Home Blog Page 95

मुहम्मद बिन कासिम ने भारत का जेहाद से प्रथम परिचय करवाया (4)

0
मुहम्मद बिन कासिम - www.bharatkaitihas.com
मुहम्मद बिन कासिम ने भारत का जेहाद से प्रथम परिचय करवाया

मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim, 695–715 CE) भारत पर आक्रमण करने वाला पहला इस्लामिक आक्रांता था। उसने जेहाद और इस्लाम के नाम पर भारत पर आक्रमण किया तथा भारतवासियों का जेहाद (Jihad) से प्रथम परिचय करवाया!

खलीफाओं को भारत आने वाले अरबी व्यापारियों के माध्यम से भारत की अपार सम्पत्ति की जानकारी थी। उन्हें यह भी ज्ञात था कि भारत के लोग ‘बुत-परस्त’ अर्थात् मूर्ति-पूजक हैं। इसलिए खलीफाओं ने भारत की सम्पत्ति लूटने तथा मूर्ति-पूजकों के देश पर आक्रमण करके इस्लाम का प्रचार करने का निश्चय किया।

अरब वालों के भारत पर आक्रमण करने के चार प्रमुख लक्ष्य प्रतीत हेाते हैं। उनका पहला लक्ष्य भारत की अपार सम्पत्ति को लूटना था। उनका दूसरा लक्ष्य भारत के स्त्री-पुरुषों एवं बच्चों को पकड़कर उन्हें गुलाम बनाने एवं मध्यएशिया में ले जाकर बेचने का था। अरब वालों का तीसरा लक्ष्य भारत में इस्लाम का प्रचार करना तथा मूर्तियों और मन्दिरों को तोड़कर कुफ्र मिटाना था। उनका चौथा लक्ष्य भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करना था।

आठवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में अरब व्यापारियों के एक जहाज को सिन्ध के लुटेरों ने लूट लिया। इस पर ईरान के गवर्नर हज्जाज को, जो खलीफा (Khalifa) के प्रतिनिधि के रूप में ईरान पर शासन करता था, सिंध पर आक्रमण करने का बहाना मिल गया। उसने खलीफा अव वालिद (प्रथम) से आज्ञा लेकर अपने भतीजे मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) की अध्यक्षता में एक सेना सिन्ध पर आक्रमण करने के लिए भेजी। हज्जाज (Hazzaz) का यह भतीजा, हज्जाद का दामाद भी था।

इन दिनों सिंध में दाहिरसेन (Dahirsen) नामक हिन्दू राजा शासन कर रहा था। मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) ने ई.711 में विशाल सेना लेकर देबुल नगर (Debul Nagar) पर आक्रमण किया। इस नगर में हिन्दू धर्म को मानने वाले लोग रहते थे। ये लोग शांति के पुजारी थे तथा युद्ध कला से अपरिचित थे। कासिम की सेनाओं द्वारा किए गए आक्रमण से देबुलवासी अत्यन्त भयभीत हो गए और वे मुस्लिम सेना का किंचित् भी प्रतिरोध नहीं कर सके। इस कारण देबुल पर बड़ी आसानी से मुसलमानों का अधिकार हो गया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) ने देबुलवासियों को आज्ञा दी कि वे मुसलमान बन जाएं। चूंकि भारत में राजाओं द्वारा अपनी प्रजा को इस तरह के आदेश दिए जाने की परम्परा नहीं थी, इसलिए सिंध के शांतिप्रिय लोगों ने मुहम्मद बिन कासिम का यह आदेश मानने से मना कर दिया। इस पर मुहम्मद बिन कासिम ने अपनी सेनाओं को आदेश दिया कि वे उन देबुलवासियों की हत्या कर दें जो मुसलमान बनने से मना कर रहे हैं।

ईरानी गर्वनर हज्जाज के भतीेज और दामाद मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) के आदेश पर ईरानी सेनाओं ने देबुल नगर में रहने वाले सत्रह वर्ष से ऊपर की आयु के समस्त पुरुषों को तलवार के घाट उतार दिया। देबुल की स्त्रियों तथा बच्चों को गुलाम बना लिया गया, नगर को लूटा गया और लूट का सामान मुस्लिम सैनिकों में बाँट दिया गया।

To purchase this book, please click on photo.

देबुल पर अधिकार कर लेने के बाद मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) की विजयी सेना आगे बढ़ी। नीरून, सेहयान आदि नगरों पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के उपरान्त वह सिंध के शासक दाहिरसेन की राजधानी ब्राह्मणाबाद पहुँची। यहाँ पर राजा दाहिरसेन उसका सामना करने के लिए पहले से ही तैयार था। उसने बड़ी वीरता तथा साहस के साथ शत्रु का सामना किया परन्तु दाहिरसेन परास्त हो गया और उसने रणक्षेत्र में ही वीरगति प्राप्त की। उसकी रानी ने अन्य स्त्रियों के साथ चिता में बैठकर अपने सतीत्व की रक्षा की। ब्राह्मणाबाद पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद मुहम्मद बिन कासिम ने ‘मूलस्थान’ की ओर प्रस्थान किया जिसे अब ‘मुल्तान’ कहा जाता है। मूलस्थान के शासक ने बड़ी वीरता तथा साहस के साथ शत्रु का सामना किया परन्तु लम्बी घेराबंदी के कारण मूलस्थान के दुर्ग में जल का अभाव हो जाने के कारण मूलस्थान के शासक को आत्म-समर्पण करना पड़ा। यहाँ भी मुहम्मद बिन कासिम ने भारतीय सैनिकों की हत्या करवाई और उनकी स्त्रियों तथा बच्चों को गुलाम बना लिया।

मूलस्थान के जिन लोगों ने मुहम्मद बिन कासिम को जजिया देना स्वीकार कर लिया, उन्हें मुसलमान नहीं बनाया गया। यहाँ पर हिन्दुओं के मन्दिरों को भी नहीं तोड़ा गया परन्तु उनकी सम्पत्ति लूट ली गई। मूलस्थान पर विजय के बाद मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) को अत्यधिक धन की प्राप्ति हुई जिससे उसके मन में बेईमानी आ गई। उसने भारत से लूटा गया समस्त धन, स्त्रियाँ तथा गुलाम अपने पास रख लिए। इस कारण खलीफा अव वालिद (Caliph al-Walid), मुहम्मद बिन कासिम से अप्रसन्न हो गया। खलीफा (Khalifa) ने उसे सम्मानित करने के बहाने से बगदाद बुलवाया तथा उसकी हत्या करवा दी।

सिन्ध पर अधिकार कर लेने के उपरान्त अरबी आक्रमणकारियों को सिन्ध क्षेत्र के शासन की व्यवस्था करनी पड़ी। चूंकि मुसलमान विजेता थे, इसलिए कृषि करना उनकी शान के विरुद्ध था। फलतः कृषिकार्य हिन्दुओं के पास रहा। हिन्दू किसान, मुस्लिम विजेताओं को भूमि-कर देने लगे। यदि किसी क्षेत्र के किसान सिंचाई के लिए राजकीय नहरों का प्रयोग करते थे तो उन्हें अपनी उपज का 40 प्रतिशत और यदि राजकीय नहरों का प्रयोग नहीं करते थे तो उपज का 25 प्रतिशत भूराजस्व देना पड़ता था।

जिन हिन्दुओं ने इस्लाम को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, उन्हें भूमि-कर के साथ-साथ जजिया भी देना पड़ता था। इससे हिन्दुओं की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। हिन्दू प्रजा को अनेक प्रकार की असुविधाओं का सामना करना पड़ा। वे अच्छे वस्त्र नहीं पहन सकते थे। घोड़े की सवारी नहीं कर सकते थे। न्याय का कार्य काजियों के हाथों में चला गया जो कुरान के नियमों के अनुसार फैसले करते थे। इसलिए हिन्दुओं के साथ प्रायः अत्याचार होता था। अरब वाले बहुत दिनों तक सिन्ध में अपनी प्रभुता स्थापित नहीं रख सके और उनका शासन अस्थाई सिद्ध हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खलीफाओं की सेनाएं हिन्दू राजाओं ने नष्ट कर दीं (5)

0
खलीफाओं की सेनाएं - www.bharatkaitihas.com
खलीफाओं की सेनाएं हिन्दू राजाओं ने नष्ट कर दीं

इस्लाम के संस्थापक हजरत मुहम्मद के उत्तराधिकारी खलीफा (Khalifa) कहलाते थे। वे भारत में इस्लाम का राज्य (Rule of Islam) स्थापित करने के लिए आठवीं शताब्दी ईस्वी से सेनाएं भेजने लगे। खलीफाओं की सेनाएं (Armies of Khalifas) हिन्दू राजाओं ने नष्ट कर दीं!

बगदाद के खलीफा अव वालिद (Caliph al-Walid) ने सिंध क्षेत्र पर अधिकार करने वाले ईरानी सेनापति मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin Qasim) को बगदाद में बुलवाकर मरवाया क्योंकि खलीफा (Khalifa) के अनुसार जेहाद (Jihad) के दौरान लूटे गए धन, गुलामों एवं औरतों पर खलीफा का अधिकार था जबकि कासिम ने भारत से प्राप्त ये सब वस्तुएं स्वयं ही रख ली थीं। मुहम्मद बिन कासिम की हत्या हो जाने के कुछ समय बाद भारतीयों ने फिर से स्वयं को स्वतंत्र कर लिया। इस कारण सिंध पर ईरानी गवर्नर का अधिकार शीघ्र ही समाप्त हो गया।

आठवीं एवं नौवीं शताब्दी ईस्वी में हिन्दू राजा पूरी शक्ति से खलीफाओं की सेनाएं (Armies of Khalifas) नष्ट करते रहे और उन्हें भारत में अपनी जड़ें जमाने से रोकते रहे। फिर भी इस काल में सिंध एवं मुल्तान में मुसलमानों के कुछ छोटे राज्य स्थापित हो गए। इन मुस्लिम राज्यों की दृष्टि भारत के हिन्दू राज्यों पर गिद्ध की भांति पर गड़ी हुई रहती थी जो हर समय झपट्टा मारने के लिए तैयार रहते थे।

ई.739 का चौलुक्य राजा पुलकेशी का दानपत्र कहता है कि अरब के खलीफा हशाम (Khalifa Hisham, ई.724-43) के भारतीय प्रदेशों के शासक जुनैद (Junaid) की सेना ने मारवाड़, भीनमाल, अजमेर तथा गुजरात आदि पर चढ़ाई की। इस युद्ध का क्या परिणाम हुआ, उसका कोई उल्लेख इस दानपत्र में नहीं है किंतु यह दानपत्र एक महत्त्वपूर्ण सूचना देता है कि ई.739 में कुछ भारतीय क्षेत्र खलीफा (Khalifa) द्वारा नियुक्त गवर्नरों के अधीन थे किंतु यह स्थिति थोड़े ही समय रही होगी तथा उनके अधीन क्षेत्र सिंध प्रदेश (Sindh Reason) में रहे होंगे।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

आठवीं शताब्दी ईस्वी में अजमेर का चौहान राजा दुर्लभराज (प्रथम) अथवा दूलाराय प्रतिहारों का सेनापति था। उसके समय में खलीफाओं की सेनाएं अजमेर आईं और अजमेर पर मुसलमानों का पहला आक्रमण हुआ। खलीफा वली अब्दुल मलिक की सेना व्यापारियों के वेष में सिंध के मार्ग से अजमेर तक चढ़ आई। यह आक्रमण अत्यंत भयानक था। इस युद्ध में प्रमुख चौहानों ने दुर्लभराज का साथ नहीं दिया। इस कारण दुर्लभराज के परिवार के प्रत्येक पुरुष ने हाथ में तलवार लेकर शत्रु का सामना किया तथा चौहान रानियों एवं राजकुमारियों ने जौहर का आयोजन किया। राजा दुर्लभराज का युद्ध-क्षेत्र में ही वध कर दिया गया।

To read this book, please click on photo.

इस युद्ध में राजा दुर्लभराज (Durlabh Raj Chouhan) का सात वर्षीय पुत्र लोत एक तीर लगने से मर गया। वह शस्त्र लेकर युद्धभूमि में लड़ रहा था। तारागढ़ पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। दूल्हराय का छोटा भाई माणक राय (Manik Rai) सांभर भाग गया। जिस दिन राजकुमार लोत मारा गया, उस दिन को पवित्र दिन माना गया तथा राजकुमार लोत की प्रतिमा देवताओं की तरह पूजी गई। कर्नल टॉड ने लिखा है कि सिन्ध से किसी शत्रु ने अजमेर पर आक्रमण करके राजा माणिकपाल (राय) का वध किया। कुछ समय बाद हर्षराय चौहान ने नासिरुद्दीन से अजमेर छीन लिया। इस प्रकार अजमेर कुछ समय तक मुसलमानों के अधिकार में रहा। उस समय दुर्लभराज का भाई माणिकपाल जिसने कि संभवतः दुर्लभराज का साथ नहीं दिया था, अजमेर के पतन के बाद सांभर में जाकर रहा। इस युद्ध के बाद के किसी काल में दुर्लभराज (प्रथम) के पुत्र गूवक (प्रथम) ने अजमेर के तारागढ़ दुर्ग पर आक्रमण करके उसे अपने अधिकार में किया। कर्नल टॉड ने मुलसमानों से अजमेर लेने वाले राजा का नाम हर्षराय लिखा है। गूवक ने अनंत क्षेत्र में हर्ष का मंदिर बनवाया था। अतः उसे हर्षराय कहा जाता था।

नौवीं शताब्दी ईस्वी में जिस समय बगदाद के खलीफा अलमामूं (Khalifa al-Ma’mun) ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की, उस समय चित्तौड़ पर खुंमाण (द्वितीय) (Khuman Second) नामक राजा का शासन था। अब्बासिया खानदान का अलमामूं (Khalifa al-Ma’mun) ई.813 से 833 तक बगदाद का खलीफा रहा। खुमांण (द्वितीय) ई.812 से 836 के बीच चित्तौड़ का शासक रहा। खुंमाण रासो के अनुसार खुंमाण की सहायता के लिए काश्मीर से सेतुबंध तक के अनेक राजा चित्तौड़ आए।

आठवीं से दसवीं शताब्दी तक भारत भूमि पर प्रतिहारों की तुलना में कोई अन्य प्रतापी हिन्दू वंश नहीं रहा। इस राजवंश ने राजस्थान से लेकर बंगाल तक शासन किया। सिंध क्षेत्र के निकट होने के कारण जालोर के प्रतिहारों को खलीफाओं की सेनाएं कई बार घेर कर मारनी पड़ीं और अरब-आक्रांताओं से कई युद्ध लड़ने पड़े।

ई.851 में सुलेमान नामक एक अरब यात्री (Arab traveller Suleman) ने प्रतिहार शासक मिहिर भोज (Pratihar Mihir Bhoj) की बड़ी प्रशंसा की है। वह लिखता है-‘जुज्र (गुर्जर) नरेश भोज के पास एक विशाल अश्वसेना थी। ऐसी विशाल सेना भारत के किसी अन्य नरेश के पास नहीं थी। वह इस्लाम का शत्रु था। उसके राज्य में सोने-चांदी की बहुत सी खानें थीं तथा उसका राज्य चोरी-डकैती के भय से मुक्त था।’

प्रतिहारों द्वारा दी गई सेवाओं को भारतीय इतिहास कभी भुला नहीं सकता। जब खलीफओं की सेनाएं (Armies of Khalifas) दक्षिणी यूरोप से लेकर उत्तरी अमरीका तथा दक्षिण एशिया को रौंद रहीं थीं तथा तथा दक्षिणी यूरोप एवं उत्तरी अमरीका कुछ ही वर्षों में अपनी स्वतंत्रता खो बैठे थे, तब प्रतिहारों ने अरबों को भारत भूमि से लगभग बाहर ही रखा। त्रस्त जनता का उद्धार करने तथा शत्रु से समाज की रक्षा करने के कारण ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट प्रथम (Nagbhatt First) को नारायण कहा गया है।

ई.950 में सिंहराज (Singhraj Chouhan) नामक महान् चौहान राजा अजमेर का स्वामी हुआ। वह लगातार मुसलमानों से लड़ता रहा। उसने मुसलमानों के सेनापति हातिम (Hatim) का वध किया तथा उसके हाथियों को पकड़ लिया। एक अन्य अवसर पर सिंहराज ने उस विशाल मुस्लिम सेना को खदेड़ दिया जो सुल्तान हाजीउद्दीन के नेतृत्व में अजमेर से 25 किलोमीटर दूर जेठाना तक आ पहुँची थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुर्की गुलाम (Turkish slave) इस्लाम को भारत ले आए (6)

0
तुर्की गुलाम - www.bharatkaitihas.com
तुर्की गुलाम इस्लाम को भारत ले आए

इस्लाम का जन्म (Birth of Islam) अरब में हुआ था। अरब के मुसलमानों ने इस्लाम को पूरी दुनिया में फैलाने का बीड़ा उठाया किंतु वे जल्दी ही थक गए। इस पर तुर्की गुलाम (Turkish slave) इस्लाम को भारत ले आए!

आठवीं सदी के आरम्भ में अरबों ने थल मार्ग से आकर सिन्ध प्रदेश (Sindh Region) को जीता था। लगभग दो सौ साल तक अरब के लोग इस्लाम को दूर-दूर तक फैलाने में लगे रहे किंतु उसके बाद अरबों का धार्मिक उत्साह शिथिल पड़ने लगा। इस अवधि में वे काफी समृद्ध हो गए थे तथा युद्धभूमि में लड़ने-मरने की बजाय अपने महलों में रहना अधिक पसंद करने लगे थे।

इस कारण इस्लाम के प्रसार-कार्य (Extension of Islam) का नेतृत्व, पहले ईरानियों के पास और उसके बाद तुर्कों के पास चला गया। सिंध में अरबों के प्रथम आक्रमण के लगभग 285 वर्ष बाद उत्तर-पश्चिमी दिशा से भारत भूमि पर तुर्कों के आक्रमण आरंभ हुए। तुर्कों के भारत में प्रवेश का इतिहास जानने से पहले हमें तुर्कों के प्रारम्भिक इतिहास के बारे में कुछ जानना चाहिए।

तुर्कों के पूर्वज हूण (Hun) थे तथा वे चीन की पश्मिोत्तर सीमा से लेकर यूराल एवं अल्ताई पर्वतों के बीच के विस्तृत क्षेत्र में रहते थे। उस काल में तुर्कों का सांस्कृतिक स्तर अत्यंत निम्न श्रेणी का था। कृषि एवं शिल्प से अल्प-परिचित होने के कारण वे अंत्यत खूंखार और लड़ाकू थे। लूट-खसोट ही उनके जीवन यापन का मुख्य साधन था।

इस कारण युद्ध से उन्हें स्वाभाविक प्रेम था। जब यूराल पर्वत से लेकर अल्ताई पर्वत तक के क्षेत्र का जलवायु इंसानों के रहने योग्य नहीं रहा तो ये तुर्क उस क्षेत्र को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में जाने लगे। जब उन्होंने अपने पश्चिम में रहने वाले शकों के क्षेत्र में प्रवेश किया तो तुर्कों के रक्त में शकों के रक्त का भी मिश्रण हो गया।

कुछ तुर्की कबीले (Turkish Tribes) ईरान एवं अफगानिस्तान के उत्तर में जा बसे जहाँ अब तुर्कमेनिस्तान (Turkmenistan) नामक अगल देश बसा हुआ है। जब अरब वालों ने तुर्कों को इस्लाम के अंतर्गत लाना चाहा तो तुर्की लोग अरबों एवं इस्लाम दोनों के शत्रु हो गए। इस पर अरबों ने हजारों तुर्कों को पकड़ कर गुलाम बना लिया तथा उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।

जो तुर्की-गुलाम (Turkish slave) मुसलमान बन जाते थे तथा खलीफा के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन करते थे, उन्हें खलीफा एवं अरबी सेनापतियों का अंगरक्षक नियुक्त किया जाने लगा क्योंकि ये लोग शरीर से ताकतवर एवं स्वभाव से लड़ाका थे। धीरे-धीरे तुर्की अंगरक्षकों की हैसियत बढ़ने लगी। अरब एवं ईरान के मुसलमानों ने उन तुुर्की गुलामों को उन्नति करने के अच्छे अवसर उपलब्ध करवाए जिन्होंने अपने अरबी एवं ईरानी स्वामियों की निष्ठापूर्वक सेवा की तथा इस्लाम (Islam) को पूरी तरह अपना लिया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

प्रारम्भ में कुछ तुर्की गुलाम(Turkish slave), खलीफाओं एवं ईरानी जनरलों की छोटी सैनिक टुकड़ियों के मुखिया भी नियुक्त किये जाने लगे तथा उनके विवाह अरबी एवं ईरानी लड़कियों के साथ किए जाने लगे। इस प्रकार तुर्की लड़ाकों में अरब तथा ईरानियों के रक्त का भी मिश्रण हो गया। धीरे-धीरे तुर्की गुलाम (Turkish slave) खलीफा की सेना में उच्च पदों पर नियुक्त होने लगे। जब खलीफा निर्बल पड़ गए तो तुर्कों ने खलीफाओं से वास्तविक सत्ता छीन ली और खलीफा (Khalifa) नाम मात्र के शासक रह गए।

To read this book, please click on photo.

नौंवी शताब्दी ईस्वी के आते-आते इस्लाम के प्रचार के लिए, तुर्क कई शाखाओं में बँट गए। समानी वंश के तुर्कों ने ई.874 से 943 के बीच पूर्व में स्थित खुरासान, आक्सस नदी पार के देशों तथा अफगानिस्तान के विशाल भू-भागों पर अधिकार कर लिया। तुर्कों की एक शाखा ईरान को पार करके ईरान के पश्चिमोत्तर में स्थित एशिया माइनर में जा बसी जिसे एशिया कोचक, एशिया माइनर (Asia Minor or Anatolia) एवं तुर्की (Turkey) भी कहा जाता था। इन तुर्कों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य (Roman Empire) की राजधानी कुस्तुंतुनिया (Kustuntuniya) पर अधिकार कर लिया तथा उसका नाम बदलकर इस्ताम्बूल कर दिया। जब अरब के खलीफाओं की विलासिता के कारण इस्लाम के प्रसार का काम मंदा पड़ गया तब मध्यएशिया के तुर्क ही इस्लाम (Islam) को दुनिया भर में फैलाने के लिए आगे आए। उन्होंने 10वीं शताब्दी के आरम्भ में बगदाद एवं बुखारा में अपने स्वामियों अर्थात् खलीफाओं के तख्ते पलट दिए और ई.943 में अर्थात् दसवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में, मध्यएशिया के विशाल भूभागों के साथ-साथ दक्षिण एशिया में स्थित अफगानिस्तान में भी अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। तुर्की कबीलों में कुछ परम्पराएं बड़ी विचित्र थीं। तुर्की सरदार अपने दरबार तथा अपने निजी महलों में तुर्की गुलामों को नियुक्त करते थे।

इन गुलामों को अपनी प्रतिभा के अनुसार उन्नति करने के अवसर मिलते थे। यदि कोई तुर्की गुलाम (Turkish slave) अत्यधिक प्रतिभाशाली होता था तो तुर्की सरदार उसके साथ अपनी शहजादियों के विवाह भी कर देते थे। कई बार ऐसा भी होता था कि ये तुर्की गुलाम अन्य तुर्की शहजादों के बराबर ही उत्तराधिकार का हक रखते थे।

दसवीं शताब्दी ईस्वी में अफगानिस्तान में गजनी (Ghazni) नामक एक छोटा सा प्राचीन दुर्ग था जिसका निर्माण किसी समय भारत के यदुवंशी भाटियों के राजा गजसिंह ने किया था। इस दुर्ग में ई.943 में तुर्की गुलाम अलप्तगीन ने अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। अलप्तगीन अफगानिस्तान के समानी वंश के तुर्क शासक ‘अहमद’ का तुर्की गुलाम था। अलप्तगीन का वंश ‘गजनवी वंश’ कहलाया।

गजनी का राज्य स्थापित करने के बाद तुर्क, भारत की ओर आकर्षित हुए। ई.977 में अलप्तगीन (Alp Tegin) के तुर्की गुलाम (Turkish slave) एवं दामाद सुबुक्तगीन (Sabuktigin) ने भारत पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। उस समय भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर हिन्दूशाही वंश (Hindu Shahi Dynasty) का राजा जयपाल शासन कर रहा था। उसका राज्य पंजाब से लेकर हिन्दूकुश पर्वत तक विस्तृत था। गजनी के सुल्तान सुबुक्तगीन (Sabuktigin) ने एक विशाल सेना लेकर पंजाब प्रांत पर आक्रमण किया। राजा जयपाल को उससे संधि करनी पड़ी।

जयपाल ने सुबुक्तगीन (Sabuktigin) को 50 हाथी देने का वचन दिया किंतु बाद में जयपाल ने संधि की शर्तों का पालन नहीं किया। इस पर सुबुक्तगीन ने भारत पर दुबारा आक्रमण करके लमगान तक के प्रदेश को लूट लिया। सुबुक्तगीन का वंश गजनी वंश कहलाता था। ई.997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु हो गई।

इस प्रकार तुर्की गुलामों (Turkish slave) ने भारत में इस्लाम (Islam) के प्रवेश का रास्ता फिर से खोल दिया तथा जो काम अरबों ने अधूरा छोड़ दिया था, उसे तुर्कों ने आगे बढ़ाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खलीफा मुझे सुल्तान माने तो मैं हर साल भारत पर हमला करूंगा (7)

0
खलीफा मुझे सुल्तान माने - www.bharatkaitihas.com
खलीफा मुझे सुल्तान माने तो मैं हर साल भारत पर हमला करूंगा

महमूद गजनवी ने खलीफा (Khlifa) को लिखा कि यदि खलीफा मुझे सुल्तान माने तो जब तक मैं जीवित रहूंगा, तब तक हर साल भारत पर आक्रमण करके कुफ्र समाप्त करूंगा तथा इस्लाम का प्रसार (Extension of Islam) करूंगा। मुझे भारत से जो सम्पदा मिलेगी उसे मैं खलीफा के पास भिजवा दूंगा।

ई.997 में गजनी के तुर्की सरदार सुबुक्तगीन (Sabuktigin) की मृत्यु हो गई। यद्यपि महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni), सुबुक्तगीन का बड़ा पुत्र था तथा उसे युद्धों में सेनाओं का नेतृत्व करने का अच्छा अनुभव था किंतु सुबुक्तुगीन ने महमूद की बजाय, अपनी चहेती बेगम के पुत्र इस्माइली को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। महमूद बहुत महत्त्वाकांक्षी था। इसलिए उसने अपने पिता के मरते ही विद्रोह कर दिया तथा एक खूनी संघर्ष में अपने भाई इस्माईली को मारकर ई.998 अथवा ई.999 में गजनी पर अधिकार कर लिया। उस समय महमूद गजनवी की आयु 27 वर्ष थी।

महमूद का पिता सुबुक्तगीन (Sabuktigin) गजनी का स्वतंत्र शासक नहीं था, वह एक तुर्की सरदार अलप्तगीन का तुर्की गुलाम था। अलप्तगीन (Alptegin) ने अपनी खूबसूरत बेटी का विवाह सुबुक्तगीन से किया था जिसकी कोख से सुबुक्तगीन के छोटे बेटे इस्माइली का जन्म हुआ था। सुबुक्तगीन का स्वामी अलप्तगीन भी स्वतंत्र शासक नहीं था, वह अफगानिस्तान के समानी वंश के तुर्की शासक ‘अहमद’ का जेरखरीद तुर्की गुलाम था।

इस प्रकार सुबुक्तगीन (Sabuktigin) गुलामों का भी गुलाम था किंतु सुबुक्तगीन के पुत्र महमूद ने अफगानिस्तान के समानी शासक से बिल्कुल नाता तोड़कर गजनी में अपने स्वंतत्र राज्य की स्थापना की तथा खलीफा के पास अपने संदेशवाहक भिजवाकर उससे अनुरोध किया कि वह महमूद गजनवी को सुल्तान घोषित करे। महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने खलीफा को लिखा कि यदि खलीफा मुझे सुल्तान माने तो जब तक मैं जीवित रहूंगा, तब तक हर साल भारत पर आक्रमण करके कुफ्र समाप्त करूंगा तथा इस्लाम का प्रसार करूंगा। मुझे भारत से जो सम्पदा मिलेगी उसे मैं खलीफा के पास भिजवा दूंगा।

खलीफा को अपने तुर्की गुलाम महमूद की सारी बातें इतनी अच्छी लगीं कि उसने इस शर्त पर महमूद को सुल्तान की उपाधि दे दी कि खुतबे में खलीफा का नाम पढ़ा जाएगा। इस पर महमूद ने सुल्तान की पदवी धारण की। ऐसा करने वाला वह गजनी का पहला मुस्लिम शासक था। महमूद के दरबार में नियुक्त अरबी लेखक उत्बी के अनुसार महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने ऑटोमन शासकों की भांति ‘पृथ्वी पर ईश्वर की प्रतिच्छाया’ की उपाधि धारण की।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

मध्यएशिया के इतिहास में सामान्यतः महमूद का वंश ‘गजनवी वंश’ कहलाता है किंतु कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि बगदाद के खलीफा अल-कादिर-बिल्लाह ने महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) को सुल्तान के रूप में मान्यता दी एवं यामीन-उद्-दौला अर्थात् साम्राज्य का दाहिना हाथ और अमीन-उल-मिल्लत अर्थात् मुसलमानों का संरक्षक की उपाधियां भी प्रदान कीं। इस कारण महमूद गजनवी के वंश को यामीनी वंश भी कहते हैं।

जब खलीफा अल-कादिर-बिल्लाह ने महमूद को सुल्तान के रूप में मान्यता दे दी तो महमूद ने खलीफा को दिए गए वचन के अनुसार ई.1000-1027 तक भारत पर 17 आक्रमण किए। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘महमूद ने भारत पर इतने अधिक आक्रमण किए थे कि उनकी वास्तविक संख्या बताना कठिन है।’

गजनवी के दरबारी लेखक उतबी के अनुसार महमूद गजनवी के भारत-आक्रमण वस्तुतः जिहाद के अंतर्गत किए गए थे जो मूर्ति-पूजा के विनाश एवं इस्लाम के प्रसार के लिए किए जाते थे। आधुनिक काल के भारतीय इतिहासकारों डॉ. निजामी एवं डॉ. हबीब का मत है कि महमूद के भारत आक्रमण का उद्देश्य धार्मिक उन्माद नहीं था अपितु भारत के मंदिरों की अपार सम्पदा को लूटना था क्योंकि गजनवी ने मध्यएशिया के मुस्लिम शासकों पर भी आक्रमण किये थे।

To read this book, please click on photo.

कुछ वामपंथी भारतीय इतिहासकारों ने लिखा है कि महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) भारत के हिन्दू धर्म पर आक्रमण नहीं करना चाहता था अपितु वह तो पंजाब के शासक जयपाल तथा आनंदपाल को दबाना चाहता था क्योंकि वे गजनी राज्य की सीमाओं को खतरा उत्पन्न करते रहते थे। डॉ. ए. बी. पाण्डे के अनुसार गजनवी का लक्ष्य भारत से हाथी प्राप्त करना था जिनका उपयोग वह मध्यएशिया के शत्रु राज्यों के विरुद्ध करना चाहता था। दक्षिणपंथी इतिहासकारों के अनुसार महमूद के आक्रमण धार्मिक एवं आर्थिक उद्देश्यों से तो प्रेरित थे ही, साथ ही उसके आक्रमणों में राजनीतिक उद्देश्य भी निहित थे। वह अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। यही कारण था कि उसने अपने पिता के छोटे से गजनी राज्य को कुछ ही दिनों में विशाल साम्राज्य में बदल दिया। विभिन्न इतिहासकार भले ही कुछ भी तर्क दें किंतु सच्चाई यह है कि महमूद के भारत आक्रमणों तथा उसके परिणामों से स्पष्ट होता है कि उसके दो बड़े उद्देश्य थे, पहला यह कि वह भारत की अपार सम्पदा लूट ले और दूसरा यह कि वह भारत से मूर्ति-पूजा समाप्त करके इस्लाम का प्रसार करे। अपने समस्त 17 भारत-आक्रमणों में महमूद ने यही दो कार्य किए।

अपने 32 वर्ष के शासन काल में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने गजनी के छोटे से राज्य को विशाल साम्राज्य में बदल दिया। उसकी सल्तनत की पूर्वी सीमा भारत के पंजाब में थी जबकि पश्चिमी सीमा ईरान के रेगिस्तान में स्थित थी। यह सचमुच एक विशाल साम्राज्य था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार सुबुक्तगीन तथा उसके उत्तराधिकारी महमूद गजनवी ने गजनी के छोटे से राज्य को विशाल साम्राज्य में बदल दिया जिसकी सीमाएं बगदाद राज्य की सीमाओं से लेकर लाहौर तक तथा समरकंद (Samarkand) राज्य की सीमा से लेकर सिंध (Sindh) की सीमा तक पहुंच गईं।

यद्यपि महमूद ने अपने 17 भारत आक्रमणों में भारत से अपार सम्पदा लूटी किंतु उसने खलीफा को कोई धन नहीं भिजवाया। फिर भी महमूद ने राजनीतिक सूझबूझ से काम लेते हुए सिक्कों पर खलीफा का नाम खुदवाया तथा अपने राज्य की मस्जिदों में पढ़े जाने वाले खुतबे में खलीफा का नाम लिया जाना जारी रखा ताकि कोई अन्य अफगानी सरदार महमूद गजनवी की राजनीतिक हस्ती को चुनौती न दे सके।

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि महमूद (Mahmud of Ghazni) की आकृति राजाओं की सी नहीं थी। उसका कद बीच का और हृष्ट-पुष्ट था किंतु वह देखने में कुरूप था। शूरत्व में भी वह असाधारण कोटि का नहीं था फिर भी वह बुद्धिमान एवं चतुर था तथा आदमियों को पहचानने की क्षमता रखता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा जयपाल महमूद से अपमानित होकर चिता पर बैठ गया (8)

0
महाराजा जयपाल - www.bharatkaitihas.com
महाराजा जयपाल महाराजा जयपाल महमूद से अपमानित होकर चिता पर बैठ गया

पंजाब के विशाल भूभाग पर हिन्दूशाही राजवंश के महाराजा जयपाल (Maharaja Jayapala) का शासन था। महाराजा जयपाल का राज्य चिनाब नदी से लेकर हिन्दूकुश पर्वतमाला तक विस्तृत था। जब महमूद गजनवी ने महाराजा को युद्धक्षेत्र में पकड़ कर अपमानित किया तो महाराजा जयपाल जीवित ही चिता में बैठ गया।

ईस्वी 999 में महमूद गजनवी गजनी (Mahmud of Ghazni) का शासक बना। जैसे ही खलीफा ने उसे सुल्तान स्वीकार किया वैसे ही महमूद गजनवी ने भारत पर हमला बोल दिया। उसका पहला आक्रमण ई.1000 में भारत के सीमावर्ती क्षेत्र में हुआ जहाँ कुछ जनजातीय कबीले निवास किया करते थे। इस प्रकार ग्याहरवीं शताब्दी के आरम्भ होते ही महमूद गजनवी ने भारत का पश्चिमी दरवाजा खटखटा दिया।

भारतवासी वैदिक काल से ही राष्ट्र शब्द से परिचित थे। यजुर्वेद की एक ऋचा में ‘राष्ट्र मे देहि’ और अथर्ववेद की एक ऋचा में ‘त्वा राष्ट्र भृत्याय’ जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं।  अथर्ववेद की रचना के काल तक भारतीयों में आसेतु-हिमालय एक राष्ट्र के होने का भाव जागृत हो चुका था। भारत के लोग भारत को आर्यभूमि, आर्यावर्त, उत्तरापथ, दक्षिणापथ, जम्बूद्वीप, भारतखण्ड आदि कहते थे। देवी-देवताओं की पूजाओं में भी इन शब्दों का प्रयोग होता था। ईसा से लगभग सवा तीन सौ साल पहले आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य (Vishnugupta Chanakya) ने भारतवर्ष को एक राष्ट्र में बांधने की परम्परा आरम्भ कर दी थी।

मौर्य एवं गुप्त सम्राटों ने राष्ट्र के एकीकरण की दिशा में बहुत कार्य किया किंतु जब छठी शताब्दी ईस्वी में गुप्त साम्राजय Gupta Epire) बिखर गया तब देश में कोई केन्द्रीय शक्ति नहीं रही। तब विभिन्न कुलों के राजाओं ने अपने-अपने राज्यों को ही अपना राष्ट्र बनाकर उसकी आराधना करनी आरम्भ कर दी। प्रत्येक राजा ने अपने राज्य की सीमा को बढ़ाना ही क्षत्रिय का एकमात्र कर्त्तव्य एवं राष्ट्रबोध समझ लिया और वे परस्पर लड़ने लगे।

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) के आक्रमण आरम्भ होने के समय भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। प्रत्येक राज्य के राजा, मंत्री एवं नागरिक अपने राज्य को ही अपनी मातृभूमि तथा अपना राष्ट्र समझते थे। ज्यादातर मामलों में तो राजा ही राष्ट्र का पर्यायवाची था। राजा की रक्षा करना ही राष्ट्र की रक्षा करना समझा जाता था।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

भारतीय राज्यों के शासक परस्पर लड़कर अपनी शक्ति का हा्रस करते थे। इस कारण उनमें बाह्य आक्रमणों का सामना करने की शक्ति नहीं बची थी तथा भारत के लोगों में भारत को एक राष्ट्र मानकर राष्ट्रीय एकता स्थापित करने का विचार तक उपलब्ध नहीं था।

भारतीय राजा अपने जीवन के अधिकांश समय में परस्पर शत्रुता और अपने रनिवास की समस्याओं में डूबे हुए थे। इस कारण वे बाह्य शत्रुओं के प्रति पूरी तरह उदासीन थे तथा अपने घमण्ड के कारण किसी एक राजा का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। हर समय चलने वाले युद्धों में भारत के वीर युवक इतनी बड़ी संख्या में मौत के गाल में समा जाते थे कि क्षत्रिय युवक के लिए बारह वर्ष से अधिक जीना धिक्कारपूर्ण कार्य माना जाने लगा था। इस कारण भारत में अच्छे सैनिकों की कमी हो गई थी।

महमूद गजनवी के आक्रमणों (Attacks of Mahmud of Ghazni) के आरम्भ होने के समय उत्तरी भारत में मुलतान तथा सिंध प्रदेशों में दो छोटे स्वतंत्र मुस्लिम राज्य थे जो सुबुक्तगीन (Sabuktigin) के समय से चले आ रहे थे। पंजाब के विशाल भूभाग पर हिन्दूशाही वंश के महाराजा जयपाल हिन्दूशाही का शासन था। महाराजा जयपाल (Maharaja Jayapala) का राज्य चिनाब नदी से लेकर हिन्दूकुश पर्वतमाला तक विस्तृत था। उसके पड़ौस में काश्मीर का स्वतंत्र राज्य था। कन्नौज पर प्रतिहार शासक राज्यपाल का शासन था।

To Read this book, please click on photo.

बंगाल में पाल शासक महीपाल (Raja Mahipal) का शासन था। राजपूताना पर चौहानों का शासन था जिनकी राजनधानी अजमेर थी। गुजरात, मालवा, बुंदेलखण्ड तथा मध्यभारत में भी अनेक स्वतंत्र राज्य स्थित थे। दक्षिण में चालुक्य एवं चोल वंशों का शासन था। पाल, गुर्जर प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट राजाओं में विगत ढाई सौ वर्षों से त्रिकोणीय संघर्ष चल रहा था। जो एक दूसरे को नष्ट करके ही शांत होने वाले थे। इस राजनीतिक कमजोरी के उपरांत भी भारत की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी क्योंकि युद्धक्षेत्र में लड़ने का काम केवल राजपूत योद्धा करते थे। किसानों, शिल्पियों, व्यापारियों तथा कर्मकारों को इन युद्धों से कोई लेना-देना नहीं था। वे अपने काम में लगे रहते थे। देश में धार्मिक वातावरण था तथा प्रजा अपनी इच्छानुसार वैदिक, पौराणिक, शाक्त, शैव, बौद्ध एवं जैन आदि धर्मों में से अपनी-अपनी पसंद के मतों एवं सम्प्रदायों में विश्वास करती थी। हिन्दू राजाओं द्वारा प्रजा पर बहुत कम ‘कर’ लगाए गए थे जिसके कारण प्रजा की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। मंदिरों में इतना चढ़ावा आता था कि वे अपार धन-सम्पदा से भर गए थे। भारत की इस अतुल्य सम्पदा की ओर ललचा कर महमूद गजनवी जैसा कोई भी विदेशी आक्रांता भारत की ओर सरलता से मुँह कर सकता था।

ई.1000 में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने भारत के सीमावर्ती प्रदेश पर आक्रमण करके पर्वतीय प्रदेशों में रहने वाली आदिम जनजातियों के कबीलों को परास्त किया। उसने वहाँ के कुछ दुर्ग तथा नगर जीतकर उन पर अपने अधिकारी नियुक्त कर दिए। ई.1001 में महमूद गजनवी ने पंजाब के हिन्दूशाही शासक (Hindushahi Ruler) जयपाल (Maharaja Jayapala) पर आक्रमण किया। महमूद के दरबारी लेखकों ने जयपाल को ‘अल्लाह का शत्रु’ लिखा है। 27 नवम्बर 1001 को पेशावर के निकट घनघोर संग्राम हुआ। महमूद ने इस युद्ध में चुने हुए 15 हजार घुड़सवारों को उतारा। इस युद्ध में जयपाल ने जबर्दस्त वीरता का प्रदर्शन किया किंतु अंत में वह अपने पुत्र-पौत्रों एवं मंत्रियों सहित बंदी बना लिया गया।

उतबी (Al-Utbi)) ने लिखा है- ‘उन सबको जिनके चेहरों पर कुफ्र के निशान स्पष्ट दिखाई देते थे, उन्हें रस्सियों में बांधकर पापियों की तरह सुल्तान के सम्मुख प्रस्तुत किया गया। ऐसा लगता था जैसे उन्हें दोजख में भेजा जा रहा है। उनमें से कुछ के हाथ बलपूर्वक पीछे बांध दिए गए थे और कुछ की गर्दन पकड़कर घूंसों द्वारा धकेला गया था। महमूद के सैनिकों ने जयपाल की गर्दन से मणियों की माला उतार ली जिसकी कीमत दो लाख दिरहम थी। उसके साथियों के आभूषण भी छीन लिए गए। विजेताओं को लूट में इतना अधिक धन मिला कि उसका हिसाब लगाना कठिन था।’

राजा जयपाल (Maharaja Jayapala) ने महमूद को विपुल धन अर्पित करके तथा 50 हाथी देने का वचन देकर स्वयं को महमूद (Mahmud of Ghazni) की कैद से मुक्त करवाया। भारतीय राजा जब किसी दूसरे राजा को परास्त करते थे तो उसके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करते थे तथा प्रायः पराजित राजा से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करके उसका राज्य उसे लौटा देते थे किंतु राजा जयपाल को एक अपवित्र म्लेच्छ के हाथों अपमानित होना पड़ा, इसे वह सहन नहीं कर सका। आत्मग्लानि के कारण ई.1002 में राजा जयपाल (Maharaja Jayapala) जीवित ही चिता में बैठ गया। उसके बाद जयपाल का पुत्र आनंदपाल (Anandpal) पंजाब का शासक हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चन्द्रवंश की प्राचीनता – लेखकीय

0
चन्द्रवंश की प्राचीनता - लेखकीय - www.bharatkaitihas.com
चन्द्रवंश की प्राचीनता - लेखकीय

चन्द्रवंश की प्राचीनता नामक इस अध्याय में चंद्रवंशी राजाओं की कथाएँ शीर्षक से लिखी गई पुस्तक की प्रस्तावना लिखी गई है।

चन्द्रवंश की प्राचीनता इस बात से ही प्रकट हो जाती है कि भारत के प्राचीन क्षत्रियों एवं पश्चवर्ती राजपूत कुलों ने अपनी पहचान सूर्यवंशी एवं चंद्रवंशी राजाओं के रूप में स्थापित की। भारत के समस्त आर्य-राजकुल इन्हीं दो राजवंशों में से निकले थे। इनमें से सूर्यवंशी राजा अपनी उत्पत्ति महर्षि कश्यप के पुत्र सूर्य से मानते हैं। सूर्य के पुत्र वैवस्वत-मनु हुए एवं वैवस्वत-मनु के पुत्र इक्ष्वाकु हुए जो परम प्रतापी सूर्यवंश के प्रवर्तक थे।

चंद्रवंशी राजा अपनी उत्पत्ति महर्षि अत्रि के पुत्र ‘सोम‘ से मानते हैं जिनका दूसरा नाम ‘चंद्र’ है। चंद्र के पुत्र बुध हुए जिन्होंने इला नामक स्त्री से विवाह किया। इसी बुध और इला के पुत्र पुरूरवा हुए जिन्हें चंद्रवंश का प्रवर्तक माना जाता है।

मत्स्य पुराण के अनुसार वैवस्वत मनु के दस महाबली पुत्र उत्पन्न हुए जिनमें ‘इल’ ज्येष्ठ थे तथा ‘इक्ष्वाकु’ दूसरे नम्बर के थे। मत्स्य पुराण, महाभारत तथा वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा इल को भगवान शिव के श्राप के कारण अपने जीवन का कुछ हिस्सा स्त्री बनकर तथा कुछ हिस्सा पुरुष बनकर निकालना पड़ा था। इल ने स्त्री रूप पाकर राजा बुध से विवाह किया जिससे पुरूरवा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। यही पुरूरवा चंद्रवंश का प्रवर्तक हुआ।

श्री हरिवंश पुराण के अनुसार वैवस्वत-मनु की दस संतानों में से पहली संतान ‘इला’ नामक कन्या थी और उसके बाद ‘इक्ष्वाकु’ आदि नौ पुत्र उत्पन्न हुए। इला का विवाह चंद्रमा के पुत्र बुध से हुआ तथा इस दाम्पत्य से पुरूरवा का जन्म हुआ। पुरूरवा से चंद्रवंश चला। मित्रावरुण के वरदान से इला कुछ समय बाद ‘सुद्युम्न’ नामक पुरुष में बदल गई। राजा सुद्युम्नु के तीन पुत्र उत्कल, गय और विनताश्व हुए जिनसे अलग-अलग राजवंश चले।

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में आई एक कथा के अनुसार ‘इल’ प्रजापति कर्दम के पुत्र थे तथा बाल्हीक देश के राजा थे। उन्हें भगवान शिव के श्राप के कारण स्त्री बनना पड़ा एवं माता पार्वती द्वारा कृपा किए जाने पर आधा जीवन पुरुष के रूप में तथा आधा जीवन स्त्री के रूप में जीने का अवसर मिला। उन्होंने स्त्री रूप में बुध से विवाह करके पुरूरवा को जन्म दिया जिससे चंद्रवंश चला।

To purchase this book, please click on photo.

इस प्रकार सार रूप में कहा जा सकता है कि विभिन्न पुराणों, रामायण एवं महाभारत की कथाओं के अनुसार चंद्रवंश का पूर्वपुरुष चंद्रमा के पुत्र बुध तथा मनु की पुत्री इला से उत्पन्न पुरूरवा नामक राजा था। पुरूरवा को ऐल भी कहा जाता है। राजा इल की राजधानी प्रयाग थी जबकि पुरूरवा की राजधानी प्रतिष्ठान थी, जहाँ आज प्रयाग के निकट झूँसी बसी हुई है। राजा पुरूरवा के कई पुत्र हुए। पुरूरवा के वंश को पुरुवंश भी कहा जाता है। पुरूरवा का पुत्र आयु प्रतिष्ठान का शासक हुआ और अमावसु ने कान्यकुब्ज में एक नए राजवंश की स्थापना की। कान्यकुब्ज के राजाओं में जह्नु प्रसिद्ध हुए जिनके नाम पर गंगाजी का नाम जाह्नवी पड़ा। इस वंश के राजा धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत में फैल गए। इस कारण पुरूवंश में से आगे चलकर कई राजवंश निकले। पुरुरवा के पुत्र राजा अमावसु के वंश में महर्षि विश्वामित्र उत्पन्न हुए। वे कान्यकुब्ज के राजा गाधि के पुत्र थे। पौरववंश, कुरुवंश, यदुवंश तथा हैहयवंश भी इसी चंद्रवंश में से निकले थे। इस प्रकार युधिष्ठिर आदि पाण्डव, दुर्योधन आदि कौरव एवं भगवान श्रीकृष्ण आदि यादव भी मूलतः चंद्रवंशी क्षत्रिय थे।

यदुवंश आगे चलकर अंधक, वृष्णि, कुकुर और भोज नामक अलग-अलग राजवंशों में बंट गया। चंद्रवंशी राजाओं में नहुष, ययाति, उशीनर, शिवि आदि अनेक राजाओं को इतनी प्रसिद्धि मिली कि वे पौराणिक मिथकों एवं जनश्रुतियों के नायक बन गए।

पौरवों ने पांचाल में अपना राज्य स्थापित किया। पांचाल में पौरवों का राजा सुदास अत्यंत प्रसिद्ध हुआ। उसकी बढ़ती हुई शक्ति से आशंकित होकर पश्चिमोत्तर भारत के दस राजाओं ने एक संघ बनाया और परुष्णी (रावी) नदी के किनारे राजा सुदास से उनका युद्ध हुआ, जिसे ‘दाशराज्ञ’ युद्ध कहते हैं और जो ऋग्वेद की प्रमुख कथाओं में से एक है।

इस युद्ध में राजा सुदास की विजय हुई। पौरव वंश के राजा संवरण का पुत्र कुरु हुआ। उसके नाम से कुरुवंश प्रसिद्ध हुआ, उसके वंशज कौरव कहलाए। दिल्ली के पास इंद्रप्रस्थ और मेरठ के पास हस्तिनापुर उनके दो प्रसिद्ध नगर हुए। दुष्यंत एवं शकुंतला के पुत्र ‘भरत’ भी इसी राजवंश में हुए।

माना जाता है कि इन्हीं भरत के नाम से हमारा देश भारत कहलाया। हालांकि इस सम्बन्ध में अधिक महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि ऋग्वैदिक आर्यों के विभिन्न जनों में से एक जन का नाम भरत था, उनके वंशज भारत कहलाए तथा उन भारतों द्वारा शासित होने के कारण हमारे देश का नाम भारत हुआ।

महाभारत का विख्यात युद्ध चंद्रवंशी राजकुमारों के बीच में लड़ा गया था जिनमें से एक पक्ष को कौरव और दूसरे पक्ष को पांडव कहा जाता है। मान्यता है कि यह युद्ध आज से लगभग 5300 वर्ष पहले लड़ा गया तथा इस युद्ध में सम्पूर्ण भारतवर्ष के राजाओं ने भाग लिया। इस युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण के सहयोग से पांडवों को विजय श्री प्राप्त हुई।

मगध का राजा जरासंध भी चंद्रवंशी ही था। वह असत्य का पक्षधर, क्रूर एवं अत्याचारी राजा था। उसने भारत के कई राजाओं को पकड़कर जेल में डाल दिया तथा उनकी रानियों को अपने महल में रख लिया। इस कारण भगवान श्रीकृष्ण ने जरासंध को पाण्डवों की सहायता से मरवाकर राजाओं एवं उनकी रानियों को मुक्त करवाया। मान्यता है कि चंदेल राजपूत, इसी जरासंध के वंशज थे।

इस पुस्तक में भगवान अत्रि द्वारा तीन हजार वर्ष तक घनघोर तपस्या करके सोम नामक पुत्र को प्राप्त करने से लेकर महाराज परीक्षित तक के काल में हुए कुछ प्रसिद्ध चंद्रवंशी राजाओं की कथाएं लिखी गई हैं। चंद्रवंशी राजाओं की यह शृंखला सत्युग से लेकर त्रेता, द्वापर एवं कलियुग तक चलती है। जो चन्द्रवंश की प्राचीनता सिद्ध करते हैं।

ये समस्त राजा प्राकृतिक शक्तियों के स्वामी, विभिन्न देवताओं के अवतार, अप्सराओं के पुत्र एवं धरती के मनुष्यों का मिला-जुला रूप प्रतीत होते हैं। इस कारण इनके साथ चमत्कारी कथाएं जुड़ी हुई हैं।

इनमें से कुछ राजाओं की कथाएं तो विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं एवं खगोलीय पिण्डों की उत्पत्ति से सम्बन्धित प्रतीत होती हैं जिनका मानवीकरण करके उन्हें चंद्रवंशी राजाओं के साथ जोड़ दिया गया है। यही कारण है कि इन कथाओं के माध्यम से भारत के प्राचीन इतिहास के साथ-साथ प्राकृतिक एवं खगोलीय घटनाओं को भी समझा जा सकता है। 

इस ग्रंथ में आई कुछ कहानियों में अनेक राजाओं एवं ऋषि-मुनियों की आयु कई हजार वर्ष बताई गई है, इस कारण कुछ पाठकों के मन में संदेह उत्पन्न हो सकता है किंतु पाठकों को यह ध्यान में रखना होगा कि पुराणों में मान्यता है कि मनुष्य की आयु सतयुग में 1 लाख वर्ष, त्रेतायुग में 10 हजार वर्ष, द्वापर में 1 हजार वर्ष तथा कलियुग में 100 वर्ष बताई गई है।

इतनी लम्बी कालगणना के बारे में कोई वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो ज्ञात नहीं है किंतु इतना अवश्य है कि इन कालगणनाओं से चन्द्रवंश की प्राचीनता प्रकट होती है।

इस ग्रंथ में दी गई कहानियों को यूट्यूब चैनल  StoriesFromHinduDharma  पर वीडियो-ब्लॉग के रूप में भी उपलब्ध कराया गया है। इच्छुक पाठक इन्हें यूट्यूब पर भी देख सकते हैं तथा विदेशों में रहने वाले अपने मित्रों एवं सम्बन्धियों को उनके बारे में बता सकते हैं। आशा है भारत की युवा पीढ़ी इन कथाओं के माध्यम से भारत के प्राचीन गौरव से परिचित होगी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नगरकोट से चांदी का महल तोड़कर गजनी ले गया महमूद गजनवी (9)

0
नगरकोट - www.bharatkaitihas.com
नगरकोट से चांदी का महल तोड़कर गजनी ले गया महमूद गजनवी

नगरकोट की लूट (Nagarkot Ki Loot) दुनिया की सबसे बड़ी लूट मानी जाती है। महमूद गजनवी को जितना धन सोमनाथ के मंदिर से मिला था, अल्लाउद्दीन खिलजी को जितना धन देवगिरि से मिला था और अहमदशाह अब्दाली को जितना धन दिल्ली के लाल किले से मिला था, उन सब से कहीं अधिक धन महमूद गजनवी को नगरकोट से मिला था।

ई.1002 में पंजाब के हिन्दूशाही राजा जयपाल (Raja Jayapal) ने महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) से पराजित होने के बाद जीवित ही अग्नि में प्रवेश किया तथा उसका पुत्र आनंदपाल (Raja Anandpal) पंजाब का राजा बना। राजा जयपाल ने अपने पौत्र सुखपाल को मूलस्थान का प्रांतपति बना रखा था। जब राजा जयपाल अपने पुत्र-पौत्रों सहित युद्ध के मैदान में ही पकड़ लिया गया था तब मूलस्थान का शासक सुखपाल भी उनमें सम्मिलित था। महमूद उसे रस्सियों में बांधकर अपने साथ गजनी ले गया और उसे बलपूर्वक मुसलमान बना लिया। सुखपाल का नाम नौशाशाह रखा गया।

जब सुखपाल मुसलमान बन गया तब महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने उसे फिर से मूलस्थान का प्रांतपति नियुक्त कर दिया ताकि भारत में महमूद का शासन बना रह सके। नौशाशाह अर्थात् सुखपाल ने मूलस्थान लौटकर स्वयं को फिर से हिन्दू घोषित कर दिया तथा महमूद के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

महमूद ने इसे अपना अपमान समझा और वह एक बार फिर से अपनी तलवार निकालकर भारत पर झपट पड़ा। महमूद ने सुखपाल (Sukhpal) को फिर से युद्ध में बंदी बना लिया और उसे फिर से गजनी ले गया। इस दौरान महमूद ने झेलम के तट पर स्थित भेरा राज्य पर भी आक्रमण किया। भेरा के हिन्दू शासक (Hinu Ruler Of Bhera) बाजीराव ने सम्मुख युद्ध में पराजित होकर आत्मघात कर लिया। इस प्रकार मूलस्थान तथा भेरा पर महमूद का अधिकार हो गया।

इस बार महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने दाउद करमाथी नामक एक अफगान सरदार को मूलस्थान का प्रांतपति नियुक्त किया किंतु ई.1005 में दाउद ने भी बगावत कर दी तथा स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। इस पर महमूद ने मुल्तान पर पुनः आक्रमण किया। दाऊद ने महमूद का सामना किया किंतु दाउद बुरी तरह पराजित हो गया।

दाउद ने महमूद को अपार धन देकर अपनी जान बचाई। उसने महमूद को वार्षिक कर देना भी स्वीकार किया किंतु महमूद ने दाऊद को हटाकर, पंजाब के राजा आनंदपाल के पुत्र सेवकपाल को मूलस्थान का शासक नियुक्त किया जिसे अब मुल्तान कहा जाने लगा था।

सेवकपाल ने भी महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) को वार्षिक कर देना स्वीकार किया किंतु ई.1007 में सेवकपाल ने भी स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। अतः महमूद ने सेवकपाल को दण्डित करने के लिए पुनः मुल्तान पर आक्रमण किया। सेवकपाल परास्त होकर बंदी हुआ। उसने महमूद को 4 लाख दिरहम भेंट किए।

महमूद ने उसे मुल्तान से खदेड़ कर दाऊद को पुनः मुल्तान का शासक नियुक्त कर दिया। जब महमूद गजनवी ने पंजाब के हिन्दूशाही राजा आनंदपाल (Raja Anandpal) के पुत्र सेवकपाल से मुल्तान छीन लिया तो आनंदपाल मुल्तान के मुस्लिम प्रांतपति दाउद करमाथी पर हमले करने लगा। इस पर ई.1008 में महमूद ने राजा आनंदपाल पर आक्रमण किया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

राजा आनंदपाल (Raja Anandpal) ने अफगानिस्तान के दुर्दान्त तुर्कों से लोहा लेने के लिए उत्तर-भारत के राजपूत राजाओं का एक संघ बनाया। उसने उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, कालिंजर, दिल्ली तथा अजमेर के राजाओं की सहायता से एक विशाल सेना एकत्रित कर ली। राजा आनंदपाल की सहायता के लिए हिन्दू औरतों ने अपने आभूषण गलाकर बेच दिए तथा उससे प्राप्त धन इस संघ की सहायता के लिए भेजा।

मुल्तान के खोखरों ने भी आनंदपाल की सहायता की। झेलम नदी के किनारे उन्द नामक स्थान पर दोनों पक्षों में भयानक युद्ध हुआ। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि ई.1009 में पेशावर के पास वैहन्द के सामने के मैदान में दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ।

To read this book, please click on photo.

इस युद्ध में राजा आनंदपाल (Raja Anandpal) का पलड़ा भारी पड़ा किंतु अचानक आनंदपाल (Raja Anandpal) का हाथी बिगड़ गया जिससे हिन्दू सेना में खलबली मच गई। तभी महमूद ने तीव्र गति से आक्रमण किया जिससे युद्ध की दिशा बदल गई। भारतीय सेना क्षत-विक्षत होकर भाग खड़ी हुई। महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) की सेना ने दूर तक उसे खदेड़ा तथा कांगड़ा के पास स्थित नगरकोट के किले को घेर लिया। नगरकोट के शासक ने तीन दिन तक महमूद की सेना का सामना किया किंतु अंत में कांगड़ा दुर्ग का पतन हो गया। इस विजय के बाद महमूद ने तीन दिन तक नगरकोट के प्रसिद्ध मंदिर को लूटा और उजाड़ा। यह मंदिर कांगड़ा दुर्ग से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसे नगरकोट मंदिर तथा ब्रजेश्वरी देवी मंदिर कहते हैं। उत्तर भारत के लाखों लोग विगत हजारों साल से इस मंदिर की यात्रा करते हैं तथा प्रचुर चढ़ावा चढ़ाते हैं। इस कारण यह मंदिर सोने-चांदी, हीरे-मोती एवं अन्य बहुमूल्य सामग्री से भरा हुआ था। महमूद के दरबारी अरबी लेखक उतबी (Al Utbi) ने लिखा है कि नगरकोट की लूट(Nagarkot Ki Loot) में महमूद को इतना अधिक धन मिला कि महमूद को जितने भी ऊंट मिल सके, उन पर उस सोने को लाद दिया गया। केवल सिक्कों का मूल्य ही 70 हजार दिरहम था। 7 लाख दिरहम मूल्य के सोने-चांदी के आभूषण थे जिसका वजन 400 मन था।

इसके अतिरिक्त मोती और सुंदर वस्त्र भी अत्यधिक मात्रा में प्राप्त हुए। ऐसे सुंदर, कोमल एवं जड़ाऊ वस्त्र महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने अपने जीवन में कभी नहीं देखे थे। लूट में चांदी का बना हुआ एक सफेद घर भी मिला जिसकी बनावट धनी पुरुषों के घर जैसी थी और जो तीन गज लम्बा और 15 गज चौड़ा था। उसके विभिन्न भागों को अलग करके पुनः जोड़ा जा सकता था। एक रोमी कपड़े का शामियाना था जिसकी लम्बाई 40 गज और चौड़ाई 20 गज थी। वह ढले हुए दो सोने और दो चांदी के खम्भों पर सधा हुआ था। महमूद गजनी ने लूट का माल अपने ऊंटों, खच्चरों, घोड़ों एवं हाथियों पर लदवा लिया।

लेनपूल ने लिखा है- ‘नगरकोट की लूट (Nagarkot Ki Loot) में महमूद को इतना धन मिला कि सारी दुनिया भारत की अपार धनराशि को देखने के लिए चल पड़ी।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चक्रस्वामी की प्रतिमा महमूद गजनवी ने गजनी के चौक पर डाल दी (10)

0
चक्रस्वामी की प्रतिमा - www.bharatkaitihas.com
चक्रस्वामी की प्रतिमा महमूद गजनवी ने गजनी के चौक पर डाल दी

जेहाद (Jihad) की अवधारणा संसार को इस्लाम की छत्रछाया में लाने से जुड़ी है! प्रत्येक जेहादी चाहता है कि संसार के अन्य धार्मिक विश्वास इस्लाम के हाथों अपमानित हों। इसलिए महमूद गजनवी ने सरस्वती नदी के तट पर लगी चक्रस्वामी की प्रतिमा तोड़कर गजनी के चौक पर डाल दी!

पंजाब का हिन्दूशाही राजा (Hindushahi Raja) आनंदपाल (Raja Anandpal) नहीं चाहता था कि मूलस्थान (Multan) पर मुसलमानों का शासन हो इसलिए जब भी गजनी के मुसलमान मूलस्थान पर अधिकार करते थे, आनंदपाल मूलस्थान पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लेता था। इसलिए पेशावर (Peshwar) के निकट वैहन्द नामक स्थान पर महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) तथा राजा आनंदपाल के बीच भयानक युद्ध हुआ। पेशावर का प्राचीन नाम पुरुषपुर था। इसे कनिष्क ने बसाया था और इसमें अनेक बौद्ध स्मारकों का निर्माण करवाया था। तीसरी बौद्ध संगीति इसी पुरुषपुर में हुई थी।

मुस्लिम आक्रांताओं ने पुरुषपुर (Purushpur) के बौद्ध स्मारकों को नष्ट कर दिया तथा इसका नाम पेशावर (Peshawar) रख दिया। जब राजा आनंदपाल की सेनाएं पेशावर में पराजित होकर कांगड़ा घाटी (Kangra Ghati) की तरफ भागीं तो महमूद की सेनाओं ने उनका पीछा करके उन्हें नगरकोट (Nagarkot) के दुर्ग में घेर लिया। तीन दिन के युद्ध के बाद राजा आनंदपाल (Raja Anandpal) नमक की पहाड़ियों में चला गया। महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने नगरकोट का दुर्ग एवं नगरकोट में स्थित बज्रेश्वरी देवी (Vajreshwari Devi Temple) के मंदिर लूट लिए तथा वहाँ की अपार सम्पत्ति को ऊंटों, खच्चरों एवं हाथियों पर लदवाकर गजनी लौट गया।

वैहन्द तथा नगरकोट की पराजय के बाद भी राजा आनंदपाल हतोत्साहित नहीं हुआ। वह नमक की पहाड़ियों के छोर पर स्थित नंदन में अपनी राजधानी बनाकर रहने लगा। इसी वर्ष महमूद ने नारायणपुर नामक स्थान पर आक्रमण किया तथा वहाँ के मंदिरों को लूटकर तोड़ डाला।

ई.1013 में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) फिर लौट कर आया तथा उसने नंदन को घेर लिया। इस समय तक राजा आनंदपाल (Raja Anandpal) की मृत्यु हो चुकी थी तथा उसका पुत्र त्रिलोचनपाल (Raja Trilochanpal) नंदन पर शासन करता था। इस युद्ध में त्रिलोचनपाल के पुत्र भीमपाल (Bhimpal) ने अतुल शौर्य का प्रदर्शन किया किंतु नंदन पर महमूद का अधिकार हो गया तथा राजा त्रिलोचनपाल भाग कर काश्मीर चला गया।

महमूद ने नंदन में एक मुस्लिम गवर्नर नियुक्त कर दिया तथा स्वयं त्रिलोचनापाल (Raja Trilochanpal) के पीछे-पीछे काश्मीर जा पहुंचा। उन दिनों काश्मीर पर तुंग (Raja Tung) नामक एक शासक राज्य करता था। त्रिलोचनपाल तथा तुंग की सम्मिलित सेनाओं ने महमूद का सामना किया किंतु भारतीय सेना परास्त हो गई।

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) यहाँ से गजनी चला गया और राजा त्रिलोचनपाल (Raja Trilochanpal) काश्मीर से निकलकर फिर से पूर्वी पंजाब में आ गया ताकि अपने पूर्वजों के खोए हुए राज्य को फिर से स्वतंत्र करवा सके। कुछ प्रयासों के बाद राजा त्रिलोचनपाल ने शिवालिक की पहाड़ियों में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

ई.1014 में महमूद ने पुष्यभूति वंश के राजा हर्षवर्द्धन (Raja Harshvardhan) की पुरानी राजधानी थानेश्वर पर आक्रमण किया। सरस्वती नदी के तट पर भीषण संघर्ष के बाद थानेश्वर का पतन हुआ। इसके बाद महमूद की सेनाओं ने थानेश्वर (Thaneshwar) को लूटा और नष्ट किया। थानेश्वर की प्रसिद्ध चक्रस्वामी की प्रतिमा गजनी ले जाई गई जहाँ उसे मुसलमानों के पैरों तले रौंदे जाने के लिए सार्वजनिक चौक में डाल दिया गया। गजनी के मुसलमान जब चक्रस्वामी की प्रतिमा के पास से निकलते तो उस पर ठोकर मारते। जेहाद (Jihad) का असली स्वरूप यही था।

त्रिलोचनपाल (Raja Trilochanpal) ने बुंदेलखण्ड के चंदेल राजा विद्याधर (Raja Vidyadhar Chandel) को अपना मित्र बना लिया। इस काल में राजा विद्याधर उत्तर भारत के शक्तिशाली राजाओं में गिना जाता था। जब महमूद को त्रिलोचनपाल की गतिविधियों की जानकारी मिली तो महमूद फिर से लौट आया।

रामगंगा नदी के किनारे पर हुए युद्ध में महमूद ने त्रिलोचनपाल को एक बार पुनः पराजित कर दिया। त्रिलोचन को पहाड़ियों में भाग जाना पड़ा। अब वह नाममात्र का राजा रह गया था। उसके दो पूर्वजों ने महमूद (Mahmud of Ghazni) के विरुद्ध लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था जिनमें त्रिलोचनपाल का बाबा जयपाल तथा पिता आनंदपाल सम्मिलित थे।

To read this book, please click on photo.

भारत के दुर्भाग्य से राजा त्रिलोचनपाल (Raja Trilochanpal) के कुछ स्वार्थी सेनापति त्रिलोचनपाल के प्राण लेने पर उतारू हो गए। वे चाहते थे कि राजा त्रिलोचनपाल महमूद गजनवरी की अधीनता स्वीकार करके दोनों पक्षों में शांति स्थापित करे किंतु स्वाभिमानी त्रिलोचनपाल इसके लिए तैयार नहीं था। इसलिए ई.1021-22 में त्रिलोचनपाल के कुछ सेनापतियों ने राजा त्रिलोचनपाल को धोखे से विष दे दिया। हिन्दूशाही राजा चाहते थे कि भारत की हिन्दू शक्तियां मिलकर गजनी के मुसलमान आक्रांताओं को भारत से दूर रखें, इसके लिए उन्होंने बार-बार प्रयास भी किए किंतु दुर्भाग्य से बहुत कम हिन्दू राजाओं ने हिन्दूशाही राजाओं (Hindushahi Rulers) के मंतव्य को समझा और उन्होंने हिन्दूशाही राजाओं को बहुत ही सीमित सहयोग उपलब्ध कराया। यहाँ तक कि उसके अपने सेनापतियों ने राजा त्रिलोचनपाल (Raja Trilochanpal) को जहर दे दिया। हिन्दूशाही राज्य के नष्ट हो जाने के कारण हिन्दुकुश पर्वत की उपत्यकाओं के द्वार आक्रांताओं के लिए पूरी तरह खुल गए तथा भारत की पश्चिमी सीमा पूरी तरह असुरक्षित हो गई। अब अफगानिस्तान के मुस्लिम आक्रांता जब चाहें, निर्भय होकर भारत में प्रवेश कर सकते थे।

भारत की पश्चिमी सीमा की इस कमजोरी का नुक्सान एक न एक दिन सम्पूर्ण भारत को उठाना ही था। हुआ भी यही। अब महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) को खलीफा (Khalifa) के समक्ष दी गई उस शपथ को पूरा करना आसान हो गया जिसके अनुसार उसे प्रतिवर्ष भारत पर हमला करके कुफ्र को समाप्त करना था।

महमूद ने भटिण्डा (Bathinda) के किले पर आक्रमण किया जो उत्तर-पश्चिम से गंगा की घाटी के मार्ग में स्थित था। राजा विजयराज ने वीरता से किले की रक्षा की किंतु वह महमूद की शक्ति के सामने नहीं टिक सका। किले पर अधिकार करने के बाद महमूद ने भटिण्डा के लोगों से कहा कि वे इस्लाम स्वीकार कर लें किंतु बहुत से लोगों ने महमूद की बात स्वीकार नहीं की। इस पर महमूद (Mahmud of Ghazni) ने उन्हें मौत के घाट पर उतार दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोम

0

ब्रह्माजी ने सोम को ब्राह्मण, बीज, वनस्पति और जल का सम्राट बना दिया!

पुरुवंश को पूर्वकाल में चंद्र वंश एवं सोम वंश भी कहा जाता था। इस कथा में हम चंद्रमा की उत्पत्ति की चर्चा करेंगे जिसकी वंश परम्परा में आगे चलकर पुरुरवा नामक राजा हुआ और जिससे पुरुवंश की शृंखला चली।

श्रीहरिवंश पुराण आदि कई पुराणों में चंद्रमा की उत्पत्ति की कथा मिलती है। इस कथा के अनुसार भगवान श्रीहरि विष्णु के नाभि-सरोवर के कमल से प्रजापति ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। विष्णु पुराण में आई एक कथा के अनुसार ब्रह्माजी के मानसिक संकल्प से अत्रि ऋषि उत्पन्न हुए। अत्रि भी प्रजापति ब्रह्मा के कार्य को आगे बढ़ाने में संलग्न हुए।

अत्रि ने तीन हजार दिव्य वर्षों तक अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर काष्ठ, दीवार तथा पत्थर के समान निश्चल रहकर किसी भी प्राणी को कष्ट पहुंचाए बिना ही अनुत्तर नामक महान् तप किया। जिस तप से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ तप नहीं हो, उसे अनुत्तर तप कहते हैं। अत्रि ने एकटक देखते हुए ऊध्र्वरेता अर्थात् ब्रह्मचारी रहकर सोम की भावना से तप किया। इस कारण अत्रि का शरीर सोमरूप में परिणत हो गया। 

इस तपस्या के कारण मुनि के नेत्रों से वह सोमरूप तेज जलरूप में बह निकला और दसों दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ आकाश में चढ़ने लगा। तब प्रसन्नता में भरी हुई दस दिशारूपी देवियों ने सम्मिलित होकर उस तेज को अपने गर्भ में विधिपूर्वक धारण किया परन्तु वे उस तेज को धारण करने में समर्थ नहीं हा सकीं।

इस रोचक कथा का वीडियो देखें-

जब दिशाएं उस गर्भ का भार सहन नहीं कर सकीं तब औषधि आदि के द्वारा सब लोकों को पुष्ट करने वाला एवं शीतल किरणों से सुशोभित वह प्रकाशमान गर्भ समस्त लोकों को प्रकाशित करता हुआ दिग्देवियों के उदर से अचानक ही धरती पर गिर पड़ा।

प्रजापति ब्रह्मा ने संसार का हित करने की कामना से उस गर्भ को एक दिव्य रथ पर रख दिया। वह रथ वेदमय, धर्मस्वरूप तथा सत्य से नियंत्रित था। उसमें एक हजार सफेद घोड़े जुते हुए थे। अत्रि के पुत्र ‘सोम’ के गिरने पर ब्रह्माजी के सुप्रसिद्ध सात मानस पुत्र सोम की स्तुति करने लगे।

अंगिरा के वंश में उत्पन्न भृगु ऋषि और उनके पुत्र, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद की ऋचाओं से सोम की स्तुति करने लगे। इस स्तुति में कहा गया- ‘अंशुरंशुष्टे देव सोमाप्यायताम्’ अर्थात् हे चंद्रदेव! आपकी प्रत्येक किरण परिपुष्ट हो! इस स्तुति से सोम पुष्ट हुआ तथा उसका तेज तीनों लोकों को प्रकाशित करने लगा।

तब बह्माजी ने उस सोमयुक्त रथ में बैठकर समुद्र तक की पृथ्वी की इक्कीस बार प्रदक्षिणा की। उस समय रथ के वेग से उछलकर सोम का तेज पृथ्वी पर टपकने लगा। उस तेज से प्रकाशपूर्ण औषधियां उत्पन्न हुईं। उन औषधियों से भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक इन तीनों लोकों का और जरायुज, अण्डायुज, स्वेदज तथा उद्भिज नामक चारों प्रकार की प्रजाओं का पालन होता रहता है। इस प्रकार भगवान सोम सम्पूर्ण जगत् का पोषण करते हैं।

To purchase this book, please click on photo.

ब्रह्माजी के पुत्रों द्वारा की गई वैदिक स्तुतियों से परिपुष्ट हुए सोम ने एक हजार पद्म वर्षों तक तप किया। चांदी के समान शुक्ल वर्ण वाली जल की अधिष्ठात्री देवियां अपने स्वरूपभूत जल से जगत् का पालन करती हैं। चंद्रदेव उनकी निधि हुए। वे अपने कर्मों से विख्यात हैं। ब्रह्माजी ने चंद्रमा को बीज, औषधि, ब्राह्मण और जल का राजा बना दिया। इस प्रकार प्रकाशवान् अस्तित्वों में श्रेष्ठ चंदमा अपनी कांति से तीनों लोकों को प्रकाशित करने लगा। जब चंद्रमा का इन चारों राज्यों अर्थात् बीज, औषधि, ब्राह्मण और जल के सम्राट के रूप में अभिषेक हो गया तब सम्राट चंद्रमा अपनी कांति से तीनों लोकों को प्रकाशित करने लगे।

उस समय प्रचेताओं के पुत्र दक्ष ने अपनी महाव्रत धारिणी सत्ताइस कन्याएं चंद्रमा को ब्याह दीं। जिन्हें विद्वान पुरुष सत्ताइस नक्षत्रों के रूप में जानते हैं। इस बड़े भारी राज्य एवं वैभव को पाकर पितृदेवों में श्रेष्ठ सोम ने राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया जिसमें उन्होंने एक लाख गौएं दक्षिणा में दीं। सोम के उस यज्ञ में भगवान अत्रि होता बने। भगवान भृगु अध्वर्यु बने। हिरण्यगर्भ उद्गाता बने तथा वसिष्ठ ब्रह्मा बने। उस यज्ञ में सनत्कुमार आदि प्राचीन ऋषियों ने स्वयं भगवान नारायण श्री हरि विष्णु को सदस्य बनाया।

यज्ञ के सम्पन्न होने पर सोम ने तीनों लोक ब्रह्मर्षियों को दक्षिणा में प्रदान कर दिए। उस समय सिनीवाली, कुहू, द्युति, पुष्टि, प्रभा, वसु, कीर्ति, धृति और शोभा नामक नौ देवियां नित्यप्रति चंद्रमा की सेवा में लगी रहती थीं। इस प्रकार समस्त ऋषियों एवं देवताओं से सत्कार पाकर द्विजराज चंद्रमा ने अवभृथ स्नान किया तथा पुनः दसों दिशाओं को प्रकाशमान करने लगे।

स्कंदपुराण सहित कई पुराणों में चंद्रमा की उत्पत्ति समुद्र से बताई गई है, वस्तुतः वह घटना संसार को वैभव की पुनर्प्राप्ति का रूपक है जिसका उल्लेख हम कूर्मावतार की कथा में विस्तार से कर चुके हैं।

जब हम अत्रि की तपस्या द्वारा सोम की उत्पत्ति की कथा पर सृष्टि के निर्माण की दृष्टि से विचार करते हैं तो हमें कुछ बातें स्पष्ट होती हैं। वस्तुतः यह कथा इस भौतिक संसार को सूक्ष्म आधार अर्थात् जीवन प्रदान करने का रूपक है। आकाश, अग्नि, वायु, सोम, जल एवं वनस्पति आदि दिव्य पदार्थों से इस स्थूल सृष्टि को जीवन प्रदान किया गया। अत्रि के तप द्वारा सोम को प्रकट करने एवं सोम के चंद्रमा बनने की कथा वस्तुतः भौतिक सृष्टि में सोम अर्थात् जीवन के प्रवेश की कथा है। विभिन्न ग्रंथों में यह कथा कई रूपोें में मिलती है।

ब्रह्माजी ने सोम को ब्राह्मण, बीज, औषधि और जल का सम्राट बनाया। वस्तुतः यह भी एक रूपक है। यहाँ ब्राह्मण से तात्पर्य उस समस्त ज्ञान-विज्ञान, यज्ञ, तपस्या, वैराग्य, त्याग तथा लोककल्याण से है जिसके प्रभाव से सृष्टि को सूक्ष्म आधार प्राप्त होता है।

औषधि से तात्पर्य उन समस्त वनस्पतियों से है जो प्राणियों का पेट भरती हैं अर्थात् सृष्टि को स्थूल आधार प्राप्त होता है। बीज से तात्पर्य सृष्टि के उन तत्वों से है जिनसे नए पदार्थ उत्पन्न होते हैं तथा जल से तात्पर्य उस तत्व से है जो सृष्टि को सौंदर्य रूपी रस अर्थात् जीवन प्रदान करता है।

सारांश रूप में ब्रह्माजी द्वारा सोम को ब्राह्मण, बीज, औषधि और जल का सम्राट बनाए जाने का अर्थ यह है कि यदि किसी भी वस्तु या प्राणी में से सोम निकाल लिया जाए तो न उसका सूक्ष्म आधार बचेगा, न उसका स्थूल आधार बचेगा, न उसमें वृद्धि प्राप्त करने का गुण बचेगा और न उसका सौंदर्य रूपी रस अर्थात् जीवन बचेगा!

वेदों में भी सोम से सम्बन्धित कई कथाएं मिलती हैं जिनमें अधिक बल इस बात पर दिया गया है कि सोम देवताओं की वस्तु है किंतु उस पर दैत्य अधिकार करना चाहते हैं। उन कथाओं का उल्लेख हम वैदिक कथाओं की पुस्तक में अलग से करेंगे। विष्णु पुराण तथा हरिवंश पुराण सहित अनेक ग्रंथों में कहा गया है कि भारी वैभव की प्राप्ति से चंद्रमा की बुद्धि भ्रष्ट हो गई और वह अनीति करने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मथुरा की लूट (11)

0
मथुरा की लूट - www.bharatkaitihas.com
मथुरा की लूट

गजनी के आक्रांता ने मथुरा (Mathura) से सोने की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ लूट लीं! मथुरा की लूट (Mathura Ki Loot) से महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) को इतना धन मिला, जिसकी कोई मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता।

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ई.1000 से भारत पर हमले करके भारत की जनता को लूट रहा था। महमूद ने बगदाद के खलीफा को जो वचन दिया था, उसका महमूद ने निष्ठा-पूर्वक पालन किया। उसने भारत पर आक्रमणों की झड़ी लगा दी। विशाल पंजाब पर अधिकार करने के बाद वह गंगा-यमुना के दो-आब की तरफ बढ़ा।

ई.1018 में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने बुलंदशहर, मथुरा तथा कन्नौज पर आक्रमण किया। इन स्थानों पर भी उसने मंदिरों तथा नगरों को लूटा और भयंकर लूट मचायी। डॉ. ईश्वरी प्रसाद के अनुसार इस अभियान में उसे 30 लाख दिरहम मूल्य की सम्पत्ति, 55 हजार गुलाम तथा 350 हाथी प्राप्त हुए।

उस काल में मथुरा उत्तर-भारत का सर्वाधिक घना बसा हुआ नगर था। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि होने के कारण इस नगर में सैंकड़ों कलापूर्ण मंदिर स्थित थे जिनमें से कई मंदिर तो सैंकड़ों वर्ष पुराने थे। उनमें हजारों वर्ष पुरानी मूर्तियां रखी हुई थीं।

विगत हजारों साल से भारत भर के हिन्दू धर्मावलम्बी भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के दर्शनों के लिए आया करते थे। ये श्रद्धालु अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार मथुरा के मंदिरों में सोना-चांदी एवं सिक्के अर्पित किया करते थे। इस कारण मथुरा के मंदिरों में सोने चांदी के ढेर लगे हुए थे।

नगरकोट की लूट से प्राप्त भारी धन के बाद महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) समझ गया था कि उसे अपने अभियानों का रुख छोटे-छोटे राजाओं की राजधानियों की बजाय भारत के प्रसिद्ध मंदिरों की तरफ करना चाहिए। यही कारण था कि इस बार महमूद ने मथुरा को अपना निशाना बनाया।

ई.1018 में महमूद की लुटेरी सेना ने मथुरा में प्रवेश किया। लगाने को तो अब भी महमूद की सेना जेहाद (Jihad) का नारा लगाती थी किंतु वास्तव में वह एक तीर से कई निशाने साध रही थी। कुफ्र का सफाया, सम्पत्ति की लूट, साम्राज्य विस्तार, गुलामों की प्राप्ति, खलीफा (Khalifa) की प्रसन्नता सभी कुछ तो इन मंदिरों पर आक्रमण करने से उपलब्ध हो रहा था!

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

To read this book, please click on photo.

महमूद गजनवी के आक्रमणों (Attacks of (Mahmud of Ghazni) से पहले, भारत के लोग चूंकि विधर्मियों द्वारा किए जाने वाले आक्रमणों की विभीषिका से परिचित नहीं थे इसलिए वे मंदिरों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध नहीं किया करते थे। जब कोई राजा किसी दूसरे राज्य पर आक्रमण करता था अथवा उस पर अधिकार कर लेता था, तब भी मंदिर की सम्पत्ति अथवा सुरक्षा को किसी प्रकार का खतरा नहीं होता था। विजेता राजा भी मंदिर में उसी प्रकार नतमस्तक होता था जिस प्रकार उस राज्य का पुराना स्वामी होता था किंतु महमूद के आक्रमण के समय दृश्य पूरी तरह बदला हुआ था। महमूद के दरबारी लेखक उतबी ने लिखा है- ‘महमूद ने एक ऐसा नगर देखा जो योजना तथा निर्माण कला की दृष्टि से आश्चर्यजनक था। ऐसा प्रतीत होता था मानो उसके भवन स्वर्ग के हैं। किंतु नगर का सौंदर्य शैतानों की रचना का परिणाम था, इसलिए कोई बुद्धिमान व्यक्ति उसके वर्णन को सुनकर विश्वास नहीं कर सकता था। मथुरा के चारों ओर पत्थर के बबने हुए एक हजार दुर्ग थे जिनका मंदिरों की भांति प्रयोग किया जाता था। उसके मध्य में एक सबसे ऊँचा मंदिर था जिसके सौन्दर्य और सजावट का वर्णन करने में न किसी लेखक की लेखनी समर्थ है और न किसी चित्रकार की तूलिका। उस पर मन का स्थिर करना और विचार करना भी कठिन है।’

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने स्वयं ने अपने यात्रा-संस्मरणों में मथुरा के श्रीकृष्ण-जन्मभूमि मंदिर (Shri Krishna Janmabhoomi Temple) के बारे में लिखा है- ‘यदि कोई व्यक्ति उस जैसे भवन का निर्माण करना चाहे तो उसे एक हजार दीनार की एक लाख थैलियां व्यय करनी पड़ेंगी और कुशल से कुशल शिल्पियों की सहायता से भी वह 20 वर्षों में पूरा नहीं होगा।’

महमूद गजनवी के दरबारी लेखक उतबी ने लिखा है- ‘इन मंदिरों में सोने की बहुमूल्य मूर्तियां थीं उनमें से कुछ पांच-पांच हाथ ऊँची थीं और एक-एक में 50 हजार दीनार के बराबर मूल्य की मणियां जड़ी हुई थीं। एक मूर्ति में शुद्ध ठोस नीलम जड़ा हुआ था जिसका मूल्य 400 मिश्काल था। आक्रमणकारियों को अनेक मूर्तियों के नीचे गड़ा हुआ बहुत सा धन मिला। एक मूर्ति के नीचे तो 4 लाख स्वर्ण निष्काल के मूल्य का कोष मिला। सैंकड़ों मूर्तियां चांदी से बनी हुई थीं इस कारण वे अत्यंत कीमती थीं।’

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने समस्त मथुरा नगर को धूल में मिला दिया और उसका कोना-कोना लूट लिया। निरीह लोगों को मारा-पीटा गया ताकि वे अपना धन महमूद को दे दें। बहुत से लोगों को जान से मार दिया गया। सैंकड़ों औरतों के साथ बलात्कार हुए और वे यमुनाजी में कूदकर मर गईं।

श्रीकृष्ण-जन्मभूमि मंदिर (Shri Krishna Janmabhoomi Temple) के साथ ही मथुरा (Mathura) के हजारों मंदिर लूट लिए गए। उनमें से बहुतों को गिराया और नष्ट किया गया। मंदिरों में रखे देव-विग्रहों को अपमानित किया गया और उन्हें तोड़कर रास्तों पर फैंक दिया गया। वृंदावन (Vrindavan) में भी मथुरा की तरह हत्या, लूट, दाह और बलात्कार के नंगे नाच हुए।  भारतीयों ने ऐसे दृश्य इससे पहले कभी नहीं देखे थे। बड़े से बड़े युद्ध में नागरिकों पर हाथ नहीं उठाया जाता था।

मथुरा (Mathra) और वृंदावन (Vrindavan) के बाद महमूद ने कन्नौज की तरफ कूच किया जहाँ कन्नौज का अंतिम गुर्जर-प्रतिहार शासक राज्यपाल शासन कर रहा था। महमूद (Mahmud of Ghazni) के आगमन का समाचार सुनते ही वह भाग खड़ा हुआ। महमूद की सेना ने बिना युद्ध लड़े ही कन्नौज पर अधिकार कर लिया। यहाँ भी वही हत्या, लूट और बलात्कार के वे सब दृश्य दोहराए गए जो इससे पहले नगरकोट, भटिण्डा, मथुरा और वृंदावन में रचे गए थे।

महमूद (Mahmud of Ghazni) की सेनाओं द्वारा किए गए जुल्मों को देखकर भारत की आत्मा सिसक उठी। भारत की धर्मशील, परिश्रमी एवं निरीह जनता को बचाने वाला कोई नहीं था। भारतीय राजा जो घमण्ड के कारण एक दूसरे को मच्छर के समान बताते थे, महमूद नामक आंधी में तिनके की तरह उड़ गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...