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मुहम्मद जमां मिर्जा ने हुमायूँ की पीठ में दूसरी छुरी भौंकी (47)

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मुहम्मद जमां मिर्जा - www.bharatkaitihas.com
मुहम्मद जमां मिर्जा ने हुमायूँ की पीठ में दूसरी छुरी भौंकी

जिस समय हुमायूँ कालिंजर के राजा रुद्र प्रताप देव तथा अपने छोटे भाई मिर्जा कामरान से उलझा हुआ था उस समय ने हुमायूँ के बहनोई मुहम्मद जमां मिर्जा ने हुमायूँ की पीठ में दूसरी छुरी भौंक दी!

बादशाह बनते ही हुमायूँ चारों तरफ शत्रुओं से घिर गया। कालिंजर का राजा रुद्र प्रताप देव कालपी पर आंख गढ़ाए बैठा था, अफगान सेनापति बिहार की तरफ से आगे बढ़कर जौनपुर पर अधिकार कर चुके थे, गुजरात का शासक बहादुरशाह दिल्ली पर आंख गढ़ाए बैठा था और राजपूत स्वयं को फिर से शक्तिशाली बनाने के प्रयास कर रहे थे।

इन सबसे बढ़कर खराब बात यह हुई कि हुमायूँ को शत्रुओं से उलझा हुआ देखकर हुमायूँ के भाई मिर्जा कामरान ने अफगानिस्तान का प्रबन्ध अपने छोटे भाई अस्करी को सौंपा और स्वयं अपनी सेना के साथ पंजाब में घुस आया। मिर्जा कामरान ने मुल्तान से लेकर लाहौर तक के क्षेत्र पर अधिकार करके अपने अधिकारी नियुक्त कर दिये। इसके बाद कामरान ने हुमायूँ को चालाकी भरे विनम्र पत्र लिखे कि हुमायूँ मुल्तान तथा पंजाब के प्रान्त कामरान को दे दे।

चूँकि हुमायूँ के पास अपने साम्राज्य के पश्चिमी-भाग में शान्ति बनाये रखने का अन्य कोई उपाय नहीं था, इसलिये हुमायूँ ने मुल्तान तथा पंजाब पर मिर्जा कामरान का दावा स्वीकार कर लिया। कामरान का यह काम हुमायूँ की पीठ में छुरी भौंकने जैसा था।

कामरान को सन्तुष्ट करने के बाद हुमायूँ ने पुनः विद्रोही अफगानों की ओर ध्यान दिया। उसने लखनऊ के निकट दौरान नामक स्थान पर अफगानों से लोहा लिया। अफगानों ने अपने खोये हुए राज्य की प्राप्ति के लिये बड़ी वीरता से युद्ध किया परन्तु वे परास्त हो गये। जौनपुर पर हुमायूँ का अधिकार हो गया और महमूद लोदी बिहार की ओर भाग गया। उसने फिर कभी युद्ध करने का साहस नहीं किया। वैसे भी अब लोदियों का समय पूरी तरह बीत चुका था और नए अफगान नेता शेर खाँ का उदय हो रहा था।

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अभी हुमायूँ कामरान द्वारा किए गए छल से उबरा भी नहीं था कि हुमायूँ के बहनोई मुहम्मद जमां मिर्जा ने हुमायूँ की पीठ में धोखे की दूसरी छुरी भौंक दी। मुहम्मद जमां मिर्जा ने कुछ मुगल अमीरों के साथ मिलकर हुमायूँ के विश्वस्त अमीर मुहम्मद खाँ कोकी के पिता को मार डाला और स्वयं बागी हो गया। हुमायूँ ने बागियों को पकड़ने के लिए एक सेना भेजी। मुहम्मद जमां, सुल्तान मुहम्मद मिर्जा और नैखूब मिर्जा पकड़े गए। इन लोगों को बयाना के किले में यादगार मामा की कैद में रखा गया किंतु यादगार मामा के आदमियों ने मुहम्मद जमां को भगा दिया। इस पर हुमायूँ ने आज्ञा दी कि सुल्तान मुहम्मद मिर्जा तथा नैखूब सुल्तान मिर्जा की आंखों में सलाई फेर दी जाए। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि यादगार मामा के आदमी बागियों से मिले हुए थे। उन्होंने सलाई फेरने में भी चालाकी की तथा इस प्रकार सलाई फेरी कि नैखूब तो अंधा हो गया किंतु सुल्तान मुहम्मद मिर्जा की आंखों पर चोट नहीं पहुंची। कुछ दिनों बाद सुल्तान मुहम्मद मिर्जा भी बयाना से भाग खड़ा हुआ और हुमायूँ के बहनोई मुहम्मद जमां मिर्जा से जा मिला। मुहम्मद जमां मिर्जा, सुल्तान मुहम्मद मिर्जा, उलूग मिर्जा और शाह मिर्जा गुजरात के शासक बहादुरशाह से जा मिले।

गुजरात का शासक बहादुरशाह जानता था कि इस समय मुगल सल्तनत नाजुक दौर से गुजर रही है, यदि वह मुगलों को एक जोरदार टक्कर मार दे तो मुगल सल्तनत शीशे के महल की तरह चूर-चूर होकर बिखर सकती है। इसलिए बहादुरशाह ने असंतुष्ट मिर्जाओं को अपनी सेवा में रख लिया।

इन मिर्जाओं ने बहादुरशाह को समझाया कि हुमायूँ एक निकम्मा शासक है और उसकी सेना में कोई दम नहीं है। इसलिये उससे दिल्ली का तख्त प्राप्त करना कठिन नहीं है। मिर्जाओं की इस बात से बहादुरशाह के उत्साह में वृद्धि हुई और वह तेजी से अपनी शक्ति बढ़ाने लगा। निश्चित रूप से उसकी दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी।

मार्च 1531 में बहादुरशाह ने मालवा पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। मेवाड़ का राज्य, दिल्ली तथा मालवा के बीच स्थित था। यदि बहादुरशाह मेवाड़ पर अधिकार स्थापित कर लेता तो वह मुगल सम्राज्य की सीमा पर पहुँच जाता और सीधे मुगल साम्राज्य पर आक्रमण कर सकता था।

बहादुरशाह ने हुमायूँ के शत्रु शेर खाँ अफगान के साथ भी गठजोड़ कर लिया था और हुमायू के विरुद्ध उसकी सहायता कर रहा था। बहादुरशाह ने बंगाल के शासक के साथ भी सम्पर्क स्थापित कर लिया जो हुमायू के विरुद्ध षड्यन्त्र रच रहा था। वास्तव में बहादुरशाह का दरबार हुमायूँ के शत्रुओं की शरण स्थली बन गया था। बहुत से विद्रोही अफगान तथा असंतुष्ट मुगल अमीर, बहादुरशाह के दरबार में चले गये थे।

बहादुरशाह को पुर्तगालियों से भी सैनिक सहायता का आश्वासन मिल गया। बहादुरशाह की गतिविधियां देखकर हुमायूँ भी समझ गया था कि उससे युद्ध होना अनिवार्य है। उसने बहादुरशाह को पत्र लिखा कि वह उसके शत्रुओं को, विशेषकर मुहम्मद जमाँ मिर्जा को अपने यहाँ शरण नहीं दे।

बहादरशाह ने हुमायूँ को संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। इस पर हुमायूँ ने बहादुरशाह के विरुद्ध अभियान करने का निश्चय किया। ई.1535 में हूमायू अपनी सेना के साथ आगरा से प्रस्थान करके ग्वालियर पहुँचा और वहीं से बहादुरशाह की गतिविधियों पर दृष्टि रखने लगा। थोड़े दिनों बाद हुमायूँ और आगे बढ़ा तथा उज्जैन पहुँच गया। इन दिनों बहादुरशाह चित्तौड़ का घेरा डाले हुए था।

पाठकों की सुविधा के लिए यह बताना समीचीन होगा कि जब मेवाड़ का शासक महाराणा सांगा जीवित था तब यही बहादुरशाह अपने दो भाइयों चांद खाँ तथा इब्राहीम खाँ के साथ महाराणा सांगा की शरण में रहा था। महाराणा सांगा ने उसे तथा उसके भाइयों को बड़े प्रेम से अपने पास रखा था।

मिराते सिकंदरी में लिखा है कि सांगा की माता जो हलवद की राजकुमारी थी, बहादुरशाह को बेटा कहा करती थी। एक बार बहादुरशाह तथा राणा सांगा के भतीजे में झगड़ा हो गया जिसमें सांगा का भतीजा मारा गया। जब राणा के राजपूत, बहादुरशाह को मारने लगे तब राजमाता ने शरणागत कहकर बहादुरशाह के प्राणों की रक्षा की थी।

जब महाराणा सांगा का बड़ा पुत्र रत्नसिंह मेवाड़ का महाराणा हुआ तो बहादुरशाह गुजरात का सुल्तान बन चुका था। बहादुरशाह, महाराणा रत्नसिंह की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने महाराणा रत्नसिंह को प्रसन्न करने के लिये 30 हाथी एवं बहुत से घोड़े भेंट किये तथा महाराणा के सामंतों को 1500 जरदोरी खिलअतें प्रदान की।

बहादुरशाह ने महाराणा से प्रार्थना की कि वह मालवा पर आक्रमण करने जा रहा है तथा इस काम में उसे मेवाड़ की सेना चाहिए। महाराणा रत्नसिंह ने अपनी एक सेना बहादुरशाह के साथ कर दी। इस सेना के बल पर बहादुरशाह ने मालवा को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया।

अब वही बहादुरशाह मेवाड़ को निगल जाने के लिए बेताब था। इस समय सांगा का दूसरा पुत्र विक्रमादित्य चित्तौड़ का राणा था। उसमें इतनी शक्ति नहीं थी कि वह बहादुशाह से लड़ सके। इसलिए राणा विक्रमादित्य की माता कर्णवती ने हूमायू को राखी भेजकर उससे सहायता मांगी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह समुद्र में डूब कर मर गया (48)

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गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह - www.bharatkaitihas.com
गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह समुद्र में डूब कर मर गया

फरवरी 1537 में गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह समुद्र में नाव उलट जाने से डूब कर मर गया, जब वह दीव के पुर्तगाली गवर्नर से मिलने जा रहा था। बहादुरशाह ने गुजरात तथा मालवा पर फिर से अधिकार कर लिया था किंतु वह इस विजय का उपभोग नहीं कर सका।

यूरोपियन इतिहासकार ब्रिग्ज ने लिखा है कि जब बहादुरशाह को ज्ञात हुआ कि मेवाड़ की राजमाता ने हुमायूँ को राखी भेजी है तो बहादुरशाह ने हुमायूँ को पत्र लिखा कि- ‘मैं इस समय जेहाद पर हूँ। यदि तुम चित्तौड़ की सहायता करोगे तो खुदा के सामने क्या जवाब दोगे?’

यह पत्र पढ़कर हुमायूँ उज्जैन में ही ठहर गया और चित्तौड़-युद्ध के परिणाम की प्रतीक्षा करने लगा। यह हुमायूँ के लिए स्वर्णिम अवसर था जब वह मेवाड़ से मित्रता करके भारत में अपनी जड़ें मजबूत कर सकता था परन्तु हूमायू ने मेवाड़ की परिस्थिति से कोई लाभ नहीं उठाया।

मेवाड़ी सरदारों ने महाराणा विक्रमादित्य तथा उसके छोटे भाई कुंवर उदयसिंह को दुर्ग से बाहर भेज दिया। अन्ततः बहादुरशाह तथा मेवाड़ की सेना के बीच भयानक संघर्ष हुआ जिसमें मेवाड़ की पराजय हो गई तथा कई हजार मेवाड़ी सैनिक मारे गये। दुर्ग में स्थित स्त्रियों ने राजमाता कर्णवती के नेतृत्व में जौहर किया। चित्तौड़ पर गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह अधिकार करके बैठ गया।

जब गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करके चित्तौड़ की विपुल सम्पदा को लूट चुका तब हुमायूँ की आँखें खुलीं और वह बहादुरशाह पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ा। बहादुरशाह ने चित्तौड़ के किले को आग के हवाले कर दिया और स्वयं भाग कर मंदसौर चला गया। हुमायूँ ने बहादुरशाह का पीछा किया और वह भी मंदसौर पहुंच गया।

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गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह हुमायूँ का मार्ग रोकने के लिये मन्दसौर में चारों ओर से खाइयाँ खुदवा कर मोर्चा बांध कर बैठ गया। उसने अपने तोपखाने को सामने करके अपनी सेना उसके पीछे छिपा दी। हुमायूँ को इसका पता लग गया। इसलिये हुमायूँ के अश्वारोहियों ने तोपों के गोलों की पहुंच से दूर रहकर ही बहादुरशाह की सेना पर बाण-वर्षा करके बहादुरशाह के तोपखाने को बेकार कर दिया। हुमायूँ ने बहादुरशाह के रसद मार्ग को भी काट दिया। इस पर बहादुरशाह मन्दसौर से भागकर माण्डू चला गया। मुगल सेना ने तेजी से बहादुरशाह का पीछा किया। इस पर बहादुरशाह माण्डू से चाम्पानेर की तरफ भागा। माण्डू के दुर्ग पर हुमायूँ का अधिकार हो गया। इस बीच बहादुरशाह की सेना छिन्न-भिन्न हो गई और वह केवल पाँच विश्वस्त अनुचरों के साथ चम्पानेर पहुंच सका। हुमायूँ ने एक हजार अश्वारोहियों के साथ बहादुरशाह का पीछा किया। इस पर बहादुरशाह ने अपने हरम की स्त्रियों तथा अपने खजाने को समुद्र में स्थित दीव नामक द्वीप पर भेज दिया जो उन दिनों पुर्तगालियों के अधिकार में था तथा स्वयं चम्पानेर में आग लगवाकर खम्भात भाग गया।

हूमायू ने खम्भात तक बहादुरशाह का पीछा किया किंतु जब बहादुरशाह दीव भाग गया तो हुमायूँ खंभात से चम्पानेर लौट आया।

हुमायूँ ने चम्पानेर दुर्ग पर अधिकार कर लिया जहाँ से उसे अपार सम्पत्ति प्राप्त हुई। कहा जाता है कि बहादुरशाह पर मिली इस अप्रत्याशित जीत की प्रसन्नता में हुमायूँ चाम्पानेर में ही रुककर भोग-विलास में डूब गया।

गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह शक्तिशाली सुल्तान था किंतु हुमायूँ के हाथों हुई उसकी इतनी भयानक पराजय का कारण यह बताया जाता है कि बहादुरशाह की काफी सेना चित्तौड़ अभियान में मारी गई थी और जो सेना बची थी उसके एक बड़े हिस्से ने बहादुरशाह के साथ छल करके स्वयं को युद्ध से अलग कर लिया क्योंकि बहादुरशाह का सेनापति रूमी खाँ गुप्त रूप से हुमायूँ से मिल गया था।

कुछ समय बाद हुमायूँ चम्पानेर से अहमदाबाद की ओर बढ़ा और उसने गुजरात पर अधिकार कर लिया। हुमायूँ ने मिर्जा अस्करी को गुजरात का शासक नियुक्त कर दिया। गुजरात की व्यवस्था करने के उपरान्त हुमायूँ दीव की ओर बढ़ा। उसका निश्चय बहादुरशाह को दीव में पहुंचकर दण्डित करने का था परन्तु इसी समय हुमायूँ को बिहार में अफगानों की गतिविधियां बढ़ने की सूचना मिली। इसलिये हुमायूँ ने तत्काल आगरा के लिए प्रस्थान किया ताकि वहाँ से बिहार की तरफ जा सके।

हुमायूँ के लौटते ही बहादुरशाह तथा उसके समर्थकों ने मुगलों को गुजरात से खदेड़ना आरम्भ कर दिया। मिर्जा अस्करी ने चाम्पानेर के मुगल गवर्नर तार्दी बेग से सहायता मांगी किंतु तार्दी बेग ने मिर्जा अस्करी की सहायता करने से मना कर दिया। हुमायूँ का ध्यान इस समय बिहार में सिर उठा रहे शेर खाँ पर केन्द्रित था इसलिए हुमायूँ भी अस्करी की सहायता के लिये सेना नहीं भेज सका।

बहादुरशाह ने गुजरात तथा मालवा पर फिर से अधिकार कर लिया किंतु वह इस विजय का बहुत दिनों तक उपभोग नहीं कर सका। फरवरी 1537 में जब वह दीव के पुर्तगाली गवर्नर से मिलने गया, तब नाव उलट जाने से समुद्र में डूब कर मर गया।

जब चित्तौड़ दुर्ग में स्थित बहादुरशाह के सैनिकों को बहादुरशाह के मरने की सूचना मिली तो वे दुर्ग छोड़कर भाग गये। यह समाचार सुनकर मेवाड़ी सरदारों ने पांच-सात हजार सैनिकों को एकत्रित करके चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया। महाराणा विक्रमादित्य तथा कुंवर उदयसिंह भी दुर्ग में आ गये।

हुमायूँ अफगान नेता शेर खाँ की गतिविधियों के समाचार सुनकर गुजरात से आगरा लौटा था। अब उसे अपना ध्यान पूरी तरह शेर खाँ पर केन्द्रित करना आवश्यक था।

शेर खाँ और हुमायूँ ई.1531 में भी चुनार दुर्ग को लेकर आमने-सामने हो गए थे किंतु उस समय शेर खाँ ने चुनार दुर्ग हुमायूँ को देकर युद्ध को कुछ समय के लिए टाल दिया था किंतु अब शेर खाँ ने फिर से ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी थीं जिनके कारण युद्ध को किसी भी हालत में टाला नहीं जा सकता था।

अपने दुर्भाग्य से हुमायूँ ने गुजरात में इतना समय खराब कर दिया था कि शेर खाँ को अपनी शक्ति बढ़ाने तथा हुमायूँ के विरुद्ध युद्ध की तैयारियां करने का पूरा समय मिल गया था। अब हुमायूँ को अपनी इस गलती का दण्ड भुगतना था।

शेर खाँ से हुमायूँ के सम्बन्धों को विस्तार से समझने के लिए हमें शेर खाँ की पिछली जिंदगी में झांकना होगा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शेर खाँ बाबर के प्रधानमंत्री खलीफा का नौकर था (49)

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शेर खाँ बाबर के प्रधानमंत्री खलीफा का नौकर था

बबार की मृत्यु के तुरंत बाद तथा हुमायूँ के बादशाह बनते ही शेर खाँ का नाम अचानक ही इतिहास की पुस्तकों में सामने आने लगता है। उससे पहले शेर खाँ का कोई उल्लेख नहीं मिलता। वह कौन था, कहाँ से आया था, अचानक ही क्यों इतना महत्वपूर्ण हो गया था, इसे जानने के लिए हमें हुमायूँ के इतिहास को कुछ समय के लिए विश्राम देकर शेर खाँ की तरफ चलना होगा। क्योंकि यहाँ से शेर खाँ तथा हुमायूँ का इतिहास साथ-साथ चलने लगते हैं। एक के इतिहास को समझे बिना, दूसरे के इतिहास को समझना कठिन है।

शेर खाँ के पूर्वज अफगानिस्तान में रहने वाले सूर कबीले से निकले थे। इसलिये वे ‘सूर’ एवं ‘सूरी’ कहलाते थे। ये लोग स्वयं को मुहम्मद गौरी का वंशज मानते थे। शेर खाँ के दादा का नाम इब्राहीम खाँ सूरी और पिता का नाम हसन खाँ सूरी था। इब्राहीम खाँ सूरी, अफगानिस्तान के रौह नामक स्थान का निवासी था और घोड़ों का व्यापारी था।

जब दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने अफगानों को भारत में आने का निमंत्रण दिया तब इब्राहीम खाँ सूरी अपने पुत्र हसन खाँ के साथ हिन्दुस्तान चला आया। उसने पंजाब में स्थित हिसार-फिरोजा की जागीर में जमाल खाँ नामक एक अफगान अमीर के यहाँ नौकरी कर ली। जमाल खाँ ने इब्राहीम खाँ सूरी को कुछ गाँव जागीर में दे दिये जिससे वह पचास घोड़ों का खर्च चला सके। इब्राहीम खाँ लोदी के बाद हसन खाँ भी जमाल खाँ की नौकरी करने लगा। धीरे-धीरे हसन खाँ उन्नति करने लगा और पाँच सौ घोड़ों का सरदार बन गया।

हसन खाँ सूरी की चार पत्नियाँ थीं। उनमें से पहली पत्नी एक अफगान महिला थी और शेष तीन हिन्दुस्तानी नौकरानियाँ थीं जिनकी सुंदरता से प्रभावित होकर हसन खाँ ने एक-एक करके उनसे विवाह कर लिये थे। हसन की अफगान पत्नी से दो पुत्र हुए जिनमें से बड़े का नाम फरीद खाँ तथा छोटे पुत्र का नाम निजाम खाँ रखा गया। यही फरीद खाँ आगे चलकर पहले शेर खाँ के नाम से जाना गया तथा बाद में शेरशाह सूरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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कुछ समय पश्चात् दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने जमाल खाँ का स्थानांतरण हिसार-फरोजा से जौनपुर कर दिया। इस पर हसन खाँ भी अपनी चारों पत्नियों एवं उनके बच्चों को लेकर जमाल खाँ के साथ बिहार चला आया। जमाल खाँ ने हसन खाँ को बिहार में स्थित सहसराम तथा खवासपुर टाँडा का जागीरदार बना दिया। जब हसन खाँ का पुत्र फरीद खाँ कुछ बड़ा हुआ तो उसने अनुभव किया कि उसका पिता हसन खाँ अपनी अफगान बीवी अर्थात् फरीद खाँ की माता की बजाय अपनी हिंदुस्तानी बीवियों से अधिक प्रेम करता था। वह फरीद खाँ और निजाम खाँ की बजाय हिंदुस्तानी बीवियों के पेट से उत्पन्न आलौदों पर प्यार लुटाता था। इस कारण फरीद खाँ अपने पिता हसन खाँ से असंतुष्ट होकर जौनपुर चला गया और वहाँ जमाल खाँ के पास रहकर अरबी-फारसी पढ़ने लगा। कुछ समय बाद हसन खाँ स्वयं जौनपुर गया तथा जमाल खाँ को मध्यस्थ बनाकर अपने पुत्र फरीद खाँ को सहसराम ले आया। हसन खाँ ने फरीद को योग्य जानकर उसे अपनी जागीर का प्रबंध सौंप दिया। फरीद खाँ प्रतिभावान एवं शिक्षित तो था ही, साथ ही उसने जौनपुर के राजनीतिक वातावरण में रहकर युद्ध एवं जागीरी शासन के कार्य के बारे में बहुत सी बातें सीख ली थीं।

इसलिए फरीद खाँ ने अपने पिता की जागीर का प्रबंधन बहुत मेहनत एवं समझदारी से किया जिससे हसन खाँ की आय बढ़ गई और हसन खाँ फरीद खाँ को चाहने लगा। यह बात हसन खाँ की हिन्दुस्तानी बीवियों को पसंद नहीं आई और वे फरीद खाँ को हसन खाँ से दूर करने का यत्न करने लगीं। अन्ततः उन्होंने षड़यंत्र करके फरीद खाँ को उसके पिता की जागीर से निकलवा दिया।

इस बार फरीद खाँ अपने पिता की जागीर छोड़कर आगरा चला गया और पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ लोदी की नौकरी करने लगा। जब दौलत खाँ लोदी फरीद खाँ के काम से प्रसन्न हो गया तब फरीद ने दौलत खाँ लोदी से अनुरोध किया कि वह सुल्तान इब्राहीम लोदी से कहकर मुझे मेरे पिता की जागीर दिलवा दे क्योंकि मेरे पिता ने अपनी हिन्दुस्तानी बीवियों के कहने से मुझे अपनी जागीर से बेदखल कर दिया है।

जब दौलत खाँ लोदी ने यह बात सुल्तान इब्राहीम लोदी को बताई तो इब्राहीम लोदी ने कहा कि उसने तुम्हारे सामने अपने पिता की निंदा करके बहुत ही नीचता का काम किया है, इसलिए मैं उसे जागीर नहीं दे सकता। फरीद खाँ मन-मसोसकर रह गया।

ई.1520 में फरीद के पिता हसन की मृत्यु हो गई। यह सूचना पाते ही फरीद ने आगरा से सहसराम के लिए प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचते ही उसने भाइयों को अपने पिता की जागीर से मार भगाया और जागीर पर अधिकार कर लिया। फरीद के सौतले भाइयों को चौंद के जागीरदार मुहम्मद खाँ सूरी का संरक्षण तथा समर्थन प्राप्त हो गया जो एक प्रभावशाली अमीर था। इससे फरीद संकट में पड़ गया। उसने अपने भाइयों के षड़यंत्रों को रोकने के लिए बिहार के शासक बहादुर खाँ नूहानी के यहाँ नौकरी कर ली जिसके प्रभाव का प्रयोग करके फरीद अपने भाइयों के षड़यंत्रों को विफल कर सकता था।

अपनी योग्यता तथा परिश्रम से फरीद ने अपने नये स्वामी को भी प्रसन्न कर लिया। एक बार फरीद ने शेर का शिकार किया। फरीद की वीरता से प्रसन्न होकर बहादुर खाँ नूहानी ने उसे शेर खाँ की उपाधि दी। तब से फरीद शेर खाँ कहलाने लगा। सूरी कबीले का वंशज होने के कारण उसे शेर खां सूरी भी कहते हैं। थोड़े दिन बाद उसे शाहजादे जलाल खाँ का शिक्षक नियुक्त कर दिया गया। इससे शेर खाँ के प्रभाव तथा उसकी प्रतिष्ठा में बड़ी वृद्धि हो गई।

एक बार शेर खाँ सूरी छुट्टी लेकर अपनी जागीर पर गया परन्तु वहाँ अधिक दिनों तक रुक गया। इस पर मुहम्मद खाँ सूरी ने बिहार के सुल्तान बहादुर खाँ नूहानी को शेर खाँ के विरुद्ध भड़काया। बहादुर खाँ नूहानी, मुहम्मद खाँ की बातों में आ गया तथा शेर खाँ से अप्रसन्न हो गया। मुहम्मद खाँ सूरी ने शेर खाँ से कहा कि वह जागीर में अपने भाइयों को हिस्सा दे। शेर खाँ ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इससे अप्रसन्न होकर मुहम्मद खाँ ने शेर खाँ की जागीर पर आक्रमण कर दिया। शेर खाँ भाग खड़ा हुआ और उसने जुनैद बर्लस के यहाँ नौकरी कर ली जो उन दिनों बाबर के पूर्वी प्रान्तों का गवर्नर था।

अपने नये स्वामी की सहायता से शेर खाँ सूरी ने मुहम्मद खाँ को मार भगाया और एक बार फिर अपनी जागीर का स्वामी बन गया। जुनैद बर्लस शेर खाँ से इतना प्रसन्न हो गया कि वह शेर खाँ को अपने भाई निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा के पास आगरा ले गया जो बाबर का प्रधानमन्त्री था। खलीफा ने शेर खाँ को मुगल सेना में रख लिया। इस प्रकार शेर खाँ सूरी बाबर के प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा का नौकर हो गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शेर खाँ सूरी ने हुमायूँ को जमकर मूर्ख बनाया (50)

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शेर खाँ सूरी ने हुमायूँ को जमकर मूर्ख बनाया

शेर खाँ सूरी पन्द्रह महीने तक बाबर के प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा की सेवा में रहा। इस दौरान शेर खाँ सूरी ने मुगलों के सैनिक संगठन, उनकी रणपद्धति तथा उनकी शासन व्यवस्था का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया।

कुछ समय बाद शेर खाँ सूरी फिर से अपनी जागीर सहसराम में चला आया परन्तु इस बार भी वह अधिक दिनों तक सहसराम में नहीं रह सका। उन्हीं दिनों बिहार के शासक बहादुर खाँ नूहानी की मृत्यु हो गयी और उसके स्थान पर उसका अल्पवयस्क बालक जलाल खाँ बिहार का सुल्तान बना। जलाल खाँ की माँ दूदू उसकी संरक्षिका बन गई।

शेर खाँ सूरी, जलाल खाँ का शिक्षक रह चुका था, इसलिए दूदू ने शेर खाँ सूरी को बुला भेजा और इस बार उसे सुल्तान का नायब बना दिया। इस पद पर रहते हुए शेर खाँ को अपने राजनीतिक भविष्य को नई ऊंचाइयाँ देने के अवसर सहज ही प्राप्त हो गए।

शेर खाँ सूरी ने बहुत यत्न से अल्पवयस्क सुल्तान जलाल खाँ तथा उसकी माता दूदू की सेवा की तथा हर तरह से उनका विश्वास जीत लिया। इस कारण बिहार में शेर खाँ की शक्ति तथा प्रभाव बढ़ते ही चले गए। कुछ ही समय में शेर खाँ बिहार सल्तनत का सर्वेसर्वा बन गया। इससे नूहानी अफगानों में बड़ी ईर्ष्या पैदा हो गई और वे शेर खाँ के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे।

कुछ असन्तुष्ट नूहानी अफगान बिहार से भागकर बंगाल पहुँचे और वहाँ के शासक नसरतशाह को बिहार पर आक्रमण करने के लिये उकसाने लगे ताकि नूहानी अफगान अपनी खोई हुई शक्ति फिर से प्राप्त कर सकें। नसरतशाह ने नूहानी अफगानों का साथ मिल जाने से उत्साहित होकर बिहार पर आक्रमण कर दिया परन्तु शेर खाँ ने बंगाल की सेना को परास्त करके मार भगाया। इस घटना के बाद बिहार में नूहानी सरदारों का प्रभाव समाप्त हो गया तथा शेर खाँ का कद और अधिक मजबूत हो गया।

ई.1530 में आगरा में बादशाह बाबर की मृत्यु हो गई और हुमायूँ मुगलों का बादशाह हुआ। ई.1531 में जब हुमायूँ कालिंजर दुर्ग का घेरा डाले हुए था तब शेर खाँ ने चुनार दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

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चुनार दुर्ग अत्यंत सुदृढ़ होने के कारण अभेद्य समझा जाता था। विशेष भौगोलिक परिस्थिति होने के कारण यह दुर्ग पूर्व का फाटक कहलाता था किंतु शेर खाँ को इस दुर्ग पर अधिकार अपने भाग्य की प्रबलता के कारण बिना किसी युद्ध के ही मिल गया था। यह दुर्ग दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के समय से अफगान अमीर ताज खाँ के अधिकार में था जो अपनी पत्नी लाड मलिका के वशीभूत था। इस कारण ताज खाँ की अन्य औरतों के पुत्र अपने पिता ताज खाँ से नाराज रहते थे। एक रात ताज खाँ के बड़े पुत्र ने जो कि एक अन्य मलिका से था, लाड मलिका पर आक्रमण करके उसे घायल कर दिया। ताज खाँ के इस बागी पुत्र ने अपने पिता ताज खाँ की भी हत्या कर दी और चुनार से भाग खड़ा हुआ। शेर खाँ ने इस अवसर से लाभ उठाया और उसने लाड मलिका को अपनी बातों में लेकर चुनार दुर्ग में प्रवेश कर कर लिया तथा लाड मलिका से विवाह कर लिया। शेर खाँ को चुनार दुर्ग में बड़ी सम्पत्ति मिली। इससे शेर खाँ की शक्ति में बड़ी वृद्धि हो गई। इस सम्पत्ति के बल पर शेर खाँ तेजी से सैनिकों की भर्ती करने लगा।

जब हुमायूँ को शेर खाँ सूरी की इस गतिविधि की जानकारी हुई तो हुमायूँ ने चुनार के दुर्ग पर अधिकार करने के लिए हिन्दू बेग नामक सेनापति को चुनार भेजा। हिन्दू बेग ने शेर खाँ से कहा कि वह यह दुर्ग मुगलों को सौंप दे किंतु शेर खाँ ने हिन्दू बेग को चुनार का दुर्ग देने से मना कर दिया। इस पर हुमायूँ स्वयं भी सेना लेकर चुनार पहुँच गया।

हुमायूँ की सेना चार महीने तक चुनार दुर्ग पर घेरा डाले रही किंतु दुर्ग पर अधिकार नहीं कर सकी। अंत में दोनों पक्ष समझौता करने को तैयार हो गये। शेर खाँ ने हुमायूँ से प्रार्थना की कि वह चुनार का दुर्ग शेर खाँ के अधिकार में छोड़ दे। इसके बदले में शेर खाँ सूरी ने अपने तीसरे पुत्र कुत्ब खाँ को एक सेना के साथ हुमायूँ की सेवा में भेजना स्वीकार कर लिया। हुमायूँ ने शेर खाँ की प्रार्थना स्वीकार कर ली और आगरा लौट गया। इस समझौते से हूमायू की प्रतिष्ठा को धक्का लगा तथा शेर खाँ को अपनी योजनाएँ पूर्ण करने का अवसर मिल गया। चुनार का दुर्ग हाथ आ जाने से उसकी शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि हो गई।

ई.1532 में बंगाल के शासक नसरत शाह की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र महमूद खाँ बंगाल का सुल्तान हुआ। ई.1534 में महमूद खाँ ने बिहार पर आक्रमण किया परन्तु शेर खाँ ने उसे सूरजगढ़ के युद्ध में बुरी तरह परास्त किया। सूरजगढ़ का युद्ध मध्यकालीन इतिहास के निर्णयात्मक युद्धों में से एक है।

इस युद्ध में शेर खाँ सूरी को विपुल युद्ध सामग्री भी प्राप्त हुई तथा उसने बंगाल के सुल्तान के साथ-साथ बिहार के नूहानी अफगानों की बची-खुची शक्ति को भी कुचल दिया। कुछ समय बाद शेर खाँ ने बिहार के सुल्तान जलाल खाँ को हटा दिया तथा स्वयं बिहार का स्वतन्त्र शासक बन गया।

शेर खाँ से समझौता करने के बाद हुमायूँ, गुजरात के शासक बहादुरशाह पर अभियान करने के लिए ग्वालियर की ओर चला गया। हुमायूँ ने ग्वालियर, उज्जैन, माण्डू, मंदसौर, चाम्पानेर तथा खम्भात आदि में इतना अधिक समय गंवा दिया कि शेर खाँ को अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए पर्याप्त समय मिल गया। उसने बिहार में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली और वह पूर्व के समस्त अफगानों का नेता बन गया।

शेर खाँ ने अफगान अमीरों को आश्वासन दिया कि यदि वे शेर खाँ के झण्डे के नीचे संगठित होकर मुगलों का सामना करें तो मुगलों को भारत से बाहर निकाला जा सकता है तथा अफगानों को अपने पुराने प्रांत तथा जागीरें फिर से प्राप्त हो सकते हैं। इस समय तक लोदी पूरी तरह नेपथ्य में जा चुके थे। इसलिए समस्त अफगान अमीर शेर खाँ के झंडे के नीचे एकत्रित होने लगे। शेर खाँ ने गुजरात के शासक बहादुरशाह के साथ भी सम्पर्क स्थापित किया जिसने शेर खाँ को विपुल धन प्रदान किया ताकि शेर खाँ एक बड़ी सेना तैयार कर सके।

शेर खाँ ने एक सुनिश्चित आर्थिक नीति का अनुसरण करके बहुत सा धन इकट्ठा किया तथा उसकी सहायता से एक विशाल सेना तैयार की। यद्यपि शेर खाँ ने अपने पुत्र कुत्ब खाँ को एक सेना के साथ हुमायूँ की सेवा में भेजने का वचन दिया था परन्तु उसने इस वचन को पूरा नहीं किया और अपनी सेना बढ़ाने में लगा रहा। वास्तविकता यह थी कि शेर खाँ सूरी हुमायूँ को अपनी कूटनीतिक चालों में फंसाकर मूर्ख बना रहा था। उसके मन में कपट भरा हुआ था। वह शीघ्र ही हुमायूँ के समूचे राज्य को हड़प जाने वाला था!                              

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ की भूल (51)

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हुमायूँ की भूल

सरल स्वभाव का हुमायूँ लोगों के कथन पर सहज ही विश्वास कर लेता था, यहाँ तक कि अपने शत्रुओं की बातों पर भी विश्वास कर लेता था। राजनीति में सहज विश्वास कर लेने की आदत हुमायूँ की भूल सिद्ध हुई।

 शेर खाँ ने चुनार के दुर्ग पर सहज ही अधिकार कर लिया और हुमायूँ उससे यह दुर्ग खाली नहीं करवा सका। जब हुमायूँ गुजरात के शासक बहादुरशाह पर अभियान करने चला गया तो शेर खाँ ने गंगा के किनारे-किनारे अपनी शक्ति का विस्तार करना आरम्भ किया और चुनार से लेकर बंगाल की सीमा तक का क्षेत्र अपने अधिकार में कर लिया।

मार्च 1537 में शेर खाँ की सेना ने गौड़ का दुर्ग घेर लिया। बंगाल के शासक महमूदशाह ने शेर खाँ से संधि कर ली और उसे तेरह लाख दीनार देकर अपना पीछा छुड़ाया परन्तु शेर खाँ ने इसका यह अर्थ निकाला कि महमूदशाह ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली है और वह उसे वार्षिक कर दिया करेगा।

जब हुमायूँ शेर खाँ की गतिविधियों के समाचार सुनकर गुजरात से आगरा लौटा तो उसने हिन्दू बेग को जौनपुर का गवर्नर बना कर भेजा तथा शेर खाँ पर दृष्टि रखने के आदेश दिए। हिन्दू बेग एक बड़ी सेना लेकर जौनपुर पहुंचा। उसने हुमायूँ का विशेष दूत शेर खाँ के पास भेजा तथा उससे कहलवाया कि उसने हाल ही में जिन इलाकों पर अधिकार किया है, वे इलाके मुगल बादशाह हुमायूँ को समर्पित कर दे।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि जिस समय हुमायूँ का दूत शेर खाँ के पास पहुंचा, उस समय शेर खाँ सिपाहियों की तरह हाथ में फावड़ा लेकर खाई खोद रहा था। शेर खाँ ने हाथ में फावड़ा पकड़े हुए ही हुमायूँ के दूत से बात की। संभवतः ऐसा करके शेर खाँ हुमायूँ को यह जताना चाहता था कि शेर खाँ बहुत ही सामान्य आदमी है और उसे बादशाहों तथा सुल्तानों की तरह तख्त और ताज की आवश्यकता नहीं है।

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शेर खाँ ने हुमायूँ के दूत से कहा कि मैंने हमेशा बादशाह हुमायूँ के प्रति निष्ठा और भक्ति निभाई है। मैंने न तो बादशाह के विरुद्ध कोई अपराध किया है और न उसकी राज्य की सीमाओं के भीतर अपने सैनिक भेजे हैं। मैंने लोहानियों से बिहार का राज्य प्राप्त किया था किंतु बंगाल के सुल्तान ने मेरा राज्य छीनने का प्रयास किया। तब मैंने बंगाल के सुल्तान से प्रार्थना की थी कि वह मुझे बिहार पर शांति से राज्य करने दे किंतु वह नहीं माना। इसलिए मैंने उसे दण्डित किया। केवल इतनी सी बात से नाराज होकर बादशाह हुमायूँ ने मुझे नुक्सान पहुंचाने के लिए बंगाल की ओर रुख किया है। यह बादशाह हुमायूँ की भूल है। वह मेरी विशाल अफगान सेना को शत्रु बनाकर आगरा में शांति से शासन नहीं कर सकेगा। शेर खाँ ने कहा कि बादशाह हुमायूँ का यह सोचना भी भूल है कि वह हमारी सेना को नष्ट कर देगा। बादशाह हुमायूँ ने हमारे साथ की गई पुरानी समस्त संधियों को तोड़ दिया है इसलिए अब मैं अपने अफगानों से यह करने में असमर्थ हूँ कि वे बादशाह के विरुद्ध विद्रोह न करें। मुगलों का यह ख्याल रहा है कि भारत में अफगानों की आपसी लड़ाई के कारण उन्हें भारत को विजय करने का अवसर मिला है किंतु अब वह स्थिति नहीं है।

आज अफगान फिर से एक हो चुके हैं और अब युद्ध-स्थल में ही इसका निर्णय होगा कि मुगलों ओर अफगानों में किसकी सेना अधिक मजबूत है!

शेर खाँ ने कूटनीति से काम लेते हुए एक ओर तो हुमायूँ के दूत को खूब खरी-खोटी सुनाई तथा उसे युद्ध की धमकी दी तथा दूसरी ओर दूत की बड़ी खातिर-तवज्जो की और उसके हाथों हुमायूँ के लिए बहुत सारे बहुमूल्य उपहार भिजवाए। इसके बाद शेर खाँ ने चुनार तथा बनारस को छोड़कर, पूर्व के समस्त जिलों से नियंत्रण हटा लिया। शेर खाँ ने हिन्दू बेग के समक्ष हुमायूँ के प्रति निष्ठा प्रकट की। हिन्दू बेग को संतोष हो गया और उसने हुमायूँ को संदेश भेजा कि पूर्व की स्थिति बिल्कुल चिन्ताजनक नहीं है। हुमायूँ भी निश्चिन्त हो गया।

इसके बाद कठिनाई से कुछ महीने ही बीते थे कि ई.1537 में हुमायूँ को सूचना मिली की शेर खाँ ने फिर से बंगाल पर आक्रमण कर दिया है क्योंकि बंगाल के सुल्तान महमूदशाह ने शेर खाँ को वार्षिक-कर नहीं भेजा था। शेर खाँ ने गौड़ पर अधिकार कर लिया। बंगाल के सुल्तान महमूदशाह ने भागकर हुमायूँ के यहाँ शरण ली।

शेर खाँ द्वारा बंगाल पर किए गए इस आक्रमण से हुमायूँ का सतर्क हो जाना स्वाभाविक ही था। इस समय तक शेर खाँ की सेना काफी विशाल हो चुकी थी तथा उसके साधनों में भी बड़ी वृद्धि हो चुकी थी। शेर खाँ ने चुनार से लेकर गौड़ तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अपनी धाक जमा ली थी। वह भारत में एक बार फिर से अफगान राज्य स्थापित करने का स्वप्न देख रहा था। इन कारणों से हुमायूँ, शेर खाँ के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए बाध्य हो गया।

जुलाई 1537 में वर्षा ऋतु आरम्भ हो जाने पर भी हुमायूँ ने आगरा से प्रस्थान किया। उसने कई महीने तक गंगाजी के किनारे पर स्थित कड़ा-मानिकपुर में पड़ाव डाले रखा तथा वहाँ से चलकर नवम्बर 1537 में चुनार से कुछ मील दूर अपना शिविर लगाया। हुमायूँ के अफगान-सरदारों ने हुमायूँ को परामर्श दिया कि वह सीधा गौड़ जाये और शेर खाँ की बंगाल-विजय की योजना को विफल कर दे।

दूसरी ओर मुगल सेनापतियों ने हुमायूँ को परामर्श दिया कि चुनार जैसे महत्त्वपूर्ण दुर्ग को, जो बंगाल के मार्ग में पड़ता था, शेर खाँ के हाथ में छोड़ना ठीक नहीं है। चुनार जीत लेने से हुमायूँ के साधनों में भी वृद्धि हो जायेगी, आगरा का मार्ग सुरक्षित बना रहेगा और चुनार को आधार बनाकर पूर्वी भारत के अफगानों से युद्ध किया जा सकेगा।

इस समय शेर खाँ की सेना ने गौड़ दुर्ग को घेर रखा था। हुमायूँ को शेर खाँ की शक्ति तथा बंगाल के शासक की कमजोरी का सही अनुमान नहीं था। इस कारण हुमायूँ को लगा कि बंगाल का शासक कुछ दिनों तक अपने राज्य की रक्षा कर सकेगा। इसलिये हुमायूँ ने मुगल सरदारों के परामर्श को स्वीकार करके चुनार दुर्ग पर आक्रमण कर दिया।

मुस्तफा रूमी खाँ ने हुमायूँ को आश्वासन दिया कि तोपखाने की सहायता से चुनार दुर्ग पर शीघ्र ही अधिकार स्थापित हो जाएगा परन्तु ऐसा नहीं हो सका। दुर्ग को जीतने में लगभग 6 माह लग गये। इस विलम्ब के परिणाम बड़े भयानक हुए।

कुछ विद्वानों की धारणा है कि इस भयंकर भूल के कारण ‘हुमायूँ को अपना साम्राज्य खो देना पड़ा।’ हुमायूँ ने इस अवसर पर एक और भूल की। उसने चुनार दुर्ग की सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंध नहीं किए। शेर खाँ को चुनार खो देने का बहुत दुःख हुआ क्योंकि यह दुर्ग उसकी शक्ति का आधार बन गया था।

शेर खाँ को हुमायूँ के विरुद्ध डटे रहने के लिये एक दुर्ग की आवश्यकता थी। इसलिये शेर खाँ ने रोहतास दुर्ग पर अधिकार करने की योजना बनाई।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा चिंतामणि के साथ घिनौना व्यवहार किया शेरशाह सूरी ने (52)

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राजा चिंतामणि के साथ घिनौना व्यवहार किया शेर खाँ ने

ई.1539 में रोहतास दुर्ग पर राजा चिंतामणि का शासन था। इतिहास की पुस्तकों में राजा चिंतामणि को नृपति भी कहा गया है। राजा चिन्तामणि शेर खाँ का मित्र था। राजा चिंतामणि इस बात को समझने में असफल रहा कि राजनीति में कोई किसी का मित्र नहीं होता, मुसलमान तो बिल्कुल भी नहीं!

जब हुमायूँ (Humayun) ने चुनार दुर्ग पर अधिकार कर लिया तो शेर खाँ (Shershah Suri) को हुमायूँ का मार्ग रोकने के लिए एक सुदृढ़ दुर्ग की आवश्यकता हुई। उसकी दृष्टि रोहतास दुर्ग पर पड़ी। उस काल में चुनार के किले को बंगाल का पहला नाका और रोहतासगढ़ को बंगाल का दूसरा नाका कहते थे।

रोहतास दुर्ग (Rohtas Fort) बिहार में बहने वाली सोन नदी के तट पर स्थित कैमूर पहाड़ी पर बना हुआ है। जनश्रुतियों के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण अयोध्या के राजा महाराज हरिश्चन्द्र के पुत्र राजा रोहिताश्व ने करवाया था। इस कारण यह दुर्ग भारत के प्राचीनतम दुर्गों में से एक है। इस दुर्ग में महाराज रोहिताश्व का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर भी स्थित था जिसे मुगल बादशाह औरंगजेब ने तुड़वाया था।

रोहतासगढ़ से 7वीं शती ईस्वी के बंगाल के महासामंत शशांक (Shashank) का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है जो थानेश्वर के सम्राट हर्षवर्द्धन का समकालीन था तथा जिसने हर्षवर्द्धन (Harsh Vardhan) के भाई राज्यवर्धन को मारा था। हुमायूँ के काल में रोहतासगढ़ को भारत के सुदृढ़तम किलों में गिना जाता था। यह दुर्ग पूर्व से पश्चिम में चार मील और उत्तर से दक्षिण में पाँच मील के विस्तार में है। भारत में इतना बड़ा दुर्ग और कोई नहीं है। उस काल में इस दुर्ग में चौदह द्वार थे।

बहुत समय तक रोहतास दुर्ग कुशवाहा राजाओं के अधिकार में रहा। उसके बाद खारवार राज्य के अंतर्गत रहा। ई.1539 में रोहतास दुर्ग पर राजा चिंतामणि का शासन था। इतिहास की पुस्तकों में राजा चिंतामणि को नृपति भी कहा गया है। राजा चिन्तामणि शेर खाँ का मित्र था।

हुमायूँ का मार्ग रोकने के लिए शेर खाँ ने इस दुर्ग को अपना केन्द्र बनाने का निश्चय किया। शेर खाँ जानता था कि वह लड़कर रोहतास के दुर्ग पर अधिकार नहीं कर सकता। इसलिए शेर खाँ ने यहाँ भी वैसा ही षड़यंत्र करने की योजना बनाई जैसा षड़यंत्र उसने चुनार की बेवा लाड मलिका के साथ किया था।

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शेर खाँ ने रोहतास के राजा चिन्तामणि के पास अपना दूत भेजकर उससे प्रार्थना की कि चुनार दुर्ग पर मुगलों ने अधिकार कर लिया है और मेरे परिवार को किसी सुरक्षित स्थान की आवश्यकता है। अतः आप कुछ समय के लिए रोहतास दुर्ग मुझे दे दें ताकि मेरा परिवार वहाँ रह सके। जब हुमायूँ पूरब से वापस आगरा लौट जाएगा, तब मैं रोहतास का दुर्ग आपको लौटा दूंगा। राजा चिंतामणि ने शेर खाँ को अपना मित्र समझ कर संकट की इस घड़ी में शेर खाँ की सहायता करने का निश्चय किया तथा रोहतास दुर्ग शेर खाँ के परिवार को रहने के लिए दे दिया। शेर खाँ से कहा गया कि वह केवल अपने परिवार की महिलाओं को उनकी दासियों के साथ दुर्ग में रहने के लिए भेज दे। उनके साथ पुरुष न भेजे जाएं। आपके परिवार की महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी राजा चिंतामणि के सैनिक करेंगे। शेर खाँ ने राजा चिंतामणि की यह शर्त स्वीकार कर ली और अपने परिवार को रोहतास दुर्ग में भेज दिया। शेर खाँ के सैनिक कई सौ डोलियाँ कंधों पर उठाकर रोहतास दुर्ग पहुंचे। दुर्ग के द्वार पर शेर खाँ के सैनिकों को रोक दिया गया और डोलियों की जांच करके उन्हें दुर्ग के भीतर लिया जाने लगा।

आगे की डोलियों में कुछ बूढ़ी औरतें थीं। इन डोलियों को दुर्ग में प्रवेश दे दिया गया किंतु इनके पीछे की डोलियों में शेर खाँ के सशस्त्र सैनिक बैठे हुए थे। वे डोलियों से कूदकर बाहर आ गए। इस समय दुर्ग का द्वार खुला हुआ था और राजा चिंतामणि के बहुत कम सैनिक शेर खाँ के परिवार की डोलियों की जांच एवं पहरे के काम पर नियुक्त थे।

इसलिए शेर खाँ के सशस्त्र सैनिकों ने राजा चिंतामणि के सैनिकों को संभलने का अवसर दिए बिना ही उनका कत्ल कर दिया। शेर खाँ स्वयं भी एक सेना लेकर दुर्ग के बाहर पहाड़ी में छिपा हुआ था। उसने भी दुर्ग में घुसकर दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

शेर खाँ का यह कृत्य अत्यंत घिनौना था और विश्वासघात की पराकाष्ठा था। भारत के इतिहास में ऐसे विश्वासघात बहुत कम मिलते हैं किंतु शेर खाँ ने शत्रु पर विजय पाने की लालसा में यह कलंक अपने माथे पर ले लिया। शेर खाँ ने रोहतास दुर्ग के चौदह दरवाजों में से दस दरवाजे बंद करवा दिए तथा चार दिशाओं में केवल चार दरवाजे रखकर उन पर कड़े पहरे लगाए ताकि कोई भी व्यक्ति धोखे से दुर्ग में प्रवेश न कर सके।

बहुत से इतिहासकार लिखते हैं कि रोहतास दुर्ग का निर्माण शेरशाह सूरी ने करवाया था किंतु यह बात सही नहीं है। रोहतास दुर्ग भारत के सबसे प्राचीन किलों में से था। बहुत से इतिहासकारों ने लिखा है कि शेरशाह सूरी ने रोहतास दुर्ग की चारदीवारी का निर्माण करवाया। यह बात भी बिल्कुल गलत है। भारत के इस विशालतम दुर्ग की चारदीवारी युगों से अस्तित्व में थी। शेरशाह ने उस चारदीवारी के दस दरवाजों को बंद करवाकर उसे मजबूत बनाने का कार्य किया था।

चुनार पर अधिकार करने के बाद हुमायूँ ने बनारस पर भी अधिकार कर लिया और उधर शेर खाँ ने रोहतास दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्थिति मजबूत करके एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रहे थे।

जब हुमायूँ बनारस से आगे बढ़ा तो शेर खाँ झारखण्ड चला गया तथा हुमायूँ के अगले कदम की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ पुस्तकों में लिखा है कि शेर खाँ ने हुमायूँ को संदेश भिजवाया कि आप मेरे विरुद्ध कार्यवाही नहीं करें। मैं आपका पुराना गुलाम हूँ। आप मुझे रहने के लिए कोई स्थान दे दें ताकि मैं वहाँ निवास कर सकूं। मैं आपको 10 लाख रुपया वार्षिक-कर के रूप में भेज दिया करूंगा।

जब शेर खाँ के सैनिकों ने बंगाल के सुल्तान महमूद से गौड़ का दुर्ग खाली करवाया था तब बंगाल का सुल्तान महमूद उत्तरी बंगाल की ओर भाग खड़ा हुआ था। कुछ समय बाद में उसने हुमायूँ की शरण में जाने की योजना बनाई। जब शेर खाँ को ज्ञात हुआ कि बंगाल का सुल्तान महमूद बादशाह हुमायूँ की शरण में जाना चाहता है तो शेर खाँ ने अपनी सेना को आदेश दिए कि वह बंगाल के सुल्तान का पीछा करे और उसे हुमायूँ तक नहीं पहुंचने दे।

मार्ग में एक स्थान पर बंगाल तथा शेर खाँ की सेनाओं में पुनः संघर्ष हुआ जिसमें बंगाल का सुल्तान बुरी तरह घायल हुआ किंतु युद्ध के मैदान से जीवित ही निकल भागने में सफल रहा और पटना के पास हाजीपुर नामक स्थान पर पहुंच गया। इस समय हुमायूँ भी हाजीपुर में शिविर लगाए हुए था। 

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मिर्जा हिन्दाल ने हुमायूँ की पीठ में तीसरी छुरी मारी (53)

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मिर्जा हिन्दाल ने हुमायूँ की पीठ में तीसरी छुरी मारी

मिर्जा हिन्दाल के कर्त्तव्य-भ्रष्ट हो जाने के कारण हुमायूँ की सेना में रसद की कमी हो गई। इधर शेर खाँ ने आगरा जाने वाले मार्गों पर नियन्त्रण कर लिया। इन परिस्थितियों में बंगाल से वापसी-यात्रा की तैयारी करने के अतिरिक्त हूमायू के पास कोई चारा नहीं बचा।

जब हुमायूँ ने शेर खाँ की तरफ बढ़ना आरम्भ किया तब शेर खाँ ने हुमायूँ को पत्र लिखकर आग्रह किया कि आप मेरे विरुद्ध कार्यवाही नहीं करें। मैं आपका पुराना गुलाम हूँ। आप मुझे रहने के लिए कोई स्थान दे दें ताकि मैं वहाँ निवास कर सकूं। मैं आपको 10 लाख रुपया वार्षिक कर के रूप में भेज दिया करूंगा।

शेर खाँ का पत्र पहुंचने के तीन दिन बाद बंगाल का सुल्तान मुहम्मद खाँ घायल अवस्था में हुमायूँ के शिविर में उपस्थित हुआ। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि बंगाल का सुल्तान युद्ध में घायल होकर हुमायूँ की शरण में आया। सुल्तान मुहम्मद खाँ ने हुमायूँ से कहा कि आप शेर खाँ की बात का विश्वास न करें। वह दगा करेगा। उसने हर आदमी के साथ आज तक दगा ही की है।

विद्या भास्कर ने अपनी पुस्तक शेरशाह सूरी में लिखा है कि सुल्तान महमूद हुमायूँ के सामने लाया गया किंतु हुमायूँ ने उसका उचित आदर और स्वागत नहीं किया। हुमायूँ ने बंगाल के सुल्तान के साथ साधारण उदारता का परिचय भी नहीं दिया, इससे सुल्तान महमूद को बड़ी मार्मिक वेदना हुई। मानसिक चिंता और अपमान से कुछ ही दिनों में उसका देहांत हो गया। हुमायूँ ने उसकी सेना को अपने अधीन कर लिया।

जिस जगह पर हुमायूँ का शिविर लगा हुआ था, उससे लगभग 24 किलोमीटर दूर शेर खाँ ने अपनी सेना के बीस हजार घुड़सवारों को शिविर लगाने भेजा ताकि जब मुगल सेना शेर खाँ की तरफ आगे बढ़े तो शेर खाँ के सैनिक मुगल सेना को पीछे से आकर तंग करें।

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हुमायूँ के शिविर से कुछ दूरी पर एक गांव स्थित था। एक दिन हुमायूँ के कुछ सैनिक उस गांव में कुछ सामान खरीदने गए। वहाँ उन्होंने कुछ घुड़सवारों को घूमते हुए देखा। इस पर हुमायूँ के सैनिकों ने गांव वालों से पूछा कि ये लोग कौन हैं? गांव वालों ने हुमायूँ के सैनिकों को बताया कि ये शेर खाँ के सैनिक हैं। शेर खाँ स्वयं भी इस गांव से कुछ दूरी पर एक शिविर में ठहरा हुआ है। शेर खाँ का नाम सुनते ही हुमायूँ के सैनिक भयभीत हो गए और तुरंत ही उस गांव से निकल कर अपने शिविर में लौट आये। हुमायूँ ने अपने सेनापतियों को शेर खाँ के विरिुद्ध अभियान करने के आदेश दिए तथा स्वयं भी एक सेना लेकर गौड़ के लिए चल दिया। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि जब शेर खाँ ने सुना कि बादशाह हुमायूँ आ रहा है तो शेर खाँ तेज गति से चलता हुआ झारखण्ड से गढ़ी चला गया ताकि हुमायूँ को गौड़ पहुंचने से रोका जा सके। बंगाल और बिहार के बीच में एक दर्रा है जिसके एक ओर गंगाजी तथा दूसरी ओर एक पहाड़ी स्थित है। इस स्थान को उन दिनों तेलिया गढ़ी कहते थे किंतु गुलबदन बेगम ने इसे गढ़ी लिखा है। संभवतः इस स्थान पर कोई पुरानी गढ़ी अर्थात् लघु दुर्ग था।

गढ़ी पर शेर खाँ के अमीर खवास खाँ का अधिकार था किंतु शेर खाँ ने अपने पुत्र जलाल खाँ को आदेश दिया कि वह गढ़ी पहुंचकर गढ़ी को मजबूत करे तथा उसमें मोर्चा बांधे। इसके बाद शेर खाँ स्वयं भी उसी गढ़ी में आ गया। दोनों ओर के गुप्तचर दोनों ओर हो रही गतिविधियों के समाचार अपने-अपने स्वामी को पहुंचा रहे थे।

शेर खाँ ने अपने अधिकांश सैनिकों को रोहतास के दुर्ग में नियुक्त किया है और स्वयं गढ़ी चला गया है, यह बात हुमायूँ को ज्ञात हो गई। इसलिए हुमायूँ भी रोहतास की ओर न जाकर गढ़ी की ओर बढ़ा।

जब हुमायूँ गढ़ी के निकट पहुंचा तो दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। इस युद्ध में हुमायूँ का सेनापति जहांगीर बेग बुरी तरह घायल हो गया किंतु शेर खाँ को अपनी पराजय स्पष्ट दिखाई देने लगी। इसलिए रात के अंधेरे का लाभ उठाकर शेर खाँ तथा उसका पुत्र जलाल खाँ गढ़ी छोड़कर जंगलों में भाग गए। हुमायूँ गढ़ी से आगे बढ़कर गौड़ पहुंचा।

हुमायूँ नौ महीने तक गौड़ दुर्ग पर घेरा डालकर पड़ा रहा। अंत में गौड़ पर भी हुमायूँ का अधिकार हो गया। हुमायूँ ने गौड़ दुर्ग का नाम बदलकर जिन्नताबाद रख दिया। जब हुमायूँ गौड़ में था, तब उसे सूचना मिली कि मिर्जा हिन्दाल ने बगावत कर दी है तथा बहुत से मुगल सेनापति एवं बेग हुमायूँ का पक्ष त्यागकर मिर्जा हिंदाल की तरफ चले गए हैं।

पाठकों को स्मरण होगा कि मिर्जा हिन्दाल हुमायूँ का सबसे छोटा सौतेला भाई था जिसका पालन-पोषण हुमायूँ की माता माहम बेगम ने किया था। गुलबदन बेगम मिर्जा हिंदाल की सगी बहिन थी।

मिर्जा हिन्दाल बदख्शां में हुमायूँ के संरक्षण में रहा करता था और हुमायूँ उसे बदख्शां का गवर्नर बनाकर स्वयं आगरा आ गया था किंतु बाबर की मृत्यु से पहले ही मिर्जा हिन्दाल भी भारत आ गया था और बाबर की मृत्यु के बाद बादशाह हुमायूँ ने मिर्जा हिन्दाल को मेवात का राज्य दे दिया था किंतु हिंदाल मेवात से संतुष्ट नहीं था और अपने लिए अधिक उपाजाऊ एवं बड़े समृद्ध क्षेत्र चाहता था।

मिर्जा हिन्दाल का यह विद्रोह अपने बड़े भाई हुमायूँ की पीठ में छुरी भौंकने जैसा था। उससे पहले हुमायूँ का भाई मिर्जा कामरान भी हुमायूँ के साथ छल करके पंजाब पर अधिकार कर चुका था और हुमायूँ का बहनोई मिर्जा जमां तथा उसके पुत्र भी हुमायूँ का पक्ष छोड़कर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के पक्ष में जा चुके थे। अपने ही परिवार के लोगों द्वारा हुमायूँ की पीठ में भौंकी गई यह तीसरी छुरी थी।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि खुसरू बेग, जाहिद बेग और सैयद अमीरमिर्जा हिन्दाल की तरफ हो गए। उन्होंने हिंदाल को बताया कि मुहम्मद सुल्तान मिर्जा, उसके पुत्र उलूग मिर्जा एवं शाह मिर्जा ने फिर से सिर उठाया है। वे सदैव एक स्थान पर रहते हैं।

शेखों का रक्षक शेख बहलोल, मुहम्मद सुल्तान मिर्जा की तरफ हो गया है तथा शाही युद्ध-भण्डार की सामग्री तहखाने में छिपाकर चुपके से छकड़ों में लादकर बागी मिर्जाओं और शेर खाँ को भिजवाता है। इस पर मिर्जा हिंदाल ने नूरूद्दीन मुहम्मद को भेजकर तहखानों और छकड़ों की जांच करवाई तो खुसरू बेग, जाहिद बेग और सैयद अमीर की बात सही पाई गई। इस पर हिंदाल ने शेख बहलोल को मार दिया।

कुछ लेखकों के अनुसार हुमायूँ ने हिंदाल को आदेश भिजवाए कि वह अपने सैनिक लेकर हुमायूँ की सहायता के लिए आए किंतु हिन्दाल ने हुमायूँ से सम्पर्क समाप्त कर दिया। हिन्दाल के इस व्यवहार से हुमायूँ को बड़ी चिन्ता हुई। उसने वास्तविकता का पता लगाने के लिय शेख बहलोल को आगरा भेजा।

मिर्जा हिन्दाल के कर्त्तव्य-भ्रष्ट हो जाने के कारण हुमायूँ की सेना में रसद की कमी हो गई। इधर शेर खाँ ने आगरा जाने वाले मार्गों पर नियन्त्रण कर लिया। इन परिस्थितियों में बंगाल से वापसी-यात्रा की तैयारी करने के अतिरिक्त हूमायू के पास कोई चारा नहीं बचा।

थोड़े ही दिनों में हुमायूँ को सूचना मिली कि हिन्दाल ने आगरा पर अधिकार करके शेख बहलोल की हत्या कर दी है। इस पर हुमायूँ ने बंगाल से शीघ्र ही प्रस्थान करने का निश्चय किया। वह बंगाल का शासन जहाँगीर कुली खाँ को सौंपकर गौड़ से आगरा के लिए चल दिया। वह गंगाजी के किनारे-किनारे चलता हुआ मुंगेर पहुंचा तथा अपने परिवार को नावों पर सवार करके हाजीपुर पटना पहुंच गया।

यहीं पर हुमायूँ को समाचार मिला कि शेर खाँ भारी सेना लेकर आ रहा है। हुमायूँ के पास अपनी शाही सेना तो थी ही, इसके साथ ही हुमायूँ के आदेश से जौनपुर से बाबा बेग, चुनार से मीरक बेग और अवध से मुगल बेग अपनी-अपनी सेनाएं लेकर हुमायूँ की सेवा में आ गए। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि इन सेनाओं के आने से उस क्षेत्र में अनाज महंगा हो गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मौत का जाल बिछा दिया शेर खाँ ने (54)

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मौत का जाल बिछा दिया शेर खाँ ने

जब शेर खाँ को ज्ञात हुआ कि हुुमायूँ वापस जा रहा है तो वह जंगलों से निकल आया। उसने हुमायूँ के लिए मौत का जाल बिछा दिया। इस समय हुमायूँ की स्थिति उस चिड़िया की तरह थी जिसके पैरों में मौत का जाल था और उसे खतरे का आभास तक नहीं था।

जब बंगाल की राजधानी गौड़ पर अधिकार करने के बाद हुमायूँ को समाचार मिला कि मिर्जा हिंदाल ने बगावत कर दी है तथा कुछ मुगल अमीर एवं बेग, मिर्जा हिंदाल की तरफ हो गए हैं तो हुमायूँ गौड़ से आगरा के लिए रवाना हुआ तथा गंगाजी के किनारे चलता हुआ गौड़ से मुंगेर होता हुआ हाजीपुर (पटना के निकट) पहुंच गया। 

जब शेर खाँ को ज्ञात हुआ कि हुुमायूँ वापस जा रहा है तो वह जंगलों से निकल आया। उसने अपनी सेनाओं को रोहतास दुर्ग में एकत्रित होने के आदेश दिए। शेर खाँ हुमायूँ को जीवित ही आगरा तक नहीं पहुंचने देता था। इसलिए जब शेर खाँ की पर्याप्त सेनाएं रोहतास पहुंच गईं तो शेर खाँ इन सेनाओं को लेकर हाजीपुर के लिए रवाना हुआ। हाजीपुर पहुंचकर शेर खाँ ने नदी के दूसरे तट पर शिविर लगा लिया जिसके एक तरफ हुमायूँ का शिविर था।

जब हुमायूँ को समाचार मिला कि शेर खाँ भारी सेना लेकर आ रहा है तो हुमायूँ ने जौनपुर से बाबा बेग, चुनार से मीरक बेग और अवध से मुगल बेग की सेनाएं बुलवा लीं।

हाजीपुर पहुंचकर शेर खाँ ने हुमायूँ को एक बार फिर प्रस्ताव भिजवाया- ‘यदि बादशाह मुझे बंगाल का राज्य प्रदान कर दे तो मैं बादशाह को 10 लाख रुपए वार्षिक-कर चुकाउंगा, बादशाह के नाम का खुतबा पढ़वाउंगा, बादशाह के नाम के ही सिक्के ढलवाउंगा और बादशाह का स्वामिभक्त बनकर रहूंगा।’

तारीखे शेरशाही में लिखा है कि इस प्रस्ताव के जवाब में हुमायूँ ने लिखा- ‘मैं तुम्हें बंगाल का राज्य देने को तैयार हूँ किंतु इस समय तुमने मेरे राज्य की सीमाओं का अतिक्रमण करके तथा मेरे सामने अपनी सेनाएं खड़ी करके बहुत अनुचित कार्य किया है। तुम्हें मेरा उचित सम्मान करते हुए वापस लौट जाना चाहिए। मैं 2-3 पड़ाव तक तुम्हारा पीछा करूंगा किंतु उसके बाद वापस लौट आउंगा। यह मैं इसलिए करूंगा ताकि सारे सैनिक मेरी उत्तम सैनिक शक्ति से परिचित हो जाएं।’

मखजने अफगना के अनुसार भी हुमायूँ केवल दिखावे के लिए शेर खाँ का पीछा करना चाहता था ताकि हुमायूँ का सम्मान बना रहे। हुमायूँ ने शेख फरीद शकर गंज के वंशज शेख खलील को अपना पत्र देकर शेर खाँ के पास भेजा। उसके साथ बहुत सारे मुगल अधिकारी भेजे गए। इन लोगों ने शेर खाँ को बादशाह हुमायूँ का प्रस्ताव दे दिया। शेर खाँ ने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

विद्या भास्कर ने अपनी पुस्तक शेरशाह सूरी में लिखा है- ‘जब सारे मुगल अधिकारी शेर खाँ से बात करके उसके दरबार से चले गए तो शेर खाँ ने हुमायूँ के दूत शेख खलील को गुप्त रूप से अपने पास बुलवाया तथा उससे पूछा कि समस्त अफगान अमीर आपके पूर्वज शेख फरीद शकर गंज में विश्वास रखते आए हैं। उसी सम्बन्ध से मैं आपसे पूछता हूँ कि मुझे हुमायूँ से लड़ना चाहिए या लौट जाना चाहिए?’

शेख खलील ने कहा- ‘हालांकि मैं बादशाह हुमायूँ का दूत हूँ किंतु तुमने मुझे अपना जानकर मुझसे यह सवाल पूछा है तो मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि तुम्हें हुमायूँ से युद्ध करना चाहिए क्योंकि इस समय हुमायूँ की सेना बिखरी हुई है तथा उसके पास घोड़ों और पशुओं का अभाव है। तुम्हें इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। क्योंकि ऐसा स्वर्णिम अवसर तुम्हें जीवन में फिर कभी नहीं मिलेगा।’

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इस गुप्त-वार्तालाप के बाद शेख खलील तो हुमायूँ के शिविर में लौट गया और शेर खाँ संधि की शर्तों को मानने का दिखावा करते हुए अपना शिविर नदी से कई कोस पीछे ले गया। अब हुमायूँ ने अपनी सेनाओं को पुल की सहायता से नदी पार करने के आदेश दिए और वह यह दिखावा करते हुए नदी के दूसरी तरफ उतर गया कि वह शेर खाँ के विरुद्ध कार्यवाही करने जा रहा है। हुमायूँ तो शेर खाँ से हुई संधि को अपनी जीत समझ रहा था और एक विजेता की तरह अपने शत्रु का पीछा करने का दिखावा कर रहा था किंतु वास्तविकता यह थी कि यह हुमायूँ की जीत नहीं थी अपितु मौत का ऐसा भयानक जाल था जो शेर खाँ ने हुमायूँ के लिए बिछाया था। अगले दिन शेर खाँ को और पीछे हटना था किंतु शेर खाँ अपनी सेना की पंक्तियाँ सजाकर हुमायूँ की तरफ बढ़ने लगा। शेर खाँ की इस कार्यवाही से हुमायूँ हक्का-बक्का रह गया और युद्ध की तैयारी करने लगा किंतु शेर खाँ कुछ कोस आगे बढ़ने के बाद अपनी सेनाओं को वापस पीछे की तरफ ले गया जहाँ उसका शिविर लगा हुआ था। उसके पीछे हट जाने पर हुमायूँ ने चैन की सांस ली।

अगले दिन शेर खाँ ने फिर यही कार्यवाही की। वह दिन निकलते ही अपने सेना की पंक्तियाँ सजा कर हुमायूँ की तरफ कुछ कोस बढ़ा और कुछ देर बाद फिर से अपनी सेना को पीछे लौटाकर अपने शिविर में ले गया। हुमायूँ पुनः असमंजस की स्थिति में रहा कि एक बार संधि हो जाने के बाद शेर खाँ यह क्या कर रहा है?

उसी दिन आधी रात के समय शेर खाँ ने अपने सेनापतियों एवं मंत्रियों की एक बैठक बुलाई तथा उन्हें एक जोशीला भाषण दिया- ‘अब वह समय आ गया है जब अफगान, मुगलों को एक भीषण टक्कर देकर हमेशा के लिए समाप्त कर सकते हैं और अपने खोए हुए राज्य एवं जागीरें प्राप्त कर सकते हैं। अफगानों ने आपसी फूट के कारण अपनी सल्तनत खोई थी किंतु अब आपसी एकता के बल पर हमें अपनी सल्तनत वापस प्राप्त करनी है। आप लोग मेरा साथ दीजिए। नहीं तो हमेशा-हमेशा के लिए मिट जाइए।

अफगान सेनापतियों ने शेर खाँ को वचन दिया कि- ‘हम मरते दम तक अफगानियों की आजादी के लिए लड़ेंगे और हुमायूँ को मारकर फिर से अपना मुल्क कायम करेंगे। आपको हमारी स्वामिभक्ति और कर्त्तव्यपरायणता पर संदेह नहीं करना चाहिए। आप ही हमारे सुल्तान हैं। हम आपके लिए अपने प्राण भी देंगे किंतु युद्ध का मैदान नहीं छोड़ेंगे।’

शेर खाँ यही चाहता था। इसलिए उसने बहुत सोच-समझकर सारी योजना बनाई थी। वह अपने जीवन का अंतिम सबसे बड़ा दांव लगाने की तैयारी कर चुका था। उसने अफगान अमीरों एवं सेनापतियों से कहा कि हमें आज रात ही अपनी योजना को अमल में लाना होगा और इसी समय अपनी सेना को पंक्तिबद्ध करके एक पहर रात रहते कूच करना होगा।

शेर खाँ की योजना के अनुसार इस बार उसकी सेनाएं न तो हुमायूँ की तरफ गईं, न हुमायूँ से उलटी दिशा में गईं अपितु नदी के समानांतर रहते हुए ढाई कोस तक आगे बढ़ीं। शेर खाँ हुमायूँ के सेनापतियों को पहले ही सूचित कर चुका था कि वह महर्ता (महारथ चेरो) के देश पर आक्रमण करने जा रहा है। हुमायूँ के गुप्तचरों ने दिन निकलते ही हुमायूँ को सूचित किया कि शेर खाँ की सेनाएं महर्ता के देश की तरफ चली गई हैं। यह समाचार सुनकर हुमायूँ ने चैन की सांस ली।

इस समय हुमायूँ की स्थिति उस चिड़िया की तरह थी जो मौत के जाल में फंस चुकी थी और उसे खतरे का आभास तक नहीं था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चौसा का युद्ध (55)

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चौसा का युद्ध

चौसा का युद्ध कोई युद्ध नहीं था किंतु हुमायूँ के भाग्य का विनाश करने वाला सिद्ध हुआ। चौसा नामक स्थान पर शेर खाँ सूरी ने अचानक ही हुमायूँ के शिविर में घुसकर शाही हरम की औरतें पकड़ लीं और हुमायूँ को जान बचाकर भागना पड़ा। इसी के साथ हिन्दुस्तान का तख्त और ताज दोनों ही हुमायूँ के हाथ से निकल गए!

25 एवं 26 जून 1539 के बीच वाली रात में शेर खाँ स्थानीय आदिवासी कबीले के सरदार महारथ चेरो पर आक्रमण करने का बहाना करके उस कबीले की दिशा में रवाना हो गया। जब हुमायूँ को यह समाचार मिले तो हुमायूँ ने संतोष की सांस ली तथा हुमायूँ की सेना में भी खुशियां मनाई जाने लगीं किंतु शेर खाँ ने ढाई कोस आगे जाकर अपनी सेना को आदेश दिए कि अब पीछे मुड़कर मुगल शिविर पर आक्रमण किया जाए। शेर खाँ के सेनापति इस आकस्मिक आदेश के लिए पहले से ही तैयार थे।

इस समय हुमायूँ का शिविर चौसा नामक गांव के निकट लगा हुआ था जो गंगाजी एवं कर्मनासा नदियों के बीच स्थित था। वर्षा-ऋतु आरम्भ हो चुकी थी तथा हुमायूँ के शिविर के आसपास बाढ़ का पानी फैला हुआ था। इसके कारण मुगलों की तोपें काम नहीं कर सकती थीं।

शेर खाँ ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार अपनी सेना को तीन हिस्सों में बांट दिया। इनमें से एक सेना की अध्यक्षता स्वयं शेर खाँ कर रहा था, दूसरी सेना की अध्यक्षता उसका पुत्र जलाल खाँ कर रहा था और तीसरी सेना की अध्यक्षता अफगान अमीर खवास खाँ कर रहा था। इन तीनों सेनाओं ने अलग-अलग दिशा से हुमायूँ के शिविर की तरफ प्रस्थान किया।

जब तक हुमायूँ के गुप्तचर हुमायूँ को शेर खाँ के आने की सूचना पहुंचाते, तब तक शेर खाँ के अग्रिम-दस्ते हुमायूँ के शिविर तक पहुंच गए। मुगलों ने स्वप्न में भी इस स्थिति की कल्पना नहीं की थी फिर भी हुमायूँ की सेना ने आनन-फानन में लड़ने की तैयारी की। हुमायूँ के पास इतना समय ही नहीं बचा था कि वह अपने सैनिकों को पंक्तियों में खड़ा करे। उसके अधिकांश सैनिक तो अभी अपने तम्बुओं में ही थे।

विद्या भास्कर ने लिखा है कि जब शेर खाँ के सैनिक हुमायूँ के शिविर में घुसे तो शेर खाँ के सैनिकों ने क्षण भर में ही हुमायूँ के सैनिकों को खदेड़ दिया। हुमायूँ अभी वजू से ही निवृत्त नहीं हो पाया था कि उसे अपनी सेना के छिन्न-भिन्न हो जाने की सूचना मिली। इससे हुमायूँ इतना घबरा गया कि उसने अपनी बेगमों एवं बच्चों की भी परवाह नहीं की और शिविर छोड़कर भाग खड़ा हुआ। कुछ लेखकों के अनुसार हुमायूँ चुनार दुर्ग की तरफ भागा जो इन दिनों हुमायूँ के अधिकार में था।

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मुगल सेना कर्मनाशा के तट की ओर भागी। चूँकि अफगानों द्वारा नदी का पुल नष्ट कर दिया गया था इसलिये मुगलों ने तैरकर नदी पार करने का प्रयत्न किया। अफगानों ने बड़ी क्रूरता से मुगलों का वध किया। कर्मनाशा नदी के भीतर तथा उसके तट पर लगभग सात हजार मुगलों के प्राण गए जिनमें से कई बड़े अधिकारी भी थे। हुमायूँ स्वयं अपने घोड़े के साथ नदी में कूद पड़ा। घोड़ा नदी में डूब गया। हुमायूँ स्वयं भी डूबने ही वाला था कि निजाम नामक एक भिश्ती ने अपनी मशक की सहायता से उसके प्राण बचाये। कुछ लेखकों के अनुसार हुमायूँ ने हाथी पर बैठकर नदी पार करने का प्रयास किया। देखते ही देखते शेर खाँ की सेना ने हुमायूँ का पूरा शिविर अपने अधिकार में ले लिया। शेर खाँ ने हुमायूँ के पक्ष के बहुत से लोगों को मार दिया तथा बहुत से प्रमुख लोगों को जीवित ही पकड़ लिया। हुमायूँ तो भाग खड़ा हुआ था किंतु उसके हरम की स्त्रियां अपने ही डेरों में बैठी हुई भय से कांप रही थीं। उन्होंने इस क्षण की कल्पना तक नहीं की थी। उन्हें पता नहीं था कि जब जीवन में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए तब उन्हें क्या करना चाहिए। न वे भाग सकीं, न छिप सकीं। उनमें से बहुत सी औरतों ने स्वयं को भाग्य के हवाले कर दिया और आने वाली विपदा की प्रतीक्षा करने लगीं।

शेर खाँ ने अपने सेनापतियों को आदेश दिया कि मुगलिया हरम की औरतों को उनके डेरों से बाहर लाया जाए। जब हुमायूँ की मुख्य बेगम परदे से बाहर लाई गई तो शेर खाँ अपने घोड़े से उतर पड़ा। उसने बेगम के प्रति सम्मान प्रकट किया तथा उसे ढाढ़स दिलाया। इसका नाम बेगा बेगम था जो अपनी पुत्री अकीकः बेगम के साथ शिविर में मौजूद थी।

इस युद्ध को इतिहास की पुस्तकों में चौसा का युद्ध कहा गया है। वस्तुतः यह कोई युद्ध नहीं था अपितु शेर खाँ द्वारा बिछाया गया एक जाल था जिसमें हुमायूँ बड़ी आसानी से फंस गया था। इस युद्ध में बहुत कम लोग मारे गए थे। हुमायूँ की तरफ से न तो तोपों में बारूद भरा गया, न बंदूकें चलीं, न किसी सैनिक ने अपनी म्यान में से तलवार बाहर निकाली, न किसी ने बादशाह की परवाह की, न बादशाह ने किसी की परवाह की। हर किसी को अपने प्राण बचाने की पड़ी थी। इसलिए हुमायूँ तथा उसकी सेना सिर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए।

कुछ लेखकों ने लिखा है कि इस युद्ध में आठ हजार मुगल सैनिक मारे गए। यह बात सही प्रतीत नहीं होती क्योंकि यदि हुमायूँ के सैनिकों से हथियार उठाए होते तो मुगल बेगमें अपने डेरों में ही न पकड़ी जातीं। कुछ लेखकों के अनुसार मुगलों की तरफ से सात हजार सैनिक मारे गए थे जो कि नदी में डूबने से मरे थे न कि युद्ध में लड़ते हुए।

मुगल औरतों को बंदी बनाने के बाद शेर खाँ ने उसी स्थान पर नमाज पढ़ी तथा आकाश की ओर देखते हुए दोनों हाथ फैलाकर अल्लाह के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। भावावेश में शेर खाँ की आंखों से आंसू निकल पड़े।

नमाज पढ़ने के बाद शेर खाँ ने अपनी सेना में मुनादी करवाई कि कोई भी सैनिक किसी भी मुगल स्त्री-बच्चे तथा दासी को एक रात के लिए भी अपने खेमे में न रखे। यदि किसी सैनिक को कोई मुगल-स्त्री हाथ लगी हो तो वह उसे तत्काल बेगा बेगम के पड़ाव में पहुंचा दे। इस प्रकार रात होने से पहले ही समस्त मुगल स्त्रियां बेगम के पड़ाव में पहुंच गईं और सबको भोजन दिया गया।

डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक भारत का इतिहास में लिखा है कि चौसा के युद्ध में हुमायूँ की दो बेगमें और एक लड़की लापता हो गई तथा उसकी मुख्य पत्नी बेगा बेगम और उसकी पुत्री अकीकः बेगम जीवित ही पकड़ ली गईं। शेर खाँ की विजय के उपलक्ष्य में नगाड़े बजने लगे और हजारों अफगान युवक अपने घोड़ों से उतर कर नाचने लगे। आखिर उन्होंने ई.1526 में पानीपत के युद्ध में हुई अपनी हार का भरपूर बदला ले लिया था! बाबर का बेटा हार कर भाग गया था और बाबर के खानदान की बहू-बेटियां अफगानों के कब्जे में थीं।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर के बेटे अपने ही भाई को नष्ट करने लगे (56)

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बाबर के बेटे

बाबर (Babur) ने पूरी जिंदगी खपाकर हिन्दुस्तान में अपनी सल्तनत स्थापित की थी। हुमायूँ (Humayun) उस सल्तनत को विस्तार दे रहा था किंतु बाबर के बेटे बड़े निकम्मे निकले, वे अपने ही भाई को मारकर अपने बाप के द्वारा बनाई गई सल्तनत को नष्ट करने पर तुल गए!

26 जून 1539 का तड़का होते ही चौसा का युद्ध (Chousa Ka Yuddh) आरम्भ हुआ और आरम्भ होने के साथ ही समाप्त हो गया। मुगल शिविर में मची भगदड़ में मुगलों की बहुत सी औरतें गायब हो गईं।

गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘मुगल सेना परास्त हुई। बहुत से सम्बन्धी और मनुष्य पकड़े गए। बादशाह के हाथ में भी घाव लगा। चौसा के युद्ध के उपरांत मची गड़बड़ में कितनों का कुछ भी पता नहीं लगा। उनमें सुल्तान हुसैन मिर्जा की पुत्री आयशा सुल्तान बेगम, बेगा जान कोका, अकीकः बेगम तथा चांदबीबी शाही हरम की सम्माननीय महिलाएं भी सम्मिलित थीं जिनका कुछ भी पता नहीं चला। बाबर के महल की मुख्य दासी का नाम बचका था जिसे खलीफा भी कहा जाता था। वह भी इस यात्रा में हुमायूँ के हरम के साथ थी। बचका भी इस अफरा-तफरी में लापता हो गई। उसका क्या हुआ, कुछ पता नहीं चल सका।’

गुलबदन बेगम लिखती है- ‘बादशाह हुमायूँ ने अपने हरम की लापता औरतों की खूब तलाश करवाई किंतु उन्हें ढूंढा नहीं जा सका। इसलिए बादशाह चुनार में तीन दिन ठहर कर आरेल आए। जब नदी के किनारे पहुंचे तो यह देखकर चकित हुए कि नाव के बिना किस प्रकार पार उतरें। इसी समय राजा वीरभान बघेला सेना लेकर आ पहुंचा। उसने हुमायूँ का पीछा कर रहे मीर फरीद गोर पर हमला करके उसे भगा दिया। राजा वीरभान बघेला ने हुमायूँ को नदी पार करवा दी।’

हुमायूँ (Humayun) के सैनिक चार-पांच दिनों से बिना भोजन और बिना मदिरा के थे। राजा वीरभान ने उनके लिए खाने की वस्तुएं, शराब, मांस और आवश्यक वस्तुओं का बाजार लगवा दिया जिससे हुमायूँ की सेना के कुछ दिन आराम से बीत गए और घोड़े भी ताजी हो गए। जो सिपाही पैदल हो गए थे उन्होंने नया घोड़ा खरीद लिया।

राजा वीरभान की सहायता से बादशाह हुमायूँ कड़ा पहुंच गया। यहाँ से हुमायूँ (Humayun) की सल्तनत आरम्भ हो गई थी। इसलिए हुमायूँ को शाही सुविधाएं एवं संसाधन फिर से प्राप्त हो गए। गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘इस युद्ध के बाद हुमायूँ बीमार पड़ गया और पूरे चालीस दिन तक बीमार रहा।’

नियामतुल्ला नामक एक लेखक ने लिखा है- ‘कुछ दिनों बाद शेर खाँ ने हुमायूँ की मुख्य बेगम अर्थात् बेगा बेगम को हुसैन खाँ नीरक की देख-रेख में रोहतास दुर्ग में भेज दिया तथा अन्य मुगल स्त्रियों के लिए सवारियों का प्रबंध करके उन्हें आगरा भिजवा दिया। इस विजय के बाद शेर खाँ ने हजरत अली की उपाधि धारण की।’

जब हुमायूँ कड़ा से आगरा जा रहा था, तब मार्ग में ही हुमायूँ को सूचना मिली कि मिर्जा हिंदाल (Mirza Hindal) दिल्ली आ गया है और अपनी माता द्वारा मना किए जाने के उपरांत भी, उसने शाही-चिह्न धारण करके स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया है।

गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘खुसरू बेग, जाहिद बेग तथा सैयद अमीर कन्नौज में एकत्रित हो गए। ये लोग बादशाह हुमायूँ से बगावत करके मिर्जा हिंदाल की तरफ हो गए थे। मुहम्मद सुल्तान मिर्जा भी कन्नौज आ गया था जो पहले बगावत करके गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह की तरफ हो गया था। जब मिर्जा हिंदाल को समाचार मिला कि हुमायूँ आगरा आ रहा है तो हिंदाल दिल्ली चला गया। उसी समय मीर फुक्रअली, यादगार नासिर मिर्जा को दिल्ली ले आया और यादगार नासिर मिर्जा ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। मिर्जा हिंदाल तथा मिर्जा यादगार नासिर में मेल नहीं था। इसलिए मिर्जा हिंदाल ने दिल्ली घेर ली।’

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जब मिर्जा कामरान (Mirza Kamran) को यह समाचार मिले तो वह भी अपने 12 हजार सैनिक लेकर दिल्ली आ गया ताकि कामरान दिल्ली पर अधिकार कर सके। मीर फुक्रअली तथा यादगार नासिर मिर्जा ने दिल्ली के फाटक बंद कर लिए। इस पर कामरान ने मीर फुक्रअली के समक्ष संधि का प्रस्ताव भिजवाया। मीर फुक्रअली, बाबर के बेटे मिर्जा कामरान से अपनी सुरक्षा की प्रतिज्ञा करवाकर दिल्ली से बाहर आया तथा उसने कामरान से भेंट की। मीर फुक्रअली ने कामरान से कहा कि मिर्जा यादगार नासिर अपने स्वार्थ में डूबा हुआ है। इसलिए वह आपसे भेंट नहीं करना चाहता। मीर फुक्रअली ने कामरान को सलाह दी कि वह दिल्ली में अपना समय खराब न करे अपितु मिर्जा हिंदाल को बंदी बना ले और हुमायूँ के आगरा पहुंचने से पहले ही आगरा पहुंचकर आगरा का बादशाह बन जाए। मिर्जा कामरान (Mirza Kamran) को मीर फुक्रअली की सलाह पसंद आई। उसने मीर फुक्रअली को ही दिल्ली सौंप दी तथा स्वयं मिर्जा हिंदाल को अपने साथ लेकर आगरा आ गया। आगरा आकर कामरान ने बाबर के मकबरे के दर्शन किए। उस समय तक बाबर का शव काबुल नहीं ले जाया जा सका था और आगरा में ही एक मजार में दफ्न था।

कामरान (Mirza Kamran) ने आगरा में अपनी माता-बहिनों से भेंट की तथा गुलअफशां बाग में डेरा डाल दिया। पाठकों की सुविधा के लिए बता देना समीचीन होगा कि हुमायूँ का तीसरा भाई मिर्जा अस्करी इस समय हुमायूँ के साथ था और वह भी चौसा के युद्ध में जीवित बचकर हुमायूँ के साथ ही आगरा आ रहा था। उसके मन में भी बादशाह बनने की चाहत थी किंतु वह जानता था कि इस समय परिस्थितियाँ बगावत करने के लिए अनुकूल नहीं हैं।

कुछ दिन बाद नूरबेग आगरा आया और उसने बाबर के बेटे कामरान तथा हिंदाल को बताया कि बादशाह हुमायूँ (Humayun) आगरा पहुंचने वाले हैं। यह सुनकर बाबर के बेटे कामरान तथा मिर्जा हिंदाल दोनों ही हक्के-बक्के रह गए। उन्हें लगता था कि हुमायूँ चौसा से आगरा तक के मार्ग को निरापद रूप से पार नहीं कर सकेगा और शेर खाँ मार्ग में ही हुमायूँ का काम तमाम कर देगा किंतु कामरान तथा हिंदाल की आशा के विपरीत हुमायूँ न केवल जीवित था अपितु सकुशल आगरा पहुंचने वाला था।

यह सुनकर मिर्जा हिंदाल (Mirza Hindal) भयभीत होकर अपने राज्य अर्थात् मेवात को लौट गया। जब हुमायूँ आगरा पहुंचा तो उसी रात परिवार के सदस्यों के साथ मिर्जा कामरान ने भी हुमायूँ से भेंट की तथा कई दिनों तक हुमायूँ की हाजरी में रहकर उसकी सेवा करता रहा।

जब गुलबदन बेगम (Gul Badan Begum) ने हुमायूँ से भेंट की तो हुमायूँ (Humayun) गुलबदन बेगम को पहचान नहीं सका। इस पर हुमायूँ को बताया गया कि यह तुम्हारी बहिन गुलबदन है।

हुमायूँ ने कहा- ‘मैं हर समय तुम्हें याद करता था और अफसोस करता था कि तुम्हें बंगाल अभियान में अपने साथ नहीं ले गया किंतु जब चौसा की दुर्घटना हुई तो मुझे इस बात पर बड़ा संतोष हुआ कि तुम मेरे साथ नहीं थीं अन्यथा तुम्हारे साथ भी जाने क्या होता?‘ आज मुझे अकीकः के लिए दुःख होता है कि क्यों मैं उसे अपने साथ ले गया। कौन जाने उस पर क्या बीत रही होगी? जब मैं जब बंगाल की यात्रा पर गया था तो तुम टोपी लगाया करती थीं किंतु अब तुम्हारा विवाह हो गया है और तुम टोपी की जगह घूंघट लगाती हो, इसलिए मैं तुम्हें नहीं पहचान सका।’

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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