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गांधीजी को समर्थन

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संकट की घड़ी में एक बार फिर सरदार पटेल ने गांधीजी को समर्थन दिया!

गांधीजी और सरदार पटेल के बीच बड़े विचित्र सम्बन्ध थे। सरदार पटेल प्रायः गांधीजी की बातों से सहमत नहीं होते थे किंतु गांधीजी जब कांग्रेस पर अथवा सरदार पटेल पर अपना व्यक्तिगत निर्णय थोप देते थे तो सरदार आंख मूंदकर उसे स्वीकार कर लेते थे। सुभाषचंद्र बोस का विरोध करने पर जब गांधीजी संकट में आ गए तब सरदार पटेल ने गांधीजी को समर्थन दिया!

ई.1939 में कांग्रेस का अधिवेशन त्रिपुरा में होना तय हुआ। त्रिपुरा सम्मेलन की अध्यक्षता के लिये अधिकांश प्रांतों से सुभाषचंद्र बोस का नाम प्रस्तावित हुआ। सुभाषचंद्र बोस पिछले साल के अधिवेशन की अध्यक्षता कर चुके थे और उनकी लोकप्रियता इस समय चरम पर थी। कांग्रेस के गांधीवादी नेता चाहते थे कि त्रिपुरा अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना आजाद करें। इस समय पूरी दुनिया में द्वितीय विश्व युद्ध का वातावरण बन रहा था।

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इसलिये सुभाषबाबू चाहते थे कि त्रिपुरा अधिवेशन की अध्यक्षता सुभाषबाबू स्वयं करें ताकि कांग्रेस कोई ढिलाई बरतते हुए वायसराय से कोई अनुचित समझौता न कर ले और त्रिपुरा अधिवेशन में कोई अनुचित प्रस्ताव पारित न कर ले। यदि सुभाषबाबू कांग्रेस के दुबारा अध्यक्ष बन जाते तो कम से कम एक साल के लिये उन्हें कांग्रेस का नेतृत्व और मिल जाता जिसका उपयोग वे द्वितीय विश्वयुद्ध की छाया में वायसराय से देश की आजादी के लिये मोलभाव करने में करते।

जवाहरलाल, जमनालाल, गांधीजी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा अन्य बड़े नेताओं ने सुभाषबाबू से कहा कि वे अपना नाम वापस ले लें। सुभाषबाबू ने कहा कि अधिकांश प्रांतों से मेरा नाम प्रस्तावित हुआ है, इसलिये मैं अध्यक्ष पद का चुनाव अवश्य लड़ूंगा। मौलाना जानते थे कि सुभाषबाबू के सामने चुनाव लड़ने का क्या अर्थ है। इसलिये उन्होंने बीमारी का बहाना करके अपना नाम वापस ले लिया। गांधीजी ने डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। अब चुनाव टल नहीं सकता था। चुनाव से पहले गांधीजी और उनके अनुयायी नेताओं ने बहुत परिश्रम किया ताकि गांधीजी के प्रत्याशी को जीत मिल सके।

चुनाव से पहली रात को गांधीजी सोये नहीं और कांग्रेसियों के घर जाकर उन्हें अपने उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने के लिये मनाते रहे। जब चुनाव का परिणाम आया तो सुभाषबाबू भारी मतों से जीत गये। गांधीजी ने तिलमिलाकर घोषणा की कि यह मेरी हार है। संयम का पाठ पढ़ाने वाले गांधीजी इस हार में अपना संयम खो बैठे और उन्होंने कांग्रेस में बगावत खड़ी कर दी।

गांधीजी के कहने पर कार्यसमिति के 15 सदस्यों ने कार्यसमिति से त्यागपत्र दे दिये। सुभाषबाबू ने कांग्रेस का विघटन रोकने का प्रयास किया परन्तु गांधीजी तथा उनके समर्थकों ने सुभाषबाबू से नाता तोड़ने का निर्णय कर लिया। सुभाषबाबू ने कांग्रेस को टूटने से बचाने के लिये अध्यक्ष पद त्याग दिया। गांधीजी के समर्थकों ने तत्काल डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष चुन लिया।

इस नाजुक अवसर पर बहुत से कांग्रेसियों को आशा थी कि सरदार पटेल गांधीजी का साथ छोड़कर नेताजी सुभाषचंद्र बोस का साथ देंगे किंतु सरदार पटेल इस पूरे प्रकरण के दौरान मौन साधे रहे। उन्होंने गांधी को अपना सेनापति चुन रखा था और वे जब तक देश की प्रतिष्ठा पर आंच न आये, सेनापति का साथ छोड़ने को तैयार नहीं थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी का अंधानुकरण

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वास्तविकता से आंखें मूंदकर गांधीजी का अंधानुकरण करते थे पटेल

सरदार पटेल का व्यक्तित्व इतना महान् था कि उसमें कोई कमी ढूंढना संभव नहीं है किंतु उनकी अच्छाई ही कई बार उनके व्यक्तित्व का दोष बन गई प्रतीत होती है। सरदार पटेल ने स्वयं को गांधीजी का अनुयायी बना लिय था और वे वास्तविकता से आंखें मूंदकर गांधीजी का अंधानुकरण करते थे। गांधीजी निजी जीवन में तो अव्यवहारिक थे ही, सार्वजनिक जीवन में भी अव्यवहारिक थे किंतु पटेल ने उनका कभी भी विरोध नहीं किया। गांधजी के कारण ही भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पटेल की बजाय नेहरू को चली गई तथा पटेल ने इसे भी स्वीकार कर लिया। पटेल के व्यक्तित्व की इस अच्छाई ने देश का बहुत नुक्सान किया।

जर्मनी पहले विश्वयुद्ध में मिली अपनी भयानक पराजय का बदला लेने के लिये ई.1939 में हिटलर के नेतृत्व में भयंकर हथियार लेकर अंग्रेजों तथा उनके मित्र देशों पर चढ़ बैठा। जब उसकी सेनाएं पौलेण्ड को रौंदकर आगे बढ़ीं तो जर्मनी को रोका जाना अनिवार्य हो गया। इंग्लैण्ड तथा उसके मित्र देशों ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी तथा भारत को भी उसमें जबर्दस्ती घसीट लिया।

कांग्रेस की विचित्र स्थिति थी। पहले विश्वयुद्ध में भी अंग्रेजों ने भारत के लोगों से पूछे बिना भारत को विश्वयुद्ध में धकेल दिया था और गांधीजी ने वायसराय से समझौता करके भारतीय नौजवानों को सेना में भरती होने का अभियान चलाया था। इस बार भी पहली बातों की ही पुनरावृत्ति होने जा रही थी।

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गोरी सरकार के इस कदम से नाराज होकर कांग्रेस की सरकारों ने समस्त प्रांतों में इस्तीफे दे दिये। सरदार पटेल ने स्पष्ट घोषणा की कि अंग्रेज भारत को तत्काल आजाद करें, उसके बाद भारत से द्वितीय विश्वयुद्ध में सहयोग मांगें। जैसे ही सरदार पटेल ने यह घोषणा की, गांधीजी, पटेल के विरोध में उतर आये। गांधीजी ने कहा कि संकट की घड़ी में भारत, बिना किसी शर्त के अंग्रेजों को सहयोग दे। अंग्रेजी सरकार समझ गई कि गांधीजी भले ही अपनी बात कहते रहें किंतु इस बार वे पटेल के रवैये के कारण, कांग्रेस से इस बात को नहीं मनवा पायेंगे कि भारत को विश्वयुद्ध में बिना शर्त के सहयोग देना चाहिये। इसलिये 16 अक्टूबर 1939 को वायसराय ने चालाकीपूर्ण घोषणा की कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, भारत को पूर्ण स्वायत्तता देने पर विचार किया जा सकता है।

सरदार पटेल ने इस पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि युद्ध का क्या परिणाम होगा, कौन जानता है ? यदि महायुद्ध के बाद भारत भूमि पर किसी अन्य जाति का कब्जा हुआ तो अंग्रेज अपने वचन को कैसे निभायेंगे ? इसलिये कुछ देना ही है तो आज ही दे दें। महात्मा गांधी ने फिर पटेल का विरोध किया।

इस पर पटेल ने व्यथित होकर कहा कि मुझे पूर्ण स्वायत्तता की अपनी मांग में किसी तरह की कमी दिखाई नहीं देती, फिर भी यदि बापू मेरे आग्रह के उपरांत भी सहमत नहीं होते हैं तो मैं इसे भी भूलकर उनका हर आदेश मानने को तैयार हूँ, लेकिन तब तक पूरी कांग्रेस, गांधीजी के तर्क को छोड़कर पटेल के तर्क से सहमत हो चुकी थी।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने एक बार कहा था कि मैं गांधीजी का अंधभक्त हूँ किंतु पटेल उनके ऐसे विलक्षण भक्तों में से हैं, जिनके विशाल नेत्र हैं जिनसे वह सब कुछ स्पष्ट देखने की क्षमता रखते हैं। पर फिर भी वह कई बार वास्तविकता से आंखें मूंदकर गांधीजी का अंधानुकरण करते हैं।

एक बार पुनः राजाजी की बात सही सिद्ध होने जा रही थी। पटेल स्पष्टतः सही थे किंतु वे गांधीजी का आदेश मानने के लिये पूरी तरह तैयार थे। ऐसा लगता था कि सरदार नहीं चाहते थे कि कांग्रेस में नेतृत्व करने वाला कोई दूसरा सिर भी तैयार हो।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत छोड़ो आंदोलन में जनता की प्रतिक्रिया पर सरदार पटेल को गर्व था

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भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा कांग्रेस ने की थी किंतु इसकी घोषणा के कुछ घण्टे भीतर ही अंग्रेज सरकार ने कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इस कारण भारत छोड़ो आंदोलन पूरी तरह जनता द्वारा चलाया गया। यही कारण था कि इस आंदोलन के परिणाम कांग्रेस द्वारा चलाए गए समस्त अभियानों से बहुत अच्छे थे।

जैसे-जैसे द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान का पलड़ा भारी हो रहा था, वैसे-वैसे अंग्रेज, भारतीयों के समक्ष स्वतंत्रता के आश्वासन दोहराते जा रहे थे। गोरी सरकार ने मार्च 1942 में क्रिप्स कमीशन को भारत भेजा। इस कमीशन द्वारा दिये गये प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता तो देश के कई टुकड़े हो जाते, इसलिये कांग्रेस ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को मानने से मना कर दिया।

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एक तरफ अंग्रेज अपनी चालबाजियों से बाज नहीं आ रहे थे और दूसरी ओर जापान का विजय रथ तेजी से आगे बढ़ रहा था। कांग्रेस की ढुलमुल और गलत नीतियों से दुःखी होकर सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का गठन किया तथा बर्मा की तरफ से भारत में प्रवेश कर लिया। एक समय ऐसा भी आया जब लगने लगा कि आजाद हिन्द फौज के बमवर्षक दिल्ली तक आ धमकेंगे। उस स्थिति की कल्पना करके कांग्रेस की हालत खराब हो गई। इसलिये कांग्रेस ने कहा कि अंग्रेज तुरंत भारत छोड़कर चले जायें ताकि सुभाषबाबू, भारत पर आक्रमण करने का नैतिक अधिकार खो दें।

8 अगस्त 1942 की रात्रि में कांग्रेस ने बम्बई में अंग्रेजों भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया। गांधीजी ने इसी सम्मेलन में करो या मरो (डू ऑर डाई), अभी नहीं तो कभी नहीं (नाउ ऑर नेवर) जैसे नारे दिये। आश्चर्य इस बात पर था कि अहिंसावादी नेताओं के मन में जमा हुआ, अहिंसा का हिमालय पूरी तरह पिघल गया प्रतीत होता था। जब कांग्रेस ने ऐसी हिंसात्मक भाषा का प्रयोग किया तो 9 अगस्त का सूर्योदय होने से पूर्व ही सरकार ने गांधी, नेहरू एवं पटेल सहित लगभग समस्त बड़े नेताओं को बंदी बना लिया तथा कांग्रेस को पुनः असंवैधानिक संस्था घोषित कर दिया।

गांधीजी और सरोजिनी नायडू को पूना के आगा खाँ पैलेस में नजरबंद किया गया। पटेल, नेहरू तथा मौलाना आजाद आदि नेता अहमद नगर के दुर्ग में नजरबन्द किये गये।

नेताओं की गिरफ्तारी से जनता भड़ककर विप्लव करने पर उतर आई। कांग्रेस द्वारा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की कोई तैयारी नहीं की गई थी और न ही आन्दोलन के संचालन की कोई रूपरेखा तैयार की गई थी। यह एक ऐसा आंदोलन था जिसकी घोषणा करने वाले जेल चले गये थे और जनता अपनी मर्जी से इसका संचालन कर रही थी। जनता ने रेल की पटरियां उखाड़ डालीं, रेलवे स्टेशनों पर तोड़-फोड़ की, पोस्ट ऑफिस तथा सरकारी कार्यालय जला दिये। टेलिफोन एवं टेलिग्राफ लाइनें काट डालीं।

ऐसा लगता था जैसे देश ने अहिंसा का मार्ग छोड़कर हिंसा का मार्ग अपना लिया है। जब पुलिस भारत छोड़ो आंदोलन के आंदोलनकारियों पर नियंत्रण न पा सकी तो उन पर हवाई जहाज से बम बरसाये गये। इस कारण बड़ी संख्या में आंदोलनकारी मारे गये। जेल जाते समय सरदार पटेल बीमार थे। इसलिये सुचेता कृपलानी उन्हें बाहर से दवायें भेजने लगीं।

तीन साल बाद ई.1945 में जेल से बाहर निकलकर सरदार पटेल ने भारत छोड़ो आंदोलन के सम्बन्ध में कहा- ‘भारत में ब्रिटिश राज के इतिहास में ऐसा विप्लव कभी नहीं हुआ, जैसा पिछले तीन वर्षों में हुआ। लोगों ने जो प्रतिक्रिया की, हमें उस पर गर्व है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिमला सम्मेलन 1945 में भाग लेने के लिये पटेल को जेल से रिहा किया गया

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शिमला सम्मेलन 1945 वायसराय लॉर्ड वैवेल की तरफ से की गई एक अच्छी पहल थी किंतु गांधीजी और जिन्ना की जिद के कारण यह सम्मेलन विफल हो गया। गांधीजी मौलाना अबुल कलाम आजाद को भारत सरकार में मंत्री बनवाना चाहता था किंतु मुहम्मद अली जिन्ना मौलाना के नाम पर सहमत नहीं था।

मई 1945 में लॉर्ड लिनलिथगो के स्थान पर लॉर्ड वैवेल भारत का गवर्नर जनरल एवं वायसराय बनकर आया। वह भारत की समस्या को सुलझाने के लिये नये सिरे से प्रयास करने लगा।

समस्या यह थी कि कांग्रेस चाहती थी कि गोरे, भारत को जैसा है, वैसा ही छोड़कर तत्काल चले जायें। जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग चाहती थी कि अंग्रेज भारत को आजादी देने से पहले इसके दो टुकड़े करें तथा मुसलमानों के लिये पाकिस्तान नामक अलग देश बनायें। डॉ. भीमराव अम्बेडकर चाहते थे कि स्वतंत्र भारत में दलित जातियों को उचित स्थान दिया जाये। अंग्रेज चाहते थे कि भारत को पूर्ण स्वतंत्रता न देकर डोमिनियन स्टेटस दिया जाये।

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डोमिनियन स्टेटस का मतलब यह था कि आंतरिक शासन के मामले में भारत सरकार पूरी तरह स्वतंत्र रहे किंतु वैश्विक स्तर पर वह ब्रिटिश ताज की अध्यक्षता वाली कॉमनवैल्थ नामक संस्था का सदस्य रहे। कांग्रेस 31 दिसम्बर 1929 को पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित कर चुकी थी इसलिये वह डोमिनियन स्टेटस के नाम से भड़कती थी। इस प्रकार समस्त पक्ष अपने-अपने तर्कों पर अड़े हुए थे और भारत की आजादी का रास्ता साफ नहीं हो रहा था।

इंग्लैण्ड दो मुंहे सांप की तरह व्यवहार कर रहा था। एक ओर तो द्वितीय विश्वयुद्ध में उसके नौजवान इतनी बड़ी संख्या में मार दिये गये थे कि अब उसके पास भारत जैसे विशाल देश में कलक्टर और कमिश्नर नियुक्त करने के लिये अंग्रेज लड़के नहीं मिल रहे थे जबकि वह तहसीलदारों के पद भी अंग्रेज लड़कों को देना चाहता था। जिन जहाजों में बैठकर इंग्लैण्ड के नौजवान, भारत पर शासन करने के लिये आते थे, इंग्लैण्ड के पास उन जहाजों में कोयला डालने तक के पैसे नहीं बचे थे। इसलिये वह चाहता था कि किसी तरह भारत की आजादी को साम्प्रदायिक प्रश्न में उलझा दिया जाये ताकि वह कुछ और वर्षों तक भारत पर शासन करके अपनी गरीबी दूर कर सके।

नये वायसराय वैवेल ने अंतरिम सरकार के गठन पर विचार करने के लिये 25 जून 1945 को शिमला सम्मेलन बुलाया। इसलिये पटेल सहित जेलों में बंद समस्त कांग्रेसी नेता रिहा किये गये। गांधीजी बीमार होने के कारण 6 मई 1945 को ही रिहा किये जा चुके थे। कांग्रेस को विश्वास था कि वह 100 प्रतिशत हिन्दू, सिख एवं अन्य मतों के लोगों का तथा 90 प्रतिशत मुसलामनों का नेतृत्व करती है। मुस्लिम लीग मानती थी कि लीग को देश के 90 प्रतिशत मुसलामनों का समर्थन प्राप्त है। जिन्ना कहता था कि मुस्लिम लीग ही मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कर सकती है।

जबकि गांधीजी का कहना था कि कांग्रेस, हिन्दू और मुसलमान दोनों का प्रतिनिधित्व करती है। गांधीजी ने शिमला सम्मेलन में कांग्रेस की ओर से मौलाना अबुल कलाम को सम्मिलित किया। इस पर जिन्ना अड़ गया कि अंतरिम सरकार में केवल चार मुस्लिम प्रतिनिधि होंगे और वे चारों, मुस्लिम लीग के होंगे।

कांग्रेस को केवल हिन्दुओं को अपना प्रतिनिधि बनाने का अधिकार है। जिन्ना के फच्चर फंसा देने पर शिमला सम्मेलन विफल हो गया।

भारतीय सैनिक और सरकार

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सरदार पटेल ने भारतीय सैनिक और सरकार के बीच समझौता करवाया

जब कांग्रेस द्वारा देश को आजाद करवाए जाने के लिए चलाए जा रहे समस्त आंदोलन विफल हो गए और कांग्रेस ने अंग्रेजों के साथ मिलकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विरुद्ध मोर्चा खोल लिया तो भारतीय सैनिक और सरकार सीधे ही एक-दूसरे से भिड़ गए। इसके कारण कांग्रेसियों एवं अंग्रेजों दोनों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया।

अंग्रेज जाति में एक मुहावरा प्रचलित था कि गोरी जाति केवल जीतने और शासन करने के लिये बनी है। जीत हासिल करने के लिये वे किसी प्रकार की नैतिकता का पालन नहीं करते थे। इसलिये द्वितीय विश्वयुद्ध में जब जर्मनी द्वारा घुटने टेक दिये जाने पर भी जापान का विजय रथ निरंतर आगे बढ़ता गया तो अमरीका ने 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर तथा 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर एटोमिक बम डाले।

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इन बमों से जापान में लाखों लोग एक साथ मर गये। मानवाता पर यह बड़ा संकट था। जापान के सम्राट ने गोरे दैत्यों से, जापान की निरीह जनता के प्राणों की रक्षा करने के लिये 15 अगस्त 1945 को हार स्वीकार कर ली। इसके तीन दिन बाद 18 अगस्त 1945 को एक हवाई दुर्घटना में नेताजी सुभाषचंद्र बोस का निधन हो गया। इस प्रकार भारत सरकार, जापानी सेनाओं तथा आजाद हिन्द फौज दोनों की ओर से निश्चिंत हो गई। जापान के घुटने टेक देने और नेताजी की आकस्मिक मृत्यु हो जाने के बाद आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों की बड़ी दुर्दशा हुई। भारत सरकार की सेनाएं जंगलों में शिविर लगाकर बैठे आजाद हिन्द फौज के बहुत से सिपाहियों को पकड़कर दिल्ली ले आईं। उन्हें युद्ध बंदियों की तरह रखा गया तथा उन पर लाल किले में मुकदमे चलाये गये। उन्हें फांसी की सजा दी गई। इस पर भारत की जनता ने उनकी रिहाई के लिए आन्दोलन चलाया। कांग्रेस ने इन सिपाहियों को हिंसा में विश्वास रखने वाला बताकर उनका साथ देने से मना कर दिया।

इस पर 20 जनवरी 1946 को कराची में वायुसेना के सैनिकों ने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के समर्थन में हड़ताल कर दी जो बम्बई, लाहौर और दिल्ली स्थित वायुसेना मुख्यालयों पर भी फैल गई। 19 फरवरी 1946 को भारतीय नौ-सैनिकों ने भी हड़ताल कर दी। 21 फरवरी 1946 को यह हड़ताल क्रांति के रूप में बदलने लगी तथा बम्बई के साथ-साथ कलकत्ता, कराची और मद्रास में भी फैल गई।

अँग्रेज अधिकारियों ने इस क्रांति का दमन करने के लिए गोलियां चलाईं। क्रांतिकारी सैनिकों ने गोलियों का जवाब गोलियों से दिया और कुछ अंग्रेज अधिकारियों को मार डाला। इस प्रकार भारतीय सैनिक और सरकार सीधे ही एक दूसरे के निशाने पर आ गए। इससे ब्रिटिश सरकार घबरा गई। बड़ी कठिनाई से सरदार पटेल ने गोरी सरकार और नौ-सैनिकों के बीच समझौता करवाया।

जब कांग्रेस को लगने लगा कि भारत में आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के साथ बहुत बड़ी संख्या में लोगों की सहानुभूति है तब कांग्रेस ने इन सिपाहियों के लिये दिल्ली में राहत शिविर लगाये। इस विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार को अनुमान हो गया कि अब उनके लिये भारत पर शासन करना संभव नहीं रह गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पटेल प्रधानमंत्री नहीं बने

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सरदार पटेल ने जीवन भर गांधीजी का साथ दिया था किंतु गांधीजी को सरदार पटेल के स्थान पर जवाहर लाल नेहरू अधिक पसंद थे। संभवतः इसका कारण यह था कि नेहरू और गांधी दोनों का झुकाव औरतों की तरफ अधिक था जबकि सरदार पटेल योगियों की तरह जीवन जीते थे। इस कारण गांधीजी ने नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने की ठान ली तथा पटेल प्रधानमंत्री नहीं बने!

1946 में कांग्रेस प्रेसीडेंसी के चुनावों में 16 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों में से 13 ने सरदार पटेल को, 2 ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को तथा 1 ने गांधीजी को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव भेजा किंतु गांधीजी ने पटेल की बजाय नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया। यह निर्णय कांग्रेस को हैरान करने वाला था।

गांधीजी पहले भी चार बार इसी तरह का उल्टा-पुल्टा कर चुके थे। 1927 में पटेल के नाम के प्रस्ताव आये थे किंतु उनके स्थान पर मुख्तार अहमद अंसारी को अध्यक्षता दी गई। 1929 में पटेल के स्थान पर नेहरू को अध्यक्षता दी गई। 1936 में पटेल के स्थान पर नेहरू को अध्यक्षता दी गई।

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1939 में सुभाषचंद्र बोस के नाम पर प्रस्ताव आये किंतु गांधीजी ने पट्टाभि सीतारमैया को अध्यक्ष बनाने की ठान ली। सुभाष ने सीतारमैया के विरुद्ध चुनाव लड़कर जीत प्राप्त की किंतु गांधीजी ने नाराज होकर कांग्रेस छोड़ दी। इस पर सुभाषचंद्र खिन्न होकर कांग्रेस छोड़ गये।

1946 में भी गांधीजी ने पटेल के स्थान पर नेहरू को अध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया। इस बार अध्यक्ष पद में विशेष बात यह थी कि कुछ ही दिनों बाद भारत में अंतरिम सरकार का गठन किया जाना था। वायसराय द्वारा उसी व्यक्ति को सरकार का गठन करने के लिये आमंत्रित किया जाना था जो कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर हो।

इसलिये गांधीजी चाहते थे कि पटेल के स्थान पर नेहरू को अध्यक्ष बनाया जाये ताकि वही भारत के प्रधानमंत्री बन सकें। गांधीजी की इच्छा का आदर करते हुए पटेल ने अपनी दावेदारी त्याग दी और नेहरू का समर्थन किया। वायसराय ने नेहरू को प्रधानमंत्री बनने के लिये आमंत्रित किया और पटेल देखते ही रह गये। पटेल प्रधानमंत्री नहीं बने!

आजादी के बाद भी नेहरू को प्रधानमंत्री और पटेल को उपप्रधानमंत्री बनवाया गया। नेहरू ने विदेश मंत्रालय अपने पास रखा और पटेल को गृह मंत्रालय दिया गया।

गांधीजी ने नेहरू के स्थान पर पटेल को प्रधानमंत्री पद के लिये क्यों चुना इस पर इतिहासकार एवं आलोचक बहुत माथापच्ची करते रहे हैं। अधिकांश लोगों का मानना है कि गांधीजी को लगता था कि नेहरू हैरो, कैम्ब्रिज तथा लंदन से पढ़े हुए थे, जबकि पटेल भारत की गंवई पाठशालाओं के विद्यार्थी थे।

इसलिये पटेल की बजाय नेहरू, अंग्रेंजों से बात करने में अधिक सक्षम थे। दुर्गादास ने लिखा है कि गांधीजी को लगता था कि नेहरू ने यूरोप, चीन, रूस आदि देशों की यात्रा की थी इसलिये अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी से बात करने में नेहरू अधिक सक्षम थे।

कुछ लोगों का मानना है कि गांधीजी को लगता था कि मुसलमानों से सहानुभूति के मामले में पटेल की बजाय नेहरू, गांधीजी के विचारों के अधिक निकट थे। इसलिये पटेल की बजाय नेहरू को प्रधानमंत्री बनाकर देश उनके हाथों में सौंपा गया।

पटेल प्रधानमंत्री नहीं बने तो इसके पीछे एकमात्र कारण गांधजी का अहंकार था। इसके अतिरिक्त और कोई कारण नहीं था क्योंकि भारत की जनता ने तो पटेल को प्रधानमंत्री बनाने की इच्छा व्यक्त की थी न कि नेहरू को!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल और चर्चिल

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सरदार पटेल और चर्चिल का व्यक्तित्व बहुत से मामलों में एक जैसा था। जिस प्रकार सरदार पटेल मातृभूमि की सेवा करने वाले अनन्य राष्ट्रभक्त थे, उसी प्रकार विंस्टन चर्चिल भी अपनी पितृभूमि की सेवा करने वाला राष्ट्रवादी था। दोनों नेताओं के हित अलग-अलग देशों से बंधे हुए होने के कारण वे आपस में एक-दूसरे को पसंद नहीं करते थे।

बीसवीं सदी में वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हुए महान नेताओं में विंस्टन चर्चिल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वे 1940 से 1945 तक तथा 1951 से 1955 तक इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री रहे। द्वितीय विश्व युद्ध उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा गया था और वे द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता थे। जिस समय भारत को आजादी मिली, वे इंग्लैण्ड की संसद में नेता प्रतिपक्ष थे तथा भारत की आजादी एवं भारतीय नेताओं के घोर विरोधी थे।

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वे कांग्रेस के समस्त नेताओं सहित मोहनदास गांधी के लिये भी कटु शब्दों का प्रयोग करने से नहीं चूकते थे। जब भारत में अंतरिम सरकार का गठन हुआ तथा सत्ता के वास्तविक हस्तांतरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई तो चर्चिल ने भारतीय नेताओं के विरुद्ध अत्यंत कटु वक्तव्य दिया। चर्चिल ने कहा- ‘सत्ता बदमाशों, दुष्टों एवं लुटेरों के हाथ में चली जायेगी….. ये व्यक्ति घास के पुतले हैं जिनका कुछ वर्षों बाद एक तिनका भी नहीं मिलेगा।’

जिस समय चर्चिल का यह वक्तव्य आया, सरदार पटेल बीमार थे तथा देहरादून में थे। ऐसे नाजुक समय में जबकि इंग्लैण्ड की संसद में भारतीय स्वतंत्रता के बिल पर चर्चा होनी थी तथा इसमें नेता प्रतिपक्ष विंस्टन चर्चिल का सहयोग अत्यंत आवश्यक था, भारतीय नेता चर्चिल के विरुद्ध कुछ भी नहीं बोल सके। स्वाभिमानी सरदार से चर्चिल की यह अशोभनीय वाणी सहन नहीं हुई। वे जानते थे कि भारत को सत्ता भीख में नहीं मिल रही है, इसके लिये लाखों भारतीयों ने संघर्ष किया है और अपने प्राण न्यौछावर किये हैं। पटेल, भारत की अंतरिम सरकार में उपप्रधानमंत्री थे। चर्चिल द्वारा अंतरिम सरकार पर प्रत्यक्ष रूप से आक्रमण किया गया था।

इसलिये पटेल ने उसी दिन देहरादून से एक वक्तव्य जारी करते हुए चर्चिल को खरीखोटी सुनाई तथा उनके लिये ‘एक बेशर्म साम्राज्यवादी, वो भी ऐसे समय में जब सम्राज्यवाद अपने अंतिम पड़ाव पर खड़ा हुआ है………एक ऐसा लोकप्रसिद्ध भगोड़ा जिसके लिये अक्खड़पन तथा नासमझ सामंजस्य, तर्क, सोच विचार और प्रज्ञा से अधिक महत्त्वपूर्ण है।’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया।

चर्चिल की लानत-मलानत करने के साथ ही सरदार पटेल ने इंग्लैण्ड की सरकार को भी चुनौती दी-

‘मैं महामहिम की सरकार को यह बताना चाहूंगा कि यदि वे भारत और ग्रेट ब्रिटेन के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाने के अभिलाषी हैं तो उन्हें इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा कि उस पर इस तरह के घृणित और जहरीले आक्रमण न किये जायें और ब्रिटिश राजनीतिज्ञ एवं अन्य लोग इस देश के बारे में मित्रतापूर्वक एवं सदभावना के साथ बोलना सीखें।’

सरदार पटेल के शब्दों ने विंस्टन चर्चिल को भीतर तक हिला दिया।

वे समझ गये कि समय का पहिया तेजी से घूम रहा है, यदि समझदारी नहीं दिखाई गई तो इंग्लैण्ड को भारत की मित्रता से हाथ धोना पड़ सकता है। इसलिये चर्चिल ने विदेश सचिव ऐंथनी हेडन के द्वारा पटेल को यह संदेश भिजवाया- ‘मुझे पटेल के प्रत्युत्तर से बड़ा आनंद हुआ।

नए अधिराज्य को अपने कार्यों तथा उत्तरदायित्वों को इस निपुणता से संभालते हुए देखकर, विशेष रूप से अन्य राज्यों से सम्बन्धित, मेरे मन में पटेल के प्रति आदर और प्रशंसा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।……. सरदार को स्वयं को भारत की चारदीवारी में सीमित नहीं रखना चाहिये, पूरे विश्व को उन्हें देखने और सुनने का अधिकार एवं उसकी आवश्यकता है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुस्लिमलीग को गृह-मंत्रालय न देने पर अड़ गये सरदार पटेल

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मुहम्मद अली जिन्ना ने जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार को विफल करने के लिए गृहमंत्रालय की मांग की किंतु सरदार पटेल और माउण्ट बेटन दोनों ही जिन्ना की कुत्सित चाल को समझ गए। इस कारण मुस्लिमलीग को गृह-मंत्रालय न देने पर अड़ गये सरदार पटेल!

12 अगस्त 1946 को वायसराय ने कांग्रेस के अध्यक्ष पं. जवाहरलाल नेहरू को अन्तरिम सरकार बनाने का निमन्त्रण भेजा और नेहरू ने अंतरिम सरकार का गठन कर लिया। सरदार पटेल को गृह मंत्री बनाया गया। नेहरू ने कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ दिया तथा आचार्य कृपलानी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। नेहरू ने एक बार पुनः जिन्ना को मनाने के लिये उससे भेंट की तथा उसे सरकार में सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया।

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जिन्ना को विश्वास नहीं था कि कांग्रेस अकेले सरकार बना लेगी किंतु अब सरकार बन चुकी थी जिससे अलग रहना मूर्खता थी। इसलिये अब जिन्ना ने सरदार पटेल से गृह मंत्रालय छीनने की चाल चली। उसने नेहरू से कहा कि यदि गृहमंत्री मुस्लिम लीग का बने तो मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में सम्मिलित हो जायेगी। मुस्लिमलीग को गृह-मंत्रालय देने का अर्थ पूरे देश को फांसी देने के निर्णय से कम नहीं होता। इसलिए जब पटेल को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने जिन्ना के प्रस्ताव का तीव्र विरोध किया। वे नहीं चाहते थे कि जिस मुस्लिम लीग ने सड़कों पर खून की होली खेलकर हजारों निर्दोष लोगों को मार दिया है, उस मुस्लिम लीग को गृह मंत्रालय देकर देश की कानून व्यवस्था उसके हाथों गिरवी रख दी जाये।

पटेल का विरोध देखते हुए नेहरू ने जिन्ना का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इस पर जिन्ना ने वायसराय से सम्पर्क करके सरकार में सम्मिलित होने की इच्छा जताई और गृह मंत्रालय न मिलने पर वित्त मंत्रालय सहित पांच महत्त्वपूर्ण विभाग ले लिये। वित्त मंत्रालय हाथ आते ही जिन्ना ने भारत सरकार को पंगु बनाने का काम आरम्भ कर दिया। मंत्रिमण्डल के मुस्लिम लीगी सदस्य प्रत्येक कदम पर सरकार के कार्यों में बाधा डालते थे।

वे सरकार में थे और फिर भी सरकार के विरुद्ध थे। वास्तव में वे इस स्थिति में थे कि सरकार के प्रत्येक कदम को ध्वस्त कर सकें। लियाकतअली खां ने जो प्रथम बजट प्रस्तुत किया, वह कांग्रेस के लिये नया झटका था। कांग्रेस की घोषित नीति थी कि आर्थिक असमानताओं को समाप्त किया जाये और पूंजीवादी समाज के स्थान पर समाजवादी पद्धति अपनायी जाये।

जवाहरलाल नेहरू भी युद्धकाल में व्यापारियों और उद्योगपतियों द्वारा कमाये जा रहे मुनाफे पर कई बार बोल चुके थे। यह भी सबको पता था कि इस आय का बहुत सा हिस्सा आयकर से छुपा लिया जाता था।

आयकर वसूली के लिये भारत सरकार द्वारा सख्त कदम उठाये जाने की आवश्यकता थी। लियाकत अली ने जो बजट प्रस्तुत किया उसमें उद्योग और व्यापार पर इतने भारी कर लगाये कि उद्योगपति और व्यापारी त्राहि-त्राहि करने लगे। इससे न केवल कांग्रेस को अपितु देश के व्यापार और उद्योग को स्थाई रूप से भारी क्षति पहुंचती।

अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि पटेल ने इतने खतरनाक इरादों वाली मुस्लिमलीग को गृह-मंत्रालय सौंप दिया होता तो भारत की कैसी दुर्दशा होती!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लॉर्ड वैवेल भारत को और दस वर्ष और गुलाम रखेगा

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इसमें कोई संदेह नहीं है कि लॉर्ड वैवेल भारत के लोगों के प्रति सद्भावना रखता था किंतु वह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सद्भाव उत्पन्न करके ही देश को आजादी देना चाहता था ताकि विभाजन के समय निर्दोष लोगों का रक्तपात न हो। लॉर्ड वैवेल का उद्देश्य तो सही था किंतु वह इस बात को नहीं समझ पाया कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सद्भावना कभी भी उत्पन्न नहीं हो सकती क्योंकि इस्लाम के उद्देश्य पूरी दुनिया को एक दिन मुसलमान बनाना है जबकि हिन्दू अपने धर्म और संस्कृति को जी-जान से अधिक प्रेम करते थे।

जैसे-जैसे भारत की आजादी निकट आ रही थी, वैसे-वैसे भारत में चारों तरफ अविश्वास का वातावरण बनता जा रहा था। जिन्ना और मुस्लिम लीग कांग्रेस पर अविश्वास करते थे तथा कांग्रेस वायसराय वैवेल पर अविश्वास करती थी।

वायसराय को इंगलैण्ड की सरकार पर अविश्वास था और प्रधानमंत्री एटली, वायसराय पर विश्वास नहीं करता था। भारतीय नेताओं में भी परस्पर अविश्वास का वातावरण था। सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू भारत के विभाजन को अनिवार्य मानते थे!

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कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम तथा गांधीजी हर हाल में विभाजन रोकना चाहते थे। जिन्ना चाहता था कि आजादी मिलने से पहले विभाजन की घोषणा हो। वायसराय चाहता था कि भारत विभाजन के बाद देश में साम्प्रदायिक उन्माद न फैले। सरदार पटेल का मानना था कि देश में गृह-युद्ध की संभावना रोकने और हिंदू-मुसलमानों के बीच सद्भावना पनपने की चिंता में लॉर्ड वैवेल, भारत को और दस वर्ष तक अँग्रेजी शासन के तले रखेगा। कांग्रेस अँग्रेजों पर आरोप लगा रही थी कि भारत के अँग्रेज, जानबूझ कर मुस्लिम लीग की मदद कर रहे हैं ताकि झगड़ा बना रहे और उनका राज भी। अंग्रेज कांग्रेस पर आरोप लगा रहे थे कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग से कोई समझौता नहीं कर पा रही है।

उधर 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली घोषित कर चुका था कि जून 1948 तक हर हालत में भारतीयों को सत्ता सौंप दी जायेगी। यदि भारतीय मिलकर इसका समाधान नहीं निकालते हैं कि सत्ता किसे सौंपी जाये तो सरकार जिसे उचित समझेगी, भारत का शासन सौंप देगी।

मार्च 1947 में लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का गवर्नर जनरल एवं वायसराय बनाकर भेजा गया। उसका काम भारत का शासन भारतीयों को सौंपकर अंग्रेजों को भारत से सुरक्षित रूप से निकालना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुस्लिम लीग का बजट

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मुस्लिम लीग जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार में गृहमंत्रालय चाहती थी किंतु जब सरदार पटेल ने मुस्लिमलीग को गृहमंत्रालय देने से मना कर दिया तब मुस्लिमलीग को वित्त मंत्रालय दिया गया। मुस्लिम लीग ने वित्तमंत्रालय के माध्यम से नेहरू की अंतरिम सरकार को विफल करने का षड़यंत्र रचा। मुस्लिम लीग का बजट भारत के उद्योगपतियों की कमर तोड़ने के लिए पर्याप्त था।

मुस्लिम लीग ने नेहरू की अंतरिम सरकार के विरुद्ध षड़यंत्र रचने के लिए जवाहर लाल नेहरू के पुराने भाषणों का सहारा लिया। जवाहर लाल नेहरू समाजवादी चिंतन के व्यक्ति थे तथा पूंजीवादियों के विरुद्ध कुछ न कुछ बोलते रहते थे। नेहरू को पता नहीं था कि समाजवादी चिंतन एवं साम्यवादी नारों से देश नहीं चलता, देश की रीढ़ देश की वह पूंजी होती है जिसका निर्माण पूंजीपति करते हैं।

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अंतरिम सरकार के मुस्लिम लीगी सदस्य लियाकत अली ने बजट भाषण में एक आयोग बैठाने का प्रस्ताव किया जो उद्योगपतियों और व्यापारियों पर आयकर न चुकाने के आरोपों की जांच करे और पुराने आयकर की वसूली करे। उसने घोषणा की कि ये प्रस्ताव कांग्रेसी घोषणा पत्र के आधार पर तैयार किये गये हैं। कांग्रेसी नेता, उद्योगपतियों और व्यापारियों के पक्ष में खुले रूप में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे। लियाकत अली ने बहुत चालाकी से काम लिया था। उसने मंत्रिमण्डल की स्वीकृति पहले ही प्राप्त कर ली थी कि बजट साम्यवादी नीतियों पर आधारित हो। उसने करों आदि के विषय में मंत्रिमण्डल को कोई विस्तृत सूचना नहीं दी थी।

जब उसने बजट प्रस्तुत किया तो कांग्रेसी नेता भौंचक्के रह गये। मुस्लिम लीग का बजट प्रकटतः पूंजीपतियों के विरुद्ध दिखता था किंतु यह देश का सत्यानाश करने वाला था। सरदार पटेल और राजगोपालाचारी ने अत्यंत आक्रोश से इस बजट का विरोध किया। वित्तमंत्री की हैसियत से लियाकत अलीखां को सरकार के प्रत्येक विभाग में दखल देने का अधिकार मिल गया था। वह प्रत्येक प्रस्ताव को या तो अस्वीकार कर देता था या फिर उसमें बदलाव कर देता था। मंत्रिगण, लियाकत अलीखां की अनुमति के बिना एक चपरासी भी नहीं रख सकते थे।

लार्ड माउण्टबेटन भी समझ गए कि मुस्लिम लीग का बजट कितना विनाशकारी है!अंत में कांग्रेस के अनुरोध पर लार्ड माउण्टबेटन ने लियाकत अली से बात की और करों की दरें काफी कम करवाईं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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