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अकबर कालीन भवन

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अकबर कालीन भवन - हुमायूँ का मकबरा

अकबर कालीन भवन अकबर के शासन की सुदृढ़ता का प्रदर्शन करते हैं। उनमें भव्यता कम है किंतु उनकी सुघड़ता, बनावट तथा आकार अकबर के शासन की शक्ति की घोषणा करते हैं।

अकबर का शासन-काल शासन के प्रत्येक क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के सम्मिश्रण और समन्वय का काल था। इस कारण उसके समय में स्थापत्य एवं भवन निर्माण में भी सम्मिश्रण की नई शुरुआत हुई। अकबर द्वारा निर्मित भवनों में ईरानी तथा भारतीय तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं पर इनमें प्रधानता भारतीय तत्त्वों की ही है।

कुछ विद्वानों की धारणा है कि मुगल कला का आरम्भ अकबर से ही मानना चाहिये। अबुल फजल का कथन है- ‘बादशाह सुन्दर इमारतों की योजना बनाता है और अपने मस्तिष्क एवं हृदय के विचार को पत्थर और गारे का रूप देता है।’

अकबर ने तत्कालीन शैलियों की बारीकी को समझा और अपने शिल्पकारों को इमारतें बनाने के लिए नये-नये विचार दिये। अकबर के काल में स्थापत्य कला की जो नई शैली विकसित हुई, वह वास्तव में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का समन्वय थी।

सुदृढ़ आर्थिक स्थिति के कारण अकबर के समय में साहित्य, स्थापत्य, शिल्प एवं संगीत आदि विविध कलाओं की बड़ी उन्नति हुई। अकबर के दरबार में नौ रत्नों की उपस्थिति से भी देश में कला और साहित्य की अभिवृद्धि हुई।

अकबर कालीन भवन स्थापत्य की विशेषताएँ

अकबरकालीन स्थापत्य की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार थीं-

(1.) भवन निर्माण में अधिकांशतः लाल बलुआ पत्थर का उपयोग हुआ है, कहीं-कहीं पर सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है।

(2.) अकबरी स्थापत्य शैली में मेहराबी और शहतीरी शैलियों का समान अनुपात में प्रयोग किया गया है।

(3.) आरम्भ में गुम्बद लोदी शैली में बनते रहे जो भीतर से खोखले होते थे किंतु तकनीकी दृष्टि से यह दोहरा गुम्बद नहीं था।

(4.) स्तम्भ का अग्रभाग बहुफलक युक्त था और इनके शीर्ष पर बै्रकेट या ताक बने होते थे।

(5.) भवनों का अलंकरण प्रायः नक्काशी या पच्चीकारी द्वारा होता था और उनमें चमकीले रंग भरे जाते थे।

अकबरी स्थापत्य का विकास दो चरणों में हुआ। प्रथम चरण में फतेहपुर सीकरी से पहले के स्थापत्य को रखा जाता है जिसमें आगरा, इलाहाबाद और लाहौर के किला शामिल हैं। दूसरे चरण में फतेहपुर सीकरी के निर्माण हैं।

दिल्ली के अकबर कालीन भवन

हुमायूँ का मकबरा

अकबर के शासनकाल में बनी सबसे पहली महत्वपूर्ण इमारत हुमायूँ का मकबरा थी। 20 जनवरी 1556 को हुमायूँ की मृत्यु के उपरांत उसे दिल्ली में ही दफ़्नाया गया था किंतु बाद में ई.1558 में उसके शव को खंजरबेग नामक सरदार द्वारा पंजाब के सरहिंद ले जाकर दफनाया गया।

ई.1562 में हुमायूँ की विधवा हमीदा बानो बेगम के आदेशानुसार इस मकबरे का निर्माण आरम्भ किया गया। समकालीन ग्रंथ आइने अकबरी के अनुसार मकबरे की देखरेख का काम हुमायूँ की सबसे पहली बेगम हाजी बेगम को सौंपा गया था जो हुमायूँ की ममेरी बहन थी और बाद में उसकी बेगम बनी। वह ईरानी आदर्शों से प्रभावित थी।

यह मकबरा दिल्ली के दीनापनाह अर्थात् पुराने किले के निकट स्थित है। गुलाम वंश के काल में यह भूमि किलोकरी किले में हुआ करती थी और नसीरुद्दीन (ई.1268-87) के पुत्र सुल्तान कैकूबाद की राजधानी थी। हुमायूँ के मकबरे के लिए इस स्थान का चुनाव यमुना नदी के जल की उपलब्धता तथा हजरत निजामुद्दीन की दरगाह से निकटता के कारण किया गया था।

यह मकबरा भारत में मुगल वास्तुकला का प्रथम उदाहरण है। इस मक़बरे की चारबाग शैली भी भारत में पहली बार प्रयुक्त हुई थी। इसके अनुकरण पर ही आगे चलकर ताजमहल तथा उसके चारों ओर के उद्यान का निर्माण हुआ। समकालीन इतिहासकार अब्द-अल-कादिर बदायूनीं के अनुसार इस भवन का मुख्य वास्तुकार मिराक मिर्जा घियास था जिसे अफगानिस्तान के हेरात शहर से इस मकबरे के निर्माण के लिए विशेष रूप से बुलवाया गया था।

उसने हेरात में कई भवन बनाए थे। मकबरे का निर्माण पूर्ण होने से पहले ही मिराक मिर्जा घियास की मृत्यु हो गई। अतः शेष कार्य उसके पुत्र सैयद मुहम्मद इब्न मिराक घियाथुद्दीन ने पूरा करवाया। मकबरे का मुख्य भवन ई.1571 में बनकर तैयार हुआ।

संभवतः उसी समय हुमायूँ का शव सरहिंद से निकालकर दिल्ली लाया गया और इस मकबरे में दफनाया गया। यह मुगल सल्तनत की पहली इमारत थी जिसमें लाल बलुआ पत्थर का इतने बड़े स्तर पर प्रयोग हुआ था। इसके निर्माण पर 15 लाख रुपये की लागत आयी थी।

इस भवन-समूह में बादशाह हुमायूँ तथा शाही परिवार के सदस्यों की कब्रें हैं जिनमें हुमायूँ की बेगम हमीदा बानो, हुमायूँ की छोटी बेगम, शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह, मुगल बादशाह जहांदारशाह, फर्रूखशीयर, बादशाह रफीउद्दरजात, रफीउद्दौला एवं आलमगीर (द्वितीय) आदि की कब्रें शामिल हैं।

यह भवन चारबाग शैली में निर्मित उद्यान के भीतर स्थित है। ऐसे उद्यान भारत में इससे पूर्व कभी नहीं बने थे और इसके बाद अनेक इमारतों का अभिन्न अंग बनते चले गये। यह मकबरा, बाबर के काबुल स्थित बाग-ए-बाबर मकबरे से एकदम भिन्न था। बाबर के साथ ही बादशाहों को बाग में बने मकबरों में दफ़्न करने की परंपरा आरंभ हुई थी।

मकबरा निर्माण की यह शैली पूर्ववर्ती मंगोल शासक तैमूर लंग के समरकंद (उजबेकिस्तान) में बने मकबरे पर आधारित थी तथा यही मकबरा आगे चलकर भारत में मुगल स्थापत्य के मकबरों की प्रेरणा बना। ताजमहल के निर्माण के साथ ही मकबरा निर्माण की यह स्थापत्य शैली अपने चरम पर पहुंच गई।

कुछ विद्वानों के अनुसार इस मकबरे की निर्माता हाजी बेगम, ईरानी (अर्थात् फारसी) आदर्शों से प्रभावित थी। अकबर ने इस मकबरे के निर्माण के लिए अफगानिस्तान के हेरात नगर से वास्तुशिल्पियों का बुलवाया था तथा इस मकबरे के निर्माण में अनेक भारतीय शिल्पकारों ने भी काम किया था।

उन सबके सम्मिलित प्रभाव से यह मकबरा ईरानी आदर्शों की भारतीय अभिव्यक्ति बन गया। इस इमारत का नीचे का भाग हिन्दू-मुस्लिम वास्तुकला शैली का तथा ऊपरी भाग ईरानी शैली का है किंतु इस मकबरे के चारों ओर स्वतंत्र रूप से कोई मीनार नहीं बनाई गई है।

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मकबरे के विशाल भवन में प्रवेश करने के लिये पश्चिम और दक्षिण में दो दुमंजिले प्रवेशद्वार बने हुए हैं। इनकी ऊँचाई 16 मीटर है। दोनों द्वारों में दोनों ओर कक्ष बने हुए हैं एवं ऊपरी तल पर छोटे प्रांगण स्थित हैं। मुख्य इमारत के ईवान पर सितारे अंकित किए गए हैं। एक छः किनारों वाला सितारा मुख्य प्रवेशद्वार पर भी अंकित है। पत्थरों से बनी दीवारों की चिनाई में गारे-चूने का प्रयोग किया गया है और दीवारों को बाहर से लाल बलुआ पत्थर से ढका गया है। इसके ऊपर पच्चीकारी, फर्श की सतह, झरोखों की जालियों, द्वार-चौखटों और छज्जों के लिये श्वेत संगमरमर का प्रयोग किया गया है। मकबरे का विशाल मुख्य गुम्बद श्वेत संगमरमर से ढका गया है। यह समरकंद के तैमूर के मकबरे तथा बीबी खानम के मकबरे के गुम्बद जैसा लगता है। इसकी शैली दमस्कस की 11वीं सदी के अंत में निर्मित उमैय्यद मस्जिद की शैली जैसी है। मकबरे के प्रत्येक तरफ एक द्वार मण्डप है जिसके साथ नुकीला मेहराब है। इस तरह इस भवन में विदेशी लक्षणों की अधिकता है किंतु इसकी कुछ विशेषताएं हिन्दू वास्तुकला की पंचरथ शैली की ओर संकेत करती हैं। मकबरे का भवन 8 मीटर ऊँचे चबूतरे पर खड़ा है। 12 हजार वर्ग मीटर की ऊपरी सतह को लाल जालीदार मुंडेर घेरे हुए है।

इस वर्गाकार चबूतरे के कोनों को छांटकर अष्टकोणीय आभास दिया गया है। फारसी वास्तुकला से प्रभावित यह मकबरा 47 मीटर ऊँचा और 100 मीटर  चौड़ा है। इमारत पर फारसी बल्बुअस गुम्बद बना है, जो सर्वप्रथम सिकंदर लोदी के मकबरे में देखा गया था। यह गुम्बद 42.5 मीटर ऊँचे गर्दन रूपी बेलन पर स्थित है। गुम्बद के ऊपर 6 मीटर ऊँचा पीतल का मुकुट रूपी कलश स्थापित किया गया है और उसके ऊपर चंद्रमा लगा हुआ है, जो तैमूर वंश के मकबरों में सैंकड़ों सालों से बनाया जा रहा था।

गुम्बद दोहरी पर्त में बना है, बाहरी पर्त के बाहर श्वेत संगमरमर का आवरण लगा है और भीतरी पर्त गुफा के समान बनाई गई है। दोहरी पर्त का गुम्बद बनाने का प्रयोग भारत में सबसे पहले ‘सिकन्दर लोदी के मकबरे’ में किया गया था।

हुमायूँ के मकबरे में गुम्बद को ही सफेद संगमरमर से बनाया गया है जबकि  शेष इमारत लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है जिस पर श्वेत और काले संगमरमर तथा पीले बलुआ पत्थर से पच्चीकारी का काम किया गया है। रंगों का यह संयोजन इस भवन को अनूठी आभा प्रदान करता है।

बाहर से सरल दिखने वाली इमारत की आंतरिक योजना कुछ जटिल है। मुख्य भवन में केन्द्रीय कक्ष सहित नौ वर्गाकार कक्ष बने हैं। बीच में मुख्य कक्ष है तथा उसे घेरे हुए शेष आठ दुमंजिले कक्ष बीच में खुलते हैं। बीच में बने मुख्य कक्ष को घेरे हुए शेष आठ दुमंजिले कक्ष बीच में खुलते हैं। मुख्य कक्ष गुम्बददार (हुज़रा) एवं दुगुनी ऊँचाई का एक-मंजिला है और इसमें गुम्बद के नीचे एकदम मध्य में आठ किनारे वाले एक जालीदार घेरे में बादशाह हुमायूँ की कब्र बनी है। यह इस इमारत की मुख्य कब्र है किंतु यह असली नहीं है। असली कब्र निचले कक्ष में बनी हुई है।

मुख्य कक्ष का प्रवेश दक्षिणी ओर बनी एक ईवान से होता है तथा अन्य दिशाओं के ईवानों में श्वेत संगमरमर की जालियां लगी हैं। बादशाह की असली समाधि ठीक नीचे आंतरिक कक्ष में बनी है जिसका रास्ता बाहर से आता है। इसके ठीक ऊपर दिखावटी किन्तु सुन्दर कब्र की प्रतिकृति बनायी गई है।

नीचे तक आम पर्यटकों को जाने की अनुमति नहीं है। बाद में यही प्रयोग ताजमहल में भी दोहराया गया था। हुमायूँ के मकबरे के सम्पूर्ण भवन में पीट्रा ड्यूरा नामक संगमरमर की पच्चीकारी का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार के कब्र-नियोजन भारतीय-इस्लामिक स्थापत्यकला के महत्त्वपूर्ण अंग हैं जो मुगल मकबरों अर्थात् ताजमहल आदि में प्रयुक्त हुए हैं।

मुख्य कक्ष में संगमरमर के जालीदार घेरे के ठीक ऊपर पश्चिम दिशा में अर्थात् मक्का की ओर एक मेहराब है। यहाँ पर प्रवेश-द्वारों पर खुदे कुरआन के सूरा 24 के बजाय सूरा-अन-नूर की एक रेखा बनी है जिसके द्वारा क़िबला अर्थात् मक्का की दिशा से प्रकाश आता है। इस प्रकार बादशाह का स्तर उसके विरोधियों और प्रतिद्वंदियों से ऊँचा एवं फरिश्तों के निकट हो जाता है।

प्रधान कक्ष के चार कोणों पर स्थित चार अष्टकोणीय कमरे मेहराबदार दीर्घा से जुड़े हैं। प्रधान कक्ष की भुजाओं के बीच-बीच में चार अन्य कक्ष भी बने हैं। ये आठ कमरे मुख्य कब्र की परिक्रमा बनाते हैं। ऐसी रचना सूफ़ीवादी और कई अन्य मुगल मकबरों में दिखती है; साथ ही ये जन्नत का संकेत भी करते हैं।

प्रत्येक कमरे के साथ 8-8 कमरे और बने हैं, जो कुल मिलाकर 124 कक्षीय योजना का भाग हैं। इन छोटे कमरों में अनेक शहजादों, नवाबों और दरबारियों की कब्रें स्थित हैं। इनमें हमीदा बानो बेगम और दारा शिकोह की कब्रें प्रमुख हैं। इस चबूतरे के नीचे गर्भगृह में 56 कोठरियां बनी हुई हैं। इस सम्पूर्ण भवन में 100 से अधिक कब्रें स्थित हैं। इसलिए इस इमारत को मुगलों का कब्रिस्तान भी कहते हैं। कब्रों पर मृतक का नाम अंकित नहीं होने से, कब्र में दफ़्न व्यक्ति का पता नहीं चलता है।

 इस इमारत में लाल बलुआ पत्थर पर श्वेत संगमरमर के संयोजन का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया था। यह पूर्णतः मुगल वास्तुकला से निर्मित है तथापि इसमें भारतीय स्थापत्य कला की अनेक विशेषताएं देखने को मिलती हैं। यहाँ स्थित राजस्थानी स्थापत्य की छोटी छतरियां नीली टाइल्स से ढकी गई थीं।

चारबाग

मुख्य भवन के चारों ओर एक वर्गाकार उद्यान है जिसका क्षेत्रफल लगभग 30 एकड़ है। वर्गाकार होने एवं चार भागों में बंटा हुआ होने से इसे चारबाग कहा जाता है। इस प्रकार के उद्यान न केवल भारत में अपितु सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में अपनी प्रकार के पहले उदाहरण थे। इस प्रकार के उद्यान उच्च श्रेणी की ज्यामितीय रचनाएं हैं। इस उद्यान को तीन ओर ऊँची चहारदीवारी से घेरा गया था तथा चौथी ओर यमुना नदी स्थित थी। अब यमुना नदी इस भवन से काफी दूर चली गई है।

सम्पूर्ण उद्यान चार भागों में पैदल पथों (खियाबान) और दो विभाजक केन्द्रीय नहरों (चौड़ी नालियों) द्वारा बंटा हुआ है। ये पथ एवं नहरें इस्लाम में कल्पित जन्नत के बाग में बहने वाली चार नदियों की प्रतीक हैं। इस प्रकार बने चार-बागों को पुनः पत्थर से निर्मित रास्तों द्वारा चार-चार छोटे उप-विभागों में विभाजित किया गया है।

इस प्रकार कुल मिलाकर 36 भाग बनते हैं। केन्द्रीय नहर, परिसर के मुख्य द्वार से मकबरे तक पहुँचकर उसके भूमिगत होती हुई एवं दूसरी ओर से पुनः निकलती हुई प्रतीत होती है, ठीक जैसा कुरआन की आयतों में जन्नत के बाग का वर्णन किया गया है।

केन्द्रीय पैदल पथ दो द्वारों तक जाते हैं। एक मुख्य द्वार दक्षिणी दीवार में और दूसरा छोटा द्वार पश्चिमी दीवार में है। ये दोनों द्वार दो-मंजिला हैं। दक्षिणी द्वार मुगल काल में प्रयोग हुआ करता था किंतु अब यह बंद रहता है। वर्तमान में पश्चिमी द्वार का प्रयोग किया जाता है। पूर्वी दीवार से जुड़ी हुई एक बारादरी है जिसमें नाम के अनुसार बारह द्वार हैं। उत्तरी दीवार से लगा हुआ एक स्नानघर है जिसे हम्माम कहा जाता था।

एक अंग्रेज़ व्यापारी, विलियम फ़िंच ने ई.1611 में मकबरे का भ्रमण किया उसने लिखा है कि केन्द्रीय कक्ष की आंतरिक सज्जा बढ़िया कालीनों एवं गलीचों से परिपूर्ण थी। कब्रों के ऊपर एक शुद्ध श्वेत शामियाना लगा होता था और उनके सामने ही पवित्र ग्रंथ रखे रहते थे।

इसके साथ ही हुमायूँ की पगड़ी, तलवार और जूते भी रखे रहते थे। यहाँ के चारबाग 13 हेक्टेयर क्षेत्र में फ़ैले हुए थे। आने वाले वर्षों में यह सब तेजी से बदल गया। इसका मुख्य कारण, राजधानी का आगरा स्थानांतरण था। बाद के मुगल शासकों के पास इतना धन नहीं रहा कि वे इन बागों का मंहगा रख-रखाव कर सकें।

18वीं शताब्दी तक स्थानीय लोगों ने चारबाग में सब्जी उगाना आरंभ कर दिया था। ब्रिटिश क्राउन के शासन-काल में ई.1860 में चारबाग शैली के वर्गाकार केन्द्रीय सरोवरों का स्थान अंग्रेज़ी शैली के गोल चक्करों ने ले लिया एवं क्यारियों में फूलों के पौधों के स्थान पर बड़े पेड़ उगने लगे।

20 वीं शताब्दी के आरम्भ में वायसरॉय लॉर्ड कर्ज़न ने चार बाग को वापस सुधारा। ई.1903-09 के बीच एक वृहत् उद्यान जीर्णोद्धार परियोजना आरंभ हुई जिसके अंतर्गत नालियों में भी बलुआ पत्थर लगाया गया। ई.1915 में पौधारोपण योजना के तहत केन्द्रीय और विकर्णीय अक्षों पर पौधा रोपण हुआ। फूलों की क्यारियां भी दोबारा बनायी गयीं।

भारत के विभाजन के समय, अगस्त 1947 में पुराना किला और हुमायूँ का मकबरा भारत से पाकिस्तान जाने वाले शरणार्थियों के लिये शरणार्थी कैम्प में बदल गये। बाद में इन्हें भारत सरकार द्वारा नियंत्रण में लिया गया। ये कैम्प लगभग पाँच वर्षों तक चलते रहे जिससे हुमायूँ का मकबरा परिसर के स्मारकों को अत्यधिक क्षति पहुंची। बगीचे, पानी की सुंदर नालियां, सुंदर जालियां आदि पूरी तरह बरबाद हो गए।

इस विनाश को रोकने के लिए मकबरे के अंदर के स्थान को ईंटों से ढंक दिया गया। बाद में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने इन्हें पुनः अपने पुराने रूप में स्थापित किया। मार्च 2003 में आगा खान सांस्कृतिक ट्रस्ट द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया। इसके बाद बागों की जल-नालियों में एक बार फिर से जल प्रवाह आरंभ हुआ।

ई.1857 में जब अंग्रेजों ने लाल किले पर अधिकार किया तब मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने अपने तीन शहजादों सहित इसी मकबरे के परिसर में शरण ली थी। ब्रिटिश कप्तान हडसन ने बहादुरशाह को यहीं से गिरफ्तार करके रंगून भिजवाया था।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार हडसन ने बादशाह तथा उसके शहजादों को लाल किले से गिरफ्तार करके हुमायूँ के मकबरे में रखा था और फिर यहीं से बादशाह को उसके परिवार सहित बर्मा लेजाकर नजरबन्द किया था। ई.1993 में इस भवन-समूह को विश्व-धरोहर घोषित किया गया है।

नाई का मकबरा

चारबाग के भीतर दक्षिण-पूर्वी कौने में ई.1590 में निर्मित शाही-नाई का गुम्बद है। यह मकबरा एक ऊँचे चबूतरे पर बना है जिस तक पहुंचने के लिये दक्षिणी ओर से सात सीढ़ियां बनी हुई हैं। यह वर्गाकार है और इसके अकेले कक्ष के ऊपर एक दोहरा गुम्बद बना हुआ है। भीतर स्थित दो कब्रों पर कुरआन की आयतें खुदी हुई हैं। इनमें से एक कब्र पर 999 अंकित है जिसका अर्थ हिजरी सन् 999 अर्थात् ई.1590-91 से है।

बूहलीमा का मकबरा

हुमायूँ के मकबरे की मुख्य चहारदीवारी के बाहर स्थित स्मारकों में बूहलीमा का मकबरा प्रमुख है। हुमायूं के मकबरे के परिसर के पश्चिमी किनारे पर स्थित यह मकबरा एक आयताकार परिसर में लगे हरे-भरे बगीचे में स्थित है। बाग में एक सुव्यवस्थित मार्ग बना हुआ है जिसके एक छोर पर बू हलीमा का मकबरा स्थित है।

इसका स्थापत्य एक आयताकार साधारण मकान के रूप में है जिस पर कोई गुम्बद, मीनार, बुर्ज, ईवान, मेहराब आदि फारसी संरचनाएं नहीं हैं। इस मकान को स्थानीय क्वार्टजाइट पत्थरों से बनाया गया है।

इस मकबरे की छत पर जाने के लिए पत्थरों की सीढ़ियां बनी हैं तथा इसके कक्षों में प्रवेश करने के लिए बने द्वारों के ऊपरी भाग में हिन्दू शैली के शहतीर रखे गए हैं। हालांकि मकबरे के बाहर एक मेहराब बनाया गया है इस मेहराब के ऊपर होकर ही सीढ़ियां छत पर जाती हैं। मकान की छत पर ठीक बीच में किसी गुम्बद के निशान जान पड़ते हैं।

संभवतः किसी समय इस मकबरे पर गुम्बद बनाया गया होगा जो समय के साथ नष्ट हो गया होगा। सामान्यतः मकबरे किसी बगीचे के केन्द्रीय भाग में होते हैं किंतु यह एक सिरे पर स्थित है। लोक में मान्यता है कि बू-हलीमा हुमायूँ से नजदीकी रखने वाली कोई महिला थी जिसने हुमायूं की मकबरे से केवल 100 मीटर की दूरी पर जबर्दस्ती अपना मकबरा बनवाया। 

अरब सराय

 अरब सराय बूहलीमा के मकबरे के निकट ‘अरब सराय’ स्थित है जिसे हमीदा बेगम ने मुख्य मकबरे के निर्माण में लगे कारीगरों के लिये बनवाया था। हुमायूं की विधवा ने अरब से आए 300 कारीगरों के लिए अरब सराय का निर्माण करवाया। यह हुमायूं के मकबरे के परिसर में स्थित है।

संभवतः ये कारीगर हुमायूं के मकबरे को बनाने के लिए अरब से बुलवाए गए थे। माना जाता है कि हमायूं की विधवा हाजी बेगम जब हज करने के लिए मक्का गई थी, तब वहाँ से लौटते समय वह इन कारीगरों को लेकर आई। इस सराय का मुख्य द्वारा एक बड़े ईवार के रूप में बनाया गया है जिसमें दो विशाल मेहराब बनाए गए हैं।

इस द्वार से प्रवेश करने पर सराय का मुख्य हिस्सा दो भागों में बंटा हुआ दिखाई देता है जिनमें एक जैसी मेहराबदार कोठरियां बनी हुई हैं तथा अब भग्न अवस्था में हैं। इस मेहंदी बाजार भी कहा जाता है जिसके बारे में मान्यता है कि इसे जहाँगीर के मुख्य हींजड़े मिहर बनू ने बनाया था। यह सराय अफसरवाला मकबरा के निकट ही स्थित है।

अफ़सरवाला मकबरा एवं मस्जिद

बूहलीम के मकबरे के परिसर में ही ‘अफ़सरवाला मकबरा’ बना है, जो अकबर के एक नवाब के लिये बना था। इसके साथ ही एक मस्जिद भी बनी है। अफसर वाला मकबरा तथा अफसरवाली मस्जिद दोनों एक ही प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं तथा दोनों इमारतें स्थानीय क्वार्टजाईट पत्थर से बनी हैं।

दोनों भवनों की बाहरी दीवारों पर लाल बलुआ पत्थर से सजावट की गई है। लाल बलुआ पत्थर में सफेद संगमरमर से पर्चिनकारी की गई है। इन इमारतों के भीतर की बनावट फारसी शैली पर आधारित है तथा सादगी पूर्ण है। दोनों ही भवन अब जीर्ण अवस्था में हैं। मस्जिद का मुख्य कक्ष ‘थ्री बे’ बना हुआ है।

बीच की ‘बे’ के चारों ओर मेहराब बने हुए हैं जिनके ऊपर एक गुम्बद स्थित है। गुम्बद के भीतरी हिस्से में चित्रों का एक पूरा पैनल है। मस्जिद का ‘तिहरा ईवान’ फारसी शैली में निर्मित है।

अफसरवाला मकबरे के भीतर एक ही कक्ष है जिसमें संगमरमर की कब्रें बनी हुई हैं जिनमें से एक कब्र पर कुरान की नौ सौ चौहत्तरवीं आयत लिखी गई है। जो संभवतः हिजरी 974 की द्योतक है। इस हिसाब से यह कब्र ई.1566-67 में बनी होनी चाहिए। अफसर वाला मकबरा के ऊपर दो गुम्बद बने हुए हैं।

यह मकबरा बाहर से अष्टकोणीय दिखाई देता है। इनमें से चार तरफ की दीवारों में चार मेहराबदार प्रवेशद्वार बने हुए हैं जो सीधे ही कब्र वाले कमरे में खुलते हैं।  मेहराबों को लाल बलुआ पत्थरों के अलंकरणों से सजाया गया है। गुम्बद के ऊपर एक उलटा कमल लगा है जो कलश के लिए आधार बनाता है। इस आधार पर एक मंगल-कलश रखा हुआ है। अकबर कालीन भवन में इस प्रकार का कमल एवं कलश बहुत कम दिखाई देता है।

आदम खाँ का मकबरा

आदम खाँ अथवा (अदहम खाँ) अकबर की धाय ‘माहम अनगा’ का पुत्र था। चूंकि अकबर केवल चौदह साल की आयु में बाशाह बन गया था इसलिये माहम अनगा ही बहुत दिनों तक सरकार चलाती रही जिसे ‘हरम सरकार’ कहते थे। माहम की ऐसी प्रभावी स्थिति के कारण उसका पुत्र आदम खाँ स्वयं को बादशाह के बराबर समझने लगा। वह अत्यंत घमण्डी और बुरे स्वभाव का व्यक्ति था तथा अकबर से भी उद्दण्डता कर बैठता था।

अकबर अपनी धाय का बहुत आदर करता था। इसलिए आदम खाँ की उद्दण्डता को सहन करता था। एक दिन आदम खाँ ने कचहरी में घुसकर अकबर के वकील-ए-मुतलक (प्रधानमंत्री) अतगा खाँ की हत्या कर दी और इसके बाद वह नंगी तलवार लेकर बादशाही हरम की तरफ गया। उस समय अकबर सो रहा था। इसलिए महल के हिंजड़ों ने महल के दरवाजे बंद कर दिए।

इस शोरगुल से अकबर की नींद खुल गई और उसने शोरगुल का कारण पूछा। उसी समय आदम खाँ भीतर आ गया और उसने शराब के नशे में अकबर को अपशब्द कहे। अकबर ने अपनी तलवार निकालकर आदम खाँ की छाती पर टिका दी और आदम खाँ से कहा कि अपनी तलवार हिंजड़े को दे दे किंतु आदम खाँ ने अकबर का आदेश मानने की बजाय अकबर की तलवार छीनने के लिए उसकी कलाई पकड़ ली।

अकबर ने आदम खाँ को कसकर मुक्का मारा जिससे आदम खाँ बेहोश हो गया। अकबर ने हिंजड़ों का आदेश दिया कि वे आदम खाँ के हाथ-पैर बांध कर उसे महल की मुंडेर से नीचे फैंक दें। ऐसा ही किया गया जिससे आदम खाँ की मृत्यु हो गई। अकबर ने हिंजड़ों को आदेश दिया कि वे मरे हुए आदम खाँ उठाकर लाएं और फिर से एक बार नीचे गिराएं।

इसके बाद अकबर अपनी धाय माहम अनगा के महल में गया और उसे घटना की जानकारी दी। माहम ने अकबर के निर्णय का समर्थन किया और स्वयं भी पुत्र-शोक में चालीस दिन बाद ही मर गई। इस प्रकार अकबर को हरम सरकार से छुटकारा मिल गया। अकबर ने दिल्ली में एक मकबरा बनवाया जिसमें आदम खाँ तथा माहम अनगा के शव दफन करवाए। आज भी यह मकबरा अच्छी हालत में है।

यह मक़बरा दक्षिणी दिल्ली के लालकोट की दीवार पर बने एक चबूतरे पर बना है। इस अष्टकोणीय इमारत के गुम्बद को 15-16वीं सदी के सैयद और लोदी शासन-काल में बनी इमारतों की शैली में बनाया गया है। मक़बरे में चारों तरफ मेहराबदार बरामदे बने हैं। प्रत्येक बरामदे में तीन दरवाजे हैं।

ई.1830 में मि. ब्लैक नामक बंगाल सिविल सेवा के अंग्रेज अधिकारी ने इस मकबरे में अपना निवास स्थान बनाया और मक़बरे के बीचों-बीच अपने डाइनिंग हॉल तक रास्ता साफ करने के लिए इसके अंदर बनी कब्रें हटा दीं। लम्बे समय तक यह मक़बरा अंग्रेज अधिकारियों का अतिथिगृह बना रहा। बाद में कुछ समय तक इस मक़बरे को पुलिस थाने और डाकघर के रूप में भी काम में लिया गया। ब्रिटिश वॉयसराय लॉर्ड कर्ज़न के आदेश से इस मक़बरे को खाली करके कब्रों का पुनर्निर्माण किया गया।

आगरा के अकबर कालीन भवन

आगरा का किला

आगरा का किला भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा शहर में स्थित है। इस किले को इतिहासकार चारदीवारी से घिरी पैलेस-सिटी (प्रासाद-नगरी) कहना अधिक उचित मानते हैं। आगरा का किला लगभग डेढ़ मील के घेरे में स्थित है। यह भारत के महत्वपूर्ण किलों में से एक है तथा प्राचीन दुर्ग श्रेणी विभाजन के अनुसार स्थल-दुर्ग की श्रेणी में आता है।

इस किले की साधारण रूपरेखा मानसिंह द्वारा बनवाये गये ग्वालियर के किले से मिलती-जुलती है। लोदी सुल्तान सिकंदर लोदी तथा इब्राहीम लोदी एवं मुगल बादशाह बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगज़ेब इस किले में थोड़े-बहुत समय के लिए अवश्य रहे। इस दुर्ग में मुगलों का सबसे बड़ा खजाना, बहुमूल्य रत्न, स्वर्ण एवं अन्य कीमती सम्पत्ति रहती थी। इस दुर्ग में मुगलों की टकसाल भी थी जिसमें सोने-चांदी के सिक्के ढाले जाते थे।

आगरा का दुर्ग मूलतः हिन्दुओं का बनवाया प्रतीत होता है क्योंकि इसका पुराना नाम बादलगढ़ था। यह मूलतः ईंटों से बनाया गया था। इसका वास्तविक निर्माण काल बताया जाना संभव नहीं है। ई.1018 में महमूद गजनवी ने जब उत्तर भारत के बुलंदशहर, मथुरा तथा कन्नौज आदि महत्वपूर्ण नगरों पर आक्रमण किया, उस समय आगरा का दुर्ग चौहान शासकों के अधीन था।

सिकंदर लोदी (ई.1487-1517) दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने आगरा की यात्रा की तथा उसने ई.1504 में आगरा के किले की मरम्म्त करवाई। वह कुछ समय के लिए इस किले में रहा। ई.1504 में सिकंदर लोदी ने इसे अपनी राजधानी बनाया। यह भारत की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन था क्योंकि भारत की राजधानी दिल्ली से खिसक कर आगरा आ गई थी।

ई.1517 में इसी किले में सिकंदर लोदी का निधन हुआ। उसके पुत्र इब्राहीम लोदी ने भी इसी दुर्ग को अपनी राजधानी बनाया। उसने इस दुर्ग में अनेक मस्जिदें, महल एवं कुएं आदि बनवाये। ई.1526 में वह पानीपत के मैदान में बाबर के विरुद्ध लड़ता हुआ मृत्यु को प्राप्त हुआ।

जब ई.1526 में बाबर ने लोदियों को परास्त किया तब वह दिल्ली पर अधिकार करने के बाद आगरा भी आया। मुगलों को इस किले से अगाध सम्पत्ति प्राप्त हुई। इस सम्पत्ति में ही कोहिनूर हीरा भी था। बाबर ने इस दुर्ग में एक बावली बनवायी। ई.1530 में हुमायूँ का राजतिलक आगरा के दुर्ग में हुआ था।

ई.1540 में जब शेरशाह सूरी ने हुमायूँ से उसका राज्य छीना तब उसने आगरा के दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया। ई.1555 में हुमायूँ ने इसे विक्रमादित्य हेमचंद्र से छीना किंतु इस बार हुमायूँ ने दिल्ली में ही रहना पसंद किया। जब ई.1556 में अकबर बादशाह हुआ तो उसने भी दो वर्ष तक अपनी राजधानी दिल्ली में रखी तथा दिल्ली में ही उसकी मृत्यु हुई।

ई.1558 में जब अकबर आगरा आया तो उसने इस दुर्ग को देखने के बाद अपनी राजधानी आगरा में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। इस प्रकार एक बार पुनः भारत की राजधानी दिल्ली से आगरा स्थानांतरित हो गई।

अबुल फजल ने लिखा है कि- ‘यह किला ईंटों से बना हुआ था और बादलगढ़ के नाम से जाना जाता था। यहाँ लगभग पाँच सौ सुंदर इमारतें, बंगाली व गुजराती शैली में बनी थीं।’

यह किला अत्यंत जीर्ण-शीर्ण स्थिति में था इसलिए अकबर ने इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया। उसने धौलपुर के निकट करौली से लाल पत्थर मंगवाकर ईंटों की दीवारों पर चढ़वा दिया और लगभग सम्पूर्ण दुर्ग का पुनर्निर्माण करवाया। 8 साल तक लगभग 4,000 कारीगर एवं श्रमिक इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करते रहे। ई.1573 में यह दुर्ग दुबारा से बनकर तैयार हुआ और अकबर अपने परिवार सहित इसमें निवास करने लगा।

आगरा के किले की पौरुषपूर्ण विशालाकाय दीवारें और परकोटे किसी महान सत्ता की शक्ति का परिचय देते हैं। किले के भीतर गुजरात और बंगाल शैली के भवन हैं। इस किले के भीतर स्थित लगभग सभी भवनों को शाहजहाँ ने दुबारा बनवाया किंतु किले का मुख्य द्वार अर्थात् दिल्ली दरवाजा और जहाँगीरी महल  अकबर के समय के ही निर्मित हैं।

ई.1566 में निर्मित दिल्ली दरवाजा अकबर के प्रारम्भिक काल की स्थापत्य कला विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है। इस किले का निर्माण तराशे हुए लाल बलुआ पत्थर से किया गया है। इन भवनों के मेहराब, दोनों ओर झुकी हुई अष्टकोणीय दीवारें, तोरणयुक्त छतें, मण्डप, कंगूरे, लाल बलुआ पत्थर पर सफेद पत्थर का अलंकरण प्रमुख हैं।

अकबरी महल

अकबरी महल की स्थापत्य शैली, जहाँगीरी महल के स्थापत्य की तुलना में कम कलात्मक है एवं भद्दी सी दिखाई देती है। अकबरी महल में बंगाली शैली के बुर्ज बने हुए हैं तथा यह महल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

जहाँगीरी महल

अकबरी महल के निकट जहाँगीरी महल का निर्माण करवाया गया। जहाँगीरी महल हिन्दू और इस्लामी पद्धति के मिश्रण से बना है। जहाँगीरी महल में कई स्तम्भ हैं तथा इस महल में जालियों द्वारा सजावट की गई है। यह हिन्दू कला से प्रभावित है। दोनों महलों के बीच में चौकोर आँगन है तथा चारों ओर दुमंजिले कमरे बने हुए हैं।

इस महल में गुम्बदों के बदले छतरियां प्रयुक्त हुई हैं। यह महल ग्वालियर के मानसिंह महल से प्रेरित है। इस महल में हिन्दू स्थापत्य की अधिकता होने से अनुमान लगाया जाता है कि यह महल अकबर के आगरा आगमन से पहले भी मौजूद था तथा हिन्दू राजाओं द्वारा बनवाया गया था। अकबर ने उसका जीर्णोद्धार करवाया और कुछ नव-निर्माण भी करवाए।

फतेहपुर सीकरी के जोधाबाई महल का स्थापत्य इसी जहाँगीरी महल के स्थापत्य से मेल खाता है जो कि मूलतः सीकरी के पूर्ववर्ती शासकों अर्थात् सिकरवार राजपूतों ने बनवाया था और जिसे अकबर द्वारा निर्मित बताया जाता है।

कलात्मक जलकुण्ड (हौज)

जहाँगीरी महल के सामने एक हौज का भी निर्माण करवाया गया था जो एक प्याले के आकार का है। हौज के बाहरी भाग में कुछ पंक्तियां खुदी हुई हैं। अब यह हौज खण्डहर अवस्था में है।

परकोटा एवं दरवाजे

आगरा का किला अर्ध-वृत्ताकार क्षेत्र में बना हुआ है जिसकी सीधी भुजा, यमुना नदी के समानांतर है। इसका बाहरी परकोटा सत्तर फुट ऊँचा है। इसमें दोहरे परकोटे हैं, जिनके बीच-बीच में भारी बुर्ज बराबर अंतराल पर हैं, जिनके साथ ही तोपों के झरोखे एवं रक्षा चौकियां भी बनी हैं।

इसके चार कोनों पर चार द्वार हैं, जिनमें से एक खिड़की द्वार, नदी की ओर खुलता है। इसके दो द्वारों को दिल्ली गेट एवं लाहौरी दरवाजा कहते हैं। जहाँगीर ने अकबर दरवाज़ा का नाम अमरसिंह दरवाजा कर दिया था। यह दरवाजा, दिल्ली-दरवाजा से मेल खाता है। दोनों ही लाल बलुआ पत्थर के बने हैं।

आजकल दर्शक किला देखने के लिये अमरसिंह दरवाजे से प्रवेश दिया जाता है। नगर की ओर का दिल्ली दरवाजा, चारों द्वारों में से भव्यतम है। इसके अंदर एक और द्वार है जिसे हाथी पोल कहते हैं। इसके दोनों ओर दो वास्तविक आकार के हाथियों की पाषाण प्रतिमाएं हैं। इनके निकट रक्षक भी खड़े हैं। एक द्वार से खुलने वाला पुल खाई पर बना है। दुर्ग की प्राचीर में एक चोर दरवाजा भी है।

भवनों की सजावट

इस्लामी अलंकरणों में ज्यामितीय नमूने, लिखाइयां तथा कुरान की आयतें आदि ही फलकों की सजावट में दिखाई देतीं हैं किंतु आगरा के किले के भवनों में हिन्दू एवं इस्लामी स्थापत्य कला का मिश्रण देखने को मिलता है। कई अलंकरण तो ऐसे हैं जिन्हें इस्लाम में वर्जित माना गया है, जैसे- अज़दहे, हाथी एवं पक्षी, जिनसे स्पष्ट है कि ये मूलतः हिन्दू भवन हैं।

अबुल फजल ने इस दुर्ग में लगभग 500 भवनों का उल्लेख किया है। इनमें से कुछ भवन शाहजहाँ के समय ध्वस्त करके सफेद संगमरमर से दुबारा बनाए गए। बहुत सी इमारतों को ब्रिटिश अधिकारियों ने मिलिट्री बैरेक बनवाने के लिए ई.1803 से 1862 के बीच तुड़वा दिया। वर्तमान में दक्षिण-पूर्वी ओर कठिनाई से तीस इमारतें शेष बची हैं।

जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने इस दुर्ग के अनेक पुराने निर्माणों को गिरवाकर नए भवनों का निर्माण कराया जिनका वर्णन जहाँगीर तथा शाहजहाँ के काल में हुए निर्माणों के साथ किया गया है।

फतहपुर सीकरी के अकबर कालीन भवन

फतेहपुर सीकरी, आगरा से 23 मील दक्षिण-पश्चिम में एक ढालू पहाड़ी पर स्थित है। इस नगर के तीन ओर दीवारें और एक ओर कृत्रिम झील थी। यह नगर ई.1571 में बनना आरम्भ हुआ और ई.1580 में बनकर तैयार हुआ। इस समय तक अकबर गुजरात एवं राजपूताना की रियासतों को अपने अधीन कर चुका था। अतः उसके पास अपार सम्पदा एकत्रित हो गई थी। अकबर के दो पुत्रों सलीम (जहाँगीर) तथा मुराद का जन्म सीकरी में ही हुआ था। इसलिए अकबर सीकरी को अपने लिए सौभाग्यशाली समझता था।

अबुल फजल ने लिखा है- ‘शहजादे सलीम का जन्म शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से हुआ था इस कारण शेख सलीम चिश्ती के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए अकबर ने सीकरी को भव्यता प्रदान करने का निर्णय लिया और वहाँ अकबर की राजधानी का निर्माण किया गया।’

जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘मेरे श्रद्धेय पिता ने सीकरी गांव को जो कि मेरा जन्मस्थान था, अपने लिए सौभाग्यपूर्ण समझकर उसे अपनी राजधानी बना लिया। चौदह-पन्द्रह वर्षों में यह जंगली जानवरों से भरी हुई पहाड़ी, समस्त प्रकार के महलों से युक्त नगरी बन गई।’

रिचडर्स ने लिखा है- ‘महलों के बीच बनी मस्जिद में शेख का मकबरा बनवाकर अकबर ने सांकेतिक रूप से राजनीतिक और आध्यात्मिक सत्ता का परस्पर संयोजन कर फतेहपुर सीकरी और आगरा को राजनीतिक सत्ता तथा अजमेर की आध्यात्मिक सत्ता को व्यावहारिक रूप देने की कोशिश की।’

फतेहपुर सीकरी के भवनों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-

(1.) मजहबी इमारतें- जामा मस्जिद, शेख सलीम चिश्ती की दरगाह, बुलंद दरवाजा, इबादतखाना (केन्द्रीय कक्ष या दीवाने आम) आदि।

(2.) रिहाइशी इमारतें- ख्वाबगाह, जोधाबाई महल, बीरबल महल (जनाना महल), बीबी मरियम महल, तुर्की सुल्ताना महल, अबुल फजल एवं फैजी के महल आदि।

(3.) कार्यालयी इमारतें- खजाना, दीवाने आम, दीवाने खास (खास महल) आदि।

मजहबी इमारतें

फतहपुर सीकरी की मजहबी इमारतों का निर्माण अर्द्ध-वृत्ताकार या धनुषाकार शैली में हुआ जबकि गैर-मजहबी इमारतों के निर्माण में शहतीर शैली काम में ली गई।

जामा मस्जिद: सीकरी की जामा मस्जिद यद्यपि इस्लामी स्थापत्य के आधार पर बनाई गई है तथापि इसमें भारतीय स्थापत्य के तत्वों को भी अपनाया गया है। इस मस्जिद के ऊपर तीन गुम्बदों का निर्माण किया गया जिनमें से केन्द्रीय गुम्बद अन्य दोनों की अपेक्षा विशाल है।

इस मस्जिद की रूपरेखा सामान्य है और इसके अग्रभाग की गणना देश की मस्जिदों के सर्वोत्तम अग्रभागों में की जाती है। इसके स्तम्भ और छत पर हिन्दू प्रभाव है। सामान्यतः यह माना जाता है कि इसके गुम्बद ईरानी स्थापत्य की प्रतिकृति हैं किंतु इसका केन्द्रीय गुम्बद चम्पानेर की जामी मस्जिद के गुम्बद से काफी साम्य रखता है। इन तीनों गुम्बदों के ऊपर के कलश पूरी तरह से हिन्दू स्थापत्य से लिए गए हैं।

मस्जिद और उसके केन्द्रीय भाग में सजावट के लिए भित्तिचित्र बनाए गए हैं। पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘इस सुन्दर इमारत में जो सजावट की विभिन्नता है, उसका सही वर्णन नहीं किया जा सकता किंतु ऐसा लगता है कि इसके कलाकारों ने किसी बहुत ही सुंदर हस्तलिखित ग्रंथ के पृष्ठों को अपना नमूना मान लिया और उन्हें अपनी रेखाओं तथा रंगों के ताने-बाने में बुनकर दीवारों के रिक्त स्थान की सजावट के लिए अंकित कर दिया।’

कुछ विद्वानों के अनुसार फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिद केवल दीन-ए-इलाही के अनुयायियों के लिये थी। संभवतः मस्जिद के मूल निर्माण के समय केवल मस्जिद ही बनाई गई थी, इस कारण उत्तरी दरवाजा भी बनाया गया किंतु बाद में इसके उत्तरी कौने में शेख सलीम चिश्ती को दफनाया गया। उस समय मस्जिद का उत्तरी द्वार बंद कर दिया गया। अकबर ने लगभग 25 वर्ष बाद दक्षिण विजय के उपरांत दक्षिण द्वार भी गिरवा दिया और उसके स्थान पर बुलंद दरवाजा बनवाया।

शेखी सलीम चिश्ती का मकबरा: शेखी सलीम चिश्ती का मकबरा फतेहपुर सीकरी की स्थापत्यकला का विशिष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण जामा मस्जिद के खुले आंगन के उत्तरी कोने में किया गया है। फतेहपुर सीकरी के अन्य भवन लाल बलुआ पत्थर के बने हुए हैं किंतु चिश्ती का मकबरा सफेद संगमरमर से बना हुआ है।

पर्सी ब्राउन का मानना है कि फतेहपुर की अन्य इमारतों की भांति इसका निर्माण भी लाल बलुआ पत्थर से हुआ हो लेकिन जहाँगीर या शाहजहाँ के काल में इसकी रचना में बिना कोई परिवर्तन करवाए ही इसको ज्यों का त्यों संगमरमर की इमारत में बदल दिया गया।

इसकी योजना वर्गाकार है और इसको सुसज्जित करने के लिए सजावटपूर्ण स्तम्भों और छज्जों का निर्माण किया गया है। इसके शाफ्ट्स टेढ़े-मेढ़े और सर्पिलाकार हैं और उनके ऊपर का शिरो-भाग चूने की उभरी हुई आकृतियों से सजाया गया है।

बरसाती की स्तम्भों के कोष्ठक (ब्रैकेट) बहुत सुंदर हैं। सलीम चिश्ती के मकबरे की विशेषताएं हिन्दू मंदिरों से ली गई हैं। शेख सलीम की दरगाह में इतनी हिन्दू विशेषताओं को देखकर स्मिथ आश्चर्य में पड़ गए थे। उन्होंने लिखा है कि सम्पूर्ण भवन में हिन्दू अनुभूति का अनुमान होता है।

इस भवन के भीतरी भागों को सुंदर जालियों, सजावटदार दीवारों तथा फर्श को रंग-बिरंगी कलाकृतियों द्वारा सुसज्जित किया गया है। मकबरे की कब्र के चबूतरे के ऊपर एक लकड़ी की चांदनी है जिसमें आबनूस की लकड़ी और सीपों का जड़ाऊ कार्य किया गया है।

पर्सी ब्राउन ने इसे देखते हुए लिखा है कि इसकी स्थापत्य कला इस्लाम की बौद्धिकता तथा गांभीर्य की अपेक्षा मंदिर निर्माता की मुक्त कल्पना का आभास कराती है। इस मकबरे में शेख सलीम चिश्ती और उसके पौत्र इस्लाम खाँ की कब्रें बनी हुई हैं।

बुलंद दरवाजा: भारत का सबसे ऊँचा दरवाजा फतेहपुर सीकरी की मस्जिद के दक्षिणी द्वार की तरफ निर्मित बुलंद दरवाजा है। पृथ्वी की सतह से इसकी ऊँचाई 176 फुट है जबकि इसके चबूतरे की ऊँचाई 42 फुट है। इसके आगे का भाग 130 फुट चौड़ा तथा आगे से पीछे तक लम्बाई 123 फुट है।

इसे ई.1573 में अकबर की गुजरात विजय के उपलक्ष्य में बनाया गया था। इसे पूरा होने में पाँच साल लगे थे। अर्थात् यह ई.1578 में बनकर तैयार हुआ।

बुलंद दरवाजा स्वयं अपने-आप में एक भवन है। इसमें एक बड़े हॉल के साथ कई छोटे-छोटे कक्षों की योजना है जिनके द्वारा जामा मस्जिद के भवन तक पहुंचा जा सकता है। इस प्रवेश द्वार का आगे का भाग ईरानी शैली में बना हुआ है किंतु इसकी बनावट स्पष्ट रूप से भारतीय है। केंद्रीय द्वार-मण्डप में तीन मेहराबदार प्रवेश द्वार हैं जिनमें सबसे बड़ा मध्य में है। इसे ‘होर्स शू गेट’ के रूप में जाना जाता है।

इसके बीच के ऊँचे भाग और उसके दोनों ओर के कम ऊँचे तथा कोण पर कम होते हुए भागों को तीन सतहों द्वारा उभारा गया है। बीच का भाग एक सिरे से दूसरे सिरे तक 86 फुट है। इसकी बनावट आयताकार है और इसकी सतह के बड़े भाग में एक मेहराबी और गुम्बदी मार्ग है।

इसके दोनों बगल के संकरे भाग तीन-मंजिले हैं। उनकी प्रत्येक मंजिल पर कई प्रकार की खिड़कियां हैं। इसके अग्रभाग का मेहराबी मार्ग इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। दरवाजे के दक्षिणी अग्रभाग पर एक सुंदर कंगूरेदार सफी है जिसके पीछे 12 ऊँची गुमटियां हैं। इनके पीछे तीन और छतरियां हैं जिनके ऊपर गोल गुम्बद हैं। इन गुम्बदों पर कलश चढ़ाए गए हैं।

दरवाज़े के प्रवेश द्वार में दो शिलालेख लगे हैं। बुलंद दरवाजा यूनेस्को की विश्व-धरोहर संरचनाओं की सूची में सबसे महत्वपूर्ण इमारतों में से एक माना जाता है। पर्सी ब्राउन ने इसके बारे में लिखा हैं- ‘बुलन्द दरवाजा एक प्रभावशाली निर्माण कार्य है, विशेषकर तब जबकि यह जमीन पर खड़ा होकर देखा जाये। तब यह उत्तेजक एवं विस्मयकारक शक्ति का रूप दिखाई देता है किन्तु इसका प्रभाव भार-स्वरूप तथा दिखावटी प्रतीत नहीं होता है।’

सरकारी इमारतें

दीवान-ए-आम: दीवान-ए-आम की बनावट आयताकार है तथा दीवान-ए-खास की वर्गाकार। दीवाने आम के मध्य में एक नक्काशीदार केन्द्रीय स्तम्भ है जिसका शीर्ष, आकार में विशाल है। इसी शीर्ष पर जैन शैली के मेहराबदार ब्रैकिटों पर गोल चबूतरा टिका हुआ है। इसमें बौद्ध तथा हिन्दू वास्तुकला की झलक दिखाई देती है।

केन्द्रीय स्तम्भ के शीर्ष पर बैठी देवी की मूर्ति की कल्पना की गई है जिसे कन्हेरी की बौद्ध गुफाओं में सामान्यतः देखा जा सकता है। ऐसी बनावट का आशय यह प्रतीत होता है कि जब अकबर विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के प्रतिनिधियों के बीच विवाद को सुनता हुआ इस केन्द्रीय मंच पर आसीन होता होगा तो संभवतः अपने सिंहासन को ‘बिहिश्त’ के सिंहासन के समकक्ष अनुभव करने का प्रयास करता होगा।

वास्तव में यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि यह कक्ष दीवान-ए-आम था अथवा धार्मिक चर्चाओं के लिए प्रयोग में लिया जाने वाला कक्ष अर्थात् ‘इबादतखाना’, जहाँ से अकबर ने ‘दीन-ए-इलाही’ का प्रवर्तन किया था!

दीवाने खास: इसे खास हॉल भी कहते हैं। यह पच्चीसी आंगन के उत्तरी छोर पर स्थित है। यह अकबर का शाही कक्ष था। अकबर द्वारा निर्मित दीवान-ए-खास अनेक विशेषताओं से युक्त है। यह इमारत बहुत ही प्रभावशाली है। इस इमारत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बनावट है जो कलाकारी का उत्कृष्ट उदाहरण है।

इसके मध्य का सतून अत्यन्त सुन्दर ढंग से बना है जिसकी नक्काशी देखने योग्य है। इसी सतून के ऊपर शाही तख्त रखा रहता था जिसको रोकने के लिए बहुत सी नक्शदार छतगीरियाँ हैं। सिंहासन तक पहुँचने के लिये चारों कोनों से छज्जों के रूप में चार मार्ग बनाये गये हैं। इसका निर्माण हिन्दू स्थापत्य के अनुसार हुआ है। इसके निकट ही ‘आंख-मिचौली’ बनी हुई है।

ट्रेजरी: दीवान-ए-खास के पास ट्रेजरी है। इसे गुप्त पत्थर की तिजोरी का घर भी कहा जाता था जो कुछ कोनों में सुरक्षित था। इस ट्रेजरी की छत पर ‘समुद्र- राक्षसों’ की मूर्तियां बनाई गई थीं जो यहाँ जमा किये गये धन की रक्षा करने के उद्देश्य से थीं।

ज्योतिषी की छतरी: ट्रेजरी के सामने ज्योतिषी की छतरी है जिसकी छत जैन शैली में तैयार की गई है।

रिहाइशी इमारतें

पंचमहल: पंचमहल अथवा हवामहल पच्चीसी आंगन के पश्चिम में स्थित ‘जनाना बाग’ के एक कोने में स्थित है। इस महल में अकबर द्वारा आंचलिक स्थापत्य तत्वों का समावेश किया गया था। इसमें नालंदा के बौद्ध विहारों के लक्षण दिखाई देते हैं। हिन्दू और बौद्ध धर्म-ग्रंथों में उल्लिखित सभा भवनों के आदर्श पर ही सम्भवतः पंच महल की निर्माण योजना तैयार की गई थी।

इस पाँच मंजिले खुले मण्डप की पहली मंजिल एक बड़े हॉल जैसी है। ऊपर वाली प्रत्येक मंजिल अपनी नीचे वाली मंजिल से छोटी होती गई है। पाँचवे तल में अर्थात् सबसे ऊपर के तल में चौखूंटे स्तम्भों पर टिकी हुई एक छोटी सी सुन्दर छतरी है।

सबसे नीचे की मंजिल में 84, पहली मंजिल में 56, दूसरी मंजिल में 20, तीसरी मंजिल में 20, चौथी मंजिल में 12 तथा सबसे ऊपर की मंजिल में 4 स्तम्भ हैं तथा सम्पूर्ण भवन में कुल 196 स्तम्भ हैं। हर स्तम्भ पर अलग तरह की नक्काशी की गई है। कहीं पर जैन स्थापत्य कला शैली की विशेषतायें दिखाई देती हैं तो कहीं पर हिन्दू स्थापत्य शैली की।

इसी प्रकार मुस्लिम स्थापत्य कला तथा बौद्ध स्थापत्यकाल की विशेषताओं को भी सम्मिलित किया गया है। नीचे की मंजिलों पर हिन्दू स्थापत्य शैली की छाप अधिक है। सजावट तथा सुन्दरता के लिये घण्टियों तथा जंजीरों की बेलों का बहुत सुंदर ढंग से प्रयोग किया गया है।

पंचमहल का निर्माण वस्तुतः हवामहल के रूप में किया गया था ताकि हरम की औरतें गर्मियों के दिनों में ठण्डी हवा का आनंद ले सकें। इसके बाहरी हिस्सों को पत्थरों की कलात्मक जालियों से ढका गया था ताकि कोई बाहरी व्यक्ति हरम की औरतों को न देख सके। इस महल का निर्माण सिकरवार राजपूतों द्वारा किया गया जो कि मुगलों के फतेहरपुर सीकरी आगमन से पहले सीकरी क्षेत्र पर शासन करते थे।

जोधाबाई का महल: जोधाबाई का महल फतहपुर सीकरी के महलों में सबसे पुराना एवं सबसे बड़ा है। जोधाबाई जहाँगीर की पत्नी थी तथा उसका वास्तविक नाम जगत गुसाईन था। वह जोधपुर की राजकुमारी थी। इस महल की बनावट न तो मुस्लिम स्थापत्य शैली की है और न हिन्दू स्थापत्य के अनुसार। वास्तव में यह इमारत अपने समय की मिली-जुली शैलियों की है। इसकी बनावट आगरा के जहाँगीरी महल के समान है। इसकी छत बहुत सुन्दर एवं सजीव है और इसमें तराशे हुए पत्थरों का उपयोग हुआ है।

पर्सी ब्राउन ने लिखा है कि इस भवन से तत्कालीन स्थापत्य कला के पूर्ण विकसित रूप का परिचय मिलता है। इसके निर्माण में भारतीय शैली के कोष्ठकों (ब्रैकेट्स) का प्रयोग किया गया है। पर्सी का मानना है कि इस भवन का निर्माण अवश्य ही गुजराती कारीगरों को सौंपा गया होगा। जहाँगीरी महल शाही आवास का आरम्भिक और प्रायोगिक रूप लगता है। जबकि जोधाबाई महल परिपक्व रूप लिए हुए है।

बीबी मरियम की कोठी: इसका असली नाम सुनहरी मकान है। यह दो-मंजिला भवन, जोधाबाई महल के निकट स्थित है। इसे सज्जित और कलात्मक बनाने के लिए बेहतर नक्काशी का काम किया गया है। इसके स्तम्भों में बंदरों, हाथियों और चीतों आदि वन्य-पशुओं की आकृतियां बनाई गई थीं। इसकी भीतरी तथा बाहरी दीवारों पर सुनहरे पत्थर जड़े गए थे। इसमें संगतराशी का अच्छा काम किया गया था। महल के भीतरी भाग में ईरानी शैली के सुन्दर चित्र बनाये गये थे जो अब नष्ट हो गये हैं।

स्मिथ ने इन चित्रों को ईसाई धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबिल पर आधारित बताया है परन्तु इसमें पंखवाली शबीहें दिखाई गई हैं, जो ईरानी देवमाला पर आधारित हैं। इनकी शक्ल फरिश्तों के समान हैं। ये भित्तिचित्र इस महल की भीतरी दीवारों, कमरों के आलों और बारामदे की बाहरी दीवारों पर चित्रित किए गए थे।

मरियम-उज्ज़मानी का महल प्राचीन हिन्दू घरों के ढंग का बनवाया गया था। इसलिए इसे महल न कहकर कोठी कहा जाता है। इस भवन के आंगन में तुलसी के पौधे का थाला है और सामने एक मंदिर के चिह्न हैं। दीवारों में मूर्तियों के लिए आले बने हैं तथा कृष्णलीला के चित्र हैं जो औरंगजेब द्वारा घिसवा दिए जाने के कारण मद्धिम पड़ गए हैं।

भवन के पत्थरों पर मंदिर के घंटों के चिह्न भी अंकित हैं। इस तीन मंज़िले घर के ऊपर के कमरों को ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन महल कहा जाता था। ग्रीष्मकालीन महल में पत्थर की बारीक जालियों में से ठंडी हवा छन-छन कर आती थी।

तुर्की सुल्ताना का महल: तुर्की सुल्ताना का महल फतेहपुर सीकरी की इमारतों में सबसे अच्छा माना जाता है। इसकी निर्माण शैली तथा पत्थरों की बनावट सुन्दर एवं सजीव है। इसके बारे में रशब्रुक विलियम ने लिखा है-

‘यहाँ अकबर के शासनकाल की चित्रकारी बहुत ही सुन्दर है। इसके अतिरिक्त यह महल संगतराशी का अच्छा उदारहण है। इसकी दीवारों पर जंगल, पेड़-पौधे, झाड़ियों आदि के दृश्य बहुत ही सुन्दर ढंग से बने हैं। झाड़ियों में शेर और पेड़ों पर मोर बैठे दिखाई देते हैं।’

तुर्की सुल्ताना का महल एक लघु किंतु सुंदर रचना वाला भवन है जिसमें एक ही मंजिल है और स्तम्भों पर आधारित योजना पर निर्मित है। पर्सी ब्राउन ने इस महल को ‘स्थापत्यकाल का मोती’ कहा है।

तुर्की सुल्ताना के विषय में अनुमान है कि यह या तो हिन्दाल की पुत्री रुकय्या बेगम थी या अकबर की पत्नी सलीमा बेगम जो वास्तव में बैरम खाँ की विधवा और हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि अब्दुर्रहीम खानखाना की माँ थी और जिससे अकबर ने विवाह कर लिया था। इस महल की दीवारों का गढ़न बहुत सुंदर है तथा इनका स्थापत्य कोमलता एवं सुरुचिता का प्रदर्शन करता है। इसका भीतरी भाग अत्यधिक सजावट पूर्ण है।

दीवारों के निचले रंगे हुए भाग पर हाथी, चीता आदि पशुओं की आकृतियां बनी हुई हैं और कई प्रकार के वृक्ष, पौधे एवं फल-फूल खुदे हुए हैं। इनमें से कुछ मानव-आकृतियाँ भी हैं जिनके चेहरे औरंगजेब के समय मिटा दिये गये क्योंकि ये इस्लाम के विरुद्ध थे।

इस भवन में ढलवां छज्जों एवं चमकदार टाइलों का प्रयोग किया गया है। पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘इसकी बनावट और उभरे चित्रों की सजावट के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि इसकी सजावट में काष्ठकला का अनुकरण किया गया है और इसके बनाने वाले कारीगर पंजाब से आए होंगे जहाँ अकबर के काल में पत्थरों पर लकड़ी जैसी खुदाई करने की कला प्रचलित थी।’

अकबर का निजी महल: तुर्की सुल्ताना के महल से लगा हुआ अकबर का निजी महल है। इस दो मंजिले भवन में चारों कोनों पर छतरियों का निर्माण किया गया है। इसकी बाहरी दीवार सफेद संगमरमर के जालीदार पर्दों और लाल ग्रेनाइट के पत्थरों की बनी थीं। इस सहन के दक्षिण में बादशाह का शयनागार है।

यह 15 गुणा 15 वर्ग फुट की लम्बाई-चौड़ाई का वर्गाकार भवन है। इसमें चार द्वार हैं जिनमें से प्रत्येक के ऊपर फारसी की चार आयतें लिखी गई हैं। ये आयतें परस्पर जुड़कर एक पद बनाती हैं जो अकबर की प्रशंसा में लिखा गया है। अकबर के शयनागार से ही लगा हुआ पुस्तकालय का कक्ष है और ऊपरी मंजिल के एक कोने में ही झरोखा दर्शन है जहाँ बादशाह प्रतिदिन प्रातःकाल में अपनी प्रजा को दर्शन देता था।

अकबर का निजी महल ख्वाबगाह के नाम से भी जाना जाता था। इसके ऊपर की मंजिल का छोटा कमरा अकबर का शयनागार था जिसकी दीवारों पर अनेक चित्र अंकित थे। इन चित्रों में महात्मा बुद्ध, मदर मेरी तथा शिशु रूप में ईसा मसीह के चित्र थे। साथ ही आखेट तथा नदी-नालों के दृश्य भी बने हुए थे। ये चित्र अब धूमिल हो गये हैं।

राजा बीरबल का महल: राजा बीरबल के महल का निर्माण मरियम महल की शैली पर हुआ है। बीरबल महल काफी ऊँची कुर्सी पर बना हुआ है तथा सीकरी की समस्त इमारतों में इसका गुम्बद सबसे सुन्दर दिखाई देता हैं। यह दो मंजिली इमारत है जिसकी पहली मंजिल में दो बरसातियां हैं।

ऊपरी मंजिल के कमरों के ऊपर चपटे गुम्बद बने हैं और बरसातियों पर मिस्र के पिरामिड जैसी छत-योजना अपनाई गई है। इन गुम्बदों और पिरामिडों जैसी छतों में दुहरे गुम्बद का प्रयोग किया गया है अर्थात् इन गुम्बदों के दो खोल हैं तथा दोनों खोलों के बीच खाली जगह है। ताकि नीचे का भवन ठण्डा रह सके।

इस मंजिल की विशेषता इसमें किया गया नक्काशी का काम और इसके अत्यधिक सुसज्जित ब्रैकेट हैं। इस भवन के भीतरी एवं बाहरी दोनों ही भागों में रचना सम्बन्धी और सजावटी तत्व उल्लेखनीय हैं क्योंकि उन्हें इतनी बारीकी से कहीं भी सुनियोजित अथवा निर्मित नहीं किया गया है जितना कि उन्हें अपेक्षाकृत इस छोेटे किंतु वैभवपूर्ण राजसी आवास में गढ़ा गया है।

अनूप तालाब: पंचमहल के सामने स्थित यह सुंदर जलकुण्ड अकबर द्वारा बनाया गया था। इसे अनूप तालाब भी कहा जाता था। कहा जाता है कि यहाँ गायक और संगीतकार पानी के ऊपर एक मंच पर प्रदर्शन करते थे। अकबर अपने निजी महल अर्थात् दौलत ख़ाने से इस संगीत का आनंद लेता था।

फजल और फैजी के महल

जामा मस्जिद के पीछे दो मामूली से किंतु ऊँचे आवासगृह हैं जो एक ही चाहरदीवारी के भीतर हैं और जिनका प्रवेशद्वार भी एक ही है। ये आवास अकबर के मित्र तथा नवरत्न अबुल फजल और उसके भाई फैजी के लिए बनवाए गए थे। इन दोनों महलों में किसी तरह का अलंकरण नहीं है। अब ये दोनों महल अच्छी दशा में नहीं हैं।

हिरन मीनार

हिरन मीनार फतेहपुर सीकरी की प्रसिद्ध इमारतों में से एक है। मान्यता है कि इस मीनार के अंदर ख़ूनी हाथी ‘हनन’ की समाधि है। मीनार में ऊपर से नीचे तक आगे निकले हुए हिरन के सींगों की तरह पत्थर जड़े हैं। इसके पास के मैदान में बादशाह अकबर शिकार खेलता था।

यहाँ बेगमों के आने के लिए अकबर ने एक आवरण-मार्ग भी बनवाया था। हिरन मीनार की दीवारों पर बड़े-बड़े सींगनुमा नुकीले पत्थर लगे हैं। संभवतः इसीलिए इसका नाम हिरन मीनार पड़ा। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यहाँ जंगल से घेरकर हिरन लाए जाते थे तथा इस बुर्ज पर चढ़कर मुग़ल बेगमें उन हिरनों का शिकार करती थीं।

फतेहपुर सीकरी के अन्य भवन

पंचमहल के निकट मुग़ल शहजादियों का मदरसा है। फतेहपुर सीकरी के अन्य भवनों में मरियम का चमन, जनाना बाग, शिफाखाना, जनाना रास्ता, मीना बाजार, दफ्तरखाना, हकीम का महल, जौहरी बाजार, नौबतखाना, राजा टोडरमल का महल आदि प्रमुख हैं। पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी के ये वैभवशाली महल ताजमहल के पश्चात् मुगलों की सर्वश्रेष्ठ कृतियां हैं।’

शहतीरी और मेहराबी शैलियों का समन्वय

फतेहपुर सीकरी के सभी शाही महल एवं मजहबी भवन यहाँ तक कि सरकारी कार्यालय भी तीरा-ब्रैकेट तथा पटी हुई छतों की शैली (ट्रैबिएट शैली) के हैं और मेहराब का प्रयोग मुख्यतः मेहराबी गुम्बदी सजावट के लिए किया गया है। सही अर्थों में फतेहपुर सीकरी के भवनों में ट्रैबिएट (शहतीरी) और आर्कुएट (मेहराबी) शैलियों का समन्वय किया गया है।

सीकरी के भवनों में प्रयुक्त गुम्बदों का भी भारतीयकरण किया गया है। इन पर जो नक्काशी या जड़ाऊ कार्य किया गया है, उसमें नवीनता के लक्षण दिखाई देते हैं। सीकरी के सभी भवन मुख्यतः लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित हैं। केवल सजावट के लिए या किन्हीं अंशों पर जोड़ देने के लिए ही इनमें सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया है। केवल शेख सलीम चिश्ती की दरगाह को सफेद संगमरमर से ढका गया है।

सीकरी का फीका पड़ता वैभव

फतेहपुर सीकरी के निर्माण अकबर के शासनकाल में ई.1671 के आसपास आरम्भ हुए तथा अनुमानतः ई.1585 तक पूर्णता को प्राप्त कर गए। ई.1585 में अकबर को उजबेकों से लड़ने के लिए सीकरी छोड़कर लाहौर जाना पड़ा। इसके बाद से सीकरी का वैभव फीका पड़ने लगा। सीकरी केवल कुछ समय के लिए अकबर की राजधानी रही।

ई.1605 में अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर बादशाह हुआ किंतु उसने फिर से आगरा को अपनी राजधानी बनाया और अपने जीवन का बड़ा हिस्सा अजमेर में व्यतीत किया। उसके उत्तराधिकारियों में से किसी ने भी फिर सीकरी की तरफ मुड़कर नहीं देखा। इसलिए सीकरी का स्थापत्य केवल देखने-दिखाने की वस्तु बनकर रह गया।

फतेहपुर सीकरी के स्थापत्य पर विद्वानों की टिप्पणियां

फतेहपुर सीकरी के स्थापत्य को देखने के लिए दुनिया भर के विद्वानों ने सीकरी की यात्रा की तथा इन भवनों का अवलोकन करने के बाद महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं जिनमें से कुछ टिप्पणियां इस प्रकार हैं-

अकबर के समकालीन लेखक रॉल्फ फिच ने ई.1585 में लिखा है- ‘आगरा और फतेहपुर सीकरी दो बड़े नगर हैं। इनमें से कोई भी लंदन से कहीं अधिक बड़ा है। इनकी आबादी बहुत अधिक है। ये बड़ी घनी आबादी के हैं। आगरा और सीकरी के बीच 12 कोस का फासला है और पूरे मार्ग में खाने-पीने की तथा अन्य वस्तुओं का ऐसा भरा-पूरा बाजार है कि जैसे कोई किसी नगर में ही हो। और इतने आदमी होते हैं कि जैसे बाजार ही लगा हो……. यह ईरान और भारत के व्यापारियों और सिल्क कपड़ा, कीमती रत्नों, हीरों तथा मोतियों के व्यापार का बड़ा केन्द्र है।’

फर्ग्यूसन ने लिखा है- ‘सब मिलाकर फतेहपुर सीकरी का यह महल पाषाण का ऐसा रोमांच है जैसे कि कहीं कम, बहुत ही कम मिलेंगे और यह उस महान् व्यक्ति जिसने इसे बनवाया था, के मस्तिष्क की ऐसी प्रतिच्छाया है जो किसी अन्य स्रोत से सरलता से उपलब्ध नहीं हो सकती।’

वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी जैसा निर्माण कार्य न तो पहले कभी हुआ था और न फिर कभी होगा। ये रोमांच का पाषाण प्रतिरूप हैं। जैसे अकबर की अद्भुत प्रवृत्ति के आते-जाते मनोभाव जड़ हो गए हों। और लगता है जैसे कि जब तक मनोभाव बने रहे तब तक विद्युत गति से इसे बनाकर खत्म कर दिया गया हो। किसी और समय अथवा किन्हीं अन्य स्थितियों में यह अकल्पनीय और असंभव था। संसार निश्चय ही उस समय के शासन के प्रति कृतज्ञता अनुभव कर सकता है जिसके लिए ऐसी प्रेरित मूर्खता करना संभव था।’

फतेहपुर सीकरी की राष्ट्रीय स्थापत्य शैली

फतेहपुर सीकरी की अकबर कालीन समस्त इमारतें हिंदू-मुस्लिम मिश्रित स्थापत्य शैली की हैं। इनमें हिन्दू स्थापत्य की प्रधानता है। इनमें से कुछ की सजावट, जैसे- दीवाने खास में लगे हुए स्तम्भों के तोड़े, पंचमहल और जोधाबाई के महल में लगे हुए उभरे घण्टे तथ जंजीर और मरियम के महल में पत्थर खोदकर बनाये गये पशु-पक्षियों के चित्र इत्यादि हिन्दू और जैन मन्दिरों की ही नकल हैं। संगमरमर और बलुआ लाल पत्थर से बना हुआ बुलन्द दरवाजा स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है।

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी की स्थापत्य कला की शैली भारतीय प्राचीन संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों को समन्वित करने और मिलाने की अकबर की नीति को ही जैसे पाषाण रूप में प्रस्तुत करती हैं।’ 

डा. श्रीवास्तव ने अकबर की इस समन्वित स्थापत्य शैली को राष्ट्रीय स्थापत्य कला शैली कहा है। अकबर ने स्थापत्य की जो नई शैली विकसित की, उसका प्रभाव सारे देश पर और राजस्थान के राजपूत राजाओं पर पड़ा। अकबर के शासनकाल में अजमेर, बीकानेर, जोधपुर, आम्बेर, ओरछा और दतिया में जो महल बने, उन पर मुगल कला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। हिन्दुओं के मन्दिर भी इस शैली के प्रभाव से नहीं बच सके।

हिन्दू राजाओं के महलों के बारे में पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘राजपूत भवनों को देखकर कोई भी कल्पना कर सकता है कि उनमें प्रारम्भिक मुगली कला, जैसे-कटोरेदार मेहराबें, काँच की पच्चीकारी, दरीखाना, पलस्तर की रँगाई किस प्रकार हिन्दू राजाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अपना लिये गये थे।’

क्या सीकरी के महल हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली के हैं?

इन इतिहासकारों ने अकबर-कालीन इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम एकता के तत्व ढूंढे हैं जबकि इस वास्तविकता को भी भुलाया नहीं जाना चाहिए कि फतेहपुर सीकरी के अधिकांश महलों का निर्माण सिकरवार राजपूतों ने करवाया था, अकबर ने तो केवल उनके बाहरी रूप को बदला था।

अंग्रेजी इतिहासकार, लेखक एवं पुरातत्ववेत्ता इस बात को नहीं समझ पाए थे, इसलिए उन्होंने मुगल कालीन इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली के दर्शन किए। बाद के भारतीय लेखकों ने भी उन्हीं के लिखे हुए को सच मान लिया। बहुत से भारतीय लेखकों ने तो इन भवनों को अपनी आंखों से देखे बिना ही यूरोपीय लेखकों का अनुसरण किया।

यहाँ तक कि कुछ इतिहासकारों ने फतेहपुर सीकरी के भवनों को राष्ट्रीय स्थापत्य शैली भी घोषित कर दिया।

अन्य नगरों के अकबर कालीन भवन

लाहौर का किला

लाहौर नगर की स्थापना भगवान राम के पुत्र लव ने की थी। उन्हीं के नाम पर यह लाहौर कहलाया। यहाँ हजारों सालों से हिन्दू राआओं का राज्य था। लाहौर का दुर्ग सबसे पहले कब और किसने बनवाया, इसका विवरण नहीं मिलता किंतु यह निश्चित है कि लाहौर में प्राचीन काल से ही एक बड़ा दुर्ग स्थित था जिसकी चिनाई मिट्टी-गारे में की गई थी। अकबर ने ई.1566 में इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया तथा इसके भीतर कई भवन बनवाए।

वस्तुतः उस काल में अकबर ने नवीन निर्माण बहुत कम करवाए अपितु पुराने भवनों के बाहरी स्वरूप को मुगल शैली में ढालने का काम अधिक किया। आगे भी उसके वंशजों ने यह परम्परा जारी रखी जो शाहजहाँ के काल तक चलती रही।

लाहौर दुर्ग आगरा के दुर्ग के समान अत्यंत विशाल है। लाहौर के किले की इमारतें आगरा के किले के जहाँगीरी महल के समान हैं। अन्तर यह है कि लाहौर के किले की सजावट आगरा के किले की अपेक्षा अधिक घनी है। तोड़ों में हाथी और सिंहों की मूर्तियाँ और छत के नीचे कारनिस में मोरों के चित्रों को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जाता है कि यह भवन मुगलकाल से भी पहले मौजूद रहा होगा तथा इसका मूल निर्माण हिन्दू राजाओं ने करवाया होगा।

भवन निर्माण में अपनाई गई शैलियों से ज्ञात होता है कि इस दुर्ग के अधिकांश भवनों के शिल्पकार हिन्दू थे। अकबर के काल में बने बहुत से मुगल भवनों की सजावट में, इस्लाम में वर्जित अलंकरण अर्थात् जीवित पशु-पक्षियों एवं मनुष्यों के चेहरे एवं मूर्तियां दिखाई देते हैं जिससे यह धारणा पुष्ट होती है कि अकबर के समय प्राचीन हिन्दू इमारतों को ही मुगल शैली के भवनों में बदल दिया गया था।

लाहौर के किले के भीतर अकबर के बाद जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब ने भी बड़े स्तर पर निर्माण करवाए। जहाँगीर काफी समय तक लाहौर में नरहा थां उसने लाहौर दुर्ग में कुछ आवासीय महलों का निर्माण करवाया। शाहजहाँ ने दीवान-ए-खास, शीश महल, नौलखा पेवेलियन और मोती मस्जिद बनवाए जबकि औरंगजेब ने आलमगीर दरवाजे का निर्माण करवाया। महाराजा रणजीतसिंह ने भी दुर्ग में कुछ निर्माण करवाए जिनमें से शीशमहल पर बनवाया गया उनका निजी महल भी था।

यह किला 1,400 फुट लंबा और 1,115 फुट चौड़ा है। यूनेस्को ने ई.1981 में इसे विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया। वर्तमान में आलमगीर दरवाजे से ही किले में प्रवेश किया जाता है। दीवाने आम, दीवाने खास और शीश महल किले के मुख्य आकर्षण हैं। लाहौर के उत्तर-पश्चिम किनारे में स्थित यह किला, लाहौर का प्रमुख दर्शनीय स्थल है।

इलाहाबाद का किला

प्रयागराज (इलाहाबाद) का किला मूलतः किसने बनवाया, इस पर विवाद है। यहाँ पहले से ही एक हिन्दू किला मौजूद था जिसे मुगल बादशाह अकबर ने नए सिरे से बनवाया। अकबर के समकालीन लेखक अब्दुल कादिर बदायूंनी ने ‘मुंतखवुल-तवारीख’ में लिखा है कि इलाहाबाद किले की नींव ई.1583 में डाली गई।

नदी की कटान से यहाँ की भौगोलिक स्थिति स्थिर न होने से इसका नक्शा अनियमित ढंग से तैयार किया गया। अनियमित नक्शे पर किले का निर्माण कराना ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। किला तीस हजार वर्ग फुट क्षेत्र में बना है। इसके निर्माण में छः करोड़ 17 लाख 20 हजार 214 रुपये लागत आयी थी।

ई.1773 में अंग्रेजों ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया। उन्होंने ई.1775 में इस दुर्ग को बंगाल के नवाब शुजाउद्दौला को 50 लाख रुपये में बेच दिया। ई.1798 में नवाब शुजात अली और अंग्रेजों में एक संधि के बाद किला फिर से अंग्रेजों के अधिकार में चला गया। आजादी के बाद इसमें भारतीय सेना रहती है। दुर्ग में फारसी भाषा का एक शिलालेख लगा है जिसमें किले की नींव पड़ने का वर्ष ई.1583 दिया गया है।

दुर्ग में जहाँगीर महल, तीन बड़ी गैलरी तथा ऊँची मीनारें हैं। मुगलों ने दुर्ग में कई फेरबदल कराये। अंग्रेजों ने भी इसमें कई परिवर्तन किए जिससे किले का अकबर कालीन स्वरूप बहुत-कुछ बदल गया। संगम के निकट स्थित इस किले के कुछ भाग ही पर्यटकों के लिए खुले रहते हैं।

शेष हिस्से भारतीय सेना के अधिकार में हैं। पर्यटकों को अशोक स्तंभ, सरस्वती कूप और जोधाबाई का महल दिखाया जाता है। दुर्ग परिसर में अक्षय वट के नाम से विख्यात बरगद का एक पुराना पेड़ और पातालपुर मंदिर भी है। इलाहाबाद का किला खण्डहर प्रायः हो गया है। उसकी अनेक इमारतें नष्ट हो गई हैं। केवल जहाँगीर महल ही अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में है।

अजमेर का किला

अकबर पहाड़ी दुर्ग में रहने का अभ्यस्त नहीं था। वह अजमेर के तारागढ़ दुर्ग तक पहुँचने के लिये उपलब्ध पहाड़ी दुर्गम पथ को भी पसंद नहीं करता था। वह आगरा, लाहौर, इलाहाबाद तथा फतहपुर सीकरी के मैदानी दुर्गों में रहना पसंद करता था जहाँ बड़े-बड़े बाग बनाए जा सकें। इसलिये उसने अजमेर में एक मैदानी दुर्ग बनाने का निर्णय लिया।

जिस स्थान पर अकबर ने अपने लिये नया दुर्ग बनवाने का निर्णय लिया, उस स्थान पर पहले से एक प्राचीन दुर्ग बना हुआ था। यह दुर्ग कब और किसने बनवाया था इसकी जानकारी इतिहास के ग्रंथों में प्राप्त नहीं होती किंतु चूंकि यह अजमेर की संस्कृत पाठशाला एवं विष्णु मंदिर (अब ढाई दिन का झौंपड़ा) से अधिक दूर नहीं है, इसलिए  अनुमान लगाया जाता है कि अजमेर नगर का मैदानी दुर्ग चौहान कालीन होना चाहिए।

अकबर ने इसी दुर्ग में कुछ निर्माण कार्य करवाए तथा इसे मुगल स्थापत्य के दुर्ग में बदल दिया। इसके भीतर अकबर ने अपने लिये एक महल बनवाया। अकबर के समय में इसे मुगल किला, अकबर का किला तथा दौलतखाना आदि नामों से जाना जाता था।

आज भी इसे को अकबर के महल के नाम से जाना जाता है। यह दुर्ग फतहपुर सीकरी के महल की अनुकृति है और विशाल चतुष्कोणीय आकृति में है। इसके चारों कोनों पर अष्टकोणीय मीनारें हैं। इसका द्वार नगर की तरफ मुंह किये हुए है। केन्द्रीय भाग में विशाल बैठक बनी है।

ला टाउच की सैटलमेंट रिपोर्ट ई.1875 के अनुसार अजमेर स्थित दौलतखाना, एक विशाल चतुर्भुज दुर्गनुमा भवन है जिसे अकबर ने अजमेर नगर के उत्तर में बनवाया था। अबुल फजल के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण 1870 में आरंभ हुआ और ई.1573 के लगभग यह बनकर तैयार हुआ। ई.1573 से 1579 के बीच अकबर जब भी अजमेर आया, इसी किले में ठहरा।

दुर्ग के चारों कोनों में एक-एक बुर्ज बनी हुई है। इसकी पश्चिमी दिशा में एक सुंदर दरवाजा है तथा इसके मध्य में भवन बना हुआ है। इस दुर्ग का दरवाजा 84 फुट ऊँचा तथा 43 फुट चौड़ा है। यह दरवाजा नया बाजार की तरफ मुंह करके खड़ा हुआ है। इस दरवाजे का निर्माण जहाँगीर के शासन-काल में करवाया गया था।

इस दरवाजे के सामने हाथियों की लड़ाई के लिये विशाल मैदान था जिसमें बादशाहों के मनोरंजन के लिये और भी कई तरह के आयोजन किये जाते थे। अकबर और जहाँगीर के समय में इस के केन्द्रीय भवन के चारों ओर एक उद्यान भी हुआ करता था जो अब पूरी तरह लुप्त हो चुका है।

18 नवम्बर 1613 से 10 नवम्बर 1616 तक जहाँगीर इस किले में रहा। वह नित्य इसके मुख्य दरवाजे के झरोखे में बैठकर जनता को दर्शन देता और यहीं से न्याय किया करता था। इसी किले में 10 जनवरी 1616 को इंग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम का राजदूत सर टामस रो जहाँगीर की सेवा में उपस्थित हुआ और उसने अपने देश के व्यापारियों के लिये भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की। कालान्तर में इस किले में दिल्ली सरकार का शस्त्रागार रहा।

इस कारण यह मैगजीन कहलाने लगा। जहाँगीर द्वारा बनाये गये मुख्य द्वार के शीर्ष भाग पर दो छतरियां हैं जहाँ से अजमेर नगर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। इन छतरियों के नीचे एक-एक झरोखा तथा जालियां लगी हुई हैं। यह भवन अजमेर रेल्वे स्टेशन के ठीक पास स्थित है। जब औरंगजेब के पुत्र अकबर ने विद्रोह किया था तब औरंगजेब कुछ समय तक इसी दुर्ग में रहा था।

उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में मराठा सूबेदार इसी दुर्ग में रहा करते थे। उन्होंने अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप इसकी बनावट में कई बदलाव किये। उस समय आनासागर के तट पर पत्थर के मण्डप के उत्तरी छोर पर पौने तेबीस फुट गुणा पौने बाईस फुट की, जहाँगीरकाली बारादरी बनी हुई थी। उस बारादरी को तोड़कर इस दुर्ग के उत्तरी बुर्ज की छत के ऊपर एक कक्ष बनाया गया जिसे एक मंदिर की तरह काम में लिया जाता था।

अकबर ने अपने अमीर-उमरावों को भी आदेश दिया कि वे अजमेर में अच्छे भवन बनवायें तथा उद्यान लगवायें। अमीरों ने आस पास के हिन्दू भवनों में कुछ परिवर्तन करके उन्हें नये भवनों का रूप दिया। इस प्रकार के भवनों का भीतरी भाग हिन्दू स्थापत्य शैली का है जबकि उनके बाहरी भाग को मुस्लिम स्थापत्य शैली में ढाल दिया गया है।

ऐसे कुछ भवन आज भी इस दुर्ग के चारों ओर देखने को मिल जायेंगे। नया बाजार में बना हुआ बादशाही भवन इसी प्रकार का है। अकबर के किले में स्थित दरबारे-आम भी इसी शैली का गवाह है। इस प्रकार जब अकबर ने अजमेर में अपने लिये दुर्ग बनवाया तो उसके चारों ओर एक नया अजमेर शहर खड़ा हो गया।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी जनरल ऑक्टर लोनी ने अजमेर में स्थित अकबर के महल अर्थात् दौलतखाना को ‘मैगजीन’ में बदल दिया। मैगजीन के चारों ओर ऊँची और मजबूत दीवार बनायी गयी। इस मैगजीन में ब्रिटिश सेना के शस्त्र रखे जाने लगे। ई.1857 में मैगजीन बंगाल इन्फैण्ट्री की 15वीं रेजीमेंट के अधीन थी।

जिस समय 1857 का विद्रोह हुआ, अजमेर-मेरवाड़ा का कमिश्नर कर्नल डिक्सन ब्यावर में था। दुर्ग का भवन उस समय इतना पुराना हो चुका था कि तोप का एक गोला उसे ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त था। इसमें इतना बारूद, शस्त्र, तोपें तथा राजकीय खजाना मौजूद था कि सम्पूर्ण राजपूताना के विद्रोहियों को आपूर्ति करने के लिये पर्याप्त था।

कर्नल डिक्सन ने ऑफिशियेटिंग सैकण्ड इन-कमाण्ड लेफ्टिनेंट डब्लू कारनेल को रात्रि में ही ब्यावर से मेरवाड़ा बटालियन की दो कम्पनियों के साथ अजमेर के लिये रवाना किया। ले. कारनेल अगली प्रातः मैगजीन के पास पहुँचा। उसने ब्रिटिश ऑफीसर इन-कमाण्ड से अपनी सेना सहित मैगजीन से बाहर आने के लिये कहा।

ब्रिटिश ऑफीसर इन-कमाण्ड ने मैगजीन खाली करने से मना कर दिया। इस पर ले. कारनेल ने उस पर दबाव बनाया और मैगजीन पर कब्जा करके 15वीं बंगाल इन्फैण्ट्री को मैगजीन से बाहर निकाल दिया। इसके बाद कारनेल, अजमेर स्थित समस्त अंग्रेज अधिकारियों के परिवारों को मैगजीन के भीतर ले आया और उसने मैगजीन की बुर्जों पर पुरानी तोपें चढ़ा दीं। कारनेल ने मैगजीन के मध्यम में एक कुआं खोदा तथा पर्याप्त रसद जमा करके, किसी भी आपात् स्थिति के लिये तैयार होकर बैठ गया।

जब 15वीं इण्डियन इनफैण्ट्री नसीराबाद पहुँची तो उनके भारतीय साथियों ने उन्हें इस बात के लिये धिक्कारा कि उन्होंने निम्न जाति के मेर लोगों को मैगजीन सौंप दी। 25 जून 1857 को कर्नल डिक्सन का ब्यावर में निधन हो गया। उसके बाद सर हेनरी लॉरेंस अजमेर-मेरवाड़ा का कमिश्नर बना।

यही लॉरेंस आगे चलकर एजीजी अर्थात् एजेंट टू दी गवर्नर जनरल बना। वह मैगजीन के निकट रहा करता था। ई.1863 में मैगजीन में शस्त्र रखने बंद कर दिये गये तथा वहाँ पर तहसील कार्यालय स्थापित किया गया। ई.1908 में इस भवन में राजपूताना संग्रहालय खोला गया।

अटक का किला

 सिंधु नदी की पश्चिमी धारा को अटक कहा जाता था। काबुल और सिंध नदी के संगम के थोड़ा नीचे सिंघ के किनारे स्थित एक ऊँची पहाड़ी पर अटक का किला स्थित है। यह एक अत्यंत प्राचीन दुर्ग था। अकबर ने ई.1581 में सिंधु नदी के तट पर अटक के किले में कुछ नीवन निर्माण करवाए। इस नगर का प्राचीन नाम हाटक है जिसका अर्थ ‘स्वर्ण’ होता है।

पारसियों के जेंद अवेस्ता में अटक नदी के पूर्व में स्थित देश को ‘हिन्दवः’ कहा जाता था, यूनानियों ने उस देश के लिए ‘इण्डिया’ (हिन्दिया) शब्द का प्रयोग किया। अटक से 16 मील दूर स्थित ओहिंद नामक स्थान पर अटक के ऊपर नावों का पुल बनाकर सिकन्दर ने भारत में प्रवेश किया था।

प्राचीन हिन्दू अटक नदी के पार जाने को बुरा समझते थे और उनमें विश्वास था कि इसके पार जाने से हिन्दुओं का धर्म नष्ट हो जाएगा। जिस भारत की कल्पना ‘आसेतु-हिमालय’ के रूप में की जाती थी, उसकी पश्चिमी सीमा का निर्माण अटक नदी ही करती थी। इन सब कारणों से प्राचीन काल एवं मध्यकाल में अटक का दुर्ग भारत की पश्चिमी सीमा का प्रहरी माना जाता था एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

 इस दुर्ग के सामने कमालिया और जलालिया नामक पहाड़ियों में से होकर सिंध नदी बहती है। अकबर के समय में दो हिन्दुओं को पाखण्डी बताकर इन चट्टानों से नीचे धकेला गया। अकबर ने अपने छोटे भाई हकीम मिरज़ा के आक्रमणों से बचने के लिये ई.1579 में यह किला फिर से बनवाया तथा नदी के पश्चिम तट पर ‘खैरबाद’ की स्थापना की।

औरंगजेब एक बार समस्त हिन्दू राजाओं को लेकर अटक के लिए रवाना हुआ। उसकी योजना इन राजाओं को अटक नदी के पार ले जाकर वहाँ उनकी सुन्नत करने की आौर सम्पूर्ण भारत को एक साथ ही मुसलमान बनाने की थी किंतु एक सूफी दरवेश को इस योजना का पता चल गया, उसने हिन्दू राजाओं को यह बात बता दी। इस पर भारतीय राजाओं ने अपनी नावों में आग लगा दी और अटक नदी पार करने से मना कर दिया। औरंगजेब ने कुरान हाथ में लेकर कसम खाई कि वह भविष्य में कभी भी ऐसा प्रयास नहीं करेगा।

मराठा सरदार रघुनाथ राव ने मराठों की सत्ता अटक तक बढ़ाई। ई.1792 में महाराजा रणजीतसिंह ने इस दुर्ग पर आक्रमण किया। इस दुर्ग के लिए अंग्रजों एवं सिक्खों में दो बार बड़ी लड़ाइयां हुईं। अंत में यह दुर्ग अंग्रेजों के अधिकार में चला गया। अंग्रेजों ने ई.1883 में इस नदी पर लोहे का एक पुल बनवाया तथा रेलवे लाइन बिछा दी जो पेशावर तक जाती है।

अब यह दुर्ग पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान की सीमा पर एवं पाकिस्तान में स्थित है तथा खण्डहर के रूप में बचा है। इस दुर्ग में पाकिस्तान द्वारा बलपूर्वक पकड़े गए भारतीय नागरिक बंदी बनाकर रखे जाते हैं। पुस्तक लिखे जाते समय इस दुर्ग में 72 भारतीय नागरिक बंद होने का अनुमान है।

अटक में ‘बेगम की सराय’ नामक एक मुगलकालीन सराय थी। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की सरकार ने इस सराय की मरम्मत करवाई है।

अकबरी मस्जिद, अजमेर

अकबर ने ई.1571 में अजमेर में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के निकट एक मस्जिद बनवाई जिसे अकबरी मस्जिद कहा जाता है। यह मस्जिद बुलंद दरवाज़ा एवं शाहजहानी दरवाजे के मध्य स्थित है। लाल बलुआ पत्थर से बनी यह मस्जिद अब मोईनुआ उस्मानिया दारुल-उलूम है जो कि अरबी एवं फारसी में इस्लामी शिक्षा का विद्यालय हैं। इस मस्जिद के निर्माण में हरे एवं सफ़ेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है।

अकबरी मस्जिद, आम्बेर

ई.1569 में रणथंभौर दुर्ग अभियान की सफलता के बाद अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए अजमेर गया। मार्ग में वह अपनी ससुराल आम्बेर में रुका। जयपुर के कच्छवाहा राजा भारमल ने अकबर के लिए आम्बेर दुर्ग में एक मस्जिद बनवाई जो आज भी देखी जा सकती है।

यद्यपि इस भवन को मुगल शैली में बनाने का प्रयास किया गया है किंतु इस पूरे भवन पर हिन्दू स्थापत्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। मस्जिद को बाहर से लाल रंग से पोतकर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित होने का आभास दिया गया है। इसके प्रवेश द्वारा को फारसी शैली के ईवान की तरह बनाने का प्रयास किया गया है किंतु उसके ऊपर पत्थर की नक्काशी मुगलिया नक्काशी की जगह हिन्दू अलंकरण की तरह दिखती है।

इसके मुख्य द्वार के दोनों तरफ तीन-तीन मेहराब बनाए गए हैं। मुख्य द्वार के दोनों तरफ एक-एक गुम्बद बनाया गया है। ये गुम्बद भी फारसी एवं मुगलिया शैली के गुम्बदों के स्थान पर मंदिर के गर्भगृहों के ऊपर बनने वाले शिखरनुमा निर्माण अधिक जान पड़ते हैं जो कि बंद कमल पुष्प की तरह दिखाई देते हैं। इस भवन के सामने एक-एक पतली मीनार बनाई गई है जो मुगल शैली से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती।

कोस मीनार

ई.1574 में अकबर ने आगरा से अजमेर के रास्ते में प्रत्येक पड़ाव पर पक्के विश्राम गृहों का निर्माण करवाया ताकि वह प्रति वर्ष बिना किसी बाधा के अजमेर आ-जा सके। प्रत्येक एक कोस की दूरी पर एक मीनार खड़ी की गई जिस पर उन हजारों हरिणों के सींग लगवाये गये जो अकबर तथा उसके सैनिकों ने मारे थे।

इन मीनारों के पास कुएं भी खुदवाये गये। बाद में इन मीनारों के पास उद्यान लगाने एवं यात्रियों के लिये सराय बनाने के भी निर्देश दिये गये। जयपुर में कनक वृंदावन के पास एवं हाड़ीपुर आमेर सहित कई स्थानों पर ये मीनारें देखी जा सकती हैं।

अकबर कालीन अन्य भवन

अकबर ने मेड़ता की मस्जिद तथा अन्य स्थानों के किले इत्यादि अन्य भवन बनवाए। सिकन्दरा में स्थित अकबर के मकबरे का नक्शा अकबर ने बनाया था। इसे अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर ने पूरा करवाया। ई.1605 में अकबर की मृत्यु हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जहाँगीर कालीन भवन

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जहाँगीर कालीन भवन

एतमादुद्दौला का मकबरा प्रमुख जहाँगीर कालीन भवन है। इसका निर्माण ई.1625 में नूरजहाँ ने अपने पिता घियासुद्दीन बेग की स्मृति में लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से आगरा में करवाया था।

25 अक्टूबर 1605 को सलीम आगरा में नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से मुगलों के तख्त पर बैठा। बादशाह बनने के बाद जहाँगीर अपनी राजधानी फतहपुर सीकरी से आगरा ले आया। उसने सड़कों के किनारे सराय तथा नगरों में औषधालयों का निर्माण करवाया। ये प्रारम्भिक जहाँगीर कालीन भवन थे जिनकी अब पहचान नहीं हो सकती है।

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जहाँगीर ने आगरा में अपने महल के समक्ष सोने की जंजीर से एक घंटी लटकाई जिसका नाम न्याय की घंटी रखा। कोई भी परिवादी इस जंजीर को खींचकर अपनी फरियाद बादशाह तक पहुँचा सकता था परन्तु सम्भवतः कभी किसी को यह जंजीर खींचने का दुस्साहस नहीं हुआ। जहाँगीर को भवन निर्माण में अकबर जैसी रुचि नहीं थी। इसलिए उसके शासन में स्थापत्य का कोई विशेष विकास नहीं हुआ। जहाँगीर ने स्थापत्य की अपेक्षा चित्रकला को अधिक महत्व दिया। यद्यपि जहाँगीर के शासन-काल में बहुत कम इमारतें बनी थीं परन्तु इस काल में उपवन लगाने की नई शैली विकसित हुई। काश्मीर में जहाँगीर द्वारा बनवाया हुआ शालीमार बाग और उसके साले आसफ खाँ का बनवाया हुआ निशात बाग आज भी मौजूद हैं। अकबर ने आगरा के बाहर सिकन्दरा में अपना मकबरा बनाने की योजना बनाई। संभवतः उसके जीवनकाल में ही इसका निर्माण कार्य भी आरम्भ हो गया किंतु इस इमारत को बाद में जहाँगीर ने पूरा करवाया। जहाँगीर की प्रिय बेगम नूरजहाँ ने आगरा में यमुना नदी के तट पर सफेद संगमरमर से अपने पिता एतिमादुद्दौला का विशाल मकबरा बनवाया। नूरजहाँ ने लाहौर के निकट जहाँगीर का मकबरा भी बनवाया।

दिल्ली में बना खानखाना का मकबरा भी जहाँगीर काल की प्रमुख इमारतों में से है।

आगरा में निर्मित जहाँगीर कालीन भवन

अकबर का मकबरा

सिकन्दरा में बने इस विशाल भवन की योजना स्वयं अकबर ने बनाई थी। संभवतः उसके शासन के अंतिम वर्षों में यह भवन बनना आरम्भ हो गया किंतु यह भवन अकबर की मृत्यु के आठ साल पश्चात् पूरा हो सका। जब यह बनकर तैयार हुआ तो जहाँगीर को इसके कुछ भाग पसंद नहीं आए, इसलिए उसने इनको फिर से बनाने के आदेश दिए। इस प्रकार अकबर के मकबरे को सर्वप्रथम जहाँगीर कालीन भवन कहा जा सकता है।

जहाँगीर ने लिखा है– ‘सोमवार 17 रजब को हम अपने पिता के मकबरे को देखने गए। जब हमें इस पवित्र यात्रा का सौभाग्य प्राप्त हुआ तब हमने कब्रिस्तान पर बनी इमारत देखी परन्तु वह हमारी इच्छा के अनुकूल नहीं लगी। हमारी इच्छा थी कि राहगीर उसे देखकर यह कहें कि ऐसी इमारत हमने संसार में और कहीं नहीं देखी है। इसका कारण यह था कि जिस समय यह बन रही थी उस समय दुर्भाग्य से खुसरू की घटना घटी थी और हम लाहौर चले गए तथा कारीगरों ने उसे अपने मन के अनुसार बना डाला। फलतः सारा धन भी व्यय हो गया और तीन-चार वर्ष इसे बनने में लग गए। हमने आज्ञा दी कि अनुभवी कारीगर अन्य अनुभवी लोगों की सम्मति से निश्चित ढंग पर कई स्थानों पर नीवें डालें।’

जहाँगीर के इस आदेश के बाद अकबर के मकबरे की ऊँची इमारत बनी। उस मकबरे के चारों ओर बाग लगाया गया तथा एक बड़ा एवं ऊँचा दरवाजा सफेद पत्थर की मीनारों सहित बनाया गया। इस ऊँची इमारत पर 15 लाख रुपए खर्च हुए जो ईरान के 50 हजार ‘तूमान’ और तूरान के 45 हजार ‘खानी’ के बराबर होते हैं।

जहाँगीर के इस कथन से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस मकबरे के बनने में जहाँगीर ने पूरी दिलचस्पी ली। यह मकबरा परम्परागत इस्लामी शैली का मकबरा नहीं है। मुसलमानों के मकबरों में गुम्बद बनाने की प्रथा प्राचीन समय से प्रचलित थी किन्तु इस मकबरे पर कोई गुम्बद नहीं है।

इस जहाँगीर कालीन भवन की बनावट बौद्ध विहार जैसी है और इसका आकार पिरामिड के जैसा है। यह मकबरा एक विस्तृत एवं सुनियोजित उद्यान के मध्य में स्थित है। इस बाग की परिधि डेढ़ मील है और इसके चारों ओर दीवार घिरी हुई है। इसके चारों ओर प्रवेश द्वार हैं और सभी द्वार वैभवशाली हैं लेकिन इसका मुख्य प्रवेश-द्वार सर्वाधिक आकर्षक है जिस पर संगमरमर का जड़ाऊ कार्य किया गया है।

इसके चारों ओर तथा चारों कोनों पर संगमरमर की एक-एक ऊँची मीनार है। प्रवेश द्वार पर कुशलतापूर्वक की गई पच्चीकारी इसकी शोभा बढ़ाती है। पर्सी ब्राउन के अनुसार ‘अब तक इस प्रकार की एक भी मीनार भारतीय स्थापत्य कला में प्रयुक्त हुई दिखाई नहीं देती है।’

यह मकबरा पाँच मंजिली इमारत है जिसमें प्रत्येक ऊपर की मंजिल नीचे की मंजिल की अपेक्षा आकार में छोटी होती गई है। इसके प्रत्येक प्रवश द्वार पर फारसी की पंक्तियां खुदी हुई हैं। ये पंक्तियां अकबर के जीवन पर प्रकाश डालती हैं। अकबर की कब्र संगमरमर की बनी हुई है। भू-तल पर बनी कब्र असली है जबकि पहली मंजिल पर बनी कब्र नकली है।

दोनों कब्रों का निर्माण संगमरमर के पत्थरों से किया गया है तथा उन पर विभिन्न प्रकार के फूल बनाए गए हैं। कब्र के सिराहने अल्लाहु अकबर और पैरों की तरफ जल्ले-जलालहु उभरे हुए अक्षरों में खुदा हुआ है। मकबरे में अल्लाह के निन्यानवे नामों के साथ हिन्दुओं का स्वास्तिक चिह्न तथा ईसाइयों का क्रॉस भी बना हुआ हैं।

फर्ग्यूसन ने लिखा है- ‘मकबरे की ऊपरी मंजिल की डिजाइन में सिरे पर एक गुम्बद की व्यवस्था अवश्य रही होगी। इस गुम्बद के बिना यह स्मारक दबा हुआ एवं अर्थहीन सा लगता है …… इमारत की ऊँचाई अब कोने के मण्डपों से 100 फुट से कुछ ही अधिक है। अगर केन्द्रीय गुम्बद 20-40 फुट और ऊँचा होता तो यह नीचे के आधार से उचित अनुपात में होता। यह मकबरा जैसी बारीक बनावट का है, वैसा ही सुंदर एवं आनुपातिक बनाने के लिए केन्द्रीय कक्ष बड़ा बनाने की आवश्यकता प्रतीत होती है। अगर यह ऐसा बना होता तो भारतीय मकबरों में इसे ताज के बाद, दूसरा स्थान दिया जाता।’

 पर्सी ब्राउन ने फर्ग्यूसन से असहमति व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘यह मकबरा ऊपर की मंजिल सहित जैसा बना है, वैसा पूर्ण है। इसकी खुली हई छत और सुरुचिपूर्ण बनावट इस इमारत के लिए उपयुक्त ही है।’

जहाँगीर कालीन भवन – एतमादुद्दौला का मकबरा

एतमादुद्दौला का मकबरा दूसरा प्रमुख जहाँगीर कालीन भवन है। इसका निर्माण ई.1625 में नूरजहाँ ने अपने पिता घियासुद्दीन बेग की स्मृति में लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से आगरा में करवाया था। घियासुद्दीन बेग को जहाँगीर ने एतमादुद्दौला की उपाधि दी थी। इस मकबरे में बाद में, एतमादुद्दौला के कई रिश्तेदारों को भी दफनाया गया।

मुगल काल के अन्य मकबरों से अपेक्षाकृत छोटा होने से, इसे शृंगारदान भी कहा जाता है। यह मकबरा यमुना नदी के बाएं किनारे पर स्थित है। यहाँ के बाग, पैट्रा ड्यूरा से सजावट की गई तथा कई अन्य घटक ताजमहल से साम्य रखते हैं। इस कारण इसे ‘बेबी ताज’ भी कहा जाता है। कई जगह इस मकबरे की नक्काशी ताजमहल से भी अधिक सुंदर है। इस मकबरे के मध्य में एशियाई शैली का गुम्बद स्थित है। यहाँ के बगीचे और रास्ते इसकी सुंदरता को और भी बढ़ाते हैं।

यह भारत में बना पहला मकबरा है जो पूरी तरह सफेद संगमरमर से बनाया गया था। इसकी दीवारों पर पेड़ पौधों, जानवरों और पक्षियों के चित्र उकेरे गए हैं। कहीं-कहीं आदमियों के चित्रों को भी देखा जा सकता है यद्यपि इस्लाम में मनुष्य आकृति को सजावट के रूप में इस्तेमाल करने की मनाही है। ‘बटेश्वर’ से मिले शिलालेख के अनुसार यह मूलतः कच्छवाहा राजा परमार्दिदेव का महल था

संगमरमर की संरचना और मकबरे का गूढ़ इस्लामी स्थापत्य, ताजमहल के अग्रगामी भवन के रूप में इसको और अधिक लोकप्रिय बनाते हैं। मकबरे को एक बड़े बगीचे के केंद्र में स्थापित किया गया है जिसमें पानी का बहाव बीच में है और आस-पास पैदल चलने वालों के लिए पगडंडियाँ बनाई गई हैं। मकबरे की दीवारें पर अर्ध-कीमती पत्थरों, जैस्पर और टोपाज एवं शराब की सुरोहियों के रूप में उकेरी हुई नक्काशी की गई है। मकबरे में रोशनी लाने के लिए जालीदार संगमरमर लगाया गया है।

इस मकबरे पर ईरानी शैली का प्रभाव है। यह हौजों और फव्वारों की पंक्तियों के बीच लाल पत्थर के 149 फुट लम्बे एवं इतने ही चौड़े वर्गाकार चबूतरे पर बना हुआ है। यह दो मंजिला भवन है जिसकी निचली मंजिल की योजना 70 फुट गुणा 70 फुट है। इसके केन्द्रीय भवन के प्रत्येक कोण पर मीनारों जैसी अष्टकोणीय बुर्जियों और एक मण्डप  अथवा छत के ऊपर से निकली हुई ऊपरी मंजिल है।

इसके प्रत्येक ओर बने मेहराबदार दरवाजे इसे गहराई प्रदान करते हैं। जबकि कोष्ठकों पर आधारित कार्निसों और ऊपरी मंजिल का छज्जा चौड़ा है जो इसे समतल आकृति प्रदान करता है। इसका मुख्य हॉल वर्गाकार है जिसका फर्श संगमरमर से बना हुआ है और उस पर मोजेक का काम किया गया है। इसी हॉल में एतमादुद्दौला और उसकी बेगम की कब्रें हैं।

हॉल की दीवारों पर कुरान और अन्य इस्लामी धर्मग्रंथों की आयतें तुगरा में लिखी गई हैं। इसके ऊपर का कक्ष वर्गाकार है जिसकी दीवारों की जालियां बहुत अच्छे संगमरमर से बनाई गई हैं। इसके फर्श पर बहुत सुंदर डिजाइनों का जड़ाऊ काम किया गया है। पर्सी ब्राउन के अनुसार- ‘यह इमारत अपनी सूक्ष्म (मिनियेचर) कला के उदाहरण के रूप में अपने बगीचों और प्रवेश द्वारों सहित अपनी तरह की सर्वाधिक पूर्ण इमारतों में से एक है।’

यद्यपि इस भवन में सजावट की अधिकता है किंतु सजावट में पूर्ण सावधानी बरती गई है ताकि उसका कलात्मक प्रभाव सुरक्षित रहे। इसमें उभरी हुई नक्काशी का काम थोड़ा सा ही है। अधिकांश सतह को जड़ाऊ पत्थरों के काम से हल्का रंगीन बना दिया गया है। इसके परिणाम स्वरूप सफेद संगमरमर की चमक हल्के रंग की नक्काशी से कम हो गई है। यह नक्काशी अन्य भागों में रंग-बिरंगी डिजाइनों में फैली हुई है। यह अधिकतर केवल ऐसी रंगीन डिजाइनों में ही है कि इससे केवल तितली के पंख ही स्पर्द्धा कर सकते हैं।

एतमादुद्दौला के मकबरे में की गई रंगीन पत्थरों की सजावट, पूर्ववर्ती इमारतों से भिन्न है। इसलिए जहाँगीर के बाद की इमारतें न केवल कला-शैली में अपितु सजावट की पद्धति में भी एक नई शैली का श्रीगणेश करती हैं। इस मकबरे के बनने से पहले के भवनों की सजावट ‘ऑपस ड्यूरा’ शैली में की जाती थी जिसमें पत्थरों के ऊपर गहरे एवं गाढ़े रंगों से चित्रकारी की जाती थी। मुगलों की बहुत ही सुंदर और संगमरमर की पूर्ण कलाकृतियों में जो सोने और कीमती पत्थरों का जड़ाऊ काम मिलता है, उसकी पहल इसी मकबरे से हुई थी जिसे ‘पैट्रा ड्यूरा’ कहा जाता है। इस शैली में नूरजहाँ का परिष्कृत स्त्रियोचित सौंदर्य भी प्रकट होता है।

लाहौर में निर्मित जहाँगीर कालीन भवन

जहाँगीर अपने शासन के शुरुआती वर्षों में लाहौर में काफी समय तक रहा। इस अवधि में उसने लाहौर तथा उसके आसपास के नगरों में कई इमारतें बनवाईं। आगरा में आज भी जहाँगीर कालीन भवन देखे जा सकते हैं।

जहाँगीर कालीन भवन – अनारकली का मकबरा, लाहौर

पाकिस्तान में पंजाब सिविल सेक्रेटरिएट के पास सफेद रंग के पत्थरों से बना एक भवन है जिसे अनारकली का मकबरा कहा जाता है। अनारकली का वास्तविक नाम नादिरा बेगम था। उसे शर्फुन्निसा भी कहा जाता था। वह अकबर के शासनकाल में व्यापारियों के एक काफिले के साथ ईरान से लाहौर आई थी। ब्रिटिश पर्यटक विलियम फिंच ई.1608 से 1611  तक लाहौर में रहा था।

उसने लिखा है कि अनारकली अकबर की कई पत्नियों में से एक थी। अनारकली से अकबर को एक पुत्र भी हुआ जिसे दानियाल कहा जाता था। अकबर के पुत्र सलीम से अनारकली के सम्बन्धों की अफवाह के कारण अकबर ने अनारकली को लाहौर के दुर्ग में चिनवा दिया।

जहाँगीर ने उसकी स्मृति में अनारकली का मकबरा बनवाया। यह आज भी बहुत अच्छी दशा में है। भवन के ऊपर एक खूबसूरत गुम्बद बना हुआ है तथा चारों कोनों पर गुम्बदाकार गुमटियां हैं। मकबरे के चारों ओर खूबसूरत बाग है।

सैयद अब्दुल लतीफ ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-लाहौर’ में लिखा है कि अनारकली अकबर की बेगम थी किंतु जहाँगीर से इश्क के चलते ही उसकी जान गई। जहाँगीर ने उसकी कब्र पर लिखवाया कि- ‘अगर मैं अपनी महबूबा को एक बार भी पकड़ सकता तो कयामत तक अल्लाह का शुक्रिया करता।’ मकबरे में स्थित कब्र पर ई.1599 और 1615 की तिथियां हैं जो अनारकली की मृत्यु एवं मकबरा पूर्ण होने की सूचना देती हैं।

कन्हैया लाल नामक लेखक ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-लाहौर’ में लिखा है कि अनारकली की मृत्यु बीमारी से हुई थी। बाद में अकबर ने उसका मकबरा बनवाया। सिख राजाओं ने उसे तुड़वा दिया और अंग्रेजों ने उस पर चर्च बनवा दिया। कन्हैयालाल का वर्णन सही प्रतीत नहीं होता जबकि सैयद अब्दुल लतीफ के विवरण अधिक सही जान पड़ते हैं क्योंकि मकबरे के शिलालेख, मकबरे के होने की सूचना देते हैं न कि चर्च की; आज भी वहाँ मेहराबों, गुम्बद एवं बुर्जों से युक्त मकबरा बना हुआ है। अकबर ई.1605 में मर गया था जबकि मकबरे पर शिलालेख की तिथि ई.1615 की है।

मकातिब खाना, लाहौर

जहाँगीर ने लाहौर में मकातिब खाना का निर्माण करवाया। मकातिब का अर्थ क्लर्क अथवा लिपिक होता है। उस काल में लिपिक को मुहर्रिर भी कहा जाता था। मुगलिया सजावट से दूर इस भवन का स्थापत्य अत्यंत साधारण है तथा फारसी शैली में बना हुआ लघु कार्यालय भवन है। यह लाहौर की प्रसिद्ध मोती मस्जिद के पास स्थित है। इस भवन के चारों ओर के आर्च (मेहराब) अत्यंत नुकीले हैं तथा ईवान भी गहरे बने हुए हैं।

इस भवन के ऊपर एक शिलालेख लगा हुआ है जिस पर ई.1617-18 की एक तिथि का उल्लेख किया गया है तथा इस भवन को मा’मुर खान नामक व्यक्ति की देखरेख में बनाए जाने की सूचना अंकित है। इसी शिलालेख से ज्ञात होता है कि इस भवन का मूलतः नामकरण ‘दौलत खाना ए जहाँगीर’ किया गया था। संभवतः बाद में इसे जहाँगीर के सचिवालय के रूप में काम लिया जाने लगा।

जहाँगीर कालीन भवन – बेगम शाही मस्जिद, लाहौर

जहाँगीर ने अपनी माँ मरियम जमानी बेगम जो कि अकबर की पत्नी थी तथा आम्बेर के कच्छवाहों की बेटी हीरा कंवर थी, के नाम पर ई.1611 से 1614 की अवधि में लहौर में बेगम शाही मस्जिद बनवाई। कर्नल टॉड तथा उसके बाद के कुछ इतिहासकारों ने उसे गलती से जोधा बाई लिख दिया है किंतु वह वास्तव में शाही बेगम के नाम से जानी जाती थी। अब लाहौर में इससे पहले की मुगल कालीन मस्जिदें अस्तित्व में नहीं हैं।

मुगलों के काल में लाहौर में बनी वजीर खान मस्जिद, बेगम शाही मस्जिद के कुछ दशकों बाद बनी थी। लाहौर दुर्ग के अकबरी दरवाजे से बेगम शाही मस्जिद का दृश्य साफ दिखाई देता था किंतु बाद में इनके बीच में बड़ी संख्या में अवैध दुकानें बन गईं। जहाँगीर के काल में मुगल अमीरों के लिए यही प्रमुख शाही मस्जिद थी।

मस्जिद की दीवारों एवं गुम्बदों पर जहाँगीर काल की शैली के फ्रैस्को (भित्ति-चित्र) बनाए गए हैं। किसी भी भवन की दीवार पर जब प्लास्टर किया जाता है तो उसके गीले होने की अवस्था में रंगों से चित्र बना दिए जाते हैं जो सूखकर स्थाई प्रभाव देते हैं। इन्हीं को फ्रैस्को या भित्तिचित्र कहा जाता है।

अधिकतर चित्र फूलों की डिजाइन में बनाए गए हैं। दीवारों पर कैलीग्राफी (अक्षर लिखाई) का काम भी किया गया है। कुछ आयतें कुरान से ली गई हैं तथा कुछ कुरान से बाहर की बातें भी लिखी गई हैं। इस मस्जिद के भित्तिचित्र आगे चलकर वजीर खाँ मस्जिद के भित्तिचित्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने।

एक दरवाजे के ऊपर लिखी इबारत में कहा गया है- ‘अल्लाह का शुक्रिया है कि उसकी मेहरबानी से बादशाह ने इस मस्जिद को पूरा किया। जन्नत की तरह दिखने वाली इस मस्जिद की नींव बेगम मरियम जमानी ने रखी। यह इबारत जहाँगीर की ओर से लिखी गई है जिसमें उसने इस मस्जिद की सुंदरता की भी प्रशंसा की है।’

मस्जिद के पूर्वी दरवाजे पर एक और इबारत लिखी गई है जिसमें कहा गया है- ‘हे अल्लाह! संसार को जीतने वाला बादशाह नूरूद्दीन मुहम्मद आकाश में सूर्य और चंद्र की तरह चमता रहे।’ मस्जिद के उत्तर की दिशा में बनी एक मेहराब के ऊपर लिखा है- ‘जिस प्रकार मछली पानी में विश्वास रखती है, उसी प्रकार श्रद्धालु इस मस्जिद में विश्वास रखते हैं, उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद बना रहे।’

इस मस्जिद के स्थापत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसके ऊपरी भाग में बने कम ऊँचाई वाले गुम्बद हैं। इस मस्जिद के स्थापत्य में मुगल स्थापत्य के साथ-साथ पूर्ववर्ती लोदी सल्तनत-कालीन स्थापत्य की विशेषताएं भी दिखाई देती हैं। मस्जिद में बनी बालकनी एवं पार्श्वकक्ष तथा चित्रकला मुगलकालीन है जबकि नीची ऊँचाई के गुम्बद लोदी कालीन स्थापत्य से प्रेरित हैं।

इस मस्जिद का निर्माण ‘फाइव बे चैम्बर’ पद्धति से किया गया है जो बाद के मुगल स्थापत्य में उपलब्ध नहीं होता। इस मस्जिद का ‘सेंट्रल बे’ फारसी शैली के अनुकरण पर बनाया गया है जिसे ‘चाहर तक’ अथवा ‘चार तक’ कहते हैं। इसमें प्रमुख कक्ष के चारों ओर चार मेहराब  बनाए जाते हैं। फारस में यह स्थापत्य शैली इस्लाम के उदय से शताब्दियों पहले से प्रयुक्त होती थी। बाद में यह इस्लामी स्थापत्य की अनिवार्य पहचान बन गई।

मस्जिद का प्रार्थना कक्ष 130.5 फुट लम्बा और 34 फुट चौड़ा है। हॉल पाच हिस्सों में विभक्त है जिनके ऊपर तीन मेहराब हैं। इनमें सबसे बड़ी मेहराब केन्द्रीय कक्ष पर बनी है। इस मस्जिद के बाहर 128 गुणा 82 फुट का दालान है। इसी में वजू करने का कुण्ड बना हुआ है।

महाराजा रणजीतसिंह के काल में इस मस्जिद में गनपाउडर बनने की फैक्ट्री स्थापित की गई। उस समय इसे बारूदखाना वाली मस्जिद कहा जाता था। ई.1850 में यह मस्जिद मुसलमानों को लौटा दी गई। वर्तमान में यह मस्जिद लाहौर नगर के परकोटे के भीतर मस्ती गेट के निकट स्थित है। इस मस्जिद के तीन दरवाजे थे जिनमें से अब दो बचे हैं।

जहाँगीर कालीन भवन – वजीर खाँ मस्जिद, लाहौर

लाहौर की ‘वजीर खाँ मस्जिद’ का निर्माण शाहजहाँ के काल में ई.1634 में आरम्भ हुआ तथा ई.1642 में पूर्ण हुआ। इसे मुगल कल की सर्वाधिक अलंकृत मस्जिद माना जाता है। इसे टैराकोटा की अलंकृत टायलों से सजाया गया है। यह ईरानी कला है जिसे ‘कशीकारी’ कहा जाता है। इसकी लगभग सम्पूर्ण भीतरी दीवारों को मुगल कालीन उभरी हुई फ्रैस्को (भित्तिचित्र कला) से सजाया गया है। मस्जिद के फ्रैस्को पर स्थानीय पंजाबी शैली का प्रभाव है। मस्जिद के निकट शाही हम्माम बने हुए हैं।

यह मस्जिद परकोटे में स्थित लाहौर नगर के भीतरी भागों में दक्षिण की तरफ गुजरगाह अथवा शाही रोड पर बनी हुई है। मुगल अमीर एवं दरबारी अधिकारी दुर्ग में स्थित शाही महलों के लिए इसी मार्ग से होकर जाया करते थे। यह दिल्ली गेट से लगभग 260 मीटर की दूरी पर स्थित है।

मस्जिद के ठीक सामने वजीर खाँ चौक तथा चिट्टा गेट है। इस मस्जिद में सूफी दरवेश सैयद मुहम्मद ईशाक गुजारनी की मजार भी है जो इस स्थान पर मस्जिद बनने से पहले भी मौजूद थी। ईशाक गुजारनी को ‘मीरन बादशाह’ भी कहा जाता था। इस मस्जिद में कई दुकानें बनी हुई हैं जिन्हें इमला (कैलीग्राफर्स) तथा जिल्दसाज (बुक बाइण्डिर्स) का बाजार कहा जाता था।

मस्जिद को ऊँचे प्लेटफॉर्म पर बनाया गया है तथा इसका निर्माण ईंटों से किया गया है। ईंटों की चिनाई के लिए चूना कंकर पीसकर गारा बनाया गया है। इसका मुख्य द्वार वजीर खाँ चौक में खुलता है। बाहर की ओर से इस मस्जिद की लम्बाई 279 फुट तथा चौड़ाई 159 फुट है।

मस्जिद का निर्माण इयामुद्दीन अंसारी नामक शाही हकीम ने करवाया था। उसे वजीर खाँ भी कहा जाता था। उसे शाहजहाँ ने पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया था। उसने लाहौर में कई भवन बनवाए। दिल्ली गेट के पास वजीर खाँ की बहुत बड़ी निजी सम्पत्ति थी।

इस मस्जिद के बनने के बाद लोग मरियम जमानी मस्जिद में न जाकर वजीर खाँ मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए आने लगे। ई.1880 के दशक में प्रसिद्ध लेखक रूदियार्ड किपलिंग के पिता लॉकवुड किपलिंग ने ‘जर्नल ऑफ दी इण्डियन आर्ट’ में इस मस्जिद तथा उसकी सजावट के बारे में एक लेख लिखा था। ई.1903 में ब्रिटिश लेखक फ्रेड हेनरी ने लिखा कि यह मस्जिद मरम्मत के अभाव में जर्जर हो गई है।

जहाँगीर का मकबरा, लाहौर

जहाँगीर के काल का अंतिम स्मारक लाहौर के पास रावी नदी के तट पर शहादरा में स्थित जहाँगीर का मकबरा है। इसका नक्शा जहाँगीर ने बनाया था तथा इसका निर्माण उसकी बेगम नूरजहाँ की देखरेख में हुआ था। इस मकबरे का निर्माण भी सिकंदरा स्थित अकबर के मकबरे के नमूने पर हुआ था किंतु यह उससे कम ऊँचा है।

इसके ऊपर संगमरमर का एक मण्डप था जिसे बाद में सिक्खों ने उतार दिया था। यह एक मंजिला वर्गाकार भवन है जिसके प्रत्येक कौने पर एक मीनार है। इसके ऊपर के चबूतरे के मध्य भाग में संगमरमर का एक मण्डप बना हुआ है जो केन्द्र में स्थित है तथा दूर से ही आकर्षित करता है।

इसे जड़ाऊ संगमरमर, रंगीन टाइलों तथा विभिन्न रंगों के पत्थरों से अलंकृत किया गया है। मकबरे का भीतरी भाग संगमरमर की पच्चीकारी से सुशोभित है। चिकने और रंगीन खपरैल इसकी सुन्दरता को अधिक बढ़ा देते हैं। पर्सी ब्राउन का कथन है कि सारी इमारत प्रभावशाली प्रतीत नहीं होती है।

अजमेर में निर्मित जहाँगीर कालीन भवन

दौलत बाग, अजमेर

जहाँगीर ने 18 नवम्बर 1613 से 10 नवम्बर 1616 तक अजमेर में प्रवास किया। इस दौरान उसने आनासागर झील के किनारे पर दौलत बाग बनवाया जिसमें संगमरमर की बारादरियां एवं मेहराबयुक्त दरवाजे बनवाए। जहाँगीर ने दौलत बाग से कैसर बाग जाने वाले मार्ग पर कुछ महल बनवाये जिनके कुछ खण्डहर आज भी देखे जा सकते हैं।

जहाँगीर ने यहां पर कुछ बारादरियां भी बनवाईं जिनमें से कुछ को आज भी देखा जा सकता है। दौलतबाग की तरफ आनासागर झील की सुंदर रेलिंग भी संभवतः जहाँगीर द्वारा बनवाई गई थी। यह बहुत सुंदर है तथा इसमें बीच-बीच में झील में उतरने के लिए सीढ़ियां भी बनाई गई हैं।

झील के तट पर बने ऊंचे चबूतरे पर जहाँगीर द्वारा कुछ खूबसूरत मेहराबदार दरवाजे बनाए गए थे। ये दरवाजे भी संगमरमर से बने हैं। चूंकि ये दरवाजे किसी भवन पर नहीं लगे थे इसलिए जनसाधारण में इन्हें खामखा (व्यर्थ) के दरवाजे कहा जाता था। अंग्रेजों ने इस बाग में बनी बारादरियों को तोड़कर उनके पत्थर को मैगजीन के कुछ भवनों में काम में लिया था।

चश्मा-ए-नूर, अजमेर

तारागढ़ की पश्चिमी घाटी में उसने सुन्दर और विशाल महल का निर्माण करवाया जो ई.1615 में बनकर तैयार हुआ। अजमेर से चार मील दक्षिण में तारागढ़ की पहाड़ियाँ एक तंग घाटी में बदल जाती हैं, इसे नूर चश्मा कहते हैं। इसी तंग घाटी में जहाँगीर के महल के खण्डहर खड़े हैं। यहाँ से एक मार्ग इंदरकोट की घाटी होता हुआ अजमेर नगर की ओर जाता था। इस प्राकृतिक झरने का नाम जहाँगीर ने नूरचश्मा रखा था। जहाँगीर ने यहाँ अपने लिये शिकारगाह बनवाया।

जहाँगीर ने अपनी पुस्तक तुजुक ए जहाँगीरी में इस स्थान का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘इस स्थान का पानी, अजमेर में अन्य किसी भी स्थान पर पाये जाने वाले पानी से अधिक मीठा है। मेरे आदेश से इस स्थान पर एक वर्ष की अवधि में एक भवन तैयार किया गया, उसके जैसा दूसरा भवन अन्यत्र कहीं नहीं था। इस महल के निकट एक विशाल टांका बनाया गया जिसमें पानी की आपूर्ति एक फव्वारे के माध्यम से की जाती थी।

इस फव्वारे का पानी 12 गज ऊँचा उठता था। टांके का आकार 40 गज गुणा 40 गज था। टांके के किनारे सुंदर दालान बनाया गया था। इसके ऊपर जहाँ झील और झरना थे, रहने और सोने के लिये स्थान बनाये गये जो अत्यंत आनंद देने वाले थे। इनमें से कुछ कक्षों में कुशल चित्रकारों द्वारा अद्भुत चित्र बनाये गये थे। मैंने इस स्थान का नाम चश्मा ए नूर रखा। इस स्थान में कमी यह है कि यह न तो अजमेर नगर के भीतर है और न ही सड़क पर स्थित है।

मैं केवल बृहस्पतिवार और शुक्रवार को इस स्थान पर रहने के लिये जाता हूँ। मेरे आग्रह पर सादी गिलानी ज़रगाबाशी ने एक ऐसी कविता बनाई जिसके शब्दों का गणितीय मूल्य, इसके निर्माण की तिथि (हिज्री 1024) को दर्शाता है। उसने बड़ी चतुराई से एक कविता की रचना की जिसकी अंतिम पंक्ति में इस महल का नामकरण किया गया है- महल शाह नूर-उद-दिन जहाँगीर। मैंने इस पंक्ति को एक पत्थर पर उत्कीर्ण करके उसे इस निचले भवन की मेहराब पर लगाने के आदेश दिये।’

यह पंक्ति आज भी इस मेहराब पर लगे पत्थर पर देखी जा सकती है।

पूरी कविता का अनुवाद इस प्रकार से था-

‘वह बहुत सौभाग्यशाली है। वह सात भूमियों का बादशाह है। उसके सद्गुणों को भाग्य के लेखे में नहीं रखा जा सकता। वह बादशाह अकबर के परिवार का प्रकाश है। वह आज के समय का बादशाह जहाँगीर है। जब वह इस झरने पर आया तो उसकी कृपा से इस झरने का जल प्रवाहित हो उठा तथा यहाँ की रेत जीवन दायिनी अक्सीर (पारस) बन गई।

बादशाह ने इसे चश्मा ए नूर नाम दिया। जिसका अर्थ होता है जीवन का जल, जो इसके वास्तविक सद्गुण के अनुरूप है। बहादुर बादशाह के शासन के दसवें वर्ष में, बादशाह के आदेश से, चश्मा ए नूर के पास यह भवन बनाया गया है। यह सकल विश्व का आभूषण बन गया है। इसके निर्माण से पूर्व ऐसा ही विचार किया गया था। खिराद (कवि का नाम) ने इसके निर्माण की तिथि का लेखन इन शब्दों में किया है- महल शाह नूर-उद-दीन जहाँगीर।’

सर टॉमस रो ने ई.1616 में अपनी पुस्तक में इस स्थान का उल्लेख इन शब्दों में किया है-

‘1 मार्च 1616 को मैं अजमेर से दो मील दूर बादशाह के एक आनंददायी भवन देखने गया जो कि बादशाह के साले आसफ खाँ ने बादशाह को दिया था। इसकी शक्तिशाली चट्टानें इस स्थान की, सूर्य की किरणों से इसे, ऐसी सुरक्षा देती थीं कि मार्ग में कुछ भी दिखाई नहीं देता था। इसका आधार भाग तथा कुछ कक्ष चट्टानों को काटकर बनाये गये थे तथा शेष भवन का निर्माण स्वतंत्र प्रस्तरों से किया गया था।

एक छोटा सुंदर उद्यान जिसमें पाँच फव्वारे लगे हुए थे, दो विशाल टांके बने हुए थे, ये एक दूसरे से 31 सीढ़ियां ऊपर थे। इसका मार्ग अलंघ्य है किंतु इसके सामने एक-दो मार्ग हैं जो सीधे चढ़ाईदार एवं चट्टानी हैं। यह विषादपूर्ण प्रसन्नता देने वाला सुरक्षित स्थान है। इस स्थान तक आने वाले मार्ग पर जंगली मोर, कछुए, मुर्गे तथा झूलते हुए बंदर देखने को मिलते हैं।’

ब्रिटिश काल में इस स्थान को ‘हैप्पी वैली’ नाम दिया गया। इस उद्यान तथा फव्वारों को लुप्त हुए सौ साल से भी अधिक समय हो चुका है। दो टांकों में से अब केवल एक ही बचा है। लाल पत्थर से निर्मित दालान अब भी हैं जिन पर ऊपर जाने के लिये सीढ़ियां बनी हुई हैं। दालानों के भीतर मार्बल प्लास्टरिंग की गई है जो स्थान-स्थान पर खराब हो चुकी है। दक्षिण की तरफ का दालान कुछ ठीक अवस्था में है। इसी दालान में बैठकर जहाँगीर और नूरजहाँ फव्वारों एवं पुष्पावलियों को देखने का आनंद लेते थे।

अन्य नगरों में निर्मित जहाँगीर कालीन भवन

खुसरो, शाह बेगम और निथार बेगम के मकबरे, प्रयागराज

प्रयागराज नगर के पश्चिम छोर पर रेलवे स्टेशन के निकट स्थित खुसरो बाग का निर्माण जहाँगीर ने करवाया था। यह उद्यान 17 बीघा क्षेत्र में फैला हुआ है तथा चारों ओर मोटे परकोटे से घिरा हुआ है। परकोटे में चारों दिशाओं में एक-एक दरवाजा है। जहाँगीर के सबसे बड़े पुत्र खुसरो मिर्जा के नाम पर इसका नाम खुसरो बाग पड़ा।

इस बाग में तीन मकबरे हैं। पहला मकबरा शहजादे खुसरो का है तथा दूसरा मकबरा खुसरो की माँ मानबाई का है जो ई.1604 में मृत्यु को प्राप्त हुई थी तथा ई.1606 में यह मकबरा बनकर तैयार हुआ था। मानबाई जहाँगीर की पहली पत्नी थी तथा आम्बेर के राजा भगवानदास की पुत्री और मानसिंह की बहिन थी।

इसे शाह बेगम का सम्मान प्राप्त था किंतु इसे जहाँगीर ने शराब के नशे में कोड़ों से पीट-पीट कर मार डाला था। तीसरा मकबरा खुसरो की बहिन सुल्ताना निथार बेगम का है। शाह बेगम और निथार बेगम की कब्रों के ऊपर एक-एक छतरी बनी हुई है।

इस बाग के प्रवेश द्वार, उद्यान और सुल्ताना बेगम के त्रि-स्तरीय मक़बरे की डिज़ाइन आक़ा रज़ा ने तैयार की थी। जहाँगीर से विद्रोह करने के बाद ई.1606 में खुसरो मिर्जा की आंखें फोड़कर उसे इसी बाग में बंदी बनाकर रखा गया था। ई.1622 में खुसरो, उसके छोटे भाई खुर्रम को सौंप दिया गया।

खुर्रम ने उसे बुरहानपुर के किले में रखा तथा वहीं पर खुसरो की हत्या करवा दी। इसके बाद खुसरो के शव को प्रयागराज लाया गया तथा खुसरो बाग में उसकी कब्र बनवाकर उस पर मकबरे का निर्माण करवाया गया। खुसरो की कब्र, खुसरो की माँ मानबाई (शाहबेगम) की कब्र के पास बनाई गई। ई.1624-25 में इन दोनों कब्रों के बीच में निथार बेगम की कब्र का निर्माण करवाया गया जो कि जहाँगीर तथा मानबाई की पुत्री थी।

खुसरो बाग बाग मुग़ल वास्तुकला का सुन्दर उदाहरण है। बाग के अन्दर जाने का मुख्य द्वार अत्यंत विशाल है। इसमें बड़ी संख्या में घोड़े की नाल लगी हुई हैं। मान्यता हैं कि किसी घोड़े ने अपने स्वामी की जान बचाई थी इसलिए उसकी मनौती मांगते हैं तथा अपना कार्य पूरा होने पर दरवाजे में घोड़े की नाल लगाते हैं। ई.1857 के सिपाही विद्रोह में क्रांतिकारी सैनिकों ने कुछ समय के लिए इस बाग में शरण ली। खुसरो बाग में अमरूद के कई बगीचे हैं। यहाँ के अमरूदों को विदेशों में निर्यात किया जाता हैं।

शालीमार बाग, काश्मीर

शालीमार बाग जम्मू और कश्मीर राज्य की राजधानी श्रीनगर में स्थित है। इसका निर्माण मुगल बादशाह जहाँगीर ने अपनी प्रिय बेगम मेहरुन्निसा के उपयोग के लिये डल झील के किनारे पर करवाया था। मेहरुन्निसा को जहाँगीर ने नूरजहाँ की उपाधि दी थी। इस बाग में चार स्तर पर उद्यान बने हैं एवं जलधारा बहती है।

इसकी जलापूर्ति निकटवर्ती हरिवन बाग से होती है। उच्चतम स्तर का उद्यान हरम की महिलाओं के उपयोग के लिए बना था। यह निचले स्तर से दिखाई नहीं देता है। यह उद्यान ग्रीष्म एवं पतझड़ में सर्वोत्तम स्थिति में होता है। इस ऋतु में पत्तों का रंग बदलता है एवं अनेक फूल खिलते हैं। उद्यान में सुंदर बारादरियां बनी हैं।

जहाँगीर कालीन भवन – नूरमहल सराय, पंजाब

पुराने समय में भारतीय शासकों द्वारा प्रमुख मार्गों पर धर्मशालाएं बनाई जाती थीं जिनमें यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था होती थी। मुस्लिम सुल्तानों एवं बादशाहों ने भी यह परम्परा जारी रखी। ऐसी ही एक सराय लाहौर से दिल्ली जाने के मार्ग पर स्थित जालंधर से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जिसे नूरमहल सराय कहा जाता है।

जब नूरजहाँ का पिता मिर्जा ग्यास मुहम्मद बेग अपने परिवार के साथ ईरान से दिल्ली आ रहा था तब उसका काफिला इस स्थान पर आराम करने के लिए रुका। संभवतः उस समय यहाँ कोई पुरानी सराय रही होगी। इसी स्थान पर ग्यास की बेगम ने नूरजहाँ को जन्म दिया।

बाद में जब नूरजहाँ का विवाह जहाँगीर के साथ हुआ तो ई.16018 में नूरजहाँ ने उसी स्थान पर नूरमहल सराय का निर्माण करवाया। दोआब के सूबेदार जकरिया खाँ ने इस सराय का निर्माण अपनी देख-रेख में करवाया।

सराय 551 वर्गफुट क्षेत्र में बनी हुई है। इसके मुख्य भवन को किनारों पर अष्टकोणीय बनाया गया है। इसके पश्चिमी दरवाजे को लाहौर दरवाजा कहा जाता है। यह लाल पत्थर से बना हुआ दो मंजिला भवन है। इसके बाहरी पैनल्स पर कई तरह के पशु-पक्षियों की खुदाई की गई है। सराय के मुख्य द्वार पर पालकी बनी है जिस पर दो हाथी सूंड उठाए स्वागत मुद्रा में बने हैं। हाथियों की लड़ाई तथा घुड़सवारों द्वारा चौगान खेलने के दृश्य भी बनाए गए थे।

मुख्य द्वार पर लगे एक शिलालेख में कहा गया है- ‘अकबर शाह के पुत्र जहाँगीर शाह के शासन-काल में नूरजहाँ बेगम के आदेश से फलोर परगने में इस सराय को बनवाया गया। इस सराय की आधारशिला हिजरी 1028 में नूरजहाँ ने अपने हाथों से रखी थी तथा यह सराय हिजरी 1030 में बनकर पूरी हुई।’

इस सराय में एक रंगमहल, बहुत से कमरे, एक कुआं, एक मस्जिद तथा दो बुर्ज भी बनवाए गए थे जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। नूरजहाँ पक्षियों से बहुत प्रेम करती थी। इसलिए सराय में पक्षियों के लिए 48 कोष्ठ बनवाए गए थे। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-जहाँगीरी’ में भी इस सराय का उल्लेख किया है।

वह लिखता है- ‘मैंने नूरसराय में निवास किया। इस स्थान पर नूरजहाँ के वकील ने बहुत उम्दा मकान बनाया है तथा शाही बाग भी लगाया है। अब यह बनकर पूरा हो गया है। इसके पूरा होने के अवसर पर बेगम के अनुरोध पर यहाँ बड़ा जलसा किया गया। इसमें कई तरह के मनोरंजन किए गए, दावत की गई तथा दान दिए गए। नूरजहाँ की प्रसन्नता के लिए मैं दो दिन तक सराय में रहा।’

अब यह भवन जर्जर हालत में है तथा इसके एक हिस्से में स्कूल और पुलिस थाने चल रहे हैं। पंजाबी लोकगीतों में भी नूरमहल को याद किया जाता है। ‘दो तारा वजदा वे रांझणा नूरमहल दे मोरी’ गीत भी इसी तर्ज पर बना। किसी जमाने में यहाँ एक मेला भी लगता था।

हिरन मीनार, शेखूपुरा (पाकिस्तान)

ई.1707 में जहाँगीर ने पंजाब में लौहार से 38 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में शेखुपुरा नामक उपनगर की स्थापना की जो अब पाकिस्तान में है। किसी समय यहाँ जाट जाति के लोग बड़ी संख्या में रहते थे तथा एक पुराना किला भी था जिसे विर्कगढ़ कहते थे। जहाँगीर ने इस उपनगर का नाम जहाँगीरपुर रखा था किंतु जहाँगीर की माँ ‘हीराकंवर’ जहाँगीर को शेखू कहा करती थी। इस कारण इस नगर को शेखूपुरा के नाम से जाना गया।

जहाँगीर ने यहाँ स्थित प्राचीन दुर्ग में कई निर्माण करवाए तथा अपने एक प्रिय हिरन ‘मनसिराज’ की स्मृति में ‘हिरन मीनार’ का निर्माण करवाया। इस प्रकार हिरन मीनार पाकिस्तान में प्रमुख जहाँगीर कालीन भवन है।

शाहपीर का मकबरा, मेरठ

मेरठ नगर में इंदिरा चौक के निकट नूरजहाँ द्वारा ई.1620 में बनवाया गया शाहपीर रहैमतुल्लाह का मकबरा स्थित है। इस जहाँगीर कालीन भवन पर छत नहीं है। शाहपीर के वंशज ईरान के ‘शिराज’ शहर से भारत आए थे। नूरजहाँ शाहपीर को अपना अध्यात्मिक गुरु मानती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहजहाँ कालीन भवन

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शाहजहाँ कालीन भवन

समूचे मुगलिया शासन के दौरान बने भवनों में शाहजहाँ कालीन भवन अपनी भव्यता के लिए सर्वाधिक विख्यात हुए। शाहजहाँ कालीन भवन निर्माण में इतना धन पानी की तरह बहाया गया कि राजकोष रिक्त होने लगा। इन भवनों में कीमती हीरे-मोतियों का उपयोग पत्थरों की तरह किया गया। धन के इसी अपव्य के कारण औरंगजेब अपने पिता से सर्वाधिक नाराज रहता था।

शाहजहाँ का वास्तविक नाम खुर्रम था। उसका जन्म 5 जनवरी 1592 को लाहौर में हुआ। जहाँगीर के बड़े शहजादे खुसरो के विद्रोह कर देने से खुर्रम को उन्नति करने का अवसर प्राप्त हो गया। ई.1618 में शाहजहाँ का विवाह नूरजहाँ के बड़े भाई आसफखाँ की पुत्री अर्जुमन्द बानू बेगम से हुआ। इस कारण शाहजहाँ को अपने पिता जहाँगीर की चहेती बेगम नूरजहाँ, नूरजहाँ के पिता एतमादुद्दौला जो प्रधानमन्त्री के पद पर आसीन था और नूरजहाँ के भाई आसफखाँ जो साम्राज्य का दीवान था, का समर्थन प्राप्त हो गया।

जब ई.1627 में जहाँगीर बीमार पड़ा तो उसके पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ। खुर्रम (शाहजहाँ) अपने सबसे बड़े भाई खुसरो की ई.1622 में बुरहानपुर के दुर्ग में हत्या करवा चुका था। खुर्रम का दूसरा भाई परवेज ई.1626 में अत्यधिक शराब पीने मर गया था।

शाहजहाँ का तीसरा भाई शहरियार, नूरजहाँ का दामाद होने के कारण बादशाह बनने की दौड़ में सबसे आगे था किंतु खुर्रम ने अपने श्वसुर आसफ खाँ के सहयोग से नूरजहाँ एवं उसके दामाद शहरयार को लाहौर में परास्त कर दिया तथा उसकी हत्या कर दी। सबसे अंत में खुर्रम ने अपने बड़े भाई खुसरो के बड़े पुत्र दावरबख्श की हत्या की। इस प्रकार खुर्रम अपने खानदान की दो पीढ़ियों को समाप्त करके शाहजहाँ के नाम से मुगलों के तख्त पर बैठा।

कतिपय पाश्चात्य एवं भारतीय इतिहासकारों की दृष्टि में शाहजहाँ का शासन-काल स्थापत्य कला के लिए स्वर्णयुग से कम नहीं था। इस काल में स्थापत्य कला अपने चरम पर पहुँच गई। शाहजहाँ ने अनेक इमारतें बनवाईं। वह स्वयं स्थापत्य कला का ज्ञाता था। वह अपनी इमारतों के नक्शे स्वयं देखता था। शाहजहाँ युगीन भवन कला अकबर एवं जहाँगीर के काल की भवन कला से आगे का विकास है। क्योंकि इस समय तक भारत के सुदूर क्षेत्र भी मुगलों के अधीन आ चुके थे और उन क्षेत्रों की स्थापत्य कला भी मुगलों द्वारा अपने भवनों में शामिल की गई। शाहजहाँ ने इतनी अधिक इमारतें बनवाईं कि उसे ‘निर्माताओं का शहजादा’ कहा जाता है।

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इस काल में धन की कोई कमी नहीं रह गई थी अतः शाहजहाँ कालीन भवन निर्माण में लाल पत्थर के स्थान पर सफेद संगमरमर को प्रमुखता दिया जाना संभव हो गया। उसके समय में राजपूताने में स्थित मकराना की खानों में प्रचुर मात्रा में संगमरमर उपलब्ध था। अकबर ने अपने समय के सबसे सुंदर महल बनाए थे। जहाँगीर के काल में मुगल स्थापत्य में ‘यूरोपीय मोटिफ’ शामिल किए गए। शाहजहाँ के काल में तकनीक में आमूलचूल परिवर्तन हो गया तथा निर्माण कला के साधनों और सिद्धान्तों में अनेक परिवर्तन हुए। उसके काल में पत्थर काटने में निपुण कारीगरों का स्थान संगमरमर काटने और पॉलिश करने में निपुण कारीगरों ने ले लिया। आयताकार भवनों का स्थान चौकोर लहरदार सजावटपूर्ण महलों ने ले लिया। सबसे अधिक मौलिक परिवर्तन मेहराब की बनावट में हुआ। इनमें सजावट, पच्चीकारी और नजाकतपूर्ण सौन्दर्य आ गया। आगरा, लाहौर, दिल्ली आदि नगरों में पुराने महलों का नव-निर्माण हुआ और नवीन भवन बनवाये गये। शाहजहाँ के काल की स्थापत्य शैली के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों की राय है कि इन कृतियों के कलाकार विदेशी थे और शाहजहाँ ने अकबर कालीन हिन्दू प्रभाव वाली स्थापत्य शैली को त्यागकर पुनः शुद्ध ईरानी शैली को अपनाने का प्रयास किया था।

कतिपय अन्य विद्वान इसे भारतीय शैली से ही उत्पन्न बताते हैं। डॉ. बनारसी प्रसाद के अनुसार यह शैली दो संस्कृतियों के समन्वय का परिणाम थी। वस्तुतः इस काल में भी बहुत से प्राचीन हिन्दू भवनों को मुगल स्थापत्य में ढाला गया।

इस काल में नक्काशी युक्त या पर्णिल मेहराब (फोलिएटेड आर्च) बनने लगे। गुम्बद ने भी फारसी आकार ले लिया। शाहजहाँ के भवन निर्माण में बंगाली शैली के मुड़े हुए कंगूरों अथवा छज्जे युक्त छतों को भी प्रयोग होने लगा।

शाहजहाँ कालीन भवन निर्माण की प्रमुख विशेषताएँ

भवनों के आकार, शैली और सजावट की दृष्टि से इस काल में बने भवन सम्पूर्ण मुगल काल में बने भवनों से अधिक महत्वपूर्ण थे। शाहजहाँ के काल में बने भवनों की कुछ विशेषताएं इस प्रकार से हैं-

(1.) इस काल में मेहराब ने नया आकार ग्रहण कर लिया था जिसमें घुमावदार फूल-पत्ती का प्रयोग और संगमरमर का तोरण पथ (छतयुक्त मेहराबों की शृंखला) प्रमुख था। इस काल में नक्काशीयुक्त एवं दांतेदार मेहराब भी बने।

(2.) शाहजहाँ के काल में बने भवनों में अलंकरण की प्रचुरता है। इनमें मूल्यवान् रत्नों और पत्थरों का प्रचुर उपयोग हुआ है।

(3.) गुम्बद कंदीय आकृति (बल्ब शेप) में बनने लगे और दोहरे गुम्बद का प्रचलन आम हो गया। इस काल के गुम्बद ऊँचे उठे हुए हैं।

(3.) अलंकरण और पच्चीकारी के लिए रंगीन टाहलों का प्रयोग तथा पच्चीकारी के रूप में पैट्रा ड्यूरा नामक तकनीक का प्रचुर रूप से प्रयोग हुआ।

(4.) भवनों के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर की जगह सफेद संगमरमर को प्रमुखता दी गई। हालांकि लाल बलुआ पत्थर का उपयोग भी जारी रहा।

(5.) इस काल के भवनों में बंगला शैली के कंगूरे भी देखे जाते हैं।

(6.) शाहजहाँ कालीन भवनों में कुछ बड़े परिवर्तन भी दृष्टिगोचर होते हैं। इस काल में आयताकार महलों के स्थान पर वृत्ताकार महल दिखाई देते हैं।

(7.) आगरा की मोती मस्जिद तथा दिल्ली की जामा मस्जिद में शाहजहाँ ने स्थापत्य सम्बन्धी कुछ ऐसे प्रयोग किए जिनसे मस्जिद में आने वाले नमाजियों को प्रसन्नता का अनुभव हो। इसलिए इन मस्जिदों के विभिन्न निर्माणों में संतुलन स्थापित किया गया है तथा उन्हें विस्तृत आकार में बनाया गया है।

आगरा के शाहजहाँ कालीन भवन

आगरा दुर्ग में शाहजहाँ कालीन भवन

शाहजहाँ ने आगरा के दुर्ग में पहले से ही बने हुए बलुआ पत्थर के बहुत से भवनों को संगमरमर से सजाया। इस दुर्ग में शाहजहाँ की बनवाई इमारतों में दीवाने-आम, दीवाने-खास, मुसम्मन-बुर्ज, शीश महल, खास महल, नगीना मस्जिद तथा मोती मस्जिद मुख्य हैं।

दीवान-ए-आम

आगरा के दुर्ग में पहले से ही एक दीवान-ए-आम बना हुआ था। यह एक खुला एवं विशाल भवन था जिसे ई.1627 में शाहजहाँ ने तुड़वाकर दुबारा बनवाया। इसका हॉल 201 फुट लम्बा तथा 67 फुट चौड़ा है। यह विशाल भवन तीन ओर से खुला है और इसकी छत 40 ऊँचे एवं दोहरे स्तम्भों पर टिकी हुई है। इन स्तम्भों को संगमरमर से निर्मित मेहराबों से जोड़ा गया है। जिससे इसे ऐश्वर्य प्रदान किया जा सके। भवन के चौथी ओर संगमरमर से बनी एक विशाल गैलेरी है जो कि पैट्रा ड्यूरा शैली के सुंदर जड़ाऊ और उभरी हुई फूल-पत्तियों से सुसज्जित है। दीवारों को काट-काटकर उनमें रंगीन पत्थर, जवाहर, स्वर्ण इत्यादि जड़े गए थे। तख्तेताउस इसी भवन में रहता था। शाही मण्डप के ठीक नीचे एक हॉल में ऊँचा स्थान था, जहां वजीर बैठता था।

दीवान-ए-खास

यह संगमरमर का एक आयताकार भवन है तथा एक ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है। शाहजहाँ द्वारा इसका निर्माण दीवान-ए-आम के निर्माण के दस साल बाद अर्थात् ई.1637 में करवाया गया। इसमें दो बड़े कक्ष हैं जिन्हें संगमरमर के बड़े एवं खुले गलियारे से जोड़ा गया है। इस गलियारे में मेहराबदार खम्भों पर छत रखी गई है। इन खम्भों और मेहराबों पर नक्काशी और जड़ाऊ कार्य किया गया है। इसकी दीवारें उभरे हुए फूलदानों, फूलों और पत्तियों से सुसज्जित हैं।

 विशाल कक्ष की दीवारों के निचले भाग में नक्काशी का काम है और किनारों पर मूंगे आदि जड़े हुए हैं। इसकी छत का भीतरी भाग इसके तमलीखाने की छत की तरह का है। दीवान-ए-खास के दक्षिणी भाग में एक लम्बा फारसी अभिलेख है जिसमें एक शेर लिखा हुआ है। इस शेर में इस भवन के निर्माण की तिथि हिजरी 1045 (ई.1637) लिखी हुई है।

मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने छत्रपति शिवाजी के साथ पुरंदर की संधि की थी जिसके बाद ई.1666 में शिवाजी आगरा आए एवं इसी दीवान-ए-खास में औरंगज़ेब से मिले। शिवाजी को अपमानित करने हेतु उन्हें कम मनसब वाले सरदारों की कतार में खड़ा किया गया। इससे नाराज होकर शिवाजी औरंगजेब का दरबार छोड़कर बाहर निकल गए। इसलिए उन्हें आगरा में रामसिंह कच्छवाहे की हवेली में नज़रबंद किया गया। शिवाजी की एक अशवारोही मूर्ति किले के बाहर लगायी गयी है। दीवाने खास के सामने एक बड़े आँगन में सफेद संगमरमर का विशाल चबूतरा बना हुआ है।

शीशमहल

दीवान-ए-खास के नीचे शीशमहल स्थित है जो संगमरमर का वर्गाकार भवन है। इसका निर्माण दीवान-ए-खास के साथ ही करवाया गया था। इसकी दीवारों पर शीशे जड़े हुए हैं और उन पर सुनहरी या अन्य रंगों का काम किया गया है। इसमें दो हौज हैं जिनमें से एक को 10 गज लम्बी और एक गज चौड़ी नहर द्वारा पानी से भरा जाता था। इस हौज में से पानी बहकर दूसरे हौज में जाता था।

खास महल

यह बादशाह का हरम था तथा दीवान-ए-खास से लगा हुआ था। यमुना की तरफ की इसकी दो सुनहरी बुर्जियों में सुन्दर फूलों की सजावट है तथा बढ़िया नक्काशी की गई है। इस महल की निचली मंजिल लाल पत्थर से निर्मित है, खास महल के गलियारे, कमरे तथा ऊपरी भाग सफेद संगमरमर के हैं। इनकी दीवारों पर अनेक प्रकार के सुन्दर तथा मूल्यवान पत्थरों की जड़ाई की गई है। उस समय इस भवन से यमुना की लहरें टकराया करती थीं। इस महल के सामने अँगूरी बाग है। बाग के तीन तरफ बड़े हॉल हैं और चौथी तरफ संगमरमर का बड़ा गलियारा है। इस बाग में कई फव्वारे भी हैं।

पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘इसकी दीवारों के निचले भागों और खम्भों पर उभरे सुन्दर काम की बहुलता है और किनारियों पर विभिन्न प्रकार के कीमती रत्न जुड़े हुए हैं। इसकी छत सुनहरी और अन्य चमकीले रंगों से सुसज्जित है। इसकी दाईं ओर दो सुंदर सुनहरी मण्डप हैं जिनकी छतें ढलवां और मेहराब नोकदार हैं। ये दो ओर से खुले हैं। इसकी छत के नदी की ओर के भाग के ऊपर दो छोटे किंतु बहुत ही सुंदर सुनहरे गुम्बद हैं। इसकी बारीक खुदाई और उभरे फूल-पत्तियों की बेला की सुंदर सजावट है। इसकी छत और गुम्बद को फ्लोरेंस जैसे मोजेक के काम से और मुलम्मे के रंगीन चित्रों से सुसज्जित किया गया है। यह जड़ाऊ कार्य रंगीन सजावट और सुंदर बारीक खुदाई इस सुंदर इमारत को और भी सुंदर बनाते हैं। इसके सुसज्जित आरामदेह कक्ष वैदूर्यमणि, गोमेद, सूर्यकांत, पुखराज और लालों से भी सभी ओर दमकते से रहते हैं……..।’

इस महल की नदी की ओर की बालकनी में तैमूर से लेकर शाहजहाँ तक के मुगल बादशाहों के चित्र थे। इसकी दीवारों पर फारसी का एक सुंदर अभिलेख था जिसमें कहा गया था कि इस महल को शाहजहाँ ने बनवाया था और इस जैसा पृथ्वी पर दूसरा महल पहले कभी नहीं था।

झरोखा दर्शन

खास महल और आठकोर मीनार के मध्य में झरोखा दर्शन है। यह सफेद संगमरमर का बना हुआ है। इसकी छतें चमकदार हैं। यहाँ से शाहजहाँ जनता को दर्शन देता था।

मुसम्मन बुर्ज

शाहजहाँ ने इन भवनों के साथ ताजमहल की तरफ उन्मुख आलिन्द (छज्जे) वाला एक बड़ा अष्टभुजाकार बुर्ज़ बनवाया था जिसे मुसम्मन बुर्ज तथा शाह बुर्ज कहते थे। यह सफेद संगमरमर से निर्मित चार मंजिला भवन है। इसकी चौथी मंजिल में सुन्दर नक्काशी है। इसके बीच में एक हौज बना हुआ है जिसका रूप गुलाब के फूल जैसा है। उसके सामने एक झरना भी बना हुआ है।

इस बुर्ज से मुगल हरम की स्त्रियां नीचे खुले मैदान में होने वाले पशु-युद्धों को देखा करती थीं। इसके दूसरी ओर बादशाह सफेद संगमरमर के सिंहासन पर बैठता था। मुमताज महल की मृत्यु के बाद शाहजहाँ इसी बुर्ज से अपनी प्रिय बेगम के मकबरे अर्थात् ताजमहल को देखा करता था।

नगीना मस्जिद

आगरा के दुर्ग में स्थित इस मस्जिद का निर्माण संगमरमर से किया गया है। स्थापत्य की दृष्टि से यह छोटी किंतु सुंदर मस्जिद है। इसका निर्माण हरम की महिलाओं के लिए हुआ था। इसे शाहजहाँ की मोती मस्जिद के समकक्ष माना जाता था। मस्जिद से लगे कई कमरे हैं जिनमें शाहजहाँ को बंदी बनाकर रखा गया था। इसके भीतर मीना बाज़ार भी था जिसमें केवल महिलायें ही सामान बेचा करती थी। इसके सामने एक सुन्दर बाग है।

मोती मस्जिद, आगरा

मोती मस्जिद का निर्माण ई.1654 में शाहजहाँ ने करवाया। इसे आगरा की सबसे सुंदर इमारत माना जाता है। यह दीवान-ए-आम के उत्तर में बने एक विशाल सहन में ऊँची कुर्सी पर बनी है। इसके सहन में लाल पत्थर के मेहराबी दरवाजे हैं। मस्जिद के भीतरी भाग को सुन्दर बनाने के लिए सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया है।

इस मस्जिद का वर्गाकार आँगन सफेद संगमरमर के बड़े आकार के चौकोर खण्डों से जड़ा हुआ है। इसके चारों तरफ एक सुंदर गैलेरी बनी हुई है तथा एक खम्भेदार बरामदा है। इसमें एक फव्वारा तथा एक धूप घड़ी लगी हुई है। इसमें अनेक कमरे बने हुए हैं जिन्हें संगमरमर के जालीदार पर्दों से एक-दूसरे से अलग कर दिया गया है।

पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘बहुत थोड़ी मजहबी इमारतें ही दर्शकों को इस मस्जिद की अपेक्षा अधिक पवित्र भावना से ओतप्रोत करवाती हैं। यह मस्जिद अपनी निर्दोष निर्माण सामग्री और अपने अंगों की कौशलपूर्ण नियंत्रित रचना होने के कारण चरमोत्कर्ष पर पहुंची मुगल कला का प्रतिनिधित्व करती है। उपासनालय की मेहराबों की प्रवेश-द्वारों की मेहराब से श्रेष्ठता और उनकी तुलना, कोनों पर बनी हुई छतरियों की योजना और विशेष रूप से दोनों पक्षों के बीच में केन्द्रीय गुम्बद के डमरू का कुशलता से उठाना आदि, इस मस्जिद में केवल वे कुछ अंग हैं जो यह बहुत स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करते हैं कि इस समय तक मुगल निर्माण संतुलन और लय के सिद्धांत को भली-भांति समझने लगे थे।’

मोती मस्जिद की प्रशंसा करते हुए सन्त निहालसिंह ने लिखा है- ‘इसकी डिजाइन ऐसी कारीगरी द्वारा बनाई गई थी जिसमें यह कौशल था कि यह आत्मा के भौतिक बन्धनों से निकल जाने के संघर्ष को प्रस्तर में प्रदर्शित कर दे।’

मुगलों के बाद लाल किले की स्थिति

यह किला 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय युद्ध स्थली भी बना। प्रसिद्ध अंग्रेज़ी उपन्यास लेखक सर आर्थर कानन डायल के शर्लाक होम्स को केन्द्रीय पात्र बनाकर लिखे गए जासूसी उपन्यास ‘द साइन ऑफ फोर’ में आगरा के किले का मुख्य रूप से वर्णन किया गया है। प्रसिद्ध मिस्री पॉप गायक हीशम अब्बास के एलबम ‘हबीबी’ में आगरा का किला दिखाया गया है। ‘एज आफ ऐम्पायर’ के विस्तार पैक ‘एशियन डायनैस्टीज़’ में आगरा के किले को भारतीय सभ्यता के पाँच अजूबों में से एक दिखाया गया है जिसे जीतने के बाद ही कोई अगले स्तर पर जा सकता है। एक बार बनने के बाद, यह खिलाड़ी को सिक्कों के जहाज भेजता रहता है। इस वर्ज़न में कई अन्य खूबियां भी हैं।

वर्तमान समय में लाल किले का परिदृश्य

आगरा के लाल किले के तीन प्रवेश द्वार हैं। इसका मुख्य द्वार लाहौरी गेट कहलाता है जो वास्तुकला की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है। शेष दो द्वार निजी प्रयोग के लिए बनाए गए थे। इसकी दीवारों पर अष्टकोणीय मीनारें तथा विशालाकाय बुर्ज हैं। इसमें दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, रंगमहल आदि महत्वपूर्ण भवन हैं।  

लाल किले में प्रवेश करते समय शाही सैनिकों के निवासगृह के बाद दूसरा भवन नौबतखाना पड़ता है। इसके बाद दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास आता है। केन्द्रीय अहाते के आधे भाग में शाही परिवार के महल हैं और इनके सामने दूसरे आधे भाग में कुई सुंदर बाग हैं। नदी के ऊपर के भाग में संगमरमर के कई मण्डप एवं महल बने हुए हैं जिनमें से मोती महल, हीरामहल और रंग महल प्रमुख हैं। ये सभी भवन एक ही शैली में निर्मित हैं।

पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘यद्यपि इनकी योजनाएं बहुत ही सुंदर लगती हैं तथापि प्रत्येक की शैली बहुत कुछ वही है। प्रत्येक भवन में प्रायः एक मंजिल, सभी ओर से खुला हुआ हॉल है। इस विशाल हॉल को खम्भों द्वारा कई भागों में विभक्त किया गया है और इसकी छत फॉलिएटेड मेहराबों पर आधारित है। हॉल के ऊपर समतल छतें हैं जिन पर कहीं जड़ाऊ काम तथा कहीं पर खुदाई का काम है। कुछ स्थानों पर रंगीन और सुनहरी डिजाइनें बनी हुई हैं। इनके फर्श संगमरमर के हैं। इन इमारतों के एक सिरे से दूसरे सिरे तक छोट-छोटी नहरों की व्यवस्था है जो आंशिक रूप से अनेक इमारतों में हमामों को पानी पहुंचाने के लिए बनाई गई थीं। इन नहरों से प्रत्येक महल में बने जलमहल तक भी पानी पहुंचाया जाता था। यमुना के सत्तर मील ऊपर की ओर एक बांध बनाया गया था। इस बांध से एक नहर, जल लेकर लाल किले में प्रवेश करती थी। किले में इस नहर का प्रवेश उत्तरी कोण में बने एक छिद्र से होता था। यह नहर-ए-बिहिश्त (स्वर्ग की नहर) शाहबुर्ज के खुले केन्द्रीय मेहराबदार मण्डप के संगमरमरी झरने से प्रवेश करती थी और वहीं से पत्थर या संगमरमर की नालियों द्वारा सभी दिशाओं में बंट जाती थी। कुछ मण्डपों में यह फव्वारों का रूप ले लेती थी……।’

किले के उत्तरी भाग में दीवान-ए-खास है। स्थापत्य की दृष्टि से इसकी शैली पूर्ण नहीं है, फिर भी यह प्रभावशाली है तथा शाहजहाँ के कला-वैभव का परिचायक है। इस पर अमीर खुसरो की कविता की पंक्तियां खुदी हुई हैं-

गर फिरदौस बररूये जमीं अस्त।

हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त।।

अर्थात्- यदि धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है।

जामा मस्जिद, आगरा

जामा मस्जिद आगरा के किले के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। इसका निर्माण शाहजहाँ की पुत्री जहांआरा ने ई.1648 में करवाया था। इसका आकार 130 फुट गुणा 100 फुट है। इसकी मेहराबें सामने की ओर चौड़ा स्थान छोड़कर बनाई गई हैं जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। मस्जिद की छत के प्रत्येक कोने पर एक-एक अष्टकोणीय गुम्बददार छतरी है। इसके ऊपरी भाग पर तीन बड़े गुम्बद तथा चार सुंदर मीनारें स्थित हैं। वी. पी. सक्सेना ने लिखा है- ‘यह साहसी विधवा की एक सुंदर कृति है।’

शाहजहाँ कालीन भवन दारा शिकोह पुस्तकालय, आगरा

शाहजहाँ के बड़े पुत्र दारा शिकोह (ई.1615-59) द्वारा आगरा शहर के मध्य में एक पुस्तकालय भवन का निर्माण करवाया गया था। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह शाहजहाँकालीन ऐतिहासिक भवन आज भी मौजूद है। इसे दारा शिकोह की हवेली भी कहा जाता था।

शाहजहाँ के शासन-काल में इस भवन में सूफी विद्वानों द्वारा आध्यात्मिक चर्चाएं आयोजित की जाती थीं जिनमें प्रायः दारा शिकोह स्वयं भी उपस्थित रहता था। दारा शिकोह को फारसी तथा संस्कृत भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। उसने कई उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था और इस्लाम तथा वेदांत की समानताओं को उजागर करने वाली आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी थीं।

दारा शिकोह ने इस पुस्तकालय के लिए यूरोप से हजारों पुस्तकें खरीद कर मंगवाई थीं। पुस्तकालय भवन में पुस्तकों को रखने के लिए तरतीब से अलमारियां बनाई गईं तथा पुस्तकें रखने के स्थान के साथ-साथ बाइण्डरों, पेंटरों एवं अनुवादकों के लिए अलग-अलग स्थान बनवाए गए। भवन के सभी हिस्सों में प्राकृतिक प्रकाश एवं हवा के प्रवेश के लिए विशेष प्रबंध किए गए थे। इसका केन्द्रीय कक्ष विद्वानों के सुविधा पूर्वक बैठने के लिए काफी बड़े आकार में बनाया गया जिसकी खिड़कियों को रंगों से सजाया गया था।

ई.1921 के आगरा गजेटियर के अनुसार अंग्रेजों ने ई.1881 में इस भवन को टाउन हॉल में परिवर्तित कर दिया। ब्रिटिश काल में ही कुछ समय के लिए इस भवन में आगरा हाईकोर्ट भी चला तथा ई.1903 में इसे सरकारी कार्यालयों एवं नगर पालिका के कार्यालय को दे दिया गया। इस दौरान इस भवन का सारा सौंदर्य नष्ट हो गया तथा दाराशिकोह के समय वाली समस्त रौनक समाप्त हो गई।

आजादी की लड़ाई के दौरान अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने इस भवन से जनता को सम्बोधित किया। इस कारण यह आगरा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भवन बन गया किंतु स्वतंत्रता के पश्चात् आगरा नगरपालिका ने इसके कुछ कमरे मोतीगंज मण्डी के व्यापारियों को किराए पर उठा दिए तथा इसके चारों ओर की भूमि पर चीनी, गुड़ और चावल के व्यापारियों ने अतिक्रमण कर लिए। वर्तमान में इस भवन में एक तरफ खादी बोर्ड का मंदिर है तथा एक हिस्से में स्कूल चलता है। दारा शिकोह ने इसी प्रकार का एक पुस्तकालय दिल्ली में भी बनवाया था। 

चीनी का रौजा, आगरा

आगरा स्थित चीनी का रौजा में शाहजहाँ के मंत्री अल्लामा अफज़ल खान मुल्ला की कब्र है। वह जहाँगीर एवं शाहजहाँ के काल में विख्यात पारसी कवि और विद्वान था जो बाद में शाहजहाँ का प्रधानमंत्री भी बना। उसकी मृत्यु ई.1639 में हुई। उसकी स्मृति में यह मकबरा बनाया गया। यह यमुना के पूर्वी तट पर, एतमादुद्दौला के मकबरे से केवल एक किलोमीटर उत्तर में स्थित है। मकबरे का मुख्य द्वार मक्का की ओर रखा गया है।

इस मकबरे के बाहरी भाग पर चमकदार टायल्स लगाई गई हैं जिन्हें ‘कशीकारी’ एवं ‘चीनी कला’ भी कहा जाता है। इसके गुम्बद मुगल शैली के अन्य गुम्बदों की तरह आनुपातिक नहीं हैं। नीचे गुम्बदों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह ईरानी शैली का मकबरा है। गुंबद की भीतरी छत पर तस्वीरों और इस्लामिक लिखावट के चिह्न देखे जा सकते हैं। गुंबद के ऊपर कुरान की कुछ आयतें खुदी हुई हैं।

अंगूरी बाग, आगरा

शाहजहाँ ने ई.1637 में आगरा में अंगूरी बाग का निर्माण करवाया। इसके भीतर चारबाग शैली में उद्यान लगा हुआ है तथा संगमरमर की बारादरियां, हौज फव्वारे एवं बरामदे बने हुए हैं। बाग के उत्तर-पूर्व में शाही हम्माम बना हुआ है जिसमें आकर्षक भित्ति चित्र बने हुए हैं। यह उद्यान खास बाग का हिस्सा है तथा शाहजहाँ के हरम की औरतों द्वारा प्रयुक्त किया जाता था। उस काल में इस बाग में उत्तम किस्म के अंगूरों की बेलें लगाई गई थीं।

दिल्ली के शाहजहाँ कालीन भवन

शाहजहाँनाबाद

ई.1638 में शाहजहाँ ने यमुना नदी के दाएं तट पर शाहजहाँनाबाद बसाना आरम्भ किया। पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘अकबर के फतेहपुर सीकरी की तरह शाहजहाँ ने दिल्ली में अपने नाम पर शाहजहाँनाबाद नामक नगर की स्थापना की तथा वहाँ अनेक सुंदर भवनों का निर्माण करवाया।’

शाहजहाँनाबाद को एक सुनिश्चित योजना के अनुसार बनाया गया था। इसके मुख्य दरवाजों से दो बड़े आम रास्ते निकलते थे जो कि नगर की दीवारों में बने दरवाजों तक जाते हैं और इस प्रकार जो कोण बनता है उसी में जामा मस्जिद बनाई गई है। शाहजहाँनाबाद उत्तर से दक्षिण की ओर समानांतर चतुर्भुज के आकार का बना हुआ है। आगरा के किले की तरह यह भी एक परकोट से घिरा हुआ है किंतु किले के परकोटे की तुलना में यह कमजोर है।

लाल किला, दिल्ली

शाहजहाँ ने दिल्ली के पास शाहजहाँनाबाद नामक नगर बसाया और ई.1638 में उसमें लाल किले के नाम से एक किले का निर्माण आरम्भ करवाया। यह ई.1647 में बनकर तैयार हुआ। इसके निर्माण में लगभग 1 करोड़ रुपया व्यय हुआ था। किले का निर्माण हमीद अहमद नामक शिल्पकार की देख-रेख में हुआ।

दिल्ली के लाल किले को प्रारम्भ में किला-ए-मुल्ला के नाम से जाना जाता था। यह आगरा के लाल किले की तुलना में बहुत छोटा है। इसकी लम्बाई 3100 फुट और चौड़ाई 1650 फुट है। किले की दीवारें ऊँची तथा कँगूरेदार हैं। इसकी पश्चिमी दीवार में मुख्य दरवाजा बनाया गया जो जन साधारण के प्रवेश के लिये था। दक्षिणी दीवार वाला दरवाजा विशेष व्यक्तियों द्वारा ही व्यवहार में लाया जाता था।

दिल्ली के दुर्ग के भीतर की इमारतों की प्रशंसा करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘दिल्ली दुर्ग के भीतर की इमारतें अत्यधिक अलंकृत थीं और चीन की कला के लिए स्पर्धा की चीज बन गई थीं।’

दीवाने आम

दिल्ली के लाल किले के मध्य विशाल भाग में दीवाने आम बना हुआ है। इसका आकार चतुर्भुजी है। यह पत्थर से निर्मित 185 फुट लम्बा तथा 70 फुट चौड़ा भवन है। यहाँ बैठकर शाहजहाँ जनसाधारण की फरियाद सुनता था। इसके बाहरी भाग में 9 मेहराबें दोहरे खम्बों पर आधारित हैं।

तीनों ओर का मार्ग स्तम्भों पर आधारित दाँतेदार डाटों से बना हुआ है। इन स्तम्भों की कुल संख्या 40 है। इस भवन में पीछे की दीवार में एक मेहराबदार ताख है। इस ताख में शाहजहाँ का प्रसिद्ध तख्ते ताउस रखा रहता था। इस ताख की दीवार में अत्यन्त सुन्दर शिल्पकारी की गई थी तथा पत्थरों को खोदकर उनमें रत्नों की जड़ाई की गई थी।

दीवान-ए-खास

दिल्ली के लाल किले की इमारतों में दीवान-ए-खास सर्वाधिक अलंकृत भवन है। इसका निर्माण एक निश्चित योजना के अनुसार हुआ है। इसका बड़ा कमरा 90 फुट लम्बा और 67 फुट चौड़ा है। इसके बाहरी भाग में पाँच रास्ते हैं। ये पाँचों रास्ते मेहराबदार हैं तथा बराबर आकार के हैं। दूसरी ओर के रास्ते कुछ छोटे हैं।

इस प्रकार यह इमारत अधिक खुली हुई है। इन रास्तों से काफी हवा आती है जिससे यहाँ ठण्डक बनी रहती हैं। इसका फर्श सफेद संगमरमर का है। इनकी मेहराबें दाँतेदार हैं। छतें बहुत ही सुन्दर हैं। इन छतों में स्वर्ण तथा जवाहरातों की सजावट की गई है। इस छत को टिकाये रखने के लिये स्तम्भों का प्रयोग नहीं किया गया है।

यह छत 12 कोनों के सेतुबन्ध से सधी हुई है। प्रत्येक भाग में सुन्दर जड़ाई तथा रंग का काम हुआ है। दीवारों तथा मेहराबों पर फूलों की सुन्दर आकृतियाँ बनी हुई हैं। इसके मेहराब स्वर्ण तथा रंग से सजे हुए हैं और पंक्तियों से भरे हुए से लगते हैं।

रंगमहल

रंगमहल तथा दीवाने खास में जड़ाई, नक्काशी, पच्चीकारी तथा सजावट का काम बहुत उत्तम है। इन दोनों की बनावट एक जैसी है। दिल्ली के लाल किले में स्थित रंगमहल एक महत्त्वपूर्ण इमारत है। यह शाहजहाँ का हरम था। यह भवन 153 फुट लम्बा और 69 फुट चौड़ा है। इसके मध्य में एक बड़ा कक्ष है तथा चारों कोनों में छोटे-छोटे कक्ष बने हुए हैं। यह अलंकृत सेतबन्धों द्वारा 15 भागों में विभाजित है तथा रंग एवं चमक में अद्वितीय है।

दिल्ली दरवाजा

दिल्ली दरवाजा, दिल्ली शहर के दक्षिणी ओर का नगर रक्षक द्वार था। यह द्वार पुरानी दिल्ली क्षेत्र (शाहजहाँनाबाद) और नई दिल्ली क्षेत्र के बीच स्थित है। पुरानी दिल्ली क्षेत्र के नेताजी सुभाष मार्ग एवं नई दिल्ली क्षेत्र के बहादुरशाह जफर मार्ग के बीच यह दरियागंज के छोर पर स्थित है।

इस दरवाजे का निर्माण शाहजहाँ ने ई.1638 में दिल्ली के सातवें शहर तथा राजधानी शाहजहानाबाद की घेराबन्दी करती रक्षक दीवार के प्रवेश-द्वार के रूप में करवाया था। बादशाह इस द्वार का उपयोग नमाज पढ़ने हेतु जामा मस्जिद जाने के लिये करता था। यह द्वार नगर के तत्कालीन उत्तरी द्वार कश्मीरी दरवाजे से मिलता जुलता था। यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित था। द्वार के निकट हाथी की दो बड़ी प्रतिमाएं भी बनी थीं। इसलिए इसे हाथी-पोल भी कहा जाता था।

इस दरवाजे से निकलती सड़क उत्तरी ओर मुख्य शहर से गुजरती हुई उत्तरी द्वार, कश्मीरी दरवाजे तक जाती है एवं दरियागंज से निकलती है। दीवार का कुछ भाग दिल्ली जंक्शन रेलवे स्टेशन के निर्माण हेतु ध्वस्त कर दिया गया था। वर्तमान में इस इमारत को ऐतिहासिक स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया है तथा इसका रखरखाव भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण विभाग द्वारा किया जा रहा है।

जामा मस्जिद, दिल्ली

‘जामा मस्जिद’ का अर्थ शुक्रवार मस्जिद होता है। शाहजहाँ की बनवाई हुई दिल्ली की इमारतों में जामा-मस्जिद सबसे विशाल है। इसका निर्माण ई.1650 में आरम्भ करवाया गया और ई.1656 में पूरा हुआ। यह भारत की सबसे विशाल मस्जिद है। इस मस्जिद को ‘मस्जिद-ए-जहनुमा’ भी कहते हैं।

यह मस्जिद दिल्ली के लाल किले से केवल आधा किलोमीटर दूर स्थित है। इसे 5,000 कारीगरों ने शाहजहाँनाबाद में पहाड़ी भोज़ाल पर बनाया था। यह लाल पत्थर से निर्मित शाही ढंग की इमारत है। इसके तीनों विशाल दरवाजों पर बुर्ज बने हुए हैं। पूर्व का द्वार शाही परिवार के उपयोग के लिये था। उत्तर और दक्षिण के द्वारों से जन-साधारण प्रवेश करता था।

मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिये विशाल स्थान उपलब्ध है जिसमें एक साथ 25000 लोग नमाज पढ़ सकते हैं। इसके सामने 325 फुट लम्बा आयताकार सहन है जिसके बीच में वजू करने के लिये एक तालाब है। नमाज स्थल के बीच का बाहरी दरवाजा चौड़ा है तथा दोनों ओर पाँच-पाँच दाँतेदार मेहराबों के रास्ते हैं।

इसके दोनों कोनों पर चार मंजिला लम्बी-लम्बी मीनारें हैं। इसका मुख्य कक्ष बहुत सुंदर है। इसमें ग्यारह मेहराब हैं जिसमें बीच वाला मेहराब अन्य से कुछ बड़ा है। इसके ऊपर बने तीन विशाल गुंबदों को सफेद और काले संगमरमर से सजाया गया है जो निजामुद्दीन दरगाह की याद दिलाते हैं।

जामा मस्जिद के निर्माण कार्य की देख-रेख शाहजहाँ के वजीर सादुल्लाह खान ने की थी। मस्जिद का उद्घाटन 23 जुलाई 1656 को उज़बेकिस्तान के बुखारा के मुल्ला इमाम बुखारी ने किया था। शाहजहाँ का यह अंतिम भवन निर्माण था, इसके बाद उसने किसी अन्य कलात्मक इमारत का निर्माण नही किया। इस स्थल से प्राचीन मंदिर के अवशेष प्राप्त होते हैं। इससे अनुमान होता है कि यह किसी समय हिन्दू पूजा स्थल रहा होगा।

शाहजहाँ ने उसे तोड़कर मस्जिद में बदल दिया होगा। हिन्दू इसे प्राचीन विष्णु मंदिर मानते हैं। इस भवन के नीचे हिन्दू मूर्तियां दबी हुई बताई जाती हैं। सांसद विनय कटियार एवं सांसद साक्षी महाराज इस मस्जिद को हिन्दू मंदिर होने का दावा करते हैं। इस तथ्य की पुष्टि के लिए व्यापक शोध की आवश्यकता है।

औरंगजेब ने पाकिस्तान के लाहौर में बादशाही मस्जिद का निर्माण करवाया जिसका नक्शा दिल्ली की जामा मस्जिद की ही तरह था। ई.1948 में जब हैदराबाद का भारत संघ में विलय नहीं हुआ था, हैदराबाद के निज़ाम मीर उस्मान अली खान से दिल्ली की जामा मस्जिद की एक चौथाई मंजिल के जीर्णोद्धार के लिए 75,000 रुपए मांगे गए।

निज़ाम ने यह कहते हुए मस्जिद को 3 लाख रुपए स्वीकृत किए कि– ‘मस्जिद का बाकी तीन चौथाई हिस्सा पुराना नहीं दिखना चाहिए।’

दाराशिकोह लाइब्रेरी, दिल्ली

शाहजहाँ के बड़े पुत्र दारा शिकोह द्वारा ई.1636 में दिल्ली में एक पुस्तकालय भवन का निर्माण करवाया गया था जो अब गुरु गोविंदसिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय परिसर में स्थित है। परवर्ती मुगल बादशाहों के समय इस भवन को पंजाब के सूबेदार का आवास बनाया गया। यह भवन दिल्ली के प्रथम ब्रिटिश रेजिडेंट डेविड ऑक्टरलोनी का भी आवास रहा। बाद में यहाँ दिल्ली कॉलेज स्थानांतरित किया गया। उसके बाद इस भवन में जिला स्कूल और फिर नगर निगम बोर्ड का स्कूल चला।

अब इस भवन में दिल्ली सरकार का पुरातत्व विभाग चलता है। पुरातत्व विभाग इसे संग्रहालय में बदलने की योजना पर काम कर रहा है। इस संग्रहालय में खुदाई में प्राप्त दो हजार वर्ष पुराने टैराकोटा बर्तन, मूर्तियां तथा दारा शिकोह के समय एकत्र की गई बहुमूल्य पुस्तकें प्रदर्शित की जानी हैं।

फतेहपुरी मस्जिद

फतेहपुरी मस्जिद चांदनी चौक की पुरानी गली के पश्चिमी छोर पर स्थित है। इसका निर्माण शाहजहाँ की बेगम फतेहपुरी ने ई.1650 में करवाया था। उसी बेगम के नाम पर इस मस्जिद का नाम फतेहपुरी मस्जिद पड़ा। यह बेगम फतेहपुर की थी। ताज महल परिसर में बनी मस्जिद भी इसी बेगम के नाम पर है। लाल पत्थरों से बनी यह मस्जिद मुगल वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है। मस्जिद के दोनों ओर लाल पत्थर से बने स्तंभों की कतारें हैं। इस मस्जिद में एक कुंड भी है जो सफेद संगमरमर से बना है।

अंग्रेज़ों ने 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बाद इस मस्जिद को नीलाम कर दिया। राय लाला चुन्नामल ने इस मस्जिद को 19,000 रुपए में खरीद लिया। लाला चुन्नामल के वंशज आज भी चांदनी चौक में चुन्नामल हवेली में रहते हैं। ई.1877 में सरकार ने इसे चार गांवों के बदले में वापस अधिग्रहीत कर मुसलमानों को दे दिया। ऐसी ही एक अन्य मस्जिद अकबरबादी बेगम द्वारा बनवाई गई थी जो अंग्रेज़ों ने ई.1858 में नष्ट कर दी।

फहीम का मकबरा

हुमायूँ के मकबरे के परिसर के बाहर नीला बुर्ज नामक मकबरा स्थित है। इसका यह नाम इसके गुम्बद के ऊपर लगी नीली ग्लेज्ड टाइलों के कारण पड़ा है। यह मकबरा अकबर के नौरत्नों में से एक अब्दुल रहीम खानखाना द्वारा अपने सेवक मियां फ़हीम के लिये बनवाया गया था। मियां फ़हीम, रहीम के बेटे फ़ीरोज़ खान के संग ही पला-बढ़ा था और रहीम का अत्यंत प्रिय सेवक था। 

ई.1625 में जब शहजादे खुर्रम (शाहजहाँ) के आदेश से महावत खाँ ने रहीम को बंदी बनाया था तब फहीम, महावत खाँ के सिपाहियों से लड़ते हुए काम आया। इस मकबरे का स्थापत्य बड़ा अनूठा है। यह बाहर से अष्टकोणीय तथा भीतर से वर्गाकार है। इसकी छत अपने समय में प्रचलित दोहरे गुम्बद से अलग है। भीतर के प्लास्टर पर बहुत ही सुंदर चित्रकारी एवं पच्चीकारी की गई है।

इस परिसर के निकट बड़ा बताशेवाला महल, छोटे बताशेवाला महल और बारापुला नामक एक पुल शामिल है जिसमें 12 स्तम्भ तथा उनके बीच 11 मेहराब हैं। इसका निर्माण जहाँगीर के दरबार के एक हिंजड़े मिह्न बानु आगा ने ई.1621 में करवाया था।

अब्दुर्रहीम खानखाना का मकबरा, दिल्ली

अब्दुर्रहीम खानखाना का मकबरा शाहजहाँ काल की महत्वपूर्ण इमारतों में से है। इसकी निर्माण योजना हुमायूँ के मकबरे की योजना पर आधारित है लेकिन इसके अग्रभाग के पक्षों को सरल कर दिया गया है जिससे इसकी योजना अष्टकोणीय न होकर वर्गाकार हो गई है शेष स्थापत्य में दोनों मकबरे एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं। इस मकबरे पर ईरानी प्रभाव स्पष्ट झलकता है।

चांदनी चौक

चांदनी चौक का निर्माण शाहजहाँ ने करवाया था। इसका डिजाइन शहजादी जहाँआरा ने किया था। इसमें मूल रूप से एक दूसरे को काटने वाली सीधी नहरें बनाई गई थीं जिनमें चंद्रमा की चांदनी झिलमिलाया करती थी। इसीलिए इसका नाम चांदनी चौक पड़ा। इन नहरों के किनारे-किनारे दुकानें एवं अमीर लोगों की हवेलियां बनाई गई थीं। समय के साथ नहरें तो समाप्त हो गईं तथा उनके स्थान पर घना बाजार विकसित हो गया।

वर्तमान में यह भारत का सबसे बड़ा थोक बाजार बन गया है। बहादुरशाह जफर के दरबारी उर्दू कवि मिर्जा गालिब की हवेली, बादशाह शाहआलम (द्वितीय) से सराधना की जागीर पाने वाली समरू बेगम तथा फतेहपुरी मस्जिद को खरीदने वाले लाला चुन्नामल की हवेली एवं अन्य ऐतिहासिक हवेलियां चांदनी चौक में स्थित हैं। यह बाजार लाल किले के सामने स्थित है तथा फतेहपुरी मस्जिद का दृश्य यहाँ से साफ दिखाई देता है। चांदनी चौक की कई गलियां विशिष्ट प्रकार की सामग्री के बाजार के रूप में प्रसिद्ध हैं

चांदनी चौक में स्थित नई सड़क पुस्तकों की दुकानों के लिए जानी जाती है। दरीबा कलां सोने, चांदी और हीरे-जवाहरात के आभूषणों के बाजार के रूप में प्रसिद्ध है। कुंदन एवं मीनाकारी के काम किए हुए आभूषण भी इस बाजार की पहचान रहे हैं। किसी समय यह हाथ से बने आभूषणों के लिए दुनिया भर के देशों में जाना जता था। इत्र एवं सुगंधित तेलों के लिए भी दरीबा कलां विशेष रूप से प्रसिद्ध था।

चावड़ी बाजार: कागजों के विशिष्ट उत्पादों तथा विवाह के निमंत्रण पत्रों की छपाई की लिए प्रसिद्ध है।

किनारी बाजार: एक संकरी गली में स्थित है। यह गली बाजार विवाह के लिए जरदोरी के काम की साड़ियों, चुन्नियों एवं लहंगों के लिए जाना जाता है। दुपट्टों एवं साड़ियों पर लगने वाले पारसी बॉर्डर तथा विभिन्न डिजाइनों की किनारियां भी इस बाजार की पहचान रही हैं।

चांदनी चौक का भागीरथ पैलेस: इलेक्ट्रिीकल एवं इलेक्ट्रिोनिक सामान के लिए विश्व के सबसे बड़े बाजार के रूप में प्रसिद्ध है।

बल्लीमारान बाजार: जूतों एवं चश्मों के लिए प्रसिद्ध है।

खारी बावली: मसालों, सूखी मेवा तथा आयुर्वेदिक औषधियों के लिए प्रसिद्ध है। यह चांदनी चौक के पश्चिमी सिरे पर स्थित है।

फतेहपुरी बाजार: फतेहपुरी बाजार खोया एवं पनीर के लिए प्रसिद्ध है।

कूचा चौधरी बाजार: कैमरों तथा फोटोग्राफी के लिए जाना जाता है।

कटरा नील: सभी प्रकार के स्त्री-पुरुष कपड़ों यथा साड़ी, सलवार सूट, लहंगा, पैंट-शर्ट के बाजार के रूप में जाना जाता है।

मोती बाजार: विभिन्न प्रकार के मोतियों, ऊनी कपड़ों, शॉल एवं स्वेटर आदि के लिए प्रसिद्ध है।

लाहौर के शाहजहाँ कालीन भवन

जहाँगीर तथा शाहजहाँ के काल में लाहौर को वही महत्व मिला जो आगरा एवं दिल्ली को प्राप्त था। इसलिए जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने लाहौर दुर्ग में तथा दुर्ग के निकटवर्ती क्षेत्र में कई भवन बनवाए। उसने लाहौर के किले में पुरानी इमारतों को गिरवाकार किले के पश्चिमी भाग में चालीस स्तम्भ का दीवाने आम, मुसम्मन बुर्ज, शीशमहल के साथ-साथ नौलक्खा और ख्वाबगाह आदि इमारतें बनवाईं। ये समस्त इमारतें काफी सुन्दर हैं। इनमें से अब कुछ ही भवन शेष बचे हैं।

लाहौर के मुगल कालीन भवनों को औरंगजेब के काल में सर्वाधिक क्षति पहुंची। गुरु गोबिंदसिंह के पुत्रों द्वारा मुसलमान बनने से इन्कार किए जाने के बाद पंजाब के सूबेदार वजीर खाँ ने गुरु के पुत्रों को जीवित ही दीवार में चिनवा दिया। इसके बाद सिक्ख वजीर खाँ तथा औरंगजेब के शत्रु हो गए।

सिक्खों ने लाहौर तथा सम्पूर्ण पंजाब में मुगलों के भवनों को लूट लिया और बहुतो को नष्ट भी कर दिया। सिक्खों ने वजीर खाँ को भी ‘चप्पर-चिरी’ के युद्ध में मार दिया। पंजाब के प्रमुख स्थान सरहिंद को पूरी तरह नष्ट कर दिया तथा लाहौर सहित आसपास के अनेक मुगल भवनों के पत्थरों को तोड़कर अमृतसर के स्वर्णमंदिर एवं अन्य भवनों को भेज दिया।

शाहजहाँ कालीन भवन – शीश महल, लाहौर दुर्ग

शाहजहाँ ने लाहौर दुर्ग में कई निर्माण करवाए जिनमें से ई.1631-32 में शीशमहल का निर्माण सर्वाधिक सजावटी एवं कलात्मक था। यह भवन लाहौर दुर्ग के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में जहाँगीर द्वारा निर्मित शाह बुर्ज खण्ड में स्थित है। इस भवन का निर्माण जहाँगीर ने ईटों से करवाया था तथा इसकी दीवारों पर चिकना प्लास्टर करके उसे फ्रैस्को (भित्तिचित्रों) से सजाया गया था। शाहजहाँ ने इस महल को शीशमहल में बदल दिया। उसने महल की दीवारों से प्लास्टर हटवाकर उसकी जगह सफेद संगमरमर लगवाया तथा उस पर पैट्रा ड्यूरा शैली में शीशे जड़वाए।

महल की छतों, दीवारों तथा स्तम्भों पर कांच के बने उत्तल-लैंस (कॉन्वैक्स ग्लास), रंगीन कांच तथा दर्पण (मिरर) का प्रयोग किया गया है। कांच के हजारों टुकड़ों से बड़ी एवं पुष्पाकार तथा ज्यामितीय आकृतियां बनाई गई हैं। फारसी में इसे आइनाकारी एवं मुनाबतकारी कहा जाता था। शीश महल के केन्द्रीय कक्ष की छत दो मंजिली ऊँची है। शीशमहल का प्रयोग शाही बैठकों के लिए होता था। केवल शहजादों तथा विशिष्ट दरबारियों को ही इस महल में प्रवेश करने की अनुमति थी।

महाराजा रणजीतसिंह इस महल का उपयोग कोहिनूर हीरे का प्रदर्शन करने के लिए करते थे। उन्होंने इस शीश महल के ऊपर अपना निजी महल बनवाया। शीशमहल को यूनेस्को द्वारा ई.1981 में विश्व धरोहर सूचि में सम्मिलित किया गया। यह मुगल बादशाहों द्वारा लाहौर दुर्ग में बनवाए गए 21 भवनों में से एक है।

इस महल के अनुकरण पर आगरा दुर्ग में भी शीश महल बनवाया गया। मारवाड़ एवं आम्बेर के राजाओं ने भी अपने-अपने दुर्ग में भी शीशमहल बनवाए जो आज भी देखे जा सकते हैं।

मोती मस्जिद, लाहौर

शाहजहाँ ने लाहौर में मोती मस्जिद का निर्माण करवाया। यह ईरानी शैली में बनी हुई है। इसे सफेद संगमरमर की पॉलिशयुक्त टायलों से ढका गया है। इसके लिए मकराना से संगमरमर ले जाया गया था। मस्जिद के भीतर का स्थापत्य बहुत सामान्य है किंतु इसके सहन के किनारों पर बने बरामदे में मेहराबदार दरवाजे बनाए गए हैं।

ये मेहराब ऊपर से गोलाकार, तिकोने एवं डिजाइनदार भी बनाए गए हैं। मस्जिद की भीतरी छतों पर खुदाई करके अलंकरण किया गया है तथा छतों के ऊपर के बाहरी हिस्से में गुम्बद बनाए गए हैं। पूरी मस्जिद सफेद पत्थर की होने के कारण इसे मोती मस्जिद कहा जाता है। सम्पूर्ण इमारत की बनावट में स्थापत्य संतुलन दिखाई देता है।

नूरजहाँ का मकबरा, लाहौर

जहाँगीर की मृत्यु के बाद नूरजहाँ ने अपने दामाद शहरयार को लाहौर में बादशाह घोषित किया था किंतु नूरजहाँ के भाई आसफ खाँ ने अपने दामाद खुर्रम को बादशाह बनाया तथा लाहौर पहुंचकर नूरजहाँ के दामाद शहरयार को मार डाला। इसके बाद नूरजहाँ लाहौर में ही रहने लगी। राजनीति तथा शासन के कार्य से उसने स्वयं को पूरी तरह अलग कर लिया। ई.1645 में लाहौर में नूरजहाँ का निधन हुआ। लाहौर के शाहदरा में जहाँगीर के मकबरे के निकट नूरजहाँ का मकबरा है जिसमें नूरजहाँ की कब्र बनी हुई है।

शालीमार उद्यान, लाहौर

शाहजहाँ ने ई.1641-42 में लाहौर में शालीमार उद्यान बनवायाा। चारों ओर से ऊँची दीवारों से घिरा यह उद्यान अपने जटिल फ्रेमवर्क के लिए प्रसिद्ध है। यह फारसी उद्यान शैली पर आधारित है जिसमें कुरान में वर्णित जन्नत के चारबाग की कल्पना को साकार करने का प्रयास किया गया है। इसका नक्शा जहाँगीर के समय काश्मीर में बने शालीमार गार्डन के समान रखने का प्रयास किया गया है।

काश्मीर के बाग और लाहौर के बाग में बड़ा अंतर भौगोलिक परिस्थितियों का है। काश्मीर का शालीमार बाग प्राकृतिक रूप से एक ढलवां भूमि पर बना हुआ है जिसमें सिंचाई जल को एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाने के लिए विशेष प्रबंध नहीं करने पड़े जबकि लाहौर का शालीमार गार्डन समतल मैदान में स्थित है अतः इस बाग में जल प्रबंधन के लिए विशेष प्रयास किए गए। यह उद्यान 18 माह में बनकर पूरा हुआ।

लाहौर के शालीमार गार्डन का निर्माण खलीउल्लाह खाँ तथा मुल्ला अलुआल मालुक तूनी की देखरेख में किया गया। उद्यान का निर्माण कार्य अली मर्दान खाँ द्वारा किया गया। यह आयताकार क्षेत्र में बना हुआ है। उत्तर-दक्षिण में इसकी लम्बाई 658 मीटर तथा पूर्व-पश्चिम में इसकी चौड़ाई 258 मीटर है। यह 16 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें भी काश्मीर के शालीमार बाग की पद्धति पर टैरेसों का निर्माण किया गया है।

प्रत्येक टैरेस अपने पूर्ववर्ती टैरेस से 4 से 5 मीटर ऊँचा है। सबसे ऊपर का टैरेस ‘बागे-फराह-बक्श’ कहलाता है जिसका अर्थ ‘आनंददायी’ होता है। यह शाही हरम के लिए आरक्षित था। अन्य टैरेस ‘बागे-फैज-बख्श’ और ‘बागे-हयात-बख्श’ कहलाते हैं। मध्यवर्ती टैरेस बादशाह एवं उसके अमीरों के लिए था जबकि निम्नवर्ती टैरेस में जनसामान्य को प्रवेश मिलता था। सबसे ऊपरी टैरेस में 105, मध्यवर्ती टैरेस में 152 तथा निम्नवर्ती टैरेस में 153 फव्वारे लगे हैं। इस प्रकार बाग में कुल 410 फव्वारे हैं।

बाग में सावन-भादों नामक जलाशय, नक्कारखाना भवन, ख्वाबगाह, हम्माम तथा बड़े हॉल बने हुए हैं। एक टैरेस से दूसरे टैरस तक जाने के लिए संगमरमर के मार्ग बने हुए हैं। प्रत्येक ऊपरी टैरेस से नीचे के टैरेस तक पानी बहकर आने के लिए संगमरमर की ढलवां रचनाएं बनी हैं।

मुस्लिम इतिहासकारों ने आरोप लगाए हैं कि सिक्खों के शासन-काल में सिक्ख सेनाओं ने इस बाग की अलंकृत जालियों, सजावटी पत्थरों आदि को निकालकर इस सामग्री से अमृतसर के स्वर्णमंदिर तथा अमृतसर के निकट स्थित रामबाग महल की सजावट की। लहनासिंह मजीठिया ने शालीमार बाग का कीमती गेट निकालकर बेच दिया। पाकिस्तान के निर्माण के पंद्रह साल बाद अयूब खाँ सरकार ने इस बाग का राष्ट्रीयकरण किया। ई.1981 में यूनेस्को ने इसे लाहौर किले के साथ ही विश्व धरोहर सूचि में सम्मिलित किया।

आसिफ खां का मकबरा

 आसिफ खां का मकबरा मुगल अमीर आसिफ खाँ की स्मृृति में बनाया गया था। वह नूरजहाँ का भाई, जहाँगीर का साला, मुमताज महल का पिता तथा शाहजहाँ का श्वसुर था। उसे शाहजहाँ ने खानखाना अर्थात् मुगल सेनाओं का मुख्य सेनापति बनाया था। वह 12 जून 1641 को जगतसिंह के विद्रोह को दबनाने के लिए हुई लड़ाई में मारा गया था। शाहजहाँ ने लाहौर में उसका मकबरा बनवाया। आसिफ खाँ का मकबरा लाहौर नगर के परकोटे के भीतर स्थित शहादरा बाग में बना हुआ है तथा जहाँगीर और नूरजहाँ के मकबरों के पास स्थित है।

यह मकबरा मध्य एशिया स्थापत्य शैली में बनी हुई है तथा इसके चारों ओर विशाल चारबाग बनाया गया था। इसके भीतर बहुत सुंदर रंगीन भित्तिचित्र ज्यामितीय अलंकरण एवं फूल-पत्ती बनाए गए थे। जब सिक्खों ने मुगल सल्तनत पर हमले किए तब गुज्जरसिंह, लहनासिंह तथा सूबासिंह नामक सिक्ख सरदारों ने इस मकबरे के महंगे रत्नों एवं पत्थरों को लूट लिया तथा मकबरे को बहुत नुक्सान पहुंचा। महाराजा रणजीतसिंह ने भी इस मकबरे के संगमरमर तथा अन्य अलंकृत पत्थरों को उखड़वाया तथा उनसे लाहौर दुर्ग के निकट हुजूरी बाग की बारादरी बनवाई। इस मकबरे का कुछ पत्थर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के लिए भेजा गया।

अन्य नगरों में शाहजहाँ कालीन भवन

शाहजहाँ ने आगरा, दिल्ली और लाहौर के अतिरिक्त काबुल, अजमेर, कन्धार, अहमदाबाद और काशमीर में भी लाल बलुआ पत्थर और सफेद  संगमरमर की अनेक इमारतें बनवाई थीं। शाहजहाँ के बड़े पुत्र दारा शिकोह ने कश्मीर में मौलवी अखूंद मस्जिद और परी महल बनवाए।

शाहजहाँ मस्जिद, थट्टा

सिंध प्रांत के थट्टा नगर में शाहजहाँ ने एक मस्जिद बनवाई जिसे शाहजहाँ मस्जिद कहा जाता है। अब यह पाकिस्तान के सिंध प्रांत में है तथा थट्टा की प्रमुख मस्जिद है। इस मस्जिद का स्थापत्य मध्य-ऐशिया के तैमूरी स्थापत्य से अत्यधिक प्रभावित है। इस मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ द्वारा बलख एवं समरकंद के अभियान के बाद करवाया गया था। वहीं पर शाहजहाँ ने तैमूरी शैली की मस्जिदें देखी थीं और उन्हीं का अनुकरण इस मस्जिद के निर्माण में किया गया था। इस मस्जिद को दक्षिण ऐशिया में सर्वाधिक अलंकृत टैराकोटा टाइल युक्त मस्जिद कहा जाता है। इस मस्जिद में ईंटों से अलंकरण किया गया है जो कि मुगल काल की अन्य मस्जिदों में देखने को नहीं मिलता है।

शेख-चिल्ली (शेख चेहली) का मकबरा, कुरुक्षेत्र

शाहजहाँ के शासनकाल में शेख चिल्ली नामक सूफी संत हुए। संभवतः उनका सही नाम शेख चेहली था जो अपभ्रंश होकर शेख-चिल्ली हो गया। शाहजहाँ का पुत्र दारा शिकोह शेख चिल्ली का शिष्य था। दाराशिकोह ने ही ई.1650 में इस मकबरे को बनवाया था।

शेख चिल्ली का मकबरा कुरुक्षेत्र के बाहरी इलाके में एक ऊँचे टीले पर स्थित है जहाँ किसी समय हर्षवर्द्धन की प्राचीन राजधानी थानेश्वर स्थित थी। यह लाल बलुआ पत्थरों से बनी विशाल इमारत है। मकबरे का गुम्बद नाशपाती की आकृति में बना है। मकबरे के निचले भाग के ठीक केंद्र में शेख-चिल्ली की कब्र स्थित है।

इस मकबरे के बगल में शेख-चिल्ली की पत्नी का भी मकबरा है। इस पर फूलों की डिजाइन से अलंकरण किया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा दोनों ही इमारतों को संरक्षित इमारतों का दर्जा दिया गया है। शेख-चिल्ली का मकबरा ताजमहल से मिलता-जुलता है। इस कारण इस मकबरे को हरियाणा का ताजमहल भी कहा जाता है। दिल्ली से अमृतसर के बीच केवल यही एक स्मारक है जिसमें सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है।

शेरशाह सूरी ( ई.1540-1545) की बनवाई ग्रैंड ट्रंक रोड इस मकबरे के प्रवेश द्वार के सामने से गुजरती थी (जो कि वास्तव में बुद्धकाल से भी अत्यंत प्राचीन सड़क है) किंतु अब जीटी रोड यहाँ से काफी दूर बन गई है। मकबरे से कुछ दूर स्थित एक प्राचीन पुलिया और कोस मीनार के होने से भी यहाँ किसी समय जीटी रोड होने का प्रमाण मिलता है।

सड़क गुजरने का स्थान आज भी दर्रा खेड़ा के नाम से प्रसिद्ध है। इसके उत्तरी छोर पर पर कोटे से घिरा हर्षवर्धन पार्क है जहाँ कभी सराय और अस्तबल हुआ करता था। यह भी शेरशाह सूरी की बनवाई सड़क पर ही स्थित है। मकबरे में संगमरमर, चित्तीदार लाल पत्थर, पांडु रंग का बलुआ पत्थर, लाखोरी ईंट, चूना-सुर्खी और रंगीन टाइलों का प्रयोग, इसे शाहजहाँ कालीन सिद्ध करता है। मकबरे के अंदर एक संग्रहालय भी है।

निशात बाग, काश्मीर

निशात बाग श्रीनगर की डल झील के पूर्वी तट पर स्थित है। यह कश्मीर घाटी का सबसे बड़ा उद्यान है। ‘निशात’ उर्दू भाषा का शब्द है जिसका अर्थ ‘प्रसन्नता’ होता है। यह सीढ़ीदार शैली में बनाया गया है जिसे अंग्रेजी में ‘टैरेस गार्डन’ कहते हैं। इस उद्यान से डल झील, जबरवन पहाड़ियां तथा पीरपंजाल पहाड़िायों की शृंखला दिखाई देती हैं जिसके कारण सम्पूर्ण दृष्य किसी विराट कैनवास पर अंकित किए गए चित्र की भांति दिखाई देता है। इस उद्यान का निर्माण ई.1633 में नूरजहाँ के बड़े भाई आसफ खाँ द्वारा करवाया गया था।

कहते हैं कि जब शाहजहाँ ने इसे पहली बार देखा तो उसने अपने श्वसुर आसफ खाँ जो कि शाहजहाँ का प्रधानमंत्री भी था, से इस उद्यान की तीन बार भूरि-भूरि प्रशंसा की ताकि आसफ खाँ इस उद्यान को शाहजहाँ को भेंट कर दे किंतु जब आसफ खाँ ने यह उद्यान शाहजहाँ को भेंट नहीं किया तो शाहजहाँ ने इस उद्यान की जलापूर्ति बंद करवा दी। इस कारण कुछ समय के लिए बाग उजड़ गया और आसफ खाँ बहुत दुखी हुआ।

एक बार आसफ खाँ इस उद्यान में किसी वृक्ष के नीचे आराम कर रहा था तब आसफ खाँ के एक सेवक ने शालीमार उद्यान से जल की आपूर्ति आरम्भ कर दी। जब आसफ खाँ ने फव्वारों के चलने की आवाज सुनी तो उसने बादशाह के भय से तुरंत जलापूर्ति बंद करवा दी। जब शाहजहाँ को इस घटना के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने आसफ खाँ के स्वामिभक्त सेवक के प्रति प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उद्यान में जलापूर्ति आरम्भ करवा दी।

मुगल बादशाह आलमगीर (द्वितीय) की पुत्री तथा बादशाह जहांदारशाह  की पौत्री जुहरा बेगम को इसी उद्यान में दफ्.न किया गया था।

यद्यपि इस बाग की मूल संरचना फारसी उद्यान शैली पर आधारित थी किंतु स्थानीय भौगोलिक परिस्थितयों एवं जलापूर्ति के स्रोतों के अनुसार इसके नक्शें में कुछ बदलाव भी किए गए थे। इसकी योजना में चारबाग शैली में अपानाई जाने जाने वाली तकनीक का पालन नहीं किया गया जिसमें कि केन्द्रीय नहर को चार भुजाओं में विभक्त किया जाता है।

अपितु इस बाग में पहाड़ी की चोटी से आने वाले स्थानीय ढाल एवं जलापूर्ति की दिशा को ध्यान में रखते हुए नालियों का प्रावधान किया गया। इसके कारण बाग वर्गाकार न बनकर आयताकार बन गया। इस बाग की लम्बी भुजा पूर्व से पश्चिम की ओर है तथा उसकी लम्बाई 1,798 फुट है जबकि बाग की चौड़ाई वाली भुजा उत्तर से दक्षिण 1,109 फुट है।

निशात बाग के लेआउट में चिनार तथा साइप्रस वृक्षों की कतारों को शामिल किया गया है जो झील के किनारे से आरम्भ होती है तथा पहाड़ी तक जाकर समाप्त होती है। डल झील से लेकर पहाड़ी तक की चढ़ाई के अनुसार इस उद्यान को बारह सीढ़ीनुमा हिस्सों में विभक्त किया गया है।

ये बारह हिस्से हिन्दू ज्योतिष की बारह राशियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पूरे बाग को पुनः दो खण्डों में विभक्त किया गया था। एक हिस्सा सार्वजनिक उद्यान के रूप में था जबकि दूसरा हिस्सा शाही महिलाओं के उपयोग के लिए था।

निशात बाग में भी शालीमार बाग की तरह पॉलिशयुक्त संगमरमर से नहरें एवं क्यारियां बनाई गई थीं। निशात बाग एवं शालीमार बाग के लिए जलापूर्ति का स्रोत एक ही था। निशात बाग के पूर्व से पश्चिम की ओर के ऊँचे भाग में जनाना गार्डन बनाया गया था। जबकि सबसे निचला हिस्सा डल झील से जुड़ा हुआ है। हाल के वर्षों में निचले भाग को सड़क मिला दिया गया है। गोपी नामक झरने से उद्यानों को जलार्पूिर्त होती है। इस उद्यान के आसपास कई शाही भवन थे।

केन्द्रीय नहर जो कि ऊँचे टॉप से आरम्भ होकर नीचे तक बहती हुई जाती है, 13 फुट चौड़ी है तथा 7.9 इंच गहरी है। ऊपर से बहकर आता हुआ जल निचले हिस्से तक पहुंचता है। इस बीच वह सभी सीढ़ीनुमा खण्डों को सींचता हुआ चलता है। जल के एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी तक बहाव के लिए पत्थर के ढलवां फर्श बनाए गए हैं। सभी सीढ़ियों पर जलकुण्ड बनाकर उनमें फव्वारे लगाए गए हैं तथा नहरों की क्रॉसिंग के पास बैठने के लिए बैंचें रखी स्थापित की गई हैं।

तख्ते ताऊस

शाहजहाँ का तख्ते ताऊस अर्थात् मयूर सिंहासन अपने समय की अद्भुत रचना है। यह सिंहासन सात वर्षों में लगभग चार करोड़ रुपयों से बना था। यह सिंहासन मयूरों के ऊपर खड़़ा था और रत्नों से जगमगाता रहता था। शाहजहाँ की इस अमूल्य कृति को नादिरशाह फारस उठा ले गया।

दलबादल

शाहजहाँ के दलबादल नामक शिविर से भी उसकी शान का पता लगता है। उसे खड़ा करने में कई हजार आदमी और हाथियों की आवश्यकता पड़ती थी और लगभग दो महिने का समय लगता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ताजमहल – मुगलकाल का सर्वश्रेष्ठ भवन

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आगरा का ताजमहल, शाहजहाँ द्वारा बनवाई गई सर्वाधिक शानदार इमारत है। यह शाहजहाँ की प्रिय बेगम अर्जुमंद बानो का मकबरा है जो अपनी 14वीं संतान को जन्म देते समय मृत्यु को प्राप्त हो गई थी। शाहजहाँ ने अर्जुमंद बानो को ‘मुमताज महल’ की उपाधि दी थी जिसका अर्थ होता है- ‘महल का सबसे सुंदर आभूषण।’

उन्नीस वर्ष की आयु में मुमताज का विवाह शाहजहाँ से हुआ था। इस विवाह के बाद वह उन्नीस साल और जीवित रही तथा इस अवधि में उसने चौदह बार गर्भ धारण किया। 17 जून 1631 को बुरहानपुर में शाहजहाँ की चौदहवीं संतान गौहरा बेगम को जन्म देते समय मुमताज महल की मृत्यु हो गई। शाहजहाँ ने गौहरा बेगम को अपने लिए अभिशप्त माना तथा उसका मुँह तक देखने से मना कर दिया।

शाहजहाँ ने मुमताज का शव बुरहानपुर के जैनाबाद बाग में दफ़्न करवाया। उसके शव को सुरक्षित रखने के लिए मिस्र देश में ममी बनाने की तीन प्रसिद्ध विधियों में से एक विधि का सहारा लिया गया ताकि शव में से कभी बदबू नहीं आ सके तथा उसका शव कयामत तक सुरक्षित रह सके।

मुमताज के शोक में डूबा हुआ शाहजहाँ, लगभग एक साल तक बुरहानपुर में ही रहा तथा इस दौरान वह अपने डेरे से एक बार भी बाहर नहीं निकला। ई.1631 में शाहजहाँ ने मुमताज महल की कब्र के लिए आगरा में एक मकबरा बनवाना आरम्भ किया जिसे उसने ताजमहल नाम दिया।

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जब ताजमहल परिसर की चाहर-दीवारियां बन गईं तब दिसम्बर 1631 में मुमताज के शव को बुरहानपुर की कब्र से बाहर निकाला गया। इस शव को पूरे लाव-लश्कर के साथ शानदार शाही जुलूस के रूप में बुरहानपुर से आगरा तक लाया गया। 12 जनवरी 1632 को मुमताज का शव निर्माणाधीन ताजमहल के परिसर में दफना दिया गया। जब 8 साल बाद ई.1640 में ताजमहल बनकर पूरा हो गया, तब मुमताज महल के शव को एक बार फिर कब्र से बाहर निकाला गया तथा इस बार उसे ताजमहल के एक तहखाने में दफनाया गया। ताजमहल के ऊपर की मंजिल में मुमताज महल की नकली कब्र बनाई गई ताकि यदि दुश्मन कभी ताजमहल को नष्ट करें तो मुमताज महल, अपने तहखाने और अपने ताबूत में सुरक्षित रहकर आराम से कयामत के दिन का इंतजार कर सके। शाहजहाँ की मृत्यु के बाद उसका शव भी इसी मकबरे में दफनाया गया। कहते हैं कि इस भवन के निर्माण में बहुत बड़ी मात्रा में महंगे रत्न लगाए गए जिनसे मुगल सल्तनत का कोष रीत गया। इस मकबरे को मुगल स्थापत्य का अंतिम पड़ाव माना जा सकता है। यह श्वेत संगमरमर से निर्मित सुंदर भवन है जिसकी गणना विश्व के सुंदरतम भवनों में होती है। 

चाहरदीवारी

सम्पूर्ण ताजमहल तीन ओर से एक चारदीवारी से घिरा हुआ है जो लाल बलुआ पत्थर से बनी है। नदी की ओर वाली भुजा पर कोई दीवार नहीं है। इन दीवारों के भीतर, बागों से लगे हुए, स्तंभ सहित तोरण वाले गलियारे हैं। यह हिंदू मन्दिरों की शैली है। दीवार में बीच-बीच में गुम्बद वाली गुमटियाँ भी हैं। परिसर के चारों कोनों पर चार चौड़े-चौड़े मेहराबदार मण्डप हैं। चाहरदीवारी के भीतर एक वर्गाकार बाग है जिसके उत्तरी सिरे पर ऊँची कुर्सी पर सफेद संगमरमरी मकबरा स्थित है जिसे ताजमहल कहते हैं।

ताज महल का मुख्य दरवाजा

तीन ओर की चाहर-दीवारी में से एक दीवार में मुख्य दरवाज़ा बना हुआ है जिसका निर्माण भव्य स्मारक की तरह किया गया है। यह संगमरमर एवं लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। इसका मेहराब ताजमहल के मेहराब की नकल है। इसके पिश्ताक एवं मेहराबों पर सुलेखन से अलंकरण किया गया है। इसमें ‘बास रिलीफ’ एवं पैट्रा ड्यूरा पच्चीकारी से पुष्प आदि आकृतियां बनाई गई हैं। मेहराबी छत एवं दीवारों पर यहाँ की अन्य इमारतों के समान ज्यामितीय अंकन किए गए हैं।

ईवान

मकबरे के मुख्य भवन के बाहर संगममर से निर्मित एक भव्य ‘ईवान’ अर्थात् ‘विशाल मेहराब रूपी द्वार’ है।

गुम्बद

मुख्य मकबरे के भवन के ऊपरी भाग में एक प्याजनुमा दोहरा गुम्बद (बल्बस डबल डोम) बना हुआ है। यह उच्च कोटि के सफेद संगमरमर से बना हुआ है और इस इमारत का सर्वाधिक शानदार भाग है। इसकी ऊँचाई लगभग इमारत के आधार के बराबर अर्थात् 35 मीटर है और यह एक 7 मीटर ऊँचे बेलनाकार आधार पर स्थित है।

शिखर

गुम्बद का शिखर एक उलटे रखे हुए कमल से अलंकृत है। यह गुम्बद के किनारों को शिखर पर जोड़ता है।

शिखर कलश

मुख्य गुम्बद के शिखर पर एक कलश रखा हुआ है। यह शिखर-कलश सत्रहवीं एवं अठराहवीं सदी तक सोने का बना हुआ था। उन्नीसवीं सदी में स्वर्णकलश के स्थान पर कांसे का कलश रख दिया गया। यह शिखर-कलश हिन्दू वास्तुकला का अंग है तथा हिन्दू मन्दिरों के शिखरों पर अनिवार्यतः पाया जाता है। इस कलश पर द्वितीया का चंद्रमा बना हुआ है, जिसकी नोक स्वर्ग की ओर संकेत करती है। अपने नियोजन के कारण चन्द्रमा एवं कलश की नोक मिलकर एक त्रिशूल का आकार बनाते हैं जो कि भगवान शिव का प्रतीक है।

छतरियां

गुम्बद के चारों ओर लगी चार छोटी गुम्बदाकार छतरियों से गुम्बद को और भव्यता प्राप्त होती है। छतरियों के गुम्बद, मुख्य गुम्बद के आकार की प्रतिलिपियाँ ही हैं, केवल आकार का अंतर है। इनके स्तम्भाकार आधार, छत पर आंतरिक प्रकाश की व्यवस्था हेतु खुले हैं। संगमरमर के ऊँचे सुसज्जित गुलदस्ते, गुम्बद की ऊँचाई को और अधिक बल देते हैं।

मीनारें

मकबरे के चारों ओर चार मीनारें मूल आधार चौकी के चारों कोनों में, इमारत के दृश्य को एक चौखटे में बांधती हुई प्रतीत होती हैं। ये मीनारें 40-40 मीटर ऊँची हैं तथा बनावट में तिमंजिली हैं। मीनारों के कारण मकबरे का वास्तु-कलात्मक प्रभाव चारों ओर विस्तारित हो गया है। इन मीनारों को देखकर भ्रम होता है कि ये मस्जिद में अजान देने के लिए बनाई गई हैं। प्रत्येक मीनार दो-दो छज्जों द्वारा तीन समान भागों में बंटी है। मीनार के ऊपर अंतिम छज्जा है, जिस पर मुख्य इमारत के समान ही छतरी बनी हैं। इन पर वही कमलाकार आकृति एवं किरीट-कलश भी हैं। चारों मीनारें बाहर की ओर हलकी सी झुकी हुई हैं ताकि यदि कभी ये गिरें तो बाहर की ओर गिरें एवं मुख्य इमारत को कोई क्षति न पहुँचे।

मेहराब

ताजमहल की मेहराबों की बनावट में, पूर्ववर्ती भवनों की तुलना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। ताजमहल की लगभग समस्त मेहराबें पत्तियोंदार या नोंकदार हैं।

मुख्य कक्ष

मकबरे का मूल-आधार एक विशाल बहु-कक्षीय संरचना है। इसका मुख्य-कक्ष अष्टकोणीय एवं घनाकार बना हुआ है जिसकी प्रत्येक भुजा 55 मीटर है। यह रचना इमारत के प्रत्येक ओर पूर्णतः सममितीय है, जो कि इस इमारत को अष्टकोणीय बनाती है परन्तु कोने की चारों भुजाएं शेष चार भुजाओं से काफी छोटी होने के कारण, इसे वर्गाकार रचना कहना ही उचित होगा।

इस कक्ष के प्रत्येक फलक में एक प्रवेश-द्वार है। इनमें से केवल दक्षिण बाग की ओर का प्रवेशद्वार ही प्रयोग होता है। आंतरिक दीवारें लगभग 25 मीटर ऊँची हैं एवं एक आभासी आंतरिक गुम्बद से ढंकी हैं जिस पर सूर्य का चिह्न अंकित है। इस कक्ष में कुल आठ पिश्ताक बने हैं। बाहरी ओर प्रत्येक निचले पिश्ताक पर एक दूसरा पिश्ताक लगभग दीवार के मध्य तक जाता है।

मुख्य कक्ष के छज्जे एवं खिड़कियां

चार केन्द्रीय ऊपरी मेहराब छज्जा बनाते हैं एवं हरेक छज्जे की बाहरी खिड़की एक संगमरमर की जाली से ढंकी है। छज्जों की खिड़कियों के अलावा, छत पर बनीं छतरियों से ढंके खुले छिद्रों से भी प्रकाश आता है।

मुख्य कक्ष की सजावट

मुख्य कक्ष को बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों की ‘लैपिडरी-आर्ट’ से सजाया गया है। साथ ही कक्ष की प्रत्येक दीवार ‘डैडो बास रिलीफ’ एवं ‘कैलिग्राफी’ से भी अलंकृत की गई है जो कि इमारत के बाहरी नमूनों को बारीकी से दिखाती है। आठ संगमरमर के फलकों से बनी जालियों का अष्टकोण, कब्रों को घेरे हुए है।

हरेक फलक की जाली पच्चीकारी के महीन कार्य से गठित है। शेष सतह पर बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों की अति महीन जड़ाऊ पच्चीकारी की गई है, जो कि पुष्प, लता एवं फलों से सज्जित है। जैसे ही सतह का क्षेत्रफल बदलता है, बडे़ पिश्ताक का क्षेत्र छोटे से अधिक होता है और उसका अलंकरण भी इसी अनुपात में बदलता है। अलंकरण घटक रोगन या गचकारी से अथवा नक्काशी एवं रत्न जड़ कर निर्मित हैं।

मेहराब के दोनों ओर के स्पैन्ड्रल में अमूर्त प्रारूप प्रयुक्त किए गए हैं, विशेषकर आधार, मीनारें, द्वार, मस्जिद, और मकबरे की सतह पर। बलुआ-पत्थर की इमारत के गुम्बदों एवं तहखानों में पत्थर की नक्काशी से, विस्तृत ज्यामितीय नमूने बनाकर अमूर्त प्रारूप उकेरे गए हैं।

यहाँ ‘हैरिंगबोन’ शैली में पत्थर जड़ कर संयुक्त हुए घटकों के बीच का स्थान भरा गया है। लाल बलुआ-पत्थर इमारत में श्वेत, एवं श्वेत संगमरमर में काले या गहरे, जडा़ऊ कार्य किए हुए हैं। संगमरमर इमारत के गारे-चूने से बने भागों को रंगीन या गहरा रंग किया गया है।

इनकी डिजाइनों में अत्यधिक जटिल ज्यामितीय प्रतिरूप बनाए गए हैं। फर्श एवं गलियारे में विरोधी रंग की टाइलों या गुटकों को ‘टैसेलेशन’ नमूने में प्रयोग किया गया है। मकबरे की निचली दीवारों पर पादप रूपांकन मिलते हैं। ये श्वेत संगमरमर के नमूने हैं जिनमें सजीव ‘बास रिलीफ’ शैली में पुष्पों एवं बेल-बूटों का सजीव अलंकरण किया गया है।

संगमरमर को खूब चिकना करके और चमकाकर महीनतम ब्यौरे को भी निखारा गया है। ‘डैडो’ साँचे एवं मेहराबों के ‘स्पैन्ड्रल’ पर भी पीट्रा ड्यूरा के उच्चस्तरीय रूपांकन हैं। इन्हें ज्यामितीय बेलों, पुष्पों एवं फलों से सुसज्जित किया गया है। इनमें पीले एवं काले संगमरमर, जैस्पर तथा हरे पत्थर जडे़ गए हैं जिन्हें दीवार की सतह से मिलाने के लिए घिसाई की गई है।

ताजमहल की अत्यन्त सुन्दर खुदाई और जड़ाई भारतीय शिल्पकारों की स्थापत्य दक्षता का प्रमाण है। इस काल में पत्थर के शिल्पकार के छैनी-हथौड़े का स्थान, संगमरमर में पैट्रा ड्यूरा करने वाले कारीगरों एवं संगमरमर पर पॉलिश’ करने वाल कारीगरों के बारीक औजारों ने ले लिया था।

शाहजहाँ एवं मुमताज की कब्रें

मुख्य भवन में शाहजहाँ एवं मुमताज महल की नकली कब्रें स्थित हैं जो धरती से 22 फुट ऊँचाई पर बनाई गई हैं। बादशाह एवं बेगम की असली कब्रें इस कक्ष के ठीक नीचे बनी हुई हैं तथा वे पर्यटकों को दिखाई नहीं जातीं। शाहजहाँ एवं मुमताज महल की असली कब्रें तुलनात्मक रूप से साधारण हैं। इनके मुख मक्का की ओर हैं।

मुमताज महल की कब्र आंतरिक कक्ष के मध्य में स्थित है, जिसका आयताकार संगमरमर आधार 1.5 मीटर चैड़ा एवं 2.5 मीटर लम्बा है। आधार एवं ऊपर का शृंगारदान रूप, दोनों ही बहुमूल्य पत्थरों एवं रत्नों से जड़े हैं। इस पर मुमताज की प्रशंसा में सुलेख लिखा गया है। इसके ढक्कन पर एक उठा हुआ आयताकार लोज़ैन्ज है, जो कि एक लेखन पट्ट का आभास देता है।

शाहजहाँ की कब्र मुमताज की कब्र के दक्षिण ओर है। यह पूरे क्षेत्र में, एकमात्र दृश्य असम्मितीय घटक है। यह असम्मिती शायद इसलिये है, कि शाहजहाँ की कब्र यहाँ बननी निर्धारित नहीं थी। यह मकबरा केवल मुमताज के लिये बना था। यह कब्र मुमताज की कब्र से बड़ी है, परंतु वही घटक एक वृहत्तर आधार दर्शाती है, जिस पर बना कुछ बड़ा शृंगारदान, लैपिडरी एवं सुलेखन से सुसज्जित है।

ताजमहल में सुलेखन (कैलिग्राफी)

ताजमहल की दीवारों पर किए गए अलंकरण में सुलेखन, निराकार आकृतियां, ज्यामितीय आकृतियां तथा पादप रूपांकन प्रयुक्त किए गए हैं। ताजमहल में किया गया सुलेखन फ्लोरिड थुलुठ लिपि का है। ये सुलेख फारसी लिपिक अमानत खाँ द्वारा लिखे गए हैं। सुलेखन के लिए जैस्पर को श्वेत संगमरमर के फलकों में जड़ा गया है।

संगमरमर के सेनोटैफ पर किया गया कार्य अत्यंत नाजु़क, कोमल एवं महीन है। ऊँचाई का ध्यान रखा गया है। ऊँचे फलकों पर उसी अनुपात में बडा़ लेखन किया गया है ताकि नीचे से पढ़ने पर टेढा़पन ना प्रतीत हो। पूरे क्षेत्र में कु़रान की आयतें लिखी गई हैं। इन आयतों का चुनाव अमानत खाँ ने किया था।

ताजमहल के प्रवेश द्वार पर यह सुलेख अंकित किया गया है- ‘हे आत्मा! तू ईश्वर के पास विश्राम कर। ईश्वर के पास शांति के साथ रह तथा उसकी परम शांति तुझ पर बरसे।’

तहखाने में बनी मुमताज महल की असली कब्र पर अल्लाह के निन्यानवे नाम खुदे हैं जिनमें से कुछ हैं- ‘ओ नीतिवान, ओ भव्य, ओ राजसी, ओ अनुपम, ओ अपूर्व, ओ अनन्त, ओ तेजस्वी… आदि।’ शाहजहाँ की कब्र पर खुदा है- ‘उसने हिजरी के 1076 साल में रज्जब के महीने की छब्बीसवीं तिथि को इस संसार से नित्यता के प्रांगण की यात्रा की।’

लाल बलुआ पत्थर की मस्जिद

ताजमहल भवन के दोनों ओर लाल बलुआ पत्थर की दो इमारतें बनी हुई हैं। ये इमारतें मुख्य मकबरे की ओर मुंह किए हुए हैं। सफेद संगमरमर के मकबरे के विपरीत प्रभाव को दर्शाने के लिए इन इमारतों में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया है। इनकी पीठ क्रमशः पूर्वी एवं पश्चिमी दीवारों से जुड़ी हुई हैं एवं दोनों इमातरें एक दूसरे की प्रतिबिम्ब जान पड़ती हैं।

पश्चिमी इमारत एक मस्जिद है एवं पूर्वी इमारत को ‘जवाब’ कहते हैं जिसका प्राथमिक उद्देश्य सम्पूर्ण दृश्य में वास्तु-संतुलन स्थापित करना है। यह आगन्तुक कक्ष की तरह प्रयुक्त होती थी। मस्जिद में एक मेहराब कम है तथा उसमें मक्का की ओर आला बना है। ‘जवाब’ के फर्श में ज्यामितीय नमूने बने हैं जबकि ‘मस्जिद’ के फर्श में नमाज़ पढ़ने हेतु 569 बिछौनों (जा-नमाज़) के काले संगमरमर के प्रतिरूप बने हैं। मस्जिद का मूल रूप दिल्ली की जामा मस्जिद के समान है। एक बड़े दालान या कक्ष पर तीन गुम्बद बने हैं।

चारबाग

ताजमहल के चारों ओर 300 वर्ग मीटर का चारबाग बना हुआ है। इस बाग में ऊँचा उठा हुआ पथ है जो इस चार बाग को 16 निम्न स्तर पर बनी क्यारियों में बांटता है। बाग के मध्य में एक उच्चतल पर बने तालाब में ताजमहल का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। यह मकबरे एवं मुख्य द्वार के बीच में बना हुआ है। बाग में वृक्षों की कतारें लगी हुई हैं एवं मुख्य द्वार से लेकर मकबरे तक फव्वारे लगाए गए हैं। इस उच्च तल के तालाब को ‘अल हौद अल कवथार’ कहते हैं, जो कि मुहम्मद द्वारा प्रत्याशित अपारता के तालाब को दर्शाता है।

चारबाग के बगीचे फारसी बागों से प्रेरित हैं। यह जन्नत की चार नदियों एवं पैराडाइज़ या फिरदौस के बागों की ओर संकेत करते हैं। यह शब्द फारसी शब्द पारिदाइजा़ से बना शब्द है, जिसका अर्थ है- ‘दीवारों से रक्षित बाग’। फारसी रहस्यवाद में मुगल कालीन इस्लामी पाठ्य में फिरदौस को एक आदर्श बाग बताया गया है। इसमें कि एक केन्द्रीय पर्वत या स्रोत या फव्वारे से चार नदियाँ चारों दिशाओं, उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम की ओर बहतीं हैं, जो बाग को चार भागों में बांटतीं हैं।

चारबाग शैली के मुगल उद्यानों के केन्द्र में मुख्य भवन स्थित होता है किंतु ताजमहल इस उद्यान के अंत में स्थित है।यमुना नदी के दूसरी ओर स्थित माहताब बाग या चांदनी बाग की खोज से, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यह निष्कर्ष निकाला है, कि यमुना नदी भी इस बाग के प्रारूप का हिस्सा थी और उसे भी स्वर्ग की नदियों में से एक गिना जाना चाहिए था।

बाग के प्रारूप एवं उसके वास्तु-लक्षण जैसे कि फव्वारे, ईंटें, संगमरमर के पैदल पथ एवं काश्मीर के शालीमार बाग की तरह बनी ज्यामितीय ईंट-जड़ित क्यारियों से अनुमान होता है कि शालीमार बाग तथा ताजमहल के बाग का वास्तुकार संभवतः एक ही था अर्थात् अली मर्दान ने इन दोनों बागों की योजना बनाई थी।

बाग के आरम्भिक विवरणों में इसके पेड़-पौधों में, गुलाब, कुमुद या नरगिस एवं फलों-वृक्षों की अधिकता का उल्लेख है। ई.1908 में लॉर्ड कर्जन ने चारबाग को इंगलैण्ड की गार्डन शैली में ढाल दिया। वर्तमान में इस बाग का ईसाई स्वरूप दिखाई देता है तथापि मूल स्वरूप वही होने से यह आज भी चारबाग की तरह दिखाई देता है।

शाहजहाँ की अन्य बेगमों के मकबरे

ताजमहल की चाहरदीवारी के बाहर शाहजहाँ की अन्य बेगमों के मकबरे स्थित हैं। इनमें एक बडा़ मकबरा मुमताज महल की प्रिय दासी का भी है। इन मकबरों की अधिकतर इमारतें लाल बलुआ पत्थर से निर्मित हैं एवं उस काल के छोटे मकबरों की स्थापत्य कला को दर्शातीं हैं।

ताजमहल के वास्तविक शिल्पी

ताजमहल के शिल्पियों के सम्बन्ध में भारत में एक किंवदंती प्रचलित है कि शाहजहाँ ने ताजमहल बनाने वालों के हाथ कटवा दिए थे ताकि वे फिर कभी एसी सुंदर इमारत का निर्माण नहीं कर सकें। यह किंवदंती असत्य जान पड़ती है क्योंकि ताजमहल मूलतः मुस्लिम इमारत नहीं होकर हिन्दू भवन है जिसे शाहजहाँ ने आम्बेर के कच्छवाहा राजाओं से प्राप्त किया था। शाहजहाँ के काल में तो इसका केवल बाह्य अलंकरण किया गया है और उसके चारों ओर मीनारें, गुम्बद, ईवान एवं पिश्ताक आदि बनाकर इसे मुगलिया रूप दिया गया है।

भारत एवं पाकिस्तान में मुगलकालीन बहुत सी इमारतों में ताजमहल की झलक दिखाई देती है जिनसे ऐसा लगता है कि मुगल शिल्पकारों ने ताजहल का अनुकरण करने का भरपूर प्रयास किया किंतु वे ऐसी कृति नहीं बना पाए। अतः कहा जा सकता है कि ताजमहल के मूल निर्माता मुगल कालीन नहीं थे, वे मुगलों के पूर्ववर्ती थे। इस सम्बन्ध में संक्षिप्त चर्चा हम अगले अध्याय में करेंगे।

बैंगलोर के सैयद महमूद के पास उपलब्ध ग्रंथ दीवान-ए महन्दीस से पता चलता है कि ताजमहल का वास्तुकार उस्ताद अहदम लाहौरी था जिसे शाहजहाँ ने नादिर-उल-अस्र की उपाधि दी थी। ताजमहल का प्रधान मिस्त्री फारस का उस्ताद ईसा एफेंदी था। मोहम्मद हनीफ, अमनत खाँ, शीराजी, मोहम्मद शरीफ, मोहनलाल तथा मोहम्मद काजिम आदि शिल्पकारों ने भी इसके निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दीवान-ए महन्दीस का लेखक लुत्फुल्ला महन्दीस शाहजहाँ का समकालीन लेखक था। 

फादर मानरिक ने लिखा है- ‘इस मकबरे की योजना गेरोनिमो वेरेनियो नामक वेनीशियन वास्तुकार ने बनाई थी।’ स्मिथ ने भी इस मत का समर्थन किया है और इसे पूरी तरह से यूरोपीय कृति बताया है।

सर जॉन मार्शल, हेवेल और पर्सी ब्राउन इस मत को नहीं मानते। पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘यह मुगल-भवन-कला का विकसित रूप है जो परम्परा के अनुसार है तथा बाह्य प्रभावों से पूर्णरूपेण मुक्त है।’

पर्सी ब्राउन के अनुसार इसका निर्माण तो प्रायः मुसलमान कलाकारों द्वारा हुआ था परन्तु इसकी चित्रकारी हिन्दू कलाकारों द्वारा हुई थी। पच्चीकारी का कठिन काम कन्नौज के हिन्दू कलाकारों को सौंपा गया था। अनेक विद्वानों के अनुसार ताजमहल का मुख्य शिल्पकार एक तुर्क या ईरानी उस्ताद ईशा था जिसे बड़ी संख्या में हिन्दू कारीगरों का सहयोग प्राप्त था। ताजमहल की सजावट की प्रेरणा एतमादुद्दौला के मकबरे से ली गई प्रतीत होती है।

ताजमहल के निर्माण का विवरण बताने वाली एक पाण्डुलिपि के अनुसार, शाहजहाँ ने इसके निर्माण से संबंधित सलाह लेने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति नियुक्त की थी। बहुत से वास्तुकारों ने इसके भावी नमूने कागज पर उत्कीर्ण कर बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किए। इस मकबरे के सम्बन्ध में शाहजहाँ की भी कुछ मौलिक कल्पनाएं थीं। अतः उसने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए और इन तमाम सुझावों के आधार पर लकड़ी के कई नमूने तैयार किए गए तथा उनमें से एक नमूना स्वीकार किया गया। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इसका डिजाइन कई वास्तुविदों ने मिलकर तैयार किया था।

मुगल स्थापत्य की सर्वश्रेष्ठ इमारत

आगरा का ताजमहल न केवल शाजहाँ काल की इमारतों में ही सर्वश्रेष्ठ है अपितु मुगल स्थापत्य कला का भी सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। इसे विश्व के सात आश्चर्यों में भी गिना जाता है। ताजमहल की प्रशंसा करते हुए एल्फिन्स्टन ने लिखा है- ‘सामग्री की सम्पन्नता, चित्र के वैचि×य तथा प्रभाव में इसकी समता करने वाला यूरोप अथवा एशिया में दूसरा मकबरा नहीं है।’

प्रसिद्ध इतिहासकार हेवेल ने लिखा है- ‘यह भारतीय स्त्री जाति का देवतुल्य स्मारक है। सुन्दर बाग और अनेक फव्वारों के मध्य स्थित ताजमहल एक काव्यमय रोमाण्टिक सौन्दर्य का सृजन करता है। वस्तुतः ताजमहल दाम्पत्य प्रेम का प्रतीक और कला-पे्रमियों का मक्का बन गया है।’

  डॉ. बनारसी ने लिखा है- ‘चाहे ऐतिहासिक साहित्य का पूर्ण पु´ज नष्ट हो जाये और केवल यह भवन ही शाहजहाँ के शासनकाल की कहानी कहने को बाकी रह जाये तो इसमें संदेह नहीं, तब भी शाहजहाँ का शासनकाल सबसे अधिक शानदार कहा जायेगा।’

निर्माण के बाद ताजमहल का इतिहास

ई.1857 की सैनिक क्रांति के दौरान, ताजमहल को अंग्रेजों ने लूट लिया। उन्होंने इमारत के भीतर लगे बहुमूल्य पत्थर एवं रत्न तथा लैपिज़ लजू़ली को खोद कर निकाल लिया। इससे ताजमहल बहुत खराब स्थिति में पहुंच गया। 19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश वॉयसरॉय लॉर्ड कर्ज़न ने एक वृहत प्रत्यावर्तन परियोजना आरंभ की जिसके अंतर्गत ताजमहल का जीर्णोद्धार किया गया और इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया।

यह परियोजना ई.1908 में पूरी हुई। लॉर्ड कर्जन ने मकबरे के मुख्य आंतरिक कक्ष में एक बड़ा दीपक स्थापित करवाया जो काहिरा में स्थित एक मस्जिद जैसा है। इसी समय यहाँ के बागों को ब्रिटिश शैली में बदला गया। आज वे बाग उसी स्थिति में हैं।

ताजमहल पर सुरक्षा कवच

ई.1942 में सरकार ने मकबरे पर एक मचान सहित पैड बनाकर बल्लियों का सुरक्षा कवच तैयार कराया ताकि इसे जर्मन एवं जापानी हवाई हमलों से बचाया जा सके। ई.1965 एवं 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के समय भी ताजमहल के ऊपर सुरक्षा-कवच बनाया गया।

ताजमहल की प्रतिकृतियाँ

भारत के बहुत से भवनों में ताजमहल की झलक दिखाई देती है। इनमें दिल्ली स्थित हुमायूँ का मकबरा तथा औरंगाबाद स्थित बीबी का मकबरा प्रमुख हैं। चीन के शेनज़ेन शहर के पश्चिमी भाग में स्थित विंडो ऑफ द वल्र्ड थीम पार्क में ताजमहल की प्रतिकृति बनी हुई है।

ताजमहल से प्रेरित होकर बनी विश्व की अन्य इमारतों में अटलांटिक सिटी, न्यू जर्सी स्थित ट्रम्प ताजमहल और मिल्वाउकी, विस्कज़िन स्थित ट्रिपोली श्राइन टेम्पल शामिल हैं। बांग्लादेश में भी ताजमहल की अनुकृति बनाने का प्रयास किया गया। ब्रिटिश काल में अंग्रेज़ों ने अपनी तत्कालीन राजधानी कलकत्ता में इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया के सम्मान में विक्टोरिया मेमोरियल स्मारक बनवाया जो ताजमहल से काफ़ी हद तक प्रेरित है यह किन्तु ‘गोथिक’ स्थापत्यकला में ढाला गया है।

विश्व धरोहर

ई.1983 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूचि में सम्मिलित किया गया।

मेहताब बाग

आगरा स्थित मेहताब बाग, ताजमहल की सीध में, यमुना के दूसरे किनारे पर स्थित है। मेहताब बाग फूलों और अलग-अलग प्रकार के पेड़-पौधों से सम्पन्न है। यह 980 फुट गुणा 980 फुट क्षेत्र का वर्गाकार उद्यान है। इस बाग की खुदाई में एक अष्टकोणीय विशाल जलाशय प्राप्त हुआ है जिस पर कई फव्वारे लगे हुए थे। यह भी चारबाग शैली का उद्यान था जिसमें केन्द्रीय जलापूर्ति तंत्र से बाग की चार दिशाओं में चार नहरों द्वारा जल ले जाया जाता था जो कि कुरान में वर्णित जन्नत में बहने वाली चार नदियों की प्रतीक हैं।

यहाँ एक और ताजमहल बनाने की योजना थी जिसमें शाहजहाँ की कब्र लगनी थी किंतु औरंगज़ेब के विद्रोह के कारण वह योजना पूरी नहीं हो सकी। इस परिसर की खुदाई में बड़ी संख्या में अलंकृत पत्थर मिले हैं जो किसी भवन के कंगूरों की तरह दिखाई देते हैं। ये कंगूरे सफेद संगमरमर से निर्मित हैं।

इसी प्रकार परिसर से बड़ी मात्रा में सफेद संगमरमर पत्थर के ब्लाॅक मिले हैं। इस सामग्री से यह अनुमान होता है कि इस नए मकबरे के लिए सामग्री जुटाई जानी आरम्भ हो गई थी किंतु इससे पहले कि यह योजना आगे बढ़ पाती, औरंगजेब ने शाहजहाँ को बंदी बना लिया और यह योजना अधूरी रह गई।

संगमरमर के ये पत्थर कई सौ साल तक मिट्टी में पड़े रहने के कारण काले पड़ गए हैं जिससे यह किंवदंती चल पड़ी कि शाहजहाँ इस स्थान पर काला ताजमहल बनाना चाहता था। वास्तव में इसे भी सफेद इमारत ही होना था।

तेजोमय महालय था ताजमहल

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तेजोमय महालय था ताजमहल

प्रसिद्ध इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपने शोध पत्रों के माध्यम से ताजमहल को हिंदू संरचना सिद्ध किया था। उनके अनुसार ताजमहल मकबरा नहीं अपितु तेजोमय महालय नामक हिंदू महल था।

शाहजहाँनामा में ताजमहल के लिए लिखा है कि यह मंदिर भवन नगर के दक्षिण में भव्य एवं सुंदर हरित उद्यान से घिरा हुआ है। इसका केन्द्रीय भवन जो राजा मानसिंह के महल के नाम से विख्यात था, अब राजा मानसिंह के पौत्र जयसिंह के अधिकार में था। इसे बेगम को दफनाने के लिए चुना गया जो स्वर्ग जा चुकी थी। इस विवरण से स्पष्ट है कि शाहजहाँ के जन्म से भी बहुत पहले ताजमहल का मूल भवन हिन्दू राजभवन के रूप में अस्तित्व में था। इसी महल का प्राचीन नाम तेजोमय महालय था।

यद्यपि राजा जयसिंह उसे अपने पूर्वजों का उत्तराधिकार और संपदा के रूप में मूल्यवान समझता था, तो भी वह बादशाह शाहजहाँ के लिए निःशुल्क देने के लिए तत्पर था। उस भव्य प्रासाद (भव्य प्रासाद कहने का अभिप्राय है कि जब शाहजहाँ ने इसे लिया तो वह खाली भूमि नही थी अपितु वहाँ एक भव्य प्रासाद बना हुआ था जिसे आलीशां मंजिल कहा गया।) के बदले में जयसिंह को एक साधारण टुकड़ा दिया गया।

 राजधानी के अधिकारियों के द्वारा शाही फरमान के अनुसार- ‘गगनचुम्बी गुम्बद के नीचे उस पुण्यात्मा रानी का शरीर संसार की आंखों से ओझल हो गया और यह ‘इमारते-आलीशां’ अपनी बनावट में इतना ऊंचा है।’

महाराष्ट्रीय ज्ञानकोष के अनुसार-‘आगरा के दक्षिण में राजा जयसिंह की कुछ भू संपत्ति थी। बादशाह ने इसे उससे खरीदा।’

गुलाबराव जगदीश ने 27 मई 1973 के मराठी दैनिक ‘लोकसत्ता’ (मुंबई) में छपे एक लेख में बताया है कि ताजमहल का निर्माण केवल एक हिन्दू ही कर सकता है। वह कहते हैं कि ई.1939 में ब्रिटिश इंजीनियरों ने ताजमहल में एक दरार देखी जिसे भरने का भरसक प्रयास किया गया परंतु वह भरी नही जा सकी। समय के साथ वह दरार और चैड़ी हो गई। इसे भरने के लिए इंजीनियरों की एक समिति बनायी गयी, परंतु सफल नही सकी।

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तब पूरनचंद नामक एक देहाती, उन इंजीनियरों के पास आया और बोला कि वह इस दरार को भर सकता है। ब्रिटिश इंजीनियर ने उसे इस दरार को भरने की अनुमति दे दी। उस देहाती भारतीय ने एक विशेष प्रकार का गारा-चूना बनाया और उस दरार में भर दिया। दरार सफलतापूर्वक भर गई। ई.1942 में डा. भीमराव अंबेडकर के प्रयासों से लार्ड लिनलिथगो ने पूरनचंद को ‘राय साहब’ की उपाधि से सम्मानित किया था। इस घटना का अर्थ है कि आजादी मिलने के समय तक भी ताजमहल जैसे भवन की चिनाई की तकनीक जानने वाले हिन्दू कारीगर जीवित थे। शाहजहाँ के प्रपितामह बाबर के समय में भी तेजोमहालय मंदिर मौजूद था। बाबर मुमताज बेगम की मृत्यु से लगभग 104 वर्ष पूर्व भारत आया था। टैवर्नियर नामक विदेशी यात्री का साक्ष्य भी यही तथ्य प्रकट करता है कि मुमताज को दफनाने के लिए एक भव्य प्रासाद अधिग्रहीत किया गया था और वह भव्य प्रासाद मुमताज को दफनाने से पूर्व भी विश्व भर के पर्यटकों को आकर्षित करता था। ‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका’ के अनुसार ताजमहल भवन समूह में अतिथि कक्ष, आरक्षी निवास और अश्वशाला थे। ये निर्माण किसी प्रासाद का हिस्सा ही हो सकते हैं। किसी कब्र से इनका क्या संबंध हो सकता है?

‘शाहजहाँ नामा’ के लेखक मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि अर्जुमन्द बानो बेगम उर्फ मुमताज को राजा मानसिंह के प्रासाद में दफन किया गया था। मियां नुराल हसन सिद्दीकी की पुस्तक ‘दि सिटी ऑफ ताज’ में भी इसी मत की पुष्टि की गयी है।

लखनऊ के संग्रहालय के ‘बटेश्वर शिलालेख’ में स्पष्ट उल्लेख है कि ताजमहल ई.1155 में निर्मित शिव मंदिर है। इस शिलालेख में कहा गया है-

प्रासादो वैष्णवस्तेन निर्मितोअन्तर्वहन्हरिः।

मूघ्र्नि स्पृशति यो नित्यं पदमस्मैव मध्यमं।। 25।।

अकार यच्च स्फटिकावदातमसाविदं मंदिरमिन्दुमौलेः।

न जातु यस्मिन्निवसन्सदेवः कैलाशवासाय चकार चेतः ।। 26 ।।

पक्ष त्र्यक्ष मुखादित्य संख्ये विक्रम वत्सरे।

आश्विन शुक्ल पंचम्यां वासरे वासर्वेशितः ।। 34 ।।

अर्थात्- उस राजा परमार्दिदेव (मानसिंह का पूर्वज) ने एक प्रासाद बनवाया जिसके भीतर विष्णु की प्रतिमा थी जिसके चरणों में वह अपना मस्तक नवाता था। उसी प्रकार उसने मस्तक पर जिनके चंद्र सुशोभित हैं, ऐसे भगवान शिव का स्फटिक का ऐसा सुंदर मंदिर बनवाया जिसमें प्रतिष्ठित होने पर भगवान शिव का कैलाश पर जाने को भी मन नही करता था। यह शिलालेख रविवार आश्विन शुक्ला पंचमी 1212 विक्रमी सम्वत को लिखा गया। स्पष्ट है कि इस शिवमंदिर का प्राचीन नाम तेजोमय महालय था।

यह उद्धरण डी. जी. काले की पुस्तक खर्जुरवाहक अर्थात वर्तमान खजुराहो तथा ऐपिग्राफिक इंडिया के भाग-1 पृष्ठ 270-274 पर भी दिया गया है। श्री काले अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 124 पर लिखते हैं-

‘उद्धृत शिलालेख आगरा के बटेश्वर गांव से प्राप्त हुआ और वर्तमान में वह लखनऊ संग्रहालय में है। यह राजा परमार्दिदेव का विक्रम संवत 1212 का शिलालेख है। यह शिलालेख मिट्टी के स्तूप में दबा हुआ पाया गया। बाद में इसे जनरल कनिंघम ने लखनऊ संग्रहालय में जमा करा दिया, जहाँ यह आज भी रखा है। दो भव्य स्फटिक मंदिर जिन्हें परमार्दिदेव ने बनवाया, एक भवन विष्णु का तथा दूसरा शिव का, बाद में मुस्लिम आक्रमण के समय भ्रष्ट कर दिये गये। किसी दूरदर्शी एवं चतुर व्यक्ति ने इन मंदिरों से संबंधित इस शिलालेख को मिट्टी के ढेर में दबा दिया। यह वर्षों तक दबा रहा तथा ई.1900 में उत्खनन के समय जनरल कनिंघम को प्राप्त हुआ।’

कनिंघम ने राजा परमार्दिदेव को ई.1165 या 1167 का माना है। इस मंदिर की ताजमहल के साथ संगति करते हुए पी. एन. ओक का कहना है कि हमारी दृष्टि में बटेश्वर के शिलालेख में जिन दो भवनों का उल्लेख है वे अपनी स्फटिकीय भव्यता सहित अभी भी आगरा में विद्यमान हैं। इनमें से एक एतमादुददौला का मकबरा है तथा दूसरा ताजमहल है। जिस भवन का उल्लेख राजा के प्रासाद के रूप में है, वह वर्तमान एतमादुददौला का मकबरा है। चंद्रमौलीश्वर मंदिर ताजमहल है।

चंद्रमौलीश्वर मंदिर जिन कारणों से ताजमहल हो सकता है, उन पर विचार करना भी आवश्यक है। इनमें पहला कारण स्फटिक श्वेत संगमरमर का है। उसके शिखर कलश पर त्रिशूल है, जो केवल चंद्रमौलीश्वर का ही चिन्ह है। ताजमहल का केन्द्रीय कक्ष जिसमें बादशाह और उसकी बेगम की कब्रें बतायी जाती हैं, उसके चारों ओर दस चतुर्भुजी कक्ष है, जो भक्तों के परिक्रमा मार्ग का काम करते थे।

कनिंघम आदि इतिहासकारों का मानना है कि शाहजहाँ से पूर्व हुमायूँ के काल में भी स्मारक में चार कोनों में चार मीनार देखी गयी थीं। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि महल शब्द किसी कब्र के साथ नही लगता है। यह शब्द भी भवन का पर्यायवाची है। कब्र का नाम ‘महल’ नही हो सकता।

इसके अतिरिक्त इस (ताजमहल) के निर्माण की कोई स्पष्ट तिथि किसी भी ग्रंथ से पता नही चलती। साथ ही इस पर उस समय कितनी धनराशि व्यय हुई, यह भी पता नहीं है। परस्पर विरोधाभासी बातें इस विषय में बतायी गयी हैं। यदि यह शाहजहाँ द्वारा निर्मित होता तो उसके ‘शाहजहाँनामा’ में इन दोनों तथ्यों की पुष्टि अवश्य होती। अवश्य ही यह प्राचीन भवन था जिसका नाम तेजोमय महालय था।

अमरीका के न्यूयार्क स्थित प्रैट इंस्टीट्यूट के प्रसिद्ध पुरात्वविद तथा प्रोफेसर मार्विन एच मिल्स ने भी ताजमहल को हिंदू भवन माना है तथा एक शोधपत्र प्रस्तुत किया है। यह शोधपत्र न्यूयार्क टाइम्स ने विस्तार से प्रकाशित किया। मिल्स ने अपने शोध पत्र में निष्कर्ष दिया है कि अपने मौलिक स्वरूप में ताजमहल एक हिंदू स्मारक था, जिसे बाद में मुगलों ने मकबरे में बदल दिया।

उनके अनुसार ताजमहल के बाईं ओर स्थित भवन को इस समय मस्जिद कहा जाता है जिसका मुख पश्चिम की ओर है। यदि उसे मूलतः मसजिद ही बनाया गया होता तो उसका मुख पश्चिम की बजाय मक्का की ओर होता। इसकी मीनारों को भी उन्होंने मुस्लिम सिद्धांतों के विरुद्ध माना है।

इसी प्रकार उन्होंने सवाल खड़ा किया है कि ताजमहल के निर्माण की वास्तविक तिथि को जानने के लिए भारत सरकार ने कार्बन-14 और थर्मोल्यूमिनेन्सेंस पद्धति से जांच करवाने पर रोक क्यों लगा रखी है ? मिल्स ने यह भी सवाल खड़ा किया है कि ताजमहल के उत्तर में टेरेस के नीचे 20 कमरे यमुना की तरफ करके क्यों बनाए गए? अवश्य ही यह प्राचीन हिन्दू मंदिर की मूल संरचनाएं रही होंगी जिन्हें पुरुषोत्तम नागेश ओक ने तेजोमय महालय कहा है।

किसी कब्र को 20 कमरे की क्या आवश्यकता है? इतने कक्ष किसी राजमहल का ही हिस्सा हो सकते हैं। ताजमहल के दक्षिण दिशा में बने 20 कमरों को सील कर क्यों रखा गया है? शोधकर्ताओं एवं पर्यटकों को वहाँ प्रवेश क्यों नहीं दिया जाता? 

मिल्स के अनुसार वैन एडिसन की पुस्तक ‘ताज महल’ तथा जियाउद्दीन अहमद देसाई की पुस्तक ‘द इल्यूमाइंड टॉम्ब’ में प्रशंसनीय आंकड़े और सूचनाएं हैं जो इन लोगों ने ताजमहल के उद्भव और विकास के समकालीन स्रोतों से एकत्रित किए थे। इनमें कई फोटो चित्र, इतिहासकारों के विवरण, शाही निर्देशों के साथ-साथ अक्षरों, योजनाओं, उन्नयन और आरेखों का संग्रह शामिल है।

दोनों इतिहासकारों ने प्यार की परिणति के रूप में ताजमहल के उद्भव की बात को अस्वीकार किया है। दोनों इतिहासकारों ने ताजमहल के उद्भव को मुगलकाल का मानने से भी इनकार कर दिया है। अवश्य ही यह प्राचीन भवन तेजोमय महालय रहा होगा।

पुरातत्वविदों द्वारा प्रस्तुत तर्कों को देखते हुए कुछ साल पहले कुछ मुसलमानों ने ताजमहल के बाईं ओर स्थित मस्जिद में नमाज पढ़ने की अनुमति मांगी थी किंतु सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब कालीन भवन – मुगल स्थापत्य का पतनकाल

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औरंगजेब कालीन भवन भारत में न के बराबर देखने को मिलते हैं। इस काल में शिल्प एवं स्थापत्य कला का विनाश देखने को मिलता है।

शाहजहाँ तथा मुमताज महल की चैदह संतानें थीं। उनमें से मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब छठा था। उसका जन्म 3 नवम्बर 1618 को उज्जैन के निकट दोहद में हुआ था। जब शाहजहाँ ने जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह किया था तब औरंगजेब आठ साल का था।

उस समय औरंगजेब तथा उसके भाई दारा को नूरजहाँ के पास बंधक के रूप में रखा गया। जब शाहजहाँ ने जहाँगीर के समक्ष समर्पण किया, तब दोनों भाईयों को मुक्त किया गया। इस कारण जब औरंगजेब 10 साल का हुआ, तब उसकी शिक्षा आरम्भ हो सकी। औरंगजेब ने कुरान तथा हदीस का ज्ञान प्राप्त किया।

उसने स्वयं को कट्टर सुन्नी मुसलमान बनाया। वह चित्रकला तथा संगीत आदि ललित कलाओं से दूर रहता था। उसे यह पसंद नहीं था कि उसके पिता शाहजहाँ तथा तीनों भाई चित्रकला, संगीत तथा स्थापत्य में रुचि रखते थे। उसकी दृष्टि में ये सब इस्लाम विरोधी कार्य थे। उसे यह भी पसंद नहीं था कि मुगल शासन में काफिर हिन्दुओं को बहुत बड़ी भूमिका दी गई थी। औरंगजेब चाहता था कि भारत को पूरी तरह ‘दारुल इस्लाम’ अर्थात् ‘इस्लाम का घर’ बनाया जाए।

ई.1657 में जब शाहजहाँ बीमार पड़ा तब औरंगजेब ने उसे आगरा के लाल किले में कैद कर लिया। औरंगजेब ने अपनी बड़ी बहन जहांआरा को भी शाहजहाँ के साथ ही कैद कर लिया। इसके बाद औरंगजेब अपने तीन भाइयों- दारा शिकोह, शाहशुजा तथा मुराद बक्श की हत्या करके स्वयं मुगलों के तख्त पर आसीन हो गया।

बादशाह बनने के बाद उसने भारत के समस्त हिन्दू राजाओं को अटक नदी के पार ले जाकर एक साथ उनकी सुन्नत करने का षड़यंत्र रचा किंतु एक सूफी फकीर ने औरंगजेब के षड़यंत्र का पर्दा फाश कर दिया और हिन्दू राजाओं ने अटक नदी के पूर्वी किनारे पर ही अपनी नावें जला दीं और नदी के पार जाने से मना कर दिया।

इस पर औरंगजेब ने हाथ में कुरान लेकर शपथ ग्रहण की कि वह भविष्य में फिर कभी ऐसा नहीं करेगा। इस घटना के बाद से औरंगजेब ने हिन्दू राजाओं को एक-एक करके नष्ट करने का निश्चय किया जिससे समस्त भारत में राजपूत, मराठे, जाट, सिक्ख तथा सतनामियों आदि ने मुगल सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और स्थान-स्थान पर युद्ध आरम्भ हो गए।

औरंगजेब के विध्वंस कार्य

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औरंगजेब के काल में भवनों का निर्माण न के बराबर हुआ। केवल गिनती की कुछ मस्जिदें और मकबरे ही बने किंतु सैंकड़ों की संख्या में हिन्दू भवनों को तोड़ा गया। बादशाह बनने से पहले ही औरंगजेब ने हिन्दू पूजा स्थलों को गिरवाना तथा देव मूर्तियों को भंग करना आरम्भ कर दिया था। जब वह गुजरात का सूबेदार था तब अहमदाबाद में चिन्तामणि का मन्दिर बनकर तैयार ही हुआ था। औरंगजेब ने उसे ध्वस्त करवाकर उसके स्थान पर एक मस्जिद बनवा दी। तख्त पर बैठते ही उसने बिहार के अधिकारियों को निर्देश दिये कि कटक तथा मेदिनीपुर के बीच में जितने हिन्दू मन्दिर हैं उन सबको गिरवा दिया जाये।

औरंगजेब के आदेश से सोमनाथ का तीसरा मन्दिर भी ध्वस्त करवा दिया गया। बनारस में विश्वनाथ के मन्दिर को गिरवाकर वहाँ विशाल मस्जिद का निर्माण करवाया गया, जो आज भी विद्यमान है। मथुरा में केशवराय मन्दिर की भी यही दशा की गई। मथुरा का नाम बदलकर इस्लामाबाद रख दिया गया। ई.1680 में औरंगजेब की आज्ञा से आम्बेर के समस्त हिन्दू मन्दिरों को गिरवा दिया गया।

आम्बेर के राजपूतों ने अकबर के शासन-काल से ही मुगलों की बड़ी सेवा की थी। इस कारण आम्बेर के कच्छवाहों को औरंगजेब के इस कुकृत्य से बहुत ठेस लगी। यह औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता की पराकाष्ठा थी। औरंगजेब ने आदेश जारी किया कि हिन्दू अपने पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार नहीं करें तथा नये मंदिर नहीं बनवायें।

उसने हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को तुड़वाकर दिल्ली तथा आगरा में मस्जिदों की सीढ़ियों तथा मार्गों में डलवा दिया जिससे वे मुसलमानों के पैरों से कुचली तथा ठुकराई जायें और उनका घोर अपमान हो। इस प्रकार औरंगजेब ने हर प्र्रकार से हिन्दुओं की भावनाओं को कुचलने का काम किया।

औरंगजेब ने हिन्दुओं के धर्म के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी उन्मूलित करने का प्रयत्न किया। उसके आदेश से थट्टा, मुल्तान तथा बनारस में स्थित समस्त हिन्दू शिक्षण संस्थाओं को नष्ट कर दिया गया। मुसलमान विद्यार्थियों को हिन्दू पाठशालाओं में पढ़ने की अनुमति नहीं थी। हिन्दू पाठशालाओं में न तो हिन्दू धर्म की कोई शिक्षा दी जा सकती थी और न इस्लाम विरोधी बात कही जा सकती थी।

औरंगजेब के निर्माण कार्य

दिलरास बानो का मकबरा (बीबी का मकबरा) औरंगाबाद

बीबी का मकबरा औरंगजेब कालीन भवन है। औरंगजेब के शासनकाल में महाराष्ट्र के औरंगाबाद नगर के निकट औरंगजेब की मरहूम बेगम रबिया-उद्-दौरानी उर्फ दिलरास बानो बेगम का मकबरा बनवाया गया। इस मकबरे का निर्माण शहजादे आजमशाह ने अपनी माँ की स्मृति में ई.1651-61 के दौरान करवाया। मुख्य प्रवेश द्वार पर लगे अभिलेख के अनुसार यह मक़बरा अताउल्ला और हंसपत राय नामक वास्तुकारों द्वारा अभिकल्पित और निर्मित किया गया।

इसे ‘बीबी का मकबरा’ तथा दक्कन का ताज’ भी कहा जाता है। इसका डिजाइन ताजमहल का डिजाइन तैयार करने वाले शिल्पी अहमद लाहौरी के पुत्र अताउल्लाह ने तैयार किया था। इसमें ताजमहल की नकल करने का असफल प्रयास किया गया किंतु इसकी मीनारों में संतुलन न हो पाने के कारण पूरे भवन का सामन्जस्य बिखर गया। यह एक मामूली ढंग की इमारत है और उसकी सजी हुई मेहराबों तथा अन्य सजावटों में कोई विशेषता नहीं है।

ग़ुलाम मुस्तफा की पुस्तक ‘तारीख नामा’ के अनुसार इस मकबरे के निर्माण पर 6,68,203 रुपये व्यय हुए थे। इस मक़बरे का गुम्बद पूरी तरह संगमरमर के पत्थर से बना हुआ है तथा शेष निर्माण पर सफेद प्लास्टर किया गया है। इस के निर्माण के लिए संगमरमर मकराना की खदानों से लाया गया था। आज़मशाह इसे ताजमहल से भी अधिक भव्य बनाना चाहता था किंतु औरंगज़ेब द्वारा दिए गए खर्च में वह संभव नहीं हो पाया।

लाल किला मस्जिद, दिल्ली

दिल्ली के लाल किले में स्थित एक मस्जिद औरंगजेब कालीन भवन है। औरंगजेब द्वारा निर्मित यह मस्जिद उसकी सादगी का परिचय देती है। इसे मोती मस्जिद भी कहा जाता है। यह मस्जिद उच्च कोटि के संगमरमर से निर्मित की गई है।

बादशाही मस्जिद लाहौर

लाहौर की बादशाही मस्जिद औरंगजेब कालीन भवन है। औरंगजेब ने ई.1673-74 में लाहौर में भी एक मस्जिद बनवाई जिसे बादशाही मस्जिद कहा जाता है। इसमें गोलाकार बंगाली छत और फूले हुए गुम्बद बनाए गए हैं। मस्जिद का मुख्य भवन एवं मीनारें लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई हैं जबकि भवन के ऊपर के गुम्बद तथा मीनारों के ऊपर के बुर्ज सफेद संगमरमर से बनाए गए हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप में यह तीसरे नम्बर की सबसे बड़ी मस्जिद है। अपने निर्माण के समय यह विश्व की सबसे बड़ी मस्जिद थी। इस समय यह विश्व की सातवें नम्बर की सबसे बड़ी मस्जिद है तथा पाकिस्तान में तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद है। यह लाहौर दुर्ग के पास ही स्थित है तथा लाल पत्थर से बनी मण्डलीय मस्जिदों में अंतिम मस्जिद है। इसके बाद मुगलों ने ऐसी मस्जिद फिर कभी नहीं बनाई।

औरंजेब द्वारा निर्मित लाहौर की बादशाही मस्जिद, शाहजहाँ द्वारा दिल्ली में बनवाई गई जामा मस्जिद की अनुकृति पर बनी है किंतु यह दिल्ली की जामा मस्जिद की तुलना में बहुत बड़ी है तथा ईदागाह के रूप में भी प्रयुक्त होती है। इसका दालान 2 लाख 76 हजार वर्ग फुट में विस्तृत है जिसमें एक लाख लोग नमाज पढ़ सकते हैं। मस्जिद के चारों ओर बनी मीनारें 196 मीटर ऊँची हैं। महाराजा रणजीतसिंह के शासन में इस मस्जिद को बहुत क्षति पहुंची। मस्जिद परिसर में एक छोटा संग्रहालय भी बनाया गया है।

जीनत-अल-मस्जिद, दिल्ली

दिल्ली की जीनत-अल-मस्जिद भी औरंगजेब कालीन भवन है। औरंगजेब की दूसरे नम्बर की पुत्री जीनत-उन्निसा ने ई.1707 में दिल्ली के शाहजहाँनाबाद में खैराती दरवाजा के पास जीनत-अल-मस्जिद बनवाई। उस समय यमुना नदी इस मस्जिद के पास से होकर बहती थी इस कारण इसे घाट मस्जिद भी कहा जाता था। औरंगजेब के समय में यह क्षेत्र शाहजहाँनाबाद के दरियागंज क्षेत्र के अंतर्गत था।

दरियागंज नामक बाजार की स्थापना मुगलों ने ही की थी जिसका आशय यमुना नदी के तट पर स्थित बाजार से था किंतु जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार किया तो उन्होंने यमुना के बहाव की दिशा में परिवर्तन कर दिया। इसके बाद दरिया अर्थात् यमुना, दरियागंज से दूर चली गई किंतु बाजार पूर्ववत् दरियागंज कहलाता रहा। शाहजहाँ द्वारा बनाई गई दिल्ली की जामा मस्जिद के स्थापत्य से साम्य होने से इसे दिल्ली की मिनी जामा-मस्जिद भी कहा जाता है।

शाहजहाँ अपनी पौत्री जीनत-उन्निसा से बहुत प्रेम करता था इसी कारण जीनत-उन्निसा ने अपने बाबा द्वारा बनाई गई मस्जिद के नक्शे पर ही यह मस्जिद भी बनवाई। कुछ किंवदन्तियों के कारण इसे घटा मस्जिद (बादल मस्जिद) एवं घाटा मस्जिद (नुक्सान मस्जिद) भी कहा जाता है।

इस मस्जिद के पास ही जीनत-उन्निसा का मकबरा भी था। जब ई.1857 में बादशाह बहादुरशाह जफर ने क्रांतिकारी सैनिकों का साथ दिया तब अंग्रेजों ने लाल किले पर अधिकार करके, उसके भीतर स्थित बहुत से भवनों को नष्ट कर दिया। उसी समय अंग्रेजों ने जीनत-उन्निसा का मकबरा भी गिरा दिया तथा जीनत-उन्निसा द्वारा बनवाई गई मस्जिद में बेकरी स्थापित कर दी।

जीनत-उन्निसा का जन्म औरंगजेब की प्रिय बेगम दिलरास बानो के पेट से हुआ था जिसका मकबरा औरंगजेब के पुत्र आजमशाह ने औरंगाबाद में बनाया था और बीबी का मकबरा के नाम से जाना जाता है। जिस प्रकार जीनत-उन्निसा द्वारा निर्मित मस्जिद को मिनी जामा मस्जिद कहा जाता है, उसी प्रकार बीबी का मकबरा को मिनी ताजमहल कहा जाता है।

ये दोनों ही इमारतें औरंगजेब के पुत्र एवं पुत्री ने बनाई थीं किंतु दोनों ने ही अपने बाबा शाहजहाँ के स्थापत्य का अनुकरण किया। इससे प्रतीत होता है कि औरंगजेब की औलादें, अपने पिता औरंगजेब की बजाय अपने बाबा शाहजहाँ से अधिक प्रेम करती थीं।

लालबाग किला, ढाका

ढाका का लाल किला औरंगजेब कालीन भवन है। औरंगजेब के तीसरे शहजादे मुहम्मद आज़म शाह को बंगाल का सूबेदार बनाया गया था। उसने ई.1678 में लालबाग किले का निर्माण आरम्भ करवाया किंतु यह काम अधूरा ही रह गया। उस समय इसे औरंगाबाद का किला कहते थे।

अब यह दुर्ग बांगलादेश की राजधानी ढाका के दक्षिण-पश्चिमी भाग में बुरीगंगा नदी के निकट स्थित है तथा लाल बाग का किला कहलाता है।

मुहम्मद आजम के बाद औरंगजेब का मामा शाइस्ता खान बंगाल का सूबेदार हुआ। वह ई.1688 तक बंगाल में रहा किंतु उसने किले का काम पूरा नहीं करवाया। ई.1684 में शाइस्ता खान की बेटी ‘बीबी ईरान दुख्त परी’ की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद शाहस्ता खान ने इस दुर्ग को अशुभ जानकर ढाका छोड़ दिया और मुर्शिदाबाद में जाकर रहने लगा। ई.1787 में जोहान जोफनी द्वारा इस किले के भवनों को चित्रित किया गया। ई.1844 में इस क्षेत्र को लालबाग कहा जाने लगा।

लंबे समय तक किले को तीन इमारतों- (1.) मस्जिद, (2.) बीबी परी का मकबरा और (3.) दीवान-ए-आम का संयोजन माना जाता था जिसक  साथ दो दरवाजे और आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त किले की दीवार का हिस्सा भी था। बांग्लादेश के पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई में अन्य संरचनाएं भी सामने आई हैं।

किले की दक्षिणी दीवार के दक्षिणी-पश्चिमी कोने पर एक विशाल बुर्ज बनी हुई है। इसके साथ ही अस्तबल तथा प्रशासनिक खण्ड के भवन बने हुए हैं। किले के पश्चिमी भाग में एक ‘रूफ-गार्डन’ बना हुआ है। इसमें जलाशय तथा फव्वारों की भी व्यवस्था है। दुर्ग की दीवार में थोड़ी-थाड़ी दूरी पर दो मंजिले बुर्ज बने हुए हैं।

दीवान-ए-आम परिसर के पूर्व की ओर स्थित बंगाल के मुगल सूबेदार का दो मंजिला आवास है। अंग्रेजी फैक्टरी के गवर्नर की रिपोर्ट में कहा गया है कि शाइस्ता खान इस कमरे में रहता था। बाद में कुछ यूरोपीय लोगों को इसी भवन में कैद करके रखा गया। बीबी पारी के मकबरे में भीतरी भाग सफेद संगमरमर से ढका हुआ है जबकि बाहरी भाग लाल पत्थर से बना है। इस मकबरे में केंद्रीय कमरे के चारों ओर आठ कमरे बनाए गए हैं। दक्षिण-पूर्वी कोने के कमरे में एक और छोटी कब्र है। इस किले में शालीमार बाग की भांति एक उद्यान भी बनाया गया था।

रौशनआरा का मकबरा, दिल्ली

रौशनआरा का मकबरा भी औरंगजेब कालीन भवन है। शाहजहाँ की पुत्री रौशन आरा का निधन ई.1671 में हुआ। उसका मकबरा दिल्ली में बनाया गया। इस मकबरे के चारों ओर बड़ा उद्यान था जिसका कुछ हिस्सा अब भी बचा हुआ है।

आलमगीरी दरवाजा, लाहौर

लाहौर का आलमगीरी दरवाजा औरंगजेब कालीन भवन है। लाहौर दुर्ग के आलमगीरी दरवाजे का निर्माण ई.1673 करवाया गया। वर्तमान समय में यही दरवाजा किले के मुख्य द्वार के रूप में प्रयुक्त होता है। यह दरवाजा बादशाही मस्जिद की तरफ खुलता था जिसका निर्माण भी औरंजेब ने करवाया था।

पिंजोर गार्डन, पंचकूला

चण्डीगढ़ का पिंजोर गार्डन औरंगजेब कालीन भवन तो नहीं है किंतु औरंगजेब के काल में बनवाया गया एक प्रमुख उद्यान है। पिंजोर गार्डन चण्डीगढ़ से 22 किलोमीटर दूर है तथा हरियाणा प्रांत के पंचकूला जिले में स्थित है। यह 17वीं शती का मुगल उद्यान है जिसे अब यदुवेन्द्र गार्डन कहा जाता है।

इसका निर्माण औरंगजेब के काल में औरंगजेब के धाय-भाई मुजफ्फर हुसैन ने करवाया था जिसे नवाब फिदाई खान कोका भी कहते थे। इसी धाय-भाई ने लाहौर की बादशाही मस्जिद के निर्माण कार्य की देख-रेख की थी। जिस समय पिंजोर का उद्यान बनवाया गया, उस समय औरंगजेब लाहौर में प्रवास कर रहा था तथा यह औरंगजेब के शासन के शुरुआती वर्ष थे।

अंग्रेज महिला लेखक एवं चित्रकार सी.एम. विलियर्स स्टुअर्ट ने ई.1913 में कुछ दिनों तक इस उद्यान में निवास किया। उसने अपनी पुस्तक गार्डन्स ऑफ द ग्रेट मुगल्स में लिखा है-

‘जब दीर्घकालीन निर्माण प्रक्रिया पूरी होने के बाद फिदाई खान अपने हरम की औरतों को लेकर पिंजौर बाग में रहने के लिए आया तो उसने देखा कि बाग में काम करने वाले बहुत से लोगों के गले में गांठें उभरी हुई थीं जिन्हें गण्डमाला (घेंघा) कहा जाता था। आसपास के गांवों की जो औरतें मुगल हरम की औरतों को फल, फूल एवं सब्जियां बेचने आती थीं, वे भी इस बीमारी से ग्रस्त थीं। उन्होंने हरम की औरतों को बताया कि यहाँ की हवा एवं पानी में कुछ दोष है जिसके कारण यहाँ रहने वाले लोग इस बीमारी से ग्रस्त होकर कुरूप हो जाते हैं। अतः फिदाई खाँ कुछ ही दिनों में इस बाग को छोड़कर चला गया ताकि उसके हरम की औरतें सुंदर बनी रह सकें।’

माना जाता है कि स्थानीय राजाओं ने फिदाई खाँ तथा औरंगजेब को इस इलाके से दूर रखने के लिए यह योजना बनाई थी कि उन्हें गण्डमाला से ग्रस्त स्त्री-पुरुष दिखाकर औरंगजेब तथा फिदाई खाँ के मन में भय उत्पन्न किया जा सके। इस कारण यह बाग उजाड़ हो गया। ई.1775 में पटियाला नरेश अमरसिंह ने सिरमूर नरेश जगत प्रकाश से यह उद्यान खरीदा। ई.1793 में इस बाग के एक हिस्से को हटाकर वहाँ सड़क बना दी गई।

अंग्रेजों के समय यह बाग पूरी तरह उजड़ गया तथा इसमें जंगली झाड़ियां उग आईं। महाराजा पटियाला ने इस बाग में गुलाबों की खेती करवाई ताकि महाराजा के लिए गुलाब का इत्र तैयार करवाया जा सके। पटियाला नरेश यदुवेन्द्रसिंह (ई.1914-74) ने इस उद्यान को फिर से लगवाया तथा इसका खोया हुआ स्वरूप पुनर्जीवित किया। तब से यह बाग यदुवेन्द्र गार्डन कहलाने लगा।

यह बाग श्रीनगर के शालीमार बाग की शैली पर बना हुआ है तथा सात सीढ़ीदार क्यारियों (टैरेस-बैड) में लगा हुआ है। बाग का मुख्य द्वार बाग के सबसे ऊँचे टैरेस में खुलता है। यहाँ पर एक महल बना हुआ है जिसका निर्माण राजस्थानी-मुगल शैली में हुआ है। इसे शीशमहल कहा जाता है। इससे लगता हुआ हवामहल बनाया गया है।

दूसरी टैरेस पर रंगमहल बना हुआ है जिसमें मेहराबदार दरवाजे बने हुए हैं। तीसरी टैरेस में सरू के पेड़ (साइप्रस ट्री) तथा फूलों की क्यारियां लगी हुई हैं। चैथी टैरेस में जल महल बना हुआ है। इसके पास ही एक चैकोर फव्वारा लगा हुआ है तथा आराम करने के लिए एक बरामदा भी बना हुआ है।

अगली टैरेस पर पुनः पेड़ एवं फव्वारे लगे हुए हैं। सबसे नीचे की टैरेस पर मुक्ताकाश थियेटर बना हुआ है, इसे तश्तरी के आकृति में बनाया गया है। आजादी के बाद मुक्ताकाश थियेटर में एक मंदिर तथा संग्रहालय स्थापित कर दिया गया है। यह बाग इतना सुंदर है कि इसमें कई फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है।

औरंगजेब कालीन भवन निश्चित रूप से मुगल स्थापत्य के पतन की कहानी कहते हैं।

औरंगजेब के बाद की मुगल स्थापत्य कला

ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तरकालीन मुगल बादशाहों के समय में कोई उल्लेखनीय इमारत नहीं बनी। इस काल में केन्द्रीय सत्ता के कमजोर हो जाने के कारण स्थापत्य शैली भी स्थानीय सत्ता की भांति आंचलिक प्रभाव ग्रहण करने लगी क्योंकि भवनों का निर्माण कार्य मुगल शहजादों के हाथों से निकलकर अवध के नवाब तथा अन्य आंचलिक प्रमुखों के हाथों में चला गया था। कुछ भवन खानदेश और दक्षिण के अन्य भागों में भी बने किंतु वे शाहजहाँ कालीन स्थापत्य का स्तर प्राप्त करने में असफल रहे।

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जो इमारतें बनीं, वे मुगलकालीन शिल्पकला के डिजाइन का खोखलापन और दीवालियापन ही प्रकट करती हैं।’

सफदर जंग का मकबरा, दिल्ली

ई.1753-54 में दिल्ली में वजीर सफदर जंग का मकबरा बना जो मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला (ई.1719-1748) का शक्तिशाली वजीर था तथा अवध का नवाब था। यह मकबरा दक्षिण दिल्ली में श्री औरोबिंदो मार्ग पर लोधी मार्ग के पश्चिमी छोर के ठीक सामने स्थित है। इस मकबरे का ऊध्र्व अनुपात (वर्टिकल प्रपोरशन) आवश्यकता से कहीं अधिक है फिर भी इसे मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है।

मकबरे में सफदरजंग और उसकी बेगम की कब्र बनी हुई है। केन्द्रीय भवन में सफ़ेद संगमरमर से निर्मित एक बड़ा गुम्बद है। शेष भवन लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है। इसका स्थापत्य हुमायूँ के मकबरे की डिजाइन पर ही आधारित है। मोती महल, जंगली महल और बादशाह पसंद नाम से पैवेलियन भी बने हुए हैं। चारों ओर पानी की चार नहरें हैं, जो चार इमारतों तक जाती हैं। मकबरे का मुख्य द्वार पूर्व दिशा में है जो श्री औरोबिन्दो मार्ग पर खुलता है। मकबरे के कुछ कक्ष आवासीय प्रयोग हेतु बनाए गए हैं। मुख्य भवन से जुड़ी हुई चार अष्टकोणीय मीनारें हैं।

उस्ताद-शागिर्द के मकबरे, सरहिंद

उस्ताद-शागिर्द के मकबरे, मुगल काल की ऐतिहासिक इमारतें हैं। उस्ताद का मकबरा शाहजहाँ के काल में महत्वपूर्ण शिल्पी एवं प्रधान भवन-निर्माता सैयद खाँ चग़ताई की स्मृति में बनवाया गया था। सैयद खाँ, जहाँगीर के काल में पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया गया था। संभवतः इस नियुक्ति के कुछ दिनों बाद ही ई.1606 में उसकी मृत्यु हो गई।

शार्गिद का मकबरा उस काल के एक और प्रसिद्ध शिल्पी तथा भवन-निर्माता ख्वाजा खाँ की स्मृति में बनवाया गया था। अनुमान लगाया जाता है कि ख्वाजा खाँ, सैयद खाँ का शिष्य रहा होगा। क्योंकि इस सम्बन्ध में और कोई तथ्य उपलब्ध नहीं होता है। ये मकबरे पंजाब के फतेहगढ़ एवं सरहिंद क्षेत्र में स्थित हैं तथा वर्तमान समय में तलानिया गांव के बाहर खण्डहरों के रूप में खड़े हैं। ये मकबरे रौजा शरीफ के स्मारक से केवल 2.5 किलोमीटर दूर स्थित हैं। इन मकबरों के भीतर की दीवारों पर बने वृक्षों के अलंकरण से अनुमान होता है कि ये जहाँगीर कालीन निर्माण हैं।

मुगलों के आगमन के समय सरहिंद, पंजाब का प्रसिद्ध क्षेत्र था। मुगल काल में भी सरहिंद की प्रमुखता बनी रही। यह दिल्ली से लाहौर जाने के मार्ग पर स्थित था। ई.1710 में बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद को मुगलों का प्रमुख स्थान होने के कारण जलाकर नष्ट कर दिया। उन दिनों सिक्ख सेनाएं गुरुगोविंद सिंह के पुत्रों की निर्मम हत्या का बदला लेने के लिए पूरे पंजाब में मुगलों पर कहर ढा रही थीं।

इस अवसर पर हुए ‘चप्पर-चिरी’ के युद्ध में वजीर खाँ भी मारा गया जो मुगलों की तरफ से पंजाब में सूबेदार नियुक्त था तथा लाहौर दुर्ग में रहा करता था। जब सिक्खों ने सरहिंद को नष्ट किया था, तब भी उस्ताद-शागिर्द के मकबरे मौजूद थे किंतु सिक्खों की सेना ने उन्हें नष्ट नहीं किया।

इन मकबरों की दीवारों पर सुंदर भित्तिचित्र बनाए गए थे किंतु अब दीवारों का प्लास्टर हट जाने से भित्तिचित्र भी नष्ट हो गए हैं। उस्ताद के मकबरे की अपेक्षा शागिर्द का मकबरा थोड़ी अच्छी हालत में हैं।

उस्ताद-शागिर्द के मकबरे, नकोदर

पंजाब के जालंधर जिले के नकोदर नामक स्थान पर भी उस्ताद-शागिर्द के मकबरे बने हुए हैं। शाहजहाँ के काल में ये मकबरे ‘हदीरों वाला बाग’ के भीतर बनाए गए थे। इनकी बाहरी एवं भीतरी दीवारों का अलंकरण बताता है कि ये शाहजहाँ काल के निर्माण हैं। उस काल में हदीरों वाला बाग में महल, बड़े दरवाजे तथा मकबरे, कुएं, पानी के हौद आदि भी बनाए गए थे। हदीरों वाला बाग अब नष्ट हो गया है किंतु मकबरे अब भी अच्छी स्थिति में हैं।

यहाँ उस्ताद के मकबरे का सम्बन्ध जहाँगीर कालीन मुहम्मद मुोमन हुसैनी से है जो जहाँगीर का दरबारी अमीर हुआ करता था। इस मकबरे पर एक शिलालेख लगा है जिसमें ई.1612-13 की तिथि का उल्लेख है। शागिर्द के मकबरे में ई.1657 की तिथि का एक शिलालेख लगा है। इस शिलालेख के अनुसार यह मजार हाजी जमाल की है।

इन दोनों लेखों में प्रयुक्त अक्षरों की बनावट बिल्कुल एक जैसी है जिससे अनुमान होता हे कि इन्हें एक ही व्यक्ति ने लिखा है। इन लेखों की लिखावट से अनुमान लगाया जाता है कि ये दोनों कब्रें एक-दूसरे से सम्बद्ध व्यक्तियों की हैं किंतु उनमें गुरु-शिष्य जैसे किसी सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है।

निकटवर्ती भोलापुर गांव में भी उस्ताद-शागिर्द के मकबरे हैं। ग्वालियर में भी उस्ताद-शागिर्द का एक मकबरा है जिसमें उस्ताद के रूप में बाबर के समकालीन संगीतकार मुहम्मद गौस की कब्र है जबकि शागिर्द की कब्र सुप्रसिद्ध गायक तानसेन की है। भारत के मुसलमानों में यह परम्परा रही है कि शिष्य की कब्र गुरु के चरणों की तरफ बनाई जाती है।

जफर महल, महरौली

दक्षिणी दिल्ली के महरौली क्षेत्र में स्थित ज़फ़र महल मुगल काल का अंतिम ऐतिहासिक भवन माना जाता है। इस भवन का निर्माण ग्रीष्मकालीन महल के रूप में करवाया गया था। इसके भीतरी ढांचे का निर्माण मुगल बादशाह अकबर (द्वितीय) द्वारा करवाया गया तथा बाहरी भाग और दरवाजे का निर्माण बहादुरशाह (द्वितीय) द्वारा 19वीं सदी में करवाया गया। भारत के इतिहास में उसे बहादुरशाह ज़फ़़र भी कहते हैं।

 उस समय महरौली क्षेत्र में घने जंगल थे जिनके कारण यहाँ ठण्डक रहती थी। ज़फ़र महल के निकट ही बहादुर शाह प्रथम की कब्र है जिसका निर्माण बहादुरशाह प्रथम के पुत्र जहांदार शाह ने करवाया था। मुगल बादशाह शाहआलम को भी इसी क्षेत्र में दफ़नाया गया था। शाहआलम के पुत्र अकबरशाह (द्वितीय) की कब्र भी ज़फ़र महल के पास ही है।

बहादुरशाह ज़फ़र ने अपनी वसीयत में मृत्यु के बाद अपने शव को जफ़र महल में दफ़नाए जाने की इच्छा व्यक्त की थी किंतु ई.1857 की सैनिक क्रांति के बाद अंग्रेजों ने बहादुरशाह को रंगून भेज दिया और वहीं उसकी मृत्यु हुई। अंग्रेजों ने उसे रंगून में ही दफ़ना दिया।

संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर से बनी इस तीन मंजिला इमारत का प्रवेशद्वार 50 फुट ऊँचा और 15 मीटर चैड़ा है। इस प्रवेश द्वार को हाथी दरवाजा कहा जाता है। इस दरवाजे से हौदे सहित एक सुसज्जित हाथी आराम से पार हो सकता था। इस द्वार का निर्माण बहादुर शाह ज़फ़र ने करवाया था। इस सम्बन्ध में प्रवेश द्वार पर एक अभिलेख भी लगा हुआ है- ‘इस द्वार को मुगल बादशाह ज़फ़र ने अपने शासन के 11वें वर्ष में ई.1847-48 में बनवाया।’ मुगल शैली में निर्मित एक विशाल छज्जा इस द्वार की महत्वपूर्ण विशेषता है। प्रवेश द्वार पर घुमावदार बंगाली गुंबजों और छोटे झरोखों का निर्माण किया गया है।

जफर महल को प्राचीन इमारत संरक्षण अधिनियम के तहत ई.1920 में संरक्षित इमारत घोषित किया गया था किंतु इसकी दक्षिणी और पूर्वी दीवार के पास अतिक्रमण कर लिए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस महल में एक संग्रहालय स्थापित करने की योजना पर कार्य कर रहा है।

जफर महल के मुख्य दरवाजे की मेहराब के ऊपरी भाग में दोनों तरफ पत्थर के दो कमल लगाए गए हैं। हुमायूँ के मकबरे के मुख्य दरवाजे के ईवान पर फारसी शैली के दो सितारे अंकित किए गए थे किंतु मुगलों की इस अंतिम इमारत में सितारों की जगह कमल ने ले ली थी जो इस बात की प्रतीक थी कि अब उनका नाता मध्य एशिया से समाप्त हो गया था और वे पूर्णतः भारतीय हो गए थे किंतु यह उनकी भारत से भी विदाई की बेला थी।

संभवतः इसी व्यथा को बहादुरशाह जफ़र ने अपनी एक नज़्म में इस प्रकार व्यक्त किया था- ‘दो गज ज़मीं भी न मिली कू-ए-यार में।’

अर्थात् मुझे अपने मित्रों के देश में दो गज जमीं भी नहीं मिल सकी।

इस प्रकार हम देखते हैं कि औरंगजेब कालीन भवन तो निश्चित रूप से. मुगल स्थापत्य के पतन की कहानी कहते ही हैं किंतु उसके बाद के काल में मुगलों की इतनी ताकत ही नहीं रह गई थी कि वे कुछ बड़े भवन बना सकें।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगलकाल में ध्वस्त भवन

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भारत के इतिहास में गुगल काल केवल निर्माण के लिए ही नहीं जाना जाता है अपितु हिन्दू स्थापत्य, विशेषकर मंदिरों के विध्वंस के लिए बदनाम भी है। मुगलकाल में ध्वस्त भवन बहुत बड़ी संख्या में रहे होंगे, अब तो उनके नाम भी नहीं मिलते।

इस अध्याय में मुगल बादशाह बाबर से लेकर शाहजहाँ तक के काल में ध्वस्त भवनों की संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है। इस पूरे काल में बड़े स्तर पर हिन्दू स्थापत्य का विनाश हुआ। इनमें से कुछ भवनों का उल्लेख पुस्तक में स्थान-स्थान पर हुआ है।

बाबर तथा हुमायूँ के काल में भवनों का विध्वंस

बाबर के काल में राम-जन्मभूमि मंदिर का ध्वंस

मुगलकाल में ध्वस्त भवन की सूची में सबसे ऊपर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का नाम आता है। बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या के श्रीराम मंदिर ‘जन्मस्थानम्’ को भंग करके उसी की सामग्री से एक ढांचा बनाया जिसे मुगल अभिलेखों में ‘जन्मस्थान मस्जिद’ कहा जाता था किंतु यहाँ लगे शिलालेख में बाबर का उल्लेख होने से जनता इसे बाबरी मस्जिद कहने लगी। ई.1992 के जनआंदोलन में हिन्दुओं ने उस ढांचे को ढहा दिया और वहाँ कपड़े का एक मंदिर बना दिया जिसमें रामलला की मूर्ति विराजमान है।

हुमायूँ के काल में चित्तौड़ दुर्ग का विध्वंस

मुगलकाल में ध्वस्त भवन की सूची में दूसरा नाम चित्तौड़ दुर्ग का नाम आता है। चित्तौड़ दुर्ग को हुमायूँ के शासनकाल में तोड़ा गया। ई.1534 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने आक्रमण किया। चित्तौड़ की राजमाता कर्मवती ने हूमायूं को राखी भेजकर उससे प्रार्थना की कि वह दुर्ग की रक्षा करे किंतु बहादुरशाह ने हुमायूँ को यह कहकर रोक दिया कि इस समय मैं जेहाद पर हूँ। यदि शत्रु की मदद की तो कयामत के दिन अल्लाह को क्या मुंह दिखाएगा? बहादुरशाह ने दुर्ग को जलाकर राख कर दिया। इसके बाद अकबर एवं औरंगजेब की सेनाओं ने चित्तौड़ दुर्ग में अनेक भवन ध्वस्त किए।

अकबर के काल में भवनों का विध्वंस

अकबर के काल में वज्रेश्वरी देवी मंदिर का ध्वंस

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आधुनिक हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा की घाटी में नगरकोट नामक अत्यंत प्राचीन सुरम्य एवं धार्मिक स्थान है जहाँ सदियों से हिन्दू राजा शासन करते आए थे। नगरकोट नामक एक स्थान में वज्रेश्वरी देवी का अति प्राचीन शक्तिपीठ स्थित है। महमूद गौरी, मुहम्मद बिन तुगलक तथा फीरोजशाह तुगलक इस शक्तिपीठ को पहले भी तोड़ चुके थे किंतु अवसर पाते ही हिन्दू इस मंदिर को फिर से बना लेते थे। अकबर के शासन काल में इस मंदिर को एक बार पुनः बुरी तरह नष्ट-भ्रष्ट किया गया। अकबर की सेनाओं ने कांगड़ा दुर्ग में स्थित मंदिर भी ध्वस्त कर दिए।

अकबर के समकालीन लेखक निजामुद्दीन अहमद ने अपनी पुस्तक तबकात ए अकबरी में अकबर की सेनाओं द्वारा नगरकोट में की गई हिंसा का उल्लेख किया है। वह लिखता है- ‘भूण की गढ़ी में महामाया का मंदिर है, उसे मुस्लिम सेनाओं ने अपने अधिकार में ले लिया। इस पर राजपूतों का एक शहीदी जत्था मुगल सेना पर चढ़ बैठा जिसे शीघ्र ही काट डाला गया। युद्ध से मचे हल्ले से घबराकर नगरकोट के हिन्दुओं की काले रंग की लगभग 200 गौएं शरण लेने के लिए मंदिर में घुस गईं, जब हिन्दू सैनिक, मुसलमानों पर तीरों और बंदूकों से गोलियों की बरसात कर रहे थे, तब उन गायों को सावग तुर्कों ने एक-एक करके काट दिया। ब्राह्मणों का एक बड़ा समूह था जो लम्बे समय से इस मंदिर में पूजा करते आसा था, उनमें से किसी ने भी युद्ध करने के बारे में विचार तक नहीं किया, किंतु उन्हें भी काट डाला गया। सैनिकों ने अपने जूतों में गायों का खून भर लिया तथा उस खून को मंदिर की छतों, दीवारों एवं फर्श पर बिखेर दिया।’

जब हिन्दुओं ने इस अत्याचार का बदला लेने का प्रयास किया तो शेख अहमद सरहिंदी ने अकबर से शिकायत की कि हिन्दू, मस्जिदों को तोड़कर उनके स्थान पर मंदिर बना रहे हैं।

अकबर के काल में चित्तौड़ दुर्ग में विनाश लीला

ई.1567 में अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग के विरुद्ध अभियान किया। उस समय चित्तौड़ पर राणा उदयसिंह का शासन था। अकबर ने इस दुर्ग की नीवों में बारूद भरकर उसकी दीवारों को उड़ा दिया तथा चित्तौड़ दुर्ग में 8 हजार हिन्दू सैनिकों और 40 हजार हिन्दू नागरिकों का कत्लेआम करवाया। इस दौरान बहुत सी इमारतें गिराई गईं।

अकबर के काल में हम्पी का विनाश

विजयनगरम् साम्राज्य दक्षिण भारत का एक विशाल हिन्दू साम्राज्य था जो भारत के मध्यकालीन इतिहास में भव्य मंदिरों के निर्माण के लिए जाना जाता है। विजयनगरम् साम्राज्य के अंतर्गत वर्तमान कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के क्षेत्र आते थे। इसकी राजधानी ‘हम्पी’ अब कर्नाटक में स्थित है।

हम्पी नगर में विश्व के सर्वश्रेष्ठ और विशालकाय मंदिर बने जिन्हें मुगलों के शासनकाल में दक्षिण भारत के शिया-मुस्लिम राज्यों ने तोड़कर नष्ट कर दिया। अब इन मंदिरों के खंडहर ही देखे जा सकते हैं। मुगलों के समय में ‘हम्पी’ रोम से भी समृद्ध नगर था। इसे ‘मंदिरों का शहर’ भी कहा जाता था।

जिस समय बाबर ने भारत पर राज्य स्थापित किया, उस समय विजयनगरम् पर राजा कृष्णदेव राय (ई.1509-29) का शासन था। अकबर के शासन-काल में ई.1565 में बीदर, बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर और बरार की मुस्लिम सेनाओं ने संगठित होकर विजयनगरम् राज्य पर हमला किया तथा उसे नष्ट कर दिया। राजधानी हम्पी तथा अन्य नगरों को खण्डहरों और लाशों के ढेर में बदल दिया गया। यह भारत के क्रूरतम हमलों में से एक था।

जहाँगीर के काल में मंदिरों का विध्वंस

जहाँगीर के शासनकाल के आठवें वर्ष में उसी की आज्ञा से अजमेर में पुष्कर के हिन्दू मन्दिरों को नष्ट किया गया। जहाँगीर के एक समकालीन इतिहासकार ने अपनी पुस्तक इन्तखाब ए जहाँगीरशाही में लिखा है- ‘अहमदाबाद में एक दिन शिकायत मिली कि सेवरास (जैनों) ने बड़ी संख्या में गुजरात में भव्य मंदिर बना लिए हैं तथा उनमें मूर्तियों की पूजा कर रहे हैं। जहाँगीर ने आदेश दिया कि उन जैनों को मुगल सल्तनत से बाहर निकाल दिया जाए तथा उनके मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बनाई जाएं।’

शाहजहाँ के काल में मंदिरों का विध्वंस

शाहजहाँ ने ई.1614 में अपने सूबेदारों को आदेश दिया कि जहाँगीर के शासन-काल में जिन मन्दिरों का निर्माण आरम्भ किया गया था, उन्हें गिरा दिया जाए। इस आदेश पर बनारस में 76 मन्दिरों को तोड़ा गया। शाहजहाँ की आज्ञा से बुन्देलखण्ड के हिन्दू मन्दिर तुड़वाये गए और जुझारसिंह के पुत्रों को मुसलमान बनाया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

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प्लासी का युद्ध

प्लासी का युद्ध बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच ई.1757 में लड़ा गया था। प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्धों में से एक है।

प्लासी का युद्ध होने के प्रमुख कारण

प्लासी का युद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

(1.) अलीनगर की सन्धि की शर्तों का पूरा नहीं होना

अलीनगर की संधि की शर्तों का पालन करने में किसी भी पक्ष ने रुचि नहीं ली। सिराजुद्दौला ने अँग्रेजों को मुआवजा देने का वचन दिया था परन्तु उसने किसी प्रकार का मुआवजा नहीं दिया। रैम्जे म्योर का कथन है कि नवाब सन्धि की शर्तों को पूरा करने के लिए तैयार नहीं था, इस कारण युद्ध आवश्यक हो गया। दूसरी ओर कम्पनी ने नवाब से भी पहले युद्ध की तैयारी आरम्भ कर दी थी। अँग्रेजों का मानना था कि जब तक सिराजुद्दौला नवाब बना रहेगा, कम्पनी के हितों को खतरा बना रहेगा।

(2.) अँग्रेजों द्वारा नवाब पर दोषारोपण करना

सिराजुद्दौला ने अपने कुछ निजी पत्रों में अंग्रजों के शत्रुओं से मित्रता नहीं रखने का आश्वासन दिया था। कम्पनी ने इस प्रकार के आश्वासनों को भी सन्धि का एक अंश समझा। जबकि सच्चाई यह थी कि सन्धि के समय ही नवाब ने इस प्रकार की शर्त को मानने से इन्कार कर दिया था। इन्हीं दिनों बंगाल के फ्रांसीसियों ने नवाब के साथ सम्बन्ध बढ़ाने का प्रयास किया, जिससे क्लाइव को आशंका हुई कि नवाब, फ्रांसीसियों से मिलकर अँग्रेजों से प्रतिशोध लेने का प्रयास करेगा।

इसलिए क्लाइव ने फ्रांसीसियों की बस्ती चन्द्रनगर पर आक्रमण करने के लिए नवाब से अनुमति माँगी। नवाब फ्रांसीसियों को अपना शत्रु नहीं बनाना चाहता था। इसलिये उसने अँग्रेजों को गोलमाल जवाब भिजवा दिया। क्लाइव ने 14 मार्च 1757 को चन्द्रनगर पर अचानक आक्रमण करके उस पर भी अधिकार कर लिया।

अँग्रेजों ने नवाब पर अलीनगर की शर्तों को तोड़ने का दोष भी लगा दिया जिसे नवाब ने स्वीकार नहीं किया। नवाब का कहना था कि बंगाल के फ्रांसीसियों ने अँग्रेजों के विरुद्ध कोई कार्य नहीं किया, तब भला उन्हें शत्रु कैसे माना जाये? परन्तु अँग्रेज अपनी बात पर डटे रहे।

(3.) राज्य के प्रमुख लोगों का नवाब के विरुद्ध षड्यन्त्र करना

कुछ प्रभावशाली मुस्लिम सरदार और धनवान हिन्दू नवाब सिराजुद्दौला के विरुद्ध कुचक्र रचने में लगे हुए थे। जब अंग्रेजों ने उनसे इस कार्य में सहयोग माँगा तो उन्होंने तत्काल स्वीकृति दे दी। मुस्लिम सरदारों में मीर जाफर, मिर्जा अमीर बेग और हुसैनखाँ प्रमुख थे जो किसी-न-किसी रूप में नवाब द्वारा बेइज्जत किए जा चुके थे।

हिन्दू, सिराजुद्दौला की कट्टर धार्मिक नीतियों के कारण उसके विरोधी थे। जगत सेठ बन्धु, मेहताबराय और स्वरूपचन्द्र को भी नवाब ने अपमानित किया था। नदिया का शक्तिशाली जमींदार महाराजा कृष्णचन्द्र भी नवाब की हिन्दू-विरोधी नीति से असन्तुष्ट था। कई प्रमुख हिन्दू व्यापारियों का अँग्रेज व्यापारियों से घनिष्ट सम्बन्ध था। वे भी नवाब को हटाना चाहते थे।

(4.) मद्रास सलैक्ट कमेटी की नीति

अलीनगर की सन्धि के बाद से ही मद्रास के अधिकारी अपनी सेना को वापिस भिजवाने की माँग कर रहे थे परन्तु क्लाइव का मानना था कि अभी बंगाल में काम पूरा नहीं हुआ है। अतः उसने मद्रास की सलेक्ट कमेटी को सम्पूर्ण स्थिति समझाते हुए मार्ग-दर्शन देने की प्रार्थना की। मद्रास से क्लाइव को उत्तर भेजा गया कि बंगाल प्रान्त में ऐसी किसी भी शक्ति से सम्बन्ध स्थापित किया जाये जो नवाब से असन्तुष्ट हो तथा नवाबी का दावा कर रही हो, ताकि सिराजुद्दौला को सदैव के लिए समाप्त किया जा सके।

सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड्यंत्र

नवाब विरोधी षड्यन्त्रकारियों ने मीर जाफर को नवाब बनाने का निर्णय लिया जिसे अँग्रेजों ने भी स्वीकार कर लिया। अँग्रेजों ने मीर जाफर से अलग से एक गुप्त समझौता कर लिया, जिसके अन्तर्गत नवाब बन जाने के बाद मीर जाफर ने कम्पनी को व्यापारिक, प्रादेशिक तथा आर्थिक सुविधाएं देने का आश्वासन दिया।

रायदुर्लभ को मन्त्री-पद का आश्वासन दिया गया। षड्यन्त्र की शर्तें कलकत्ता के एक सिक्ख व्यापारी अमीचन्द की मध्यस्थता से तय हुई थीं। अतः उसे नकद के कोष का पाँच प्रतिशत भाग देने का वायदा किया गया। जब सब कुछ तय हो गया तो अमीचन्द ने पाँच प्रतिशत के अलावा 30,000 पौंड की माँग की और माँग न मानने पर षड्यन्त्र का भण्डाफोड़ करने की धमकी दी।

इस पर क्लाइव ने अमीचंद को धोखा देने की नीयत से, दो सन्धि-पत्र तैयार करवाये। एक सफेद कागज पर, जो सही था और दूसरा लाल कागज पर, जो झूठा था और जिसमें अमीचन्द को 30,000 पौंड देने की बात कही गई थी। वाट्सन ने झूठे सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया।

तब क्लाइव ने उसके जाली हस्ताक्षर बनाये और अमीचन्द को सन्तुष्ट कर दिया। चूँकि क्लाइव ने कम्पनी के हितों की रक्षा के लिए धोखाधड़ी की थी, इसलिये अँग्रेज इतिहासकारों ने उसके इस कुकृत्य को उचित उचित ठहराया है।

नवाब सिराजुद्दौला को इस षड्यन्त्र की सूचना युद्ध के पूर्व ही मिल गई किन्तु उसने षड्यन्त्रकारियों के विरुद्ध सख्त कदम उठाने के स्थान पर मीर जाफर, रायदुर्लभ, यारलतीफखाँ और मीर मुईनुद्दीनखाँ को बुलवाकर अपने प्रति वफादारी की शपथ लेने को कहा। उनके ऐसा करने से नवाब संतुष्ट हो गया, जबकि मीर मुईनुद्दीनखाँ के अतिरिक्त शेष तीनों सेनापति, नवाब के विरुद्ध षड्यन्त्र में सक्रिय थे।

मीर जाफर तथा उसके साथियों की गद्दारी

अब क्लाइव ने युद्ध का बहाना ढूँढना आरम्भ किया। उसने नवाब को एक पत्र लिखा, जिसमें उस पर अलीनगर की सन्धि को भंग करने का आरोप लगाया तथा नवाब का उत्तर आने से पहले ही राजधानी की तरफ कूच कर दिया। 19 जून 1757 को अंग्रेजों ने कटवा पर अधिकार कर लिया। नवाब भी सेना सहित आगे बढ़ा।

दोनों पक्षों की सेनाएँ प्लासी के मैदान में आमने-सामने आ डटीं। नवाब की सेना में लगभग 50,000 सैनिक थे। क्लाइव के पास 800 यूरोपियन तथा 2200 भारतीय सैनिक थे। क्लाइव ने अपना डेरा आम के पेड़ों की ओट में लगाया ताकि शत्रु के तोपखाने से बचाव हो सके।

नवाब की विशाल सेना देखकर क्लाइव साहस खो बैठा और उसने आक्रमण करने का साहस नहीं किया परन्तु जब नवाब के विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे लोगों ने क्लाइव को उसकी जीत का विश्वास दिलाया तो 23 जून 1757 को क्लाइव ने धावा बोल दिया। नवाब के चारों सेनापतियों में से तीन सेनापति अपने-अपने सैनिक दस्तों के साथ चुपचाप युद्ध का दृश्य देखते रहे।

केवल मीर मुईनुद्दीनखाँ ने शत्रु का सामना किया परन्तु थोड़ी देर में ही मारा गया। सिराजुद्दौला अपने ही लोगों के विश्वासघात से घबरा गया और 2000 सैनिकों के साथ युद्ध के मैदान से भाग खड़ा हुआ। उसके भागते ही नवाब के षड्यन्त्रकारी सेनापतियों ने अपने-अपने दस्तों को भी लौट जाने के आदेश दे दिये।

इस प्रकार, बिना किसी विशेष युद्ध के ही क्लाइव ने प्लासी का युद्ध जीत लिया। नवाब जब मुर्शिदाबाद से पटना की ओर भाग रहा था, तब उसे बन्दी बना लिया गया। 28 जून 1757 को अँग्रेजों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया। 2 जुलाई 1757 को मीर जाफर के पुत्र मीरन ने नवाब सिराजुद्दौला की हत्या कर दी।

प्लासी के युद्ध का महत्त्व

प्लासी के युद्ध में नवाब की तरफ के केवल 500 सैनिक तथा अँग्रेजों की ओर के केवल 29 सैनिक मारे गये थे। इसलिये सैनिक दृष्टि से प्लासी का युद्ध महत्त्वपूर्ण नहीं था किंतु इसके राजनीतिक परिणाम अत्यंत दूरगामी एवं महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। नवाब की विशाल सेना की पराजय का मूल कारण उसके सेनापतियों का विश्वासघात था। क्लाइव ने जगत सेठ और मीर जाफर की महत्त्वाकांक्षाओं का लाभ उठाया।

के. एम. पणिक्कर ने लिखा है- ‘प्लासी एक ऐसा सौदा था, जिसमें बंगाल के धनी लोगों और मीर जाफर ने नवाब को अँग्रेजों के हाथों बेच दिया।’

प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल में नया युग आरम्भ हुआ जिसने न केवल बंगाल में ही क्रान्ति उत्पन्न की, अपितु ईस्ट इण्डिया कम्पनी के स्वरूप में भी क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया।

(1.) राजनीतिक महत्त्व

प्लासी के युद्ध से बंगाल की तात्कालिक शासन व्यवस्था का खोखलापन स्पष्ट हो गया तथा हिन्दुओं और मुसलमानों के आन्तरिक मतभेद प्रकट हो गये जिससे यह स्पष्ट हो गया कि धनवान हिन्दू, बंगाल में मुस्लिम शासन को समाप्त करने के लिये किसी भी सीमा तक विदेशियों से साँठ-गाँठ कर सकते हैं।

इससे अँग्रेजों का आत्मविश्वास बढ़ा और वे यह मानने लगे कि षड्यन्त्रों तथा कुचक्रों द्वारा भारतीयों को परास्त करके अपने साम्राज्य की स्थापना की जा सकती है। युद्ध के बाद मीर जाफर बंगाल का नवाब अवश्य बन गया परन्तु उसकी सत्ता कम्पनी के सैनिक सहयोग पर टिकी हुई थी।

इस प्रकार, मीर जाफर कम्पनी के हाथों की कठपुतली बन गया। इस युद्ध से पहले, अँग्रेज एक व्यापारिक कम्पनी के मालिक थे और नवाब का कम्पनी पर नियंत्रण रहता था किंतु प्लासी के युद्ध ने कम्पनी पर नवाब के नियन्त्रण को समाप्त करके नवाब पर कम्पनी का नियंत्रण स्थापित कर दिया।

नवाब का शासन इतना कमजोर था कि आगे चलकर मीर जाफर अपने दीवान रायदुर्लभ और बिहार के नायब दीवान रामनारायण को किसी प्रकार की सजा नहीं दे सका क्योंकि वे कम्पनी के प्रति वफादार थे। कम्पनी की कृपा प्राप्त करके कोई भी व्यक्ति प्रशासन में उच्च से उच्च पद प्राप्त कर सकता था।

अँग्रेजों का राजनीतिक प्रभुत्व इस बात से स्पष्ट होता है कि बाद में मीर जाफर को पदच्युत करने में उन्हें किसी प्रकार का रक्तपात नहीं करना पड़ा। प्लासी के युद्ध के महत्त्व की चर्चा करते हुए इतिहासकार मेलीसन ने लिखा है-‘इतना तात्कालिक, स्थायी और प्रभावशाली परिणामों वाला कोई युद्ध नहीं हुआ।’  

एल्फ्रेड लायल ने लिखा है- ‘प्लासी में क्लाइव की सफलता ने बंगाल में युद्ध तथा राजनीति का एक अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र अँग्रेजों के लिए खोल दिया।’

इस युद्ध ने अँग्रेज व्यापारियों की आकांक्षाओं को जागृत कर दिया और वे भारत में साम्राज्य की स्थापना का स्वप्न देखने लगे। दक्षिण भारत में निजाम तथा मराठों की उपस्थिति के कारण साम्राज्य स्थापना का काम सरल नहीं था परन्तु बंगाल में ऐसी कोई शक्ति नहीं थी जो अँग्रेजों को रोक सके।

बंगाल को केन्द्र बनाकर वे सुगमता से मुगलों की राजधानी दिल्ली का द्वार खटखटा सकते थे। यह युद्ध मुगल सल्तनत के लिए भी घातक सिद्ध हुआ। एक व्यापारिक कम्पनी ने उसके एक सूबेदार को पदच्युत करके दूसरे व्यक्ति को सूबेदार नियुक्त कर दिया। इससे स्पष्ट हो गया कि मुगल बादशाह पूर्णतः शक्तिविहीन है, कोई भी शक्ति अपने बल पर उसके किसी सूबेदार को हटा सकती है और अपनी ओर से सूबेदार नियुक्त कर सकती है।

बंगाल की राजनीति में अब अन्य यूरोपीय शक्तियों का प्रभाव क्षीण हो गया। फ्रांसीसी, बंगाल की धरती पर फिर कभी पनप नहीं सके और डचों ने जब अँग्रेजों को चुनौती देने का साहस किया तो उन्हें बुरी तरह से असफल होना पड़ा। इस प्रकार, बंगाल में अँग्रेजों की सर्वोच्चता स्थापित हो गई।

बंगला कवि नवीनचंद्र सेन ने लिखा है- ‘भारत में अनंत अंधकारमयी रात्रि आरम्भ हो गई।’

(2.) आर्थिक महत्त्व

बंगाल भारत का सर्वाधिक समृद्ध प्रान्त था। बंगाल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को 24 परगनों की जागीर प्राप्त हुई। प्लासी के युद्ध के पूर्व कम्पनी को भारत में माल खरीदने के लिए इंग्लैण्ड से सोना और चाँदी लाने पड़ते थे। अब उसे भारत में ही इतना अधिक धन मिलने लग गया कि वह समस्त आवश्यक सामान क्रय कर सकती थी।

बंगाल से प्राप्त धन को कम्पनी ने चीन के व्यापार में लगाना आरम्भ कर दिया। इससे बंगाल का भयानक आर्थिक शोषण हुआ और बंगाल एक निर्धन प्रांत बन बया। प्लासी के युद्ध के बाद कम्पनी को तीन सूबों- बंगाल, बिहार और उड़ीसा में कर-मुक्त व्यवसाय करने की छूट मिल गई।

कम्पनी ने इसका लाभ उठाते हुए तीनों प्रान्तों के भीतरी भागों में अपनी कई फैक्ट्रियाँ तथा कोठियाँ स्थापित कीं। कलकत्ता में कम्पनी ने अपनी स्वतन्त्र टकसाल स्थापित की जहाँ से 19 अगस्त 1757 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पहला सिक्का जारी हुआ।

(3.) नैतिक महत्त्व

प्लासी के युद्ध से भारत की राजनीति में नैतिक पतन का नया युग आरम्भ हुआ। नवाब के विश्वस्त सेनापतियों ने युद्ध के मैदान में धोखा देकर नवाब को हरवा दिया। इस युद्ध के बाद बंगाल में धन की अंधी लूट मच गई। मीर जाफर ने बंगाल का नवाब बनने के बाद 1757 से 1760 ई. के मध्य अँग्रेजों को लगभग 3 करोड़ रुपये रिश्वत के रूप में दिये।

स्वयं क्लाइव को 30,000 पौंड प्राप्त हुए और बाद में 37,70,833 पौंड क्षतिपूर्ति के रूप में प्राप्त हुए (कुछ इतिहासकारों के अनुसार 16 लाख रुपये और कुछ के अनुसार 2 से 3 लाख पौंड के बीच प्राप्त हुए थे)। प्रत्येक अँग्रेज पदाधिकारी और सैनिक को भी अच्छी-खासी राशि प्राप्त हुई। अँग्रेजों को सन्तुष्ट करने के लिए मीर जाफर को अपने महल के सोने-चाँदी के बर्तन तक बेचने पड़े।

(4.) ऐतिहासिक महत्त्व

प्लासी की लड़ाई का अत्यंत ऐतिहासिक महत्व है। इस युद्ध के बाद प्रथम बार कम्पनी को राजनीतिक सत्ता प्राप्त हुई।

एडमिरल वाट्सन ने लिखा है- ‘प्लासी के युद्ध में अँग्रेजों की विजय कम्पनी के लिये नहीं अपितु सामान्यतः ब्रिटिश राज्य के लिये महत्व की थी।’

इस लड़ाई ने बंगाल, और अंततोगत्वा समस्त भारत पर ब्रिटिश प्रभुत्व का मार्ग प्रशस्त किया। उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारतीय साम्राज्य के प्रमुख दावेदार के रूप में स्थापित कर दिया।

ब्रिटिश इतिहासकारों एडवर्ड थॉम्पसन और जी. टी. गैरेट ने लिखा है- ‘क्रांति करना संसार में सबसे लाभदायक धंधा समझा जाता था। अँग्रेजों के मस्तिष्क में ऐसा स्वर्ण मोह भर गया था जैसा उस युग के बाद कभी नहीं देखा गया था जब कोर्टेस और पिजारो के युग के स्पेनवासी सोने के लिये उन्मादग्रस्त हो गये थे। जब तक बंगाल को पूरी तरह चूस नहीं लिया गया, तब तक वहाँ शांति स्थापित नहीं हो सकी।’

(5.) भूमि, न कि व्यापार

विगत डेढ़ सौ वर्षों से कम्पनी भारत में ‘व्यापार, न कि भूमि’ की नीति पर चल रही थी किंतु 23 जून 1757 के प्लासी युद्ध के पश्चात् ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत में प्रथम बार राजनीतिक सत्ता प्राप्त हुई। इसके बाद अँग्रेजों ने भारत में अपनी नीति ‘भूमि, न कि व्यापार’ कर दी। इस युद्ध के केवल 8 वर्ष बाद ही, 1765 ई. के बक्सर युद्ध के पश्चात् हुई इलाहाबाद संधि के उपरांत ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में पूर्णतः राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो गई।

मीर जाफर और अँग्रेज

प्लासी के युद्ध के बाद 29 जून 1757 को क्लाइव ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब घोषित किया और स्वयं सेना लेकर मुर्शिदाबाद चला गया। बंगाल की जनता इस युद्ध एवं परिवर्तन से पूरी तरह उदासीन थी। मीर जाफर अयोग्य व्यक्ति था। क्लाइव ने शीघ्र ही यह प्रकट कर दिया कि शासन की वास्तविक शक्ति उसके पास है और मीर जाफर नाममात्र का नवाब है। क्लाइव ने जगत सेठ के माध्यम से बंगाल में हुए सत्ता-परिवर्तन के लिए मुगल बादशाह की स्वीकृति भी मँगवा ली।

मीर जाफर के राज्याभिषेक के अवसर पर क्लाइव ने कहा था कि अँग्रेज वापस कलकत्ता चले जायेंगे और और अपना ध्यान व्यापार की ओर केन्द्रित करेंगे परन्तु वह नवाब तथा शासनतन्त्र पर अपना नियंत्रण रखना चाहता था। इसीलिए उसने समस्त महत्त्वपूर्ण पदों पर ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त करवाया जो अँग्रेजों के प्रति निष्ठावान हों।

उसने षड्यन्त्रकारी रायदुर्लभ को मन्त्री पद पर नियुक्त करवाया। क्लाइव ने रायदुर्लभ के साथ अलग से एक गुप्त समझौता भी किया जिसमें रायदुर्लभ ने क्लाइव के समस्त दावों को समर्थन देने का आश्वासन दिया। रायदुर्लभ, नवाब के विरुद्ध निरन्तर षड्यन्त्र करता रहा।

नवाब ने रायदुर्लभ को हटाना चाहा किंतु क्लाइव के हस्तक्षेप के कारण नवाब कुछ नहीं कर सका। बिहार के नायब सूबेदार रामनारायण ने भी क्लाइव के साथ अलग से समझौता कर रखा था। वह शासन चलाने के लिये क्लाइव से निर्देश प्राप्त करता था।

उसने नवाब के आदेशों का कभी सम्मान नहीं किया। नवाब उसके विरुद्ध भी कोई कार्यवाही नहीं कर सका। शासनतंत्र पर नियंत्रण स्थपित होने के बाद क्लाइव ने बंगाल के भारतीय अधिकारियों को निर्देश भिजवाये कि वे अपने-अपने क्षेत्रों से फ्रांसीसियों को पकड़कर अँग्रेजों को सौंप दें।

इन्हीं दिनों नवाब के दो जमींदारों ने विद्रोह किये। क्लाइव ने नवाब को निर्देश दिया कि वह तुरन्त विद्रोह को दबाये। इसके लिए क्लाइव ने 500 सैनिक भी दिये। इस सहायता के बदले में क्लाइव ने बंगाल में शोरे के उत्पादन का एकाधिकार प्राप्त कर लिया। केवल 15 प्रतिशत शोरा नवाब के लिए छोड़ा गया। शोरे का उपयोग बारूद बनाने में किया जाता था। इस कारण नवाब की सेना और भी कमजोर हो गई।

अलीगौहर का आक्रमण

शाहजादा अलीगौहर (मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय) इस समय अवध में भटक रहा था। बंगाल, बिहार और उड़ीसा की अव्यवस्था का हाल सुनकर उसने इन प्रान्तों में अपना भाग्य आजमाने का प्रयास किया। उसे अवध के नवाब से सैनिक सहायता भी मिल गई। 3 अप्रैल 1759 को उसने पटना पर आक्रमण किया।

मीर जाफर के कुछ असंतुष्ट सरदार गुप्त रूप से शाहजादे से मिल गये। पटना के नायब सूबेदार रामनारायण ने अलीगौहर को मार भगाया। उस समय क्लाइव अपनी सेना के साथ युद्धस्थल के निकट ही था, उसने विजय का सारा श्रेय स्वयं ले लिया। उसका मानना था कि शाहजादा ब्रिटिश सेना के भय से भाग खड़ा हुआ।

इसके लिए मीर जाफर ने क्लाइव को व्यक्तिगत जागीर प्रदान की। 1760 ई. में अलीगौहर ने पुनः बिहार पर आक्रमण किया परन्तु इस बार भी वह असफल रहा। अब अँग्रेज मीर जाफर के रक्षक कहलाये जाने लगे।

डचों पर आक्रमण (बेदरा का युद्ध)

डच व्यापारियों ने बंगाल प्रांत में पटना, ढाका, पीपली, चिन्सुरा तथा कासिम बाजार के निकट फैक्ट्रियाँ स्थापित कर रखी थीं। बंगाल प्रान्त के भीतरी भागों में भी उनकी कई शाखाएँ थी। बड़ानगर तथा चिन्सुरा के प्रदेश तो उनके अधिकार में ही थे।

जब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर आक्रमण किया था तब उसने डचों से सहायता माँगी थी परन्तु डचों ने नवाब को सहायता नहीं दी। उस समय अँग्रेजों ने भी डचों से सहायता की याचना की थी परन्तु डचों ने उन्हें भी सहयोग नहीं दिया था। जब अँग्रेजों ने फुल्टा द्वीप में शरण ली तब डचों ने अँग्रेजों को सहायता पहँुचाई।

जब मीर जाफर की सहायता से बंगाल में फ्रांसीसियों के प्रभाव को क्षीण कर दिया गया तो डचों को अपने भविष्य की चिन्ता लगी। अँग्रेज लेखकों ने आरोप लगाया है कि डचों ने मीर जाफर से साँठ-गाठ कर ली। यह आरोप सत्य प्रतीत नहीं होता। डचों को बंगाल से बाहर निकालने के लिए अँग्रेजों को किसी बहाने की आवश्यकता थी।

अतः अँग्रेजों ने डचों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही आरम्भ कर दी। 25 नवम्बर 1759 को बेदरा नामक स्थान पर दोनों पक्षों में युद्ध लड़ा गया जिसमें डच हार गये और उन्होंने सन्धि का प्रस्ताव भिजवाया। इसी समय मीर जाफर का पुत्र मीरन अपनी सेना लेकर डचों को सजा देने आ पहुँचा।

क्लाइव की मध्यस्थता से डचों और मीरन के बीच एक सन्धि हुई जिसके अनुसार डचों ने भविष्य में युद्ध नहीं करने तथा नई सैनिक भर्ती और किलेबन्दी नहीं करने का वचन दिया। उन्होंने अपनी फैक्ट्रियों की सुरक्षा के लिये केवल 125 यूरोपियन सैनिकों को रखना स्वीकार कर लिया।

अँग्रेजी सत्ता की दिशा में प्लासी के युद्ध के बाद बेदरा का युद्ध, दूसरी महत्त्वपूर्ण सफलता थी। इस विजय से बंगाल में अँग्रेजों की धाक में और अधिक वृद्धि हो गई। फ्रांसीसियों की भाँति डचों की महत्त्वाकांक्षाएं भी पूर्ण रूप से कुचल दी गईं। अब बंगाल में अँग्रेजों की सर्वोच्चता को चुनौती देने वाली कोई शक्ति नहीं बची थी।   

बंगाल में प्रशासनिक अव्यवस्था

मीर जाफर की अयोग्यता, अदूरदर्शिता तथा क्रोधी स्वभाव के कारण बंगाल में प्रशासन की व्यवस्था बिगड़ती जा रही थी। मीर जाफर को न तो अपने ऊपर भरोसा था और न वह अपने सहयोगियों पर विश्वास करता था। राजकोष पहले से ही रिक्त था। मराठे, नवाब से निरन्तर चौथ वसूली कर रहे थे। क्लाइव भी मराठों से उलझना नहीं चाहता था। प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण भू-राजस्व की पूरी वसूली नहीं हो पाती थी। कम्पनी तथा उसके अधिकारी नवाब से निरन्तर धन की माँग कर रहे थे।

कर्नल मैल्लेसन ने लिखा है– ‘कम्पनी के अधिकारियों का एक ही उद्देश्य था कि जितना हो सके उतना हड़प लें, मीर जाफर को सोने की बोरी के रूप में इस्तेमाल करें और जब भी इच्छा हो उसमें अपने हाथ डालें।’

बंगाल के नवाब को शिकंजे में आया देखकर पूरी कम्पनी पर ही लालच का भयंकर भूत सवार हो गया। इस धारणा के आधार पर कि कामधेनु मिल गई है और बंगाल की सम्पदा अक्षय है, कम्पनी के निदेशकों ने बंगाल में अपने अधिकारियों को निर्देश दिये कि वे बम्बई और मद्रास प्रेसीडेंसियों का खर्च उठायें और उसकी आय से कम्पनी के भारतीय निर्यातित माल को खरीदें।

नवाब कम्पनी को निर्धारित किश्तें भी नहीं चुका पा रहा था, जबकि अनिर्धारित माँगें बढ़ती जा रही थीं। ऐसी स्थिति में नवाब अपने सैनिकों को वेतन भी नहीं चुका पाया। कम्पनी के दबाव पर नवाब को बर्दवान, नदिया तथा हुगली के क्षेत्रों से राजस्व वसूली का अधिकार तब तक के लिए कम्पनी को सौंपना पड़ा जब तक कि उसकी किश्तों के बराबर धन की वसूली नहीं हो जाये। ब्रिटिश इतिहासकार पर्सिवल स्पीयर ने इसे खुली और बेशर्म लूट का काल बताया है। वस्तुतः जिस समृद्धि के लिये बंगाल प्रसिद्ध था, उसे तेजी से नष्ट किया जा रहा था।

मीर जाफर को हटाया जाना

25 फरवरी 1760 को क्लाइव, हॉलवेल को कम्पनी का प्रभार सौंपकर स्वदेश लौट गया। जुलाई 1760 में वेन्सीटार्ट को फोर्ट विलियम का गवर्नर बनाकर कलकत्ता भेजा गया। कलकत्ता कौंसिल के 16 सदस्यों में से अनेक सदस्य उससे वरिष्ठ थे। अतः उन्हें वेन्सीटार्ट की नियुक्ति पसन्द नहीं आई।

कलकत्ता कौंसिल के अधिकांश सदस्य धनलोलुप तथा भ्रष्ट थे। ऐसे लोगों के मध्य वेन्सीटार्ट ठीक ढंग से कार्य नहीं कर सका। स्थिति उस समय और भी विषम हो गई जब उसके तीन समर्थक सदस्यों को कौंसिल की सदस्यता से हटा दिया गया और उनके स्थान पर उसके विरोधियों को नियुक्त किया गया।

वेन्सीटार्ट के प्रमुख विरोधी एलिस को कम्पनी की पटना स्थित फैक्ट्री का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। कम्पनी के पदाधिकारियों में जिस तेजी के साथ परिवर्तन किया जा रहा था, उससे मीर जाफर के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न होने लगीं।

शाहजादा अलीगौहर का भय अब भी बना हुआ था, क्योंकि कुछ स्थानीय जमींदार और सरदार उसे गुप्त सहयोग दे रहे थे। मराठे भी चौथ वसूली के नाम पर निरन्तर बंगाल में आते रहते थे। अँग्रेजों ने नवाब को इन समस्त संकटों में बराबर सहायता दी परन्तु उन्हें सदैव यह शिकायत बनी रही कि नवाब और उसके पुत्र मीरन की तरफ से उन्हें पूरा सहयोग नहीं मिलता है।

जब मीर जाफर ने अँग्रेजों के समर्थक रायदुर्लभ को मंत्री पद से हटा दिया तो अँग्रेजों का असन्तोष और बढ़ गया। 3 जुलाई 1760 को किसी ने मीरन की हत्या कर दी जिससे अँग्रेजों को नये नायब नवाब की नियुक्ति का अवसर मिल गया। उन्होंने मीर जाफर के दामाद मीर कासिम को इस पद पर नियुक्त करने का निश्चय किया जो उनके निर्देर्शों पर चलने और उन्हें काफी भेंट-उपहार देने के लिये तैयार था।

उसने अँग्रेज अधिकारियों को ढेर सारे बहुमूल्य उपहार दिये जिससे अँग्रेज अधिकारी प्रसन्न हो गये और उन्होंने मीर जाफर को पदच्युत करके मीर कासिम को नया नवाब बनाने का षड्यन्त्र रचा, ताकि उन्हें और धन की प्राप्ति हो सके। मीर जाफर की जगह मीर कासिम को नवाब बनाये जाने की घटना को बंगाल के इतिहास में 1760 ई. की रक्तहीन क्रांति कहते हैं। मीर जाफर को नवाब पद से हटाये जाने के अनेक कारण थे-

(1.) कम्पनी के अधिकारियों तथा कर्मचारियों को लगातार रिश्वत एवं उपहार देते रहने से मीर जाफर का कोष रिक्त हो गया था। वह न तो कम्पनी को वार्षिक किश्त चुका पाया और न अपने सैनिकों को वेतन दे सका।

(2.) कम्पनी के समस्त कर्मचारियों को नवाब से भेंट-उपहार लेने की आदत हो गई थी। जब नवाब उन्हें धन नहीं दे सका तो वे नवाब से नाराज हो गये और किसी दूसरे व्यक्ति को नवाब बनाने की सोचने लगे।

(3.) अँग्रेजों की लूट-खसोट से मीर जाफर भी तंग आ चुका था। इसलिये वह अँग्रेजों के चंगुल से मुक्ति पाने का उपाय सोचने लगा।

(4.) अपने युवा पुत्र मीरन की हत्या से मीर जाफर को भारी सदमा पहुँचा जिससे वह शासन की तरफ विशेष ध्यान नहीं दे पा रहा था। इस कारण बंगाल में व्यापार-वाणिज्य ठप्प होने लगा था और शान्ति-व्यवस्था लड़खड़ाने लगी थी।

(5.) अँग्रेजों को विश्वास था कि मीर जाफर के स्थान पर जिसे भी नया नवाब बनाया जायेगा, उससे उन्हें पर्याप्त धन और कम्पनी को अधिक सुविधाएँ मिलेंगी।

इस समय दक्षिण भारत में फ्रांसीसियों के विरुद्ध लड़े जाने वाले युद्ध के कारण अँग्रेजों का कोष खाली हो चुका था और मद्रास के अधिकारी बंगाल में नियुक्त अधिकारियों से लगातार धन की माँग कर रहे थे। बिहार में नियुक्त अँग्रेजी सेना को वेतन नहीं चुकाया जा सका थ। इस कारण वहाँ के सैनिक बगावत कर सकते थे।

इस आर्थिक संकट से उबारने के लिये कम्पनी को मीर कासिम ही दिखलाई पड़ा। क्योंकि उसके पास काफी धन था और वह नवाब बनने की इच्छा रखता था। ऐसी स्थिति में 27 सितम्बर 1760 को वेन्सीटार्ट ने मीर कासिम के साथ एक गुप्त समझौता कर लिया, जिसमें मीर कासिम को नवाब बनाने का वचन दिया गया। इसके बदले में मीर कासिम ने अँग्रेजों को कई वचन दिये-

(1.) मीर कासिम हर हाल में अँग्रेजों के प्रति निष्ठा रखेगा।

(2.) मीर कासिम अँग्रेजी सेना के व्यय के लिए उन्हें बर्दवान, मिदनापुर और चिटगाँव के प्रदेश देगा।

(3.) अँग्रेजों को, सिलहट में उत्पादित सीमेण्ट का आधा भाग तीन वर्ष तक खरीदने का अधिकार होगा।

(4.) मीर जाफर में, कम्पनी की जो बकाया धनराशि है उसे मीर कासिम चुकायेगा।

(5.) दक्षिण में कम्पनी द्वारा लड़े जा रहे युद्धों के लिये मीर कासिम 5 लाख रुपये की सहायता देगा।

(6.) मीर कासिम कलकत्ता कौंसिल के सदस्यों को 4 लाख 52 हजार पौंड उपहार में देगा। इस राशि में से 50 हजार पौंड वेन्सीटार्ट को, 27 हजार पौंड हॉलवेल को तथा 25-25 हजार पौंड प्रत्येक सदस्य को दिये जाने थे।

(7.) इस संधि के बदले में ब्रिटिश सेना मीर कासिम को बंगाल की शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग देगी।

इस समझौते को गोपनीय रखा गया। इस कारण मीर जाफर को इसकी भनक नहीं लगी। अक्टूबर 1760 ई. में वेन्सीटार्ट सेना सहित मुर्शिदाबाद गया और नवाब का महल घेर लिया। वेन्सीटार्ट ने नवाब से गद्दी छोड़ने के लिये कहा। इस पर नवाब अत्यंत क्रोधित हुआ किंतु जान बचाने के लिये उसे वेन्सीटार्ट की बात माननी पड़ी।

उसने निर्वाह भत्ता तथा सुरक्षा का आश्वासन मिलने पर मीर कासिम के पक्ष में गद्दी त्याग दी। इसके बाद वह कलकत्ता चला गया और वहीं रहने लगा। मीर कासिम को नवाब घोषित कर दिया गया।

मीर जाफर को गद्दी से उतारने के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए कलकत्ता कौंसिल ने कहा- ‘नवाब मीर जाफर क्रोधी, क्रूर, लालची और विलासी प्रवृत्ति का था तथा उसके निकट के व्यक्ति पूर्णतः दास, खुशामदी तथा उसकी बुराइयों की पूर्ति के साधन बने हुए थे। ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि उसने बिना किसी कारण के विभिन्न स्तर के व्यक्तियों का खून बहाया है।’

कलकत्ता कौंसिल के ये आरोप बेबुनियाद तथा तथ्य से परे हैं। सत्य तो यह है कि कम्पनी के अधिकारियों ने उसे स्वतंत्र रूप से शासन चलाने का अवसर ही नहीं दिया। 1765 ई. में क्लाइव ने स्वयं स्वीकार किया कि नवाब पर लगाये गये आरोप असत्य थे।

हॉलवेल ने नवाब पर जिन अमानवीय कृत्यों, क्रूरताओं तथा हत्याओं के आरोप लगाये हैं, उसमें लेशमात्र भी सत्य नहीं है। वस्तुतः मीर जाफर को तख्त से हटाने के लिए किसी बहाने की आवश्यकता थी और इसके लिए उस पर मिथ्या दोष मंढे़ गये। कुछ इतिहासकारों ने इस समस्त काण्ड के लिए मीर कासिम को दोषी ठहराया है।

कुछ अन्य इतिहासकारों का मत है कि मीर कासिम को दोषी ठहराना उचित नहीं है क्योंकि विश्वासघाती मीर जाफर को विश्वासघात का फल मिलना ही था। अँग्रेजों ने उसे नवाब बनाकर भारी भूल की थी, अँग्रेजों को जब अपनी भूल का ज्ञान हुआ तो उन्होंने मीर जाफर को हटाकर मीर कासिम को नवाब बनाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – अंग्रेज जाति का भारतीय शक्तियों से संघर्ष

बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

बक्सर युद्ध

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

बसीन की संधि

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

मराठा शक्ति का पतन

बक्सर युद्ध

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बक्सर युद्ध

बक्सर युद्ध में भारत की तीन प्रमुख शक्तियों- मुगल बादशाह शाहआलम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के नवाब मीर कासिम के भाग्य का फैसला हुआ।

नवाब मीर कासिम

मीर कासिम के प्रारम्भिक जीवन के बारे में विशेष जानकारी नहीं मिलती। उसका जन्म निश्चय ही किसी शासक परिवार में हुआ होगा, तभी मीर जाफर ने उसे अपना दामाद बनाया होगा। जब मीर जाफर बंगाल का नवाब बना तो मीर कासिम ने पूर्णिया और रंगपुर के फौजदार के रूप में अपनी प्रतिभा का अच्छा परिचय दिया।

वह योग्य सेनापति था। मीर जाफर के पुत्र मीरन की मृत्यु के बाद मीर कासिम की महत्त्वाकांक्षा जाग उठी और वह बंगाल का नवाब बनने का स्वप्न देखने लगा। अन्त में वेन्सीटार्ट के साथ साँठगाँठ करके वह बंगाल का नवाब बनने में सफल रहा।

मीर कासिम की समस्याएँ

नवाब बनते ही मीर कासिम के सामने समस्याएं मुँह बाये खड़ी थीं। उसकी प्रमुख समस्याएं इस प्रकार थीं-

(1.) धन की समस्या

अँग्रेजों से हुई संधि के अनुसार मीर कासिम द्वारा अंग्रेजों को बहुत-सा धन दिया जाना था। शासन व्यवस्था को सुधारने तथा सेना का पुनर्गठन करने के लिए भी धन की आवश्यकता थी।

(2.) सेना के पुनर्गठन की समस्या

मीर कासिम ने सेना की स्थिति को सुधारने की आवश्यकता को भी अनुभव किया, ताकि वह बाह्य आक्रमणों और आन्तरिक उपद्रवों का सामना करने में सक्षम सिद्ध हो सके। बंगाल को अब भी अली गौहर के आक्रमण, मराठों की लूट-खसोट तथा अवध के नवाब की विस्तारवादी नीति का भय बना हुआ था। वीरभूम के जमींदार तथा बिहार के नायब-सूबेदार जैसे आन्तरिक शत्रुओं का दमन भी करना था।

(3.) अँग्रेजों के नियंत्रण से मुक्त होने की समस्या

मीर कासिम अपने श्वसुर से गद्दारी करके तथा अँग्रेजों से कई प्रकार के वायदे करके नवाब बना था किंतु वह शीघ्र ही समझ गया कि यदि नवाबी करनी है तो उसे अँग्रेजों के नियंत्रण से मुक्ति पानी होगी।

समस्याओं के निराकरण के प्रयास

मीर कासिम ने समस्याओं से छुटकारा पाने के लिये कई कदम उठाये जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

(1.) राजधानी का परिवर्तन

मीर कासिम अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से हटाकर मुंगेर ले गया जो कलकत्ता से काफी दूर था। यहाँ वह कम्पनी के अधिकारियों के नियंत्रण से मुक्त होकर अधिक स्वतंत्रता से काम कर सकता था।

(2.) बारूद तथा तोप बनाने के कारखाने की स्थापना

मीर जाफर ने मुंगेर में बारूद बनाने तथा अच्छी तोपें बनाने का कारखाना स्थापित किया।

(3.) सेना का प्रशिक्षण

मीर जाफर ने अपनी सेना को यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित करने के लिये फ्रांसीसी तथा अमरीकी अधिकारियों को नियुक्त किया।

(4.) जमींदारों एवं अधिकारियों का दमन

मीर कासिम ने उन समस्त जमींदारों तथा अधिकारियों का दमन किया, जो नवाब की अवज्ञा करते थे और ठीक प्रकार से कर नहीं चुकाते थे। उसने बिहार के नायब सूबेदार रामनारायण को पदच्युत करके उसकी सम्पत्ति जब्त कर ली तथा उसे बंदी बना लिया।

(5.) अवध के नवाब से समझौता

मीर कासिम ने अवध के नवाब से समझौता करके सीमावर्ती क्षेत्रों में शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित की।

(6.) धन की व्यवस्था

अँग्रेजों को पुरानी देनदारी चुकाने, कम्पनी के अधिकारियों को उपहार देने, शासन चलाने तथा सेना का वेतन चुकाने के लिये धन जुटाने हेतु मीर कासिम ने कई उपाय किये। उसे जिस किसी व्यक्ति के पास अधिक धन होने की जानकारी मिली उसे मीर जाफर का समर्थक ठहराकर उसके धन को जब्त कर लिया।

पुराने राजकीय अधिकारियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर उनकी सम्पत्ति को जब्त कर लिया। राजस्व विभाग में विश्वस्त व्यक्तियों को नियुक्त किया। सरकारी खर्चे में कमी करने के लिये अनेक कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। जनता पर नये कर लगाये। इन प्रयासों से राज्य की आय में काफी वृद्धि हो गई।

अँग्रेजों के साथ झगड़ा

अँग्रेजों के साथ झगड़ा उठ खड़े होने के कई कारण थे। इनमें से अधिकांश कारण अँग्रेजों की तरफ से खड़े किये गये थे। इनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

(1.) अलीगौहर को बादशाह के रूप में मान्यता

1761 ई. के प्रारम्भ में अली गौहर (शाहआलम द्वितीय) ने अँग्रेजों से बातचीत आरम्भ की और स्वयं को दिल्ली के सिंहासन पर बैठाने में उनकी सहायता माँगी। अँग्रेजों ने उसे पटना में आमन्त्रित करके शाही सम्मान के साथ स्वागत किया। उन्होंने मीर कासिम को विवश किया कि वह शाहआलम को बादशाह माने।

अँग्रेजों ने मीर कासिम से शाहआलम को 12 लाख रुपये नजराने के भी दिलवाये। अँग्रेजों ने शाहआलम के नाम से सिक्के भी ढलवाये। अँग्रेजों की इस नीति के कारण मीर कासिम की स्थिति और भी कमजोर हो गई। उसे भय हुआ कि कहीं उससे नवाबी न छीन ली जाये। इस घटना से मीर कासिम और अँग्रेजों के सम्बन्धों में तनाव आ गया।

(2.) कम्पनी के अधिकारियों एवं गोमाश्तों की बदमाशी

प्लासी के युद्ध के बाद से बंगाल में कम्पनी के कर्मचारियों को व्यापार करने की और अधिक स्वतंत्रता मिल गई थी। वे लोग बिना सीमा-शुल्क चुकाये धड़ल्ले-से व्यापार करते थे। प्रान्त के भीतरी भागों में भी अँग्रेज अधिकारियों ने सैकड़ों कारखाने स्थापित कर लिये थे।

इन कारखानों में नमक, सुपारी, घी, चावल, माँस, मछली, चीनी, तम्बाकू, अफीम आदि विविध वस्तुओं को खरीदा और बेचा जाता था। कारखानों की देखभाल के लिए प्रायः भारतीयों को गोमाश्ता (प्रतिनिधि) नियुक्त किया जाता था। अँग्रेज मालिकों की देखा-देखी इन गोमाश्ताओं ने भी बिना शुल्क चुकाये व्यापार करना आरम्भ कर दिया।

इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। एक तरफ तो नवाब की आय घट गई और दूसरी तरफ भारतीय व्यापारियों के लिए कारोबार चलाना कठिन हो गया। क्योंकि उन्हें सीमा-शुल्क चुकाना पड़ता था, वे अँग्रेज गोमाश्ताओं की तुलना में सस्ती दर पर सामान बेचने में असमर्थ थे। इस कारण अँग्रेजों तथा उनके गोमाश्ताओं का व्यापार बढ़ता चला गया और भारतीय व्यापारियों का व्यापार घटता चला गया।

(3.) नवाब द्वारा भारतीय व्यापारियों से चुंगी हटाने का निर्णय

मीर कासिम ने कम्पनी और उसके अधिकारियों तथा गोमाश्ताओं के व्यापार पर अंकुश लगाने का प्रयास किया। उसने फोर्ट विलियम के गवर्नर वेन्सीटार्ट से शिकायत की। वेन्सीटार्ट स्वयं मुंगेर गया और उसने मीर कासिम से व्यक्तिगत विचार-विमर्श किया।

वह इस बात पर सहमत हो गया कि अब से कम्पनी अपने सामान पर 9 प्रतिशत शुल्क अदा करेगी और भारतीय व्यापारी 25 से 30 प्रतिशत शुल्क देंगे परन्तु कलकत्ता कौंसिल ने वेन्सीटार्ट के प्रस्ताव को रद्द कर दिया। इससे निराश होकर मीर कासिम ने भारतीय व्यापारियों को भी निःशुल्क व्यापार करने की अनुमति दे दी।

मीर कासिम के इस कदम से अँग्रेज अधिकारी अत्यधिक नाराज हुए, क्योंकि इससे उनका विशेषाधिकार समाप्त हो गया। अब उन्हें भारतीय व्यापारियों से बराबरी के स्तर पर स्पर्द्धा करनी पड़ी जिसमें वे बुरी तरह से पिटने लगे। उन्हें लाभ के स्थान पर हानि होने लगी।

उन्होंने नवाब से अपना आदेश वापिस लेने के लिये कहा परन्तु नवाब ने उनकी बात को ठुकरा दिया। इस व्यापारिक संघर्ष से पुनः यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि बंगाल का वास्तविक शासक कौन है, ईस्ट इण्डिया कम्पनी अथवा मीर कासिम?

(4.) नवाब के खर्चे पर रखी गई सेना का नवाब के विरुद्ध प्रयोग

मीर कासिम ने कम्पनी पर आरोप लगाया कि 1760 ई. की सन्धि के अनुसार नवाब की सहायता के लिए जिस अँग्रेजी सेना को रखने तथा उसके व्यय के लिए तीन जिले प्रदान किये गये थे, वह सेना उसी के विरुद्ध काम में लाई जा रही है। अतः कम्पनी उन जिलों को वापिस लौटा दे और उन जिलों से जो राजस्व वसूल किया है, वह भी लौटा दे। इस आदेश से दोनों पक्षों में और अधिक तनाव उत्पन्न हो गया।

ऐसी स्थिति में कलकत्ता कौंसिल ने अपने दो सदस्यों- हे और अमायत को नवाब से वार्त्ता करने के लिये भेजा। नवाब ने कलकत्ता कौंसिल के प्रस्ताव को ठुकरा कर हे को बन्दी बना लिया। इस पर एलिस ने पटना पर आक्रमण करके बाजार को लूट लिया तथा कई लोगों को मार दिया। नवाब के आदमियों के साथ हुई हाथापाई में अमायत मारा गया। मीर कासिम ने सेना भेजकर पटना पर पुनः अधिकार कर लिया तथा एलिस और उसके साथियों को बन्दी बना लिया।

बक्सर युद्ध (1764 ई.)

ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा नवाब मीर कासिम दोनों ही एक दूसरे के विरुद्ध आक्रामक कार्यवाहियाँ कर रहे थे इस कारण दोनों के बीच निर्णायक युद्ध की परिस्थितियां तैयार हो गईं। ऐसा संभव नहीं था कि अँग्रेज बिना खून चूसे रह जायें। उन्हें धन की इतनी अधिक भूख थी कि उसे पाने के लिये वे किसी भी हद तक गिर सकते थे। नवाब उनकी इस अभिलिप्सा में बाधा उत्पन्न कर रहा था इसलिये कलकत्ता कौंसिल ने उसे नवाब के पद से हटाने का निर्णय किया।

मीर कासिम की पराजय

जून 1763 में मेजर एडम्स के नेतृत्व में अँग्रेज सेना मुंगेर की तरफ बढ़ी। 19 जुलाई 1763 को कटवा के निकट मीर कासिम और ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना में युद्ध हुआ जिसमें नवाब की सेना परास्त हो गई। इसके बाद तीन और युद्ध लड़े गये। उन समस्त युद्धों में मीर कासिम परास्त हुआ। अंत में नवाब पटना की तरफ भाग गया। पटना में उसने अँग्रेज बन्दियों और भारतीयों बन्दियों जिनमें राजा रामनारायण, सेठ बन्धु आदि प्रमुख थे, को मौत के घाट उतार दिया और स्वयं अवध चला गया।

मीर जाफर को पुनः नवाबी

मीर कासिम के भाग जाने से जुलाई 1763 में बंगाल के नवाब की गद्दी पुनः खाली हो गई। कलकत्ता कौंसिल ने मीर जाफर के साथ नया समझौता करके उसे दूसरी बार नवाब बनाया। मीर जाफर ने अँग्रेजों की समस्त अनुचित मांगें स्वीकार कर लीं। कम्पनी को जो कुछ हानि हुई थी, उसे भी पूरा करने का वचन दिया।

बंगाल में अराजकता

मीर जाफर पहली बार अपने श्वसुर सिराजुद्दौला से गद्दारी करके नवाब बना था उस समय भी उसने बंगाल का खजाना अँग्रेज अधिकारियों पर लुटा दिया था। दूसरी बार वह अपने जामाता को अपदस्थ किये जाने के बाद नवाब बना। इस बार भी कम्पनी के अधिकारियों ने उसे चूसने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इससे बंगाल में अराजकता मच गई।

इस अराजकता को देखकर स्वयं क्लाइव ने लिखा है- ‘मैं केवल यही कहूंगा कि अराजकता, अस्तव्यस्त्ता, घूसखोरी, भ्रष्टाचार और लूट-खसोट का ऐसा दृश्य बंगाल के अतिरिक्त किसी अन्य देश में कभी देखा या सुना नहीं गया। न ही इस प्रकार की और इतनी बड़ी राशि, इतने अन्यायपूर्ण और लूट खसोट के तरीके से कभी प्राप्त की गई। जब से मीर जाफर को फिर से सूबेदारी दी गई है तब से तीनों प्रांत- बंगाल, बिहार और उड़ीसा जिनसे 30 लाख पौण्ड का निबल राजस्व प्राप्त होता है, कम्पनी के कर्मचारियों के पूर्ण प्रबंध में हैं और असैनिक तथा सैनिक दोनों प्रकार के कर्मचारियों ने हर प्रभावशाली और महत्त्वपूर्ण व्यक्ति, नवाब से लेकर सबसे छोटे जमींदार तक से पैसे ऐंठे हैं।’

क्लाइव का अनुमान था कि कम्पनी और उसके कर्मचारियों ने मीर जाफर से तीन करोड़ रुपये से अधिक की रकम ऐंठी थी।  क्लाइव द्वारा की गई यह अभिव्यक्ति, ग्लानि-युक्त स्वीकरोक्ति समझी जानी चाहिये क्योंकि बंगाल में नवाब से रुपये ऐंठने का खेल उसी ने आरम्भ किया था।

शुजाउद्दौला की गद्दारी

मीर कासिम ने बंगाल से भाग आने के बाद, अवध के नवाब वजीर शुजाउद्दौला की सहायता प्राप्त करने का निश्चय किया। इन दिनों शुजाउद्दौला मुगल बादशाह शाहआलम के साथ इलाहाबाद में था। शुजाउद्दौला और मीर कासिम के मध्य लम्बे समय से अच्छे सम्बन्घ नहीं थे।

शुजाउद्दौला ने अगस्त 1763 में भगोड़े मीर कासिम के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये अँग्रेजों को सहायता देने का प्रस्ताव भी रखा था परन्तु जब मीर कासिम इलाहाबाद पहँुचा तो शुजाउद्दौला का विचार बदल गया। क्योंकि इस समय मीर कासिम के पास दस करोड़ रुपये मूल्य के जवाहरात थे। शुजाउद्दौला इस सम्पत्ति को हड़पना चाहता था।

इसके अलावा मीर कासिम की ओट में वह बंगाल तथा बिहार में अपना प्रभाव बढ़ाने की योजना बनाने लगा। शुजाउद्दौला ने एक ओर तो मीर कासिम का स्वागत किया और दूसरी ओर अँग्रेजों से भी बातचीत जारी रखी। लगभग 6 माह का समय निकल गया। जब अँग्रेजों ने शुजाउद्दौला का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया, तब उसने अँग्रेजों से युद्ध करने का निर्णय लिया।

मुगल बादशाह शाहआलम भी उसके साथ हो गया। बादशाह शाहआलम ने भी दोहरी चाल चली। एक ओर तो वह शुजाउद्दौला के साथ अँग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करने के लिये चल पड़ा और दूसरी ओर उसने गुप्त रूप से अँग्रेजों को लिख भेजा कि वह विवशता में नवाब शुजाउद्दौला का साथ दे रहा है।

शुजाउद्दौला तथा मीर कासिम की पराजय

अँग्रेजों ने बनारस के पूर्व में स्थित बक्सर में शुजाउद्दौला की सेना से लड़ने का निर्णय लिया। सेनापति मुनरो लगभग 8,000 सैनिकों के साथ बक्सर पहुँच गया। शुजाउद्दौला की सेना भी वहाँ पहुँच गई। अँग्रेजों ने युद्ध आरम्भ होने से पहले शुजाउद्दौला के कुछ अधिकारियों- असद खाँ, जैनउल अबीदीन, गुलाम हुसैन खाँ, रोहतास के गवर्नर साहूमल आदि को घूस देकर अपनी तरफ मिला लिया।

23 अक्टूबर 1764 को बक्सर में दोनों पक्षों के मध्य संघर्ष हुआ। तीन घण्टे के युद्ध में अवध की सेना बुरी तरह से परास्त होकर मैदान से भाग खड़ी हुई। युद्ध में अँग्रेजी सेना के 825 सैनिक मारे गये जबकि शुजाउद्दौला के लगभग दो हजार सैनिक मारे गये। इस प्रकार बक्सर युद्ध में शुजाउद्दौला की पराजय हो गई। शुजाउद्दौला भी भाग निकला। अँग्रेजों ने उसका पीछा किया।

जनवरी 1765 में बनारस के निकट शुजाउद्दौला पुनः परास्त हुआ। अँग्रेजों ने चुनार तथा इलाहाबाद के दुर्गों पर अधिकार कर लिया। शुजाउद्दौला ने मराठा सेनापति मल्हारराव होलकर से सहायता प्राप्त की परन्तु अपै्रल 1765 में कड़ा के युद्ध में अँग्रेजों ने उन दोनों को परास्त किया। अन्त में शुजाउद्दौला ने समर्पण कर दिया। मीर कासिम भागकर दिल्ली पहुँचा जहाँ वह 12 वर्ष तक जीवित रहा। 1777 ई. में उसकी मृत्यु हुई।

बक्सर युद्ध का महत्त्व

बक्सर युद्ध मध्यकालीन भारतीय इतिहास का निर्णायक युद्ध था। इसमें अँग्रेजों की निर्णायक विजय हुई। इस युद्ध का महत्त्व प्लासी के युद्ध से भी अधिक है। इससे अँग्रेजों की शक्ति में अत्यंत वृद्धि हुई। मुगल बादशाह शाहआलम और उसका वजीर नवाब शुजाउद्दौला, दोनों परास्त होकर अँग्रेजों की दया पर निर्भर हो गये।

प्लासी के युद्ध में क्लाइव के षड्यन्त्र के कारण, बिना लड़े ही अँग्रेजों को विजय प्राप्त हुई थी परन्तु बक्सर के मैदान में अनुभवी सेनापति शुजाउद्दौला जिसके पास अँग्रेजों की तुलना में पाँच गुना सेना और एक श्रेष्ठ तोपखाना थे, को परास्त होना पड़ा। इससे अँग्रेजों की सैनिक श्रेष्ठता प्रमाणित हो गई और भारतीय शासकों की सैनिक शक्ति का खोखलापन स्पष्ट हो गया।

प्लासी के युद्ध में केवल बंगाल के नवाब के भाग्य का फैसला हुआ था और विजय के परिणामस्वरूप केवल बंगाल के लाभकारी स्रोतों पर कम्पनी का अधिकार हुआ था परन्तु बक्सर युद्ध में भारत की तीन प्रमुख शक्तियों- मुगल बादशाह शाहआलम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के नवाब मीर कासिम के भाग्य का फैसला हुआ। यहां तक कि मल्हारराव होलकर भी अँग्रेजों से परास्त हुआ।

बक्सर विजय के परिणाम स्वरूप, सम्पूर्ण अवध सूबे पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का नियंत्रण हो गया। इससे अँग्रेजों के लिए उत्तरी भारत में साम्राज्य की स्थापना का कार्य सरल हो गया। इस पराजय के बाद अवध के किसी नवाब ने अँग्रेजों का सामना करने का साहस नहीं किया। इस युद्ध का सम्पूर्ण भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा। अब ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक अखिल भारतीय शक्ति बन गई।

प्लासी के युद्ध में कम्पनी ने बंगाल की सेना को परास्त किया था परन्तु बक्सर युद्ध में उसने उत्तरी भारत की सबसे बड़ी सेना को परास्त किया और बाद में अवध तथा मराठों की संयुक्त सेना को परास्त किया। कम्पनी की शानदार सैनिक सफलताओं से भारतीय राजनीति में उसका दबदबा बढ़ गया। अब उसका प्रभाव क्षेत्र बंगाल से दिल्ली तक विस्तृत हो गया। इसीलिए यह कहा जाता है कि बक्सर युद्ध ने प्लासी के अधूरे कार्य को पूरा किया।

ब्रूम ने लिखा है- ‘इस प्रकार प्रसिद्ध बक्सर युद्ध समाप्त हुआ, जिस पर भारत का भाग्य निर्भर था और जितनी बहादुरी से लड़ा गया, परिणामों की दृष्टि से भी उतना ही महत्त्वपूर्ण था।’

अब बंगाल का नवाब कम्पनी के हाथों की कठपुतली था। अवध का नवाब कम्पनी पर निर्भर रहने वाला समर्थक मित्र और मुगल बादशाह उसका पेन्शनर था। जी. बी. मालेसन ने लिखा है- ‘चाहे आप इसे देशी और विदेशियों के बीच द्वंद्व युद्ध समझें या ऐसी एक सारगर्भित घटना जिसका परिणाम स्थाई और विशाल हुआ। बक्सर को सर्वाधिक निर्णायक युद्धों में से माना जाता है।’

क्लाइव की दूसरी गवर्नरी (जून 1765 से जनवरी 1767)

बक्सर विजय के बाद भारत में बदली हुई परिस्थितियों का अधिकतम लाभ उठाने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने राबर्ट क्लाइव को जून 1765 में दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बनाकर भारत भेजा। वह एक अनुभवी अधिकारी था तथा बंगाल की परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझता था।

क्लाइव की समस्याएँ

क्लाइव को अपने दूसरे कार्यकाल में अनेक महत्वपूर्ण राजनीतिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। इनमें से कुछ इस प्रकार थीं-

(1.) मुगल बादशाह और अवध के नवाब के सम्बन्ध में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भावी नीति का निर्णय करना शेष था।

(2.) कम्पनी के आन्तरिक मामलों में बड़े सुधारों की आवश्यकता थी।

(3.) कम्पनी के अधिकारी, कर्मचारी एवं भारतीय गुमाश्तों के निजी व्यापार के कारण कम्पनी के लाभ में कमी आने लगी थी। इस समस्या को सख्ती से सुलझाने की आवश्यकता थी।

(4.) क्लाइव के कलकत्ता पहुँचने के पूर्व ही मीर जाफर की मृत्यु हो गई। उसका पुत्र नज्मुद्दौला अल्पवयस्क था। क्लाइव को इस समस्या का समाधान भी करना था।

समस्याओं का समाधान

(1.) इलाहाबाद की सन्धि (1765 ई.)

1765 ई. में जब क्लाइव कलकत्ता पहुँचा, उस समय दिल्ली, अवध तथा बंगाल के ताज कम्पनी के चरणों में पड़े थे। उन्हें भावी राजनीतिक शिकंजों में कसने के लिये ठोस नीति का निर्माण आवश्यक था ताकि ये शक्तियां समय पाकर फिर से सिर न उठाने लगें।

बक्सर विजय के बाद वेन्सीटार्ट ने शाहआलम को अवध का सूबा देने का आश्वासन दिया था। उसने सोचा था कि यदि कम्पनी की सीमाओं के पास ही मुगल सल्तनत की सेनाएँ रहेंगी तो कम्पनी के हित अधिक सुरक्षित रहेंगे परन्तु क्लाइव का मानना था कि यदि अवध का सूबा कमजोर मुगल बादशाह को सौंपा गया तो मराठे अवध पर निरन्तर धावा मारते रहेंगे और कम्पनी को मराठोें से उलझना पड़ेगा। कौंसिल के कुछ सदस्यों की राय थी कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी को स्वयं दिल्ली तथा अवध पर प्रत्यक्ष अधिकार कर लेना चाहिए। क्लाव की राय इन सदस्यों से अलग थी।

उसके अनुसार इस समय ऐसा करना लाभदायक नहीं था। कम्पनी के पास इतने साधन नहीं थे कि वह इतने बड़े भू-भाग की व्यवस्था कर सके। यदि कम्पनी का मराठों से झगड़ा उठ खड़ा हुआ तो बंगाल, बिहार और उड़ीसा भी उसके हाथ से निकल सकते थे।

एक सुझाव यह भी था कि कम्पनी मुगल बादशाह को उसके भाग्य पर छोड़ दे तथा दिल्ली को उसके अधिकार में बने रहने दे। क्लाइव इस सुझाव से सहमत नहीं था क्योंकि इससे मराठे मुगल सल्तनत पर नियंत्रण कर सकते थे। क्लाइव ने मध्यम मार्ग का अनुसरण किया। 12 अगस्त 1765 को उसने मुगल बादशाह से एक संधि की जिसे इलाहाबाद की सन्धि कहते हैं। इसकी प्रमुख शर्तें इस प्रकार से थीं-

1. अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के जिले छीनकर मुगल बादशाह शाहआलम को सौंप दिये गये।

2. मुगल बादशाह ने एक विशेष फरमान के द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अँग्रेजों को दे दी। एक अन्य फरमान द्वारा मुगल बादशाह ने मीर जाफर के पुत्र नज्मुद्दौला को इन प्रान्तों का नवाब स्वीकार कर लिया।

3. ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने मुगल बादशाह को 26 लाख रुपया प्रतिवर्ष देना स्वीकार कर लिया।

इस प्रकार, इलाहाबाद की सन्धि से कम्पनी को वैधानिक रूप से बंगाल, बिहार और उड़ीसा में मुगल बादशाह के प्रतिनिधि की हैसियत से शासन करने का अधिकार मिल गया। अब वह इन सूबों में अपनी सत्ता मजबूत बनाने का प्रयास करने लगी।

(2.) अवध के नवाब से संधि

क्लाइव ने अवध के नवाब वजीर शुजाउद्दौला के साथ एक पृथक सन्धि की जिसकी प्रमुख शर्तें इस प्रकार से थीं-

1. अवध सूबे के कड़ा और इलाहाबाद जिले मुगल बादशाह को दे दिये गये।

2. चुनार का दुर्ग ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिया गया।

3. शेष जिले फिर से अवध के नवाब को सौंप दिये गये।

4. नवाब वजीर ने कम्पनी को युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में 50 लाख रुपये देने का वचन दिया।

5. नवाब वजीर ने भविष्य में मीर कासिम तथा उसके समर्थकों को सरंक्षण अथवा नौकरी नहीं देने का आश्वासन दिया।

6. बनारस और गाजीपुर, राजा बलवन्तसिंह को पैतृक जागीर के रूप में दिये गये। अँग्रेजों को उसका संरक्षक बनाया गया।

7. नवाब ने अवध सूबे में कम्पनी को निःशुल्क व्यापार करने की सुविधा दी।

8. क्लाइव ने अवध में कुछ फैक्ट्रियाँ स्थापित करने की इच्छा प्रकट की परन्तु शुजाउद्दौला ने इसे स्वीकार नहीं किया। इस शर्त पर क्लाइव ने जोर नहीं दिया।

9. एक पृथक् सन्धि द्वारा कम्पनी ने अवध की सुरक्षा का भार अपने ऊपर ले लिया। अवध के नवाब ने कम्पनी की सैनिक सहायता का व्यय देना स्वीकार कर लिया।

(3.) बंगाल के नवाब से नई संधि

बंगाल, उड़ीसा और बिहार की दीवानी प्राप्त करने के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिये यह आवश्यक हो गया कि वह बंगाल के नवाब से नये सिरे से संधि करे।

इलाहाबाद की सन्धि से कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा से लगान वसूल करने और असैनिक न्याय प्रदान करने के अधिकार मिल गये किंतु निजामत अर्थात् शान्ति-व्यवस्था और फौजदारी न्याय नवाब के अधिकार में रहे। नये समझौते के अनुसार निजामत के कार्य के व्यय के लिए कम्पनी ने नवाब को 53 लाख रुपया वार्षिक देना स्वीकार किया। इस प्रकार, बंगाल में दोहरे शासन की शुरुआत हुई।

इलाहाबाद की सन्धि का मूल्यांकन

इलाहाबाद की सन्धि के सम्बन्ध में विद्वानों ने परस्पर-विरोधी मत व्यक्त किये हैं। सर आयरकूट का मत है कि इस संधि के द्वारा क्लाइव ने दिल्ली, अवध, बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा के विशाल क्षेत्र में विशाल साम्राज्य स्थापित करने का एक शानदार अवसर खो दिया। मृत अथवा निष्क्रिय शासकों को पुनः जीवनदान देना उचित नहीं था।

शुजाउद्दौला को पुनः तख्त पर बैठाने की बजाय, उसे स्वयं अवध पर अधिकार कर लेना चाहिए था और मुगल बादशाह के नाम पर दिल्ली की तरफ बढ़ जाना था, जहाँ वह अपनी सत्ता स्थापित कर सकता था। एक अन्य मत यह है कि क्लाइव ने शाहआलम के साथ बहुत ही कठोर व्यवहार किया।

वेन्सीटार्ट ने उसे अवध का प्रान्त देने का वायदा किया था परन्तु क्लाइव ने वचन का पालन नहीं किया। इन आरोपों के विरुद्ध क्लाइव की दलील यह थी कि वेन्सीटार्ट ने मुगल बादशाह के साथ कोई लिखित समझौता नहीं किया था। इसके अलावा मुगल बादशाह पर ऐसा बोझ डालना अनुचित था, जिसका भार वहन करने की उसमें क्षमता नहीं थी।

वस्तुतः इलाहाबाद की सन्धि क्लाइव की गहरी सूझबूझ का प्रमाण है। बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर कम्पनी ने हाल ही में वैधानिक अधिकार प्राप्त किया था। कम्पनी को अपने राज्य का विस्तार करने के स्थान पर अपने द्वारा शासित क्षेत्र में अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाना आवश्यक था।

कम्पनी के वित्तीय एवं सैनिक संसाधनों पर पहले से ही भारी दबाव था। कम्पनी मुख्यतः एक व्यापारिक संस्था थी, अतः उसके लिए स्वतंत्र रूप से राज्य का निर्माण करना उचित नहीं था। बंगाल की सुरक्षा की समस्या अभी भी बनी हुई थी।

ऐसी स्थिति में नये सैनिक अभियानों से कम्पनी के व्यापार को भारी हानि पहुँच सकती थी। यदि अवध को कम्पनी के अधिकार में ले लिया जाता तो भारत के देशी शासकों में असंतोष उत्पन्न होने की सम्भावना थी। कम्पनी के पास इतने बड़े राज्य का शासन चलाने के लिए योग्य अधिकारियों और कर्मचारियों का भी अभाव था। इन समस्त तथ्यों के आधार पर इलाहाबाद की सन्धि को क्लाइव की महत्त्वपूर्ण सफलता माना जा सकता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – अंग्रेज जाति का भारतीय शक्तियों से संघर्ष

बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

बक्सर युद्ध

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

बसीन की संधि

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

मराठा शक्ति का पतन

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

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बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना की गई। हस व्यवस्था में बंगाल का प्रशानिक प्रबंधन नवाब के हाथों में रहा जबकि भूराजस्व वसूल करने का दायित्व ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ग्रहण कर लिया।

अकबर द्वारा स्थापित मुगल शासन पद्धति के अन्तर्गत बंगाल के सूबे का शासन दो भागों में बँटा हुआ था-

(1) दीवानी शासन- इसके अनतर्गत कर-वसूली और दीवानी न्याय का कार्य सम्मिलित था और

(2) निजामत- इसके अन्तर्गत सूबे में शान्ति व्यवस्था, बाह्य-आक्रमण से रक्षा और फौजदारी न्याय के कार्य सम्मिलित थे।

जिन दिनों मुगलों की केन्द्रीय सत्ता मजबूत रही, बंगाल के सूबेदारों के पास निजामत के अधिकार ही थे, जबकि दीवानी शासन के लिए मुगल बादशाह अपनी तरफ से पृथक् दीवान की नियुक्ति करता था। जब बंगाल का सूबेदार केन्द्रीय सत्ता से स्वतंत्र हो गया तो उसने निजामत और दीवानी, दोनों अधिकार अपने हाथ में ले लिये। फिर भी सैद्धान्तिक रूप से दीवानी के अधिकार अब भी मुगल बादशाह के पास ही थे।

मीर जाफर की मृत्यु के बाद उसके पुत्र नज्मुद्दौला को बंगाल का नवाब बनाया गया। कम्पनी ने शिशु नवाब पर एक नई सन्धि थोप दी, जिसके अनुसार कम्पनी ने 53 लाख रुपया वार्षिक के बदले में निजामत के अधिकार प्राप्त कर लिये। अब नवाब को केवल शान्ति व्यवस्था के लिए आवश्यक सेना रखने की अनुमति दी गई।

नवाब के अधिकारियों की नियुक्ति एवं नियंत्रण का अधिकार भी कम्पनी ने अपने हाथ में ले लिया। नवाब द्वारा निजामत के अधिकार त्यागना वस्तुतः बंगाल में ब्रिटिश राज्य की स्थापना की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम था।

अगस्त 1765 में कम्पनी को मुगल बादशाह की तरफ से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी भी प्राप्त हो गई। यद्यपि मुगल बादशाह स्वयं इस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी पर निर्भर था परन्तु सैद्धान्तिक और वैधानिक दृष्टि से वह अब भी सम्पूर्ण सल्तनत का बादशाह था। अतः उसके आदेशों ने कम्पनी के कार्यों को वैधानिकता का जामा पहना दिया। इस प्रकार, कम्पनी को बंगाल में निजामत तथा दीवानी, दोनों अधिकार प्राप्त हो गये।

कम्पनी द्वारा हिन्दू शासकों के विरुद्ध षड़यंत्र

इलाहबाद की संधि के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने पूर्वी भारत के प्रमुख हिन्दू शासकों के विरुद्ध षड़यंत्र करके उन्हें हटा दिया। बिहार के शासक रामनारायण सिंह, उड़ीसा के राजा रामसिंह और पूर्णिया के राजा युगलसिंह को उनके पदों से हटा दिया गया। इन शासकों ने अँग्रेजों के विरुद्ध महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई थीं।

बंगाल में द्वैध शासन व्यवस्था

क्लाइव की शासन-व्यवस्था को द्वैध शासन प्रणाली (दोहरा शासन) कहते हैं। क्योंकि कम्पनी ने वास्तविक सत्ता के होते हुए भी सूबे की शासन व्यवस्था को स्पष्टतः अपने हाथों में नहीं लिया। निजामत का कार्य नवाब के हाथों में नहीं रहने दिया गया और इसके लिए कम्पनी ने नवाब को 53 लाख रुपये वार्षिक देना तय किया।

चूँकि सैनिक शक्ति कम्पनी के हाथों में थी, इसलिये वह नवाब की ओर से स्वयं निजामत का कार्य करने लगी। अर्थात् निजामत की सर्वोच्च शक्ति कम्पनी के पास थी परन्तु उत्तरदायित्व नवाब का था। इस प्रकार, सूबे में दो सत्ताओं की स्थापना हुई- एक भारतीय और दूसरी विदेशी। विदेशी सत्ता वास्तविक थी, जबकि भारतीय सत्ता उसकी परछाई मात्र थी।

ऐसा इसलिये किया गया था क्योंकि कम्पनी को बंगाल में शासन करने के लगभग समस्त अधिकार मिल गये परन्तु शासन सम्बन्धी विविध कार्यों को करने के लिये कम्पनी के पास न तो साधन थे, न कर्मचारी। द्वैध शासन प्रणाली के माध्यम से, चतुर क्लाइव ने ऐसी शासन व्यवस्था स्थापित की कि कम्पनी शासन तो करे किंतु उसके ऊपर शासन का उत्तरदायित्व न रहे।

नायब दीवानों की नियुक्ति

क्लाइव का मानना था कि कम्पनी के अधिकारी बंगाल की शासन व्यवस्था की पेचादगियों को नहीं समझ पायेंगे। अतः उसने भारतीय अधिकारियों के माध्यम से दीवानी का काम चलाने का निश्चय किया। उसने दो नायब दीवान नियुक्त किये- एक बंगाल के लिए और दूसरा बिहार के लिए।

बंगाल में मुहम्मद रजा खाँ और बिहार में राजा शिताबराय को नियुक्त किया गया। इस प्रकार कम्पनी ने अपना उत्तरदायित्व भारतीय अधिकारियों पर डाल दिया। कम्पनी का लक्ष्य अधिक-से अधिक आय प्राप्त करना था। भारतीय नायब दीवान, इस उद्देश्य को पूरा करने के उपकरण मात्र थे।

नायब निजाम की नियुक्ति

चूँकि नवाब नज्मुद्दौला अल्पायु था इसलिए उसके कामों की देखभाल के लिए नायब-निजाम की नियुक्ति की गई और इस पद पर भी मुहम्मद रजाखाँ को नियुक्त किया गया जो बंगाल का नायब-दीवान था।

बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना के कारण

द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना के कारण बहुत गहरे थे। इसके पीछे क्लाइव का अब तक का अनुभव एवं चिंतन काम कर रहे थे। वह चारों तरफ से अपने शत्रुओं और विरोधियों से घिरा हुआ था इसलिये उसने बंगाल का शासन अपने हाथ में न लेकर द्वैध शासन प्रणाली को जन्म दिया। इस चिंतन के कारण इस प्रकार से थे-

(1.) क्लाइव को लगता था कि इस व्यवस्था से भारतीयों में कम्पनी के प्रति विद्रोह की भावना उत्पन्न नहीं होगी। उन्हें अनुभव ही नहीं होगा कि कम्पनी ने राजनीतिक सत्ता हथिया ली है।

(2.) क्लाइव को लगता था कि राजनीतिक सत्ता प्रत्यक्ष रूप से हाथ में लेने से भारत में स्थित फ्रांसीसी तथा डच कम्पनियां सुगमता से ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सूबेदारी स्वीकार नहीं करेंगी तथा कम्पनी को वे कर आदि नहीं देंगी जो नवाब के फरमान के अनुसार उन्हें देने होते थे।

(3.) इस व्यवस्था के अभाव में यूरोप में भी इंग्लैण्ड के प्रति अन्य शक्तियों के बीच वैमनस्य और कटुता बढ़ने की संभावना थी।

(4.) कम्पनी का कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने अधिकार में लेने के पक्ष में नहीं था।

(5.) कम्पनी के अँग्रेज अधिकारी इस समूचे क्षेत्र की प्रजा, उसके व्यवहार, भाषा, रीति-रिवाज आदि से परिचित नहीं थे। इस कारण शासन का कार्य चलाने में सफलता का मिलना संदिग्ध था।

(6.) क्लाइव बंगाल के नवाबों को निकम्मा सिद्ध करके उन्हें शासन कार्य से दूर कर देना चाहता था।

(7.) क्लाइव को लगता था कि यदि कम्पनी भारत में किसी क्षेत्र पर शासन का काम अपने हाथ में लेती है तो लंदन की संसद कम्पनी के काम में सीधा हस्तक्षेप करने लगेगी।

बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना के परिणाम

बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली 1765 ई. में आरम्भ होकर 1772 ई. तक चलती रही। 1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्स ने इसे समाप्त किया। बंगाल की जनता के लिये द्वैध शासन प्रणाली के परिणाम अत्यंत विध्वंसकारी सिद्ध हुए।

(1.) द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना के बाद न तो कम्पनी ने और न नवाब ने ही जनता की भलाई की चिंता की।

(2.) कम्पनी के अधिकारी एवं कर्मचारी जनता का भयानक शोषण करने लगे।

(3.) नवाब के अधिकारियों में इतनी शक्ति नहीं रही कि वे जनता को कम्पनी और उसके कर्मचारियों की लूट-खसोट से बचा सकें।

(4.) नवाब के कर्मचारी स्वयं भी जनता को लूटने और खसोटने में लग गये।

(5.) सम्पूर्ण बंगाल कम्पनी के कदमों में आ पड़ा। कम्पनी की मर्जी थी कि वह बंगाल की कितनी ही बुरी गत क्यों न बनाये। कोई विरोध करने वाला नहीं था।

(6.) बंगाल में न्याय व्यवस्था बिल्कुल ठप्प हो गई। चोर, डाकू और लुटेरों का आतंक बढ़ गया।

(7.) राज्य में भू-राजस्व संग्रह का कार्य प्रति वर्ष अधिक से अधिक बोली लगाने वाले को दिया जाने लगा। इससे मनमाना राजस्व वसूल किया जाने लगा। इस कारण बहुत से किसान खेती-बाड़ी छोड़कर भाग गये और बंगाल का उपजाऊ प्रदेश उजाड़ और बंजर होने लगा।

(8.) व्यापार-वाणिज्य की अवनति हुई। कम्पनी के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने कम्पनी का व्यापार बढ़ाने की बजाये अपना व्यापार बढ़ाया। इससे भारतीय व्यापारियों की कमर टूट गई। स्वयं क्लाइव ने माना कि कम्पनी के अधिकारी और कर्मचारी कम्पनी के लिये व्यापार न करके सम्प्रभु व्यापारी की तरह व्यापार करते थे। उन्होंने हजारों भारतीय व्यापारियों के मुँह की रोटी छीन ली।

(9.) कम्पनी ने बंगाल के रेशम उद्योग को हतोत्साहित किया। अब अँग्रेज रेशम के कपड़ों के स्थान पर कच्चा रेशम खरीदते थे। जो भारतीय जुलाहे, रेशम का कपड़ा बुनते थे, उनका शारीरिक उत्पीड़न किया गया।

(10.) भारतीय जुलाहों को विवश किया गया कि वे अपना काम न करके कम्पनी के लिये कपड़ा बुनें।

(11.) 1770 ई. में बंगाल में भयानक दुर्भिक्ष पड़ा। सरकार की ओर से जनता की कोई सहायता नहीं की गई। इस कारण बंगाल की एक तिहाई जनसंख्या भूख और बीमारी से नष्ट हो गई किंतु द्वैध शासन होने के कारण न तो नवाब ने और न कम्पनी ने प्रजा की सहायता की।

(12.) भारत का धन तेजी से इंग्लैण्ड की ओर प्रवाहित होने लगा। एक अनुमान के अनुसार 1766 से 1768 ई. के तीन सालों में बंगाल से 57 लाख पौण्ड की विपुल राशि लंदन ले जाई गई।

(13.) बंगाल में मची लूट से उत्साहित होकर इंग्लैण्ड की सरकार ने 1767 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से इस लूट में अपना हिस्सा मांगा तथा कम्पनी को निर्देश दिये कि वह प्रति वर्ष सरकार को 4 लाख पौण्ड दे।

रॉबर्ट क्लाइव की सफलताओं एवं कार्यों का मूल्यांकन

रॉबर्ट क्लाइव का जन्म 1725 ई. में इंग्लैण्ड में मार्केट ड्रायटन के समीप एक सामान्य परिवार में हुआ। वह बहुत ही साधारण प्रतिभा का बालक था। उसे एक के बाद एक चार स्कूलों में पढ़ने भेजा गया परन्तु वह पढ़ने-लिखने में विशेष प्रगति नहीं कर सका। 17 वर्ष की आयु में उसे ईस्ट इण्डिया कम्पनी में क्लर्क के पद पर रख लिया गया।

1744 ई. के अन्तिम दिनों में वह इंग्लैण्ड से मद्रास पहुँचा। उसे क्लर्की का काम बिन्कुल पसन्द नहीं था इसलिये उसने तंग आकर आत्महत्या करने का विचार किया परन्तु अर्काट के घेरे ने उसके भाग्य को बदल दिया। वह क्लर्क से सैनिक और फिर सेनापति और अंत में बंगाल का गवर्नर बन गया।

एक सामान्य नागरिक से वह एक सम्पन्न व्यक्ति बन गया। इंग्लैण्ड की सरकार ने उसकी सेवाओं के लिये उसे लॉर्ड की उपाधि से विभूषित किया। क्लाइव एक साहसी सैनिक, कुशल कूटनीतिज्ञ एवं परिश्रमी व्यक्ति था। साथ ही वह झूठा, धोखेबाज, रिश्वतखोर तथा षड्यन्त्रकारी भी था। यही कारण था कि भारत में अँग्रेजी राज्य की स्थापना में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

क्लाइव की सफलताएँ     

क्लाइव ने बुद्धिमत्तापूर्ण सैनिक योजनाओं के स्थान पर, दृढ़ संकल्प शक्ति एवं दिलेरी से बड़े कार्य सम्पादित किये जिनसे भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सका। उसके द्वारा मुख्यतः निम्नलिखित सफलताएं अर्जित की गईं-

(1.) 1751 ई. में उसके द्वारा अर्काट युद्ध में विजय प्राप्त की गई और अर्काट की सुरक्षा का सुचारू रूप से प्रबंध किया गया।

(2.) दक्षिण भारत में उसने फ्रैंच गवर्नर डुप्ले की समस्त योजनाओं को प्रभावहीन कर दिया।

(3.) उसने कलकत्ता पर पुनः अधिकार किया तथा प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला को परास्त किया।

(4.) अपनी प्रथम गवर्नरी के समय उसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखी, तो दूसरी गवर्नरी के काल में एक चतुर एवं दूरदर्शी राजनीतिज्ञ की भाँति उस नींव को मजबूत बनाया।

(5.) क्लाइव ने तात्कालिक प्रलोभनों में न फँसकर उचित अवसर की प्रतीक्षा करना अधिक ठीक समझा। राज्य विस्तार के कार्य में हड़बड़ी दिखाने के स्थान पर धैर्यपूर्वक कम्पनी की स्थिति को मजबूत बनाया।

(6.) क्लाइव ने कम्पनी को शासक की भूमिका में लाने के स्थान पर, शासकों को नियुक्त करने वाला बनाया। मुगल बादशाह शाहआलम और अवध के नवाब वजीर के साथ किये गये समझौते इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। बंगाल, बिहार और उड़ीसा में पूर्ण शासन सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद भी प्रत्यक्षतः उत्तरदायित्व न सम्भालना, उसकी कूटनीतिक प्रतिभा का परिचायक है।

(7.) बंगाल में उसके प्रशासनिक सुधारों के विरोध में अँग्रेज अधिकारियों ने सामूहिक त्याग-पत्र दे दिये। इस पर भी वह अपने निश्चय से नहीं डिगा। न ही उसने किसी से प्रतिशोध लेने का प्रयास किया।

क्लाइव की कमजोरियाँ

लॉर्ड क्लाइव के चरित्र में कई कमजोरियां भी थीं। वह साधनों के औचित्य के स्थान पर लक्ष्य की प्राप्ति को आवश्यक समझता था। इस कारण उसमें नैतिकता का अभाव था। सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड्यन्त्र रचना और जाली सन्धि-पत्र तैयार करवाकर अमीचन्द को धोखा देना उसके निम्न नैतिक स्तर को स्पष्ट करते हैं।

व्यक्तिगत रूप से वह अत्यधिक लोभी तथा धन का भूखा था। जब उसे दूसरी बार गवर्नर बनाकर बंगाल में भेजा गया तो उसे कम्पनी के प्रशासन में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के आदेश दिये गये। क्लाइव ने इस दिशा में कुछ कदम भी उठाये परन्तु वह स्वयं पर संयम न रख सका। उस ने भारतीयों से कीमती भेंटें तथा घूस लेने की प्रथा आरम्भ की।

कुछ इतिहासकार उसे योग्य सेनानायक होना स्वीकार नहीं करते। उसे योग्य शासक भी नहीं माना जाता। के. एम. पाणिक्कर का मत है कि 1765 से 1772 ई. तक कम्पनी द्वारा स्थापित बंगाल का राज्य एक डाकू-राज्य था। क्लाइव ने समस्याओं के जो हल निकाले, वे स्थायी न होकर अस्थायी थे।

क्लाइव का अंत

1767 ई. में क्लाइव इंग्लैण्ड चला गया। कुछ समय बाद उसे हाउस ऑफ कॉमन्स का सदस्य चुना गया। इंग्लैण्ड की संसद में क्लाइव की कटु आलोचना एवं निन्दा की गई। उस पर भ्रष्टाचार तथा जालसाजी करने के आरोप लगाये गये। क्लाइव ने इन आरोपों को स्वीकार कर लिया परन्तु यह भी स्पष्ट कर दिया कि उसने यह, अपने देश की भलाई के लिए किया।

अन्त में संसद ने क्लाइव को समस्त आरोपों से मुक्त कर दिया और उसकी सेवाओं की प्रशंसा की गई परन्तु इस कार्यवाही से क्लाइव को गहरा सदमा पहुँचा। उसने मानसिक संतुलन खोकर नवम्बर 1774 में उस्तरे से गला काटकर आत्महत्या कर ली। इस प्रकार उसके जीवन का अन्त हुआ।

अँग्रेजी इतिहासकारों द्वारा क्लाइव का मूल्यांकन

लगभग समस्त अँग्रेज इतिहासकारों ने क्लाइव के कार्यों एवं सफलताओं की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। इतिहासकार पिट्स ने अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दों में उसकी स्तुति करते हुए उसे स्वर्ग में जन्मा सेनानायक बताया है। चेथम ने उसे ईश्वर द्वारा भेजा गया सेनापति बताया।

मैकाले ने लिखा है- ‘हमारे टापू ने शायद ही ऐसे व्यक्ति को जन्म दिया हो जो युद्ध और विचार-विमर्श में उससे बढ़कर हो।’ क्लाइव की उपलब्धियों की चर्चा करते हुए बर्क ने कहा है- ‘उसने महान् कार्यों की नींव डाली…… उसने उस गहरे पानी में प्रवेश किया जिसके तल का भी पता न था। उसने अपने उत्तराधिकारियों के लिए एक पुल का निर्माण किया, जिस पर लंगड़े चल सकते थे और अन्धे भी अपना मार्ग खोज सकते थे।’

वेरेलस्ट तथा कार्टियर

क्लवाइव के बाद वेरेलस्ट (1767-1769 ई.) तथा कार्टियर (1769-1772 ई.) बंगाल के गवर्नर रहे। इस दौरान 1770 ई. में बंगाल में भयानक दुर्भिक्ष पड़ा जिसमें बंगाल की एक तिहाई जनसंख्या समाप्त हो गई। दुर्भिक्ष के बाद ज्वर तथा चेचक का प्रकोप फैला। प्रतिदिन हजारों शव हुगली नदी में बहाये जाने लगे किंतु द्वैध शासन होने के कारण न तो नवाब ने और न कम्पनी ने जनता की सहायता की। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ऐसे भयानक समय में भी बंगाल से चावल एकत्रित करके अधिक मूल्य पर बंगाल से बाहर बेचती रही।

वारेन हेस्टिंग्ज (1772-1785 ई.)

कार्टियर के बाद वारेन हेस्टिंग्ज बंगाल का गवर्नर नियुक्त हुआ। उसने मुगल बादशाह शाहआलम की 26 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन बंद कर दी क्योंकि वह मराठों की शरण में चला गया था। हेस्टिंग्ज ने बंगाल के नवाब की 32 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन घटाकर 16 लाख रुपये कर दी।

शाहआलम से कड़ा और इलाहाबाद के इलाके छीनकर 50 लाख रुपये में अवध के नवाब को दे दिये। द्वैध शासन व्यवस्था के कारण बंगाल में पहले से ही अराजकता फैली हुई थी किंतु अकाल ने स्थिति और भयावह बना दी। उसके समय में भी कम्पनी के अधिकारियों एवं कर्मचारियों में भ्रष्टाचार अपने चरम पर बना रहा।

बंगाल का शोषण उसी भांति होता रहा। जब वह इंग्लैण्ड लौट कर गया तो उस पर ब्रिटिश संसद में भ्रष्टाचरण का मुकदमा चला। सांसद एडमण्ड बु्रक पूरे दो दिन तक हेस्टिंग्स पर लगाये गये आरापों को संसद में पढ़कर सुनाता रहा। सात साल तक यह मुकदमा चलता रहा। इसे लड़ने में हेस्टिंग्स बर्बाद हो गया।

मुकदमे की कार्यवाही के दौरान हेस्टिंग्स को कहना पड़ा कि यदि उसने आरोप स्वीकार कर लिये होते तो उसे कम नुक्सान उठाना पड़ता। अंत में संसद ने उसे समस्त आरोपों से मुक्त कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – अंग्रेज जाति का भारतीय शक्तियों से संघर्ष

बंगाल में ब्रिटिश प्रभुसत्ता का विस्तार

प्लासी का युद्ध (1757 ई.)

बक्सर युद्ध

बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना

बसीन की संधि

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.)

द्वितीय आँग्ल-मराठा युद्ध

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

मराठा शक्ति का पतन

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