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तेजोमय महालय था ताजमहल

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तेजोमय महालय - www.bharatkaitihas.com
तेजोमय महालय था ताजमहल

प्रसिद्ध इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपने शोध पत्रों के माध्यम से ताजमहल को हिंदू संरचना सिद्ध किया था। उनके अनुसार ताजमहल मकबरा नहीं अपितु तेजोमय महालय नामक हिंदू महल था।

शाहजहाँनामा में ताजमहल के लिए लिखा है कि यह मंदिर भवन नगर के दक्षिण में भव्य एवं सुंदर हरित उद्यान से घिरा हुआ है। इसका केन्द्रीय भवन जो राजा मानसिंह के महल के नाम से विख्यात था, अब राजा मानसिंह के पौत्र जयसिंह के अधिकार में था। इसे बेगम को दफनाने के लिए चुना गया जो स्वर्ग जा चुकी थी। इस विवरण से स्पष्ट है कि शाहजहाँ के जन्म से भी बहुत पहले ताजमहल का मूल भवन हिन्दू राजभवन के रूप में अस्तित्व में था। इसी महल का प्राचीन नाम तेजोमय महालय था।

यद्यपि राजा जयसिंह उसे अपने पूर्वजों का उत्तराधिकार और संपदा के रूप में मूल्यवान समझता था, तो भी वह बादशाह शाहजहाँ के लिए निःशुल्क देने के लिए तत्पर था। उस भव्य प्रासाद (भव्य प्रासाद कहने का अभिप्राय है कि जब शाहजहाँ ने इसे लिया तो वह खाली भूमि नही थी अपितु वहाँ एक भव्य प्रासाद बना हुआ था जिसे आलीशां मंजिल कहा गया।) के बदले में जयसिंह को एक साधारण टुकड़ा दिया गया।

 राजधानी के अधिकारियों के द्वारा शाही फरमान के अनुसार- ‘गगनचुम्बी गुम्बद के नीचे उस पुण्यात्मा रानी का शरीर संसार की आंखों से ओझल हो गया और यह ‘इमारते-आलीशां’ अपनी बनावट में इतना ऊंचा है।’

महाराष्ट्रीय ज्ञानकोष के अनुसार-‘आगरा के दक्षिण में राजा जयसिंह की कुछ भू संपत्ति थी। बादशाह ने इसे उससे खरीदा।’

गुलाबराव जगदीश ने 27 मई 1973 के मराठी दैनिक ‘लोकसत्ता’ (मुंबई) में छपे एक लेख में बताया है कि ताजमहल का निर्माण केवल एक हिन्दू ही कर सकता है। वह कहते हैं कि ई.1939 में ब्रिटिश इंजीनियरों ने ताजमहल में एक दरार देखी जिसे भरने का भरसक प्रयास किया गया परंतु वह भरी नही जा सकी। समय के साथ वह दरार और चैड़ी हो गई। इसे भरने के लिए इंजीनियरों की एक समिति बनायी गयी, परंतु सफल नही सकी।

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तब पूरनचंद नामक एक देहाती, उन इंजीनियरों के पास आया और बोला कि वह इस दरार को भर सकता है। ब्रिटिश इंजीनियर ने उसे इस दरार को भरने की अनुमति दे दी। उस देहाती भारतीय ने एक विशेष प्रकार का गारा-चूना बनाया और उस दरार में भर दिया। दरार सफलतापूर्वक भर गई। ई.1942 में डा. भीमराव अंबेडकर के प्रयासों से लार्ड लिनलिथगो ने पूरनचंद को ‘राय साहब’ की उपाधि से सम्मानित किया था। इस घटना का अर्थ है कि आजादी मिलने के समय तक भी ताजमहल जैसे भवन की चिनाई की तकनीक जानने वाले हिन्दू कारीगर जीवित थे। शाहजहाँ के प्रपितामह बाबर के समय में भी तेजोमहालय मंदिर मौजूद था। बाबर मुमताज बेगम की मृत्यु से लगभग 104 वर्ष पूर्व भारत आया था। टैवर्नियर नामक विदेशी यात्री का साक्ष्य भी यही तथ्य प्रकट करता है कि मुमताज को दफनाने के लिए एक भव्य प्रासाद अधिग्रहीत किया गया था और वह भव्य प्रासाद मुमताज को दफनाने से पूर्व भी विश्व भर के पर्यटकों को आकर्षित करता था। ‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका’ के अनुसार ताजमहल भवन समूह में अतिथि कक्ष, आरक्षी निवास और अश्वशाला थे। ये निर्माण किसी प्रासाद का हिस्सा ही हो सकते हैं। किसी कब्र से इनका क्या संबंध हो सकता है?

‘शाहजहाँ नामा’ के लेखक मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि अर्जुमन्द बानो बेगम उर्फ मुमताज को राजा मानसिंह के प्रासाद में दफन किया गया था। मियां नुराल हसन सिद्दीकी की पुस्तक ‘दि सिटी ऑफ ताज’ में भी इसी मत की पुष्टि की गयी है।

लखनऊ के संग्रहालय के ‘बटेश्वर शिलालेख’ में स्पष्ट उल्लेख है कि ताजमहल ई.1155 में निर्मित शिव मंदिर है। इस शिलालेख में कहा गया है-

प्रासादो वैष्णवस्तेन निर्मितोअन्तर्वहन्हरिः।

मूघ्र्नि स्पृशति यो नित्यं पदमस्मैव मध्यमं।। 25।।

अकार यच्च स्फटिकावदातमसाविदं मंदिरमिन्दुमौलेः।

न जातु यस्मिन्निवसन्सदेवः कैलाशवासाय चकार चेतः ।। 26 ।।

पक्ष त्र्यक्ष मुखादित्य संख्ये विक्रम वत्सरे।

आश्विन शुक्ल पंचम्यां वासरे वासर्वेशितः ।। 34 ।।

अर्थात्- उस राजा परमार्दिदेव (मानसिंह का पूर्वज) ने एक प्रासाद बनवाया जिसके भीतर विष्णु की प्रतिमा थी जिसके चरणों में वह अपना मस्तक नवाता था। उसी प्रकार उसने मस्तक पर जिनके चंद्र सुशोभित हैं, ऐसे भगवान शिव का स्फटिक का ऐसा सुंदर मंदिर बनवाया जिसमें प्रतिष्ठित होने पर भगवान शिव का कैलाश पर जाने को भी मन नही करता था। यह शिलालेख रविवार आश्विन शुक्ला पंचमी 1212 विक्रमी सम्वत को लिखा गया। स्पष्ट है कि इस शिवमंदिर का प्राचीन नाम तेजोमय महालय था।

यह उद्धरण डी. जी. काले की पुस्तक खर्जुरवाहक अर्थात वर्तमान खजुराहो तथा ऐपिग्राफिक इंडिया के भाग-1 पृष्ठ 270-274 पर भी दिया गया है। श्री काले अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 124 पर लिखते हैं-

‘उद्धृत शिलालेख आगरा के बटेश्वर गांव से प्राप्त हुआ और वर्तमान में वह लखनऊ संग्रहालय में है। यह राजा परमार्दिदेव का विक्रम संवत 1212 का शिलालेख है। यह शिलालेख मिट्टी के स्तूप में दबा हुआ पाया गया। बाद में इसे जनरल कनिंघम ने लखनऊ संग्रहालय में जमा करा दिया, जहाँ यह आज भी रखा है। दो भव्य स्फटिक मंदिर जिन्हें परमार्दिदेव ने बनवाया, एक भवन विष्णु का तथा दूसरा शिव का, बाद में मुस्लिम आक्रमण के समय भ्रष्ट कर दिये गये। किसी दूरदर्शी एवं चतुर व्यक्ति ने इन मंदिरों से संबंधित इस शिलालेख को मिट्टी के ढेर में दबा दिया। यह वर्षों तक दबा रहा तथा ई.1900 में उत्खनन के समय जनरल कनिंघम को प्राप्त हुआ।’

कनिंघम ने राजा परमार्दिदेव को ई.1165 या 1167 का माना है। इस मंदिर की ताजमहल के साथ संगति करते हुए पी. एन. ओक का कहना है कि हमारी दृष्टि में बटेश्वर के शिलालेख में जिन दो भवनों का उल्लेख है वे अपनी स्फटिकीय भव्यता सहित अभी भी आगरा में विद्यमान हैं। इनमें से एक एतमादुददौला का मकबरा है तथा दूसरा ताजमहल है। जिस भवन का उल्लेख राजा के प्रासाद के रूप में है, वह वर्तमान एतमादुददौला का मकबरा है। चंद्रमौलीश्वर मंदिर ताजमहल है।

चंद्रमौलीश्वर मंदिर जिन कारणों से ताजमहल हो सकता है, उन पर विचार करना भी आवश्यक है। इनमें पहला कारण स्फटिक श्वेत संगमरमर का है। उसके शिखर कलश पर त्रिशूल है, जो केवल चंद्रमौलीश्वर का ही चिन्ह है। ताजमहल का केन्द्रीय कक्ष जिसमें बादशाह और उसकी बेगम की कब्रें बतायी जाती हैं, उसके चारों ओर दस चतुर्भुजी कक्ष है, जो भक्तों के परिक्रमा मार्ग का काम करते थे।

कनिंघम आदि इतिहासकारों का मानना है कि शाहजहाँ से पूर्व हुमायूँ के काल में भी स्मारक में चार कोनों में चार मीनार देखी गयी थीं। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि महल शब्द किसी कब्र के साथ नही लगता है। यह शब्द भी भवन का पर्यायवाची है। कब्र का नाम ‘महल’ नही हो सकता।

इसके अतिरिक्त इस (ताजमहल) के निर्माण की कोई स्पष्ट तिथि किसी भी ग्रंथ से पता नही चलती। साथ ही इस पर उस समय कितनी धनराशि व्यय हुई, यह भी पता नहीं है। परस्पर विरोधाभासी बातें इस विषय में बतायी गयी हैं। यदि यह शाहजहाँ द्वारा निर्मित होता तो उसके ‘शाहजहाँनामा’ में इन दोनों तथ्यों की पुष्टि अवश्य होती। अवश्य ही यह प्राचीन भवन था जिसका नाम तेजोमय महालय था।

अमरीका के न्यूयार्क स्थित प्रैट इंस्टीट्यूट के प्रसिद्ध पुरात्वविद तथा प्रोफेसर मार्विन एच मिल्स ने भी ताजमहल को हिंदू भवन माना है तथा एक शोधपत्र प्रस्तुत किया है। यह शोधपत्र न्यूयार्क टाइम्स ने विस्तार से प्रकाशित किया। मिल्स ने अपने शोध पत्र में निष्कर्ष दिया है कि अपने मौलिक स्वरूप में ताजमहल एक हिंदू स्मारक था, जिसे बाद में मुगलों ने मकबरे में बदल दिया।

उनके अनुसार ताजमहल के बाईं ओर स्थित भवन को इस समय मस्जिद कहा जाता है जिसका मुख पश्चिम की ओर है। यदि उसे मूलतः मसजिद ही बनाया गया होता तो उसका मुख पश्चिम की बजाय मक्का की ओर होता। इसकी मीनारों को भी उन्होंने मुस्लिम सिद्धांतों के विरुद्ध माना है।

इसी प्रकार उन्होंने सवाल खड़ा किया है कि ताजमहल के निर्माण की वास्तविक तिथि को जानने के लिए भारत सरकार ने कार्बन-14 और थर्मोल्यूमिनेन्सेंस पद्धति से जांच करवाने पर रोक क्यों लगा रखी है ? मिल्स ने यह भी सवाल खड़ा किया है कि ताजमहल के उत्तर में टेरेस के नीचे 20 कमरे यमुना की तरफ करके क्यों बनाए गए? अवश्य ही यह प्राचीन हिन्दू मंदिर की मूल संरचनाएं रही होंगी जिन्हें पुरुषोत्तम नागेश ओक ने तेजोमय महालय कहा है।

किसी कब्र को 20 कमरे की क्या आवश्यकता है? इतने कक्ष किसी राजमहल का ही हिस्सा हो सकते हैं। ताजमहल के दक्षिण दिशा में बने 20 कमरों को सील कर क्यों रखा गया है? शोधकर्ताओं एवं पर्यटकों को वहाँ प्रवेश क्यों नहीं दिया जाता? 

मिल्स के अनुसार वैन एडिसन की पुस्तक ‘ताज महल’ तथा जियाउद्दीन अहमद देसाई की पुस्तक ‘द इल्यूमाइंड टॉम्ब’ में प्रशंसनीय आंकड़े और सूचनाएं हैं जो इन लोगों ने ताजमहल के उद्भव और विकास के समकालीन स्रोतों से एकत्रित किए थे। इनमें कई फोटो चित्र, इतिहासकारों के विवरण, शाही निर्देशों के साथ-साथ अक्षरों, योजनाओं, उन्नयन और आरेखों का संग्रह शामिल है।

दोनों इतिहासकारों ने प्यार की परिणति के रूप में ताजमहल के उद्भव की बात को अस्वीकार किया है। दोनों इतिहासकारों ने ताजमहल के उद्भव को मुगलकाल का मानने से भी इनकार कर दिया है। अवश्य ही यह प्राचीन भवन तेजोमय महालय रहा होगा।

पुरातत्वविदों द्वारा प्रस्तुत तर्कों को देखते हुए कुछ साल पहले कुछ मुसलमानों ने ताजमहल के बाईं ओर स्थित मस्जिद में नमाज पढ़ने की अनुमति मांगी थी किंतु सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब कालीन भवन – मुगल स्थापत्य का पतनकाल

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औरंगजेब कालीन भवन भारत में न के बराबर देखने को मिलते हैं। इस काल में शिल्प एवं स्थापत्य कला का विनाश देखने को मिलता है।

शाहजहाँ तथा मुमताज महल की चैदह संतानें थीं। उनमें से मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब छठा था। उसका जन्म 3 नवम्बर 1618 को उज्जैन के निकट दोहद में हुआ था। जब शाहजहाँ ने जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह किया था तब औरंगजेब आठ साल का था।

उस समय औरंगजेब तथा उसके भाई दारा को नूरजहाँ के पास बंधक के रूप में रखा गया। जब शाहजहाँ ने जहाँगीर के समक्ष समर्पण किया, तब दोनों भाईयों को मुक्त किया गया। इस कारण जब औरंगजेब 10 साल का हुआ, तब उसकी शिक्षा आरम्भ हो सकी। औरंगजेब ने कुरान तथा हदीस का ज्ञान प्राप्त किया।

उसने स्वयं को कट्टर सुन्नी मुसलमान बनाया। वह चित्रकला तथा संगीत आदि ललित कलाओं से दूर रहता था। उसे यह पसंद नहीं था कि उसके पिता शाहजहाँ तथा तीनों भाई चित्रकला, संगीत तथा स्थापत्य में रुचि रखते थे। उसकी दृष्टि में ये सब इस्लाम विरोधी कार्य थे। उसे यह भी पसंद नहीं था कि मुगल शासन में काफिर हिन्दुओं को बहुत बड़ी भूमिका दी गई थी। औरंगजेब चाहता था कि भारत को पूरी तरह ‘दारुल इस्लाम’ अर्थात् ‘इस्लाम का घर’ बनाया जाए।

ई.1657 में जब शाहजहाँ बीमार पड़ा तब औरंगजेब ने उसे आगरा के लाल किले में कैद कर लिया। औरंगजेब ने अपनी बड़ी बहन जहांआरा को भी शाहजहाँ के साथ ही कैद कर लिया। इसके बाद औरंगजेब अपने तीन भाइयों- दारा शिकोह, शाहशुजा तथा मुराद बक्श की हत्या करके स्वयं मुगलों के तख्त पर आसीन हो गया।

बादशाह बनने के बाद उसने भारत के समस्त हिन्दू राजाओं को अटक नदी के पार ले जाकर एक साथ उनकी सुन्नत करने का षड़यंत्र रचा किंतु एक सूफी फकीर ने औरंगजेब के षड़यंत्र का पर्दा फाश कर दिया और हिन्दू राजाओं ने अटक नदी के पूर्वी किनारे पर ही अपनी नावें जला दीं और नदी के पार जाने से मना कर दिया।

इस पर औरंगजेब ने हाथ में कुरान लेकर शपथ ग्रहण की कि वह भविष्य में फिर कभी ऐसा नहीं करेगा। इस घटना के बाद से औरंगजेब ने हिन्दू राजाओं को एक-एक करके नष्ट करने का निश्चय किया जिससे समस्त भारत में राजपूत, मराठे, जाट, सिक्ख तथा सतनामियों आदि ने मुगल सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और स्थान-स्थान पर युद्ध आरम्भ हो गए।

औरंगजेब के विध्वंस कार्य

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औरंगजेब के काल में भवनों का निर्माण न के बराबर हुआ। केवल गिनती की कुछ मस्जिदें और मकबरे ही बने किंतु सैंकड़ों की संख्या में हिन्दू भवनों को तोड़ा गया। बादशाह बनने से पहले ही औरंगजेब ने हिन्दू पूजा स्थलों को गिरवाना तथा देव मूर्तियों को भंग करना आरम्भ कर दिया था। जब वह गुजरात का सूबेदार था तब अहमदाबाद में चिन्तामणि का मन्दिर बनकर तैयार ही हुआ था। औरंगजेब ने उसे ध्वस्त करवाकर उसके स्थान पर एक मस्जिद बनवा दी। तख्त पर बैठते ही उसने बिहार के अधिकारियों को निर्देश दिये कि कटक तथा मेदिनीपुर के बीच में जितने हिन्दू मन्दिर हैं उन सबको गिरवा दिया जाये।

औरंगजेब के आदेश से सोमनाथ का तीसरा मन्दिर भी ध्वस्त करवा दिया गया। बनारस में विश्वनाथ के मन्दिर को गिरवाकर वहाँ विशाल मस्जिद का निर्माण करवाया गया, जो आज भी विद्यमान है। मथुरा में केशवराय मन्दिर की भी यही दशा की गई। मथुरा का नाम बदलकर इस्लामाबाद रख दिया गया। ई.1680 में औरंगजेब की आज्ञा से आम्बेर के समस्त हिन्दू मन्दिरों को गिरवा दिया गया।

आम्बेर के राजपूतों ने अकबर के शासन-काल से ही मुगलों की बड़ी सेवा की थी। इस कारण आम्बेर के कच्छवाहों को औरंगजेब के इस कुकृत्य से बहुत ठेस लगी। यह औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता की पराकाष्ठा थी। औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि हिन्दू अपने पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार नहीं करें तथा नये मंदिर नहीं बनवायें।

उसने हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाकर दिल्ली तथा आगरा में मस्जिदों की सीढ़ियों तथा मार्गों में डलवा दिया जिससे वे मुसलमानों के पैरों से कुचली तथा ठुकराई जायें और उनका घोर अपमान हो। इस प्रकार औरंगजेब ने हर प्र्रकार से हिन्दुओं की भावनाओं को कुचलने का काम किया।

औरंगजेब ने हिन्दुओं के धर्म के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी उन्मूलित करने का प्रयत्न किया। उसके आदेश से थट्टा, मुल्तान तथा बनारस में स्थित समस्त हिन्दू शिक्षण संस्थाओं को नष्ट कर दिया गया। मुसलमान विद्यार्थियों को हिन्दू पाठशालाओं में पढ़ने की अनुमति नहीं थी। हिन्दू पाठशालाओं में न तो हिन्दू धर्म की कोई शिक्षा दी जा सकती थी और न इस्लाम विरोधी बात कही जा सकती थी।

औरंगजेब के निर्माण कार्य

दिलरास बानो का मकबरा (बीबी का मकबरा) औरंगाबाद

बीबी का मकबरा औरंगजेब कालीन भवन है। औरंगजेब के शासनकाल में महाराष्ट्र के औरंगाबाद नगर के निकट औरंगजेब की मरहूम बेगम रबिया-उद्-दौरानी उर्फ दिलरास बानो बेगम का मकबरा बनवाया गया। इस मकबरे का निर्माण शहजादे आजमशाह ने अपनी माँ की स्मृति में ई.1651-61 के दौरान करवाया। मुख्य प्रवेश द्वार पर लगे अभिलेख के अनुसार यह मक़बरा अताउल्ला और हंसपत राय नामक वास्तुकारों द्वारा अभिकल्पित और निर्मित किया गया।

इसे ‘बीबी का मकबरा’ तथा दक्कन का ताज’ भी कहा जाता है। इसका डिजाइन ताजमहल का डिजाइन तैयार करने वाले शिल्पी अहमद लाहौरी के पुत्र अताउल्लाह ने तैयार किया था। इसमें ताजमहल की नकल करने का असफल प्रयास किया गया किंतु इसकी मीनारों में संतुलन न हो पाने के कारण पूरे भवन का सामन्जस्य बिखर गया। यह एक मामूली ढंग की इमारत है और उसकी सजी हुई मेहराबों तथा अन्य सजावटों में कोई विशेषता नहीं है।

ग़ुलाम मुस्तफा की पुस्तक ‘तारीख नामा’ के अनुसार इस मकबरे के निर्माण पर 6,68,203 रुपये व्यय हुए थे। इस मक़बरे का गुम्बद पूरी तरह संगमरमर के पत्थर से बना हुआ है तथा शेष निर्माण पर सफेद प्लास्टर किया गया है। इस के निर्माण के लिए संगमरमर मकराना की खदानों से लाया गया था। आज़मशाह इसे ताजमहल से भी अधिक भव्य बनाना चाहता था किंतु औरंगज़ेब द्वारा दिए गए खर्च में वह संभव नहीं हो पाया।

लाल किला मस्जिद, दिल्ली

दिल्ली के लाल किले में स्थित एक मस्जिद औरंगजेब कालीन भवन है। औरंगजेब द्वारा निर्मित यह मस्जिद उसकी सादगी का परिचय देती है। इसे मोती मस्जिद भी कहा जाता है। यह मस्जिद उच्च कोटि के संगमरमर से निर्मित की गई है।

बादशाही मस्जिद लाहौर

लाहौर की बादशाही मस्जिद औरंगजेब कालीन भवन है। औरंगजेब ने ई.1673-74 में लाहौर में भी एक मस्जिद बनवाई जिसे बादशाही मस्जिद कहा जाता है। इसमें गोलाकार बंगाली छत और फूले हुए गुम्बद बनाए गए हैं। मस्जिद का मुख्य भवन एवं मीनारें लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई हैं जबकि भवन के ऊपर के गुम्बद तथा मीनारों के ऊपर के बुर्ज सफेद संगमरमर से बनाए गए हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप में यह तीसरे नम्बर की सबसे बड़ी मस्जिद है। अपने निर्माण के समय यह विश्व की सबसे बड़ी मस्जिद थी। इस समय यह विश्व की सातवें नम्बर की सबसे बड़ी मस्जिद है तथा पाकिस्तान में तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद है। यह लाहौर दुर्ग के पास ही स्थित है तथा लाल पत्थर से बनी मण्डलीय मस्जिदों में अंतिम मस्जिद है। इसके बाद मुगलों ने ऐसी मस्जिद फिर कभी नहीं बनाई।

औरंजेब द्वारा निर्मित लाहौर की बादशाही मस्जिद, शाहजहाँ द्वारा दिल्ली में बनवाई गई जामा मस्जिद की अनुकृति पर बनी है किंतु यह दिल्ली की जामा मस्जिद की तुलना में बहुत बड़ी है तथा ईदागाह के रूप में भी प्रयुक्त होती है। इसका दालान 2 लाख 76 हजार वर्ग फुट में विस्तृत है जिसमें एक लाख लोग नमाज पढ़ सकते हैं। मस्जिद के चारों ओर बनी मीनारें 196 मीटर ऊँची हैं। महाराजा रणजीतसिंह के शासन में इस मस्जिद को बहुत क्षति पहुंची। मस्जिद परिसर में एक छोटा संग्रहालय भी बनाया गया है।

जीनत-अल-मस्जिद, दिल्ली

दिल्ली की जीनत-अल-मस्जिद भी औरंगजेब कालीन भवन है। औरंगजेब की दूसरे नम्बर की पुत्री जीनत-उन्निसा ने ई.1707 में दिल्ली के शाहजहाँनाबाद में खैराती दरवाजा के पास जीनत-अल-मस्जिद बनवाई। उस समय यमुना नदी इस मस्जिद के पास से होकर बहती थी इस कारण इसे घाट मस्जिद भी कहा जाता था। औरंगजेब के समय में यह क्षेत्र शाहजहाँनाबाद के दरियागंज क्षेत्र के अंतर्गत था।

दरियागंज नामक बाजार की स्थापना मुगलों ने ही की थी जिसका आशय यमुना नदी के तट पर स्थित बाजार से था किंतु जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार किया तो उन्होंने यमुना के बहाव की दिशा में परिवर्तन कर दिया। इसके बाद दरिया अर्थात् यमुना, दरियागंज से दूर चली गई किंतु बाजार पूर्ववत् दरियागंज कहलाता रहा। शाहजहाँ द्वारा बनाई गई दिल्ली की जामा मस्जिद के स्थापत्य से साम्य होने से इसे दिल्ली की मिनी जामा-मस्जिद भी कहा जाता है।

शाहजहाँ अपनी पौत्री जीनत-उन्निसा से बहुत प्रेम करता था इसी कारण जीनत-उन्निसा ने अपने बाबा द्वारा बनाई गई मस्जिद के नक्शे पर ही यह मस्जिद भी बनवाई। कुछ किंवदन्तियों के कारण इसे घटा मस्जिद (बादल मस्जिद) एवं घाटा मस्जिद (नुक्सान मस्जिद) भी कहा जाता है।

इस मस्जिद के पास ही जीनत-उन्निसा का मकबरा भी था। जब ई.1857 में बादशाह बहादुरशाह जफर ने क्रांतिकारी सैनिकों का साथ दिया तब अंग्रेजों ने लाल किले पर अधिकार करके, उसके भीतर स्थित बहुत से भवनों को नष्ट कर दिया। उसी समय अंग्रेजों ने जीनत-उन्निसा का मकबरा भी गिरा दिया तथा जीनत-उन्निसा द्वारा बनवाई गई मस्जिद में बेकरी स्थापित कर दी।

जीनत-उन्निसा का जन्म औरंगजेब की प्रिय बेगम दिलरास बानो के पेट से हुआ था जिसका मकबरा औरंगजेब के पुत्र आजमशाह ने औरंगाबाद में बनाया था और बीबी का मकबरा के नाम से जाना जाता है। जिस प्रकार जीनत-उन्निसा द्वारा निर्मित मस्जिद को मिनी जामा मस्जिद कहा जाता है, उसी प्रकार बीबी का मकबरा को मिनी ताजमहल कहा जाता है।

ये दोनों ही इमारतें औरंगजेब के पुत्र एवं पुत्री ने बनाई थीं किंतु दोनों ने ही अपने बाबा शाहजहाँ के स्थापत्य का अनुकरण किया। इससे प्रतीत होता है कि औरंगजेब की औलादें, अपने पिता औरंगजेब की बजाय अपने बाबा शाहजहाँ से अधिक प्रेम करती थीं।

लालबाग किला, ढाका

ढाका का लाल किला औरंगजेब कालीन भवन है। औरंगजेब के तीसरे शहजादे मुहम्मद आज़म शाह को बंगाल का सूबेदार बनाया गया था। उसने ई.1678 में लालबाग किले का निर्माण आरम्भ करवाया किंतु यह काम अधूरा ही रह गया। उस समय इसे औरंगाबाद का किला कहते थे।

अब यह दुर्ग बांगलादेश की राजधानी ढाका के दक्षिण-पश्चिमी भाग में बुरीगंगा नदी के निकट स्थित है तथा लाल बाग का किला कहलाता है।

मुहम्मद आजम के बाद औरंगजेब का मामा शाइस्ता खान बंगाल का सूबेदार हुआ। वह ई.1688 तक बंगाल में रहा किंतु उसने किले का काम पूरा नहीं करवाया। ई.1684 में शाइस्ता खान की बेटी ‘बीबी ईरान दुख्त परी’ की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद शाहस्ता खान ने इस दुर्ग को अशुभ जानकर ढाका छोड़ दिया और मुर्शिदाबाद में जाकर रहने लगा। ई.1787 में जोहान जोफनी द्वारा इस किले के भवनों को चित्रित किया गया। ई.1844 में इस क्षेत्र को लालबाग कहा जाने लगा।

लंबे समय तक किले को तीन इमारतों- (1.) मस्जिद, (2.) बीबी परी का मकबरा और (3.) दीवान-ए-आम का संयोजन माना जाता था जिसक  साथ दो दरवाजे और आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त किले की दीवार का हिस्सा भी था। बांग्लादेश के पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई में अन्य संरचनाएं भी सामने आई हैं।

किले की दक्षिणी दीवार के दक्षिणी-पश्चिमी कोने पर एक विशाल बुर्ज बनी हुई है। इसके साथ ही अस्तबल तथा प्रशासनिक खण्ड के भवन बने हुए हैं। किले के पश्चिमी भाग में एक ‘रूफ-गार्डन’ बना हुआ है। इसमें जलाशय तथा फव्वारों की भी व्यवस्था है। दुर्ग की दीवार में थोड़ी-थाड़ी दूरी पर दो मंजिले बुर्ज बने हुए हैं।

दीवान-ए-आम परिसर के पूर्व की ओर स्थित बंगाल के मुगल सूबेदार का दो मंजिला आवास है। अंग्रेजी फैक्टरी के गवर्नर की रिपोर्ट में कहा गया है कि शाइस्ता खान इस कमरे में रहता था। बाद में कुछ यूरोपीय लोगों को इसी भवन में कैद करके रखा गया। बीबी पारी के मकबरे में भीतरी भाग सफेद संगमरमर से ढका हुआ है जबकि बाहरी भाग लाल पत्थर से बना है। इस मकबरे में केंद्रीय कमरे के चारों ओर आठ कमरे बनाए गए हैं। दक्षिण-पूर्वी कोने के कमरे में एक और छोटी कब्र है। इस किले में शालीमार बाग की भांति एक उद्यान भी बनाया गया था।

रौशनआरा का मकबरा, दिल्ली

रौशनआरा का मकबरा भी औरंगजेब कालीन भवन है। शाहजहाँ की पुत्री रौशन आरा का निधन ई.1671 में हुआ। उसका मकबरा दिल्ली में बनाया गया। इस मकबरे के चारों ओर बड़ा उद्यान था जिसका कुछ हिस्सा अब भी बचा हुआ है।

आलमगीरी दरवाजा, लाहौर

लाहौर का आलमगीरी दरवाजा औरंगजेब कालीन भवन है। लाहौर दुर्ग के आलमगीरी दरवाजे का निर्माण ई.1673 करवाया गया। वर्तमान समय में यही दरवाजा किले के मुख्य द्वार के रूप में प्रयुक्त होता है। यह दरवाजा बादशाही मस्जिद की तरफ खुलता था जिसका निर्माण भी औरंजेब ने करवाया था।

पिंजोर गार्डन, पंचकूला

चण्डीगढ़ का पिंजोर गार्डन औरंगजेब कालीन भवन तो नहीं है किंतु औरंगजेब के काल में बनवाया गया एक प्रमुख उद्यान है। पिंजोर गार्डन चण्डीगढ़ से 22 किलोमीटर दूर है तथा हरियाणा प्रांत के पंचकूला जिले में स्थित है। यह 17वीं शती का मुगल उद्यान है जिसे अब यदुवेन्द्र गार्डन कहा जाता है।

इसका निर्माण औरंगजेब के काल में औरंगजेब के धाय-भाई मुजफ्फर हुसैन ने करवाया था जिसे नवाब फिदाई खान कोका भी कहते थे। इसी धाय-भाई ने लाहौर की बादशाही मस्जिद के निर्माण कार्य की देख-रेख की थी। जिस समय पिंजोर का उद्यान बनवाया गया, उस समय औरंगजेब लाहौर में प्रवास कर रहा था तथा यह औरंगजेब के शासन के शुरुआती वर्ष थे।

अंग्रेज महिला लेखक एवं चित्रकार सी.एम. विलियर्स स्टुअर्ट ने ई.1913 में कुछ दिनों तक इस उद्यान में निवास किया। उसने अपनी पुस्तक गार्डन्स ऑफ द ग्रेट मुगल्स में लिखा है-

‘जब दीर्घकालीन निर्माण प्रक्रिया पूरी होने के बाद फिदाई खान अपने हरम की औरतों को लेकर पिंजौर बाग में रहने के लिए आया तो उसने देखा कि बाग में काम करने वाले बहुत से लोगों के गले में गांठें उभरी हुई थीं जिन्हें गण्डमाला (घेंघा) कहा जाता था। आसपास के गांवों की जो औरतें मुगल हरम की औरतों को फल, फूल एवं सब्जियां बेचने आती थीं, वे भी इस बीमारी से ग्रस्त थीं। उन्होंने हरम की औरतों को बताया कि यहाँ की हवा एवं पानी में कुछ दोष है जिसके कारण यहाँ रहने वाले लोग इस बीमारी से ग्रस्त होकर कुरूप हो जाते हैं। अतः फिदाई खाँ कुछ ही दिनों में इस बाग को छोड़कर चला गया ताकि उसके हरम की औरतें सुंदर बनी रह सकें।’

माना जाता है कि स्थानीय राजाओं ने फिदाई खाँ तथा औरंगजेब को इस इलाके से दूर रखने के लिए यह योजना बनाई थी कि उन्हें गण्डमाला से ग्रस्त स्त्री-पुरुष दिखाकर औरंगजेब तथा फिदाई खाँ के मन में भय उत्पन्न किया जा सके। इस कारण यह बाग उजाड़ हो गया। ई.1775 में पटियाला नरेश अमरसिंह ने सिरमूर नरेश जगत प्रकाश से यह उद्यान खरीदा। ई.1793 में इस बाग के एक हिस्से को हटाकर वहाँ सड़क बना दी गई।

अंग्रेजों के समय यह बाग पूरी तरह उजड़ गया तथा इसमें जंगली झाड़ियां उग आईं। महाराजा पटियाला ने इस बाग में गुलाबों की खेती करवाई ताकि महाराजा के लिए गुलाब का इत्र तैयार करवाया जा सके। पटियाला नरेश यदुवेन्द्रसिंह (ई.1914-74) ने इस उद्यान को फिर से लगवाया तथा इसका खोया हुआ स्वरूप पुनर्जीवित किया। तब से यह बाग यदुवेन्द्र गार्डन कहलाने लगा।

यह बाग श्रीनगर के शालीमार बाग की शैली पर बना हुआ है तथा सात सीढ़ीदार क्यारियों (टैरेस-बैड) में लगा हुआ है। बाग का मुख्य द्वार बाग के सबसे ऊँचे टैरेस में खुलता है। यहाँ पर एक महल बना हुआ है जिसका निर्माण राजस्थानी-मुगल शैली में हुआ है। इसे शीशमहल कहा जाता है। इससे लगता हुआ हवामहल बनाया गया है।

दूसरी टैरेस पर रंगमहल बना हुआ है जिसमें मेहराबदार दरवाजे बने हुए हैं। तीसरी टैरेस में सरू के पेड़ (साइप्रस ट्री) तथा फूलों की क्यारियां लगी हुई हैं। चैथी टैरेस में जल महल बना हुआ है। इसके पास ही एक चैकोर फव्वारा लगा हुआ है तथा आराम करने के लिए एक बरामदा भी बना हुआ है।

अगली टैरेस पर पुनः पेड़ एवं फव्वारे लगे हुए हैं। सबसे नीचे की टैरेस पर मुक्ताकाश थियेटर बना हुआ है, इसे तश्तरी के आकृति में बनाया गया है। आजादी के बाद मुक्ताकाश थियेटर में एक मंदिर तथा संग्रहालय स्थापित कर दिया गया है। यह बाग इतना सुंदर है कि इसमें कई फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है।

औरंगजेब कालीन भवन निश्चित रूप से मुगल स्थापत्य के पतन की कहानी कहते हैं।

औरंगजेब के बाद की मुगल स्थापत्य कला

ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तरकालीन मुगल बादशाहों के समय में कोई उल्लेखनीय इमारत नहीं बनी। इस काल में केन्द्रीय सत्ता के कमजोर हो जाने के कारण स्थापत्य शैली भी स्थानीय सत्ता की भांति आंचलिक प्रभाव ग्रहण करने लगी क्योंकि भवनों का निर्माण कार्य मुगल शहजादों के हाथों से निकलकर अवध के नवाब तथा अन्य आंचलिक प्रमुखों के हाथों में चला गया था। कुछ भवन खानदेश और दक्षिण के अन्य भागों में भी बने किंतु वे शाहजहाँ कालीन स्थापत्य का स्तर प्राप्त करने में असफल रहे।

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जो इमारतें बनीं, वे मुगलकालीन शिल्पकला के डिजाइन का खोखलापन और दीवालियापन ही प्रकट करती हैं।’

सफदर जंग का मकबरा, दिल्ली

ई.1753-54 में दिल्ली में वजीर सफदर जंग का मकबरा बना जो मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला (ई.1719-1748) का शक्तिशाली वजीर था तथा अवध का नवाब था। यह मकबरा दक्षिण दिल्ली में श्री औरोबिंदो मार्ग पर लोधी मार्ग के पश्चिमी छोर के ठीक सामने स्थित है। इस मकबरे का ऊध्र्व अनुपात (वर्टिकल प्रपोरशन) आवश्यकता से कहीं अधिक है फिर भी इसे मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है।

मकबरे में सफदरजंग और उसकी बेगम की कब्र बनी हुई है। केन्द्रीय भवन में सफ़ेद संगमरमर से निर्मित एक बड़ा गुम्बद है। शेष भवन लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है। इसका स्थापत्य हुमायूँ के मकबरे की डिजाइन पर ही आधारित है। मोती महल, जंगली महल और बादशाह पसंद नाम से पैवेलियन भी बने हुए हैं। चारों ओर पानी की चार नहरें हैं, जो चार इमारतों तक जाती हैं। मकबरे का मुख्य द्वार पूर्व दिशा में है जो श्री औरोबिन्दो मार्ग पर खुलता है। मकबरे के कुछ कक्ष आवासीय प्रयोग हेतु बनाए गए हैं। मुख्य भवन से जुड़ी हुई चार अष्टकोणीय मीनारें हैं।

उस्ताद-शागिर्द के मकबरे, सरहिंद

उस्ताद-शागिर्द के मकबरे, मुगल काल की ऐतिहासिक इमारतें हैं। उस्ताद का मकबरा शाहजहाँ के काल में महत्वपूर्ण शिल्पी एवं प्रधान भवन-निर्माता सैयद खाँ चग़ताई की स्मृति में बनवाया गया था। सैयद खाँ, जहाँगीर के काल में पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया गया था। संभवतः इस नियुक्ति के कुछ दिनों बाद ही ई.1606 में उसकी मृत्यु हो गई।

शार्गिद का मकबरा उस काल के एक और प्रसिद्ध शिल्पी तथा भवन-निर्माता ख्वाजा खाँ की स्मृति में बनवाया गया था। अनुमान लगाया जाता है कि ख्वाजा खाँ, सैयद खाँ का शिष्य रहा होगा। क्योंकि इस सम्बन्ध में और कोई तथ्य उपलब्ध नहीं होता है। ये मकबरे पंजाब के फतेहगढ़ एवं सरहिंद क्षेत्र में स्थित हैं तथा वर्तमान समय में तलानिया गांव के बाहर खण्डहरों के रूप में खड़े हैं। ये मकबरे रौजा शरीफ के स्मारक से केवल 2.5 किलोमीटर दूर स्थित हैं। इन मकबरों के भीतर की दीवारों पर बने वृक्षों के अलंकरण से अनुमान होता है कि ये जहाँगीर कालीन निर्माण हैं।

मुगलों के आगमन के समय सरहिंद, पंजाब का प्रसिद्ध क्षेत्र था। मुगल काल में भी सरहिंद की प्रमुखता बनी रही। यह दिल्ली से लाहौर जाने के मार्ग पर स्थित था। ई.1710 में बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद को मुगलों का प्रमुख स्थान होने के कारण जलाकर नष्ट कर दिया। उन दिनों सिक्ख सेनाएं गुरुगोविंद सिंह के पुत्रों की निर्मम हत्या का बदला लेने के लिए पूरे पंजाब में मुगलों पर कहर ढा रही थीं।

इस अवसर पर हुए ‘चप्पर-चिरी’ के युद्ध में वजीर खाँ भी मारा गया जो मुगलों की तरफ से पंजाब में सूबेदार नियुक्त था तथा लाहौर दुर्ग में रहा करता था। जब सिक्खों ने सरहिंद को नष्ट किया था, तब भी उस्ताद-शागिर्द के मकबरे मौजूद थे किंतु सिक्खों की सेना ने उन्हें नष्ट नहीं किया।

इन मकबरों की दीवारों पर सुंदर भित्तिचित्र बनाए गए थे किंतु अब दीवारों का प्लास्टर हट जाने से भित्तिचित्र भी नष्ट हो गए हैं। उस्ताद के मकबरे की अपेक्षा शागिर्द का मकबरा थोड़ी अच्छी हालत में हैं।

उस्ताद-शागिर्द के मकबरे, नकोदर

पंजाब के जालंधर जिले के नकोदर नामक स्थान पर भी उस्ताद-शागिर्द के मकबरे बने हुए हैं। शाहजहाँ के काल में ये मकबरे ‘हदीरों वाला बाग’ के भीतर बनाए गए थे। इनकी बाहरी एवं भीतरी दीवारों का अलंकरण बताता है कि ये शाहजहाँ काल के निर्माण हैं। उस काल में हदीरों वाला बाग में महल, बड़े दरवाजे तथा मकबरे, कुएं, पानी के हौद आदि भी बनाए गए थे। हदीरों वाला बाग अब नष्ट हो गया है किंतु मकबरे अब भी अच्छी स्थिति में हैं।

यहाँ उस्ताद के मकबरे का सम्बन्ध जहाँगीर कालीन मुहम्मद मुोमन हुसैनी से है जो जहाँगीर का दरबारी अमीर हुआ करता था। इस मकबरे पर एक शिलालेख लगा है जिसमें ई.1612-13 की तिथि का उल्लेख है। शागिर्द के मकबरे में ई.1657 की तिथि का एक शिलालेख लगा है। इस शिलालेख के अनुसार यह मजार हाजी जमाल की है।

इन दोनों लेखों में प्रयुक्त अक्षरों की बनावट बिल्कुल एक जैसी है जिससे अनुमान होता हे कि इन्हें एक ही व्यक्ति ने लिखा है। इन लेखों की लिखावट से अनुमान लगाया जाता है कि ये दोनों कब्रें एक-दूसरे से सम्बद्ध व्यक्तियों की हैं किंतु उनमें गुरु-शिष्य जैसे किसी सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है।

निकटवर्ती भोलापुर गांव में भी उस्ताद-शागिर्द के मकबरे हैं। ग्वालियर में भी उस्ताद-शागिर्द का एक मकबरा है जिसमें उस्ताद के रूप में बाबर के समकालीन संगीतकार मुहम्मद गौस की कब्र है जबकि शागिर्द की कब्र सुप्रसिद्ध गायक तानसेन की है। भारत के मुसलमानों में यह परम्परा रही है कि शिष्य की कब्र गुरु के चरणों की तरफ बनाई जाती है।

जफर महल, महरौली

दक्षिणी दिल्ली के महरौली क्षेत्र में स्थित ज़फ़र महल मुगल काल का अंतिम ऐतिहासिक भवन माना जाता है। इस भवन का निर्माण ग्रीष्मकालीन महल के रूप में करवाया गया था। इसके भीतरी ढांचे का निर्माण मुगल बादशाह अकबर (द्वितीय) द्वारा करवाया गया तथा बाहरी भाग और दरवाजे का निर्माण बहादुरशाह (द्वितीय) द्वारा 19वीं सदी में करवाया गया। भारत के इतिहास में उसे बहादुरशाह ज़फ़़र भी कहते हैं।

 उस समय महरौली क्षेत्र में घने जंगल थे जिनके कारण यहाँ ठण्डक रहती थी। ज़फ़र महल के निकट ही बहादुर शाह प्रथम की कब्र है जिसका निर्माण बहादुरशाह प्रथम के पुत्र जहांदार शाह ने करवाया था। मुगल बादशाह शाहआलम को भी इसी क्षेत्र में दफ़नाया गया था। शाहआलम के पुत्र अकबरशाह (द्वितीय) की कब्र भी ज़फ़र महल के पास ही है।

बहादुरशाह ज़फ़र ने अपनी वसीयत में मृत्यु के बाद अपने शव को जफ़र महल में दफ़नाए जाने की इच्छा व्यक्त की थी किंतु ई.1857 की सैनिक क्रांति के बाद अंग्रेजों ने बहादुरशाह को रंगून भेज दिया और वहीं उसकी मृत्यु हुई। अंग्रेजों ने उसे रंगून में ही दफ़ना दिया।

संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर से बनी इस तीन मंजिला इमारत का प्रवेशद्वार 50 फुट ऊँचा और 15 मीटर चैड़ा है। इस प्रवेश द्वार को हाथी दरवाजा कहा जाता है। इस दरवाजे से हौदे सहित एक सुसज्जित हाथी आराम से पार हो सकता था। इस द्वार का निर्माण बहादुर शाह ज़फ़र ने करवाया था। इस सम्बन्ध में प्रवेश द्वार पर एक अभिलेख भी लगा हुआ है- ‘इस द्वार को मुगल बादशाह ज़फ़र ने अपने शासन के 11वें वर्ष में ई.1847-48 में बनवाया।’ मुगल शैली में निर्मित एक विशाल छज्जा इस द्वार की महत्वपूर्ण विशेषता है। प्रवेश द्वार पर घुमावदार बंगाली गुंबजों और छोटे झरोखों का निर्माण किया गया है।

जफर महल को प्राचीन इमारत संरक्षण अधिनियम के तहत ई.1920 में संरक्षित इमारत घोषित किया गया था किंतु इसकी दक्षिणी और पूर्वी दीवार के पास अतिक्रमण कर लिए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस महल में एक संग्रहालय स्थापित करने की योजना पर कार्य कर रहा है।

जफर महल के मुख्य दरवाजे की मेहराब के ऊपरी भाग में दोनों तरफ पत्थर के दो कमल लगाए गए हैं। हुमायूँ के मकबरे के मुख्य दरवाजे के ईवान पर फारसी शैली के दो सितारे अंकित किए गए थे किंतु मुगलों की इस अंतिम इमारत में सितारों की जगह कमल ने ले ली थी जो इस बात की प्रतीक थी कि अब उनका नाता मध्य एशिया से समाप्त हो गया था और वे पूर्णतः भारतीय हो गए थे किंतु यह उनकी भारत से भी विदाई की बेला थी।

संभवतः इसी व्यथा को बहादुरशाह जफ़र ने अपनी एक नज़्म में इस प्रकार व्यक्त किया था- ‘दो गज ज़मीं भी न मिली कू-ए-यार में।’

अर्थात् मुझे अपने मित्रों के देश में दो गज जमीं भी नहीं मिल सकी।

इस प्रकार हम देखते हैं कि औरंगजेब कालीन भवन तो निश्चित रूप से. मुगल स्थापत्य के पतन की कहानी कहते ही हैं किंतु उसके बाद के काल में मुगलों की इतनी ताकत ही नहीं रह गई थी कि वे कुछ बड़े भवन बना सकें।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगलकाल में ध्वस्त भवन

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भारत के इतिहास में गुगल काल केवल निर्माण के लिए ही नहीं जाना जाता है अपितु हिन्दू स्थापत्य, विशेषकर मंदिरों के विध्वंस के लिए बदनाम भी है। मुगलकाल में ध्वस्त भवन बहुत बड़ी संख्या में रहे होंगे, अब तो उनके नाम भी नहीं मिलते।

इस अध्याय में मुगल बादशाह बाबर से लेकर शाहजहाँ तक के काल में ध्वस्त भवनों की संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है। इस पूरे काल में बड़े स्तर पर हिन्दू स्थापत्य का विनाश हुआ। इनमें से कुछ भवनों का उल्लेख पुस्तक में स्थान-स्थान पर हुआ है।

बाबर तथा हुमायूँ के काल में भवनों का विध्वंस

बाबर के काल में राम-जन्मभूमि मंदिर का ध्वंस

मुगलकाल में ध्वस्त भवन की सूची में सबसे ऊपर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का नाम आता है। बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या के श्रीराम मंदिर ‘जन्मस्थानम्’ को भंग करके उसी की सामग्री से एक ढांचा बनाया जिसे मुगल अभिलेखों में ‘जन्मस्थान मस्जिद’ कहा जाता था किंतु यहाँ लगे शिलालेख में बाबर का उल्लेख होने से जनता इसे बाबरी मस्जिद कहने लगी। ई.1992 के जनआंदोलन में हिन्दुओं ने उस ढांचे को ढहा दिया और वहाँ कपड़े का एक मंदिर बना दिया जिसमें रामलला की मूर्ति विराजमान है।

हुमायूँ के काल में चित्तौड़ दुर्ग का विध्वंस

मुगलकाल में ध्वस्त भवन की सूची में दूसरा नाम चित्तौड़ दुर्ग का नाम आता है। चित्तौड़ दुर्ग को हुमायूँ के शासनकाल में तोड़ा गया। ई.1534 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने आक्रमण किया। चित्तौड़ की राजमाता कर्मवती ने हूमायूं को राखी भेजकर उससे प्रार्थना की कि वह दुर्ग की रक्षा करे किंतु बहादुरशाह ने हुमायूँ को यह कहकर रोक दिया कि इस समय मैं जेहाद पर हूँ। यदि शत्रु की मदद की तो कयामत के दिन अल्लाह को क्या मुंह दिखाएगा? बहादुरशाह ने दुर्ग को जलाकर राख कर दिया। इसके बाद अकबर एवं औरंगजेब की सेनाओं ने चित्तौड़ दुर्ग में अनेक भवन ध्वस्त किए।

अकबर के काल में भवनों का विध्वंस

अकबर के काल में वज्रेश्वरी देवी मंदिर का ध्वंस

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आधुनिक हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा की घाटी में नगरकोट नामक अत्यंत प्राचीन सुरम्य एवं धार्मिक स्थान है जहाँ सदियों से हिन्दू राजा शासन करते आए थे। नगरकोट नामक एक स्थान में वज्रेश्वरी देवी का अति प्राचीन शक्तिपीठ स्थित है। महमूद गौरी, मुहम्मद बिन तुगलक तथा फीरोजशाह तुगलक इस शक्तिपीठ को पहले भी तोड़ चुके थे किंतु अवसर पाते ही हिन्दू इस मंदिर को फिर से बना लेते थे। अकबर के शासन काल में इस मंदिर को एक बार पुनः बुरी तरह नष्ट-भ्रष्ट किया गया। अकबर की सेनाओं ने कांगड़ा दुर्ग में स्थित मंदिर भी ध्वस्त कर दिए।

अकबर के समकालीन लेखक निजामुद्दीन अहमद ने अपनी पुस्तक तबकात ए अकबरी में अकबर की सेनाओं द्वारा नगरकोट में की गई हिंसा का उल्लेख किया है। वह लिखता है- ‘भूण की गढ़ी में महामाया का मंदिर है, उसे मुस्लिम सेनाओं ने अपने अधिकार में ले लिया। इस पर राजपूतों का एक शहीदी जत्था मुगल सेना पर चढ़ बैठा जिसे शीघ्र ही काट डाला गया। युद्ध से मचे हल्ले से घबराकर नगरकोट के हिन्दुओं की काले रंग की लगभग 200 गौएं शरण लेने के लिए मंदिर में घुस गईं, जब हिन्दू सैनिक, मुसलमानों पर तीरों और बंदूकों से गोलियों की बरसात कर रहे थे, तब उन गायों को सावग तुर्कों ने एक-एक करके काट दिया। ब्राह्मणों का एक बड़ा समूह था जो लम्बे समय से इस मंदिर में पूजा करते आसा था, उनमें से किसी ने भी युद्ध करने के बारे में विचार तक नहीं किया, किंतु उन्हें भी काट डाला गया। सैनिकों ने अपने जूतों में गायों का खून भर लिया तथा उस खून को मंदिर की छतों, दीवारों एवं फर्श पर बिखेर दिया।’

जब हिन्दुओं ने इस अत्याचार का बदला लेने का प्रयास किया तो शेख अहमद सरहिंदी ने अकबर से शिकायत की कि हिन्दू, मस्जिदों को तोड़कर उनके स्थान पर मंदिर बना रहे हैं।

अकबर के काल में चित्तौड़ दुर्ग में विनाश लीला

ई.1567 में अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग के विरुद्ध अभियान किया। उस समय चित्तौड़ पर राणा उदयसिंह का शासन था। अकबर ने इस दुर्ग की नीवों में बारूद भरकर उसकी दीवारों को उड़ा दिया तथा चित्तौड़ दुर्ग में 8 हजार हिन्दू सैनिकों और 40 हजार हिन्दू नागरिकों का कत्लेआम करवाया। इस दौरान बहुत सी इमारतें गिराई गईं।

अकबर के काल में हम्पी का विनाश

विजयनगरम् साम्राज्य दक्षिण भारत का एक विशाल हिन्दू साम्राज्य था जो भारत के मध्यकालीन इतिहास में भव्य मंदिरों के निर्माण के लिए जाना जाता है। विजयनगरम् साम्राज्य के अंतर्गत वर्तमान कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के क्षेत्र आते थे। इसकी राजधानी ‘हम्पी’ अब कर्नाटक में स्थित है।

हम्पी नगर में विश्व के सर्वश्रेष्ठ और विशालकाय मंदिर बने जिन्हें मुगलों के शासनकाल में दक्षिण भारत के शिया-मुस्लिम राज्यों ने तोड़कर नष्ट कर दिया। अब इन मंदिरों के खंडहर ही देखे जा सकते हैं। मुगलों के समय में ‘हम्पी’ रोम से भी समृद्ध नगर था। इसे ‘मंदिरों का शहर’ भी कहा जाता था।

जिस समय बाबर ने भारत पर राज्य स्थापित किया, उस समय विजयनगरम् पर राजा कृष्णदेव राय (ई.1509-29) का शासन था। अकबर के शासन-काल में ई.1565 में बीदर, बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर और बरार की मुस्लिम सेनाओं ने संगठित होकर विजयनगरम् राज्य पर हमला किया तथा उसे नष्ट कर दिया। राजधानी हम्पी तथा अन्य नगरों को खण्डहरों और लाशों के ढेर में बदल दिया गया। यह भारत के क्रूरतम हमलों में से एक था।

जहाँगीर के काल में मंदिरों का विध्वंस

जहाँगीर के शासनकाल के आठवें वर्ष में उसी की आज्ञा से अजमेर में पुष्कर के हिन्दू मन्दिरों को नष्ट किया गया। जहाँगीर के एक समकालीन इतिहासकार ने अपनी पुस्तक इन्तखाब ए जहाँगीरशाही में लिखा है- ‘अहमदाबाद में एक दिन शिकायत मिली कि सेवरास (जैनों) ने बड़ी संख्या में गुजरात में भव्य मंदिर बना लिए हैं तथा उनमें मूर्तियों की पूजा कर रहे हैं। जहाँगीर ने आदेश दिया कि उन जैनों को मुगल सल्तनत से बाहर निकाल दिया जाए तथा उनके मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बनाई जाएं।’

शाहजहाँ के काल में मंदिरों का विध्वंस

शाहजहाँ ने ई.1614 में अपने सूबेदारों को आदेश दिया कि जहाँगीर के शासन-काल में जिन मन्दिरों का निर्माण आरम्भ किया गया था, उन्हें गिरा दिया जाए। इस आदेश पर बनारस में 76 मन्दिरों को तोड़ा गया। शाहजहाँ की आज्ञा से बुन्देलखण्ड के हिन्दू मन्दिर तुड़वाये गए और जुझारसिंह के पुत्रों को मुसलमान बनाया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

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प्लासी का युद्ध

प्लासी का युद्ध बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच ई.1757 में लड़ा गया था। प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्धों में से एक है।

प्लासी का युद्ध होने के प्रमुख कारण

प्लासी का युद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

(1.) अलीनगर की सन्धि की शर्तों का पूरा नहीं होना

अलीनगर की संधि की शर्तों का पालन करने में किसी भी पक्ष ने रुचि नहीं ली। सिराजुद्दौला ने अँग्रेजों को मुआवजा देने का वचन दिया था परन्तु उसने किसी प्रकार का मुआवजा नहीं दिया। रैम्जे म्योर का कथन है कि नवाब सन्धि की शर्तों को पूरा करने के लिए तैयार नहीं था, इस कारण युद्ध आवश्यक हो गया। दूसरी ओर कम्पनी ने नवाब से भी पहले युद्ध की तैयारी आरम्भ कर दी थी। अँग्रेजों का मानना था कि जब तक सिराजुद्दौला नवाब बना रहेगा, कम्पनी के हितों को खतरा बना रहेगा।

(2.) अँग्रेजों द्वारा नवाब पर दोषारोपण करना

सिराजुद्दौला ने अपने कुछ निजी पत्रों में अंग्रजों के शत्रुओं से मित्रता नहीं रखने का आश्वासन दिया था। कम्पनी ने इस प्रकार के आश्वासनों को भी सन्धि का एक अंश समझा। जबकि सच्चाई यह थी कि सन्धि के समय ही नवाब ने इस प्रकार की शर्त को मानने से इन्कार कर दिया था। इन्हीं दिनों बंगाल के फ्रांसीसियों ने नवाब के साथ सम्बन्ध बढ़ाने का प्रयास किया, जिससे क्लाइव को आशंका हुई कि नवाब, फ्रांसीसियों से मिलकर अँग्रेजों से प्रतिशोध लेने का प्रयास करेगा।

इसलिए क्लाइव ने फ्रांसीसियों की बस्ती चन्द्रनगर पर आक्रमण करने के लिए नवाब से अनुमति माँगी। नवाब फ्रांसीसियों को अपना शत्रु नहीं बनाना चाहता था। इसलिये उसने अँग्रेजों को गोलमाल जवाब भिजवा दिया। क्लाइव ने 14 मार्च 1757 को चन्द्रनगर पर अचानक आक्रमण करके उस पर भी अधिकार कर लिया।

अँग्रेजों ने नवाब पर अलीनगर की शर्तों को तोड़ने का दोष भी लगा दिया जिसे नवाब ने स्वीकार नहीं किया। नवाब का कहना था कि बंगाल के फ्रांसीसियों ने अँग्रेजों के विरुद्ध कोई कार्य नहीं किया, तब भला उन्हें शत्रु कैसे माना जाये? परन्तु अँग्रेज अपनी बात पर डटे रहे।

(3.) राज्य के प्रमुख लोगों का नवाब के विरुद्ध षड्यन्त्र करना

कुछ प्रभावशाली मुस्लिम सरदार और धनवान हिन्दू नवाब सिराजुद्दौला के विरुद्ध कुचक्र रचने में लगे हुए थे। जब अंग्रेजों ने उनसे इस कार्य में सहयोग माँगा तो उन्होंने तत्काल स्वीकृति दे दी। मुस्लिम सरदारों में मीर जाफर, मिर्जा अमीर बेग और हुसैनखाँ प्रमुख थे जो किसी-न-किसी रूप में नवाब द्वारा बेइज्जत किए जा चुके थे।

हिन्दू, सिराजुद्दौला की कट्टर धार्मिक नीतियों के कारण उसके विरोधी थे। जगत सेठ बन्धु, मेहताबराय और स्वरूपचन्द्र को भी नवाब ने अपमानित किया था। नदिया का शक्तिशाली जमींदार महाराजा कृष्णचन्द्र भी नवाब की हिन्दू-विरोधी नीति से असन्तुष्ट था। कई प्रमुख हिन्दू व्यापारियों का अँग्रेज व्यापारियों से घनिष्ट सम्बन्ध था। वे भी नवाब को हटाना चाहते थे।

(4.) मद्रास सलैक्ट कमेटी की नीति

अलीनगर की सन्धि के बाद से ही मद्रास के अधिकारी अपनी सेना को वापिस भिजवाने की माँग कर रहे थे परन्तु क्लाइव का मानना था कि अभी बंगाल में काम पूरा नहीं हुआ है। अतः उसने मद्रास की सलेक्ट कमेटी को सम्पूर्ण स्थिति समझाते हुए मार्ग-दर्शन देने की प्रार्थना की। मद्रास से क्लाइव को उत्तर भेजा गया कि बंगाल प्रान्त में ऐसी किसी भी शक्ति से सम्बन्ध स्थापित किया जाये जो नवाब से असन्तुष्ट हो तथा नवाबी का दावा कर रही हो, ताकि सिराजुद्दौला को सदैव के लिए समाप्त किया जा सके।

सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड्यंत्र

नवाब विरोधी षड्यन्त्रकारियों ने मीर जाफर को नवाब बनाने का निर्णय लिया जिसे अँग्रेजों ने भी स्वीकार कर लिया। अँग्रेजों ने मीर जाफर से अलग से एक गुप्त समझौता कर लिया, जिसके अन्तर्गत नवाब बन जाने के बाद मीर जाफर ने कम्पनी को व्यापारिक, प्रादेशिक तथा आर्थिक सुविधाएं देने का आश्वासन दिया।

रायदुर्लभ को मन्त्री-पद का आश्वासन दिया गया। षड्यन्त्र की शर्तें कलकत्ता के एक सिक्ख व्यापारी अमीचन्द की मध्यस्थता से तय हुई थीं। अतः उसे नकद के कोष का पाँच प्रतिशत भाग देने का वायदा किया गया। जब सब कुछ तय हो गया तो अमीचन्द ने पाँच प्रतिशत के अलावा 30,000 पौंड की माँग की और माँग न मानने पर षड्यन्त्र का भण्डाफोड़ करने की धमकी दी।

इस पर क्लाइव ने अमीचंद को धोखा देने की नीयत से, दो सन्धि-पत्र तैयार करवाये। एक सफेद कागज पर, जो सही था और दूसरा लाल कागज पर, जो झूठा था और जिसमें अमीचन्द को 30,000 पौंड देने की बात कही गई थी। वाट्सन ने झूठे सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया।

तब क्लाइव ने उसके जाली हस्ताक्षर बनाये और अमीचन्द को सन्तुष्ट कर दिया। चूँकि क्लाइव ने कम्पनी के हितों की रक्षा के लिए धोखाधड़ी की थी, इसलिये अँग्रेज इतिहासकारों ने उसके इस कुकृत्य को उचित उचित ठहराया है।

नवाब सिराजुद्दौला को इस षड्यन्त्र की सूचना युद्ध के पूर्व ही मिल गई किन्तु उसने षड्यन्त्रकारियों के विरुद्ध सख्त कदम उठाने के स्थान पर मीर जाफर, रायदुर्लभ, यारलतीफखाँ और मीर मुईनुद्दीनखाँ को बुलवाकर अपने प्रति वफादारी की शपथ लेने को कहा। उनके ऐसा करने से नवाब संतुष्ट हो गया, जबकि मीर मुईनुद्दीनखाँ के अतिरिक्त शेष तीनों सेनापति, नवाब के विरुद्ध षड्यन्त्र में सक्रिय थे।

मीर जाफर तथा उसके साथियों की गद्दारी

अब क्लाइव ने युद्ध का बहाना ढूँढना आरम्भ किया। उसने नवाब को एक पत्र लिखा, जिसमें उस पर अलीनगर की सन्धि को भंग करने का आरोप लगाया तथा नवाब का उत्तर आने से पहले ही राजधानी की तरफ कूच कर दिया। 19 जून 1757 को अंग्रेजों ने कटवा पर अधिकार कर लिया। नवाब भी सेना सहित आगे बढ़ा।

दोनों पक्षों की सेनाएँ प्लासी के मैदान में आमने-सामने आ डटीं। नवाब की सेना में लगभग 50,000 सैनिक थे। क्लाइव के पास 800 यूरोपियन तथा 2200 भारतीय सैनिक थे। क्लाइव ने अपना डेरा आम के पेड़ों की ओट में लगाया ताकि शत्रु के तोपखाने से बचाव हो सके।

नवाब की विशाल सेना देखकर क्लाइव साहस खो बैठा और उसने आक्रमण करने का साहस नहीं किया परन्तु जब नवाब के विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे लोगों ने क्लाइव को उसकी जीत का विश्वास दिलाया तो 23 जून 1757 को क्लाइव ने धावा बोल दिया। नवाब के चारों सेनापतियों में से तीन सेनापति अपने-अपने सैनिक दस्तों के साथ चुपचाप युद्ध का दृश्य देखते रहे।

केवल मीर मुईनुद्दीनखाँ ने शत्रु का सामना किया परन्तु थोड़ी देर में ही मारा गया। सिराजुद्दौला अपने ही लोगों के विश्वासघात से घबरा गया और 2000 सैनिकों के साथ युद्ध के मैदान से भाग खड़ा हुआ। उसके भागते ही नवाब के षड्यन्त्रकारी सेनापतियों ने अपने-अपने दस्तों को भी लौट जाने के आदेश दे दिये।

इस प्रकार, बिना किसी विशेष युद्ध के ही क्लाइव ने प्लासी का युद्ध जीत लिया। नवाब जब मुर्शिदाबाद से पटना की ओर भाग रहा था, तब उसे बन्दी बना लिया गया। 28 जून 1757 को अँग्रेजों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया। 2 जुलाई 1757 को मीर जाफर के पुत्र मीरन ने नवाब सिराजुद्दौला की हत्या कर दी।

प्लासी के युद्ध का महत्त्व

प्लासी के युद्ध में नवाब की तरफ के केवल 500 सैनिक तथा अँग्रेजों की ओर के केवल 29 सैनिक मारे गये थे। इसलिये सैनिक दृष्टि से प्लासी का युद्ध महत्त्वपूर्ण नहीं था किंतु इसके राजनीतिक परिणाम अत्यंत दूरगामी एवं महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। नवाब की विशाल सेना की पराजय का मूल कारण उसके सेनापतियों का विश्वासघात था। क्लाइव ने जगत सेठ और मीर जाफर की महत्त्वाकांक्षाओं का लाभ उठाया।

के. एम. पणिक्कर ने लिखा है- ‘प्लासी एक ऐसा सौदा था, जिसमें बंगाल के धनी लोगों और मीर जाफर ने नवाब को अँग्रेजों के हाथों बेच दिया।’

प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल में नया युग आरम्भ हुआ जिसने न केवल बंगाल में ही क्रान्ति उत्पन्न की, अपितु ईस्ट इण्डिया कम्पनी के स्वरूप में भी क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया।

(1.) राजनीतिक महत्त्व

प्लासी के युद्ध से बंगाल की तात्कालिक शासन व्यवस्था का खोखलापन स्पष्ट हो गया तथा हिन्दुओं और मुसलमानों के आन्तरिक मतभेद प्रकट हो गये जिससे यह स्पष्ट हो गया कि धनवान हिन्दू, बंगाल में मुस्लिम शासन को समाप्त करने के लिये किसी भी सीमा तक विदेशियों से साँठ-गाँठ कर सकते हैं।

इससे अँग्रेजों का आत्मविश्वास बढ़ा और वे यह मानने लगे कि षड्यन्त्रों तथा कुचक्रों द्वारा भारतीयों को परास्त करके अपने साम्राज्य की स्थापना की जा सकती है। युद्ध के बाद मीर जाफर बंगाल का नवाब अवश्य बन गया परन्तु उसकी सत्ता कम्पनी के सैनिक सहयोग पर टिकी हुई थी।

इस प्रकार, मीर जाफर कम्पनी के हाथों की कठपुतली बन गया। इस युद्ध से पहले, अँग्रेज एक व्यापारिक कम्पनी के मालिक थे और नवाब का कम्पनी पर नियंत्रण रहता था किंतु प्लासी के युद्ध ने कम्पनी पर नवाब के नियन्त्रण को समाप्त करके नवाब पर कम्पनी का नियंत्रण स्थापित कर दिया।

नवाब का शासन इतना कमजोर था कि आगे चलकर मीर जाफर अपने दीवान रायदुर्लभ और बिहार के नायब दीवान रामनारायण को किसी प्रकार की सजा नहीं दे सका क्योंकि वे कम्पनी के प्रति वफादार थे। कम्पनी की कृपा प्राप्त करके कोई भी व्यक्ति प्रशासन में उच्च से उच्च पद प्राप्त कर सकता था।

अँग्रेजों का राजनीतिक प्रभुत्व इस बात से स्पष्ट होता है कि बाद में मीर जाफर को पदच्युत करने में उन्हें किसी प्रकार का रक्तपात नहीं करना पड़ा। प्लासी के युद्ध के महत्त्व की चर्चा करते हुए इतिहासकार मेलीसन ने लिखा है-‘इतना तात्कालिक, स्थायी और प्रभावशाली परिणामों वाला कोई युद्ध नहीं हुआ।’  

एल्फ्रेड लायल ने लिखा है- ‘प्लासी में क्लाइव की सफलता ने बंगाल में युद्ध तथा राजनीति का एक अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र अँग्रेजों के लिए खोल दिया।’

इस युद्ध ने अँग्रेज व्यापारियों की आकांक्षाओं को जागृत कर दिया और वे भारत में साम्राज्य की स्थापना का स्वप्न देखने लगे। दक्षिण भारत में निजाम तथा मराठों की उपस्थिति के कारण साम्राज्य स्थापना का काम सरल नहीं था परन्तु बंगाल में ऐसी कोई शक्ति नहीं थी जो अँग्रेजों को रोक सके।

बंगाल को केन्द्र बनाकर वे सुगमता से मुगलों की राजधानी दिल्ली का द्वार खटखटा सकते थे। यह युद्ध मुगल सल्तनत के लिए भी घातक सिद्ध हुआ। एक व्यापारिक कम्पनी ने उसके एक सूबेदार को पदच्युत करके दूसरे व्यक्ति को सूबेदार नियुक्त कर दिया। इससे स्पष्ट हो गया कि मुगल बादशाह पूर्णतः शक्तिविहीन है, कोई भी शक्ति अपने बल पर उसके किसी सूबेदार को हटा सकती है और अपनी ओर से सूबेदार नियुक्त कर सकती है।

बंगाल की राजनीति में अब अन्य यूरोपीय शक्तियों का प्रभाव क्षीण हो गया। फ्रांसीसी, बंगाल की धरती पर फिर कभी पनप नहीं सके और डचों ने जब अँग्रेजों को चुनौती देने का साहस किया तो उन्हें बुरी तरह से असफल होना पड़ा। इस प्रकार, बंगाल में अँग्रेजों की सर्वोच्चता स्थापित हो गई।

बंगला कवि नवीनचंद्र सेन ने लिखा है- ‘भारत में अनंत अंधकारमयी रात्रि आरम्भ हो गई।’

(2.) आर्थिक महत्त्व

बंगाल भारत का सर्वाधिक समृद्ध प्रान्त था। बंगाल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को 24 परगनों की जागीर प्राप्त हुई। प्लासी के युद्ध के पूर्व कम्पनी को भारत में माल खरीदने के लिए इंग्लैण्ड से सोना और चाँदी लाने पड़ते थे। अब उसे भारत में ही इतना अधिक धन मिलने लग गया कि वह समस्त आवश्यक सामान क्रय कर सकती थी।

बंगाल से प्राप्त धन को कम्पनी ने चीन के व्यापार में लगाना आरम्भ कर दिया। इससे बंगाल का भयानक आर्थिक शोषण हुआ और बंगाल एक निर्धन प्रांत बन बया। प्लासी के युद्ध के बाद कम्पनी को तीन सूबों- बंगाल, बिहार और उड़ीसा में कर-मुक्त व्यवसाय करने की छूट मिल गई।

कम्पनी ने इसका लाभ उठाते हुए तीनों प्रान्तों के भीतरी भागों में अपनी कई फैक्ट्रियाँ तथा कोठियाँ स्थापित कीं। कलकत्ता में कम्पनी ने अपनी स्वतन्त्र टकसाल स्थापित की जहाँ से 19 अगस्त 1757 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पहला सिक्का जारी हुआ।

(3.) नैतिक महत्त्व

प्लासी के युद्ध से भारत की राजनीति में नैतिक पतन का नया युग आरम्भ हुआ। नवाब के विश्वस्त सेनापतियों ने युद्ध के मैदान में धोखा देकर नवाब को हरवा दिया। इस युद्ध के बाद बंगाल में धन की अंधी लूट मच गई। मीर जाफर ने बंगाल का नवाब बनने के बाद 1757 से 1760 ई. के मध्य अँग्रेजों को लगभग 3 करोड़ रुपये रिश्वत के रूप में दिये।

स्वयं क्लाइव को 30,000 पौंड प्राप्त हुए और बाद में 37,70,833 पौंड क्षतिपूर्ति के रूप में प्राप्त हुए (कुछ इतिहासकारों के अनुसार 16 लाख रुपये और कुछ के अनुसार 2 से 3 लाख पौंड के बीच प्राप्त हुए थे)। प्रत्येक अँग्रेज पदाधिकारी और सैनिक को भी अच्छी-खासी राशि प्राप्त हुई। अँग्रेजों को सन्तुष्ट करने के लिए मीर जाफर को अपने महल के सोने-चाँदी के बर्तन तक बेचने पड़े।

(4.) ऐतिहासिक महत्त्व

प्लासी की लड़ाई का अत्यंत ऐतिहासिक महत्व है। इस युद्ध के बाद प्रथम बार कम्पनी को राजनीतिक सत्ता प्राप्त हुई।

एडमिरल वाट्सन ने लिखा है- ‘प्लासी के युद्ध में अँग्रेजों की विजय कम्पनी के लिये नहीं अपितु सामान्यतः ब्रिटिश राज्य के लिये महत्व की थी।’

इस लड़ाई ने बंगाल, और अंततोगत्वा समस्त भारत पर ब्रिटिश प्रभुत्व का मार्ग प्रशस्त किया। उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारतीय साम्राज्य के प्रमुख दावेदार के रूप में स्थापित कर दिया।

ब्रिटिश इतिहासकारों एडवर्ड थॉम्पसन और जी. टी. गैरेट ने लिखा है- ‘क्रांति करना संसार में सबसे लाभदायक धंधा समझा जाता था। अँग्रेजों के मस्तिष्क में ऐसा स्वर्ण मोह भर गया था जैसा उस युग के बाद कभी नहीं देखा गया था जब कोर्टेस और पिजारो के युग के स्पेनवासी सोने के लिये उन्मादग्रस्त हो गये थे। जब तक बंगाल को पूरी तरह चूस नहीं लिया गया, तब तक वहाँ शांति स्थापित नहीं हो सकी।’

(5.) भूमि, न कि व्यापार

विगत डेढ़ सौ वर्षों से कम्पनी भारत में ‘व्यापार, न कि भूमि’ की नीति पर चल रही थी किंतु 23 जून 1757 के प्लासी युद्ध के पश्चात् ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत में प्रथम बार राजनीतिक सत्ता प्राप्त हुई। इसके बाद अँग्रेजों ने भारत में अपनी नीति ‘भूमि, न कि व्यापार’ कर दी। इस युद्ध के केवल 8 वर्ष बाद ही, 1765 ई. के बक्सर युद्ध के पश्चात् हुई इलाहाबाद संधि के उपरांत ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में पूर्णतः राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गई।

मीर जाफर और अँग्रेज

प्लासी के युद्ध के बाद 29 जून 1757 को क्लाइव ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब घोषित किया और स्वयं सेना लेकर मुर्शिदाबाद चला गया। बंगाल की जनता इस युद्ध एवं परिवर्तन से पूरी तरह उदासीन थी। मीर जाफर अयोग्य व्यक्ति था। क्लाइव ने शीघ्र ही यह प्रकट कर दिया कि शासन की वास्तविक शक्ति उसके पास है और मीर जाफर नाममात्र का नवाब है। क्लाइव ने जगत सेठ के माध्यम से बंगाल में हुए सत्ता-परिवर्तन के लिए मुगल बादशाह की स्वीकृति भी मँगवा ली।

मीर जाफर के राज्याभिषेक के अवसर पर क्लाइव ने कहा था कि अँग्रेज वापस कलकत्ता चले जायेंगे और और अपना ध्यान व्यापार की ओर केन्द्रित करेंगे परन्तु वह नवाब तथा शासनतन्त्र पर अपना नियंत्रण रखना चाहता था। इसीलिए उसने समस्त महत्त्वपूर्ण पदों पर ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त करवाया जो अँग्रेजों के प्रति निष्ठावान हों।

उसने षड्यन्त्रकारी रायदुर्लभ को मन्त्री पद पर नियुक्त करवाया। क्लाइव ने रायदुर्लभ के साथ अलग से एक गुप्त समझौता भी किया जिसमें रायदुर्लभ ने क्लाइव के समस्त दावों को समर्थन देने का आश्वासन दिया। रायदुर्लभ, नवाब के विरुद्ध निरन्तर षड्यन्त्र करता रहा।

नवाब ने रायदुर्लभ को हटाना चाहा किंतु क्लाइव के हस्तक्षेप के कारण नवाब कुछ नहीं कर सका। बिहार के नायब सूबेदार रामनारायण ने भी क्लाइव के साथ अलग से समझौता कर रखा था। वह शासन चलाने के लिये क्लाइव से निर्देश प्राप्त करता था।

उसने नवाब के आदेशों का कभी सम्मान नहीं किया। नवाब उसके विरुद्ध भी कोई कार्यवाही नहीं कर सका। शासनतंत्र पर नियंत्रण स्थपित होने के बाद क्लाइव ने बंगाल के भारतीय अधिकारियों को निर्देश भिजवाये कि वे अपने-अपने क्षेत्रों से फ्रांसीसियों को पकड़कर अँग्रेजों को सौंप दें।

इन्हीं दिनों नवाब के दो जमींदारों ने विद्रोह किये। क्लाइव ने नवाब को निर्देश दिया कि वह तुरन्त विद्रोह को दबाये। इसके लिए क्लाइव ने 500 सैनिक भी दिये। इस सहायता के बदले में क्लाइव ने बंगाल में शोरे के उत्पादन का एकाधिकार प्राप्त कर लिया। केवल 15 प्रतिशत शोरा नवाब के लिए छोड़ा गया। शोरे का उपयोग बारूद बनाने में किया जाता था। इस कारण नवाब की सेना और भी कमजोर हो गई।

अलीगौहर का आक्रमण

शाहजादा अलीगौहर (मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय) इस समय अवध में भटक रहा था। बंगाल, बिहार और उड़ीसा की अव्यवस्था का हाल सुनकर उसने इन प्रान्तों में अपना भाग्य आजमाने का प्रयास किया। उसे अवध के नवाब से सैनिक सहायता भी मिल गई। 3 अप्रैल 1759 को उसने पटना पर आक्रमण किया।

मीर जाफर के कुछ असंतुष्ट सरदार गुप्त रूप से शाहजादे से मिल गये। पटना के नायब सूबेदार रामनारायण ने अलीगौहर को मार भगाया। उस समय क्लाइव अपनी सेना के साथ युद्धस्थल के निकट ही था, उसने विजय का सारा श्रेय स्वयं ले लिया। उसका मानना था कि शाहजादा ब्रिटिश सेना के भय से भाग खड़ा हुआ।

इसके लिए मीर जाफर ने क्लाइव को व्यक्तिगत जागीर प्रदान की। 1760 ई. में अलीगौहर ने पुनः बिहार पर आक्रमण किया परन्तु इस बार भी वह असफल रहा। अब अँग्रेज मीर जाफर के रक्षक कहलाये जाने लगे।

डचों पर आक्रमण (बेदरा का युद्ध)

डच व्यापारियों ने बंगाल प्रांत में पटना, ढाका, पीपली, चिन्सुरा तथा कासिम बाजार के निकट फैक्ट्रियाँ स्थापित कर रखी थीं। बंगाल प्रान्त के भीतरी भागों में भी उनकी कई शाखाएँ थी। बड़ानगर तथा चिन्सुरा के प्रदेश तो उनके अधिकार में ही थे।

जब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर आक्रमण किया था तब उसने डचों से सहायता माँगी थी परन्तु डचों ने नवाब को सहायता नहीं दी। उस समय अँग्रेजों ने भी डचों से सहायता की याचना की थी परन्तु डचों ने उन्हें भी सहयोग नहीं दिया था। जब अँग्रेजों ने फुल्टा द्वीप में शरण ली तब डचों ने अँग्रेजों को सहायता पहँुचाई।

जब मीर जाफर की सहायता से बंगाल में फ्रांसीसियों के प्रभाव को क्षीण कर दिया गया तो डचों को अपने भविष्य की चिन्ता लगी। अँग्रेज लेखकों ने आरोप लगाया है कि डचों ने मीर जाफर से साँठ-गाठ कर ली। यह आरोप सत्य प्रतीत नहीं होता। डचों को बंगाल से बाहर निकालने के लिए अँग्रेजों को किसी बहाने की आवश्यकता थी।

अतः अँग्रेजों ने डचों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही आरम्भ कर दी। 25 नवम्बर 1759 को बेदरा नामक स्थान पर दोनों पक्षों में युद्ध लड़ा गया जिसमें डच हार गये और उन्होंने सन्धि का प्रस्ताव भिजवाया। इसी समय मीर जाफर का पुत्र मीरन अपनी सेना लेकर डचों को सजा देने आ पहुँचा।

क्लाइव की मध्यस्थता से डचों और मीरन के बीच एक सन्धि हुई जिसके अनुसार डचों ने भविष्य में युद्ध नहीं करने तथा नई सैनिक भर्ती और किलेबन्दी नहीं करने का वचन दिया। उन्होंने अपनी फैक्ट्रियों की सुरक्षा के लिये केवल 125 यूरोपियन सैनिकों को रखना स्वीकार कर लिया।

अँग्रेजी सत्ता की दिशा में प्लासी के युद्ध के बाद बेदरा का युद्ध, दूसरी महत्त्वपूर्ण सफलता थी। इस विजय से बंगाल में अँग्रेजों की धाक में और अधिक वृद्धि हो गई। फ्रांसीसियों की भाँति डचों की महत्त्वाकांक्षाएं भी पूर्ण रूप से कुचल दी गईं। अब बंगाल में अँग्रेजों की सर्वोच्चता को चुनौती देने वाली कोई शक्ति नहीं बची थी।   

बंगाल में प्रशासनिक अव्यवस्था

मीर जाफर की अयोग्यता, अदूरदर्शिता तथा क्रोधी स्वभाव के कारण बंगाल में प्रशासन की व्यवस्था बिगड़ती जा रही थी। मीर जाफर को न तो अपने ऊपर भरोसा था और न वह अपने सहयोगियों पर विश्वास करता था। राजकोष पहले से ही रिक्त था। मराठे, नवाब से निरन्तर चौथ वसूली कर रहे थे। क्लाइव भी मराठों से उलझना नहीं चाहता था। प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण भू-राजस्व की पूरी वसूली नहीं हो पाती थी। कम्पनी तथा उसके अधिकारी नवाब से निरन्तर धन की माँग कर रहे थे।

कर्नल मैल्लेसन ने लिखा है– ‘कम्पनी के अधिकारियों का एक ही उद्देश्य था कि जितना हो सके उतना हड़प लें, मीर जाफर को सोने की बोरी के रूप में इस्तेमाल करें और जब भी इच्छा हो उसमें अपने हाथ डालें।’

बंगाल के नवाब को शिकंजे में आया देखकर पूरी कम्पनी पर ही लालच का भयंकर भूत सवार हो गया। इस धारणा के आधार पर कि कामधेनु मिल गई है और बंगाल की सम्पदा अक्षय है, कम्पनी के निदेशकों ने बंगाल में अपने अधिकारियों को निर्देश दिये कि वे बम्बई और मद्रास प्रेसीडेंसियों का खर्च उठायें और उसकी आय से कम्पनी के भारतीय निर्यातित माल को खरीदें।

नवाब कम्पनी को निर्धारित किश्तें भी नहीं चुका पा रहा था, जबकि अनिर्धारित माँगें बढ़ती जा रही थीं। ऐसी स्थिति में नवाब अपने सैनिकों को वेतन भी नहीं चुका पाया। कम्पनी के दबाव पर नवाब को बर्दवान, नदिया तथा हुगली के क्षेत्रों से राजस्व वसूली का अधिकार तब तक के लिए कम्पनी को सौंपना पड़ा जब तक कि उसकी किश्तों के बराबर धन की वसूली नहीं हो जाये। ब्रिटिश इतिहासकार पर्सिवल स्पीयर ने इसे खुली और बेशर्म लूट का काल बताया है। वस्तुतः जिस समृद्धि के लिये बंगाल प्रसिद्ध था, उसे तेजी से नष्ट किया जा रहा था।

मीर जाफर को हटाया जाना

25 फरवरी 1760 को क्लाइव, हॉलवेल को कम्पनी का प्रभार सौंपकर स्वदेश लौट गया। जुलाई 1760 में वेन्सीटार्ट को फोर्ट विलियम का गवर्नर बनाकर कलकत्ता भेजा गया। कलकत्ता कौंसिल के 16 सदस्यों में से अनेक सदस्य उससे वरिष्ठ थे। अतः उन्हें वेन्सीटार्ट की नियुक्ति पसन्द नहीं आई।

कलकत्ता कौंसिल के अधिकांश सदस्य धनलोलुप तथा भ्रष्ट थे। ऐसे लोगों के मध्य वेन्सीटार्ट ठीक ढंग से कार्य नहीं कर सका। स्थिति उस समय और भी विषम हो गई जब उसके तीन समर्थक सदस्यों को कौंसिल की सदस्यता से हटा दिया गया और उनके स्थान पर उसके विरोधियों को नियुक्त किया गया।

वेन्सीटार्ट के प्रमुख विरोधी एलिस को कम्पनी की पटना स्थित फैक्ट्री का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। कम्पनी के पदाधिकारियों में जिस तेजी के साथ परिवर्तन किया जा रहा था, उससे मीर जाफर के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न होने लगीं।

शाहजादा अलीगौहर का भय अब भी बना हुआ था, क्योंकि कुछ स्थानीय जमींदार और सरदार उसे गुप्त सहयोग दे रहे थे। मराठे भी चौथ वसूली के नाम पर निरन्तर बंगाल में आते रहते थे। अँग्रेजों ने नवाब को इन समस्त संकटों में बराबर सहायता दी परन्तु उन्हें सदैव यह शिकायत बनी रही कि नवाब और उसके पुत्र मीरन की तरफ से उन्हें पूरा सहयोग नहीं मिलता है।

जब मीर जाफर ने अँग्रेजों के समर्थक रायदुर्लभ को मंत्री पद से हटा दिया तो अँग्रेजों का असन्तोष और बढ़ गया। 3 जुलाई 1760 को किसी ने मीरन की हत्या कर दी जिससे अँग्रेजों को नये नायब नवाब की नियुक्ति का अवसर मिल गया। उन्होंने मीर जाफर के दामाद मीर कासिम को इस पद पर नियुक्त करने का निश्चय किया जो उनके निर्देर्शों पर चलने और उन्हें काफी भेंट-उपहार देने के लिये तैयार था।

उसने अँग्रेज अधिकारियों को ढेर सारे बहुमूल्य उपहार दिये जिससे अँग्रेज अधिकारी प्रसन्न हो गये और उन्होंने मीर जाफर को पदच्युत करके मीर कासिम को नया नवाब बनाने का षड्यन्त्र रचा, ताकि उन्हें और धन की प्राप्ति हो सके। मीर जाफर की जगह मीर कासिम को नवाब बनाये जाने की घटना को बंगाल के इतिहास में 1760 ई. की रक्तहीन क्रांति कहते हैं। मीर जाफर को नवाब पद से हटाये जाने के अनेक कारण थे-

(1.) कम्पनी के अधिकारियों तथा कर्मचारियों को लगातार रिश्वत एवं उपहार देते रहने से मीर जाफर का कोष रिक्त हो गया था। वह न तो कम्पनी को वार्षिक किश्त चुका पाया और न अपने सैनिकों को वेतन दे सका।

(2.) कम्पनी के समस्त कर्मचारियों को नवाब से भेंट-उपहार लेने की आदत हो गई थी। जब नवाब उन्हें धन नहीं दे सका तो वे नवाब से नाराज हो गये और किसी दूसरे व्यक्ति को नवाब बनाने की सोचने लगे।

(3.) अँग्रेजों की लूट-खसोट से मीर जाफर भी तंग आ चुका था। इसलिये वह अँग्रेजों के चंगुल से मुक्ति पाने का उपाय सोचने लगा।

(4.) अपने युवा पुत्र मीरन की हत्या से मीर जाफर को भारी सदमा पहुँचा जिससे वह शासन की तरफ विशेष ध्यान नहीं दे पा रहा था। इस कारण बंगाल में व्यापार-वाणिज्य ठप्प होने लगा था और शान्ति-व्यवस्था लड़खड़ाने लगी थी।

(5.) अँग्रेजों को विश्वास था कि मीर जाफर के स्थान पर जिसे भी नया नवाब बनाया जायेगा, उससे उन्हें पर्याप्त धन और कम्पनी को अधिक सुविधाएँ मिलेंगी।

इस समय दक्षिण भारत में फ्रांसीसियों के विरुद्ध लड़े जाने वाले युद्ध के कारण अँग्रेजों का कोष खाली हो चुका था और मद्रास के अधिकारी बंगाल में नियुक्त अधिकारियों से लगातार धन की माँग कर रहे थे। बिहार में नियुक्त अँग्रेजी सेना को वेतन नहीं चुकाया जा सका थ। इस कारण वहाँ के सैनिक बगावत कर सकते थे।

इस आर्थिक संकट से उबारने के लिये कम्पनी को मीर कासिम ही दिखलाई पड़ा। क्योंकि उसके पास काफी धन था और वह नवाब बनने की इच्छा रखता था। ऐसी स्थिति में 27 सितम्बर 1760 को वेन्सीटार्ट ने मीर कासिम के साथ एक गुप्त समझौता कर लिया, जिसमें मीर कासिम को नवाब बनाने का वचन दिया गया। इसके बदले में मीर कासिम ने अँग्रेजों को कई वचन दिये-

(1.) मीर कासिम हर हाल में अँग्रेजों के प्रति निष्ठा रखेगा।

(2.) मीर कासिम अँग्रेजी सेना के व्यय के लिए उन्हें बर्दवान, मिदनापुर और चिटगाँव के प्रदेश देगा।

(3.) अँग्रेजों को, सिलहट में उत्पादित सीमेण्ट का आधा भाग तीन वर्ष तक खरीदने का अधिकार होगा।

(4.) मीर जाफर में, कम्पनी की जो बकाया धनराशि है उसे मीर कासिम चुकायेगा।

(5.) दक्षिण में कम्पनी द्वारा लड़े जा रहे युद्धों के लिये मीर कासिम 5 लाख रुपये की सहायता देगा।

(6.) मीर कासिम कलकत्ता कौंसिल के सदस्यों को 4 लाख 52 हजार पौंड उपहार में देगा। इस राशि में से 50 हजार पौंड वेन्सीटार्ट को, 27 हजार पौंड हॉलवेल को तथा 25-25 हजार पौंड प्रत्येक सदस्य को दिये जाने थे।

(7.) इस संधि के बदले में ब्रिटिश सेना मीर कासिम को बंगाल की शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग देगी।

इस समझौते को गोपनीय रखा गया। इस कारण मीर जाफर को इसकी भनक नहीं लगी। अक्टूबर 1760 ई. में वेन्सीटार्ट सेना सहित मुर्शिदाबाद गया और नवाब का महल घेर लिया। वेन्सीटार्ट ने नवाब से गद्दी छोड़ने के लिये कहा। इस पर नवाब अत्यंत क्रोधित हुआ किंतु जान बचाने के लिये उसे वेन्सीटार्ट की बात माननी पड़ी।

उसने निर्वाह भत्ता तथा सुरक्षा का आश्वासन मिलने पर मीर कासिम के पक्ष में गद्दी त्याग दी। इसके बाद वह कलकत्ता चला गया और वहीं रहने लगा। मीर कासिम को नवाब घोषित कर दिया गया।

मीर जाफर को गद्दी से उतारने के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए कलकत्ता कौंसिल ने कहा- ‘नवाब मीर जाफर क्रोधी, क्रूर, लालची और विलासी प्रवृत्ति का था तथा उसके निकट के व्यक्ति पूर्णतः दास, खुशामदी तथा उसकी बुराइयों की पूर्ति के साधन बने हुए थे। ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि उसने बिना किसी कारण के विभिन्न स्तर के व्यक्तियों का खून बहाया है।’

कलकत्ता कौंसिल के ये आरोप बेबुनियाद तथा तथ्य से परे हैं। सत्य तो यह है कि कम्पनी के अधिकारियों ने उसे स्वतंत्र रूप से शासन चलाने का अवसर ही नहीं दिया। 1765 ई. में क्लाइव ने स्वयं स्वीकार किया कि नवाब पर लगाये गये आरोप असत्य थे।

हॉलवेल ने नवाब पर जिन अमानवीय कृत्यों, क्रूरताओं तथा हत्याओं के आरोप लगाये हैं, उसमें लेशमात्र भी सत्य नहीं है। वस्तुतः मीर जाफर को तख्त से हटाने के लिए किसी बहाने की आवश्यकता थी और इसके लिए उस पर मिथ्या दोष मंढे़ गये। कुछ इतिहासकारों ने इस समस्त काण्ड के लिए मीर कासिम को दोषी ठहराया है।

कुछ अन्य इतिहासकारों का मत है कि मीर कासिम को दोषी ठहराना उचित नहीं है क्योंकि विश्वासघाती मीर जाफर को विश्वासघात का फल मिलना ही था। अँग्रेजों ने उसे नवाब बनाकर भारी भूल की थी, अँग्रेजों को जब अपनी भूल का ज्ञान हुआ तो उन्होंने मीर जाफर को हटाकर मीर कासिम को नवाब बनाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – अंग्रेज जाति का भारतीय शक्तियों से संघर्ष

बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

बक्सर युद्ध

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

बसीन की संधि

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

मराठा शक्ति का पतन

बक्सर युद्ध

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बक्सर युद्ध

बक्सर युद्ध में भारत की तीन प्रमुख शक्तियों- मुगल बादशाह शाहआलम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के नवाब मीर कासिम के भाग्य का फैसला हुआ।

नवाब मीर कासिम

मीर कासिम के प्रारम्भिक जीवन के बारे में विशेष जानकारी नहीं मिलती। उसका जन्म निश्चय ही किसी शासक परिवार में हुआ होगा, तभी मीर जाफर ने उसे अपना दामाद बनाया होगा। जब मीर जाफर बंगाल का नवाब बना तो मीर कासिम ने पूर्णिया और रंगपुर के फौजदार के रूप में अपनी प्रतिभा का अच्छा परिचय दिया।

वह योग्य सेनापति था। मीर जाफर के पुत्र मीरन की मृत्यु के बाद मीर कासिम की महत्त्वाकांक्षा जाग उठी और वह बंगाल का नवाब बनने का स्वप्न देखने लगा। अन्त में वेन्सीटार्ट के साथ साँठगाँठ करके वह बंगाल का नवाब बनने में सफल रहा।

मीर कासिम की समस्याएँ

नवाब बनते ही मीर कासिम के सामने समस्याएं मुँह बाये खड़ी थीं। उसकी प्रमुख समस्याएं इस प्रकार थीं-

(1.) धन की समस्या

अँग्रेजों से हुई संधि के अनुसार मीर कासिम द्वारा अंग्रेजों को बहुत-सा धन दिया जाना था। शासन व्यवस्था को सुधारने तथा सेना का पुनर्गठन करने के लिए भी धन की आवश्यकता थी।

(2.) सेना के पुनर्गठन की समस्या

मीर कासिम ने सेना की स्थिति को सुधारने की आवश्यकता को भी अनुभव किया, ताकि वह बाह्य आक्रमणों और आन्तरिक उपद्रवों का सामना करने में सक्षम सिद्ध हो सके। बंगाल को अब भी अली गौहर के आक्रमण, मराठों की लूट-खसोट तथा अवध के नवाब की विस्तारवादी नीति का भय बना हुआ था। वीरभूम के जमींदार तथा बिहार के नायब-सूबेदार जैसे आन्तरिक शत्रुओं का दमन भी करना था।

(3.) अँग्रेजों के नियंत्रण से मुक्त होने की समस्या

मीर कासिम अपने श्वसुर से गद्दारी करके तथा अँग्रेजों से कई प्रकार के वायदे करके नवाब बना था किंतु वह शीघ्र ही समझ गया कि यदि नवाबी करनी है तो उसे अँग्रेजों के नियंत्रण से मुक्ति पानी होगी।

समस्याओं के निराकरण के प्रयास

मीर कासिम ने समस्याओं से छुटकारा पाने के लिये कई कदम उठाये जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

(1.) राजधानी का परिवर्तन

मीर कासिम अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से हटाकर मुंगेर ले गया जो कलकत्ता से काफी दूर था। यहाँ वह कम्पनी के अधिकारियों के नियंत्रण से मुक्त होकर अधिक स्वतंत्रता से काम कर सकता था।

(2.) बारूद तथा तोप बनाने के कारखाने की स्थापना

मीर जाफर ने मुंगेर में बारूद बनाने तथा अच्छी तोपें बनाने का कारखाना स्थापित किया।

(3.) सेना का प्रशिक्षण

मीर जाफर ने अपनी सेना को यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित करने के लिये फ्रांसीसी तथा अमरीकी अधिकारियों को नियुक्त किया।

(4.) जमींदारों एवं अधिकारियों का दमन

मीर कासिम ने उन समस्त जमींदारों तथा अधिकारियों का दमन किया, जो नवाब की अवज्ञा करते थे और ठीक प्रकार से कर नहीं चुकाते थे। उसने बिहार के नायब सूबेदार रामनारायण को पदच्युत करके उसकी सम्पत्ति जब्त कर ली तथा उसे बंदी बना लिया।

(5.) अवध के नवाब से समझौता

मीर कासिम ने अवध के नवाब से समझौता करके सीमावर्ती क्षेत्रों में शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित की।

(6.) धन की व्यवस्था

अँग्रेजों को पुरानी देनदारी चुकाने, कम्पनी के अधिकारियों को उपहार देने, शासन चलाने तथा सेना का वेतन चुकाने के लिये धन जुटाने हेतु मीर कासिम ने कई उपाय किये। उसे जिस किसी व्यक्ति के पास अधिक धन होने की जानकारी मिली उसे मीर जाफर का समर्थक ठहराकर उसके धन को जब्त कर लिया।

पुराने राजकीय अधिकारियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर उनकी सम्पत्ति को जब्त कर लिया। राजस्व विभाग में विश्वस्त व्यक्तियों को नियुक्त किया। सरकारी खर्चे में कमी करने के लिये अनेक कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। जनता पर नये कर लगाये। इन प्रयासों से राज्य की आय में काफी वृद्धि हो गई।

अँग्रेजों के साथ झगड़ा

अँग्रेजों के साथ झगड़ा उठ खड़े होने के कई कारण थे। इनमें से अधिकांश कारण अँग्रेजों की तरफ से खड़े किये गये थे। इनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

(1.) अलीगौहर को बादशाह के रूप में मान्यता

1761 ई. के प्रारम्भ में अली गौहर (शाहआलम द्वितीय) ने अँग्रेजों से बातचीत आरम्भ की और स्वयं को दिल्ली के सिंहासन पर बैठाने में उनकी सहायता माँगी। अँग्रेजों ने उसे पटना में आमन्त्रित करके शाही सम्मान के साथ स्वागत किया। उन्होंने मीर कासिम को विवश किया कि वह शाहआलम को बादशाह माने।

अँग्रेजों ने मीर कासिम से शाहआलम को 12 लाख रुपये नजराने के भी दिलवाये। अँग्रेजों ने शाहआलम के नाम से सिक्के भी ढलवाये। अँग्रेजों की इस नीति के कारण मीर कासिम की स्थिति और भी कमजोर हो गई। उसे भय हुआ कि कहीं उससे नवाबी न छीन ली जाये। इस घटना से मीर कासिम और अँग्रेजों के सम्बन्धों में तनाव आ गया।

(2.) कम्पनी के अधिकारियों एवं गोमाश्तों की बदमाशी

प्लासी के युद्ध के बाद से बंगाल में कम्पनी के कर्मचारियों को व्यापार करने की और अधिक स्वतंत्रता मिल गई थी। वे लोग बिना सीमा-शुल्क चुकाये धड़ल्ले-से व्यापार करते थे। प्रान्त के भीतरी भागों में भी अँग्रेज अधिकारियों ने सैकड़ों कारखाने स्थापित कर लिये थे।

इन कारखानों में नमक, सुपारी, घी, चावल, माँस, मछली, चीनी, तम्बाकू, अफीम आदि विविध वस्तुओं को खरीदा और बेचा जाता था। कारखानों की देखभाल के लिए प्रायः भारतीयों को गोमाश्ता (प्रतिनिधि) नियुक्त किया जाता था। अँग्रेज मालिकों की देखा-देखी इन गोमाश्ताओं ने भी बिना शुल्क चुकाये व्यापार करना आरम्भ कर दिया।

इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। एक तरफ तो नवाब की आय घट गई और दूसरी तरफ भारतीय व्यापारियों के लिए कारोबार चलाना कठिन हो गया। क्योंकि उन्हें सीमा-शुल्क चुकाना पड़ता था, वे अँग्रेज गोमाश्ताओं की तुलना में सस्ती दर पर सामान बेचने में असमर्थ थे। इस कारण अँग्रेजों तथा उनके गोमाश्ताओं का व्यापार बढ़ता चला गया और भारतीय व्यापारियों का व्यापार घटता चला गया।

(3.) नवाब द्वारा भारतीय व्यापारियों से चुंगी हटाने का निर्णय

मीर कासिम ने कम्पनी और उसके अधिकारियों तथा गोमाश्ताओं के व्यापार पर अंकुश लगाने का प्रयास किया। उसने फोर्ट विलियम के गवर्नर वेन्सीटार्ट से शिकायत की। वेन्सीटार्ट स्वयं मुंगेर गया और उसने मीर कासिम से व्यक्तिगत विचार-विमर्श किया।

वह इस बात पर सहमत हो गया कि अब से कम्पनी अपने सामान पर 9 प्रतिशत शुल्क अदा करेगी और भारतीय व्यापारी 25 से 30 प्रतिशत शुल्क देंगे परन्तु कलकत्ता कौंसिल ने वेन्सीटार्ट के प्रस्ताव को रद्द कर दिया। इससे निराश होकर मीर कासिम ने भारतीय व्यापारियों को भी निःशुल्क व्यापार करने की अनुमति दे दी।

मीर कासिम के इस कदम से अँग्रेज अधिकारी अत्यधिक नाराज हुए, क्योंकि इससे उनका विशेषाधिकार समाप्त हो गया। अब उन्हें भारतीय व्यापारियों से बराबरी के स्तर पर स्पर्द्धा करनी पड़ी जिसमें वे बुरी तरह से पिटने लगे। उन्हें लाभ के स्थान पर हानि होने लगी।

उन्होंने नवाब से अपना आदेश वापिस लेने के लिये कहा परन्तु नवाब ने उनकी बात को ठुकरा दिया। इस व्यापारिक संघर्ष से पुनः यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि बंगाल का वास्तविक शासक कौन है, ईस्ट इण्डिया कम्पनी अथवा मीर कासिम?

(4.) नवाब के खर्चे पर रखी गई सेना का नवाब के विरुद्ध प्रयोग

मीर कासिम ने कम्पनी पर आरोप लगाया कि 1760 ई. की सन्धि के अनुसार नवाब की सहायता के लिए जिस अँग्रेजी सेना को रखने तथा उसके व्यय के लिए तीन जिले प्रदान किये गये थे, वह सेना उसी के विरुद्ध काम में लाई जा रही है। अतः कम्पनी उन जिलों को वापिस लौटा दे और उन जिलों से जो राजस्व वसूल किया है, वह भी लौटा दे। इस आदेश से दोनों पक्षों में और अधिक तनाव उत्पन्न हो गया।

ऐसी स्थिति में कलकत्ता कौंसिल ने अपने दो सदस्यों- हे और अमायत को नवाब से वार्त्ता करने के लिये भेजा। नवाब ने कलकत्ता कौंसिल के प्रस्ताव को ठुकरा कर हे को बन्दी बना लिया। इस पर एलिस ने पटना पर आक्रमण करके बाजार को लूट लिया तथा कई लोगों को मार दिया। नवाब के आदमियों के साथ हुई हाथापाई में अमायत मारा गया। मीर कासिम ने सेना भेजकर पटना पर पुनः अधिकार कर लिया तथा एलिस और उसके साथियों को बन्दी बना लिया।

बक्सर युद्ध (1764 ई.)

ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा नवाब मीर कासिम दोनों ही एक दूसरे के विरुद्ध आक्रामक कार्यवाहियाँ कर रहे थे इस कारण दोनों के बीच निर्णायक युद्ध की परिस्थितियां तैयार हो गईं। ऐसा संभव नहीं था कि अँग्रेज बिना खून चूसे रह जायें। उन्हें धन की इतनी अधिक भूख थी कि उसे पाने के लिये वे किसी भी हद तक गिर सकते थे। नवाब उनकी इस अभिलिप्सा में बाधा उत्पन्न कर रहा था इसलिये कलकत्ता कौंसिल ने उसे नवाब के पद से हटाने का निर्णय किया।

मीर कासिम की पराजय

जून 1763 में मेजर एडम्स के नेतृत्व में अँग्रेज सेना मुंगेर की तरफ बढ़ी। 19 जुलाई 1763 को कटवा के निकट मीर कासिम और ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना में युद्ध हुआ जिसमें नवाब की सेना परास्त हो गई। इसके बाद तीन और युद्ध लड़े गये। उन समस्त युद्धों में मीर कासिम परास्त हुआ। अंत में नवाब पटना की तरफ भाग गया। पटना में उसने अँग्रेज बन्दियों और भारतीयों बन्दियों जिनमें राजा रामनारायण, सेठ बन्धु आदि प्रमुख थे, को मौत के घाट उतार दिया और स्वयं अवध चला गया।

मीर जाफर को पुनः नवाबी

मीर कासिम के भाग जाने से जुलाई 1763 में बंगाल के नवाब की गद्दी पुनः खाली हो गई। कलकत्ता कौंसिल ने मीर जाफर के साथ नया समझौता करके उसे दूसरी बार नवाब बनाया। मीर जाफर ने अँग्रेजों की समस्त अनुचित मांगें स्वीकार कर लीं। कम्पनी को जो कुछ हानि हुई थी, उसे भी पूरा करने का वचन दिया।

बंगाल में अराजकता

मीर जाफर पहली बार अपने श्वसुर सिराजुद्दौला से गद्दारी करके नवाब बना था उस समय भी उसने बंगाल का खजाना अँग्रेज अधिकारियों पर लुटा दिया था। दूसरी बार वह अपने जामाता को अपदस्थ किये जाने के बाद नवाब बना। इस बार भी कम्पनी के अधिकारियों ने उसे चूसने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इससे बंगाल में अराजकता मच गई।

इस अराजकता को देखकर स्वयं क्लाइव ने लिखा है- ‘मैं केवल यही कहूंगा कि अराजकता, अस्तव्यस्त्ता, घूसखोरी, भ्रष्टाचार और लूट-खसोट का ऐसा दृश्य बंगाल के अतिरिक्त किसी अन्य देश में कभी देखा या सुना नहीं गया। न ही इस प्रकार की और इतनी बड़ी राशि, इतने अन्यायपूर्ण और लूट खसोट के तरीके से कभी प्राप्त की गई। जब से मीर जाफर को फिर से सूबेदारी दी गई है तब से तीनों प्रांत- बंगाल, बिहार और उड़ीसा जिनसे 30 लाख पौण्ड का निबल राजस्व प्राप्त होता है, कम्पनी के कर्मचारियों के पूर्ण प्रबंध में हैं और असैनिक तथा सैनिक दोनों प्रकार के कर्मचारियों ने हर प्रभावशाली और महत्त्वपूर्ण व्यक्ति, नवाब से लेकर सबसे छोटे जमींदार तक से पैसे ऐंठे हैं।’

क्लाइव का अनुमान था कि कम्पनी और उसके कर्मचारियों ने मीर जाफर से तीन करोड़ रुपये से अधिक की रकम ऐंठी थी।  क्लाइव द्वारा की गई यह अभिव्यक्ति, ग्लानि-युक्त स्वीकरोक्ति समझी जानी चाहिये क्योंकि बंगाल में नवाब से रुपये ऐंठने का खेल उसी ने आरम्भ किया था।

शुजाउद्दौला की गद्दारी

मीर कासिम ने बंगाल से भाग आने के बाद, अवध के नवाब वजीर शुजाउद्दौला की सहायता प्राप्त करने का निश्चय किया। इन दिनों शुजाउद्दौला मुगल बादशाह शाहआलम के साथ इलाहाबाद में था। शुजाउद्दौला और मीर कासिम के मध्य लम्बे समय से अच्छे सम्बन्घ नहीं थे।

शुजाउद्दौला ने अगस्त 1763 में भगोड़े मीर कासिम के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये अँग्रेजों को सहायता देने का प्रस्ताव भी रखा था परन्तु जब मीर कासिम इलाहाबाद पहँुचा तो शुजाउद्दौला का विचार बदल गया। क्योंकि इस समय मीर कासिम के पास दस करोड़ रुपये मूल्य के जवाहरात थे। शुजाउद्दौला इस सम्पत्ति को हड़पना चाहता था।

इसके अलावा मीर कासिम की ओट में वह बंगाल तथा बिहार में अपना प्रभाव बढ़ाने की योजना बनाने लगा। शुजाउद्दौला ने एक ओर तो मीर कासिम का स्वागत किया और दूसरी ओर अँग्रेजों से भी बातचीत जारी रखी। लगभग 6 माह का समय निकल गया। जब अँग्रेजों ने शुजाउद्दौला का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया, तब उसने अँग्रेजों से युद्ध करने का निर्णय लिया।

मुगल बादशाह शाहआलम भी उसके साथ हो गया। बादशाह शाहआलम ने भी दोहरी चाल चली। एक ओर तो वह शुजाउद्दौला के साथ अँग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करने के लिये चल पड़ा और दूसरी ओर उसने गुप्त रूप से अँग्रेजों को लिख भेजा कि वह विवशता में नवाब शुजाउद्दौला का साथ दे रहा है।

शुजाउद्दौला तथा मीर कासिम की पराजय

अँग्रेजों ने बनारस के पूर्व में स्थित बक्सर में शुजाउद्दौला की सेना से लड़ने का निर्णय लिया। सेनापति मुनरो लगभग 8,000 सैनिकों के साथ बक्सर पहुँच गया। शुजाउद्दौला की सेना भी वहाँ पहुँच गई। अँग्रेजों ने युद्ध आरम्भ होने से पहले शुजाउद्दौला के कुछ अधिकारियों- असद खाँ, जैनउल अबीदीन, गुलाम हुसैन खाँ, रोहतास के गवर्नर साहूमल आदि को घूस देकर अपनी तरफ मिला लिया।

23 अक्टूबर 1764 को बक्सर में दोनों पक्षों के मध्य संघर्ष हुआ। तीन घण्टे के युद्ध में अवध की सेना बुरी तरह से परास्त होकर मैदान से भाग खड़ी हुई। युद्ध में अँग्रेजी सेना के 825 सैनिक मारे गये जबकि शुजाउद्दौला के लगभग दो हजार सैनिक मारे गये। इस प्रकार बक्सर युद्ध में शुजाउद्दौला की पराजय हो गई। शुजाउद्दौला भी भाग निकला। अँग्रेजों ने उसका पीछा किया।

जनवरी 1765 में बनारस के निकट शुजाउद्दौला पुनः परास्त हुआ। अँग्रेजों ने चुनार तथा इलाहाबाद के दुर्गों पर अधिकार कर लिया। शुजाउद्दौला ने मराठा सेनापति मल्हारराव होलकर से सहायता प्राप्त की परन्तु अपै्रल 1765 में कड़ा के युद्ध में अँग्रेजों ने उन दोनों को परास्त किया। अन्त में शुजाउद्दौला ने समर्पण कर दिया। मीर कासिम भागकर दिल्ली पहुँचा जहाँ वह 12 वर्ष तक जीवित रहा। 1777 ई. में उसकी मृत्यु हुई।

बक्सर युद्ध का महत्त्व

बक्सर युद्ध मध्यकालीन भारतीय इतिहास का निर्णायक युद्ध था। इसमें अँग्रेजों की निर्णायक विजय हुई। इस युद्ध का महत्त्व प्लासी के युद्ध से भी अधिक है। इससे अँग्रेजों की शक्ति में अत्यंत वृद्धि हुई। मुगल बादशाह शाहआलम और उसका वजीर नवाब शुजाउद्दौला, दोनों परास्त होकर अँग्रेजों की दया पर निर्भर हो गये।

प्लासी के युद्ध में क्लाइव के षड्यन्त्र के कारण, बिना लड़े ही अँग्रेजों को विजय प्राप्त हुई थी परन्तु बक्सर के मैदान में अनुभवी सेनापति शुजाउद्दौला जिसके पास अँग्रेजों की तुलना में पाँच गुना सेना और एक श्रेष्ठ तोपखाना थे, को परास्त होना पड़ा। इससे अँग्रेजों की सैनिक श्रेष्ठता प्रमाणित हो गई और भारतीय शासकों की सैनिक शक्ति का खोखलापन स्पष्ट हो गया।

प्लासी के युद्ध में केवल बंगाल के नवाब के भाग्य का फैसला हुआ था और विजय के परिणामस्वरूप केवल बंगाल के लाभकारी स्रोतों पर कम्पनी का अधिकार हुआ था परन्तु बक्सर युद्ध में भारत की तीन प्रमुख शक्तियों- मुगल बादशाह शाहआलम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के नवाब मीर कासिम के भाग्य का फैसला हुआ। यहां तक कि मल्हारराव होलकर भी अँग्रेजों से परास्त हुआ।

बक्सर विजय के परिणाम स्वरूप, सम्पूर्ण अवध सूबे पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का नियंत्रण हो गया। इससे अँग्रेजों के लिए उत्तरी भारत में साम्राज्य की स्थापना का कार्य सरल हो गया। इस पराजय के बाद अवध के किसी नवाब ने अँग्रेजों का सामना करने का साहस नहीं किया। इस युद्ध का सम्पूर्ण भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा। अब ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक अखिल भारतीय शक्ति बन गई।

प्लासी के युद्ध में कम्पनी ने बंगाल की सेना को परास्त किया था परन्तु बक्सर युद्ध में उसने उत्तरी भारत की सबसे बड़ी सेना को परास्त किया और बाद में अवध तथा मराठों की संयुक्त सेना को परास्त किया। कम्पनी की शानदार सैनिक सफलताओं से भारतीय राजनीति में उसका दबदबा बढ़ गया। अब उसका प्रभाव क्षेत्र बंगाल से दिल्ली तक विस्तृत हो गया। इसीलिए यह कहा जाता है कि बक्सर युद्ध ने प्लासी के अधूरे कार्य को पूरा किया।

ब्रूम ने लिखा है- ‘इस प्रकार प्रसिद्ध बक्सर युद्ध समाप्त हुआ, जिस पर भारत का भाग्य निर्भर था और जितनी बहादुरी से लड़ा गया, परिणामों की दृष्टि से भी उतना ही महत्त्वपूर्ण था।’

अब बंगाल का नवाब कम्पनी के हाथों की कठपुतली था। अवध का नवाब कम्पनी पर निर्भर रहने वाला समर्थक मित्र और मुगल बादशाह उसका पेन्शनर था। जी. बी. मालेसन ने लिखा है- ‘चाहे आप इसे देशी और विदेशियों के बीच द्वंद्व युद्ध समझें या ऐसी एक सारगर्भित घटना जिसका परिणाम स्थाई और विशाल हुआ। बक्सर को सर्वाधिक निर्णायक युद्धों में से माना जाता है।’

क्लाइव की दूसरी गवर्नरी (जून 1765 से जनवरी 1767)

बक्सर विजय के बाद भारत में बदली हुई परिस्थितियों का अधिकतम लाभ उठाने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने राबर्ट क्लाइव को जून 1765 में दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बनाकर भारत भेजा। वह एक अनुभवी अधिकारी था तथा बंगाल की परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझता था।

क्लाइव की समस्याएँ

क्लाइव को अपने दूसरे कार्यकाल में अनेक महत्वपूर्ण राजनीतिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। इनमें से कुछ इस प्रकार थीं-

(1.) मुगल बादशाह और अवध के नवाब के सम्बन्ध में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भावी नीति का निर्णय करना शेष था।

(2.) कम्पनी के आन्तरिक मामलों में बड़े सुधारों की आवश्यकता थी।

(3.) कम्पनी के अधिकारी, कर्मचारी एवं भारतीय गुमाश्तों के निजी व्यापार के कारण कम्पनी के लाभ में कमी आने लगी थी। इस समस्या को सख्ती से सुलझाने की आवश्यकता थी।

(4.) क्लाइव के कलकत्ता पहुँचने के पूर्व ही मीर जाफर की मृत्यु हो गई। उसका पुत्र नज्मुद्दौला अल्पवयस्क था। क्लाइव को इस समस्या का समाधान भी करना था।

समस्याओं का समाधान

(1.) इलाहाबाद की सन्धि (1765 ई.)

1765 ई. में जब क्लाइव कलकत्ता पहुँचा, उस समय दिल्ली, अवध तथा बंगाल के ताज कम्पनी के चरणों में पड़े थे। उन्हें भावी राजनीतिक शिकंजों में कसने के लिये ठोस नीति का निर्माण आवश्यक था ताकि ये शक्तियां समय पाकर फिर से सिर न उठाने लगें।

बक्सर विजय के बाद वेन्सीटार्ट ने शाहआलम को अवध का सूबा देने का आश्वासन दिया था। उसने सोचा था कि यदि कम्पनी की सीमाओं के पास ही मुगल सल्तनत की सेनाएँ रहेंगी तो कम्पनी के हित अधिक सुरक्षित रहेंगे परन्तु क्लाइव का मानना था कि यदि अवध का सूबा कमजोर मुगल बादशाह को सौंपा गया तो मराठे अवध पर निरन्तर धावा मारते रहेंगे और कम्पनी को मराठोें से उलझना पड़ेगा। कौंसिल के कुछ सदस्यों की राय थी कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी को स्वयं दिल्ली तथा अवध पर प्रत्यक्ष अधिकार कर लेना चाहिए। क्लाव की राय इन सदस्यों से अलग थी।

उसके अनुसार इस समय ऐसा करना लाभदायक नहीं था। कम्पनी के पास इतने साधन नहीं थे कि वह इतने बड़े भू-भाग की व्यवस्था कर सके। यदि कम्पनी का मराठों से झगड़ा उठ खड़ा हुआ तो बंगाल, बिहार और उड़ीसा भी उसके हाथ से निकल सकते थे।

एक सुझाव यह भी था कि कम्पनी मुगल बादशाह को उसके भाग्य पर छोड़ दे तथा दिल्ली को उसके अधिकार में बने रहने दे। क्लाइव इस सुझाव से सहमत नहीं था क्योंकि इससे मराठे मुगल सल्तनत पर नियंत्रण कर सकते थे। क्लाइव ने मध्यम मार्ग का अनुसरण किया। 12 अगस्त 1765 को उसने मुगल बादशाह से एक संधि की जिसे इलाहाबाद की सन्धि कहते हैं। इसकी प्रमुख शर्तें इस प्रकार से थीं-

1. अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के जिले छीनकर मुगल बादशाह शाहआलम को सौंप दिये गये।

2. मुगल बादशाह ने एक विशेष फरमान के द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अँग्रेजों को दे दी। एक अन्य फरमान द्वारा मुगल बादशाह ने मीर जाफर के पुत्र नज्मुद्दौला को इन प्रान्तों का नवाब स्वीकार कर लिया।

3. ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने मुगल बादशाह को 26 लाख रुपया प्रतिवर्ष देना स्वीकार कर लिया।

इस प्रकार, इलाहाबाद की सन्धि से कम्पनी को वैधानिक रूप से बंगाल, बिहार और उड़ीसा में मुगल बादशाह के प्रतिनिधि की हैसियत से शासन करने का अधिकार मिल गया। अब वह इन सूबों में अपनी सत्ता मजबूत बनाने का प्रयास करने लगी।

(2.) अवध के नवाब से संधि

क्लाइव ने अवध के नवाब वजीर शुजाउद्दौला के साथ एक पृथक सन्धि की जिसकी प्रमुख शर्तें इस प्रकार से थीं-

1. अवध सूबे के कड़ा और इलाहाबाद जिले मुगल बादशाह को दे दिये गये।

2. चुनार का दुर्ग ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिया गया।

3. शेष जिले फिर से अवध के नवाब को सौंप दिये गये।

4. नवाब वजीर ने कम्पनी को युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में 50 लाख रुपये देने का वचन दिया।

5. नवाब वजीर ने भविष्य में मीर कासिम तथा उसके समर्थकों को सरंक्षण अथवा नौकरी नहीं देने का आश्वासन दिया।

6. बनारस और गाजीपुर, राजा बलवन्तसिंह को पैतृक जागीर के रूप में दिये गये। अँग्रेजों को उसका संरक्षक बनाया गया।

7. नवाब ने अवध सूबे में कम्पनी को निःशुल्क व्यापार करने की सुविधा दी।

8. क्लाइव ने अवध में कुछ फैक्ट्रियाँ स्थापित करने की इच्छा प्रकट की परन्तु शुजाउद्दौला ने इसे स्वीकार नहीं किया। इस शर्त पर क्लाइव ने जोर नहीं दिया।

9. एक पृथक् सन्धि द्वारा कम्पनी ने अवध की सुरक्षा का भार अपने ऊपर ले लिया। अवध के नवाब ने कम्पनी की सैनिक सहायता का व्यय देना स्वीकार कर लिया।

(3.) बंगाल के नवाब से नई संधि

बंगाल, उड़ीसा और बिहार की दीवानी प्राप्त करने के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिये यह आवश्यक हो गया कि वह बंगाल के नवाब से नये सिरे से संधि करे।

इलाहाबाद की सन्धि से कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा से लगान वसूल करने और असैनिक न्याय प्रदान करने के अधिकार मिल गये किंतु निजामत अर्थात् शान्ति-व्यवस्था और फौजदारी न्याय नवाब के अधिकार में रहे। नये समझौते के अनुसार निजामत के कार्य के व्यय के लिए कम्पनी ने नवाब को 53 लाख रुपया वार्षिक देना स्वीकार किया। इस प्रकार, बंगाल में दोहरे शासन की शुरुआत हुई।

इलाहाबाद की सन्धि का मूल्यांकन

इलाहाबाद की सन्धि के सम्बन्ध में विद्वानों ने परस्पर-विरोधी मत व्यक्त किये हैं। सर आयरकूट का मत है कि इस संधि के द्वारा क्लाइव ने दिल्ली, अवध, बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा के विशाल क्षेत्र में विशाल साम्राज्य स्थापित करने का एक शानदार अवसर खो दिया। मृत अथवा निष्क्रिय शासकों को पुनः जीवनदान देना उचित नहीं था।

शुजाउद्दौला को पुनः तख्त पर बैठाने की बजाय, उसे स्वयं अवध पर अधिकार कर लेना चाहिए था और मुगल बादशाह के नाम पर दिल्ली की तरफ बढ़ जाना था, जहाँ वह अपनी सत्ता स्थापित कर सकता था। एक अन्य मत यह है कि क्लाइव ने शाहआलम के साथ बहुत ही कठोर व्यवहार किया।

वेन्सीटार्ट ने उसे अवध का प्रान्त देने का वायदा किया था परन्तु क्लाइव ने वचन का पालन नहीं किया। इन आरोपों के विरुद्ध क्लाइव की दलील यह थी कि वेन्सीटार्ट ने मुगल बादशाह के साथ कोई लिखित समझौता नहीं किया था। इसके अलावा मुगल बादशाह पर ऐसा बोझ डालना अनुचित था, जिसका भार वहन करने की उसमें क्षमता नहीं थी।

वस्तुतः इलाहाबाद की सन्धि क्लाइव की गहरी सूझबूझ का प्रमाण है। बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर कम्पनी ने हाल ही में वैधानिक अधिकार प्राप्त किया था। कम्पनी को अपने राज्य का विस्तार करने के स्थान पर अपने द्वारा शासित क्षेत्र में अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाना आवश्यक था।

कम्पनी के वित्तीय एवं सैनिक संसाधनों पर पहले से ही भारी दबाव था। कम्पनी मुख्यतः एक व्यापारिक संस्था थी, अतः उसके लिए स्वतंत्र रूप से राज्य का निर्माण करना उचित नहीं था। बंगाल की सुरक्षा की समस्या अभी भी बनी हुई थी।

ऐसी स्थिति में नये सैनिक अभियानों से कम्पनी के व्यापार को भारी हानि पहुँच सकती थी। यदि अवध को कम्पनी के अधिकार में ले लिया जाता तो भारत के देशी शासकों में असंतोष उत्पन्न होने की सम्भावना थी। कम्पनी के पास इतने बड़े राज्य का शासन चलाने के लिए योग्य अधिकारियों और कर्मचारियों का भी अभाव था। इन समस्त तथ्यों के आधार पर इलाहाबाद की सन्धि को क्लाइव की महत्त्वपूर्ण सफलता माना जा सकता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – अंग्रेज जाति का भारतीय शक्तियों से संघर्ष

बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

बक्सर युद्ध

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

बसीन की संधि

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

मराठा शक्ति का पतन

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

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बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना की गई। हस व्यवस्था में बंगाल का प्रशानिक प्रबंधन नवाब के हाथों में रहा जबकि भूराजस्व वसूल करने का दायित्व ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ग्रहण कर लिया।

अकबर द्वारा स्थापित मुगल शासन पद्धति के अन्तर्गत बंगाल के सूबे का शासन दो भागों में बँटा हुआ था-

(1) दीवानी शासन- इसके अनतर्गत कर-वसूली और दीवानी न्याय का कार्य सम्मिलित था और

(2) निजामत- इसके अन्तर्गत सूबे में शान्ति व्यवस्था, बाह्य-आक्रमण से रक्षा और फौजदारी न्याय के कार्य सम्मिलित थे।

जिन दिनों मुगलों की केन्द्रीय सत्ता मजबूत रही, बंगाल के सूबेदारों के पास निजामत के अधिकार ही थे, जबकि दीवानी शासन के लिए मुगल बादशाह अपनी तरफ से पृथक् दीवान की नियुक्ति करता था। जब बंगाल का सूबेदार केन्द्रीय सत्ता से स्वतंत्र हो गया तो उसने निजामत और दीवानी, दोनों अधिकार अपने हाथ में ले लिये। फिर भी सैद्धान्तिक रूप से दीवानी के अधिकार अब भी मुगल बादशाह के पास ही थे।

मीर जाफर की मृत्यु के बाद उसके पुत्र नज्मुद्दौला को बंगाल का नवाब बनाया गया। कम्पनी ने शिशु नवाब पर एक नई सन्धि थोप दी, जिसके अनुसार कम्पनी ने 53 लाख रुपया वार्षिक के बदले में निजामत के अधिकार प्राप्त कर लिये। अब नवाब को केवल शान्ति व्यवस्था के लिए आवश्यक सेना रखने की अनुमति दी गई।

नवाब के अधिकारियों की नियुक्ति एवं नियंत्रण का अधिकार भी कम्पनी ने अपने हाथ में ले लिया। नवाब द्वारा निजामत के अधिकार त्यागना वस्तुतः बंगाल में ब्रिटिश राज्य की स्थापना की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम था।

अगस्त 1765 में कम्पनी को मुगल बादशाह की तरफ से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी भी प्राप्त हो गई। यद्यपि मुगल बादशाह स्वयं इस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर निर्भर था परन्तु सैद्धान्तिक और वैधानिक दृष्टि से वह अब भी सम्पूर्ण सल्तनत का बादशाह था। अतः उसके आदेशों ने कम्पनी के कार्यों को वैधानिकता का जामा पहना दिया। इस प्रकार, कम्पनी को बंगाल में निजामत तथा दीवानी, दोनों अधिकार प्राप्त हो गये।

कम्पनी द्वारा हिन्दू शासकों के विरुद्ध षड़यंत्र

इलाहबाद की संधि के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने पूर्वी भारत के प्रमुख हिन्दू शासकों के विरुद्ध षड़यंत्र करके उन्हें हटा दिया। बिहार के शासक रामनारायण सिंह, उड़ीसा के राजा रामसिंह और पूर्णिया के राजा युगलसिंह को उनके पदों से हटा दिया गया। इन शासकों ने अँग्रेजों के विरुद्ध महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई थीं।

बंगाल में द्वैध शासन व्यवस्था

क्लाइव की शासन-व्यवस्था को द्वैध शासन प्रणाली (दोहरा शासन) कहते हैं। क्योंकि कम्पनी ने वास्तविक सत्ता के होते हुए भी सूबे की शासन व्यवस्था को स्पष्टतः अपने हाथों में नहीं लिया। निजामत का कार्य नवाब के हाथों में नहीं रहने दिया गया और इसके लिए कम्पनी ने नवाब को 53 लाख रुपये वार्षिक देना तय किया।

चूँकि सैनिक शक्ति कम्पनी के हाथों में थी, इसलिये वह नवाब की ओर से स्वयं निजामत का कार्य करने लगी। अर्थात् निजामत की सर्वोच्च शक्ति कम्पनी के पास थी परन्तु उत्तरदायित्व नवाब का था। इस प्रकार, सूबे में दो सत्ताओं की स्थापना हुई- एक भारतीय और दूसरी विदेशी। विदेशी सत्ता वास्तविक थी, जबकि भारतीय सत्ता उसकी परछाई मात्र थी।

ऐसा इसलिये किया गया था क्योंकि कम्पनी को बंगाल में शासन करने के लगभग समस्त अधिकार मिल गये परन्तु शासन सम्बन्धी विविध कार्यों को करने के लिये कम्पनी के पास न तो साधन थे, न कर्मचारी। द्वैध शासन प्रणाली के माध्यम से, चतुर क्लाइव ने ऐसी शासन व्यवस्था स्थापित की कि कम्पनी शासन तो करे किंतु उसके ऊपर शासन का उत्तरदायित्व न रहे।

नायब दीवानों की नियुक्ति

क्लाइव का मानना था कि कम्पनी के अधिकारी बंगाल की शासन व्यवस्था की पेचादगियों को नहीं समझ पायेंगे। अतः उसने भारतीय अधिकारियों के माध्यम से दीवानी का काम चलाने का निश्चय किया। उसने दो नायब दीवान नियुक्त किये- एक बंगाल के लिए और दूसरा बिहार के लिए।

बंगाल में मुहम्मद रजा खाँ और बिहार में राजा शिताबराय को नियुक्त किया गया। इस प्रकार कम्पनी ने अपना उत्तरदायित्व भारतीय अधिकारियों पर डाल दिया। कम्पनी का लक्ष्य अधिक-से अधिक आय प्राप्त करना था। भारतीय नायब दीवान, इस उद्देश्य को पूरा करने के उपकरण मात्र थे।

नायब निजाम की नियुक्ति

चूँकि नवाब नज्मुद्दौला अल्पायु था इसलिए उसके कामों की देखभाल के लिए नायब-निजाम की नियुक्ति की गई और इस पद पर भी मुहम्मद रजाखाँ को नियुक्त किया गया जो बंगाल का नायब-दीवान था।

बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना के कारण

द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना के कारण बहुत गहरे थे। इसके पीछे क्लाइव का अब तक का अनुभव एवं चिंतन काम कर रहे थे। वह चारों तरफ से अपने शत्रुओं और विरोधियों से घिरा हुआ था इसलिये उसने बंगाल का शासन अपने हाथ में न लेकर द्वैध शासन प्रणाली को जन्म दिया। इस चिंतन के कारण इस प्रकार से थे-

(1.) क्लाइव को लगता था कि इस व्यवस्था से भारतीयों में कम्पनी के प्रति विद्रोह की भावना उत्पन्न नहीं होगी। उन्हें अनुभव ही नहीं होगा कि कम्पनी ने राजनीतिक सत्ता हथिया ली है।

(2.) क्लाइव को लगता था कि राजनीतिक सत्ता प्रत्यक्ष रूप से हाथ में लेने से भारत में स्थित फ्रांसीसी तथा डच कम्पनियां सुगमता से ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सूबेदारी स्वीकार नहीं करेंगी तथा कम्पनी को वे कर आदि नहीं देंगी जो नवाब के फरमान के अनुसार उन्हें देने होते थे।

(3.) इस व्यवस्था के अभाव में यूरोप में भी इंग्लैण्ड के प्रति अन्य शक्तियों के बीच वैमनस्य और कटुता बढ़ने की संभावना थी।

(4.) कम्पनी का कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने अधिकार में लेने के पक्ष में नहीं था।

(5.) कम्पनी के अँग्रेज अधिकारी इस समूचे क्षेत्र की प्रजा, उसके व्यवहार, भाषा, रीति-रिवाज आदि से परिचित नहीं थे। इस कारण शासन का कार्य चलाने में सफलता का मिलना संदिग्ध था।

(6.) क्लाइव बंगाल के नवाबों को निकम्मा सिद्ध करके उन्हें शासन कार्य से दूर कर देना चाहता था।

(7.) क्लाइव को लगता था कि यदि कम्पनी भारत में किसी क्षेत्र पर शासन का काम अपने हाथ में लेती है तो लंदन की संसद कम्पनी के काम में सीधा हस्तक्षेप करने लगेगी।

बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना के परिणाम

बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली 1765 ई. में आरम्भ होकर 1772 ई. तक चलती रही। 1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्स ने इसे समाप्त किया। बंगाल की जनता के लिये द्वैध शासन प्रणाली के परिणाम अत्यंत विध्वंसकारी सिद्ध हुए।

(1.) द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना के बाद न तो कम्पनी ने और न नवाब ने ही जनता की भलाई की चिंता की।

(2.) कम्पनी के अधिकारी एवं कर्मचारी जनता का भयानक शोषण करने लगे।

(3.) नवाब के अधिकारियों में इतनी शक्ति नहीं रही कि वे जनता को कम्पनी और उसके कर्मचारियों की लूट-खसोट से बचा सकें।

(4.) नवाब के कर्मचारी स्वयं भी जनता को लूटने और खसोटने में लग गये।

(5.) सम्पूर्ण बंगाल कम्पनी के कदमों में आ पड़ा। कम्पनी की मर्जी थी कि वह बंगाल की कितनी ही बुरी गत क्यों न बनाये। कोई विरोध करने वाला नहीं था।

(6.) बंगाल में न्याय व्यवस्था बिल्कुल ठप्प हो गई। चोर, डाकू और लुटेरों का आतंक बढ़ गया।

(7.) राज्य में भू-राजस्व संग्रह का कार्य प्रति वर्ष अधिक से अधिक बोली लगाने वाले को दिया जाने लगा। इससे मनमाना राजस्व वसूल किया जाने लगा। इस कारण बहुत से किसान खेती-बाड़ी छोड़कर भाग गये और बंगाल का उपजाऊ प्रदेश उजाड़ और बंजर होने लगा।

(8.) व्यापार-वाणिज्य की अवनति हुई। कम्पनी के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने कम्पनी का व्यापार बढ़ाने की बजाये अपना व्यापार बढ़ाया। इससे भारतीय व्यापारियों की कमर टूट गई। स्वयं क्लाइव ने माना कि कम्पनी के अधिकारी और कर्मचारी कम्पनी के लिये व्यापार न करके सम्प्रभु व्यापारी की तरह व्यापार करते थे। उन्होंने हजारों भारतीय व्यापारियों के मुँह की रोटी छीन ली।

(9.) कम्पनी ने बंगाल के रेशम उद्योग को हतोत्साहित किया। अब अँग्रेज रेशम के कपड़ों के स्थान पर कच्चा रेशम खरीदते थे। जो भारतीय जुलाहे, रेशम का कपड़ा बुनते थे, उनका शारीरिक उत्पीड़न किया गया।

(10.) भारतीय जुलाहों को विवश किया गया कि वे अपना काम न करके कम्पनी के लिये कपड़ा बुनें।

(11.) 1770 ई. में बंगाल में भयानक दुर्भिक्ष पड़ा। सरकार की ओर से जनता की कोई सहायता नहीं की गई। इस कारण बंगाल की एक तिहाई जनसंख्या भूख और बीमारी से नष्ट हो गई किंतु द्वैध शासन होने के कारण न तो नवाब ने और न कम्पनी ने प्रजा की सहायता की।

(12.) भारत का धन तेजी से इंग्लैण्ड की ओर प्रवाहित होने लगा। एक अनुमान के अनुसार 1766 से 1768 ई. के तीन सालों में बंगाल से 57 लाख पौण्ड की विपुल राशि लंदन ले जाई गई।

(13.) बंगाल में मची लूट से उत्साहित होकर इंग्लैण्ड की सरकार ने 1767 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से इस लूट में अपना हिस्सा मांगा तथा कम्पनी को निर्देश दिये कि वह प्रति वर्ष सरकार को 4 लाख पौण्ड दे।

रॉबर्ट क्लाइव की सफलताओं एवं कार्यों का मूल्यांकन

रॉबर्ट क्लाइव का जन्म 1725 ई. में इंग्लैण्ड में मार्केट ड्रायटन के समीप एक सामान्य परिवार में हुआ। वह बहुत ही साधारण प्रतिभा का बालक था। उसे एक के बाद एक चार स्कूलों में पढ़ने भेजा गया परन्तु वह पढ़ने-लिखने में विशेष प्रगति नहीं कर सका। 17 वर्ष की आयु में उसे ईस्ट इण्डिया कम्पनी में क्लर्क के पद पर रख लिया गया।

1744 ई. के अन्तिम दिनों में वह इंग्लैण्ड से मद्रास पहुँचा। उसे क्लर्की का काम बिन्कुल पसन्द नहीं था इसलिये उसने तंग आकर आत्महत्या करने का विचार किया परन्तु अर्काट के घेरे ने उसके भाग्य को बदल दिया। वह क्लर्क से सैनिक और फिर सेनापति और अंत में बंगाल का गवर्नर बन गया।

एक सामान्य नागरिक से वह एक सम्पन्न व्यक्ति बन गया। इंग्लैण्ड की सरकार ने उसकी सेवाओं के लिये उसे लॉर्ड की उपाधि से विभूषित किया। क्लाइव एक साहसी सैनिक, कुशल कूटनीतिज्ञ एवं परिश्रमी व्यक्ति था। साथ ही वह झूठा, धोखेबाज, रिश्वतखोर तथा षड्यन्त्रकारी भी था। यही कारण था कि भारत में अँग्रेजी राज्य की स्थापना में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

क्लाइव की सफलताएँ     

क्लाइव ने बुद्धिमत्तापूर्ण सैनिक योजनाओं के स्थान पर, दृढ़ संकल्प शक्ति एवं दिलेरी से बड़े कार्य सम्पादित किये जिनसे भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सका। उसके द्वारा मुख्यतः निम्नलिखित सफलताएं अर्जित की गईं-

(1.) 1751 ई. में उसके द्वारा अर्काट युद्ध में विजय प्राप्त की गई और अर्काट की सुरक्षा का सुचारू रूप से प्रबंध किया गया।

(2.) दक्षिण भारत में उसने फ्रैंच गवर्नर डुप्ले की समस्त योजनाओं को प्रभावहीन कर दिया।

(3.) उसने कलकत्ता पर पुनः अधिकार किया तथा प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला को परास्त किया।

(4.) अपनी प्रथम गवर्नरी के समय उसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखी, तो दूसरी गवर्नरी के काल में एक चतुर एवं दूरदर्शी राजनीतिज्ञ की भाँति उस नींव को मजबूत बनाया।

(5.) क्लाइव ने तात्कालिक प्रलोभनों में न फँसकर उचित अवसर की प्रतीक्षा करना अधिक ठीक समझा। राज्य विस्तार के कार्य में हड़बड़ी दिखाने के स्थान पर धैर्यपूर्वक कम्पनी की स्थिति को मजबूत बनाया।

(6.) क्लाइव ने कम्पनी को शासक की भूमिका में लाने के स्थान पर, शासकों को नियुक्त करने वाला बनाया। मुगल बादशाह शाहआलम और अवध के नवाब वजीर के साथ किये गये समझौते इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। बंगाल, बिहार और उड़ीसा में पूर्ण शासन सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद भी प्रत्यक्षतः उत्तरदायित्व न सम्भालना, उसकी कूटनीतिक प्रतिभा का परिचायक है।

(7.) बंगाल में उसके प्रशासनिक सुधारों के विरोध में अँग्रेज अधिकारियों ने सामूहिक त्याग-पत्र दे दिये। इस पर भी वह अपने निश्चय से नहीं डिगा। न ही उसने किसी से प्रतिशोध लेने का प्रयास किया।

क्लाइव की कमजोरियाँ

लॉर्ड क्लाइव के चरित्र में कई कमजोरियां भी थीं। वह साधनों के औचित्य के स्थान पर लक्ष्य की प्राप्ति को आवश्यक समझता था। इस कारण उसमें नैतिकता का अभाव था। सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड्यन्त्र रचना और जाली सन्धि-पत्र तैयार करवाकर अमीचन्द को धोखा देना उसके निम्न नैतिक स्तर को स्पष्ट करते हैं।

व्यक्तिगत रूप से वह अत्यधिक लोभी तथा धन का भूखा था। जब उसे दूसरी बार गवर्नर बनाकर बंगाल में भेजा गया तो उसे कम्पनी के प्रशासन में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के आदेश दिये गये। क्लाइव ने इस दिशा में कुछ कदम भी उठाये परन्तु वह स्वयं पर संयम न रख सका। उस ने भारतीयों से कीमती भेंटें तथा घूस लेने की प्रथा आरम्भ की।

कुछ इतिहासकार उसे योग्य सेनानायक होना स्वीकार नहीं करते। उसे योग्य शासक भी नहीं माना जाता। के. एम. पाणिक्कर का मत है कि 1765 से 1772 ई. तक कम्पनी द्वारा स्थापित बंगाल का राज्य एक डाकू-राज्य था। क्लाइव ने समस्याओं के जो हल निकाले, वे स्थायी न होकर अस्थायी थे।

क्लाइव का अंत

1767 ई. में क्लाइव इंग्लैण्ड चला गया। कुछ समय बाद उसे हाउस ऑफ कॉमन्स का सदस्य चुना गया। इंग्लैण्ड की संसद में क्लाइव की कटु आलोचना एवं निन्दा की गई। उस पर भ्रष्टाचार तथा जालसाजी करने के आरोप लगाये गये। क्लाइव ने इन आरोपों को स्वीकार कर लिया परन्तु यह भी स्पष्ट कर दिया कि उसने यह, अपने देश की भलाई के लिए किया।

अन्त में संसद ने क्लाइव को समस्त आरोपों से मुक्त कर दिया और उसकी सेवाओं की प्रशंसा की गई परन्तु इस कार्यवाही से क्लाइव को गहरा सदमा पहुँचा। उसने मानसिक संतुलन खोकर नवम्बर 1774 में उस्तरे से गला काटकर आत्महत्या कर ली। इस प्रकार उसके जीवन का अन्त हुआ।

अँग्रेजी इतिहासकारों द्वारा क्लाइव का मूल्यांकन

लगभग समस्त अँग्रेज इतिहासकारों ने क्लाइव के कार्यों एवं सफलताओं की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। इतिहासकार पिट्स ने अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दों में उसकी स्तुति करते हुए उसे स्वर्ग में जन्मा सेनानायक बताया है। चेथम ने उसे ईश्वर द्वारा भेजा गया सेनापति बताया।

मैकाले ने लिखा है- ‘हमारे टापू ने शायद ही ऐसे व्यक्ति को जन्म दिया हो जो युद्ध और विचार-विमर्श में उससे बढ़कर हो।’ क्लाइव की उपलब्धियों की चर्चा करते हुए बर्क ने कहा है- ‘उसने महान् कार्यों की नींव डाली…… उसने उस गहरे पानी में प्रवेश किया जिसके तल का भी पता न था। उसने अपने उत्तराधिकारियों के लिए एक पुल का निर्माण किया, जिस पर लंगड़े चल सकते थे और अन्धे भी अपना मार्ग खोज सकते थे।’

वेरेलस्ट तथा कार्टियर

क्लवाइव के बाद वेरेलस्ट (1767-1769 ई.) तथा कार्टियर (1769-1772 ई.) बंगाल के गवर्नर रहे। इस दौरान 1770 ई. में बंगाल में भयानक दुर्भिक्ष पड़ा जिसमें बंगाल की एक तिहाई जनसंख्या समाप्त हो गई। दुर्भिक्ष के बाद ज्वर तथा चेचक का प्रकोप फैला। प्रतिदिन हजारों शव हुगली नदी में बहाये जाने लगे किंतु द्वैध शासन होने के कारण न तो नवाब ने और न कम्पनी ने जनता की सहायता की। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ऐसे भयानक समय में भी बंगाल से चावल एकत्रित करके अधिक मूल्य पर बंगाल से बाहर बेचती रही।

वारेन हेस्टिंग्ज (1772-1785 ई.)

कार्टियर के बाद वारेन हेस्टिंग्ज बंगाल का गवर्नर नियुक्त हुआ। उसने मुगल बादशाह शाहआलम की 26 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन बंद कर दी क्योंकि वह मराठों की शरण में चला गया था। हेस्टिंग्ज ने बंगाल के नवाब की 32 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन घटाकर 16 लाख रुपये कर दी।

शाहआलम से कड़ा और इलाहाबाद के इलाके छीनकर 50 लाख रुपये में अवध के नवाब को दे दिये। द्वैध शासन व्यवस्था के कारण बंगाल में पहले से ही अराजकता फैली हुई थी किंतु अकाल ने स्थिति और भयावह बना दी। उसके समय में भी कम्पनी के अधिकारियों एवं कर्मचारियों में भ्रष्टाचार अपने चरम पर बना रहा।

बंगाल का शोषण उसी भांति होता रहा। जब वह इंग्लैण्ड लौट कर गया तो उस पर ब्रिटिश संसद में भ्रष्टाचरण का मुकदमा चला। सांसद एडमण्ड बु्रक पूरे दो दिन तक हेस्टिंग्स पर लगाये गये आरापों को संसद में पढ़कर सुनाता रहा। सात साल तक यह मुकदमा चलता रहा। इसे लड़ने में हेस्टिंग्स बर्बाद हो गया।

मुकदमे की कार्यवाही के दौरान हेस्टिंग्स को कहना पड़ा कि यदि उसने आरोप स्वीकार कर लिये होते तो उसे कम नुक्सान उठाना पड़ता। अंत में संसद ने उसे समस्त आरोपों से मुक्त कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – अंग्रेज जाति का भारतीय शक्तियों से संघर्ष

बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

बक्सर युद्ध

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

बसीन की संधि

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

मराठा शक्ति का पतन

बसीन की संधि (1802 ई.)

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बसीन की संधि

बसीन की संधि ई.1802 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा अपदस्थ पेशवा बाजीराव (द्वितीय) के बीच हुई। इस संधि के बाद से ही मराठा शक्ति का पतन आरम्भ हो गया तथा कुछ ही वषोँ में मराठे सहायक संधियों के माध्यम से कम्पनी सरकार के अधीन हो गए।

मराठों में परस्पर संघर्ष

पेशवा बाजीराव (द्वितीय) (1796-1851 ई.) अयोग्य व्यक्ति था। उसके समय में नाना फड़नवीस शासन का कार्य संभालता था। 13 मार्च 1800 को नाना फड़नवीस की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद मराठा सरदारों में परस्पर संघर्ष प्रारम्भ हो गये।

दो मराठा सरदारों- ग्वालियर के दौलतराव सिन्धिया तथा इन्दौर के यशवंतराव होलकर के बीच इस विषय को लेकर प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न हो गयी कि पेशवा पर किसका प्रभाव रहे। पेशवा बाजीराव (द्वितीय) किसी शक्तिशाली मराठा सरदार का संरक्षण चाहता था। अतः उसने दौलतराव सिन्धिया का संरक्षण स्वीकार कर लिया। बाजीराव  तथा सिन्धिया ने होलकर के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बना लिया।

होलकर के लिये यह स्थिति असहनीय थी। इस कारण 1802 ई. के प्रारम्भ में सिन्धिया एवं होलकर के बीच युद्ध छिड़ गया। जब होलकर मालवा में सिन्धिया की सेना के विरुद्ध युद्ध में व्यस्त था, तब पेशवा ने पूना में होलकर के भाई बिट्ठूजी की हत्या करवा दी। होलकर अपने भाई की हत्या का बदला लेने पूना की ओर चल पड़ा।

होलकर ने पूना के निकट पेशवा और सिन्धिया की संयुक्त सेना को परास्त किया और एक विजेता की भाँति पूना में प्रवेश किया। होलकर ने राघोबा के दत्तक पुत्र अमृतराव के बेटे विनायकराव को पेशवा घोषित कर दिया। इस पर पेशवा बाजीराव (द्वितीय) भयभीत होकर बसीन (बम्बई के पास अँग्रेजों की बस्ती) चला गया।

बसीन में उसने वेलेजली से प्रार्थना की कि वह उसे पुनः पेशवा बनाने में सहायता दे। वेलेजली भारत में कम्पनी की सर्वोपरि सत्ता स्थापित करना चाहता था। मैसूर की शक्ति को नष्ट करने के बाद अब मराठे ही उसके एकमात्र प्रतिद्वन्द्वी रह गये थे। अतः वह मराठा राजनीति में हस्तक्षेप करने का अवसर ढूंढ रहा था। पेशवा द्वारा प्रार्थना करने पर वेलेजली को यह अवसर मिल गया।

बसीन की संधि (1802 ई.)

लॉर्ड वेलेजली ने पेशवा बाजीराव (द्वितीय) के समक्ष शर्त रखी कि यदि वह सहायक सन्धि स्वीकार कर ले तो उसे पुनः पेशवा बनाने में सहायता दी जा सकती है। पेशवा ने वेलेजली की शर्त को स्वीकार कर लिया। 31 दिसम्बर 1802 को पेशवा और कम्पनी के बीच बसीन की सन्धि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

(1.) पेशवा अपने राज्य में 6,000 अँग्रेज सैनिकों की एक सेना रखेगा तथा इस सेना के खर्चे के लिए 26 लाख रुपये वार्षिक आय का भू-भाग अँग्रेजों को देगा।

(2.) पेशवा बिना अँग्रेजों की अनुमति के मराठा राज्य में किसी अन्य यूरोपियन को नियुक्ति नहीं देगा और न अपने राज्य में रहने की अनुमति देगा।

(3.) पेशवा सूरत पर से अपना अधिकार त्याग देगा।

(4.) निजाम और गायकवाड़ के विरुद्ध पेशवा के झगड़ों के पंच निपटारे का कार्य कम्पनी द्वारा किया जायेगा।

(5.) पेशवा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी देशी राज्य के साथ सन्धि, युद्ध अथवा पत्र-व्यवहार नहीं करेगा।

बसीन की सन्धि का महत्त्व

बसीन की सन्धि के द्वारा पेशवा ने मराठों के सम्मान एवं स्वतंत्रता को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों बेच दिया, जिससे मराठा शक्ति को भारी धक्का लगा। सिडनी ओवन ने लिखा है- ‘इस सन्धि के पश्चात् सम्पूर्ण भारत में, कम्पनी का राज्य स्थापित हो गया।’

अँग्रेज इतिहासकारों ने इस सन्धि का महत्त्व आवश्यकता से अधिक बताया है। इस सन्धि का सबसे बड़ा दोष यह था कि अब अँग्रेजों का मराठों से युद्ध होना प्रायः निश्चित हो गया, क्योंकि वेलेजली ने मराठों के आन्तरिक झगड़ों को तय करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया था।

वेलेजली ने कहा था कि इससे शान्ति तथा व्यवस्था बनी रहेगी किन्तु इस संधि के बाद सबसे व्यापक युद्ध हुआ। वेलेजली ने सन्धि का औचित्य बताते हुए कहा था कि अँग्रेजों को मराठों के आक्रमण का भय था किन्तु जब मराठे स्वयं अपने झगड़ों में उलझे हुए थे, तब फिर अँग्रेजों पर आक्रमण करने का प्रश्न ही नहीं था।

वास्तविकता यह थी कि वेलेजली भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करने पर तुला हुआ था और वह मराठों को ऐसी सन्धि में उलझा देना चाहता था, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का मार्ग खुल जाये। अतः बसीन की सन्धि ने ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – अंग्रेज जाति का भारतीय शक्तियों से संघर्ष

बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

बक्सर युद्ध

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

बसीन की संधि

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

मराठा शक्ति का पतन

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

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प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध

18 मई 1775 को अँग्रेजों एवं मराठों के बीच अरास नामक स्थान पर प्रथम आंग्ल.मराठा युद्ध हुआ जिसमें मराठे परास्त हुए और मराठा शक्ति को बड़ा धक्का लगा।

छत्रपति शिवाजी (1646-1680 ई.) ने मराठा शक्ति को संगठित करने का काम किया। औरंगजेब जैसा शक्तिशाली मुगल बादशाह भी मराठा शक्ति का दमन नहीं कर सका। छत्रपति शाहू के शासन काल में पेशवाओं के नेतृत्व में मराठों ने उत्तर भारत में अपना वर्चस्व स्थापित किया।

इससे मराठा संगठन अपनी उन्नति के चरम पर पहुँच गया। इस वर्चस्व को बनाये रखने के लिये ई.1761 में मराठों को अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली से टक्कर लेनी पड़ी। पानीपत के मैदान में दोनों शक्तियों में भीषण युद्ध हुआ, जिसमें मराठों की निर्णायक पराजय हुई। सर जादुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘पानीपत का युद्ध एक निर्णायक युद्ध था। मराठा सेना की मुकुट मणि वहीं गिर गई।’

इस युद्ध के बाद अहमदशाह अब्दाली वापस अफगानिस्तान लौट गया। इस कारण वह पानीपत की जीत का राजनीतिक लाभ नहीं उठा सका। मेजर इवान्स बेल ने लिखा है– ‘यद्यपि इस युद्ध में मराठों की पराजय हुई तथापि विजयी अफगान वापस चले गये और उन्होंने फिर कभी भारत के मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया।’

निःसंदेह मराठों ने उल्लेखनीय क्षति उठायी किंतु उन्होंने बहुत कम समय में इस क्षति को पूरा कर लिया। मराठा इतिहासकार जी. एस. सरदेसाई का मत है– ‘इसमें संदेह नहीं कि जहाँ तक जनशक्ति का सम्बन्ध है, उन्हें (मराठों को) इस युद्ध से भारी क्षति पहुँची; पर इसके अतिरिक्त मराठों के भाग्य पर इस विपत्ति का वस्तुतः कोई प्रभाव नहीं पड़ा। नई पीढ़ी के लोग शीघ्र ही पानीपत में होने वाली क्षति की पूर्ति करने के लिए उठ खड़े हुए।’

पेशवा माधवराव (प्रथम) (1761-1772 ई.) ने मराठों में पुनः उत्साह एवं अनुशासन स्थापित किया। उसने शीघ्र ही पानीपत की पराजय का दाग धो दिया। उसके नेतृत्व में मराठा पुनः उतने ही शक्तिशाली बन गये जितने पानीपत के युद्ध से पूर्व थे किन्तु 18 नवम्बर 1772 ई. को उसकी मृत्यु हो गई।

मराठों के लिए उसकी मुत्यु पानीपत से भी अधिक घातक सिद्ध हुई। पेशवा माधवराव (प्रथम) की मृत्यु के बाद मराठा शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई और मराठा दरबार षड्यन्त्रों का अड्डा बन गया। मराठा सरदार स्वतंत्र आचरण करने लगे और उनमें भारी फूट पड़ गई। अँग्रेजों ने मराठों की फूट से लाभ उठाने का निर्णय लिया।

1772 ई. में भारत के राजनीतिक रंगमंच पर केवल दो शक्तियाँ- मराठा और ईस्ट इण्डिया कम्पनी, सर्वोच्चता प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील थीं। अतः इन दोनों शक्तियों में संघर्ष होना अवश्यम्भावी था।

रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 ई.

1773 ई. में ब्रिटिश संसद ने रेग्यूलेटिंग एक्ट पारित किया जिसके माध्यम से बम्बई और मद्रास प्रेसीडेन्सियों पर बंगाल के गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल का नियन्त्रण स्थापित किया गया। कौंसिल के प्रत्येक सदस्य को मत देने का समान अधिकार था। मतों की संख्या बराबर होने की स्थिति में गवर्नर जनरल को अतिरिक्त मत देने का अधिकार था। कौंसिल के तीन सदस्य गवर्नर जनरल से व्यक्तिगत शत्रुता रखते थे। इस कारण गवर्नर जनरल कौंसिल में कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं करवा पाता था।

अँग्रेजों की मराठा नीति

गवर्नर जनरल के अधिकार एवं शक्तियां स्पष्ट नहीं होने से दोनों प्रेसीडेन्सियों के अधिकारी स्वछन्द होकर कार्य करने लगे। दक्षिण व मध्य भारत की ऐसी कोई शक्ति नहीं थी, जिनसे उन्होंने झगड़ा मोल न ले रखा हो। बम्बई प्रेसीडेन्सी के गवर्नर की स्वच्छन्द प्रवृत्ति के कारण ही अँग्रेजों को मराठों से संघर्ष करना पड़ा। मराठों के सम्बन्ध में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने एक नीति तैयार की जिसके तीन प्रमुख भाग थे-

(1.) उन दिनों दक्षिण में मुख्य रूप से तीन शक्तियाँ कार्यरत थीं- हैदराबाद का निजाम, महाराष्ट्र के मराठा और मैसूर का हैदरअली। यदि ये तीनों शक्तियां अँग्रेजों के विरुद्ध एक हो जातीं तो दक्षिण में अँग्रेजों का अस्तित्त्व समाप्त हो सकता था। अतः अँग्रेज चाहते थे कि ये तीनों शक्तियाँ आपस में लड़ती रहें।

(2.) दक्षिण की इन तीनों शक्तियों में मराठा सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी थे। अतः अँग्रेजों ने तय किया कि मराठों को घरेलू झगड़ों में फँसाये रखना चाहिये, ताकि बंगाल व उत्तर भारत में अँग्रेजों के बढ़ते हुए प्रभाव में उन्हें हस्तक्षेप करने का अवसर न मिल सके।

(3.) दक्षिण भारत के पश्चिमी तट पर अपने पैर फैलाने के लिए सालसेट, बसीन व गुजरात का कुछ भाग कम्पनी को अपने अधिकार में कर लेना चाहिए।

आंग्ल-मराठा सम्बन्ध

मुगल शक्ति के पतन के बाद उत्तर भारत में उत्पन्न हुई रिक्तता को मराठे तेजी से भरते जा रहे थे। अँग्रेज उनके प्रभाव को रोकना चाहते थे किंतु 18वीं शताब्दी के मध्य तक अँग्रेजों के पास इतनी शक्ति नहीं थी कि वे मराठों का सामना कर सकें। अतः कम्पनी इस बात का ध्यान रखती थी कि वह ऐसा कोई कार्य न करे, जिससे मराठों से संघर्ष करना पड़े।

फिर भी वह निजाम, हैदरअली तथा मराठों को एक दूसरे के विरुद्ध उकसाने का कार्य करती रही। 1758 ई. में अँग्रेजों व मराठों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार अँग्रेजों ने मराठों से दस गाँव तथा मराठा क्षेत्र में कुछ व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त कीं। 1759 ई. में ब्रिटिश अधिकारी प्राइस व थामस मॉट्सन पूना गये।

इन दोनों का उद्देश्य मराठों से सालसेट व बसीन प्राप्त करना था किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। पानीपत में मराठों की पराजय ने अँग्रेजों को पुनः प्रोत्साहित किया तथा 1767 ई. में थामस मॉट्सन को पुनः पूना भेजा गया। इस बार भी सालसेट एवं बसीन के सम्बन्ध में कोई समझौता नहीं हो सका।

पेशवा माधवराव (प्रथम), मैसूर के शासक हैदरअली के विरुद्ध अँग्रेजों की सहायता प्राप्त करना चाहता था किन्तु कम्पनी इस प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। फिर भी मॉट्सन ने पेशवा को आश्वासन दिया कि कम्पनी मराठों से कभी युद्ध नहीं करेगी और यदि कोई तीसरी शक्ति मराठों से युद्ध करती है तो कम्पनी मराठों के विरुद्ध उस तीसरी शक्ति को सहायता नहीं देगी।

18 नवम्बर 1772 को पेशवा माधवराव (प्रथम) की मृत्यु हो गयी। उसके कोई सन्तान नहीं थी, अतः उसका भाई नारायणराव (1772-1773 ई.) पेशवा की मनसब पर बैठा। नारायण का चाचा राघोबा (रघुनाथ) स्वयं पेशवा बनना चाहता था।

अतः राघोबा ने अपनी पत्नी आनन्दीबाई के सहयोग से 13 अगस्त 1773 को नारायणराव की हत्या करवा दी और अपने आपको पेशवा घोषित कर दिया। बालाजी जनार्दन ने राघोबा की इस कार्यवाही का विरोध किया। बालाजी जनार्दन को नाना फड़नवीस के नाम से जाना जाता है।

नाना फड़नवीस के नेतृत्व में मराठों ने बाराभाई संसद का निर्माण किया और शासन-प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया। उनके सामने समस्या यह थी कि पेशवा किसे बनाया जाये? जिस समय नारायणराव की मृत्यु हुई थी, उस समय उसकी पत्नी गंगाबाई गर्भवती थी।

18 अपै्रल 1774 को उसने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम माधवराव (द्वितीय) रखा गया। बाराभाई संसद ने माधवराव (द्वितीय) को पेशवा घोषित कर दिया तथा नाना फड़नवीस को उसका संरक्षक नियुक्त कर दिया। बाराभाई संसद ने राघोबा को बंदी बनाने के आदेश दिये। इस पर राघोबा ने दिसम्बर 1774 में थाणे पर आक्रमण कर दिया किन्तु परास्त होकर भाग खड़ा हुआ।

सूरत की सन्धि (1775 ई.)

राघोबा भागकर बम्बई गया। उसने बम्बई कौंसिल के अध्यक्ष हॉर्नबाई से बातचीत की। इस बातचीत के बाद कम्पनी की बम्बई शाखा और राघोबा के बीच 6 मार्च 1775 को एक सन्धि हुई जिसे सूरत की सन्धि कहते हैं। इस सन्धि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

(1.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी राघोबा को पेशवा बनाने में सहायता करेगी।

(2.) राघोबा कम्पनी की बम्बई शाखा को थाणे, बसीन, सालसेट व जम्बूसर (गुजरात) के प्रदेश देगा।

(3.) राघोबा की सुरक्षा के लिए 2500 अँग्रेज सैनिक पूना में रखे जायेंगे जिनका खर्च सवा लाख रुपये वार्षिक के हिसाब से राघोबा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी को देगा।

(4.) राघोबा अपनी सुरक्षा के बदले कम्पनी की बम्बई शाखा को छः लाख रुपये वार्षिक देगा।

(5.) यदि राघोबा पूना से कोई संधि या समझौता करेगा तो उसमें अँग्रेजों को भी सम्मिलित करेगा।

रेगुलेटिंग एक्ट के अनुसार ईस्ट इण्डिया कम्पनी की बम्बई शाखा राघोबा से किसी तरह की संधि करने के लिये अधिकृत नहीं थी। बम्बई शाखा ने यह सन्धि गवर्नर जनरल से पूछे बिना की थी। सन्धि के पश्चात् हॉर्नबाई ने पत्र लिखकर इसकी सूचना गवर्नर जनरल को भेज दी।

इस सन्धि के कारण अँग्रेज व मराठों के संघर्षों का सूत्रपात हुआ तथा मॉट्सन ने मराठों को जो आश्वासन दिया था, उसे इस सन्धि द्वारा तोड़ दिया गया। राघोबा ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण सम्पूर्ण मराठा जाति की प्रतिष्ठा का बलिदान कर दिया।

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

सूरत की सन्धि के बाद बम्बई सरकार ने राघोबा की सहायता हेतु एक सेना भेजी। अँग्रेजी सेनाएँ पूना की ओर बढ़ीं। 18 मई 1775 को अँग्रेजों एवं मराठों के बीच अरास नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें मराठे परास्त हुए। अँग्रेजों ने सालसेट पर अधिकार कर लिया किन्तु इसी समय बंगाल कौंसिल ने हस्तक्षेप किया। क्योंकि बम्बई सरकार ने यह समझौता बिना बंगाल कौंसिल की स्वीकृति से किया था। बंगाल कौंसिल ने सूरत की सन्धि को अस्वीकार करके मराठों के विरुद्ध चल रहे युद्ध को बंद करने का आदेश दिया। ऐसा करने के कई कारण थे-

(1.) यह सन्धि राघोबा द्वारा हस्ताक्षरित थी और वह उस समय पेशवा नहीं था।

(2.) सूरत की सन्धि से कम्पनी को अनावश्यक युद्ध में भाग लेना पड़ा था।

(3.) मराठा शक्ति से अँग्रेजों को कोई क्षति नहीं हुई थी, अतः उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं था।

(4.) यह सन्धि रेग्यूलेटिंग एक्ट के विरुद्ध थी।

पुरन्दर की संधि (1776 ई.)

यद्यपि बंगाल कौंसिल ने युद्ध बन्द करने का आदेश दिया था, फिर भी युद्ध बन्द नहीं हुआ। तब बंगाल कौंसिल ने कर्नल अप्टन को मराठों से बातचीत करने पूना भेजा। अप्टन के पूना पहुँचने पर युद्ध बन्द हो गया। पूना में अप्टन और मराठों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गये, क्योंकि अप्टन ने राघोबा को सौंपने से इन्कार कर दिया।

साथ ही अप्टन, सालसेट व बसीन पर अधिकार बनाये रखना चाहता था। अतः यह वार्त्ता असफल हो गई और युद्ध पुनः चालू हो गया। मराठों ने युद्ध में बड़ी वीरता दिखाई किन्तु दुर्भाग्य से पेशवा का विद्रोही मराठा सरदार सदाशिव एक दूसरे मोर्चे पर मराठों के विरुद्ध आ धमका।

मराठे दो मोर्चों पर युद्ध नहीं कर सके और उन्होंने अँग्रेजों से सन्धि करने हेतु प्रार्थना की। अँग्रेजों ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। 1 मार्च 1776 को दोनों पक्षों में एक संधि हुई जिसे पुरन्दर की सन्धि कहते हैं। इस सन्धि की मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं-

(1.) कम्पनी ने शिशु माधवराव (द्वितीय) को पेशवा तथा नाना फड़नवीस को उसका संरक्षक मान लिया।

(2.) अँग्रेजों ने राघोबा से युद्ध करने पर जो राशि खर्च की है, उसके लिए मराठा, अँग्रेजों को 12 लाख रुपये देंगे।

(3.) सूरत की सन्धि को रद्द कर दिया गया।

(4.) मराठों ने राघोबा को 3 लाख 15 हजार रुपये वार्षिक पेंशन देना स्वीकार कर लिया।

(5.) राघोबा कोई सेना नहीं रखेगा तथा गुजरात के कोपर गाँव में जाकर रहेगा।

(6.) कम्पनी ने मराठों से सालसेट तथा बम्बई के निकट जो टापू प्राप्त किये हैं वे कम्पनी के पास ही रहेंगें।

इस सन्धि पर मराठों की ओर से सुखराम बापू ने तथा अँग्रेजों की ओर से कर्नल अप्टन ने हस्ताक्षर किये किन्तु बम्बई सरकार तथा वारेन हेस्टिंग्ज इस सन्धि को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वारेन हेस्टिंग्स ने इस संधि को कागज का एक टुकड़ा कहा। इसी बीच मराठों ने विद्रोही सदाशिव राव भाऊ को पकड़कर उसकी हत्या कर दी।

अब मराठे अँग्रेजों से निपटने के लिए तैयार थे। स्थिति उस समय और अधिक जटिल बन गई, जब 1778 ई. में एक फ्रांसीसी राजदूत सैण्ट लूबिन, फ्रांस के बादशाह का पत्र लेकर मराठा दरबार में पहुँचा। मराठों ने उसका शानदार स्वागत किया किन्तु जब अँग्रेज राजदूत मॉट्सन पूना पहुँचा तो उसका विशेष स्वागत नहीं किया गया।

अतः यह अफवाह फैल गई कि मराठों एवं फ्रांसीसियों में सन्धि हो गई है। उधर मॉट्सन ने मराठा दरबार के मंत्री मोरोबा को अपनी ओर मिलाकर नाना फड़नवीस और सुखराम बापू में फूट डलवा दी। सुखराम बापू, जिसने पुरन्दर की संधि  पर हस्ताक्षर किये थे, विद्रोही हो गया।

उसने गुप्त रूप से बम्बई सरकार को लिखा कि वह राघोबा को पेशवा बनाने में सहायता देने को तैयार है। अतः बम्बई सरकार ने कहा कि चूँकि पुरन्दर की सन्धि पर हस्ताक्षर करने वाला स्वयं हमारे निकट आ रहा है, इसलिए पुनः युद्ध चालू करने पर सन्धि का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

बंगाल कौंसिल ने इसका विरोध किया किन्तु वारेन हेस्टिंग्ज ने बम्बई सरकार का समर्थन किया। यद्यपि मराठों ने स्पष्ट कर दिया कि फ्रांसीसियों के साथ उनकी कोई सन्धि नहीं हुई है तथा सैण्ट लुबिन को भी वापस भेज दिया गया है किन्तु हेस्टिंग्ज ने मार्च 1778 में बम्बई सरकार को युद्ध करने का अधिकार दे दिया।

बड़गांव की संधि (1779 ई.)

बम्बई सरकार ने कर्नल एगटस के नेतृत्व में एक सेना भेजी। कर्नल एगटस मराठों के द्वारा परास्त कर दिया गया। उसके स्थान पर कर्नल काकबर्क को भेजा गया। मराठा सेना का नेतृत्व महादजी सिन्धिया एवं मल्हारराव होलकर कर रहे थे। मराठा सेना धीरे-धीरे पीछे हटती गई और ब्रिटिश सेना आगे बढ़ती गई।

ब्रिटिश सेना पूना से 18 मील दूर तेलगाँव के मैदान तक पहुँच गई। 19 जनवरी 1779 को तेलगाँव पहुँचते ही अँग्रेजों को ज्ञात हो गया कि मराठों ने उन्हें तीन ओर से घेर लिया है। अँग्रेजों ने अपने गोला-बारूद में आग लगाकर पीछे हटना आरम्भ किया। इस पर मराठों ने आगे बढ़कर आक्रमण कर दिया।

दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ जिसमें अँग्रेज परास्त हो गये। इस पराजय के साथ ही बम्बई सरकार को एक अपमानजनक समझौता करना पड़ा। 29 जनवरी 1779 को दोनों पक्षों में बड़गांव की संधि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें निम्नलिखित थीं-

(1.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी, राघोबा को मराठों के हवाले कर देगी।

(2.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अब तक जिन मराठा प्रदेशों पर अधिकार किया है, वे मराठों को सौंप दिये जायेंगे।

(3.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी, जब तक शर्तों को पूरा न करे, तब तक दो अँग्रेज अधिकारी बन्धक के रूप में मराठों की कैद में रहेंगे।

बड़गाँव की संधि अँग्रेजों के लिए घोर अपमानजनक थी। स्वयं हेस्टिंग्ज ने कहा- ‘जब बड़गाँव संधि की धाराओं को पढ़ता हूँ तो मेरा सिर लज्जा से झुक जाता है।’

अतः हेस्टिंग्ज ने इस संधि को स्वीकार नहीं किया और मराठों के विरुद्ध दो सेनाएँ भेजीं। एक सेना का नेतृत्व कर्नल पोफम कर रहा था और दूसरी का नेतृत्व कर्नल गॉडर्ड कर रहा था। जब नाना फड़नवीस को अँग्रेजों के आक्रमण की सूचना मिली तो उसने नागपुर के शासक भोंसले, हैदराबाद के निजाम तथा मैसूर के शासक हैदरअली को अपनी ओर मिलाया तथा अँग्रेजों का सामना करने की योजना तैयार की किन्तु हेस्टिंग्ज ने कूटनीति से निजाम व भौंसले को मराठों से अलग कर दिया।

कर्नल गाडर्ड अहमदाबाद एवं बसीन पर अधिकार करके 1780 ई. में बड़ौदा पहुँच गया। उसने बड़ौदा के शासक फतेहसिंह गायकवाड़ से सन्धि की और पूना की ओर बढ़ा किन्तु पूना के निकट मराठों ने उसे काफी क्षति पहुँचाई। उत्तर दिशा में कर्नल पोफम ग्वालियर की ओर बढ़ा। 3 अगस्त 1780 को उसने ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

उसके बाद सिप्री नामक स्थान पर महादजी सिन्धिया एवं पोफम के बीच भीषण युद्ध हुआ जिसमें महादजी परास्त हो गया। 13 अक्टूबर 1781 को उसने अँग्रेजों से सन्धि कर ली। इस सन्धि में एक धारा यह भी थी कि महादजी मराठों व अँग्रेजों के बीच सन्धि करवायेगा तथा सन्धि का पालन करवाने हेतु स्वयं अपनी गारण्टी देगा।

सालबाई की सन्धि (1782 ई.)

इधर गुजरात में कर्नल गॉडर्ड व मराठों के बीच युद्ध चल रहा था। ब्रिटिश सेना का दबाव बढ़ता जा रहा था। इस दबाव को कम करने के लिए नाना फड़नवीस ने हैदरअली को कर्नाटक पर आक्रमण करने को कहा। इस पर हैदरअली ने कर्नाटक पर धावा बोल दिया। इसके बाद अँग्रेजों की निरन्तर पराजय होने लगी।

ब्रिटिश सेना का मनोबल गिरने लगा। अतः हेस्टिंग्ज ने एण्डरसन को मराठों से वार्त्ता करने भेजा। वार्त्ता के दौरान हेस्टिंग्ज ने एण्डरसन को तथा नाना फड़नवीस को जो पत्र लिखे, उनसे स्पष्ट होता है कि हेस्टिंग्स, मराठों से सन्धि करने के लिए अत्यधिक व्यग्र था। 17 मई 1782 को अँग्रेजों और मराठों के बीच सालबाई की सन्धि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

(1.) अँग्रेजों ने राघोबा का साथ छोड़ने का आश्वासन दिया तथा मराठों ने उसे 25,000 रुपये मासिक पेन्शन देना स्वीकार कर लिया।

(2.) सालसेट तथा भड़ौच को छोड़कर मराठा राज्य के अन्य समस्त भू-भागों से कम्पनी अपना अधिकार त्यागने पर सहमत हो गई।

(3.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने माधवराव (द्वितीय) को पेशवा तथा फतेसिंह गायकवाड़ को बड़ौदा का शासक स्वीकार कर लिया। बड़ौदा के जिन भू-भागोंपर कम्पनी ने अधिकार कर लिया था, उन्हें पुनः बड़ौदा के शासक को लौटा दिया गया।

(4.) इस सन्धि की स्वीकृति के छः माह के अन्दर हैदरअली जीते हुए प्रदेश लौटा देगा।

इस संधि पर महादजी एवं नाना फड़नवीस के बीच मतभेद उत्पन्न हो गये। क्योंकि नाना का मित्र एवं अँग्रेजों का शत्रु हैदरअली, अभी तक अँग्रेजों से लड़ रहा था। अतः जब तक हैदरअली युद्ध के मैदान में था, अँग्रेजों से सन्धि करना हैदरअली के साथ विश्वासघात करने जैसा था। जब 7 दिसम्बर 1782 को हैदरअली की मृत्यु हो गई, तब नाना ने 20 दिसम्बर 1782 को सन्धि पर हस्ताक्षर कर दिये।

सन्धि का महत्त्व

साल्बाई की सन्धि कुछ विशेष दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी। अँग्रेजों ने मराठों से सन्धि करके मैसूर को मराठों से अलग कर दिया। मैसूर का शासक हैदरअली मराठों की सहायता से वंचित हो गया। हैदरअली की मृत्यु के बाद उसके पुत्र टीपू ने यद्यपि युद्ध जारी रखा, किन्तु उसे मराठों की

स्मिथ के अनुसार सालबाई की सन्धि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई क्योंकि इसने दक्षिण भारत में कम्पनी का प्रभुत्व स्थापित कर दिया तथा इसके बाद 20 वर्षों तक कम्पनी एवं मराठों के बीच शान्ति बनी रही। स्मिथ ने इस सन्धि का महत्त्व आवश्यकता से अधिक बताया है। वस्तुतः यह सन्धि कम्पनी की असफलता को सूचित करती है।

अँग्रेजों ने इस सन्धि के पूर्व जो कुछ प्राप्त किया था, उसमें से सालसेट को छोड़कर शेष सब खो दिया। इस सन्धि ने पेशवा की स्थिति को सुदृढ़ बनाया तथा महादजी सिंधिया का महत्त्व इतना अधिक बढ़ गया कि वह मैसूर पर प्रभुत्व स्थापित करने लगा। अँग्रेजों ने शाहआलम के मामले में हस्तक्षेप न करने का वादा किया।

इससे शाहआलम पर महादजी सिंधिया का प्रभाव अधिक बढ़ गया और शाहआलम ने महादजी सिंधिया को मुगल सल्तनत का वकील-ए-मुतलक नियुक्त किया। अतः इस सन्धि से अँग्रेजों के प्रभुत्व की बजाय, मराठों के प्रभुत्व में वृद्धि हुई। अँग्रेजों एवं मराठों के बीच 20 वर्षों तक की दीर्घ शान्ति का कारण सालबाई की सन्धि नहीं थी, अपितु अँग्रेज उत्तर भारत में दूसरी समस्याओं में उलझ गये थे, जिससे वे मराठों की ओर ध्यान नहीं दे सके। इधर मराठा संघ में भी फूट पड़ गई थी।

पिट्स इण्डिया एक्ट

 1784 ई. में ब्रिटिश संसद ने पिट्स  इण्डिया एक्ट पारित किया जिसमें यह स्पष्ट कर दिया गया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी देशी रियासतों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति का पालन करेगी। इस एक्ट में यह भी प्रावधान किया गया कि गवर्नर जनरल को आपातकाल में, कौंसिल के बहुमत की स्वीकृति प्राप्त किये बिना भी कार्य करने के विशेष अधिकार होंगे।

हेस्टिंज की विदाई

1785 ई. में वारेन हेस्टिंग्ज अपना कार्यकाल पूरा होने पर इंग्लैण्ड चला गया। वारेन हेस्टिंग्ज के अत्याचारों, आर्थिक शोषण एवं कुकर्मों की गूंज ब्रिटिश पार्लियामेंट में भी हुई। क्लाइव की भांति उस पर भी मुकदमा चला जो सात साल तक (1788-1795 ई. तक) चलता रहा। उस पर बीस से भी अधिक आरोप लगाये गये।

प्रधानमंत्री पिट प्रारम्भ में हेस्टिंग्ज के पक्ष में था किंतु बाद में हेस्टिंग्ज का विरोधी हो गया। अंत में हेस्टिंग्ज को क्लाइव की ही भांति दोष-मुक्त घोषित कर दिया गया। इस मुकदमे को लड़ने में हेस्टिंग्ज ने एक लाख पौण्ड खर्च किये। वह इतनी राशि भारत से लूटकर नहीं ले जा पाया था। इसलिये इस मुकदमे ने हेस्टिंग्ज को बर्बाद कर दिया।

अहस्तक्षेप की नीति

 हेस्टिंग के बाद मेकफर्सन ने 1785 से 1786 ई. में 21 माह तक कार्यवाहक गवर्नर जनरल के रूप में कार्य किया। सितम्बर 1786 में कार्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। कार्नवालिस ने सामान्यतः अहस्तक्षेप की नीति का पालन किया।

1793 ई. में वह इंग्लैण्ड लौट गया तथा सर जॉन शोर (1793-1798 ई.) को गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। उसने भी कार्नवालिस की नीति का अनुसरण किया। 1795 ई. में हैदराबाद के निजाम एवं मराठों के बीच खरदा का युद्ध हुआ। निजाम ने कम्पनी से सैनिक सहायता मांगी किंतु कम्पनी ने देशी राज्यों के परस्पर झगड़ों में हस्तक्षेप करने तथा निजाम को सहायता देने से इन्कार कर दिया।

निजाम मराठों से परास्त हो गया और उसे मराठों से अपमानजनक शर्तों पर सन्धि करनी पड़ी। 1796 ई. में पेशवा माधवराव (द्वितीय) की मृत्यु हो गई तथा बाजीराव (द्वितीय) पेशवा के मनसब पर बैठा।

1798 ई. में सर जॉन शोर को वापिस इंग्लैण्ड बुला लिया गया। इस प्रकार सालबाई की सन्धि के बाद 20 वर्ष तक अंग्र्रेजों तथा मराठों के बीच शान्ति रही किंतु इस अवधि में मराठे अपने अन्य शत्रुओं से निपटते रहे। नाना फड़नवीस के नेतृत्व में उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत में मराठों का प्रभाव फैलने लगा। इस अवधि में महादजी सिन्धिया की शक्ति में भी अपूर्व वृद्धि हुई तथा पेशवा की शक्ति का ह्रास हुआ।

लार्ड वेलेजली द्वारा अहस्तक्षेप की नीति का त्याग (1798-1805 ई.)

1798 ई. में मार्क्विस वेलेजली को बंगाल का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। उसने सहायक संधियों के माध्यम से हैदराबाद के निजाम, अवध के नवाब, मराठों के पेशवा, राजपूताने के अलवर, भरतपुर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर और त्रावणकोर के राजा सहित अनेक राजाओं और नवाबों पर कम्पनी की सर्वोच्चता स्थापित की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – अंग्रेज जाति का भारतीय शक्तियों से संघर्ष

बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

बक्सर युद्ध

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

बसीन की संधि

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

मराठा शक्ति का पतन

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805 ई.)

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द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा मराठा शक्ति के बीच हुआ। मराठों की तरफ से सिंधिया एवं भौंसले ने इस युद्ध में भाग लिया जबकि गायकवाड़ और होलकर इस युद्ध से अलग रहे।

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

बसीन की सन्धि के बाद मई 1803 में बाजीराव (द्वितीय) को अँग्रेजों के संरक्षण में पुनः पेशवा बनाया गया। मराठा सरदार इसे सहन करने को तैयार नहीं थे। उन्होंने पारस्परिक वैमनस्य को भुलाककर अँग्रेजों के विरुद्ध एक होने का प्रयत्न किया। सिन्धिया और भौंसले तो एक एक हो गये, किन्तु सिन्धिया व होलकर की शत्रुता अभी ताजी थी।

अतः होलकर पूना छोड़कर मालवा चला गया। गायकवाड़ अँग्रेजों का मित्र था। अतः उसने भी इस अँग्रेज विरोधी संघ में सम्मिलित होने से इन्कार कर दिया। इस प्रकार अँग्रेजों के विरुद्ध सैनिक अभियान करने के लिये केवल सिन्धिया व भौंसले ही बचे। उन्होंने अँग्रेजों से युद्ध करने की तैयारी आरम्भ कर दी।

जब वेलेजली को इसकी सूचना मिली तो उसने 7 अगस्त 1803 को मराठों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी और एक सेना अपने भाई आर्थर वेलेजली तथा दूसरी जनरल लेक के नेतृत्व में मराठों के विरुद्ध भेजी। इस युद्ध को इतिहास में द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध कहा जाता है।

देवगढ़ की संधि (1803 ई.)

आर्थर वेलेजली ने सर्वप्रथम अहमदनगर पर विजय प्राप्त की। तत्पश्चात् अजन्ता व एलोरा के निकट असाई नामक स्थान पर सिन्धिया व भौंसले की संयुक्त सेना को परास्त किया। असीरगढ़ व अरगाँव के युद्धों में मराठा पूर्ण रूप से परास्त हुए। अरगाँव में परास्त होने के बाद 17 दिसम्बर 1803 को भौंसले ने अँग्रेजों से देवगढ़ की सन्धि कर ली।

इस सन्धि के अन्तर्गत भौंसले ने वेलेजली की सहायक सन्धि की समस्त शर्तें स्वीकार कर लीं किंतु राज्य में कम्पनी की सेना रखने सम्बन्धी शर्त स्वीकार नहीं की। वेलेजली ने इस शर्त पर जोर नहीं दिया। इस सन्धि के अनुसार कटक तथा वर्धा नदी के निकटवर्ती क्षेत्र ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिये गये।

सुर्जी-अर्जन की संधि (1803 ई.)

जनरल लेक ने उत्तरी भारत की विजय यात्रा आरम्भ की। उसने सर्वप्रथम अलीगढ़ पर अधिकार किया। तत्पश्चात् दिल्ली पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया। जनरल लेक ने भरतपुर पर आक्रमण किया और भरतपुर के शासक से सहायक सन्धि की। भरतपुर के बाद उसने आगरा पर अधिकार किया।

अन्त में लासवाड़ी नामक स्थान पर सिन्धिया की सेना पूर्णतः परास्त हुई। सिन्धिया को विवश होकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि करनी पड़ी। 30 दिसम्बर 1803 को सुर्जीअर्जन नामक गाँव में यह सन्धि हुई। इस सन्धि के अनुसार सिन्धिया ने दिल्ली, आगरा, गंगा-यमुना का दोआब, बुन्देलखण्ड, भड़ौंच, अहमदनगर का दुर्ग, गुजरात के कुछ जिले, जयपुर व जोधपुर अँग्रेजों के प्रभाव में दे दिये। उसने कम्पनी की सेना को भी अपने राज्य में रखना स्वीकार कर लिया। अँग्रेजों ने सिन्धिया को उसके शत्रुओं से पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिया।

सिन्धिया व भौंसले ने बसीन की सन्धि को भी स्वीकार कर लिया। इन सफलताओं से उत्साहित होकर वेलेजली ने घोषणा की- ‘युद्ध के प्रत्येक लक्ष्य को प्राप्त कर लिया गया है। इससे सदैव शान्ति बनी रहेगी।’ किन्तु वेलेजली का उक्त कथन ठीक नहीं निकला, क्योंकि शान्ति शीघ्र ही भंग हो गई।

होलकर से युद्ध

होलकर अब तक इन घटनाओं से उदासीन था। उसने सिन्धिया व भौंसले के आत्मसमर्पण के बाद अँग्रेजों से युद्ध करने का निर्णय लिया और अप्रैल 1804 में संघर्ष छेड़ दिया। उसने सर्वप्रथम राजपूताना में कम्पनी के मित्र राज्यों पर आक्रमण किया। यह आक्रमण अँग्रेजों के लिए चुनौती था।

16 अप्रेल 1804 को लार्ड वेलेजली ने जनरल लेक को लिखा कि जितनी जल्दी हो सके, जसवंतराव होलकर के विरुद्ध युद्ध आरम्भ किया जाये। ऑर्थर वेलेजली के नेतृत्व में दक्षिण की ओर से तथा कर्नल मेर के नेतृत्व में गुजरात की ओर से होलकर के राज्य पर आक्रमण किया गया।

इस कार्य में दक्षिण भारत तथा गुजरात की अन्य राजनीतिक शक्तियों की सहायता ली गयी किंतु होलकर ने इस मिश्रित सेना को बुरी तरह परास्त किया। वेलेजली ने कर्नल मॉन्सन के नेतृत्व में राजपूताने की तरफ एक सेना भेजी। कर्नल मॉन्सन राजपूूताने के भीतर तक घुस गया। 17 जुलाई 1804 को मोन्सन ने चम्बल के किनारे होलकर को घेर लिया।

होलकर ने कोटा के निकट मुकन्दरा दर्रे के युद्ध में कर्नल मोन्सन में कसकर मार लगायी तथा अँग्रेज सैन्य दल को लूट लिया। अँग्रेजों का तोपखाना और बहुत सी युद्ध सामग्री मराठों के हाथ लगी।

मॉन्सन आगरा की ओर भाग गया। तत्पश्चात् होलकर ने भरतपुर पर आक्रमण करके वहाँ के शासक रणजीतसिंह से सन्धि कर ली। यद्यपि महाराजा रणजीतसिंह ने अँग्रेजों से भी सहायक सन्धि कर रखी थी किन्तु इस समय उसने अँग्रेजों की सन्धि को ठुकराकर होलकर का समर्थन किया। यहाँ से होलकर दिल्ली की ओर गया। उसने दिल्ली को चारों ओर से घेर लिया।

दिल्ली पर होलकर के दबाव को कम करने के लिए अँग्रेजों ने जनरल मूरे को होलकर की राजधानी इन्दौर पर आक्रमण करने भेजा। मूरे ने इन्दौर पर अधिकार कर लिया। जब होलकर को इन्दौर के पतन की सूचना मिली तो वह दिल्ली का घेरा उठाकर इन्दौर की ओर रवाना हुआ। कर्नल बर्न, मेजर फ्रैजर और जनरल लेक की सेनाओं ने होलकर का पीछा किया।

होलकर की सेनाओं ने डीग के पास हुई लड़ाई में मेजर फ्रैजर को मार डाला। डीग के दुर्ग पर होलकर का अधिकार हो गया किंतु 23 दिसम्बर 1804 को अँग्रेजों ने होलकर को परास्त करके डीग पर अधिकार कर लिया। इस पर होलकर को भाग कर भरतपुर के दुर्ग में शरण लेनी पड़ी। भरतपुर के राजा रणजीतसिंह ने होलकर तथा उसकी सेना को अपने यहाँ शरण दी।

गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली चाहता था कि होलकर अँग्रेजों को सौंप दिया जाये किंतु महाराजा रणजीतसिंह ने अपनी शरण में आये व्यक्ति के साथ विश्वासघात करने से मना कर दिया। अँग्रेजों ने भरतपुर पर चार आक्रमण किये किंतु भरतपुर को जीता नहीं जा सका। इसके बाद फर्रूखाबाद में एक और युद्ध हुआ जिसमें होलकर परास्त होकर पंजाब की तरफ भाग गया।

यद्यपि ईस्ट इण्डिया कम्पनी इस युद्ध में विजयी रही किंतु होलकर की शक्ति को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सका। भरतपुर में मिली असफलता के कारण इंग्लैण्ड में वेलेजली की कटु आलोचना हुई। 1805 ई. में वेलेजली को त्यागपत्र देकर इंग्लैण्ड लौट जाना पड़ा।

लॉर्ड कार्नवालिस से लॉर्ड मिण्टो तक

वेलेजली के बाद 1805 ई. में लॉर्ड कार्नवालिस को पुनः भारत भेजा गया किन्तु यहाँ आने के कुछ माह बाद गाजीपुर में उसकी मृत्यु हो गयी। अतः जार्ज बार्लो को गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। कार्नवालिस व जार्ज बार्लो दोनों ने देशी राज्यों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति का पालन किया और मराठों के प्रति उदारता की नीति अपनाई।

फलस्वरूप 22 नवम्बर 1805 को सिन्धिया से एक नई सन्धि की गई, जिसके अनुसार उसे ग्वालियर व गोहद के दुर्ग तथा उसका उत्तरी चम्बल का भू-भाग लौटा दिया। कम्पनी ने राजपूत राज्यों को संरक्षण में लेने का विचार त्याग दिया। फलस्वरूप राजपूत राज्यों पर पर पुनः मराठों का प्रभाव स्थापित हो गया।

7 जनवरी 1806 को होलकर के साथ सन्धि करके उसके अधिकांश क्षेत्र लौटा दिये गये। 1807 ई. में लॉर्ड मिण्टो गवर्नर जनरल नियुक्त हुआ। उसने भी अहस्तक्षेप की नीति का अनुसरण किया। कार्नवालिस, जार्ज बार्लो तथा लॉर्ड मिण्टो, इन तीनों गवर्नर जनरलों की नीतियों के कारण मराठों ने अपनी शक्ति पुनः संगठित कर ली। इधर पिण्डारी भी, जो आरम्भ से मराठों के सहयोगी थे, अपनी शक्ति बढ़ा रहे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – अंग्रेज जाति का भारतीय शक्तियों से संघर्ष

बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

बक्सर युद्ध

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

बसीन की संधि

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

मराठा शक्ति का पतन

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1816-1818 ई.)

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तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध ई.1816 से 1818 के बीच चला। इस समय लॉर्ड वेलेजली ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गवर्नर जनरल था। इस युद्ध में मराठों की तरफ से पेशवा, होलकर, सिन्धिया और भौंसले ने युद्ध किया।तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद ये तीनों ही अपने-अपने राज्यों के अधिकांश भू.भाग खो बैठे।

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

लॉर्ड हेस्टिंग्ज

1813 ई. में लॉर्ड हेस्टिंग्ज गवर्नर जनरल बनकर आया। वह 1823 ई. तक भारत में रहा। यद्यपि पेशवा 1802 ई. में ही बसीन की सन्धि द्वारा अँग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर चुका था किन्तु अब वह इस अधीनता से मुक्त होना चाहता था। इसलिये उसने 1815 ई. में सिन्धिया, होलकर एवं भौंसले से गुप्त रूप से बातचीत आरम्भ की।

पेशवा ने अपनी सैन्य शक्ति को दृढ़ करने का प्रयास किया। इस समय पेशवा तथा गायकवाड़ के बीच खण्डनी (खिराज) के सम्बन्ध में झगड़ा चल रहा था। इस सम्बन्ध में बातचीत करने के लिए गायकवाड़ का एक मंत्री गंगाधर शास्त्री, अँग्रेजों के संरक्षण में पूना आया।

पेशवा अँग्रेजों के विरुद्ध गायकवाड़ का सहायोग चाहता था, किन्तु गंगाधर शास्त्री अँग्रेजों का घनिष्ठ मित्र था, अतः उसने पेशवा से सहयोग करने से इन्कार कर दिया। ऐसी स्थिति में पेशवा के एक विश्वसनीय मंत्री त्रियम्बकजी ने धोखे से गंगाधर शास्त्री की हत्या करवा दी।

पूना दरबार में ब्रिटिश रेजीडेन्ट एलफिन्सटन की त्रियम्बकजी से व्यक्तिगत शत्रुता थी, अतः रेजीडेण्ट ने पेशवा से माँग की कि त्रियम्बकजी को बन्दी बनाकर उसे अँग्रेजों के सुपुर्द कर दिया जाये। पेशवा ने बड़ी हिचकिचाहट के साथ 11 सितम्बर 1815 को त्रियम्बकजी को अँग्रेजों के हवाले कर दिया। त्रियम्बकजी को बन्दी बनाकर थाना भेज दिया गया किंतु एक वर्ष बाद त्रियम्बकजी थाना से निकल भागने में सफल हो गया। एलफिन्सटन ने पेशवा पर आरोप लगाया कि उसने त्रियम्बकजी को भगाने में सहायता दी है।

पूना की संधि (1817 ई.)

एलफिन्सटन ने पेशवा की शक्ति को सीमित करने के उद्देश्य से पेशवा पर एक नई सन्धि करने हेतु दबाव डाला और उसे धमकी दी कि यदि वह नई सन्धि करने पर सहमत नहीं होगा तो उसे पेशवा के मनसब से हटा दिया जायेगा। पेशवा ने भयभीत होकर 13 जून 1817 को अँग्रेजों से नई सन्धि की जिसे पूना की सन्धि कहते हैं।

इस सन्धि के अन्तर्गत पेशवा ने मराठा संघ के अध्यक्ष पद को त्याग दिया, सहायक सेना के खर्च के लिए 33 लाख रुपये वार्षिक आय के भू-भाग ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सौंप दिये। साथ ही नर्बदा नदी के उत्तर में स्थित अपने राज्य के समस्त भू-भाग एवं अहमदनगर का दुर्ग अँग्रेजों को समर्पित कर दिये।

पेशवा ने त्रियम्बकजी को बन्दी बनाकर अँग्रेजों को सौंपने का वचन दिया और जब तक त्रियम्बकजी को अँग्रेजोें के सुपुर्द न कर दिया जाय, उस समय तक त्रियम्बकजी के परिवार को अँग्रेजों के पास बन्धक के रूप में रखना स्वीकार किया। पेशवा ने अँग्रेजों की अनुमति के बिना, किसी अन्य देशी राज्य से पत्र-व्यवहार न करने का वचन दिया।

पेशवा की किर्की पराजय (1817 ई.)

इस समय तक समस्त मराठा सरदार अँग्रेजों से अपमानजनक सन्धियाँ कर चुके थे और अब उनसे मुक्त होना चाहते थे। पेशवा भी पूना की सन्धि के अपमान की आग में जल रहा था। अतः जब 5 नवम्बर 1817 को सिन्धिया ने अँग्रेजों से सन्धि की, उसी दिन पेशवा ने पूना में स्थित ब्रिटिश रेजीडेन्सी पर आक्रमण कर दिया।

एलफिन्सटन किसी प्रकार जान बचाकर भागा तथा पूना से चार मील दूर किर्की नामक स्थान पर ब्रिटिश सैनिक छावनी में शरण ली। पेशवा की सेना ने किर्की पर आक्रमण किया किन्तु पेशवा परास्त हो गया तथा सतारा की ओर भाग गया। इस प्रकार नवम्बर 1817 में पूना पर अँग्रेजों का अधिकार हो गया।

अप्पा साहब भौंसले की पराजय (1817 ई.)

पेशवा द्वारा युद्ध आरम्भ कर दिये जाने पर कुछ मराठा सरदारों ने भी कम्पनी से युद्ध करने का निश्चय किया। नवम्बर 1817 में अप्पा साहब भौंसले ने नागपुर के पास सीताबल्दी नामक स्थान पर कम्पनी की सेना पर आक्रमण किया किंतु परास्त हो गया।

दिसम्बर 1817 में उसने नागपुर में कम्पनी की सेना पर आक्रमण किया किंतु वह पुनः परास्त हुआ और पंजाब होता हुआ, शरण प्राप्त करने के लिए जोधपुर चला गया। जोधपुर के राजा मानसिंह ने, जो स्वयं अँग्रेजों का विरोधी था, अप्पा साहब को शरण दे दी। अप्पा साहब 1840 ई. तक जोधपुर में रहा तथा वहीं उसकी मृत्यु हुई।

होलकर की पराजय (1817 ई.)

ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा होलकर की सेना के बीच 21 दिसम्बर 1817 को महीदपुर के मैदान में भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में होलकर की सेना परास्त हुई। जनवरी 1818 में दोनों पक्षों के बीच मन्दसौर की सन्धि हुई। इस सन्धि के अनुसार होलकर ने सहायक सन्धि स्वीकार कर ली, राजपूत राज्यों से अपने अधिकार त्याग दिये तथा बून्दी की पहाड़ियों व उसके उत्तर के समस्त प्रदेश कम्पनी को हस्तान्तरित कर दिये। इस प्रकार होलकर भी कम्पनी की अधीनता में चला गया।

पेशवा के पद की समाप्ति (1818 ई.)

पेशवा बाजीराव (द्वितीय) अब भी सतारा में रह रहा था। जनवरी 1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने पेशवा के विरुद्ध एक सेना भेजी। जनवरी 1818 में कोरगांव के युद्ध में तथा फरवरी 1818 में अष्टी के युद्ध में पेशवा बुरी तरह परास्त हुआ। मई 1818 में उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया।

अँग्रेजों ने पेशवा के पद को समाप्त करके पेशवा को 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर कानपुर के पास बिठुर भेज दिया। पेशवा का राज्य ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। सतारा का छोटा-सा राज्य शिवाजी के वंशज प्रतापसिंह को दे दिया गया। पेशवा के मंत्री त्रियम्बकजी को आजीवन कारावास की सजा देकर चुनार के किले में भेज दिया गया। इस प्रकार लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने मराठा शक्ति को नष्ट करने में सफलता प्राप्त की।

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध का महत्त्व

यह मराठों का अन्तिम राष्ट्रीय युद्ध था। इस युद्ध में मिली पराजय ने मराठा शक्ति का सूर्य सदा के लिए अस्त कर दिया। एक-एक करके समस्त मराठा सरदारों ने अँग्रेजों के समक्ष घुटने टेक दिये। मराठा संघ ध्वस्त हो गया। भारत में अँग्रेजों की प्रतिद्वन्द्विता करने वाला कोई नहीं रहा। पेशवा, होलकर, सिन्धिया और भौंसले अपने राज्यों के अधिकांश भू-भाग खो बैठे। राजपूत राज्य मराठों के प्रभुत्व से निकलकर अँग्रेजों के प्रभुत्व में चले गये।

रेम्जे म्यूर ने इस युद्ध के औचित्य को सिद्ध करते हुए लिखा है- ‘कम्पनी की ओर से यह कोई आक्रामक युद्ध नहीं था तथा जिन क्षेत्रों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाये जाने के साथ यह युद्ध समाप्त हुआ था, वह भविष्य में शान्ति बनाये रखने के लिए आवश्यक था।’

वेलेजली ने मराठा शक्ति पर प्रहार कर उसे क्षीण कर दिया था, लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने मराठा शक्ति को धराशायी कर दिया। इसलिए कहा जाता है कि लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने वेलेजली के कार्य को पूरा किया। इस युद्ध के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत की सर्वशक्ति सम्पन्न सत्ता बन गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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