गांधी के दबाव पर पटेल ने नेहरू को प्रधानमंत्री की कुर्सी तो दे दी किंतु दोनों के व्यक्तित्व बिल्कुल अलग थे।काश्मीर, गोआ, चीन, तिब्बत और नेपाल को लेकर नेहरू से असंतुष्ट थे पटेल !
सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू ने अपना पूरा जीवन कांग्रेस में बिताया था। दोनों ही गांधीजी के निकट सहयोगी माने जाते थे किंतु दोनों के व्यक्तित्व में आकाश और पाताल जैसा अंतर था।
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दोनों ने इंग्लैण्ड में जाकर बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त की किंतु सरदार पटेल वकालात में नेहरू से बहुत आगे थे तथा उन्होंने सम्पूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य के विद्यार्थियों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया। नेहरू प्रायः सोचते रहते थे किंतु पटेल उसे कर डालते थे। नेहरू शास्त्रों के ज्ञाता थे किंतु पटेल शास्त्र और नीति दोनों के ज्ञाता थे। नेहरू केवल भाषणों के माध्यम से विरोधियों को आंख दिखाते थे किंतु पटेल भाषण के साथ-साथ सेनाओं का उपयोग करना भी जानते थे। पटेल ने भी नेहरू जितनी ही ऊँची शिक्षा पाई थी किंतु पटेल में अहंकार नहीं था। वे स्वयं कहते थे कि मैंने कला या विज्ञान के विशाल गगन में ऊंची उड़ानें नहीं भरीं। मेरा विकास कच्ची झौंपड़ियों में गरीब किसान के खेतों की भूमि और शहरों के गंदे मकानों में हुआ है।
पं. नेहरू को गांव की गंदगी तथा जीवन से चिढ़ थी। पं. नेहरू अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के इच्छुक थे तथा समाजवादी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। नेहरू से असंतुष्ट पटेल ने 1950 में नेहरू को पत्र लिखकर उन्हें चीन तथा चीन की तिब्बत नीति के प्रति सावधान किया और चीन के रवैये को कपटपूर्ण तथा विश्वासघाती बताया। पटेल ने अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को भावी शत्रु की भाषा बताया।
सरदार ने लिखा कि तिब्बत पर चीन का कब्जा नई समस्याओं को जन्म देगा। कम्युनिस्टी आभा से ग्रस्त नेहरू ने पटेल की बात नहीं सुनी तथा हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाते रहे। इसका दुष्परिणाम 1962 में भारत को चीन के आक्रमण के रूप में भुगतना पड़ा। 1950 में नेपाल के सदंर्भ में लिखे पत्रों में भी पटेल ने नेहरू की नीति के प्रति अपनी असहमति एवं असंतोष व्यक्त किया।
1950 में गोवा की स्वतंत्रता के सम्बन्ध में चली दो घण्टे की कैबिनेट बैठक में लम्बी वार्त्ता सुनने के बाद पटेल ने नेहरू से केवल इतना ही पूछा, क्या हम गोवा जायेंगे, केवल दो घण्टे की बात है ? नेहरू इससे बड़े नाराज हुए। यदि पटेल की बात मान ली गई होती तो गोवा को अपनी स्वतंत्रता के लिये 1961 तक प्रतीक्षा न करनी पड़ती।
पटेल जहाँ पाकिस्तान की छद्म कार्यवाहियों एवं शत्रुता पूर्ण चालों से सतर्क रहते थे वहीं नेहरू को विघटनकारी तत्वों से भी सावधान करते थे। पटेल, भारत में मुस्लिम लीग तथा कम्युनिस्टों की विभेदकारी तथा रूस के प्रति उनकी राजभक्ति से परिचित थे।
विद्वानों का मत है कि पटेल बिस्मार्क की तरह थे किंतु लंदन के टाइम्स ने लिखा था- बिस्मार्क की सफलताएं पटेल के समक्ष महत्वहीन हैं। यदि जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल के कहने पर चलते तो काश्मीर, चीन, तिब्बत और नेपाल की परिस्थितियां आज जैसी न होतीं। पटेल सही अर्थों में मनु के शासन की कल्पना थे। उनमें कौटिल्य की कूटनीतिज्ञता तथा छत्रपति महाराज शिवाजी जैसी दूरदृष्टि थी।
सरदार पटेल नेहरू की चीन नीति से बुरी तरह नाराज थे। सरदार पटेल को पूर्वाभास था कि एक दिन चीन भारत पर आक्रमण करेगा तथा भारत को बड़ी मुसीबत में डाल देगा किंतु प्रत्यक्ष रूप से समाजवादी तथा परोक्ष रूप से कम्युनिस्ट नेहरू चीन के सम्मोहन में ऐसे बंधे थे कि वे सरदार पटेल की कोई बात सुनने को तैयार नहीं थे। इसलिए पटेल ने नेहरू को एक कड़ा पत्र लिखकर अपनी नाराजगी व्यक्त की।
मेरे अहमदाबाद से लौटने और उसी दिन हुई समिति की बैठक के बाद से, जिसकी जानकारी मुझे उसके शुरू होने से केवल 15 मिनट पहले मिली थी और मुझे अफसोस है कि उस कारण में उससे संबंधित दस्तावेज भी नहीं पढ़ पाया, मैं तिब्बत के बारे में चिन्तित हूं, मैंने सोचा कि मुझे अपने विचार तुम्हारे साथ बांटने चाहिए।
मैंने अपने विदेश मंत्रालय और पीकिंग में हमारे राजदूत तथा उनके जरिए चीनी सरकार के बीच हुए सारे पत्रव्यवहार को पढ़ा है, मैंने इस पत्रव्यवहार को अपने राजदूत तथा चीनी सरकार को अनुकूल ढंग से पढ़कर पेश करने की कोशिश की, परंतु मुझे यह कहते हुए दुःख हो रहा है कि इस अध्ययन के बाद उनमें से कोई भी मेरी आंखों में खरा नहीं उतरा।
चीनी सरकार ने शांति के इरादों का प्रवचन करके हमें धोखा दिया है। मुझे लगता है कि उन्होंने मौका देखकर हमारे राजदूत को शांतिपूर्वक ढंग से तिब्बत की समस्या सुलझाने का झांसा देकर उनके मन में अपनी जगह बना ली थी। निस्संदेह जब यह पत्रव्यवहार चल रहा होगा तब चीनियों ने तिब्बत पर आक्रमण करने की सारी योजना तैयार कर ली होगी। ऐसा लगता है कि चीनी अंत में हमसे विश्वासघात करेंगे।
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सबसे दुःख की बात यह है कि तिब्बतियों ने हम पर विश्वास किया। उन्होंने अपने मार्गदर्शन के लिए हम पर भरोसा किया, हम उन्हें चीनी कूटनीतिक जंजाल या चीनी दुर्भाव से बचाने में असमर्थ रहे। हाल में जन्मी परिस्थितियों को देखकर ऐसा लगता है कि हम दलाई लामा को नहीं बचा पाएंगे। हमारे राजदूत को चीनियों द्वारा अपनाई नीतियों और किए गए कर्मों के स्पष्टीकरण और उसकी सफाई ढूंढने में बहुत कष्ट झेलने पड़े हैं। जैसे कि विदेशी मामलों के मंत्रालय द्वारा भेजे गए एक तार में बताया गया था कि जब चीनी सरकार के समक्ष हमारे दूत ने हमारी ओर से एक या दो मुद्दों पर आपत्ति प्रकट की तो उन्हें उनकी ओर से ढीलापन और फिजूल की माफियां देखने को मिलीं।
क्या कोई भी समझदार व्यक्ति इस बात को मान सकता है कि चीन को तिब्बत में एंग्लो-अमेरीकन गुप्त योजनाओं से किसी तरह का कोई खतरा हो सकता है। इसलिए, यदि चीनी इस बात को सच मानते हैं तो जाहिर सी बात है कि, उन्हें हम पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं होगा और हमें एंग्लो अमेरिकी राजनीति या उनकी योजनाओं की कठपुतली समझते होंगे।
यदि आपके उनके साथ प्रत्यक्ष सम्पर्क के बाद वे हमारे प्रति ऐसा सोचते हैं तो चाहे हम उन्हें अपना जितना गहरा मित्र समझें, वो बेशक हमें अपना दोस्त नहीं मानते। हमें उनकी इस साम्यवादी मनोवृत्ति ‘जो भी उनके साथ नहीं है, उनके खिलाफ है’ को विशेष रूप से ध्यान में रखना होगा।
पिछले कई महीनों से रूसी खेमे से बाहर केवल हम अकेले ही चीन के यूएनओ में दाखिले के लिए और अमेरीकियों से फोरमोसा के मामले में आश्वासन लेने के लिए लड़ रहे हैं। हमने चीनियों की भावनाओं को शांत करने की, उनकी आशंकाओं को कम करने की और अमरीका, ब्रिटेन एवं यूएनओ के साथ हमारी वार्ताओं में उनकी जायज मांगों का समर्थन करने की हर मुमकिन कोशिश की है।
इस सब के बावजूद चीन हमारी अरुचि से सहमत नहीं है, वह हमें शक की नजरों से लगातार देख रहा है और बाहर से देखो तो शक्की मानसिकता साफ दिखाई देती है जिसमें शायद थोड़ी शत्रुता भी मिली हुई है। मुझे नहीं लगता है कि हम चीन को अपने नेक इरादों, अपनी मित्रता और सद्भावना पर विश्वास दिलाने के लिए इससे ज्यादा और कुछ काम कर सकते हैं।
पीकिंग में बैठा हमारा राजदूत जो हमारे इस मैत्रीपूर्ण दृष्टिकोण को उन तक पहुंचाने का सामर्थ्य रखता है, शायद वो भी इस काम में असफल हो गया है। उनके द्वारा भेजा गया आखिरी तार, एक सम्पूर्णतः असभ्य कार्य है, न केवल इसलिए क्योंकि चीनी ताकतों का तिब्बत में प्रवेश हमारे विद्रोह को नकारता है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि हमारा रवैया विदेशी दबाव से प्रभावित है। ये किसी मित्र की नहीं बल्कि हेाने वाले शत्रु की भाषा लगती है।
इसे पृष्ठभूमि में रखते हुए हमें अब, जैसा कि हम जानते थे, तिब्बत के विलुप्त हो जाने से और चीन का हमारे घर के दरवाजे तक विस्तार करने से, हमारे समक्ष खड़ी होने वाली नई परिस्थितियों के बारे में सोचना होगा। पूरे इतिहास में हमें कभी अपनी उत्तरपूर्वी सीमा के बारे में चिंता नहीं करनी पड़ी है; उत्तरी दिशा में स्थित हिमालय पर्वत को सदा अभेद्य माना जाता रहा है; हमारे मित्र ने हमें कभी कोई परेशानी नहीं दी।
चीनी विभाजित हैं। उनकी अपनी आंतरिक समस्याओं के कारण उन्होंने कभी हमें हमारी सीमाओं पर तंग नहीं किया। 1914 में हमने तिब्बत के साथ संधि स्थापित की जिसे चीन की मंजूरी हासिल नहीं थी। हमें लगा कि तिब्बत का स्वशासन इस स्वतंत्र संधि की मान्यता के लिए काफी है।
लेकिन हमें शायद उस पर चीन की मंजूरी भी हस्ताक्षरित करवा लेनी चाहिए थी। शायद चीन के लिए अधिराज्य के मायने कुछ और ही हैं। इसलिए हमें यह मानकर चलना चाहिए कि बहुत जल्द चीनी, तिब्बत और हमारे बीच हुए अनुबन्धों से भी पल्ला झाड़ लेंगे। जिससे तिब्बत के साथ हुए सभी सीमांत और आर्थिक समझौते, जिन पर हम पिछली आधी सदी से काम करते आ रहे हैं, उबलते तेल की हांडी में जा गिरेंगे। चीन अब विभाजित नहीं रहा। वह संयुक्त और शक्तिशाली हो गया है।
उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशा में हिमालय के साथ साथ सरहद के इस पार हमारी ऐसी आबादी है जो जातीय रूप से तिब्बतियों और मंगोलों से ज्यादा अलग नहीं है। अपरिभाषित सीमाओं और हमारी तरफ की आबादी की तिब्बतियों और चीनियों से समरूपता, आने वाले समय में चीन और हमारे बीच संकट पैदा कर सकती है।
अर्वाचीन और कड़वा इतिहास हमें यह सीख देता है कि साम्यवाद, साम्राज्यवाद से बचने की ढाल नहीं है और साम्यवादी भी साम्राज्यवादियों या अन्य किसी और की भी भांति उतने ही अच्छे या बुरे हैं। चीन केवल हिमालय पर्वत के इस पार के हिस्से में नहीं बल्कि असम के महत्वपूर्ण हिस्सों में भी दिलचस्पी रखता है।
चीनियों की तो बर्मा पर नजर है; बर्मा की मुश्किल यह है कि उसके पास तो मैक मोहन लाइन भी नहीं, जिसके इर्द गिर्द वह कोई समझौता तैयार कर सके। चीनियों की अधिग्रहण नीति और साम्यवादियों का साम्राज्यवाद पश्चिमी ताकतों के विस्तारवाद या साम्राज्यवाद से भिन्न है।
पहले के पास विचारधारा का वह चोगा है जो इसे दस गुना और खतरनाक बना देता है। विचारधारा के विस्तार के पीछे जातीय, राष्ट्रीय और ऐतिहासिक दावे छिपे हैं। इसलिए, उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशाओं से आने वाला खतरा दोनों, साम्यवादी भी है और साम्राज्यवादी भी। जहां, हमारी सुरक्षा को पहले ही पश्चिम और उत्तरपश्चिमी दिशाएं ललकार रही थीं, अब उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशाओं से हमारे लिए नया खतरा पैदा हो गया है।
इसलिए सदियों में पहली बार भारत को एक ही समय पर दो भिन्न दिशाओं में अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए खुद को एकत्रित करना होगा। अब तक हम पाकिस्तान को ध्यान में रखते हुए, जो हम से दुर्बल है, अपनी सुरक्षा योजनाएं तैयार करते आए हैं। अब हमें उत्तर और उत्तरपूर्वी दिशा में बसे साम्यवादी चीन को ध्यान में रखते हुए तैयारियां करनी होंगी, एक ऐसा साम्यवादी चीन जिसके निश्चित लक्ष्य और उद्देश्य हैं और जिसके मन में किसी भी हाल में हमारे प्रति मित्रता की भावना दिखाई नहीं देती।
इस सम्भावित तकलीफदेह सीमा की राजनैतिक परिस्थितियों पर भी हमें विचार कर लेना चाहिए। हमारी उत्तर और उत्तरपूर्वी सीमाओं में नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र बसे हैं। संचारण के हिसाब से ये सभी इलाके बहुत कमजोर हैं। इनमें लगातार रक्षात्मक रेखाएं नहीं बनाई गई हैं।
यहां से घुसपैठ करना बहुत आसान काम है। बहुत कम गलियारों में पुलिस सुरक्षा मौजूद हैं। जो चौकियाँ हैं, उन सब में भी हमारे सैनिक तैनात नहीं हैं। इन क्षेत्रों के साथ अपने सम्पर्क को हम किसी भी हाल में नजदीकी नहीं कह सकते। यहां पर रहने वाले लोग भारत के प्रति कोई विशेष निष्ठा भाव नहीं रखते।
दार्जिलिंग तथा कैलिंगपौंग क्षेत्रों में भी मंगोली प्रभाव साफ देखा जा सकता है। पिछले तीन वर्षों में हम नागा या असम की किसी भी अन्य पहाड़ी आदिवासी जाति की ओर कोई विशेष प्रशंसनीयस कदम नहीं बढ़ा सके हैं। यूरोपीय धर्मप्रचारक एवं अन्य अतिथि इन जातियों के सम्पर्क में अवश्य रहे हैं लेकिन इनका प्रभाव भारत के अनुकूल हरगिज नहीं था। कुछ समय पहले सिक्किम में कुछ राजनैतिक उत्तेजना हुई थी। हो सकता है कि वहां असंतुष्टि की भावना अभी भी सुलग रही हो।
बाकियों की तुलना में भूटान थोड़ा शांत है लेकिन तिब्बती लोगों के साथ उसकी नजदीकियां हानिकारक हो सकती हैं। नेपाल में बल शक्ति पर आधारित, अल्पतंत्रीय शासन चल रहा है; यह वहां के उग्र नागरिकों तथा आधुनिक जमाने के प्रबुद्ध विचारों के बीच टकराव है। ऐसी परिस्थिति में लोगों को खतरे का अहसास दिलाना या उन्हें रक्षात्मक तौर पर दृढ़ बनाना एक बहुत मुश्किल कार्य है और इस
मुश्किल को आसान करने का एकमात्र रास्ता है प्रबुद्ध दृढ़ता, ताकत और स्पष्ट नीतियां। मुझे पूर्ण विश्वास है कि चीनी और उनकी प्रेरणा के स्रोत सोवियत रूस, इन कमजोर कड़ियों का फायदा उठाने में कभी नहीं चूकेंगे, कुछ हद तक उनकी विचारधाराओं के समर्थन में और कुछ हद तक उनके लक्ष्यों के समर्थन में।
मेरे विचार में ऐसी परिस्थिति में हम न तो नमनशील हो सकते हैं और न ही ढुलमुल सकते हैं। हमें न केवल अपने लक्ष्यों को स्पष्टतः साध लेना चाहिए परंतु उन तक पहुंचने के रास्तों को भी अच्छी तरह पहचान लेना चाहिए। हमारे द्वारा की गई छोटी सी गलती लक्ष्यों के चुनाव में या फिर उन्हें कार्यान्वित करने हेतु लिए जाने वाले निर्णयों में से किसी तरह की ढील, हमें कमजोर बना देगी और हमारे सामने खड़ी साफ दिखाई दे रही धमकियों को और विशाल कर देगी।
इन बाहरी खतरों के साथ साथ हमें अब आतंरिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ेगा। मैंने पहले ही (एचवीआर) अयंगर को विदेश मंत्रालय को इन मामलों पर आसूचना विभाग की समीक्षा रिपोर्ट की एक नकल भिजवा देने के निर्देश दिए हैं। अब तक भारतीय साम्यवादी पार्टी को बाहरी देशों में साम्यवादियों से सम्पर्क साधने में या उनसे हथियार या कागज पत्री आदि की सप्लाई लेने में थोड़ी मुश्किल हो रही थी।
उन्हें इस काम के लिए पूर्व दिशा में स्थित कठिन बर्मी या पाकिस्तानी सीमाओं को प्रयोग में लाना पड़ रहा था या लंबे समुद्र तटों का सहारा लेना पड़ रहा था। अब इनके पास चीनी साम्यवादियों तक पहुंचने का एक आसान रास्ता उपलब्ध हो जाएगा, जिनके जरिए ये आराम से अन्य विदेशी साम्यवादियों तक भी पहुँच पाएंगे। गुप्तचरों, पांचवे स्तम्भ लेखकों एवं साम्यवादियों की घुसपैठ एक आम और आसान बात बन जाएगी। तेलंगाना और वारंगल में कहीं कहीं स्थित साम्यवादियों से निपटने की जगह हमें शायद अपनी
उत्तरी और उत्तरपूर्वी सीमा के साथ बसी साम्यवादी चुनौतियों से भी जूझना होगा, अपनी गोला बारूद की सप्लाई के लिए वे सुरक्षित रूप से चीन में साम्यवादी आयुधशालाओं पर निर्भर कर सकते हैं। इस तरह, ये सारी परिस्थितियां हमारे सामने ऐसी मुश्किलें लेकर आई हैं जिन पर हमें तुरंत कोई निर्णय लेना होगा ताकि, जैसा मैंने पहले भी कहा था, हम अपनी नीतियों के उद्देश्य तय करके उनकी उपलब्धि का रास्ता इख्तियार कर सकें।
यह भी स्पष्ट है कि हमारे द्वारा एक ऐसा व्यापक कदम उठाना चाहिए जिसमें न केवल हमारी रक्षात्मक नीति और तैयारी की स्थिति सम्मिलित हो बल्कि आतंरिक सुरक्षा की समस्या भी, जिससे हमें बिना एक क्षण बर्बाद किए निपटना चाहिए। हमें सीमा के कमजोर इलाकों में प्रशासनिक एवं राजनैतिक समस्याओं से भी निपटना होगा जिनका मैं पहले भी जिक्र कर चुका हूँ।
बेशक, मेरे लिए इन सभी समस्याओं का विस्तृत विवरण करना तो संभव नहीं होगा लेकिन फिर भी मैं नीचे कुछ ऐसी समस्याओं के बारे में बात करने जा रहा हूँ, मेरे विचार में जिनका समाधान बहुत जल्द हो जाना चाहिए और जिनके इर्द गिर्द ही हमें अपनी प्रशासनिक तथा सैनिक नीतियां तैयार करके इन्हें लागू करने की योजना बनानी चाहिए।
ए) भारतीय सीमाओं एवं आतंरिक सुरक्षा की चीनी चुनौतियों से होने वाले खतरे का आसूचना एवं सैन्य आकलन।
बी) अपने सैन्य दलों की स्थिति का निरीक्षण और उनकी आवश्यक पुनः तैनाती, विशेष तौर पर उन क्षेत्रों एवं रास्तों की सुरक्षा को लेकर जिन पर भविष्य में विवादों की सम्भावना है।
सी) अपने सुरक्षा दलों की ताकतों का मूल्यांकन और इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सेना की कटौती योजना पर पुनः विचार।
डी) हमारी रक्षात्मक आवश्यकताओं पर चिरस्थाई सोच विचार। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम बंदूकों, गोलाबारूद तथा कवचित सप्लाई पर विशेष ध्यान नहीं देंगे तो हमारी रक्षात्मक स्थिति लगातार कमजोर पड़ती जाएगी और हम पश्चिम एवं उत्तरपश्चिम तथा उत्तर एवं उत्तरपूर्वी दिशाओं से आने वाली दोहरी चुनौतियों के खतरों से लड़ने के योग्य नहीं रहेंगे।
इ) जहां तक चीन के यूएनओ में प्रवेश का सवाल है, चीन से हमें मिले दो टूक जवाब और उनके तिब्बत की ओर रवैये को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि हमें और देर तक उनके दावों का समर्थन करना चाहिए। चीन की कोरीयन युद्ध में सक्रिय हिस्सेदारी को देखते हुए यूएनओ में शायद उन्हें बहिष्कृत करने का अप्रत्यक्ष खतरा होगा। हमें इस समस्या पर भी अपना रुख निर्धारित कर लेना चाहिए।
एफ) अपनी उत्तरी एवं उत्तरपूर्वी सीमाओं को मजबूत करने के लिए हमारे द्वारा उठाए जाने वाले राजनैतिक एवं प्रशासनिक कदम। इसमें सम्पूर्ण सीमा सम्मिलित होगी यानि कि नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र।
जी) सीमा क्षेत्रों तथा उनके बगल में बसे क्षेत्रों जैसे कि यूपी, बिहार, बंगाल एवं असम की आंतरिक सुरक्षा के उपाय।
एच) इन क्षेत्रों तथा सेनाओं पर तैनात फौजी चौकियों के लिए सड़क, रेल, हवाई और बेतार संचारण विकास।
आई) सीमा चौकियों की सुरक्षा एवं उनकी आसूचना।
जे) ल्हासा तथा यांग्त्से और यतुंग की व्यापार चौकियों में हमारे मिशन का भविष्य और इन रास्तों की सुरक्षा के लिए तिब्बत में काम कर रहे हमारे रक्षा दल।
के) मैकमोहन रेखा के संबंध में हमारी नीति।
ये कुछ सवाल मेरे मन में उमड़कर मुझे परेशान करते हैं। हो सकता है कि इन मसलों पर सोचविचार हमें चीन, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन तथा बर्मा के साथ हमारे संबंधों के व्यापक प्रश्नों की ओर ले जाए। वैसे तो ये सब सवाल आम ही हैं लेकिन इनमें से कुछ एक प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण भी हो सकते हैं। जैसे कि हो सकता है हमें इस बात पर विचार करना पड़े कि क्या हमें बर्मा से हमारे संबंध घनिष्ठ करके उन्हें चीन से निपटने के लिए दृढ़ता मुहैया करवानी चाहिए।
मुझे लगता है कि हम पर दबाव डालने से पहले चीन, बर्मा पर दबाव डालने की कोशिश करेगा। चीन के साथ लगती सीमाएं पूरी तरह अपरिभाषित हैं, जिससे चीन, सीमा पर ठोस दावे कर सकता है। मौजूदा स्थिति में बर्मा चीन के लिए एक सरल मुश्किल पैदा करके हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकता है।
मेरा सुझाव है कि हमें जल्दी मिलकर इन समस्याओं पर व्यापक सोच विचार कर लेना चाहिए और तुरंत उठाए जाने वाले आवश्यक कदमों पर भी निर्णय ले लेना चाहिए और इसके साथ ही अन्य समस्याओं पर भी फुर्तीली नजर दौड़ाते हुए उनसे निपटने के लिए आवश्यक कदमों पर फैसला ले लेना चाहिए।
आपका वल्लभभाई
उपरोक्त पत्र से स्पष्ट है कि सरदार पटेल को नेहरू की चीन नीति बिल्कुल पसंद थी। पटेल की मृत्यु के लगभग 12 साल बाद पटेल की यह भविष्यवाणी सही हुई कि नेहरू की चीन नीति बिल्कुल गलत थी।
यह घटना उन दिनों की है जब सरदार पटेल को राजस्थान नामक नवीन प्रादेशिक इकाई का उद्घाटन करने के लिए दिल्ली से जयपुर जाना था। जयपुर से कुछ पहले ही विमान खराब हो गया। पूरे देश में वायुयान दुर्घटना के समाचार फैल गए जिन्होंने देश को चिंता में डाल दिया!
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29 मार्च 1949 को सरदार पटेल अपनी पुत्री मणिबेन तथा यादवेंद्र सिंह के साथ दिल्ली से वायुयान से राजस्थान के लिये रवाना हुए। बीच मार्ग में इंजन में खराबी आ गई तथा प्लेन का सम्पर्क रेडियो से कट गया। इस पर विमान में बैठे जोधपुर नरेश हनवंतसिंह ने विमान को अपने अधिकार में लेकर एक सूखी नदी में उतार दिया। इससे वायुयान दुर्घटना टल गई। सरदार पटेल के प्राण बच गए और वे सड़क मार्ग से जयपुर पहुंच कर राजस्थान का उद्घाटन कर सके। जब पटेल वापस दिल्ली लौटे तो सैंकड़ों देशवासियों ने हवाई अड्डे पर उनका भव्य स्वागत किया। संसद में सांसदों ने पटेल का अभूतपूर्व स्वागत किया। उनके सम्मान में आधे घण्टे तक संसद की कार्यवाही रोक दी गई। पटेल को पंजाब विश्वविद्यालय तथा उस्मानिया विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ लॉ की मानद उपाधि दी गई। जोधपुर नरेश हनवंतसिंह के इस योगदान के लिए देश उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहेगा।
सरदार पटेल जन-जन के नेता थे। उनकी अंतिम यात्रा में बहुत बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हुए किंतु सरदार पटेल का अंतिम संस्कार आम आदमी की तरह किया गया!
1950 की गर्मियों में पटेल का स्वास्थ्य तेजी से गिरा। उनकी खांसी में खून आने लगा। मणिबेन ने पटेल की बैठकों तथा कार्य-घण्टों की संख्या कम कर दी तथा पटेल के स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिये व्यक्तिगत मेडिकल स्टाफ नियुक्त किया गया।
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पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बिधानरॉय जो कि डॉक्टर भी थे, को ज्ञात हुआ कि पटेल अब अपनी मृत्यु के निकट होने को लेकर मजाक कर रहे हैं तथा उन्होंने अपने साथी मंत्री एन.वी. गाडगिल के समक्ष यह कहा है कि अब वे अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहेंगे। 2 नवम्बर 1950 को पटेल का स्वास्थ्य अत्यंत खराब हो गया। वे बार-बार बेहोश होने लगे। 12 दिसम्बर 1950 को उन्हें दिल्ली ले जाया गया। उस दिन नेहरू, राजगोपालाचारी, राजेन्द्र प्रसाद तथा मेनन दिल्ली एयरपोर्ट पर उन्हें विदा देने आये। पटेल बहुत कमजोर हो चुके थे। उन्हें कुर्सी सहित ही विमान में चढ़ाया गया। बम्बई में सांताक्रूज हवाई अड्डे पर विशाल जन समूह उनके स्वागत के लिये खड़ा था। पटेल को तनाव से बचाने के लिये जूहू हवाई अड्डे पर उतारा गया। यहाँ मुख्यमंत्री बी. जीत्र खेर तथा मोरारजी देसाई ने उनका स्वागत किया। बम्बई के राज्यपाल की कार उन्हें लेने आई थी जिससे वे बिड़ला हाउस पहुंचे। 15 दिसम्बर 1950 को उन्हें दूसरी बार तीव्र हृदयाघात हुआ तथा उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के अगले दिन भारतीय नागरिक सेवाओं तथा भारतीय पुलिस सेवा के डेढ़ हजार से अधिक अधिकारियों ने पटेल के दिल्ली स्थित निवास पर उपस्थित होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने भारत माता के प्रति पूर्ण स्वामिभक्ति की शपथ ग्रहण की।
भारत के इतिहास में ऐसा दृश्य इससे पहले कभी नहीं देखा गया। बम्बई सरकार ने गिरगाम चौपाटी पर उनका अंतिम संस्कार करने की योजना बनाई किंतु मणिबेन ने कहा कि सरदार की इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार सामान्य आदमी की तरह सोनापुर में किया जाये।
अब इस स्थान को मैरीन लाइन्स कहा जाता है। इसी स्थान पर पटेल के भाई का तथा पटेल की पत्नी का अंतिम संस्कार किया गया था। उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिये दस लाख लोग आये। प्रधानमंत्री नेहरू, राजगोपालाचारी तथा राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भी उपस्थित रहे। उनकी मृत्यु पर मैनचैस्टर गार्जियन ने लिखा था कि एक ही व्यक्ति विद्रोही और राजनेता के रूप में कभी-कभी ही सफल होता है परन्तु पटेल इस सम्बन्ध में अपवाद थे।
भारत के विभाजन के समय, वल्लभभाई पटेल पर हिन्दुओं का पक्ष लेने तथा साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया गया। मौलाना आजाद ने अपनी पुस्तक में पटेल की बहुत आलोचना की है।
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हिन्दू राष्ट्रवादी शक्तियां भी वल्लभभाई पर भारत का विभाजन स्वीकारने में जल्दबाजी करने का आरोप लगाती रही हैं। सुभाषचंद्र बोस के पक्षधर सरदार पटेल पर यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने जीवन भर गांधी का पक्ष लिया तथा गांधी के विरोधियों को कमजोर करने का काम किया। समाजवादी नेता जयप्रकाश तथा अशोक मेहता ने वल्लभभाई पटेल पर आरोप लगाया है कि वे भारतीय उद्योपतियों विशेषकर बिड़ला परिवार तथा साराभाई परिवार का व्यक्तिशः पक्ष लेते थे। कुछ इतिहासकारों ने उन पर आरोप लगाया है कि उन्होंने देशी राज्यों का एकीकरण करने के लिये, देशी राज्यों को स्व-विवेक एवं स्व-इच्छा से काम नहीं लेने दिया। इतिहास गवाह है कि वल्लभभाई पटेल पर लगाये गये समस्त आरोप निराधार हैं। भारत के एकीकरण एवं देशी राज्यों के एकीकरण के लिये यह देश पटेल का उतना ही ऋणी है जितना कि विष्णुगुप्त चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य तथा समुद्रगुप्त का। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा जे.आर.डी. टाटा का मानना था कि नेहरू की बजाय पटेल अच्छे प्रधानमंत्री सिद्ध होते। वे भारत के सफलतम गृहमंत्री थे। जनवरी 1947 के अंक में टाइम मैगजीन ने उनका चित्र अपने कवर पेज पर मुद्रित किया।
वल्लभभाई की मृत्यु पर मैनचैस्टर गार्जियन ने लिखा था कि एक ही व्यक्ति विद्रोही और राजनेता के रूप में कभी-कभी ही सफल होता है परन्तु पटेल इस सम्बन्ध में अपवाद थे। पटेल की मृत्यु के बाद वर्षों तक सरकार ने पटेल के बारे में न तो कोई साहित्य प्रकाशित किया न उनकी स्मृति में कोई आयोजन किये। 1980 में अहमदाबाद में सरदार पटेल राष्ट्रीय स्मारक की स्थापना की गई। 1991 में उन्हें भारत रत्न दिया गया।
प्राक्कथन – मुगल कालीन भवन पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक भारत के मुगलकालीन प्रमुख भवन पुस्तक की भूमिका दी गई है। यह पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है।
वास्तुकला को समस्त कलाओं की रानी कहा जाता है। इसलिए यह कहावत भी है कि ‘संसार में दो ही चीजें जीवित रहती हैं, या तो गीत या फिर भीत।’ अर्थात् संसार में साहित्य एवं भवन ही चिरस्थाई रहते हैं।
भारत में वास्तुकला का विकास उस समय ही होने लगा था जब अधिकांश दुनिया में जंगल स्थित थे और विश्व में बहुत कम सभ्यताएं प्रकाश में आई थीं। यही कारण था कि आठवीं शताब्दी ईस्वी में जब भारत पर मुस्लिम आक्रमण आरम्भ हुए, उस समय से बहुत पहले ही भारत में बड़ी संख्या में विशाल और भव्य भवन बन चुके थे जिनकी होड़ अन्य देशों में स्थित बहुत कम भवन कर सकते थे।
खलीफाओं, तुर्क आक्रांताओं एवं मंगोलों की सेनाओं ने भारत के हजारों विशाल एवं बहुमूल्य भवनों को तोड़कर नष्ट कर दिया तथा उनमें मेहराबों, गुम्बदों, मीनारों एवं आयत लिखी शिलाओं को लगाकर उन्हें मुसलमानों द्वारा निर्मित इमारत घोषित किया।
दिल्ली का विष्णु-स्तम्भ (अब कुतुबमीनार) एवं विष्णु मंदिर (अब जामा मस्जिद), अध्योया का मंदिर-जन्मस्थानम् (बाद में मस्जिद-जन्मस्थान), अजमेर का विष्णु मंदिर (अब ढाई दिन का झौंपड़ा), धार का सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर (अब कमलमौला मस्जिद), वाराणसी का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर, जालोर का विष्णु मंदिर एवं संस्कृत पाठशाला (तोपखाना मस्जिद) ऐसे ही अनुपम भवन थे जो मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा नष्ट-भ्रष्ट करके मस्जिदों में बदल दिए गए।
नगरकोट का प्राचीन वज्रेश्वरी देवी मंदिर, काठियावाड़ (गुजरात) का सोमनाथ महालय, अनंतनाग (कश्मीर) का मार्तण्ड सूर्य मंदिर, पाटन (गुजरात) का मोढेरा सूर्य मंदिर, हम्पी (कर्नाटक) के मंदिर, पाटन (गुजरात) का रुद्र महालय, वृंदावन (उत्तर प्रदेश) का मदन मोहन मंदिर एवं केशवराय मंदिर, मदुरै (तमिलनाडु) का मीनाक्षी मंदिर, जालोर जिले के सेवाड़ा शिवालय आदि सैंकड़ों ऐसे मंदिर थे जो मुसलमानों ने भंग कर दिए अथवा उन्हें गंभीर क्षति पहुंचाई।
भारतीय भवनों का यह विध्वंस दिल्ली सल्तनत-काल एवं मुगल सल्तनत-काल में निरंतर जारी रहा किंतु मुगलों ने जहाँ एक ओर मंदिरों को तोड़कर नष्ट किया वहीं नवीन महलों, मकबरों, मस्जिदों, उद्यानों आदि का निर्माण भी किया। विदेशी इतिहासकारों के अनुसार मुगल शासन की स्थापना के साथ ही भारतीय वास्तुकला के इतिहास में एक नवीन युग की शुरुआत हुई। पर्सी ब्राउन ने ‘मुगलकाल को भारतीय वास्तुकला की ग्रीष्म ऋतु’ माना है जो प्रकाश और ऊर्वरा शक्ति का प्रतीक होती है।
मुगल युग की वास्तुकला के सर्वांगीण विकास का कारण मुगलों में शानो-शौकत के प्रदर्शन की प्रवृत्ति, शिल्प आदि कलाओं के प्रति उनकी अभिरुचि, राजकोष की समृद्धि तथा संसाधनों की विपुल उपलब्धता माना जाता है। बाबर से लेकर औरंगजेब तक के मुगल शासकों ने भारत में कई महत्वपूर्ण भवन बनवाए तथा अनेक हिन्दू भवनों को मुगल शैली में ढाला।
मुगल काल में न केवल बादशाहों ने अपितु उनकी बेगमों, वजीरों, शहजादों, शहजादियों तथा अन्य लोगों ने भी बड़ी संख्या में छोटे-बड़े भवन बनाए थे जिनकी संख्या का पता लगाना संभव नहीं है। उनमें से बहुत से भवन एवं उद्यान अब काल के गाल में समा चुके हैं तथा बहुत कम भवन ही अपनी गवाही स्वयं देने के लिए उपलब्ध हैं। ये भवन भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान तथा बांगलादेश आदि देशों में मिलते हैं। मुगलकाल में ये समस्त क्षेत्र भारत के ही अंग थे। इसलिए इस पुस्तक में वहाँ के भी प्रमुख मुगल भवनों को सम्मिलित किया गया है।
भारत के समस्त मुगल कालीन भवनों का वर्णन करना संभव नहीं है। इसलिए इस ग्रंथ में मुगल काल में बने प्रमुख भवनों के इतिहास एवं स्थापत्य सम्बन्धी विशेषताओं को लिखा गया है। पुस्तक के अंत में पाठकों की सुविधा के लिए मुगलों के शासन-काल में विध्वंस किए गए हिन्दू-स्थापत्य की भी संक्षिप्त जानकारी दी गई है ताकि पाठकों को उस युग की स्थापत्य सम्बन्धी प्रवृत्तियों की वास्तविक तस्वीर के दर्शन हो सकें।
भारत में मुगल स्थापत्य शैली का प्रवेश बाबर की दिल्ली सल्तनत पर विजय के बाद हुआ। बाबर एवं हुमायूं के काल में मुगल स्थापत्य शैली का विकास नहीं हो सका।
भारत में मुगलों ने एक नवीन इस्लामी राज्य की स्थापना की जो सभ्यता एवं संस्कृति के स्तर पर अपने पूर्ववर्ती ‘दिल्ली सल्तनत’ से पूर्णतः भिन्न था। भारत का मुगल साम्राज्य ‘इस्लामी-तुर्की-मंगोल’ साम्राज्य था जिसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि भारत के मुगल शासकों में मध्य एवं पूर्वी एशिया की दो बड़ी क्रूर एवं लड़ाका जातियों- तुर्क एवं मंगोलों के रक्त का मिश्रण था और वे इस्लाम के अनुयायी थे।
मंगोल जाति अत्यंत प्राचीन काल में चीन में अर्गुन नदी के पूर्व के इलाकों में रहा करती थी, बाद में वह बाह्य ख़िन्गन पर्वत शृंखला और अल्ताई पर्वत शृंखला के बीच स्थित मंगोलिया पठार के आर-पार फैल गई। युद्धप्रिय मंगोल जाति ख़ानाबदोशों का जीवन व्यतीत करती थी और शिकार, तीरंदाजी एवं घुड़सवारी करने में बहुत कुशल थी।
भारत पर मंगोलों के आक्रमण
12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मंगोलों के मुखिया ‘तेमूचीन’ ने बड़ी संख्या में बिखरे हुए मंगोल-कबीलों को एकत्र किया और स्वयं उनका नेता बन गया। वह इतिहास में चंगेज़ ख़ान के नाम से जाना गया। इसके बाद मंगोल मध्य एशिया तक बढ़ आए और उनका सामना मुस्लिम-तुर्कों से हुआ। ई.1221 में मंगोलों ने चंगेजखाँ के नेतृत्व में भारत पर पहला बड़ा आक्रमण किया किंतु तब तक भारत में मध्य एशियाई तुर्क अपना शासन जमा चुके थे। उस काल में मंगोल इस्लाम के सबसे बड़े शत्रु थे।
इसलिए वे पूरे तीन सौ साल तक भारत पर आक्रमण करते रहे और भारी रक्तपात एवं बरबादी मचाकर पुनः मध्य ऐशिया को भागते रहे। ई.1221 से लेकर ई.1526 तक मंगोल आक्रमणकारियों की कई लहरें भारत में आईं। इस दौरान वे विदेशी आक्रांता बने रहे। वे नृशंस हत्याओं, भयानक आगजनी तथा क्रूरतम विध्वंस के लिये कुख्यात थे।
मुगल स्थापत्य का वास्तविक काल
ई.1526 में मंगोल-वंशी बाबर भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने में सफल हो गया। भारत में बाबर तथा उसके वंशज ‘मुगलों’ के नाम से जाने गए। बाबर के वंशज थोड़े बहुत व्यवधानों के साथ ई.1526 से ई.1765 तक भारत के न्यूनाधिक क्षेत्रों पर शासन करते रहे। ई.1765 में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) से इलाहाबाद की संधि की जिसके तहत मुगल बादशाह को 26 लाख रुपए की पेंशन देकर शासन के कार्य से अलग कर दिया गया।
बाबर के वंशजों में हुमायूँ, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब ही प्रभावशाली शासक हुए तथा उनके समय देश में कई प्रकार के विशाल भवनों का निर्माण हुआ। इनमें से भी औरंगजेब ने अपने शासनकाल ई.1658 से ई.1707 तक बहुत कम भवन बनवाए।
अतः मुगलों के स्थापत्य का वास्तविक इतिहास बाबर से आरम्भ होकर शाहजहाँ तक अर्थात् ई.1526 से लेकर ई.1658 तक समाप्त हो जाता है। इतिहास की दृष्टि से यह कालखण्ड बहुत बड़ा नहीं होता किंतु उस काल में बहुत बड़ी संख्या में बने भवन, भारत में मुगल शासन के इतिहास को जीवित रखे हुए हैं।
फारसी और भारतीय मिश्रण से बनी मुगल स्थापत्य शैली
मुगल अपने साथ स्थापत्य कला की कोई विशिष्ट शैली लेकर नहीं आए थे। उनकी स्मृतियों में समरकंद के मेहराबदार भवन, ऊँचे गुम्बद, बड़े दालान, कोनों पर बनी पतली और ऊँची मीनारें तथा विशाल बागीचे थे। उन्हीं स्मृतियों को मुगलों ने हिन्दू, तुर्की एवं फारसी वास्तुकला में थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ मिला दिया। इन सबके मिश्रण से जो स्थापत्य शैली सामने आई उसे मुगल स्थापत्य शैली कहा गया।
हालांकि मुगलों के स्थापत्य की सभी प्रमुख विशेषताएं यथा तिकोने या गोल मेहराब (।तबी), पतली और लम्बी मीनारें, झरोखेदार बुर्ज और गोलाकार गुम्बद पहले से ही तुर्कों के स्थापत्य में समाहित थे। अंतर केवल इतना था कि मुगलों के मेहराब, मीनारें, बुर्ज और गुम्बद पहले की अपेक्षा अधिक बड़े, कीमती पत्थरों से युक्त एवं हिन्दू तथा फारसी विशेषताओं को समेटे हुए थे। मुगल-इमारतों के भीतर विशाल कक्षों का एवं बाहर सुंदर एवं विशाल उद्यानों का निर्माण किया गया।
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दिल्ली सल्तनत के तुर्की सुल्तानों द्वारा निर्मित भवनों के स्थापत्य को मुगलों के स्थापत्य से भिन्न करने के लिए कहा जा सकता है कि तुर्की सुल्तानों के भवनों में पुरुषोचित दृढ़ता का समावेश है जबकि मुगलों के स्थापत्य में स्त्रियोचित-स्थापत्य-सौंदर्य के दर्शन होते हैं। मुगल वास्तुकला की तुलना मुगलों के काल में भारत में विकसित उर्दू भाषा से की जा सकती है। उर्दू अपने आप में कोई भाषा नहीं है, अपितु मुगलों के सैनिक स्कंधावरों में तैयार हुई विभिन्न भाषाओं का मिश्रण है। मुगलों की सेना में अरब, फारस, उजबेकिस्तान, अफगानिस्तान, तूरान, मकरान, ईरान और भारत आदि देशों के सैनिक भर्ती होते थे। वे सब अपने-अपने देश की भाषा बोलते थे। लम्बे समय तक साथ रहने के कारण वे एक दूसरे की भाषा को समझने लगे और उनकी भाषा में विदेशी भाषाओं के शब्दों का समावेश होने लगा। इस प्रकार उर्दू भाषा तैयार हो गई। यही स्थिति मुगलों के स्थापत्य की थी जिसमें फारसी, तुर्की, अरबी, उजबेकी तथा भारतीय स्थापत्य शैलियां मिश्रित होकर एक नए रूप में सामने आई थीं। इसलिए मुगलों की स्थापत्य शैली को ‘इण्डो सारसेनिक शैली’ भी कहा जाता है।
मुगल स्थापत्य शैली की विशेषताएँ
भारत में बने मुगल भवनों के स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-
(1.) विशालाकाय प्याज के आकार के गुम्बद जिनके चारों तरफ चार छोटे गुम्बद बने हुए हों।
(2.) इमारतों में लाल बलुआ पत्थर एवं सफेद संगमरमर का उपयोग।
(3.) पत्थरों पर नाजुक सजावटी अलंकरण, दीवारों के बाहरी एवं भीतरी हिस्सों पर पच्चीकारी एवं दीवारों और खिड़कियों में पत्थरों की अलंकृत जालियों का उपयोग।
(4.) मस्जिदों, मकबरों एवं महलों की भीतरी दीवारों पर फ्रैस्को अर्थात् भित्तिचित्रों का निर्माण।
(5.) चारों ओर उद्यान से घिरे हुए स्मारक भवनों का निर्माण।
(6.) विशाल सहन सहित मस्जिदों का निर्माण।
(7.) फारसी एवं अरबी के अलंकृत शिलालेख, कुरान की आयतों का कलात्मक लेखन।
(8.) भवन परिसर के विशाल मेहराब युक्त मुख्य द्वारों का निर्माण।
(9.) दो तरफ या चार तरफ ईवान का निर्माण।
(10.) भवनों की छतों पर कलात्मक बुर्ज एवं छतरियों का निर्माण।
(11.) भवन के चारों ओर लम्बी एवं पतली मीनारों का निर्माण।
(12.) मुगल शैली में स्थानीय शैलियों के मिश्रण से उप-मुगल शैलियों का निर्माण यथा- राजपूत स्थापत्य शैली, सिक्ख स्थापत्य शैली, इण्डो सारसैनिक स्थापत्य शैली, ब्रिटिश राज स्थापत्य शैली।
मुगल स्थापत्य शैली के सम्बन्ध में विदेशी विद्वानों के मत
बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि मुगल स्थापत्य शैली में भारतीय स्थापत्य की प्रधानता है। हेवेल ने लिखा है- ‘मुगल शैली विदेशी तथा देशी शैलियों का सम्मिश्रण प्रदर्शित करती है। भारतीय शैली अनुपम थी और उसमें विदेशी तत्त्वों को मिलाने की अलौकिक शक्ति थी।’
सर जान मार्शल ने लिखा है- ‘मुगल शैली के विषय में यह निश्चय करना कठिन है कि उस पर किन तत्त्वों का प्रभाव अधिक था।’
फर्ग्यूसन तथा कुछ अन्य विद्वानों का विश्वास है कि ‘मुगल कला, पूर्व-मुगलकाल की कला का परिवर्तित और विकसित रूप थी।’ अर्थात् भारतीय कला को विदेशी कला से प्रेरणा प्राप्त हुई थी और विदेशी कला ने भारतीय कला को प्रभावित किया था।
ऑपस ड्यूरा से पीट्रा ड्यूरा
भारत में मुगलों के आने से पहले के मुस्लिम भवनों की सजावट ‘ऑपस ड्यूरा’ शैली में की जाती थी। इस शैली में पत्थर के ऊपर रंगों से डिजाइन, या ज्यामितीय आकृतियां अथवा कुरान की आयतें लिखी जाती थीं किंतु हुमायूँ के काल से मुगल भवनों के बाहर बनने वाले ईवान तथा मेहराब और भवन की भीतरी दीवारों पर ‘पीट्रा ड्यूरा’ शैली की सजावट का प्रयोग किया जाने लगा।
पीट्रा ड्यूरा को दक्षिण एशिया में पर्चिनकारी तथा हिन्दी में पच्चीकारी कहा जाता है। पीट्रा ड्यूरा एक विशिष्ट प्रकार की कला है जिसमें उत्कृष्ट पद्धति से कटे संगमरमर आदि पत्थर में तराशे एवं चमकाए हुए पत्थरों, नगीनों, महंगे रत्नों, सोने-चांदी एवं कांच के टुकड़ों की जड़ाई की जाती है।
इस कार्य को इमारत बनने के बाद, उसके ऊपर पत्थर की चौकियों अथवा पट्टियों के रूप में चिपकाया जाता है। यह कार्य इतनी बारीकी से किया जाता है कि पत्थरों के बीच का महीनतम खाली स्थान भी अदृश्य हो जाता है। जड़े गए पत्थरों के समूह में स्थिरता लाने हेतु इसे जिगसॉ पहेली जैसा बनाया जाता है ताकि प्रत्येक टुकडा़ अपने स्थान पर मजबूती से ठहरा रहे।
यह कला सर्वप्रथम रोम में प्रयोग की गई। ई.1500 के आसपास यह कला चरमोत्कर्ष पर पहुँची। सोलहवीं शती में यह कला यूरोप से बाहर निकलकर मुगलों तक पहुंची जहाँ इस कला को नए आयाम मिले, स्थानीय एवं देशी कलाकारों ने भारत में बने अनेक भवनों में इस कला का उपयोग किया जिसके सबसे उत्कृष्ट उदाहरण एतमादुद्दौला के मकबरे, अगारा के लाल किले के महलों एवं ताजमहल में मिलता है। मुगल भारत में इसे पर्चिनकारी या पच्चीकारी कहा जाता था जिसका आशय नगीना जड़ने से होता है।
लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर
मुगल स्थापत्य शैली की सबसे बड़ी विशेषता उत्तर भारत में बहुतायत से मिलने वाला लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर का व्यापक उपयोग है जिसे काटकर, घिसकर तथा पॉलिश करके सुंदर कलात्मक स्वरूप प्रदान किया गया। मुगलों ने भवन निर्माण में बहुत कम मात्रा में काला संगमरमर, क्वाट्जाईट एवं ग्रेनाइट का उपयोग किया।
मुगल भवनों की चिनाई सामान्यतः चूने के गारे में होती थी। दीवारों के भीतरी हिस्से में अनगढ़ पत्थरों को चिना जाता था और बाहरी भाग को लाल बलुआ पत्थर अथवा सफेद संगमरमर की पट्टियों (slabs) से ढक दिया जाता था। कुछ भवनों के निर्माण में ईंटों का भी प्रयोग किया गया।
राजस्थान ने उपलब्ध कराई निर्माण सामग्री
बाबर एवं हुमायूँ के काल के भवनों में राजस्थान के करौली नामक स्थान से मिलने वाले लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया किंतु जहाँगीर के काल से मुगल स्थापत्य में संगमरमर का उपयोग व्यापक पैमाने पर होने लगा। संगमरमर की आपूर्ति मारवाड़ के मकराना नगर से होती थी।
दिल्ली के दीवाने खास, मोती मस्जिद एवं जामा मस्जिद, आगरा के ताजमहल, एतमादुद्दौला का मकबरा एवं मुस्समन बुर्ज, औरंगाबाद का बीबी का मकबरा, आदि भवनों का निर्माण मकराना के संगमरमर से हुआ है। चिनाई के लिए उत्तम कोटि के चूने की आपूर्ति भी राजस्थान के नागौर जिले से होती थी। गहरे नीले रंग का लाजवर्त (Lapis lazuli) अफगानिस्तान से आता था। जबकि महंगे रत्न विश्व के अनेक देशों से मंगवाए जाते थे। मुगलों ने अपने महलों में जलापूर्ति के लिए नहरों, उद्यानों में नालियों एवं फव्वारों का भी बड़े स्तर पर उपयोग किया।
महंगे रत्नों की भरमार
मुगलों ने अपने महलों में नीला लाजवर्त, लाल मूंगा, पीला पुखराज, हरा पन्ना, कत्थई गोमेद, सफेद मोती आदि मूल्यवान एवं अर्द्धमूल्यवान पत्थरों का भरपूर उपयोग किया। शाही महलों एवं शाही मकबरों में संगमरमर में बने फूल-पत्तियों की डिजाइनों में वैदूर्य, गोमेद, सूर्यकान्त, पुखराज और ऐसे ही अनेक कीमती रत्नों को जड़ने का काम मुगल स्थापत्य की विशेषता है।
उनसे पहले भारत के मुस्लिम भवनों में रत्नों का प्रयोग कभी नहीं हुआ था। मुगलों की बहुत ही सुंदर और संगमरमर की कलाकृतियों में सोने और कीमती पत्थरों का जड़ाऊ काम भी मिलता है। सोने-चांदी के पतरों में रत्नों की ऐसी जड़ाई प्राचीन हिन्दू स्थापत्य में मिलती थी किंतु मुस्लिम आक्रमणों के कारण हिन्दू स्थापत्य कला का लगभग पूरी तरह विनाश हो चुका था।
नहरों एवं फव्वारों से युक्त मुगल गार्डन्स
मुगलों ने समरकंद के तैमूर शैली के उपवनों के अनुकरण पर भारत में कई बाग बनवाए जिन्हें मुगल उद्यान कहा जाता है। बाबर ने ई.1528 में आगरा में एक बाग बनवाया जिसे आराम बाग कहा जाता था। यह भारत का सबसे पुराना मुग़ल उद्यान था। इसे अब रामबाग कहा जाता है। जहाँगीर काल में निर्मित हुमायूँ का मकबरा एक बड़े चारबाग के भीतर स्थित है।
जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ द्वारा निर्मित एतमादुद्दौला का मकबरा भी चारबाग शैली के एक विशाल उद्यान के भीतर बना हुआ है। जहाँगीर ने काश्मीर में शालीमार बाग बनवाया। नूरजहाँ के भाई आसफ खान (जो कि शाहजहाँ का श्वसुर और मुमताज महल का पिता था) ने ई.1633 में कश्मीर में निशात बाग बनवाया। प्रयागराज का जहाँगीर कालीन खुसरो बाग भी चारबाग शैली में बना हुआ है।
शाहजहाँ ने लाहौर में शालीमार बाग बनवाया जिसकी प्रेरणा काश्मीर के शालीमार बाग से ली गई थी। शाहजहाँ द्वारा निर्मित ताजमहल भी चारबाग शैली के एक बड़े उद्यान के बीच स्थित है।
ताजमहल की सीध में यमुना के दूसरी ओर भी शाहजहाँ द्वारा निर्मित एक उद्यान है जिसे मेहताब बाग कहा जाता है। यह भी चारबाग शैली में बना हुआ है। औरंगजेब ने पंजाब में पिंजोर बाग बनवाया जो हरियाणा के पंचकूला जिले में अपने बदले हुए स्वरूप में अब भी मौजूद हैं तथा यदुवेन्द्र बाग कहलाता है।
चारबाग शैली एक विशिष्ट प्रकार की शैली थी जिसमें उद्यान के केन्द्रीय भाग से चारों दिशाओं में चार नहरें जाती थीं जिनसे पूरे उद्यान को जल की आपूर्ति होती थी। ये चार नहरें, कुरान में वर्णित जन्नत के बाग में बहने वाली चार नदियों का प्रतीक होती थीं। भारत में मुगलों द्वारा बनाए गए छः उद्यानों को यूनेस्को विश्व धरोहर की संभावित सूचि में सम्मिलित किया गया हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर के परी महल, निशात बाग, शालीमार बाग, चश्म-ए-शाही, वेरिनाग गार्डन तथा अचबल गार्डन सम्मिलित हैं।
भारत में मुगल स्थापत्य के प्रसिद्ध उदाहरण
भारत में मुगल स्थापत्य शैली के उत्कृष्टतम नमूने दिल्ली, आगरा, फतेहपुर सीकरी, लखनऊ, लाहौर (अब पाकिस्तान), काबुल (अब अफगानिस्तान), कांधार (अब अफगानिस्तान) आदि नगरों में हैं। कुछ प्रसिद्ध भवन इस प्रकार हैं-
(1.) मकबरे: एतमादुद्दौला का मकबरा, हुमायूँ का मकबरा, अकबर का मकबरा, जहाँगीर का मकबरा, ताजमहल, अनारकली का मकबरा, बीबी का मकबरा, आदि।
(2.) मस्जिद: दिल्ली, आगरा एवं फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिदें, लाहौर, दिल्ली एवं आगरा की मोती मस्जिदें, आगरा की नगीना मस्जिद, फतेहाबाद की मस्जिद, दिल्ली की किला-ए-कुहना मस्जिद आदि।
(3.) किले: दीन पनाह, आगरा एवं दिल्ली के लाल किले, लाहौर का किला, प्रयागराज का किला, अजमेर का दौलताबाद किला।
(4.) महलः फतेहपुर सीकरी के महल, आगरा एवं दिल्ली के लाल किलों के महल, आदि।
बाबर का स्थापत्य बोध उसके द्वारा बनाए गए भवनों की अपेक्षा उसकी आत्मकथा बाबरनामा से अधिक होता है। बाबर ने भारत में मौलिक रचनाओं का निर्माण करने की बजाय हिन्दू मंदिरों को तोड़कर उन्हें मस्जिदों में बदलने का कार्य किया।
जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर ने ई.1526 में भारत में मुगल सल्तनत की स्थापना की थी। उसे भारत के इतिहास में बाबर के नाम से जाना जाता है। बाबर के पिता मिर्जा उमर बेग ने बाबर की शिक्षा-दीक्षा की निश्चय ही अच्छी व्यवस्था की होगी क्योंकि उसका दरबार उस समय के विद्वान व्यक्त्यिों से भरा हुआ था।
बाबर का नाना यूनुस खाँ अपने समय का ख्यातिनाम विद्वान था। उसे चित्रकला, संगीत एवं अन्य कलाओं में अच्छी रुचि थी। नाना यूनुस खाँ ने बाबर को बहुत प्रभावित किया था। इस कारण बाबर में विभिन्न कलाओं के प्रति स्वाभाविक रूप से प्रेम पनप गया।
बाबर की माँ कूतलूक निगार खानम तुर्की एवं फारसी की अच्छी ज्ञाता थी। इस कारण बाबर में साहित्य के प्रति प्रेम जन्मा। बाबर प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य लिखता था। वह अपने जीवन में जिस भी स्थान पर गया, उसने वहाँ का वर्णन अवश्य किया। वह उस स्थान के पक्षियों, वनस्पतियों, पहाड़ों, झीलों, नदियों, पशुओं, मनुष्यों, नगरों, बगीचों एवं भवनों आदि का बारीकी से वर्णन करता था जिससे स्पष्ट होता है कि उसे नगरों के निर्माण एवं भवनों की भी अच्छी जानकारी थी।
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जब बाबर 11 वर्ष का था, उसके पिता मिर्जा उमर बेग का निधन हो गया। इतनी कम आयु में बाबर को फरगना का राज्य संभालना पड़ा। उसी समय उसके ताऊ मिर्जा अहमद ने फरगना पर आक्रमण कर दिया जो कि समरकंद का शासक था। अहमद ने बाबर के कुछ नगरों पर अधिकार कर लिया। बाबर के मामा महमूद खाँ ने भी बाबर के राज्य पर आक्रण करके उसके कुछ नगर दबा लिए। कीश के अमीर ने भी बाबर के राज्य का कुछ भाग दबा लिया। इन कठिनाइयों में उसकी दादी ऐसान दौलत बेगम ने उसका मार्गदर्शन किया जिसके कारण बाबर अपने राज्य की रक्षा कर सका। राज्य बचाने के लिए किए गए कड़े संघर्ष के कारण उसमें समय से पहले ही प्रौढ़ता आ गई। इसलिए इतिहासकारों ने उसे ‘असमय प्रौढ़ बालक’ कहा है। पाँच साल बाद जब बाबर के ताऊ अहमद मिर्जा की मृत्यु हुई और उसके पुत्रों में राज्याधिकार को लेकर झगड़ा हुआ तो बाबर ने समरकंद पर आक्रमण कर दिया। समरकंद उसके पूर्वजों की राजधानी थी इसलिए बाबर उस पर अपना नैसर्गिक अधिकार समझता था। समरकंद उन दिनों तुर्की सभ्यता एवं संस्कृति का बड़ा केन्द्र था। वहाँ के विद्यालय, पुस्तकालय, चिकित्सालय और राजाप्रासाद मुस्लिम जगत् में विख्यात थे। समरकंद के कवि, गणितज्ञ, साहित्यकार और ज्योतिषियों की धाक चारों ओर थी। समरकंद के वन-उपवन और पुष्प लोगों को मुग्ध कर देते थे।
जब बाबर ने समरकंद पर विजय प्राप्त की तो उसने समरकंद शहर का बारीकी से निरीक्षण किया एवं अपने आदमियों से उसकी चाहरदीवारी को नपवाया। बाबर ने अपनी पुस्तक ‘बाबरनामा’ में इस शहर का बड़ा रोचक वर्णन किया है। बाबर ने लिखा है कि समरकंद एक सुंदर शहर था जिसे इस्कंदर नामक तुर्क सरदार ने बसाया था। बाद में तैमूर बेग ने इसे अपनी राजधानी बनाया जिसे भारत में तैमूर लंग अर्थात् लंगड़ा तैमूर कहा जाता है।
बाबर ने जब समरकंद पर अधिकार किया था तब इस शहर के चारों ओर एक सुंदर चाहरदीवारी बनी हुई थी जिसकी लम्बाई दस हजार कदम थी। समरकंद के पूर्व में फरगाना तथा काशगर, पश्चिम में बुखारा तथा ख्वारिज्म, उत्तर में ताशकंद और शाहरुखिया नामक नगर थे जिन्हें तुर्कों एवं मंगोलों ने दुनिया भर के नगरों को लूटकर समृद्ध किया था। समरकंद में भी बाबर के पूर्वज तैमूर बेग तथा उलूग बेग मिर्जा के बनाए हुए कई भवन तथा उद्यान थे जिन्हें बाबर ने अपनी आंखों से देखा था।
बाबर के पूर्वज उलूग बेग मिर्जा ने समरकंद में एक वेधशाला बनवाई थी जिसे जीचशाही कहा जाता था। इस वेधशाला में तीन मंजिलें थीं। बाबर ने इसे समरकंद के उत्तम भवनों में से एक कहा है। उलूग बेग मिर्जा ने इस वेधशाला में सूर्य, चन्द्र एवं अन्य नक्षत्रों की गति का अध्ययन करके कूरकानी जीच (पंचांग) तैयार किया था। यह पंचांग इतना प्रसिद्ध हुआ कि कई शताब्दियों तक विश्व के कई देशों में यही पंचांग प्रचलित रहा।
उस समय तक सम्पूर्ण विश्व में केवल 7-8 वेधशालाओं का निर्माण हुआ था जिनमें से एक वेधशाला भारत के उज्जैन राज्य के राजा विक्रमादित्य के समय में बनी थी, बाबर ने उज्जैन की वेधशाला का समय 57 ईस्वी पूर्व बताया है तथा इस वेधशाला में बने पंचांग में कुछ दोष बताए हैं।
बाबर के समय एक और पंचांग का उपयोग होता था जिसे ‘ईलखानी जीच’ कहते थे। इसे ख्वाजा नसीर तूसी ने हुलाकू खाँ के समय ‘मरागा’ में तैयार किया था। बाबर ने ‘मामूनी जीच’ का भी उल्लेख किया है जिसे मामून खलीफा द्वारा निर्मित वेधशाला में तैयार किया गया था। उसने ‘बतलीमूस’ नामक वेधशाला का भी उल्लेख किया है।
बाबारनामा में समरकंद के भवनों एवं वेधशालाओं के वर्णन से अनुमान लगाया जा सकता है कि बाबर में नगर-सौन्दर्य के सम्बन्ध में चेतना थी, उसकी इतिहास के अध्ययन में भी रुचि थी और वह नक्षत्र विद्या की बारीकियों को भी समझता था। समरकंद को ‘मावराउन्नहर’ तथा ‘बदलए-महफूजा’ भी कहा जाता था जिसका अर्थ होता है- ‘जिसे किसी शत्रु ने आज तक नहीं जीता।’ बाबर ने समरकंद की चाहरदीवारी में एक लोहे के फाटक का उल्लेख किया है जिसके बाहर शाह जिन्दा की मजार थी।
समरकंद के सम्बन्ध में बाबर ने लिखा है कि यह आश्चर्यजनक रूप से सुंदर है तथा यहाँ विभिन्न व्यवसाय करने वाले लोग एक ही बाजार में नहीं बैठते थे अर्थात् विभिन्न व्यवसाय वाले लोगों के लिए अलग-अलग बाजार बने हुए थे। बाबर ने इसे बड़ी ही आश्चर्यजनक योजना बताया है तथा समरकंद के नानबाइयों और बावरचियों की तारीफ करते हुए यह भी लिखा है कि संसार का सर्वोत्तम कागज यहीं बनता है।
कीश के मेहराब (Arches of Ketch)
बाबर ने अपनी पुस्तक में समरकंद के पास स्थित कीश नामक नगर का वर्णन भी किया है जो समरकंद से लगभग 48 मील दूर स्थित था। तैमूर लंग का जन्म इसी नगर में हुआ था। तैमूर लंग ने कीश में अपने लिए भव्य महलों का निर्माण करवाया था। उसने अपने दरबार के लिए एक भव्य मेहराबदार हॉल बनवाया था जिसमें उसके सेनापति बेग तथा दरबारी बेग उसकी दाईं एवं बाईं ओर बैठते थे। दरबार में उपस्थित होने के इच्छुक लोगों के लिए उसने दो छोटे हॉल बनवाए थे और दरबार में प्रार्थना करने के लिए दरबार भवन के चारों ओर छोटे-छोटे कमरे बनवाए थे।
बाबर ने लिखा है कि इस प्रकार की भव्य मेहराबें संसार में बहुत कम होंगी तथा कहा जाता है कि यह ‘किसरा के मेहराब’ से भी उत्तम है। तैमूर ने कीश में एक मदरसे तथा एक मकबरे का भी निर्माण करवाया था। जहाँगीर मिर्जा की कब्र तथा उसकी संतान के कुछ अन्य लोगों की कब्रें भी वहीं थीं जिनका उल्लेख बाबर ने अपनी पुस्तक में किया है।
बाबर ने लिखा है कि चूंकि कीश ऐसा स्थान नहीं था जिसे खूबसूरत नगर में बदला जा सके इसलिए तैमूर ने कीश की जगह समरकंद को अपनी राजधानी बनाया तथा वहाँ अनेक प्रकार के उत्तम भवन बनवाए। बाबर ने ‘ईतमाक दर्रे’ का भी उल्लेख किया है जो समरकंद एवं कीश के बीच स्थित पहाड़ियों में था तथा जहाँ से पत्थर लाए जाकर, समरकंद एवं कीश के महल एवं अन्य भवन बनाए गए थे। ऐसा प्रतीत होता है कि कीश नगर के मेहराब (Arch) बाबर के मस्तिष्क पर छा गए। भविष्य में उसके समस्त भवनों को मेहराबदार ही बनाया गया। यही मेहराब मुगलों की स्थापत्य शैली की प्रमुख पहचान बन गई। मेहराब किसी भी द्वार या दीवार में बनाई गई आर्चनुमा आकृति को कहते हैं। यह गोलाई लिए हुए अथवा त्रिकोणात्मक आकृति लिए हुए हो सकता है।
पेशताक (कांधार)
बाबर ने कांधार में ‘पेशताक’ नामक एक भवन बनवाया। इसके लिए उसने ‘सरपूजा’ नामक पहाड़ से पत्थर कटवाकर मंगवाए। इस भवन को पत्थर काटने वाले 80 कारीगरों ने 9 वर्ष तक प्रतिदिन काम करके पूरा किया।
बाग-ए-बाबर (काबुल)
बाबर ने काबुल में भी एक बाग बनवाया जिसे बाग-ए-बाबर कहा जाता था। इसमें पानी की नहरें, बारादरियां, बैठक के कमरे आदि अनेक निर्माण करवाए गए थे जिसे बाद में तालिबानियों ने तबाह कर दिया। वर्तमान में इसके अवशेष ही देखे जा सकते हैं।
बाबर का भारत में प्रवेश
बाबर में नई चीजों को देखने और समझने का इतना प्रबल उत्साह था कि जब उसने 11 मार्च 1519 को झेलम पार करने के बाद जीवन में पहली बार बाल्टियों सहित रहट को देखा तब उसने रहट की कार्य-विधि को जानने के लिए कई बार पानी निकलवाकर देखा। ई.1526 में बाबर ने इब्राहीम लोदी को परास्त करके दिल्ली एवं आगरा पर अधिकार कर लिया। बाबर भारत में केवल चार साल ही राज्य कर सका। इतने कम समय में वह अपना राज्य भी ढंग से व्यवस्थित नहीं कर सका इसलिए भवन निर्माण के बारे में सोचना भी कठिन ही था। फिर भी बाबर ने भारत में कुछ विध्वंस एवं कुछ निर्माण किए।
हिन्दू स्थापत्य का अनुकरण
उसे दिल्ली और आगरा की तुर्क तथा अफगान सुल्तानों द्वारा निर्मित इमरतें पसंद नहीं आईं। वह ग्वालियर में मानसिंह एवं विक्रमजीतसिंह के महलों की स्थापत्य शैली से अत्यधिक प्रभावित हुआ। उस काल में ग्वालियर के महल ही हिन्दू कला के सुंदर उदाहरण के रूप में शेष बचे थे। यद्यपि बाबर के अनुसार इनके निर्माण में किसी निश्चित नियम एवं योजना का पालन नहीं हुआ था तथापि वे बाबर को सुंदर एवं हृदयग्राही प्रतीत हुए। बाबर ने अपने लिए ग्वालयिर के अनुकरण पर महल बनवाए। बाबर ने स्वयं अपनी प्रशंसा करते हुए लिखा है कि ‘मैंने आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर एवं कोल नामक स्थानों पर भवन निर्माण के कार्य में संगतराशों को लगाया।’
सतीश चन्द्र ने लिखा है- ‘बाबर के लिए स्थापत्य का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नियम-निष्ठता एवं समरूपता थी जो उसे भारतीय इमारतों में दिखाई नहीं दी। बाबर भारतीय कलाकारों के साथ काम करने के लिए उत्सुक था। इस कार्य हेतु उसने प्रसिद्ध अलबानियाई कलाकार ‘सिनान’ के शिष्यों को बुलाया। बाबर को भारत में स्थापत्य के क्षेत्र में ज्यादा कुछ करने का समय नहीं मिला और उसने जो कुछ बनवाया उसमें अधिकतर अब नष्ट हो चुके हैं।’
ऐसा प्रतीत होता है कि या तो उसने आगरा, सीकरी, बयाना आदि स्थानों पर बड़े निर्माण अर्थात् महल एवं दुर्ग आदि नहीं बनवाकर मण्डप, स्नानागार, कुएं, तालाब एवं फव्वारे जैसी लघु रचनाएं ही बनवाई थीं या फिर बाबर द्वारा निर्मित इमारतें मजबूत सिद्ध नहीं हुईं। क्योंकि वर्तमान में पानीपत के काबुली बाग की विशाल मस्जिद एवं रूहेलखण्ड में संभल की जामा मजिस्जद को छोड़कर, बाबर द्वारा निर्मित कोई भी इमारत उपलब्ध नहीं है। या तो वे बनी ही नहीं थीं या फिर वे समस्त इमारतें खराब गुणवत्ता के कारण नष्ट हो चुकी हैं।
यद्यपि पानीपत के काबुली बाग की मस्जिद एवं रूहेलखण्ड की मस्जिद पर्याप्त विशाल रचनाएं हैं तथापि उनमें शिल्प, स्थापत्य एवं वास्तु का कोई सौंदर्य दिखाई नहीं देता। इन दोनों भवनों के बारे में स्वयं बाबर ने स्वीकार किया है कि इनकी शैली पूरी तरह भारतीय थी। यहाँ भारतीय शैली से तात्पर्य मुगलों के पूर्ववर्ती दिल्ली सल्तनत-काल की स्थापत्य शैली से है। बाबर को भारत में समरकंद जैसी इमारतें बना सकने योग्य कारीगर उपलब्ध नहीं हुए। न बाबर के पास इतना धन एवं इतना समय था कि वह इमारतों का निर्माण करवा सके।
काबुली मस्जिद, पानीपत
बाबर ने ई.1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहीम लोदी को परास्त करने के बाद अपनी विजय की स्मृति में ई.1527 में पानीपत में एक बाग और मस्जिद का निर्माण करवाया। बाबर की एक बेगम का नाम मुस्समत काबुली था। उसी के नाम पर इस बाग एवं मस्जिद का नाम काबुली बाग एवं काबुली मस्जिद रखा गया। यह एक विशाल एवं मजबूत भवन है किंतु स्थापत्य एवं शिल्प की दृष्टि से अत्यंत सामान्य है। इस मस्जिद के निर्माण के छः साल बाद हुमायूँ ने सलीमशाह को हराया तथा इस विजय की स्मृति में इस बाग में एक चबूतरा बनवाया जिसे फतेह मुबारक कहा जाता है। अकबर के काल में ई.1557 में इस मस्जिद में फारसी भाषा में दो शिलालेख लगवाए गए।
सम्भल की जामा मस्जिद
रूहेलखण्ड क्षेत्र में राप्ती नदी के तट पर एक पौराणिक नगर स्थित था जिसे मुगल काल में सम्भल कहा जाता था। इस नगर में पौराणिक युगीन ‘हरिहर मंदिर’ स्थित था। बाबर ने इस मंदिर को तोड़कर उसके ध्वंसावशेषों पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया जिसे जामा मस्दिज कहा गया। इस मस्जिद निर्माण में मेहराबों, मीनारों एवं गुम्बदों का प्रयोग किया गया। औरंगजेब के दूसरे पुत्र शहजादा मुअज्जम (बहादुरशाह प्रथम) ने भी इसमें कुछ निर्माण करवाए। उसने गोरखपुर का नाम मुअज्जमाबाद रखा तथा संभल में उर्दू बाजार का निर्माण करवाया। इस मस्जिद की उत्तर-दक्षिण में लम्बाई 90 फुट तथा पूरब-पश्चिम में चौड़ाई लगभग 80 फुट है। मस्जिद चारों तरफ से खुली हुई है।
मस्जिद जन्मस्थानम्
बाबर के शिया सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में भगवान राम के ‘जन्मस्थानम्’ मंदिर को तोड़कर, उसी की सामग्री से उसी स्थल पर एक ढांचा खड़ा किया जिसे मुगल रिकॉर्ड्स में ‘मस्जिद-जन्मस्थानम्’ कहा गया। मीर बाकी ने इस ढांचे पर दो शिलालेख लगवाए जो इस प्रकार से हैं-
अयोध्या की जन्मस्थानम्-मस्जिद का प्रथम शिलालेख
शाह बाबर के आदेशानुसार जिसका न्याय,
एक ऐसी इमारत है जो आकाश की ऊँचाई तक पहुंचती है।
निर्माण कराया इस फिरिश्तों के उतरने के स्थान को,
सौभाग्यशाली अमीर मीर बाकी ने, बवद खैरे बाकी।
(बवद खैरे बाकी के दो अर्थ हैं। पहला अर्थ है- हिजरी 935 अर्थात् ई.1530; तथा दूसरा अर्थ है- यह सदाचरण अनन्त तक रहे।)
अयोध्या की बाबरी मस्जिद का द्वितीय शिलालेख
उसके नाम से जो महान् ज्ञानी है,
जो समस्त संसार का सृष्टा के उपरान्त मुस्तफा पर दरूद
जो दोनों लोकों के नबियों के सरदार हैं।
संसार में चर्चा है कि बाबर कलन्दर
कालचक्र में उसे सफलता प्राप्त हुई।
इन शिलालेखों में बाबर के नाम का उल्लेख होने के कारण इस ढांचे को जन-साधारण की भाषा में ‘बाबरी-मस्जिद’ कहा जाने लगा। इस ढांचे को वर्ष 1992 में एक जन-आंदोलन में ढहा दिया गया।
आराम बाग, आगरा
भारत का सबसे पुराना मुग़ल उद्यान आगरा का आरामबाग था जिसका निर्माण ई.1528 में बाबर ने करवाया था। यह उद्यान ताजमहल से 2.5 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में स्थित है। इस उद्यान में विभिन्न प्रकार की ज्यामितीय रचनाएं बनाई गई हैं। यह बाग यमुना नदी के बायें तट पर स्थित है।
बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में इसका उल्लेख किया है। इसे बाग-ए-नूर-अफसाँ भी कहा जाता था। ई.1530 में जब बाबर की मृत्यु हुई तो उसे सबसे पहले इसी बाग में दफनाया गया। बाद में बाबर के शव को उसकी इच्छानुसार काबुल ले जाया गया। ई.1775 से ई.1803 तक आगरा मराठों के अधिकार में रहा। उनके समय में आरामबाग को रामबाग कहा जाने लगा।
यह बाग ऊँची चाहरदिवारी से घिरा है जिसके कोने की बुर्जियों के ऊपर स्तम्भयुक्त मंडप हैं। नदी के किनारे दो-दो मंजिले भवनों के बीच में एक ऊँचा पत्थर का चबूतरा है। जहाँगीर ने इस बाग की संरचनाओं में कुछ परिवर्तन किए। बाद में ब्रिटिश शासनकाल में भी कुछ नव-निर्माण करवाए गए। इस स्मारक के उत्तरी-पूर्वी किनारे पर एक और चबूतरा है जहाँ से हम्माम के लिए रास्ता है। हम्माम की छत मेहराबदार है। नदी से पानी निकालकर एक चबूतरे से बहते हुए चौड़े नहरों, कुंडों एवं झरनों के रास्ते दूसरे चबूतरे तक लाया जाता था।
बाबर द्वारा निर्मित अन्य भवन
बाबर ने आगरा के लोदी किले में जामा मस्जिद बनवाई। वह राजपूताने की सीमा पर ऐसे भवन बनवाना चाहता था जो ठण्डे हों। इसलिए उसके आदेश से आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर तथा अन्य नगरों में कुछ भवनों का निर्माण किया गया जो अब शेष नहीं बचे हैं। धौलपुर नगर के बाहर स्थित कमलताल के निकट बाबरकालीन भवनों के ध्वंसावशेष देखे जा सकते हैं। जब बाबर खानवा के युद्ध के लिए धौलपुर पहुंचा था तब यह कमलताल मौजूद था। इसके चारों ओर सुंदर भवन एवं उद्यान थे जो अब नष्ट हो गए हैं तथा उन पर अवैध मुस्लिम बस्तियां बस गई हैं।
गुलबदन बेगम का वर्णन
बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने बाबर द्वारा करवाए गए निर्माण कार्यों का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘हुमायूँनामा’ में किया है। उसने लिखा है कि बाबर ने आगरा में यमुना के इस पार कई भवनों के निर्माण की आाज्ञा दी। हरम और बाग के मध्य अपनी खिलवत खास के लिए पत्थर का एक महल बनवाया और दीवानखाना में भी एक महल का निर्माण करवाया। भवन के किनारे एक बावली और चारों बुर्जों में चार कमरों के निर्माण की आज्ञा दी। नदी के किनारे चार आंगन वाले एक भवन का निर्माण करवाया।
गुलबदन लिखती है कि बाबर ने धौलपुर में पत्थर की, दस गज लम्बी और चौड़ी एक बावली बनाने की आज्ञा दी तथा अपने सैनिकों से कहा कि यदि उन्होंने राणा सांगा को परास्त कर दिया तो वह इस बावली को शराब से भर देगा। चूंकि सांगा पर विजय प्राप्त करने से पहले ही बाबर ने शराब न पीने की शपथ ले ली थी इसलिए इस बावली को नींबू के शरबत से भरवाया गया।
गुलबदलन के इस वर्णन में कुछ अतिश्योक्ति है। जिसे वह बावली बता रही है, वह एक छोटा सा कुण्ड है तथा कमलताल के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण बाबर ने नहीं करवाया था, यह बाबर के भारत आने से पहले भी मौजूद था और एक विशाल बाग के भीतर स्थित था। गुगलबदन ने यमुना के निकट जिन भवनों के निर्माण का उल्लेख किया है वे अब उपलब्ध नहीं हैं। या तो वे बने ही नहीं, और यदि बने तो नष्ट हो गए।
बाबर का मकबरा (काबुल)
बाबर की मृत्यु के बाद, बाबर की इच्छानुसार, उसके शव को काबुल ले जाकर, बाबर द्वारा निर्मित बाग-ए-बहार के भीतर दफन किया गया। वहाँ एक छोटा सा मकबरा भी बना हुआ है जिसके बाहर की जालियां देखते ही बनती हैं। तालिबानियों ने बाग-ए-बाबर को तो बर्बाद कर दिया है किंतु यह मकबरा अब भी सुरक्षित है।
बाबर भले ही अफगानिस्तान छोड़कर भारत आ गया था किंतु अफगानिस्तान में आज भी उसे नायक के रूप में देखा जाता है। भारत में भले ही बाबर ने मनुष्यों के सिर काटकर उनकी मीनारें बनाईं और अपने पैरों से लुढ़काईं किंतु अफगानिस्तान में बाबर को सुशिक्षित, वैज्ञानिक चिंतन युक्त सुसभ्य व्यक्ति माना जाता है। आधुनिक अफगानिस्तान में बाबर के अनेक स्मारक बनाए गए हैं जिनमें से बहुत से स्मारक तालिबानियों ने नष्ट कर दिए हैं।
भारत में हुमायूँ द्वारा निर्मित भवन बहुत कम हैं। हुमायूँ ने ई.1530 से 1540 तक भारत पर शासन किया। लगभग छः माह के लिए उसने ई.1555 में भी शासन किया।
बाबर के पुत्र नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 को काबुल के दुर्ग में हुआ था। जब ई.1526 में वह बाबर के साथ भारत आया था, उस समय हुमायूँ अठारह वर्ष का नवयुवक था। जब वह 22 वर्ष का हुआ तब ई.1530 में उसके पिता जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर की अचानक मृत्यु हो जाने के कारण हुमायूँ को बाबर द्वारा भारत में विजित प्रदेशों का राज्य संभालना पड़ा था। हुमायूँ ने भी अपने पिता की राजधानी समरकंद तथा उसके निकटवर्ती नगरों के वैभव को अपनी आंखों से देखा था। बाबर ने हुमायूँ की शिक्षा-दीक्षा की अच्छी व्यवस्था की थी इसलिए हुमायूँ को शिक्षा, कला एवं निर्माण आदि गतिविधियों से अच्छा प्रेम था।
दीन पनाह
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हुमायूँ ने ई.1533 में दिल्ली में यमुना के किनारे दीनपनाह नामक नवीन नगर का निर्माण आरम्भ करवाया। यह नगर ठीक उसी स्थान पर निर्मित किया गया जिस स्थान पर पाण्डवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ स्थित थी। इस परिसर से मौर्य एवं गुप्त कालीन मुद्राएं, मूर्तियां एवं बर्तन आदि मिले हैं तथा भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर भी मिला है जिसे कुंती का मंदिर कहा जाता है। दीनपनाह नामक शहर में हुमायूँ ने अपने लिए कुछ महलों का निर्माण करवाया। इन महलों के निर्माण में स्थापत्य-सौंदर्य के स्थान पर भवनों की मजबूती पर अधिक ध्यान दिया गया ताकि शाही परिवार को शत्रु के आक्रमणों से बचाया जा सके। जब ई.1540 में शेरशाह सूरी ने हुमायूँ का राज्य भंग कर दिया तब शेरशाह ने दीनपनाह को नष्ट करके उसके स्थान पर एक नवीन दुर्ग का निर्माण करवाया जिसे अब दिल्ली का पुराना किला कहते हैं। 20 जुलाई 1555 को हुमायूँ ने जब दिल्ली में पुनः प्रवेश किया तब वह इसी दुर्ग में आकर रहा।
हुमायूँ द्वारा निर्मित भवन – शेरमण्डल
दीन पनाह के भीतर एक शेरमण्डल नामक भवन है। कुछ विद्वानों का मानना है कि इसका निर्माण बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ के लिए एक पुस्तकालय के रूप में करवाना आरम्भ किया था किंतु अधिक संभावना इस बात की है कि इस भवन का निर्माण स्वयं हुमायूँ ने आरम्भ करवाया था। संभवतः शेरशाह सूरी ने भी इस भवन में कुछ निर्माण करवाया था इसलिए यह शेरमण्डल कहलाने लगा।
26 जनवरी 1556 को इसी भवन की सीढ़ियों से गिरकर हूमायूं की मृत्यु हुई थी। इसे दीनपनाह पुस्तकालय भी कहते हैं। यह अष्टकोणीय एवं दो मंजिला भवन है जो एक कम ऊँचाई के चबूतरे पर टावर की आकृति में खड़ा किया गया है। इसके निर्माण में लाल बलुआ पत्थर काम में लिया गया है।
वेधशालाओं के निर्माण की योजना
शेरमण्डल के पास एक स्नानागार स्थित है। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह एक वेधाशाला का बचा हुआ हिस्सा है। हुमायूँ को गणित तथा नक्षत्रविद्या का अच्छा ज्ञान था। इस ज्ञान का उपयोग करने के लिए उसने भारत में एक वेधशाला का निर्माण करवाने का निश्चय किया। इसके लिए उसने समरकंद आदि स्थानों से अनेक प्रकार के यंत्र भी मंगवाए किंतु शेरशाह सूरी द्वारा अचानक ही उसका राज्य भंग कर दिए जाने के कारण वह वेधाशाला का निर्माण नहीं करवा सका। अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है कि वेधशाला के लिए कई स्थानों का चुनाव किया गया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वह भारत में एक नहीं अपितु कई वेधशालाएं बनवाना चाहता था।
हुमायूँ द्वारा निर्मित भवन – आगरा की मस्जिद
हुमायूँ ने आगरा में एक मस्जिद बनवाई थी जिसके भग्नावशेष ही शेष हैं। इसकी मीनारें भी ध्वस्त प्रायः हैं जिसके कारण इसकी स्थापत्य सम्बन्धी विशेषताओं को समझा नहीं जा सकता।
हुमायूँ द्वारा निर्मित भवन फतेहाबादमस्जिद
हिसार के फतेहाबाद कस्बे में हुमायूँ ने एक मस्जिद का निर्माण करवाया। इसे हुमायूँ मस्जिद कहा जाता है। हुमायूँ ने यह मस्जिद दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगक द्वारा निर्मित लाट के निकट बनवाई। मस्जिद में लम्बा चौक है। इस मस्जिद के पश्चिम में लाखौरी ईंटों से बना हुआ एक पर्दा है जिस पर एक मेहराब बनी हुई है। इस पर एक शिलालेख लगा हुआ है जिसमें बादशाह हूमायूं की प्रशंसा की गई है। यह मस्जिद ई.1529 में बननी शुरु हुई थी किंतु हुमायूँ के भारत से चले जाने के कारण अधूरी छूट गई। ई.1555 में जब हुमायूँ लौट कर आया तब इसका निर्माण पूरा करवाया गया।
सूर स्थापत्य अपने पूर्ववर्ती तुर्क शासकों एवं पश्चवर्ती मुगलशासकों से कई प्रकार से अलग था। य़़द्यपि भारत में सूर स्थापत्य के अधिक उदाहरण देखने को नहीं मिलते तथापि वे अपनी शैलीगत विशेषताओं के कारण अलग से ही पहचाने जाते हैं।
शेरशाह सूरी का का वास्तविक नाम शेर खाँ था। उसका उत्कर्ष ई.1520 से 1525 के बीच हुआ। ई.1520 में उसने अपने पिता की छोटी सी जागीर पर अधिकार किया तथा ई.1525 में वह बिहार का स्वतंत्र शासक बन बैठा। उसने बंगाल के शासक से कई बार कर वसूल किया तथा चुनार के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। चुनार दुर्ग से उसे अपार धन प्राप्त हुआ। इससे उसकी शक्ति बढ़ गई।
ई.1539 में मुगल बादशाह हुमायूँ ने शेरशाह पर आक्रमण किया तो शेरशाह ने न केवल उसे परास्त कर दिया अपितु उसे भारत से निष्कासित करके दिल्ली एवं आगरा सहित सम्पूर्ण मुगल सल्तनत पर अधिकार जमा लिया। शेरशाह ई.1540 से ई.1545 तक ही शासन कर पाया था कि 22 मई 1545 को कालिंजर दुर्ग पर चढ़ाई के दौरान अपनी ही तोप का गोला फट जाने से उसकी मृत्यु हो गई।
उसके बाद इस्लामशाह, महमूदशाह आदिल, इब्राहीम खाँ सूरी तथा सिकंदरशाह सूरी ने ई.1555 तक भारत पर शासन किया किंतु ई.1555 में हुमायूँ लौट आया और उसने सूर वंश का शासन समाप्त करके भारत का खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।
सूर स्थापत्य
सूर स्थापत्य को मोटे तौर पर दो कालों में विभक्त किया जा सकता है- पहला कालखण्ड ई.1530-40 के बीच का है जिसका केन्द्र सहसराम (बिहार) था जहाँ शाही परिवार के लोगों के लिए लोदी शैली के मकबरों का निर्माण करवाया गया। दूसरा चरण ई.1540-45 के मध्य माना जा सकता है।
इस काल में शेरशाह के संरक्षण में दिल्ली से लेकर बिहार तक कई इमारतों का निर्माण हुआ। इस दौरान वास्तुकला के क्षेत्र में कई प्रयोग किए गए जिन्हें बाद में मुगल शैली में समाहित किया गया और जिससे मुगल शैली परिपक्व हुई।
सहसराम के मकबरे
सहसराम का मकबरा सूर स्थापत्य का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है। सहसराम (सासाराम) के शाही मकबरों का शिल्पी अलीवल खाँ था। ये भवन शेरशाह की उच्च महत्वाकांक्षा को प्रदर्शित करते हैं। शेरशाह इनके माध्यम से दिल्ली के मकबरों की तुलना में अधिक वैभवशाली उदाहरण प्रदर्शित करना चाहता था। सहसराम में स्थित शेरशाह के मकबरे के बारे में विद्वानों का मत है कि ‘यह मकबरा तुगलक कालीन इमारतों के गाम्भीर्य और शाहजहाँ की महान कृति ताजमहल के स्त्रियोचित सौन्दर्य के सम्पर्क का एक बेहतर माध्यम है।’
दिल्ली का पुराना किला (शेरगढ़)
ई.1542 में शेरशाह ने दिल्ली नगर के छठे शहर के रूप में शेरगढ़ का निर्माण करवाया जिसे अब पुराना किला कहा जाता है। दिल्ली के पुराने किले को भी सूर स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है किंतु इसके अधिकांश निर्माण शेरशाह से पहले एवं बाद में हुए थे। अब इसके केवल दो द्वार ‘लाल दरवाजा’ एवं ‘खूनी दरवाजा’ ही शेष बचे हैं। उसने इस किले का निर्माण हुमायूँ द्वारा बनाए गए ‘दीनपनाह’ नामक शहर के चारों ओर करवाया था। शेरशाह ने इस किले के भीतर स्थित पुराने भवन तुड़वाकर, उनके स्थान पर कुछ नवीन भवनों का निर्माण करवाया। अधिकांश निर्माण पुराने भवनों की सामग्री से ही करवाया गया।
वस्तुतः हुमायूँ द्वारा निर्मित ‘दीनपनाह’ तथा शेरशाह द्वारा निर्मित पुराना किला, पाण्डवों द्वारा निर्मित ‘इन्द्रप्रस्थ नगर’ के ध्वंसावेशेषों पर बनाए गए थे। इसलिए इन्हें सूर स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना नहीं माना जा सकता। इस दुर्ग के भीतर से ईसा से 1000 वर्ष पुरानी मुद्राएं, मूर्तियां, बर्तन एवं सामग्री मिली हैं। कुछ सामग्री मौर्य कालीन एवं गुप्त कालीन भी है जिन्हें इसी परिसर में बने संग्रहालय में रखा गया है।
किला-ए-कोहना मस्जिद
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कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस मस्जिद को हुमायूँ ने बनवाना आरम्भ किया था क्योंकि इस मस्जिद के नुकीले मेहराब मुगल स्थापत्य की निशानी हैं न कि शेरशाह के स्थापत्य की। हुमायूँ ने ही लिवान तथा मेहराब पर पीट्रा ड्यूरा कार्य को मुगल स्थापत्य में शामिल किया था। बाद में शेरशाह ने इसका ऊपरी भाग पूरा करवाया जिसमें मस्जिद के ऊपर का डोम भी सम्मिलित है। उसने इस मस्जिद को ‘मण्डलीय’ अफगानी शैली का विधान प्रदान किया। इसके बाहरी भाग पर लगे संगमरमर का काम अकबर के समय में पूरा हुआ होना संभावित है क्योंकि संगमरमर पर ज्यातिमितीय रचनाओं का अंकन किया गया है। इस प्रकार का ज्यामितीय अंकन अकबर के समय में ही शुरु हुआ था।
इस मस्जिद को ‘फाइव बे मौस्क’ शैली में बनाया गया है इस शैली की अवधारणा मुगलों के पूर्ववर्ती सैयदों तथा लोदियों के काल में बनी मस्जिदों में दिखाई देती है। मुख्य कक्ष का आगे का भाग पाँच झुके हुए कोष्ठकों में विभक्त है। मध्य का कक्ष दूसरों की अपेक्षा बड़ा है और सभी में खुले झिर्रीनुमा मेहराब बने हुए हैं।
केन्द्रीय मेहराब के पार्श्व में संकीर्ण, लम्बी धारियों से युक्त भित्ति-स्तम्भ बने हुए हैं। मस्जिद की मेहराबों की गोलाई में ऊपर की ओर बढ़ते हुए हल्का झुकाव या समतलपन दृष्टिगोचर होता है। यह मुगलों के चतुर-केन्द्रित-ट्यूडर-आर्च के विकास की पूर्वपीठिका है। मस्जिद के प्रवेश द्वार और गुम्बद के चारों ओर की मीनारें ईरानी प्रभाव लिये हुए हैं। इमारत का शेष भाग भारतीय शैली में निर्मित है। इस मस्जिद की लम्बाई 167 फुट, चौड़ाई 44 फुट एवं डोम सहित ऊँचाई 66 फुट है। इस मस्जिद में कोई शिलालेख नहीं है।
शेरशाह ने शेरगढ़ (पुराना किला) के अंदर ‘किला-ए-कोहना मस्जिद’ बनवाई जो किले की भीतर ‘शेरमण्डल’ के निकट स्थित है। अब्बास सरवनी द्वारा लिखित ‘तारीखे शेरशाही’ के अनुसार शेरशाह ने इस मस्जिद का निर्माण ई.1540 में करवाया। इस मस्जिद के निर्माण में पत्थरों के टुकड़ों को चूना-गारे में चिना गया है।
दीवारों के बाहरी भागों, दालानों आदि में लाल बलुआ पत्थर, क्वार्ट्जाइट एवं संगमरमर के टुकड़ों का उपयोग किया गया है। इसके भीतरी भाग में स्वर्ण; तथा अफगानिस्तान से प्राप्त होने वाले अर्द्ध-मूल्यवान नीले रंग के पत्थर लाजवर्त (Lapis lazuli) का भी प्रयोग किया गया है। मस्जिद के सामने वाले भाग में सफेद संगमरमर तथा लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है।
इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि संभवतः पूरे भवन के बाहरी हिस्से में संगमरमर का उपयोग करने की योजना थी किंतु संगमरमर की आपूर्ति मिलने में कठिनाई होने से शेष बचे हुए भाग में लाल बलुआ पत्थर लगा दिया गया।
रोहतास दुर्ग
रोहतासगढ़ दुर्ग या रोहतास दुर्ग, बिहार के रोहतास जिले में स्थित एक प्राचीन दुर्ग है। यह भारत के सबसे प्राचीन दुर्गों में से एक है। यह जिला मुख्यालय सासाराम से लगभग 55 और डेहरी आन सोन से 43 किलोमीटर की दूरी पर सोन नदी के बहाव वाली दिशा में पहाड़ी पर स्थित है।
माना जाता है कि इस प्राचीन दुर्ग का निर्माण त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा त्रिशंकु के पौत्र व राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने कराया था। रोहतास गढ़ का किला काफी भव्य है। किले का घेरा 45 किमी तक विस्तृत है। इसमें कुल 83 दरवाजे हैं जिनमें से चार मुख्य दरवाजे घोड़ाघाट, राजघाट, कठौतिया घाट एव मेढ़ा घाट कहलाते हैं।
दुर्ग के मुख्यप्रवेश द्वार पर निर्मित हाथी, दरवाजों के बुर्ज तथा दीवारों पर बनाए गए भित्तिचित्र अद्भुत हैं। दुर्ग परिसर में अनेक भवन हैं जिनमें रंगमहल, शीश महल, पंचमहल, खूंटा महल, आइना महल, रानी का झरोखा तथा मानसिंह की कचहरी प्रमुख हैं।
ई.1539 में जब हूँमायूँ ने शेरशाह सूरी पर आक्रमण करने का निश्चय किया तब यह दुर्ग सूर्यवंशी खरवार राजा के अधिकार में था। शेरशाह ने खरवार राजा से अनुरोध किया कि मेरे परिवार को कुछ समय के लिए रोहतास दुर्ग में रहने दिया जाए। खरवार राजा ने शेरशाह का अनुरोध स्वीकार कर लिया और शेरशाह से कहा कि दुर्ग में केवल स्त्रियों को ही प्रवेश दिया जाएगा।
शेरशाह ने अपने हरम की औरतों की कई सौ डोलिया रोहतास दूर्ग के भीतर भेज दीं। पिछली डोली मे स्वयम् शेरशाह बैठ गया। आगे की डोलियां जब रोहतास दुर्ग में पहुंची तो उनकी तलाशी ली गई। डोलियों में कुछ बूढी औरतें बैठी थीं। इसी बीच अन्य डोलीयो से सशस्त्र सैनिक कूदकर बाहर आ गए। उन्होंने दुर्ग रक्षकों की हत्या कर दी।
इसी बीच शेरशाह भी दुर्ग मे प्रवेश कर गया और उसने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। दुर्ग अधिकार में आ जाने के बाद शेरशाह ने अपने मंत्री टोडरमल खत्री के निरीक्षण में इसका जीर्णोद्धार करवाया तथा इसके चारों ओर का परकोटा मजबूत करवाया। हूमायूँ से लड़ने के लिए शेरशाह ने इस दुर्ग में युद्ध एवं रसद सामग्री जमा करवाई। ई.1857 में अमरसिंह ने इसी दुर्ग से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था। रोहतास दुर्ग को सूर स्थापत्य के अंतर्गत रखा जाता है किंतु वस्तुतः इस दुर्ग में कुछ निर्माण ही सूरी वंश के काल में हुए थे।
शेरशाह का मकबरा, सहसराम
सूरी काल में निर्मित मिश्रित स्थापत्य कला का दूसरा नमूना सहसराम (बिहार) में झील के बीच ऊँची कुर्सी पर बना शेरशाह का मकबरा है जिसे स्वयं शेरशाह ने बनवाया था। यह एक पिरामिडीय रचना है तथा शेरशाह के काल में बने समस्त मकबरों से अधिक बड़ी है। इसके मुख्य भवन में अष्टकोणीय कक्ष है जो कि विस्तृत निचले गुम्बद से आच्छादित है।
क्रमशः न्यूनतम अवस्थाओं का उपयोग ओर चतुर्भुज से अष्टकोण और फिर गोलाकार पद्धति पर आना भारतीय स्थापत्य की सुव्यवस्था का प्रमाण है। इसकी आकृति मुस्लिम है किन्तु इसके भीतर तोड़ों तथा हिन्दू शैली के स्तम्भों का सुन्दर प्रयोग किया गया है। इस मकबरे की बहुत सी विशेषताएं, बाद में बने आगरा के ताजमहल में दिखाई देती हैं।
विद्वानों का मत है कि यह मकबरा तुगलक काल की इमारतों के गाम्भीर्य और शाहजहाँ की महान् कृति ताजमहल के स्त्रियोचित सौन्दर्य के बीच सम्पर्क स्थापित करता है। पर्सी ब्राउन तथा स्मिथ ने इस इमारत की बड़ी प्रशंसा की है।
ईसा खाँ नियाज़ी का मकबरा, दिल्ली
हुमायूँ के मकबरे के पश्चिमी प्रवेश द्वार के रास्ते में कई अन्य स्मारक बने हैं। इनमें से प्रमुख स्मारक ईसा खाँ नियाज़ी का मकबरा है, जो मुख्य मकबरे से 20 वर्ष पूर्व अर्थात् ई.1547 में बना था। ईसा खाँ नियाज़ी, शेरशाह सूरी का अफ़्गानी सरदार था तथा वह मुगलों के विरुद्ध लड़ा था।
इस मकबरे का निर्माण सूर सल्तनत के काल में तथा ईसा खाँ के सामने ही हुआ था और उसके बाद उसके पूरे परिवार के लिये काम आया था। यह अष्टकोणीय मकबरा सूर वंश के लोदी मकबरे के परिसर में स्थित अन्य मकबरों से बहुत मेल खाता है। मकबरे के पश्चिम में तीन आंगन चौड़ी लाल बलुआ पत्थर की एक मस्जिद है।
अलावल खाँ का मकबरा
सासाराम के दक्षिणी भाग में स्थित सूरी वंश के वास्तुशिल्पी एवं पाँच सौ सवारों के सेनापति अलावल खाँ का मकबरा स्थित है। यह खुला मकबरा ऊँची चहारदीवारी से घिरा हुआ है। मकबरे की पूर्वी दीवार में बड़ा मेहराबदार दरवाजा बना हुआ है। दरवाजे के भीतर एक सौ तीन वर्गफुट का वर्गाकार आंगन है।
आंगन के चारों कोनों पर चार वर्गाकार कक्ष बने हुए हैं। इनमें से उत्तरी-पूर्वी कक्ष दो मंजिला है। आंगन के बीच तीन कब्रें स्थित हैं। पश्चिमी दीवार में मेहराबदार अलंकुत मिम्बर बना है। बिहार सरकार ने इस मकबरे को संरक्षित स्मारक घोषित किया है।
शेरशाह सूरी के अन्य निर्माण
शेरशाह ने अपने राज्य में यातायात को सुचारू बनाने के लिये कई उपाय किये। उसने कई सड़कों तथा सरायों का निर्माण करवाया तथा राज्य के प्रमुख स्थानों को सड़कों से जोड़ा। कहा जाता है कि वर्तमान ग्राण्ड ट्रंक रोड का निर्माण शेरशाह ने करवाया था जो ढाका से लाहौर तक जाती थी। वस्तुतः यह सड़क महाभारत काल में भी मौजूद थी।
प्राचीन संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों में उत्तरपथ और दक्षिणपथ का विपुलता से उल्लेख हुआ है। दक्षिणपथ उत्तर भारत से तमिलनाडु तक जाता था। गौतम बुद्ध के प्रथम उपदेश का स्थान सारनाथ, उत्तरपथ एवं दक्षिणपथ के संगम पर स्थित था। शेरशाह सूरी ने इसी मार्ग को सुधरवाकर उसे मजबूती प्रदान की होगी।
शेरशाह के राज्य में दूसरी प्रमुख सड़क आगरा से बुरहानपुर तक, तीसरी आगरा से बयाना होती हुई मरुप्रदेश की सीमा तक, चौथी मुल्तान से लाहौर तक और पाँचवी आगरा से जोधपुर तथा चितौड़ तक जाती थी। अन्य कई सड़कें भी शेरशाह के समय में मौजूद थीं जो विभिन्न नगरों को जोड़ती थीं। सड़कों के किनारे छायादार पेड़ लगवाये गये और कुएँ खुदवाये गये।
शेरशाह ने प्रमुख सड़कों के किनारे चार-चार मील की दूरी पर सरायें बनवाईं जिनमें हिन्दू तथा मुसलमान यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था रहती थी। यात्रियों के लिए गर्म तथा ठण्डे जल, बिस्तर, भोजन आदि का प्रबन्ध रहता था।
घोड़ों तथा पशुओं के लिए घास एवं दाने का प्रबन्ध रहता था। समकालीन उल्लेखों के अनुसार शेरशाह ने लगभग 1700 सरायों का निर्माण तथा जीर्णोद्धार करवाया। हालांकि यह संख्या गलत जान पड़ती है क्योंकि उसे ई.1540 से 1545 तक केवल 5 साल का ही समय मिला था।
सड़कों के किनारे पर स्थित होने से ये सरायें डाक-चौकियों का काम देती थीं। इन सरायों में डाक ले जाने वाले हरकारे विद्यमान रहते थे। शेरशाह ने कई मदरसे और मस्जिदें बनवाईं तथा उनके संचालन के लिए वित्तीय व्यवस्था भी की। वह पुराने मदरसों तथा मस्जिदों को भी दान देता था। उसके राज्य में अनेक स्थानों पर दानशालाएँ खोली गईं और भोजनालय बनाये गये जहाँ निःशुल्क भोजन बँटता था।
सलीमगढ़ दुर्ग, दिल्ली
पुरानी दिल्ली में स्थित सलीमगढ़ किला ठोस गारे की चिनाई वाली दीवारों से घिरा हुआ है और बहुभुजी आकृति में निर्मित है। ई.1546 में शेरशाह सूरी के पुत्र सलीमशाह सूरी ने हुमायूँ के आक्रमणों को रोकने के लिए यमुना नदी में स्थित एक छोटे से द्वीप पर इस दुर्ग का निर्माण करवाया था। यह किला सूर स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
ई.1622 में जहाँगीर ने यहाँ पुल बनवाया और किले को मुख्य भूमि से जोड़ा। शाहजहाँ ने सलीमगढ़ के दक्षिण में लाल किले का निर्माण करवाया तथा सलीम गढ़ को लाल किले से जोड़ दिया। औरंगजेब के शासनकाल में यह किला जेल के रूप में काम लिया जाने लगा।
औरंगजेब के विद्रोही शाहज़ादे अकबर के साथ गुप्त पत्र व्यवहार करने के कारण शहजादी जेबुन्निसा को ई.1691 में सलीमगढ़ के किले में बंद किया गया। ई.1702 में इसी दुर्ग में उसकी मृत्यु हुई। शाहज़ादे मुराद बख्श को भी सलीमगढ़ के दुर्ग में बन्दी बनाकर रखा गया।
वर्तमान समय में इस दुर्ग में जाने के लिए उत्तरी द्वार से प्रवेश दिया जाता है। उत्तरी द्वार को बहादुरशाही गेट के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इसका निर्माण ई.1854-55 में अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर ने करवाया था। इस द्वार का निर्माण लाल पत्थरों एवं ईटों की चिनाई से किया गया है।
उन्नीसवीं सदी में जब ब्रिटिश इंजीनियरों ने रेल्वे लाइन का निर्माण किया तब उन्होंने जहाँगीर द्वारा निर्मित पुल को तोड़ दिया। ब्रिटिश सरकार भी सलीमगढ़ का उपयोग कारावास के रूप में कती रही। ई.1945 में भारतीय राष्ट्रीय सेना के नेताओ को यहाँ बंदी बनाकर रखा गया। किले के भीतर अनेक स्मारक हैं। वर्तमान समय में किले का नाम बदलकर स्वतंत्रता सेनानी स्मारक रखा गया है।
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