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बड़ौदा नरेश प्रतापसिंह गायकवाड़ को गद्दी से उतार दिया!

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वायसराय के राजनैतिक सलाहकार कोनार्ड कोरफील्ड के कहने पर कुछ राजाओं ने भारत में सम्मिलन करने से मना कर दिया तथा अपने स्वतंत्र रहने की घोषणा की। इन राजाओं में बड़ौदा नरेश प्रतापसिंह गायकवाड़ भी सम्मिलित था।

वायसराय के राजनैतिक सलाहकार कोनार्ड कोरफील्ड को इस प्रकार कार्यमुक्त करके इंग्लैण्ड के लिये डिस्पैच करवाने से उन देशी राजाओं में हताशा फैल गई जिन्हें लगता था कि कोरफील्ड ही संकट की घड़ी में उनका सबसे बड़ा सहायक सिद्ध होगा तथा देशी राज्यों को भारत में मिलने से बचा लेगा।

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जब कोरफील्ड भारत से इंग्लैण्ड के लिये जाने लगा तो उसे विदाई देने के लिये भारत के कई छोटे बड़े राजा एयरपोर्ट पर एकत्रित हुए किंतु कोरफील्ड अब राजाओं के लिये कुछ नहीं कर सकता था। पटेल के इस दृढ़ रुख के बाद भी कुछ हठी राजाओं ने अपनी जिद्द नहीं छोड़ी। वे प्रकट रूप से पटेल के आदेशों की अवहेलना करने पर उतारू हो गये। बड़ौदा के महाराजा प्रतापसिंह गायकवाड़ ने अपने हाथ से सरदार पटेल को लिखा कि जब तक उनको भारत का राजा नहीं बनाया जाता और भारत सरकार उनकी समस्त मांगें नहीं मान लेती, तब तक वे कोई सहयोग नहीं देंगे और न ही जूनागढ़ के नवाब की बगावत दबाने में सहयोग देंगे।

इस पर भारत सरकार ने बड़ौदा नरेश प्रतापसिंह गायकवाड़ की मान्यता समाप्त करके उनके पुत्र फतहसिंह को महाराजा बड़ौदा स्वीकार किया। यह राजाओं के लिये बड़ा झटका था, सच्चाई उनकी समझ में आने लगी थी। इस घटना के बाद अधिकांश राजा विनम्र देश सेवकों जैसा व्यवहार करने लगे। उन्होंने रियासतों का विलय न होने देने के लिये जो राज्य संघ बनाया था, उसे भंग कर दिया गया।

वे समझ गये कि अब भारत सरकार से मिल जाने और उसका संरक्षण प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। वे यह भी सोचने लगे कि शासक बने रह कर विद्रोही प्रजा की इच्छा पर जीने के बजाय भारत सरकार की छत्रछाया में रहना कहीं अधिक उपयुक्त होगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल का लक्ष्य राजाओं के झुण्ड को हाँककर भारत संघ में लाना था

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सरदार पटेल का लक्ष्य

भारत की आजादी के समय जब चारों ओर चीख-चिल्लाहट मची हुई थी तब सरदार पटेल का लक्ष्य भारत के 565 राजाओं में से अधिकांश राजाओं को भारत संघ में सम्मिलित करना था।

5 जुलाई 1947 को रियासती विभाग के अस्तित्व में आते ही सरदार पटेल ने देशी राजाओं से अपील की कि वे 15 अगस्त 1947 से पहले, भारत संघ में सम्मिलित हो जायें। देशी राज्यों को सार्वजनिक हित के तीन विषय- रक्षा, विदेशी मामले और संचार, भारत संघ को सुपुर्द करने होंगे जिसकी स्वीकृति उन्होंने पूर्व में केबीनेट मिशन योजना के समय दे दी थी। भारत संघ इससे अधिक उनसे और कुछ नहीं मांग रहा।

भारत संघ देशी राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की मंशा नहीं रखता। राज्यों के साथ व्यवहार में रियासती विभाग की नीति अधिकार की नहीं होगी। कांग्रेस राजाओं के विरुद्ध नहीं रही है। देशी नरेशों ने सदैव देशभक्ति व लोक कल्याण के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है।

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साथ ही पटेल ने राजाओं को चेतावनी भी दी कि यदि कोई नरेश यह सोचता हो कि ब्रिटिश परमोच्चता, राजाओं को हस्तांतरित कर दी जायेगी तो यह उस राजा की भूल होगी। परमोच्चता जनता में निहित है। एक प्रकार से यह घोषणा, राजाओं को समान अस्तित्व के आधार पर भारत में सम्मिलित होने का निमंत्रण था। सरदार के अनुसार यह प्रस्ताव, रजवाड़ों द्वारा पूर्व में ब्रिटिश सरकार के साथ की गयी अधीनस्थ संधियों से बेहतर था।

इस प्रकार पटेल व मेनन द्वारा देशी राजाओं को घेर कर भारत संघ में विलय करवाने के लिये पहला पांसा फैंका गया जिसका परिणाम यह हुआ कि बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने सरदार पटेल की इस घोषणा का एक बार फिर तुरंत स्वागत किया और अपने बंधु राजाओं से अनुरोध किया कि वे इस प्रकार आगे बढ़ाये गये मित्रता के हाथ को थाम लें और भारत सरकार को पूरा समर्थन दें ताकि भारत अपने लक्ष्य को शीघ्रता से प्राप्त कर सके किंतु अधिकांश राजाओं का मानना था कि उन्हें पटेल की बजाय कोरफील्ड की बात सुननी चाहिये।

रियासती विभाग ने देशी राज्यों के भारत अथवा पाकिस्तान में प्रवेश के लिये दो प्रकार के प्रपत्र तैयार करवाये- प्रविष्ठ संलेख तथा यथास्थिति समझौता पत्र। प्रविष्ठ संलेख एक प्रकार का मिलाप पत्र था जिस पर हस्ताक्षर करके कोई भी राजा भारतीय संघ में प्रवेश कर सकता था। यह प्रविष्ठ संलेख उन बड़ी रियासतों के लिये था जिनके शासकों को पूर्ण अधिकार प्राप्त थे। इन रियासतों की संख्या 140 थी। गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में 300 रियासतों को जागीर कहा जाता था।

इनमें से कुछ जागीरों को ई.1943 में संलग्नता योजना में निकटवर्ती बड़े राज्यों से जोड़ दिया गया था किंतु परमोच्चता की समाप्ति के साथ संलग्नता योजना भी समाप्त हो जानी थी। अतः इन जागीरों के ठिकानेदारों एवं तालुकदारों ने मांग की कि उन्हें वर्ष 1943 वाली स्थिति में लाया जाये तथा उनकी देखभाल भारत सरकार द्वारा की जाये जैसी कि राजनैतिक विभाग द्वारा की जाती रही थी।

इन ठिकानों एवं तालुकों के लिये अलग प्रविष्ठ संलेख बनाया गया। काठियावाड़, मध्य भारत तथा शिमला हिल्स में 70 से अधिक राज्य ऐसे थे जिनका पद ठिकानेदारों और ताुलकदारों से बड़ा था किंतु उन्हें पूर्ण शासक का दर्जा प्राप्त नहीं था। ऐसे राज्यों के लिये अलग प्रविष्ठ संलेख बनाया गया। सरदार पटेल का लक्ष्य राजाओं के इन झुण्डों को हाँककर भारत संघ में लाना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल के हाथ राजाओं की भुजाओं पर कसने लगे

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राजा लोग सदियों से अपने राज्यों को भोगते आए थे। पहले वे मुगलों की छत्रछाया में रहे और बार में अंग्रेजों के संरक्षण में रहे किंतु अब उन्हें कांग्रेस शासित भारत में मिलने से डर लग रहा था किंतु सरदार पटेल के हाथ राजाओं की भुजाओं पर कसने लगे।

अधिकांश राजाओं को डर था कि आजादी के बाद या तो उनकी जनता उनकी संपत्तियों को लूट लेगी अथवा भारत सरकार उसे जब्त कर लेगी। ब्रिटिश सत्ता, आजादी के बाद किसी भी तरह भारतीय राजाओं की रक्षा नहीं कर सकती थी।

उनमें से अधिकांश को समझ में आने लगा था कि या तो अत्यंत असम्मानजनक तरीके से हमेशा के लिये मिट जाओ या फिर किसी तरह सम्मानजनक तरीके से अपनी कुछ सम्पत्ति तथा कुछ अधिकारों को बचा लो।

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31 जुलाई 1947 को बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने रियासती मंत्रालय के सचिव को एक पत्र लिखकर विशेषाधिकारों  की मांग की। रियासती मंत्रालय के सचिव ने महाराजा को लिखा कि नेरशों के व्यक्तिगत विशेषाधिकारों के विषय में हमने केन्द्र सरकार के समस्त सम्बन्धित विभागों से राय ली है और मुझे यह आश्वासन देने का निर्देश हुआ है कि नरेशगण व उनके परिवार जिन विशेषाधिकारों का उपयोग करते आये हैं, वह भविष्य में भी करते रहेंगे। बीकानेर महाराजा ने इस पत्र की प्रतियां बहुत से राजाओं को भिजवायीं। जोधपुर महाराजा इस पत्र से आश्वस्त नहीं हुए किंतु उन्होंने केन्द्र सरकार से किसी विशेष अधिकार की मांग नहीं की।

सरदार पटेल के मखमली दस्ताने युक्त हाथ, राजाओं की भुजाओं पर कसने लगे। सरदार पटेल की उदार अपील, माउंटबेटन द्वारा नरेंद्रमंडल में दिये गये उद्बोधन, कोरफील्ड की रवानगी, रियासतों में चल रहे जन आंदोलन तथा बीकानेर नरेश को रियासती मंत्रालय के पत्र आदि परिस्थितियों के वशीभूत होकर देश के अधिकांश राजाओं ने भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये। बीकानेर नरेश सादूलसिंह हस्ताक्षर करने वाले प्रथम राजा थे।

अधिकतर राज्यों, विशेषकर छोटे राज्यों, जिन्हें अपनी सीमाओं का पता था तथा वे ये भी जानते थे कि रोटी के किस तरफ मक्खन लगा हुआ है, स्वेच्छा से भारतीय संघ के अंतर्गत आ गये। न तो वे अर्थिक रूप से सक्षम थे और न ही उनमें आंतरिक अथवा बाह्य दबावों का विरोध करने की क्षमता थी।

कई बुद्धिमान तथा यथार्थवादी राजाओं ने विरोध की व्यर्थता तथा शक्तिशाली भारत संघ की संविधान सभा की सदस्यता की सार्थकता को अनुभव किया तथा शालीनता पूर्वक भारत संघ में सम्मिलित हो गये। कुछ हंसोड़ एंव मजाकिया स्वभाव के थे, वे भी संघ में धकेल दिये गये। कुछ राजा अपने घोटालों और कारनामों से डरे हुए थे, उन्हें भी बलपूर्वक संघ में धकेल दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देशी रियासतों का विलय

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भारत की आजादी के समय भारत में 566 देशी रियासतें थीं किंतु पाकिस्तान के अलग हो जाने के कारण उस क्षेत्र की 12 रियासतें पाकिस्तान में चली गईं। सरदार पटेल ने शेष 554 में से 550 देशी रियासतों का विलय भारत में कर लिया।

भारतीय राजाओं ने भारत संघ में सम्मिलित होने के लिये एक-एक करके हस्ताक्षर करने के लिये कतार लगा दी। कुछ रजवाड़ों ने अपना विलय स्वीकार तो किया किंतु बेहद कड़वाहट  के साथ। मध्य भारत का एक राजा विलय के कागजों पर हस्ताक्षर करने के साथ लड़खड़ा कर गिरा और हृदयाघात से मर गया। बड़ौदा का महाराजा दस्तखत करने के बाद मेनन के गले में हाथ डालकर बच्चों की तरह रोया।

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भोपाल ने सेंट्रल इण्डियन स्टेट्स का एक फेडरेशन बनाने का प्रयास किया किंतु वह असफल हो गया। जब त्रावणकोर ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया तो सरदार पटेल के आदेश पर त्रावणकोर की जनता ने महाराजा के खिलाफ आंदोलन किया। त्रावणकोर की जनता ने त्रावणकोर राज्य की पुलिस के साथ सड़कों पर मुठभेड़ की। 29 जुलाई को एक अनजान व्यक्ति ने त्रावणकोर रियासत के प्रधानमंत्री सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर को छुरा मारकर बुरी तरह घायल कर दिया। रामास्वामी के चेहरे पर गहरी चोट आयी।

आक्रमणकारी भागने में सफल रहा। इस हमले ने निर्णय कर दिया। महाराजा ने वायसराय को तार दिया कि वह दस्तखत करने को तैयार है। सरदार पटेल ने स्थानीय कांग्रेस कमेटी को महाराजा के विरुद्ध प्रदर्शन बंद करने का आदेश दिया। त्रावणकोर भारत में मिल गया। त्रावणकोर की घटनाओं का देशी राजाओं पर जादू का सा प्रभाव हुआ। उन्हें बड़ा सबक मिला और वे और अधिक संख्या में हस्ताक्षर करने लगे। त्रावणकोर की घटनाओं ने हैदराबाद, भोपाल, जोधपुर व इंदौर के शासकों को हिला दिया। उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगा किंतु वे अब भी हठ छोड़ने को तैयार नहीं थे।

वायसराय ने भोपाल, जोधपुर व इंदौर के शासकों अथवा उनके दीवानों को वार्त्ता के लिये बुलाया। इन वार्त्ताओं के परिणाम स्वरूप जोधपुर एवं इंदौर के राजाओं ने भारत में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया।

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतन्त्र हो गया। 566 भारतीय रियासतों में से 12 रियासतें- बहावलपुर, खैरपुर, कलात, लास बेला, मकरान, खरान, अम्ब (तनावल), चित्राल, हुंजा, धीर, नगर तथा स्वात, पाकिस्तानी क्षेत्रों से घिरी हुई थीं। इसलिये उन्हें पाकिस्तान में सम्मिलित किया गया। शेष 554 रियासतें भारत में रह गईं।

इनमें से जूनागढ़़ (सौराष्ट्र), भोपाल, हैदराबाद (दक्षिण भारत) और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर 550 रियासतों ने सरदार पटेल के प्रयत्नों से 15 अगस्त 1947 से पहले ही भारतीय संघ में मिलने पर सहमति दे दी। जूनागढ़, हैदराबाद, भोपाल तथा जम्मू-कश्मीर राज्य भारत में मिलने को तैयार नहीं हुए। 554 में से 550 देशी रियासतों का विलय भारत की बहुत बड़ी सफलता थी। इस सफलता का श्रेय सरदार पटेल, वी. पी. मेनन तथा उनकी टीम को जाता है।

भारत के एकीकरण पर संतोष व्यक्त करते हुए जॉर्ज षष्ठम् ने लिखा है- मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि लगभग समस्त भारतीय राज्यों ने किसी न किसी उपनिवेश में सम्मिलित होने का निर्णय कर लिया है। वे संसार में कभी भी अकेले खड़े नहीं हो सकते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लक्षद्वीप पर अधिकार

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लक्षद्वीप में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी रहती थी, इसलिए डर था कि पाकिस्तान इन पर कब्जा कर लेगा किंतु सरदार पटेल ने लक्षद्वीप पर अधिकार कर लिया।

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जब अरब के मुसलमानों ने दुनिया में इस्लाम फैलाना आरम्भ किया तब उन्होंने दुनिया के उन हिस्सों को अपना पहला निशाना बनाया जो सीरिया और ईरान की तरह रेगिस्तान में थे, इण्डोनेशिया, सुमात्रा, जावा, ब्रुनेई आदि की तरह समुद्र के बीच टापुओं के रूप में स्थित थे अथवा अफगानिस्तान जैसी दुर्गम पहाड़ियों में थे। इन क्षेत्रों की जनता निर्धन होती थी इस कारण आसानी से मुसलमानों द्वारा दबा ली जाती थी और इस्लाम के अंतर धकेल दी जाती थी। यही कारण था कि लक्षद्वीप जैसे शांत और एकाकी द्वीप समूहों में भी इस्लाम ने अपना शिकंजा जकड़ लिया।

लक्षद्वीप समूह भारत की मुख्य भूमि से दूर तथा अरब सागर में स्थित है। भारत की आजादी के समय ये द्वीप ब्रिटिश क्राउन की सत्ता का हिस्सा थे तथा मद्रास प्रेसीडेंसी के अधीन थे। 15 अगस्त 1947 अधिनियम के अनुसार इन्हें भारत में मिलना था किंतु इन द्वीपों पर बड़ी संख्या में मुस्लिम जनसंख्या निवास करती थी।

इस कारण यह भय उत्पन्न हो गया कि इन द्वीपों पर पाकिस्तान अपना अधिकार जतायेगा अथवा अधिकार जमाने की चेष्टा करेगा। सरदार पटेल की दृष्टि से भारत का सुदूरस्थ भाग भी बचा हुआ नहीं था। इसलिये उन्होंने समय रहते ही रॉयल इण्डियन नेवी की एक टुकड़ी लक्षद्वीप भेजने का निर्णय लिया। इस टुकड़ी ने द्वीप पर अपनी स्थिति सुदृढ़ करके वहाँ भारतीय झण्डा फहरा दिया। यह सुनिश्चित किया गया कि पाकिस्तान इन द्वीपों पर अधिकार करने की कुचेष्टा न कर सके। सरदार पटेल का अनुमान सही था।

रॉयल इण्डियन नेवी की टुकड़ियों द्वारा लक्षद्वीप पर अधिकार कर लिये जाने के कुछ घण्टों बाद ही रॉयल पाकिस्तान नेवी के जहाज लक्षद्वीप के चारों ओर दिखाई देने लगे किंतु जब उन्होंने देखा कि द्वीप पर पहले से ही तिरंगा फहरा रहा है तो वे बिना कोई कार्यवाही किये, कराची लौट गये।

यदि पटेल में इतनी दूरदृष्टि नहीं होती तो भारत का नक्शा निःसंदेह आज के नक्शे जैसा नहीं होता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान में मिलने की घोषणा करके पटेल को चुनौती दे बैठा

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जूनागढ़ का नवाब रसूलखानजी कट्टर मुसलमान था। भारत की आजादी के समय उसने प्रयास किया कि जूनागढ़ रियासत पाकिस्तान में शामिल हो जाए। वस्तुतः हैदराबाद, जूनागढ़ और भोपाल नवाब एक ऐसा मुस्लिम गलियारा बनाना चाहते थे जिसका एक सिरा भारत में तो दूसरा सिरा पाकिस्तान में खुलता हो!

गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में जूनागढ़ रियासत स्थित थी। इसकी स्थापना ई.1735 में शेरखान बाबी नामक मुगल सिपाही द्वारा की गई थी। इस रियासत का कुल क्षेत्रफल 3,337 वर्ग मील तथा जनसंख्या 6,70,719 थी। रियासत की 80 से 90 प्रतिशत जनता हिन्दू थी किंतु इस पर जूनागढ़ नवाब शासन करते थे। सर मुहम्मद महाबत खान रसूलखानजी (तृतीय) 11 वर्ष की आयु में जूनागढ़ का नवाब बना था।

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जूनागढ़ का नवाब मेयो कॉलेज अजमेर में रहकर पढ़ा था। उसे तरह-तरह के कुत्ते पालने तथा शेरों का शिकार करने का शौक था। उसके पास सैंकड़ों की संख्या में कुत्ते थे। एक बार उसने एक कुत्ते का एक कुतिया से विवाह करवाया जिस पर उसने बहुत धन व्यय किया तथा पूरे राज्य में अवकाश घोषित किया।

ई.1947 में मुस्लिम लीग के वरिष्ठ नेता सर शाह नवाज भुट्टो को कराची से बुलाकर जूनागढ़ राज्य का दीवान बनाया गया। शाह नवाज भुट्टो ने जूनागढ़ के नवाब को डराया कि यदि जूनागढ़ भारत में मिला तो सरकार, उसके कुत्तों को मार डालेगी तथा शेरों का राष्ट्रीयकरण कर देगी। जबकि पाकिस्तान में वह अपने कुत्तों को सुरक्षित रख सकेगा तथा निर्बाध रूप से शेरों के शिकार कर सकेगा। यह बात नवाब के मस्तिष्क में बैठ गई। जूनागढ़ रियासत चारों ओर से हिन्दू रियासतों से घिरी हुई थी किंतु रियासत की दक्षिण एवं दक्षिण पश्चिम सीमा अरब सागर से मिलती थी। इस कारण जूनागढ़ का नवाब सोचता था कि वह आसानी से पाकिस्तान में सम्मिलित हो सकता है। वास्तविकता यह थी कि जूनागढ़ रियासत तथा पाकिस्तान की सीमा के बीच 240 मील की दूरी में समुद्र स्थित था।

फिर भी जूनागढ़ का नवाब भारत में मिलने की बजाय पाकिस्तान में मिलने के लिये तैयार हो गया। वह यह भी भूल गया कि राज्य की 80 प्रतिशत जनता हिन्दू है तथा चारों ओर हिन्दू रियासतों से घिरी हुई है जो कि भारत में मिल चुकी हैं।

 जब वायसराय की 25 जुलाई 1947 की दिल्ली बैठक के बाद भारत सरकार ने नवाब को इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन भिजवाया तो नवाब ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किये तथा 15 अगस्त 1947 को समाचार पत्रों में एक घोषणा पत्र प्रकाशित करवाया- ‘पिछले कुछ सप्ताहों से जूनागढ़ की सरकार के समक्ष यह सवाल रहा है कि वह हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला करे।

इस मसले के समस्त पक्षों पर सरकार को अच्छी तरह गौर करना है। यह ऐसा रास्ता अख्तयार करना चाहती थी जिससे अंततः जूनागढ़ के लोगों की तरक्की और भलाई स्थायी तौर पर हो सके तथा राज्य की एकता कायम रहे और साथ ही साथ असकी आजादी और ज्यादा से ज्यादा बातों पर इसके अधिकार बने रहें।

गहरे सोच विचार और सभी पहलुओं पर जांच परख के बाद सरकार ने पकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया है और अब उसे जाहिर कर रही है। राज्य का विश्वास है कि वफादार रियाया, जिसके दिल में राज्य की भलाई और तरक्की है, इस फैसले का स्वागत करेगी।’ नवाब यह घोषणा करके सरदार पटेल को सीधी चुनौती दे बैठा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

माउण्टबेटन का सुझाव

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माउण्टबेटन का सुझाव था किजूनागढ़ के मसले को यूनाईटेड नेशन्स में ले जाना चाहिये अन्यथा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ जायेगा। सरदार पटेल ने माउण्टबेटन का सुझाव मानने से मना कर दिया!

जूनागढ़ नवाब द्वारा पाकिस्तान में मिलने की घोषणा करने से जूनागढ़ की जनता में बेचैनी फैल गई तथा जनता ने नवाब की कार्यवाही का विरोध करते हुए एक स्वतन्त्र अस्थायी सरकार स्थापित कर ली। भारत सरकार ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली को तार भेजकर कहलवाया कि वह जूनागढ़ के सम्मिलन को अस्वीकृत कर दे।

लॉर्ड माउण्टबेटन ने इस तार को चीफ ऑफ द गवर्नर जनरल्स स्टाफ लॉर्ड इस्मे के हाथों कराची भिजवाया। लियाकत अली ने भारत सरकार की इस मांग को यह कहकर मानने से अस्वीकार कर दिया कि जो टेलिग्राम लॉर्ड इस्मे के साथ भेजा गया है, उस पर सम्बन्धित मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। 13 सितम्बर 1947 को पाकिस्तान सरकार ने घोषणा की कि जूनागढ़ नवाब का निर्णय मान लिया गया है तथा अब वह पाकिस्तान का हिस्सा माना जायेगा।

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पाकिस्तान से एक छोटी टुकड़ी समुद्र के रास्ते जूनागढ़ को रवाना कर दी गई। पाकिस्तान की यह कार्यवाही कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के मध्य, हुए उस समझौते का उल्लंघन थी जिसमें दोनों पक्षों ने यह मान लिया था कि भारत की सीमाओं से घिरी हुई रियासतों को भारत में ही मिलना होगा।

जूनागढ़ के पाकिस्तान में मिलने की घोषणा को पाकिस्तान द्वारा स्वीकार कर लिये जाने के बाद, नवाब मुहम्मद महाबत खानजी के सैनिकों ने, जूनागढ़ राज्य की हिन्दू जनता का उत्पीड़न करना आरम्भ कर दिया ताकि बहुसंख्यक हिन्दू, जूनागढ़ छोड़कर भाग जायें। जूनागढ़ के चारों तरफ छोटी हिन्दू रियासतों का जमावड़ा था।

नवाब ने अपनी सेनाएं भेजकर इन रियासतों पर अधिकार कर लिया। उन्होंने भारत सरकार से सहायता मांगी। माउण्टबेटन ने सुझाव दिया कि इस मसले को यूनाईटेड नेशन्स में ले जाना चाहिये अन्यथा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ जायेगा। सरदार पटेल को यह सुझाव पसंद नहीं आया। वे जूनागढ़ को कड़ा सबक सिखाकर हैदराबाद और कश्मीर को भी चुनौती देना चाहते थे।

24 सितम्बर 1947 को भारत सरकार ने काठियावाड़ डिफेंस फोर्स को जूनागढ़ के विरुद्ध कार्यवाही करने को कहा। इस सेना ने जूनागढ़ को चारों तरफ से घेर लिया। कुछ दिन बाद जब जूनागढ़ की सेना के पास रसद की कमी हो गई तब भारतीय सेना आगे बढ़ी। जूनागढ़ की जनता ने इस सेना का स्वागत किया।

24 अक्टूबर 1947 को नवाब अपने विशेष हवाई जहाज में बैठकर पाकिस्तान भाग गया। वह अपनी चार बेगमों एवं सैंकड़ों कुत्तों को हवाई जहाज में ले जाना चाहता था किंतु एक बेगम तथा बहुत से कुत्ते जूनागढ़ में ही छूट गये। नवाब अपने साथ अपने समस्त जवाहरात भी ले गया। नवाब तथा उसका परिवार कराची में बस गये। 9 नवम्बर 1947 को भारतीय सेना ने जूनागढ़ पर अधिकार कर लिया। यदि सरदार पटेल माउण्टबेटन का सुझाव मान लेते तो जूनागढ़ का भारत में विलय समय पर नहीं हो पाता तथा यह भी काश्मीर समस्या की तरह एक नासूर बन जाता।

20 फरवरी 1948 को भारत सरकार द्वारा जूनागढ़ में जनमत-संग्रह करवाया गया जिसमें रियासत की 2 लाख से अधिक जनसंख्या ने भाग लिया तथा 99 प्रतिशत जनसंख्या ने भारत में मिलने की इच्छा व्यक्त की। 17 नवम्बर 1959 को पाकिस्तान में नवाब मुहम्मद महाबत खानजी की मृत्यु हुई। जूनागढ़ का नवाब शाह नवाज भुट्टो भी पाकिस्तान चला गया जहाँ उसे कराची में बहुत बड़ी जमीन दी गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

निजाम हैदराबाद ने हैदराबाद की समस्या को भारत के पेट में नासूर बना दिया!

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भारत की आजादी के समय हैदराबाद भारत का सबसे बड़ा राज्य था। यहां की जनता हिन्दू थी किंतु शासक मुसलमान था जिसे निजाम हैदराबाद कहा जाता था। वह भारत में शामिल नहीं होना चाहता था। इसलिए निजाम हैदराबाद ने हैदराबाद की समस्या को भारत के पेट में नासूर बना दिया!

15 अगस्त 1947 तक भारत में न मिलने वाली दूसरी रियासत हैदराबाद थी। हैदराबाद रियासत की स्थापना ई.1720 में मुगल सूबेदार चिनकुलीजखाँ ने की थी। उसने निजामुल्मुल्क की उपाधि धारण की थी। इस कारण हैदराबाद के शासक को निजाम कहा जाता था। ई.1798 में हैदराबाद रियासत ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सहायता की संधि (सबसीडरी एलायंस) की।

हैदराबाद निजाम को अंग्रेज सरकार द्वारा 21 तोपों की सलामी दी जाती थी। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हैदराबाद रियासत का क्षेत्रफल 2,14,190 वर्ग किलोमीटर था।

यह भारत का सबसे बड़ा तथा सबसे समृद्ध देशी राज्य था। क्षेत्रफल में वह फ्रांस जितना बड़ा था। हैदराबाद की जनसंख्या लगभग 1,63,40,000 थी। वर्तमान में स्थित महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश प्रांतों के भू-भाग, हैदाराबाद राज्य में स्थित थे।

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जूनागढ़ की भांति हैदराबाद का शासक भी मुसलमान था किंतु राज्य की 85 प्रतिशत जनता हिन्दू थी। हैदराबाद राज्य चारों तरफ से भारतीय सीमाओं से घिरा हुआ था। हैदराबाद के अंतिम निजाम ओस्मान अली खान आसिफ जाह (सप्तम) के 28 पुत्र तथा 44 पुत्रियां थीं। निजाम को सोना तथा हीरे-जवाहर एकत्र करने की सनक थी। निजाम को भारत का सबसे अमीर शासक माना जाता था।

निजाम प्रजातन्त्र को दूषित प्रणाली समझता था और राजाओं के दैवीय अधिकारों में विश्वास रखता था। उसने रियासत के समस्त शासनाधिकार स्वयं में केन्द्रित कर रखे थे। निजाम के अधिकारी भी उसी के समान चालाक तथा लालची थे। राज्य की समस्त नौकरियां मुसलमानों के लिये आरक्षित थीं।

1947 में हैदाराबाद में एक विधान सभा बनाई गई जिसमें 48 पद मुसलमानों के लिये तथा 38 पद हिन्दुओं के लिये रखे गये ताकि कोई कानून ऐसा न बन सके जो मुसलमान रियाया के अधिकारों के विरुद्ध हो। इस विधानसभा को इतने अधिकार दिये गये कि यदि निजाम स्वयं भी चाहे तो मुसलमान रियाया के अधिकारों में कटौती न कर सके।

निजाम को अपने राज्य के विशाल भू-भाग, विपुल धन-सम्पत्ति, ब्रिटिश शासकों से पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे सम्बन्धों तथा विशाल सेना पर बड़ा भरोसा था। इसलिये वह हैदराबाद राज्य को भारत अथवा पाकिस्तान में मिलाने के स्थान पर स्वतन्त्र देश बनाना चाहता था। निजाम को विश्वास था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश क्राउन से समय-समय पर जो संधियां की गई थीं, उनके बल पर वह हैदराबाद को स्वतंत्र बनाये रखने में सफल होगा।

जब 15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करने की घोषणा की, तभी से निजाम ने अपने राज्य को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलवाने के प्रयास आरभ्भ कर दिये। निजाम लॉर्ड माउण्टबेटन को अपना मित्र मानता था तथा उसे विश्वास था कि माउण्टबेटन हैदराबाद को भारत एवं पाकिस्तान से अलग डोमिनियन नेशन के रूप में मान्यता दिलवाने में निजाम की सहायता करेगा।

हैदाराबाद को इस तरह का आचरण करते देख सरदार पटेल को कहना पड़ा कि हैदराबाद भारत के पेट में नासूर की तरह है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हैदराबाद में सत्याग्रह आंदोलन

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जब निजाम हैदराबाद ने भारत में सम्मिलन के पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए तो पटेल ने कांग्रेस को हैदराबाद में सत्याग्रह आंदोलन चलाने का निर्देश दिया !

9 जून 1947 को निजाम ने वायसराय माउण्टबेटन को एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपने मन की अकुलाहट को खुलकर व्यक्त किया- ‘पिछले कुछ दिनों में मैंने स्वाधीनता बिल का सातवां हिस्सा (क्लॉज) जैसा कि अखबारों में आया है, देखा। मुझे अफसोस है कि पिछले महीनों में जैसा अक्सर होता रहा, कि इस मामले में राजनैतिक नेताओं से अच्छी तरह बातचीत की गई और रजवाड़ों के प्रतिनिधियों से बातचीत तो दूर, उन्हें यह दिखाया भी नहीं गया।

यह देखकर मुझे दुःख हुआ कि यह बिल न सिर्फ एक तरफा ढंग से ब्रिटिश सरकार के साथ की गई संधियों और समझौतों को रद्द करती है बल्कि यह आभास भी देती है कि अगर हैदराबाद पाकिस्तान या हिन्दुस्तान का हिस्सा नहीं बन सका तो ब्रिटिश कॉमनवैल्थ में भी नहीं रह सकेगा।

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जिन संधियों के आधार पर बरसों पहले ब्रिटिश सरकार ने विदेशी हमले और आंतरिक विद्रोह के खिलाफ मेरे खानदान और इस राज्य को बचाने का वादा किया था उसकी हमेशा दाद दी जाती रही और हिमायत होती रही।

इनमें सर स्टैफर्ड क्रिप्स का 1941 का वादा प्रमुख है। मैंने समझा था कि ब्रिटिश फौज और वादे पर मैं अच्छी तरह भरोसा कर सकता हूँ। मैं अपनी फौज नहीं बढ़ाने पर राजी हो गया, अपने कारखानों में हथियार नहीं तैयार करने के लिये राजी हो गया। और उधर हमारी सहमति तो दूर, हमसे या हमारी सरकार से सलाह किये बगैर बिल पास हो गया। आपको पता है कि जब आप इंग्लैण्ड में थे, मैंने मांग की थी कि जब अँग्रेज हिन्दुस्तान छोड़कर जायें तो हमें भी उपनिवेश का दर्जा मिले।

मैंने हमेशा महसूस किया है कि एक शताब्दी से ज्यादा की वफादार दोस्ती, जिसमें हमने अँग्रेजों को अपना सारा विश्वास दिया, का इतना तो नतीजा होगा ही कि बिना किसी सवाल के हमें कॉमनवेल्थ में रहने दिया जाये। लेकिन अब लगता है कि वह भी इन्कार किया जा रहा है।

मैं अब भी उम्मीद करता हूँ कि किसी तरह का मतभेद मेरे और ब्रिटिश सरकार के सीधे रिश्ते के बीच नहीं आयेगा। हाल में ही मुझे बताया गया कि आपने यह भार अपने ऊपर ले लिया है कि पार्लियामेंट में ऐसी घोषणा होगी ताकि ऐसे सम्बन्ध सम्भव हों।’

इस पर वासयराय माउण्टबेटन ने नवाब को सूचित किया कि हैदराबाद को उपनिवेश का दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसके चारों ओर उस देश का हिस्सा होगा जो इस स्थिति में दुश्मन बन जायेगा।

ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में हैदराबाद के लिये एक ही रास्ता है कि वह हिन्दुस्तान में सम्मिलित हो जाये किंतु हैदराबाद के अधिकारियों एवं कोनार्ड कोरफील्ड के कहने पर चल रहे भारत सरकार के राजनैतिक विभाग के अधिकारियों ने नवाब को सलाह दी कि वह वायसराय की सलाह को न माने।

7 अगस्त 1947 को कांग्रेस ने सरदार के निर्देश पर हैदराबाद रियासत में एक सत्याग्रह आंदोलन आरम्भ किया। निजाम ने इस आंदोलन को सख्ती से कुचलने के लिये रियासती पुलिस के साथ-साथ कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित किया। इस कारण यह आंदोलन हिंसक हो गया। इसी समय तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में एक शक्तिशाली किसान संघर्ष भी हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

माउण्टबेटन योजना घर चली गई!

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माउण्टबेटन योजना घर चली गई

पटेल ने हैदराबाद के नवाब से कहा कि माउण्टबेटन योजना घर चली गई है! उस समय नेहरू यूरोप दौरे पर थे तथा सरदार पटेल कार्यकारी प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहे थे।

वायसराय के दबाव से नवम्बर 1947 में हैदराबाद निजाम ने भारत के साथ स्टेंडस्टिल एग्रीमेंट पर दस्तख्त कर दिये जिसके अनुसार भारत और हैदराबाद के बीच पोस्ट ऑफिस, टेलिग्राफ, रेल, सड़क यातायात एवं व्यापार आदि सुचारू रूप से जारी रहें परन्तु निजाम, भारत संघ में सम्मिलित होने की बात को टालता रहा। इसी के साथ-साथ वह अपने राज्य में कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित करता रहा।

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निजाम ने रजाकारों को विश्वास दिलाया कि जब हम विद्रोह करेंगे तो हमारे अँग्रेज दोस्त हमारी सहायता करेंगे। निजाम की शह पाकर मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन इतिदाद-उल-मुसलमीन और उसके अर्द्ध सैनिक रजाकरों ने हैदराबाद रियासत के बहुसंख्यक हिन्दुओं को डराना-धमकाना तथा लूटना-खसोटना आरम्भ कर दिया ताकि वे रियासत छोड़कर भाग जायें। रजाकारों की हिंसक वारदातों से रियासत में शान्ति एवं व्यवस्था बिगड़ गई। हैदराबाद रियासत से होकर गुजरने वाले रेलमार्गों तथा सड़कों को क्षतिग्रस्त किया जाने लगा तथा रेलों एवं बसों से यात्रा करने वाले हिन्दुओं को लूटा जाने लगा। इससे स्थिति बहुत खराब हो गई। मुस्लिम रजाकारों के नेता कासिम रिजवी ने भारत सरकार को धमकी दी कि वे सम्पूर्ण भारत को जीतकर दिल्ली के लाल किले पर निजाम का आसफजाही झण्डा फहरायेंगे। इसके बाद हैदराबाद राज्य में बड़े पैमाने पर हिन्दुओं की हत्याएं की जाने लगीं तथा उनकी सम्पत्ति को लूटा अथवा नष्ट किया जाने लगा। माउण्टबेटन, सरदार पटेल और वी. पी. मेनन ने निजाम को समझाने का प्रयास किया परन्तु अब स्थिति उसके नियन्त्रण में भी नहीं रही थी। रजाकार और कट्टर मुल्ला-मौलवी, मुसलमान जनता को भड़काकर साम्प्रदायिक दंगे करवा रहे थे। सरदार पटेल और वी. पी. मेनन तब तक चुप रहे जब तक कि माउण्टबेटन इंग्लैण्ड नहीं लौट गये।

जून 1948 में माउण्टबेटन के लौटने के दो माह बाद, सितम्बर 1948 में निजाम ने घोषणा की कि वह माउण्टबेटन योजना को स्वीकार करने के लिये तैयार है। इस पर 13 सितम्बर 1948 को पटेल ने उत्तर दिया- ‘अब बहुत देरी हो चुकी। माउण्टबेटन योजना तो घर चली गई है।’ उस समय नेहरू यूरोप दौरे पर थे तथा सरदार पटेल कार्यकारी प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहे थे।

इसलिये उन्होंने उसी दिन सेना को हैदराबाद को भारत में एकीकृत करने के आदेश दिये। इस कार्यवाही को ऑपरेशन पोलो नाम दिया गया। मेजर जनरल जोयन्तोनाथ चौधरी के नेतृत्व में भारतीय सेना हैदराबाद में प्रवेश कर गई। पांच दिन की कार्यवाही में भारतीय सेना ने मुस्लिम रजाकारों के प्रतिरोध को कुचल डाला।

हजारों रजाकार मारे गये। पूरे हैदराबाद में रजाकरों के शव पड़े हुए दिखाई देने लगे। 17 सितम्बर 1948 को हैदराबाद के सेनापति जनरल ई.आई. एड्रूस ने सिकंदराबाद में जनरल चौधरी के समक्ष समर्पण कर दिया। इस प्रकार केवल 5 दिन की पुलिस कार्यवाही में हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया।

न कोई बम चला, न कोई क्रांति हुई, जैसा कि डराया जा रहा था। 18 सितम्बर को मेजर जनरल चौधरी ने हैदराबाद रियासत के सैनिक गवर्नर का पद संभाल लिया। हैदराबाद रियासत को भारतीय संघ में सम्मिलित कर लिया गया। विवश होकर निजाम को नई व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी।

सरदार पटेल ने उसके साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार किया। उसे रियासत का मानद मुखिया बना रहने दिया गया। बाद में जब राज्यों का पुनर्गठन हुआ तो हैदराबाद रियासत को तोड़कर उसके क्षेत्र आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र प्रांतों में मिला दिये गये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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