम ऐसा कर सके तो यह विशाल हाथी तड़पकर जमीन पर गिर पड़ेगा।

सरदार की बातें किसानों के हृदय और मस्तिष्क को छूती थीं। वे इस दृढ़ संकल्प नेता के पीछे आंखें मूंदकर चल पड़े। किसानों को विश्वास था कि उनका नेता समस्या का अंत लेकर ही दम लेगा और यदि इस बार उन्होंने अपने नेता का साथ न देकर कमजोरी दिखाई तो सरकार भविष्य में भी किसानों पर बेखौफ होकर अत्याचार करेगी।

इसलिये इस आंदोलन को पहले के समस्त आंदोलनों से भी अधिक समर्थन मिला। 12 जून 1928 को गांधीजी की अपील पर पूरे देश में बारदौली दिवस मनाया गया। बारदोली दिवस मनाने से हाथी और मच्छर की लड़ाई पूरे देश के सामने प्रकट हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बारदोली आंदोलन की सफलता

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बात-बात पर गोले-गोलियां चलाने वाली अंग्रेज सरकार की जिद किसानों के ढोल नगाड़ों के सामने फीकी पड़ गई जिससे बारदोली आंदोलन की सफलता सुनिश्चित हो गई।

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जब बारदोली के किसानों ने कर नहीं चुकाया तो सरकार ने अपनी उग्र कार्यवाहियां आरम्भ कर दीं। सरकार ने एक किसान पर 700 रुपये का कर लगाया तथा कर न चुकाने पर उसकी 40 हजार रुपये मूल्य की जमीन जब्त कर ली। एक अन्य किसान के पास 33 एकड़ उपजाऊ भूमि थी जिसका मूल्य लगभग 15 हजार रुपये था। सरकार ने उस भूमि को जब्त करके एक अन्य व्यक्ति को केवल 161 रुपये में बेच दिया।

30 हजार रुपये मूल्य वाली एक अन्य भूमि को केवल 151 रुपये में बेचा गया। इसी प्रकार किसानों के दुधारू पशुओं को जब्त करके कौड़ियों के भाव बेचा जाने लगा। इसके बाद सरकारी कारिंदों ने घरों में घुसकर किसानों के हल-बैल खोल लिये। इस पर किसानों ने सामूहिक रूप से सरकारी कारिंदों का सामना करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने पशुओं को घरों में बंद कर दिया। जब सरकारी कारिंदे गांव की तरफ आते हुए दिखाई पड़ते तो लोग ढोल, नगाड़े एवं शंख बजाने लगते।

इन आवाजों को सुनकर गांव के स्त्री-पुरुष लट्ठ लेकर एकत्रित हो जाते। सरकारी कारिंदों का गांवों में घुसना असम्भव हो गया। इस पर सरकार ने आदेश जारी किया कि कोई भी व्यक्ति ढोल, नगाड़े तथा शंख नहीं बजायेगा। जब सरदार पटेल को सरकार के इस आदेश की जानकारी हुई तो उन्होंने अखबारों में वक्तव्य प्रकाशित करवाया कि गोले-गोलियों वाली सरकार ढोल-नगाड़ों की आवाज से डर गई है। सरदार पटेल ने लोगों से अपील की कि ढोल-नगाड़े बजाते रहो तथा लगान मत दो।

कुछ ही दिनों में बारदोली आंदोलन की सफलता सामने दिखाई देने लगी और बारदोली आंदोलन राष्ट्रीय अखबारों में सुर्खियां पाने लगा। पूरे देश की दृष्टि बारदोली आंदोलन पर आ टिकी। गोरी सरकार के विरुद्ध यह एक अद्भुत प्रयोग था जो पहली बार देश में होने जा रहा था। इस आंदोलन के आगे, देश के अब तक के समस्त आंदोलन फीके पड़ गये।

बम्बई के गवर्नर ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका एक छोटा सा आदेश, सम्पूर्ण गोरी सरकार की प्रतिष्ठा को खतरे में डाल देगा किंतु अब तो तीर, तरकष से निकल चुका था। इसका कुछ न कुछ दुष्परिणाम तो होना ही था। इसलिये सरकार ने कुछ लोगों को प्रलोभन देने आरम्भ किये। इन प्रलोभनों में आकर कुछ किसानों ने आंदोलनकारियों का साथ छोड़कर सरकार की आवाज में आवाज मिलाना आरम्भ कर दिया।

आंदेलनकारी किसान चाहते थे कि इन गद्दारों को सबक सिखाया जाये किंतु सरदार पटेल ने इस बार भी पुरानी बात दोहराई कि आपस में मत लड़ो। सारी शक्ति सरकार से लड़ने में लगाओ।इस पर किसानों ने निर्णय लिया कि जो लोग सरकार के साथ होते हैं, उनका बहिष्कार किया जाये ताकि गद्दारी करने की बीमारी दूसरे लोगों में न फैले।

इस पर पटेल ने लोगों से कहा कि गलत आदमी का बहिष्कार करना समाज का अधिकार है किंतु उसके विरुद्ध हिंसा न की जाये। यदि वह व्यक्ति पारिवारिक समारोह में किसी को भोजन के लिये बुलाये तो बेशक उसके घर कोई न जाये किंतु यदि वह बीमार पड़ जाये तो उसकी सेवा करने के लिये गांव का प्रत्येक व्यक्ति उसके घर जाये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल का सम्मान

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जब बारदोली के किसानों ने सरकार की बात नहीं मानी तथा बढ़ा हुआ कर नहीं चुकाता तो सरकार ने किसानों पर अत्याचार बढ़ा दिए। इस पर सरदार पटेल ने गांवों का दौरा बढ़ा दिया। लोग सरदार पटेल का सम्मान करने के लिए आतुर रहते। फटे चीथड़ों वाली ग्रामीण महिलाएं पटेल के भाल पर तिलक लगाती थीं!

किसानों पर की गई ज्यादतियों के उपरांत भी जब बारदोली का आंदोलन शिथिल नहीं हुआ तो अंग्रेजों की सरकार ने दो नये उपाय किये। उन्होंने गांवों में गुण्डों की टोलियां भेजना आरम्भ किया जो गांवों में जाकर लोगों के साथ मारपीट करती तथा औरतों के साथ बदतमीजी करती।

साथ ही सरकार ने किसानों के पशुओं को खूंटों से बांधकर उन्हें चारे-पानी से वंचित कर दिया। सरकार का विश्वास था कि जब किसान अपने पशुओं को खूंटों से भूखा-प्यासा बंधा देखेंगे तो टूट जायेंगे। सरदार पटेल को इस अत्याचार का तोड़ ढूंढना था।

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उन्होंने लगान वसूल करने वाले पटेलों और तलातियों से अपील की कि वे अपने भाइयों पर हो रहे अत्याचारों में भागीदार न बनें तथा अपने पदों का त्याग कर दें। सरदार पटेल की इस अपील ने सूखे जंगल में आग की भूमिका निभाई। बारदोली तहसील के 90 में 69 पटेलों तथा 35 तलातियों ने तत्काल अपने पद त्याग दिये और किसानों के साथ हो गये। नगरों में रहने वाली जनता की सहानुभूति भी पूरी तरह किसानों के साथ हो गई। जब सरकारी कारिंदे कुर्की के लिये गांव जाना चाहते तो कोई उन्हें अपनी सवारी नहीं देता था।

नाइयों ने सरकारी कारिंदो के बाल काटने और दाढ़ी छीलनी बंद कर दी। जिन लोगों ने किसानों के मवेशी तथा जमीनें खरीदी थीं, उनके घरों में काम करने वाले नौकरों ने काम करना बंद कर दिया। भले ही वह कितने ही रुपये देने का लालच क्यों न दे! जब दोनों ही पक्ष अपने-अपने मंतव्य पर अड़े रहे तो बम्बई धारासभा के सदस्य कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने बम्बई के गवर्नर को पत्र लिखकर आग्रह किया कि वह बारदोली के किसानों की समस्या सुलझाये किंतु गवर्नर पर इस पत्र का कोई प्रभाव नहीं हुआ।

इसके बाद मुंशी स्वयं बारदोली आये और उन्होंने सरकार द्वारा किये जा रहे अत्याचारों को स्वयं अपनी आंखों से देखा। वे सरदार पटेल के काम करने के तरीके को देखकर हैरान रह गये। मुंशी ने गवर्नर को तीखी भाषा में एक पत्र लिखा-

‘आपको भले ही यह रिपोर्ट मिली हो कि किसान आंदोलन बाहर से थोपा गया है किंतु वास्तविकता यह है कि आंदोलन वास्तविक है और रिपोर्ट झूठी।

अपने दुधारू पशुओं को बचाने के लिये विगत तीन महीनों से यहाँ स्त्री-पुरुष और बच्चे, अपने पशुओं के साथ अंधेरे, गोबर तथा बदबू से भरी कोठरियों में पड़े हैं। इस तरह की बुरी स्थिति का उदाहरण मध्यकाल में भी नहीं मिल सकता है। सारे जोर-जुल्म सहकर भी किसान, सरकारी दमन का मजाक ही उड़ा रहे हैं।

सरदार पटेल उनके एकछत्र नेता हैं, वे जहाँ भी जाते हैं, लोग सरदार पटेल का सम्मान करते हैं तथा उनके स्वागत को उमड़ पड़ते हैं। फटे चीथड़ों में लिपटी गांव की बेहाल स्त्रियां पटेल के माथे पर तिलक लगाकर उनका अभिनंदन करती हैं। वल्लभभाई के आदेश के बिना बारदोली में कोई काम नहीं होता। मैं आपको यह सब इसलिये लिख रहा हूँ कि आपको वास्तविकता का ज्ञान हो सके।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी का मंत्र

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सरदार पटेल ने गांधीजी का मंत्र अपनी जीवन में उतारा तथा उसे सार्वजनिक जीवन में सिद्ध करके दिखाया। यह मंत्र था सत्य पर अड़े रहना, जिसे गांधीजी सत्याग्रह कहते थे।

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के पत्र को पढ़कर बम्बई का गवर्नर हिल गया। उसे सरदार पटेल की शक्ति का अनुमान हो गया। उसे यह भी समझ में आ गया कि आंदोलन को विफल करने के सारे सरकारी हथकण्डे क्यों व्यर्थ सिद्ध हो रहे हैं ! बारदोली सत्याग्रह ने जितना उग्र रूप धारण कर लिया था, वह गोरी सरकार के लिये शुभ लक्षण नहीं था।

यदि यह आंदोलन कुछ दिनों के लिये ही, पूरे भारत में फैल जाये तो गोरी सरकार को अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर इंग्लैण्ड को लौट जाना पड़े। इसलिये गवर्नर ने सरदार पटेल से समझौता करने का मन बनाया। गवर्नर ने सरदार पटेल को समझौता वार्त्ता करने के लिये आमंत्रित किया। सरदार यहाँ भी पूरी तैयारी करके गये। उन्हें गोरी सरकार के शक्तिशाली गवर्नर से अकेले ही पंजा लड़ाना था।

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यदि इसमें जरा भी चूक हो जाती तो न केवल अब तक किये गये समस्त काम पर पानी फिर जाता अपितु जीवन भर के लिये बदनामी का कलंक भी उनके माथे पर लग जाता। लोगों ने सरदार पटेल पर विश्वास करके अपना बहुत कुछ दांव पर लगा रखा था। इसलिये सरदार पटेल ने गांधीजी का मंत्र कसकर पकड़ लिया तथा समझौते की टेबल पर दो टूक शब्दों में गवर्नर से कहा कि किसानों का बढ़ा हुआ कर माफ किया जाये। गवर्नर ने कहा कि सरकार लगान वृद्धि की जांच कराने तथा जांच के बाद उचित लगान तय करने के लिये तैयार है।

जहाँ लगान माफ किया जाना आवश्यक है, सरकार लगान माफ करने को भी तैयार है लेकिन शर्त यह है कि आंदोलन वापस ले लिया जाये और किसान पहले की तरह लगान देना आरम्भ कर दें। सरदार पटेल इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे कि गवर्नर उनसे अपील करे कि आंदोलन बंद किया जाये। सरदार पटेल ने गवर्नर से कहा कि आंदोलन बंद किया जा सकता है किंतु शर्त यह है कि आंदोलन के दौरान बंदी बनाये गये लोगों को तत्काल बिना शर्त रिहा किया जाये।

जिन सरकारी कर्मचारियों ने आंदोलन के दौरान नौकरियां छोड़ दी हैं, उन्हें तुरंत नौकरी पर वापस लिया जाये। जिन किसानों की जमीनें और पशुधन जब्त किया गया है, उसे तुरंत किसानों को लौटाया जाये। गवर्नर ने सरदार पटेल की समस्त बातें स्वीकार कर लीं। सम्भवतः गवर्नर को ज्ञात हो गया था कि उसका सामना किस दृढ़-निश्चयी और जिद्दी नेता से हुआ है। सरदार पटेल की नजरों में गांधीजी का मंत्र सफल हो गया था।

वस्तुतः इतिहासकारों ने बारदोली आंदोलन की सफलता का श्रेय गांधीजी को देते हुए लिखा है कि यह सरदार ने गांधीजी का मंत्र सार्वजनिक जीवन में सिद्ध करके दिखाया किंतु वस्तुतः गांधीजी अपने जीवन में किसी भी सत्याग्रह आंदोलन में सफल नहीं हुए थे। यह सफलता को पटेल के आत्मविश्वास की थी।

निश्चय ही यह एक शानदार जीत थी। पूरे देश में सरदार वल्ल्भभाई पटेल की सफलता का डंका बज गया। वस्तुतः आगे चलकर गांधीजी और कांग्रेस ने जिस राष्ट्रव्यापी आंदोलन का संचालन किया, उसका प्रथम प्रयोग सरदार पटेल के द्वारा बारदोली की प्रयोगशाला में ही सफल करके देखा गया।

देश को समझ में आ गया कि जनता की एकता से बड़ी कोई चीज नहीं है और पटेल उस एकता को उत्पन्न करने वाले जादूगर हैं। बारदोली में सशक्त सत्याग्रह करने के लिये ही उन्हें पहले बारदोली का सरदार और बाद में केवल सरदार कहा जाने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजनैतिक मंच से क्रांति नहीं होती

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प्रायः लोगों को यह भ्रम होता है कि किसी भी समाज में अथवा राष्ट्र में राजनीतिक मंच से क्रांति होनी संभव है किंतु वास्तविकता यह है कि राजनैतिक मंच से चिल्लाने से क्रांति नहीं होती!

बारदोली की सफलता के बाद सरदार पटेल एक चमत्कारिक पुरुष के रूप में देखे जाने लगे। उन्होंने वह कर दिखाया था जो उनसे पहले कोई नहीं कर पाया था। बम्बई की गोरी सरकार को हथियार डालते हुए पहली बार ही देखा गया था। इसलिये अब सरदार पटेल जहाँ भी जाते, उन्हें देखने के लिये लोगों की भीड़ लग जाती। अब वे राष्ट्र नायक थे। उन्हें देश में विभिन्न स्थानों पर भाषण देने, आंदोलनों का नेतृत्व करने, सभाओं और सम्मेलनों की अध्यक्षता करने के लिये बुलाया जाने लगा।

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मार्च 1929 में पांचवे काठियावाड़ राजनैतिक सम्मेलन की अध्यक्षता करने के लिये सरदार को बुलाया गया। उन्हीं दिनों महाराष्ट्र के कई हिस्सों में सरकार ने लगान में अनुचित वृद्धि की। काठियावाड़ के नेता चाहते थे कि सरदार न केवल सम्मेलन में आयें अपितु इस सम्मेलन में वे महाराष्ट्र में हुई कर वृद्धि के विरोध में एक आंदोलन की घोषणा करें और उस आंदोलन का नेतृत्व करना भी स्वीकार करें। सरदार को काठियावाड़ के नेताओं के बुरे हाल की जानकारी थी, इसलिये उन्होंने जाने से मना कर दिया। इस पर काठियावाड़ के नेता गांधीजी के पास गये और उनसे अनुरोध किया कि वे सरदार पटेल को आदेश दें ताकि सरदार, काठियावाड़ सम्मेलन की अध्यक्षता करें। गांधीजी ने सरदार के नाम आदेश भिजवा दिया।

इस प्रकार सरदार को काठियावाड़ सम्मेलन की अध्यक्षता करने के लिये जाना पड़ा। इस सम्मेलन में कई प्रस्ताव पारित किये गये तथा अंत में सरदार को अध्यक्षीय भाषण देने के लिये खड़ा किया गया। उनसे यह भी आग्रह किया गया कि वे महाराष्ट्र में कर वृद्धि के विरोध में किये जाने वाले आंदोलन का नेतृत्व करना स्वीकार करें। बारदोली आंदोलन की सफलता के बाद सरदार अत्यंत विनम्र हो गये थे किंतु स्पष्ट बोलने से परहेज भी नहीं करते थे।

इसलिये उन्होंने काठियावाड़ सम्मेलन में उपस्थित कांग्रेसियों को खरी-खरी सुनाते हुए कहा कि आपने प्रस्ताव तो बहुत पारित किये हैं किंतु वे व्यर्थ ही हैं, यदि उन पर अमल न हो। मैं देख रहा हूँ कि यहाँ नेता तो बहुत हैं किंतु संगठित एवं कर्मठ कार्यकर्ता नहीं हैं। कोई भी संघर्ष तब तक सफल नहीं होता जब तक उसके लिये बलिदान न दिया जाये। उन्होंने कहा कि मैं किसान का बेटा हूँ इसलिये मुझे मीठा बोलना नहीं आता किंतु यदि मैं अपनी बात से आपको सही रास्ता दिखाने का प्रयास करूं तो मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगा। मेरी स्पष्ट राय है कि किसी राजनैतिक मंच से चीखने-चिल्लाने से क्रांति नहीं होती।

वस्तुतः तब तक कांग्रेस की कार्यप्रणाली इसी प्रकार की ढुलमुल रवैये वाली थी जिसमें मंच से प्रस्ताव पारित किये जाते किंतु उन्हें कार्यान्वित करने के लिये कुछ नहीं किया जाता। सरदार के अतिरिक्तअन्य सभी नेताओं ने छोटे-मोटे आंदोलन किये थे जबकि गांधीजी ने कुछ बड़े किंतु असफल आंदोलन किये थे। इन असफलताओं का कारण यही था कि राजनैतिक मंच से क्रांति नहीं होती।

उनका अंत भी भयानक असफलताओं में हुआ था। इसलिये पटेल ने नेताओं को न केवल सच का दर्पण दिखाया अपितु कुछ दिनों तक महाराष्ट्र में घूमकर राष्ट्रीय जन-जागरण की अलख भी जगाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बालगंगाधर तिलक की अनुगूंज

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इस काल तक सरदार पटेल न केवल गुजरात कांग्रेस के अपितु अखिल भारतीय कांग्रेस के भी सर्वमान्य नेता बन गए थे। उन्होंने बोरसद, खेड़ा, अहमदाबाद एवं बारदोली में सफल आंदोलन चलाए थे। कांग्रेसी नेताओं को सरदार पटेल की वाणी में बालगंगाधर तिलक की अनुगूंज सुनाई देती थी।

अभी सरदार पटेल महाराष्ट्र में जन-जागरण के कार्य से निवृत्त हुए ही थे कि उन्हें चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने वेदारण्य में होने वाले तलिमनाडु राजनैतिक सम्मेलन की अध्यक्षता के लिये आमंत्रित किया। पटेल ने सदा की तरह अनिच्छा प्रकट कर दी। इस पर राजाजी ने गांधीजी से सम्पर्क किया। गांधीजी ने इस बार भी अपना आदेश दोहरा दिया और वल्लभभाई को तमिलनाडु जाना पड़ा।

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उन दिनों तमिलनाडु में ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों में वैमनस्य अपने चरम पर था। राजाजी ने पटेल से आग्रह किया कि वे इस दिशा में कुछ करें। पटेल ने इस सम्मेलन में भी लोगों से यह कहा कि केवल नारेबाजी करने और प्रस्ताव पारित करने से कुछ नहीं होता, ठोस रचनात्मक कार्य करें तथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग अपनायें। सम्मेलन के बाद पटेल ने तमिलनाडु के गांवों का व्यापक दौरा किया तथा ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मण समुदायों के लोगों से बात की। पटेल ने गैर-ब्राह्मण समुदायों के लोगों को समझाया कि क्या ब्राह्मणों ने आपका उतना बुरा कर दिया है, जितना अंग्रेजों ने किया है ? पांच हजार मील दूर से आकर वे आपके ऊपर शासन कर रहे हैं।

वे विजातीय हैं, फिर भी ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण दोनों ही समुदायों के लोग उनकी पूजा करते हैं! ब्राह्मण ऊँचे कैसे हैं ? सबसे ऊँचा तो वह है जो अन्न उपजाकर दूसरों को भोजन देता है। फिर आप ब्राह्मणों को ऊँचा और स्वयं को नीचा क्यों मानते हैं ? पटेल ने ब्राह्मणों को भी समझाया कि वे समस्त लोगों से बराबरी का व्यवहार करें। यही उचित है। यदि समाज एक नहीं हुआ तो हम विदेशी शासकों का राज समाप्त नहीं कर पायेंगे।

सरदार के शब्दों का जादू ऐसा था कि ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण दोनोें ही समुदायों के लोगों पर उनकी बातों का गहरा असर पड़ा तथा उनके बीच के मनमुटाव में कमी आई।

अभी सरदार तमिलनाडु में ही थे कि गंगाधरराव देशपाण्डे ने उन्हें कर्नाटक में दो दिन का दौरा करने का निमंत्रण दिया। सरदार ने उस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। गंगाधरराव कर्नाटक में किसानों का एक संगठन बनाना चाहते थे। सरदार पटेल ने दो दिन में दस विशाल जनसभाओं को सम्बोधित किया तथा किसानों को निर्भय होने एवं संगठित होने के लिये प्रेरित किया।

उन्होंने किसानों को समझाया कि किसी से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, न नौकरशाही से, न पुलिस से, न जेल से, न कुर्की से, न अत्याचार से। संगठित और निर्भय होकर इन समस्त समस्याओं का सामना किया जा सकता है। उन्होंने किसानों से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का भी आह्वान किया।

जब सरदार किसानों को सम्बोधित कर रहे थे तो गंगाधरराव को लगा जैसे बालगंगाधर तिलक बोल रहे हैं। उनकी वाणी में वही ओज, आंखों में वही आक्रोश दिखाई दिया। महादेव भाई ने भी सरदार के बारे में लिखा है कि उनकी वाणी में बाल गंगाधर की अनुगूंज सुनाई देती है। दोनों के हाव-भाव में भी समानता है। दोनों बाहर से जितने कठोर लगते हैं, अंदर से उतने ही कोमल हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बिहारी किसानों की दुर्दशा देखकर सरदार पटेल का हृदय रो उठा

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जब से देश में तुर्कों का आगमन हुआ था, तब से पूरे देश के किसानों की हालत खराब होने लगी थी। मुगलों के काल में भी किसानों का बहुत शोषण हुआ। अंग्रेजों ने जमींदारी व्यवस्था को मजबूत करके किसानों के शोषण के लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित कर दिया। बिहारी किसानों की दुर्दशा देखकर सरदार पटेल का हृदय रो उठा!

कर्नाटक के दौरे के बाद सरदार पटेल ने बिहार में 15 दिन का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने सीतामढ़ी, मुंगेर, चम्पारण और गया में आयेजित जिला सम्मेलनों को सम्बोधित किया।

जब बिहार के लोगों को ज्ञात हुआ कि सरदार पटेल आये हैं तो दूर-दूर से लोग उन्हें सुनने के लिये आने लगे। बिहार के किसानों की दशा, गुजरात के किसानों से भी अधिक खराब थी। दोनों ही प्रांतों के किसानों को दिल्ली सल्तनत के काल में, मुगलों के काल में तथा परवर्ती शासकों के काल में बुरी तरह लूटा-खसोटा और बर्बाद किया गया था।

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बिहार के किसानों को बर्बाद करने में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी और अब ब्रिटिश ताज उनका शोषण कर रहा था। वल्लभभाई स्वयं एक किसान के पुत्र थे इसलिये किसानों की दुर्दशा को उनसे अधिक और कौन समझ सकता था। बिहारी किसानों की दुर्दशा देखकर सरदार पटेल का हृदय रो उठा। उन्होंने बिहार के किसानों का आह्वान किया कि अपनी दुर्दशा को पहचानो और अपने अधिकारों के लिये संगठित होकर संघर्ष करो।

जमींदारों से मत डरो। किसान तो सबका अन्नदाता है, अतः वह सबसे श्रेष्ठ है, उन सबसे भी श्रेष्ठ है जो स्वयं को ऊँचे तबके का समझते हैं। सरदार के भाषणों से गरीब किसानों में नया जोश जगता था, वे अपनी मुक्ति के लिये छटपटा रहे थे किंतु वे नहीं जानते थे कि संगठित किस प्रकार हुआ जाता है और संघर्ष किस प्रकार किया जाता है। सरदार उन्हें दोनों ही तरीके समझा रहे थे। सरदार पटेल ने बिहार में एक नई बात देखी। उन्होंने देखा कि पर्दा प्रथा ने जिस बुरी तरह बिहार को जकड़ रखा है, उतनी बुरी तरह से देश के अन्य प्रांतों को नहीं। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को संदेश दिया कि वे औरतों से पर्दा करवाना बंद करें। महिलाओं को चारदीवारी में कैद करके न रखें। ये हमारी माताएं, बहनें, बेटियां और पत्नी हैं। इनसे हर कार्य में सहयोग लें। सरदार ने बारदोली के आंदोलन में महिला स्वयं-सेवकों की टोलियों का गठन किया था जिन्होंने अद्भुत कार्य कर दिखाया था।

सरदार अब तक गुजराती बहिनों के उस योगदान को भूले नहीं थे। इसलिये वे बिहार के किसानों को बताते कि किस प्रकार बारदोली के आंदोलन में महिलाओं ने आगे बढ़कर सहयोग किया तथा किस प्रकार महिलाओं की दृढ़ता के कारण बारदोली के आंदोलनकारी अंत तक मोर्चे पर टिके रहे और सफलता लेकर ही माने।

बिहारी किसानों की दुर्दशा का कोई पार नहीं था किंतु उनके साथ बिहार के युवक भी बड़ी आशा भरी दृष्टि से सरदार पटेल की ओर देख रहे थे। सरदार ने नौजवानों को स्थान-स्थान पर सम्बोधित किया तथा उन्हें एक ही मंत्र दिया कि नारेबाजी बंद करके काम में जुट जाओ। जो काम करना चाहते हो, उसी को करने में अपनी पूरी ऊर्जा व्यय करो।

यदि राष्ट्र में क्रांति लानी है तो अपने जीवन में क्रांति लाओ। सरदार के पंद्रह दिन के दौरे ने बिहार जैसे पिछड़े राज्य में आशा की नई क्रांति उत्पन्न की और बिहार भी राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान देने के लिये तैयार हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता

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सरदार पटेल और मोहनदास कर्मचंद गांधी दोनों गुजराती थे। इस समय तक गांधीजी को जितनी भी सफलता मिली थी, उसमें सरदार वल्लभभाई पटेल का हाथ अधिक था। गांधीजी अपने दम पर अब तक कोई सफलता प्राप्त नहीं कर सके थे। फिर भी गांधजी को पटेल की बजाय नेहरू अधिक पसंद थे। गांधीजी की इच्छा देखकर पटेल ने लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता करने से मना कर दिया!

कांग्रेस अब तक औपनिवेशिक राज्य को ही अपनी मुख्य मांग बताती आई थी औपनिवेशिक राज्य का अर्थ था अंग्रेजों की छत्रछाया में भारतीयों की ऐसी सरकार जिसमें कानून बनाने को सर्वोच्च अधिकार अंग्रेजों के पास रहें तथा भारतीय तत्व स्थानीय विषयों के सम्बन्ध में कानून बना सकें।

युवा नेताओं को औपनिवेशिक राज्य की मांग पसंद नहीं आती थी। वे पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित करना चाहते थे। युवा कांग्रेसियों को लगता था कि पूर्ण स्वराज्य हेतु संघर्ष करने के लिए सरदार पटेल ही सर्वाधिक उपयुक्त नेता हैं। इसलिए जब दिसम्बर 1929 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन होना तय हुआ तो कांग्रेसियों ने लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए सरदार पटेल को अधिक उपयुक्त समझा।

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उस काल में ग्यारह ब्रिटिश प्रांत थे। इन सभी प्रांतों में प्रांतीय कांग्रेस का गठन हुआ था। समस्त प्रांतों से लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए सुझाव मांगे गए। दस प्रांतों से इस अधिवेशन के अध्यक्ष पद के लिये तीन नाम आये। पांच प्रांतों ने गांधीजी का, तीन प्रांतों ने सरदार पटेल का तथा दो प्रांतों ने जवाहरलाल नेहरू का नाम भेजा। गांधीजी चाहते थे कि जवाहरलाल को इस अधिवेशन की अध्यक्षता दी जाये, इसलिये उन्होंने स्वयं अध्यक्ष बनने से मना कर दिया। पटेल ने भी लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता करने से मना कर दिया।

जब लोगों ने पटेल से इसका कारण पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि मेरे सेनापति गांधीजी हैं, जहाँ वे रहेंगे, वहीं मैं रहूंगा। इस प्रकार जवाहरलाल को इस अधिवेशन की अध्यक्षता मिल गई।जवाहरलाल ने इस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित हो गया। 31 दिसम्बर 1929 को जवाहरलाल ने रावी नदी के तट पर तिरंगा फहराकर पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने के संकल्प की घोषणा कर दी। यह एक नये संघर्ष का आरम्भ था। आगे का पथ कांटों से भरा था जिसमें मुसीबतों के अतिरिक्त और कुछ न था। देश के सामने आग का दरिया था जिसे डूबकर पार करना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सविनय अवज्ञा आंदोलन

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मोहनदास कर्मचंद गांधी का ई.1914 में भारतीय राजनीति में पदार्पण हुआ था। विगत 16 साल की दीर्घ अवधि में वे चम्पारन आंदोलन तथा सत्याग्रह आंदोलन चला चुके थे जिन्हें बिना किसी सफलता के बंद कर दिया गया था। ई.1930 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाने की घोषणा की। इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए सरदार पटेल ने जनता का आह्वान किया कि जब तोपों से गोले बरसते हैं, तभी इतिहास बनता है!

जब गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की घोषणा की तो साबरमती से दाण्डी तक की पैदल यात्रा करके नमक कानून तोड़ने का कार्यक्रम बनाया। यह यात्रा 12 मार्च 1930 को आरम्भ होनी थी। गांधी ने इसे सफल बनाने की पूरी जिम्मेदारी सरदार पटेल पर डाल दी।

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सरदार अपना झोला उठाकर गुजरात के दौरे पर निकल गये और गांव-गांव जाकर उन्होंने गांधी की दाण्डी यात्रा की जानकारी दी तथा लोगों को सविनय अवज्ञा आंदोलन के महत्त्व के बारे में समझाया। उन्होंने अपने ओजस्वी वक्तव्यों से पूरे गुजरात में धूम मचा दी। वे लोगों को घरों से निकलकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने को कहते-

‘दुनिया आपसे सवाल करेगी कि आपने क्या किया ? मैं किसानों और दूसरों से पूछता हूँ कि आपकी ईश्वर में या स्वयं में आस्था है या नहीं ? क्या आप नहीं जानते कि जो जन्मा है, वह एक दिन अवश्य मरेगा। मौत से कोई नहीं बच सकता। इसलिए मरना है तो बहादुरों की मौत मरो। कायरों की नहीं। जब तोपों से गोले बरसते हैं, हवाई जहाजों से बम गिरते हैं, हजारों की संख्या में लोग मरते हैं, तभी इतिहास बनता है। वह दिन हमारे यहाँ कब आएगा ? वह दिन तभी आयेगा जब एक भी गुजराती, सरकार का साथ नहीं देगा। हम साबरमती के संत की बात को समझ लें तो यह सब आसान हो जायेगा। आवश्यकता इस बात की है कि आप अधिक से अधिक संख्या में गिरफ्तारियां दें।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी की दाण्डी यात्रा को सफल बनाने के लिये पटेल गांव-गांव घूमे

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गांधीजी की दाण्डी यात्रा को भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। इस यात्रा ने पूरे देश के लोगों का ध्यान कांग्रेस के कार्यक्रमों की तरफ खींचा। जब गांधीजी पैदल चले तो सैंकड़ों भावुक भारतीय भी इस आशा में उनके साथ हो लिए कि एक दिन यही व्यक्ति भारत को आजादी दिलवाएगा।

उधर गांधी, दाण्डी यात्रा की तैयारी कर रहे थे और इधर गांधीजी की दाण्डी यात्रा को सफल बनाने के लिये सरदार पटेल अपना झोला उठाये गांव-गांव जाकर भाषणों से आग बरसा रहे थे। सरदार ने लोगों को जानकारी दी कि सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान करबंदी, लगानबंदी, शराबबंदी, नमक सत्याग्रह, जंगल सत्याग्रह, गांजा, भांग और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना देने, सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और आदालतों का बहिष्कार करने एवं सरकारी कार्यक्रमों से असहयोग करने आदि कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे।

पटेल के भाषणों से लोगों की समझ में आने लगा था कि सविनय अवज्ञा आंदोलन का क्या अर्थ है ! सरदार के इस अलख-जागरण से गोरी सरकार भयभीत हो गई। उसने सरदार के भाषणों पर रोक लगा दी किंतु सरदार ने अपना काम जारी रखा। दाण्डी यात्रा आरम्भ होने में अब केवल सात दिन बचे थे। 7 मार्च 1930 को बोरसद के निकट रास गांव में सरदार एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करने के लिये पहुंचे।

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जब वे सभा में जाने लगे तो मजिस्ट्रेट ने उन्हें रोककर भाषण न देने का आदेश दिया। सरदार ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया। इस पर उन्हें तत्काल बंदी बनाकर बोरसद ले जाया गया जहाँ उन्हें तीन माह की कैद की सजा सुनाई गई। सरदार रास में एक शब्द भी भाषण नहीं दे पाये थे फिर भी उन्होंने इस सजा को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

एक दिन जिस युवक के नाम की पूरे लंदन में धूम मच गई थी आज उसी युवक को लंदन से आये गोरों ने उसके अपने देश में बंदी बना लिया था। जब यह समाचार देशवासियों को मिला तो देश में आक्रोश की ज्वाला फूट पड़ी। स्थान-स्थान पर धरने, प्रदर्शन, जनसभाएं होने लगीं। अहमदाबाद में विशाल जनसभा हुई। इस सभा में 75 हजार कण्ठ एक साथ यह शपथ लेने के लिये खुले कि जब तक देश स्वतंत्र नहीं होगा, वे सत्य तथा अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए, संघर्ष करते रहेंगे तथा अन्याय के समक्ष नहीं झुकेंगे। रास गांव से आये 500 लोग भी इस सभा में थे जहाँ सरदार अपना भाषण नहीं दे पाये थे। उन्होंने शपथ ली कि वे भी सत्याग्रह में सक्रिय भागीदारी निभायेंगे।

सरदार की लोकप्रियता अपने चरम पर पहुंच चुकी थी। सैंकड़ों लोगों ने उनके मार्ग पर चलने के लिये सरकारी नौकरियां छोड़ दीं। ये त्यागपत्र इस बात की गवाही देते थे कि लोग अपने सरदार से कितना प्रेम करते थे। 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने 79 कार्यकर्ताओं के साथ साबरमती आश्रम से समुद्र तट पर स्थित दाण्डी के लिये पैदल यात्रा आरम्भ की।

जिस समय गांधीजी की दाण्डी यात्रा आरम्भ हुई उस समय जेल में सरदार पटेल ने स्नान-ध्यान करके गीता का पाठ किया तथा भगवान से प्रार्थना की कि वे गांधी की यात्रा को सफल बनायें ताकि भारत की आजादी का मार्ग खुल सके। गांधी ने लगभग 200 मील की यात्रा 24 दिन में पूरी की।

5 अप्रैल 1930 को गांधीजी दाण्डी पहुंचे। 6 अप्रेल को आत्म-शुद्धि के उपरान्त गांधीजी ने समुद्र के जल से नमक बनाकर, नमक कानून भंग किया। गांधीजी की दाण्डी यात्रा को जो प्रसिद्धि मिली, उसके पीछे एक मात्र सरदार पटेल की ही तपस्या काम कर रही थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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