Home Blog Page 210

नेहरू को पत्र

0

यद्यपि सरदार पटेल अजमेर दंगे पर आयंग की यात्रा के लिए आयंगर के माध्यम से नेहरू को फटकार चुके थे किंतु इससे पटेल को संतोष नहीं हुआ। उन्होनें सीधे ही नेहरू को पत्र लिखने का निश्चय किया।

23 दिसम्बर 1947 को सरदार पटेल ने नेहरू को पत्र लिखकर कहा कि आयंगर की अजमेर यात्रा आश्चर्य में डालने वाली एवं धक्का पहुँचाने वाली थी। इस यात्रा के दो ही अर्थ निकलते हैं। पहला यह कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री द्वारा अजमेर को लेकर दिये गये वक्तव्य से असंतुष्ट थे।

दूसरा यह कि वे अजमेर के स्थानीय प्रशासन द्वारा की गई कार्यवाही से असंतुष्ट थे। इसलिये प्रधानमंत्री ने स्वतंत्र अभिमत जानने के लिये अपने प्रमुख निजी सचिव को अजमेर यात्रा पर भेजा। चीफ कमिश्नर या तो मंत्री के अधीन होता है या फिर सम्बन्धित विभाग के सचिव के अधीन होता है।

सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
To Purchase this Book Please Click on Image

पटेल ने चीफ कमिश्नर शंकर प्रसाद की प्रशंसा करते हुए लिखा कि वह यू. पी. का सबसे योग्यतम अधिकारी है जिसकी दक्षता, ईमानदारी एवं निष्पक्षता को चुनौती नहीं दी जा सकती। आयंगर की इस यात्रा ने शंकर प्रसाद को दुःखी किया है तथा उसकी छवि को कमजोर किया है। कौल तथा भार्गव द्वारा चीफ कमिश्नर के विरुद्ध एक अभियान चलाया गया था। इस यात्रा से आयंगर को कौल तथा भार्गव के बारे में सही जानकारी हो गई होगी। अतः आशा की जानी चाहिये कि अजमेर की यह यात्रा, इस प्रकार की अंतिम यात्रा होगी।

सरदार पटेल का पत्र निश्चित रूप से जवाहरलाल नेहरू पर अपने काम में हस्तक्षेप करने का आक्षेप था और खुली चुनौती भी कि भविष्य में इसे दोहराया न जाये। इस आक्षेप तथा चुनौती को सहन करना जवाहरलाल के लिये सहज नहीं था। जवाहरलाल ने उसी दिन पटेल को जवाब भिजवाया जिसमें उन्होंने लिखा कि यह यात्रा इन परिस्थितियों में व्यक्तिगत प्रकार की थी। इस यात्रा का उद्देश्य किसी अधिकारी अथवा उसके द्वारा किये गये कार्य पर कोई निर्णय देना नहीं था। यह जनता से सम्पर्क करने के लिये, विशेषतः पीड़ितों से सम्पर्क करने के लिये की गई ताकि उनका विश्वास जीता जा सके तथा उनके हृदय से भय को निकाला जा सके।

नेहरू ने सहमति व्यक्त की कि शंकर प्रसाद एक अच्छे और निष्पक्ष अधिकारी हैं किंतु यह समझ से परे है कि प्रधानमंत्री द्वारा किसी व्यक्ति को अजमेर भेज देने से उसकी प्रतिष्ठा अथवा छवि को धक्का कैसे पहुँच गया!

किसी भी परिस्थिति में जनता पर पड़ने वाला प्रभाव महत्वपूर्ण है न कि एक अधिकारी की प्रतिक्रिया। नेहरू ने लिखा कि जब लोगों के दिलों में घबराहट हो तथा मनोवैज्ञानिक परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हों, तब केवल विशुद्ध प्रशासन कैसे काम कर सकता है! इससे तो कोई बड़ा हादसा घटित हो सकता है।

किसी अधिकारी की प्रतिष्ठा अथवा हमारी स्वयं की प्रतिष्ठा एक द्वितीय मुद्दा है यदि अन्य बड़े मुद्दे दांव पर लगे हुए हों। यदि हम प्रजा के साथ सही आचरण करेंगे तो हमारी प्रतिष्ठा स्वयं ही बन जायेगी। अधिकारियों के मामले में भी ऐसा ही है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नेहरू द्वारा पदत्याग की इच्छा !

0

अजमेर दंगे के बाद सरदार पटेल द्वारा जवाहर लाल नेहरू को लगाई गई फटकार से व्यथित होकर नेहरू द्वारा पदत्याग करने की इच्छा व्यक्त की गई!

सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
To Purchase this Book Please Click on Image

नेहरू ने सरदार को लिखा कि आपके और मेरे बीच में इस प्रकार की घटनाओं की प्रवृत्ति तथा कठिनाइयां उत्पन्न होने से मैं बहुत अप्रसन्न हूँ। ऐसा लगता है कि आपकी और मेरी कार्य करने की प्रवृत्ति अलग-अलग प्रकार की है। यद्यपि आप और मैं एक दूसरे का बहुत आदर करते हैं तथापि हम दोनों के बीच जो विषय खड़ा हो गया है, इसे हम सबके द्वारा बहुत सावधानीपूर्वक लिया जाना चाहिये। यदि मुझे प्रधानमंत्री रहना है तो मुझ पर इस तरह के प्रतिबंध से मुक्ति होनी चाहिये। अन्यथा मेरे लिये यही उचित है कि मैं कुर्सी छोड़ दूं।

मैं जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहता और न यह चाहता हूँ कि आप ऐसा करें। इसलिये हम दोनों को इस परिस्थिति पर गहरा विचार करना चाहिये ताकि हमारे निर्णय राष्ट्र के लिये हितकारी हो सकें। हमने और आपने देश की लम्बी सेवा की है। यदि दुर्भाग्य से आपको अथवा मुझे सरकार से हटना पड़े तो इसे प्रतिष्ठापूर्ण एवं गरिमापूर्ण विधि से होने देना चाहिये। मैं प्रसन्नता पूर्वक त्यागपत्र देने और सत्ता आपको सौंपेने के लिये तैयार हूँ। नेहरू द्वारा पदत्याग की इच्छा व्यक्त करने वाले इस पत्र का उल्लेख इतिहास में बहुत कम हुआ है।

सरदार पटेल ने नेहरू के इस पत्र का प्रत्युत्तर दिया जिसमें उन्होंने लिखा कि यह सही है कि विभिन्न विषयों एवं मुद्दों पर आपके और मेरे काम करने के ढंग में अंतर है किंतु निष्कर्षतः अथवा अंतिम निर्णय के रूप में यह कहा जा सकता है कि आपमें और मुझमें कोई भेद नहीं है। हम दोनों देश के भले के लिये एक समान उद्देश्य से काम कर रहे हैं। पटेल ने लिखा कि आयंगर का अजमेर भेजा जाना गलत था।

मैं आपकी स्वतंत्रता को सीमित नहीं करना चाहता और न ही मैंने पहले कभी ऐसा किया है। न मेरा उद्देश्य आपके लिये किसी प्रकार की कोई समस्या खड़ी करना है किंतु जब यह हम दोनों को ही अपने उत्तरदायित्वों के क्षेत्र के आधारभूत प्रश्न, अधिकार तथा कार्यों में विरोधाभास स्पष्ट हों तब यह हमारे उन उद्देश्यों के लिये हितकारी नहीं होगा जो कि हम दोनों ही करना चाहते हैं।

इस पत्र के मिलने के बाद जवाहर लाल नेहरू ने सरदार पटेल को गांधीजी के निवास पर मिलने का सुझाव दिया ताकि इस विषय पर आगे विचार-विमर्श किया जा सके। 6 जनवरी 1948 को नेहरू ने गांधीजी को एक नोट भिजवाया तथा उसकी एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई।

सरदार ने नेहरू के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया तथा उन्हें संदेश भिजवाया कि जो भी समय उन्हें उचित लगता हो, वे गांधीजी से तय कर लें। सरदार ने भी एक नोट गांधीजी को भिजवाया तथा उसकी प्रति नेहरू को दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पटेल-नेहरू विवाद काल के गर्त में समा गया!

0

जवाहर लाल नेहरू ने सरदार पटेल के साथ मिलकर एक-दूसरे की शिकायतें सुनने का निर्णय किया किंतु उसके कुछ दिन बाद ही गांधीजी की हत्या हो गई। इसके कारण नेहरू और पटेल की बैठक नहीं हो सकी तथा इसी के साथ पटेल-नेहरू विवाद काल के गर्त में समा गया।

नेहरू ने अपने नोट में गांधीजी को अजमेर दंगे के प्रकरण के सम्बन्ध में घटी घटनाओं के सम्बन्ध में जानकारी दी तथा पटेल-नेहरू विवाद को स्पष्ट करते हुए पूछा कि क्या प्रधानमंत्री इस प्रकार का कदम उठाने के लिये अधिकृत थे। इस बात का निर्णय किसे लेना था ?

सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
To Purchase this Book Please Click on Image

यदि प्रधानमंत्री को इस प्रकार का कदम उठाने का अधिकार नहीं था, और न ही इस सम्बन्ध में निर्णय लेने का अधिकार था तो वे इस पद पर ढंग से काम नहीं कर सकेंगे और न ही अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकेंगे। नेहरू ने इस नोट में गांधी को लिखा कि यह तो पृष्ठभूमि है किंतु निरंतर उठ रही व्यावहारिक कठिनाईयों के सम्बन्ध में सिद्धांत क्या रहेगा ?

यदि सीधे शब्दों में कहें तो कैबीनेट में कुछ व्यवस्थायें करने की आवश्यकता है जो एक व्यक्ति पर उत्तरदायित्व का निर्माण कर सके। वर्तमान परिस्थितियों में या तो मैं जाऊँ या सरदार जायें। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं जाने को तैयार हूँ। मेरा या हम दोनों में से किसी एक का सरकार से बाहर जाने का अर्थ यह नहीं है कि हम आगे से एक दूसरे का विरोध करेंगे। हम सरकार के भीतर रहें अथवा बाहर, हम विश्वसनीय कांग्रेसी रहेंगे, विश्वसनीय साथी रहेंगे तथा हम अपने कार्यक्षेत्र में फिर से एक साथ आने के लिये कार्य करेंगे।

सरदार पटेल ने अपने पत्र में प्रधानमंत्री के दायित्वों के सम्बन्ध में नेहरू की धारणा से असहमति व्यक्त की। यदि प्रधानमंत्री इसी प्रकार कार्य करेगा तो वह एक निरंकुश शासक बन जायेगा। प्रधानमंत्री, सरकार में, बराबर के मंत्रियों में सबसे पहला है। वह अपने साथियों पर कोई बाध्यकारी शक्तियां नहीं रखता।

पटेल ने गांधी को लिखा कि प्रधानमंत्री ने अपने नोट में लिखा है कि यदि प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री के बीच सामंजस्य नहीं बनता है तो एक को जाना होगा। यदि ऐसा ही होना है तो मुझे जाना चाहिये। मैंने सक्रिय सेवा का दीर्घ काल व्यतीत किया है। प्रधानमंत्री देश के जाने-माने नेता हैं तथा अपेक्षाकृत युवा हैं।

उन्होंने अपने लिये अंतर्राष्ट्रीय छवि स्थापित की है। मुझे कोई संदेह नहीं है कि मेरे और उनके बीच में निर्णय उनके पक्ष में होगा। इसलिये उनके कार्यालय छोड़ने का कोई प्रश्न ही नहीं है।

इन दोनों नेताओं के मध्य, गांधीजी के समक्ष होने वाला विचार-विमर्श गांधीजी के उपवास के कारण स्थगित कर देना पड़ा। इसके अन्य कारण भी थे। कश्मीर समस्या अपने चरम पर पहुँच गई थी तथा देश में साम्प्रदायिक तनाव भी अपने उच्चतम स्तर पर था। भारत सरकार इस समय संक्रांति काल में थी। एक छोटा सा धक्का भी बहुत बड़ा नुक्सान पहुँचा सकता था।

अंत में गांधी की मृत्यु पर दोनों ने एक दूसरे को गले लगा लिया और उसके बाद उनके झगड़े सदैव के लिये मिट गये। दोनों ने एक साथ देश को सम्बोधित किया तथा जनता को संभावित हिंसा से दूर रहने का आह्वान किया।गांधी की हत्या ने नेहरू और पटेल को एक किया। इसी के साथ पटेल-नेहरू विवाद काल के गर्त में समा गया तथा पटेल और नेहरू के बीच रहने वाला स्थाई विरोध और मतभेद काल के गर्त में समा गये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भीमराव अम्बेडकर की नियुक्ति में पटेल की भूमिका

0

सरदार पटेल ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर को प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाने का निश्चय किया किंतु भीमराव अम्बेडकर की नियुक्ति में कठिनाई यह थी कि उस काल की कांग्रेस में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का कद इतना ऊँचा नहीं था।

जिस समय भारत की संविधान सभा का गठन हुआ और संविधान का प्रारूप बनाने के लिए प्रारूप समिति का गठन किया गया, तब कांग्रेस को एक ऐसे नेता की तलाश थी जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का ज्ञाता हो तथा भारत की राजनीति में सभी पक्षों को स्वीकार हो सके। गांधी, जिन्ना एवं नेहरू लंदन में बैरिस्ट्री की पढ़ाई करके आए थे।

ये तीनों ही अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के ज्ञाता थे किंतु ये तीनों ही संविधान का प्रारूप बनाने के लम्बे कार्य को करने के लिए समय निकालने में असमर्थ थे। इसलिए सरदार पटेल की दृष्टि डॉ. भीमराव अम्बेडकर पर गई जो गांधी, जिन्ना एवं नेहरू की तरह लंदन में रहकर बैरिस्ट्री की पढ़ाई करके आए थे तथा अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के ज्ञाता थे।

सरदार पटेल ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर को प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाने का निश्चय किया किंतु भीमराव अम्बेडकर की नियुक्ति में कठिनाई यह थी कि उस काल की कांग्रेस में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का कद इतना ऊँचा नहीं था। इससे भी बड़ी कठिनाई यह थी कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर के गांधीजी एवं जिन्ना दोनों से सम्बन्ध अच्छे नहीं थे।

सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
To Purchase this Book Please Click on Image

अम्बेडकर सरे आम गांधीजी की आलोचना किया करते थे और उन्हें राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दिया करते थे। इसलिए किसी कांग्रेसी नेता में हिम्मत नहीं थी कि इतनी महत्वपूर्ण समिति के लिए अम्बेडकर का नाम सुझा सके। सरदार पटेल डॉ. भीमराव अम्बेडकर की योग्यता, विद्वता एवं परिश्रमशील स्वभाव से परिचित थे। उन्होंने यह भी पता था कि उस काल की राजनीति में डॉ. अम्बेडकर ही एक मात्र ऐसे कानूनविद् थे जिन्हें हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच की समस्या की गहराई तक जानकारी थी।

डॉ. अम्बेडकर अनेक बार सार्वजनिक मंचों से हिन्दुओं में व्याप्त छुआछूत एवं भेदभाव की समस्या पर बोल चुके थे किंतु इसके साथ ही वे इस्लाम के सम्बन्ध में भी खुलकर विचार प्रकट करने का साहस रखते थे। वे जानते थे कि यदि मुसलमान भारत में रहे तो वे कभी भी हिंदुओं को शांति से नहीं जीने देंगे। डॉ. भीमराव अम्बेडकर में एक विशेषता और थी जो उस काल के किसी भी नेता में नहीं थी, वह विशेषता थी उनका सच बोलने के प्रति उत्साह। वे किसी बात को गांधीजी की तरह चाशनी में लपेटकर, अल्पसंख्यकों के प्रति अनावश्यक आग्रह दिखाकर अपनी राजनीति आगे नहीं बढ़ाते थे।

डॉ. अम्बेडकर भारत जैसे विशाल देश में बड़ी संख्या में निवास करने वाली एवं दलित जातियों को शैक्षिक रूप से योग्य बनाकर आर्थिक रूप से सक्षम बनाना चाहते थे। इसलिए अंग्रेजों द्वारा पैदा की गई आरक्षण जैसी बुराइयों से दलित जातियों को अलग रखना चाहते थे।
इसलिए सरदार पटेल ने डॉ. अम्बेडकर को ही प्रारूप समिमिति का अध्यक्ष बनवाने का संकल्प किया।

संविधान सभा में सरदार पटेल ने सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने भीमराव अम्बेडकर की नियुक्ति संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के पद पर करवाने के लिए नेताओं को सहमत किया तथा अम्बेडकर के पक्ष में वातावरण तैयार किया।

सरदार पटेल संविधान सभा की अनेक महत्त्वपूर्ण सामितियों यथा अल्पसंख्यक समिति, आदिवासी समिति, मौलिक अधिकार समिति तथा प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष थे।

पटेल ने संविधान सभा में प्रांतीय संविधान का मॉडल प्रस्तुत किया जिसमें राज्यपालों को अत्यंत सीमित अधिकार दिये गये। पटेल चाहते थे कि राज्यपाल किसी भी स्थिति में, चुनी गई सरकार के कामकाज को प्रभावित न करें। पटेल ने ही राष्ट्रपति द्वारा संसद में दो एंग्लो इण्डियन्स को नामित करने का प्रावधान करवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये

0

पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये भारत के इतिहास की और मोहनदास कर्मचंद गांधी के रहस्यमयी आचरण की एक अनसुलझी पहेली है।

सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
To Purchase this Book Please Click on Image

जिस समय भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया तब पाकिस्तान में सम्मिलित हुए प्रांतों की सरकारों से भारत सरकार 300 करोड़ रुपए मांगती थी। जबकि केन्द्रीय कोष के विभाजन के फलस्वरूप पाकिस्तान सरकार भारत की केन्द्रीय सरकार से 55 करोड़ रुपए मांगती थी। इसलिए भारत सरकार ने पाकिस्तान की सरकार के 55 करोड़ रुपए इसलिए रोक लिए कि जब पाकिस्तान की प्रांतीय सरकारों से भारत सरकार को रुपए दिए जाएंगे, तब भारत सरकार पाकिस्तान सरकार को उसके हिस्से के रुपए दे देगी।

पाकिस्तान सरकार भारत से अलग होते ही अपनी राशि मांगने लगी किंतु भारत सरकार अपने 300 करोड़ रुपयों के न आने तक पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने की इच्छुक नहीं थी। इसी बीच पाकिस्तान की सेना ने कबाइलियों के साथ मिलकर कश्मीर राज्य पर हमला कर दिया जो अब तक भारत में सम्मिलित नहीं हुआ था। पाकिस्तान के हमले से घबराकर कश्मीर के राजा हरिसिंह ने भारत में मिलने की घोषणा कर दी। इस हमले के बाद गांधीजी ने भारत सरकार से कहा कि वह पाकिस्तान के 55 करोड़ लौटाए।

गांधीजी की इस मांग ने भारत सरकार को असमंजस में डाल दिया। भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच युद्ध चल रहा। ऐसी स्थिति में गांधीजी को पाकिस्तान से सहानुभूति क्यों है?

पटेल ने पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये दिये जाने का जमकर विरोध किया। पटेल का कहना था कि यह राशि काश्मीर में भारत के विरुद्ध काम में ली जायेगी किंतु गांधी ने पटेल की इस बात का यह कहकर विरोध किया कि यदि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये नहीं दिये गये तो उसके बदले में अधिक हिंसा और बदले की कार्यवाही की जायेगी।

कैबीनेट ने पटेल के प्रस्ताव का पक्ष लिया किंतु गांधी ने आमरण  अनशन पर बैठने की घोषणा कर दी जब तक कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये न दे दिये जायें। कैबीनेट ने गांधीजी की बात को स्वीकार कर लिया, इससे पटेल को दुःख हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अल्पसंख्यक आयोग का विरोध किया पटेल ने !

0

जब नेहरू ने भारत में रह गए मुसलमानों के लिए अल्पसंख्यक आयोग स्थापित करने का प्रयास किया तो पटेल ने अल्पसंख्यक आयोग का विरोध किया।

भारत का विभाजन हिन्दू एवं मुसलमान जनसंख्या के आधार पर किया गया था। चूंकि भारत के मुसलमानों ने हिन्दुओं के साथ रहने से मना कर दिया था, इसी आधार पर भारत में से पाकिस्तान अस्तित्व में आया था।

जवाहर लाल नेहरू को हिन्दू जनसंख्या के लिए बने भारत देश का प्रधानमंत्री बनाया गया किंतु नेहरू का झुकाव हिन्दू प्रजा की बजाय मुसलमानों की तरफ अधिक था। नेहरू को न केवल भारत में रह गए मुसलमानों से सहानुभूति थी अपितु पाकिस्तान में चले गए मुसलमानों के लिए भी सहानुभूति थी।

सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
To Purchase this Book Please Click on Image

दूसरी ओर सरदार पटेल का मानना था कि मुसलमानों को अपना अलग देश मिल गया है, अब उनके लिए कैसी सहानुभूति! अब हमें देश के हिन्दुओं की समस्या पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए!

नेहरू को अपने मुस्लिम प्रेम के लिए मोहनदास कर्मचंद गांधी से पूरा समर्थन मिलता था। इस कारण सरदार पटेल देश की राजनीति में अलग-थलग पड़ते रहे थे।

1949 में पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिमी बंगाल, असम एवं त्रिपुरा में 8 लाख से अधिक शरणार्थी घुस आये। इन शरणार्थियों को पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा बलपूर्वक भारतीय क्षेत्रों में धकेला जा रहा था। ये हिंसा और उत्पीड़न के मारे हुए हिन्दू नागरिक थे।

इस समय तक गांधी की हत्या हो चुकी थी और अब नेहरू अधिक मुखरता से मुसलमानों का पक्ष नहीं ले पाते थे।

नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खां को इस समस्या का शांतिपूर्वक समाधान निकालने के लिये आमंत्रित किया। नेहरू के तरीके से असंतुष्ट होकर पटेल ने लियाकत अली खां से भेंट की तथा उसे सख्त लहजे में संदेश दिया कि वह इस तरह की हरकतों से बाज आये।

इस पर नेहरू ने लियाकत अली खां के समक्ष प्रस्ताव रखा कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देश अल्पसंख्यक आयोगों की स्थापना करे। पटेल ने अल्पसंख्यक आयोग का विरोध किया तथा नेहरू के इस प्रस्ताव की कड़ी आलोचना की। श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा के. सी. नेगी ने नेहरू की तुष्टिकरण की नीतियों से नाराज होकर मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पटेल-नेहरू द्वंद्व

0

सरदार पटेल एवं जवाहर लाल नेहरू अलग-अलग व्यक्तित्व के धनी थे। भारत की आजादी के बाद पटेल-नेहरू द्वंद्व अधिक मुखर होकर सामने आया। पटेल ने नेहरू की व्यक्तिगत इच्छाओं को कांग्रेस पर हावी नहीं होने दिया!

पटेल एवं नेहरू दोनों ही कांग्रेस के सर्वाग्रणी नेता थे। स्वतंत्रता के समय कांग्रेस में पटेल को अधिक पसंद किया जाता था किंतु गांधी के दबाव से नेहरू प्रधानमंत्री बन गए और पटेल ने उपप्रधानमंत्री पद पर संतोष कर लिया। पटेल-नेहरू द्वंद्व का कारण पद नहीं था अपितु यह द्वंद्व विचारों के कारण था। पटेल आजाद भारत में हिन्दुओं की सेवा करना चाहते थे जबकि नेहरू ने मुसलमानों के हित का सिद्धांत कसकर ओढ़ लिया था।

मीडिया ने पटेल पर आरोप लगाया कि उनका गृह मंत्रालय गांधी की रक्षा नहीं कर पाया। इससे दुःखी होकर पटेल ने सरकार से त्यागपत्र दे दिया।

नेहरू इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि यदि पटेल का त्यागपत्र स्वीकार कर लिया तो फिर नेहरू भी अपनी कुर्सी पर बने नहीं रह सकेंगे। इसलिए नेहरू ने पटेल का त्यागपत्र यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि नेहरू और पटेल तीस साल से कांग्रेस में एक साथ एक उद्देश्य के लिये काम करते रहे हैं और गांधी की मृत्यु के बाद उन दोनों के लिये लड़ना अच्छी बात नहीं होगी।

सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
To Purchase this Book Please Click on Image

पटेल का त्यागपत्र तो टल गया किंतु उसके बाद भी राजनैतिक विषयों पर नेहरू और पटेल के बीच मतभेद बने रहे। नेहरू द्वारा अपनाई गई तीन नीतियों- 1948 में काश्मीर मुद्दे को यूनाइटेड नेशन्स में ले जाने, 1950 में तिब्बत को चीन के विरुद्ध सहायता न देने तथा गोआ से पुर्तगालियों को निकालने हेतु सैनिक कार्यवाही न किये जाने पर पटेल एवं नेहरू के बीच तीव्र मतभेद, पटेल की मृत्यु तक बने रहे। जब नेहरू ने काश्मीर मुद्दे पर पटेल तथा गृह मंत्रालय के अधिकारियों को किनारे लगाने का प्रयास किया तो पटेल ने जोरदार प्रतिवाद किया।

1950 में नेहरू ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पर दबाव बनाया कि वे राजगोपालाचारी के पक्ष में, राष्ट्रपति पद हेतु दिया गया अपना नामांकन वापस ले लें। नेहरू की इस कार्यवाही ने कांग्रेसी नेताओं को बुरी तरह नाराज कर दिया। कांग्रेसियों को लगा कि नेहरू, कांग्रेस पर अपनी इच्छा थोपने का प्रयास कर रहे हैं। नेहरू ने पटेल से कहा कि वे राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनवाने में नेहरू की सहायता करें। इस पर पटेल ने पार्टी की इच्छा के विरुद्ध कार्य करने से मना कर दिया तथा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को ही भारत का प्रथम राष्ट्रपति बनाया गया। 1950 में नेहरू ने पुरुषोत्तम दास टण्डन कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिये खड़े हुए।

टण्डन की छवि एक हिन्दू नेता की थी इसलिये नेहरू ने उनका विरोध किया तथा जीवराम कृपलानी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने की अपील करते हुए कहा कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो नेहरू त्यागपत्र दे देंगे। पटेल ने नेहरू के दृष्टिकोण का विरोध करते हुए गुजरात में टण्डन को समर्थन देने की घोषणा कर दी।

कृपलानी गुजरात के ही रहने वाले थे किंतु उन्हें गुजरात से एक भी वोट नहीं मिला। पटेल का विश्वास था कि नेहरू की इच्छा कांग्रेस के लिये कानून नहीं है किंतु जब टण्डन जीत गये तो नेहरू को समझ में आ गया कि उन्होंने कांग्रेस का पूरा विश्वास खो दिया है। इस पर नेहरू ने त्यागपत्र दे दिया। तब पटेल ने नेहरू को त्यागपत्र देने से मना कर दिया।

इस प्रकार पटेल-नेहरू द्वंद्व चलता रहा किंतु दोनों ही एक-दूसरे को सहन करके एक-दूसरे की प्रतिष्ठा की रक्षा भी करते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण

0

आजादी की लड़ाई में सरदार पटेल की उपलब्धियां विलक्षण थीं किंतु आजादी के समय उनकी भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण थी। उन्होंने देश की 554 देशी रियासतों का भारत में सम्मिलन करवाया। स्वतंत्र भारत में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि गुजरात के प्राचीन सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाना रही।

सोमनाथ का जगत् प्रसिद्ध मंदिर गुजरात के काठियावाड़ प्रदेश में स्थित था। मान्यता है कि यह ईसा के जन्म से भी पहले का मंदिर है। इस मंदिर को सिंध और अरब से आये मुस्लिम आक्रांताओं ने कई बार तोड़ा। आठवीं शती में जालौर के प्रतिहार शासक नागभट्ट ने तीसरी बार सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।

महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर की सम्पदा लूटने के लिये भारत पर 17 बार भयानक आक्रमण किये। उसने इस मंदिर में पूजा कर रहे पचास हजार लोगों को मारकर मंदिर के शिवलिंग को तोड़ डाला।

सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
To Purchase this Book Please Click on Image

 महमूद गजनवी, शिवलिंग के टुकड़ों को हाथी के पैरों से बांधकर गजनी ले गया और वहाँ जाकर उन रास्तों में चिनवा दिया जो गजनी के महलों से मस्जिदों तक जाते थे। इस मंदिर से महमूद गजनवी को विशाल सम्पदा हाथ लगी थी जिसे वह हाथियों, ऊँटों एवं बैलगाड़ियों पर लादकर गजनी ले गया। उसने इस मंदिर के भवन को भी बहुत क्षति पहुंचाई। गुजरात तथा मालवा के राजाओं ने इसका पुनिर्निर्माण करवाया। ई.1706 में पुनः औंरगजेब ने इसे गिरवा दिया। तब से यह भग्नावस्था में खड़ा था।

भारत को स्वतंत्रता प्राप्त होते ही 13 नवम्बर 1947 को पटेल ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाने का संकल्प लिया। पण्डित नेहरू ने प्रधानमंत्री की हैसियत से सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का तीव्र विरोध किया किंतु पटेल और मुंशी ठान चुके थे। अक्टूबर 1950 में पुराने भग्नावशेष हटा दिये गये।

नेहरू के पुरजोर विरोध के बावजूद सरदार पटेल एवं कन्हैयालाल मुंशी ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवा लिया। इस मंदिर के निर्माण में जनता से धन एकत्रित किया गया, सरकार के कोष से एक कौड़ी भी नहीं ली गई। इसलिए नेहरू की चीख-चिल्लाहट सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करने में बाधा नहीं बन सकी।

इससे पहले कि मंदिर का शिलान्यास होता, 15 दिसम्बर 1950 को सरदार पटेल का निधन हो गया। मई 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने केन्द्रीय मंत्री के. एम. मुंशी के निमंत्रण पर इस मंदिर का शिलान्यास किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शेख अब्दुल्ला की बोलती बंद कर दी पटेल ने!

0

कश्मीर समस्या के तीन मुख्य सूत्रधार थे- शेख अब्दुल्ला, जवाहरलाल नेहरू और महाराजा हरिसिंह! तीन की महत्वाकांक्षाओं ने कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा दिया तथा कश्मीर को अंतर्राष्ट्रीय स्तर की समस्या बना दिया। यह समस्या आज भी पूरी तरह नहीं सुलझ सकी है।

शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के पूर्वज कश्मीरी ब्राह्मण थे। शेख अब्दुल्ला का परदादा सूफी सम्प्रदाय में शामिल होकर मुसलमान बन गया और कश्मीरी शॉल बेचकर अपना पेट भरने लगा। जिस समय भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन चल रहा था, उस समय बहुत से देशी राज्यों में राजाओं के विरुद्ध भी आंदोलन चल रहे थे। शेख को यह पसंद नहीं था कि कश्मीर के मुसलमानों पर कोई हिन्दू राजा राज्य करे। इस कारण उसने महाराजा हरिसिंह के विरुद्ध आंदोलन चलाया।

सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
To Purchase this Book Please Click on Image

जब महाराजा हरिसिंह ने राजगद्दी नहीं छोड़ी और देश आजाद हो गया तो शेख अब्दुल्ला ने प्रयास किया कि कश्मीर को भारत और पाकिस्तान दोनों से अलग एक स्वतंत्र मुसलमान राज्य बना लिया जाए। महाराजा हरिसिंह चाहता था कि कश्मीर को भारत और पाकिस्तान से अलग एक हिन्दू शासित राज्य बनाए रखा जाए। आजादी के कुछ दिनों बाद पाकिस्तान की सेना ने कबायलियों के साथ मिलकर कश्मीर राज्य पर आक्रमण किया। इस पर हरिसिंह ने भारत में सम्मिलित होने की घोषणा कर दी तो शेख तिलमिला गया। उसने अपना आंदोलन तेज कर दिया किंतु जवाहर लाल नेहरू ने महाराजा हरिसिंह पर दबाव डालकर शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का प्रधानमंत्री बनवा दिया। इसके बाद भी शेख की अलगाववादी कार्यवाहियां जारी रहीं।

1949 में संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में सम्मिलित होने गये भारतीय प्रतिनिधि मण्डल में शेख अब्दुल्ला भी शामिल था। जब यह प्रतिनिधि मण्डल वापस लौट रहा था तब शेख अब्दुल्ला ने लंदन में डेली टेलिग्राफ को एक साक्षात्कार दिया जिसमें शेख ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर कश्मीर को स्वतंत्र राज्य बनाने के अपने स्वप्न का खुलासा किया।

भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल ने शेख अब्दुल्ला को दिल्ली बुलाकर कहा कि यदि उसे स्वतंत्रता चाहिये तो वे भारतीय सेना को काश्मीर से वापस बुलाने के लिये तैयार हैं। शेख का मुंह पीला पड़ गया क्योंकि उसे यह भलीभांति ज्ञात था कि भारतीय सेना के काश्मीर से निकलते ही पाकिस्तान घाटी पर अधिकार कर लेगा और शेख को अपना शेष जीवन कारावास में व्यतीत करना होगा।

इस घटना के बाद जब तक सरदार पटेल जीवित रहे, शेख ने अपना मुंह नहीं खोला किंतु 15 दिसम्बर 1950 को पटेल की मृत्यु के बाद शेख ने अपनी विभाजनकारी गतिविधियां फिर से चालू कर दीं। 8 अगस्त 1953 को जवाहर लाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री पद से हटाकर जेल में डाल दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नेहरू से असंतुष्ट थे पटेल ! (112)

0

गांधी के दबाव पर पटेल ने नेहरू को प्रधानमंत्री की कुर्सी तो दे दी किंतु दोनों के व्यक्तित्व बिल्कुल अलग थे।काश्मीर, गोआ, चीन, तिब्बत और नेपाल को लेकर नेहरू से असंतुष्ट थे पटेल !

सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू ने अपना पूरा जीवन कांग्रेस में बिताया था। दोनों ही गांधीजी के निकट सहयोगी माने जाते थे किंतु दोनों के व्यक्तित्व में आकाश और पाताल जैसा अंतर था।

सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
To Purchase this Book Please Click on Image

दोनों ने इंग्लैण्ड में जाकर बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त की किंतु सरदार पटेल वकालात में नेहरू से बहुत आगे थे तथा उन्होंने सम्पूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य के विद्यार्थियों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया। नेहरू प्रायः सोचते रहते थे किंतु पटेल उसे कर डालते थे। नेहरू शास्त्रों के ज्ञाता थे किंतु पटेल शास्त्र और नीति दोनों के ज्ञाता थे। नेहरू केवल भाषणों के माध्यम से विरोधियों को आंख दिखाते थे किंतु पटेल भाषण के साथ-साथ सेनाओं का उपयोग करना भी जानते थे। पटेल ने भी नेहरू जितनी ही ऊँची शिक्षा पाई थी किंतु पटेल में अहंकार नहीं था। वे स्वयं कहते थे कि मैंने कला या विज्ञान के विशाल गगन में ऊंची उड़ानें नहीं भरीं। मेरा विकास कच्ची झौंपड़ियों में गरीब किसान के खेतों की भूमि और शहरों के गंदे मकानों में हुआ है।

पं. नेहरू को गांव की गंदगी तथा जीवन से चिढ़ थी। पं. नेहरू अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के इच्छुक थे तथा समाजवादी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। नेहरू से असंतुष्ट पटेल ने 1950 में नेहरू को पत्र लिखकर उन्हें चीन तथा चीन की तिब्बत नीति के प्रति सावधान किया और चीन के रवैये को कपटपूर्ण तथा विश्वासघाती बताया। पटेल ने अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को भावी शत्रु की भाषा बताया।

सरदार ने लिखा कि तिब्बत पर चीन का कब्जा नई समस्याओं को जन्म देगा। कम्युनिस्टी आभा से ग्रस्त नेहरू ने पटेल की बात नहीं सुनी तथा हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाते रहे। इसका दुष्परिणाम 1962 में भारत को चीन के आक्रमण के रूप में भुगतना पड़ा। 1950 में नेपाल के सदंर्भ में लिखे पत्रों में भी पटेल ने नेहरू की नीति के प्रति अपनी असहमति एवं असंतोष व्यक्त किया।

1950 में गोवा की स्वतंत्रता के सम्बन्ध में चली दो घण्टे की कैबिनेट बैठक में लम्बी वार्त्ता सुनने के बाद पटेल ने नेहरू से केवल इतना ही पूछा, क्या हम गोवा जायेंगे, केवल दो घण्टे की बात है ? नेहरू इससे बड़े नाराज हुए। यदि पटेल की बात मान ली गई होती तो गोवा को अपनी स्वतंत्रता के लिये 1961 तक प्रतीक्षा न करनी पड़ती।

पटेल जहाँ पाकिस्तान की छद्म कार्यवाहियों एवं शत्रुता पूर्ण चालों से सतर्क रहते थे वहीं नेहरू को विघटनकारी तत्वों से भी सावधान करते थे। पटेल, भारत में मुस्लिम लीग तथा कम्युनिस्टों की विभेदकारी तथा रूस के प्रति उनकी राजभक्ति से परिचित थे।

विद्वानों का मत है कि पटेल बिस्मार्क की तरह थे किंतु लंदन के टाइम्स ने लिखा था- बिस्मार्क की सफलताएं पटेल के समक्ष महत्वहीन हैं। यदि जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल के कहने पर चलते तो काश्मीर, चीन, तिब्बत और नेपाल की परिस्थितियां आज जैसी न होतीं। पटेल सही अर्थों में मनु के शासन की कल्पना थे। उनमें कौटिल्य की कूटनीतिज्ञता तथा छत्रपति महाराज शिवाजी जैसी दूरदृष्टि थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति - bharatkaitihas.com

सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व में फंसी कबीर की राम-भक्ति

0
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य - bharatkaitihas.com

काशी नामकरण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

0
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों  तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं— काशी...
तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

0
तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...