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मुगलों की निंदा करता था बाबर (42)

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मुगलों की निंदा करता था बाबर

यद्यपि बाबरनामा स्वयं भी झूठ से भरा पड़ा है तथापि बाबरनामा से कई चौंकाने वाले खुलासे होते हैं किंतु यह देखकर हैरानी होती है कि आधुनिक भारतीय इतिहासकारों ने बाबरनामा की सच्चाइयों को यत्नपूर्वक छिपाया है। इनमें से सबसे बड़ी सच्चाई बाबर के वंश के सम्बन्ध में है। बाबरनामा से ज्ञात होता है कि बाबर मुगलों की निंदा किया करता था!

बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में अपनी माता कुतलुग निगार खानम को आधा चगताई तथा आधा मुगुल (मुगल) बताया है जबकि बाबर का पिता मिर्जा उमर शेख तैमूर लंग का चौथा वंशज था और तुर्क खानदान का बादशाह था। भारत में लिखी गई इतिहास की पुस्तकों में बाबर के वंशजों को बहुत कम स्थानों पर तैमूरी खानदान कहा गया है।

उन्हें अधिकांशतः चंगेजी खानदान, चगताई खानदान और मुगलिया खानदान कहकर पुकारा गया है जो कि वस्तुतः बाबर की माता के पूर्वजों के खानदान थे न कि बाबर के पिता के पूर्वजों के। हालांकि उमर शेख की तरह उमर शेख के किसी पूर्वज का विवाह भी चंगेजी खानदान की किसी शहजादी से हुआ था। इस कारण तैमूरी खनदान को तुर्को-मंगोल माना जाता था किंतु यह मुगल खानदान तो कतई नहीं था!

वंशनाम का यह परिवर्तन बहुत ही आश्चर्यजनक था। बाबरनामा में तो इस बात का उल्लेख होना ही नहीं था क्योंकि बाबर के जीवन-काल में बाबर को मुगल नहीं कहा जाता था किंतु हुमायूंनामा आदि ग्रंथों में भी इस बात का उल्लेख नहीं है। इससे स्पष्ट है कि हुमायूँ के जीवनकाल में भी इस खानदान को मुगल खानदान नहीं कहा जाता था।

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यह एक पहेली ही है कि बाबर के खानदान के नाम का परिवर्तन क्यों ओर कैसे संभव हुआ? जबकि बाबरनामा में बाबर ने अनेक स्थानों पर मुगलों की निंदा की है। बाबर को मंगोलों (मुगलों) के रहन-सहन, आचार-विचार तथा जीवन-शैली पर बड़ी आपत्तियां थीं। सैयद अतहर अब्बास रिजवी ने अपनी पुस्तक मुगलकालीन भारत में लिखा है कि बाबर को जब भी अवसर मिला उसने मुगलों पर चोट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हुमायूँ भी प्रकट रूप में, सार्वजनिक रूप से मुगलों की निंदा किया करता था। बाबरनामा में जिस भाषा का प्रयोग किया गया है, वह चगताई-तुर्की है न कि मुगलों द्वारा प्रयुक्त होने वाली भाषा। चगताई-तुर्की भाषा मध्य-एशिया की सर एवं आमू नामक नदियों के बीच बोली जाती थी। इस भाषा में दो-तिहाई शब्द तुर्की भाषा के थे तथा एक-तिहाई शब्द फारसी एवं अरबी भाषाओं से लिए गए थे। बाबर की भाषा के आधार पर भी बाबर को मुगल नहीं कहा जाना चाहिए था। तुर्क होने के कारण बाबर को अपने तुर्की भाषा के ज्ञान पर बड़ा गर्व था।

इसलिए वह हुमायूँ के पत्रों में भाषा सम्बन्धी कमियां निकाला करता था और हुमायूँ के पत्रों के जवाब में वह हुमायूँ को लगातार सलाह देता था कि- ‘तेरे द्वारा लिखे गए पत्र में अशुद्ध तुर्की लिखी जाती है। तेरे वाक्य बड़े ही अस्पष्ट और जटिल होते हैं। मनुष्य को अपने लेखन में सरल भाषा में स्पष्ट संदेश लिखना चाहिए।’

बाबर ने तुर्की लिपि में एक नयी लेखन-शैली को जन्म दिया जिसे ‘खते बाबरी’ कहा जाता है। तुर्की के सबसे बड़े कवि मीर अली शेर बेग के बाद बाबर को ही स्थान दिया जाता है। इस दृष्टि से भी बाबर तुर्क ठहरता है न कि मुगुल अथवा मुगल।

बाबर तथा हुमायूँ के चित्रों में उनकी पगड़ी के बीच एक शंक्वाकार उभार दिखाई देता है जो उनके तुर्की होने की स्पष्ट घोषणा करता है। बाबर एवं हुमायूँ की पगड़ी, दाढ़ी, आंखें, आंखों के नीचे के उभार कोई भी चीज मुगलों से मेल नहीं खाती। इस आधार पर भी बाबर ओर हुमायूँ ‘तुर्की’ ठहरते हैं न कि मुगल।

संभवतः भारत के किसी इतिहासकार ने बाबर को उसके पूर्ववर्ती तुर्क सुल्तानों से अलग करने के लिए मुगल कहकर पुकारा। जब एक बार यह गलती हो गई तब यह गलती आगे से आगे चलती रही किसी ने इस बात का खण्डन करने का प्रयास नहीं किया।

यहाँ एक बात और समझी जानी चाहिए कि बाबर भी अफगानिस्तान से भारत आया था और उसके पूर्ववर्ती दिल्ली सल्तनत के शासक भी अफगानिस्तान से भारत आए थे। बाबर भी तुर्की था और उसके पूर्ववर्ती दिल्ली सल्तनत के शासक भी तुर्की थे। फिर भी उनमें अंतर यह था कि बाबर मूलतः समरकंद का तुर्क था और उसके पूर्ववर्ती सुल्तान अफगानिस्तान के तुर्क थे।

अब हम थोड़ी सी चर्चा बाबर की मृत्यु वाले दिन की करना चाहते हैं। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने लिखा है कि जब बाबर का रोग बढ़ने लगा तो उसने समस्त अमीरों को बुलाकर कहा कि बहुत वर्ष हुए, मेरी इच्छा थी कि हुमायूँ मिर्जा को बादशाही देकर मैं स्वयं जरअफशां बाग में एकांतवास करूं किंतु मैं अपने स्वस्थ रहते ऐसा नहीं कर सका।

इसलिए अब इस रोग से दुःखी होकर वसीअत करता हूँ कि आप सब हुमायूँ को हमारे स्थान पर समझें, उसका भला चाहने में कमी न करें और उससे एकमत रहें। मैं हुमायूं, समस्त सम्बन्धियों और अपने आदमियों को अल्लाह को और हुमायूँ को सौंपता हूँ।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि बादशाह के इतना कहते ही वहाँ उपस्थित सभी लोग रोने-पीटने लगे। बादशाह की आंखों में भी आंसू भर आए। जब यह बात हरम में पहुंची तो हरमवालियां भी रोने लगीं।

बाबर ने हुमायूँ को सलाह दी कि- ‘संसार उसका है जो परिश्रम करता है। किसी भी आपत्ति का सामना करने से मत चूकना। परिश्रमहीनता तथा आराम बादशाह के लिये हानिकारक है।’

अपनी आँखें बन्द करने से पहले बाबर ने हुमायूँ को आदेश दिया कि- ‘वह अपने भाइयों के साथ सदैव सद्व्यवहार करे चाहे वे उसके साथ दुर्व्यवहार ही क्यों न करें।’ हुमायूँ ने अपने पिता की इस आज्ञा का जीवन भर पालन किया। हालांकि बाबर की इस आज्ञा के कारण हुमायूँ को आगे चलकर बड़े कष्ट उठाने पड़े।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि तीन दिन के अनंतर 26 दिसम्बर 1530 को बादशाह इस नश्वर संसार से अमरलोक को चले गए। जब बाबर की मृत्यु हुई तो हरम की औरतों को बाबर के कक्ष से यह कहकर निकाला गया कि आप लोग पीछे के कमरे में जाइए, हकीम लोग बादशाह के स्वास्थ्य की जांच करने आ रहे हैं। हरम की औरतें जान चुकी थीं कि बादशाह का इंतकाल हो चुका है। अतः वे अपने कमरों में जाकर बंद हो गईं और रोने लगीं।

बाबर की मृत्यु की सूचना उसके महल से बाहर नहीं जाने दी गई क्योंकि हिंदुस्तान में यह चलन है कि जैसे ही लोगों को पता चलता है कि बादशाह की मृत्यु हो गई है तो जनता घरों से बाहर निकलकर लूटपाट करने लगती है। चूंकि मुगल खानदान को इस समय तक भारत में आए हुए चार साल ही हुए थे इसलिए इस बात की भी आशंका थी कि जनता शाही महलों में घुसकर लूटपाट मचाए।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि यह निर्णय लिया गया कि एक आदमी को लाल कपड़े पहनाकर हाथी पर बैठाकर मुनादी करवाई जाए कि बादशाह बाबर दरवेश हो गए हैं और मुल्क बादशाह हुमायूँ को दे गए हैं। हुमायूँ बादशाह के नाम की मुनादी सुनकर प्रजा को संतोष हो गया और सबने उनकी लम्बी उम्र की कामना की।

गुलबदन बेगम के इस विवरण से सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि बाबर मुगलों की निंदा क्यों किया करता था। न केवल बाबर अपितु गुलबदन बेगम भी इस सच्चाई से परिचित थे कि बाबर की मृत्यु का समाचार सुनते ही दूसरे मुगल शहजादे बाबर के परिवार की हत्या करके स्वयं बादशाह बनने का प्रयास करेंगे!

                                                      – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

माहम सुल्ताना हेरात के शिया परिवार की बेटी थी !

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माहम सुल्ताना हेरात के शिया परिवार की बेटी थी

हुमायूँ की माता माहम सुल्ताना हेरात के शिया परिवार की बेटी थी! उसे माहिज बेगम एवं माहम बेगम भी कहते थे। गुलबदन बेगम ने उसे अपनी पुस्तकों में आका बेगम एवं आकम बेगम भी लिखा है। हुमायूँ के व्यक्तित्व पर माहम सुल्ताना की गहरी छाप थी।

26 दिसम्बर 1530 को बाबर की मृत्यु हो गई तथा 30 दिसम्बर 1530 को हुमायूँ बादशाह हुआ। बाबर की मृत्यु के समय बाबर के चार पुत्र और तीन पुत्रियाँ जीवित थे जिनमें हुमायूँ सबसे बड़ा था। हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 को काबुल में हुआ था। उसकी माता माहम सुल्ताना हेरात के शिया मुसलमान हुसैन बैकरा के खानदान में उत्पन्न हुई थी।

उन दिनों हेरात, खुरासान राज्य की राजधानी हुआ करता था। कुछ पुस्तकों में आए वर्णन के अनुसार माहम सुल्ताना का भाई ख्वाजा अली, खोस्त के दरबार में नौकरी करता था। माहम का परिवार अपनी शांत प्रवृत्ति के लिए विख्यात था और ख्वाजा के नाम से जाना जाता था।

माहम सुल्ताना को माहिज बेगम एवं माहम बेगम भी कहते थे। माहम बेगम ने बाबर की एक अन्य पत्नी दिलदार बेगम से उत्पन्न पुत्री गुलबदन बेगम तथा पुत्र मिर्जा हिंदाल को गोद लेकर उनका पालन-पोषण किया था। गुलबदन बेगम ने माहम बेगम को अपनी पुस्तकों में आका बेगम एवं आकम बेगम भी लिखा है।

यद्यपि माहम बेगम बाबर की तीसरी पत्नी थी किंतु बाबर ने उसे पादशाह बेगम (बादशाह बेगम) का रुतबा प्रदान किया था। इस रुतबे का कारण यह था कि माहम सुशिक्षित, सुंदर एवं बुद्धिमती स्त्री थी और जीवन के हर मोड़ पर बाबर के साथ दृढ़ता से खड़ी रही थी। वह युद्ध के समय में भी बाबर के शिविर में उपस्थित रहती थी और बाबर को राजनीतिक विषयों पर सलाह देती थी। बाबर के हरम को अनुशासन में रखने में भी माहम की बड़ी भूमिका रही थी।

जब बाबर ने काबुल से बदख्शां एवं ट्रांसऑक्सियाना के कठिन अभियान किए थे तब माहम बेगम भी बाबर के साथ उन अभियानों में मौजूद रही। बाबर माहम बेगम के व्यवहार से इतना प्रभावित था कि जब माहम के पिता सुल्तान हुसैन मिर्जा की मृत्यु हुई तो बाबर उसे श्रद्धांजली देने के लिए स्वयं हेरात गया था।

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जब बाबर विशेष दरबारों का आयोजन करता था जिसमें समस्त मिर्जा, बेग, अमीर और प्रजा उपस्थित होती थी, तब माहम सुल्ताना भी बाबर के साथ सज-धज कर उसके सिंहासन पर बैठा करती थी। बाबर माहम से इतना अधिक प्रभावित था कि कभी उसकी किसी बात का प्रतिवाद नहीं करता था और माहम की प्रत्येक इच्छा पूरी करने के लिए तत्पर रहता था। जब माहम काबुल से भारत आई थी तब बाबर ने माहम के सम्मान में शाही पालकियां घुड़सवारों के साथ अलीगढ़ में उसकी अगवानी करने के लिए भिजवाईं। जब बाबर को समाचार मिला कि बेगम आगरा के निकट पहुंच गई है, तब बाबर पैदल ही बेगम की अगवानी के लिए पुराने किले से रवाना हुआ तथा पैदल चलकर ही बेगम को अपने महल तक लाया, इस दौरान बेगम अपनी पालकी में बैठी रही। माहम के साथ सौ मुगलानी दासियां अच्छे घोड़ों पर सवार होकर आई थीं जो बेहद सजी-धजी थीं। बाबर के समय में किसी अन्य बेगम को ऐसा रुतबा प्राप्त नहीं था।

माहम संसार की अकेली ऐसी औरत थी जो न केवल बाबर के हरम पर शासन करती थी अपितु बाबर के दिल, दिमाग और बाबर की बादशाहत पर भी राज किया करती थी। हुमायूँ को मुगलों में सबसे अच्छा बादशाह बताया जाता है किंतु बहुत कम लेखकों ने हुमायूँ के नरम दिल के निर्माण के लिए माहम की भूमिका को पहचाना है। माहम के स्नेहशील व्यक्तित्व के कारण ही हुमायूँ को साहित्य तथा चित्रकला से प्रेम हुआ तथा हुमायूँ के व्यक्तित्व में कठोरता का समावेश नहीं हो सका।

माहम के पेट से हुमायूँ के अतिरिक्त और भी चार औलादें पैदा हुई थीं किंतु वे शैशव अवस्था में मृत्यु को प्राप्त हुईं। जब बाबर बीमार पड़ा तब बाबर ने गुलरुख बेगम तथा गुलचहरा बेगम के विवाह की जिम्मेदारी माहम बेगम को ही प्रदान की थी।

कुछ लेखकों के अनुसार जब बाबर ने ई.1527 में खानवा-विजय के बाद हुमायूँ को बदख्शां का गवर्नर बनाकर आगरा से बदख्शां भेज दिया, तब माहम बेगम ने ही बड़ी चतुराई से हुमायूँ को बदख्शां से आगरा बुलवा लिया था जबकि बाबर चाहता था कि हुमायूँ बदख्शां का बादशाह बने तथा समरकंद पर विजय प्राप्त करे।

माहम द्वारा हुमायूँ को चुपके से भारत बुला लिए जाने का कारण यह बताया जाता है कि जब ई.1529 में घाघरा-युद्ध के बाद बाबर बीमार रहने लगा तो बाबर के प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा ने योजना बनाई कि बाबर की मृत्यु के बाद बाबर के जवांई मिर्जा जमाँ को बादशाह बनाया जाए जिसका विवाह बाबर की पुत्री मासूमा बेगम से हुआ था किंतु माहम बेगम को इस षड़यंत्र की जानकारी हो गई तथा उसने हुमायूँ को आगरा बुलवाकर खलीफा का षड़यंत्र निष्फल कर दिया।

जब हुमायूँ भारत आकर बीमार पड़ गया था तब माहम बेगम हुमायूँ को दिल्ली से आगरा ले आई थी तथा जीजान से उसकी सेवा एवं चिकित्सा करके उसे मौत के मुँह से बाहर खींच लिया था। इस प्रकार माहम बेगम ने न केवल अपने पति बाबर का अपितु अपने पुत्र हुमायूँ का भी यथाशक्ति साथ निभाया तथा उनकी राह के कांटे हटाए।

बाबर की मृत्यु के बाद माहम बेगम प्रतिदिन दोनों समय निर्धनों को भोजन खिलाया करती थी। इस भोजन के लिए वह प्रातःकाल में एक बैल, दो भेड़ और पांच बकरे तथा दोपहर के समय पांच बकरे दान किया करती थी। इस दान का पूरा खर्च माहम अपनी जागीर से होने वाली आय से करती थी।

बाबर की मृत्यु के बाद एक बार फिर प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा ने प्रयास किया कि बाबर के जवांई मिर्जा जमां को बादशाह बनाया जाए किंतु माहम सुल्ताना ने ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दीं कि खलीफा को यह अनुभव हो गया कि यदि उसने हुमायूँ का मार्ग रोका तो खलीफा का अपना जीवन खतरे में पड़ जायेगा इसलिये खलीफा ने हुमायूँ का समर्थन कर दिया।

बादशाह बनने के बाद हुमायूँ ने अपनी माता माहम बेगम का पादशाह बेगम का पद बनाए रखा। माहम अपनी मृत्यु के समय तक इस पद पर बनी रही। इस पद पर रहने के कारण उसे बादशाह के हरम एवं दरबार में कुछ निश्चित अधिकार प्राप्त थे जिनकी अनदेखी कोई नहीं कर सकता था।

जब हुमायूँ चुनार का युद्ध जीतकर आगरा लौटा तब माहम बेगम ने पूरे आगरा को सजाने के आदेश दिए। माहम के आदेश से महलों, बाजारों, गलियों और सैनिक छावनियों में दिए जलाए गए। सड़कों पर पानी का छिड़काव किया गया और उन्हें फूलों तथा रंगीन कागजों से सजाया गया। इस अवसर पर माहम ने 7 हजार लोगों को सम्मान-स्वरूप शाही चोगे प्रदान किए।

16 अप्रेल 1534 को बीमारी के कारण माहम का निधन हो गया। माहम बेगम की बड़ी इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उसके शरीर को काबुल ले जाकर बाबर की कब्र की बगल में दफनाया जाए किंतु माहम की मृत्यु के बाद उसका शव कभी भी काबुल नहीं ले जाया जा सका। माहम को आगरा में कहाँ दफनाया गया, इस सम्बन्ध में पक्की जानकारी नहीं मिलती। माहम की मृत्यु के बाद बाबर की बहिन खानजादः बेगम को पादशाह बेगम बनाया गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कांटों का ताज सौंपा बाबर ने हुमायूँ को (44)

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कांटों का ताज सौंपा बाबर ने हुमायूँ को

बाबर की मृत्यु के समय उसके चार पुत्र जीवित थे जिनमें से हुमायूँ सबसे बड़ा था। बाबर ने उसे ही अपना उत्तराधिकारी बनाया। वास्तव में बाबर ने हुमायूँ को जो बादशाहत दी, वह कांटों का ताज से अधिक कुछ नहीं थी!

हालांकि बाबर ने अपनी मृत्यु से चार दिन पहले हुमायूँ को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था किंतु बाबर के प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा ने हुमायूँ के स्थान पर हुमायूँ के बहनोई ख्वाजा जमां को बादशाह बनाने का प्रयास किया। इस पर राजनीति की चतुर खिलाड़ी माहम बेगम ने खलीफा के प्रयासों पर पानी फेर दिया तथा मुगल सल्तनत का ताज हुमायूँ को मिल गया।

बाबर ने हुमायूँ को जो ताज सौंपा था, वह सुख और आनंद से भरा हुआ कतई नहीं था। खून की कई नदियों को पार करके बाबर ने कांटों का ताज हासिल किया था।कांटों का ताज अपने सिर पर बनाए रखने के लिए हुमायूँ को भी खून की कई नदियां पार करनी थीं।

बादशाह बनते समय समय हुमायूँ 23 वर्ष का था। उसके बादशाह बनने पर राज्य में खुशियाँ मनायी गईं और दान-दक्षिणा दी गई। राज्य के मिर्जाओं, अमीरों तथा बेगों ने नए बादशाह का स्वागत किया और उसकी बादशाहत को सहर्ष स्वीकार कर लिया। जब हुमायूँ बादशाह हुआ तो उसने आदेश जारी किया कि जो व्यक्ति मरहूम बादशाह के समय में जिस पद पर काम कर रहा था, उसी पद पर पहले की तरह काम करता रहे।

जिस दिन हुमायूँ का राज्यारोहण हुआ, उसी दिन मिर्जा हिंदाल काबुल से आकर नए बादशाह से मिला। मिर्जा हिंदाल तथा उसकी बहिन गुलबदन बेगम का पालन पोषण हुमायूँ की माता आकम बेगम अर्थात् माहम सुल्ताना ने किया था तथा हिंदाल बचपन से हुमायूँ के संरक्षण में रहा था। जब बाबर ने ई.1527 में हुमायूँ को बदख्शां का गवर्नर नियुक्त करके भारत से बदख्शां भेजा था, तब भी हिंदाल हुमायं के पास बदख्शां में रहा करता था हुमायूँ हिंदाल को ही बदख्शां का शासन सौंपकर आगरा आया था।

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हुमायूँ के इतने उपकारों और स्नेह-प्रदर्शन के उपरांत भी हिंदाल का मन हुमायूँ के प्रति साफ नहीं था किंतु हुमायूँ उस समय इस बात को न जान सका। हुमायूँ ने बड़े प्रेम से हिंदाल का स्वागत किया तथा अपने पिता के कोष से बहुत सी वस्तुएं निकालकर मिर्जा हिंदाल को दीं ताकि मिर्जा हिंदाल यह न सोचे कि हुमायूँ ने अपने पिता की समस्त सम्पत्ति हड़प ली है। मिर्जा हिंदाल ने यह सम्पत्ति तो स्वीकार कर ली किंतु उसके मन का मैल साफ नहीं हुआ। हुमायूँ का छोटा भाई मिर्जा कामरान अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था। बाबर ने उसे पहले कांधार का तथा बाद में मुल्तान का गवर्नर बनाया था। कामरान में सामरिक तथा प्रशासकीय प्रतिभा भी बहुत थी। इसलिए इस बात की प्रबल सम्भावना थी कि कामरान हुमायूँ का प्रतिद्वन्द्वी बनकर स्वयं हिन्दुस्तान का बादशाह बनने का प्रयास करे। हुमायूँ का एक और भाई मिर्जा अस्करी भी हुमायूँ के मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न करने की नीयत रखता था किंतु सरल हृदय हूमायू को अपने भाइयों के इरादों के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं था। उसे पिता बाबर ने बारबार ने यह शिक्षा दी थी कि हुमायूँ हर हाल में अपने भाइयों के प्रति सद्भावना रखे। अतः हुमायूँ का हृदय उसी भावना से ओतप्रोत था।

यद्यपि हुमायूँ की ताजपोशी से पहले ही उसका बइनोई ख्वाजा जमां और सल्तनत का प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा हुमायूँ के मार्ग में बाधा उत्पन्न करने का प्रयास करके अपने इरादों की भनक दे चुके थे तथापि हुमायूँ ने उनसे कुछ नहीं कहा और वे दोनों ही पूर्ववत् अपने पदों पर कार्य करते रहे। ये लोग ही हुमायूँ के राजमुकुट को कांटों का ताज बनाने वाले थे।

शीघ्र ही अनेक मंगोल एवं चगताई अमीर मुगलिया सल्तनत में अपना-अपना प्रभाव बढ़ाने के लिये अलग-अलग शहजादों के समर्थक बन जाने वाले थे और बाबर के बेटों को बादशाह हुमायूँ के विरुद्ध भड़काकर अपने स्वार्थ की सिद्धि करने वाले थे। इस कारण दूर-दूर तक विस्तृत, बिना किसी ठोस प्रशासनिक आधार वाली मुगल सल्तनत के शासन को संभालना कठिन हो जाने वाला था।

हुमायूँ को अपने भाइयों और अमीरों से भी अधिक खतरा मिर्जाओं से होने वाला था। मिर्जा मुगल खानदान के उन कुलीन शहजादों और उनकी औलादों को कहते थे जो राजवंश से सम्बन्धित होने के कारण स्वयं को तख्त के अधीन न समझकर तख्त की सत्ता एवं शक्ति में भागीदार समझते थे। इन मिर्जाओं को अनुशासन में लाना हुमायूँ के लिए आसान नहीं था। उसके राज्य में कुछ बड़े ही प्रभावशाली तथा शक्तिशाली मिर्जा विद्यमान थे जो तैमूर के वंशज थे। वे बाबर के तख्त के उसी प्रकार दावेदार थे जिस प्रकार बाबर के पुत्र।

इनमें सबसे अधिक प्रभावशाली मुहम्मद जमाँ मिर्जा था जिसका विवाह बाबर की पुत्री मासूमा बेगम से हुआ था। पहले वह बिहार का शासक बनाया गया परन्तु बाद में उसे जौनपुर का शासक बनाया गया जो मुगल साम्राज्य की सीमा पर स्थित था। अपने प्रभाव तथा अपनी स्थिति के कारण वह कभी भी हुमायूँ के लिए संकट उत्पन्न कर सकता था।

दूसरा प्रभावशाली मिर्जा मुहम्मद सुल्तान मिर्जा था जो सुल्तान हुसैन की लड़की का पुत्र था। हुमायूँ की माता माहम बेगम की एक बहिन का विवाह इसी मुहम्मद सुल्तान मिर्जा से हुआ था। इस प्रकार मुहम्मद सुल्तान मिर्जा हुमायूँ का चाचा और मौसा दोनों लगता था और स्वयं को राज्य का प्रबल दावेदार मानता था।

मिर्जा लोग बेहद लालची और राज्य के भूखे थे तथा किसी भी संकटापन्न स्थिति में हुमायूँ के राज्य की बन्दरबांट कर सकते थे। इसलिए हुमायूँ के लिए इन मिर्जाओं से सतर्क रहना आवश्यक था।

बाबर ने बहुत कम समय में भारत का बहुत बड़ा हिस्सा जीत लिया था, इस विशाल क्षेत्र में वह किसी तरह का शासनतंत्र विकसित नहीं कर सका था। इसलिए बाबर ने अपने द्वारा विजित क्षेत्रों को विभिन्न अमीरों, मिर्जाओं एवं बेगों में बाँट दिया था जो अपने-अपने क्षेत्र में शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखते थे और प्रतिवर्ष एक निश्चित राशि शाही-खजाने में भेजते थे।

बाबर को जब भी आवश्यकता होती थी, वह इन बेगों और मिर्जाओं को सेना लेकर आने के आदेश देता था। यह सामंत प्रथा का दूसरा रूप थी जो अत्यंत ढुलमुल होने के कारण हुमायूँ के लिए खतरे से खाली नहीं थी। अमीर, बेग, मिर्जा तथा अन्य अधिकारी कभी भी हुमायूँ को धोखा दे सकते थे और बादशाह तथा सल्तनत के लिए खतरा उत्पन्न कर सकते थे।

अभी मुगलों के लिए भारत के युद्ध पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुए थे। हुमायूँ जिस समय तख्त पर बैठा, वह समय युद्ध-कालीन परिस्थितियों जैसा ही था। यद्यपि बाबर ने अफगानों को कई बार पराजित कर दिया था किंतु अफगान अभी भी हार मानने का तैयार नहीं थे और मुगल सल्तनत को उन्मूलित करने के लिए तत्पर थे। ऐसी स्थिति में हुमायूँ के राज्य में राजनीतिक तथा आर्थिक गड़बड़ी फैली हुई थी और शासन व्यवस्था का कहीं अता-पता नहीं था। परिस्थितियों ने हुमायूँ के सिर पर कांटों का ताज धर दिया था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ की सल्तनत स्वार्थी भाइयों में बंट गई (45)

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हुमायूँ की सल्तनत स्वार्थी भाइयों में बंट गई

बाबर जानता था कि उसका बड़ा पुत्र हुमायूँ योग्य शहजादा है किंतु उसके छोटे भाई न केवल अयोग्य हैं अपितु राज्य के लालची भी हैं। इसलिए बाबर ने हुमायूँ को अपना उत्तराधिकारी बनाया किंतु हुमायूँ ने अपनी सल्तनत का बंटवारा करने का निश्चय किया। इस कारण हुमायूँ की सल्तनत स्वार्थी भाइयों में बंट गई!

बाबर ने पश्चिम में आमू नदी से लेकर पूर्व में बिहार और बंगाल तक के क्षेत्रों को अपने अधीन किया था। दक्षिण में मालवा तथा राजपूताना के राज्य उसके साम्राज्य की सीमा पर स्थित थे। इस साम्राज्य को कुछ समय के लिये तो संभाला जा सकता था परन्तु दीर्घकालीन शासन के लिये नवीन शासन व्यवस्थायें करनी आवश्यक थीं।

तुर्कों तथा मंगोलों की प्राचीन परंपराओं के अनुसार बाबर की मृत्यु के उपरान्त उसका साम्राज्य उसके पुत्रों में विभक्त हो जाना चाहिए था। बाबर ने इसके लिए एक योजना भी बनाई थी जिसके तहत उसने हुमायूँ को बदख्शां का, कामरान को काबुल का तथा अस्करी को मुल्तान का गवर्नर बनाया था।

जबकि मिर्जा हिंदाल सबसे छोटा होने के कारण अपने सबसे बड़े भाई हुमायूँ के सरंक्षण में बदख्शां में रखा गया था। संभवतः बाबर को लगता था कि इस प्रकार अपने पुत्रों की नियुक्ति एक दूसरे से दूर के क्षेत्रों में कर देने से बाबर की मृत्यु के बाद उसके राज्य का बंटवारा बड़ी आसानी से हो जाएगा।

बाबर चाहता था कि हुमायूँ समरकंद पर अधिकार कर ले और ट्रांसऑक्सिाना पर राज्य करे। हिंदाल बदख्शां का शासक बन जाए। अफगानिस्तान के क्षेत्र कामरान के पास रह जाएं और अस्करी मुल्तान एवं पंजाब का शासक बन जाए किंतु हुमायूँ के अचानक ही बदख्शां छोड़कर आगरा आ जाने के कारण बाबर की वह योजना विफल हो गई थी। इसलिए बाबर ने हुमायूँ को संभल का गवर्नर बना दिया और हिंदाल बदख्शां का गवर्नर बन गया। कामरान पूर्वत् काबुल में और अस्करी मुल्तान में रखा गया।

अब बाबर मर चुका था और हुमायूँ समूची सल्तनत का बादशाह बनाया जा चुका था। यह निश्चित था कि यदि हुमायूँ तुर्कों एवं मंगोलों की पुरानी परम्पराओं की उपेक्षा करके समस्त सल्तनत अपने अधिकार में रखने का प्रयत्न करता तो उसके भाई उसके विरुद्ध विद्रोह कर देते और अमीर लोग उसके अलग-अलग भाई के साथ होकर उनका समर्थन करते। अतः हुमायूँ ने अपने पिता की विशाल सल्तनत अपने भाइयों में बांट दी।

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हुमायूँ ने कामरान को काबुल, कांधार तथा बदख्शाँ का, अस्करी को सम्भल का तथा मिर्जा हिन्दाल को मेवात का राज्य दे दिया। सल्तनत का शेष भाग हुमायूँ ने अपने पास रखा। इस प्रकार हुमायूँ ने अपने पिता के साम्राज्य को अपने भाइयों में बाँट दिया परन्तु सिद्धान्ततः वह अपने पिता के तख्त का उत्तराधिकारी बना रहा और उसकी प्रभुत्व-शक्ति इन चारों राज्यों पर अविभक्त बनी रही। हुमायूँ को लगता था कि इस व्यवस्था से उसके भाई संतुष्ट हो जाएंगे किंतु उसका कोई भी भाई इस व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। हुमायूँ की सल्तनत के लिए यह नाजुक दौर था। इस कारण उसे अपने भाइयों एवं सल्तनत के समस्त तत्वों की सहायता की आवश्यकता थी जिनमें तुर्की अमीर, तुर्को-मंगोल मिर्जा एवं मुगल बेग शामिल थे। बाबर ने अपनी सेना का गठन युद्धकालीन आवश्यकताओं के आधार पर किया था। अब इस सेना के कंधों पर न केवल सल्तनत के शासन को सुचारू रूप से संचालित करने की जिम्मेदारी थी अपितु सल्तनत के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले विद्रोहों एवं बाहरी आक्रमणों से भी सल्तनत की रक्षा करने की आवश्यकता थी किंतु मुगल सेनाएं इन जिम्मेदारियों का वहन करने के लिए प्रशिक्षित नहीं थीं।

मुगल सेना में बड़ी संख्या में मंगोल, उजबेग, तुर्क, चगताई, फारसी, अफगानी तथा भारतीय मुसलमान भर्ती हो चुके थे। प्रत्येक सेना अपने कबीले के नेता की अध्यक्षता में युद्ध करती थी। विभिन्न कबीलों से सम्बन्ध रखने वाली इन सेनाओं में ईर्ष्या-द्वेष व्याप्त था। इस सेना को युद्धों में तो व्यस्त रखा जा सकता था किंतु शांतिकाल में इस सेना को नियंत्रण में रख पाना बहुत कठिन था। कई बार सैनिक टुकड़ियां परस्पर संघर्ष करने लगती थीं। यह स्थिति हुमायूँ के राज्य के लिये अत्यंत घातक थी।

बाबर तथा हुमायूँ ने कई बार अफगानों को हाराया था परन्तु भारत में सवा तीन सौ साल से शासन कर रही अफगान-शक्ति से छुटकारा पाना इतना आसान नहीं था। बाबर के भय से अफगान छिन्न-भिन्न हो गये थे और उनका नैतिक बल समाप्त प्रायः था परन्तु उनमें से कई अफगान अब भी मुगलों का आधिपत्य स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

उन्हें लगता था कि मुगलों को नष्ट करके दिल्ली सल्तनत को एक बार फिर से जीवित किया जा सकता है। इसलिए बिहार की तरफ के अफगानों ने सिकंदर लोदी के पुत्र महमूद लोदी को अपना सुल्तान घोषित कर दिया और उसके झण्डे के नीचे संगठित होने लगे। बिबन, बयाजीद, मारूफ, फार्मूली आदि शक्तिशाली अफगान-योद्धाओं ने महमूद लोदी का नेतृत्व स्वीकार कर लिया।

वे किसी भी कीमत पर अपनी खोई हुई शक्ति को पुनः स्थापित करना चाहते थे और बंगाल तथा गुजरात के सुल्तानों से मिलकर मुगलों को भारत से मार-भगाने की योजनाएँ बना रहे थे।

हुमायूँ भी इस बात को जानता था कि अफगान कभी भी बंगाल तथा गुजरात के शासकों से हाथ मिला सकते थे। हुमायूँ को जितना बड़ा खतरा बिहार तथा बंगाल के अफगानों से था उससे कहीं अधिक बड़ा खतरा गुजरात के शासक बहादुरशाह से था। बहादुरशाह बड़ा ही महत्त्वाकांक्षी नवयुवक था।

अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए उसके पास साधन भी थे। उसका राज्य सम्पन्न था और उसने एक तोपखाना भी तैयार कर लिया था। उसे अत्यंत योग्य अधिकारियों की सेवाएँ प्राप्त थीं जिसके कारण उसके पड़ौसी राज्य उसकी शक्ति से आतंकित रहते थे।

महाराणा सांगा की मृत्यु के बाद राजपूताना, मालवा तथा दक्षिण भारत के राज्यों में बहादुरशाह का विरोध करने की क्षमता नहीं बची थी। ऐसे शक्तिशाली अफगान शासक की ओर अन्य अफगान सरदारों का आकृष्ट हो जाना स्वाभाविक ही था। फतेह खाँ, कुतुब खाँ, आलम खाँ आदि कई अफगान सरदार, गुजरात चले गये।

बहादुरशाह ने उनका स्वागत किया और उन्हें जागीरों तथा पदों से पुरस्कृत किया। इस प्रकार गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह हुमायूँ का बड़ा प्रतिद्वन्द्वी बन गया। उत्तर भारत में उसका प्रभाव बढ़ता जा रहा था और उसकी दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी। इसलिये हुमायूँ को उससे भी सतर्क रहना आवश्यक था।

यद्यपि बाबर ने खानवा में राणा सांगा को बुरी तरह परास्त किया था जिसका राजपूत संघ पर घातक प्रभाव पड़ा था परन्तु राणा सांगा का पुत्र रत्नसिंह पुनः अपनी शक्ति बढ़ाने में लगा हुआ था। अन्य राजपूत-राज्य भी स्वयं को संगठित करने तथा अपनी शक्ति बढ़़ाने का प्रयत्न कर रहे थे। वे मुगलों को घृणा से देखते थे तथा उन्हें भारत से बाहर निकालने के लिये अफगानों से गठबन्धन कर सकते थे। इसलिए हुमायूँ को राजपूतों की ओर से भी पूरा खतरा था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मिर्जा कामरान ने बड़े भाई हुमायूँ की पीठ में पहली छुरी मारी (46)

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मिर्जा कामरान ने बड़े भाई हुमायूँ की पीठ में पहली छुरी मारी

हुमायूँ को कालिंजर के राजा रुद्र प्रताप देव तथा अफगानों के नेता महमूद लोदी से संघर्ष में फंसा हुआ देखकर मिर्जा कामरान ने पंजाब पर हमला कर दिया। कामरान का यह काम पीठ में छुरी भौंकने से कम नहीं था।

बादशाह बनते समय हुमायूँ के सामने समस्याओं का अम्बार था जिन्हें धैर्य, समय, परिश्रम, योग्यता एवं भाग्य के बल पर ही सुलझाया जा सकता था। हुमायूँ के पास धैर्य, समय, परिश्रम एवं योग्यता सभी कुछ उपलब्ध था किंतु इन गुणों के अनुपात में उसका भाग्य बहुत कमजोर था।

तुर्की भाषा में हुमायूँ का अर्थ सौभाग्यशाली होता है किंतु वास्तविक जीवन में वह दुर्भाग्यशाली था। उसके दुर्भाग्य के कारण ही उसके चारों ओर अविश्वसनीय और धोखेबाज लोगों का जमावड़ा था। उसके दुर्भाग्य के कारण ही उसके भाई और बहनोई उसके प्रति छल करने की भावना रखते थे किंतु हुमायूँ को अपनी शिक्षा एवं धैर्य के बल पर इस दुर्भाग्य पर विजय प्राप्त करनी थी।

बाबर तथा माहम सुल्ताना बेगम ने हुमायूँ को अच्छी शिक्षा दिलवाई थी। उसे तुर्की, अरबी और फारसी साहित्य के साथ-साथ घुड़सवारी, तलवारबाजी एवं रणनीतिक कौशल की शिक्षा दी गई थी। हुमायूँ नजूमी अर्थात् ज्योतिषी तो नहीं था किंतु उसे नक्षत्रों की गति का अच्छा ज्ञान था और विवाह आदि के मुहूर्त भी स्वयं ही निकाल लेता था। हमीदा बानो के साथ हुए विवाह का मुहूर्त हुमायूँ ने जंत्री देखकर स्वयं ही निकाला था।

हुमायूँ अपने पिता के जीवन काल में अनेक युद्धों में भाग लेने तथा प्रशासकीय कार्य करने का अनुभव प्राप्त कर चुका था। बाबर ने जब उसे पहली बार बदख्शाँ का शासन प्रबन्ध सौंपा, उस समय हुमायूँ केवल 11 साल का बालक था। बदख्शाँ पर उजबेग लोग बार-बार आक्रमण करते थे परन्तु हुमायूँ ने उजबेगों को दबाकर वहाँ पर शान्ति-व्यवस्था स्थापित की। जब बाबर ने ई.1526 में अंतिम बार भारत पर आक्रमण किया था तब हुमायूँ केवल 18 साल का युवक था किंतु उसने अनेक युद्धों में स्थानीय सरदारों को परास्त करके बाबर की राह आसान की थी।

हुमायूँ ने की लड़ाई तथा खानवा युद्ध में भाग लेकर अपनी सैन्य-प्रतिभा का परिचय दिया था। पानीपत के युद्ध के बाद बाबर ने हुमायूँ को बंगाल तथा बिहार के अफगान अमीरों के विद्रोह का दमन करने की जिम्मेदारी दी थी जिसे हुमायूँ ने भलीभांति निभाया था।

जब हुमायूँ अचानक ही बदख्शां से आगरा आ गया था तब बाबर ने हुमायूँ को सम्भल का गवर्नर नियुक्त किया था। इस प्रकार हुमायूँ को बादशाह बनते समय लम्बी दूरी की यात्राएं करने, छोटे युद्धों को संचालित करने, बड़े युद्धों में भागीदारी निभाने एवं प्रांतीय प्रशासन का संचालन करने का अनुभव प्राप्त था। उसे उज्बेकों, अफगानों एवं राजपूतों से लड़ने का प्रत्यक्ष अनुभव था।

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बाबर की तरह हुमायूँ भी विषम-घड़ी में आपा नहीं खोता था। वह भी बाबर की तरह अपने परिवार से प्रेम करता था और परिवार की महिलाओं के साथ विशेष आदर के साथ व्यवहार करता था। बादशाह बनने के बाद हुमायूँ के अनुभवों एवं गुणों की वास्तविक परीक्षा का समय आ गया था। बादशाह बनने के बाद हुमायूँ को सबसे पहला युद्ध-अभियान बिबन तथा बायजीद के विरुद्ध करना पड़ा। गुलबदन बेगम ने हुमायूंनामा में लिखा है कि बाबर की मृत्यु के छः माह बाद बब्बन (बिबन) तथा बायजीद ने गौड़ की ओर आगे बढ़कर मुगल सल्तनत पर हमला किया। इस पर हुमायूँ ने स्वयं एक सेना लेकर गौड़ देश पर अभियान किया और बब्बन तथा बायजीद को परास्त करके चुनार होते हुए आगरा गया। जब हुमायूँ अफगानों को परास्त करके आगरा लौटा तब हुमायूँ की माता माहम बेगम जीवित थी। उसने अपने पुत्र की इस विजय के उपलक्ष्य में बड़ा उत्सव मनाने का निश्चय किया। उसके आदेश से आगरा के शाही महलों से लेकर आगरा की गलियों एवं सैनिक छावनियों में प्रकाश किया गया। सड़कों को फूलों एवं रंगीन कागजों से सजाया गया। निर्धनों को भोजन करवाया गया तथा 7000 लोगों को शाही-पोशाकें दी गईं। हुमायूँ की बहिन गुलबदन बेगम ने अपनी पुस्तक हुमायूंनामा में इस उत्सव का आंखों देखा वर्णन किया है।

कुछ दिनों बाद हुमायूँ को समाचार मिला कि कालिंजर का राजा प्रताप रुद्र देव कालपी पर अभियान की तैयारी कर रहा है। इन दिनों कालपी का सामरिक महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया था क्योंकि गुजरात के शासक बहादुरशाह ने मालवा पर अधिकार करके मेवाड़ पर हमला बोल दिया था तथा मेवाड़ से कालपी होते हुए आगरा तक पहुंचने का सपना देख रहा था। इसलिये हुमायूँ ने कालिंजर पर हमला करके राजा प्रताप रुद्र देव को निरुद्ध करने का निर्णय लिया ताकि वह कालपी की तरफ मुँह न कर सके।

कालिंजर का दुर्ग वर्तमान उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में स्थित था। यह विन्ध्याचल पर्वत पर कई सौ फुट ऊँची चट्टान पर बना हुआ होने के कारण सुरक्षित और अभेद्य समझा जाता था। तुर्कों ने कई बार इस दुर्ग पर अधिकार करने का प्रयास किया था किंतु वे इसे जीत नहीं पाए थे। बाबर ने भी हुमायूँ को इस दुर्ग पर आक्रमण करने के लिए भेजा था परन्तु हुमायूँ को कालिंजर के शासक राजा प्रताप रुद्र से समझौता करके दुर्ग का घेरा उठाना पड़ा था।

हुमायूँ की सेना ने कालिंजर के दुर्ग पर घेरा डाल दिया और वह एक महीने तक दुर्ग पर गोलाबारी करती रही परन्तु कालिंजर दुर्ग को अधिकार में नहीं किया जा सका। इसी बीच हुमायूँ को कालिंजर में व्यस्त देखकर इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी ने बिहार से निकलकर जौनपुर पर अधिकार कर लिया और वहाँ से मुगल अफसरों को मार भगाया। इसलिये हूमायू को एक बार फिर कालिंजर के राजा से समझौता करके जौनपुर की तरफ जाना पड़ा।

अभी हुमायूँ मार्ग में ही था कि वर्षा ऋतु आरम्भ हो गई और गीली मिट्टी में तोपगाड़ियों को आगे बढ़ाना कठिन हो गया। इस कारण हुमायूँ को वहीं रुक जाना पड़ा और वह अफगानों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सका। हुमायूँ को जौनपुर में फंसा हुआ जानकर शेर खाँ नामक एक अफगान सरदार ने चुनार के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इसी समय हुमायूँ को अपने भाई कामरान के विद्रोह की सूचना मिली।

हुमायूँ की स्थिति राजनीति की चौसर में फंसे हुए मोहरे जैसी हो गई। उसने राजा प्रताप रुद्र देव को कालपी की तरफ बढ़ने से रोकने के लिए कालिंजर पर आक्रमण किया तो अफगानों ने विद्रोह कर दिया। जब उसने कालिंजर का मोर्चा छोड़कर अफगानों की तरफ रुख किया तो शेर खाँ ने चुनार पर अधिकार कर लिया तथा हुमायूँ के अपने भाई मिर्जा कामरान ने पंजाब दबा लिया। इसलिए हुमायूँ को अफगानों के विरुद्ध अभियान बीच में छोड़कर अपनी राजधानी की तरफ दौड़ना पड़ा क्योंकि उसे भय था कि कहीं मिर्जा कामरान आगरा पर अधिकार न कर ले!

हुमायूँ ने मिर्जा कामरान को अफगागिनस्तान का शासक बनाया था जिसमें काबुल, कांधार, गजनी तथा बदख्शां शामिल थे। यह एक विशाल क्षेत्र था और समरकंद से अफगानिस्तान आने के बाद बाबर का मूल राज्य यही बन गया था किंतु जिस तरह बाबर और हुमायूँ  जानते थे कि अफगानिस्तान के निर्धन एवं अनुपजाऊ भूभाग पर शासन करने से कोई लाभ नहीं है, उसी प्रकार कामरान भी इस क्षेत्र की निर्धनता से भलीभांति परिचित हो गया था।

इसलिए हुमायूँ को कालिंजर के राजा रुद्र प्रताप देव तथा अफगानों के नेता महमूद लोदी से संघर्ष में फंसा हुआ देखकर मिर्जा कामरान ने पंजाब पर हमला कर दिया। कामरान का यह काम पीठ में छुरी भौंकने से कम नहीं था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मद जमां मिर्जा ने हुमायूँ की पीठ में दूसरी छुरी भौंकी (47)

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मुहम्मद जमां मिर्जा ने हुमायूँ की पीठ में दूसरी छुरी भौंकी

जिस समय हुमायूँ कालिंजर के राजा रुद्र प्रताप देव तथा अपने छोटे भाई मिर्जा कामरान से उलझा हुआ था उस समय ने हुमायूँ के बहनोई मुहम्मद जमां मिर्जा ने हुमायूँ की पीठ में दूसरी छुरी भौंक दी!

बादशाह बनते ही हुमायूँ चारों तरफ शत्रुओं से घिर गया। कालिंजर का राजा रुद्र प्रताप देव कालपी पर आंख गढ़ाए बैठा था, अफगान सेनापति बिहार की तरफ से आगे बढ़कर जौनपुर पर अधिकार कर चुके थे, गुजरात का शासक बहादुरशाह दिल्ली पर आंख गढ़ाए बैठा था और राजपूत स्वयं को फिर से शक्तिशाली बनाने के प्रयास कर रहे थे।

इन सबसे बढ़कर खराब बात यह हुई कि हुमायूँ को शत्रुओं से उलझा हुआ देखकर हुमायूँ के भाई मिर्जा कामरान ने अफगानिस्तान का प्रबन्ध अपने छोटे भाई अस्करी को सौंपा और स्वयं अपनी सेना के साथ पंजाब में घुस आया। मिर्जा कामरान ने मुल्तान से लेकर लाहौर तक के क्षेत्र पर अधिकार करके अपने अधिकारी नियुक्त कर दिये। इसके बाद कामरान ने हुमायूँ को चालाकी भरे विनम्र पत्र लिखे कि हुमायूँ मुल्तान तथा पंजाब के प्रान्त कामरान को दे दे।

चूँकि हुमायूँ के पास अपने साम्राज्य के पश्चिमी-भाग में शान्ति बनाये रखने का अन्य कोई उपाय नहीं था, इसलिये हुमायूँ ने मुल्तान तथा पंजाब पर मिर्जा कामरान का दावा स्वीकार कर लिया। कामरान का यह काम हुमायूँ की पीठ में छुरी भौंकने जैसा था।

कामरान को सन्तुष्ट करने के बाद हुमायूँ ने पुनः विद्रोही अफगानों की ओर ध्यान दिया। उसने लखनऊ के निकट दौरान नामक स्थान पर अफगानों से लोहा लिया। अफगानों ने अपने खोये हुए राज्य की प्राप्ति के लिये बड़ी वीरता से युद्ध किया परन्तु वे परास्त हो गये। जौनपुर पर हुमायूँ का अधिकार हो गया और महमूद लोदी बिहार की ओर भाग गया। उसने फिर कभी युद्ध करने का साहस नहीं किया। वैसे भी अब लोदियों का समय पूरी तरह बीत चुका था और नए अफगान नेता शेर खाँ का उदय हो रहा था।

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अभी हुमायूँ कामरान द्वारा किए गए छल से उबरा भी नहीं था कि हुमायूँ के बहनोई मुहम्मद जमां मिर्जा ने हुमायूँ की पीठ में धोखे की दूसरी छुरी भौंक दी। मुहम्मद जमां मिर्जा ने कुछ मुगल अमीरों के साथ मिलकर हुमायूँ के विश्वस्त अमीर मुहम्मद खाँ कोकी के पिता को मार डाला और स्वयं बागी हो गया। हुमायूँ ने बागियों को पकड़ने के लिए एक सेना भेजी। मुहम्मद जमां, सुल्तान मुहम्मद मिर्जा और नैखूब मिर्जा पकड़े गए। इन लोगों को बयाना के किले में यादगार मामा की कैद में रखा गया किंतु यादगार मामा के आदमियों ने मुहम्मद जमां को भगा दिया। इस पर हुमायूँ ने आज्ञा दी कि सुल्तान मुहम्मद मिर्जा तथा नैखूब सुल्तान मिर्जा की आंखों में सलाई फेर दी जाए। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि यादगार मामा के आदमी बागियों से मिले हुए थे। उन्होंने सलाई फेरने में भी चालाकी की तथा इस प्रकार सलाई फेरी कि नैखूब तो अंधा हो गया किंतु सुल्तान मुहम्मद मिर्जा की आंखों पर चोट नहीं पहुंची। कुछ दिनों बाद सुल्तान मुहम्मद मिर्जा भी बयाना से भाग खड़ा हुआ और हुमायूँ के बहनोई मुहम्मद जमां मिर्जा से जा मिला। मुहम्मद जमां मिर्जा, सुल्तान मुहम्मद मिर्जा, उलूग मिर्जा और शाह मिर्जा गुजरात के शासक बहादुरशाह से जा मिले।

गुजरात का शासक बहादुरशाह जानता था कि इस समय मुगल सल्तनत नाजुक दौर से गुजर रही है, यदि वह मुगलों को एक जोरदार टक्कर मार दे तो मुगल सल्तनत शीशे के महल की तरह चूर-चूर होकर बिखर सकती है। इसलिए बहादुरशाह ने असंतुष्ट मिर्जाओं को अपनी सेवा में रख लिया।

इन मिर्जाओं ने बहादुरशाह को समझाया कि हुमायूँ एक निकम्मा शासक है और उसकी सेना में कोई दम नहीं है। इसलिये उससे दिल्ली का तख्त प्राप्त करना कठिन नहीं है। मिर्जाओं की इस बात से बहादुरशाह के उत्साह में वृद्धि हुई और वह तेजी से अपनी शक्ति बढ़ाने लगा। निश्चित रूप से उसकी दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी।

मार्च 1531 में बहादुरशाह ने मालवा पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। मेवाड़ का राज्य, दिल्ली तथा मालवा के बीच स्थित था। यदि बहादुरशाह मेवाड़ पर अधिकार स्थापित कर लेता तो वह मुगल सम्राज्य की सीमा पर पहुँच जाता और सीधे मुगल साम्राज्य पर आक्रमण कर सकता था।

बहादुरशाह ने हुमायूँ के शत्रु शेर खाँ अफगान के साथ भी गठजोड़ कर लिया था और हुमायू के विरुद्ध उसकी सहायता कर रहा था। बहादुरशाह ने बंगाल के शासक के साथ भी सम्पर्क स्थापित कर लिया जो हुमायू के विरुद्ध षड्यन्त्र रच रहा था। वास्तव में बहादुरशाह का दरबार हुमायूँ के शत्रुओं की शरण स्थली बन गया था। बहुत से विद्रोही अफगान तथा असंतुष्ट मुगल अमीर, बहादुरशाह के दरबार में चले गये थे।

बहादुरशाह को पुर्तगालियों से भी सैनिक सहायता का आश्वासन मिल गया। बहादुरशाह की गतिविधियां देखकर हुमायूँ भी समझ गया था कि उससे युद्ध होना अनिवार्य है। उसने बहादुरशाह को पत्र लिखा कि वह उसके शत्रुओं को, विशेषकर मुहम्मद जमाँ मिर्जा को अपने यहाँ शरण नहीं दे।

बहादरशाह ने हुमायूँ को संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। इस पर हुमायूँ ने बहादुरशाह के विरुद्ध अभियान करने का निश्चय किया। ई.1535 में हूमायू अपनी सेना के साथ आगरा से प्रस्थान करके ग्वालियर पहुँचा और वहीं से बहादुरशाह की गतिविधियों पर दृष्टि रखने लगा। थोड़े दिनों बाद हुमायूँ और आगे बढ़ा तथा उज्जैन पहुँच गया। इन दिनों बहादुरशाह चित्तौड़ का घेरा डाले हुए था।

पाठकों की सुविधा के लिए यह बताना समीचीन होगा कि जब मेवाड़ का शासक महाराणा सांगा जीवित था तब यही बहादुरशाह अपने दो भाइयों चांद खाँ तथा इब्राहीम खाँ के साथ महाराणा सांगा की शरण में रहा था। महाराणा सांगा ने उसे तथा उसके भाइयों को बड़े प्रेम से अपने पास रखा था।

मिराते सिकंदरी में लिखा है कि सांगा की माता जो हलवद की राजकुमारी थी, बहादुरशाह को बेटा कहा करती थी। एक बार बहादुरशाह तथा राणा सांगा के भतीजे में झगड़ा हो गया जिसमें सांगा का भतीजा मारा गया। जब राणा के राजपूत, बहादुरशाह को मारने लगे तब राजमाता ने शरणागत कहकर बहादुरशाह के प्राणों की रक्षा की थी।

जब महाराणा सांगा का बड़ा पुत्र रत्नसिंह मेवाड़ का महाराणा हुआ तो बहादुरशाह गुजरात का सुल्तान बन चुका था। बहादुरशाह, महाराणा रत्नसिंह की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने महाराणा रत्नसिंह को प्रसन्न करने के लिये 30 हाथी एवं बहुत से घोड़े भेंट किये तथा महाराणा के सामंतों को 1500 जरदोरी खिलअतें प्रदान की।

बहादुरशाह ने महाराणा से प्रार्थना की कि वह मालवा पर आक्रमण करने जा रहा है तथा इस काम में उसे मेवाड़ की सेना चाहिए। महाराणा रत्नसिंह ने अपनी एक सेना बहादुरशाह के साथ कर दी। इस सेना के बल पर बहादुरशाह ने मालवा को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया।

अब वही बहादुरशाह मेवाड़ को निगल जाने के लिए बेताब था। इस समय सांगा का दूसरा पुत्र विक्रमादित्य चित्तौड़ का राणा था। उसमें इतनी शक्ति नहीं थी कि वह बहादुशाह से लड़ सके। इसलिए राणा विक्रमादित्य की माता कर्णवती ने हूमायू को राखी भेजकर उससे सहायता मांगी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह समुद्र में डूब कर मर गया (48)

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गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह समुद्र में डूब कर मर गया

फरवरी 1537 में गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह समुद्र में नाव उलट जाने से डूब कर मर गया, जब वह दीव के पुर्तगाली गवर्नर से मिलने जा रहा था। बहादुरशाह ने गुजरात तथा मालवा पर फिर से अधिकार कर लिया था किंतु वह इस विजय का उपभोग नहीं कर सका।

यूरोपियन इतिहासकार ब्रिग्ज ने लिखा है कि जब बहादुरशाह को ज्ञात हुआ कि मेवाड़ की राजमाता ने हुमायूँ को राखी भेजी है तो बहादुरशाह ने हुमायूँ को पत्र लिखा कि- ‘मैं इस समय जेहाद पर हूँ। यदि तुम चित्तौड़ की सहायता करोगे तो खुदा के सामने क्या जवाब दोगे?’

यह पत्र पढ़कर हुमायूँ उज्जैन में ही ठहर गया और चित्तौड़-युद्ध के परिणाम की प्रतीक्षा करने लगा। यह हुमायूँ के लिए स्वर्णिम अवसर था जब वह मेवाड़ से मित्रता करके भारत में अपनी जड़ें मजबूत कर सकता था परन्तु हूमायू ने मेवाड़ की परिस्थिति से कोई लाभ नहीं उठाया।

मेवाड़ी सरदारों ने महाराणा विक्रमादित्य तथा उसके छोटे भाई कुंवर उदयसिंह को दुर्ग से बाहर भेज दिया। अन्ततः बहादुरशाह तथा मेवाड़ की सेना के बीच भयानक संघर्ष हुआ जिसमें मेवाड़ की पराजय हो गई तथा कई हजार मेवाड़ी सैनिक मारे गये। दुर्ग में स्थित स्त्रियों ने राजमाता कर्णवती के नेतृत्व में जौहर किया। चित्तौड़ पर गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह अधिकार करके बैठ गया।

जब गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करके चित्तौड़ की विपुल सम्पदा को लूट चुका तब हुमायूँ की आँखें खुलीं और वह बहादुरशाह पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ा। बहादुरशाह ने चित्तौड़ के किले को आग के हवाले कर दिया और स्वयं भाग कर मंदसौर चला गया। हुमायूँ ने बहादुरशाह का पीछा किया और वह भी मंदसौर पहुंच गया।

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गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह हुमायूँ का मार्ग रोकने के लिये मन्दसौर में चारों ओर से खाइयाँ खुदवा कर मोर्चा बांध कर बैठ गया। उसने अपने तोपखाने को सामने करके अपनी सेना उसके पीछे छिपा दी। हुमायूँ को इसका पता लग गया। इसलिये हुमायूँ के अश्वारोहियों ने तोपों के गोलों की पहुंच से दूर रहकर ही बहादुरशाह की सेना पर बाण-वर्षा करके बहादुरशाह के तोपखाने को बेकार कर दिया। हुमायूँ ने बहादुरशाह के रसद मार्ग को भी काट दिया। इस पर बहादुरशाह मन्दसौर से भागकर माण्डू चला गया। मुगल सेना ने तेजी से बहादुरशाह का पीछा किया। इस पर बहादुरशाह माण्डू से चाम्पानेर की तरफ भागा। माण्डू के दुर्ग पर हुमायूँ का अधिकार हो गया। इस बीच बहादुरशाह की सेना छिन्न-भिन्न हो गई और वह केवल पाँच विश्वस्त अनुचरों के साथ चम्पानेर पहुंच सका। हुमायूँ ने एक हजार अश्वारोहियों के साथ बहादुरशाह का पीछा किया। इस पर बहादुरशाह ने अपने हरम की स्त्रियों तथा अपने खजाने को समुद्र में स्थित दीव नामक द्वीप पर भेज दिया जो उन दिनों पुर्तगालियों के अधिकार में था तथा स्वयं चम्पानेर में आग लगवाकर खम्भात भाग गया।

हूमायू ने खम्भात तक बहादुरशाह का पीछा किया किंतु जब बहादुरशाह दीव भाग गया तो हुमायूँ खंभात से चम्पानेर लौट आया।

हुमायूँ ने चम्पानेर दुर्ग पर अधिकार कर लिया जहाँ से उसे अपार सम्पत्ति प्राप्त हुई। कहा जाता है कि बहादुरशाह पर मिली इस अप्रत्याशित जीत की प्रसन्नता में हुमायूँ चाम्पानेर में ही रुककर भोग-विलास में डूब गया।

गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह शक्तिशाली सुल्तान था किंतु हुमायूँ के हाथों हुई उसकी इतनी भयानक पराजय का कारण यह बताया जाता है कि बहादुरशाह की काफी सेना चित्तौड़ अभियान में मारी गई थी और जो सेना बची थी उसके एक बड़े हिस्से ने बहादुरशाह के साथ छल करके स्वयं को युद्ध से अलग कर लिया क्योंकि बहादुरशाह का सेनापति रूमी खाँ गुप्त रूप से हुमायूँ से मिल गया था।

कुछ समय बाद हुमायूँ चम्पानेर से अहमदाबाद की ओर बढ़ा और उसने गुजरात पर अधिकार कर लिया। हुमायूँ ने मिर्जा अस्करी को गुजरात का शासक नियुक्त कर दिया। गुजरात की व्यवस्था करने के उपरान्त हुमायूँ दीव की ओर बढ़ा। उसका निश्चय बहादुरशाह को दीव में पहुंचकर दण्डित करने का था परन्तु इसी समय हुमायूँ को बिहार में अफगानों की गतिविधियां बढ़ने की सूचना मिली। इसलिये हुमायूँ ने तत्काल आगरा के लिए प्रस्थान किया ताकि वहाँ से बिहार की तरफ जा सके।

हुमायूँ के लौटते ही बहादुरशाह तथा उसके समर्थकों ने मुगलों को गुजरात से खदेड़ना आरम्भ कर दिया। मिर्जा अस्करी ने चाम्पानेर के मुगल गवर्नर तार्दी बेग से सहायता मांगी किंतु तार्दी बेग ने मिर्जा अस्करी की सहायता करने से मना कर दिया। हुमायूँ का ध्यान इस समय बिहार में सिर उठा रहे शेर खाँ पर केन्द्रित था इसलिए हुमायूँ भी अस्करी की सहायता के लिये सेना नहीं भेज सका।

बहादुरशाह ने गुजरात तथा मालवा पर फिर से अधिकार कर लिया किंतु वह इस विजय का बहुत दिनों तक उपभोग नहीं कर सका। फरवरी 1537 में जब वह दीव के पुर्तगाली गवर्नर से मिलने गया, तब नाव उलट जाने से समुद्र में डूब कर मर गया।

जब चित्तौड़ दुर्ग में स्थित बहादुरशाह के सैनिकों को बहादुरशाह के मरने की सूचना मिली तो वे दुर्ग छोड़कर भाग गये। यह समाचार सुनकर मेवाड़ी सरदारों ने पांच-सात हजार सैनिकों को एकत्रित करके चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया। महाराणा विक्रमादित्य तथा कुंवर उदयसिंह भी दुर्ग में आ गये।

हुमायूँ अफगान नेता शेर खाँ की गतिविधियों के समाचार सुनकर गुजरात से आगरा लौटा था। अब उसे अपना ध्यान पूरी तरह शेर खाँ पर केन्द्रित करना आवश्यक था।

शेर खाँ और हुमायूँ ई.1531 में भी चुनार दुर्ग को लेकर आमने-सामने हो गए थे किंतु उस समय शेर खाँ ने चुनार दुर्ग हुमायूँ को देकर युद्ध को कुछ समय के लिए टाल दिया था किंतु अब शेर खाँ ने फिर से ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी थीं जिनके कारण युद्ध को किसी भी हालत में टाला नहीं जा सकता था।

अपने दुर्भाग्य से हुमायूँ ने गुजरात में इतना समय खराब कर दिया था कि शेर खाँ को अपनी शक्ति बढ़ाने तथा हुमायूँ के विरुद्ध युद्ध की तैयारियां करने का पूरा समय मिल गया था। अब हुमायूँ को अपनी इस गलती का दण्ड भुगतना था।

शेर खाँ से हुमायूँ के सम्बन्धों को विस्तार से समझने के लिए हमें शेर खाँ की पिछली जिंदगी में झांकना होगा।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शेर खाँ बाबर के प्रधानमंत्री खलीफा का नौकर था (49)

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शेर खाँ बाबर के प्रधानमंत्री खलीफा का नौकर था

बबार की मृत्यु के तुरंत बाद तथा हुमायूँ के बादशाह बनते ही शेर खाँ का नाम अचानक ही इतिहास की पुस्तकों में सामने आने लगता है। उससे पहले शेर खाँ का कोई उल्लेख नहीं मिलता। वह कौन था, कहाँ से आया था, अचानक ही क्यों इतना महत्वपूर्ण हो गया था, इसे जानने के लिए हमें हुमायूँ के इतिहास को कुछ समय के लिए विश्राम देकर शेर खाँ की तरफ चलना होगा। क्योंकि यहाँ से शेर खाँ तथा हुमायूँ का इतिहास साथ-साथ चलने लगते हैं। एक के इतिहास को समझे बिना, दूसरे के इतिहास को समझना कठिन है।

शेर खाँ के पूर्वज अफगानिस्तान में रहने वाले सूर कबीले से निकले थे। इसलिये वे ‘सूर’ एवं ‘सूरी’ कहलाते थे। ये लोग स्वयं को मुहम्मद गौरी का वंशज मानते थे। शेर खाँ के दादा का नाम इब्राहीम खाँ सूरी और पिता का नाम हसन खाँ सूरी था। इब्राहीम खाँ सूरी, अफगानिस्तान के रौह नामक स्थान का निवासी था और घोड़ों का व्यापारी था।

जब दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने अफगानों को भारत में आने का निमंत्रण दिया तब इब्राहीम खाँ सूरी अपने पुत्र हसन खाँ के साथ हिन्दुस्तान चला आया। उसने पंजाब में स्थित हिसार-फिरोजा की जागीर में जमाल खाँ नामक एक अफगान अमीर के यहाँ नौकरी कर ली। जमाल खाँ ने इब्राहीम खाँ सूरी को कुछ गाँव जागीर में दे दिये जिससे वह पचास घोड़ों का खर्च चला सके। इब्राहीम खाँ लोदी के बाद हसन खाँ भी जमाल खाँ की नौकरी करने लगा। धीरे-धीरे हसन खाँ उन्नति करने लगा और पाँच सौ घोड़ों का सरदार बन गया।

हसन खाँ सूरी की चार पत्नियाँ थीं। उनमें से पहली पत्नी एक अफगान महिला थी और शेष तीन हिन्दुस्तानी नौकरानियाँ थीं जिनकी सुंदरता से प्रभावित होकर हसन खाँ ने एक-एक करके उनसे विवाह कर लिये थे। हसन की अफगान पत्नी से दो पुत्र हुए जिनमें से बड़े का नाम फरीद खाँ तथा छोटे पुत्र का नाम निजाम खाँ रखा गया। यही फरीद खाँ आगे चलकर पहले शेर खाँ के नाम से जाना गया तथा बाद में शेरशाह सूरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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कुछ समय पश्चात् दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने जमाल खाँ का स्थानांतरण हिसार-फरोजा से जौनपुर कर दिया। इस पर हसन खाँ भी अपनी चारों पत्नियों एवं उनके बच्चों को लेकर जमाल खाँ के साथ बिहार चला आया। जमाल खाँ ने हसन खाँ को बिहार में स्थित सहसराम तथा खवासपुर टाँडा का जागीरदार बना दिया। जब हसन खाँ का पुत्र फरीद खाँ कुछ बड़ा हुआ तो उसने अनुभव किया कि उसका पिता हसन खाँ अपनी अफगान बीवी अर्थात् फरीद खाँ की माता की बजाय अपनी हिंदुस्तानी बीवियों से अधिक प्रेम करता था। वह फरीद खाँ और निजाम खाँ की बजाय हिंदुस्तानी बीवियों के पेट से उत्पन्न आलौदों पर प्यार लुटाता था। इस कारण फरीद खाँ अपने पिता हसन खाँ से असंतुष्ट होकर जौनपुर चला गया और वहाँ जमाल खाँ के पास रहकर अरबी-फारसी पढ़ने लगा। कुछ समय बाद हसन खाँ स्वयं जौनपुर गया तथा जमाल खाँ को मध्यस्थ बनाकर अपने पुत्र फरीद खाँ को सहसराम ले आया। हसन खाँ ने फरीद को योग्य जानकर उसे अपनी जागीर का प्रबंध सौंप दिया। फरीद खाँ प्रतिभावान एवं शिक्षित तो था ही, साथ ही उसने जौनपुर के राजनीतिक वातावरण में रहकर युद्ध एवं जागीरी शासन के कार्य के बारे में बहुत सी बातें सीख ली थीं।

इसलिए फरीद खाँ ने अपने पिता की जागीर का प्रबंधन बहुत मेहनत एवं समझदारी से किया जिससे हसन खाँ की आय बढ़ गई और हसन खाँ फरीद खाँ को चाहने लगा। यह बात हसन खाँ की हिन्दुस्तानी बीवियों को पसंद नहीं आई और वे फरीद खाँ को हसन खाँ से दूर करने का यत्न करने लगीं। अन्ततः उन्होंने षड़यंत्र करके फरीद खाँ को उसके पिता की जागीर से निकलवा दिया।

इस बार फरीद खाँ अपने पिता की जागीर छोड़कर आगरा चला गया और पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ लोदी की नौकरी करने लगा। जब दौलत खाँ लोदी फरीद खाँ के काम से प्रसन्न हो गया तब फरीद ने दौलत खाँ लोदी से अनुरोध किया कि वह सुल्तान इब्राहीम लोदी से कहकर मुझे मेरे पिता की जागीर दिलवा दे क्योंकि मेरे पिता ने अपनी हिन्दुस्तानी बीवियों के कहने से मुझे अपनी जागीर से बेदखल कर दिया है।

जब दौलत खाँ लोदी ने यह बात सुल्तान इब्राहीम लोदी को बताई तो इब्राहीम लोदी ने कहा कि उसने तुम्हारे सामने अपने पिता की निंदा करके बहुत ही नीचता का काम किया है, इसलिए मैं उसे जागीर नहीं दे सकता। फरीद खाँ मन-मसोसकर रह गया।

ई.1520 में फरीद के पिता हसन की मृत्यु हो गई। यह सूचना पाते ही फरीद ने आगरा से सहसराम के लिए प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचते ही उसने भाइयों को अपने पिता की जागीर से मार भगाया और जागीर पर अधिकार कर लिया। फरीद के सौतले भाइयों को चौंद के जागीरदार मुहम्मद खाँ सूरी का संरक्षण तथा समर्थन प्राप्त हो गया जो एक प्रभावशाली अमीर था। इससे फरीद संकट में पड़ गया। उसने अपने भाइयों के षड़यंत्रों को रोकने के लिए बिहार के शासक बहादुर खाँ नूहानी के यहाँ नौकरी कर ली जिसके प्रभाव का प्रयोग करके फरीद अपने भाइयों के षड़यंत्रों को विफल कर सकता था।

अपनी योग्यता तथा परिश्रम से फरीद ने अपने नये स्वामी को भी प्रसन्न कर लिया। एक बार फरीद ने शेर का शिकार किया। फरीद की वीरता से प्रसन्न होकर बहादुर खाँ नूहानी ने उसे शेर खाँ की उपाधि दी। तब से फरीद शेर खाँ कहलाने लगा। सूरी कबीले का वंशज होने के कारण उसे शेर खां सूरी भी कहते हैं। थोड़े दिन बाद उसे शाहजादे जलाल खाँ का शिक्षक नियुक्त कर दिया गया। इससे शेर खाँ के प्रभाव तथा उसकी प्रतिष्ठा में बड़ी वृद्धि हो गई।

एक बार शेर खाँ सूरी छुट्टी लेकर अपनी जागीर पर गया परन्तु वहाँ अधिक दिनों तक रुक गया। इस पर मुहम्मद खाँ सूरी ने बिहार के सुल्तान बहादुर खाँ नूहानी को शेर खाँ के विरुद्ध भड़काया। बहादुर खाँ नूहानी, मुहम्मद खाँ की बातों में आ गया तथा शेर खाँ से अप्रसन्न हो गया। मुहम्मद खाँ सूरी ने शेर खाँ से कहा कि वह जागीर में अपने भाइयों को हिस्सा दे। शेर खाँ ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इससे अप्रसन्न होकर मुहम्मद खाँ ने शेर खाँ की जागीर पर आक्रमण कर दिया। शेर खाँ भाग खड़ा हुआ और उसने जुनैद बर्लस के यहाँ नौकरी कर ली जो उन दिनों बाबर के पूर्वी प्रान्तों का गवर्नर था।

अपने नये स्वामी की सहायता से शेर खाँ सूरी ने मुहम्मद खाँ को मार भगाया और एक बार फिर अपनी जागीर का स्वामी बन गया। जुनैद बर्लस शेर खाँ से इतना प्रसन्न हो गया कि वह शेर खाँ को अपने भाई निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा के पास आगरा ले गया जो बाबर का प्रधानमन्त्री था। खलीफा ने शेर खाँ को मुगल सेना में रख लिया। इस प्रकार शेर खाँ सूरी बाबर के प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा का नौकर हो गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शेर खाँ सूरी ने हुमायूँ को जमकर मूर्ख बनाया (50)

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शेर खाँ सूरी ने हुमायूँ को जमकर मूर्ख बनाया

शेर खाँ सूरी पन्द्रह महीने तक बाबर के प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा की सेवा में रहा। इस दौरान शेर खाँ सूरी ने मुगलों के सैनिक संगठन, उनकी रणपद्धति तथा उनकी शासन व्यवस्था का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया।

कुछ समय बाद शेर खाँ सूरी फिर से अपनी जागीर सहसराम में चला आया परन्तु इस बार भी वह अधिक दिनों तक सहसराम में नहीं रह सका। उन्हीं दिनों बिहार के शासक बहादुर खाँ नूहानी की मृत्यु हो गयी और उसके स्थान पर उसका अल्पवयस्क बालक जलाल खाँ बिहार का सुल्तान बना। जलाल खाँ की माँ दूदू उसकी संरक्षिका बन गई।

शेर खाँ सूरी, जलाल खाँ का शिक्षक रह चुका था, इसलिए दूदू ने शेर खाँ सूरी को बुला भेजा और इस बार उसे सुल्तान का नायब बना दिया। इस पद पर रहते हुए शेर खाँ को अपने राजनीतिक भविष्य को नई ऊंचाइयाँ देने के अवसर सहज ही प्राप्त हो गए।

शेर खाँ सूरी ने बहुत यत्न से अल्पवयस्क सुल्तान जलाल खाँ तथा उसकी माता दूदू की सेवा की तथा हर तरह से उनका विश्वास जीत लिया। इस कारण बिहार में शेर खाँ की शक्ति तथा प्रभाव बढ़ते ही चले गए। कुछ ही समय में शेर खाँ बिहार सल्तनत का सर्वेसर्वा बन गया। इससे नूहानी अफगानों में बड़ी ईर्ष्या पैदा हो गई और वे शेर खाँ के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे।

कुछ असन्तुष्ट नूहानी अफगान बिहार से भागकर बंगाल पहुँचे और वहाँ के शासक नसरतशाह को बिहार पर आक्रमण करने के लिये उकसाने लगे ताकि नूहानी अफगान अपनी खोई हुई शक्ति फिर से प्राप्त कर सकें। नसरतशाह ने नूहानी अफगानों का साथ मिल जाने से उत्साहित होकर बिहार पर आक्रमण कर दिया परन्तु शेर खाँ ने बंगाल की सेना को परास्त करके मार भगाया। इस घटना के बाद बिहार में नूहानी सरदारों का प्रभाव समाप्त हो गया तथा शेर खाँ का कद और अधिक मजबूत हो गया।

ई.1530 में आगरा में बादशाह बाबर की मृत्यु हो गई और हुमायूँ मुगलों का बादशाह हुआ। ई.1531 में जब हुमायूँ कालिंजर दुर्ग का घेरा डाले हुए था तब शेर खाँ ने चुनार दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

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चुनार दुर्ग अत्यंत सुदृढ़ होने के कारण अभेद्य समझा जाता था। विशेष भौगोलिक परिस्थिति होने के कारण यह दुर्ग पूर्व का फाटक कहलाता था किंतु शेर खाँ को इस दुर्ग पर अधिकार अपने भाग्य की प्रबलता के कारण बिना किसी युद्ध के ही मिल गया था। यह दुर्ग दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के समय से अफगान अमीर ताज खाँ के अधिकार में था जो अपनी पत्नी लाड मलिका के वशीभूत था। इस कारण ताज खाँ की अन्य औरतों के पुत्र अपने पिता ताज खाँ से नाराज रहते थे। एक रात ताज खाँ के बड़े पुत्र ने जो कि एक अन्य मलिका से था, लाड मलिका पर आक्रमण करके उसे घायल कर दिया। ताज खाँ के इस बागी पुत्र ने अपने पिता ताज खाँ की भी हत्या कर दी और चुनार से भाग खड़ा हुआ। शेर खाँ ने इस अवसर से लाभ उठाया और उसने लाड मलिका को अपनी बातों में लेकर चुनार दुर्ग में प्रवेश कर कर लिया तथा लाड मलिका से विवाह कर लिया। शेर खाँ को चुनार दुर्ग में बड़ी सम्पत्ति मिली। इससे शेर खाँ की शक्ति में बड़ी वृद्धि हो गई। इस सम्पत्ति के बल पर शेर खाँ तेजी से सैनिकों की भर्ती करने लगा।

जब हुमायूँ को शेर खाँ सूरी की इस गतिविधि की जानकारी हुई तो हुमायूँ ने चुनार के दुर्ग पर अधिकार करने के लिए हिन्दू बेग नामक सेनापति को चुनार भेजा। हिन्दू बेग ने शेर खाँ से कहा कि वह यह दुर्ग मुगलों को सौंप दे किंतु शेर खाँ ने हिन्दू बेग को चुनार का दुर्ग देने से मना कर दिया। इस पर हुमायूँ स्वयं भी सेना लेकर चुनार पहुँच गया।

हुमायूँ की सेना चार महीने तक चुनार दुर्ग पर घेरा डाले रही किंतु दुर्ग पर अधिकार नहीं कर सकी। अंत में दोनों पक्ष समझौता करने को तैयार हो गये। शेर खाँ ने हुमायूँ से प्रार्थना की कि वह चुनार का दुर्ग शेर खाँ के अधिकार में छोड़ दे। इसके बदले में शेर खाँ सूरी ने अपने तीसरे पुत्र कुत्ब खाँ को एक सेना के साथ हुमायूँ की सेवा में भेजना स्वीकार कर लिया। हुमायूँ ने शेर खाँ की प्रार्थना स्वीकार कर ली और आगरा लौट गया। इस समझौते से हूमायू की प्रतिष्ठा को धक्का लगा तथा शेर खाँ को अपनी योजनाएँ पूर्ण करने का अवसर मिल गया। चुनार का दुर्ग हाथ आ जाने से उसकी शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि हो गई।

ई.1532 में बंगाल के शासक नसरत शाह की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र महमूद खाँ बंगाल का सुल्तान हुआ। ई.1534 में महमूद खाँ ने बिहार पर आक्रमण किया परन्तु शेर खाँ ने उसे सूरजगढ़ के युद्ध में बुरी तरह परास्त किया। सूरजगढ़ का युद्ध मध्यकालीन इतिहास के निर्णयात्मक युद्धों में से एक है।

इस युद्ध में शेर खाँ सूरी को विपुल युद्ध सामग्री भी प्राप्त हुई तथा उसने बंगाल के सुल्तान के साथ-साथ बिहार के नूहानी अफगानों की बची-खुची शक्ति को भी कुचल दिया। कुछ समय बाद शेर खाँ ने बिहार के सुल्तान जलाल खाँ को हटा दिया तथा स्वयं बिहार का स्वतन्त्र शासक बन गया।

शेर खाँ से समझौता करने के बाद हुमायूँ, गुजरात के शासक बहादुरशाह पर अभियान करने के लिए ग्वालियर की ओर चला गया। हुमायूँ ने ग्वालियर, उज्जैन, माण्डू, मंदसौर, चाम्पानेर तथा खम्भात आदि में इतना अधिक समय गंवा दिया कि शेर खाँ को अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए पर्याप्त समय मिल गया। उसने बिहार में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली और वह पूर्व के समस्त अफगानों का नेता बन गया।

शेर खाँ ने अफगान अमीरों को आश्वासन दिया कि यदि वे शेर खाँ के झण्डे के नीचे संगठित होकर मुगलों का सामना करें तो मुगलों को भारत से बाहर निकाला जा सकता है तथा अफगानों को अपने पुराने प्रांत तथा जागीरें फिर से प्राप्त हो सकते हैं। इस समय तक लोदी पूरी तरह नेपथ्य में जा चुके थे। इसलिए समस्त अफगान अमीर शेर खाँ के झंडे के नीचे एकत्रित होने लगे। शेर खाँ ने गुजरात के शासक बहादुरशाह के साथ भी सम्पर्क स्थापित किया जिसने शेर खाँ को विपुल धन प्रदान किया ताकि शेर खाँ एक बड़ी सेना तैयार कर सके।

शेर खाँ ने एक सुनिश्चित आर्थिक नीति का अनुसरण करके बहुत सा धन इकट्ठा किया तथा उसकी सहायता से एक विशाल सेना तैयार की। यद्यपि शेर खाँ ने अपने पुत्र कुत्ब खाँ को एक सेना के साथ हुमायूँ की सेवा में भेजने का वचन दिया था परन्तु उसने इस वचन को पूरा नहीं किया और अपनी सेना बढ़ाने में लगा रहा। वास्तविकता यह थी कि शेर खाँ सूरी हुमायूँ को अपनी कूटनीतिक चालों में फंसाकर मूर्ख बना रहा था। उसके मन में कपट भरा हुआ था। वह शीघ्र ही हुमायूँ के समूचे राज्य को हड़प जाने वाला था!                              

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ की भूल (51)

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हुमायूँ की भूल

सरल स्वभाव का हुमायूँ लोगों के कथन पर सहज ही विश्वास कर लेता था, यहाँ तक कि अपने शत्रुओं की बातों पर भी विश्वास कर लेता था। राजनीति में सहज विश्वास कर लेने की आदत हुमायूँ की भूल सिद्ध हुई।

 शेर खाँ ने चुनार के दुर्ग पर सहज ही अधिकार कर लिया और हुमायूँ उससे यह दुर्ग खाली नहीं करवा सका। जब हुमायूँ गुजरात के शासक बहादुरशाह पर अभियान करने चला गया तो शेर खाँ ने गंगा के किनारे-किनारे अपनी शक्ति का विस्तार करना आरम्भ किया और चुनार से लेकर बंगाल की सीमा तक का क्षेत्र अपने अधिकार में कर लिया।

मार्च 1537 में शेर खाँ की सेना ने गौड़ का दुर्ग घेर लिया। बंगाल के शासक महमूदशाह ने शेर खाँ से संधि कर ली और उसे तेरह लाख दीनार देकर अपना पीछा छुड़ाया परन्तु शेर खाँ ने इसका यह अर्थ निकाला कि महमूदशाह ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली है और वह उसे वार्षिक कर दिया करेगा।

जब हुमायूँ शेर खाँ की गतिविधियों के समाचार सुनकर गुजरात से आगरा लौटा तो उसने हिन्दू बेग को जौनपुर का गवर्नर बना कर भेजा तथा शेर खाँ पर दृष्टि रखने के आदेश दिए। हिन्दू बेग एक बड़ी सेना लेकर जौनपुर पहुंचा। उसने हुमायूँ का विशेष दूत शेर खाँ के पास भेजा तथा उससे कहलवाया कि उसने हाल ही में जिन इलाकों पर अधिकार किया है, वे इलाके मुगल बादशाह हुमायूँ को समर्पित कर दे।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि जिस समय हुमायूँ का दूत शेर खाँ के पास पहुंचा, उस समय शेर खाँ सिपाहियों की तरह हाथ में फावड़ा लेकर खाई खोद रहा था। शेर खाँ ने हाथ में फावड़ा पकड़े हुए ही हुमायूँ के दूत से बात की। संभवतः ऐसा करके शेर खाँ हुमायूँ को यह जताना चाहता था कि शेर खाँ बहुत ही सामान्य आदमी है और उसे बादशाहों तथा सुल्तानों की तरह तख्त और ताज की आवश्यकता नहीं है।

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शेर खाँ ने हुमायूँ के दूत से कहा कि मैंने हमेशा बादशाह हुमायूँ के प्रति निष्ठा और भक्ति निभाई है। मैंने न तो बादशाह के विरुद्ध कोई अपराध किया है और न उसकी राज्य की सीमाओं के भीतर अपने सैनिक भेजे हैं। मैंने लोहानियों से बिहार का राज्य प्राप्त किया था किंतु बंगाल के सुल्तान ने मेरा राज्य छीनने का प्रयास किया। तब मैंने बंगाल के सुल्तान से प्रार्थना की थी कि वह मुझे बिहार पर शांति से राज्य करने दे किंतु वह नहीं माना। इसलिए मैंने उसे दण्डित किया। केवल इतनी सी बात से नाराज होकर बादशाह हुमायूँ ने मुझे नुक्सान पहुंचाने के लिए बंगाल की ओर रुख किया है। यह बादशाह हुमायूँ की भूल है। वह मेरी विशाल अफगान सेना को शत्रु बनाकर आगरा में शांति से शासन नहीं कर सकेगा। शेर खाँ ने कहा कि बादशाह हुमायूँ का यह सोचना भी भूल है कि वह हमारी सेना को नष्ट कर देगा। बादशाह हुमायूँ ने हमारे साथ की गई पुरानी समस्त संधियों को तोड़ दिया है इसलिए अब मैं अपने अफगानों से यह करने में असमर्थ हूँ कि वे बादशाह के विरुद्ध विद्रोह न करें। मुगलों का यह ख्याल रहा है कि भारत में अफगानों की आपसी लड़ाई के कारण उन्हें भारत को विजय करने का अवसर मिला है किंतु अब वह स्थिति नहीं है।

आज अफगान फिर से एक हो चुके हैं और अब युद्ध-स्थल में ही इसका निर्णय होगा कि मुगलों ओर अफगानों में किसकी सेना अधिक मजबूत है!

शेर खाँ ने कूटनीति से काम लेते हुए एक ओर तो हुमायूँ के दूत को खूब खरी-खोटी सुनाई तथा उसे युद्ध की धमकी दी तथा दूसरी ओर दूत की बड़ी खातिर-तवज्जो की और उसके हाथों हुमायूँ के लिए बहुत सारे बहुमूल्य उपहार भिजवाए। इसके बाद शेर खाँ ने चुनार तथा बनारस को छोड़कर, पूर्व के समस्त जिलों से नियंत्रण हटा लिया। शेर खाँ ने हिन्दू बेग के समक्ष हुमायूँ के प्रति निष्ठा प्रकट की। हिन्दू बेग को संतोष हो गया और उसने हुमायूँ को संदेश भेजा कि पूर्व की स्थिति बिल्कुल चिन्ताजनक नहीं है। हुमायूँ भी निश्चिन्त हो गया।

इसके बाद कठिनाई से कुछ महीने ही बीते थे कि ई.1537 में हुमायूँ को सूचना मिली की शेर खाँ ने फिर से बंगाल पर आक्रमण कर दिया है क्योंकि बंगाल के सुल्तान महमूदशाह ने शेर खाँ को वार्षिक-कर नहीं भेजा था। शेर खाँ ने गौड़ पर अधिकार कर लिया। बंगाल के सुल्तान महमूदशाह ने भागकर हुमायूँ के यहाँ शरण ली।

शेर खाँ द्वारा बंगाल पर किए गए इस आक्रमण से हुमायूँ का सतर्क हो जाना स्वाभाविक ही था। इस समय तक शेर खाँ की सेना काफी विशाल हो चुकी थी तथा उसके साधनों में भी बड़ी वृद्धि हो चुकी थी। शेर खाँ ने चुनार से लेकर गौड़ तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अपनी धाक जमा ली थी। वह भारत में एक बार फिर से अफगान राज्य स्थापित करने का स्वप्न देख रहा था। इन कारणों से हुमायूँ, शेर खाँ के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए बाध्य हो गया।

जुलाई 1537 में वर्षा ऋतु आरम्भ हो जाने पर भी हुमायूँ ने आगरा से प्रस्थान किया। उसने कई महीने तक गंगाजी के किनारे पर स्थित कड़ा-मानिकपुर में पड़ाव डाले रखा तथा वहाँ से चलकर नवम्बर 1537 में चुनार से कुछ मील दूर अपना शिविर लगाया। हुमायूँ के अफगान-सरदारों ने हुमायूँ को परामर्श दिया कि वह सीधा गौड़ जाये और शेर खाँ की बंगाल-विजय की योजना को विफल कर दे।

दूसरी ओर मुगल सेनापतियों ने हुमायूँ को परामर्श दिया कि चुनार जैसे महत्त्वपूर्ण दुर्ग को, जो बंगाल के मार्ग में पड़ता था, शेर खाँ के हाथ में छोड़ना ठीक नहीं है। चुनार जीत लेने से हुमायूँ के साधनों में भी वृद्धि हो जायेगी, आगरा का मार्ग सुरक्षित बना रहेगा और चुनार को आधार बनाकर पूर्वी भारत के अफगानों से युद्ध किया जा सकेगा।

इस समय शेर खाँ की सेना ने गौड़ दुर्ग को घेर रखा था। हुमायूँ को शेर खाँ की शक्ति तथा बंगाल के शासक की कमजोरी का सही अनुमान नहीं था। इस कारण हुमायूँ को लगा कि बंगाल का शासक कुछ दिनों तक अपने राज्य की रक्षा कर सकेगा। इसलिये हुमायूँ ने मुगल सरदारों के परामर्श को स्वीकार करके चुनार दुर्ग पर आक्रमण कर दिया।

मुस्तफा रूमी खाँ ने हुमायूँ को आश्वासन दिया कि तोपखाने की सहायता से चुनार दुर्ग पर शीघ्र ही अधिकार स्थापित हो जाएगा परन्तु ऐसा नहीं हो सका। दुर्ग को जीतने में लगभग 6 माह लग गये। इस विलम्ब के परिणाम बड़े भयानक हुए।

कुछ विद्वानों की धारणा है कि इस भयंकर भूल के कारण ‘हुमायूँ को अपना साम्राज्य खो देना पड़ा।’ हुमायूँ ने इस अवसर पर एक और भूल की। उसने चुनार दुर्ग की सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंध नहीं किए। शेर खाँ को चुनार खो देने का बहुत दुःख हुआ क्योंकि यह दुर्ग उसकी शक्ति का आधार बन गया था।

शेर खाँ को हुमायूँ के विरुद्ध डटे रहने के लिये एक दुर्ग की आवश्यकता थी। इसलिये शेर खाँ ने रोहतास दुर्ग पर अधिकार करने की योजना बनाई।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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तिरुक्कुरल विश्व साहित्य का गौरव - bharatkaitihas.com

तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

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तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...