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नेहरू की चीन नीति से नाराज थे सरदार पटेल ! (113)

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सरदार पटेल नेहरू की चीन नीति से बुरी तरह नाराज थे। सरदार पटेल को पूर्वाभास था कि एक दिन चीन भारत पर आक्रमण करेगा तथा भारत को बड़ी मुसीबत में डाल देगा किंतु प्रत्यक्ष रूप से समाजवादी तथा परोक्ष रूप से कम्युनिस्ट नेहरू चीन के सम्मोहन में ऐसे बंधे थे कि वे सरदार पटेल की कोई बात सुनने को तैयार नहीं थे। इसलिए पटेल ने नेहरू को एक कड़ा पत्र लिखकर अपनी नाराजगी व्यक्त की।

सरदार पटेल का पत्र

नई दिल्ली, 7 नवंबर 1950

मेरे प्रिय जवाहरलाल,

मेरे अहमदाबाद से लौटने और उसी दिन हुई समिति की बैठक के बाद से, जिसकी जानकारी मुझे उसके शुरू होने से केवल 15 मिनट पहले मिली थी और मुझे अफसोस है कि उस कारण में उससे संबंधित दस्तावेज भी नहीं पढ़ पाया, मैं तिब्बत के बारे में चिन्तित हूं, मैंने सोचा कि मुझे अपने विचार तुम्हारे साथ बांटने चाहिए।

मैंने अपने विदेश मंत्रालय और पीकिंग में हमारे राजदूत तथा उनके जरिए चीनी सरकार के बीच हुए सारे पत्रव्यवहार को पढ़ा है, मैंने इस पत्रव्यवहार को अपने राजदूत तथा चीनी सरकार को अनुकूल ढंग से पढ़कर पेश करने की कोशिश की, परंतु मुझे यह कहते हुए दुःख हो रहा है कि इस अध्ययन के बाद उनमें से कोई भी मेरी आंखों में खरा नहीं उतरा।

चीनी सरकार ने शांति के इरादों का प्रवचन करके हमें धोखा दिया है। मुझे लगता है कि उन्होंने मौका देखकर हमारे राजदूत को शांतिपूर्वक ढंग से तिब्बत की समस्या सुलझाने का झांसा देकर उनके मन में अपनी जगह बना ली थी। निस्संदेह जब यह पत्रव्यवहार चल रहा होगा तब चीनियों ने तिब्बत पर आक्रमण करने की सारी योजना तैयार कर ली होगी। ऐसा लगता है कि चीनी अंत में हमसे विश्वासघात करेंगे।

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सबसे दुःख की बात यह है कि तिब्बतियों ने हम पर विश्वास किया। उन्होंने अपने मार्गदर्शन के लिए हम पर भरोसा किया, हम उन्हें चीनी कूटनीतिक जंजाल या चीनी दुर्भाव से बचाने में असमर्थ रहे। हाल में जन्मी परिस्थितियों को देखकर ऐसा लगता है कि हम दलाई लामा को नहीं बचा पाएंगे। हमारे राजदूत को चीनियों द्वारा अपनाई नीतियों और किए गए कर्मों के स्पष्टीकरण और उसकी सफाई ढूंढने में बहुत कष्ट झेलने पड़े हैं। जैसे कि विदेशी मामलों के मंत्रालय द्वारा भेजे गए एक तार में बताया गया था कि जब चीनी सरकार के समक्ष हमारे दूत ने हमारी ओर से एक या दो मुद्दों पर आपत्ति प्रकट की तो उन्हें उनकी ओर से ढीलापन और फिजूल की माफियां देखने को मिलीं।

क्या कोई भी समझदार व्यक्ति इस बात को मान सकता है कि चीन को तिब्बत में एंग्लो-अमेरीकन गुप्त योजनाओं से किसी तरह का कोई खतरा हो सकता है। इसलिए, यदि चीनी इस बात को सच मानते हैं तो जाहिर सी बात है कि, उन्हें हम पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं होगा और हमें एंग्लो अमेरिकी राजनीति या उनकी योजनाओं की कठपुतली समझते होंगे।

यदि आपके उनके साथ प्रत्यक्ष सम्पर्क के बाद वे हमारे प्रति ऐसा सोचते हैं तो चाहे हम उन्हें अपना जितना गहरा मित्र समझें, वो बेशक हमें अपना दोस्त नहीं मानते। हमें उनकी इस साम्यवादी मनोवृत्ति ‘जो भी उनके साथ नहीं है, उनके खिलाफ है’ को विशेष रूप से ध्यान में रखना होगा।

पिछले कई महीनों से रूसी खेमे से बाहर केवल हम अकेले ही चीन के यूएनओ में दाखिले के लिए और अमेरीकियों से फोरमोसा के मामले में आश्वासन लेने के लिए लड़ रहे हैं। हमने चीनियों की भावनाओं को शांत करने की, उनकी आशंकाओं को कम करने की और अमरीका, ब्रिटेन एवं यूएनओ के साथ हमारी वार्ताओं में उनकी जायज मांगों का समर्थन करने की हर मुमकिन कोशिश की है।

इस सब के बावजूद चीन हमारी अरुचि से सहमत नहीं है, वह हमें शक की नजरों से लगातार देख रहा है और बाहर से देखो तो शक्की मानसिकता साफ दिखाई देती है जिसमें शायद थोड़ी शत्रुता भी मिली हुई है। मुझे नहीं लगता है कि हम चीन को अपने नेक इरादों, अपनी मित्रता और सद्भावना पर विश्वास दिलाने के लिए इससे ज्यादा और कुछ काम कर सकते हैं।

पीकिंग में बैठा हमारा राजदूत जो हमारे इस मैत्रीपूर्ण दृष्टिकोण को उन तक पहुंचाने का सामर्थ्य रखता है, शायद वो भी इस काम में असफल हो गया है। उनके द्वारा भेजा गया आखिरी तार, एक सम्पूर्णतः असभ्य कार्य है, न केवल इसलिए क्योंकि चीनी ताकतों का तिब्बत में प्रवेश हमारे विद्रोह को नकारता है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि हमारा रवैया विदेशी दबाव से प्रभावित है। ये किसी मित्र की नहीं बल्कि हेाने वाले शत्रु की भाषा लगती है।

इसे पृष्ठभूमि में रखते हुए हमें अब, जैसा कि हम जानते थे, तिब्बत के विलुप्त हो जाने से और चीन का हमारे घर के दरवाजे तक विस्तार करने से, हमारे समक्ष खड़ी होने वाली नई परिस्थितियों के बारे में सोचना होगा। पूरे इतिहास में हमें कभी अपनी उत्तरपूर्वी सीमा के बारे में चिंता नहीं करनी पड़ी है; उत्तरी दिशा में स्थित हिमालय पर्वत को सदा अभेद्य माना जाता रहा है; हमारे मित्र ने हमें कभी कोई परेशानी नहीं दी।

चीनी विभाजित हैं। उनकी अपनी आंतरिक समस्याओं के कारण उन्होंने कभी हमें हमारी सीमाओं पर तंग नहीं किया। 1914 में हमने तिब्बत के साथ संधि स्थापित की जिसे चीन की मंजूरी हासिल नहीं थी। हमें लगा कि तिब्बत का स्वशासन इस स्वतंत्र संधि की मान्यता के लिए काफी है।

लेकिन हमें शायद उस पर चीन की मंजूरी भी हस्ताक्षरित करवा लेनी चाहिए थी। शायद चीन के लिए अधिराज्य के मायने कुछ और ही हैं। इसलिए हमें यह मानकर चलना चाहिए कि बहुत जल्द चीनी, तिब्बत और हमारे बीच हुए अनुबन्धों से भी पल्ला झाड़ लेंगे। जिससे तिब्बत के साथ हुए सभी सीमांत और आर्थिक समझौते, जिन पर हम पिछली आधी सदी से काम करते आ रहे हैं, उबलते तेल की हांडी में जा गिरेंगे। चीन अब विभाजित नहीं रहा। वह संयुक्त और शक्तिशाली हो गया है।

उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशा में हिमालय के साथ साथ सरहद के इस पार हमारी ऐसी आबादी है जो जातीय रूप से तिब्बतियों और मंगोलों से ज्यादा अलग नहीं है। अपरिभाषित सीमाओं और हमारी तरफ की आबादी की तिब्बतियों और चीनियों से समरूपता, आने वाले समय में चीन और हमारे बीच संकट पैदा कर सकती है।

अर्वाचीन और कड़वा इतिहास हमें यह सीख देता है कि साम्यवाद, साम्राज्यवाद से बचने की ढाल नहीं है और साम्यवादी भी साम्राज्यवादियों या अन्य किसी और की भी भांति उतने ही अच्छे या बुरे हैं। चीन केवल हिमालय पर्वत के इस पार के हिस्से में नहीं बल्कि असम के महत्वपूर्ण हिस्सों में भी दिलचस्पी रखता है।

चीनियों की तो बर्मा पर नजर है; बर्मा की मुश्किल यह है कि उसके पास तो मैक मोहन लाइन भी नहीं, जिसके इर्द गिर्द वह कोई समझौता तैयार कर सके। चीनियों की अधिग्रहण नीति और साम्यवादियों का साम्राज्यवाद पश्चिमी ताकतों के विस्तारवाद या साम्राज्यवाद से भिन्न है।

पहले के पास विचारधारा का वह चोगा है जो इसे दस गुना और खतरनाक बना देता है। विचारधारा के विस्तार के पीछे जातीय, राष्ट्रीय और ऐतिहासिक दावे छिपे हैं। इसलिए, उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशाओं से आने वाला खतरा दोनों, साम्यवादी भी है और साम्राज्यवादी भी। जहां, हमारी सुरक्षा को पहले ही पश्चिम और उत्तरपश्चिमी दिशाएं ललकार रही थीं, अब उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशाओं से हमारे लिए नया खतरा पैदा हो गया है।

इसलिए सदियों में पहली बार भारत को एक ही समय पर दो भिन्न दिशाओं में अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए खुद को एकत्रित करना होगा। अब तक हम पाकिस्तान को ध्यान में रखते हुए, जो हम से दुर्बल है, अपनी सुरक्षा योजनाएं तैयार करते आए हैं। अब हमें उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशा में बसे साम्यवादी चीन को ध्यान में रखते हुए तैयारियां करनी होंगी, एक ऐसा साम्यवादी चीन जिसके निश्चित लक्ष्य और उद्देश्य हैं और जिसके मन में किसी भी हाल में हमारे प्रति मित्रता की भावना दिखाई नहीं देती।

इस सम्भावित तकलीफदेह सीमा की राजनैतिक परिस्थितियों पर भी हमें विचार कर लेना चाहिए। हमारी उत्तर और उत्तरपूर्वी सीमाओं में नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र बसे हैं। संचारण के हिसाब से ये सभी इलाके बहुत कमजोर हैं। इनमें लगातार रक्षात्मक रेखाएं नहीं बनाई गई हैं।

यहां से घुसपैठ करना बहुत आसान काम है। बहुत कम गलियारों में पुलिस सुरक्षा मौजूद हैं। जो चौकियाँ हैं, उन सब में भी हमारे सैनिक तैनात नहीं हैं। इन क्षेत्रों के साथ अपने सम्पर्क को हम किसी भी हाल में नजदीकी नहीं कह सकते। यहां पर रहने वाले लोग भारत के प्रति कोई विशेष निष्ठा भाव नहीं रखते।

दार्जिलिंग तथा कैलिंगपौंग क्षेत्रों में भी मंगोली प्रभाव साफ देखा जा सकता है। पिछले तीन वर्षों में हम नागा या असम की किसी भी अन्य पहाड़ी आदिवासी जाति की ओर कोई विशेष प्रशंसनीयस कदम नहीं बढ़ा सके हैं। यूरोपीय धर्मप्रचारक एवं अन्य अतिथि इन जातियों के सम्पर्क में अवश्य रहे हैं लेकिन इनका प्रभाव भारत के अनुकूल हरगिज नहीं था। कुछ समय पहले सिक्किम में कुछ राजनैतिक उत्तेजना हुई थी। हो सकता है कि वहां असंतुष्टि की भावना अभी भी सुलग रही हो।

बाकियों की तुलना में भूटान थोड़ा शांत है लेकिन तिब्बती लोगों के साथ उसकी नजदीकियां हानिकारक हो सकती हैं। नेपाल में बल शक्ति पर आधारित, अल्पतंत्रीय शासन चल रहा है; यह वहां के उग्र नागरिकों तथा आधुनिक जमाने के प्रबुद्ध विचारों के बीच टकराव है। ऐसी परिस्थिति में लोगों को खतरे का अहसास दिलाना या उन्हें रक्षात्मक तौर पर दृढ़ बनाना एक बहुत मुश्किल कार्य है और इस

मुश्किल को आसान करने का एकमात्र रास्ता है प्रबुद्ध दृढ़ता, ताकत और स्पष्ट नीतियां। मुझे पूर्ण विश्वास है कि चीनी और उनकी प्रेरणा के स्रोत सोवियत रूस, इन कमजोर कड़ियों का फायदा उठाने में कभी नहीं चूकेंगे, कुछ हद तक उनकी विचारधाराओं के समर्थन में और कुछ हद तक उनके लक्ष्यों के समर्थन में।

मेरे विचार में ऐसी परिस्थिति में हम न तो नमनशील हो सकते हैं और न ही ढुलमुल सकते हैं। हमें न केवल अपने लक्ष्यों को स्पष्टतः साध लेना चाहिए परंतु उन तक पहुंचने के रास्तों को भी अच्छी तरह पहचान लेना चाहिए। हमारे द्वारा की गई छोटी सी गलती लक्ष्यों के चुनाव में या फिर उन्हें कार्यान्वित करने हेतु लिए जाने वाले निर्णयों में से किसी तरह की ढील, हमें कमजोर बना देगी और हमारे सामने खड़ी साफ दिखाई दे रही धमकियों को और विशाल कर देगी।

इन बाहरी खतरों के साथ साथ हमें अब आतंरिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ेगा। मैंने पहले ही (एचवीआर) अयंगर को विदेश मंत्रालय को इन मामलों पर आसूचना विभाग की समीक्षा रिपोर्ट की एक नकल भिजवा देने के निर्देश दिए हैं। अब तक भारतीय साम्यवादी पार्टी को बाहरी देशों में साम्यवादियों से सम्पर्क साधने में या उनसे हथियार या कागज पत्री आदि की सप्लाई लेने में थोड़ी मुश्किल हो रही थी।

उन्हें इस काम के लिए पूर्व दिशा में स्थित कठिन बर्मी या पाकिस्तानी सीमाओं को प्रयोग में लाना पड़ रहा था या लंबे समुद्र तटों का सहारा लेना पड़ रहा था। अब इनके पास चीनी साम्यवादियों तक पहुंचने का एक आसान रास्ता उपलब्ध हो जाएगा, जिनके जरिए ये आराम से अन्य विदेशी साम्यवादियों तक भी पहुँच पाएंगे। गुप्तचरों, पांचवे स्तम्भ लेखकों एवं साम्यवादियों की घुसपैठ एक आम और आसान बात बन जाएगी। तेलंगाना और वारंगल में कहीं कहीं स्थित साम्यवादियों से निपटने की जगह हमें शायद अपनी

उत्तरी और उत्तरपूर्वी सीमा के साथ बसी साम्यवादी चुनौतियों से भी जूझना होगा, अपनी गोला बारूद की सप्लाई के लिए वे सुरक्षित रूप से चीन में साम्यवादी आयुधशालाओं पर निर्भर कर सकते हैं। इस तरह, ये सारी परिस्थितियां हमारे सामने ऐसी मुश्किलें लेकर आई हैं जिन पर हमें तुरंत कोई निर्णय लेना होगा ताकि, जैसा मैंने पहले भी कहा था, हम अपनी नीतियों के उद्देश्य तय करके उनकी उपलब्धि का रास्ता इख्तियार कर सकें।

यह भी स्पष्ट है कि हमारे द्वारा एक ऐसा व्यापक कदम उठाना चाहिए जिसमें न केवल हमारी रक्षात्मक नीति और तैयारी की स्थिति सम्मिलित हो बल्कि आतंरिक सुरक्षा की समस्या भी, जिससे हमें बिना एक क्षण बर्बाद किए निपटना चाहिए। हमें सीमा के कमजोर इलाकों में प्रशासनिक एवं राजनैतिक समस्याओं से भी निपटना होगा जिनका मैं पहले भी जिक्र कर चुका हूँ।

बेशक, मेरे लिए इन सभी समस्याओं का विस्तृत विवरण करना तो संभव नहीं होगा लेकिन फिर भी मैं नीचे कुछ ऐसी समस्याओं के बारे में बात करने जा रहा हूँ, मेरे विचार में जिनका समाधान बहुत जल्द हो जाना चाहिए और जिनके इर्द गिर्द ही हमें अपनी प्रशासनिक तथा सैनिक नीतियां तैयार करके इन्हें लागू करने की योजना बनानी चाहिए।

ए) भारतीय सीमाओं एवं आतंरिक सुरक्षा की चीनी चुनौतियों से होने वाले खतरे का आसूचना एवं सैन्य आकलन।

बी) अपने सैन्य दलों की स्थिति का निरीक्षण और उनकी आवश्यक पुनः तैनाती, विशेष तौर पर उन क्षेत्रों एवं रास्तों की सुरक्षा को लेकर जिन पर भविष्य में विवादों की सम्भावना है।

सी) अपने सुरक्षा दलों की ताकतों का मूल्यांकन और इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सेना की कटौती योजना पर पुनः विचार।

डी) हमारी रक्षात्मक आवश्यकताओं पर चिरस्थाई सोच विचार। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम बंदूकों, गोलाबारूद तथा कवचित सप्लाई पर विशेष ध्यान नहीं देंगे तो हमारी रक्षात्मक स्थिति लगातार कमजोर पड़ती जाएगी और हम पश्चिम एवं उत्तरपश्चिम तथा उत्तर एवं उत्तरपूर्वी दिशाओं से आने वाली दोहरी चुनौतियों के खतरों से लड़ने के योग्य नहीं रहेंगे।

इ) जहां तक चीन के यूएनओ में प्रवेश का सवाल है, चीन से हमें मिले दो टूक जवाब और उनके तिब्बत की ओर रवैये को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि हमें और देर तक उनके दावों का समर्थन करना चाहिए। चीन की कोरीयन युद्ध में सक्रिय हिस्सेदारी को देखते हुए यूएनओ में शायद उन्हें बहिष्कृत करने का अप्रत्यक्ष खतरा होगा। हमें इस समस्या पर भी अपना रुख निर्धारित कर लेना चाहिए।

एफ) अपनी उत्तरी एवं उत्तरपूर्वी सीमाओं को मजबूत करने के लिए हमारे द्वारा उठाए जाने वाले राजनैतिक एवं प्रशासनिक कदम। इसमें सम्पूर्ण सीमा सम्मिलित होगी यानि कि नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र।

जी) सीमा क्षेत्रों तथा उनके बगल में बसे क्षेत्रों जैसे कि यूपी, बिहार, बंगाल एवं असम की आंतरिक सुरक्षा के उपाय।

एच) इन क्षेत्रों तथा सेनाओं पर तैनात फौजी चौकियों के लिए सड़क, रेल, हवाई और बेतार संचारण विकास।

आई) सीमा चौकियों की सुरक्षा एवं उनकी आसूचना।

जे) ल्हासा तथा यांग्त्से और यतुंग की व्यापार चौकियों में हमारे मिशन का भविष्य और इन रास्तों की सुरक्षा के लिए तिब्बत में काम कर रहे हमारे रक्षा दल।

के) मैकमोहन रेखा के संबंध में हमारी नीति।

ये कुछ सवाल मेरे मन में उमड़कर मुझे परेशान करते हैं। हो सकता है कि इन मसलों पर सोचविचार हमें चीन, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन तथा बर्मा के साथ हमारे संबंधों के व्यापक प्रश्नों की ओर ले जाए। वैसे तो ये सब सवाल आम ही हैं लेकिन इनमें से कुछ एक प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण भी हो सकते हैं। जैसे कि हो सकता है हमें इस बात पर विचार करना पड़े कि क्या हमें बर्मा से हमारे संबंध घनिष्ठ करके उन्हें चीन से निपटने के लिए दृढ़ता मुहैया करवानी चाहिए।

मुझे लगता है कि हम पर दबाव डालने से पहले चीन, बर्मा पर दबाव डालने की कोशिश करेगा। चीन के साथ लगती सीमाएं पूरी तरह अपरिभाषित हैं, जिससे चीन, सीमा पर ठोस दावे कर सकता है। मौजूदा स्थिति में बर्मा चीन के लिए एक सरल मुश्किल पैदा करके हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकता है।

मेरा सुझाव है कि हमें जल्दी मिलकर इन समस्याओं पर व्यापक सोच विचार कर लेना चाहिए और तुरंत उठाए जाने वाले आवश्यक कदमों पर भी निर्णय ले लेना चाहिए और इसके साथ ही अन्य समस्याओं पर भी फुर्तीली नजर दौड़ाते हुए उनसे निपटने के लिए आवश्यक कदमों पर फैसला ले लेना चाहिए।

आपका
वल्लभभाई

उपरोक्त पत्र से स्पष्ट है कि सरदार पटेल को नेहरू की चीन नीति बिल्कुल पसंद थी। पटेल की मृत्यु के लगभग 12 साल बाद पटेल की यह भविष्यवाणी सही हुई कि नेहरू की चीन नीति बिल्कुल गलत थी।

वायुयान दुर्घटना ने देश को चिंता में डाल दिया (114)

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वायुयान दुर्घटना ने देश को चिंता में डाल दिया

यह घटना उन दिनों की है जब सरदार पटेल को राजस्थान नामक नवीन प्रादेशिक इकाई का उद्घाटन करने के लिए दिल्ली से जयपुर जाना था। जयपुर से कुछ पहले ही विमान खराब हो गया। पूरे देश में वायुयान दुर्घटना के समाचार फैल गए जिन्होंने देश को चिंता में डाल दिया!

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29 मार्च 1949 को सरदार पटेल अपनी पुत्री मणिबेन तथा यादवेंद्र सिंह के साथ दिल्ली से वायुयान से राजस्थान के लिये रवाना हुए। बीच मार्ग में इंजन में खराबी आ गई तथा प्लेन का सम्पर्क रेडियो से कट गया। इस पर विमान में बैठे जोधपुर नरेश हनवंतसिंह ने विमान को अपने अधिकार में लेकर एक सूखी नदी में उतार दिया। इससे वायुयान दुर्घटना टल गई। सरदार पटेल के प्राण बच गए और वे सड़क मार्ग से जयपुर पहुंच कर राजस्थान का उद्घाटन कर सके। जब पटेल वापस दिल्ली लौटे तो सैंकड़ों देशवासियों ने हवाई अड्डे पर उनका भव्य स्वागत किया। संसद में सांसदों ने पटेल का अभूतपूर्व स्वागत किया। उनके सम्मान में आधे घण्टे तक संसद की कार्यवाही रोक दी गई। पटेल को पंजाब विश्वविद्यालय तथा उस्मानिया विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ लॉ की मानद उपाधि दी गई। जोधपुर नरेश हनवंतसिंह के इस योगदान के लिए देश उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहेगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पटेल का अंतिम संस्कार आम आदमी की तरह किया गया ! (115)

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पटेल का अंतिम संस्कार आम आदमी की तरह किया गया

सरदार पटेल जन-जन के नेता थे। उनकी अंतिम यात्रा में बहुत बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हुए किंतु सरदार पटेल का अंतिम संस्कार आम आदमी की तरह किया गया!

1950 की गर्मियों में पटेल का स्वास्थ्य तेजी से गिरा। उनकी खांसी में खून आने लगा। मणिबेन ने पटेल की बैठकों तथा कार्य-घण्टों की संख्या कम कर दी तथा पटेल के स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिये व्यक्तिगत मेडिकल स्टाफ नियुक्त किया गया।

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पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बिधानरॉय जो कि डॉक्टर भी थे, को ज्ञात हुआ कि पटेल अब अपनी मृत्यु के निकट होने को लेकर मजाक कर रहे हैं तथा उन्होंने अपने साथी मंत्री एन.वी. गाडगिल के समक्ष यह कहा है कि अब वे अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहेंगे। 2 नवम्बर 1950 को पटेल का स्वास्थ्य अत्यंत खराब हो गया। वे बार-बार बेहोश होने लगे। 12 दिसम्बर 1950 को उन्हें दिल्ली ले जाया गया। उस दिन नेहरू, राजगोपालाचारी, राजेन्द्र प्रसाद तथा मेनन दिल्ली एयरपोर्ट पर उन्हें विदा देने आये। पटेल बहुत कमजोर हो चुके थे। उन्हें कुर्सी सहित ही विमान में चढ़ाया गया। बम्बई में सांताक्रूज हवाई अड्डे पर विशाल जन समूह उनके स्वागत के लिये खड़ा था। पटेल को तनाव से बचाने के लिये जूहू हवाई अड्डे पर उतारा गया। यहाँ मुख्यमंत्री बी. जीत्र खेर तथा मोरारजी देसाई ने उनका स्वागत किया। बम्बई के राज्यपाल की कार उन्हें लेने आई थी जिससे वे बिड़ला हाउस पहुंचे। 15 दिसम्बर 1950 को उन्हें दूसरी बार तीव्र हृदयाघात हुआ तथा उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के अगले दिन भारतीय नागरिक सेवाओं तथा भारतीय पुलिस सेवा के डेढ़ हजार से अधिक अधिकारियों ने पटेल के दिल्ली स्थित निवास पर उपस्थित होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने भारत माता के प्रति पूर्ण स्वामिभक्ति की शपथ ग्रहण की।

भारत के इतिहास में ऐसा दृश्य इससे पहले कभी नहीं देखा गया। बम्बई सरकार ने गिरगाम चौपाटी पर उनका अंतिम संस्कार करने की योजना बनाई किंतु मणिबेन ने कहा कि सरदार की इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार सामान्य आदमी की तरह सोनापुर में किया जाये।

अब इस स्थान को मैरीन लाइन्स कहा जाता है। इसी स्थान पर पटेल के भाई का तथा पटेल की पत्नी का अंतिम संस्कार किया गया था। उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिये दस लाख लोग आये। प्रधानमंत्री नेहरू, राजगोपालाचारी तथा राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भी उपस्थित रहे। उनकी मृत्यु पर मैनचैस्टर गार्जियन ने लिखा था कि एक ही व्यक्ति विद्रोही और राजनेता के रूप में कभी-कभी ही सफल होता है परन्तु पटेल इस सम्बन्ध में अपवाद थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वल्लभभाई विष्णुगुप्त चाणक्य तथा समुद्रगुप्त की तरह राष्ट्र निर्माता थे ! (116)

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वल्लभभाई

भारत के विभाजन के समय, वल्लभभाई पटेल पर हिन्दुओं का पक्ष लेने तथा साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया गया। मौलाना आजाद ने अपनी पुस्तक में पटेल की बहुत आलोचना की है।

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हिन्दू राष्ट्रवादी शक्तियां भी वल्लभभाई पर भारत का विभाजन स्वीकारने में जल्दबाजी करने का आरोप लगाती रही हैं। सुभाषचंद्र बोस के पक्षधर सरदार पटेल पर यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने जीवन भर गांधी का पक्ष लिया तथा गांधी के विरोधियों को कमजोर करने का काम किया। समाजवादी नेता जयप्रकाश तथा अशोक मेहता ने वल्लभभाई पटेल पर आरोप लगाया है कि वे भारतीय उद्योपतियों विशेषकर बिड़ला परिवार तथा साराभाई परिवार का व्यक्तिशः पक्ष लेते थे। कुछ इतिहासकारों ने उन पर आरोप लगाया है कि उन्होंने देशी राज्यों का एकीकरण करने के लिये, देशी राज्यों को स्व-विवेक एवं स्व-इच्छा से काम नहीं लेने दिया। इतिहास गवाह है कि वल्लभभाई पटेल पर लगाये गये समस्त आरोप निराधार हैं। भारत के एकीकरण एवं देशी राज्यों के एकीकरण के लिये यह देश पटेल का उतना ही ऋणी है जितना कि विष्णुगुप्त चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य तथा समुद्रगुप्त का। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा जे.आर.डी. टाटा का मानना था कि नेहरू की बजाय पटेल अच्छे प्रधानमंत्री सिद्ध होते। वे भारत के सफलतम गृहमंत्री थे। जनवरी 1947 के अंक में टाइम मैगजीन ने उनका चित्र अपने कवर पेज पर मुद्रित किया।

वल्लभभाई की मृत्यु पर मैनचैस्टर गार्जियन ने लिखा था कि एक ही व्यक्ति विद्रोही और राजनेता के रूप में कभी-कभी ही सफल होता है परन्तु पटेल इस सम्बन्ध में अपवाद थे। पटेल की मृत्यु के बाद वर्षों तक सरकार ने पटेल के बारे में न तो कोई साहित्य प्रकाशित किया न उनकी स्मृति में कोई आयोजन किये। 1980 में अहमदाबाद में सरदार पटेल राष्ट्रीय स्मारक की स्थापना की गई। 1991 में उन्हें भारत रत्न दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

प्राक्कथन – मुगल कालीन भवन

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प्राक्कथन - मुगल कालीन भवन

प्राक्कथन – मुगल कालीन भवन पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक भारत के मुगलकालीन प्रमुख भवन पुस्तक की भूमिका दी गई है। यह पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है।

वास्तुकला को समस्त कलाओं की रानी कहा जाता है। इसलिए यह कहावत भी है कि ‘संसार में दो ही चीजें जीवित रहती हैं, या तो गीत या फिर भीत।’ अर्थात् संसार में साहित्य एवं भवन ही चिरस्थाई रहते हैं।

भारत में वास्तुकला का विकास उस समय ही होने लगा था जब अधिकांश दुनिया में जंगल स्थित थे और विश्व में बहुत कम सभ्यताएं प्रकाश में आई थीं। यही कारण था कि आठवीं शताब्दी ईस्वी में जब भारत पर मुस्लिम आक्रमण आरम्भ हुए, उस समय से बहुत पहले ही भारत में बड़ी संख्या में विशाल और भव्य भवन बन चुके थे जिनकी होड़ अन्य देशों में स्थित बहुत कम भवन कर सकते थे।

खलीफाओं, तुर्क आक्रांताओं एवं मंगोलों की सेनाओं ने भारत के हजारों विशाल एवं बहुमूल्य भवनों को तोड़कर नष्ट कर दिया तथा उनमें मेहराबों, गुम्बदों, मीनारों एवं आयत लिखी शिलाओं को लगाकर उन्हें मुसलमानों द्वारा निर्मित इमारत घोषित किया।

दिल्ली का विष्णु-स्तम्भ (अब कुतुबमीनार) एवं विष्णु मंदिर (अब जामा मस्जिद), अध्योया का मंदिर-जन्मस्थानम् (बाद में मस्जिद-जन्मस्थान), अजमेर का विष्णु मंदिर (अब ढाई दिन का झौंपड़ा), धार का सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर (अब कमलमौला मस्जिद), वाराणसी का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर, जालोर का विष्णु मंदिर एवं संस्कृत पाठशाला (तोपखाना मस्जिद) ऐसे ही अनुपम भवन थे जो मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा नष्ट-भ्रष्ट करके मस्जिदों में बदल दिए गए।

नगरकोट का प्राचीन वज्रेश्वरी देवी मंदिर, काठियावाड़ (गुजरात) का सोमनाथ महालय, अनंतनाग (कश्मीर) का मार्तण्ड सूर्य मंदिर, पाटन (गुजरात) का मोढेरा सूर्य मंदिर, हम्पी (कर्नाटक) के मंदिर, पाटन (गुजरात) का रुद्र महालय, वृंदावन (उत्तर प्रदेश) का मदन मोहन मंदिर एवं केशवराय मंदिर, मदुरै (तमिलनाडु) का मीनाक्षी मंदिर, जालोर जिले के सेवाड़ा शिवालय आदि सैंकड़ों ऐसे मंदिर थे जो मुसलमानों ने भंग कर दिए अथवा उन्हें गंभीर क्षति पहुंचाई।

भारतीय भवनों का यह विध्वंस दिल्ली सल्तनत-काल  एवं मुगल सल्तनत-काल में निरंतर जारी रहा किंतु मुगलों ने जहाँ एक ओर मंदिरों को तोड़कर नष्ट किया वहीं नवीन महलों, मकबरों, मस्जिदों, उद्यानों आदि का निर्माण भी किया। विदेशी इतिहासकारों के अनुसार मुगल शासन की स्थापना के साथ ही भारतीय वास्तुकला के इतिहास में एक नवीन युग की शुरुआत हुई। पर्सी ब्राउन ने ‘मुगलकाल को भारतीय वास्तुकला की ग्रीष्म ऋतु’ माना है जो प्रकाश और ऊर्वरा शक्ति का प्रतीक होती है।

मुगल युग की वास्तुकला के सर्वांगीण विकास का कारण मुगलों में शानो-शौकत के प्रदर्शन की प्रवृत्ति, शिल्प आदि कलाओं के प्रति उनकी अभिरुचि, राजकोष की समृद्धि तथा संसाधनों की विपुल उपलब्धता माना जाता है। बाबर से लेकर औरंगजेब तक के मुगल शासकों ने भारत में कई महत्वपूर्ण भवन बनवाए तथा अनेक हिन्दू भवनों को मुगल शैली में ढाला।

  मुगल काल में न केवल बादशाहों ने अपितु उनकी बेगमों, वजीरों, शहजादों, शहजादियों तथा अन्य लोगों ने भी बड़ी संख्या में छोटे-बड़े भवन बनाए थे जिनकी संख्या का पता लगाना संभव नहीं है। उनमें से बहुत से भवन एवं उद्यान अब काल के गाल में समा चुके हैं तथा बहुत कम भवन ही अपनी गवाही स्वयं देने के लिए उपलब्ध हैं। ये भवन भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान तथा बांगलादेश आदि देशों में मिलते हैं। मुगलकाल में ये समस्त क्षेत्र भारत के ही अंग थे। इसलिए इस पुस्तक में वहाँ के भी प्रमुख मुगल भवनों को सम्मिलित किया गया है।

भारत के समस्त मुगल कालीन भवनों का वर्णन करना संभव नहीं है। इसलिए इस ग्रंथ में मुगल काल में बने प्रमुख भवनों के इतिहास एवं स्थापत्य सम्बन्धी विशेषताओं को लिखा गया है। पुस्तक के अंत में पाठकों की सुविधा के लिए मुगलों के शासन-काल में विध्वंस किए गए हिन्दू-स्थापत्य की भी संक्षिप्त जानकारी दी गई है ताकि पाठकों को उस युग की स्थापत्य सम्बन्धी प्रवृत्तियों की वास्तविक तस्वीर के दर्शन हो सकें।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगल स्थापत्य शैली

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मुगल स्थापत्य शैली

भारत में मुगल स्थापत्य शैली का प्रवेश बाबर की दिल्ली सल्तनत पर विजय के बाद हुआ। बाबर एवं हुमायूं के काल में मुगल स्थापत्य शैली का विकास नहीं हो सका।

भारत में मुगलों ने एक नवीन इस्लामी राज्य की स्थापना की जो सभ्यता एवं संस्कृति के स्तर पर अपने पूर्ववर्ती ‘दिल्ली सल्तनत’ से पूर्णतः भिन्न था। भारत का मुगल साम्राज्य ‘इस्लामी-तुर्की-मंगोल’ साम्राज्य था जिसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि भारत के मुगल शासकों में मध्य एवं पूर्वी एशिया की दो बड़ी क्रूर एवं लड़ाका जातियों- तुर्क एवं मंगोलों के रक्त का मिश्रण था और वे इस्लाम के अनुयायी थे।

मंगोल जाति अत्यंत प्राचीन काल में चीन में अर्गुन नदी के पूर्व के इलाकों में रहा करती थी, बाद में वह बाह्य ख़िन्गन पर्वत शृंखला और अल्ताई पर्वत शृंखला के बीच स्थित मंगोलिया पठार के आर-पार फैल गई। युद्धप्रिय मंगोल जाति ख़ानाबदोशों का जीवन व्यतीत करती थी और शिकार, तीरंदाजी एवं घुड़सवारी करने में बहुत कुशल थी।

भारत पर मंगोलों के आक्रमण

12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मंगोलों के मुखिया ‘तेमूचीन’ ने बड़ी संख्या में बिखरे हुए मंगोल-कबीलों को एकत्र किया और स्वयं उनका नेता बन गया। वह इतिहास में चंगेज़ ख़ान के नाम से जाना गया। इसके बाद मंगोल मध्य एशिया तक बढ़ आए और उनका सामना मुस्लिम-तुर्कों से हुआ। ई.1221 में मंगोलों ने चंगेजखाँ के नेतृत्व में भारत पर पहला बड़ा आक्रमण किया किंतु तब तक भारत में मध्य एशियाई तुर्क अपना शासन जमा चुके थे। उस काल में मंगोल इस्लाम के सबसे बड़े शत्रु थे।

इसलिए वे पूरे तीन सौ साल तक भारत पर आक्रमण करते रहे और भारी रक्तपात एवं बरबादी मचाकर पुनः मध्य ऐशिया को भागते रहे। ई.1221 से लेकर ई.1526 तक मंगोल आक्रमणकारियों की कई लहरें भारत में आईं। इस दौरान वे विदेशी आक्रांता बने रहे। वे नृशंस हत्याओं, भयानक आगजनी तथा क्रूरतम विध्वंस के लिये कुख्यात थे।

मुगल स्थापत्य का वास्तविक काल

ई.1526 में मंगोल-वंशी बाबर भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने में सफल हो गया। भारत में बाबर तथा उसके वंशज ‘मुगलों’ के नाम से जाने गए। बाबर के वंशज थोड़े बहुत व्यवधानों के साथ ई.1526 से ई.1765 तक भारत के न्यूनाधिक क्षेत्रों पर शासन करते रहे। ई.1765 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) से इलाहाबाद की संधि की जिसके तहत मुगल बादशाह को 26 लाख रुपए की पेंशन देकर शासन के कार्य से अलग कर दिया गया।

बाबर के वंशजों में हुमायूँ, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब ही प्रभावशाली शासक हुए तथा उनके समय देश में कई प्रकार के विशाल भवनों का निर्माण हुआ। इनमें से भी औरंगजेब ने अपने शासनकाल ई.1658 से ई.1707 तक बहुत कम भवन बनवाए।

अतः मुगलों के स्थापत्य का वास्तविक इतिहास बाबर से आरम्भ होकर शाहजहाँ तक अर्थात् ई.1526 से लेकर ई.1658 तक समाप्त हो जाता है। इतिहास की दृष्टि से यह कालखण्ड बहुत बड़ा नहीं होता किंतु उस काल में बहुत बड़ी संख्या में बने भवन, भारत में मुगल शासन के इतिहास को जीवित रखे हुए हैं।

फारसी और भारतीय मिश्रण से बनी मुगल स्थापत्य शैली

मुगल अपने साथ स्थापत्य कला की कोई विशिष्ट शैली लेकर नहीं आए थे। उनकी स्मृतियों में समरकंद के मेहराबदार भवन, ऊँचे गुम्बद, बड़े दालान, कोनों पर बनी पतली और ऊँची मीनारें तथा विशाल बागीचे थे। उन्हीं स्मृतियों को मुगलों ने हिन्दू, तुर्की एवं फारसी वास्तुकला में थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ मिला दिया। इन सबके मिश्रण से जो स्थापत्य शैली सामने आई उसे मुगल स्थापत्य शैली कहा गया।

हालांकि मुगलों के स्थापत्य की सभी प्रमुख विशेषताएं यथा तिकोने या गोल मेहराब (।तबी), पतली और लम्बी मीनारें, झरोखेदार बुर्ज और गोलाकार गुम्बद पहले से ही तुर्कों के स्थापत्य में समाहित थे। अंतर केवल इतना था कि मुगलों के मेहराब, मीनारें, बुर्ज और गुम्बद पहले की अपेक्षा अधिक बड़े, कीमती पत्थरों से युक्त एवं हिन्दू तथा फारसी विशेषताओं को समेटे हुए थे। मुगल-इमारतों के भीतर विशाल कक्षों का एवं बाहर सुंदर एवं विशाल उद्यानों का निर्माण किया गया।

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दिल्ली सल्तनत के तुर्की सुल्तानों द्वारा निर्मित भवनों के स्थापत्य को मुगलों के स्थापत्य से भिन्न करने के लिए कहा जा सकता है कि तुर्की सुल्तानों के भवनों में पुरुषोचित दृढ़ता का समावेश है जबकि मुगलों के स्थापत्य में स्त्रियोचित-स्थापत्य-सौंदर्य के दर्शन होते हैं। मुगल वास्तुकला की तुलना मुगलों के काल में भारत में विकसित उर्दू भाषा से की जा सकती है। उर्दू अपने आप में कोई भाषा नहीं है, अपितु मुगलों के सैनिक स्कंधावरों में तैयार हुई विभिन्न भाषाओं का मिश्रण है। मुगलों की सेना में अरब, फारस, उजबेकिस्तान, अफगानिस्तान, तूरान, मकरान, ईरान और भारत आदि देशों के सैनिक भर्ती होते थे। वे सब अपने-अपने देश की भाषा बोलते थे। लम्बे समय तक साथ रहने के कारण वे एक दूसरे की भाषा को समझने लगे और उनकी भाषा में विदेशी भाषाओं के शब्दों का समावेश होने लगा। इस प्रकार उर्दू भाषा तैयार हो गई। यही स्थिति मुगलों के स्थापत्य की थी जिसमें फारसी, तुर्की, अरबी, उजबेकी तथा भारतीय स्थापत्य शैलियां मिश्रित होकर एक नए रूप में सामने आई थीं। इसलिए मुगलों की स्थापत्य शैली को ‘इण्डो सारसेनिक शैली’ भी कहा जाता है।

मुगल स्थापत्य शैली की विशेषताएँ

भारत में बने मुगल भवनों के स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-

(1.) विशालाकाय प्याज के आकार के गुम्बद जिनके चारों तरफ चार छोटे गुम्बद बने हुए हों।

(2.) इमारतों में लाल बलुआ पत्थर एवं सफेद संगमरमर का उपयोग।

(3.) पत्थरों पर नाजुक सजावटी अलंकरण, दीवारों के बाहरी एवं भीतरी हिस्सों पर पच्चीकारी एवं दीवारों और खिड़कियों में पत्थरों की अलंकृत जालियों का उपयोग।

(4.) मस्जिदों, मकबरों एवं महलों की भीतरी दीवारों पर फ्रैस्को अर्थात् भित्तिचित्रों का निर्माण।

(5.) चारों ओर उद्यान से घिरे हुए स्मारक भवनों का निर्माण।

(6.) विशाल सहन सहित मस्जिदों का निर्माण।

(7.) फारसी एवं अरबी के अलंकृत शिलालेख, कुरान की आयतों का कलात्मक लेखन।

(8.) भवन परिसर के विशाल मेहराब युक्त मुख्य द्वारों का निर्माण।

(9.) दो तरफ या चार तरफ ईवान का निर्माण।

(10.) भवनों की छतों पर कलात्मक बुर्ज एवं छतरियों का निर्माण।

(11.) भवन के चारों ओर लम्बी एवं पतली मीनारों का निर्माण।

(12.) मुगल शैली में स्थानीय शैलियों के मिश्रण से उप-मुगल शैलियों का निर्माण यथा- राजपूत स्थापत्य शैली, सिक्ख स्थापत्य शैली, इण्डो सारसैनिक स्थापत्य शैली, ब्रिटिश राज स्थापत्य शैली।

मुगल स्थापत्य शैली के सम्बन्ध में विदेशी विद्वानों के मत

बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि मुगल स्थापत्य शैली में भारतीय स्थापत्य की प्रधानता है। हेवेल ने लिखा है- ‘मुगल शैली विदेशी तथा देशी शैलियों का सम्मिश्रण प्रदर्शित करती है। भारतीय शैली अनुपम थी और उसमें विदेशी तत्त्वों को मिलाने की अलौकिक शक्ति थी।’

सर जान मार्शल ने लिखा है- ‘मुगल शैली के विषय में यह निश्चय करना कठिन है कि उस पर किन तत्त्वों का प्रभाव अधिक था।’ 

फर्ग्यूसन तथा कुछ अन्य विद्वानों का विश्वास है कि ‘मुगल कला, पूर्व-मुगलकाल की कला का परिवर्तित और विकसित रूप थी।’ अर्थात् भारतीय कला को विदेशी कला से प्रेरणा प्राप्त हुई थी और विदेशी कला ने भारतीय कला को प्रभावित किया था।

ऑपस ड्यूरा से पीट्रा ड्यूरा

भारत में मुगलों के आने से पहले के मुस्लिम भवनों की सजावट ‘ऑपस ड्यूरा’ शैली में की जाती थी। इस शैली में पत्थर के ऊपर रंगों से डिजाइन, या ज्यामितीय आकृतियां अथवा कुरान की आयतें लिखी जाती थीं किंतु हुमायूँ के काल से मुगल भवनों के बाहर बनने वाले ईवान तथा मेहराब और भवन की भीतरी दीवारों पर ‘पीट्रा ड्यूरा’ शैली की सजावट का प्रयोग किया जाने लगा।

पीट्रा ड्यूरा को दक्षिण एशिया में पर्चिनकारी तथा हिन्दी में पच्चीकारी कहा जाता है। पीट्रा ड्यूरा एक विशिष्ट प्रकार की कला है जिसमें उत्कृष्ट पद्धति से कटे संगमरमर आदि पत्थर में तराशे एवं चमकाए हुए पत्थरों, नगीनों, महंगे रत्नों, सोने-चांदी एवं कांच के टुकड़ों की जड़ाई की जाती है।

 इस कार्य को इमारत बनने के बाद, उसके ऊपर पत्थर की चौकियों अथवा पट्टियों के रूप में चिपकाया जाता है। यह कार्य इतनी बारीकी से किया जाता है कि पत्थरों के बीच का महीनतम खाली स्थान भी अदृश्य हो जाता है। जड़े गए पत्थरों के समूह में स्थिरता लाने हेतु इसे जिगसॉ पहेली जैसा बनाया जाता है ताकि प्रत्येक टुकडा़ अपने स्थान पर मजबूती से ठहरा रहे।

यह कला सर्वप्रथम रोम में प्रयोग की गई। ई.1500 के आसपास यह कला चरमोत्कर्ष पर पहुँची। सोलहवीं शती में यह कला यूरोप से बाहर निकलकर मुगलों तक पहुंची जहाँ इस कला को नए आयाम मिले, स्थानीय एवं देशी कलाकारों ने भारत में बने अनेक भवनों में इस कला का उपयोग किया जिसके सबसे उत्कृष्ट उदाहरण एतमादुद्दौला के मकबरे, अगारा के लाल किले के महलों एवं ताजमहल में मिलता है। मुगल भारत में इसे पर्चिनकारी या पच्चीकारी कहा जाता था जिसका आशय नगीना जड़ने से होता है।

लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर

मुगल स्थापत्य शैली की सबसे बड़ी विशेषता उत्तर भारत में बहुतायत से मिलने वाला लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर का व्यापक उपयोग है जिसे काटकर, घिसकर तथा पॉलिश करके सुंदर कलात्मक स्वरूप प्रदान किया गया। मुगलों ने भवन निर्माण में बहुत कम मात्रा में काला संगमरमर, क्वाट्जाईट एवं ग्रेनाइट का उपयोग किया।

मुगल भवनों की चिनाई सामान्यतः चूने के गारे में होती थी। दीवारों के भीतरी हिस्से में अनगढ़ पत्थरों को चिना जाता था और बाहरी भाग को लाल बलुआ पत्थर अथवा सफेद संगमरमर की पट्टियों (slabs) से ढक दिया जाता था। कुछ भवनों के निर्माण में ईंटों का भी प्रयोग किया गया।

राजस्थान ने उपलब्ध कराई निर्माण सामग्री

बाबर एवं हुमायूँ के काल के भवनों में राजस्थान के करौली नामक स्थान से मिलने वाले लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया किंतु जहाँगीर के काल से मुगल स्थापत्य में संगमरमर का उपयोग व्यापक पैमाने पर होने लगा। संगमरमर की आपूर्ति मारवाड़ के मकराना नगर से होती थी।

दिल्ली के दीवाने खास, मोती मस्जिद एवं जामा मस्जिद, आगरा के ताजमहल, एतमादुद्दौला का मकबरा एवं मुस्समन बुर्ज, औरंगाबाद का बीबी का मकबरा, आदि भवनों का निर्माण मकराना के संगमरमर से हुआ है। चिनाई के लिए उत्तम कोटि के चूने की आपूर्ति भी राजस्थान के नागौर जिले से होती थी। गहरे नीले रंग का लाजवर्त (Lapis lazuli) अफगानिस्तान से आता था। जबकि महंगे रत्न विश्व के अनेक देशों से मंगवाए जाते थे। मुगलों ने अपने महलों में जलापूर्ति के लिए नहरों, उद्यानों में नालियों एवं फव्वारों का भी बड़े स्तर पर उपयोग किया।

महंगे रत्नों की भरमार

मुगलों ने अपने महलों में नीला लाजवर्त, लाल मूंगा, पीला पुखराज, हरा पन्ना, कत्थई गोमेद, सफेद मोती आदि मूल्यवान एवं अर्द्धमूल्यवान पत्थरों का भरपूर उपयोग किया। शाही महलों एवं शाही मकबरों में संगमरमर में बने फूल-पत्तियों की डिजाइनों में वैदूर्य, गोमेद, सूर्यकान्त, पुखराज और ऐसे ही अनेक कीमती रत्नों को जड़ने का काम मुगल स्थापत्य की विशेषता है।

उनसे पहले भारत के मुस्लिम भवनों में रत्नों का प्रयोग कभी नहीं हुआ था। मुगलों की बहुत ही सुंदर और संगमरमर की कलाकृतियों में सोने और कीमती पत्थरों का जड़ाऊ काम भी मिलता है। सोने-चांदी के पतरों में रत्नों की ऐसी जड़ाई प्राचीन हिन्दू स्थापत्य में मिलती थी किंतु मुस्लिम आक्रमणों के कारण हिन्दू स्थापत्य कला का लगभग पूरी तरह विनाश हो चुका था।

नहरों एवं फव्वारों से युक्त मुगल गार्डन्स

मुगलों ने समरकंद के तैमूर शैली के उपवनों के अनुकरण पर भारत में कई बाग बनवाए जिन्हें मुगल उद्यान कहा जाता है। बाबर ने ई.1528 में आगरा में एक बाग बनवाया जिसे आराम बाग कहा जाता था। यह भारत का सबसे पुराना मुग़ल उद्यान था। इसे अब रामबाग कहा जाता है। जहाँगीर काल में निर्मित हुमायूँ का मकबरा एक बड़े चारबाग के भीतर स्थित है।

जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ द्वारा निर्मित एतमादुद्दौला का मकबरा भी चारबाग शैली के एक विशाल उद्यान के भीतर बना हुआ है। जहाँगीर ने काश्मीर में शालीमार बाग बनवाया। नूरजहाँ के भाई आसफ खान (जो कि शाहजहाँ का श्वसुर और मुमताज महल का पिता था) ने ई.1633 में कश्मीर में निशात बाग बनवाया। प्रयागराज का जहाँगीर कालीन खुसरो बाग भी चारबाग शैली में बना हुआ है।

शाहजहाँ ने लाहौर में शालीमार बाग बनवाया जिसकी प्रेरणा काश्मीर के शालीमार बाग से ली गई थी। शाहजहाँ द्वारा निर्मित ताजमहल भी चारबाग शैली के एक बड़े उद्यान के बीच स्थित है।

ताजमहल की सीध में यमुना के दूसरी ओर भी शाहजहाँ द्वारा निर्मित एक उद्यान है जिसे मेहताब बाग कहा जाता है। यह भी चारबाग शैली में बना हुआ है। औरंगजेब ने पंजाब में पिंजोर बाग बनवाया जो हरियाणा के पंचकूला जिले में अपने बदले हुए स्वरूप में अब भी मौजूद हैं तथा यदुवेन्द्र बाग कहलाता है।

चारबाग शैली एक विशिष्ट प्रकार की शैली थी जिसमें उद्यान के केन्द्रीय भाग से चारों दिशाओं में चार नहरें जाती थीं जिनसे पूरे उद्यान को जल की आपूर्ति होती थी। ये चार नहरें, कुरान में वर्णित जन्नत के बाग में बहने वाली चार नदियों का प्रतीक होती थीं। भारत में मुगलों द्वारा बनाए गए छः उद्यानों को यूनेस्को विश्व धरोहर की संभावित सूचि में सम्मिलित किया गया हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर के परी महल, निशात बाग, शालीमार बाग, चश्म-ए-शाही, वेरिनाग गार्डन तथा अचबल गार्डन सम्मिलित हैं।

भारत में मुगल स्थापत्य के प्रसिद्ध उदाहरण

भारत में मुगल स्थापत्य शैली के उत्कृष्टतम नमूने दिल्ली, आगरा, फतेहपुर सीकरी, लखनऊ, लाहौर (अब पाकिस्तान), काबुल (अब अफगानिस्तान), कांधार (अब अफगानिस्तान) आदि नगरों में हैं। कुछ प्रसिद्ध भवन इस प्रकार हैं-

(1.) मकबरे: एतमादुद्दौला का मकबरा, हुमायूँ का मकबरा, अकबर का मकबरा, जहाँगीर का मकबरा, ताजमहल, अनारकली का मकबरा, बीबी का मकबरा, आदि।

(2.) मस्जिद: दिल्ली, आगरा एवं फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिदें, लाहौर, दिल्ली एवं आगरा की मोती मस्जिदें, आगरा की नगीना मस्जिद, फतेहाबाद की मस्जिद, दिल्ली की किला-ए-कुहना मस्जिद आदि।

(3.) किले: दीन पनाह, आगरा एवं दिल्ली के लाल किले, लाहौर का किला, प्रयागराज का किला, अजमेर का दौलताबाद किला। 

(4.) महलः फतेहपुर सीकरी के महल, आगरा एवं दिल्ली के लाल किलों के महल, आदि।

(5.) उद्यान: बाग-ए-बाबर (लाहौर), आराम बाग (अगरा), शालीमार बाग (काश्मीर), चारबाग (हुमायूँ का मकबरा), निशातबाग (श्रीनगर), आगरा का अंगूरी बाग आदि।

(6.) सरकारी कार्यालय: आगरा, फतेहरपुर सीकरी एवं दिल्ली के दीवान-ए-आम तथा दीवान-ए-खास, फतेहपुर सीकरी की ट्रेजरी।

(7.) दरवाजा: फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा, अजमेर में खामख्वा के दरवाजे, दिल्ली का दिल्ली दरवाजा आदि।

(8.) बारादरियां: अजमेर में आनासागर झील की बारादरियां।

(9.) हवामहल: फतेहपुर सीकरी का पंचमहल।

(10.) सराय: जालंधर की नूमहल सराय।

(7.) बुर्ज: मुसम्मन बुर्ज, जामा मस्जिद की बुर्ज आदि।

(12.) मीनारें: फतेहपुर सीकरी एवं लाहौर की हिरन मीनार आदि।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर का स्थापत्य बोध

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बाबर का स्थापत्य बोध

बाबर का स्थापत्य बोध उसके द्वारा बनाए गए भवनों की अपेक्षा उसकी आत्मकथा बाबरनामा से अधिक होता है। बाबर ने भारत में मौलिक रचनाओं का निर्माण करने की बजाय हिन्दू मंदिरों को तोड़कर उन्हें मस्जिदों में बदलने का कार्य किया।

जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर ने ई.1526 में भारत में मुगल सल्तनत की स्थापना की थी। उसे भारत के इतिहास में बाबर के नाम से जाना जाता है। बाबर के पिता मिर्जा उमर बेग ने बाबर की शिक्षा-दीक्षा की निश्चय ही अच्छी व्यवस्था की होगी क्योंकि उसका दरबार उस समय के विद्वान व्यक्त्यिों से भरा हुआ था।

बाबर का नाना यूनुस खाँ अपने समय का ख्यातिनाम विद्वान था। उसे चित्रकला, संगीत एवं अन्य कलाओं में अच्छी रुचि थी। नाना यूनुस खाँ ने बाबर को बहुत प्रभावित किया था। इस कारण बाबर में विभिन्न कलाओं के प्रति स्वाभाविक रूप से प्रेम पनप गया।

बाबर की माँ कूतलूक निगार खानम तुर्की एवं फारसी की अच्छी ज्ञाता थी। इस कारण बाबर में साहित्य के प्रति प्रेम जन्मा। बाबर प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य लिखता था। वह अपने जीवन में जिस भी स्थान पर गया, उसने वहाँ का वर्णन अवश्य किया। वह उस स्थान के पक्षियों, वनस्पतियों, पहाड़ों, झीलों, नदियों, पशुओं, मनुष्यों, नगरों, बगीचों एवं भवनों आदि का बारीकी से वर्णन करता था जिससे स्पष्ट होता है कि उसे नगरों के निर्माण एवं भवनों की भी अच्छी जानकारी थी।

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जब बाबर 11 वर्ष का था, उसके पिता मिर्जा उमर बेग का निधन हो गया। इतनी कम आयु में बाबर को फरगना का राज्य संभालना पड़ा। उसी समय उसके ताऊ मिर्जा अहमद ने फरगना पर आक्रमण कर दिया जो कि समरकंद का शासक था। अहमद ने बाबर के कुछ नगरों पर अधिकार कर लिया। बाबर के मामा महमूद खाँ ने भी बाबर के राज्य पर आक्रण करके उसके कुछ नगर दबा लिए। कीश के अमीर ने भी बाबर के राज्य का कुछ भाग दबा लिया। इन कठिनाइयों में उसकी दादी ऐसान दौलत बेगम ने उसका मार्गदर्शन किया जिसके कारण बाबर अपने राज्य की रक्षा कर सका। राज्य बचाने के लिए किए गए कड़े संघर्ष के कारण उसमें समय से पहले ही प्रौढ़ता आ गई। इसलिए इतिहासकारों ने उसे ‘असमय प्रौढ़ बालक’ कहा है। पाँच साल बाद जब बाबर के ताऊ अहमद मिर्जा की मृत्यु हुई और उसके पुत्रों में राज्याधिकार को लेकर झगड़ा हुआ तो बाबर ने समरकंद पर आक्रमण कर दिया। समरकंद उसके पूर्वजों की राजधानी थी इसलिए बाबर उस पर अपना नैसर्गिक अधिकार समझता था। समरकंद उन दिनों तुर्की सभ्यता एवं संस्कृति का बड़ा केन्द्र था। वहाँ के विद्यालय, पुस्तकालय, चिकित्सालय और राजाप्रासाद मुस्लिम जगत् में विख्यात थे। समरकंद के कवि, गणितज्ञ, साहित्यकार और ज्योतिषियों की धाक चारों ओर थी। समरकंद के वन-उपवन और पुष्प लोगों को मुग्ध कर देते थे।

जब बाबर ने समरकंद पर विजय प्राप्त की तो उसने समरकंद शहर का बारीकी से निरीक्षण किया एवं अपने आदमियों से उसकी चाहरदीवारी को नपवाया। बाबर ने अपनी पुस्तक ‘बाबरनामा’ में इस शहर का बड़ा रोचक वर्णन किया है। बाबर ने लिखा है कि समरकंद एक सुंदर शहर था जिसे इस्कंदर नामक तुर्क सरदार ने बसाया था। बाद में तैमूर बेग ने इसे अपनी राजधानी बनाया जिसे भारत में तैमूर लंग अर्थात् लंगड़ा तैमूर कहा जाता है।

बाबर ने जब समरकंद पर अधिकार किया था तब इस शहर के चारों ओर एक सुंदर चाहरदीवारी बनी हुई थी जिसकी लम्बाई दस हजार कदम थी। समरकंद के पूर्व में फरगाना तथा काशगर, पश्चिम में बुखारा तथा ख्वारिज्म, उत्तर में ताशकंद और शाहरुखिया नामक नगर थे जिन्हें तुर्कों एवं मंगोलों ने दुनिया भर के नगरों को लूटकर समृद्ध किया था। समरकंद में भी बाबर के पूर्वज तैमूर बेग तथा उलूग बेग मिर्जा के बनाए हुए कई भवन तथा उद्यान थे जिन्हें बाबर ने अपनी आंखों से देखा था।

बाबर के पूर्वज उलूग बेग मिर्जा ने समरकंद में एक वेधशाला बनवाई थी जिसे जीचशाही कहा जाता था। इस वेधशाला में तीन मंजिलें थीं। बाबर ने इसे समरकंद के उत्तम भवनों में से एक कहा है। उलूग बेग मिर्जा ने इस वेधशाला में सूर्य, चन्द्र एवं अन्य नक्षत्रों की गति का अध्ययन करके कूरकानी जीच (पंचांग) तैयार किया था। यह पंचांग इतना प्रसिद्ध हुआ कि कई शताब्दियों तक विश्व के कई देशों में यही पंचांग प्रचलित रहा।

उस समय तक सम्पूर्ण विश्व में केवल 7-8 वेधशालाओं का निर्माण हुआ था जिनमें से एक वेधशाला भारत के उज्जैन राज्य के राजा विक्रमादित्य के समय में बनी थी, बाबर ने उज्जैन की वेधशाला का समय 57 ईस्वी पूर्व बताया है तथा इस वेधशाला में बने पंचांग में कुछ दोष बताए हैं।

बाबर के समय एक और पंचांग का उपयोग होता था जिसे ‘ईलखानी जीच’ कहते थे। इसे ख्वाजा नसीर तूसी ने हुलाकू खाँ के समय ‘मरागा’ में तैयार किया था। बाबर ने ‘मामूनी जीच’ का भी उल्लेख किया है जिसे मामून खलीफा द्वारा निर्मित वेधशाला में तैयार किया गया था। उसने ‘बतलीमूस’ नामक वेधशाला का भी उल्लेख किया है।

बाबारनामा में समरकंद के भवनों एवं वेधशालाओं के वर्णन से अनुमान लगाया जा सकता है कि बाबर में नगर-सौन्दर्य के सम्बन्ध में चेतना थी, उसकी इतिहास के अध्ययन में भी रुचि थी और वह नक्षत्र विद्या की बारीकियों को भी समझता था। समरकंद को ‘मावराउन्नहर’ तथा ‘बदलए-महफूजा’ भी कहा जाता था जिसका अर्थ होता है- ‘जिसे किसी शत्रु ने आज तक नहीं जीता।’ बाबर ने समरकंद की चाहरदीवारी में एक लोहे के फाटक का उल्लेख किया है जिसके बाहर शाह जिन्दा की मजार थी।

समरकंद के सम्बन्ध में बाबर ने लिखा है कि यह आश्चर्यजनक रूप से सुंदर है तथा यहाँ विभिन्न व्यवसाय करने वाले लोग एक ही बाजार में नहीं बैठते थे अर्थात् विभिन्न व्यवसाय वाले लोगों के लिए अलग-अलग बाजार बने हुए थे। बाबर ने इसे बड़ी ही आश्चर्यजनक योजना बताया है तथा समरकंद के नानबाइयों और बावरचियों की तारीफ करते हुए यह भी लिखा है कि संसार का सर्वोत्तम कागज यहीं बनता है।

कीश के मेहराब (Arches of Ketch)

बाबर ने अपनी पुस्तक में समरकंद के पास स्थित कीश नामक नगर का वर्णन भी किया है जो समरकंद से लगभग 48 मील दूर स्थित था। तैमूर लंग का जन्म इसी नगर में हुआ था। तैमूर लंग ने कीश में अपने लिए भव्य महलों का निर्माण करवाया था। उसने अपने दरबार के लिए एक भव्य मेहराबदार हॉल बनवाया था जिसमें उसके सेनापति बेग तथा दरबारी बेग उसकी दाईं एवं बाईं ओर बैठते थे। दरबार में उपस्थित होने के इच्छुक लोगों के लिए उसने दो छोटे हॉल बनवाए थे और दरबार में प्रार्थना करने के लिए दरबार भवन के चारों ओर छोटे-छोटे कमरे बनवाए थे।

बाबर ने लिखा है कि इस प्रकार की भव्य मेहराबें संसार में बहुत कम होंगी तथा कहा जाता है कि यह ‘किसरा के मेहराब’ से भी उत्तम है। तैमूर ने कीश में एक मदरसे तथा एक मकबरे का भी निर्माण करवाया था। जहाँगीर मिर्जा की कब्र तथा उसकी संतान के कुछ अन्य लोगों की कब्रें भी वहीं थीं जिनका उल्लेख बाबर ने अपनी पुस्तक में किया है। 

बाबर ने लिखा है कि चूंकि कीश ऐसा स्थान नहीं था जिसे खूबसूरत नगर में बदला जा सके इसलिए तैमूर ने कीश की जगह समरकंद को अपनी राजधानी बनाया तथा वहाँ अनेक प्रकार के उत्तम भवन बनवाए। बाबर ने ‘ईतमाक दर्रे’ का भी उल्लेख किया है जो समरकंद एवं कीश के बीच स्थित पहाड़ियों में था तथा जहाँ से पत्थर लाए जाकर, समरकंद एवं कीश के महल एवं अन्य भवन बनाए गए थे। ऐसा प्रतीत होता है कि कीश नगर के मेहराब (Arch) बाबर के मस्तिष्क पर छा गए। भविष्य में उसके समस्त भवनों को मेहराबदार ही बनाया गया। यही मेहराब मुगलों की स्थापत्य शैली की प्रमुख पहचान बन गई। मेहराब किसी भी द्वार या दीवार में बनाई गई आर्चनुमा आकृति को कहते हैं। यह गोलाई लिए हुए अथवा त्रिकोणात्मक आकृति लिए हुए हो सकता है।

पेशताक (कांधार)

बाबर ने कांधार में ‘पेशताक’ नामक एक भवन बनवाया। इसके लिए उसने ‘सरपूजा’ नामक पहाड़ से पत्थर कटवाकर मंगवाए। इस भवन को पत्थर काटने वाले 80 कारीगरों ने 9 वर्ष तक प्रतिदिन काम करके पूरा किया।

बाग-ए-बाबर (काबुल)

बाबर ने काबुल में भी एक बाग बनवाया जिसे बाग-ए-बाबर कहा जाता था। इसमें पानी की नहरें, बारादरियां, बैठक के कमरे आदि अनेक निर्माण करवाए गए थे जिसे बाद में तालिबानियों ने तबाह कर दिया। वर्तमान में इसके अवशेष ही देखे जा सकते हैं।

बाबर का भारत में प्रवेश

 बाबर में नई चीजों को देखने और समझने का इतना प्रबल उत्साह था कि जब उसने 11 मार्च 1519 को झेलम पार करने के बाद जीवन में पहली बार बाल्टियों सहित रहट को देखा तब उसने रहट की कार्य-विधि को जानने के लिए कई बार पानी निकलवाकर देखा। ई.1526 में बाबर ने इब्राहीम लोदी को परास्त करके दिल्ली एवं आगरा पर अधिकार कर लिया। बाबर भारत में केवल चार साल ही राज्य कर सका। इतने कम समय में वह अपना राज्य भी ढंग से व्यवस्थित नहीं कर सका इसलिए भवन निर्माण के बारे में सोचना भी कठिन ही था। फिर भी बाबर ने भारत में कुछ विध्वंस एवं कुछ निर्माण किए।

हिन्दू स्थापत्य का अनुकरण

उसे दिल्ली और आगरा की तुर्क तथा अफगान सुल्तानों द्वारा निर्मित इमरतें पसंद नहीं आईं। वह ग्वालियर में मानसिंह एवं विक्रमजीतसिंह के महलों की स्थापत्य शैली से अत्यधिक प्रभावित हुआ। उस काल में ग्वालियर के महल ही हिन्दू कला के सुंदर उदाहरण के रूप में शेष बचे थे। यद्यपि बाबर के अनुसार इनके निर्माण में किसी निश्चित नियम एवं योजना का पालन नहीं हुआ था तथापि वे बाबर को सुंदर एवं हृदयग्राही प्रतीत हुए। बाबर ने अपने लिए ग्वालयिर के अनुकरण पर महल बनवाए। बाबर ने स्वयं अपनी प्रशंसा करते हुए लिखा है कि ‘मैंने आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर एवं कोल नामक स्थानों पर भवन निर्माण के कार्य में संगतराशों को लगाया।’

सतीश चन्द्र ने लिखा है- ‘बाबर के लिए स्थापत्य का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नियम-निष्ठता एवं समरूपता थी जो उसे भारतीय इमारतों में दिखाई नहीं दी। बाबर भारतीय कलाकारों के साथ काम करने के लिए उत्सुक था। इस कार्य हेतु उसने प्रसिद्ध अलबानियाई कलाकार ‘सिनान’ के शिष्यों को बुलाया। बाबर को भारत में स्थापत्य के क्षेत्र में ज्यादा कुछ करने का समय नहीं मिला और उसने जो कुछ बनवाया उसमें अधिकतर अब नष्ट हो चुके हैं।’

ऐसा प्रतीत होता है कि या तो उसने आगरा, सीकरी, बयाना आदि स्थानों पर बड़े निर्माण अर्थात् महल एवं दुर्ग आदि नहीं बनवाकर मण्डप, स्नानागार, कुएं, तालाब एवं फव्वारे जैसी लघु रचनाएं ही बनवाई थीं या फिर बाबर द्वारा निर्मित इमारतें मजबूत सिद्ध नहीं हुईं। क्योंकि वर्तमान में पानीपत के काबुली बाग की विशाल मस्जिद एवं रूहेलखण्ड में संभल की जामा मजिस्जद को छोड़कर, बाबर द्वारा निर्मित कोई भी इमारत उपलब्ध नहीं है। या तो वे बनी ही नहीं थीं या फिर वे समस्त इमारतें खराब गुणवत्ता के कारण नष्ट हो चुकी हैं।

यद्यपि पानीपत के काबुली बाग की मस्जिद एवं रूहेलखण्ड की मस्जिद पर्याप्त विशाल रचनाएं हैं तथापि उनमें शिल्प, स्थापत्य एवं वास्तु का कोई सौंदर्य दिखाई नहीं देता। इन दोनों भवनों के बारे में स्वयं बाबर ने स्वीकार किया है कि इनकी शैली पूरी तरह भारतीय थी। यहाँ भारतीय शैली से तात्पर्य मुगलों के पूर्ववर्ती दिल्ली सल्तनत-काल  की स्थापत्य शैली से है। बाबर को भारत में समरकंद जैसी इमारतें बना सकने योग्य कारीगर उपलब्ध नहीं हुए। न बाबर के पास इतना धन एवं इतना समय था कि वह इमारतों का निर्माण करवा सके।

काबुली मस्जिद, पानीपत

 बाबर ने ई.1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहीम लोदी को परास्त करने के बाद अपनी विजय की स्मृति में ई.1527 में पानीपत में एक बाग और मस्जिद का निर्माण करवाया। बाबर की एक बेगम का नाम मुस्समत काबुली था। उसी के नाम पर इस बाग एवं मस्जिद का नाम काबुली बाग एवं काबुली मस्जिद रखा गया। यह एक विशाल एवं मजबूत भवन है किंतु स्थापत्य एवं शिल्प की दृष्टि से अत्यंत सामान्य है। इस मस्जिद के निर्माण के छः साल बाद हुमायूँ ने सलीमशाह को हराया तथा इस विजय की स्मृति में इस बाग में एक चबूतरा बनवाया जिसे फतेह मुबारक कहा जाता है। अकबर के काल में ई.1557 में इस मस्जिद में फारसी भाषा में दो शिलालेख लगवाए गए।

सम्भल की जामा मस्जिद

रूहेलखण्ड क्षेत्र में राप्ती नदी के तट पर एक पौराणिक नगर स्थित था जिसे मुगल काल में सम्भल कहा जाता था। इस नगर में पौराणिक युगीन ‘हरिहर मंदिर’ स्थित था। बाबर ने इस मंदिर को तोड़कर उसके ध्वंसावशेषों पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया जिसे जामा मस्दिज कहा गया।  इस मस्जिद निर्माण में मेहराबों, मीनारों एवं गुम्बदों का प्रयोग किया गया। औरंगजेब के दूसरे पुत्र शहजादा मुअज्जम (बहादुरशाह प्रथम) ने भी इसमें कुछ निर्माण करवाए। उसने गोरखपुर का नाम मुअज्जमाबाद रखा तथा संभल में उर्दू बाजार का निर्माण करवाया। इस मस्जिद की उत्तर-दक्षिण में लम्बाई 90 फुट तथा पूरब-पश्चिम में चौड़ाई लगभग 80 फुट है। मस्जिद चारों तरफ से खुली हुई है।

मस्जिद जन्मस्थानम्

बाबर के शिया सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में भगवान राम के ‘जन्मस्थानम्’ मंदिर को तोड़कर, उसी की सामग्री से उसी स्थल पर एक ढांचा खड़ा किया जिसे मुगल रिकॉर्ड्स में ‘मस्जिद-जन्मस्थानम्’ कहा गया। मीर बाकी ने इस ढांचे पर दो शिलालेख लगवाए जो इस प्रकार से हैं-

अयोध्या की जन्मस्थानम्-मस्जिद का प्रथम शिलालेख

शाह बाबर के आदेशानुसार जिसका न्याय,

एक ऐसी इमारत है जो आकाश की ऊँचाई तक पहुंचती है।

निर्माण कराया इस फिरिश्तों के उतरने के स्थान को,

सौभाग्यशाली अमीर मीर बाकी ने, बवद खैरे बाकी।

(बवद खैरे बाकी के दो अर्थ हैं। पहला अर्थ है- हिजरी 935 अर्थात् ई.1530; तथा दूसरा अर्थ है- यह सदाचरण अनन्त तक रहे।)

अयोध्या की बाबरी मस्जिद का द्वितीय शिलालेख

उसके नाम से जो महान् ज्ञानी है,

जो समस्त संसार का सृष्टा के उपरान्त मुस्तफा पर दरूद

जो दोनों लोकों के नबियों के सरदार हैं।

संसार में चर्चा है कि बाबर कलन्दर

कालचक्र में उसे सफलता प्राप्त हुई।

इन शिलालेखों में बाबर के नाम का उल्लेख होने के कारण इस ढांचे को जन-साधारण की भाषा में ‘बाबरी-मस्जिद’ कहा जाने लगा। इस ढांचे को वर्ष 1992 में एक जन-आंदोलन में ढहा दिया गया।

आराम बाग, आगरा

 भारत का सबसे पुराना मुग़ल उद्यान आगरा का आरामबाग था जिसका निर्माण ई.1528 में बाबर ने करवाया था। यह उद्यान ताजमहल से 2.5 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में स्थित है। इस उद्यान में विभिन्न प्रकार की ज्यामितीय रचनाएं बनाई गई हैं। यह बाग यमुना नदी के बायें तट पर स्थित है।

बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में इसका उल्लेख किया है। इसे बाग-ए-नूर-अफसाँ भी कहा जाता था। ई.1530 में जब बाबर की मृत्यु हुई तो उसे सबसे पहले इसी बाग में दफनाया गया। बाद में बाबर के शव को उसकी इच्छानुसार काबुल  ले जाया गया। ई.1775 से ई.1803 तक आगरा मराठों के अधिकार में रहा। उनके समय में आरामबाग को रामबाग कहा जाने लगा।

यह बाग ऊँची चाहरदिवारी से घिरा है जिसके कोने की बुर्जियों के ऊपर स्तम्भयुक्त मंडप हैं। नदी के किनारे दो-दो मंजिले भवनों के बीच में एक ऊँचा पत्थर का चबूतरा है। जहाँगीर ने इस बाग की संरचनाओं में कुछ परिवर्तन किए। बाद में ब्रिटिश शासनकाल में भी कुछ नव-निर्माण करवाए गए। इस स्मारक के उत्तरी-पूर्वी किनारे पर एक और चबूतरा है जहाँ से हम्माम के लिए रास्ता है। हम्माम की छत मेहराबदार है। नदी से पानी निकालकर एक चबूतरे से बहते हुए चौड़े नहरों, कुंडों एवं झरनों के रास्ते दूसरे चबूतरे तक लाया जाता था।

बाबर द्वारा निर्मित अन्य भवन

बाबर ने आगरा के लोदी किले में जामा मस्जिद बनवाई। वह राजपूताने की सीमा पर ऐसे भवन बनवाना चाहता था जो ठण्डे हों। इसलिए उसके आदेश से आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर तथा अन्य नगरों में कुछ भवनों का निर्माण किया गया जो अब शेष नहीं बचे हैं। धौलपुर नगर के बाहर स्थित कमलताल के निकट बाबरकालीन भवनों के ध्वंसावशेष देखे जा सकते हैं। जब बाबर खानवा के युद्ध के लिए धौलपुर पहुंचा था तब यह कमलताल मौजूद था। इसके चारों ओर सुंदर भवन एवं उद्यान थे जो अब नष्ट हो गए हैं तथा उन पर अवैध मुस्लिम बस्तियां बस गई हैं।

गुलबदन बेगम का वर्णन

बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने बाबर द्वारा करवाए गए निर्माण कार्यों का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘हुमायूँनामा’ में किया है। उसने लिखा है कि बाबर ने आगरा में यमुना के इस पार कई भवनों के निर्माण की आाज्ञा दी। हरम और बाग के मध्य अपनी खिलवत खास के लिए पत्थर का एक महल बनवाया और दीवानखाना में भी एक महल का निर्माण करवाया। भवन के किनारे एक बावली और चारों बुर्जों में चार कमरों के निर्माण की आज्ञा दी। नदी के किनारे चार आंगन वाले एक भवन का निर्माण करवाया।

 गुलबदन लिखती है कि बाबर ने धौलपुर में पत्थर की, दस गज लम्बी और चौड़ी एक बावली बनाने की आज्ञा दी तथा अपने सैनिकों से कहा कि यदि उन्होंने राणा सांगा को परास्त कर दिया तो वह इस बावली को शराब से भर देगा। चूंकि सांगा पर विजय प्राप्त करने से पहले ही बाबर ने शराब न पीने की शपथ ले ली थी इसलिए इस बावली को नींबू के शरबत से भरवाया गया।

गुलबदलन के इस वर्णन में कुछ अतिश्योक्ति है। जिसे वह बावली बता रही है, वह एक छोटा सा कुण्ड है तथा कमलताल के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण बाबर ने नहीं करवाया था, यह बाबर के भारत आने से पहले भी मौजूद था और एक विशाल बाग के भीतर स्थित था। गुगलबदन ने यमुना के निकट जिन भवनों के निर्माण का उल्लेख किया है वे अब उपलब्ध नहीं हैं। या तो वे  बने ही नहीं, और यदि बने तो नष्ट हो गए।

बाबर का मकबरा (काबुल)

बाबर की मृत्यु के बाद, बाबर की इच्छानुसार, उसके शव को काबुल ले जाकर, बाबर द्वारा निर्मित बाग-ए-बहार के भीतर दफन किया गया। वहाँ एक छोटा सा मकबरा भी बना हुआ है जिसके बाहर की जालियां देखते ही बनती हैं। तालिबानियों ने बाग-ए-बाबर को तो बर्बाद कर दिया है किंतु यह मकबरा अब भी सुरक्षित है।

बाबर भले ही अफगानिस्तान छोड़कर भारत आ गया था किंतु अफगानिस्तान में आज भी उसे नायक के रूप में देखा जाता है। भारत में भले ही बाबर ने मनुष्यों के सिर काटकर उनकी मीनारें बनाईं और अपने पैरों से लुढ़काईं किंतु अफगानिस्तान में बाबर को सुशिक्षित, वैज्ञानिक चिंतन युक्त सुसभ्य व्यक्ति माना जाता है। आधुनिक अफगानिस्तान में बाबर के अनेक स्मारक बनाए गए हैं जिनमें से बहुत से स्मारक तालिबानियों ने नष्ट कर दिए हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ द्वारा निर्मित भवन

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हुमायूँ द्वारा निर्मित भवन

भारत में हुमायूँ द्वारा निर्मित भवन बहुत कम हैं। हुमायूँ ने ई.1530 से 1540 तक भारत पर शासन किया। लगभग छः माह के लिए उसने ई.1555 में भी शासन किया।

बाबर के पुत्र नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 को काबुल के दुर्ग में हुआ था। जब ई.1526 में वह बाबर के साथ भारत आया था, उस समय हुमायूँ अठारह वर्ष का नवयुवक था। जब वह 22 वर्ष का हुआ तब ई.1530 में उसके पिता जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर की अचानक मृत्यु हो जाने के कारण हुमायूँ को बाबर द्वारा भारत में विजित प्रदेशों का राज्य संभालना पड़ा था। हुमायूँ ने भी अपने पिता की राजधानी समरकंद तथा उसके निकटवर्ती नगरों के वैभव को अपनी आंखों से देखा था। बाबर ने हुमायूँ की शिक्षा-दीक्षा की अच्छी व्यवस्था की थी इसलिए हुमायूँ को शिक्षा, कला एवं निर्माण आदि गतिविधियों से अच्छा प्रेम था।

दीन पनाह

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हुमायूँ ने ई.1533 में दिल्ली में यमुना के किनारे दीनपनाह नामक नवीन नगर का निर्माण आरम्भ करवाया। यह नगर ठीक उसी स्थान पर निर्मित किया गया जिस स्थान पर पाण्डवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ स्थित थी। इस परिसर से मौर्य एवं गुप्त कालीन मुद्राएं, मूर्तियां एवं बर्तन आदि मिले हैं तथा भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर भी मिला है जिसे कुंती का मंदिर कहा जाता है। दीनपनाह नामक शहर में हुमायूँ ने अपने लिए कुछ महलों का निर्माण करवाया। इन महलों के निर्माण में स्थापत्य-सौंदर्य के स्थान पर भवनों की मजबूती पर अधिक ध्यान दिया गया ताकि शाही परिवार को शत्रु के आक्रमणों से बचाया जा सके। जब ई.1540 में शेरशाह सूरी ने हुमायूँ का राज्य भंग कर दिया तब शेरशाह ने दीनपनाह को नष्ट करके उसके स्थान पर एक नवीन दुर्ग का निर्माण करवाया जिसे अब दिल्ली का पुराना किला कहते हैं। 20 जुलाई  1555 को हुमायूँ ने जब दिल्ली में पुनः प्रवेश किया तब वह इसी दुर्ग में आकर रहा।

हुमायूँ द्वारा निर्मित भवन – शेरमण्डल

दीन पनाह के भीतर एक शेरमण्डल नामक भवन है। कुछ विद्वानों का मानना है कि इसका निर्माण बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ के लिए एक पुस्तकालय के रूप में करवाना आरम्भ किया था किंतु अधिक संभावना इस बात की है कि इस भवन का निर्माण स्वयं हुमायूँ ने आरम्भ करवाया था। संभवतः शेरशाह सूरी ने भी इस भवन में कुछ निर्माण करवाया था इसलिए यह शेरमण्डल कहलाने लगा।

26 जनवरी 1556 को इसी भवन की सीढ़ियों से गिरकर हूमायूं की मृत्यु हुई थी। इसे दीनपनाह पुस्तकालय भी कहते हैं। यह अष्टकोणीय एवं दो मंजिला भवन है जो एक कम ऊँचाई के चबूतरे पर टावर की आकृति में खड़ा किया गया है। इसके निर्माण में लाल बलुआ पत्थर काम में लिया गया है।

वेधशालाओं के निर्माण की योजना

शेरमण्डल के पास एक स्नानागार स्थित है। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह एक वेधाशाला का बचा हुआ हिस्सा है। हुमायूँ को गणित तथा नक्षत्रविद्या का अच्छा ज्ञान था। इस ज्ञान का उपयोग करने के लिए उसने भारत में एक वेधशाला का निर्माण करवाने का निश्चय किया। इसके लिए उसने समरकंद आदि स्थानों से अनेक प्रकार के यंत्र भी मंगवाए किंतु शेरशाह सूरी द्वारा अचानक ही उसका राज्य भंग कर दिए जाने के कारण वह वेधाशाला का निर्माण नहीं करवा सका। अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है कि वेधशाला के लिए कई स्थानों का चुनाव किया गया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वह भारत में एक नहीं अपितु कई वेधशालाएं बनवाना चाहता था।

हुमायूँ द्वारा निर्मित भवन – आगरा की मस्जिद

हुमायूँ ने आगरा में एक मस्जिद बनवाई थी जिसके भग्नावशेष ही शेष हैं। इसकी मीनारें भी ध्वस्त प्रायः हैं जिसके कारण इसकी स्थापत्य सम्बन्धी विशेषताओं को समझा नहीं जा सकता।

हुमायूँ द्वारा निर्मित भवन फतेहाबाद मस्जिद

 हिसार के फतेहाबाद कस्बे में हुमायूँ ने एक मस्जिद का निर्माण करवाया। इसे हुमायूँ मस्जिद कहा जाता है। हुमायूँ ने यह मस्जिद दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगक द्वारा निर्मित लाट के निकट बनवाई। मस्जिद में लम्बा चौक है। इस मस्जिद के पश्चिम में लाखौरी ईंटों से बना हुआ एक पर्दा है जिस पर एक मेहराब बनी हुई है। इस पर एक शिलालेख लगा हुआ है जिसमें बादशाह हूमायूं की प्रशंसा की गई है। यह मस्जिद ई.1529 में बननी शुरु हुई थी किंतु हुमायूँ के भारत से चले जाने के कारण अधूरी छूट गई। ई.1555 में जब हुमायूँ लौट कर आया तब इसका निर्माण पूरा करवाया गया।

सूर स्थापत्य – सूरी सल्तनत में निर्मित भवन

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सूर स्थापत्य अपने पूर्ववर्ती तुर्क शासकों एवं पश्चवर्ती मुगलशासकों से कई प्रकार से अलग था। य़़द्यपि भारत में सूर स्थापत्य के अधिक उदाहरण देखने को नहीं मिलते तथापि वे अपनी शैलीगत विशेषताओं के कारण अलग से ही पहचाने जाते हैं।

शेरशाह सूरी का का वास्तविक नाम शेर खाँ था। उसका उत्कर्ष ई.1520 से 1525 के बीच हुआ। ई.1520 में उसने अपने पिता की छोटी सी जागीर पर अधिकार किया तथा ई.1525 में वह बिहार का स्वतंत्र शासक बन बैठा। उसने बंगाल के शासक से कई बार कर वसूल किया तथा चुनार के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। चुनार दुर्ग से उसे अपार धन प्राप्त हुआ। इससे उसकी शक्ति बढ़ गई।

ई.1539 में मुगल बादशाह हुमायूँ ने शेरशाह पर आक्रमण किया तो शेरशाह ने न केवल उसे परास्त कर दिया अपितु उसे भारत से निष्कासित करके दिल्ली एवं आगरा सहित सम्पूर्ण मुगल सल्तनत पर अधिकार जमा लिया। शेरशाह ई.1540 से ई.1545 तक ही शासन कर पाया था कि 22 मई 1545 को कालिंजर दुर्ग पर चढ़ाई के दौरान अपनी ही तोप का गोला फट जाने से उसकी मृत्यु हो गई।

उसके बाद इस्लामशाह, महमूदशाह आदिल, इब्राहीम खाँ सूरी तथा सिकंदरशाह सूरी ने ई.1555 तक भारत पर शासन किया किंतु ई.1555 में हुमायूँ लौट आया और उसने सूर वंश का शासन समाप्त करके भारत का खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।

सूर स्थापत्य

सूर स्थापत्य को मोटे तौर पर दो कालों में विभक्त किया जा सकता है- पहला कालखण्ड ई.1530-40 के बीच का है जिसका केन्द्र सहसराम (बिहार) था जहाँ शाही परिवार के लोगों के लिए लोदी शैली के मकबरों का निर्माण करवाया गया। दूसरा चरण ई.1540-45 के मध्य माना जा सकता है।

इस काल में शेरशाह के संरक्षण में दिल्ली से लेकर बिहार तक कई इमारतों का निर्माण हुआ। इस दौरान वास्तुकला के क्षेत्र में कई प्रयोग किए गए जिन्हें बाद में मुगल शैली में समाहित किया गया और जिससे मुगल शैली परिपक्व हुई।

सहसराम के मकबरे

सहसराम का मकबरा सूर स्थापत्य का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है। सहसराम (सासाराम) के शाही मकबरों का शिल्पी अलीवल खाँ था। ये भवन शेरशाह की उच्च महत्वाकांक्षा को प्रदर्शित करते हैं। शेरशाह इनके माध्यम से दिल्ली के मकबरों की तुलना में अधिक वैभवशाली उदाहरण प्रदर्शित करना चाहता था। सहसराम में स्थित शेरशाह के मकबरे के बारे में विद्वानों का मत है कि ‘यह मकबरा तुगलक कालीन इमारतों के गाम्भीर्य और शाहजहाँ की महान कृति ताजमहल के स्त्रियोचित सौन्दर्य के सम्पर्क का एक बेहतर माध्यम है।’

दिल्ली का पुराना किला (शेरगढ़)

ई.1542 में शेरशाह ने दिल्ली नगर के छठे शहर के रूप में शेरगढ़ का निर्माण करवाया जिसे अब पुराना किला कहा जाता है। दिल्ली के पुराने किले को भी सूर स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है किंतु इसके अधिकांश निर्माण शेरशाह से पहले एवं बाद में हुए थे। अब इसके केवल दो द्वार ‘लाल दरवाजा’ एवं ‘खूनी दरवाजा’ ही शेष बचे हैं। उसने इस किले का निर्माण हुमायूँ द्वारा बनाए गए ‘दीनपनाह’ नामक शहर के चारों ओर करवाया था। शेरशाह ने इस किले के भीतर स्थित पुराने भवन तुड़वाकर, उनके स्थान पर  कुछ नवीन भवनों का निर्माण करवाया। अधिकांश निर्माण पुराने भवनों की सामग्री से ही करवाया गया।

वस्तुतः हुमायूँ द्वारा निर्मित ‘दीनपनाह’ तथा शेरशाह द्वारा निर्मित पुराना किला, पाण्डवों द्वारा निर्मित ‘इन्द्रप्रस्थ नगर’ के ध्वंसावेशेषों पर बनाए गए थे। इसलिए इन्हें सूर स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना नहीं माना जा सकता। इस दुर्ग के भीतर से ईसा से 1000 वर्ष पुरानी मुद्राएं, मूर्तियां, बर्तन एवं सामग्री मिली हैं। कुछ सामग्री मौर्य कालीन एवं गुप्त कालीन भी है जिन्हें इसी परिसर में बने संग्रहालय में रखा गया है।

किला-ए-कोहना मस्जिद

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कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस मस्जिद को हुमायूँ ने बनवाना आरम्भ किया था क्योंकि इस मस्जिद के नुकीले मेहराब मुगल स्थापत्य की निशानी हैं न कि शेरशाह के स्थापत्य की। हुमायूँ ने ही लिवान तथा मेहराब पर पीट्रा ड्यूरा कार्य को मुगल स्थापत्य में शामिल किया था। बाद में शेरशाह ने इसका ऊपरी भाग पूरा करवाया जिसमें मस्जिद के ऊपर का डोम भी सम्मिलित है। उसने इस मस्जिद को ‘मण्डलीय’ अफगानी शैली का विधान प्रदान किया। इसके बाहरी भाग पर लगे संगमरमर का काम अकबर के समय में पूरा हुआ होना संभावित है क्योंकि संगमरमर पर ज्यातिमितीय रचनाओं का अंकन किया गया है। इस प्रकार का ज्यामितीय अंकन अकबर के समय में ही शुरु हुआ था।

इस मस्जिद को ‘फाइव बे मौस्क’ शैली में बनाया गया है इस शैली की अवधारणा मुगलों के पूर्ववर्ती सैयदों तथा लोदियों के काल में बनी मस्जिदों में दिखाई देती है। मुख्य कक्ष का आगे का भाग पाँच झुके हुए कोष्ठकों में विभक्त है। मध्य का कक्ष दूसरों की अपेक्षा बड़ा है और सभी में खुले झिर्रीनुमा मेहराब बने हुए हैं।

केन्द्रीय मेहराब के पार्श्व में संकीर्ण, लम्बी धारियों से युक्त भित्ति-स्तम्भ बने हुए हैं। मस्जिद की मेहराबों की गोलाई में ऊपर की ओर बढ़ते हुए हल्का झुकाव या समतलपन दृष्टिगोचर होता है। यह मुगलों के चतुर-केन्द्रित-ट्यूडर-आर्च के विकास की पूर्वपीठिका है। मस्जिद के प्रवेश द्वार और गुम्बद के चारों ओर की मीनारें ईरानी प्रभाव लिये हुए हैं। इमारत का शेष भाग भारतीय शैली में निर्मित है। इस मस्जिद की लम्बाई 167 फुट, चौड़ाई 44 फुट एवं डोम सहित ऊँचाई 66 फुट है। इस मस्जिद में कोई शिलालेख नहीं है।

शेरशाह ने शेरगढ़ (पुराना किला) के अंदर ‘किला-ए-कोहना मस्जिद’ बनवाई जो किले की भीतर ‘शेरमण्डल’ के निकट स्थित है। अब्बास सरवनी द्वारा लिखित ‘तारीखे शेरशाही’ के अनुसार शेरशाह ने इस मस्जिद का निर्माण ई.1540 में करवाया। इस मस्जिद के निर्माण में पत्थरों के टुकड़ों को चूना-गारे में चिना गया है।

दीवारों के बाहरी भागों, दालानों आदि में लाल बलुआ पत्थर, क्वार्ट्जाइट एवं संगमरमर के टुकड़ों का उपयोग किया गया है। इसके भीतरी भाग में स्वर्ण; तथा अफगानिस्तान से प्राप्त होने वाले अर्द्ध-मूल्यवान नीले रंग के पत्थर लाजवर्त  (Lapis lazuli)  का भी प्रयोग किया गया है। मस्जिद के सामने वाले भाग में सफेद संगमरमर तथा लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है।

इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि संभवतः पूरे भवन के बाहरी हिस्से में संगमरमर का उपयोग करने की योजना थी किंतु संगमरमर की आपूर्ति मिलने में कठिनाई होने से शेष बचे हुए भाग में लाल बलुआ पत्थर लगा दिया गया।

रोहतास दुर्ग

रोहतासगढ़ दुर्ग या रोहतास दुर्ग, बिहार के रोहतास जिले में स्थित एक प्राचीन दुर्ग है। यह भारत के सबसे प्राचीन दुर्गों में से एक है। यह जिला मुख्यालय सासाराम से लगभग 55 और डेहरी आन सोन से 43 किलोमीटर की दूरी पर सोन नदी के बहाव वाली दिशा में पहाड़ी पर स्थित है।

माना जाता है कि इस प्राचीन दुर्ग का निर्माण त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा त्रिशंकु के पौत्र व राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने कराया था। रोहतास गढ़ का किला काफी भव्य है। किले का घेरा 45 किमी तक विस्तृत है। इसमें कुल 83 दरवाजे हैं जिनमें से चार मुख्य दरवाजे घोड़ाघाट, राजघाट, कठौतिया घाट एव मेढ़ा घाट कहलाते हैं।

दुर्ग के मुख्यप्रवेश द्वार पर निर्मित हाथी, दरवाजों के बुर्ज तथा दीवारों पर बनाए गए भित्तिचित्र अद्भुत हैं। दुर्ग परिसर में अनेक भवन हैं जिनमें रंगमहल, शीश महल, पंचमहल, खूंटा महल, आइना महल, रानी का झरोखा तथा मानसिंह की कचहरी प्रमुख हैं।

ई.1539 में जब हूँमायूँ ने शेरशाह सूरी पर आक्रमण करने का निश्चय किया तब यह दुर्ग सूर्यवंशी खरवार राजा के अधिकार में था। शेरशाह ने खरवार राजा से अनुरोध किया कि मेरे परिवार को कुछ समय के लिए रोहतास दुर्ग में रहने दिया जाए। खरवार राजा ने शेरशाह का अनुरोध स्वीकार कर लिया और शेरशाह से कहा कि दुर्ग में केवल स्त्रियों को ही प्रवेश दिया जाएगा।

शेरशाह ने अपने हरम की औरतों की कई सौ डोलिया रोहतास दूर्ग के भीतर भेज दीं। पिछली डोली मे स्वयम् शेरशाह बैठ गया। आगे की डोलियां जब रोहतास दुर्ग में पहुंची तो उनकी तलाशी ली गई। डोलियों में कुछ बूढी औरतें बैठी थीं। इसी बीच अन्य डोलीयो से सशस्त्र सैनिक कूदकर बाहर आ गए। उन्होंने दुर्ग रक्षकों की हत्या कर दी।

इसी बीच शेरशाह भी दुर्ग मे प्रवेश कर गया और उसने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। दुर्ग अधिकार में आ जाने के बाद शेरशाह ने अपने मंत्री टोडरमल खत्री के निरीक्षण में इसका जीर्णोद्धार करवाया तथा इसके चारों ओर का परकोटा मजबूत करवाया। हूमायूँ से लड़ने के लिए शेरशाह ने इस दुर्ग में युद्ध एवं रसद सामग्री जमा करवाई। ई.1857 में अमरसिंह ने इसी दुर्ग से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था। रोहतास दुर्ग को सूर स्थापत्य के अंतर्गत रखा जाता है किंतु वस्तुतः इस दुर्ग में कुछ निर्माण ही सूरी वंश के काल में हुए थे।

शेरशाह का मकबरा, सहसराम

सूरी काल में निर्मित मिश्रित स्थापत्य कला का दूसरा नमूना सहसराम (बिहार) में झील के बीच ऊँची कुर्सी पर बना शेरशाह का मकबरा है जिसे स्वयं शेरशाह ने बनवाया था। यह एक पिरामिडीय रचना है तथा शेरशाह के काल में बने समस्त मकबरों से अधिक बड़ी है। इसके मुख्य भवन में अष्टकोणीय कक्ष है जो कि विस्तृत निचले गुम्बद से आच्छादित है।

क्रमशः न्यूनतम अवस्थाओं का उपयोग ओर चतुर्भुज से अष्टकोण और फिर गोलाकार पद्धति पर आना भारतीय स्थापत्य की सुव्यवस्था का प्रमाण है। इसकी आकृति मुस्लिम है किन्तु इसके भीतर तोड़ों तथा हिन्दू शैली के स्तम्भों का सुन्दर प्रयोग किया गया है। इस मकबरे की बहुत सी विशेषताएं, बाद में बने आगरा के ताजमहल में दिखाई देती हैं।

विद्वानों का मत है कि यह मकबरा तुगलक काल की इमारतों के गाम्भीर्य और शाहजहाँ की महान् कृति ताजमहल के स्त्रियोचित सौन्दर्य के बीच सम्पर्क स्थापित करता है। पर्सी ब्राउन तथा स्मिथ ने इस इमारत की बड़ी प्रशंसा की है।

ईसा खाँ नियाज़ी का मकबरा, दिल्ली

हुमायूँ के मकबरे के पश्चिमी प्रवेश द्वार के रास्ते में कई अन्य स्मारक बने हैं। इनमें से प्रमुख स्मारक ईसा खाँ नियाज़ी का मकबरा है, जो मुख्य मकबरे से 20 वर्ष पूर्व अर्थात् ई.1547 में बना था। ईसा खाँ नियाज़ी, शेरशाह सूरी का अफ़्गानी सरदार था तथा वह मुगलों के विरुद्ध लड़ा था।

इस मकबरे का निर्माण सूर सल्तनत के काल में तथा ईसा खाँ के सामने ही हुआ था और उसके बाद उसके पूरे परिवार के लिये काम आया था। यह अष्टकोणीय मकबरा सूर वंश के लोदी मकबरे के परिसर में स्थित अन्य मकबरों से बहुत मेल खाता है। मकबरे के पश्चिम में तीन आंगन चौड़ी लाल बलुआ पत्थर की एक मस्जिद है।

अलावल खाँ का मकबरा

सासाराम के दक्षिणी भाग में स्थित सूरी वंश के वास्तुशिल्पी एवं पाँच सौ सवारों के सेनापति अलावल खाँ का मकबरा स्थित है। यह खुला मकबरा ऊँची चहारदीवारी से घिरा हुआ है। मकबरे की पूर्वी दीवार में बड़ा मेहराबदार दरवाजा बना हुआ है। दरवाजे के भीतर एक सौ तीन वर्गफुट का वर्गाकार आंगन है।

आंगन के चारों कोनों पर चार वर्गाकार कक्ष बने हुए हैं। इनमें से उत्तरी-पूर्वी कक्ष दो मंजिला है। आंगन के बीच तीन कब्रें स्थित हैं। पश्चिमी दीवार में मेहराबदार अलंकुत मिम्बर बना है। बिहार सरकार ने इस मकबरे को संरक्षित स्मारक घोषित किया है।

शेरशाह सूरी के अन्य निर्माण

शेरशाह ने अपने राज्य में यातायात को सुचारू बनाने के लिये कई उपाय किये। उसने कई सड़कों तथा सरायों का निर्माण करवाया तथा राज्य के प्रमुख स्थानों को सड़कों से जोड़ा। कहा जाता है कि वर्तमान ग्राण्ड ट्रंक रोड का निर्माण शेरशाह ने करवाया था जो ढाका से लाहौर तक जाती थी। वस्तुतः यह सड़क महाभारत काल में भी मौजूद थी।

प्राचीन संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों में उत्तरपथ और दक्षिणपथ का विपुलता से उल्लेख हुआ है। दक्षिणपथ उत्तर भारत से तमिलनाडु तक जाता था। गौतम बुद्ध के प्रथम उपदेश का स्थान सारनाथ, उत्तरपथ एवं दक्षिणपथ के संगम पर स्थित था। शेरशाह सूरी ने इसी मार्ग को सुधरवाकर उसे मजबूती प्रदान की होगी।

शेरशाह के राज्य में दूसरी प्रमुख सड़क आगरा से बुरहानपुर तक, तीसरी आगरा से बयाना होती हुई मरुप्रदेश की सीमा तक, चौथी मुल्तान से लाहौर तक और पाँचवी आगरा से जोधपुर तथा चितौड़ तक जाती थी। अन्य कई सड़कें भी शेरशाह के समय में मौजूद थीं जो विभिन्न नगरों को जोड़ती थीं। सड़कों के किनारे छायादार पेड़ लगवाये गये और कुएँ खुदवाये गये।

शेरशाह ने प्रमुख सड़कों के किनारे चार-चार मील की दूरी पर सरायें बनवाईं जिनमें हिन्दू तथा मुसलमान यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था रहती थी। यात्रियों के लिए गर्म तथा ठण्डे जल, बिस्तर, भोजन आदि का प्रबन्ध रहता था।

घोड़ों तथा पशुओं के लिए घास एवं दाने का प्रबन्ध रहता था। समकालीन उल्लेखों के अनुसार शेरशाह ने लगभग 1700 सरायों का निर्माण तथा जीर्णोद्धार करवाया। हालांकि यह संख्या गलत जान पड़ती है क्योंकि उसे ई.1540 से 1545 तक केवल 5 साल का ही समय मिला था।

सड़कों के किनारे पर स्थित होने से ये सरायें डाक-चौकियों का काम देती थीं। इन सरायों में डाक ले जाने वाले हरकारे विद्यमान रहते थे। शेरशाह ने कई मदरसे और मस्जिदें बनवाईं तथा उनके संचालन के लिए वित्तीय व्यवस्था भी की। वह पुराने मदरसों तथा मस्जिदों को भी दान देता था। उसके राज्य में अनेक स्थानों पर दानशालाएँ खोली गईं और भोजनालय बनाये गये जहाँ निःशुल्क भोजन बँटता था।

सलीमगढ़ दुर्ग, दिल्ली

पुरानी दिल्ली में स्थित सलीमगढ़ किला ठोस गारे की चिनाई वाली दीवारों से घिरा हुआ है और बहुभुजी आकृति में निर्मित है। ई.1546 में शेरशाह सूरी के पुत्र सलीमशाह सूरी ने हुमायूँ के आक्रमणों को रोकने के लिए यमुना नदी में स्थित एक छोटे से द्वीप पर इस दुर्ग का निर्माण करवाया था। यह किला सूर स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

ई.1622 में जहाँगीर ने यहाँ पुल बनवाया और किले को मुख्य भूमि से जोड़ा। शाहजहाँ ने सलीमगढ़ के दक्षिण में लाल किले का निर्माण करवाया तथा सलीम गढ़ को लाल किले से जोड़ दिया। औरंगजेब के शासनकाल में यह किला जेल के रूप में काम लिया जाने लगा।

औरंगजेब के विद्रोही शाहज़ादे अकबर के साथ गुप्त पत्र व्यवहार करने के कारण शहजादी जेबुन्निसा को ई.1691 में सलीमगढ़ के किले में बंद किया गया। ई.1702 में इसी दुर्ग में उसकी मृत्यु हुई। शाहज़ादे मुराद बख्श को भी सलीमगढ़ के दुर्ग में बन्दी बनाकर रखा गया।

वर्तमान समय में इस दुर्ग में जाने के लिए उत्तरी द्वार से प्रवेश दिया जाता है। उत्तरी द्वार को बहादुरशाही गेट के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इसका निर्माण ई.1854-55 में अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर ने करवाया था। इस द्वार का निर्माण लाल पत्थरों एवं ईटों की चिनाई से किया गया है।

उन्नीसवीं सदी में जब ब्रिटिश इंजीनियरों ने रेल्वे लाइन का निर्माण किया तब उन्होंने जहाँगीर द्वारा निर्मित पुल को तोड़ दिया। ब्रिटिश सरकार भी सलीमगढ़ का उपयोग कारावास के रूप में कती रही। ई.1945 में भारतीय राष्ट्रीय सेना के नेताओ को यहाँ बंदी बनाकर रखा गया। किले के भीतर अनेक स्मारक हैं। वर्तमान समय में किले का नाम बदलकर स्वतंत्रता सेनानी स्मारक रखा गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अकबर कालीन भवन

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अकबर कालीन भवन - हुमायूँ का मकबरा

अकबर कालीन भवन अकबर के शासन की सुदृढ़ता का प्रदर्शन करते हैं। उनमें भव्यता कम है किंतु उनकी सुघड़ता, बनावट तथा आकार अकबर के शासन की शक्ति की घोषणा करते हैं।

अकबर का शासन-काल शासन के प्रत्येक क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के सम्मिश्रण और समन्वय का काल था। इस कारण उसके समय में स्थापत्य एवं भवन निर्माण में भी सम्मिश्रण की नई शुरुआत हुई। अकबर द्वारा निर्मित भवनों में ईरानी तथा भारतीय तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं पर इनमें प्रधानता भारतीय तत्त्वों की ही है।

कुछ विद्वानों की धारणा है कि मुगल कला का आरम्भ अकबर से ही मानना चाहिये। अबुल फजल का कथन है- ‘बादशाह सुन्दर इमारतों की योजना बनाता है और अपने मस्तिष्क एवं हृदय के विचार को पत्थर और गारे का रूप देता है।’

अकबर ने तत्कालीन शैलियों की बारीकी को समझा और अपने शिल्पकारों को इमारतें बनाने के लिए नये-नये विचार दिये। अकबर के काल में स्थापत्य कला की जो नई शैली विकसित हुई, वह वास्तव में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का समन्वय थी।

सुदृढ़ आर्थिक स्थिति के कारण अकबर के समय में साहित्य, स्थापत्य, शिल्प एवं संगीत आदि विविध कलाओं की बड़ी उन्नति हुई। अकबर के दरबार में नौ रत्नों की उपस्थिति से भी देश में कला और साहित्य की अभिवृद्धि हुई।

अकबर कालीन भवन स्थापत्य की विशेषताएँ

अकबरकालीन स्थापत्य की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार थीं-

(1.) भवन निर्माण में अधिकांशतः लाल बलुआ पत्थर का उपयोग हुआ है, कहीं-कहीं पर सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है।

(2.) अकबरी स्थापत्य शैली में मेहराबी और शहतीरी शैलियों का समान अनुपात में प्रयोग किया गया है।

(3.) आरम्भ में गुम्बद लोदी शैली में बनते रहे जो भीतर से खोखले होते थे किंतु तकनीकी दृष्टि से यह दोहरा गुम्बद नहीं था।

(4.) स्तम्भ का अग्रभाग बहुफलक युक्त था और इनके शीर्ष पर बै्रकेट या ताक बने होते थे।

(5.) भवनों का अलंकरण प्रायः नक्काशी या पच्चीकारी द्वारा होता था और उनमें चमकीले रंग भरे जाते थे।

अकबरी स्थापत्य का विकास दो चरणों में हुआ। प्रथम चरण में फतेहपुर सीकरी से पहले के स्थापत्य को रखा जाता है जिसमें आगरा, इलाहाबाद और लाहौर के किला शामिल हैं। दूसरे चरण में फतेहपुर सीकरी के निर्माण हैं।

दिल्ली के अकबर कालीन भवन

हुमायूँ का मकबरा

अकबर के शासनकाल में बनी सबसे पहली महत्वपूर्ण इमारत हुमायूँ का मकबरा थी। 20 जनवरी 1556 को हुमायूँ की मृत्यु के उपरांत उसे दिल्ली में ही दफ़्नाया गया था किंतु बाद में ई.1558 में उसके शव को खंजरबेग नामक सरदार द्वारा पंजाब के सरहिंद ले जाकर दफनाया गया।

ई.1562 में हुमायूँ की विधवा हमीदा बानो बेगम के आदेशानुसार इस मकबरे का निर्माण आरम्भ किया गया। समकालीन ग्रंथ आइने अकबरी के अनुसार मकबरे की देखरेख का काम हुमायूँ की सबसे पहली बेगम हाजी बेगम को सौंपा गया था जो हुमायूँ की ममेरी बहन थी और बाद में उसकी बेगम बनी। वह ईरानी आदर्शों से प्रभावित थी।

यह मकबरा दिल्ली के दीनापनाह अर्थात् पुराने किले के निकट स्थित है। गुलाम वंश के काल में यह भूमि किलोकरी किले में हुआ करती थी और नसीरुद्दीन (ई.1268-87) के पुत्र सुल्तान कैकूबाद की राजधानी थी। हुमायूँ के मकबरे के लिए इस स्थान का चुनाव यमुना नदी के जल की उपलब्धता तथा हजरत निजामुद्दीन की दरगाह से निकटता के कारण किया गया था।

यह मकबरा भारत में मुगल वास्तुकला का प्रथम उदाहरण है। इस मक़बरे की चारबाग शैली भी भारत में पहली बार प्रयुक्त हुई थी। इसके अनुकरण पर ही आगे चलकर ताजमहल तथा उसके चारों ओर के उद्यान का निर्माण हुआ। समकालीन इतिहासकार अब्द-अल-कादिर बदायूनीं के अनुसार इस भवन का मुख्य वास्तुकार मिराक मिर्जा घियास था जिसे अफगानिस्तान के हेरात शहर से इस मकबरे के निर्माण के लिए विशेष रूप से बुलवाया गया था।

उसने हेरात में कई भवन बनाए थे। मकबरे का निर्माण पूर्ण होने से पहले ही मिराक मिर्जा घियास की मृत्यु हो गई। अतः शेष कार्य उसके पुत्र सैयद मुहम्मद इब्न मिराक घियाथुद्दीन ने पूरा करवाया। मकबरे का मुख्य भवन ई.1571 में बनकर तैयार हुआ।

संभवतः उसी समय हुमायूँ का शव सरहिंद से निकालकर दिल्ली लाया गया और इस मकबरे में दफनाया गया। यह मुगल सल्तनत की पहली इमारत थी जिसमें लाल बलुआ पत्थर का इतने बड़े स्तर पर प्रयोग हुआ था। इसके निर्माण पर 15 लाख रुपये की लागत आयी थी।

इस भवन-समूह में बादशाह हुमायूँ तथा शाही परिवार के सदस्यों की कब्रें हैं जिनमें हुमायूँ की बेगम हमीदा बानो, हुमायूँ की छोटी बेगम, शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह, मुगल बादशाह जहांदारशाह, फर्रूखशीयर, बादशाह रफीउद्दरजात, रफीउद्दौला एवं आलमगीर (द्वितीय) आदि की कब्रें शामिल हैं।

यह भवन चारबाग शैली में निर्मित उद्यान के भीतर स्थित है। ऐसे उद्यान भारत में इससे पूर्व कभी नहीं बने थे और इसके बाद अनेक इमारतों का अभिन्न अंग बनते चले गये। यह मकबरा, बाबर के काबुल स्थित बाग-ए-बाबर मकबरे से एकदम भिन्न था। बाबर के साथ ही बादशाहों को बाग में बने मकबरों में दफ़्न करने की परंपरा आरंभ हुई थी।

मकबरा निर्माण की यह शैली पूर्ववर्ती मंगोल शासक तैमूर लंग के समरकंद (उजबेकिस्तान) में बने मकबरे पर आधारित थी तथा यही मकबरा आगे चलकर भारत में मुगल स्थापत्य के मकबरों की प्रेरणा बना। ताजमहल के निर्माण के साथ ही मकबरा निर्माण की यह स्थापत्य शैली अपने चरम पर पहुंच गई।

कुछ विद्वानों के अनुसार इस मकबरे की निर्माता हाजी बेगम, ईरानी (अर्थात् फारसी) आदर्शों से प्रभावित थी। अकबर ने इस मकबरे के निर्माण के लिए अफगानिस्तान के हेरात नगर से वास्तुशिल्पियों का बुलवाया था तथा इस मकबरे के निर्माण में अनेक भारतीय शिल्पकारों ने भी काम किया था।

उन सबके सम्मिलित प्रभाव से यह मकबरा ईरानी आदर्शों की भारतीय अभिव्यक्ति बन गया। इस इमारत का नीचे का भाग हिन्दू-मुस्लिम वास्तुकला शैली का तथा ऊपरी भाग ईरानी शैली का है किंतु इस मकबरे के चारों ओर स्वतंत्र रूप से कोई मीनार नहीं बनाई गई है।

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मकबरे के विशाल भवन में प्रवेश करने के लिये पश्चिम और दक्षिण में दो दुमंजिले प्रवेशद्वार बने हुए हैं। इनकी ऊँचाई 16 मीटर है। दोनों द्वारों में दोनों ओर कक्ष बने हुए हैं एवं ऊपरी तल पर छोटे प्रांगण स्थित हैं। मुख्य इमारत के ईवान पर सितारे अंकित किए गए हैं। एक छः किनारों वाला सितारा मुख्य प्रवेशद्वार पर भी अंकित है। पत्थरों से बनी दीवारों की चिनाई में गारे-चूने का प्रयोग किया गया है और दीवारों को बाहर से लाल बलुआ पत्थर से ढका गया है। इसके ऊपर पच्चीकारी, फर्श की सतह, झरोखों की जालियों, द्वार-चौखटों और छज्जों के लिये श्वेत संगमरमर का प्रयोग किया गया है। मकबरे का विशाल मुख्य गुम्बद श्वेत संगमरमर से ढका गया है। यह समरकंद के तैमूर के मकबरे तथा बीबी खानम के मकबरे के गुम्बद जैसा लगता है। इसकी शैली दमस्कस की 11वीं सदी के अंत में निर्मित उमैय्यद मस्जिद की शैली जैसी है। मकबरे के प्रत्येक तरफ एक द्वार मण्डप है जिसके साथ नुकीला मेहराब है। इस तरह इस भवन में विदेशी लक्षणों की अधिकता है किंतु इसकी कुछ विशेषताएं हिन्दू वास्तुकला की पंचरथ शैली की ओर संकेत करती हैं। मकबरे का भवन 8 मीटर ऊँचे चबूतरे पर खड़ा है। 12 हजार वर्ग मीटर की ऊपरी सतह को लाल जालीदार मुंडेर घेरे हुए है।

इस वर्गाकार चबूतरे के कोनों को छांटकर अष्टकोणीय आभास दिया गया है। फारसी वास्तुकला से प्रभावित यह मकबरा 47 मीटर ऊँचा और 100 मीटर  चौड़ा है। इमारत पर फारसी बल्बुअस गुम्बद बना है, जो सर्वप्रथम सिकंदर लोदी के मकबरे में देखा गया था। यह गुम्बद 42.5 मीटर ऊँचे गर्दन रूपी बेलन पर स्थित है। गुम्बद के ऊपर 6 मीटर ऊँचा पीतल का मुकुट रूपी कलश स्थापित किया गया है और उसके ऊपर चंद्रमा लगा हुआ है, जो तैमूर वंश के मकबरों में सैंकड़ों सालों से बनाया जा रहा था।

गुम्बद दोहरी पर्त में बना है, बाहरी पर्त के बाहर श्वेत संगमरमर का आवरण लगा है और भीतरी पर्त गुफा के समान बनाई गई है। दोहरी पर्त का गुम्बद बनाने का प्रयोग भारत में सबसे पहले ‘सिकन्दर लोदी के मकबरे’ में किया गया था।

हुमायूँ के मकबरे में गुम्बद को ही सफेद संगमरमर से बनाया गया है जबकि  शेष इमारत लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है जिस पर श्वेत और काले संगमरमर तथा पीले बलुआ पत्थर से पच्चीकारी का काम किया गया है। रंगों का यह संयोजन इस भवन को अनूठी आभा प्रदान करता है।

बाहर से सरल दिखने वाली इमारत की आंतरिक योजना कुछ जटिल है। मुख्य भवन में केन्द्रीय कक्ष सहित नौ वर्गाकार कक्ष बने हैं। बीच में मुख्य कक्ष है तथा उसे घेरे हुए शेष आठ दुमंजिले कक्ष बीच में खुलते हैं। बीच में बने मुख्य कक्ष को घेरे हुए शेष आठ दुमंजिले कक्ष बीच में खुलते हैं। मुख्य कक्ष गुम्बददार (हुज़रा) एवं दुगुनी ऊँचाई का एक-मंजिला है और इसमें गुम्बद के नीचे एकदम मध्य में आठ किनारे वाले एक जालीदार घेरे में बादशाह हुमायूँ की कब्र बनी है। यह इस इमारत की मुख्य कब्र है किंतु यह असली नहीं है। असली कब्र निचले कक्ष में बनी हुई है।

मुख्य कक्ष का प्रवेश दक्षिणी ओर बनी एक ईवान से होता है तथा अन्य दिशाओं के ईवानों में श्वेत संगमरमर की जालियां लगी हैं। बादशाह की असली समाधि ठीक नीचे आंतरिक कक्ष में बनी है जिसका रास्ता बाहर से आता है। इसके ठीक ऊपर दिखावटी किन्तु सुन्दर कब्र की प्रतिकृति बनायी गई है।

नीचे तक आम पर्यटकों को जाने की अनुमति नहीं है। बाद में यही प्रयोग ताजमहल में भी दोहराया गया था। हुमायूँ के मकबरे के सम्पूर्ण भवन में पीट्रा ड्यूरा नामक संगमरमर की पच्चीकारी का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार के कब्र-नियोजन भारतीय-इस्लामिक स्थापत्यकला के महत्त्वपूर्ण अंग हैं जो मुगल मकबरों अर्थात् ताजमहल आदि में प्रयुक्त हुए हैं।

मुख्य कक्ष में संगमरमर के जालीदार घेरे के ठीक ऊपर पश्चिम दिशा में अर्थात् मक्का की ओर एक मेहराब है। यहाँ पर प्रवेश-द्वारों पर खुदे कुरआन के सूरा 24 के बजाय सूरा-अन-नूर की एक रेखा बनी है जिसके द्वारा क़िबला अर्थात् मक्का की दिशा से प्रकाश आता है। इस प्रकार बादशाह का स्तर उसके विरोधियों और प्रतिद्वंदियों से ऊँचा एवं फरिश्तों के निकट हो जाता है।

प्रधान कक्ष के चार कोणों पर स्थित चार अष्टकोणीय कमरे मेहराबदार दीर्घा से जुड़े हैं। प्रधान कक्ष की भुजाओं के बीच-बीच में चार अन्य कक्ष भी बने हैं। ये आठ कमरे मुख्य कब्र की परिक्रमा बनाते हैं। ऐसी रचना सूफ़ीवादी और कई अन्य मुगल मकबरों में दिखती है; साथ ही ये जन्नत का संकेत भी करते हैं।

प्रत्येक कमरे के साथ 8-8 कमरे और बने हैं, जो कुल मिलाकर 124 कक्षीय योजना का भाग हैं। इन छोटे कमरों में अनेक शहजादों, नवाबों और दरबारियों की कब्रें स्थित हैं। इनमें हमीदा बानो बेगम और दारा शिकोह की कब्रें प्रमुख हैं। इस चबूतरे के नीचे गर्भगृह में 56 कोठरियां बनी हुई हैं। इस सम्पूर्ण भवन में 100 से अधिक कब्रें स्थित हैं। इसलिए इस इमारत को मुगलों का कब्रिस्तान भी कहते हैं। कब्रों पर मृतक का नाम अंकित नहीं होने से, कब्र में दफ़्न व्यक्ति का पता नहीं चलता है।

 इस इमारत में लाल बलुआ पत्थर पर श्वेत संगमरमर के संयोजन का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया था। यह पूर्णतः मुगल वास्तुकला से निर्मित है तथापि इसमें भारतीय स्थापत्य कला की अनेक विशेषताएं देखने को मिलती हैं। यहाँ स्थित राजस्थानी स्थापत्य की छोटी छतरियां नीली टाइल्स से ढकी गई थीं।

चारबाग

मुख्य भवन के चारों ओर एक वर्गाकार उद्यान है जिसका क्षेत्रफल लगभग 30 एकड़ है। वर्गाकार होने एवं चार भागों में बंटा हुआ होने से इसे चारबाग कहा जाता है। इस प्रकार के उद्यान न केवल भारत में अपितु सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में अपनी प्रकार के पहले उदाहरण थे। इस प्रकार के उद्यान उच्च श्रेणी की ज्यामितीय रचनाएं हैं। इस उद्यान को तीन ओर ऊँची चहारदीवारी से घेरा गया था तथा चौथी ओर यमुना नदी स्थित थी। अब यमुना नदी इस भवन से काफी दूर चली गई है।

सम्पूर्ण उद्यान चार भागों में पैदल पथों (खियाबान) और दो विभाजक केन्द्रीय नहरों (चौड़ी नालियों) द्वारा बंटा हुआ है। ये पथ एवं नहरें इस्लाम में कल्पित जन्नत के बाग में बहने वाली चार नदियों की प्रतीक हैं। इस प्रकार बने चार-बागों को पुनः पत्थर से निर्मित रास्तों द्वारा चार-चार छोटे उप-विभागों में विभाजित किया गया है।

इस प्रकार कुल मिलाकर 36 भाग बनते हैं। केन्द्रीय नहर, परिसर के मुख्य द्वार से मकबरे तक पहुँचकर उसके भूमिगत होती हुई एवं दूसरी ओर से पुनः निकलती हुई प्रतीत होती है, ठीक जैसा कुरआन की आयतों में जन्नत के बाग का वर्णन किया गया है।

केन्द्रीय पैदल पथ दो द्वारों तक जाते हैं। एक मुख्य द्वार दक्षिणी दीवार में और दूसरा छोटा द्वार पश्चिमी दीवार में है। ये दोनों द्वार दो-मंजिला हैं। दक्षिणी द्वार मुगल काल में प्रयोग हुआ करता था किंतु अब यह बंद रहता है। वर्तमान में पश्चिमी द्वार का प्रयोग किया जाता है। पूर्वी दीवार से जुड़ी हुई एक बारादरी है जिसमें नाम के अनुसार बारह द्वार हैं। उत्तरी दीवार से लगा हुआ एक स्नानघर है जिसे हम्माम कहा जाता था।

एक अंग्रेज़ व्यापारी, विलियम फ़िंच ने ई.1611 में मकबरे का भ्रमण किया उसने लिखा है कि केन्द्रीय कक्ष की आंतरिक सज्जा बढ़िया कालीनों एवं गलीचों से परिपूर्ण थी। कब्रों के ऊपर एक शुद्ध श्वेत शामियाना लगा होता था और उनके सामने ही पवित्र ग्रंथ रखे रहते थे।

इसके साथ ही हुमायूँ की पगड़ी, तलवार और जूते भी रखे रहते थे। यहाँ के चारबाग 13 हेक्टेयर क्षेत्र में फ़ैले हुए थे। आने वाले वर्षों में यह सब तेजी से बदल गया। इसका मुख्य कारण, राजधानी का आगरा स्थानांतरण था। बाद के मुगल शासकों के पास इतना धन नहीं रहा कि वे इन बागों का मंहगा रख-रखाव कर सकें।

18वीं शताब्दी तक स्थानीय लोगों ने चारबाग में सब्जी उगाना आरंभ कर दिया था। ब्रिटिश क्राउन के शासन-काल में ई.1860 में चारबाग शैली के वर्गाकार केन्द्रीय सरोवरों का स्थान अंग्रेज़ी शैली के गोल चक्करों ने ले लिया एवं क्यारियों में फूलों के पौधों के स्थान पर बड़े पेड़ उगने लगे।

20 वीं शताब्दी के आरम्भ में वायसरॉय लॉर्ड कर्ज़न ने चार बाग को वापस सुधारा। ई.1903-09 के बीच एक वृहत् उद्यान जीर्णोद्धार परियोजना आरंभ हुई जिसके अंतर्गत नालियों में भी बलुआ पत्थर लगाया गया। ई.1915 में पौधारोपण योजना के तहत केन्द्रीय और विकर्णीय अक्षों पर पौधा रोपण हुआ। फूलों की क्यारियां भी दोबारा बनायी गयीं।

भारत के विभाजन के समय, अगस्त 1947 में पुराना किला और हुमायूँ का मकबरा भारत से पाकिस्तान जाने वाले शरणार्थियों के लिये शरणार्थी कैम्प में बदल गये। बाद में इन्हें भारत सरकार द्वारा नियंत्रण में लिया गया। ये कैम्प लगभग पाँच वर्षों तक चलते रहे जिससे हुमायूँ का मकबरा परिसर के स्मारकों को अत्यधिक क्षति पहुंची। बगीचे, पानी की सुंदर नालियां, सुंदर जालियां आदि पूरी तरह बरबाद हो गए।

इस विनाश को रोकने के लिए मकबरे के अंदर के स्थान को ईंटों से ढंक दिया गया। बाद में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने इन्हें पुनः अपने पुराने रूप में स्थापित किया। मार्च 2003 में आगा खान सांस्कृतिक ट्रस्ट द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया। इसके बाद बागों की जल-नालियों में एक बार फिर से जल प्रवाह आरंभ हुआ।

ई.1857 में जब अंग्रेजों ने लाल किले पर अधिकार किया तब मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने अपने तीन शहजादों सहित इसी मकबरे के परिसर में शरण ली थी। ब्रिटिश कप्तान हडसन ने बहादुरशाह को यहीं से गिरफ्तार करके रंगून भिजवाया था।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार हडसन ने बादशाह तथा उसके शहजादों को लाल किले से गिरफ्तार करके हुमायूँ के मकबरे में रखा था और फिर यहीं से बादशाह को उसके परिवार सहित बर्मा लेजाकर नजरबन्द किया था। ई.1993 में इस भवन-समूह को विश्व-धरोहर घोषित किया गया है।

नाई का मकबरा

चारबाग के भीतर दक्षिण-पूर्वी कौने में ई.1590 में निर्मित शाही-नाई का गुम्बद है। यह मकबरा एक ऊँचे चबूतरे पर बना है जिस तक पहुंचने के लिये दक्षिणी ओर से सात सीढ़ियां बनी हुई हैं। यह वर्गाकार है और इसके अकेले कक्ष के ऊपर एक दोहरा गुम्बद बना हुआ है। भीतर स्थित दो कब्रों पर कुरआन की आयतें खुदी हुई हैं। इनमें से एक कब्र पर 999 अंकित है जिसका अर्थ हिजरी सन् 999 अर्थात् ई.1590-91 से है।

बूहलीमा का मकबरा

हुमायूँ के मकबरे की मुख्य चहारदीवारी के बाहर स्थित स्मारकों में बूहलीमा का मकबरा प्रमुख है। हुमायूं के मकबरे के परिसर के पश्चिमी किनारे पर स्थित यह मकबरा एक आयताकार परिसर में लगे हरे-भरे बगीचे में स्थित है। बाग में एक सुव्यवस्थित मार्ग बना हुआ है जिसके एक छोर पर बू हलीमा का मकबरा स्थित है।

इसका स्थापत्य एक आयताकार साधारण मकान के रूप में है जिस पर कोई गुम्बद, मीनार, बुर्ज, ईवान, मेहराब आदि फारसी संरचनाएं नहीं हैं। इस मकान को स्थानीय क्वार्टजाइट पत्थरों से बनाया गया है।

इस मकबरे की छत पर जाने के लिए पत्थरों की सीढ़ियां बनी हैं तथा इसके कक्षों में प्रवेश करने के लिए बने द्वारों के ऊपरी भाग में हिन्दू शैली के शहतीर रखे गए हैं। हालांकि मकबरे के बाहर एक मेहराब बनाया गया है इस मेहराब के ऊपर होकर ही सीढ़ियां छत पर जाती हैं। मकान की छत पर ठीक बीच में किसी गुम्बद के निशान जान पड़ते हैं।

संभवतः किसी समय इस मकबरे पर गुम्बद बनाया गया होगा जो समय के साथ नष्ट हो गया होगा। सामान्यतः मकबरे किसी बगीचे के केन्द्रीय भाग में होते हैं किंतु यह एक सिरे पर स्थित है। लोक में मान्यता है कि बू-हलीमा हुमायूँ से नजदीकी रखने वाली कोई महिला थी जिसने हुमायूं की मकबरे से केवल 100 मीटर की दूरी पर जबर्दस्ती अपना मकबरा बनवाया। 

अरब सराय

 अरब सराय बूहलीमा के मकबरे के निकट ‘अरब सराय’ स्थित है जिसे हमीदा बेगम ने मुख्य मकबरे के निर्माण में लगे कारीगरों के लिये बनवाया था। हुमायूं की विधवा ने अरब से आए 300 कारीगरों के लिए अरब सराय का निर्माण करवाया। यह हुमायूं के मकबरे के परिसर में स्थित है।

संभवतः ये कारीगर हुमायूं के मकबरे को बनाने के लिए अरब से बुलवाए गए थे। माना जाता है कि हमायूं की विधवा हाजी बेगम जब हज करने के लिए मक्का गई थी, तब वहाँ से लौटते समय वह इन कारीगरों को लेकर आई। इस सराय का मुख्य द्वारा एक बड़े ईवार के रूप में बनाया गया है जिसमें दो विशाल मेहराब बनाए गए हैं।

इस द्वार से प्रवेश करने पर सराय का मुख्य हिस्सा दो भागों में बंटा हुआ दिखाई देता है जिनमें एक जैसी मेहराबदार कोठरियां बनी हुई हैं तथा अब भग्न अवस्था में हैं। इस मेहंदी बाजार भी कहा जाता है जिसके बारे में मान्यता है कि इसे जहाँगीर के मुख्य हींजड़े मिहर बनू ने बनाया था। यह सराय अफसरवाला मकबरा के निकट ही स्थित है।

अफ़सरवाला मकबरा एवं मस्जिद

बूहलीम के मकबरे के परिसर में ही ‘अफ़सरवाला मकबरा’ बना है, जो अकबर के एक नवाब के लिये बना था। इसके साथ ही एक मस्जिद भी बनी है। अफसर वाला मकबरा तथा अफसरवाली मस्जिद दोनों एक ही प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं तथा दोनों इमारतें स्थानीय क्वार्टजाईट पत्थर से बनी हैं।

दोनों भवनों की बाहरी दीवारों पर लाल बलुआ पत्थर से सजावट की गई है। लाल बलुआ पत्थर में सफेद संगमरमर से पर्चिनकारी की गई है। इन इमारतों के भीतर की बनावट फारसी शैली पर आधारित है तथा सादगी पूर्ण है। दोनों ही भवन अब जीर्ण अवस्था में हैं। मस्जिद का मुख्य कक्ष ‘थ्री बे’ बना हुआ है।

बीच की ‘बे’ के चारों ओर मेहराब बने हुए हैं जिनके ऊपर एक गुम्बद स्थित है। गुम्बद के भीतरी हिस्से में चित्रों का एक पूरा पैनल है। मस्जिद का ‘तिहरा ईवान’ फारसी शैली में निर्मित है।

अफसरवाला मकबरे के भीतर एक ही कक्ष है जिसमें संगमरमर की कब्रें बनी हुई हैं जिनमें से एक कब्र पर कुरान की नौ सौ चौहत्तरवीं आयत लिखी गई है। जो संभवतः हिजरी 974 की द्योतक है। इस हिसाब से यह कब्र ई.1566-67 में बनी होनी चाहिए। अफसर वाला मकबरा के ऊपर दो गुम्बद बने हुए हैं।

यह मकबरा बाहर से अष्टकोणीय दिखाई देता है। इनमें से चार तरफ की दीवारों में चार मेहराबदार प्रवेशद्वार बने हुए हैं जो सीधे ही कब्र वाले कमरे में खुलते हैं।  मेहराबों को लाल बलुआ पत्थरों के अलंकरणों से सजाया गया है। गुम्बद के ऊपर एक उलटा कमल लगा है जो कलश के लिए आधार बनाता है। इस आधार पर एक मंगल-कलश रखा हुआ है। अकबर कालीन भवन में इस प्रकार का कमल एवं कलश बहुत कम दिखाई देता है।

आदम खाँ का मकबरा

आदम खाँ अथवा (अदहम खाँ) अकबर की धाय ‘माहम अनगा’ का पुत्र था। चूंकि अकबर केवल चौदह साल की आयु में बाशाह बन गया था इसलिये माहम अनगा ही बहुत दिनों तक सरकार चलाती रही जिसे ‘हरम सरकार’ कहते थे। माहम की ऐसी प्रभावी स्थिति के कारण उसका पुत्र आदम खाँ स्वयं को बादशाह के बराबर समझने लगा। वह अत्यंत घमण्डी और बुरे स्वभाव का व्यक्ति था तथा अकबर से भी उद्दण्डता कर बैठता था।

अकबर अपनी धाय का बहुत आदर करता था। इसलिए आदम खाँ की उद्दण्डता को सहन करता था। एक दिन आदम खाँ ने कचहरी में घुसकर अकबर के वकील-ए-मुतलक (प्रधानमंत्री) अतगा खाँ की हत्या कर दी और इसके बाद वह नंगी तलवार लेकर बादशाही हरम की तरफ गया। उस समय अकबर सो रहा था। इसलिए महल के हिंजड़ों ने महल के दरवाजे बंद कर दिए।

इस शोरगुल से अकबर की नींद खुल गई और उसने शोरगुल का कारण पूछा। उसी समय आदम खाँ भीतर आ गया और उसने शराब के नशे में अकबर को अपशब्द कहे। अकबर ने अपनी तलवार निकालकर आदम खाँ की छाती पर टिका दी और आदम खाँ से कहा कि अपनी तलवार हिंजड़े को दे दे किंतु आदम खाँ ने अकबर का आदेश मानने की बजाय अकबर की तलवार छीनने के लिए उसकी कलाई पकड़ ली।

अकबर ने आदम खाँ को कसकर मुक्का मारा जिससे आदम खाँ बेहोश हो गया। अकबर ने हिंजड़ों का आदेश दिया कि वे आदम खाँ के हाथ-पैर बांध कर उसे महल की मुंडेर से नीचे फैंक दें। ऐसा ही किया गया जिससे आदम खाँ की मृत्यु हो गई। अकबर ने हिंजड़ों को आदेश दिया कि वे मरे हुए आदम खाँ उठाकर लाएं और फिर से एक बार नीचे गिराएं।

इसके बाद अकबर अपनी धाय माहम अनगा के महल में गया और उसे घटना की जानकारी दी। माहम ने अकबर के निर्णय का समर्थन किया और स्वयं भी पुत्र-शोक में चालीस दिन बाद ही मर गई। इस प्रकार अकबर को हरम सरकार से छुटकारा मिल गया। अकबर ने दिल्ली में एक मकबरा बनवाया जिसमें आदम खाँ तथा माहम अनगा के शव दफन करवाए। आज भी यह मकबरा अच्छी हालत में है।

यह मक़बरा दक्षिणी दिल्ली के लालकोट की दीवार पर बने एक चबूतरे पर बना है। इस अष्टकोणीय इमारत के गुम्बद को 15-16वीं सदी के सैयद और लोदी शासन-काल में बनी इमारतों की शैली में बनाया गया है। मक़बरे में चारों तरफ मेहराबदार बरामदे बने हैं। प्रत्येक बरामदे में तीन दरवाजे हैं।

ई.1830 में मि. ब्लैक नामक बंगाल सिविल सेवा के अंग्रेज अधिकारी ने इस मकबरे में अपना निवास स्थान बनाया और मक़बरे के बीचों-बीच अपने डाइनिंग हॉल तक रास्ता साफ करने के लिए इसके अंदर बनी कब्रें हटा दीं। लम्बे समय तक यह मक़बरा अंग्रेज अधिकारियों का अतिथिगृह बना रहा। बाद में कुछ समय तक इस मक़बरे को पुलिस थाने और डाकघर के रूप में भी काम में लिया गया। ब्रिटिश वॉयसराय लॉर्ड कर्ज़न के आदेश से इस मक़बरे को खाली करके कब्रों का पुनर्निर्माण किया गया।

आगरा के अकबर कालीन भवन

आगरा का किला

आगरा का किला भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा शहर में स्थित है। इस किले को इतिहासकार चारदीवारी से घिरी पैलेस-सिटी (प्रासाद-नगरी) कहना अधिक उचित मानते हैं। आगरा का किला लगभग डेढ़ मील के घेरे में स्थित है। यह भारत के महत्वपूर्ण किलों में से एक है तथा प्राचीन दुर्ग श्रेणी विभाजन के अनुसार स्थल-दुर्ग की श्रेणी में आता है।

इस किले की साधारण रूपरेखा मानसिंह द्वारा बनवाये गये ग्वालियर के किले से मिलती-जुलती है। लोदी सुल्तान सिकंदर लोदी तथा इब्राहीम लोदी एवं मुगल बादशाह बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगज़ेब इस किले में थोड़े-बहुत समय के लिए अवश्य रहे। इस दुर्ग में मुगलों का सबसे बड़ा खजाना, बहुमूल्य रत्न, स्वर्ण एवं अन्य कीमती सम्पत्ति रहती थी। इस दुर्ग में मुगलों की टकसाल भी थी जिसमें सोने-चांदी के सिक्के ढाले जाते थे।

आगरा का दुर्ग मूलतः हिन्दुओं का बनवाया प्रतीत होता है क्योंकि इसका पुराना नाम बादलगढ़ था। यह मूलतः ईंटों से बनाया गया था। इसका वास्तविक निर्माण काल बताया जाना संभव नहीं है। ई.1018 में महमूद गजनवी ने जब उत्तर भारत के बुलंदशहर, मथुरा तथा कन्नौज आदि महत्वपूर्ण नगरों पर आक्रमण किया, उस समय आगरा का दुर्ग चौहान शासकों के अधीन था।

सिकंदर लोदी (ई.1487-1517) दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने आगरा की यात्रा की तथा उसने ई.1504 में आगरा के किले की मरम्म्त करवाई। वह कुछ समय के लिए इस किले में रहा। ई.1504 में सिकंदर लोदी ने इसे अपनी राजधानी बनाया। यह भारत की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन था क्योंकि भारत की राजधानी दिल्ली से खिसक कर आगरा आ गई थी।

ई.1517 में इसी किले में सिकंदर लोदी का निधन हुआ। उसके पुत्र इब्राहीम लोदी ने भी इसी दुर्ग को अपनी राजधानी बनाया। उसने इस दुर्ग में अनेक मस्जिदें, महल एवं कुएं आदि बनवाये। ई.1526 में वह पानीपत के मैदान में बाबर के विरुद्ध लड़ता हुआ मृत्यु को प्राप्त हुआ।

जब ई.1526 में बाबर ने लोदियों को परास्त किया तब वह दिल्ली पर अधिकार करने के बाद आगरा भी आया। मुगलों को इस किले से अगाध सम्पत्ति प्राप्त हुई। इस सम्पत्ति में ही कोहिनूर हीरा भी था। बाबर ने इस दुर्ग में एक बावली बनवायी। ई.1530 में हुमायूँ का राजतिलक आगरा के दुर्ग में हुआ था।

ई.1540 में जब शेरशाह सूरी ने हुमायूँ से उसका राज्य छीना तब उसने आगरा के दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया। ई.1555 में हुमायूँ ने इसे विक्रमादित्य हेमचंद्र से छीना किंतु इस बार हुमायूँ ने दिल्ली में ही रहना पसंद किया। जब ई.1556 में अकबर बादशाह हुआ तो उसने भी दो वर्ष तक अपनी राजधानी दिल्ली में रखी तथा दिल्ली में ही उसकी मृत्यु हुई।

ई.1558 में जब अकबर आगरा आया तो उसने इस दुर्ग को देखने के बाद अपनी राजधानी आगरा में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। इस प्रकार एक बार पुनः भारत की राजधानी दिल्ली से आगरा स्थानांतरित हो गई।

अबुल फजल ने लिखा है कि- ‘यह किला ईंटों से बना हुआ था और बादलगढ़ के नाम से जाना जाता था। यहाँ लगभग पाँच सौ सुंदर इमारतें, बंगाली व गुजराती शैली में बनी थीं।’

यह किला अत्यंत जीर्ण-शीर्ण स्थिति में था इसलिए अकबर ने इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया। उसने धौलपुर के निकट करौली से लाल पत्थर मंगवाकर ईंटों की दीवारों पर चढ़वा दिया और लगभग सम्पूर्ण दुर्ग का पुनर्निर्माण करवाया। 8 साल तक लगभग 4,000 कारीगर एवं श्रमिक इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करते रहे। ई.1573 में यह दुर्ग दुबारा से बनकर तैयार हुआ और अकबर अपने परिवार सहित इसमें निवास करने लगा।

आगरा के किले की पौरुषपूर्ण विशालाकाय दीवारें और परकोटे किसी महान सत्ता की शक्ति का परिचय देते हैं। किले के भीतर गुजरात और बंगाल शैली के भवन हैं। इस किले के भीतर स्थित लगभग सभी भवनों को शाहजहाँ ने दुबारा बनवाया किंतु किले का मुख्य द्वार अर्थात् दिल्ली दरवाजा और जहाँगीरी महल  अकबर के समय के ही निर्मित हैं।

ई.1566 में निर्मित दिल्ली दरवाजा अकबर के प्रारम्भिक काल की स्थापत्य कला विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है। इस किले का निर्माण तराशे हुए लाल बलुआ पत्थर से किया गया है। इन भवनों के मेहराब, दोनों ओर झुकी हुई अष्टकोणीय दीवारें, तोरणयुक्त छतें, मण्डप, कंगूरे, लाल बलुआ पत्थर पर सफेद पत्थर का अलंकरण प्रमुख हैं।

अकबरी महल

अकबरी महल की स्थापत्य शैली, जहाँगीरी महल के स्थापत्य की तुलना में कम कलात्मक है एवं भद्दी सी दिखाई देती है। अकबरी महल में बंगाली शैली के बुर्ज बने हुए हैं तथा यह महल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

जहाँगीरी महल

अकबरी महल के निकट जहाँगीरी महल का निर्माण करवाया गया। जहाँगीरी महल हिन्दू और इस्लामी पद्धति के मिश्रण से बना है। जहाँगीरी महल में कई स्तम्भ हैं तथा इस महल में जालियों द्वारा सजावट की गई है। यह हिन्दू कला से प्रभावित है। दोनों महलों के बीच में चौकोर आँगन है तथा चारों ओर दुमंजिले कमरे बने हुए हैं।

इस महल में गुम्बदों के बदले छतरियां प्रयुक्त हुई हैं। यह महल ग्वालियर के मानसिंह महल से प्रेरित है। इस महल में हिन्दू स्थापत्य की अधिकता होने से अनुमान लगाया जाता है कि यह महल अकबर के आगरा आगमन से पहले भी मौजूद था तथा हिन्दू राजाओं द्वारा बनवाया गया था। अकबर ने उसका जीर्णोद्धार करवाया और कुछ नव-निर्माण भी करवाए।

फतेहपुर सीकरी के जोधाबाई महल का स्थापत्य इसी जहाँगीरी महल के स्थापत्य से मेल खाता है जो कि मूलतः सीकरी के पूर्ववर्ती शासकों अर्थात् सिकरवार राजपूतों ने बनवाया था और जिसे अकबर द्वारा निर्मित बताया जाता है।

कलात्मक जलकुण्ड (हौज)

जहाँगीरी महल के सामने एक हौज का भी निर्माण करवाया गया था जो एक प्याले के आकार का है। हौज के बाहरी भाग में कुछ पंक्तियां खुदी हुई हैं। अब यह हौज खण्डहर अवस्था में है।

परकोटा एवं दरवाजे

आगरा का किला अर्ध-वृत्ताकार क्षेत्र में बना हुआ है जिसकी सीधी भुजा, यमुना नदी के समानांतर है। इसका बाहरी परकोटा सत्तर फुट ऊँचा है। इसमें दोहरे परकोटे हैं, जिनके बीच-बीच में भारी बुर्ज बराबर अंतराल पर हैं, जिनके साथ ही तोपों के झरोखे एवं रक्षा चौकियां भी बनी हैं।

इसके चार कोनों पर चार द्वार हैं, जिनमें से एक खिड़की द्वार, नदी की ओर खुलता है। इसके दो द्वारों को दिल्ली गेट एवं लाहौरी दरवाजा कहते हैं। जहाँगीर ने अकबर दरवाज़ा का नाम अमरसिंह दरवाजा कर दिया था। यह दरवाजा, दिल्ली-दरवाजा से मेल खाता है। दोनों ही लाल बलुआ पत्थर के बने हैं।

आजकल दर्शक किला देखने के लिये अमरसिंह दरवाजे से प्रवेश दिया जाता है। नगर की ओर का दिल्ली दरवाजा, चारों द्वारों में से भव्यतम है। इसके अंदर एक और द्वार है जिसे हाथी पोल कहते हैं। इसके दोनों ओर दो वास्तविक आकार के हाथियों की पाषाण प्रतिमाएं हैं। इनके निकट रक्षक भी खड़े हैं। एक द्वार से खुलने वाला पुल खाई पर बना है। दुर्ग की प्राचीर में एक चोर दरवाजा भी है।

भवनों की सजावट

इस्लामी अलंकरणों में ज्यामितीय नमूने, लिखाइयां तथा कुरान की आयतें आदि ही फलकों की सजावट में दिखाई देतीं हैं किंतु आगरा के किले के भवनों में हिन्दू एवं इस्लामी स्थापत्य कला का मिश्रण देखने को मिलता है। कई अलंकरण तो ऐसे हैं जिन्हें इस्लाम में वर्जित माना गया है, जैसे- अज़दहे, हाथी एवं पक्षी, जिनसे स्पष्ट है कि ये मूलतः हिन्दू भवन हैं।

अबुल फजल ने इस दुर्ग में लगभग 500 भवनों का उल्लेख किया है। इनमें से कुछ भवन शाहजहाँ के समय ध्वस्त करके सफेद संगमरमर से दुबारा बनाए गए। बहुत सी इमारतों को ब्रिटिश अधिकारियों ने मिलिट्री बैरेक बनवाने के लिए ई.1803 से 1862 के बीच तुड़वा दिया। वर्तमान में दक्षिण-पूर्वी ओर कठिनाई से तीस इमारतें शेष बची हैं।

जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने इस दुर्ग के अनेक पुराने निर्माणों को गिरवाकर नए भवनों का निर्माण कराया जिनका वर्णन जहाँगीर तथा शाहजहाँ के काल में हुए निर्माणों के साथ किया गया है।

फतहपुर सीकरी के अकबर कालीन भवन

फतेहपुर सीकरी, आगरा से 23 मील दक्षिण-पश्चिम में एक ढालू पहाड़ी पर स्थित है। इस नगर के तीन ओर दीवारें और एक ओर कृत्रिम झील थी। यह नगर ई.1571 में बनना आरम्भ हुआ और ई.1580 में बनकर तैयार हुआ। इस समय तक अकबर गुजरात एवं राजपूताना की रियासतों को अपने अधीन कर चुका था। अतः उसके पास अपार सम्पदा एकत्रित हो गई थी। अकबर के दो पुत्रों सलीम (जहाँगीर) तथा मुराद का जन्म सीकरी में ही हुआ था। इसलिए अकबर सीकरी को अपने लिए सौभाग्यशाली समझता था।

अबुल फजल ने लिखा है- ‘शहजादे सलीम का जन्म शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से हुआ था इस कारण शेख सलीम चिश्ती के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए अकबर ने सीकरी को भव्यता प्रदान करने का निर्णय लिया और वहाँ अकबर की राजधानी का निर्माण किया गया।’

जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘मेरे श्रद्धेय पिता ने सीकरी गांव को जो कि मेरा जन्मस्थान था, अपने लिए सौभाग्यपूर्ण समझकर उसे अपनी राजधानी बना लिया। चौदह-पन्द्रह वर्षों में यह जंगली जानवरों से भरी हुई पहाड़ी, समस्त प्रकार के महलों से युक्त नगरी बन गई।’

रिचडर्स ने लिखा है- ‘महलों के बीच बनी मस्जिद में शेख का मकबरा बनवाकर अकबर ने सांकेतिक रूप से राजनीतिक और आध्यात्मिक सत्ता का परस्पर संयोजन कर फतेहपुर सीकरी और आगरा को राजनीतिक सत्ता तथा अजमेर की आध्यात्मिक सत्ता को व्यावहारिक रूप देने की कोशिश की।’

फतेहपुर सीकरी के भवनों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-

(1.) मजहबी इमारतें- जामा मस्जिद, शेख सलीम चिश्ती की दरगाह, बुलंद दरवाजा, इबादतखाना (केन्द्रीय कक्ष या दीवाने आम) आदि।

(2.) रिहाइशी इमारतें- ख्वाबगाह, जोधाबाई महल, बीरबल महल (जनाना महल), बीबी मरियम महल, तुर्की सुल्ताना महल, अबुल फजल एवं फैजी के महल आदि।

(3.) कार्यालयी इमारतें- खजाना, दीवाने आम, दीवाने खास (खास महल) आदि।

मजहबी इमारतें

फतहपुर सीकरी की मजहबी इमारतों का निर्माण अर्द्ध-वृत्ताकार या धनुषाकार शैली में हुआ जबकि गैर-मजहबी इमारतों के निर्माण में शहतीर शैली काम में ली गई।

जामा मस्जिद: सीकरी की जामा मस्जिद यद्यपि इस्लामी स्थापत्य के आधार पर बनाई गई है तथापि इसमें भारतीय स्थापत्य के तत्वों को भी अपनाया गया है। इस मस्जिद के ऊपर तीन गुम्बदों का निर्माण किया गया जिनमें से केन्द्रीय गुम्बद अन्य दोनों की अपेक्षा विशाल है।

इस मस्जिद की रूपरेखा सामान्य है और इसके अग्रभाग की गणना देश की मस्जिदों के सर्वोत्तम अग्रभागों में की जाती है। इसके स्तम्भ और छत पर हिन्दू प्रभाव है। सामान्यतः यह माना जाता है कि इसके गुम्बद ईरानी स्थापत्य की प्रतिकृति हैं किंतु इसका केन्द्रीय गुम्बद चम्पानेर की जामी मस्जिद के गुम्बद से काफी साम्य रखता है। इन तीनों गुम्बदों के ऊपर के कलश पूरी तरह से हिन्दू स्थापत्य से लिए गए हैं।

मस्जिद और उसके केन्द्रीय भाग में सजावट के लिए भित्तिचित्र बनाए गए हैं। पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘इस सुन्दर इमारत में जो सजावट की विभिन्नता है, उसका सही वर्णन नहीं किया जा सकता किंतु ऐसा लगता है कि इसके कलाकारों ने किसी बहुत ही सुंदर हस्तलिखित ग्रंथ के पृष्ठों को अपना नमूना मान लिया और उन्हें अपनी रेखाओं तथा रंगों के ताने-बाने में बुनकर दीवारों के रिक्त स्थान की सजावट के लिए अंकित कर दिया।’

कुछ विद्वानों के अनुसार फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिद केवल दीन-ए-इलाही के अनुयायियों के लिये थी। संभवतः मस्जिद के मूल निर्माण के समय केवल मस्जिद ही बनाई गई थी, इस कारण उत्तरी दरवाजा भी बनाया गया किंतु बाद में इसके उत्तरी कौने में शेख सलीम चिश्ती को दफनाया गया। उस समय मस्जिद का उत्तरी द्वार बंद कर दिया गया। अकबर ने लगभग 25 वर्ष बाद दक्षिण विजय के उपरांत दक्षिण द्वार भी गिरवा दिया और उसके स्थान पर बुलंद दरवाजा बनवाया।

शेखी सलीम चिश्ती का मकबरा: शेखी सलीम चिश्ती का मकबरा फतेहपुर सीकरी की स्थापत्यकला का विशिष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण जामा मस्जिद के खुले आंगन के उत्तरी कोने में किया गया है। फतेहपुर सीकरी के अन्य भवन लाल बलुआ पत्थर के बने हुए हैं किंतु चिश्ती का मकबरा सफेद संगमरमर से बना हुआ है।

पर्सी ब्राउन का मानना है कि फतेहपुर की अन्य इमारतों की भांति इसका निर्माण भी लाल बलुआ पत्थर से हुआ हो लेकिन जहाँगीर या शाहजहाँ के काल में इसकी रचना में बिना कोई परिवर्तन करवाए ही इसको ज्यों का त्यों संगमरमर की इमारत में बदल दिया गया।

इसकी योजना वर्गाकार है और इसको सुसज्जित करने के लिए सजावटपूर्ण स्तम्भों और छज्जों का निर्माण किया गया है। इसके शाफ्ट्स टेढ़े-मेढ़े और सर्पिलाकार हैं और उनके ऊपर का शिरो-भाग चूने की उभरी हुई आकृतियों से सजाया गया है।

बरसाती की स्तम्भों के कोष्ठक (ब्रैकेट) बहुत सुंदर हैं। सलीम चिश्ती के मकबरे की विशेषताएं हिन्दू मंदिरों से ली गई हैं। शेख सलीम की दरगाह में इतनी हिन्दू विशेषताओं को देखकर स्मिथ आश्चर्य में पड़ गए थे। उन्होंने लिखा है कि सम्पूर्ण भवन में हिन्दू अनुभूति का अनुमान होता है।

इस भवन के भीतरी भागों को सुंदर जालियों, सजावटदार दीवारों तथा फर्श को रंग-बिरंगी कलाकृतियों द्वारा सुसज्जित किया गया है। मकबरे की कब्र के चबूतरे के ऊपर एक लकड़ी की चांदनी है जिसमें आबनूस की लकड़ी और सीपों का जड़ाऊ कार्य किया गया है।

पर्सी ब्राउन ने इसे देखते हुए लिखा है कि इसकी स्थापत्य कला इस्लाम की बौद्धिकता तथा गांभीर्य की अपेक्षा मंदिर निर्माता की मुक्त कल्पना का आभास कराती है। इस मकबरे में शेख सलीम चिश्ती और उसके पौत्र इस्लाम खाँ की कब्रें बनी हुई हैं।

बुलंद दरवाजा: भारत का सबसे ऊँचा दरवाजा फतेहपुर सीकरी की मस्जिद के दक्षिणी द्वार की तरफ निर्मित बुलंद दरवाजा है। पृथ्वी की सतह से इसकी ऊँचाई 176 फुट है जबकि इसके चबूतरे की ऊँचाई 42 फुट है। इसके आगे का भाग 130 फुट चौड़ा तथा आगे से पीछे तक लम्बाई 123 फुट है।

इसे ई.1573 में अकबर की गुजरात विजय के उपलक्ष्य में बनाया गया था। इसे पूरा होने में पाँच साल लगे थे। अर्थात् यह ई.1578 में बनकर तैयार हुआ।

बुलंद दरवाजा स्वयं अपने-आप में एक भवन है। इसमें एक बड़े हॉल के साथ कई छोटे-छोटे कक्षों की योजना है जिनके द्वारा जामा मस्जिद के भवन तक पहुंचा जा सकता है। इस प्रवेश द्वार का आगे का भाग ईरानी शैली में बना हुआ है किंतु इसकी बनावट स्पष्ट रूप से भारतीय है। केंद्रीय द्वार-मण्डप में तीन मेहराबदार प्रवेश द्वार हैं जिनमें सबसे बड़ा मध्य में है। इसे ‘होर्स शू गेट’ के रूप में जाना जाता है।

इसके बीच के ऊँचे भाग और उसके दोनों ओर के कम ऊँचे तथा कोण पर कम होते हुए भागों को तीन सतहों द्वारा उभारा गया है। बीच का भाग एक सिरे से दूसरे सिरे तक 86 फुट है। इसकी बनावट आयताकार है और इसकी सतह के बड़े भाग में एक मेहराबी और गुम्बदी मार्ग है।

इसके दोनों बगल के संकरे भाग तीन-मंजिले हैं। उनकी प्रत्येक मंजिल पर कई प्रकार की खिड़कियां हैं। इसके अग्रभाग का मेहराबी मार्ग इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। दरवाजे के दक्षिणी अग्रभाग पर एक सुंदर कंगूरेदार सफी है जिसके पीछे 12 ऊँची गुमटियां हैं। इनके पीछे तीन और छतरियां हैं जिनके ऊपर गोल गुम्बद हैं। इन गुम्बदों पर कलश चढ़ाए गए हैं।

दरवाज़े के प्रवेश द्वार में दो शिलालेख लगे हैं। बुलंद दरवाजा यूनेस्को की विश्व-धरोहर संरचनाओं की सूची में सबसे महत्वपूर्ण इमारतों में से एक माना जाता है। पर्सी ब्राउन ने इसके बारे में लिखा हैं- ‘बुलन्द दरवाजा एक प्रभावशाली निर्माण कार्य है, विशेषकर तब जबकि यह जमीन पर खड़ा होकर देखा जाये। तब यह उत्तेजक एवं विस्मयकारक शक्ति का रूप दिखाई देता है किन्तु इसका प्रभाव भार-स्वरूप तथा दिखावटी प्रतीत नहीं होता है।’

सरकारी इमारतें

दीवान-ए-आम: दीवान-ए-आम की बनावट आयताकार है तथा दीवान-ए-खास की वर्गाकार। दीवाने आम के मध्य में एक नक्काशीदार केन्द्रीय स्तम्भ है जिसका शीर्ष, आकार में विशाल है। इसी शीर्ष पर जैन शैली के मेहराबदार ब्रैकिटों पर गोल चबूतरा टिका हुआ है। इसमें बौद्ध तथा हिन्दू वास्तुकला की झलक दिखाई देती है।

केन्द्रीय स्तम्भ के शीर्ष पर बैठी देवी की मूर्ति की कल्पना की गई है जिसे कन्हेरी की बौद्ध गुफाओं में सामान्यतः देखा जा सकता है। ऐसी बनावट का आशय यह प्रतीत होता है कि जब अकबर विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के प्रतिनिधियों के बीच विवाद को सुनता हुआ इस केन्द्रीय मंच पर आसीन होता होगा तो संभवतः अपने सिंहासन को ‘बिहिश्त’ के सिंहासन के समकक्ष अनुभव करने का प्रयास करता होगा।

वास्तव में यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि यह कक्ष दीवान-ए-आम था अथवा धार्मिक चर्चाओं के लिए प्रयोग में लिया जाने वाला कक्ष अर्थात् ‘इबादतखाना’, जहाँ से अकबर ने ‘दीन-ए-इलाही’ का प्रवर्तन किया था!

दीवाने खास: इसे खास हॉल भी कहते हैं। यह पच्चीसी आंगन के उत्तरी छोर पर स्थित है। यह अकबर का शाही कक्ष था। अकबर द्वारा निर्मित दीवान-ए-खास अनेक विशेषताओं से युक्त है। यह इमारत बहुत ही प्रभावशाली है। इस इमारत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बनावट है जो कलाकारी का उत्कृष्ट उदाहरण है।

इसके मध्य का सतून अत्यन्त सुन्दर ढंग से बना है जिसकी नक्काशी देखने योग्य है। इसी सतून के ऊपर शाही तख्त रखा रहता था जिसको रोकने के लिए बहुत सी नक्शदार छतगीरियाँ हैं। सिंहासन तक पहुँचने के लिये चारों कोनों से छज्जों के रूप में चार मार्ग बनाये गये हैं। इसका निर्माण हिन्दू स्थापत्य के अनुसार हुआ है। इसके निकट ही ‘आंख-मिचौली’ बनी हुई है।

ट्रेजरी: दीवान-ए-खास के पास ट्रेजरी है। इसे गुप्त पत्थर की तिजोरी का घर भी कहा जाता था जो कुछ कोनों में सुरक्षित था। इस ट्रेजरी की छत पर ‘समुद्र- राक्षसों’ की मूर्तियां बनाई गई थीं जो यहाँ जमा किये गये धन की रक्षा करने के उद्देश्य से थीं।

ज्योतिषी की छतरी: ट्रेजरी के सामने ज्योतिषी की छतरी है जिसकी छत जैन शैली में तैयार की गई है।

रिहाइशी इमारतें

पंचमहल: पंचमहल अथवा हवामहल पच्चीसी आंगन के पश्चिम में स्थित ‘जनाना बाग’ के एक कोने में स्थित है। इस महल में अकबर द्वारा आंचलिक स्थापत्य तत्वों का समावेश किया गया था। इसमें नालंदा के बौद्ध विहारों के लक्षण दिखाई देते हैं। हिन्दू और बौद्ध धर्म-ग्रंथों में उल्लिखित सभा भवनों के आदर्श पर ही सम्भवतः पंच महल की निर्माण योजना तैयार की गई थी।

इस पाँच मंजिले खुले मण्डप की पहली मंजिल एक बड़े हॉल जैसी है। ऊपर वाली प्रत्येक मंजिल अपनी नीचे वाली मंजिल से छोटी होती गई है। पाँचवे तल में अर्थात् सबसे ऊपर के तल में चौखूंटे स्तम्भों पर टिकी हुई एक छोटी सी सुन्दर छतरी है।

सबसे नीचे की मंजिल में 84, पहली मंजिल में 56, दूसरी मंजिल में 20, तीसरी मंजिल में 20, चौथी मंजिल में 12 तथा सबसे ऊपर की मंजिल में 4 स्तम्भ हैं तथा सम्पूर्ण भवन में कुल 196 स्तम्भ हैं। हर स्तम्भ पर अलग तरह की नक्काशी की गई है। कहीं पर जैन स्थापत्य कला शैली की विशेषतायें दिखाई देती हैं तो कहीं पर हिन्दू स्थापत्य शैली की।

इसी प्रकार मुस्लिम स्थापत्य कला तथा बौद्ध स्थापत्यकाल की विशेषताओं को भी सम्मिलित किया गया है। नीचे की मंजिलों पर हिन्दू स्थापत्य शैली की छाप अधिक है। सजावट तथा सुन्दरता के लिये घण्टियों तथा जंजीरों की बेलों का बहुत सुंदर ढंग से प्रयोग किया गया है।

पंचमहल का निर्माण वस्तुतः हवामहल के रूप में किया गया था ताकि हरम की औरतें गर्मियों के दिनों में ठण्डी हवा का आनंद ले सकें। इसके बाहरी हिस्सों को पत्थरों की कलात्मक जालियों से ढका गया था ताकि कोई बाहरी व्यक्ति हरम की औरतों को न देख सके। इस महल का निर्माण सिकरवार राजपूतों द्वारा किया गया जो कि मुगलों के फतेहरपुर सीकरी आगमन से पहले सीकरी क्षेत्र पर शासन करते थे।

जोधाबाई का महल: जोधाबाई का महल फतहपुर सीकरी के महलों में सबसे पुराना एवं सबसे बड़ा है। जोधाबाई जहाँगीर की पत्नी थी तथा उसका वास्तविक नाम जगत गुसाईन था। वह जोधपुर की राजकुमारी थी। इस महल की बनावट न तो मुस्लिम स्थापत्य शैली की है और न हिन्दू स्थापत्य के अनुसार। वास्तव में यह इमारत अपने समय की मिली-जुली शैलियों की है। इसकी बनावट आगरा के जहाँगीरी महल के समान है। इसकी छत बहुत सुन्दर एवं सजीव है और इसमें तराशे हुए पत्थरों का उपयोग हुआ है।

पर्सी ब्राउन ने लिखा है कि इस भवन से तत्कालीन स्थापत्य कला के पूर्ण विकसित रूप का परिचय मिलता है। इसके निर्माण में भारतीय शैली के कोष्ठकों (ब्रैकेट्स) का प्रयोग किया गया है। पर्सी का मानना है कि इस भवन का निर्माण अवश्य ही गुजराती कारीगरों को सौंपा गया होगा। जहाँगीरी महल शाही आवास का आरम्भिक और प्रायोगिक रूप लगता है। जबकि जोधाबाई महल परिपक्व रूप लिए हुए है।

बीबी मरियम की कोठी: इसका असली नाम सुनहरी मकान है। यह दो-मंजिला भवन, जोधाबाई महल के निकट स्थित है। इसे सज्जित और कलात्मक बनाने के लिए बेहतर नक्काशी का काम किया गया है। इसके स्तम्भों में बंदरों, हाथियों और चीतों आदि वन्य-पशुओं की आकृतियां बनाई गई थीं। इसकी भीतरी तथा बाहरी दीवारों पर सुनहरे पत्थर जड़े गए थे। इसमें संगतराशी का अच्छा काम किया गया था। महल के भीतरी भाग में ईरानी शैली के सुन्दर चित्र बनाये गये थे जो अब नष्ट हो गये हैं।

स्मिथ ने इन चित्रों को ईसाई धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबिल पर आधारित बताया है परन्तु इसमें पंखवाली शबीहें दिखाई गई हैं, जो ईरानी देवमाला पर आधारित हैं। इनकी शक्ल फरिश्तों के समान हैं। ये भित्तिचित्र इस महल की भीतरी दीवारों, कमरों के आलों और बारामदे की बाहरी दीवारों पर चित्रित किए गए थे।

मरियम-उज्ज़मानी का महल प्राचीन हिन्दू घरों के ढंग का बनवाया गया था। इसलिए इसे महल न कहकर कोठी कहा जाता है। इस भवन के आंगन में तुलसी के पौधे का थाला है और सामने एक मंदिर के चिह्न हैं। दीवारों में मूर्तियों के लिए आले बने हैं तथा कृष्णलीला के चित्र हैं जो औरंगजेब द्वारा घिसवा दिए जाने के कारण मद्धिम पड़ गए हैं।

भवन के पत्थरों पर मंदिर के घंटों के चिह्न भी अंकित हैं। इस तीन मंज़िले घर के ऊपर के कमरों को ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन महल कहा जाता था। ग्रीष्मकालीन महल में पत्थर की बारीक जालियों में से ठंडी हवा छन-छन कर आती थी।

तुर्की सुल्ताना का महल: तुर्की सुल्ताना का महल फतेहपुर सीकरी की इमारतों में सबसे अच्छा माना जाता है। इसकी निर्माण शैली तथा पत्थरों की बनावट सुन्दर एवं सजीव है। इसके बारे में रशब्रुक विलियम ने लिखा है-

‘यहाँ अकबर के शासनकाल की चित्रकारी बहुत ही सुन्दर है। इसके अतिरिक्त यह महल संगतराशी का अच्छा उदारहण है। इसकी दीवारों पर जंगल, पेड़-पौधे, झाड़ियों आदि के दृश्य बहुत ही सुन्दर ढंग से बने हैं। झाड़ियों में शेर और पेड़ों पर मोर बैठे दिखाई देते हैं।’

तुर्की सुल्ताना का महल एक लघु किंतु सुंदर रचना वाला भवन है जिसमें एक ही मंजिल है और स्तम्भों पर आधारित योजना पर निर्मित है। पर्सी ब्राउन ने इस महल को ‘स्थापत्यकाल का मोती’ कहा है।

तुर्की सुल्ताना के विषय में अनुमान है कि यह या तो हिन्दाल की पुत्री रुकय्या बेगम थी या अकबर की पत्नी सलीमा बेगम जो वास्तव में बैरम खाँ की विधवा और हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि अब्दुर्रहीम खानखाना की माँ थी और जिससे अकबर ने विवाह कर लिया था। इस महल की दीवारों का गढ़न बहुत सुंदर है तथा इनका स्थापत्य कोमलता एवं सुरुचिता का प्रदर्शन करता है। इसका भीतरी भाग अत्यधिक सजावट पूर्ण है।

दीवारों के निचले रंगे हुए भाग पर हाथी, चीता आदि पशुओं की आकृतियां बनी हुई हैं और कई प्रकार के वृक्ष, पौधे एवं फल-फूल खुदे हुए हैं। इनमें से कुछ मानव-आकृतियाँ भी हैं जिनके चेहरे औरंगजेब के समय मिटा दिये गये क्योंकि ये इस्लाम के विरुद्ध थे।

इस भवन में ढलवां छज्जों एवं चमकदार टाइलों का प्रयोग किया गया है। पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘इसकी बनावट और उभरे चित्रों की सजावट के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि इसकी सजावट में काष्ठकला का अनुकरण किया गया है और इसके बनाने वाले कारीगर पंजाब से आए होंगे जहाँ अकबर के काल में पत्थरों पर लकड़ी जैसी खुदाई करने की कला प्रचलित थी।’

अकबर का निजी महल: तुर्की सुल्ताना के महल से लगा हुआ अकबर का निजी महल है। इस दो मंजिले भवन में चारों कोनों पर छतरियों का निर्माण किया गया है। इसकी बाहरी दीवार सफेद संगमरमर के जालीदार पर्दों और लाल ग्रेनाइट के पत्थरों की बनी थीं। इस सहन के दक्षिण में बादशाह का शयनागार है।

यह 15 गुणा 15 वर्ग फुट की लम्बाई-चौड़ाई का वर्गाकार भवन है। इसमें चार द्वार हैं जिनमें से प्रत्येक के ऊपर फारसी की चार आयतें लिखी गई हैं। ये आयतें परस्पर जुड़कर एक पद बनाती हैं जो अकबर की प्रशंसा में लिखा गया है। अकबर के शयनागार से ही लगा हुआ पुस्तकालय का कक्ष है और ऊपरी मंजिल के एक कोने में ही झरोखा दर्शन है जहाँ बादशाह प्रतिदिन प्रातःकाल में अपनी प्रजा को दर्शन देता था।

अकबर का निजी महल ख्वाबगाह के नाम से भी जाना जाता था। इसके ऊपर की मंजिल का छोटा कमरा अकबर का शयनागार था जिसकी दीवारों पर अनेक चित्र अंकित थे। इन चित्रों में महात्मा बुद्ध, मदर मेरी तथा शिशु रूप में ईसा मसीह के चित्र थे। साथ ही आखेट तथा नदी-नालों के दृश्य भी बने हुए थे। ये चित्र अब धूमिल हो गये हैं।

राजा बीरबल का महल: राजा बीरबल के महल का निर्माण मरियम महल की शैली पर हुआ है। बीरबल महल काफी ऊँची कुर्सी पर बना हुआ है तथा सीकरी की समस्त इमारतों में इसका गुम्बद सबसे सुन्दर दिखाई देता हैं। यह दो मंजिली इमारत है जिसकी पहली मंजिल में दो बरसातियां हैं।

ऊपरी मंजिल के कमरों के ऊपर चपटे गुम्बद बने हैं और बरसातियों पर मिस्र के पिरामिड जैसी छत-योजना अपनाई गई है। इन गुम्बदों और पिरामिडों जैसी छतों में दुहरे गुम्बद का प्रयोग किया गया है अर्थात् इन गुम्बदों के दो खोल हैं तथा दोनों खोलों के बीच खाली जगह है। ताकि नीचे का भवन ठण्डा रह सके।

इस मंजिल की विशेषता इसमें किया गया नक्काशी का काम और इसके अत्यधिक सुसज्जित ब्रैकेट हैं। इस भवन के भीतरी एवं बाहरी दोनों ही भागों में रचना सम्बन्धी और सजावटी तत्व उल्लेखनीय हैं क्योंकि उन्हें इतनी बारीकी से कहीं भी सुनियोजित अथवा निर्मित नहीं किया गया है जितना कि उन्हें अपेक्षाकृत इस छोेटे किंतु वैभवपूर्ण राजसी आवास में गढ़ा गया है।

अनूप तालाब: पंचमहल के सामने स्थित यह सुंदर जलकुण्ड अकबर द्वारा बनाया गया था। इसे अनूप तालाब भी कहा जाता था। कहा जाता है कि यहाँ गायक और संगीतकार पानी के ऊपर एक मंच पर प्रदर्शन करते थे। अकबर अपने निजी महल अर्थात् दौलत ख़ाने से इस संगीत का आनंद लेता था।

फजल और फैजी के महल

जामा मस्जिद के पीछे दो मामूली से किंतु ऊँचे आवासगृह हैं जो एक ही चाहरदीवारी के भीतर हैं और जिनका प्रवेशद्वार भी एक ही है। ये आवास अकबर के मित्र तथा नवरत्न अबुल फजल और उसके भाई फैजी के लिए बनवाए गए थे। इन दोनों महलों में किसी तरह का अलंकरण नहीं है। अब ये दोनों महल अच्छी दशा में नहीं हैं।

हिरन मीनार

हिरन मीनार फतेहपुर सीकरी की प्रसिद्ध इमारतों में से एक है। मान्यता है कि इस मीनार के अंदर ख़ूनी हाथी ‘हनन’ की समाधि है। मीनार में ऊपर से नीचे तक आगे निकले हुए हिरन के सींगों की तरह पत्थर जड़े हैं। इसके पास के मैदान में बादशाह अकबर शिकार खेलता था।

यहाँ बेगमों के आने के लिए अकबर ने एक आवरण-मार्ग भी बनवाया था। हिरन मीनार की दीवारों पर बड़े-बड़े सींगनुमा नुकीले पत्थर लगे हैं। संभवतः इसीलिए इसका नाम हिरन मीनार पड़ा। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यहाँ जंगल से घेरकर हिरन लाए जाते थे तथा इस बुर्ज पर चढ़कर मुग़ल बेगमें उन हिरनों का शिकार करती थीं।

फतेहपुर सीकरी के अन्य भवन

पंचमहल के निकट मुग़ल शहजादियों का मदरसा है। फतेहपुर सीकरी के अन्य भवनों में मरियम का चमन, जनाना बाग, शिफाखाना, जनाना रास्ता, मीना बाजार, दफ्तरखाना, हकीम का महल, जौहरी बाजार, नौबतखाना, राजा टोडरमल का महल आदि प्रमुख हैं। पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी के ये वैभवशाली महल ताजमहल के पश्चात् मुगलों की सर्वश्रेष्ठ कृतियां हैं।’

शहतीरी और मेहराबी शैलियों का समन्वय

फतेहपुर सीकरी के सभी शाही महल एवं मजहबी भवन यहाँ तक कि सरकारी कार्यालय भी तीरा-ब्रैकेट तथा पटी हुई छतों की शैली (ट्रैबिएट शैली) के हैं और मेहराब का प्रयोग मुख्यतः मेहराबी गुम्बदी सजावट के लिए किया गया है। सही अर्थों में फतेहपुर सीकरी के भवनों में ट्रैबिएट (शहतीरी) और आर्कुएट (मेहराबी) शैलियों का समन्वय किया गया है।

सीकरी के भवनों में प्रयुक्त गुम्बदों का भी भारतीयकरण किया गया है। इन पर जो नक्काशी या जड़ाऊ कार्य किया गया है, उसमें नवीनता के लक्षण दिखाई देते हैं। सीकरी के सभी भवन मुख्यतः लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित हैं। केवल सजावट के लिए या किन्हीं अंशों पर जोड़ देने के लिए ही इनमें सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया है। केवल शेख सलीम चिश्ती की दरगाह को सफेद संगमरमर से ढका गया है।

सीकरी का फीका पड़ता वैभव

फतेहपुर सीकरी के निर्माण अकबर के शासनकाल में ई.1671 के आसपास आरम्भ हुए तथा अनुमानतः ई.1585 तक पूर्णता को प्राप्त कर गए। ई.1585 में अकबर को उजबेकों से लड़ने के लिए सीकरी छोड़कर लाहौर जाना पड़ा। इसके बाद से सीकरी का वैभव फीका पड़ने लगा। सीकरी केवल कुछ समय के लिए अकबर की राजधानी रही।

ई.1605 में अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर बादशाह हुआ किंतु उसने फिर से आगरा को अपनी राजधानी बनाया और अपने जीवन का बड़ा हिस्सा अजमेर में व्यतीत किया। उसके उत्तराधिकारियों में से किसी ने भी फिर सीकरी की तरफ मुड़कर नहीं देखा। इसलिए सीकरी का स्थापत्य केवल देखने-दिखाने की वस्तु बनकर रह गया।

फतेहपुर सीकरी के स्थापत्य पर विद्वानों की टिप्पणियां

फतेहपुर सीकरी के स्थापत्य को देखने के लिए दुनिया भर के विद्वानों ने सीकरी की यात्रा की तथा इन भवनों का अवलोकन करने के बाद महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं जिनमें से कुछ टिप्पणियां इस प्रकार हैं-

अकबर के समकालीन लेखक रॉल्फ फिच ने ई.1585 में लिखा है- ‘आगरा और फतेहपुर सीकरी दो बड़े नगर हैं। इनमें से कोई भी लंदन से कहीं अधिक बड़ा है। इनकी आबादी बहुत अधिक है। ये बड़ी घनी आबादी के हैं। आगरा और सीकरी के बीच 12 कोस का फासला है और पूरे मार्ग में खाने-पीने की तथा अन्य वस्तुओं का ऐसा भरा-पूरा बाजार है कि जैसे कोई किसी नगर में ही हो। और इतने आदमी होते हैं कि जैसे बाजार ही लगा हो……. यह ईरान और भारत के व्यापारियों और सिल्क कपड़ा, कीमती रत्नों, हीरों तथा मोतियों के व्यापार का बड़ा केन्द्र है।’

फर्ग्यूसन ने लिखा है- ‘सब मिलाकर फतेहपुर सीकरी का यह महल पाषाण का ऐसा रोमांच है जैसे कि कहीं कम, बहुत ही कम मिलेंगे और यह उस महान् व्यक्ति जिसने इसे बनवाया था, के मस्तिष्क की ऐसी प्रतिच्छाया है जो किसी अन्य स्रोत से सरलता से उपलब्ध नहीं हो सकती।’

वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी जैसा निर्माण कार्य न तो पहले कभी हुआ था और न फिर कभी होगा। ये रोमांच का पाषाण प्रतिरूप हैं। जैसे अकबर की अद्भुत प्रवृत्ति के आते-जाते मनोभाव जड़ हो गए हों। और लगता है जैसे कि जब तक मनोभाव बने रहे तब तक विद्युत गति से इसे बनाकर खत्म कर दिया गया हो। किसी और समय अथवा किन्हीं अन्य स्थितियों में यह अकल्पनीय और असंभव था। संसार निश्चय ही उस समय के शासन के प्रति कृतज्ञता अनुभव कर सकता है जिसके लिए ऐसी प्रेरित मूर्खता करना संभव था।’

फतेहपुर सीकरी की राष्ट्रीय स्थापत्य शैली

फतेहपुर सीकरी की अकबर कालीन समस्त इमारतें हिंदू-मुस्लिम मिश्रित स्थापत्य शैली की हैं। इनमें हिन्दू स्थापत्य की प्रधानता है। इनमें से कुछ की सजावट, जैसे- दीवाने खास में लगे हुए स्तम्भों के तोड़े, पंचमहल और जोधाबाई के महल में लगे हुए उभरे घण्टे तथ जंजीर और मरियम के महल में पत्थर खोदकर बनाये गये पशु-पक्षियों के चित्र इत्यादि हिन्दू और जैन मन्दिरों की ही नकल हैं। संगमरमर और बलुआ लाल पत्थर से बना हुआ बुलन्द दरवाजा स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है।

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी की स्थापत्य कला की शैली भारतीय प्राचीन संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों को समन्वित करने और मिलाने की अकबर की नीति को ही जैसे पाषाण रूप में प्रस्तुत करती हैं।’ 

डा. श्रीवास्तव ने अकबर की इस समन्वित स्थापत्य शैली को राष्ट्रीय स्थापत्य कला शैली कहा है। अकबर ने स्थापत्य की जो नई शैली विकसित की, उसका प्रभाव सारे देश पर और राजस्थान के राजपूत राजाओं पर पड़ा। अकबर के शासनकाल में अजमेर, बीकानेर, जोधपुर, आम्बेर, ओरछा और दतिया में जो महल बने, उन पर मुगल कला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। हिन्दुओं के मन्दिर भी इस शैली के प्रभाव से नहीं बच सके।

हिन्दू राजाओं के महलों के बारे में पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘राजपूत भवनों को देखकर कोई भी कल्पना कर सकता है कि उनमें प्रारम्भिक मुगली कला, जैसे-कटोरेदार मेहराबें, काँच की पच्चीकारी, दरीखाना, पलस्तर की रँगाई किस प्रकार हिन्दू राजाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अपना लिये गये थे।’

क्या सीकरी के महल हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली के हैं?

इन इतिहासकारों ने अकबर-कालीन इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम एकता के तत्व ढूंढे हैं जबकि इस वास्तविकता को भी भुलाया नहीं जाना चाहिए कि फतेहपुर सीकरी के अधिकांश महलों का निर्माण सिकरवार राजपूतों ने करवाया था, अकबर ने तो केवल उनके बाहरी रूप को बदला था।

अंग्रेजी इतिहासकार, लेखक एवं पुरातत्ववेत्ता इस बात को नहीं समझ पाए थे, इसलिए उन्होंने मुगल कालीन इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली के दर्शन किए। बाद के भारतीय लेखकों ने भी उन्हीं के लिखे हुए को सच मान लिया। बहुत से भारतीय लेखकों ने तो इन भवनों को अपनी आंखों से देखे बिना ही यूरोपीय लेखकों का अनुसरण किया।

यहाँ तक कि कुछ इतिहासकारों ने फतेहपुर सीकरी के भवनों को राष्ट्रीय स्थापत्य शैली भी घोषित कर दिया।

अन्य नगरों के अकबर कालीन भवन

लाहौर का किला

लाहौर नगर की स्थापना भगवान राम के पुत्र लव ने की थी। उन्हीं के नाम पर यह लाहौर कहलाया। यहाँ हजारों सालों से हिन्दू राआओं का राज्य था। लाहौर का दुर्ग सबसे पहले कब और किसने बनवाया, इसका विवरण नहीं मिलता किंतु यह निश्चित है कि लाहौर में प्राचीन काल से ही एक बड़ा दुर्ग स्थित था जिसकी चिनाई मिट्टी-गारे में की गई थी। अकबर ने ई.1566 में इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया तथा इसके भीतर कई भवन बनवाए।

वस्तुतः उस काल में अकबर ने नवीन निर्माण बहुत कम करवाए अपितु पुराने भवनों के बाहरी स्वरूप को मुगल शैली में ढालने का काम अधिक किया। आगे भी उसके वंशजों ने यह परम्परा जारी रखी जो शाहजहाँ के काल तक चलती रही।

लाहौर दुर्ग आगरा के दुर्ग के समान अत्यंत विशाल है। लाहौर के किले की इमारतें आगरा के किले के जहाँगीरी महल के समान हैं। अन्तर यह है कि लाहौर के किले की सजावट आगरा के किले की अपेक्षा अधिक घनी है। तोड़ों में हाथी और सिंहों की मूर्तियाँ और छत के नीचे कारनिस में मोरों के चित्रों को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जाता है कि यह भवन मुगलकाल से भी पहले मौजूद रहा होगा तथा इसका मूल निर्माण हिन्दू राजाओं ने करवाया होगा।

भवन निर्माण में अपनाई गई शैलियों से ज्ञात होता है कि इस दुर्ग के अधिकांश भवनों के शिल्पकार हिन्दू थे। अकबर के काल में बने बहुत से मुगल भवनों की सजावट में, इस्लाम में वर्जित अलंकरण अर्थात् जीवित पशु-पक्षियों एवं मनुष्यों के चेहरे एवं मूर्तियां दिखाई देते हैं जिससे यह धारणा पुष्ट होती है कि अकबर के समय प्राचीन हिन्दू इमारतों को ही मुगल शैली के भवनों में बदल दिया गया था।

लाहौर के किले के भीतर अकबर के बाद जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब ने भी बड़े स्तर पर निर्माण करवाए। जहाँगीर काफी समय तक लाहौर में नरहा थां उसने लाहौर दुर्ग में कुछ आवासीय महलों का निर्माण करवाया। शाहजहाँ ने दीवान-ए-खास, शीश महल, नौलखा पेवेलियन और मोती मस्जिद बनवाए जबकि औरंगजेब ने आलमगीर दरवाजे का निर्माण करवाया। महाराजा रणजीतसिंह ने भी दुर्ग में कुछ निर्माण करवाए जिनमें से शीशमहल पर बनवाया गया उनका निजी महल भी था।

यह किला 1,400 फुट लंबा और 1,115 फुट चौड़ा है। यूनेस्को ने ई.1981 में इसे विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया। वर्तमान में आलमगीर दरवाजे से ही किले में प्रवेश किया जाता है। दीवाने आम, दीवाने खास और शीश महल किले के मुख्य आकर्षण हैं। लाहौर के उत्तर-पश्चिम किनारे में स्थित यह किला, लाहौर का प्रमुख दर्शनीय स्थल है।

इलाहाबाद का किला

प्रयागराज (इलाहाबाद) का किला मूलतः किसने बनवाया, इस पर विवाद है। यहाँ पहले से ही एक हिन्दू किला मौजूद था जिसे मुगल बादशाह अकबर ने नए सिरे से बनवाया। अकबर के समकालीन लेखक अब्दुल कादिर बदायूंनी ने ‘मुंतखवुल-तवारीख’ में लिखा है कि इलाहाबाद किले की नींव ई.1583 में डाली गई।

नदी की कटान से यहाँ की भौगोलिक स्थिति स्थिर न होने से इसका नक्शा अनियमित ढंग से तैयार किया गया। अनियमित नक्शे पर किले का निर्माण कराना ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। किला तीस हजार वर्ग फुट क्षेत्र में बना है। इसके निर्माण में छः करोड़ 17 लाख 20 हजार 214 रुपये लागत आयी थी।

ई.1773 में अंग्रेजों ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया। उन्होंने ई.1775 में इस दुर्ग को बंगाल के नवाब शुजाउद्दौला को 50 लाख रुपये में बेच दिया। ई.1798 में नवाब शुजात अली और अंग्रेजों में एक संधि के बाद किला फिर से अंग्रेजों के अधिकार में चला गया। आजादी के बाद इसमें भारतीय सेना रहती है। दुर्ग में फारसी भाषा का एक शिलालेख लगा है जिसमें किले की नींव पड़ने का वर्ष ई.1583 दिया गया है।

दुर्ग में जहाँगीर महल, तीन बड़ी गैलरी तथा ऊँची मीनारें हैं। मुगलों ने दुर्ग में कई फेरबदल कराये। अंग्रेजों ने भी इसमें कई परिवर्तन किए जिससे किले का अकबर कालीन स्वरूप बहुत-कुछ बदल गया। संगम के निकट स्थित इस किले के कुछ भाग ही पर्यटकों के लिए खुले रहते हैं।

शेष हिस्से भारतीय सेना के अधिकार में हैं। पर्यटकों को अशोक स्तंभ, सरस्वती कूप और जोधाबाई का महल दिखाया जाता है। दुर्ग परिसर में अक्षय वट के नाम से विख्यात बरगद का एक पुराना पेड़ और पातालपुर मंदिर भी है। इलाहाबाद का किला खण्डहर प्रायः हो गया है। उसकी अनेक इमारतें नष्ट हो गई हैं। केवल जहाँगीर महल ही अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में है।

अजमेर का किला

अकबर पहाड़ी दुर्ग में रहने का अभ्यस्त नहीं था। वह अजमेर के तारागढ़ दुर्ग तक पहुँचने के लिये उपलब्ध पहाड़ी दुर्गम पथ को भी पसंद नहीं करता था। वह आगरा, लाहौर, इलाहाबाद तथा फतहपुर सीकरी के मैदानी दुर्गों में रहना पसंद करता था जहाँ बड़े-बड़े बाग बनाए जा सकें। इसलिये उसने अजमेर में एक मैदानी दुर्ग बनाने का निर्णय लिया।

जिस स्थान पर अकबर ने अपने लिये नया दुर्ग बनवाने का निर्णय लिया, उस स्थान पर पहले से एक प्राचीन दुर्ग बना हुआ था। यह दुर्ग कब और किसने बनवाया था इसकी जानकारी इतिहास के ग्रंथों में प्राप्त नहीं होती किंतु चूंकि यह अजमेर की संस्कृत पाठशाला एवं विष्णु मंदिर (अब ढाई दिन का झौंपड़ा) से अधिक दूर नहीं है, इसलिए  अनुमान लगाया जाता है कि अजमेर नगर का मैदानी दुर्ग चौहान कालीन होना चाहिए।

अकबर ने इसी दुर्ग में कुछ निर्माण कार्य करवाए तथा इसे मुगल स्थापत्य के दुर्ग में बदल दिया। इसके भीतर अकबर ने अपने लिये एक महल बनवाया। अकबर के समय में इसे मुगल किला, अकबर का किला तथा दौलतखाना आदि नामों से जाना जाता था।

आज भी इसे को अकबर के महल के नाम से जाना जाता है। यह दुर्ग फतहपुर सीकरी के महल की अनुकृति है और विशाल चतुष्कोणीय आकृति में है। इसके चारों कोनों पर अष्टकोणीय मीनारें हैं। इसका द्वार नगर की तरफ मुंह किये हुए है। केन्द्रीय भाग में विशाल बैठक बनी है।

ला टाउच की सैटलमेंट रिपोर्ट ई.1875 के अनुसार अजमेर स्थित दौलतखाना, एक विशाल चतुर्भुज दुर्गनुमा भवन है जिसे अकबर ने अजमेर नगर के उत्तर में बनवाया था। अबुल फजल के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण 1870 में आरंभ हुआ और ई.1573 के लगभग यह बनकर तैयार हुआ। ई.1573 से 1579 के बीच अकबर जब भी अजमेर आया, इसी किले में ठहरा।

दुर्ग के चारों कोनों में एक-एक बुर्ज बनी हुई है। इसकी पश्चिमी दिशा में एक सुंदर दरवाजा है तथा इसके मध्य में भवन बना हुआ है। इस दुर्ग का दरवाजा 84 फुट ऊँचा तथा 43 फुट चौड़ा है। यह दरवाजा नया बाजार की तरफ मुंह करके खड़ा हुआ है। इस दरवाजे का निर्माण जहाँगीर के शासन-काल में करवाया गया था।

इस दरवाजे के सामने हाथियों की लड़ाई के लिये विशाल मैदान था जिसमें बादशाहों के मनोरंजन के लिये और भी कई तरह के आयोजन किये जाते थे। अकबर और जहाँगीर के समय में इस के केन्द्रीय भवन के चारों ओर एक उद्यान भी हुआ करता था जो अब पूरी तरह लुप्त हो चुका है।

18 नवम्बर 1613 से 10 नवम्बर 1616 तक जहाँगीर इस किले में रहा। वह नित्य इसके मुख्य दरवाजे के झरोखे में बैठकर जनता को दर्शन देता और यहीं से न्याय किया करता था। इसी किले में 10 जनवरी 1616 को इंग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम का राजदूत सर टामस रो जहाँगीर की सेवा में उपस्थित हुआ और उसने अपने देश के व्यापारियों के लिये भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की। कालान्तर में इस किले में दिल्ली सरकार का शस्त्रागार रहा।

इस कारण यह मैगजीन कहलाने लगा। जहाँगीर द्वारा बनाये गये मुख्य द्वार के शीर्ष भाग पर दो छतरियां हैं जहाँ से अजमेर नगर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। इन छतरियों के नीचे एक-एक झरोखा तथा जालियां लगी हुई हैं। यह भवन अजमेर रेल्वे स्टेशन के ठीक पास स्थित है। जब औरंगजेब के पुत्र अकबर ने विद्रोह किया था तब औरंगजेब कुछ समय तक इसी दुर्ग में रहा था।

उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में मराठा सूबेदार इसी दुर्ग में रहा करते थे। उन्होंने अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप इसकी बनावट में कई बदलाव किये। उस समय आनासागर के तट पर पत्थर के मण्डप के उत्तरी छोर पर पौने तेबीस फुट गुणा पौने बाईस फुट की, जहाँगीरकाली बारादरी बनी हुई थी। उस बारादरी को तोड़कर इस दुर्ग के उत्तरी बुर्ज की छत के ऊपर एक कक्ष बनाया गया जिसे एक मंदिर की तरह काम में लिया जाता था।

अकबर ने अपने अमीर-उमरावों को भी आदेश दिया कि वे अजमेर में अच्छे भवन बनवायें तथा उद्यान लगवायें। अमीरों ने आस पास के हिन्दू भवनों में कुछ परिवर्तन करके उन्हें नये भवनों का रूप दिया। इस प्रकार के भवनों का भीतरी भाग हिन्दू स्थापत्य शैली का है जबकि उनके बाहरी भाग को मुस्लिम स्थापत्य शैली में ढाल दिया गया है।

ऐसे कुछ भवन आज भी इस दुर्ग के चारों ओर देखने को मिल जायेंगे। नया बाजार में बना हुआ बादशाही भवन इसी प्रकार का है। अकबर के किले में स्थित दरबारे-आम भी इसी शैली का गवाह है। इस प्रकार जब अकबर ने अजमेर में अपने लिये दुर्ग बनवाया तो उसके चारों ओर एक नया अजमेर शहर खड़ा हो गया।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी जनरल ऑक्टर लोनी ने अजमेर में स्थित अकबर के महल अर्थात् दौलतखाना को ‘मैगजीन’ में बदल दिया। मैगजीन के चारों ओर ऊँची और मजबूत दीवार बनायी गयी। इस मैगजीन में ब्रिटिश सेना के शस्त्र रखे जाने लगे। ई.1857 में मैगजीन बंगाल इन्फैण्ट्री की 15वीं रेजीमेंट के अधीन थी।

जिस समय 1857 का विद्रोह हुआ, अजमेर-मेरवाड़ा का कमिश्नर कर्नल डिक्सन ब्यावर में था। दुर्ग का भवन उस समय इतना पुराना हो चुका था कि तोप का एक गोला उसे ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त था। इसमें इतना बारूद, शस्त्र, तोपें तथा राजकीय खजाना मौजूद था कि सम्पूर्ण राजपूताना के विद्रोहियों को आपूर्ति करने के लिये पर्याप्त था।

कर्नल डिक्सन ने ऑफिशियेटिंग सैकण्ड इन-कमाण्ड लेफ्टिनेंट डब्लू कारनेल को रात्रि में ही ब्यावर से मेरवाड़ा बटालियन की दो कम्पनियों के साथ अजमेर के लिये रवाना किया। ले. कारनेल अगली प्रातः मैगजीन के पास पहुँचा। उसने ब्रिटिश ऑफीसर इन-कमाण्ड से अपनी सेना सहित मैगजीन से बाहर आने के लिये कहा।

ब्रिटिश ऑफीसर इन-कमाण्ड ने मैगजीन खाली करने से मना कर दिया। इस पर ले. कारनेल ने उस पर दबाव बनाया और मैगजीन पर कब्जा करके 15वीं बंगाल इन्फैण्ट्री को मैगजीन से बाहर निकाल दिया। इसके बाद कारनेल, अजमेर स्थित समस्त अंग्रेज अधिकारियों के परिवारों को मैगजीन के भीतर ले आया और उसने मैगजीन की बुर्जों पर पुरानी तोपें चढ़ा दीं। कारनेल ने मैगजीन के मध्यम में एक कुआं खोदा तथा पर्याप्त रसद जमा करके, किसी भी आपात् स्थिति के लिये तैयार होकर बैठ गया।

जब 15वीं इण्डियन इनफैण्ट्री नसीराबाद पहुँची तो उनके भारतीय साथियों ने उन्हें इस बात के लिये धिक्कारा कि उन्होंने निम्न जाति के मेर लोगों को मैगजीन सौंप दी। 25 जून 1857 को कर्नल डिक्सन का ब्यावर में निधन हो गया। उसके बाद सर हेनरी लॉरेंस अजमेर-मेरवाड़ा का कमिश्नर बना।

यही लॉरेंस आगे चलकर एजीजी अर्थात् एजेंट टू दी गवर्नर जनरल बना। वह मैगजीन के निकट रहा करता था। ई.1863 में मैगजीन में शस्त्र रखने बंद कर दिये गये तथा वहाँ पर तहसील कार्यालय स्थापित किया गया। ई.1908 में इस भवन में राजपूताना संग्रहालय खोला गया।

अटक का किला

 सिंधु नदी की पश्चिमी धारा को अटक कहा जाता था। काबुल और सिंध नदी के संगम के थोड़ा नीचे सिंघ के किनारे स्थित एक ऊँची पहाड़ी पर अटक का किला स्थित है। यह एक अत्यंत प्राचीन दुर्ग था। अकबर ने ई.1581 में सिंधु नदी के तट पर अटक के किले में कुछ नीवन निर्माण करवाए। इस नगर का प्राचीन नाम हाटक है जिसका अर्थ ‘स्वर्ण’ होता है।

पारसियों के जेंद अवेस्ता में अटक नदी के पूर्व में स्थित देश को ‘हिन्दवः’ कहा जाता था, यूनानियों ने उस देश के लिए ‘इण्डिया’ (हिन्दिया) शब्द का प्रयोग किया। अटक से 16 मील दूर स्थित ओहिंद नामक स्थान पर अटक के ऊपर नावों का पुल बनाकर सिकन्दर ने भारत में प्रवेश किया था।

प्राचीन हिन्दू अटक नदी के पार जाने को बुरा समझते थे और उनमें विश्वास था कि इसके पार जाने से हिन्दुओं का धर्म नष्ट हो जाएगा। जिस भारत की कल्पना ‘आसेतु-हिमालय’ के रूप में की जाती थी, उसकी पश्चिमी सीमा का निर्माण अटक नदी ही करती थी। इन सब कारणों से प्राचीन काल एवं मध्यकाल में अटक का दुर्ग भारत की पश्चिमी सीमा का प्रहरी माना जाता था एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

 इस दुर्ग के सामने कमालिया और जलालिया नामक पहाड़ियों में से होकर सिंध नदी बहती है। अकबर के समय में दो हिन्दुओं को पाखण्डी बताकर इन चट्टानों से नीचे धकेला गया। अकबर ने अपने छोटे भाई हकीम मिरज़ा के आक्रमणों से बचने के लिये ई.1579 में यह किला फिर से बनवाया तथा नदी के पश्चिम तट पर ‘खैरबाद’ की स्थापना की।

औरंगजेब एक बार समस्त हिन्दू राजाओं को लेकर अटक के लिए रवाना हुआ। उसकी योजना इन राजाओं को अटक नदी के पार ले जाकर वहाँ उनकी सुन्नत करने की आौर सम्पूर्ण भारत को एक साथ ही मुसलमान बनाने की थी किंतु एक सूफी दरवेश को इस योजना का पता चल गया, उसने हिन्दू राजाओं को यह बात बता दी। इस पर भारतीय राजाओं ने अपनी नावों में आग लगा दी और अटक नदी पार करने से मना कर दिया। औरंगजेब ने कुरान हाथ में लेकर कसम खाई कि वह भविष्य में कभी भी ऐसा प्रयास नहीं करेगा।

मराठा सरदार रघुनाथ राव ने मराठों की सत्ता अटक तक बढ़ाई। ई.1792 में महाराजा रणजीतसिंह ने इस दुर्ग पर आक्रमण किया। इस दुर्ग के लिए अंग्रजों एवं सिक्खों में दो बार बड़ी लड़ाइयां हुईं। अंत में यह दुर्ग अंग्रेजों के अधिकार में चला गया। अंग्रेजों ने ई.1883 में इस नदी पर लोहे का एक पुल बनवाया तथा रेलवे लाइन बिछा दी जो पेशावर तक जाती है।

अब यह दुर्ग पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान की सीमा पर एवं पाकिस्तान में स्थित है तथा खण्डहर के रूप में बचा है। इस दुर्ग में पाकिस्तान द्वारा बलपूर्वक पकड़े गए भारतीय नागरिक बंदी बनाकर रखे जाते हैं। पुस्तक लिखे जाते समय इस दुर्ग में 72 भारतीय नागरिक बंद होने का अनुमान है।

अटक में ‘बेगम की सराय’ नामक एक मुगलकालीन सराय थी। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की सरकार ने इस सराय की मरम्मत करवाई है।

अकबरी मस्जिद, अजमेर

अकबर ने ई.1571 में अजमेर में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के निकट एक मस्जिद बनवाई जिसे अकबरी मस्जिद कहा जाता है। यह मस्जिद बुलंद दरवाज़ा एवं शाहजहानी दरवाजे के मध्य स्थित है। लाल बलुआ पत्थर से बनी यह मस्जिद अब मोईनुआ उस्मानिया दारुल-उलूम है जो कि अरबी एवं फारसी में इस्लामी शिक्षा का विद्यालय हैं। इस मस्जिद के निर्माण में हरे एवं सफ़ेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है।

अकबरी मस्जिद, आम्बेर

ई.1569 में रणथंभौर दुर्ग अभियान की सफलता के बाद अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए अजमेर गया। मार्ग में वह अपनी ससुराल आम्बेर में रुका। जयपुर के कच्छवाहा राजा भारमल ने अकबर के लिए आम्बेर दुर्ग में एक मस्जिद बनवाई जो आज भी देखी जा सकती है।

यद्यपि इस भवन को मुगल शैली में बनाने का प्रयास किया गया है किंतु इस पूरे भवन पर हिन्दू स्थापत्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। मस्जिद को बाहर से लाल रंग से पोतकर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित होने का आभास दिया गया है। इसके प्रवेश द्वारा को फारसी शैली के ईवान की तरह बनाने का प्रयास किया गया है किंतु उसके ऊपर पत्थर की नक्काशी मुगलिया नक्काशी की जगह हिन्दू अलंकरण की तरह दिखती है।

इसके मुख्य द्वार के दोनों तरफ तीन-तीन मेहराब बनाए गए हैं। मुख्य द्वार के दोनों तरफ एक-एक गुम्बद बनाया गया है। ये गुम्बद भी फारसी एवं मुगलिया शैली के गुम्बदों के स्थान पर मंदिर के गर्भगृहों के ऊपर बनने वाले शिखरनुमा निर्माण अधिक जान पड़ते हैं जो कि बंद कमल पुष्प की तरह दिखाई देते हैं। इस भवन के सामने एक-एक पतली मीनार बनाई गई है जो मुगल शैली से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती।

कोस मीनार

ई.1574 में अकबर ने आगरा से अजमेर के रास्ते में प्रत्येक पड़ाव पर पक्के विश्राम गृहों का निर्माण करवाया ताकि वह प्रति वर्ष बिना किसी बाधा के अजमेर आ-जा सके। प्रत्येक एक कोस की दूरी पर एक मीनार खड़ी की गई जिस पर उन हजारों हरिणों के सींग लगवाये गये जो अकबर तथा उसके सैनिकों ने मारे थे।

इन मीनारों के पास कुएं भी खुदवाये गये। बाद में इन मीनारों के पास उद्यान लगाने एवं यात्रियों के लिये सराय बनाने के भी निर्देश दिये गये। जयपुर में कनक वृंदावन के पास एवं हाड़ीपुर आमेर सहित कई स्थानों पर ये मीनारें देखी जा सकती हैं।

अकबर कालीन अन्य भवन

अकबर ने मेड़ता की मस्जिद तथा अन्य स्थानों के किले इत्यादि अन्य भवन बनवाए। सिकन्दरा में स्थित अकबर के मकबरे का नक्शा अकबर ने बनाया था। इसे अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर ने पूरा करवाया। ई.1605 में अकबर की मृत्यु हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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