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आजादी की नाव को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी आने वाली थी सरदार पटेल पर

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इतिहास के समुद्र में भारत की आजादी की नाव हिचकोले खाती हुई तट पर आ लगी थी किंतु यहाँ उसे भारत के 565 देशी राजाओं की लहरों ने घेर लिया। रियासती विभाग का मंत्री होने के कारण सरदार पटेल पर इन राजाओं से आजादी की नाव की रक्षा करने की जिम्मेदारी आ पड़ी। ये वे राजा थे जो अपने राज्य को भारत में मिलाने की बजाय स्वतंत्र रखने का प्रयास कर रहे थे। इन्हीं में वे मुस्लिम शासक भी थे जो अपनी रियासत को पाकिस्तान में मिलाने के लिए अपने राज्य की जनता के विरुद्ध षड़यंत्र कर रहे थे।

ब्रिटिश क्राउन के शासन में भारत, दो भागों में बंट गया था। पहला भाग ब्रिटिश भारत कहलाता था जिसमें 11 ब्रिटिश प्रांत तथा 6 कमिश्नरी प्रांत थे। इस भाग पर ब्रिटेन से नियुक्त होकर आया सर्वोच्च अधिकारी, गवर्नर जनरल की हैसियत से शासन करता था। दूसरा भाग रियासती भारत कहलाता था जिसमें 566 देशी रियासतें थीं।

इस भाग पर ब्रिटेन से नियुक्त होकर आया गवर्नर जनरल ही वायसराय के पदनाम से शासन करता था। इस भाग पर शासन करने के लिये अंग्रेजों ने देशी राज्यों से अधीनस्थ संधियां कर रखी थीं। इन संधियों के माध्यम से अंग्रेजों ने देशी राज्यों पर अपनी परमोच्चता थोप रखी थी।

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भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के प्रावधानों के अनुसार 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश भारतीय क्षेत्रों को भारत तथा पाकिस्तान नामक दो देशों में बांट दिया जाना था। इसी अधिनियम की धारा 8 के अनुसार भारत के 566 देशी राज्यों पर से ब्रिटिश क्राउन की परमोच्चता समाप्त करके उन्हें स्वतंत्र कर दिया जाना था। इसके बाद देशी राज्य अपनी इच्छानुसार भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी भी देश में सम्मिलित होने, कोई तीसरा संघ बनाने अथवा पृथक अस्तित्व बनाये रखने के लिये स्वतंत्र थे।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय ब्रिटिश भारत में बहुसंख्यक हिन्दू जनसंख्या निवास करती थी। इसी प्रकार रियासती भारत में अधिकांश देशी राज्य, हिंदू राज्य थे। अतः नृवंशीय एवं सांस्कृतिक आधार पर ब्रिटिश भारत एवं रियासती भारत की जनता एक ही थी। भारतीय नेताओं का मानना था कि जब ब्रिटिश सरकार सत्ता का हस्तांतरण भारत सरकार को कर रही है तब देशी राज्यों पर से ब्रिटिश सरकार की परमोच्चता स्वतः ही भारत सरकार को स्थानांतरित हो जायेगी जबकि भारतीय रियासतों के शासक विगत लगभग डेढ़ सदी से स्वतंत्र होने का स्वप्न देख रहे थे।

जब अंग्रेजों ने देशी राज्यों को मुक्त कर दिया तो त्रावणकोर, हैदराबाद, जम्मू एवं कश्मीर, मैसूर, इन्दौर, भोपाल, नवानगर यहाँ तक कि बिलासपुर की बौनी रियासत ने भी पूर्णतः स्वतंत्र रहने का स्वप्न देखा। 3 अप्रेल 1947 को बम्बई में नरेंद्र मंडल की बैठक आयोजित हुई जिसमें कई राजाओं ने कहा कि देशी राज्यों के अधिपतियों को हिंदी संघ राज्य में नहीं मिलना चाहिये।

5 जून 1947 को भोपाल तथा त्रावणकोर ने स्वतंत्र रहने की घोषणा की। हैदराबाद को भी यही उचित जान पड़ा। भारतीय नेताओं को जम्मू एवं कश्मीर, इन्दौर, जोधपुर, धौलपुर, भरतपुर तथा कुछ अन्य राज्यों के समूहों द्वारा भी ऐसी ही घोषणा किये जाने की आशंका थी। इस प्रकार देशी रियासतों के शासकों की महत्वाकांक्षाएं देश की अखण्डता के लिये खतरा बन गयीं।

तेजबहादुर सप्रू का कहना था कि मुझे उन राज्यों पर, चाहे वह छोटे हों अथवा बड़े, आश्चर्य होता है कि वे इतने मूर्ख हैं कि वे समझते हैं कि वे इस तरह से स्वतंत्र हो जायेंगे और फिर अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखेंगे। दुर्दिन के मसीहाओं ने भविष्यवाणी की थी कि हिंदुस्तान की आजादी की नाव रजवाड़ों की चट्टान से टकरायेगी। सरदार पटेल पर जिम्मदारी आने वाली थी कि आजादी की नाव इस चट्टान टकराकर चूर-चूर न हो जाये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजे-रजवाड़े स्वतंत्र भारत की झोली में डाल दें

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सदार पटेल ने माउण्टबेटन से कहा कि वे ब्रिटिश भारत के समस्त राजे-रजवाड़े स्वतंत्र भारत की झोली में डाल दें!

भारत के 566 देशी राज्यों में से 12 राज्य, प्रस्तावित पाकिस्तान की भौगोलिक सीमा में स्थित थे जबकि शेष 554 में से अधिकांश, भारतीय क्षेत्रों से घिरे हुए थे। कुछ राज्य प्रस्तावित भारत-पाकिस्तान की सीमा पर स्थित थे। भारत पाकिस्तान सीमा पर स्थित समस्त राज्य हिन्दू बहुल प्रजा एवं हिन्दू शासकों द्वारा शासित थे। इस कारण स्वाभाविक रूप से भारत में ही सम्मिलित किये जाने थे किंतु मुस्लिम लीग ने अब दोहरी चाल चली।

उसने देशी राज्यों के साथ बड़ा मुलायम रवैया अपनाया। उसके लिये ऐसा करना सुविधाजनक था। जिन्ना यह प्रयास कर रहे थे कि अधिक से अधिक संख्या में देशी रियासतें अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दें अथवा पाकिस्तान में सम्मिलित हो जायें ताकि भारतीय संघ स्थायी रूप से दुर्बल बन सके।

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इसलिये जिन्ना ने लुभावने प्रस्ताव देकर भारतीय रियासतों को पाकिस्तान में सम्मिलित करने का प्रयास किया। उसने घोषित किया कि मुस्लिम लीग, देशी राज्यों में बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेगी और यदि देशी राज्य स्वतंत्र रहें तो भी मुस्लिम लीग की ओर से उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं दी जायेगी। भारत राजे-रजवाड़े के बहुत से जिन्ना की बातों में आ गए!

उन्हीं दिनों लंदन इवनिंग स्टैण्डर्ड में कार्टूनिस्ट डेविड लॉ का एक कार्टून ‘योअर बेबीज नाउ’ शीर्षक से छपा जिसमें भारत के राष्ट्रीय नेताओं के समक्ष भारतीय राजाओं की समस्या का सटीक चित्रण किया गया था। इस कार्टून में नेहरू तथा जिन्ना को अलग-अलग कुर्सियों पर बैठे हुए दिखाया गया था जिनकी गोद में कुछ बच्चे बैठे थे। ब्रिटेन को एक नर्स के रूप में दिखाया गया था जो यूनियन जैक लेकर दूर जा रही थी। नेहरू की गोद में बैठे हुए बच्चों को राजाओं की समस्या के रूप में दिखाया गया था जो नेहरू के घुटनों पर लातें मार कर चिल्ला रहे थे। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर तथा बाद में स्वतंत्र भारत में ब्रिटेन के प्रथम हाई कमिश्नर रहे, सर आर्चिबाल्ड नेई को भारत सरकार तथा देशी रजवाड़ों के बीच किसी प्रकार की संधि होने में संदेह था।

राष्ट्रीय नेताओं तथा देशी राज्यों के शासकों में प्रायः अच्छे सम्बन्ध नहीं रहे थे जबकि माउंटबेटन देशी राजाओं से भी बात कर रहे थे।

इसलिये उन्हें देशी राजाओं की इच्छाओं का पता था। सरदार पटेल ने देशी रियासतों को भारत में सम्मिलित होने के लिये सहमत करने हेतु, माउण्बेटन से सहयोग मांगा। पटेल ने माउण्टबेटन से कहा कि यदि इस काम में आपने सहयोग दिया तो भारत की जनता सदियों तक आपकी ऋणी रहेगी।

माउंटबेटन ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया। उन्होंने पटेल से कहा कि यदि राजाओं से उनकी पदवियां न छीनी जायें, महल उन्हीं के पास बने रहें, उन्हें गिरफ्तारी से मुक्त रखा जाये, प्रिवीपर्स की सुविधा जारी रहे तथा अंग्रेजों द्वारा दिये गये किसी भी सम्मान को स्वीकारने से न रोका जाये तो वायसराय, राजाओं को इस बात पर राजी कर लेंगे कि वे अपने राज्य भारतीय संघ में मिलायें और स्वतंत्र होने का विचार त्याग दें।

सरदार पटेल ने भी माउंटबेटन के सामने शर्त रखी कि वे माउंटबेटन की शर्त को स्वीकार कर लेंगे यदि माउंटबेटन उन सारे राजे-रजवाड़े भारत की झोली में डाल दें जो कि स्वतंत्र भारत की धरती में आते हैं। यदि सारे रजवाड़े भारत में मिल जाते हैं तो विभाजन का घाव काफी कम हो जायेगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल की चुनौती

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सरदार पटेल को जवाहर लाल नेहरू की अंतरिम सरकार में गृहमंत्री बनाया गया था किंतु आजादी से कुछ दिन पहले रियासती मंत्रालय का गठन किया गया जिसका कार्य भारत के 565 देशी राज्यों एवं भारत सरकार के बीच सम्पर्क स्थापित करना था। सरदार पटेल की चुनौती यह थी कि वे इन समस्त देशी राज्यों को भारत संघ में सम्मिलित करें।

पाकिस्तान के जनक मुहम्मद अली जिन्ना ने भारत को स्थाई रूप से कमजोर करने के लिये एक योजना बनाई तथा उसमें भोपाल नवाब हमीदुल्ला, राजनैतिक विभाग के सचिव कोनार्ड कोरफील्ड, जूनागढ़ के नवाब मुहम्मद महाबत खानजी तथा कुछ अन्य मित्रों को सम्मिलित किया।

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जिन्ना ने निजाम हैदराबाद से भी सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया क्योंकि उसके प्रति माउंटबेटन का रवैया अत्यंत नरम था। कुछ हिन्दू रियासतों के शासक भी पाकिस्तान में सम्मिलित होने को तैयार हो गये जो कि कांग्रेस के नेताओं से नाराज थे। त्रावणकोर के महाराजा ने 11 जून 1947 को एक व्यापारी दल अपने यहाँ से पाकिस्तान भेजना स्वीकार कर लिया।भोपाल नवाब हमीदुल्लाखां छिपे तौर पर पाकिस्तान परस्त तथा कांग्रेस विरोधी के रूप में काम कर रहा था किंतु जब देश का विभाजन होना निश्चित हो गया तो भोपाल नवाब ने अपनी मुट्ठी खोल दी और प्रत्यक्षतः विभाजनकारी मुस्लिम लीग के समर्थन में चला गया तथा जिन्ना का निकट सलाहकार बन गया।

वह जिन्ना की उस योजना में सम्मिलित हो गया जिसके तहत राजाओं को अधिक से अधिक संख्या में या तो पाकिस्तान में मिलने के लिये प्रोत्साहित करना था या फिर उनसे यह घोषणा करवानी थी कि वे अपने राज्य को स्वतंत्र रखेंगे। नवाब की कार्यवाहियों को देखते हुए रियासती मंत्रालय के सचिव ए. एस. पई ने पटेल को एक नोटशीट भिजवायी कि भोपाल नवाब, जिन्ना के दलाल की तरह काम कर रहा है।

नवाब चाहता था कि भोपाल से लेकर कराची तक के मार्ग में आने वाले राज्यों का एक समूह बने जो पाकिस्तान में मिल जाये। इसलिये उसने जिन्ना की सहमति से एक योजना बनायी कि बड़ौदा, इंदौर, भोपाल, उदयपुर, जोधपुर और जैसलमेर राज्य पाकिस्तान का अंग बन जायें।

इस योजना में सबसे बड़ी बाधा उदयपुर और बड़ौदा की ओर से उपस्थित हो सकती थी। इस प्रकार भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का एक मानचित्र तैयार हो गया। छोटी रियासतों के शासक बड़े ध्यान से यह देख रहे थे कि बड़ी रियासतों के विद्रोह का क्या परिणाम निकलता है, उसी के अनुसार वे आगे की कार्यवाही करना चाहते थे। इस प्रकार सरदार पटेल के लिये बड़ी चुनौती तैयार हो चुकी थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लौह-पुरुष अपनी धोती समेट कर राजाओं के पीछे पड़ जायेगा

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देशी राज्यों को भारत में सम्मिलित करना एक कठिन कार्य था किंतु कांग्रेस जानती थी कि लौह-पुरुष अपनी धोती समेट कर राजाओं के पीछे पड़ जायेगा!

अंग्रेज सरकार भारत की देशी रियासतों पर राजनैतिक विभाग के माध्यम से शासन करती थी। भारत का गवर्नर जनरल, वायसराय अर्थात् क्राउन रिप्रजेण्टेटिव (ब्रिटेन के राजा के प्रतिनिधि) की हैसियत से इन राजाओं पर अपने बनाये हुए तथा घोषित तथा अघोषित कानून लादता था।

जब भारत की आजादी की तिथि निकट आ गयी तो एक ऐसे विभाग की आवश्यकता अनुभव की गई जो भारत की अंतरिम सरकार की तरफ से देशी राजाओं से पूर्ण अधिकार के साथ बात कर सके। इसलिये 5 जुलाई 1947 को सरदार पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग का गठन किया गया।

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कांग्रेस को आशा थी कि पार्टी का यह लौह-पुरुष अपनी धोती समेट कर राजाओं के पीछे पड़ जायेगा। हमीदुल्ला खां, कोरफील्ड तथा रामास्वामी अय्यर की योजना से निबटने तथा स्वतंत्र हुई रियासतों को भारत संघ में घेरने के लिये पटेल अकेले ही भारी थे। सरदार पटेल गुजरात प्रांत की धरती से निकले थे जिसे बौनी रियासतों अथवा नाखूनी रियासतों का संग्रहालय कहा जाता था। इस कारण सरदार पटेल को राजाओं तथा रजवाड़ों के व्यवहार की अच्छी परख थी। अपने दृढ़ स्वभाव के कारण पटेल, राजाओं से उन्हीं की भाषा में अच्छी तरह बात कर सकते थे। वी. पी. मेनन को उनका सलाहकार व सचिव बनाया गया। वे एकमात्र ऐसे अधिकारी थे जो देशी राज्यों की जटिल समस्या को सुलझा सकते थे।

लौह-पुरुष पटेल का जोरदार व्यक्तित्व और मेनन के लचीले दिमाग का संयोग इस मौके पर अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हुआ। पटेल और मेनन की जोड़ी के साथ नेपथ्य में मंजे हुए राजनीतिज्ञ- सरदार के. एम. पन्निकर, वी. टी. कृष्णामाचारी, भारतीय रियासतों के प्रतिष्ठित मंत्री और भारतीय सिविल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी- सी. एस. वेंकटाचार, एम. के. वेल्लोदी, वी. शंकर, पण्डित हरि शर्मा आदि कार्य कर रहे थे।

पटेल ने मेनन से कहा कि पाकिस्तान इस विचार के साथ कार्य कर रहा है कि सीमावर्ती कुछ राज्यों को वह अपने साथ मिला ले। स्थिति इतनी खतरनाक संभावनायें लिये हुए है कि जो स्वतंत्रता हमने बड़ी कठिनाईयों को झेलने के पश्चात् प्राप्त की है वह राज्यों के दरवाजे से विलुप्त हो सकती है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कोरफील्ड को इंग्लैण्ड के लिये डिस्पैच करवाया

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सरदार पटेल ने राजनैतिक सलाहकार कोनार्ड कोरफील्ड को इंग्लैण्ड के लिये डिस्पैच करवाया को इंग्लैण्ड के लिये डिस्पैच करवाया

वायसराय के राजनैतिक सलाहकार कोनार्ड कोरफील्ड ने मुहम्मद अली जिन्ना की सहायता करने के लिये, रेजीडेंटों और पॉलिटिकल एजेंटों के माध्यम से देशी राजाओं को भारतीय संघ से पृथक रहने के लिये प्रेरित किया। वायसराय के राजनैतिक सलाहकार की हैसियत से वह चाहता था कि कम से कम दो-तीन राज्य जिनमें हैदराबाद प्रमुख था, कांग्रेस के चंगुल से बच जायें। बाकी रजवाड़ों का भी भारत में सम्मिलित होना, जितना मुश्किल हो सके बना दिया जाये।

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कोरफील्ड ने रजवाड़ों के बीच घूम-घूम कर प्रचार किया कि उनके सामने दो नहीं, तीन रास्ते हैं। वे दोनों उपनिवेशों में से किसी एक में सम्मिलित हो सकते हैं अथवा स्वतंत्र भी रह सकते हैं। उसके प्रयासों से त्रावणकोर तथा हैदराबाद ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी उपनिवेश में सम्मिलित नहीं होंगे अपितु स्वतंत्र देश के रूप में रहेंगे। आजादी की तिथि में पाँच सप्ताह शेष रह गये थे। इस बीच कोरफील्ड ने माउण्टबेटन को बताये बिना, देशी रजवाड़ों से केंद्रीय सत्ता का विलोपन करना आरम्भ कर दिया। उसके कहने पर अधिकांश रियासतों में वे फाइलें जला दी गईं जिनमें अंग्रेजी सरकार तथा देशी रियासतों के बीच गोपनीय पत्र व्यवहार संजोकर रखा गया था।

यह पत्र व्यवहार राजाओं द्वारा अपनी रियासतों में किये गये अत्याचारों, हत्याओं और बलात्कार जैसे अपराधों के सम्बन्ध में था। कोरफील्ड के प्रयासों से केन्द्र सरकार एवं देशी रियासातें के बीच चली आ रही व्यवस्थायें रद्द होती जा रही थीं जबकि सरदार इस उधेड़-बुन में थे कि 15 अगस्त से पहले राजाओं की प्रत्येक व्यवस्था, जैसे सेना, डाक आदि को बनाये रखने के सम्बन्ध में राजाओं से किस प्रकार बात की जाये?

पटेल तथा मेनन ने विचार किया कि भारतीय राजाओं से केवल तीन विषयों- रक्षा, विदेशी मामले और संचार में विलय करने के लिये कहा जाये।

जब सरदार पटेल को कोरफील्ड की कारस्तानियों की जानकारी हुई तो उन्होंने माउण्टबेटन को कोरफील्ड की कारस्तानियों से अवगत कराया तथा उसे तत्काल कार्यमुक्त करके इंग्लैण्ड भेजने की मांग की। वायसराय भी कोरफील्ड की कारगुजारियों से तंग था, इसलिये वायसराय ने कोरफील्ड को उसी दिन कार्यमुक्त करके इंग्लैण्ड भेज दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बड़ौदा नरेश प्रतापसिंह गायकवाड़ को गद्दी से उतार दिया!

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वायसराय के राजनैतिक सलाहकार कोनार्ड कोरफील्ड के कहने पर कुछ राजाओं ने भारत में सम्मिलन करने से मना कर दिया तथा अपने स्वतंत्र रहने की घोषणा की। इन राजाओं में बड़ौदा नरेश प्रतापसिंह गायकवाड़ भी सम्मिलित था।

वायसराय के राजनैतिक सलाहकार कोनार्ड कोरफील्ड को इस प्रकार कार्यमुक्त करके इंग्लैण्ड के लिये डिस्पैच करवाने से उन देशी राजाओं में हताशा फैल गई जिन्हें लगता था कि कोरफील्ड ही संकट की घड़ी में उनका सबसे बड़ा सहायक सिद्ध होगा तथा देशी राज्यों को भारत में मिलने से बचा लेगा।

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जब कोरफील्ड भारत से इंग्लैण्ड के लिये जाने लगा तो उसे विदाई देने के लिये भारत के कई छोटे बड़े राजा एयरपोर्ट पर एकत्रित हुए किंतु कोरफील्ड अब राजाओं के लिये कुछ नहीं कर सकता था। पटेल के इस दृढ़ रुख के बाद भी कुछ हठी राजाओं ने अपनी जिद्द नहीं छोड़ी। वे प्रकट रूप से पटेल के आदेशों की अवहेलना करने पर उतारू हो गये। बड़ौदा के महाराजा प्रतापसिंह गायकवाड़ ने अपने हाथ से सरदार पटेल को लिखा कि जब तक उनको भारत का राजा नहीं बनाया जाता और भारत सरकार उनकी समस्त मांगें नहीं मान लेती, तब तक वे कोई सहयोग नहीं देंगे और न ही जूनागढ़ के नवाब की बगावत दबाने में सहयोग देंगे।

इस पर भारत सरकार ने बड़ौदा नरेश प्रतापसिंह गायकवाड़ की मान्यता समाप्त करके उनके पुत्र फतहसिंह को महाराजा बड़ौदा स्वीकार किया। यह राजाओं के लिये बड़ा झटका था, सच्चाई उनकी समझ में आने लगी थी। इस घटना के बाद अधिकांश राजा विनम्र देश सेवकों जैसा व्यवहार करने लगे। उन्होंने रियासतों का विलय न होने देने के लिये जो राज्य संघ बनाया था, उसे भंग कर दिया गया।

वे समझ गये कि अब भारत सरकार से मिल जाने और उसका संरक्षण प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। वे यह भी सोचने लगे कि शासक बने रह कर विद्रोही प्रजा की इच्छा पर जीने के बजाय भारत सरकार की छत्रछाया में रहना कहीं अधिक उपयुक्त होगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल का लक्ष्य राजाओं के झुण्ड को हाँककर भारत संघ में लाना था

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सरदार पटेल का लक्ष्य

भारत की आजादी के समय जब चारों ओर चीख-चिल्लाहट मची हुई थी तब सरदार पटेल का लक्ष्य भारत के 565 राजाओं में से अधिकांश राजाओं को भारत संघ में सम्मिलित करना था।

5 जुलाई 1947 को रियासती विभाग के अस्तित्व में आते ही सरदार पटेल ने देशी राजाओं से अपील की कि वे 15 अगस्त 1947 से पहले, भारत संघ में सम्मिलित हो जायें। देशी राज्यों को सार्वजनिक हित के तीन विषय- रक्षा, विदेशी मामले और संचार, भारत संघ को सुपुर्द करने होंगे जिसकी स्वीकृति उन्होंने पूर्व में केबीनेट मिशन योजना के समय दे दी थी। भारत संघ इससे अधिक उनसे और कुछ नहीं मांग रहा।

भारत संघ देशी राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की मंशा नहीं रखता। राज्यों के साथ व्यवहार में रियासती विभाग की नीति अधिकार की नहीं होगी। कांग्रेस राजाओं के विरुद्ध नहीं रही है। देशी नरेशों ने सदैव देशभक्ति व लोक कल्याण के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है।

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साथ ही पटेल ने राजाओं को चेतावनी भी दी कि यदि कोई नरेश यह सोचता हो कि ब्रिटिश परमोच्चता, राजाओं को हस्तांतरित कर दी जायेगी तो यह उस राजा की भूल होगी। परमोच्चता जनता में निहित है। एक प्रकार से यह घोषणा, राजाओं को समान अस्तित्व के आधार पर भारत में सम्मिलित होने का निमंत्रण था। सरदार के अनुसार यह प्रस्ताव, रजवाड़ों द्वारा पूर्व में ब्रिटिश सरकार के साथ की गयी अधीनस्थ संधियों से बेहतर था।

इस प्रकार पटेल व मेनन द्वारा देशी राजाओं को घेर कर भारत संघ में विलय करवाने के लिये पहला पांसा फैंका गया जिसका परिणाम यह हुआ कि बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने सरदार पटेल की इस घोषणा का एक बार फिर तुरंत स्वागत किया और अपने बंधु राजाओं से अनुरोध किया कि वे इस प्रकार आगे बढ़ाये गये मित्रता के हाथ को थाम लें और भारत सरकार को पूरा समर्थन दें ताकि भारत अपने लक्ष्य को शीघ्रता से प्राप्त कर सके किंतु अधिकांश राजाओं का मानना था कि उन्हें पटेल की बजाय कोरफील्ड की बात सुननी चाहिये।

रियासती विभाग ने देशी राज्यों के भारत अथवा पाकिस्तान में प्रवेश के लिये दो प्रकार के प्रपत्र तैयार करवाये- प्रविष्ठ संलेख तथा यथास्थिति समझौता पत्र। प्रविष्ठ संलेख एक प्रकार का मिलाप पत्र था जिस पर हस्ताक्षर करके कोई भी राजा भारतीय संघ में प्रवेश कर सकता था। यह प्रविष्ठ संलेख उन बड़ी रियासतों के लिये था जिनके शासकों को पूर्ण अधिकार प्राप्त थे। इन रियासतों की संख्या 140 थी। गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में 300 रियासतों को जागीर कहा जाता था।

इनमें से कुछ जागीरों को ई.1943 में संलग्नता योजना में निकटवर्ती बड़े राज्यों से जोड़ दिया गया था किंतु परमोच्चता की समाप्ति के साथ संलग्नता योजना भी समाप्त हो जानी थी। अतः इन जागीरों के ठिकानेदारों एवं तालुकदारों ने मांग की कि उन्हें वर्ष 1943 वाली स्थिति में लाया जाये तथा उनकी देखभाल भारत सरकार द्वारा की जाये जैसी कि राजनैतिक विभाग द्वारा की जाती रही थी।

इन ठिकानों एवं तालुकों के लिये अलग प्रविष्ठ संलेख बनाया गया। काठियावाड़, मध्य भारत तथा शिमला हिल्स में 70 से अधिक राज्य ऐसे थे जिनका पद ठिकानेदारों और ताुलकदारों से बड़ा था किंतु उन्हें पूर्ण शासक का दर्जा प्राप्त नहीं था। ऐसे राज्यों के लिये अलग प्रविष्ठ संलेख बनाया गया। सरदार पटेल का लक्ष्य राजाओं के इन झुण्डों को हाँककर भारत संघ में लाना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल के हाथ राजाओं की भुजाओं पर कसने लगे

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राजा लोग सदियों से अपने राज्यों को भोगते आए थे। पहले वे मुगलों की छत्रछाया में रहे और बार में अंग्रेजों के संरक्षण में रहे किंतु अब उन्हें कांग्रेस शासित भारत में मिलने से डर लग रहा था किंतु सरदार पटेल के हाथ राजाओं की भुजाओं पर कसने लगे।

अधिकांश राजाओं को डर था कि आजादी के बाद या तो उनकी जनता उनकी संपत्तियों को लूट लेगी अथवा भारत सरकार उसे जब्त कर लेगी। ब्रिटिश सत्ता, आजादी के बाद किसी भी तरह भारतीय राजाओं की रक्षा नहीं कर सकती थी।

उनमें से अधिकांश को समझ में आने लगा था कि या तो अत्यंत असम्मानजनक तरीके से हमेशा के लिये मिट जाओ या फिर किसी तरह सम्मानजनक तरीके से अपनी कुछ सम्पत्ति तथा कुछ अधिकारों को बचा लो।

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31 जुलाई 1947 को बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने रियासती मंत्रालय के सचिव को एक पत्र लिखकर विशेषाधिकारों  की मांग की। रियासती मंत्रालय के सचिव ने महाराजा को लिखा कि नेरशों के व्यक्तिगत विशेषाधिकारों के विषय में हमने केन्द्र सरकार के समस्त सम्बन्धित विभागों से राय ली है और मुझे यह आश्वासन देने का निर्देश हुआ है कि नरेशगण व उनके परिवार जिन विशेषाधिकारों का उपयोग करते आये हैं, वह भविष्य में भी करते रहेंगे। बीकानेर महाराजा ने इस पत्र की प्रतियां बहुत से राजाओं को भिजवायीं। जोधपुर महाराजा इस पत्र से आश्वस्त नहीं हुए किंतु उन्होंने केन्द्र सरकार से किसी विशेष अधिकार की मांग नहीं की।

सरदार पटेल के मखमली दस्ताने युक्त हाथ, राजाओं की भुजाओं पर कसने लगे। सरदार पटेल की उदार अपील, माउंटबेटन द्वारा नरेंद्रमंडल में दिये गये उद्बोधन, कोरफील्ड की रवानगी, रियासतों में चल रहे जन आंदोलन तथा बीकानेर नरेश को रियासती मंत्रालय के पत्र आदि परिस्थितियों के वशीभूत होकर देश के अधिकांश राजाओं ने भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये। बीकानेर नरेश सादूलसिंह हस्ताक्षर करने वाले प्रथम राजा थे।

अधिकतर राज्यों, विशेषकर छोटे राज्यों, जिन्हें अपनी सीमाओं का पता था तथा वे ये भी जानते थे कि रोटी के किस तरफ मक्खन लगा हुआ है, स्वेच्छा से भारतीय संघ के अंतर्गत आ गये। न तो वे अर्थिक रूप से सक्षम थे और न ही उनमें आंतरिक अथवा बाह्य दबावों का विरोध करने की क्षमता थी।

कई बुद्धिमान तथा यथार्थवादी राजाओं ने विरोध की व्यर्थता तथा शक्तिशाली भारत संघ की संविधान सभा की सदस्यता की सार्थकता को अनुभव किया तथा शालीनता पूर्वक भारत संघ में सम्मिलित हो गये। कुछ हंसोड़ एंव मजाकिया स्वभाव के थे, वे भी संघ में धकेल दिये गये। कुछ राजा अपने घोटालों और कारनामों से डरे हुए थे, उन्हें भी बलपूर्वक संघ में धकेल दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देशी रियासतों का विलय

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भारत की आजादी के समय भारत में 566 देशी रियासतें थीं किंतु पाकिस्तान के अलग हो जाने के कारण उस क्षेत्र की 12 रियासतें पाकिस्तान में चली गईं। सरदार पटेल ने शेष 554 में से 550 देशी रियासतों का विलय भारत में कर लिया।

भारतीय राजाओं ने भारत संघ में सम्मिलित होने के लिये एक-एक करके हस्ताक्षर करने के लिये कतार लगा दी। कुछ रजवाड़ों ने अपना विलय स्वीकार तो किया किंतु बेहद कड़वाहट  के साथ। मध्य भारत का एक राजा विलय के कागजों पर हस्ताक्षर करने के साथ लड़खड़ा कर गिरा और हृदयाघात से मर गया। बड़ौदा का महाराजा दस्तखत करने के बाद मेनन के गले में हाथ डालकर बच्चों की तरह रोया।

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भोपाल ने सेंट्रल इण्डियन स्टेट्स का एक फेडरेशन बनाने का प्रयास किया किंतु वह असफल हो गया। जब त्रावणकोर ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया तो सरदार पटेल के आदेश पर त्रावणकोर की जनता ने महाराजा के खिलाफ आंदोलन किया। त्रावणकोर की जनता ने त्रावणकोर राज्य की पुलिस के साथ सड़कों पर मुठभेड़ की। 29 जुलाई को एक अनजान व्यक्ति ने त्रावणकोर रियासत के प्रधानमंत्री सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर को छुरा मारकर बुरी तरह घायल कर दिया। रामास्वामी के चेहरे पर गहरी चोट आयी।

आक्रमणकारी भागने में सफल रहा। इस हमले ने निर्णय कर दिया। महाराजा ने वायसराय को तार दिया कि वह दस्तखत करने को तैयार है। सरदार पटेल ने स्थानीय कांग्रेस कमेटी को महाराजा के विरुद्ध प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया। त्रावणकोर भारत में मिल गया। त्रावणकोर की घटनाओं का देशी राजाओं पर जादू का सा प्रभाव हुआ। उन्हें बड़ा सबक मिला और वे और अधिक संख्या में हस्ताक्षर करने लगे। त्रावणकोर की घटनाओं ने हैदराबाद, भोपाल, जोधपुर व इंदौर के शासकों को हिला दिया। उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगा किंतु वे अब भी हठ छोड़ने को तैयार नहीं थे।

वायसराय ने भोपाल, जोधपुर व इंदौर के शासकों अथवा उनके दीवानों को वार्त्ता के लिये बुलाया। इन वार्त्ताओं के परिणाम स्वरूप जोधपुर एवं इंदौर के राजाओं ने भारत में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया।

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतन्त्र हो गया। 566 भारतीय रियासतों में से 12 रियासतें- बहावलपुर, खैरपुर, कलात, लास बेला, मकरान, खरान, अम्ब (तनावल), चित्राल, हुंजा, धीर, नगर तथा स्वात, पाकिस्तानी क्षेत्रों से घिरी हुई थीं। इसलिये उन्हें पाकिस्तान में सम्मिलित किया गया। शेष 554 रियासतें भारत में रह गईं।

इनमें से जूनागढ़़ (सौराष्ट्र), भोपाल, हैदराबाद (दक्षिण भारत) और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर 550 रियासतों ने सरदार पटेल के प्रयत्नों से 15 अगस्त 1947 से पहले ही भारतीय संघ में मिलने पर सहमति दे दी। जूनागढ़, हैदराबाद, भोपाल तथा जम्मू-कश्मीर राज्य भारत में मिलने को तैयार नहीं हुए। 554 में से 550 देशी रियासतों का विलय भारत की बहुत बड़ी सफलता थी। इस सफलता का श्रेय सरदार पटेल, वी. पी. मेनन तथा उनकी टीम को जाता है।

भारत के एकीकरण पर संतोष व्यक्त करते हुए जॉर्ज षष्ठम् ने लिखा है- मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि लगभग समस्त भारतीय राज्यों ने किसी न किसी उपनिवेश में सम्मिलित होने का निर्णय कर लिया है। वे संसार में कभी भी अकेले खड़े नहीं हो सकते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लक्षद्वीप पर अधिकार

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लक्षद्वीप में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी रहती थी, इसलिए डर था कि पाकिस्तान इन पर कब्जा कर लेगा किंतु सरदार पटेल ने लक्षद्वीप पर अधिकार कर लिया।

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जब अरब के मुसलमानों ने दुनिया में इस्लाम फैलाना आरम्भ किया तब उन्होंने दुनिया के उन हिस्सों को अपना पहला निशाना बनाया जो सीरिया और ईरान की तरह रेगिस्तान में थे, इण्डोनेशिया, सुमात्रा, जावा, ब्रुनेई आदि की तरह समुद्र के बीच टापुओं के रूप में स्थित थे अथवा अफगानिस्तान जैसी दुर्गम पहाड़ियों में थे। इन क्षेत्रों की जनता निर्धन होती थी इस कारण आसानी से मुसलमानों द्वारा दबा ली जाती थी और इस्लाम के अंतर धकेल दी जाती थी। यही कारण था कि लक्षद्वीप जैसे शांत और एकाकी द्वीप समूहों में भी इस्लाम ने अपना शिकंजा जकड़ लिया।

लक्षद्वीप समूह भारत की मुख्य भूमि से दूर तथा अरब सागर में स्थित है। भारत की आजादी के समय ये द्वीप ब्रिटिश क्राउन की सत्ता का हिस्सा थे तथा मद्रास प्रेसीडेंसी के अधीन थे। 15 अगस्त 1947 अधिनियम के अनुसार इन्हें भारत में मिलना था किंतु इन द्वीपों पर बड़ी संख्या में मुस्लिम जनसंख्या निवास करती थी।

इस कारण यह भय उत्पन्न हो गया कि इन द्वीपों पर पाकिस्तान अपना अधिकार जतायेगा अथवा अधिकार जमाने की चेष्टा करेगा। सरदार पटेल की दृष्टि से भारत का सुदूरस्थ भाग भी बचा हुआ नहीं था। इसलिये उन्होंने समय रहते ही रॉयल इण्डियन नेवी की एक टुकड़ी लक्षद्वीप भेजने का निर्णय लिया। इस टुकड़ी ने द्वीप पर अपनी स्थिति सुदृढ़ करके वहाँ भारतीय झण्डा फहरा दिया। यह सुनिश्चित किया गया कि पाकिस्तान इन द्वीपों पर अधिकार करने की कुचेष्टा न कर सके। सरदार पटेल का अनुमान सही था।

रॉयल इण्डियन नेवी की टुकड़ियों द्वारा लक्षद्वीप पर अधिकार कर लिये जाने के कुछ घण्टों बाद ही रॉयल पाकिस्तान नेवी के जहाज लक्षद्वीप के चारों ओर दिखाई देने लगे किंतु जब उन्होंने देखा कि द्वीप पर पहले से ही तिरंगा फहरा रहा है तो वे बिना कोई कार्यवाही किये, कराची लौट गये।

यदि पटेल में इतनी दूरदृष्टि नहीं होती तो भारत का नक्शा निःसंदेह आज के नक्शे जैसा नहीं होता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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