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ब्रिटिश कमिश्नर का स्वागत

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सरदार पटेल ने ब्रिटिश कमिश्नर का स्वागत करने के लिए खड़े होने से मना कर दिया!

सरदार पटेल किसी भी अंग्रेज का सम्मान नहीं करते थे। एक बार उन्होंने जेल में निरीक्षण करने आए ब्रिटिश कमिश्नर का स्वागत करने के लिए खड़े होने से मना कर दिया। इससे अंग्रेज बहुत कुपित हुए।

अंग्रेजों के शासन काल में ब्रिटिश अधिकारी स्वयं को भारत का स्वामी समझते थे और भारतवासियों को अपना गुलाम मानकर उनके साथ बुरा व्यवहार करते थे। जब कोई अंग्रेज अधिकारी भारतीयों के समक्ष आता तो भारतीयों को विवश किया जाता कि वे अंग्रेज अधिकारी के स्वागत में उठकर खड़े हों, उसके सामने झुकें और यदि कोई भारतीय घोड़े पर सवार होकर जा रहा है तो वह अंग्रेज के स्वागत में घोड़े से उतर जाए।

सरदार पटेल को जेल में राजनीतिक कैदी की सुविधा नहीं दी गई अपितु सामान्य कैदियों के साथ रखा गया। उन्हें खाने के लिये ज्वार की रोटी, थोड़ी सी सब्जी या दाल दी जाती थी। सोने के लिये एक कम्बल दिया गया था। किसान के बेटे को इस प्रकार की जिंदगी में कोई कठिनाई नहीं हुई। वे जेल में गीता का पाठ करते और बंदियों को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिये प्रेरित करते।

वल्लभभाई कभी भूलकर भी जेल कर्मियों पर क्रोध नहीं करते। यदि कोई कर्मचारी दुर्व्यवहार करता तो भी सरदार शांत रहते। वे कहते थे कि ये मेरे ही देशवासी हैं, यदि ये गोरे होते तो मैं इन्हें कुछ कहता। दुःख की बात है कि हमारे देशवासी, पेट भरने के लिये विदेशी गोरों की चाकरी करते हैं। यदि ये सरकार की नौकरी छोड़ दें तो सरकार एक दिन भी भारत में न टिक सके।

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एक बार कमिश्नर गेरेट जेल के दौरे पर आया। उसके सम्मान के लिये समस्त कैदियों को एक पंक्ति में खड़े होने के लिये कहा गया। सरदार ने ब्रिटिश कमिश्नर का स्वागत करने के लिए बनाई गई कैदियों की पंक्ति में खड़े होने से मना कर दिया और कहा कि ऐसा करना मेरे आत्म-सम्मान के विरुद्ध है। जेल का दौरा करने के बाद गेरेट ने सरदार से भेंट की। तब सरदार ने उससे कहा कि यदि आप यह सोचते हैं कि आपने नेताओं को जेल में बंद करके आंदोलन को दबा लिया है तो यह आपकी भूल है। करोड़ों भारतवासी आज भी अपनी आजादी के लिये संघर्षरत हैं।

यदि आप हमसे कोई बात करना चाहते हैं तो पहले समस्त नेताओं को जेल से रिहा कीजिये। गेरेट को सरदार की किसी बात का कोई जवाब नहीं सूझा, वह चुपचाप उठकर चला गया। गैरेट अच्छी तरह समझ गया था कि जिस बैरिस्टर ने ब्रिटिश कमिश्नर का स्वागत नहीं किया, वह बैरिस्टर सबके सामने उसकी कोई भी बेइज्जती कर सकता है।

सजा की अवधि पूरी होने पर 26 जून 1930 को सरदार को रिहा कर दिया गया। जब सरदार जेल से बाहर निकले तो उन्होंने पाया कि 6 मई को गांधीजी को बंदी बना लिया गया है और वे जेल जाने से पहले मोतीलाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी बना गये हैं। जब सरदार जेल से बाहर आये तो मोतीलाल ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। 30 जून को मोतीलाल को भी बंदी बना लिया गया। इस कारण पार्टी की बागडोर पटेल के हाथों में आ गई।

जेल से बाहर आने पर पटेल को ज्ञात हुआ कि उनकी अनुपस्थिति में भी लोगों ने संघर्ष जारी रखा है। रास में, जहाँ पटेल की गिरफ्तारी हुई थी, सत्याग्रह अपने चरम पर था। लोगों ने विदेशी कपड़ों की होली जलाने का कार्यक्रम चला रखा था तथा सरकार को लगान नहीं दिया था।

गुजरात के गांव-गांव में नमक कानून का उल्लंघन किया जा रहा था। लोग विदेशी माल की होली जला रहे थे। महिलाएं बड़ी संख्या में एकत्रित होकर शराब की दुकानों पर धरने दे रही थीं। सरदार पटेल को इन सब बातों से बहुत संतोष हुआ। उनकी मेहनत रंग ला रही थी और लोगों में स्वतंत्रता के संस्कार जन्म ले रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सिंह जेल में था और गीदड़ उसका घर खराब कर रहे थे

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सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान सरदार पटेल ने जनता में सरकार का विरोध करने का साहस संचारित किया जिसके कारण सरकार घबरा गई। सरकार ने सरदार पटेल को जेल में ठूंस दिया तथा सरदार की माता पर अत्याचार किया। यह वैसा ही था जैसे कि सिंह जेल में था और गीदड़ उसका घर खराब कर रहे थे!

अब सविनय अवज्ञा आंदोलन सरदार पटेल के हाथों में था इसलिये उसका तीव्र हो उठना स्वाभाविक था। सरदार पटेल की गर्जना से सरकार कांप उठी थी। यह कार्यक्रम इतनी तेजी पकड़ गया कि गोरी सरकार ने घबराकर कांग्रेेस कार्यसमिति की गतिविधियों पर रोक लगा दी और देश भर में उसके कार्यालयों को सील कर दिया।

इस पर सरदार पटेल ने सिंह-गर्जना की कि आज से देश का हर नागरिक हमारा कार्यकर्ता है तथा प्रत्येक घर हमारा कार्यालय है। यदि सरकार में ताकत है तो इस देश के सारे लोगों को बंदी बना ले और सारे घरों को सीज कर ले। इस सिंह-गर्जना से अंग्रेजों की आत्मा कांप उठी। उन्हें समझ में नहीं आया कि सरदार पटेल किस मिट्टी से बने हैं !

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कांग्रेस पर प्रतिबंध लगाने के बाद जब कार्यवाहियां और उग्र हो गईं तो सरकार ने सरदार को बंदी बनाने का निर्णय लिया।31 जुलाई 1930 को लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की 75वीं जयंती के उपलक्ष्य में सरदार पटेल ने बम्बई में एक विशाल जुलूस निकालने का निश्चय किया। सरकार ने जुलूस पर प्रतिबंध लगा दिया। लोग सरकारी आदेश के विरोध में सड़कों पर धरना देकर बैठ गये।

स्वयं सरदार पटेल उनका नेतृत्व कर रहे थे। लोग रात भर सड़कों पर बैठे रहे। पूरी रात बरसात हुई किंतु लोग डटे रहे। सरदार पटेल भी रात भर सड़क पर बैठे भीगते रहे। दिन निकलते ही सरकार ने सड़कों पर बैठे लोगों पर बेरहमी से लाठी चार्ज किया। औरतों और बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया। सरदार पटेल को भी लाठियों मारी गईं और उन्हें बंदी बना लिया गया। उन्हें फिर से तीन महीने की सजा सुनाई गई और यरवदा जेल भेज दिया गया।इधर सरदार जेल में थे और उधर पुलिस ने उनके परिवार को तंग करना आरम्भ किया। पुलिस ने सरदार के घर में घुसकर सरदार की 80 साल की वृद्धा माँ से दुर्व्यवहार किया।

विगत दो सौ वर्षों से अंग्रेज यह कहकर भारत पर शासन कर रहे थे कि वे असभ्य भारतीयों को सभ्य बनाने के लिये आये हैं किंतु सरदार के निर्दोष परिवार और उनकी वृद्धा माता के साथ जिस तरह की असभ्यता बरती गई उसकी मिसाल इंसानियत के इतिहास में अन्यत्र मिलनी कठिन थी।

पुलिस उनकी रसोई में घुस गई और जिस हाण्डी में उन्होंने चावल बनाये थे, उस हाण्डी में कंकर-पत्थर डाल दिये। रसोई में रखा बहुत सा सामान घर से बाहर फैंक दिया। बाकी बचे हुए सामान में मिट्टी का तेल और धूल डाल दी गई।

यह खबर आनन-फानन में चारों ओर फैल गई। सिंह जेल में था और गीदड़ उसके घर को खराब कर रहे थे। हजारों लोग पुलिस वालों को मारने के लिये एकत्रित हो गये। किसी ने सरदार को जेल में सूचना पहुंचाई तो उन्होंने लोगों के नाम संदेश भिजवाया कि हिंसा न करें, शांति बनाये रखें। जनता ने सरदार का आदेश चुपचाप स्वीकार कर लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल की सिंह-गर्जना से गोरी सरकार कांप उठी

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सरदार पटेल कुशल वक्ता थे, अंग्रेजी कानून के ज्ञाता थे, उन्होंने लंदन में रहकर अंग्रेजी तौर-तरीके सीखे थे। निर्भय व्यक्तित्व के धनी थे और भारत माता को ब्रिटिश दासता से मुक्त करवाने के लिए जीवन समर्पित करते थे। इस कारण वे अपने भाषणों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आग उगलते थे। सरदार पटेल की सिंह-गर्जना से भयभीत गोरी सरकार ने उनके भाषणों पर कई बार प्रतिबंध लगाया।

सरदार पटेल को जेल भेज देने के बाद, गोरी सरकार ने बोरसद तथा बारदोली के समझौतों को तोड़ डाला तथा लोगों से बढ़ा हुआ कर वसूलना आरम्भ कर दिया। किसानों को विवश होकर पुराना आंदोलन फिर से आरम्भ करना पड़ा। जब पुलिस के अत्याचार बढ़े तो बहुत से किसान अपने परिवारों और मवेशियों को लेकर जंगलों में भाग गये। पुलिस वालों ने गांवों में रह गये बच्चों और स्त्रियों को निशाना बनाया।

वस्तुतः अंग्रेजों के समय से भारतीय पुलिस की जो छवि खराब हुई वह आजादी के बाद भी नहीं सुधर सकी। पुलिस ने अपने आप को कभी भी जनता का सेवक नहीं समझा। सरदार जेल से बाहर आये तो वे भी आंदोलन में कूद पड़े। उन्हें अपने साथ पाकर जनता का आत्मविश्वास लौट आया। इसी बीच एक अंग्रेज अधिकारी ने वक्तव्य दिया कि यदि समस्त किसानों ने कर नहीं दिया तो सरकार सबकी जमीनें छीन लेगी।

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इस पर सरदार ने जवाब दिया कि सरकार समस्त किसानों की जमीनें छीन लेगी तो राज किस पर करेगी ? सरदार ने किसानों का आह्वान किया कि जमीन जब्त होने से मत डरो। जब्त हुई जमीन फिर से लौट आयेगी। सरदार की सिंह-गर्जना से सरकार डर गई और उसने फिर से पटेल के भाषण देने पर प्रतिबंध लगा दिया।

ई.1930 में साइमन कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद भारत सरकार ने ग्यारह ब्रिटिश प्रांतों तथा 566 देशी रियासतों का एक संघ बनाने का मन बनाया। इस विषय पर भारत के राजनैतिक दलों, देशी रियासतों के शासकों एवं अन्य संगठनों के प्रतिनिधियों से विचार विमर्श करने के लिये 12 नवम्बर 1930 को लंदन में गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया। कांग्रेस ने इस सम्मेलन में सम्मिलित होने से मना कर दिया क्योंकि कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य घोषित कर चुकी थी तथा इस सम्मेलन में औपनिवेशिक राज्य के निर्माण पर विचार किया जाना था। कांग्रेस के भाग न लेने के कारण सम्मेलन का विफल हो जाना स्वाभाविक था किंतु प्रथम गोलमेज सम्मेलन में उपस्थित अन्य समस्त भारतीय पक्षों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा देशी राज्यों का एक संघ बने।

दिसम्बर 1930 में बम्बई में एक खादी भण्डार के उद्घाटन के अवसर पर सरदार ने सामान्य सा भाषण दिया किंतु उन्हें बंदी बना लिया गया क्योंकि सरकार ने उनके भाषण देने पर रोक लगा रखी थी। इस बार उन्हें 9 महीने की जेल हुई।

जब 1930 का प्रथम गोलमेज सम्मेलन विफल हो गया तो 1931 में दूसरा गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया। सरकार जान गई थी कि जब तक कांग्रेस गोलमेज सम्मेलन में नहीं आयेगी, सम्मेलन सफल नहीं होगा। कांग्रेस के सभी बड़े नेता उस समय जेलों में थे इसलिये 25 जनवरी 1931 को विशेष आदेश जारी करके भारत सरकार ने कांग्रेस के 26 शीर्ष नेताओं को रिहा कर दिया ताकि कांग्रेस को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिये मनाया जा सके। रिहा होने वाले नेताओं में सरदार पटेल भी थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधी-इरविन पैक्ट से देश में उत्तेजना फैल गई

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गांधी-इरविन पैक्ट के समय जनता को आशा थी कि गांधीजी सरदार भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फांसी रोकने के लिए वायसराय से बात करेंगे किंतु गांधीजी ने इस सम्बन्ध में कोई बात नहीं की जिससे देश में गांधीजी के आचरण एवं व्यवहार के प्रति असंतोष फैल गया।

अंग्रेज सरकार किसी भी कीमत पर कांग्रेस को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में ले जाना चाहती थी। इसलिये तेजबहादुर सपू्र तथा जयकर के प्रयत्नों से 5 मार्च 1931 को वायसराय लॉर्ड इरविन एवं गांधीजी के बीच एक समझौता हुआ जो गांधी-इरविन पैक्ट कहलाता है। गोलमेज सम्मेलन की छाया के कारण कांग्रेस का पलड़ा भारी था। इसलिये इस पैक्ट से देश को बहुत आशायें थीं।

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जिन दिनों, गांधीजी और इरविन की वार्त्ता चल रही थी, उन दिनों भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव जेल में बंद थे और उन्हें फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी। अतः देश के कौने-कौने से यह मांग उठी कि गांधीजी को वायसराय पर दबाव बनाकर इन तीनों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलवाना चाहिये किंतु गांधीजी ने अहिंसा के सिद्धांत पर चलते हुए, वायसराय से क्रांतिकारियों के सम्बन्ध में कोई बात नहीं की।

17 फरवरी से 5 मार्च 1931 तक चली इस वार्त्ता में गांधीजी ने यह स्वीकार किया कि कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस ले लेगी तथा इरविन ने यह स्वीकार किया कि सरकार ने सत्याग्रहियों के विरुद्ध अब तक जो कार्यवाहियां की हैं, उन्हें निरस्त कर दिया जायेगा तथा लोगों को जेल से छोड़कर उनकी जमीनें तथा नौकरियां लौटा दी जायेंगी। इस प्रकार इस समझौते में कांग्रेस को वस्तुतः कुछ नहीं मिला था, देश अपनी पुरानी स्थिति पर लौट आया था और देश की आजादी का मुद्दा पूरी तरह गौण हो गया था। क्रांतिकारियों को उनके भाग्य पर अकेला छोड़ दिया गया था। सुभाषचंद्र बोस तथा विट्ठलभाई उस समय विदेश में थे। उन्होंने वहीं से गांधी की कार्यवाही का विरोध किया। सुभाषचंद्र बोस ने घोषणा की कि इस पैक्ट से स्पष्ट है कि गांधी एक राजनीतिज्ञ के रूप में असफल सिद्ध हो चुके हैं।

देश को लगा कि गांधीजी ने अचानक ही और अकारण ही हथियार डाल दिये हैं तथा जिन लोगों ने अब तक बलिदान दिया है, वह सब व्यर्थ चला गया है। कांग्रेसी युवाओं में बहुत नाराजगी थी। स्वयं जवाहरलाल नेहरू इस समझौते से अत्यंत क्षुब्ध थे। गांधी-इरविन पैक्ट के बाद कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस ले लिया और घोषणा की कि वह दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी।

सरकार ने कांग्रेस पर से प्रतिबंध हटा लिया और समस्त सत्याग्रहियों को रिहा कर दिया। इस पैक्ट के कुछ दिन बाद मार्च 1931 के अंतिम दिनों में, कांग्रेस का कराची अधिवेशन हुआ। उस समय भारत का राजनैतिक वातावरण अत्यंत उत्तेजित था। अधिवेशन से ठीक एक दिन पहले भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई थी।

करोड़ों भारतीयों के मन में यह प्रश्न था कि गांधीजी ने अचानक सविनय अवज्ञा आंदोलन क्यों बंद किया ? भारतीय युवा चाहते थे कि आंदोलन तब तक जारी रखा जाये जब तक भारत स्वतंत्र न हो जाये। वे ये भी चाहते थे कि अंग्रेज सरकार से कोई समझौता न किया जाये। इस विरोध के कारण यह साफ दिखाई देने लगा कि कराची सम्मेलन में गांधी-इरविन पैक्ट को पारित नहीं कराया जा सकेगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कराची सम्मेलन की अध्यक्षता

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सरदार को कराची सम्मेलन की अध्यक्षता का कांटों भरा ताज मिला

जिस समय कांग्रेस का कराची सम्मेलन आयोजित हुआ, उस समय देश के युवा वर्ग में गांधीजी के विरुद्ध भयंकर आक्रोश था। गांधीजी को आशंका हो गई कि कुछ उत्तेजित युवा कांग्रेस के सम्मेलन पर हमला करके गांधीजी को पीट सकते हैं। इसलिए सरदार पटेल को कराची सम्मेलन की अध्यक्षता का कांटों भरा ताज दिया गया! गांधाजी ने सरदार पटेल के प्रति यह चालाकी जीवन भर की।

जब गांधीजी और अन्य कांग्रेसी नेता कराची सम्मेलन में भाग लेने कराची पहुंचे तो हजारों युवकों ने उनके विरोध में नारे लगाये। इस विकट स्थिति का सामना करना सरल नहीं था। संकट की इस घड़ी में गांधीजी ने पटेल को कांटों का ताज पहनाते हुए सम्मेलन की अध्यक्षता का दायित्व सौंपा। सरदार ने अपने पहले ही भाषण में उन हजारों युवकों का गुस्सा ठण्डा कर दिया जो नेताओं को सुनने को तैयार नहीं थे।

पटेल ने कहा कि जब आपने एक साधारण किसान को इस सम्मेलन का अध्यक्ष चुन ही लिया है तो मेरी आपसे प्रार्थना है कि गुजरात ने अब तक स्वतंत्रता आंदोलन में जो कुछ किया है, आप भी उससे प्रेरणा लेकर देश को आजाद करवाने के काम में लग जायें। सशस्त्र क्रांति में विश्वास रखने वाले युवकों की तरफ संकेत करते हुए सरदार ने कहा कि मैं उनके काम करने के तरीकों के बारे में यहाँ कुछ नहीं कहूंगा किंतु उनकी देशभक्ति, साहस और बलिदान के आगे मैं अपना शीश नवाता हूँ।

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सरदार ने कहा कि हमें गांधी-इरविन पैक्ट के कुछ अच्छे परिणाम निकलने की आशा है किंतु यदि ऐसा नहीं हुआ तो आंदोलन पुनः आरम्भ किया जायेगा। इस बात पर बहुत से युवक खड़े होकर कहने लगे कि आंदोलन स्थगित करने से आजादी लेने में विलम्ब होगा। इस पर सरदार ने कहा कि इस समय गांधीजी की आयु 63 वर्ष और मेरी आयु 56 वर्ष है। हम लोग अपने जीवन में ही देश को स्वतंत्र देखना चाहते हैं, इसलिये आपसे अधिक व्यग्र हम हैं। सरदार के इन शब्दों से युवकों का गुस्सा ठण्डा हुआ। वे बैठ गये और सम्मेलन की कार्यवाही सुचारू रूप से चल पड़ी।

गांधी ने देश की आवाज को अनसुना करके और बहुत कुछ खोकर, इरविन से समझौता किया था किंतु साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने कांग्रेसियों को जेल से निकालकर इसलिये वार्त्ता की थी ताकि लंदन में चल रहे गोलमेज सम्मेलन में भारत संघ के निर्माण का प्रस्ताव पारित कराकर भारतीयों पर एक नया संविधान लादा जा सके जिसके माध्यम से गोरी सरकार को सम्पूर्ण भारत का संवैधानिक तरीके से शोषण करने का लाइसेंस मिल जाये।

इस सम्मेलन में गांधीजी कांग्रेस के अकेले प्रतिनिधि थे। सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित संघीय संसद में दलित वर्गों के लिए तथा जिन्ना द्वारा मुसलमानों के लिये सीटें आरक्षित करने की मांगों पर अड़ जाने के कारण 1 दिसम्बर 1931 को यह सम्मेलन, बिना किसी समाधान के समाप्त हो गया।

देशी रियासतों के शासक भी अब भारत संघ का निर्माण नहीं चाहते थे क्योंकि इससे उनके राज्यों के समाप्त हो जाने का भय था। इस गोलमेज सम्मेलन की विशेषता यह रही कि इसमें भावी भारत संघ के लिये संविधान बनाने का निर्णय लिया गया। जब कांग्रेस ने गोलमेज सम्मेलन में सरकार के पक्ष का समर्थन नहीं किया तो भारत में दमन चक्र फिर से आरम्भ हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लौह निर्मित हैं सरदार

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गोरों को पता नहीं था कि हाड़-मांस से नहीं, लौह निर्मित हैं सरदार!

अंग्रेजी सरकार वल्लभभाई को अन्य नेताओं की तरह मानकर व्यवहार कर रही थी किंतु सरकार को पता नहीं था कि हाड़-मांस से नहीं, लौह निर्मित हैं सरदार!

गोलमेज सम्मेलन के बाद गांधी ने लंदन में भारत मामलों के मंत्री होरे से भेंट की तथा उनसे अनुरोध किया कि वे भारत की समस्या का समाधान करें। होरे ने गांधीजी को दो टूक जवाब दिया कि आपको कुछ नहीं दिया जायेगा और अब हम कांग्रेस को टिकने भी नहीं देंगे।

इस प्रकार 28 दिसम्बर 1931 को गांधीजी अंग्रेजों के दरवाजे से एक बार फिर खाली हाथ लौट आये। नये वायसराय लॉर्ड विलिंगडन ने कांग्रेस को अवैधानिक संस्था घोषित कर दिया। 4 जनवरी 1932 को सरकार ने बिना कोई कारण बताये सरदार पटेल और गांधीजी को यरवदा जेल में ठूंस दिया। सरदार पटेल ने गांधीजी के साथ यरवदा जेल में 16 महीने बिताये। गांधीजी चाय तथा चावल का सेवन नहीं करते थे।

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इसलिये इस दौरान सरदार पटेल ने भी न तो चाय पी और न चावल खाये। वे हर समय गांधीजी का पूरा ध्यान रखते और उनके छोटे-छोटे कार्य करते थ्रे। गांधीजी प्रातः चार बजे उठते थे, पटेल भी चार बजे उठ जाते। यदि गांधीजी उससे पहले उठते तो पटेल भी उसी समय उठ जाते। गांधीजी कहते कि आप थोड़ा और सो लें तो पटेल का जवाब होता कि यह कैसे हो सकता है कि आप जागें और मैं सोऊं ? जेल से रिहा होने के बाद गांधीजी ने अपनी डायरी में लिखा कि सरदार ने जेल में मेरी इतनी सेवा की कि मुझे अपनी माँ की याद आ गई।

जेल जाने के कुछ समय बाद ही सरदार पटेल की माता का निधन हो गया। सरकार ने सरदार को कुछ शर्तों पर रिहा करने का प्रस्ताव दिया किंतु पटेल ने बिना शर्त रिहा होने की मांग की। सरकार ने पटेल को बिना शर्त रिहा करने से मना कर दिया। पटेल ने अपनी माता के निधन का शोक जेल में ही सहन किया। सरकार अब भी नहीं समझ सकी कि हाड़-मांस नहीं, लौह निर्मित हैं सरदार!

अगले वर्ष 1933 में सरदार को समाचार मिला कि उनके अग्रज विट्ठलभाई का विदेश में निधन हो गया है। उनका पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिये बम्बई लाया गया। सब लोगों की इच्छा थी कि वल्लभभाई उनके अंतिम संस्कार में सम्मिलित हों किंतु सरकार ने उन्हें फिर से कुछ शर्तों पर रिहा करने का प्रस्ताव दिया और वल्लभभाई ने इस बार भी सरकार की शर्तें मानने से मना कर दिया। सरकार संभवतः अब तक नहीं समझी थी कि यह इंसान हाड़-मांस से नहीं, लोहे से बना था।

जेल में वल्लभभाई का स्वास्थ्य खराब हो गया। उनकी नाक की तकलीफ बहुत बढ़ गई। इस कारण सांस लेना कठिन हो गया। डॉक्टरों के एक दल ने सरदार के स्वास्थ्य की जांच की तथा उन्हें तुरंत ऑपरेशन करवाने की सलाह दी। अंततः गोरी सरकार उन्हें बिना शर्त रिहा करने को तैयार हो गई। ई.1934 में सरकार ने पटेल को रिहा कर दिया। पटेल यरवदा से बम्बई पहुंचे। इस प्रकार लम्बा कष्ट झेल चुकने के बाद उन्होंने अपनी नाक का ऑपरेशन करवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोने का सरदार

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निःस्वार्थ सेवा से लोहे का सरदार, सोने का सरदार हो गया!

मनुष्य हाड़-मांस से निर्मित है किंतु वह उच्च मनोबल के कारण तथा कठोर परिश्रम के बल पर लोहे से अधिक मजबूत बन जाता है। सरदार पटेल में ये दोनों विशेषताएं तो थी हीं, साथ ही उनमें मानव मात्र की सेवा करने का इतना बड़ा गुण था कि वल्लभ भाई नामक महापुरुष हाड़-मांस या लोहे का नहीं, सोने का सरदार बन चुका था।

सरदार पटेल के जेल से निकलने के कुछ समय बाद ही बोरसद तहसील के 27 गांवों में प्लेग का प्रकोप हो गया। यह क्षेत्र पहले भी इस महामारी को झेल चुका था किंतु इस बार इसकी विभीषिका अत्यंत प्रबल थी। प्लेग का नाम सुनकर सगे सम्बन्धी भी बीमार को मरने के लिये छोड़कर भाग जाते थे। सरदार पटेल को अनुमान था कि गोरी सरकार पहले की तरह इस बार भी उदासीन रहेगी। इसलिये उन्होंने स्वयं सेवकों के दल गठित किये जो गांव-गांव घूमकर लोगों की सेवा करते, मृतकों का दाह संस्कार करते तथा ग्रामीणों को प्लेग से बचने और उससे लड़ने के तरीके बताते।

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सरदार ने बोरसद में एक अस्पताल स्थापित किया जहाँ प्लेग का उपचार किया जाने लगा। सरदार स्वयं गांव-गांव घूमकर बीमारों की सेवा करते तथा राहत कार्यों का नेतृत्व एवं संचालन करते। प्लेग के डर से सरकारी कर्मचारी गांवों में जाते ही नहीं थे। केवल ये स्वयं सेवक ही अपनी जान पर खेलकर लोगों को बचा रहे थे। इस निःस्वार्थ सेवा ने सरदार पटेल को कुंदन की तरह निखार दिया। लोहे का सरदार अब सोने का सरदार हो गया था। आज इस घटना को हुए 79 वर्ष हो चुके हैं किंतु आज भी यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि यदि पटेल और उनके स्वयंसेवकों ने अपनी जान पर खेलकर प्लेग से मुकाबला न किया होता तो निश्चय ही हजारों घरों के दीपक हमेशा के लिये बुझ गये होते।

जब सरदार के स्वयं सेवक गांव-गांव घूमने लगे और गोरी सरकार की थू-थू होने लगी तो सरकार ने वक्तव्य जारी किया कि कुछ लोग निजी तौर पर प्लेग का मुकाबला करने की कोशिश कर रहे हैं, यह कदापि उचित नहीं है। इस कार्य में दक्ष चिकित्सक की आवश्यकता होती है और यह काम सरकारी स्वास्थ्य विभाग ही कर सकता है। अपरिपक्व ज्ञान के साथ इस कार्य को करना खतरनाक है।

इस पर वल्लभभाई ने समाचार पत्रों में वक्तव्य दिया कि सरकार बताये कि उसने अब तक क्या किया है ? इसी के साथ सरदार ने अपने स्वयंसेवकों द्वारा किये गये कार्य का विवरण भी भिजवाया। इस पर नागरिकों द्वारा एक स्वतंत्र जांच समिति की स्थापना की गई। इस समिति ने गांवों में जाकर सच्चाई का पता लगाया और निष्कर्ष दिया कि यह महामारी सरकार की गलती के कारण फैली।

सरकारी विभाग ने इसकी रोकथाम के लिये कुछ नहीं किया और लोग मरते रहे। यदि सरदार पटेल तथा उनके स्वयं सेवकों ने सही समय पर मोर्चा न संभाला होता तो न जाने क्या हुआ होता। सरदार पटेल के स्वयं सेवकों द्वारा की गई सेवा के कारण ही इस महामारी को उन्मूलित किया जा सका है। जब यह रिपोर्ट समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई तो पहले से ही बदनामी झेल रही गोरी सरकार की और अधिक थू-थू हुई तथा निःस्वार्थ सेवा के बल पर लोहे का सरदार, सोने का सरदार हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चुनावी टिकटों का बंटवारा करने के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत

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चुनावी टिकटों का बंटवारा राजनीतिक दलों के लिए बहुत बड़ा संकट रहा है। जो लोग निःस्वार्थ भाव से जनता की सेवा करते हैं, वे अपने लिए कभी पद नहीं मांगते किंतु जो लोग सत्ता एवं शक्ति प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दलों में घुस जाते हैं, वे चुनावी टिकटों का बंटवारा होते समय चालाकियां दिखाकर टिकट पा जाते हैं। पटेल ने केन्द्रीय एवं प्रांतीय सभाओं में चुनावी टिकटों का बंटवारा करने के लिए मार्गदर्शी सिद्धांतों का निर्माण किया।

तीन गोलमेज सम्मेलनों के आयोजन के बाद सरकार ने भारत सरकार अधिनियम 1935 का निर्माण किया तथा केन्द्र एवं ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में विधान सभाओं का गठन करने के लिये आम चुनाव करवाये। कांग्रेस ने भी विधान सभाओं के चुनाव लड़ने का निर्णय लिया तथा वल्लभभाई की अध्यक्षता में एक संसदीय उपसमिति का गठन किया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद को इसका सदस्य बनाया गया।

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आगामी चुनावों के लिये प्रत्याशियों के नाम तय करने की जिम्मेदारी सरदार पटेल को दी गई। सरदार पटेल ने कुछ मानदण्ड निर्धारित किये तथा उन्हीं के अनुसार प्रत्याशियों का चयन किया। जो लोग स्वयं को पटेल के निकट समझते थे, उनमें से बहुतों को टिकट नहीं मिले। इस कारण वे लोग, पटेल से नाराज हो गये। जब कुछ कांग्रेसियों ने उन्हें हिटलर कहा तो पटेल ने केवल इतना ही जवाब दिया कि निर्धारित मानदण्ड के अनुसार जिनमें पात्रता थी, केवल उन्हीं को टिकट दिये गये हैं।

इस प्रकार सरदार पटेल ने भारत के लिये उन मार्गदर्शी सिद्धांतों का निर्माण किया जिनके आधार पर राजनैतिक दलों द्वारा लोकसभा, राज्यसभा और विधान सभाओं के टिकट दिये जाने चाहिये। केंद्रीय विधान सभा में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला। फरवरी 1937 में हुए प्रांतीय विधान सभा चुनावों में कांग्रेस को छः प्रांतों- मद्रास, बम्बई, बिहार, उड़ीसा, संयुक्त प्रान्त और मध्य प्रान्त में स्पष्ट बहुमत मिला। तीन प्रान्तों- बंगाल, असम और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही।

दो प्रान्तों- पंजाब और सिन्ध में कांग्रेस को बहुत कम सीटें मिलीं। सरदार पटेल का विचार था कि जिन प्रांतों में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला था, वहाँ उसे सरकार बनानी चाहिये तथा पार्टी को यह जिम्मेदारी संभालने से हिचकना नहीं चाहिये। मदनमोहन मालवीय आदि बहुत से नताओं ने सरदार पटेल के विचार का तीव्र विरोध किया। उनका कहना था कि गवर्नर जनरल यह आश्वासन दे कि प्रान्तों के गवर्नर, मंत्रियों के काम में हस्तक्षेप नहीं करेंगे तो कांग्रेस, सरकार बनाये अन्यथा विपक्ष में बैठे। गवर्नर जनरल लॉर्ड लिनलिथगो ने ऐसा आश्वासन देने से मना कर दिया। गांधीजी कोई निर्णय नहीं ले सके और अंततः कांग्रेस ने सरकार बनाने से मना कर दिया।

इस पर अन्य दलों को प्रान्तीय सरकारें बनाने के लिए आमंत्रित किया गया तथा समस्त प्रांतों में अल्पमत की सरकारों का गठन हुआ। इस कारण प्रांतों में कोई काम नहीं हो सका। 21 जून 1937 को गवर्नर जनरल द्वारा सहयोग करने का आश्वासन दिये जाने पर 7 जुलाई 1937 को बहुमत वाले प्रान्तों में कांग्रेस ने अपने मंत्रिमण्डल बनाये।

अगले वर्ष कांग्रेस ने दूसरे दलों के सहयोग से असम और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त में भी अपने मंत्रिमण्डल बना लिये। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग से किसी भी प्रांत में समझौता नहीं किया। बंगाल, पंजाब और सिन्ध में गैर-कांग्रेसी मन्त्रिमण्डल बने। ई.1939 तक प्रान्तीय मंत्रिमण्डल सुचारू रूप से कार्य करते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल साम्प्रदायिक हैं!

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नरीमन ने आरोप लगाया कि सरदार पटेल साम्प्रदायिक हैं!

सरदार पटेल ने केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधानसभाओं के चुनावों में कांग्रेस के सदस्यों को टिकट बंटावारा करने हेतु मार्गदर्शी सिद्धांतों का निर्माण किया था। सरदार पटेल इन्हीं सिद्वांतों के आधार पर टिकट देना चाहते थे, इस पर नरीमन सहित कुछ पारसी एवं मुस्लिम नेताओं ने पटेल पर आरोप लगाए कि सरदार पटेल साम्प्रदायिक हैं!

प्रांतीय विधान सभाओं से पहले केन्द्रीय विधान सभा के चुनाव हुए। बम्बई से दो सीटें थीं जिन पर कांग्रेस ने के. एफ. नरीमन तथा डॉ. देशमुख को टिकट दिये। नरीमन उस समय बम्बई कांग्रेस समिति के अध्यक्ष थे। वे चाहते थे कि एक सीट पर तो कांग्रेस नरीमन को टिकट दे तथा दूसरी सीट गैर-कांग्रेसी उम्मीदवार सर कावसजी जहांगीर के लिये छोड़ दे। नरीमन ने खुले आम वक्तव्य दिया कि कांग्रेस बम्बई की एक ही सीट पर चुनाव लड़े तो बेहतर होगा। पटेल ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।

जब नामांकन भरने का समय आया तो नरीमन ने पर्चा भरने में आनाकानी की। इस पर केंद्रीय संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष वल्लभभाई पटेल ने नरीमन के व्यवहार को अनुचित तथा पार्टी विरोधी मानते हुए नरीमन की उम्मीदवारी निरस्त कर दी और कन्हैयालाल मुंशी को कांग्रेस का प्रत्याशी घोषित कर दिया। नरीमन ने नाराज होकर पार्टी से भीतरघात किया जिससे मुंशी बहुत कम मतों के अंतर से हार गये।

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केन्द्रीय विधानसभा के बाद प्रांतीय विधान सभाओं के चुनाव हुए। इन चुनावों में नरीमन, बम्बई से जीतकर आये। उन्हें पूरी आशा थी कि विधान सभा में कांग्रेस के नेता वही बनाये जायेंगे किंतु सरदार पटेल तथा पार्टी के शीर्ष नेता, नरीमन की पार्टी विरोधी गतिविधि को भूले नहीं थे। इसलिये नरीमन के स्थान पर बाला साहब खेर को पार्टी का नेता चुना गया।

नरीमन ने इसे अपना अमान समझा और अपने प्रभाव वाले अखबारों में सरदार पटेल के विरुद्ध बहुत सी अनर्गल बातें छपवाईं जिनका सीधा-सीधा अर्थ यह होता था कि सरदार पटेल साम्प्रदायिक हैं इसलिये उन्होंने पारसी धर्म के नरीमन को बम्बई विधान सभा में कांग्रेस का नेता नहीं बनने दिया। इसके बाद नरीमन ने अखबारों की कतरनों के साथ कांग्रेस के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को शिकायत भिजवाई और इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की।

जवाहरलाल ने जवाब दिया कि मैं इसमें सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता, आप चाहें तो मैं इसे कांग्रेस कार्यसमिति में प्रस्तुत कर सकता हूँ। इस पर नरीमन ने जवाहरलाल को लिखा कि कार्यसमिति का निर्णय निष्पक्ष होगा, इसमें मुझे संदेह है। इस पर नेहरूजी ने नरीमन को लिखा कि तब आप अपना प्रकरण लीग ऑफ नेशन्स, प्रिवी काउंसिल या उससे भी ऊपर की किसी संस्था में ले जा सकते हैं। नरीमन ने हार नहीं मानी और सारा प्रकरण गांधीजी को लिख भेजा। गांधीजी को सारी बात पहले से ही ज्ञात थी किंतु उन्होंने नरीमन को सुझाव दिया कि यदि नरीमन चाहें तो मैं (गांधीजी) और डी. एन. बहादुर (एक पारसी नेता) जांच करने को तैयार हैं।

नरीमन ने गांधीजी का प्रस्ताव मान लिया। जब गांधीजी और डी. एन. बहादुर ने निर्णय सुनाया कि सरदार पटेल की कोई गलती नहीं है, तो नरीमन की हवा खराब हो गई। नरीमन ने पहले तो इस निर्णय को स्वीकार कर लिया किंतु बाद में उसे मानने से मुकर गये। इस पर गांधीजी ने जवाहरलाल को लिखा कि नरीमन के पूरे व्यवहार से स्पष्ट है कि उनमें किसी पद को धारण करने की क्षमता नहीं, इसलिये उन्हें भविष्य में कोई पद नहीं दिया जाये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी को समर्थन

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संकट की घड़ी में एक बार फिर सरदार पटेल ने गांधीजी को समर्थन दिया!

गांधीजी और सरदार पटेल के बीच बड़े विचित्र सम्बन्ध थे। सरदार पटेल प्रायः गांधीजी की बातों से सहमत नहीं होते थे किंतु गांधीजी जब कांग्रेस पर अथवा सरदार पटेल पर अपना व्यक्तिगत निर्णय थोप देते थे तो सरदार आंख मूंदकर उसे स्वीकार कर लेते थे। सुभाषचंद्र बोस का विरोध करने पर जब गांधीजी संकट में आ गए तब सरदार पटेल ने गांधीजी को समर्थन दिया!

ई.1939 में कांग्रेस का अधिवेशन त्रिपुरा में होना तय हुआ। त्रिपुरा सम्मेलन की अध्यक्षता के लिये अधिकांश प्रांतों से सुभाषचंद्र बोस का नाम प्रस्तावित हुआ। सुभाषचंद्र बोस पिछले साल के अधिवेशन की अध्यक्षता कर चुके थे और उनकी लोकप्रियता इस समय चरम पर थी। कांग्रेस के गांधीवादी नेता चाहते थे कि त्रिपुरा अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना आजाद करें। इस समय पूरी दुनिया में द्वितीय विश्व युद्ध का वातावरण बन रहा था।

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इसलिये सुभाषबाबू चाहते थे कि त्रिपुरा अधिवेशन की अध्यक्षता सुभाषबाबू स्वयं करें ताकि कांग्रेस कोई ढिलाई बरतते हुए वायसराय से कोई अनुचित समझौता न कर ले और त्रिपुरा अधिवेशन में कोई अनुचित प्रस्ताव पारित न कर ले। यदि सुभाषबाबू कांग्रेस के दुबारा अध्यक्ष बन जाते तो कम से कम एक साल के लिये उन्हें कांग्रेस का नेतृत्व और मिल जाता जिसका उपयोग वे द्वितीय विश्वयुद्ध की छाया में वायसराय से देश की आजादी के लिये मोलभाव करने में करते।

जवाहरलाल, जमनालाल, गांधीजी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा अन्य बड़े नेताओं ने सुभाषबाबू से कहा कि वे अपना नाम वापस ले लें। सुभाषबाबू ने कहा कि अधिकांश प्रांतों से मेरा नाम प्रस्तावित हुआ है, इसलिये मैं अध्यक्ष पद का चुनाव अवश्य लड़ूंगा। मौलाना जानते थे कि सुभाषबाबू के सामने चुनाव लड़ने का क्या अर्थ है। इसलिये उन्होंने बीमारी का बहाना करके अपना नाम वापस ले लिया। गांधीजी ने डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। अब चुनाव टल नहीं सकता था। चुनाव से पहले गांधीजी और उनके अनुयायी नेताओं ने बहुत परिश्रम किया ताकि गांधीजी के प्रत्याशी को जीत मिल सके।

चुनाव से पहली रात को गांधीजी सोये नहीं और कांग्रेसियों के घर जाकर उन्हें अपने उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने के लिये मनाते रहे। जब चुनाव का परिणाम आया तो सुभाषबाबू भारी मतों से जीत गये। गांधीजी ने तिलमिलाकर घोषणा की कि यह मेरी हार है। संयम का पाठ पढ़ाने वाले गांधीजी इस हार में अपना संयम खो बैठे और उन्होंने कांग्रेस में बगावत खड़ी कर दी।

गांधीजी के कहने पर कार्यसमिति के 15 सदस्यों ने कार्यसमिति से त्यागपत्र दे दिये। सुभाषबाबू ने कांग्रेस का विघटन रोकने का प्रयास किया परन्तु गांधीजी तथा उनके समर्थकों ने सुभाषबाबू से नाता तोड़ने का निर्णय कर लिया। सुभाषबाबू ने कांग्रेस को टूटने से बचाने के लिये अध्यक्ष पद त्याग दिया। गांधीजी के समर्थकों ने तत्काल डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष चुन लिया।

इस नाजुक अवसर पर बहुत से कांग्रेसियों को आशा थी कि सरदार पटेल गांधीजी का साथ छोड़कर नेताजी सुभाषचंद्र बोस का साथ देंगे किंतु सरदार पटेल इस पूरे प्रकरण के दौरान मौन साधे रहे। उन्होंने गांधी को अपना सेनापति चुन रखा था और वे जब तक देश की प्रतिष्ठा पर आंच न आये, सेनापति का साथ छोड़ने को तैयार नहीं थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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