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चक्रस्वामी की प्रतिमा महमूद गजनवी ने गजनी के चौक पर डाल दी (10)

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चक्रस्वामी की प्रतिमा महमूद गजनवी ने गजनी के चौक पर डाल दी

जेहाद (Jihad) की अवधारणा संसार को इस्लाम की छत्रछाया में लाने से जुड़ी है! प्रत्येक जेहादी चाहता है कि संसार के अन्य धार्मिक विश्वास इस्लाम के हाथों अपमानित हों। इसलिए महमूद गजनवी ने सरस्वती नदी के तट पर लगी चक्रस्वामी की प्रतिमा तोड़कर गजनी के चौक पर डाल दी!

पंजाब का हिन्दूशाही राजा (Hindushahi Raja) आनंदपाल (Raja Anandpal) नहीं चाहता था कि मूलस्थान (Multan) पर मुसलमानों का शासन हो इसलिए जब भी गजनी के मुसलमान मूलस्थान पर अधिकार करते थे, आनंदपाल मूलस्थान पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लेता था। इसलिए पेशावर (Peshwar) के निकट वैहन्द नामक स्थान पर महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) तथा राजा आनंदपाल के बीच भयानक युद्ध हुआ। पेशावर का प्राचीन नाम पुरुषपुर था। इसे कनिष्क ने बसाया था और इसमें अनेक बौद्ध स्मारकों का निर्माण करवाया था। तीसरी बौद्ध संगीति इसी पुरुषपुर में हुई थी।

मुस्लिम आक्रांताओं ने पुरुषपुर (Purushpur) के बौद्ध स्मारकों को नष्ट कर दिया तथा इसका नाम पेशावर (Peshawar) रख दिया। जब राजा आनंदपाल की सेनाएं पेशावर में पराजित होकर कांगड़ा घाटी (Kangra Ghati) की तरफ भागीं तो महमूद की सेनाओं ने उनका पीछा करके उन्हें नगरकोट (Nagarkot) के दुर्ग में घेर लिया। तीन दिन के युद्ध के बाद राजा आनंदपाल (Raja Anandpal) नमक की पहाड़ियों में चला गया। महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने नगरकोट का दुर्ग एवं नगरकोट में स्थित बज्रेश्वरी देवी (Vajreshwari Devi Temple) के मंदिर लूट लिए तथा वहाँ की अपार सम्पत्ति को ऊंटों, खच्चरों एवं हाथियों पर लदवाकर गजनी लौट गया।

वैहन्द तथा नगरकोट की पराजय के बाद भी राजा आनंदपाल हतोत्साहित नहीं हुआ। वह नमक की पहाड़ियों के छोर पर स्थित नंदन में अपनी राजधानी बनाकर रहने लगा। इसी वर्ष महमूद ने नारायणपुर नामक स्थान पर आक्रमण किया तथा वहाँ के मंदिरों को लूटकर तोड़ डाला।

ई.1013 में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) फिर लौट कर आया तथा उसने नंदन को घेर लिया। इस समय तक राजा आनंदपाल (Raja Anandpal) की मृत्यु हो चुकी थी तथा उसका पुत्र त्रिलोचनपाल (Raja Trilochanpal) नंदन पर शासन करता था। इस युद्ध में त्रिलोचनपाल के पुत्र भीमपाल (Bhimpal) ने अतुल शौर्य का प्रदर्शन किया किंतु नंदन पर महमूद का अधिकार हो गया तथा राजा त्रिलोचनपाल भाग कर काश्मीर चला गया।

महमूद ने नंदन में एक मुस्लिम गवर्नर नियुक्त कर दिया तथा स्वयं त्रिलोचनापाल (Raja Trilochanpal) के पीछे-पीछे काश्मीर जा पहुंचा। उन दिनों काश्मीर पर तुंग (Raja Tung) नामक एक शासक राज्य करता था। त्रिलोचनपाल तथा तुंग की सम्मिलित सेनाओं ने महमूद का सामना किया किंतु भारतीय सेना परास्त हो गई।

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) यहाँ से गजनी चला गया और राजा त्रिलोचनपाल (Raja Trilochanpal) काश्मीर से निकलकर फिर से पूर्वी पंजाब में आ गया ताकि अपने पूर्वजों के खोए हुए राज्य को फिर से स्वतंत्र करवा सके। कुछ प्रयासों के बाद राजा त्रिलोचनपाल ने शिवालिक की पहाड़ियों में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली।

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ई.1014 में महमूद ने पुष्यभूति वंश के राजा हर्षवर्द्धन (Raja Harshvardhan) की पुरानी राजधानी थानेश्वर पर आक्रमण किया। सरस्वती नदी के तट पर भीषण संघर्ष के बाद थानेश्वर का पतन हुआ। इसके बाद महमूद की सेनाओं ने थानेश्वर (Thaneshwar) को लूटा और नष्ट किया। थानेश्वर की प्रसिद्ध चक्रस्वामी की प्रतिमा गजनी ले जाई गई जहाँ उसे मुसलमानों के पैरों तले रौंदे जाने के लिए सार्वजनिक चौक में डाल दिया गया। गजनी के मुसलमान जब चक्रस्वामी की प्रतिमा के पास से निकलते तो उस पर ठोकर मारते। जेहाद (Jihad) का असली स्वरूप यही था।

त्रिलोचनपाल (Raja Trilochanpal) ने बुंदेलखण्ड के चंदेल राजा विद्याधर (Raja Vidyadhar Chandel) को अपना मित्र बना लिया। इस काल में राजा विद्याधर उत्तर भारत के शक्तिशाली राजाओं में गिना जाता था। जब महमूद को त्रिलोचनपाल की गतिविधियों की जानकारी मिली तो महमूद फिर से लौट आया।

रामगंगा नदी के किनारे पर हुए युद्ध में महमूद ने त्रिलोचनपाल को एक बार पुनः पराजित कर दिया। त्रिलोचन को पहाड़ियों में भाग जाना पड़ा। अब वह नाममात्र का राजा रह गया था। उसके दो पूर्वजों ने महमूद (Mahmud of Ghazni) के विरुद्ध लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था जिनमें त्रिलोचनपाल का बाबा जयपाल तथा पिता आनंदपाल सम्मिलित थे।

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भारत के दुर्भाग्य से राजा त्रिलोचनपाल (Raja Trilochanpal) के कुछ स्वार्थी सेनापति त्रिलोचनपाल के प्राण लेने पर उतारू हो गए। वे चाहते थे कि राजा त्रिलोचनपाल महमूद गजनवरी की अधीनता स्वीकार करके दोनों पक्षों में शांति स्थापित करे किंतु स्वाभिमानी त्रिलोचनपाल इसके लिए तैयार नहीं था। इसलिए ई.1021-22 में त्रिलोचनपाल के कुछ सेनापतियों ने राजा त्रिलोचनपाल को धोखे से विष दे दिया। हिन्दूशाही राजा चाहते थे कि भारत की हिन्दू शक्तियां मिलकर गजनी के मुसलमान आक्रांताओं को भारत से दूर रखें, इसके लिए उन्होंने बार-बार प्रयास भी किए किंतु दुर्भाग्य से बहुत कम हिन्दू राजाओं ने हिन्दूशाही राजाओं (Hindushahi Rulers) के मंतव्य को समझा और उन्होंने हिन्दूशाही राजाओं को बहुत ही सीमित सहयोग उपलब्ध कराया। यहाँ तक कि उसके अपने सेनापतियों ने राजा त्रिलोचनपाल (Raja Trilochanpal) को जहर दे दिया। हिन्दूशाही राज्य के नष्ट हो जाने के कारण हिन्दुकुश पर्वत की उपत्यकाओं के द्वार आक्रांताओं के लिए पूरी तरह खुल गए तथा भारत की पश्चिमी सीमा पूरी तरह असुरक्षित हो गई। अब अफगानिस्तान के मुस्लिम आक्रांता जब चाहें, निर्भय होकर भारत में प्रवेश कर सकते थे।

भारत की पश्चिमी सीमा की इस कमजोरी का नुक्सान एक न एक दिन सम्पूर्ण भारत को उठाना ही था। हुआ भी यही। अब महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) को खलीफा (Khalifa) के समक्ष दी गई उस शपथ को पूरा करना आसान हो गया जिसके अनुसार उसे प्रतिवर्ष भारत पर हमला करके कुफ्र को समाप्त करना था।

महमूद ने भटिण्डा (Bathinda) के किले पर आक्रमण किया जो उत्तर-पश्चिम से गंगा की घाटी के मार्ग में स्थित था। राजा विजयराज ने वीरता से किले की रक्षा की किंतु वह महमूद की शक्ति के सामने नहीं टिक सका। किले पर अधिकार करने के बाद महमूद ने भटिण्डा के लोगों से कहा कि वे इस्लाम स्वीकार कर लें किंतु बहुत से लोगों ने महमूद की बात स्वीकार नहीं की। इस पर महमूद (Mahmud of Ghazni) ने उन्हें मौत के घाट पर उतार दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोम

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ब्रह्माजी ने सोम को ब्राह्मण, बीज, वनस्पति और जल का सम्राट बना दिया!

पुरुवंश को पूर्वकाल में चंद्र वंश एवं सोम वंश भी कहा जाता था। इस कथा में हम चंद्रमा की उत्पत्ति की चर्चा करेंगे जिसकी वंश परम्परा में आगे चलकर पुरुरवा नामक राजा हुआ और जिससे पुरुवंश की शृंखला चली।

श्रीहरिवंश पुराण आदि कई पुराणों में चंद्रमा की उत्पत्ति की कथा मिलती है। इस कथा के अनुसार भगवान श्रीहरि विष्णु के नाभि-सरोवर के कमल से प्रजापति ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। विष्णु पुराण में आई एक कथा के अनुसार ब्रह्माजी के मानसिक संकल्प से अत्रि ऋषि उत्पन्न हुए। अत्रि भी प्रजापति ब्रह्मा के कार्य को आगे बढ़ाने में संलग्न हुए।

अत्रि ने तीन हजार दिव्य वर्षों तक अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर काष्ठ, दीवार तथा पत्थर के समान निश्चल रहकर किसी भी प्राणी को कष्ट पहुंचाए बिना ही अनुत्तर नामक महान् तप किया। जिस तप से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ तप नहीं हो, उसे अनुत्तर तप कहते हैं। अत्रि ने एकटक देखते हुए ऊध्र्वरेता अर्थात् ब्रह्मचारी रहकर सोम की भावना से तप किया। इस कारण अत्रि का शरीर सोमरूप में परिणत हो गया। 

इस तपस्या के कारण मुनि के नेत्रों से वह सोमरूप तेज जलरूप में बह निकला और दसों दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ आकाश में चढ़ने लगा। तब प्रसन्नता में भरी हुई दस दिशारूपी देवियों ने सम्मिलित होकर उस तेज को अपने गर्भ में विधिपूर्वक धारण किया परन्तु वे उस तेज को धारण करने में समर्थ नहीं हा सकीं।

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जब दिशाएं उस गर्भ का भार सहन नहीं कर सकीं तब औषधि आदि के द्वारा सब लोकों को पुष्ट करने वाला एवं शीतल किरणों से सुशोभित वह प्रकाशमान गर्भ समस्त लोकों को प्रकाशित करता हुआ दिग्देवियों के उदर से अचानक ही धरती पर गिर पड़ा।

प्रजापति ब्रह्मा ने संसार का हित करने की कामना से उस गर्भ को एक दिव्य रथ पर रख दिया। वह रथ वेदमय, धर्मस्वरूप तथा सत्य से नियंत्रित था। उसमें एक हजार सफेद घोड़े जुते हुए थे। अत्रि के पुत्र ‘सोम’ के गिरने पर ब्रह्माजी के सुप्रसिद्ध सात मानस पुत्र सोम की स्तुति करने लगे।

अंगिरा के वंश में उत्पन्न भृगु ऋषि और उनके पुत्र, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद की ऋचाओं से सोम की स्तुति करने लगे। इस स्तुति में कहा गया- ‘अंशुरंशुष्टे देव सोमाप्यायताम्’ अर्थात् हे चंद्रदेव! आपकी प्रत्येक किरण परिपुष्ट हो! इस स्तुति से सोम पुष्ट हुआ तथा उसका तेज तीनों लोकों को प्रकाशित करने लगा।

तब बह्माजी ने उस सोमयुक्त रथ में बैठकर समुद्र तक की पृथ्वी की इक्कीस बार प्रदक्षिणा की। उस समय रथ के वेग से उछलकर सोम का तेज पृथ्वी पर टपकने लगा। उस तेज से प्रकाशपूर्ण औषधियां उत्पन्न हुईं। उन औषधियों से भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक इन तीनों लोकों का और जरायुज, अण्डायुज, स्वेदज तथा उद्भिज नामक चारों प्रकार की प्रजाओं का पालन होता रहता है। इस प्रकार भगवान सोम सम्पूर्ण जगत् का पोषण करते हैं।

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ब्रह्माजी के पुत्रों द्वारा की गई वैदिक स्तुतियों से परिपुष्ट हुए सोम ने एक हजार पद्म वर्षों तक तप किया। चांदी के समान शुक्ल वर्ण वाली जल की अधिष्ठात्री देवियां अपने स्वरूपभूत जल से जगत् का पालन करती हैं। चंद्रदेव उनकी निधि हुए। वे अपने कर्मों से विख्यात हैं। ब्रह्माजी ने चंद्रमा को बीज, औषधि, ब्राह्मण और जल का राजा बना दिया। इस प्रकार प्रकाशवान् अस्तित्वों में श्रेष्ठ चंदमा अपनी कांति से तीनों लोकों को प्रकाशित करने लगा। जब चंद्रमा का इन चारों राज्यों अर्थात् बीज, औषधि, ब्राह्मण और जल के सम्राट के रूप में अभिषेक हो गया तब सम्राट चंद्रमा अपनी कांति से तीनों लोकों को प्रकाशित करने लगे।

उस समय प्रचेताओं के पुत्र दक्ष ने अपनी महाव्रत धारिणी सत्ताइस कन्याएं चंद्रमा को ब्याह दीं। जिन्हें विद्वान पुरुष सत्ताइस नक्षत्रों के रूप में जानते हैं। इस बड़े भारी राज्य एवं वैभव को पाकर पितृदेवों में श्रेष्ठ सोम ने राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया जिसमें उन्होंने एक लाख गौएं दक्षिणा में दीं। सोम के उस यज्ञ में भगवान अत्रि होता बने। भगवान भृगु अध्वर्यु बने। हिरण्यगर्भ उद्गाता बने तथा वसिष्ठ ब्रह्मा बने। उस यज्ञ में सनत्कुमार आदि प्राचीन ऋषियों ने स्वयं भगवान नारायण श्री हरि विष्णु को सदस्य बनाया।

यज्ञ के सम्पन्न होने पर सोम ने तीनों लोक ब्रह्मर्षियों को दक्षिणा में प्रदान कर दिए। उस समय सिनीवाली, कुहू, द्युति, पुष्टि, प्रभा, वसु, कीर्ति, धृति और शोभा नामक नौ देवियां नित्यप्रति चंद्रमा की सेवा में लगी रहती थीं। इस प्रकार समस्त ऋषियों एवं देवताओं से सत्कार पाकर द्विजराज चंद्रमा ने अवभृथ स्नान किया तथा पुनः दसों दिशाओं को प्रकाशमान करने लगे।

स्कंदपुराण सहित कई पुराणों में चंद्रमा की उत्पत्ति समुद्र से बताई गई है, वस्तुतः वह घटना संसार को वैभव की पुनर्प्राप्ति का रूपक है जिसका उल्लेख हम कूर्मावतार की कथा में विस्तार से कर चुके हैं।

जब हम अत्रि की तपस्या द्वारा सोम की उत्पत्ति की कथा पर सृष्टि के निर्माण की दृष्टि से विचार करते हैं तो हमें कुछ बातें स्पष्ट होती हैं। वस्तुतः यह कथा इस भौतिक संसार को सूक्ष्म आधार अर्थात् जीवन प्रदान करने का रूपक है। आकाश, अग्नि, वायु, सोम, जल एवं वनस्पति आदि दिव्य पदार्थों से इस स्थूल सृष्टि को जीवन प्रदान किया गया। अत्रि के तप द्वारा सोम को प्रकट करने एवं सोम के चंद्रमा बनने की कथा वस्तुतः भौतिक सृष्टि में सोम अर्थात् जीवन के प्रवेश की कथा है। विभिन्न ग्रंथों में यह कथा कई रूपोें में मिलती है।

ब्रह्माजी ने सोम को ब्राह्मण, बीज, औषधि और जल का सम्राट बनाया। वस्तुतः यह भी एक रूपक है। यहाँ ब्राह्मण से तात्पर्य उस समस्त ज्ञान-विज्ञान, यज्ञ, तपस्या, वैराग्य, त्याग तथा लोककल्याण से है जिसके प्रभाव से सृष्टि को सूक्ष्म आधार प्राप्त होता है।

औषधि से तात्पर्य उन समस्त वनस्पतियों से है जो प्राणियों का पेट भरती हैं अर्थात् सृष्टि को स्थूल आधार प्राप्त होता है। बीज से तात्पर्य सृष्टि के उन तत्वों से है जिनसे नए पदार्थ उत्पन्न होते हैं तथा जल से तात्पर्य उस तत्व से है जो सृष्टि को सौंदर्य रूपी रस अर्थात् जीवन प्रदान करता है।

सारांश रूप में ब्रह्माजी द्वारा सोम को ब्राह्मण, बीज, औषधि और जल का सम्राट बनाए जाने का अर्थ यह है कि यदि किसी भी वस्तु या प्राणी में से सोम निकाल लिया जाए तो न उसका सूक्ष्म आधार बचेगा, न उसका स्थूल आधार बचेगा, न उसमें वृद्धि प्राप्त करने का गुण बचेगा और न उसका सौंदर्य रूपी रस अर्थात् जीवन बचेगा!

वेदों में भी सोम से सम्बन्धित कई कथाएं मिलती हैं जिनमें अधिक बल इस बात पर दिया गया है कि सोम देवताओं की वस्तु है किंतु उस पर दैत्य अधिकार करना चाहते हैं। उन कथाओं का उल्लेख हम वैदिक कथाओं की पुस्तक में अलग से करेंगे। विष्णु पुराण तथा हरिवंश पुराण सहित अनेक ग्रंथों में कहा गया है कि भारी वैभव की प्राप्ति से चंद्रमा की बुद्धि भ्रष्ट हो गई और वह अनीति करने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मथुरा की लूट (11)

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मथुरा की लूट

गजनी के आक्रांता ने मथुरा (Mathura) से सोने की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ लूट लीं! मथुरा की लूट (Mathura Ki Loot) से महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) को इतना धन मिला, जिसकी कोई मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता।

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ई.1000 से भारत पर हमले करके भारत की जनता को लूट रहा था। महमूद ने बगदाद के खलीफा को जो वचन दिया था, उसका महमूद ने निष्ठा-पूर्वक पालन किया। उसने भारत पर आक्रमणों की झड़ी लगा दी। विशाल पंजाब पर अधिकार करने के बाद वह गंगा-यमुना के दो-आब की तरफ बढ़ा।

ई.1018 में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने बुलंदशहर, मथुरा तथा कन्नौज पर आक्रमण किया। इन स्थानों पर भी उसने मंदिरों तथा नगरों को लूटा और भयंकर लूट मचायी। डॉ. ईश्वरी प्रसाद के अनुसार इस अभियान में उसे 30 लाख दिरहम मूल्य की सम्पत्ति, 55 हजार गुलाम तथा 350 हाथी प्राप्त हुए।

उस काल में मथुरा उत्तर-भारत का सर्वाधिक घना बसा हुआ नगर था। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि होने के कारण इस नगर में सैंकड़ों कलापूर्ण मंदिर स्थित थे जिनमें से कई मंदिर तो सैंकड़ों वर्ष पुराने थे। उनमें हजारों वर्ष पुरानी मूर्तियां रखी हुई थीं।

विगत हजारों साल से भारत भर के हिन्दू धर्मावलम्बी भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के दर्शनों के लिए आया करते थे। ये श्रद्धालु अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार मथुरा के मंदिरों में सोना-चांदी एवं सिक्के अर्पित किया करते थे। इस कारण मथुरा के मंदिरों में सोने चांदी के ढेर लगे हुए थे।

नगरकोट की लूट से प्राप्त भारी धन के बाद महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) समझ गया था कि उसे अपने अभियानों का रुख छोटे-छोटे राजाओं की राजधानियों की बजाय भारत के प्रसिद्ध मंदिरों की तरफ करना चाहिए। यही कारण था कि इस बार महमूद ने मथुरा को अपना निशाना बनाया।

ई.1018 में महमूद की लुटेरी सेना ने मथुरा में प्रवेश किया। लगाने को तो अब भी महमूद की सेना जेहाद (Jihad) का नारा लगाती थी किंतु वास्तव में वह एक तीर से कई निशाने साध रही थी। कुफ्र का सफाया, सम्पत्ति की लूट, साम्राज्य विस्तार, गुलामों की प्राप्ति, खलीफा (Khalifa) की प्रसन्नता सभी कुछ तो इन मंदिरों पर आक्रमण करने से उपलब्ध हो रहा था!

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महमूद गजनवी के आक्रमणों (Attacks of (Mahmud of Ghazni) से पहले, भारत के लोग चूंकि विधर्मियों द्वारा किए जाने वाले आक्रमणों की विभीषिका से परिचित नहीं थे इसलिए वे मंदिरों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध नहीं किया करते थे। जब कोई राजा किसी दूसरे राज्य पर आक्रमण करता था अथवा उस पर अधिकार कर लेता था, तब भी मंदिर की सम्पत्ति अथवा सुरक्षा को किसी प्रकार का खतरा नहीं होता था। विजेता राजा भी मंदिर में उसी प्रकार नतमस्तक होता था जिस प्रकार उस राज्य का पुराना स्वामी होता था किंतु महमूद के आक्रमण के समय दृश्य पूरी तरह बदला हुआ था। महमूद के दरबारी लेखक उतबी ने लिखा है- ‘महमूद ने एक ऐसा नगर देखा जो योजना तथा निर्माण कला की दृष्टि से आश्चर्यजनक था। ऐसा प्रतीत होता था मानो उसके भवन स्वर्ग के हैं। किंतु नगर का सौंदर्य शैतानों की रचना का परिणाम था, इसलिए कोई बुद्धिमान व्यक्ति उसके वर्णन को सुनकर विश्वास नहीं कर सकता था। मथुरा के चारों ओर पत्थर के बबने हुए एक हजार दुर्ग थे जिनका मंदिरों की भांति प्रयोग किया जाता था। उसके मध्य में एक सबसे ऊँचा मंदिर था जिसके सौन्दर्य और सजावट का वर्णन करने में न किसी लेखक की लेखनी समर्थ है और न किसी चित्रकार की तूलिका। उस पर मन का स्थिर करना और विचार करना भी कठिन है।’

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने स्वयं ने अपने यात्रा-संस्मरणों में मथुरा के श्रीकृष्ण-जन्मभूमि मंदिर (Shri Krishna Janmabhoomi Temple) के बारे में लिखा है- ‘यदि कोई व्यक्ति उस जैसे भवन का निर्माण करना चाहे तो उसे एक हजार दीनार की एक लाख थैलियां व्यय करनी पड़ेंगी और कुशल से कुशल शिल्पियों की सहायता से भी वह 20 वर्षों में पूरा नहीं होगा।’

महमूद गजनवी के दरबारी लेखक उतबी ने लिखा है- ‘इन मंदिरों में सोने की बहुमूल्य मूर्तियां थीं उनमें से कुछ पांच-पांच हाथ ऊँची थीं और एक-एक में 50 हजार दीनार के बराबर मूल्य की मणियां जड़ी हुई थीं। एक मूर्ति में शुद्ध ठोस नीलम जड़ा हुआ था जिसका मूल्य 400 मिश्काल था। आक्रमणकारियों को अनेक मूर्तियों के नीचे गड़ा हुआ बहुत सा धन मिला। एक मूर्ति के नीचे तो 4 लाख स्वर्ण निष्काल के मूल्य का कोष मिला। सैंकड़ों मूर्तियां चांदी से बनी हुई थीं इस कारण वे अत्यंत कीमती थीं।’

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने समस्त मथुरा नगर को धूल में मिला दिया और उसका कोना-कोना लूट लिया। निरीह लोगों को मारा-पीटा गया ताकि वे अपना धन महमूद को दे दें। बहुत से लोगों को जान से मार दिया गया। सैंकड़ों औरतों के साथ बलात्कार हुए और वे यमुनाजी में कूदकर मर गईं।

श्रीकृष्ण-जन्मभूमि मंदिर (Shri Krishna Janmabhoomi Temple) के साथ ही मथुरा (Mathura) के हजारों मंदिर लूट लिए गए। उनमें से बहुतों को गिराया और नष्ट किया गया। मंदिरों में रखे देव-विग्रहों को अपमानित किया गया और उन्हें तोड़कर रास्तों पर फैंक दिया गया। वृंदावन (Vrindavan) में भी मथुरा की तरह हत्या, लूट, दाह और बलात्कार के नंगे नाच हुए।  भारतीयों ने ऐसे दृश्य इससे पहले कभी नहीं देखे थे। बड़े से बड़े युद्ध में नागरिकों पर हाथ नहीं उठाया जाता था।

मथुरा (Mathra) और वृंदावन (Vrindavan) के बाद महमूद ने कन्नौज की तरफ कूच किया जहाँ कन्नौज का अंतिम गुर्जर-प्रतिहार शासक राज्यपाल शासन कर रहा था। महमूद (Mahmud of Ghazni) के आगमन का समाचार सुनते ही वह भाग खड़ा हुआ। महमूद की सेना ने बिना युद्ध लड़े ही कन्नौज पर अधिकार कर लिया। यहाँ भी वही हत्या, लूट और बलात्कार के वे सब दृश्य दोहराए गए जो इससे पहले नगरकोट, भटिण्डा, मथुरा और वृंदावन में रचे गए थे।

महमूद (Mahmud of Ghazni) की सेनाओं द्वारा किए गए जुल्मों को देखकर भारत की आत्मा सिसक उठी। भारत की धर्मशील, परिश्रमी एवं निरीह जनता को बचाने वाला कोई नहीं था। भारतीय राजा जो घमण्ड के कारण एक दूसरे को मच्छर के समान बताते थे, महमूद नामक आंधी में तिनके की तरह उड़ गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुल्तान की लूट (12)

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मुल्तान की लूट

मुल्तान (Multan) का वास्तविक नाम मूलस्थान था। यहाँ सूर्य देव का अत्यंत प्राचीन मंदिर था जिसे मार्तण्ड मंदिर कहते थे। महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने मार्तण्ड मंदिर (Martand Temple) के स्वर्ण भण्डारों के किस्से सुन रखे थे। इसलिए वह मुल्तान को लूटने के लिए चल दिया। मुल्तान की लूट (Multan Ki Loot) से महमूद को इतना धन मिला कि उसे फिर कभी जीवन में धन की कमी नहीं हुई। इसी धन से उसने भारत को लूटने के लिए बड़ी सेना बना ली!

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) अब तक भारत के विरुद्ध कई अभियान कर चुका था और प्रत्येक अभियान में उसने अपने शैतानी दिमाग तथा शातिराना चालों का भरपूर उपयोग किया था। उस काल में भारत पर अभियान करना कोई आसान कार्य नहीं था जबकि केवल पशु की पीठ ही मनुष्य के यातायात, परिवहन एवं संचार का एकमात्र साधन थी।

अफगानिस्तान तथा भारत के बीच हिन्दुकुश पर्वत स्थित था जिसे लांघकर भारत में प्रवेश करना तथा पंजाब की पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित प्रबल हिन्दूशाही राज्य से टक्कर लेना लगभग असंभव सी दिखने वाली बातें थीं किंतु अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति एवं राजनीतिक सूझबूझ के बल पर महमूद ने इसे सफलतापूर्वक कर दिखाया।

निश्चित रूप से महमूद (Mahmud of Ghazni) की सामरिक एवं राजनीतिक सूझबूझ में धूर्तता एवं मक्कारी ने बड़ी भूमिका निभाई थी किंतु भारतीय राजाओं की मूर्खताओं ने महमूद की बहुत सहायता की। महमूद ने खलीफा को भारत की अपार दौलत के सब्जबाग दिखाकर सुल्तान की पदवी प्राप्त की।

इस पदवी के बल पर महमूद उस काल के इस्लामिक जगत में उपेक्षित तुर्क सरदार के स्थान पर खलीफा (Khalifa) का दायाँ हाथ कहलाने लगा तथा उसे भारत पर प्रारम्भिक आक्रमणों के लिए अरबी एवं ईरानी सहायताएं मिल गईं। महमूद (Mahmud of Ghazni) ने खलीफा से मिली सुल्तान की पदवी तथा भारत से मिले धन का उपयोग अपनी सेनाओं तथा सल्तनत का विस्तार करने में और भारत से कुफ्र मिटाने में किया।

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महमूद का पहला भारत अभियान हिन्दूकुश (Hindukush) की उपत्यकाओं में रहने वाले जनजातीय कबीलों के विरुद्ध था ताकि पंजाब को जाने वाले आगे के रास्ते खुल जाएं। इस अभियान में महमूद को धन की प्राप्ति तो नहीं हुई किंतु अब वह सिंधु नदी के मध्य-उपजाऊ-क्षेत्र में स्थित मूलस्थान अथवा मुल्तान (Multan) तक आसानी से पहुंच सकता था। वस्तुतः मूलस्थान ही वह ताला था जिसके खुलने पर भारत के अपार स्वर्णभण्डारों को लूटा जा सकता था।

मूलस्थान भारत के पश्चिमोत्तर भाग में स्थित पंजाब का एक महत्त्वपूर्ण शहर था। फारस की खाड़ी से लेकर पश्चिमी भारत के बीच चलने वाले व्यापारी काफिले मूलस्थान से होकर निकलते थे। इस कारण इस नगर की आय बहुत अच्छी थी। मूलस्थान का राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक महत्त्व, महमूद गजनवी को गजनी में चैन से नहीं बैठने देता था।

मध्य-एशिया से आए कुछ शिया लुटेरों (Shia Dacoits) ने आठवीं शताब्दी ईस्वी के बाद से ही मूलस्थान के आसपास कई छोटे-मोटे स्थाई डेरे बना लिये थे जो इन व्यापारिक काफिलों से बलपूर्वक धन वसूला करते थे। रोमिला थापर ने लिखा है कि महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) भारत में रह रहे इन शिया मुसलमानों को भ्रष्ट-मुसलमान मानता था तथा उन्हें दण्डित करना चाहता था। वस्तुतः ऐसा कहकर रोमिला थापर महमूद गजनवी के वास्तविक उद्देश्यों पर पर्दा डालने का प्रयास कर रही हैं तथा यह बताना चाहती हैं कि महमूद के लिए हिन्दू और मुसलमान एक बराबर थे।

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मूलस्थान (Mutan) में सदियों पुराना एक सूर्यमंदिर हुआ करता था जिसे मार्त्तण्ड मंदिर (Martand Temple or Sun Temple) कहते थे। इस मंदिर में सदियों से आ रहे चढ़ावे के कारण अपार धन-सम्पदा एकत्रित हो गई थी। जब महमूद ने मूलस्थान पर अधिकार किया तो उसे मार्त्तण्ड मन्दिर से इतना धन मिला कि उसे भविष्य के अभियानों के लिए धन की कोई कमी नहीं रही। यद्यपि महमूद ने खलीफा को वचन दिया था कि वह भारत से लूटे गए धन में से खलीफा (Khalifa) का हिस्सा भिजवाएगा किंतु महमूद ने मुल्तान की लूट में मिले धन में से खलीफा को फूटी कौड़ी भी नहीं भेजी। मुल्तान की लूट से महमूद का भाग्य बदल गया। मूलस्थान के मार्त्तण्ड मंदिर (Martand Temple) से मिले धन से महमूद गजनवी के मस्तिष्क में यह बात भलीभांति पैठ गई थी कि मूलस्थान से आरम्भ होने वाला मंदिरों का यह सिलसिला एक ओर तो पंजाब होते हुए भारत के उत्तरी छोर तक तथा दूसरी ओर थार मरुस्थल (Thar Desert) से होते हुए गुजरात तथा उससे आगे दक्खिन के प्रदेशों तक मौजूद है जिन्हें लूटने से महमूद को इतना धन मिल जाएगा कि वह संसार का सबसे धनी सुल्तान बन जाएगा। अफगानिस्तान की ओर से भारत के लिए सैनिक अभियानों का दरवाजा हिन्दूकुश पर्वत (Hindu Kush Mountains) के दर्रों से घुसकर मुल्तान (Multan) होते हुए ही खुल सकता था।

इन्हीं सब कारणों से पंजाब के हिन्दूशाही राजा (Hindushahi Rulers) नहीं चाहते थे कि मूलस्थान पर अफगानी आक्रांताओं का शासन हो। इसलिए वे भी महमूद से तब तक संघर्ष करते रहे जब तक कि हिन्दूशाही राजवंश पूरी तरह नष्ट नहीं हो गया।

आवश्यकता इस बात थी कि महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) भारत के जिस उत्तर-पश्चिमी दरवाजे को खोलने का प्रयास कर रहा था, भारत के सारे राजा मिलकर महमूद को नष्ट कर दें किंतु बड़ी-बड़ी बातें करने वाले भारतीयों को कभी भी अपनी हीन अवस्था का भान नहीं हो पाता था। स्वार्थी, चाटुकार और झूठे मंत्री शायद ही कभी अपने राजाओं को राष्ट्र-हित की सलाह देते थे। जिस तरह वे अपने राज्य की सीमा से आगे नहीं सोच पाते थे, उसी प्रकार वे अपने वर्तमान समय से आगे भी नहीं सोच पाते थे।

यही कारण था कि महमूद बारबार आता रहा और भारतीयों की गर्दनों पर तलवार बजाता रहा। भारतीय राजा भी भेड़-बकरियों की भांति एक-एक करके अपनी गर्दनें महमूद की तलवार के नीचे धरते रहे। भारतीय राजा कभी एक हुए भी तो बड़े बेमन से, आधे-अधूरे साधनों, हृदय में छिपे कलुषों, अपनी वंश परम्पराओं की झूठी शान और सिर में भरी हुई घमण्ड भरी बातों के साथ एकत्रित हुए तथा सामान्यतः बिना कोई सफलता प्राप्त किए फिर से बिखर गए।

भारतीयों के सौभाग्य से पश्चिमोत्तर सीमा पर उस काल में प्रबल हिन्दूशाही राज्य (Hindushahi Rajya) था तथा हिन्दूशाही राजाओं ने दूसरे राजाओं को साथ लेने के कुछ प्रयास भी किए किंतु उन्हें अन्य भारतीय राजाओं का बहुत सीमित सहयोग प्राप्त हुआ और वे प्रायः अकेले ही महमूद नामक विपत्ति से जूझते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कन्नौज के प्रतिहार नष्ट कर दिए महमूद गजनवी ने (13)

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कन्नौज के प्रतिहार - www.bharatkaitihas.com
कन्नौज के प्रतिहार नष्ट कर दिए महमूद गजनवी ने

कन्नौज (Kannauj)क्षेत्र के सात दुर्ग महमूद (Mahmud of Ghazni)के अधीन हो गए। गंगा के उपजाऊ मैदान (Fields of Ganga-Yamuna) की अपार सम्पदा महमूद ने लूट ली। कई हजार स्त्री-पुरुषों को पकड़कर गुलाम बना लिया। हजारों स्त्रियों का सतीत्व लूटा मासूम बच्चे भालों एवं तलवारों की नोकों से मार दिए। कन्नौज के प्रतिहार (Pratihas of Kannauj) महमूद के हाथों नष्ट हो गए।

ई.1018 में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने कन्नौज के प्रतिहार राजा राज्यपाल (Pratihar Raja Rajypal) पर आक्रमण किया। कन्नौज के प्रतिहार विगत लगभग दो शताब्दियों से उत्तरी भारत का नेतृत्व कर रहे थे किंतु चौहानों, परमारों तथा चौलुक्यों के प्रहारों से ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के आते-आते प्रतिहारों की शक्ति क्षीण हो चुकी थी। फिर भी गुर्जर-प्रतिहारों की वीरताओं के किस्से पूरे मध्य-एशिया में प्रचलित थे जिनके कारण महमूद गजनवी ने अतिरिक्त सावधानी बरती।

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने अपनी सेना को मथुरा (Mathura) में छोड़ा जो मथुरा नगर के कलात्मक भवनों एवं मंदिरों को जलाकर नष्ट करने में व्यस्त हो गई तथा महमूद स्वयं एक छोटी घुड़सवार सेना लेकर तेजी से चलता हुआ 20 दिसम्बर 1018 को कन्नौज पहुंच गया। जब महमूद कन्नौज के काफी निकट आ गया तब महमूद के गुप्तचरों ने कन्नौज नगर में यह सूचना फैला दी कि महमूद अपनी विशाल सेना लेकर कन्नौज के निकट पहुंच गया है।

एक समय था जब कन्नौज के प्रतिहार आधे से अधिक भारत पर शासन करते थे किंतु कन्नौज का राजा राज्यपाल (Pratihar Raja Rajypal) महमूद गजनवी की शातिराना चाल को नहीं समझ सका कि महमूद थोड़े से घुड़सवारों के साथ आया है तथा उसकी अधिकांश सेना मथुरा में पड़ी हुई है। राज्यपाल के पास इस बात की पुष्टि करने का भी समय नहीं था कि महमूद के पास वास्तव में कितनी सेना है!

राज्यपाल ने सोचा कि मैं बिना किसी तैयारी के महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) की विशाल सेना का सामना नहीं कर सकता अतः राज्यपाल घबरा गया और कन्नौज से बाहर निकलकर गंगा नदी को पार करके बारी नामक स्थान पर चला गया। महमूद के गुप्तचर महमूद को राज्यपाल की गतिविधियों की पल-पल की सूचना दे रहे थे। अतः महमूद थोड़े से अश्वारोहियों के साथ ही कन्नौज में घुस गया। देखते ही देखते कन्नौज पर महमूद का अधिकार हो गया। महमूद ने राज्यपाल (Pratihar Raja Rajypal) के सात दुर्ग भी छीन लिए।

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महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) के दरबारी लेखक उतबी (Al Utbi) के अनुसार महमूद ने मुंज (Munj Fort) नामक दुर्ग पर आक्रमण किया। यह दुर्ग ब्राह्मणों के अधिकार में था। जब मुंज के ब्राह्मणों ने महमूद द्वारा कन्नौज जीत लिए जाने की सूचना सुनी तो वे मुंज दुर्ग में तैयारियां करके बैठ गए। पूरे 25 दिन तक मुंज के नागरिक एवं सैनिक महमूद से युद्ध करते रहे।

अंत में मुस्लिम अश्वारोहियों ने दुर्ग में घुसकर मारकाट मचा दी। बहुत से ब्राह्मण-सैनिक मारे गए तथा कुछ ने किले से बाहर निकलकर जंगलों की शरण ली। मुंज नगर की औरतों एवं बच्चों ने किले की दीवारों पर से छलांग लगाकर अपने शरीर त्याग दिए।

मुंज के बाद महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) की सेना आसी नामक दुर्ग की ओर बढ़ी। आसी का दुर्गपति चंदर कन्नौज के गुर्जर-प्रतिहारों (Pratihas of Kannauj) के विरुद्ध युद्ध करता रहता था किंतु महमूद के आने की सूचना पाकर वह भी आसी का दुर्ग छोड़कर भाग गया। महमूद के अश्वारोही दुर्ग में घुस गए तथा यहाँ भी उन्होंने दुर्ग में रह रहे निरीह लोगों का नृशंसता पूर्वक संहार किया। गजनी की सेना ने लगभग पूरा दुर्ग ही तहस-नहस कर दिया।

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इसके बाद महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) शरवा के दुर्ग की तरफ बढ़ा। यहाँ का शासक चन्द्रराय, हिन्दूशाही राजा त्रिलोचनपाल (Hindushahi Raja Trilochanpal) का शत्रु था किंतु उसने भी महमूद का नाम सुनते ही किला खाली कर दिया। वह अपने रनिवास, राजकोष एवं हाथियों को लेकर 45 मील दूर घने जंगल में स्थित एक पहाड़ पर जा चढ़ा। महमूद ने शरवा के दुर्ग पर अधिकार कर लिया तथा आगे बढ़कर उस पहाड़ी को घेर लिया जिस पहाड़ी पर राजा चन्द्रराय Raja Chandrrai) चढ़ा हुआ था। 6 जनवरी 1019 को महमूद ने उस पहाड़ी पर अधिकार कर लिया तथा राजा चंद्रराय को पकड़ लिया। चूंकि यहाँ पर तीन दिन तक भयानक युद्ध चला था इसलिए महमूद ने पहाड़ी पर स्थित समस्त मनुष्यों का कत्ल करवा दिया तथा राजा चंद्रराय के हाथी-घोड़े, सोना-चांदी एवं विशाल सम्पत्ति छीन लिए। गजनी की सेना तीन दिन तक पहाड़ी में इधर-उधर छिपे हुए खजाने को एकत्रित करती रही। इस पहाड़ी से महमूद को अनेक दास एवं सुंदर दासियां भी प्राप्त हुईं।

इस प्रकार एक-एक करके कन्नौज क्षेत्र के सात दुर्ग महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) के अत्याचारों के ग्रास बन गए। गंगा के उपजाऊ मैदान में स्थित इस समृद्ध क्षेत्र की अपार सम्पदा महमूद के द्वारा लूट ली गई। कई हजार स्त्री-पुरुषों को पकड़कर गुलाम बना लिया गया। हजारों स्त्रियों का सतीत्व लूटा गया, मासूम बच्चे भालों एवं तलवारों की नोकों से मार दिए गए एवं सम्पूर्ण क्षेत्र में हाहाकार मच गया।

जो भारतीय राजा अपनी आन-बान और शान के लिए एक दूसरे का खून बहाते रहते थे, वे महमूद के हाथों से अपनी निरीह प्रजा की रक्षा नहीं कर सके। इन राजाओं को रणक्षेत्र क्षेत्र छोड़कर भाग जाने में भी कोई शर्म नहीं आई। जिन प्रतिहारों ने अपने नामों के आगे नारायण, परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर, श्रीमद्, तथा नाम के पीछे देवराज्ये जैसी उपाधियां लिखीं, वे महमूद नामक आंधी में तुच्छ तिनके तरह उड़ गए।

जिन वीर चंदेलों (Chandels) को पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chouhan) से युद्ध करने एवं उसे परास्त करके जीवित छोड़ने का आज तक दंभ है, वे चंदेल भी अपने राज्य में मुंह छिपाकर बैठे रहे। मानो उनके राज्य की सीमा पर जो कुछ हो रहा था, वह अत्यंत सामान्य बात थी।

होना तो यह चाहिए था कि जब महमूद की लुटेरी सेना गंगा-यमुना के दो-आब में स्थित मथुरा (Mathura) को लूट रही थी, तभी गंगा के मैदानों में स्थित राजाओं को सतर्क हो जाना चाहिए था और अपनी तैयारियां आरम्भ कर देनी चाहिए थीं। मध्य-गंगा-मैदान (Fields of Ganga-Yamuna) के राजाओं को एक विदेशी, विधर्मी, अत्याचारी एवं दुर्दान्त आक्रांता के विरुद्ध कोई संघ बनाने का प्रयास करना चाहिए था किंतु उस काल के शासकों की बुद्धि मानो किसी अदृश्य शक्ति ने हर ली थी जिसका दुष्परिणाम आने वाली सदियों तक भारतीयों को भुगतना था।

गंगा के समृद्ध मैदानों में स्थित दुर्गों से प्राप्त सम्पूर्ण सम्पत्ति को जानवरों पर लादकर एवं दास-दासियों को रस्सियों से बांधकर महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) बड़ी अकड़ के साथ धौंसा बजाता हुआ गजनी (Ghazni) के लिए रवाना हो गया। इन दृश्यों को देखकर वीरभूमि भारत की आत्मा निष्प्रभ एवं श्रीहीन होकर सिसकने लगी किंतु यह महमूद के पापों का अंत नहीं था। अभी तो उसके अत्याचारों के बड़े किस्से लिखे जाने बाकी थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चंदेल राजा विद्याधर को औरतें उपहार में भिजवाईं महमूद गजनवी ने (14)

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चंदेल राजा विद्याधर को औरतें उपहार में भिजवाईं महमूद गजनवी ने

हिन्दूशाही राजा त्रिलोचनपाल (Hindushahi Raja Trilochanpal) से निबटकर जब महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) फिर से कन्नौज (Kannauj) की ओर बढ़ा तो चंदेल राजा विद्याधर (Vidyadhara Chandela of Kalinjar) के पुत्र त्रिलोचनपाल (Prince Trilochanpal of Kannauj) ने महमूद का सामना किया जो इस समय कन्नौज का शासक था किंतु यह त्रिलोचनपाल (Prince Trilochanpal of Kannauj) भी महमूद से परास्त होकर भाग गया।

महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने गंगा-यमुना के दो-आब (Doab of the Ganga and Yamuna) से आगे बढ़कर मध्य-गंगा के उपजाऊ क्षेत्र में स्थित कन्नौज (Kannauj) तथा उसके निकटवर्ती सात दुर्गों पर भीषण आक्रमण करके उन्हें तहस-नहस कर दिया तथा हजारों मनुष्यों को मौत के घाट उतारकर, इन दुर्गों की अपार सम्पत्ति लूटकर एवं हजारों स्त्री-पुरुषों को गुलाम बनाकर अपने साथ गजनी ले गया। 

कालिंजर के चंदेल राजा विद्याधर (Vidyadhara Chandela of Kalinjar) ने कन्नौज (Kannauj) एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्रों की बरबादी के लिए कन्नौज के प्रतिहार शासक राज्यपाल को जिम्मेदार ठहराया जिसने महमूद का तनिक भी प्रतिरोध नहीं किया। इसलिए चंदेल राजा विद्याधर ने राज्यपाल को दण्डित करने का निश्चय किया तथा अपनी सेना भेजकर राज्यपाल को मरवा दिया।

‘सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध’ नामक शोधग्रंथ के लेखक अशोककुमार सिंह ने लिखा है कि प्रतिहार राजा राज्यपाल की हत्या करवाने के बाद राजा विद्याधर (Vidyadhara Chandela of Kalinjar) ने अपने पुत्र त्रिलोचनसिंह को कन्नौज का शासक बना दिया। होना तो यह चाहिए था कि चंदेल राजा विद्याधर, महमूद द्वारा किए गए आक्रमण में प्रतिहार राजा राज्यपाल की सहायता करता किंतु विद्याधर ने महमूद (Mahmud of Ghazni) से लड़ने की बजाय प्रतिहार राजा राज्यपाल को मार डाला।

चंदेल राजा विद्याधर के इस कृत्य से तो ऐसा लगता है कि विद्याधर (Vidyadhara Chandela of Kalinjar) ने महमूद की मार से कमजोर पड़ चुके प्रतिहारों को नष्ट करके उनका राज्य हड़प लिया। जबकि विद्याधर के पिता गण्ड ने ई.1008 में पंजाब के हिन्दूशाही राजा आनंदपाल (Hindushai Raja Anand Pal) की सहायता की थी।

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जब महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) को चंदेल राजा विद्याधर (Vidyadhara Chandela of Kalinjar) द्वारा कन्नौज (Kannauj) के राजा राज्यपाल को मार दिए जाने की बात ज्ञात हुई तो ई.1019 में ही महमूद ने चंदेल राज्य पर आक्रमण किया। वह मार्ग में पड़ने वाले दुर्गों को जीतता हुआ और उनमें नरसंहार करवाता हुआ आगे बढ़ता रहा।

जब महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) चंदेल राजा विद्याधर के राज्य पर आक्रमण करने के लिए राहिब नामक नदी पार कर रहा था, तब हिन्दूशाही राजा त्रिलोचनपाल (Hindushahi Raja Trilochanpal) अपनी सेना लेकर आया। त्रिलोचनपाल (Hindushahi Raja Trilochanpal) को ‘पुरु जयपाल’ (Puru Jayapal) भी कहा जाता था। वह हिन्दूशाही राजा आनंदपाल (Hindushahi Raja Anand Pal) का पुत्र था। इस समय तक महमूद गजनवी त्रिलोचनपाल का नंदन राज्य छीन चुका था किंतु त्रिलोचनपाल अभी तक जीवित था। पाठकों को स्मरण होगा कि हिन्दूशाही राजा त्रिलोचनपाल (Hindushahi Raja Trilochanpal) तथा चंदेल राजा विद्याधर (Vidyadhara Chandela of Kalinjar) ने महमूद के विरुद्ध एक संघ बना रखा था।

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महमूद की सेना को आगे बढ़ने से पहले हिन्दूशाही राजा त्रिलोचनपाल (Hindushahi Raja Trilochanpal) उर्फ पुरु जयपाल की सेना से भयानक युद्ध करना पड़ा जिसमें त्रिलोचनपाल हार गया। इस पराजय के बाद जब त्रिलोचनपाल अपने मित्र विद्याधर से मिलने जा रहा था, तभी मार्ग में त्रिलोचनपाल के मंत्रियों ने त्रिलोचनपाल की हत्या कर दी। इस प्रकार महमूद के विरुद्ध चल रही लड़ाई कमजोर पड़ गई। हिन्दूशाही राजा त्रिलोचनपाल (Hindushahi Raja Trilochanpal) से निबटकर जब महमूद फिर से कन्नौज (Kannauj) की ओर बढ़ा तो चंदेल राजा विद्याधर के पुत्र त्रिलोचनपाल (Prince Trilochanpal of Kannauj) ने महमूद का सामना किया जो इस समय कन्नौज का शासक था किंतु यह त्रिलोचनपाल (Prince Trilochanpal of Kannauj) भी महमूद से परास्त होकर भाग गया। यहाँ से महमूद बारी नामक स्थान पर पहुंचा जहाँ उस काल में अनेक समृद्ध मंदिर स्थित थे। महमूद ने उन मंदिरों को नष्ट कर दिया तथा नगर को भूमिसात कर दिया। इसके बाद महमूद ने विद्याधर (Vidyadhara Chandela of Kalinjar) को संदेश भिजवाया कि वह महमूद की अधीनता और इस्लाम स्वीकार कर ले किंतु विद्याधर ने महमूद को जवाब भिजवाया कि मैं तुझसे केवल युद्ध चाहता हूँ।

राजा विद्याधर चंदेलों की विशाल सेना लेकर महमूद (Mahmud of Ghazni) से लड़ने के लिए आया। चंदेल सेना में ढेढ़ लाख पैदल सवार, 36 हजार घुड़सवार तथा 650 हाथी थे। चंदेलों की सेना के मुकाबले महमूद की सेना बहुत छोटी थी। जब महमूद ने एक पहाड़ी पर चढ़कर चंदेलों की विशाल सेना को देखा तो महमूद भयभीत हो गया।

फारूखी तथा इब्नुल असीर नामक दो तत्कालीन लेखकों ने लिखा है- ‘महमूद को अपनी विजय होने की कोई संभावना नहीं दिख रही थी किंतु जब महमूद ने अल्लाह से प्रार्थना की तो अल्लाह ने राजा विद्याधर की सेना के मन में डर पैदा कर दिया और वह भाग गई।’

महमूद के घुड़सवारों ने भागती हुई चंदेल सेना का पीछा किया तथा हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। चंदेल राज्य से महमूद को अपार धन-सम्पत्ति तथा एक जंगल में छिपे हुए 580 हाथी मिले। इन सबको लेकर महमूद फिर से गजनी लौट गया।

‘सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध’ के लेखक अशोक कुमार सिंह ने इन तथ्यों को स्वीकार नहीं किया है। ‘चंदेल विद्याधर, प्रतिहार राज्यपाल एण्ड महमूद ऑफ गजनी’ नामक पुस्तक के लेखक संतलाल कटारे के अनुसार महमूद ने युद्ध के मैदान के पास से बह रही नदी का जल रोक दिया जिससे नदी का पानी युद्ध के मैदान में भर गया। इस कारण राजा विद्याधर रात के समय अपनी सेना को युद्ध के मैदान से हटाकर पीछे ले गया किंतु विद्याधर की सेना का बहुत सा सामान मैदान में ही छूट गया जिसे महमूद की सेना ने लूट लिया। इसके बाद महमूद विद्याधर से युद्ध करने का निश्चय त्यागकर गजनी चला गया।

ई.1020 में महमूद गजनवी ने पंजाब में नए सिरे से मुस्लिम शासन की स्थापना की तथा ई.1022 में ग्वालियर पर आक्रमण किया। इस समय ग्वालियर दुर्ग (Gwalior Fort) पर चंदेल राजा विद्याधर के सामंत कीर्तिराज (Kirtiraj) का अधिकार था। उसने महमूद को 35 हाथी समर्पित करके उससे समझौता कर लिया। इसके बाद महमूद चंदेलों की राजधानी कालिंजर की तरफ बढ़ा। राजा विद्याधर इस समय कालिंजर (Kalinjar) में ही मौजूद था। कालिंजर का दुर्ग (Kalinjar Fort) इतना ऊंचा था कि महमूद दुर्ग के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सका।

तत्कालीन मुस्लिम लेखकों ने लिखा है कि कई दिन की घेरेबंदी के बाद राजा विद्याधर (Vidyadhara Chandela of Kalinjar) ने महमूद (Mahmud of Ghazni) के पास संदेश भिजवाया कि यदि महमूद कालिंजर से लौट जाए तो मैं महमूद को 300 हाथी देने के लिए तैयार हूँ। महमूद ने विद्याधर का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

इस पर विद्याधर ने 300 हाथी बिना महावतों के ही दुर्ग से बाहर छुड़वा दिए जिन्हें महमूद के सैनिक पकड़कर ले गए। राजा विद्याधर ने महमूद की प्रशंसा में एक कविता भी लिखकर भिजवाई जिसे पढ़कर महमूद इतना प्रसन्न हुआ कि उसने राजा विद्याधर को स्त्रियाँ, आभूषण, वस्त्र तथा 15 दुर्ग उपहार में दिए।

कहा नहीं जा सकता कि मुस्लिम लेखकों का यह वर्णन कितना सही है क्योंकि तत्कालीन हिन्दू लेखकों ने इस सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखा है। फिर भी इस वर्णन के आधार पर कहा जा सकता है कि दोनों के बीच सम्मानजनक संधि हुई जिसमें दोनों ने एक दूसरे को उपहार दिए।

अजमेर के चौहान (Chauhans of Ajmer) राजाओं से महमूद की कम से कम दो बार जबर्दस्त भिड़ंतें हुईं। पहली भिड़ंत में अजमेर के शासक गोविंदराज (द्वितीय) (Govind Raj Second) ने महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) को परास्त किया। उसके वंशज वीर्यराम के शासन काल में ई.1024 में महमूद गजनवी ने अजमेर पर आक्रमण किया तथा बीठली दुर्ग को घेर लिया। राजा वीर्यराम (Raja Virya Ram of Ajmer) ने महमूद में कसकर मार लगाई जिससे महमूद घायल होकर अन्हिलवाड़ा की तरफ भाग गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोमनाथ महालय की देवदासियां और स्वर्ण-भण्डार (15)

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सोमनाथ महालय की देवदासियां और स्वर्ण-भण्डार

अफगानिस्तान में ऐसी बहुत सी कथाएं प्रचलित थीं जिनमें सोमनाथ महालय की देवदासियां (Devadasis of Somnath Mahalaya) और और स्वर्ण-भण्डार के रोचक विवरण होते थे। महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) अब तक मुल्तान, नगरकोट, मथुरा और कन्नौज के मंदिरों की सम्पदा लूट चुका था। अब वह सोमनाथ महालय की देवदासियां लूटने को आतुर था।

ई.1025 में महमूद ने सौराष्ट्र के विश्व प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर (Somnath Temple) पर आक्रमण करने का निश्चय किया जो भारत के प्रमुख तीर्थों में से एक था। सोमनाथ शिवालय को सौराष्ट्र के चौलुक्य शासकों ने सैंकड़ों गांव अर्पित कर रखे थे जिनसे प्राप्त राजस्व सोमनाथ शिवालय को मिलता था।

सोमनाथ मंदिर (Somnath Temple) के बारे में मध्यएशिया, ईरान एवं अफगानिस्तान में सदियों पहले से ही कहानियाँ प्रसिद्ध थीं। यह मंदिर ईसा के जन्म से भी कई सौ साल पहले अस्तित्व में था। आठवीं शताब्दी ईस्वी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने सोमनाथ के मंदिर (Somnath Temple) को नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी थी। यह सेना अपने उद्देश्य में सफल हुई तथा मंदिर को तोड़ दिया गया। गुर्जरप्रतिहार राजा नागभट्ट (Gurjara-Pratihara King Nagabhata) ने ई.815 में सोमनाथ मंदिर का फिर से निर्माण करवाया।

कहा जाता है कि जब मध्यएशिया के ख्वारिज्म शहर में रहने वाले अलबरूनी नामक एक अरबी लेखक को ज्ञात हुआ कि गजनी के सुल्तान महमूद गजनवी ने हर साल भारत पर आक्रमण करने की घोषणा की है तो वह ख्वारिज्म से चलकर गजनी आ गया ताकि जब महमूद भारत पर आक्रमण करे तो अलबरूनी भारत के भूगोल, इतिहास, ज्योतिष, खगोलशास्त्र एवं सामाजिक जन-जीवन का अध्ययन करके पुस्तकें लिख सके तथा भारत से इन विषयों की दुर्लभ पुस्तकें प्राप्त कर सके।

संभवतः जब महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) मथुरा, ग्वालियर, कन्नौज अथवा कालिंजर के किसी अभियान पर भारत आया तो अलबरूनी उसके साथ भारत आया और उसने इस दौरान हिन्दुओं के प्रसिद्ध तीर्थ सोमनाथ की भी यात्रा की।

भारत से प्राप्त पुस्तकों को आधारित करके अलबरूनी ने अपने जीवन में 146 पुस्तकें लिखीं। यद्यपि इनमें से कई पुस्तकें बहुत छोटी हैं तथापि उस काल के भारत की राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक जनजीवन के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियां देती हैं।

अलबरूनी ने सोमनाथ मंदिर के वैभव, स्थापत्य, देव-प्रतिमाओं तथा धर्मिक रीतियों आदि का इतना भव्य एवं रोचक वर्णन किया कि उसे पढ़कर महमूद गजनवी दंग रह गया। महमूद को ज्ञात हुआ कि सोमनाथ महालय में भारत भर के संभ्रांत परिवारों की सुंदर लड़कियां देवदासियों के रूप में अर्पित की जाती हैं तथा वे हजारों लड़कियां रेशम की साड़ियां और सोने के आभूषण पहनकर एक साथ मंदिर में नृत्य करती हैं। महमूद सोमनाथ महालय की देवदासियां (Devadasis of Somnath Mahalaya) और उनके वस्त्राभूषणों को लूटने के लिए बेताब हो गया।

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आगे बढ़ने से पहले हमें उस काल के दक्षिण भारत एवं गुजरात के मंदिरों में प्रचलित देवदासी प्रथा (Devadasi System) के बारे में चर्चा करनी चाहिए। भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा कब आरम्भ हुई, इसके बारे में निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता किंतु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह काफी प्राचीन प्रथा थी।

मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी देवदासी प्रथा का उल्लेख मिलता है। कालिदास की साहित्यिक रचना ‘मेघदूतम्’ में भी मंदिरों में नृत्य करने वाली तथा आजीवन अविवाहित रहने वाली कन्याओं का उल्लेख किया गया है।

प्राचीन काल के भारत में विशेषकर दक्षिण भारत में विशाल मंदिर समूहों का निर्माण होता था जिनमें हजारों लोगों का प्रतिदिन आना जाना लगा रहता था। इसलिए इन मंदिरों की सफाई, साज-सज्जा, वस्तुओं के भण्डारण, देव-प्रतिमाओं के संरक्षण, कीर्तन-पूजन, दीप-प्रज्वलन, नृत्य एवं गायन आदि के लिए बड़ी संख्या में सेवकों अथवा अनुचरों की आवश्यकता होती थी।

प्रायः युवा लड़कियों को इस काम पर रखा जाता था जो इस कार्य को आसानी से सीख जाती थीं और जीवन भर इसी कार्य में लगी रहती थीं। ये लड़कियां जीवन भर इन्हीं मंदिरों में रह सकें, इसके लिए इन लड़कियों का विवाह देव-प्रतिमाओं के साथ कर दिया जाता था।

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 बहुत से निर्धन लोग धन प्राप्ति के लिए तथा बहुत से श्रद्धालु लोग पुण्य-अर्जन के लिए अपनी पुत्रियां इन मंदिरों में समर्पित कर देते थे। दक्षिण भारत के बहुत से परिवारों में यह प्रथा भी थी कि जब उनकी कोई मनौती पूर्ण होती थी तो वे अपने किसी बच्चे को देवमंदिर में देवता की सेवार्थ समर्पित कर देते थे जिनमें लड़कियां भी होती थीं। देवदासियों को सामान्यतः देवी मानकर उनका सम्मान किया जाता था किंतु कुछ मंदिरों में पुजारियों ने इन्हें अपने भोग-विलास का साधन बना लिया था। कुछ प्राचीन ग्रंथों में देवदासियों द्वारा किए जाने वाले कार्यों के आधार पर देवदासियों की अलग-अलग श्रेणियां बताई गई हैं जिनमें दत्ता, विक्रिता, भृत्या, भक्ता, हृता, अलंकारा तथा नागरी प्रमुख थीं। जो लड़कियां मंदिर में भक्तिभाव से अर्पित की जाती थीं उन्हें दत्ता कहा जाता था। उन्हें देवी का दर्जा मिलता था। वे मंदिर के सभी प्रमुख कार्य करती थीं। जो लड़कियां स्वयं अपने भक्तिभाव से मंदिर में सेवा करती थीं उन्हें भक्ता कहा जाता था। इन्हें भी देवी के समान आदर मिलता था। जो लड़कियां मंदिर द्वारा क्रय की जाती थीं उन्हें विक्रिता कहा जाता था। वे मुख्यतः मंदिरों की साफ-सफाई का काम करती थीं। उन्हें मंदिर की परिचारिका माना जाता था। भृत्या उन देवदासियों को कहते थे जो अपने तथा अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए मंदिर में नृत्य आदि कार्य करती थीं।

जिन लड़कियों अथवा स्त्रियों को दूसरे राज्यों से हरण करके किसी मंदिर को दान कर दिया जाता था, उन्हें हृता कहा जाता था। मंदिर के पुजारी इन औरतों का उपयोग अपनी इच्छानुसार करते थे। राजा, श्रेष्ठि एवं सामंतगण कुछ कन्याओं को मंदिर में उपहार के रूप में भेंट करते थे, उन्हें अलंकारा श्रेणी की देवदासी कहा जाता था। ये भी मंदिर की सम्पत्ति की तरह प्रयुक्त होती थीं। कुछ महिलाएं विधवा अथवा परित्यक्ता होने पर मंदिर में आश्रय प्राप्त करती थीं, उन्हें नागरी कहा जाता था। ये भोजन एवं आश्रय के बदले में मंदिर में सेवा करती थीं।

अलबरूनी ने अपने वर्णन में सोमनाथ महालय की देवदासियां (Devadasis of Somnath Mahalaya) तथा उनके द्वारा किए जाने वाले नृत्यों का विस्तार से उल्लेख किया। इनमें से बहुत सी देवदासियां नृत्य एवं गायन में निष्णात थीं तथा अत्यंत रूपवती थीं। यद्यपि महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) अपने पिछले कई अभियानों में संकटों से घिरकर मृत्यु के मुख में जा पहुंचा था तथापि इसमें कोई संदेह नहीं कि महमूद की शैतानी ताकत उसे गजनी में चैन से नहीं बैठने देती थी। महमूद ने इन देवदासियों को उनके वस्त्रों एवं आभूषणों सहित गजनी में लाने का निर्णय लिया।

महमूद अब तक काश्मीर में किए गए दो अभियानों में पराजय का मुख देख चुका था। उसने अजमेर के दो अभियानों में भी पराजय का मुख देखा था एवं कालिंजर के दो अभियानों में भी उसे सफलता नहीं मिली थी फिर भी महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने सोमनाथ अभियान का निर्णय लिया तो निश्चित रूप से यह निर्णय किसी दुस्साहस से कम नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

थार रेगिस्तान में घुस गया महमूद गजनवी (16)

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रेगिस्तान में घुस गया महमूद गजनवी

सोमनाथ महालय की देवदासियां (Devadasis of Somnath Mahalaya) तथा सोने के भण्डार लूटने के लिए महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) अपने प्राणों की परवाह किए बिना सांप-बिच्छुओं से भरे थार रेगिस्तान (Desert of Thar) में घुस गया।

अब तक किए गए भारत-अभियानों में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) भारतीय राजाओं एवं भारतीय सेनाओं की शक्तियों एवं कमजोरियों को अच्छी तरह जान चुका था। इसलिए गजनी से सोमनाथ तक पहुंचने के लिए महमूद गजनवी ने अच्छी तैयारी की। उस काल में गजनी से सोमनाथ तक आने के लिए दो मार्ग उपलब्ध थे।

पहला मार्ग गजनी से मुल्तान (Ghazni to Multan) होते हुए चौहानों के अजमेर राज्य से होकर सोमनाथ (Ajmer to Somnath) को आता था। यह पूरा मार्ग हरा-भरा, समृद्ध एवं मनुष्यों तथा प्राकृतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण था किंतु इस मार्ग को अपनाने में कठिनाई यह थी कि उस काल में अजमेर के चौहान शासक (Chauhan Rulers of Ajmer) बहुत प्रबल थे और महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) पहले भी दो बार अजमेर के चौहान राजाओं से मार खा चुका था। इसलिए इस राज्य से होकर निकलना लगभग असंभव था।

दूसरा मार्ग गजनी से मुल्तान (Ghazni To Multan) होकर भाटियों के लोद्रवा (Lodrava) राज्य होते हुए सोमनाथ को जाता था। इस मार्ग में भयानक थार रेगिस्तान (Desert of Thar) स्थित था जहाँ सैंकड़ों मील तक न तो पानी की एक बूंद उपलब्ध होती थी और न पेड़-पौधों के ही दर्शन होते थे।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

यह मार्ग जहरीले सांप-बिच्छुओं एवं रेगिस्तानी डाकुओं से भरा हुआ था। इस मरुस्थल में हाथी, घोड़े, बैल तथा गाड़ियां नहीं चल सकती थीं। केवल ऊँट ही एकमात्र साधन था जिसकी पीठ पर बैठकर हजारों सैनिकों को हजारों मील की यात्रा करनी थी। इस भयानक, लम्बे और थकाऊ मार्ग को पार करने के लिए पानी से भरी हुई कई लाख पखालें तथा कई हजार मन अनाज भी ऊंटों की पीठ पर ही लादे जाने थे। इतने ऊँटों का प्रबंध करना भी एक कठिन कार्य था।

यह एक असंभव सा दिखने वाला कार्य था किंतु जब से महमूद (Mahmud of Ghazni) ने मूलस्थान के मार्त्तण्ड मंदिर (Matand Temple of Multan), नगरकोट के बज्रेश्वरी मंदिर (Vajreshwari Devi Temple of Nagarkot) तथा मथुरा के श्रीकृष्ण-जन्मभूमि मंदिर (Krishan Janmabhoomi Mathura) से सोने की बड़ी-बड़ी मूर्तियां लूटी थीं तब से उसकी आँखों में भारत के मंदिरों के सोने को लूटने का लालच बहुत बढ़ गया था। यहाँ तो उसे सोमनाथ के मंदिर से सोने और रेशम से लदी हुई हजारों देवदासियां (Devadasis of Somnath Mahalaya) भी मिलने वाली थीं।

महमूद ने गजनी से सोमनाथ पहुंचने के लिए, चौहानों के भय से अजमेर राज्य से होकर निकलना उचित नहीं समझा तथा थार मरुस्थल के दुर्गम मार्ग पर चलने का निश्चय किया। इस मार्ग पर चलने में एक लाभ यह भी था कि इस काल में लोद्रवा के भाटियों का राज्य कमजोर चल रहा था। कई महीनों तक महमूद इस अभियान की तैयारी करने में जुटा रहा।

जैसे ही वर्षा ऋतु समाप्त हुई और पहाड़ों पर चलना सुगम हो गया, महमूद (Mahmud of Ghazni), गजनी से निकलकर हिन्दुकुश पर्वत (Hindukush Mountains) पर चढ़ गया। 30 हजार ऊंटों पर अन्न तथा जल लादकर तथा 30 हजार घोड़ों पर सैनिकों को बैठाकर 18 अक्टूबर 1025 को महमूद गजनी से रवाना हुआ तथा 9 नवम्बर 1025 को मुल्तान पहुंच गया। इसके बाद वह पंजाब में नदियों के किनारे-किनारे आगे बढ़ता हुआ थार रेगिस्तान (Desert of Thar) की सीमा तक पहुंच गया।

जैसे ही थार मरुस्थल (Desert of Thar) आरम्भ हुआ, महमूद (Mahmud of Ghazni) का सामना गोगाजी चौहान (Gogaji Chauhan) नामक एक अद्भुत वीर से हुआ। गोगाजी चौहान वर्तमान पंजाब के दक्षिण में स्थित एक छोटे से रेगिस्तानी राज्य के शासक थे जिसे ददरेवा कहा जाता है। वर्तमान समय में ददरेवा हिसार तथा बीकानेर के बीच स्थित मरुस्थलीय गांव है।

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लोक मान्यता है कि गोगाजी चौहान (Gogaji Chauhan) ने महमूद की सेना से लड़ते हुए वीर गति प्राप्त की। इस युद्ध के बारे में इतिहास में अधिक उल्लेख नहीं मिलता किंतु निश्चय ही यह एक महत्त्वपूर्ण घटना रही होगी क्योंकि आज एक हजार साल बीत जाने पर भी उत्तर भारत के करोड़ों लोग गोगाजी को लोकदेवता के रूप में पूजते हैं। गोगाजी चौहान को राजस्थान में गोगापीर तथा हरियाणा, उत्तरप्रदेश तथा पंजाब में जाहिर पीर कहा जाता है। जब विकट थार रेगिस्तान (Desert of Thar) आरम्भ हुआ तो महमूद (Mahmud of Ghazni) ने अपने घोड़ों तथा बैलगाड़ियों को एक सेना के संरक्षण में वहीं छोड़ दिया। आगे की यात्रा केवल ऊंटों पर की जा सकती थी। इसलिए सारी खाद्य सामग्री और पानी की पखालें ऊँटों पर लाद दी गईं। रेगिस्तान में यात्रा करना कोई आसान बात नहीं थी। उन दिनों मरुस्थल में चलने वाले काफिले प्रायः रात में यात्रा किया करते थे तथा दिन में किसी स्थान पर तम्बू लगाकर आराम किया करते थे। इन दिनों शीत ऋतु अपने चरम पर थी, इसलिए दिन की तपती धूप तो अधिक परेशान नहीं करती थी किंतु रात को तापमान इतना अधिक गिर जाता था कि मोटे-मोटे कम्बलों में भी सैनिकों के शरीर ठिठुरते थे। थार रेगिस्तान में भूरे-पीले सांपों की एक विचित्र प्रजाति मौजूद थी जो रात के समय सोते हुए सैनिकों के निकट आकर बैठ जाती थी और सैनिकों की सांसों में तेज जहर छोड़ देती थी।

जब सुबह होने पर मृत सैनिक के शरीर की जांच की जाती तो उनका शरीर नीला होता था जिससे अनुमान होता था कि उसे सर्प ने काटा है किंतु शरीर पर सर्पदंश का निशान नहीं मिलता था। स्थानीय लोग उसे पीवणा सांप (Peevna Snake) कहते थे। वह सांप कब तम्बू में घुसता था और कब निकल जाता था, इसका अनुमान तक नहीं हो पाता था।

यही हाल बड़े-बड़े बिच्छुओं का था। वे रेत में छिपे रहते थे और जैसे ही कोई इंसान उसके पास पहुंचता था, वे रेत से निकल कर डंस लेते थे। कई तरह की जहरीली छिपकलियां भी इसी तरह आँख-मिचौनी खेलती थीं। वे चुपके से सैनिकों के कपड़ों में घुस जातीं और जान लिए बिना नहीं छोड़ती थीं। सैंकड़ों फुट ऊंचे रेत के टीलों में पैर घुटनों तक धंस जाते थे। कोई रास्ता, कोई पगडण्डी, कोई ऐसा निशान मीलों तक दिखाई नहीं देता था जिससे यह पता लग सके कि यात्री सही दिशा में जा रहे हैं या नहीं।

महमूद की सेना को केवल इतना पता था कि उन्हें दक्षिण दिशा की तरफ चलते जाना है। महमूद (Mahmud of Ghazni) की सेना मार्ग में कभी-कभार दिखने वाले मरुस्थलीय गांवों के कुछ लोगों को पकड़कर अपने साथ ले लेती थी जो उन्हें कुछ दूरी तक मार्ग दिखा सकते थे।

ऊंटों की पीठ पर बैठकर ऊँचे टीलों को पार करते हुए सैनिक प्रायः यह सोचते थे कि वे रेत के किसी समुद्र में धकेल दिए गए हैं। कौन जाने कभी इस समुद्र का अंत आएगा भी या नहीं! यह यात्रा कभी नहीं हुई होती यदि सैनिकों को पेट की आग ने और महमूद को सोने तथा देवदासियों की भूख ने इस यात्रा के लिए विवश नहीं किया होता।

पहाड़ों, पठारों, जंगलों और मैदानों में घोड़ों की पीठ पर बैठकर कई हजार मील की यात्राएं कर चुका महमूद (Mahmud of Ghazni) स्वयं को घोड़ों के बिना बड़ा असहाय समझ रहा था किंतु थार रेगिस्तान (Desert of Thar) में ऊंटों ने जो गति दिखाई उसे देखकर महमूद हैरान रह गया। वह अपने अनुमान से अपेक्षाकृत बहुत कम समय में लोद्रवा पहुंच गया जो रेत के महासमुद्र के बीचों-बीच स्थित जान पड़ता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पत्थरों से बने आश्चर्य तोड़ दिए महमूद गजनवी ने (17)

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पत्थरों से बने आश्चर्य - www.bharatkaitihas.com
पत्थरों से बने आश्चर्य तोड़ दिए महमूद गजनवी ने

किरातकूप के देवालय (Temples of Kiradu) इतने सुंदर थे जिन्हें देखकर यह कहने को मन होता था कि इन्हें इंसानी हाथों ने नहीं अपितु देवताओं ने बनाया होगा। महमूद गजनवी ने पीले पत्थरों से बने आश्चर्य तोड़ दिए!

जहरीले सांप-बिच्छुओं से भरे थार मरुस्थल में महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) अपने तीस हजार ऊंट सवारों के साथ तेजी से चला जा रहा था। कुछ दिनों की यात्रा के बाद उसे लोद्रवा का दुर्ग (Lodrava Fort) दिखाई दिया। यह पीले पत्थरों से निर्मित दुर्ग था जो तेज धूप में ऐसे चमकता था मानो पूरा दुर्ग सोने की भारी शिलाओं से बनाया गया हो।

रेत के सागर में पत्थरों का यह मजबूत किंतु छोटा दुर्ग किसी आश्चर्य से कम नहीं था। इन दिनों भाटी बच्छराज (Raja Bachchhraj) लोद्रवा का शासक था। जब बच्छराज को ज्ञात हुआ कि महमूद तीस हजार ऊंटों को लेकर आ रहा है तो बच्छराज अपने दुर्ग में युद्ध की तैयारी करके बैठ गया।

यद्यपि बच्छराज (Raja Bachchhraj) के पास सैनिक-शक्ति बहुत कम थी किंतु बच्छराज का दमन किए बिना महमूद (Mahmud of Ghazni) आगे नहीं बढ़ सकता था क्योंकि यदि वह ऐसा करता तो वह आगे से सौराष्ट्र की और पीछे से लोद्रवा की सेनाओं द्वारा घेर लिया जाता। कुछ दिनों की घेराबंदी एवं संक्षिप्त युद्ध के बाद लोद्रवा का दुर्ग भंग कर दिया गया। भटनेर (Bhatner) से आकर लोद्रवा (Lodrava Fort) में बसे यदुवंशी भाटियों ने थार की प्यासी धरती पर अंतिम सांसें लीं।

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यह इतिहास की कैसी विडम्बना थी कि एक दिन इन्हीं भाटियों के किसी पूर्वज गजसिंह ने गजनी का दुर्ग (Fort of Ghazni) बनाया था और आज गजनी से आया एक आक्रांता भाटियों के दुर्ग उजाड़ रहा था। महमूद (Mahmud of Ghazni) ने लोद्रवा नगर (Lodrava Nagar) में पीले पत्थरों से निर्मित कई कलात्मक मंदिर देखे जो दूर से देखने पर सोने से बने हुए लगते थे। महमूद ने इन मंदिरों को भी तोड़ दिया और देवमूर्तियों को नष्ट कर दिया। लोद्रवा के इन मंदिरों एवं दुर्ग के खण्डहर आज भी राजस्थान के जैसलमेर जिले में देखे जा सकते हैं।

लोद्रवा से लगभग 100 मील दक्षिण की ओर चलने पर महमूद गजनवी की सेना को पहाड़ियों का एक झुरमुट दिखाई दिया। प्रकृति भी जाने कैसे-कैसे चमत्कार करती है। इस विकट रेगिस्तान के बीच पहाड़ियों का यह झुरमुट किसी चमत्कार से कम नहीं था।

इन्हीं पहाड़ियों की तलहटी में एक विशाल सरोवर भी था जिसमें वर्षा का निर्मल जल भरा हुआ था। महमूद तथा उसकी सेना ने इन्हीं पहाड़ियों के बीच एक विचित्र नगर देखा। इस नगर का नाम किरातकूप (Kiradu) था और इस नगर में घरों से अधिक देवालय बने हुए थे।

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किरातकूप के देवालय (Temples of Kiradu) इतने सुंदर थे जिन्हें देखकर यह कहने को मन होता था कि इन्हें इंसानी हाथों ने नहीं अपितु देवताओं ने बनाया होगा। पीले पत्थरों से बने इन गगनचुम्बी भव्य देवालयों का समूचा नगर देखकर गजनी की सेना भौंचक्की रह गई। इस स्थान पर पीले पत्थरों के चौबीस बड़े मंदिर थे जिनके भीतर सैंकड़ों देवालय बने हुए थे। इन देवालयों में प्रतिष्ठित हजारों प्रतिमाएं इतनी सजीव दिखाई देती थीं मानो स्वयं देवी-देवता ही मंदिरों में आकर बैठ गए हों। ये पत्थरों से बने आश्चर्य ही प्रतीत होते थे। इस नगर पर राजपूतों की परमार शाखा शासन करती थी। ये मंदिर भी इन्हीं परमार शासकों ने बनवाए थे। इस मंदिर समूह के छः मंदिरों के खण्डहर आज भी देखे जा सकते हैं। इनमें से चार मंदिर भगवान शिव को, एक मंदिर भगवान विष्णु को तथा एक मंदिर शेषावतार को समर्पित है। इनमें सबसे विशाल मंदिर भगवान सोमेश्वर का है किंतु सबसे पुराना मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। महमूद की सेना ने इस मंदिर-समूह को भंग कर दिया। देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के हाथ-पैर, मुंह, नाक, आँख आदि तोड़ दिए गए। प्रमुख देवालयों के शिखरों को ढहा दिया। पूरे मंदिर-समूह का इतना बुरा हाल किया गया कि कल तक जो मंदिर स्वर्ग से उतरी हुई कौतुकी-रचनाएं लगते थे, अब पत्थरों के ढेर से अधिक कुछ नहीं थे।

किरातकूप को अब किराडू कहा जाता है और यह राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित है। किरातकूप के मंदिरों (Temples of Kiradu) को भंग करके महमूद की सेना आगे बढ़ी और राष्ट्रकूटों की प्राचीन राजधानी हस्तिकुण्डी में जा पहुंची। मरुस्थल का दूसरा छोर आ चुका था।

हरियाली फिर से मिलने लगी थी। तालाबों की कोई कमी नहीं रह गई थी। ऊंटों को हरी घास फिर से मिलने लगी थी। गांवों, घरों और खेतों में मनुष्य दिखाई देने लगे थे। महमूद ने हस्तिकुण्डी में भी कुछ भव्य मंदिरों को देखा और उन्हें भी उसी गति को पहुंचा दिया जिस गति को वह किराडू के मंदिरों को पहुंचा कर आया था। हस्तिकुण्डी में पत्थरों से बने आश्चर्य आज भी खण्डहरों के रूप में बिखरे पड़े हैं।

इस नगरी के समस्त राष्ट्रकूट देश की रक्षा के लिए तिल-तिल कर कट मरे। उन्हें धरती पर सुलाकर ही महमूद यहाँ से आगे बढ़ सका। ध्वंस, लूट, आग, हत्या, मरते हुए मनुष्यों के चीत्कार यही सब तो महमूद को आनंद देते थे।

पाठकों की सुविधा के लिए बताना समीचीन होगा कि यही राष्ट्रकूट मारवाड़ के राठौड़ों के पूर्वज थे। बहुत से लोगों का मानना है कि मारवाड़ के राठौड़ कन्नौज से आए थे किंतु सच्चाई यही है कि हस्तिकुण्डी के राष्ट्रकूट ही मारवाड़ के राठौड़ों के पूर्वज थे। हालांकि हस्तिकुण्डी मिट गया किंतु इन्हीं राठौड़ों ने आगे चलकर देश की बहुत बड़ी सेवा की।

हस्तिकुण्डी (Hastikundi) के विध्वंस से संतुष्ट होकर महमूद पालनपुर के निकट स्थित चिकुदर पहाड़ी पहुंचा। इस पहाड़ी पर चिकलोदर माता का अति प्राचीन मंदिर था। महमूद ने उस मंदिर को भी तोड़ डाला। सोमनाथ महालय (Somnath Temple) अब महमूद (Mahmud of Ghazni) से अधिक दूर नहीं रह गया था।

इतनी कठिनाइयां सहन करके महमूद अपने सपने को पूरा होते हुए देखना चाहता था। वह सोमनाथ रूपी स्वर्ग में नृत्य करने वाली उन हजारों अप्सराओं (Devadasis of Somnath Mahalaya) को गजनी ले जाकर गजनी के वेश्यालयों को सजाना चाहता था और सम्पूर्ण भारत का सोना गजनी में ले जाकर गजनी के महलों को सजाना चाहता था ताकि मध्य-एशिया के मुसलमान गजनी से ईर्ष्या करें तथा महमूद की सफलताओं के चर्चे समरकंद से लेकर खुरासान, ख्वारिज्म तथा बगदाद तक की गलियों में हों।

महमूद की आँखें नित नए सपने देख रही थीं किंतु उसके सपने बहुत बड़े थे और जिंदगी बहुत छोटी थी। महमूद नहीं जानता था कि उससे पहले भी बहुत से योद्धाओं ने ऐसे वीभत्स सपने देखे थे किंतु समय आने पर वे योद्धा समय की बाढ़ में मरी हुई चिड़िया की तरह बह गए थे।

वह दिन दूर नहीं रह गया था जब महमूद (Mahmud of Ghazni) के साथ भी ऐसा ही होने वाला था किंतु महमूद उस घड़ी से अनभिज्ञ था और स्वयं को अजर-अमर समझ रहा था। उस पर हिंसा का उन्माद छाया हुआ था, इसलिए इंसान उसे कीड़े-मकोड़े जैसे दिखाई देते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोमनाथ में अरब जैसे बुत देखे महमूद ने(18)

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सोमनाथ में अरब जैसे बुत देखे महमूद ने

जब महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni) ने सोमनाथ मंदिर (Somnath Temple) में प्रवेश किया तब उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उसे सोमनाथ में अरब जैसे बुत (Arab-like idols in Somnath) देखने को मिले। ठीक वैसे ही बुत सोमनाथ में हर ओर लगे हुए थे जो इस्लाम के जन्म से पहले अरब में भी पूजे जाते थे।

सोमनाथ का शिवालय (Somnath Temple) सौराष्ट्र के प्रभासपत्तन (Prabhas Patan) क्षेत्र में सागर तट पर स्थित था जिसे अत्यंत प्राचीन काल में कुशस्थली भी कहा जाता था। इस महालय की स्थापना ईसा मसीह के जन्म से कई सौ साल पहले हुई थी। स्कंद पुराण में लिखा है कि वैदिक सरस्वती (Saraswati River) जिस स्थान पर सागर में आकर मिलती है, उसी स्थान पर सोमेश्वर का प्राचीन मंदिर (The Ancient Temple of Someshvara) स्थित है। यही सोमेश्वर, सोमनाथ (Somnath Temple) के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है तथा इन्हें ‘सोम’ अर्थात् ‘अमृत का देवता’ माना जाता है। 

11वीं सदी के पारसी भूगोलवेत्ता अकारिया अल किजवानी ने सोमनाथ महालय (Somnath Mahalaya) का रोचक वर्णन किया है। उसने लिखा है-

‘सोमनाथ भारत के समुद्र के किनारे एक शानदार शहर में स्थित है। समुद्र का जल नित्य ही ज्वारभाटे के रूप में पूर्वमुखी सोमनाथ मंदिर की मूर्ति का अभिषेक करता है। इसका आश्चर्य मंदिर की एक प्रतिमा है जो मंदिर के गर्भगृह में बिना किसी आधार के अधर में स्थित है।

चन्द्रग्रहण और शिवरात्रि के अवसर पर हजारों हिन्दू इस शिवालय में पूजा करने आते हैं। मान्यता है कि मरणोपरांत हिन्दुओं की आत्मा सोमनाथ में आती है। भगवान सोमनाथ उन आत्माओं को अगले शरीर में प्रवेश कराते हैं …… मूल्यवान से मूल्यवान वस्तुएं भगवान के समर्पण के लिये लायी जाती हैं।

मंदिर खर्च के लिये 10 हजार गांवों से कर लिया जाता है। भगवान सोमेश्वर का हजारों मील दूर स्थित गंगा नदी के जल से प्रतिदिन अभिषेक किया जाता है। मंदिर की अर्चना हेतु एक हजार ब्राह्मण नियुक्त हैं। पांच हजार दासियां मंदिर के द्वार पर नृत्य एवं गायन करती हैं। मंदिर का ढांचा सागवान की लकड़ी के 56 खंभों पर टिका है, जो सीसे की पर्त से ढके हुए हैं।

भगवान सोमनाथ की मूर्ति काले रंग की है, जो मूल्यवान आभूषणों से सुसज्जित है। मंदिर के निकट 100 मन भारी एक सोने की जंजीर है जो प्रातःकाल में मंदिर के घंटे बजाती है जिसे सुनकर मंदिर के ब्राह्मण पूजन के लिये उठते हैं।’

अंग्रेज लेखक इलियट ने किजवानी के कथन को उद्धृत किया है।

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12वीं सदी के जैन लेखक हेमचंद्र के अनुसार सोमनाथ की लूट (Somnath Ki Loot) के समय सौराष्ट्र का राजा भीमदेव चौलुक्य (Bhim Dev Chaulukya) था जो चामुण्डराज (Chamund Raj) के सबसे छोटे बेटे नागराज (Nag Raj) का पुत्र था। गुजरात के इतिहास में उसे भीम (प्रथम) ( Chaulukya Bheem First) भी कहा जाता है। दिसम्बर 1025 के मध्य में महमूद चौलुक्यों की राजधानी अन्हिलपाटन (Anhil Patan or Anhilwada) पहुंचा।

अन्हिलपाटन (Anhil Patan or Anhilwada) में कोई किलेबंदी या सैन्य तैयारी नही थी। कुछ स्रोतों का कहना है कि राजा भीमदेव (Bhim Dev Chaulukya) महमूद (Mahmud of Ghazni) के इस अचानक हमले से भयभीत होकर राजधानी छोड़कर भाग गया और उसने कंठकोट द्वीप में शरण ली। वस्तुतः यह कहना गलत है कि राजा भीमदेव भयभीत हो गया था। वह तो अन्हिलवाड़ा छोड़कर कंठकोट इसलिए गया था क्योंकि अन्हिलवाड़ा में गजनवी का सामना करना संभव नहीं था जबकि कंठकोट का दुर्ग युद्ध एवं सुरक्षा दोनों ही दृष्टि से अधिक उपयुक्त था।

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अन्हिलवाड़ा के नागरिक भी राजा के साथ ही नगर खाली करके चले गए थे। अतः महमूद को अन्हिलवाड़ा (Anhil Patan or Anhilwada) में किसी सैन्य-विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। वह कुछ दिन तक अन्हिलवाड़ा में रुककर सोमनाथ की ओर रवाना हुआ। मार्ग में मोधेरा के राजपूत सामंत ने 20,000 सैनिकों के साथ महमूद (Mahmud of Ghazni) से लोहा लिया। वे सभी सैनिक सोमनाथ की रक्षा के निमित्त तिल-तिल कर कट मरे। मोधेरा से निबटकर महमूद गजनवी देलवाड़ा (Delwada) की तरफ रवाना हुआ। देलवाड़ा के निवासियों ने बिना किसी प्रतिरोघ के आत्मसमर्पण कर दिया। वहाँ से 40 मील आगे बढ़कर महमूद गजनवी सोमनाथ (Somnath) जा पहुंचा जहाँ हिन्दू सैनिकों ने जबरदस्त किलेबंदी कर रखी थी। अबू सैय्यद गरदेजी नामक लेखक के अनुसार 6 जनवरी 1026 को महमूद की सेना ने सोमनाथ मंदिर (Somnath Temple) पर हमला किया। राजपूतों ने डटकर सामना किया किंतु वे पराजित हो गए। हिन्दू सूत्रों के अनुसार राजा भीमदेव युद्ध में घायल होकर अचेत हो गया तथा उसके अंगरक्षक उसे युद्धक्षेत्र से बाहर ले गए। फारूखी ने लिखा है कि राजा भीमदेव चौलुक्य (Bhim Dev Chaulukya) की सेना में एक लाख घुड़सवार, 90 हजार पैदल सेना तथा 200 हाथी थे।

यह संख्या सही प्रतीत नहीं होती क्योंकि महमूद के तीस हजार सैनिक चौलुक्यों के लगभग दो लाख सैनिकों का मुकाबला नहीं कर सकत थे। अवश्य ही चौलुक्य सैनिकों की संख्या महमूद के सैनिकों से कम रही होगी।

कुछ लेखकों ने लिखा है कि महमूद (Mahmud of Ghazni) ने सोमनाथ के मंदिर पर वैसे ही बुत (Arab-like idols in Somnath) लगे हुए देखे जो किसी समय अरब के रेगिस्तान में स्थित मंदिरों में पूजे जाते थे। सोमनाथ में अरब जैसे बुत देखकर महमूद गजनवी हैरान रह गया।  

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...
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डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

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चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...