सरदार पटेल ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर को प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाने का निश्चय किया किंतु भीमराव अम्बेडकर की नियुक्ति में कठिनाई यह थी कि उस काल की कांग्रेस में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का कद इतना ऊँचा नहीं था।
जिस समय भारत की संविधान सभा का गठन हुआ और संविधान का प्रारूप बनाने के लिए प्रारूप समिति का गठन किया गया, तब कांग्रेस को एक ऐसे नेता की तलाश थी जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का ज्ञाता हो तथा भारत की राजनीति में सभी पक्षों को स्वीकार हो सके। गांधी, जिन्ना एवं नेहरू लंदन में बैरिस्ट्री की पढ़ाई करके आए थे।
ये तीनों ही अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के ज्ञाता थे किंतु ये तीनों ही संविधान का प्रारूप बनाने के लम्बे कार्य को करने के लिए समय निकालने में असमर्थ थे। इसलिए सरदार पटेल की दृष्टि डॉ. भीमराव अम्बेडकर पर गई जो गांधी, जिन्ना एवं नेहरू की तरह लंदन में रहकर बैरिस्ट्री की पढ़ाई करके आए थे तथा अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के ज्ञाता थे।
सरदार पटेल ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर को प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाने का निश्चय किया किंतु भीमराव अम्बेडकर की नियुक्ति में कठिनाई यह थी कि उस काल की कांग्रेस में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का कद इतना ऊँचा नहीं था। इससे भी बड़ी कठिनाई यह थी कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर के गांधीजी एवं जिन्ना दोनों से सम्बन्ध अच्छे नहीं थे।
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अम्बेडकर सरे आम गांधीजी की आलोचना किया करते थे और उन्हें राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दिया करते थे। इसलिए किसी कांग्रेसी नेता में हिम्मत नहीं थी कि इतनी महत्वपूर्ण समिति के लिए अम्बेडकर का नाम सुझा सके। सरदार पटेल डॉ. भीमराव अम्बेडकर की योग्यता, विद्वता एवं परिश्रमशील स्वभाव से परिचित थे। उन्होंने यह भी पता था कि उस काल की राजनीति में डॉ. अम्बेडकर ही एक मात्र ऐसे कानूनविद् थे जिन्हें हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच की समस्या की गहराई तक जानकारी थी।
डॉ. अम्बेडकर अनेक बार सार्वजनिक मंचों से हिन्दुओं में व्याप्त छुआछूत एवं भेदभाव की समस्या पर बोल चुके थे किंतु इसके साथ ही वे इस्लाम के सम्बन्ध में भी खुलकर विचार प्रकट करने का साहस रखते थे। वे जानते थे कि यदि मुसलमान भारत में रहे तो वे कभी भी हिंदुओं को शांति से नहीं जीने देंगे। डॉ. भीमराव अम्बेडकर में एक विशेषता और थी जो उस काल के किसी भी नेता में नहीं थी, वह विशेषता थी उनका सच बोलने के प्रति उत्साह। वे किसी बात को गांधीजी की तरह चाशनी में लपेटकर, अल्पसंख्यकों के प्रति अनावश्यक आग्रह दिखाकर अपनी राजनीति आगे नहीं बढ़ाते थे।
डॉ. अम्बेडकर भारत जैसे विशाल देश में बड़ी संख्या में निवास करने वाली एवं दलित जातियों को शैक्षिक रूप से योग्य बनाकर आर्थिक रूप से सक्षम बनाना चाहते थे। इसलिए अंग्रेजों द्वारा पैदा की गई आरक्षण जैसी बुराइयों से दलित जातियों को अलग रखना चाहते थे। इसलिए सरदार पटेल ने डॉ. अम्बेडकर को ही प्रारूप समिमिति का अध्यक्ष बनवाने का संकल्प किया।
संविधान सभा में सरदार पटेल ने सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने भीमराव अम्बेडकर की नियुक्ति संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के पद पर करवाने के लिए नेताओं को सहमत किया तथा अम्बेडकर के पक्ष में वातावरण तैयार किया।
सरदार पटेल संविधान सभा की अनेक महत्त्वपूर्ण सामितियों यथा अल्पसंख्यक समिति, आदिवासी समिति, मौलिक अधिकार समिति तथा प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष थे।
पटेल ने संविधान सभा में प्रांतीय संविधान का मॉडल प्रस्तुत किया जिसमें राज्यपालों को अत्यंत सीमित अधिकार दिये गये। पटेल चाहते थे कि राज्यपाल किसी भी स्थिति में, चुनी गई सरकार के कामकाज को प्रभावित न करें। पटेल ने ही राष्ट्रपति द्वारा संसद में दो एंग्लो इण्डियन्स को नामित करने का प्रावधान करवाया।
पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये भारत के इतिहास की और मोहनदास कर्मचंद गांधी के रहस्यमयी आचरण की एक अनसुलझी पहेली है।
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जिस समय भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया तब पाकिस्तान में सम्मिलित हुए प्रांतों की सरकारों से भारत सरकार 300 करोड़ रुपए मांगती थी। जबकि केन्द्रीय कोष के विभाजन के फलस्वरूप पाकिस्तान सरकार भारत की केन्द्रीय सरकार से 55 करोड़ रुपए मांगती थी। इसलिए भारत सरकार ने पाकिस्तान की सरकार के 55 करोड़ रुपए इसलिए रोक लिए कि जब पाकिस्तान की प्रांतीय सरकारों से भारत सरकार को रुपए दिए जाएंगे, तब भारत सरकार पाकिस्तान सरकार को उसके हिस्से के रुपए दे देगी।
पाकिस्तान सरकार भारत से अलग होते ही अपनी राशि मांगने लगी किंतु भारत सरकार अपने 300 करोड़ रुपयों के न आने तक पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने की इच्छुक नहीं थी। इसी बीच पाकिस्तान की सेना ने कबाइलियों के साथ मिलकर कश्मीर राज्य पर हमला कर दिया जो अब तक भारत में सम्मिलित नहीं हुआ था। पाकिस्तान के हमले से घबराकर कश्मीर के राजा हरिसिंह ने भारत में मिलने की घोषणा कर दी। इस हमले के बाद गांधीजी ने भारत सरकार से कहा कि वह पाकिस्तान के 55 करोड़ लौटाए।
गांधीजी की इस मांग ने भारत सरकार को असमंजस में डाल दिया। भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच युद्ध चल रहा। ऐसी स्थिति में गांधीजी को पाकिस्तान से सहानुभूति क्यों है?
पटेल ने पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये दिये जाने का जमकर विरोध किया। पटेल का कहना था कि यह राशि काश्मीर में भारत के विरुद्ध काम में ली जायेगी किंतु गांधी ने पटेल की इस बात का यह कहकर विरोध किया कि यदि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये नहीं दिये गये तो उसके बदले में अधिक हिंसा और बदले की कार्यवाही की जायेगी।
कैबीनेट ने पटेल के प्रस्ताव का पक्ष लिया किंतु गांधी ने आमरण अनशन पर बैठने की घोषणा कर दी जब तक कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये न दे दिये जायें। कैबीनेट ने गांधीजी की बात को स्वीकार कर लिया, इससे पटेल को दुःख हुआ।
जब नेहरू ने भारत में रह गए मुसलमानों के लिए अल्पसंख्यक आयोग स्थापित करने का प्रयास किया तो पटेल ने अल्पसंख्यक आयोग का विरोध किया।
भारत का विभाजन हिन्दू एवं मुसलमान जनसंख्या के आधार पर किया गया था। चूंकि भारत के मुसलमानों ने हिन्दुओं के साथ रहने से मना कर दिया था, इसी आधार पर भारत में से पाकिस्तान अस्तित्व में आया था।
जवाहर लाल नेहरू को हिन्दू जनसंख्या के लिए बने भारत देश का प्रधानमंत्री बनाया गया किंतु नेहरू का झुकाव हिन्दू प्रजा की बजाय मुसलमानों की तरफ अधिक था। नेहरू को न केवल भारत में रह गए मुसलमानों से सहानुभूति थी अपितु पाकिस्तान में चले गए मुसलमानों के लिए भी सहानुभूति थी।
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दूसरी ओर सरदार पटेल का मानना था कि मुसलमानों को अपना अलग देश मिल गया है, अब उनके लिए कैसी सहानुभूति! अब हमें देश के हिन्दुओं की समस्या पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए!
नेहरू को अपने मुस्लिम प्रेम के लिए मोहनदास कर्मचंद गांधी से पूरा समर्थन मिलता था। इस कारण सरदार पटेल देश की राजनीति में अलग-थलग पड़ते रहे थे।
1949 में पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिमी बंगाल, असम एवं त्रिपुरा में 8 लाख से अधिक शरणार्थी घुस आये। इन शरणार्थियों को पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा बलपूर्वक भारतीय क्षेत्रों में धकेला जा रहा था। ये हिंसा और उत्पीड़न के मारे हुए हिन्दू नागरिक थे।
इस समय तक गांधी की हत्या हो चुकी थी और अब नेहरू अधिक मुखरता से मुसलमानों का पक्ष नहीं ले पाते थे।
नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खां को इस समस्या का शांतिपूर्वक समाधान निकालने के लिये आमंत्रित किया। नेहरू के तरीके से असंतुष्ट होकर पटेल ने लियाकत अली खां से भेंट की तथा उसे सख्त लहजे में संदेश दिया कि वह इस तरह की हरकतों से बाज आये।
इस पर नेहरू ने लियाकत अली खां के समक्ष प्रस्ताव रखा कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देश अल्पसंख्यक आयोगों की स्थापना करे। पटेल ने अल्पसंख्यक आयोग का विरोध किया तथा नेहरू के इस प्रस्ताव की कड़ी आलोचना की। श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा के. सी. नेगी ने नेहरू की तुष्टिकरण की नीतियों से नाराज होकर मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।
सरदार पटेल एवं जवाहर लाल नेहरू अलग-अलग व्यक्तित्व के धनी थे। भारत की आजादी के बाद पटेल-नेहरू द्वंद्व अधिक मुखर होकर सामने आया। पटेल ने नेहरू की व्यक्तिगत इच्छाओं को कांग्रेस पर हावी नहीं होने दिया!
पटेल एवं नेहरू दोनों ही कांग्रेस के सर्वाग्रणी नेता थे। स्वतंत्रता के समय कांग्रेस में पटेल को अधिक पसंद किया जाता था किंतु गांधी के दबाव से नेहरू प्रधानमंत्री बन गए और पटेल ने उपप्रधानमंत्री पद पर संतोष कर लिया। पटेल-नेहरू द्वंद्व का कारण पद नहीं था अपितु यह द्वंद्व विचारों के कारण था। पटेल आजाद भारत में हिन्दुओं की सेवा करना चाहते थे जबकि नेहरू ने मुसलमानों के हित का सिद्धांत कसकर ओढ़ लिया था।
मीडिया ने पटेल पर आरोप लगाया कि उनका गृह मंत्रालय गांधी की रक्षा नहीं कर पाया। इससे दुःखी होकर पटेल ने सरकार से त्यागपत्र दे दिया।
नेहरू इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि यदि पटेल का त्यागपत्र स्वीकार कर लिया तो फिर नेहरू भी अपनी कुर्सी पर बने नहीं रह सकेंगे। इसलिए नेहरू ने पटेल का त्यागपत्र यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि नेहरू और पटेल तीस साल से कांग्रेस में एक साथ एक उद्देश्य के लिये काम करते रहे हैं और गांधी की मृत्यु के बाद उन दोनों के लिये लड़ना अच्छी बात नहीं होगी।
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पटेल का त्यागपत्र तो टल गया किंतु उसके बाद भी राजनैतिक विषयों पर नेहरू और पटेल के बीच मतभेद बने रहे। नेहरू द्वारा अपनाई गई तीन नीतियों- 1948 में काश्मीर मुद्दे को यूनाइटेड नेशन्स में ले जाने, 1950 में तिब्बत को चीन के विरुद्ध सहायता न देने तथा गोआ से पुर्तगालियों को निकालने हेतु सैनिक कार्यवाही न किये जाने पर पटेल एवं नेहरू के बीच तीव्र मतभेद, पटेल की मृत्यु तक बने रहे। जब नेहरू ने काश्मीर मुद्दे पर पटेल तथा गृह मंत्रालय के अधिकारियों को किनारे लगाने का प्रयास किया तो पटेल ने जोरदार प्रतिवाद किया।
1950 में नेहरू ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पर दबाव बनाया कि वे राजगोपालाचारी के पक्ष में, राष्ट्रपति पद हेतु दिया गया अपना नामांकन वापस ले लें। नेहरू की इस कार्यवाही ने कांग्रेसी नेताओं को बुरी तरह नाराज कर दिया। कांग्रेसियों को लगा कि नेहरू, कांग्रेस पर अपनी इच्छा थोपने का प्रयास कर रहे हैं। नेहरू ने पटेल से कहा कि वे राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनवाने में नेहरू की सहायता करें। इस पर पटेल ने पार्टी की इच्छा के विरुद्ध कार्य करने से मना कर दिया तथा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को ही भारत का प्रथम राष्ट्रपति बनाया गया। 1950 में नेहरू ने पुरुषोत्तम दास टण्डन कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिये खड़े हुए।
टण्डन की छवि एक हिन्दू नेता की थी इसलिये नेहरू ने उनका विरोध किया तथा जीवराम कृपलानी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने की अपील करते हुए कहा कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो नेहरू त्यागपत्र दे देंगे। पटेल ने नेहरू के दृष्टिकोण का विरोध करते हुए गुजरात में टण्डन को समर्थन देने की घोषणा कर दी।
कृपलानी गुजरात के ही रहने वाले थे किंतु उन्हें गुजरात से एक भी वोट नहीं मिला। पटेल का विश्वास था कि नेहरू की इच्छा कांग्रेस के लिये कानून नहीं है किंतु जब टण्डन जीत गये तो नेहरू को समझ में आ गया कि उन्होंने कांग्रेस का पूरा विश्वास खो दिया है। इस पर नेहरू ने त्यागपत्र दे दिया। तब पटेल ने नेहरू को त्यागपत्र देने से मना कर दिया।
इस प्रकार पटेल-नेहरू द्वंद्व चलता रहा किंतु दोनों ही एक-दूसरे को सहन करके एक-दूसरे की प्रतिष्ठा की रक्षा भी करते रहे।
आजादी की लड़ाई में सरदार पटेल की उपलब्धियां विलक्षण थीं किंतु आजादी के समय उनकी भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण थी। उन्होंने देश की 554 देशी रियासतों का भारत में सम्मिलन करवाया। स्वतंत्र भारत में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि गुजरात के प्राचीन सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाना रही।
सोमनाथ का जगत् प्रसिद्ध मंदिर गुजरात के काठियावाड़ प्रदेश में स्थित था। मान्यता है कि यह ईसा के जन्म से भी पहले का मंदिर है। इस मंदिर को सिंध और अरब से आये मुस्लिम आक्रांताओं ने कई बार तोड़ा। आठवीं शती में जालौर के प्रतिहार शासक नागभट्ट ने तीसरी बार सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।
महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर की सम्पदा लूटने के लिये भारत पर 17 बार भयानक आक्रमण किये। उसने इस मंदिर में पूजा कर रहे पचास हजार लोगों को मारकर मंदिर के शिवलिंग को तोड़ डाला।
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महमूद गजनवी, शिवलिंग के टुकड़ों को हाथी के पैरों से बांधकर गजनी ले गया और वहाँ जाकर उन रास्तों में चिनवा दिया जो गजनी के महलों से मस्जिदों तक जाते थे। इस मंदिर से महमूद गजनवी को विशाल सम्पदा हाथ लगी थी जिसे वह हाथियों, ऊँटों एवं बैलगाड़ियों पर लादकर गजनी ले गया। उसने इस मंदिर के भवन को भी बहुत क्षति पहुंचाई। गुजरात तथा मालवा के राजाओं ने इसका पुनिर्निर्माण करवाया। ई.1706 में पुनः औंरगजेब ने इसे गिरवा दिया। तब से यह भग्नावस्था में खड़ा था।
भारत को स्वतंत्रता प्राप्त होते ही 13 नवम्बर 1947 को पटेल ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाने का संकल्प लिया। पण्डित नेहरू ने प्रधानमंत्री की हैसियत से सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का तीव्र विरोध किया किंतु पटेल और मुंशी ठान चुके थे। अक्टूबर 1950 में पुराने भग्नावशेष हटा दिये गये।
नेहरू के पुरजोर विरोध के बावजूद सरदार पटेल एवं कन्हैयालाल मुंशी ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवा लिया। इस मंदिर के निर्माण में जनता से धन एकत्रित किया गया, सरकार के कोष से एक कौड़ी भी नहीं ली गई। इसलिए नेहरू की चीख-चिल्लाहट सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करने में बाधा नहीं बन सकी।
इससे पहले कि मंदिर का शिलान्यास होता, 15 दिसम्बर 1950 को सरदार पटेल का निधन हो गया। मई 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने केन्द्रीय मंत्री के. एम. मुंशी के निमंत्रण पर इस मंदिर का शिलान्यास किया।
कश्मीर समस्या के तीन मुख्य सूत्रधार थे- शेख अब्दुल्ला, जवाहरलाल नेहरू और महाराजा हरिसिंह! तीन की महत्वाकांक्षाओं ने कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा दिया तथा कश्मीर को अंतर्राष्ट्रीय स्तर की समस्या बना दिया। यह समस्या आज भी पूरी तरह नहीं सुलझ सकी है।
शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के पूर्वज कश्मीरी ब्राह्मण थे। शेख अब्दुल्ला का परदादा सूफी सम्प्रदाय में शामिल होकर मुसलमान बन गया और कश्मीरी शॉल बेचकर अपना पेट भरने लगा। जिस समय भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन चल रहा था, उस समय बहुत से देशी राज्यों में राजाओं के विरुद्ध भी आंदोलन चल रहे थे। शेख को यह पसंद नहीं था कि कश्मीर के मुसलमानों पर कोई हिन्दू राजा राज्य करे। इस कारण उसने महाराजा हरिसिंह के विरुद्ध आंदोलन चलाया।
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जब महाराजा हरिसिंह ने राजगद्दी नहीं छोड़ी और देश आजाद हो गया तो शेख अब्दुल्ला ने प्रयास किया कि कश्मीर को भारत और पाकिस्तान दोनों से अलग एक स्वतंत्र मुसलमान राज्य बना लिया जाए। महाराजा हरिसिंह चाहता था कि कश्मीर को भारत और पाकिस्तान से अलग एक हिन्दू शासित राज्य बनाए रखा जाए। आजादी के कुछ दिनों बाद पाकिस्तान की सेना ने कबायलियों के साथ मिलकर कश्मीर राज्य पर आक्रमण किया। इस पर हरिसिंह ने भारत में सम्मिलित होने की घोषणा कर दी तो शेख तिलमिला गया। उसने अपना आंदोलन तेज कर दिया किंतु जवाहर लाल नेहरू ने महाराजा हरिसिंह पर दबाव डालकर शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का प्रधानमंत्री बनवा दिया। इसके बाद भी शेख की अलगाववादी कार्यवाहियां जारी रहीं।
1949 में संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में सम्मिलित होने गये भारतीय प्रतिनिधि मण्डल में शेख अब्दुल्ला भी शामिल था। जब यह प्रतिनिधि मण्डल वापस लौट रहा था तब शेख अब्दुल्ला ने लंदन में डेली टेलिग्राफ को एक साक्षात्कार दिया जिसमें शेख ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर कश्मीर को स्वतंत्र राज्य बनाने के अपने स्वप्न का खुलासा किया।
भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल ने शेख अब्दुल्ला को दिल्ली बुलाकर कहा कि यदि उसे स्वतंत्रता चाहिये तो वे भारतीय सेना को काश्मीर से वापस बुलाने के लिये तैयार हैं। शेख का मुंह पीला पड़ गया क्योंकि उसे यह भलीभांति ज्ञात था कि भारतीय सेना के काश्मीर से निकलते ही पाकिस्तान घाटी पर अधिकार कर लेगा और शेख को अपना शेष जीवन कारावास में व्यतीत करना होगा।
इस घटना के बाद जब तक सरदार पटेल जीवित रहे, शेख ने अपना मुंह नहीं खोला किंतु 15 दिसम्बर 1950 को पटेल की मृत्यु के बाद शेख ने अपनी विभाजनकारी गतिविधियां फिर से चालू कर दीं। 8 अगस्त 1953 को जवाहर लाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री पद से हटाकर जेल में डाल दिया।
गांधी के दबाव पर पटेल ने नेहरू को प्रधानमंत्री की कुर्सी तो दे दी किंतु दोनों के व्यक्तित्व बिल्कुल अलग थे।काश्मीर, गोआ, चीन, तिब्बत और नेपाल को लेकर नेहरू से असंतुष्ट थे पटेल !
सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू ने अपना पूरा जीवन कांग्रेस में बिताया था। दोनों ही गांधीजी के निकट सहयोगी माने जाते थे किंतु दोनों के व्यक्तित्व में आकाश और पाताल जैसा अंतर था।
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दोनों ने इंग्लैण्ड में जाकर बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त की किंतु सरदार पटेल वकालात में नेहरू से बहुत आगे थे तथा उन्होंने सम्पूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य के विद्यार्थियों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया। नेहरू प्रायः सोचते रहते थे किंतु पटेल उसे कर डालते थे। नेहरू शास्त्रों के ज्ञाता थे किंतु पटेल शास्त्र और नीति दोनों के ज्ञाता थे। नेहरू केवल भाषणों के माध्यम से विरोधियों को आंख दिखाते थे किंतु पटेल भाषण के साथ-साथ सेनाओं का उपयोग करना भी जानते थे। पटेल ने भी नेहरू जितनी ही ऊँची शिक्षा पाई थी किंतु पटेल में अहंकार नहीं था। वे स्वयं कहते थे कि मैंने कला या विज्ञान के विशाल गगन में ऊंची उड़ानें नहीं भरीं। मेरा विकास कच्ची झौंपड़ियों में गरीब किसान के खेतों की भूमि और शहरों के गंदे मकानों में हुआ है।
पं. नेहरू को गांव की गंदगी तथा जीवन से चिढ़ थी। पं. नेहरू अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के इच्छुक थे तथा समाजवादी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। नेहरू से असंतुष्ट पटेल ने 1950 में नेहरू को पत्र लिखकर उन्हें चीन तथा चीन की तिब्बत नीति के प्रति सावधान किया और चीन के रवैये को कपटपूर्ण तथा विश्वासघाती बताया। पटेल ने अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को भावी शत्रु की भाषा बताया।
सरदार ने लिखा कि तिब्बत पर चीन का कब्जा नई समस्याओं को जन्म देगा। कम्युनिस्टी आभा से ग्रस्त नेहरू ने पटेल की बात नहीं सुनी तथा हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाते रहे। इसका दुष्परिणाम 1962 में भारत को चीन के आक्रमण के रूप में भुगतना पड़ा। 1950 में नेपाल के सदंर्भ में लिखे पत्रों में भी पटेल ने नेहरू की नीति के प्रति अपनी असहमति एवं असंतोष व्यक्त किया।
1950 में गोवा की स्वतंत्रता के सम्बन्ध में चली दो घण्टे की कैबिनेट बैठक में लम्बी वार्त्ता सुनने के बाद पटेल ने नेहरू से केवल इतना ही पूछा, क्या हम गोवा जायेंगे, केवल दो घण्टे की बात है ? नेहरू इससे बड़े नाराज हुए। यदि पटेल की बात मान ली गई होती तो गोवा को अपनी स्वतंत्रता के लिये 1961 तक प्रतीक्षा न करनी पड़ती।
पटेल जहाँ पाकिस्तान की छद्म कार्यवाहियों एवं शत्रुता पूर्ण चालों से सतर्क रहते थे वहीं नेहरू को विघटनकारी तत्वों से भी सावधान करते थे। पटेल, भारत में मुस्लिम लीग तथा कम्युनिस्टों की विभेदकारी तथा रूस के प्रति उनकी राजभक्ति से परिचित थे।
विद्वानों का मत है कि पटेल बिस्मार्क की तरह थे किंतु लंदन के टाइम्स ने लिखा था- बिस्मार्क की सफलताएं पटेल के समक्ष महत्वहीन हैं। यदि जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल के कहने पर चलते तो काश्मीर, चीन, तिब्बत और नेपाल की परिस्थितियां आज जैसी न होतीं। पटेल सही अर्थों में मनु के शासन की कल्पना थे। उनमें कौटिल्य की कूटनीतिज्ञता तथा छत्रपति महाराज शिवाजी जैसी दूरदृष्टि थी।
सरदार पटेल नेहरू की चीन नीति से बुरी तरह नाराज थे। सरदार पटेल को पूर्वाभास था कि एक दिन चीन भारत पर आक्रमण करेगा तथा भारत को बड़ी मुसीबत में डाल देगा किंतु प्रत्यक्ष रूप से समाजवादी तथा परोक्ष रूप से कम्युनिस्ट नेहरू चीन के सम्मोहन में ऐसे बंधे थे कि वे सरदार पटेल की कोई बात सुनने को तैयार नहीं थे। इसलिए पटेल ने नेहरू को एक कड़ा पत्र लिखकर अपनी नाराजगी व्यक्त की।
मेरे अहमदाबाद से लौटने और उसी दिन हुई समिति की बैठक के बाद से, जिसकी जानकारी मुझे उसके शुरू होने से केवल 15 मिनट पहले मिली थी और मुझे अफसोस है कि उस कारण में उससे संबंधित दस्तावेज भी नहीं पढ़ पाया, मैं तिब्बत के बारे में चिन्तित हूं, मैंने सोचा कि मुझे अपने विचार तुम्हारे साथ बांटने चाहिए।
मैंने अपने विदेश मंत्रालय और पीकिंग में हमारे राजदूत तथा उनके जरिए चीनी सरकार के बीच हुए सारे पत्रव्यवहार को पढ़ा है, मैंने इस पत्रव्यवहार को अपने राजदूत तथा चीनी सरकार को अनुकूल ढंग से पढ़कर पेश करने की कोशिश की, परंतु मुझे यह कहते हुए दुःख हो रहा है कि इस अध्ययन के बाद उनमें से कोई भी मेरी आंखों में खरा नहीं उतरा।
चीनी सरकार ने शांति के इरादों का प्रवचन करके हमें धोखा दिया है। मुझे लगता है कि उन्होंने मौका देखकर हमारे राजदूत को शांतिपूर्वक ढंग से तिब्बत की समस्या सुलझाने का झांसा देकर उनके मन में अपनी जगह बना ली थी। निस्संदेह जब यह पत्रव्यवहार चल रहा होगा तब चीनियों ने तिब्बत पर आक्रमण करने की सारी योजना तैयार कर ली होगी। ऐसा लगता है कि चीनी अंत में हमसे विश्वासघात करेंगे।
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सबसे दुःख की बात यह है कि तिब्बतियों ने हम पर विश्वास किया। उन्होंने अपने मार्गदर्शन के लिए हम पर भरोसा किया, हम उन्हें चीनी कूटनीतिक जंजाल या चीनी दुर्भाव से बचाने में असमर्थ रहे। हाल में जन्मी परिस्थितियों को देखकर ऐसा लगता है कि हम दलाई लामा को नहीं बचा पाएंगे। हमारे राजदूत को चीनियों द्वारा अपनाई नीतियों और किए गए कर्मों के स्पष्टीकरण और उसकी सफाई ढूंढने में बहुत कष्ट झेलने पड़े हैं। जैसे कि विदेशी मामलों के मंत्रालय द्वारा भेजे गए एक तार में बताया गया था कि जब चीनी सरकार के समक्ष हमारे दूत ने हमारी ओर से एक या दो मुद्दों पर आपत्ति प्रकट की तो उन्हें उनकी ओर से ढीलापन और फिजूल की माफियां देखने को मिलीं।
क्या कोई भी समझदार व्यक्ति इस बात को मान सकता है कि चीन को तिब्बत में एंग्लो-अमेरीकन गुप्त योजनाओं से किसी तरह का कोई खतरा हो सकता है। इसलिए, यदि चीनी इस बात को सच मानते हैं तो जाहिर सी बात है कि, उन्हें हम पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं होगा और हमें एंग्लो अमेरिकी राजनीति या उनकी योजनाओं की कठपुतली समझते होंगे।
यदि आपके उनके साथ प्रत्यक्ष सम्पर्क के बाद वे हमारे प्रति ऐसा सोचते हैं तो चाहे हम उन्हें अपना जितना गहरा मित्र समझें, वो बेशक हमें अपना दोस्त नहीं मानते। हमें उनकी इस साम्यवादी मनोवृत्ति ‘जो भी उनके साथ नहीं है, उनके खिलाफ है’ को विशेष रूप से ध्यान में रखना होगा।
पिछले कई महीनों से रूसी खेमे से बाहर केवल हम अकेले ही चीन के यूएनओ में दाखिले के लिए और अमेरीकियों से फोरमोसा के मामले में आश्वासन लेने के लिए लड़ रहे हैं। हमने चीनियों की भावनाओं को शांत करने की, उनकी आशंकाओं को कम करने की और अमरीका, ब्रिटेन एवं यूएनओ के साथ हमारी वार्ताओं में उनकी जायज मांगों का समर्थन करने की हर मुमकिन कोशिश की है।
इस सब के बावजूद चीन हमारी अरुचि से सहमत नहीं है, वह हमें शक की नजरों से लगातार देख रहा है और बाहर से देखो तो शक्की मानसिकता साफ दिखाई देती है जिसमें शायद थोड़ी शत्रुता भी मिली हुई है। मुझे नहीं लगता है कि हम चीन को अपने नेक इरादों, अपनी मित्रता और सद्भावना पर विश्वास दिलाने के लिए इससे ज्यादा और कुछ काम कर सकते हैं।
पीकिंग में बैठा हमारा राजदूत जो हमारे इस मैत्रीपूर्ण दृष्टिकोण को उन तक पहुंचाने का सामर्थ्य रखता है, शायद वो भी इस काम में असफल हो गया है। उनके द्वारा भेजा गया आखिरी तार, एक सम्पूर्णतः असभ्य कार्य है, न केवल इसलिए क्योंकि चीनी ताकतों का तिब्बत में प्रवेश हमारे विद्रोह को नकारता है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि हमारा रवैया विदेशी दबाव से प्रभावित है। ये किसी मित्र की नहीं बल्कि हेाने वाले शत्रु की भाषा लगती है।
इसे पृष्ठभूमि में रखते हुए हमें अब, जैसा कि हम जानते थे, तिब्बत के विलुप्त हो जाने से और चीन का हमारे घर के दरवाजे तक विस्तार करने से, हमारे समक्ष खड़ी होने वाली नई परिस्थितियों के बारे में सोचना होगा। पूरे इतिहास में हमें कभी अपनी उत्तरपूर्वी सीमा के बारे में चिंता नहीं करनी पड़ी है; उत्तरी दिशा में स्थित हिमालय पर्वत को सदा अभेद्य माना जाता रहा है; हमारे मित्र ने हमें कभी कोई परेशानी नहीं दी।
चीनी विभाजित हैं। उनकी अपनी आंतरिक समस्याओं के कारण उन्होंने कभी हमें हमारी सीमाओं पर तंग नहीं किया। 1914 में हमने तिब्बत के साथ संधि स्थापित की जिसे चीन की मंजूरी हासिल नहीं थी। हमें लगा कि तिब्बत का स्वशासन इस स्वतंत्र संधि की मान्यता के लिए काफी है।
लेकिन हमें शायद उस पर चीन की मंजूरी भी हस्ताक्षरित करवा लेनी चाहिए थी। शायद चीन के लिए अधिराज्य के मायने कुछ और ही हैं। इसलिए हमें यह मानकर चलना चाहिए कि बहुत जल्द चीनी, तिब्बत और हमारे बीच हुए अनुबन्धों से भी पल्ला झाड़ लेंगे। जिससे तिब्बत के साथ हुए सभी सीमांत और आर्थिक समझौते, जिन पर हम पिछली आधी सदी से काम करते आ रहे हैं, उबलते तेल की हांडी में जा गिरेंगे। चीन अब विभाजित नहीं रहा। वह संयुक्त और शक्तिशाली हो गया है।
उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशा में हिमालय के साथ साथ सरहद के इस पार हमारी ऐसी आबादी है जो जातीय रूप से तिब्बतियों और मंगोलों से ज्यादा अलग नहीं है। अपरिभाषित सीमाओं और हमारी तरफ की आबादी की तिब्बतियों और चीनियों से समरूपता, आने वाले समय में चीन और हमारे बीच संकट पैदा कर सकती है।
अर्वाचीन और कड़वा इतिहास हमें यह सीख देता है कि साम्यवाद, साम्राज्यवाद से बचने की ढाल नहीं है और साम्यवादी भी साम्राज्यवादियों या अन्य किसी और की भी भांति उतने ही अच्छे या बुरे हैं। चीन केवल हिमालय पर्वत के इस पार के हिस्से में नहीं बल्कि असम के महत्वपूर्ण हिस्सों में भी दिलचस्पी रखता है।
चीनियों की तो बर्मा पर नजर है; बर्मा की मुश्किल यह है कि उसके पास तो मैक मोहन लाइन भी नहीं, जिसके इर्द गिर्द वह कोई समझौता तैयार कर सके। चीनियों की अधिग्रहण नीति और साम्यवादियों का साम्राज्यवाद पश्चिमी ताकतों के विस्तारवाद या साम्राज्यवाद से भिन्न है।
पहले के पास विचारधारा का वह चोगा है जो इसे दस गुना और खतरनाक बना देता है। विचारधारा के विस्तार के पीछे जातीय, राष्ट्रीय और ऐतिहासिक दावे छिपे हैं। इसलिए, उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशाओं से आने वाला खतरा दोनों, साम्यवादी भी है और साम्राज्यवादी भी। जहां, हमारी सुरक्षा को पहले ही पश्चिम और उत्तरपश्चिमी दिशाएं ललकार रही थीं, अब उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशाओं से हमारे लिए नया खतरा पैदा हो गया है।
इसलिए सदियों में पहली बार भारत को एक ही समय पर दो भिन्न दिशाओं में अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए खुद को एकत्रित करना होगा। अब तक हम पाकिस्तान को ध्यान में रखते हुए, जो हम से दुर्बल है, अपनी सुरक्षा योजनाएं तैयार करते आए हैं। अब हमें उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशा में बसे साम्यवादी चीन को ध्यान में रखते हुए तैयारियां करनी होंगी, एक ऐसा साम्यवादी चीन जिसके निश्चित लक्ष्य और उद्देश्य हैं और जिसके मन में किसी भी हाल में हमारे प्रति मित्रता की भावना दिखाई नहीं देती।
इस सम्भावित तकलीफदेह सीमा की राजनैतिक परिस्थितियों पर भी हमें विचार कर लेना चाहिए। हमारी उत्तर और उत्तरपूर्वी सीमाओं में नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र बसे हैं। संचारण के हिसाब से ये सभी इलाके बहुत कमजोर हैं। इनमें लगातार रक्षात्मक रेखाएं नहीं बनाई गई हैं।
यहां से घुसपैठ करना बहुत आसान काम है। बहुत कम गलियारों में पुलिस सुरक्षा मौजूद हैं। जो चौकियाँ हैं, उन सब में भी हमारे सैनिक तैनात नहीं हैं। इन क्षेत्रों के साथ अपने सम्पर्क को हम किसी भी हाल में नजदीकी नहीं कह सकते। यहां पर रहने वाले लोग भारत के प्रति कोई विशेष निष्ठा भाव नहीं रखते।
दार्जिलिंग तथा कैलिंगपौंग क्षेत्रों में भी मंगोली प्रभाव साफ देखा जा सकता है। पिछले तीन वर्षों में हम नागा या असम की किसी भी अन्य पहाड़ी आदिवासी जाति की ओर कोई विशेष प्रशंसनीयस कदम नहीं बढ़ा सके हैं। यूरोपीय धर्मप्रचारक एवं अन्य अतिथि इन जातियों के सम्पर्क में अवश्य रहे हैं लेकिन इनका प्रभाव भारत के अनुकूल हरगिज नहीं था। कुछ समय पहले सिक्किम में कुछ राजनैतिक उत्तेजना हुई थी। हो सकता है कि वहां असंतुष्टि की भावना अभी भी सुलग रही हो।
बाकियों की तुलना में भूटान थोड़ा शांत है लेकिन तिब्बती लोगों के साथ उसकी नजदीकियां हानिकारक हो सकती हैं। नेपाल में बल शक्ति पर आधारित, अल्पतंत्रीय शासन चल रहा है; यह वहां के उग्र नागरिकों तथा आधुनिक जमाने के प्रबुद्ध विचारों के बीच टकराव है। ऐसी परिस्थिति में लोगों को खतरे का अहसास दिलाना या उन्हें रक्षात्मक तौर पर दृढ़ बनाना एक बहुत मुश्किल कार्य है और इस
मुश्किल को आसान करने का एकमात्र रास्ता है प्रबुद्ध दृढ़ता, ताकत और स्पष्ट नीतियां। मुझे पूर्ण विश्वास है कि चीनी और उनकी प्रेरणा के स्रोत सोवियत रूस, इन कमजोर कड़ियों का फायदा उठाने में कभी नहीं चूकेंगे, कुछ हद तक उनकी विचारधाराओं के समर्थन में और कुछ हद तक उनके लक्ष्यों के समर्थन में।
मेरे विचार में ऐसी परिस्थिति में हम न तो नमनशील हो सकते हैं और न ही ढुलमुल सकते हैं। हमें न केवल अपने लक्ष्यों को स्पष्टतः साध लेना चाहिए परंतु उन तक पहुंचने के रास्तों को भी अच्छी तरह पहचान लेना चाहिए। हमारे द्वारा की गई छोटी सी गलती लक्ष्यों के चुनाव में या फिर उन्हें कार्यान्वित करने हेतु लिए जाने वाले निर्णयों में से किसी तरह की ढील, हमें कमजोर बना देगी और हमारे सामने खड़ी साफ दिखाई दे रही धमकियों को और विशाल कर देगी।
इन बाहरी खतरों के साथ साथ हमें अब आतंरिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ेगा। मैंने पहले ही (एचवीआर) अयंगर को विदेश मंत्रालय को इन मामलों पर आसूचना विभाग की समीक्षा रिपोर्ट की एक नकल भिजवा देने के निर्देश दिए हैं। अब तक भारतीय साम्यवादी पार्टी को बाहरी देशों में साम्यवादियों से सम्पर्क साधने में या उनसे हथियार या कागज पत्री आदि की सप्लाई लेने में थोड़ी मुश्किल हो रही थी।
उन्हें इस काम के लिए पूर्व दिशा में स्थित कठिन बर्मी या पाकिस्तानी सीमाओं को प्रयोग में लाना पड़ रहा था या लंबे समुद्र तटों का सहारा लेना पड़ रहा था। अब इनके पास चीनी साम्यवादियों तक पहुंचने का एक आसान रास्ता उपलब्ध हो जाएगा, जिनके जरिए ये आराम से अन्य विदेशी साम्यवादियों तक भी पहुँच पाएंगे। गुप्तचरों, पांचवे स्तम्भ लेखकों एवं साम्यवादियों की घुसपैठ एक आम और आसान बात बन जाएगी। तेलंगाना और वारंगल में कहीं कहीं स्थित साम्यवादियों से निपटने की जगह हमें शायद अपनी
उत्तरी और उत्तरपूर्वी सीमा के साथ बसी साम्यवादी चुनौतियों से भी जूझना होगा, अपनी गोला बारूद की सप्लाई के लिए वे सुरक्षित रूप से चीन में साम्यवादी आयुधशालाओं पर निर्भर कर सकते हैं। इस तरह, ये सारी परिस्थितियां हमारे सामने ऐसी मुश्किलें लेकर आई हैं जिन पर हमें तुरंत कोई निर्णय लेना होगा ताकि, जैसा मैंने पहले भी कहा था, हम अपनी नीतियों के उद्देश्य तय करके उनकी उपलब्धि का रास्ता इख्तियार कर सकें।
यह भी स्पष्ट है कि हमारे द्वारा एक ऐसा व्यापक कदम उठाना चाहिए जिसमें न केवल हमारी रक्षात्मक नीति और तैयारी की स्थिति सम्मिलित हो बल्कि आतंरिक सुरक्षा की समस्या भी, जिससे हमें बिना एक क्षण बर्बाद किए निपटना चाहिए। हमें सीमा के कमजोर इलाकों में प्रशासनिक एवं राजनैतिक समस्याओं से भी निपटना होगा जिनका मैं पहले भी जिक्र कर चुका हूँ।
बेशक, मेरे लिए इन सभी समस्याओं का विस्तृत विवरण करना तो संभव नहीं होगा लेकिन फिर भी मैं नीचे कुछ ऐसी समस्याओं के बारे में बात करने जा रहा हूँ, मेरे विचार में जिनका समाधान बहुत जल्द हो जाना चाहिए और जिनके इर्द गिर्द ही हमें अपनी प्रशासनिक तथा सैनिक नीतियां तैयार करके इन्हें लागू करने की योजना बनानी चाहिए।
ए) भारतीय सीमाओं एवं आतंरिक सुरक्षा की चीनी चुनौतियों से होने वाले खतरे का आसूचना एवं सैन्य आकलन।
बी) अपने सैन्य दलों की स्थिति का निरीक्षण और उनकी आवश्यक पुनः तैनाती, विशेष तौर पर उन क्षेत्रों एवं रास्तों की सुरक्षा को लेकर जिन पर भविष्य में विवादों की सम्भावना है।
सी) अपने सुरक्षा दलों की ताकतों का मूल्यांकन और इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सेना की कटौती योजना पर पुनः विचार।
डी) हमारी रक्षात्मक आवश्यकताओं पर चिरस्थाई सोच विचार। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम बंदूकों, गोलाबारूद तथा कवचित सप्लाई पर विशेष ध्यान नहीं देंगे तो हमारी रक्षात्मक स्थिति लगातार कमजोर पड़ती जाएगी और हम पश्चिम एवं उत्तरपश्चिम तथा उत्तर एवं उत्तरपूर्वी दिशाओं से आने वाली दोहरी चुनौतियों के खतरों से लड़ने के योग्य नहीं रहेंगे।
इ) जहां तक चीन के यूएनओ में प्रवेश का सवाल है, चीन से हमें मिले दो टूक जवाब और उनके तिब्बत की ओर रवैये को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि हमें और देर तक उनके दावों का समर्थन करना चाहिए। चीन की कोरीयन युद्ध में सक्रिय हिस्सेदारी को देखते हुए यूएनओ में शायद उन्हें बहिष्कृत करने का अप्रत्यक्ष खतरा होगा। हमें इस समस्या पर भी अपना रुख निर्धारित कर लेना चाहिए।
एफ) अपनी उत्तरी एवं उत्तरपूर्वी सीमाओं को मजबूत करने के लिए हमारे द्वारा उठाए जाने वाले राजनैतिक एवं प्रशासनिक कदम। इसमें सम्पूर्ण सीमा सम्मिलित होगी यानि कि नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र।
जी) सीमा क्षेत्रों तथा उनके बगल में बसे क्षेत्रों जैसे कि यूपी, बिहार, बंगाल एवं असम की आंतरिक सुरक्षा के उपाय।
एच) इन क्षेत्रों तथा सेनाओं पर तैनात फौजी चौकियों के लिए सड़क, रेल, हवाई और बेतार संचारण विकास।
आई) सीमा चौकियों की सुरक्षा एवं उनकी आसूचना।
जे) ल्हासा तथा यांग्त्से और यतुंग की व्यापार चौकियों में हमारे मिशन का भविष्य और इन रास्तों की सुरक्षा के लिए तिब्बत में काम कर रहे हमारे रक्षा दल।
के) मैकमोहन रेखा के संबंध में हमारी नीति।
ये कुछ सवाल मेरे मन में उमड़कर मुझे परेशान करते हैं। हो सकता है कि इन मसलों पर सोचविचार हमें चीन, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन तथा बर्मा के साथ हमारे संबंधों के व्यापक प्रश्नों की ओर ले जाए। वैसे तो ये सब सवाल आम ही हैं लेकिन इनमें से कुछ एक प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण भी हो सकते हैं। जैसे कि हो सकता है हमें इस बात पर विचार करना पड़े कि क्या हमें बर्मा से हमारे संबंध घनिष्ठ करके उन्हें चीन से निपटने के लिए दृढ़ता मुहैया करवानी चाहिए।
मुझे लगता है कि हम पर दबाव डालने से पहले चीन, बर्मा पर दबाव डालने की कोशिश करेगा। चीन के साथ लगती सीमाएं पूरी तरह अपरिभाषित हैं, जिससे चीन, सीमा पर ठोस दावे कर सकता है। मौजूदा स्थिति में बर्मा चीन के लिए एक सरल मुश्किल पैदा करके हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकता है।
मेरा सुझाव है कि हमें जल्दी मिलकर इन समस्याओं पर व्यापक सोच विचार कर लेना चाहिए और तुरंत उठाए जाने वाले आवश्यक कदमों पर भी निर्णय ले लेना चाहिए और इसके साथ ही अन्य समस्याओं पर भी फुर्तीली नजर दौड़ाते हुए उनसे निपटने के लिए आवश्यक कदमों पर फैसला ले लेना चाहिए।
आपका वल्लभभाई
उपरोक्त पत्र से स्पष्ट है कि सरदार पटेल को नेहरू की चीन नीति बिल्कुल पसंद थी। पटेल की मृत्यु के लगभग 12 साल बाद पटेल की यह भविष्यवाणी सही हुई कि नेहरू की चीन नीति बिल्कुल गलत थी।
यह घटना उन दिनों की है जब सरदार पटेल को राजस्थान नामक नवीन प्रादेशिक इकाई का उद्घाटन करने के लिए दिल्ली से जयपुर जाना था। जयपुर से कुछ पहले ही विमान खराब हो गया। पूरे देश में वायुयान दुर्घटना के समाचार फैल गए जिन्होंने देश को चिंता में डाल दिया!
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29 मार्च 1949 को सरदार पटेल अपनी पुत्री मणिबेन तथा यादवेंद्र सिंह के साथ दिल्ली से वायुयान से राजस्थान के लिये रवाना हुए। बीच मार्ग में इंजन में खराबी आ गई तथा प्लेन का सम्पर्क रेडियो से कट गया। इस पर विमान में बैठे जोधपुर नरेश हनवंतसिंह ने विमान को अपने अधिकार में लेकर एक सूखी नदी में उतार दिया। इससे वायुयान दुर्घटना टल गई। सरदार पटेल के प्राण बच गए और वे सड़क मार्ग से जयपुर पहुंच कर राजस्थान का उद्घाटन कर सके। जब पटेल वापस दिल्ली लौटे तो सैंकड़ों देशवासियों ने हवाई अड्डे पर उनका भव्य स्वागत किया। संसद में सांसदों ने पटेल का अभूतपूर्व स्वागत किया। उनके सम्मान में आधे घण्टे तक संसद की कार्यवाही रोक दी गई। पटेल को पंजाब विश्वविद्यालय तथा उस्मानिया विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ लॉ की मानद उपाधि दी गई। जोधपुर नरेश हनवंतसिंह के इस योगदान के लिए देश उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहेगा।
सरदार पटेल जन-जन के नेता थे। उनकी अंतिम यात्रा में बहुत बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हुए किंतु सरदार पटेल का अंतिम संस्कार आम आदमी की तरह किया गया!
1950 की गर्मियों में पटेल का स्वास्थ्य तेजी से गिरा। उनकी खांसी में खून आने लगा। मणिबेन ने पटेल की बैठकों तथा कार्य-घण्टों की संख्या कम कर दी तथा पटेल के स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिये व्यक्तिगत मेडिकल स्टाफ नियुक्त किया गया।
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पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बिधानरॉय जो कि डॉक्टर भी थे, को ज्ञात हुआ कि पटेल अब अपनी मृत्यु के निकट होने को लेकर मजाक कर रहे हैं तथा उन्होंने अपने साथी मंत्री एन.वी. गाडगिल के समक्ष यह कहा है कि अब वे अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहेंगे। 2 नवम्बर 1950 को पटेल का स्वास्थ्य अत्यंत खराब हो गया। वे बार-बार बेहोश होने लगे। 12 दिसम्बर 1950 को उन्हें दिल्ली ले जाया गया। उस दिन नेहरू, राजगोपालाचारी, राजेन्द्र प्रसाद तथा मेनन दिल्ली एयरपोर्ट पर उन्हें विदा देने आये। पटेल बहुत कमजोर हो चुके थे। उन्हें कुर्सी सहित ही विमान में चढ़ाया गया। बम्बई में सांताक्रूज हवाई अड्डे पर विशाल जन समूह उनके स्वागत के लिये खड़ा था। पटेल को तनाव से बचाने के लिये जूहू हवाई अड्डे पर उतारा गया। यहाँ मुख्यमंत्री बी. जीत्र खेर तथा मोरारजी देसाई ने उनका स्वागत किया। बम्बई के राज्यपाल की कार उन्हें लेने आई थी जिससे वे बिड़ला हाउस पहुंचे। 15 दिसम्बर 1950 को उन्हें दूसरी बार तीव्र हृदयाघात हुआ तथा उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के अगले दिन भारतीय नागरिक सेवाओं तथा भारतीय पुलिस सेवा के डेढ़ हजार से अधिक अधिकारियों ने पटेल के दिल्ली स्थित निवास पर उपस्थित होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने भारत माता के प्रति पूर्ण स्वामिभक्ति की शपथ ग्रहण की।
भारत के इतिहास में ऐसा दृश्य इससे पहले कभी नहीं देखा गया। बम्बई सरकार ने गिरगाम चौपाटी पर उनका अंतिम संस्कार करने की योजना बनाई किंतु मणिबेन ने कहा कि सरदार की इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार सामान्य आदमी की तरह सोनापुर में किया जाये।
अब इस स्थान को मैरीन लाइन्स कहा जाता है। इसी स्थान पर पटेल के भाई का तथा पटेल की पत्नी का अंतिम संस्कार किया गया था। उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिये दस लाख लोग आये। प्रधानमंत्री नेहरू, राजगोपालाचारी तथा राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भी उपस्थित रहे। उनकी मृत्यु पर मैनचैस्टर गार्जियन ने लिखा था कि एक ही व्यक्ति विद्रोही और राजनेता के रूप में कभी-कभी ही सफल होता है परन्तु पटेल इस सम्बन्ध में अपवाद थे।
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...